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भारत के एकीकरण में संस्कृत भाषा की अग्रणी भूमिका है – दिनेश कामत

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संस्कृत में शपथ लेने पर लोकसभा सांसदों को सम्मानित किया नई दिल्ली. लोकसभा सदस्य के रूप में संस्कृत में शपथ लेने वाले सांसदों का 15 जुलाई 2019 को नई दिल्ली स्थित कांस्टीट्यूशन क्लब में संस्कृत भारती ने सम्मान किया. 17वीं लोकसभा में कुल 47 सांसदों ने संस्कृत में शपथ ली है. संस्कृत भारती के राष्ट्रीय महासचिव दिनेश कामत ने कहा ने कहा कि डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने कहा था कि भारत की राजभाषा संस्कृत को बनाया जाना चाहिए. संस्कृत भाषा को ब्राह्मणों से जोड़कर देखा जाता है और उन्हें इसका प्रचार नहीं करना चाहिए, के प्रश्न पर डॉ. आम्बेडकर ने अपने अनुयाइयों से कहा था कि महान कवि व्यास, वाल्मीकि और कालिदास आदि भी ब्राह्मण नहीं थे, जिन्होंने संस्कृत के सर्वमान्य महान ग्रंथों की रचना की थी. भारत के एकीकरण और सांस्कृतिक विकास में संस्कृत भाषा की भूमिका अग्रणी है. उन्होंने कहा कि वर्तमान में संस्कृत भारती के देशभर में 585 केंद्र हैं. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद 37 सांसदों ने संस्कृत में शपथ ली थी और 2019 में अब यह संख्या बढ़कर 47 हो गई है. वर्तमान में न केवल भारत के सांसदों ने संस्कृत में दिलचस्पी दिखाई है, बल्कि चीन सहित 40 देशों और विश्व में 254 विश्वविद्यालयों में संस्कृत का अध्ययन और इस पर शोध किया जा रहा है. केंद्रीय राज्य मंत्री प्रताप चंद सारंगी ने आज के परिदृश्य में संस्कृत की महत्ता को बताया. संस्कृत भारती के दिल्ली प्रांत के मंत्री कौशल किशोर तिवारी ने कहा कि संस्था के प्रयासों से पहली बार इतनी बड़ी संख्या में सांसदों ने संस्कृत भाषा में शपथ ली है. इसलिए संस्था ने इन सभी सांसदों को सम्मानित करने का निर्णय लिया है. केन्द्रीय मंत्री डॉ. हर्षवधन ने पिछली बार भी संस्कृत में शपथ ली थी, इसलिए संस्था ने उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया. उन्होंने कहा कि समारोह में उन सभी सांसदों को भी आमंत्रित किया गया, जिन्होंने इसके पहले संस्कृत में शपथ ली थी. समारोह में संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. भक्त वत्सल विशेष रूप से उपस्थित रहे. संस्कृत में शपथ लेने वाले सांसद संस्कृत में शपथ लेने वालों में प्रमुख रूप से डॉ. हर्षवर्धन, अश्विनी चौबे, प्रताप सारंगी, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, श्रीपद येशो नाईक, मिनाक्षी लेखी, रमेश चंद्र बिधूड़ी, सी.आर. पाटिल, वीरेंद्र सिंह, साक्षी महाराज और निशिकांत दुबे शामिल हैं. कार्यक्रम में सम्मिलित हुए सांसदों में दिलीप घोष, पुष्पेन्द्र सिंह चंदेल, छतर सिंह, पर्वत पटेल, प्रो. रमेश कुमार पांडेय, सुनीता दुग्गल, गिरीश बापट, सुनील मेढ़े, सुदांत मजूमदार, डॉ. श्रेयांश द्विवेदी, संजय सेठ, अजय भट्ट, सुधीर गुप्त, डॉ. महेन्द्र मंजुपरा, प्रभु वसावा, जतिन भाई सिंह महतो, नारायण पंचारिया, राजेन्द्र अग्रवाल, महेन्द्र सोलंकी, गजेन्द्र पटेल, रोडमल नागर, दुर्गादास उइके को संस्कृत सम्मान से सम्मानित किया गया.  

July 17th 2019, 3:20 am

17 जुलाई / जन्म दिवस – भारतीयता के सेतुबंध बालेश्वर अग्रवाल

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नई दिल्ली. भारतीय पत्र जगत में नये युग के प्रवर्तक बालेश्वर अग्रवाल जी का जन्म 17 जुलाई, 1921 को उड़ीसा के बालासोर (बालेश्वर) में जेल अधीक्षक नारायण प्रसाद जी अग्रवाल एवं प्रभादेवी जी के घर में हुआ था. बिहार में हजारीबाग से इंटर उत्तीर्ण कर उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से बीएससी (इंजीनियरिंग) की उपाधि ली तथा डालमिया नगर की रोहतास इंडस्ट्री में काम करने लगे. बालेश्वर जी छात्र जीवन में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आकर अविवाहित रहकर देशसेवा का व्रत अपना चुके थे.

वर्ष 1948 में संघ पर प्रतिबंध लगने पर उन्हें गिरफ्तार कर पहले आरा और फिर हजारीबाग जेल में रखा गया. छह महीने बाद रिहा होकर काम पर गये ही थे कि सत्याग्रह प्रारम्भ हो गया. अतः वे भूमिगत होकर संघर्ष करने लगे. उन्हें पटना से प्रकाशित ‘प्रवर्तक पत्र’ के सम्पादन का काम दिया गया.

बालेश्वर जी की रुचि पत्रकारिता में थी ही. स्वाधीनता के बाद भी इस क्षेत्र में अंग्रेजी के हावी होने से वे बहुत दुखी थे. भारतीय भाषाओं के पत्र अंग्रेजी समाचारों का अनुवाद कर उन्हें ही छापते थे. ऐसे में संघ के प्रयास से वर्ष 1951 में भारतीय भाषाओं में समाचार देने वाली ‘हिन्दुस्थान समाचार’ नामक संवाद संस्था का जन्म हुआ. दादा साहब आप्टे और नारायण राव तर्टे जैसे वरिष्ठ प्रचारकों के साथ बालेश्वर जी भी प्रारम्भ से ही उससे जुड़ गये. इससे भारतीय पत्रों में केवल अनुवाद कार्य तक सीमित संवाददाता अब मौलिक लेखन, सम्पादन तथा समाचार संकलन में समय लगाने लगे. इस प्रकार हर भाषा में काम करने वाली पत्रकारों की नयी पीढ़ी तैयार हुई. ‘हिन्दुस्थान समाचार’ को व्यापारिक संस्था की बजाय ‘सहकारी संस्था’ बनाया गया, जिससे यह देशी या विदेशी पूंजी के दबाव से मुक्त होकर काम कर सके.

उन दिनों सभी पत्रों के कार्यालयों में अंग्रेजी के ही दूरमुद्रक (टेलीप्रिंटर) होते थे. बालेश्वर जी के प्रयास से नागरी लिपि के दूरमुद्रक का प्रयोग प्रारम्भ हुआ. तत्कालीन संचार मंत्री जगजीवन राम जी ने दिल्ली में तथा राजर्षि पुरुषोत्तम दास जी टंडन ने पटना में इसका एक साथ उद्घाटन किया. भारतीय समाचार जगत में यह एक क्रांतिकारी कदम था, जिसके दूरगामी परिणाम हुए.

आपातकाल में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘हिन्दुस्थान समाचार’ पर ताले डलवा दिये, पर बालेश्वर जी शान्त नहीं बैठे. भारत-नेपाल मैत्री संघ, अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद तथा अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग न्यास आदि के माध्यम से विदेशस्थ भारतीयों से सम्पर्क में लग गये. कालान्तर में बालेश्वर जी तथा ये सभी संस्थाएं प्रवासी भारतीयों और भारत के बीच एक मजबूत सेतु बन गयी. वर्ष 1998 में उन्होंने विदेशों में बसे भारतवंशी सांसदों का तथा वर्ष 2000 में ‘प्रवासी भारतीय सम्मेलन’ किया. प्रतिवर्ष नौ जनवरी को मनाये जाने वाले ‘प्रवासी दिवस’ की कल्पना भी उनकी ही थी. प्रवासियों की सुविधा के लिए उन्होंने दिल्ली में ‘प्रवासी भवन’ बनवाया. वे विदेशस्थ भारतवंशियों के संगठन और कल्याण में सक्रिय लोगों को सम्मानित भी करते थे. जिन देशों में भारतीय मूल के लोगों की बहुलता है, वहां उन्हें भारतीय राजदूत से भी अधिक सम्मान मिलता था. कई राज्याध्यक्ष उन्हें अपने परिवार का ही सदस्य मानते थे.

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के प्रतिरूप बालेश्वर जी का न निजी परिवार था और न घर. अनुशासन और समयपालन के प्रति वे सदा सजग रहते थे. देश और विदेश की अनेक संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया था. जीवन का अधिकांश समय प्रवास में बिताने के बाद वृद्धावस्था में वे ‘प्रवासी भवन’ में ही रहते हुए विदेशस्थ भारतीयों के हितचिंतन में लगे रहे. 23 मई, 2013 को 92 वर्ष की आयु में भारतीयता के सेतुबंध का यह महत्वपूर्ण स्तम्भ टूट गया.

July 16th 2019, 6:48 pm

नेहरू-गांधी परिवार की राजनैतिक व कूटनीतिक विफलताएं

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प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जीवन की दो बड़ी विफलताएं – भारत-पाकिस्तान युद्ध (1947) और भारत-चीन युद्ध (1962) हैं. दोनों बार प्रधानमंत्री नेहरू की कमजोर दूरदर्शिता और विफल कूटनीति की साफ झलक दिखाई देती है. इन युद्धों के बाद बनी परिस्थितियों ने भारतीय सैनिकों को सियाचिन ग्लेशियर के 30 डिग्री से कम तापमान वाले मौसम में तैनाती को मजबूर कर दिया. भारतीय जवानों ने वहां शौर्य, जज्बे और दृढ़ता का शानदार प्रदर्शन किया है.

विभाजन के साथ ही भारत को पश्चिम, उत्तर और उत्तर-पूर्व की सीमाओं से चुनौतियां मिलनी शुरू हो गयी थी. शुरुआत में अधिकतर ध्यान पाकिस्तान की ओर था, चीन के तिब्बत पर एकाधिकार ने जल्दी ही हमारी चिंताएं बढ़ा दीं. सरदार पटेल इस उभरते खतरे पर भारत के रुख को ठोस और सुरक्षित करना चाहते थे. उन्होंने 07 नवंबर, 1950 को प्रधानमंत्री को एक पत्र में लिखा, “चीन सरकार ने शांतिपूर्ण इरादों के बल पर हमें बहकाने की कोशिश की है……हालांकि हम खुद को चीन का मित्र मानते हैं, चीनी हमें अपना मित्र नहीं मानते.”

प्रधानमंत्री नेहरू के पास विदेश मंत्रालय की भी अतिरिक्त जिम्मेदारी थी. आमतौर पर जवाहरलाल नेहरू उचित नसीहत की ओर विशेष ध्यान नहीं देते थे. ऐसा ही उन्होंने सरदार पटेल के साथ किया और चीन पर अपना एकतरफा भरोसा कायम रखा. इसका नतीजा 1962 का युद्ध था. इस हार से जम्मू-कश्मीर का 37,544 वर्ग किलोमीटर का हिस्सा चीन के कब्जे में चला गया. साल 1963 में पाकिस्तान ने 5,180 वर्ग किलोमीटर का इलाका भी गैर-कानूनी रूप से चीन को दे दिया. इस तरह अक्साई चिन, मनसार और शाक्सगाम घाटी का कुल 42,735 वर्ग किलोमीटर का इलाका चीन अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर (सीओजेके) कहलाता है.

अब विडम्बना थी कि प्रधानमंत्री नेहरू को कोई सलाह समझ नहीं आती थी, दूसरी ओर वे खुद अपनी समझ के अनुसार भी काम नहीं करते थे. उदाहरण के लिए, उन्होंने 14 मई, 1949 को वी.के. कृष्णा मेनन को एक पत्र लिखा, “कश्मीर का मुद्दा हमारे लिए समस्या बनता जा रहा है. यूएन कमीशन की हमें सहायता नहीं मिल रही है. वास्तव में, उन्होंने हमेशा हमारा हित कमजोर किया है. हमारी उनके साथ लंबी चर्चा हुई है. हम संभवतः उनके हालिया प्रस्तावों को स्वीकार नहीं कर सकते.” (नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी, वी.के. कृष्णा मेनन पेपर्स) फिर भी उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ को पक्षकार बनाते हुए कराची समझौता 1949 किया. पाकिस्तान के साथ युद्ध विराम में जम्मू-कश्मीर में 78,114 वर्ग किलोमीटर का इलाका पाकिस्तान के कब्जे में रह गया. मीरपुर, भिम्बर, कोटली, मुजफ्फराबाद, पूंछ (कुछ हिस्सा), नीलम घाटी और गिलगित-बल्तिस्तान को मिलाकर पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) कहा जाता है.

जवाहरलाल नेहरू की दोनों व्यक्तिगत कमजोरियों के कारण भारत को दो बार भारी नुकसान उठाना पड़ा. हालांकि कराची समझौते में भारत ने सियाचिन ग्लेशियर पर अपना दावा कायम रखा. जिसमें एनजे 9842 (सालोटोरो पर्वत श्रृंखला) से आगे के इलाके को युद्ध विराम की रेखा माना गया. चीन से युद्ध के बाद इसका सामरिक महत्व बढ़ गया. सियाचिन ग्लेशियर एक त्रिकोणीय आकार में लद्दाख से आगे काराकोरम श्रृंखला में स्थित है. इसके पश्चिम में पीओजेके और उत्तर में सीओजेके स्थित है. इस तरह यह ग्लेशियर दोनों कब्जाई जमीनों को एक-दूसरे से अलग करता है. अगर भारत अपनी सेना वहां से हटा ले तो चीन और पाकिस्तान लेह तक अपनी पकड़ बना सकते हैं. इसलिए सियाचिन भारत की सुरक्षा के लिए अहम है.

वैसे प्रधानमंत्री नेहरू ने खुद इस मुद्दे पर 1964 में ही ध्यान दिया था. उन्होंने कहा, “वर्तमान में, हालाँकि, हमारी प्रमुख चिंता हमारे दोनों पड़ोसी चीन और पाकिस्तान हैं. हमें नहीं पता उनका एक-दूसरे से कैसा गोपनीय समझौता है, अगर ऐसा है तो यह भारत के हित में नहीं होगा.” (लोकसभा डिबेट्स, 15 अप्रैल, 1964) यहां उन्हें यह भी ध्यान रखना था कि उपरोक्त समस्या भी उनके कार्यकाल में पनपी थी. अगर प्रधानमंत्री नेहरू समझदारी से काम लेते तो जम्मू-कश्मीर के सभी इलाके भारत का हिस्सा बने रहते. सियाचिन में भी भारतीय सेना को विपरीत हालातों का सामना नहीं करना पड़ता.

जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद इस मामले में उलझनें पैदा होनी शुरू हो गयी. साल 1971 के आसपास पाकिस्तान ने इस क्षेत्र को अपने नक्शे में दर्शाना शुरू कर दिया और सियाचिन एवं उसके आसपास के चोटियों पर अपने पर्वतारोहण अभियान भेजना शुरू कर दिए. इसका पता 1977 में कुमायूं रेजिमनेट के कर्नल नरेंद्र कुमार को चला. कर्नल कुमार की मुलाकात कुछ पर्वतारोही जर्मन नागरिकों से हुई थी. उनके पास मिले नक्शों में सियाचिन को पाकिस्तान का हिस्सा बताया गया था.

इस बीच 02 जुलाई, 1972 को इंदिरा गाँधी और उनके पाकिस्तानी समकक्ष जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच शिमला समझौता हुआ. जिसमें कराची समझौते पर दोनों देशों ने स्थिति को बरकरार रखा. पाकिस्तान ने व्यवहारिकता में समझौते की शर्तों को कभी नहीं अपनाया. भुट्टो को हटाकर वहां जिया-उल-हक ने सैन्य शासन लगा दिया. वे बार-बार सियाचिन में घुसपैठ कर, ग्लेशियर को कब्जाने की योजना बनाने लगे. इसलिए भारतीय सेना की नॉर्दन कमांड को समझ आ गया था कि सियाचिन में सेना की तैनाती बेहद जरुरी है. पाकिस्तान के प्रयास को विफल करने के लिए भारत ने ऑपेरशन मेघदूत और ऑपरेशन राजीव नाम से दो अभियान चलाए. दोनों बार पाकिस्तान को हार का सामना करना पड़ा.

भारतीय सेना की सूझबूझ और तुरंत कार्रवाई ने भारत की सियाचिन में मौजूदगी को संभव किया है. वरना यह पाकिस्तान के कब्जे में लगभग चला ही गया था. इस इलाके में पहली बार शांति की कोशिश प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय हुई. उस दौरान जुल्फिकार की बेटी बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनी. उस दौरान दोनों देशों ने सचिव स्तर पर एक समझौते में निश्चित किया कि सियाचिन में 2 जुलाई, 1972 की स्थिति बनी रहेगी. हालांकि इस बार भी पाकिस्तान ने धोखा दिया. दरअसल 1999 का कारगिल युद्ध पाकिस्तान को सियाचिन में मिली हार का बदला लेने के लिए भारत पर थोपा गया था. जिसका जवाब भारतीय सेना ने पाकिस्तान को एक और हार के रूप में दिया.

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की 1949 और 1962 की गलतियों का नतीजा 1999 तक कायम रहा. यह आज भी जारी है. साल 1984 से 2018 तक 869 सेना के जवान सियाचिन में बलिदान हो गए. यहां दुश्मन से भी ज्यादा खतरनाक मौसम है. अधिकतर मौतें जलवायु परिस्थितियों और पर्यावरण के कारण हुईं. वहां तैनात जवानों के सैन्य उपकरण और अन्य सामग्री पर सरकार 7,500 करोड़ का खर्चा कर चुकी है. नेहरू-गांधी परिवार ने पाकिस्तान से जम्मू-कश्मीर पर कई स्तर की वार्ताएं और समझौते किये, लेकिन कोई खास नतीजा नहीं निकला.

अगर जवाहरलाल नेहरू पाकिस्तान और चीन अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर पर भारत का दावा बनाये रखते तो सियाचिन में भारतीय सेना को इतना नुकसान नहीं उठाना पड़ता. हालाँकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि सेना को मौका मिला और उन्होंने वहां साहस का परिचय दिया. आज सियाचिन भारतीय सेना की उपलब्धियों में से एक है, जिस पर प्रत्येक भारतीय को गर्व है.

देवेश खंडेलवाल

July 16th 2019, 8:55 am

जैश आतंकी बशीर श्रीनगर से गिरफ्तार, 2013 के बाद से था फरार

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दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल को मिली सफलता, जैश आतंकी पर था 02 लाख का पुरस्कार

जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी बशीर अहमद मौलवी को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की टीम ने श्रीनगर से गिरफ्तार किया है. आतंकी बशीर की गिरफ्तार पुलिस के लिए बड़ी सफलता है. बशीर पर 2 लाख रुपये का ईनाम था. बशीर 2013 के बाद से फरार चल रहा था.

जैश-ए-मोहम्मद के 4 आतंकियों को दिल्ली पुलिस ने वर्ष 2007 में गिरफ्तार किया था. जिसमें शाहिद गफूर (पाकिस्तानी आतंकी), बशीर अहमद, फैयाज़ अहमद लोन और अब्दुल माजिद बाबा शामिल थे. इनको एक एनकाउंटर के दौरान स्पेशल सेल की टीम ने दिल्ली के डीडीयू मार्ग से गिरफ्तार किया था. इनके पास से 3 किलो एक्सप्लोसिव, 4 डेटोनेटर, एक टाइमर, 6 ग्रेनेड और एक पिस्टल के साथ 50 हजार रूपये बरामद हुए थे. इसके अलावा इनके पास से नकली डॉलर करंसी भी बरामद हुई थी. दिल्ली में किसी बड़े आतंकी हमले को अंजाम देने की इनकी योजना थी.

मामले में ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया था, ट्रायल कोर्ट के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील दायर की गई. उच्च न्यायालय ने 2013 में सभी को दोषी करार दिया था. उच्च न्यायालय का निर्णय आने के बाद बशीर अहमद, फैयाज़ अहमद लोन और अब्दुल माजिद बाबा ने सरेंडर नहीं किया तथा फरार हो गए. इसके बाद से दिल्ली पुलिस की स्पेशल टीम इनकी खोज में थी. 04 महीने पहले दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को बशीर अहमद के बारे में सुराग मिला. जिसके बाद से लगातार वो ट्रैक किया जा रहा था.

पूरी तसल्ली और रेकी करने के बाद दिल्ली पुसिल की टीम ने बशीर अहमद को श्रीनगर से गिरफ्तार कर लिया. बशीर को दिल्ली लाकर पूछताछ की जा रही है.

July 16th 2019, 5:05 am

16 जुलाई / नदी की स्वच्छता हेतु प्रवेश – जल सेवक सन्त बलबीर सिंह सींचेवाल

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नई दिल्ली. भारत में सन्त, महात्माओं की छवि मुख्यतः धर्मोपदेशक की है, पर कुछ सन्त पर्यावरण संरक्षण, सड़क एवं विद्यालय निर्माण आदि द्वारा नर सेवा को ही नारायण सेवा मानते रहे हैं. ऐसे ही एक सन्त हैं ….. बलबीर सिंह सींचेवाल, जिन्होंने सिख पन्थ के प्रथम गुरु नानकदेव के स्पर्श से पावन हुई ‘काली बेई’ नदी को शुद्ध कर दिखाया. यह नदी होशियारपुर जिले के धनोआ गांव से निकलकर हरी के पत्तन में रावी और व्यास नदी में विलीन होती है.

बलबीर सिंह जी ग्राम सींचेवाल के निवासी हैं. एक बार भ्रमण के दौरान उन्होंने सुल्तानपुर लोधी (जिला कपूरथला) गांव के निकट बहती काली बेई नदी को देखा. वह इतनी प्रदूषित हो चुकी थी कि स्नान और आचमन करना तो दूर, उसे छूने से भी डर लगता था. दुर्गन्ध के कारण उसके निकट जाना भी कठिन था. 162 किमी लम्बी नदी में निकटवर्ती 35 शहरों का मल-मूत्र एवं गन्दगी गिरती थी. नदी के आसपास की जमीनों को भ्रष्ट पटवारियों ने बेच दिया था या फिर उन पर अवैध कब्जे हो चुके थे. लोगों का ध्यान इस पवित्र नदी की स्वच्छता की ओर बिल्कुल नहीं था.

ऐसे में संकल्प के धनी बलबीर सिंह जी ने कारसेवा के माध्यम से नदी को शुद्ध करने का बीड़ा उठाया. उनके साथ  20-22 युवक भी आ जुटे. 16 जुलाई, 2001 को उन्होंने वाहे गुरु को स्मरण कर गुरुद्वारा बेर साहिब के प्राचीन घाट पर अपने साथियों के साथ नदी में प्रवेश किया, पर यह काम इतना आसान नहीं था. स्थानीय माफिया, राजनेताओं, शासन ही नहीं, तो गुरुद्वारा समिति वालों ने भी इसमें व्यवधान डालने का प्रयास किया. उन्हें लगा कि इस प्रकार तो हमारी चौधराहट ही समाप्त हो जाएगी. कुछ लोगों ने उन कारसेवकों से सफाई के उपकरण छीन लिये.

पर, सन्त सींचेवाल ने धैर्य नहीं खोया. उनकी छवि क्षेत्र में बहुत उज्ज्वल थी. वे इससे पहले भी कई विद्यालय और सड़क बनवा चुके थे. उन्हें न राजनीति करनी थी और न ही किसी संस्था पर अधिकार. अतः उन्होंने जब प्रेम से लोगों को समझाया, तो बात बन गयी और फिर तो कारसेवा में सैकड़ों हाथ जुट गये. उन्होंने गन्दगी को शुद्ध कर खेतों में डलवाया, इससे खेतों को उत्तम खाद मिलने लगी और फसल भी अच्छी होने लगी. सबमर्सिबल पम्पों द्वारा भूमि से पानी निकालने की गति जब कम हुई, तो नदी का जल स्तर भी बढ़ने लगा. जब समाचार पत्रों में इसकी चर्चा हुई, तो हजारों लोग पुण्य कार्य में योगदान देने लगे.

सन्त जी ने न केवल नदी को शुद्ध किया, बल्कि उसके पास के 160 किमी लम्बे मार्ग का भी निर्माण कराया. किनारों पर फलदार पेड़ और सुन्दर सुगन्धित फूलों के बाग लगवाये. उन्होंने पुराने घाटों की मरम्मत कराई और नये घाट बनवाये. नदी में नौकायन का प्रबन्ध कराया, जिससे लोगों का आवागमन उस ओर खूब होने लगा. इससे उनकी प्रसिद्धि चहुँ ओर फैल गयी. होते-होते यह प्रसिद्धि तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम तक पहुंची. वे एक वैज्ञानिक होने के साथ ही पर्यावरण प्रेमी भी थे. 17 अगस्त, 2006 को वे स्वयं इस प्रकल्प को देखने आये. उन्होंने देखा कि यदि एक व्यक्ति ही सत्संकल्प से काम करे, तो वह असम्भव को सम्भव कर सकता है. सन्त जी को पर्यावरण के क्षेत्र में अनेक राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय सम्मान मिले हैं, पर वे विनम्र भाव से इसे गुरु कृपा का प्रसाद ही मानते हैं. 2017 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया.

July 15th 2019, 6:26 pm

गुरु पूर्णिमा और संघ

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अपने राष्ट्र और समाज जीवन में गुरुपूर्णिमा-आषाढ़ पूर्णिमा अत्यंत महत्वपूर्ण उत्सव है. व्यास महर्षि आदिगुरु हैं. उन्होंने मानव जीवन को गुणों पर निर्धारित करते हुए उन महान आदर्शों को व्यवस्थित रूप में समाज के सामने रखा. विचार तथा आचार का समन्वय करते हुए, भारतवर्ष के साथ उन्होंने सम्पूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शन किया. इसलिए भगवान वेदव्यास जगत् गुरु हैं. इसीलिए कहा है - 'व्यासो नारायणम् स्वयं'- इस दृष्टि से गुरुपूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा गया है. गुरु की कल्पना "अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन् चराचरं, तत्पदं दर्शितंयेनं तस्मै श्री गुरुवे नम:" यह सृष्टि अखंड मंडलाकार है. बिन्दु से लेकर सारी सृष्टि को चलाने वाली अनंत शक्ति का, जो परमेश्वर तत्व है, वहां तक सहज सम्बंध है. यानी वह जो मनुष्य से लेकर समाज, प्रकृति और परमेश्वर शक्ति के बीच में जो सम्बंध है. इस सम्बंध को जिनके चरणों में बैठकर समझने की अनुभूति पाने का प्रयास करते हैं, वही गुरु है. संपूर्ण सृष्टि चैतन्ययुक्त है. चर, अचर में एक ही ईश्वर तत्व है. इनको समझकर, सृष्टि के सन्तुलन की रक्षा करते हुए, सृष्टि के साथ समन्वय करते हुए जीना ही मानव का कर्तव्य है. सृष्टि को जीतने की भावना विकृति है -सहजीवन ही संस्कृति है. सृष्टि का परम सत्य-सारी सृष्टि परस्पर पूरक है. सम्पूर्ण सृष्टि का आधार है. देना ही संस्कार है, त्याग ही भारतीय संस्कृति है. त्याग, समर्पण, समन्वय-यही हिन्दू संस्कृति है, मानव जीवन में, सृष्टि में शांतियुक्त, सुखमय, आनन्दमय जीवन का आधार है. नित्य अनुभव वृक्ष निरन्तर कार्बन डाइ ऑक्साइड को लेते हुए ऑक्सीजन बाहर छोड़ते हुए सूर्य की सहायता से अपना आहार तैयार कर लेते हैं. उनके ऑक्सीजन यानी प्राणवायु छोड़ने के कारण मानव जी सकता है. मानव का जीवन वृक्षों पर आधारित है अन्यथा सृष्टि नष्ट हो जाएगी. आजकल वातावरण प्रदूषण से विश्व चिंतित है, मानव जीवन खतरे में है. इसलिए सृष्टि के संरक्षण के लिए मानव को योग्य मानव, मानवतायुक्त मानव बनना है, तो गुरुपूजा महत्वपूर्ण है. सृष्टि में सभी जीवराशि, प्रकृति अपना व्यवहार ठीक रखते हैं. मानव में विशेष बुद्धि होने के कारण बुद्धि में विकृति होने से प्रकृति का संतुलन बिगाड़ने का काम भी मानव ही करता है. बुद्धि के अहंकार के कारण मानव ही गड़बड़ करता है. इसलिए 'गुरुपूजा' के द्वारा मानव जीवन में त्याग, समर्पण भाव निर्माण होता है. गुरु व्यक्ति नहीं, तत्व है अपने समाज में हजारों सालों से, व्यास भगवान से लेकर आज तक, श्रेष्ठ गुरु परम्परा चलती आयी है. व्यक्तिगत रीति से करोड़ों लोग अपने-अपने गुरु को चुनते हैं, श्रद्धा से, भक्ति से वंदना करते हैं, अनेक अच्छे संस्कारों को पाते हैं. इसी कारण अनेक आक्रमणों के बाद भी अपना समाज, देश, राष्ट्र आज भी जीवित है.  समाज जीवन में एकात्मता की, एक रस जीवन की कमी है. राष्ट्रीय भावना की कमी, त्याग भावना की कमी के कारण भ्रष्टाचार, विषमय, संकुचित भावनाओं से, ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार, शोक रहित (चारित्र्य दोष) आदि दिखते हैं. इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने गुरु स्थान पर भगवाध्वज को स्थापित किया है. भगवाध्वज त्याग, समर्पण का प्रतीक है. स्वयं जलते हुए सारे विश्व को प्रकाश देने वाले सूर्य के रंग का प्रतीक है. संपूर्ण जीवों के शाश्वत सुख के लिए समर्पण करने वाले साधु, संत भगवा वस्त्र ही पहनते हैं, इसलिए भगवा, केसरिया त्याग का प्रतीक है. अपने राष्ट्र जीवन के, मानव जीवन के इतिहास का साक्षी यह ध्वज है. यह शाश्वत है, अनंत है, चिरंतन है. व्यक्ति पूजा नहीं, तत्व पूजा संघ तत्व पूजा करता है, व्यक्ति पूजा नहीं. व्यक्ति शाश्वत नहीं, समाज शाश्वत है. अपने समाज में अनेक विभूतियां हुई हैं, आज भी अनेक विद्यमान हैं. उन सारी महान विभूतियों के चरणों में शत्-शत् प्रणाम, परन्तु अपने राष्ट्रीय समाज को, संपूर्ण समाज को, संपूर्ण हिन्दू समाज को राष्ट्रीयता के आधार पर, मातृभूमि के आधार पर संगठित करने का कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कर रहा है. इस नाते किसी व्यक्ति को गुरुस्थान पर न रखते हुए भगवाध्वज को ही हमने गुरु माना है. तत्वपूजा - तेज, ज्ञान, त्याग का प्रतीक हमारे समाज की सांस्कृतिक जीवनधारा में 'यज्ञ' का बड़ा महत्व रहा है. 'यज्ञ' शब्द के अनेक अर्थ है. व्यक्तिगत जीवन को समर्पित करते हुए समष्टिजीवन को परिपुष्ट करने के प्रयास को यज्ञ कहा गया है. सद्गुण रूप अग्नि में अयोग्य, अनिष्ट, अहितकर बातों को होम करना यज्ञ है. श्रद्धामय, त्यागमय, सेवामय, तपस्यामय जीवन व्यतीत करना भी यज्ञ है. यज्ञ का अधिष्ठाता देव यज्ञ है. अग्नि की प्रतीक है ज्वाला, और ज्वालाओं का प्रतिरूप है - अपना परम पवित्र भगवाध्वज. हम श्रद्धा के उपासक हैं, अन्धविश्वास के नहीं. हम ज्ञान के उपासक हैं, अज्ञान के नहीं. जीवन के हर क्षेत्र में विशुद्ध रूप में ज्ञान की प्रतिष्ठापना करना ही हमारी संस्कृति की विशेषता रही है. सच्ची पूजा- 'तेल जले, बाती जले-लोग कहें दीप जले' जब दीप जलता है हम कहते हैं या देखते हैं कि दीप जल रहा है, लेकिन सही अर्थ में तेल जलता है, बाती जलती है, वे अपने आपको समर्पित करते हैं तेल के लिए. कारगिल युद्ध में मेजर पद्मपाणी आचार्य, गनर रविप्रसाद जैसे असंख्य वीर पुत्रों ने भारत माता के लिए अपने आपको समर्पित किया. मंगलयान में अनेक वैज्ञानिकों ने अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक सुख की तिलाञ्जलि देकर अपनी सारी शक्ति समर्पित की. प्राचीन काल में महर्षि दधीचि ने समाज कल्याण के लिए, संरक्षण के लिए अपने जीवन को ही समर्पित कर दिया था. समर्पण अपने राष्ट्र की, समाज की परंपरा है. समर्पण भगवान की आराधना है. गर्भवती माता अपनी संतान के सुख के लिए अनेक नियमों का पालन करती है, अपने परिवार में माता, पिता, परिवार के विकास के लिए अपने जीवन को समर्पित करती है. खेती करने वाले किसान और श्रमिक के समर्पण के कारण ही सबको अन्न मिलता है. करोड़ों श्रमिकों के समर्पण के कारण ही सड़क मार्ग, रेल मार्ग तैयार होते हैं. शिक्षक- आचार्यों के समर्पण के कारण ही करोड़ों लोगों का ज्ञानवर्धन होता है. डॉक्टरों के समर्पण सेवा के कारण ही रोगियों को चिकित्सा मिलती है. इस नाते सभी काम अपने समाज में आराधना भावना से, समर्पण भावना से होते थे. पैसा केवल जीने के लिए लिया जाता था. सभी काम आराधना भावना से, समर्पण भावना से ही होते थे. परंतु आज आचरण में हृास दिखता  है. राष्ट्राय स्वाहा- इदं न मम् इसलिए प.पू. डॉ. हेडगेवार जी ने फिर से संपूर्ण समाज में, प्रत्येक व्यक्ति में समर्पण भाव जगाने के लिए, गुरुपूजा की, भगवाध्वज की पूजा का परंपरा प्रारंभ की. व्यक्ति के पास प्रयासपूर्वक लगाई गई शारीरिक शक्ति, बुद्धिशक्ति, धनशक्ति होती है, पर उसका मालिक व्यक्ति नहीं, समाज रूपी परमेश्वर है. अपने लिए जितना आवश्यक है उतना ही लेना. अपने परिवार के लिए उपयोग करते हुए शेष पूरी शक्ति- धन, समय, ज्ञान-समाज के लिए समर्पित करना ही सच्ची पूजा है. मुझे जो भी मिलता है, वह समाज से मिलता है. सब कुछ समाज का है, परमेश्वर का है, जैसे- सूर्य को अर्घ्य देते समय, नदी से पानी लेकर फिर से नदी में डलते हैं. मैं, मेरा के अहंकार भाव के लिए कोई स्थान नहीं. परंतु आज चारों ओर व्यक्ति के अहंकार को बढ़ावा दिया जा रहा है. इस लिए सारी राक्षसी प्रवृत्तियां- अहंकार, ईर्ष्या, पदलोलुपता, स्वार्थ बढ़ गया है, बढ़ रहा है. इन सब आसुरी प्रवृत्तियों को नष्ट करते हुए त्याग, तपस्या, प्रेम, निरहंकार से युक्त गुणों को अपने जीवन में लाने की साधना ही गुरु पूजा है. शिवोभूत्वा शिवंयजेत्- शिव की पूजा करना यानी स्वयं शिव बनना, यानी शिव के गुणों को आत्मसात् करना, जीवन में उतारना है. भगवाध्वज की पूजा यानी गुरुपूजा यानी-त्याग, समर्पण जैसे गुणों को अपने जीवन में उतारते हुए समाज की सेवा करना है. संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी ने स्वयं अपने जीवन को अपने समाज की सेवा में अर्पित किया था, ध्येय के अनुरूप अपने जीवन को ढाला था. इसलिए कहा गया कि प.पू. डॉक्टर जी के जीवन यानी देह आयी ध्येय लेकर. वैसे प.पू. गुरुजी, रामकृष्ण मिशन में दीक्षा लेने के बाद भी हिमालय में जाकर तपस्या करने की दृष्टि होने के बाद भी "राष्ट्राय स्वाहा, इदं न मम्", मैं नहीं तू ही- जीवन का ध्येय लेकर संपूर्ण शक्ति को, तपस्या को, अपनी विद्वता को समाज सेवा में समर्पित किया. लाखों लोग अत्यंत सामान्य जीवन जीने वाले किसान, श्रमिक से लेकर रिक्शा चलाने वाले तक, वनवासी गिरिवासी से लेकर शिक्षित, आचार्य, डॉक्टर तक, ग्रामवासी, नगरवासी भी आज समाज जीवन में अपना समय, धन, शक्ति समर्पण करके कश्मीर से कन्याकुमारी तक काम करते दिखते हैं. भारत के अनेक धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संगठनों में भी ऐसे समर्पण भाव से काम करने वाले कार्यकर्ता मिलते हैं. गुरुपूजा - हर वर्ष आषाढ़ पूर्णिमा को व्यक्तिश: संघ की शाखाओं में गुरुपूजा यानी भगवाध्वज की पूजा स्वयंसेवक करते हैं. अपने तन-मन-धन का धर्म मार्ग से विकास करते हुए, विकसित व्यक्तित्व को समाज सेवा में समर्पित करने का संकल्प लेते हुए, संकल्प को आगे बढ़ाते हुए, जीवन भर व्रतधारी होकर जीने के लिए हर वर्ष भगवाध्वज की पूजा करते हैं. यह दान नहीं, उपकार नहीं, यह अपना परम कर्तव्य है. समर्पण में ही अपने जीवन की सार्थकता है, यही भावना है. परिवार के लिए काम करना गलत नहीं है, परंतु केवल परिवार के लिए ही काम करना गलत है. यह अपनी संस्कृति नहीं है. परिवार के लिए जितनी श्रद्धा से कठोर परिश्रम करते हैं, उसी श्रद्धा से, वैसी कर्तव्य भावना से समाज के लिए काम करना ही समर्पण है. इस भावना का सारे समाज में निर्माण करना है. इस भावना का निर्माण होने से ही भ्रष्टाचार, हिंसा प्रवृत्ति, ईर्ष्या आदि दोष दूर हो जाएंगे. समर्पण भाव से ही सारे समाज में एकात्म भाव भी बढ़ जाएगा. इस भावना से ही लाखों स्वयंसेवक अपने समाज के विकास के लिए, हजारों सेवा प्रकल्प चलाते हैं. समाज में भी अनेक धार्मिक, सामाजिक सांस्कृतिक संस्थानों के कार्यकर्ता अच्छी मात्रा में समाज सेवा करते हैं. आज सभी समर्पण भाव को हृदय में जगाकर काम करने वालों को एकत्र आना है, एक हृदय से मिलकर, परस्पर सहयोग से समन्वय करते हुए, समाज सेवा में अग्रसर होना है. व्यक्तिपूजा को बढ़ावा देते हुए भौतिकवाद, भोगवाद, के वातावरण के दुष्प्रभाव से अपने आपको बचाना भी महान तपस्या है. जड़वाद, भोगवाद, समर्पण, त्याग, सेवा, निरहंकारिता, सहकारिता, सहयोग, समन्वय के बीच संघर्ष है. त्याग, समर्पण, सहयोग, समन्वय की साधना एकाग्रचित होकर, एक सूत्रता में करना ही मार्ग है. मानव जीवन की सार्थकता और विश्व का कल्याण इसी से  संभव है. वी. भगैय्या, सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

July 15th 2019, 5:11 pm

कश्मीर केवल भूभाग नहीं, हमारी संस्कृति व ज्ञान का केंद्र था

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नई दिल्ली. जम्मू कश्मीर विचार मंच एवं भारत नीति प्रतिष्ठान के तत्वाधान में कांस्टीट्यूशन क्लब में ‘रीक्लेमिंग कश्मीर, द सैक्रेड लैंड’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई.

विचारक एवं भाजपा प्रवक्ता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि अक्तूबर 1947 में महाराजा हरिसिंह ने विलय के समझौते पर जब हस्ताक्षर किए थे, तब इसमें एक भी विशेष प्रावधान नहीं था. कश्मीर को हथियाने के लिए युद्ध पाकिस्तान ने शुरु किया, लेकिन हमने जब जीतना शुरु किया तो हमारी जीतती हुई फौज से युद्ध विराम करवा दिया गया. यह विचित्र स्थिति कश्मीर के साथ हुई. युनाइटेड नेशन में इस स्थिति में वो देश जाता है जो छोटा, कमजोर हो और युद्ध हार रहा हो. लेकिन यहां हम जीत रहे थे, तब भी हम युनाइटेड नेशन में गए, दूसरा आत्मघात हमने यह किया.

उन्होंने कहा कि हमारे ज्ञान विज्ञान के संस्थानों का केन्द्र कश्मीर था. कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत के फार्मूले से कश्मीर समस्या का समाधान निकालना चाहते हैं. लेकिन जो कश्मीरियत है, उसमें अगर हजरतबल है तो अमरनाथ भी है. अमरनाथ पर हमला करना कश्मीरियत नहीं हो सकती. सुरक्षाबलों के मारे जाने पर जो जश्न मनाते हैं, यह हैवानियत है इंसानियत नहीं. जो वार्ता के लिए आना चाहता है वह कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत के साथ आए तो जरूर कश्मीर समस्या का समाधान मिलेगा. लेकिन जहां पर खलीफत, हैवानियत और दहशत की बात होगी तो समाधान नहीं निकल सकता. सभ्यताओं के टकराव से बचाव केवल वही कर सकता है, जिसको विविधताओं में सामन्जस्य बिठाना आता हो और वह केवल भारत ही कर सकता है. भारत दुनिया का एकमात्र देश है, जिसने दुनिया के किसी देश पर आक्रमण नहीं किया. हम एकमात्र रिलीजन हैं जो कन्वर्जन में विश्वास नहीं करता. इसलिए हमारे यहां सभ्यताओं का टकराव नहीं है. कश्मीर में शैव मत का बहुत प्रभाव रहा है, बहुत विष पी लिया है भगवान शंकर की तरह, जब पराक्रम दिखाएंगे तो सब आ कर के झुकेंगे.

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज के अध्यक्ष डॉ. कपिल कपूर ने कहा कि शस्त्र और शास्त्र दोनों चाहिए, हिन्दू प्रकृति है कि जब हम शक्तिशाली हो जाते हैं तो शत्रुबोध हमारा कम हो जाता है और फिर हमारा शत्रु की तरफ थोड़ा दया वाला भाव बन जाता है. यह एक कमजोरी है, जिसके कारण हिन्दुओं ने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है. जिन कारणों से आज का कश्मीरी अपनी मूल संस्कृति से कट गया है, उसका पहला कारण वहां की वर्तमान शिक्षा है. सन् 1988 के आतंकवाद के भयावह दौर में भी वहां की लड़कियां युनिवर्सिटी में बुरका नहीं पहनती थीं, सांस्कृतिक नृत्य करती थीं. यह स्थिति उनकी ग्रंथ आधारित शिक्षा के आने से बदली, उन्होंने कश्मीरी भाषा और संस्कृत को निकाल दिया. ऐसे लोगों को शिक्षक बना दिया जो शिक्षक कम और धर्म परिवर्तक ज्यादा दिखाई देते हैं. कश्मीर के विषय में 1987-88 तक इस समस्या के समाधान के लिए बात भी कर सकते थे, लेकिन अब वहां हमारे प्रति इतना द्वेष, वैमनस्य पैदा कर दिया गया है कि अब तो एक बार सशक्त तरीके से पूरे दृढ़ निश्चय के साथ शस्त्र से उनको काबू में करके फिर शास्त्र से उनको बदलना पड़ेगा. यह अभिनव गुप्त का शास्त्र उन्हीं का है, जिसकी गुफा उन्होंने बंद कर दी है.

मेजर (से.नि.) गौरव आर्या ने कहा कि कश्मीर की समस्या राजनीतिक नहीं साम्प्रदायिक है. कश्मीर में मुस्लिम धार्मिक संकीर्णता, उन्माद इतना ज्यादा हो गया है कि वहां की पांच साल की बच्ची यह कहती मिलती है कि जब वह बड़ी होगी तो अपने बच्चे को जेहाद के लिए भेजेगी. भारतीय सेना उस पांच साल की बच्ची से नहीं लड़ सकती. पाकिस्तान ने एक पूरी पीढ़ी को इस तरह से हमारे खिलाफ खड़ा कर दिया है. कश्मीर से पंडितों का पलायन यकायक नहीं हुआ, यह पाकिस्तान द्वारा वहां की जनसंख्या को कम्युनल बनाकर हिन्दुओं के प्रति तीव्र नफरत पैदा करने से हुआ. वहां की आतंकी वारदातें बिना स्थानीय मदद के सम्भव नहीं हो सकतीं. पंजाब में इसी तरह के आतंकवाद को मिलने वाले स्थानीय सहयोग को के.पी.एस गिल ने खत्म किया था. कश्मीर में आतंकवाद को भी इसी सर्जरी से खत्म करना होगा, जिसमें थोड़ा दर्द तो होगा, जिसके लिए देश को कान बंद करने पड़ेंगे क्योंकि कुछ चीखें तो निकलेंगी ही. एक देश का बंटवारा सिर्फ एक बार होता है और एक देश को आजादी सिर्फ एक बार मिलती है. कश्मीर को भी आजादी 1947 में मिल चुकी है, अब कोई आजादी के लिए जगह नहीं है. कश्मीर में पाकिस्तानी झंडा लहराने वाले अलगाववादियों से बातचीत का अब कोई रास्ता नहीं बचा है, उनसे सख्ती से निपटना ही एकमात्र हल है.

डॉ. कुलदीप रत्नू ने कहा कि जब क्रिकेट में भारत हारता है तो कितने ही भारतीय रोने लगते हैं, फिल्म, टीवी सीरियल में किसी पात्र के साथ अन्याय होने पर हम उससे खुद को जुड़ा मानने लगते हैं कि कितना अन्याय हो रहा है उसके साथ, जो वास्तविक नहीं केवल एक्टिंग होती है. लेकिन हकीकत में जब कश्मीर में हजारों कश्मीरियों को मार के बाहर निकाला गया, हमारे जवान मारे गए, तब कितने भारतीयों की आंखों में आंसू आए, कितने भारतीय उनके साथ खड़े हुए?

जम्मू कश्मीर विचार मंच के अध्यक्ष जवाहर लाल कौल ने कहा कि कश्मीर केवल एक भूभाग नहीं है, कुछ लाख लोगों का समूह नहीं है, यह एक संस्कृति है. यह भारतीय सभ्यता का वह अंग है जो उसको ऊर्जा देता है और उसको समकालीन बनाता है, उसे प्रासांगिक बनाता है. अपनी इज्जत, धर्म को बचाने के लिए हम वहां से पलायन कर गए थे. इसमें कोई शर्मिंदगी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि हम हथियारबंद लोग नहीं थे. हम ज्ञान की बातें करते थे, हमने तलवार चलाना नहीं सीखा था, शिक्षा हमारा गहना माना जाता था. इसलिए हमारे यहां विद्वान तो हर जगह पलायन करते रहे हैं. हमको वह सभ्यता संस्कृति को जिंदा रखना है तो अपने इतिहास को याद रखना होगा. क्योंकि जो इतिहास को भूल जाता है, इतिहास उसे भूल जाता है.

July 15th 2019, 9:34 am

गौ तस्करी के आरोपी को पकड़ने गई पुलिस टीम पर हमला, 07 पुलिसकर्मी घायल, आरोपी भागने में सफल

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प्रयागराज जनपद के धूमनगंज स्थित मरियाडीह गांव में गौ तस्करी के आरोपी को पकड़ने गई पुलिस पर गांव वासियों ने हमला कर दिया. गांव वासियों ने पुलिस पर फायरिंग भी की. जिसके चलते आरोपी मौके से भागने में सफल हो गया. घटना में सात पुलिस कर्मी घायल हुए हैं. घायल पुलिस कर्मियों का उपचार कॉल्विन अस्पताल में चल रहा है. घटना के पश्चात क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिये पुलिस बल की तैनाती की गई है.

मीडिया से बातचीत में एसपी (क्राइम) आशुतोष मिश्र ने कहा कि हमले में शामिल आरोपितों को जल्दी ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार हमलावरों को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस ने देर रात तक सर्च ऑपरेशन और छापेमारी की कार्रवाई को जारी रखा.

एसपी आशुतोष मिश्र के अनुसार नुरैन नामक व्यक्ति गौ तस्करी के एक मामले में फरार चल रहा है. पुलिस को सूचना मिली कि वह घर पर है, सूचना के आधार पर शनिवार शाम बम्हरौली थाना क्षेत्र के आठ पुलिस कर्मियों की टीम ने उसे घर पर धर दबोचा. लेकिन नुरैन को लेकर जब पुलिस जाने लगी तो महिलाओं सहित सैकड़ों की संख्या में एकत्रित भीड़ ने पुलिस को घेर लिया. अचानक से पुलिस पर लाठी-डंडों और पत्थरों से हमला कर दिया. मौका पाकर कुछ युवक नुरैन को साथ लेकर भागने में सफल हो गए.

बम्हरौली के चौकी प्रभारी नित्यानंद सिंह ने जब नुरैन का पीछा किया तो उन पर फायरिंग की गई. इसके बाद जान बचाने के लिए पुलिस को पीछे हटना पड़ा. घटना की सूचना उच्चाधिकारियों को मिली तो तुरंत हरकत में आए सिविल लाइन्स के सीओ (सर्कल अफसर) 6 थानों का पुलिस बल और पीएसी लेकर खुद मौके पर पहुंचे. पुलिस फोर्स की मौजूदगी देख ग्रामीण तितर-बितर हो गए.

पुलिस ने 20 लोगों को नामजद किया है और अन्य अज्ञात आरोपियों का भी जिक्र है. सभी के खिलाफ हत्या के प्रयास सहित गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया है.

July 15th 2019, 8:18 am

जम्मू कश्मीर में कम हुईं पत्थरबाजी की घटनाएं

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जम्मू कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाओं में तेजी से कमी आई है. गृह मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों से यह पुष्टि हुई है. गृह मंत्रालय ने रविवार को बताया कि 2016 में पत्थरबाजी की 2600 से अधिक घटनाएं हुईं थीं. जबकि 2019 की पहली छमाही में ऐसी कुछ दर्जन घटनाएं ही हुई हैं. पत्थरबाजी की घटनाओं में लिप्त रहे असामाजिक तत्वों की गिरफ्तारी की घटनाएं भी 10,500 से घट करीब 100 ही रह गईं.

मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2016 में पत्थरबाजी की 2653 घटनाओं में पुलिस ने 10571 लोगों को गिरफ्तार किया था. इन लोगों में से महज 276 जेल भेजे गए और बाकी को चेतावनी देकर छोड़ दिया गया. साल 2016 में हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर घाटी में अशांति का लंबा दौर चला था.

साल 2017 में पत्थरबाजी की 1412 घटनाएं हुईं. इनमें गड़बड़ी फैलाने वाले 2838 लोगों को गिरफ्तार किया गया और उनमें से 63 जेल भेजे गए. 2018 में पत्थरबाजी की 1458 घटनाएं हुईं, इनमें 3797 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 65 जेल भेजे गए. इस साल के पहले छह महीने में पत्थरबाजी की करीब 40 घटनाएं हुईं, जिसमें करीब 100 लोग हिरासत में लिए गए. प्रदेश में 19 जून 2018 को राज्यपाल शासन लागू होने के पश्चात घाटी में सुरक्षा की स्थिति सुधरी है. कहें तो अलगाववादियों पर नकेल कसे जाने का भी परिणाम है.

 

July 15th 2019, 3:14 am

झूठी कहानी बना के हिन्दुओं को बदनाम करने की साजिश

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अब मुसलमानों ने सौहार्द बिगाड़ने का एक नया तरीका ढूंढ लिया है. यदि किसी मुसलमान के साथ किसी भी वजह से मारपीट होती है तो वह मामले को बढ़ाने के लिए आरोप लगा देता है कि उस पर ‘जय श्री राम’ कहने के लिए दबाव बनाया जा रहा था. ‘जय श्री राम’ का उद्घोष न करने पर उनके साथ मार-पीट की गई. ऐसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं, कहीं यह कोई साजिश तो नहीं है ?

कुछ समय पहले, कानपुर जनपद में एक रिक्शा चलाने वाले मुस्लिम युवक ने इसी तरह का आरोप लगा कर शहर का माहौल बिगाड़ने की कोशिश की. बरेली में एक मदरसे के छात्र ने ‘मॉब लिंचिंग’ की फर्जी कहानी गढ़ के साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने का प्रयास किया और अब उन्नाव में भी इसी तरह का विवाद खड़ा किया गया. उन्नाव जनपद का मामला इतना बढ़ गया कि देर रात प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर उत्तर प्रदेश सरकार ने स्थिति स्पष्ट की.

उन्नाव जनपद में क्रिकेट के खेल में हुए विवाद को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की गयी. विवाद बस इतना था कि दारूल उलूम फैज़ेआम मदरसे में पढ़ने वाले कुछ मुसलमान लड़के क्रिकेट खेल रहे थे. क्रिकेट खेलने वाले लड़कों का कुछ लोगों से झगड़ा हो गया और मौके मार – पीट हो गई. मगर मुसलमान लड़कों ने आरोप लगाया कि जब वह क्रिकेट खेल रहे थे. उसी दौरान चार युवक आये और उन लोगों ने जबरदस्ती ‘जय श्री राम’ का उद्घोष करने के लिए कहा. मुसलमान लड़कों के इन्कार करने पर उन चार युवकों ने स्टंप उखाड़ कर मुसलमान लड़कों के ऊपर हमला कर दिया, जिससे मदरसे के कुछ छात्र घायल हो गए.

इस घटना की सूचना मदरसे के प्रधानाचार्य एवं शहर काजी मौलाना निसार अहमद को दी गयी. उन्होंने भारतीय जनता युवा मोर्चा के चार कार्यकर्ताओं के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई. घटना के बाद पुलिस ने नामजद लोगों में से दो को गिरफ्तार भी कर लिया. बाद में मामला फर्जी निकला.

प्रमुख सचिव गृह अवनीश अवस्थी एवं अपर पुलिस महानिदेशक (कानून एवं व्यवस्था) पी. वी. रामाशास्त्री ने सरकार की तरफ से स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि “क्रिकेट के विवाद में मार-पीट की घटना हुई थी. ‘जय श्री राम’ कहलवाने का कोई साक्ष्य नहीं मिला है. उत्तर प्रदेश के कुछ अन्य जनपदों में सौहार्द बिगाड़ने के लिए इस तरह की बात का सहारा लिया जा रहा है. अलीगढ़, कानपुर एवं उन्नाव के मामले में ‘जय श्री राम’ एवं ‘मॉब लिंचिंग’ की बात बिल्कुल झूठी पाई गई है. इस तरफ की अफवाह जो लोग फैला रहे हैं. उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी.”

इसी प्रकार, कानपुर नगर के बाबू पुरवा इलाके का निवासी आतिब, ऑटो चलाने का कार्य करता है. आतिब और उसके परिजनों ने आरोप लगाया था कि बाकरगंज मोहल्ले के सुमित, राजेश और शिवा ये तीनों लोग ऑटो में बैठ गए और आगे चौराहे तक पहुंचाने को कहा. कुछ देर बाद इन लोगों ने आतिब को ‘जय श्री राम’ का उद्घोष करने के लिए कहा. इन्कार करने पर आतिब के साथ मार-पीट की गई. बाद में जब मामला खुला तो पता चला कि “रिक्शा चालक आतिब ने अपने कुछ साथियों के साथ रात में शराब पी थी. शराब पीने के दौरान किसी बात को लेकर झगड़ा हुआ. इसी बीच उन लोगों ने आतिब के साथ मारपीट की. इसी तरह कुछ दिन पहले, अलीगढ़ जनपद के थाना जवां अंतर्गत तालिबनगर के रहने वाले फरमान नियाजी ने भी सौहार्द बिगाड़ने का प्रयास किया. फरमान ने सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल करते हुए यह दावा किया था कि उसके साथ ‘मॉब लिंचिंग’ की घटना हुई थी. फरमान ने आरोप लगाया था कि बरेली जाते समय ट्रेन में कुछ लोगों ने उसके साथ मार -पीट की थी. इस घटना के बाद वह बेहोश हो गया था. होश में आने पर उसने खुद को अंजान जगह पर पाया.

अलीगढ़ की पुलिस ने तत्परता के साथ इस मामले का खुलासा किया. फरमान जब ट्रेन में यात्रा कर रहा था, उस समय उसकी किसी कहासुनी हुई थी. उसके कुछ देर बाद उसके साथ जहर खुरानी की घटना हुई. जहर खुरानी की घटना के बाद वह बेहोश हो गया था. इस मामले को तूल देने के लिए उसने इसे “माब लिंचिंग” की तरह प्रस्तुत किया था.

सुनील राय

पांञ्चजन्य

July 15th 2019, 3:00 am

15 जुलाई / जन्मदिवस – नारी उत्थान को समर्पित: दुर्गाबाई देशमुख

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आंध्र प्रदेश से स्वाधीनता समर में सर्वप्रथम कूदने वाली महिला दुर्गाबाई का जन्म 15 जुलाई, 1909 को राजमुंदरी जिले के काकीनाडा नामक स्थान पर हुआ था. इनकी माता श्रीमती कृष्णवेनम्मा तथा पिता श्री रामाराव थे. पिताजी का देहांत तो जल्दी ही हो गया था; पर माता जी की कांग्रेस में सक्रियता से दुर्गाबाई के मन पर बचपन से ही देशप्रेम एवं समाजसेवा के संस्कार पड़े. उन दिनों गांधी जी के आग्रह के कारण दक्षिण भारत में हिन्दी का प्रचार हो रहा था. दुर्गाबाई ने पड़ोस के एक अध्यापक से हिन्दी सीखकर महिलाओं के लिये एक पाठशाला खोल दी. इसमें उनकी मां भी पढ़ने आती थीं. इससे लगभग 500 महिलाओं ने हिन्दी सीखी. इसे देखकर गांधी जी ने दुर्गाबाई को स्वर्ण पदक दिया. गांधी जी के सामने दुर्गाबाई ने विदेशी वस्त्रों की होली भी जलाई. इसके बाद वे अपनी मां के साथ खादी के प्रचार में जुट गयीं. नमक सत्याग्रह में श्री टी. प्रकाशम के साथ सत्याग्रह कर वे एक वर्ष तक जेल में रहीं. बाहर आकर वे फिर आंदोलन में सक्रिय हो गयीं. इससे उन्हें फिर तीन वर्ष के लिये जेल भेज दिया गया. कारावास का उपयोग उन्होंने अंग्रेजी का ज्ञान बढ़ाने में किया. दुर्गाबाई बहुत अनुशासनप्रिय थीं. 1923 में काकीनाड़ा में हुए कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में वे स्वयंसेविका के नाते कार्यरत थीं. वहां खादी वस्त्रों की प्रदर्शनी में उन्होंने नेहरू जी को भी बिना टिकट नहीं घुसने दिया. आयोजक नाराज हुये; पर अंततः उन्हें टिकट खरीदना ही पड़ा. जेल से आकर उन्होंने बनारस मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा आंध्र विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में बी.ए किया. मद्रास वि. वि. से एम.ए की परीक्षा में उन्हें पांच पदक मिले. इसके बाद इंग्लैंड जाकर उन्होंने अर्थशास्त्र तथा कानून की पढ़ाई की. इंग्लैंड में वकालत कर उन्होंने पर्याप्त धन भी कमाया. स्वाधीनता के बाद उन्होंने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में वकालत की. 1946 में दुर्गाबाई लोकसभा और संविधान सभा की सदस्य निर्वाचित हुईं. 1953 में ही उन्होंने भारत के प्रथम वित्तमंत्री श्री चिन्तामणि देशमुख से नेहरू जी की उपस्थिति में न्यायालय में विवाह किया. इसी वर्ष नेहरू जी ने इन्हें केन्द्रीय समाज कल्याण विभाग का अध्यक्ष बनाया. इसके अन्तर्गत उन्होंने महिला एवं बाल कल्याण के अनेक उपयोगी कार्यक्रम प्रारम्भ किये. इन विषयों के अध्ययन एवं अनुभव के लिये उन्होंने इंग्लैंड, अमेरिका, सोवियत रूस, चीन, जापान आदि देशों की यात्रा भी की. दुर्गाबाई देशमुख ने आन्ध्र महिला सभा, विश्वविद्यालय महिला संघ, नारी निकेतन जैसी कई संस्थाओं के माध्यम से महिलाओं के उत्थान के लिये अथक प्रयत्न किये. योजना आयोग द्वारा प्रकाशित ‘भारत में समाज सेवा का विश्वकोश’ उन्हीं के निर्देशन में तैयार हुआ. आंध्र के गांवों में शिक्षा के प्रसार हेतु उन्हें नेहरू साक्षरता पुरस्कार दिया गया. उन्होंने अनेक विद्यालय, चिकित्सालय, नर्सिंग विद्यालय तथा तकनीकी विद्यालय स्थापित किये. उन्होंने नेत्रहीनों के लिये भी विद्यालय, छात्रावास तथा तकनीकी प्रशिक्षण केन्द्र खोले. दुर्गाबाई देशमुख का जीवन देश और समाज के लिये समर्पित था. लम्बी बीमारी के बाद नौ मई, 1981 को उनका देहांत हुआ. उनके द्वारा स्थापित अनेक संस्थाएं आंध्र और तमिलनाडु में सेवा कार्यों में संलग्न हैं. (संदर्भ - राष्ट्रधर्म दिसम्बर 2010)

July 14th 2019, 7:18 pm

15 जुलाई / इतिहास स्मृति – शहीद जवान का 48 वर्ष बाद अन्तिम संस्कार

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नई दिल्ली. जो भी व्यक्ति इस संसार में आया है, उसकी मृत्यु होती ही है. मृत्यु के बाद अपने-अपने धर्म एवं परम्परा के अनुसार उसकी अंतिम क्रिया भी होती ही है. पर, मृत्यु के 48 साल बाद अपनी जन्मभूमि में किसी की अंत्येष्टि हो, यह सुनकर कुछ अजीब सा लगता है. लेकिन हिमाचल प्रदेश के एक वीर सैनिक कर्मचंद कटोच के साथ कुछ यही हुआ.

वर्ष 1962 में भारत और चीन के मध्य हुए युद्ध के समय हिमाचल प्रदेश के पालमपुर (जिला कांगड़ा) क्षेत्र के पास अगोजर गांव का 21 वर्षीय नवयुवक कर्मचंद सेना में कार्यरत था. हिमाचल के अधिकांश क्षेत्रों में वहां के हर घर से प्रायः कोई न कोई व्यक्ति सेना में होता ही है. इसी परम्परा का पालन करते हुए 19 वर्ष की अवस्था में कर्मचंद थलसेना में भर्ती हो गया था. प्रशिक्षण के बाद उसे चौथी डोगरा रेजिमेण्ट में नियुक्ति मिली. कुछ ही समय बाद धूर्त चीन ने भारत पर हमला कर दिया. हिन्दी-चीनी भाई-भाई की खुमारी में डूबे प्रधानमंत्री नेहरू के होश आक्रमण का समाचार सुनकर उड़ गये. उस समय भारतीय जवानों के पास न समुचित हथियार थे और न ही सर्दियों में पहनने लायक कपड़े और जूते. फिर भी मातृभूमि के मतवाले सैनिक सीमाओं पर जाकर चीनी सैनिकों से दो-दो हाथ करने लगे.

युद्ध शुरू होने के दौरान कर्मचंद के विवाह की बात चल रही थी. मातृभूमि के आह्वान को सुनकर उसने अपनी भाभी को कहा कि मैं तो युद्ध में जा रहा हूं. पता नहीं वापस लौटूंगा या नहीं. तुम लड़की देख लो, पर जल्दबाजी नहीं करना. कर्मचंद को डोगरा रेजिमेण्ट के साथ अरुणाचल की पहाड़ी सीमा पर भेजा गया. युद्ध के दौरान 16 नवम्बर, 1962 को कर्मचंद कहीं खो गया. काफी ढूंढने पर भी न वह जीवित अवस्था में मिला और न ही उसका शव. ऐसा मान लिया गया कि या तो वह शहीद हो गया है या चीन में युद्धबन्दी है. युद्ध समाप्ति के बाद भी काफी समय तक जब उसका कुछ पता नहीं लगा, तो उसके घर वालों ने उसे मृतक मानकर गांव में उसकी याद में एक मंदिर बना दिया.

लेकिन पांच जुलाई, 2010 को अरुणाचल की सीमा पर एक ग्लेशियर के पास सीमा सड़क संगठन के सैन्य कर्मियों को एक शव दिखाई दिया. पास जाने पर वहां सेना का बैज, 303 राइफल, 47 कारतूस, एक पेन और वेतन पुस्तिका भी मिले. साथ की चीजों के आधार पर जांच करने पर पता लगा कि वह भारत-चीन युद्ध में बलिदान हुए कर्मचंद कटोच का शव है. गांव में उसके चित्र और अन्य दस्तावेजों से इसकी पुष्टि भी हो गयी. इस समय तक गांव में कर्मचंद की मां गायत्री देवी, पिता कश्मीर चंद कटोच और बड़े भाई जनकचंद भी मर चुके थे. उसकी बड़ी भाभी और भतीजे जसवंत सिंह को जब यह पता लगा, तो उन्होंने कर्मचंद की अंत्येष्टि गांव में करने की इच्छा व्यक्त की. सेना के अधिकारियों को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी. सेना ने पूरे सम्मान के साथ शहीद का शव पहले पालमपुर की होल्टा छावनी में रखा. वहां वरिष्ठ सैनिक अधिकारियों ने उसे श्रद्धासुमन अर्पित किये. इसके बाद 15 जुलाई, 2010 को शव को अगोजर गांव में लाया गया.

तब तक यह समाचार चारों ओर फैल चुका था. अतः हजारों लोगों ने वहां आकर अपने क्षेत्र के लाडले सपूत के दर्शन किये. इसके बाद गांव के श्मशान घाट में कर्मचंद के भतीजे जसवंत सिंह ने उन्हें मुखाग्नि दी. सेना के जवानों ने गोलियां दागकर शहीद को सलामी दी. बड़ी संख्या में सैन्य अधिकारी तथा शासन-प्रशासन के लोग वहां उपस्थित हुए थे. इस प्रकार 48 वर्ष बाद भारत मां का वीर पुत्र अपनी जन्मभूमि में ही सदा के लिए सो गया.

July 14th 2019, 6:47 pm

एनआईए को मिली सफलता – आतंकियों की साजिश नाकाम

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तमिलनाडु में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के हाथ बड़ी सफलता लगी है. एनआईए की जांच में पता चला है कि आतंकियों ने अंसारुल्ला नाम का संगठन बनाया था जो भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश रच रहा था. इस मामले में एनआईए ने कई जगहों पर छापेमारी की. जिसके बाद कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है.

राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने तमिलनाडु के चेन्नई में सैयद मोहम्मद बुखारी के आवास और कार्यालय में छापा मारा था. इसके साथ ही जांच एजेंसी ने हसन अली युनुसमरिकर और हरीश मोहम्मद के तमिलनाडु के नागापट्टिनम स्थित घर पर भी छापेमारी की थी.

वास्तव में ये लोग एनआईए के रडार पर थे और जांच एजेंसियों को सूचना मिल रही थी कि ये कोई षडयंत्र रच रहे हैं और आतंकी घटनाओं को अंजाम देने की तैयारी कर रहे हैं. एनआईए ने आतंकी संगठन के खिलाफ केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है.

एनआईए ने इन लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 12बी, 121ए और 122 के साथ ही गैरकानूनी गतिविधियों की धारा 17,18,18-बी,38 और 39 के तहत मामला दर्ज किया है. जांच एजेंसियों ने बताया कि पूरी जानकारी पुख्ता होने के बाद चेन्नई में छापेमारी की है. अभी कई लोग एनआईए के रडार पर हैं.

एनआईए की छापेमारी में ये राज खुला है कि ये लोग भारत में हमले की साजिश कर रहे थे और इसके लिए फंड और समर्थकों को जुटाने का काम कर रहे थे. इन लोगों का मकसद भारत में इस्लामिक शासन कायम करना था. जिसके लिए ये आतंकी हमलों की साजिश रच रहे थे.

जांच एजेंसी के अनुसार आतंकियों से देश के अन्य हिस्सों से और बाहर से भी लोग जुड़े हैं. इसकी जांच की जा रही है. सैयद मोहम्मद बुखारी, हसन अली और मोहम्मद युसुफुद्दीन और उसके सहयोगियों ने बड़े पैमाने पर फंड जुटाया है.

पिछले दिनों ही एनआईए ने यूपी और देश के कई हिस्सों में छापेमारी की थी. जिसमें आतंकी बम बनाने के अंतिम चरण में थे. इन आतंकियों से एक देशी रॉकेट लॉंचर भी बरामद किया गया था, साथ ही भारी मात्रा में हथियार भी बरामद किए गए थे.

July 14th 2019, 12:31 pm

माहौल बिगाड़ने के लिये फैलाया जा रहा झूठ

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अब मुसलमानों ने सौहार्द बिगाड़ने का एक नया तरीका ढूंढ लिया है. यदि किसी मुसलमान के साथ किसी भी वजह से मारपीट होती है तो वह मामले को बढ़ाने के लिए आरोप लगा देता है कि उस पर ‘जय श्री राम’ कहने के लिए दबाव बनाया जा रहा था. ‘जय श्री राम’ का उद्घोष न करने पर उनके साथ मार-पीट की गई. ऐसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं, कहीं यह कोई साजिश तो नहीं है ?

कुछ समय पहले, कानपुर जनपद में एक रिक्शा चलाने वाले मुस्लिम युवक ने इसी तरह का आरोप लगा कर शहर का माहौल बिगाड़ने की कोशिश की. बरेली में एक मदरसे के छात्र ने ‘मॉब लिंचिंग’ की फर्जी कहानी गढ़ के साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने का प्रयास किया और अब उन्नाव में भी इसी तरह का विवाद खड़ा किया गया. उन्नाव जनपद का मामला इतना बढ़ गया कि देर रात प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर उत्तर प्रदेश सरकार ने स्थिति स्पष्ट की.

उन्नाव जनपद में क्रिकेट के खेल में हुए विवाद को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की गयी. विवाद बस इतना था कि दारूल उलूम फैज़ेआम मदरसे में पढ़ने वाले कुछ मुसलमान लड़के क्रिकेट खेल रहे थे. क्रिकेट खेलने वाले लड़कों का कुछ लोगों से झगड़ा हो गया और मौके मार – पीट हो गई. मगर मुसलमान लड़कों ने आरोप लगाया कि जब वह क्रिकेट खेल रहे थे. उसी दौरान चार युवक आये और उन लोगों ने जबरदस्ती ‘जय श्री राम’ का उद्घोष करने के लिए कहा. मुसलमान लड़कों के इन्कार करने पर उन चार युवकों ने स्टंप उखाड़ कर मुसलमान लड़कों के ऊपर हमला कर दिया, जिससे मदरसे के कुछ छात्र घायल हो गए.

इस घटना की सूचना मदरसे के प्रधानाचार्य एवं शहर काजी मौलाना निसार अहमद को दी गयी. उन्होंने भारतीय जनता युवा मोर्चा के चार कार्यकर्ताओं के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई. घटना के बाद पुलिस ने नामजद लोगों में से दो को गिरफ्तार भी कर लिया. बाद में मामला फर्जी निकला.

प्रमुख सचिव गृह अवनीश अवस्थी एवं अपर पुलिस महानिदेशक (कानून एवं व्यवस्था) पी. वी. रामाशास्त्री ने सरकार की तरफ से स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि “क्रिकेट के विवाद में मार-पीट की घटना हुई थी. ‘जय श्री राम’ कहलवाने का कोई साक्ष्य नहीं मिला है. उत्तर प्रदेश के कुछ अन्य जनपदों में सौहार्द बिगाड़ने के लिए इस तरह की बात का सहारा लिया जा रहा है. अलीगढ़, कानपुर एवं उन्नाव के मामले में ‘जय श्री राम’ एवं ‘मॉब लिंचिंग’ की बात बिल्कुल झूठी पाई गई है. इस तरफ की अफवाह जो लोग फैला रहे हैं. उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी.”

इसी प्रकार, कानपुर नगर के बाबू पुरवा इलाके का निवासी आतिब, ऑटो चलाने का कार्य करता है. आतिब और उसके परिजनों ने आरोप लगाया था कि बाकरगंज मोहल्ले के सुमित, राजेश और शिवा ये तीनों लोग ऑटो में बैठ गए और आगे चौराहे तक पहुंचाने को कहा. कुछ देर बाद इन लोगों ने आतिब को ‘जय श्री राम’ का उद्घोष करने के लिए कहा. इन्कार करने पर आतिब के साथ मार-पीट की गई. बाद में जब मामला खुला तो पता चला कि “रिक्शा चालक आतिब ने अपने कुछ साथियों के साथ रात में शराब पी थी. शराब पीने के दौरान किसी बात को लेकर झगड़ा हुआ. इसी बीच उन लोगों ने आतिब के साथ मारपीट की. इसी तरह कुछ दिन पहले, अलीगढ़ जनपद के थाना जवां अंतर्गत तालिबनगर के रहने वाले फरमान नियाजी ने भी सौहार्द बिगाड़ने का प्रयास किया. फरमान ने सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल करते हुए यह दावा किया था कि उसके साथ ‘मॉब लिंचिंग’ की घटना हुई थी. फरमान ने आरोप लगाया था कि बरेली जाते समय ट्रेन में कुछ लोगों ने उसके साथ मार -पीट की थी. इस घटना के बाद वह बेहोश हो गया था. होश में आने पर उसने खुद को अंजान जगह पर पाया.

अलीगढ़ की पुलिस ने तत्परता के साथ इस मामले का खुलासा किया. फरमान जब ट्रेन में यात्रा कर रहा था, उस समय उसकी किसी कहासुनी हुई थी. उसके कुछ देर बाद उसके साथ जहर खुरानी की घटना हुई. जहर खुरानी की घटना के बाद वह बेहोश हो गया था. इस मामले को तूल देने के लिए उसने इसे “माब लिंचिंग” की तरह प्रस्तुत किया था.

सुनील राय

पांञ्चजन्य

July 14th 2019, 9:44 am

पहले प्रतापगढ़, अब बूंदी में कट्टरपंथी जिहादियों का संघ की शाखा पर हमला

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जयपुर. पंजाब, केरल व पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं व स्वयंसेवकों पर मुस्लिम जिहादियों व कम्युनिस्टों द्वारा जानलेवा हमला करने के समाचार आते ही हैं. लेकिन ऐसे ही  घटनाक्रम राजस्थान में भी प्रारम्भ हुए हैं.

कुछ दिन पूर्व बूंदी जिले में संघ की सायं शाखा पर हमला हुआ. यहां मुसलमानों की भीड़ ने बाल शाखा में मौजूद स्वयंसेवकों पर जानलेवा हमला कर दिया, हमले में कई बाल स्वयंसेवक घायल हुए हैं. इससे पूर्व 14 जनवरी 2014 को प्रतापगढ़ जिले में भी शाखा में स्वयंसेवकों पर हमला हुआ था. जहां अरनोद तहसील के कोटड़ी गांव में संघ की रात्रि शाखा में किसान स्वयंसेवकों पर मुस्लिम जिहादियों ने बंदूकों से हमला कर दिया था, जिसमें एक दर्जन स्वयंसेवक गोली लगने से गंभीर रूप से घायल हो गए थे. स्वयंसेवकों पर हमला कर भाग रहे मुस्लिम युवकों ने सर्दी से बचाव के लिए अलाव ताप रहे दो लोगों की भी गोली मारकर हत्या कर दी थी. इसके साथ ही राजस्थान में कई जगहों पर हिन्दू समाज के पारम्परिक धार्मिक कार्यक्रमों पर पथराव व हमला करने की घटनाएं सामने आती रही हैं. देश के अन्य हिस्सों की तरह ही जिहादी उन्मादियों द्वारा फैलाए जा रहे कट्टरपंथ की पराकाष्ठा अब राजस्थान में भी देखने को मिल रही है. ऐसी घटनाओं के बावजूद पुलिस-प्रशासन राजनैतिक संरक्षण के चलते हमलावरों के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई नहीं कर रहा है. ऐसे में संघ की शाखाओं व हिन्दू समाज पर आए दिन हो रहे आक्रमण कानून व्यवस्था पर भी प्रश्न खड़ा करते हैं.

बूंदी के संघ कार्यकर्ताओं ने बताया कि बूंदी जिला मुख्यालय के बालचन्द पाड़ा स्थित नवल सागर पार्क में बाल स्वयंसेवकों की सायं शाखा प्रतिदिन लगती है. 10 जुलाई को पार्क में पास में ही मुस्लिमों का कोई कार्यक्रम चल रहा था, जहां स्वयंसेवकों ने उन्हें संघस्थान से दूसरी जगह जाने के लिए बोला तो मुस्लिमों ने स्वयंसेवकों से झगड़ा कर लिया और देखते ही देखते करीब 50 व्यक्ति, जिसमें पुरूषों के साथ महिलाएं भी हाथों में लाठी-डण्डे लिए पार्क में आकर शाखा में व्यायाम कर रहे स्वयंसेवकों पर हमला कर दिया. मुसलमानों की भीड़ ने स्वयंसेवकों को पार्क में दौड़ा-दौड़ाकर पीटा, इतने में ही आसपास के लोगों ने पार्क में पहुंचकर बीच-बचाव किया. स्वयंसेवकों ने थाने पहुंचकर मामला दर्ज कराया तथा आरोपितों की गिरफ्तारी की मांग की. इसके बाद पुलिस ने तीन मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार कर लिया. जहां से एक आरोपित को जमानत पर रिहा तथा दो आरोपितों को जेल भेज दिया गया. पुलिस द्वारा की गई खानापूर्ति से हिन्दू समाज में रोष व्याप्त हो गया. हिन्दू समाज के मुखियाओं ने जिला कलैक्टर को ज्ञापन देकर सख्त कार्रवाई की मांग की तथा आंदोलन की चेतावनी दी. शाखा पर हमले की घटना किसी ने मोबाइल के कैमरे में कैद कर ली, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. वीडियो में दिखाई दे रहा है कि शाखा में मौजूद बाल स्वयंसेवकों को पीटने के लिए उनके पीछे दौड़ा जा रहा है , वे बड़ी मुश्किल से जान बचाकर भागे.

राजस्थान को पश्चिम बंगाल-केरल नहीं बनने देंगे

बूंदी में शाखा में स्वयंसेवकों पर हुए हमले को लेकर 11 जुलाई को विधानसभा में भी हंगामा हुआ. हाड़ोती क्षेत्र के विधायक मदन दिलावर ने कहा कि बूंदी में इमरान के नेतृत्व में असामाजिक  मुस्लिम लोगों ने संघ की शाखा पर हमला किया, जिसके कारण कई स्वयंसेवक जख्मी हो गए. इस संबंध में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाने सात बजे थाने पहुंचने के बावजूद 9.42 पर रिपोर्ट दर्ज की गई.

दिलावर ने कहा कि राजस्थान को पश्चिम बंगाल और केरल नहीं बनने दिया जाएगा. उन्होंने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल और केरल में राज्य सरकारों के संरक्षण में स्वयंसेवकों पर हमले हो रहे हैं, लेकिन राजस्थान में किसी भी स्थिति में ऐसा नहीं होने दिया जाएगा. स्वयंसेवकों पर हमले के मुद्दे पर जब नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया ने अपनी बात रखनी चाही तो संसदीय कार्यमंत्री ने आपत्ति जतायी. कटारिया ने कहा कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष को बोलने से नहीं रोका जा सकता है. यह मामला बहुत गंभीर है और प्रदेशभर की कानून व्यवस्था से जुड़ा हुआ है. सरकार को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए. इस पर संसदीय कार्यमंत्री ने सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए कहा कि बूंदी के प्रकरण में तीन व्यक्तियों की पहचान कर ली गई है और उन्हें जल्द ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा.

सरकार के मंत्री ने बताई मामूली घटना

बूंदी में संघ की शाखा में स्वयंसेवको पर हमले के मामले में स्थानीय पुलिस ने तीन युवकों सद्दाम, शाहिद और शफी को गिरफ्तार किया है. शाखा में हमले का मुद्दा राजस्थान विधानसभा में उठने के बाद काफी चर्चा में रहा, बाद में जवाब देते हुए राजस्थान सरकार के मंत्री शांति धारीवाल ने घटना को बेहद मामूली बताया है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार संघ के स्वयंसेवकों पर हुए हमले को लेकर कितनी गंभीर है. सरकार के मंत्री के बयान से इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि आरोपितों को राजनीतिक संरक्षण भी दिया जा रहा है.

July 14th 2019, 1:51 am

आचार्य गिरिराज किशोर – श्रीराम के कार्य को समर्पित व्यक्तित्व

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विश्व हिन्दू परिषद के मार्गदर्शक आचार्य गिरिराज किशोर का जीवन बहुआयामी था. उनका जन्म 04 फरवरी, 1920 को एटा, उ.प्र. के मिसौली गांव में श्री श्यामलाल एवं श्रीमती अयोध्यादेवी के घर में मंझले पुत्र के रूप में हुआ. हाथरस और अलीगढ़ के बाद उन्होंने आगरा से इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण की. आगरा में श्री दीनदयाल जी और श्री भव जुगादे के माध्यम से वे स्वयंसेवक बने और फिर उन्होंने संघ के लिये ही जीवन समर्पित कर दिया. प्रचारक के नाते आचार्य जी मैनपुरी, आगरा, भरतपुर, धौलपुर आदि में रहे. 1948 में संघ पर प्रतिबंध लगने पर वे मैनपुरी, आगरा, बरेली तथा बनारस की जेल में 13 महीने तक बंद रहे. कारागार से मुक्त होने के बाद संघ कार्य के साथ ही आचार्य जी ने बी.ए. तथा इतिहास, हिन्दी व राजनीति शास्त्र में एम.ए. किया. साहित्य रत्न और संस्कृत की प्रथमा परीक्षा भी उन्होंने उत्तीर्ण कर ली. 1949 से 58 तक वे उन्नाव, आगरा, जालौन तथा उड़ीसा में प्रचारक रहे. इसी दौरान उनके छोटे भाई वीरेन्द्र की अचानक मृत्यु हो गयी. ऐसे में परिवार की आर्थिक दशा संभालने हेतु वे भिण्ड (म.प्र.) के अड़ोखर कॉलेज में प्राचार्य के पद पर नियुक्त हुए. इस काल में विद्यालय का चहुंमुखी विकास हुआ. एक बार डाकुओं ने छात्रावास पर धावा बोलकर कुछ छात्रों का अपहरण कर लिया. आचार्य जी ने जान पर खेलकर एक छात्र की रक्षा की. इससे चारों ओर वे विख्यात हो गये. यहां तक कि डाकू भी उनका सम्मान करने लगे. आचार्य जी की रुचि सार्वजनिक जीवन में देखकर उन्हें अ.भा. विद्यार्थी परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और फिर संगठन मंत्री बनाया गया. नौकरी छोड़कर वे विद्यार्थी परिषद को सुदृढ़ करने लगे. उनका केन्द्र दिल्ली था. उसी समय दिल्ली वि.वि. में पहली बार विद्यार्थी परिषद ने अध्यक्ष पद जीता. फिर आचार्य जी को जनसंघ का संगठन मंत्री बनाकर राजस्थान भेजा गया. आपातकाल में वे 15 मास भरतपुर, जोधपुर और जयपुर जेल में रहे. 1979 में मीनाक्षीपुरम कांड ने पूरे देश में हलचल मचा दी. वहां गांव के सभी 3,000 हिन्दू एक साथ मुसलमान बने. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इससे चिंतित होकर डॉ. कर्णसिंह को कुछ करने को कहा. उन्होंने संघ से मिलकर ‘विराट हिन्दू समाज’ नामक संस्था बनायी. संघ की ओर से श्री अशोक सिंहल और आचार्य जी इस काम में लगे. दिल्ली तथा देश के अनेक भागों में विशाल कार्यक्रम हुये; मथुरा में विराट हिन्दू समाज के द्वारा आयोजित विराट हिन्दू सम्मेलन की संपूर्ण जिम्मेदारी आचार्य जी ने संभाली थी. इसके बाद अशोक जी और आचार्य जी को ‘विश्व हिन्दू परिषद’ के काम में लगा दिया गया. 1983 में प्रथम एकात्मता यात्रा (भारत माता, गंगा माता) के संचालन का दायित्व आचार्यजी के द्वारा ही सम्पन्न हुआ. परिषद में आते ही 1980 के बाद इन दोनों के नेतृत्व में परिषद ने अभूतपूर्व काम किये. संस्कृति रक्षा योजना, द्वितीय एकात्मता यज्ञ यात्रा, राम जानकी यात्रा, रामशिला पूजन, राम ज्योति अभियान, राममंदिर का शिलान्यास आदि ने विश्व हिन्दू परिषद को नयी ऊंचाइयां प्रदान कीं. आज विश्व हिन्दू परिषद गोरक्षा, संस्कृत, सेवा कार्य, एकल विद्यालय, बजरंग दल, दुर्गा वाहिनी, पुजारी प्रशिक्षण, मठ-मंदिर व संतों से संपर्क, घर वापसी आदि आयामों के माध्यम से विश्व का सबसे प्रबल हिन्दू संगठन के रूप में स्थापित है. विश्व हिन्दू परिषद के विभिन्न दायित्व निभाते हुए मीडिया से उनका सजीव सम्बन्ध और सम्पर्क रहता था. आचार्य जी ने इंग्लैंड, हॉलैंड, बेल्जियम, फ्रांस, स्पेन, जर्मनी, रूस, नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क, इटली, मॉरीशस, मोरक्को, गुयाना, नैरोबी, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, सिंगापुर, जापान, थाइलैंड आदि देशों की यात्रा की है. अभी तक आचार्यजी की स्मृति बहुत अच्छी थी, सबसे मिलते थे, वृद्धावस्था संबंधी रोगों के कारण 13 जुलाई, 2014 (रविवार) को 94 वर्ष की सुदीर्घ आयु में उन्होंने अंतिम श्वास ली. उनकी इच्छानुसार उनके नेत्र और देह चिकित्सा विज्ञान के छात्रों के उपयोग हेतु दान किये जायेंगे. - विजय कुमार

July 13th 2019, 7:47 pm

भारतीय ज्ञान का खजाना – 3

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भारत की प्राचीन कलाएं – १

विश्व के किसी भी भूभाग में यदि किसी संस्कृति को टिके रहना है, जीवंत रहना है, तो उसे परिपूर्ण होना आवश्यक है. ‘परिपूर्ण’ का अर्थ यह है कि उस संस्कृति को मानवीय मन का सर्वांगीण विचार करना चाहिए, समाज की इच्छाओं का विचार करना चाहिए. इस कसौटी पर हमारी भारतीय संस्कृति एकदम खरी उतरती है. इसीलिए विभाजन के पश्चात पाकिस्तान के राष्ट्र कवि कहे जाने वाले इकबाल ने लिखा था –

यूनान, मिस्र, रोमां

सब मिट गए जहाँ से…!

कुछ बात है कि हस्ती

मिटती नहीं हमारी..!!

यह ‘हस्ती’, अर्थात हमारी परिपूर्ण जीवन पद्धति. जीवनयापन करने के सभी मानकों को देखें तो हम भारतीय दुनिया से बहुत आगे थे… इस सम्बन्ध में एक छोटा सा उदाहरण देता हूँ –

मैं पहली बार, सन् 1994 में अमेरिका गया था. उससे पहले जापान एवं यूरोप में कई देशों का भ्रमण कर चुका था, इसलिए अमेरिका के प्रति कोई विशेष उत्साह या कौतूहल नहीं था. परन्तु फिर भी अमेरिका की कई कहानियाँ लगातार मेरे कानों पर आती रहीं. सौभाग्य से अमेरिका में मेरी व्यवस्था देखने वाले व्यक्ति भारतीय ही निकले, एक बंगाली बाबू. इस कारण वे निरंतर मुझे अमेरिका का प्रत्येक वैभव दिखाने में जुटे हुए थे. वह मुझे “ड्राईव-इन’ की तकनीक और सुविधा दिखाने ले गए. मुझसे कहा, ‘देखिये अमेरिका में किस प्रकार सभी स्थानों पर ड्राईव-इन की सुविधा मौजूद है. गाड़ी में बैठे-बैठे मैकडोनाल्ड के पैसे चुका सकते हैं और गाड़ी में बैठे-बैठे ही अपना खाने का पैकेट भी ले सकते हैं. उन्होंने मुझे ड्राईव-इन एटीएम मशीन भी दिखाई. निश्चित रूप से मैं थोड़ा प्रभावित तो हुआ ही था.

फिर पाँच-छह वर्षों के बाद एक बार रायगढ़ गया था. शिवाजी महाराज के उस विस्तीर्ण किले के विशाल परिसर में एक बड़ा सा मैदान था. उसे ‘होली का मैदान’ कहते हैं. उस मैदान में मनुष्य की सामान्य ऊँचाई जितने विशाल चबूतरे देखकर मैंने गाईड से पूछा, ‘ये क्या है..? इतने ऊँचे-ऊँचे चबूतरे किसलिए..? कौन चढ़ेगा वहाँ?’

एकदम सहज स्वर में गाईड ने जवाब दिया, ‘यह बाज़ार था. असल में उस जमाने में घुड़सवार अपनी खरीददारी के लिए बाज़ार-हाट आते थे, परन्तु वे अपने घोड़े कहां बांधते? इसीलिए शिवाजी महाराज ने घोड़ों पर बैठे-बैठे ही उन्हें बाज़ार-हाट करने की सुविधा मिले, इस कारण से ऊँचे-ऊँचे चबूतरे बनवाए थे..’.

सच कहता हूँ, यह सुनकर शरीर रोमांच से काँप उठा… कौन आधुनिक है..? कौन मॉडर्न है..?

साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व अपनी जनता और सैनिकों की सुविधा के लिए घोड़ों पर बैठे-बैठे खरीददारी करने के लिए ‘ड्राईव-इन’ बाजार का निर्माण करने वाले शिवाजी महाराज मॉडर्न हैं, या पिछले पचास-साठ वर्ष में ड्राईव-इन का रौब दिखाने वाले अमेरिकी मॉडर्न हैं?

यह बहुत बाद का उदाहरण है. हम भारतीय तो प्राचीनकाल से ही आधुनिक और प्रगतिशील रहे हैं. हमारी समग्र जीवनशैली ही आधुनिक एवं उन्नत थी. ज्ञान-विज्ञान एवं अध्यात्म के क्षेत्र सहित हमारे देश में कला, संगीत जैसे विषयों का निर्माण हुआ, वह उन्नत बना और कालान्तर में प्रगल्भ हुआ. सभी कलाओं को एक निश्चित स्वरूप में बांधने का काम भारत ने किया है.

यदि हम अपनी गायन/वादन परंपरा को देखें, तो यह बहुत ही प्राचीन है. देवी सरस्वती एक प्राचीन देवी है. उनके हाथों में हमें वीणा दिखाई देती है. नौवीं शताब्दी में श्रृंगेरी में निर्मित शारदाम्बा देवी का मंदिर यह सरस्वती देवी का ही मंदिर है. गदग में भी देवी सरस्वती का एक मंदिर ग्यारहवीं शताब्दी में निर्मित है. परन्तु सरस्वती की मूर्तियां इससे भी पहले के कालखंड की प्राप्त होती रहती हैं. सरस्वती की सबसे प्राचीन मूर्ति भी भारत में ही खोजी गई है, जो पहली शताब्दी की है. कहीं-कहीं नृत्य शारदा की मूर्ति भी मिलती है, परन्तु अधिकांश मूर्तियां अपने हाथ में वीणा लिए हुए हैं. अर्थात् वीणा नामक वाद्य को हम कितना पुराना मानें?? कम से कम एक – दो हजार वर्ष पुराना तो माना ही जा सकता है. अर्थात् हमारी संस्कृति में संगीत का उल्लेख कितने प्राचीनकाल से है.

सरस्वती द्वारा धारण की जाने वाला ‘वीणा’ नामक तंतुवाद्य कम से कम चार हजार वर्ष पुराना होने का अनुमान है. प्राचीनकाल में ‘एकतंत्री वीणा’ हुआ करती थी. भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में ‘चित्रा’ (७ तारों की) तथा ‘विपंची’ (९ तारों की), इन प्रमुख वीणाओं का उल्लेख किया है, साथ ही घोषा, कच्छभी जैसी दोयम दर्जे की वीणाओं का उल्लेख भी है.

परन्तु संगीत का उल्लेख हमारे वैदिक कालखंड से ही देखने को मिलता है. ऋग्वेद को विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ माना जाता है, जो पाँच हजार वर्ष पुराना है. ऋग्वेद में संगीत का उल्लेख है. यजुर्वेद के 30वें काण्ड के 19 एवं 20वें मंत्र में अनेक वाद्यों को बजाए जाने का उल्लेख है. अर्थात् उस जमाने में भी ‘वाद्यों को बजाना’ कला ही मानी जाती थी. वाण, वीणा, कर्करीया, तंतुवाद्य के साथ ही अवनद्ध वाद्यों के तहत दुंदुभी, गर्गरा, एवं सुषिर वाद्यों के अंतर्गत बाकुर, नाड़ी, तनव एवं शंख इत्यादि का उल्लेख आता है.

सामवेद में संगीत का विस्तार से वर्णन मिलता है. उस काल में स्वरों को ‘यम’ कहा जाता था. सामवेद में ‘साम’ का घनिष्ठ सम्बन्ध संगीत से ही था. यह इतना घनिष्ठ है कि ‘छान्दोग्योपनिषदः’ में प्रश्न पूछा गया है,

‘कां साम्नो गतिरीती?

– स्वर इति होवाच

अर्थात ‘साम’ की गति क्या है? इसका उत्तर है – स्वर.

वैदिक काल में तीन स्वरों के गायन को ‘साम्रिक’ (वर्तमान में ‘सामूहिक’) कहा जाता था. ये स्वर थे – ग, रे, स.. आगे चलकर यह सात स्वर बने. स्वरों के जो क्रम निर्धारित किए गए और जिनसे एक समूह बना उसे ‘साम’ कहा जाने लगा. फिर बाद में यूरोप वालों ने उनके संगीत के इन क्रमों को ‘स्केल’ नाम दिया.

इसका सीधा सा अर्थ यह है कि भारत की संस्कृति में लगभग तीन से चार हजार वर्ष पहले पूर्णतः विकसित संगीत हुआ करता था. आगे चलकर भरत मुनि का नाट्यशास्त्र हमें मिला, और भारतीय संगीत की प्राचीनता पर मुहर लग गई.

भरत मुनि का कालखंड ईसा पूर्व लगभग पांच सौ वर्ष पहले माना जाता है. परन्तु इस सम्बन्ध में कुछ विवाद भी है. कोई इनका जन्म ईसा पूर्व सौ वर्ष पहले हुआ, ऐसा भी कहते हैं. परन्तु चाहे जो भी हो, भरत मुनि के इस नाट्यशास्त्र ने एक बड़ी महत्त्वपूर्ण बात प्रतिपादित की, वह ये कि भारतीय कलाएं अपने पूर्ण विकसित स्वरूप में तथा एकदम वैज्ञानिक पद्धति के साथ अस्तित्त्व में थीं, यह ठोस स्वरूप में सिद्ध हुआ.

इस ग्रन्थ में नाट्यशास्त्र के साथ ही अन्य सहायक कलाओं की भी व्यवस्थित जानकारी दी गई है. गीत-संगीत संबंधी विस्तृत विवरण इस ग्रन्थ में मिलता है.

अब प्रश्न यह उठता है कि विश्व का सबसे पुराना संगीत कौन सा है? अथवा सबसे पुराना वाद्य कौन सा माना जाएगा? ऐसा कहते हैं कि ईसा पूर्व 4000 वर्ष पहले मिस्र के लोगों ने बांसुरी जैसे कुछ वाद्यों का निर्माण किया था. डेनमार्क में भी ईसा पूर्व 2500 वर्ष पहले ट्रम्पेट जैसे वाद्य का निर्माण हुआ था.

परन्तु पाश्चात्य संस्कृति को सुरों की विशिष्ट श्रेणी में पहुँचाया पायथागोरस ने, अर्थात् ईसा पूर्व 600 वर्ष पहले. इन्होंने स्वरों का मंडल तैयार किया एवं उसकी गणितीय परिभाषा में रचना की.

दुर्भाग्य से भारत में हजारों प्राचीन ग्रन्थ और उनके अवशेष मुस्लिम आक्रमणों में नष्ट हुए. इसलिए हमें अपना एक निश्चित इतिहास निर्धारण करना संभव नहीं होता. परन्तु ईसा पूर्व 2500 वर्ष पहले की कुछ जानकारियां अवश्य मिलती हैं एवं उसके अनुसार संगीत अथवा वाद्यों में कोई नई खोज हुई है, ऐसा प्रतीत नहीं होता. किसी एकाध विकसित कला को शब्दबद्ध करने संबंधी विवरण हमें मिलता है. अर्थात् ये कलाएं और वाद्य उससे भी बहुत पहले के थे यह स्पष्ट होता है.

परन्तु ऋग्वेद एवं सामवेद में संगीत का उल्लेख देखते हुए यह निश्चित ही कहा जा सकता है कि हमारा संगीत कम से कम पांच हजार वर्ष पुराना तो है ही. और मजे की बात यह भी है कि सामवेद के सूत्रों में हमें एक पूर्ण विकसित तथा प्रगल्भ संगीत व्यवस्था दिखाई देती है.

वेदों के साथ ही अनेक उपनिषदों से भी गीत-संगीत एवं अन्य कलाओं का उल्लेख मिलता है. श्रोत सूत्रों में से एक कात्यायन का श्रोत सूत्र है. मूलतः यह वैदिक कर्मकांड संबंधी ग्रन्थ है. परन्तु उसमें भी विभिन्न उत्सवों के अवसर पर गाए जाने वाले गीतों की भरमार है. इस श्रोत सूत्र का कालखंड लगभग साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व का माना जाता है.

जब हम पश्चिमी संगीत का विचार करते हैं, तब एक मजेदार बात पता चलती है. पश्चिमी संगीत में दो हजार / ढाई हजार / तीन हजार वर्ष पहले के उल्लेख मजबूती से किए हुए दिखाई देते हैं और इन उल्लेखों में कोई नई खोज, अथवा किसी नए आविष्कार के बारे में स्पष्ट रूप से बताया गया है.

इसके उलट भारतीय ग्रंथों में हमें जो वर्णन मिलता है, वह किसी विकसित संगीत पद्धति की जानकारी रहती है. सामवेद के सूत्रों में भी विकसित किए गए संगीत का उल्लेख भी है. इसका सीधा अर्थ है कि भारतीय संगीत पूर्णरुप से शास्त्रशुध्द पद्धति से, हजारों वर्ष पहले विकसित हो चुका था. कितने वर्षों पहले?? यह कहना कठिन है…!

हमारा एक और दुर्भाग्य ये भी है कि भारतीय कलाओं के बारे में इतिहास में जो भी सन्दर्भ आते हैं, वे अधिकांश पश्चिमी शोधकर्ताओं के ही होते हैं. ब्रॉडीज़, वुइनडिश, वी. स्मिथ, पिशेल, याकोबी, हार्मन कीट… इत्यादि शोधकर्ताओं का बोलबाला है. स्वाभाविक है कि भारतीय संगीत के इतिहास को एक विशिष्ट उपेक्षित निगाह से ही देखा गया है.

जैसे गीत-संगीत का मामला है, वैसे ही नाटक के बारे में भी है. भारत के समान विकसित नाट्यशास्त्र यदि सर्वांग रुप में कहीं प्रसारित हुआ, तो वह देश है ‘ग्रीस’. हालाँकि उन्नीसवीं शताब्दी में इस बात को लेकर जबरदस्त विवाद उत्पन्न हुआ था कि क्या भारतीयों द्वारा ग्रीस के रंगभूमि की नकल की गई, अथवा ग्रीस की रंगभूमि ही भारतीय नाट्यशास्त्र से प्रभावित होकर उभरकर आई थी…!

इन दोनों बातों में से कौन सी बात सही है…? यह हम अगली कड़ी में देखेंगे…!

–  प्रशांत पोळ

July 13th 2019, 6:25 am

सामाजिक परिवर्तन के लिए स्वयंसेवकों को सक्रिय करेगा संघ – डॉ. मनमोहन वैद्य

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चुनाव के समय जनजागरण अभियान में  11 लाख कार्यकर्ताओं ने 4.5 लाख गांवों में किया संपर्क संघ से जुड़ने के लिए ज्वाइन आरएसएस से मिले आवेदन में बढ़ोतरी 2019 के पहले छः माह में 66835 ने जताई संघ से जुड़ने की इच्छा विजयवाड़ा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य ने कहा कि संघ समाज को साथ लेकर व समाज के सहयोग से काम करता है। आगामी काल में संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक सामाजिक परिवर्तन (Social Transformation) के कार्य में सक्रिय हो, इसके लिए प्रयासों की गति बढ़ाएंगे। भारतीय मूल्यों व सांस्कृतिक जीवन पद्धति के आधार पर समाज में परिवर्तन हो, इसके लिए प्रत्येक स्वयंसेवक को जागरूक कर व प्रशिक्षण देकर सक्रिय किया जाएगा। डॉ. वैद्य विजयवाड़ा में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रांत प्रचारक बैठक के अंतिम दिन पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि संघ के स्वयंसेवक ग्राम विकास के लिये कार्य कर रहे हैं, वर्तमान में देशभर में ग्राम विकास गतिविधि के प्रयासों से 300 गांवों में पूर्ण परिवर्तन हुआ है, और 1000 गांवों में कार्य चल रहा है। आर्गेनिक फार्मिंग व गौ संवर्धन, समाज में सद्भाव जागृत करने के लिए समरसता का कार्य, कुटुंब प्रबोधन का कार्य स्वयंसेवक कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि लोकसभा चुनावों के दौरान संघ के सरसंघचालक जी ने 100 प्रतिशत मतदान का आह्वान किया था। मतदान प्रतिशत बढ़ाने और राष्ट्रीय विषयों के आधार पर मतदान के प्रति मतदाताओं को जागरूक करने के लिए संघ के स्वयंसेवक भी जनजागरण अभियान में लगे थे। स्वयंसेवकों ने घर-घर संपर्क किया, छोटी बैठकें कीं। देशभर में 5.5 लाख गांवों में से 4.5 लाख गांवों में स्वयंसेवकों ने संपर्क किया। संघ की रचना के अनुसार 56 हजार मंडल में से 50 हजार मंडलों तक संघ के स्वयंसेवक पहुंचे। जनजागरण अभियान में 11 लाख स्वयंसेवक एवं समाज के बंधु- भगिनी जुटे। इनमें एक लाख महिलाएं भी शामिल थीं। उन्होंने कहा कि समाज में संघ का स्वागत व समर्थन बढ़ रहा है। संघ से जुड़ने, संघ के बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ी है। 7 दिन के प्राथमिक शिक्षण में प्रति वर्ष एक लाख से अधिक लोग प्रशिक्षण ले रहे हैं। इसी प्रकार वेबसाइट पर ज्वाइन आरएसएस के तहत मिलने वाली रिक्वेस्ट में भी बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2014 में पहले छः माह (जनवरी से जून तक) में 39760 रिक्वेस्ट प्राप्त हुई, 2016 में इसी कालावधि में 47200, वर्ष 2018 में 56892 तथा 2019 में 66835 लोगों ने संघ से जुड़ने की इच्छा जताई है। इनमें अधिकांश 40 वर्ष तक की आयु के लोग हैं। संघ ने पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में नई गतिविधि शुरू की है। और इसके लिए संघ शिक्षा वर्गों में अलग-अलग प्रयोग कर स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। जल के न्यूनतम उपयोग से स्नानादि आवश्यक कार्य कर जल की बचत व विभिन्न माध्यमों से जल संरक्षण का प्रशिक्षण स्वयंसेवकों को दिया गया। सह सरकार्यवाह मनमोहन वैद्य ने बताया कि जागरण पत्रिकाओं के माध्यम से 175000 गांवों में राष्ट्रीय विचार को पहुंचाने का कार्य चल रहा है। इस वर्ष प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग में 12432 प्रतिभागी शामिल रहे, लगभग 80 स्थानों पर आयोजित संघ शिक्षा वर्गों में 17500 शिक्षार्थियों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्होंने बताया कि बैठक में प्रांत प्रचारक, क्षेत्र प्रचारक, अखिल भारतीय अधिकारी तथा विविध संगठनों के संगठन मंत्री उपस्थित हैं। प्रांत प्रचारक बैठक निर्णय लेने वाली बैठक नहीं है। निर्णय लेने वाली बैठक कार्यकारी मंडल और प्रतिनिधि सभा की होती है। पत्रकार वार्ता में उनके साथ आंध्र प्रदेश के प्रांत संघचालक श्री श्रीनिवास राजू और अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार भी उपस्थित थे।

July 13th 2019, 6:25 am

13 जुलाई / बलिदान दिवस – बाजीप्रभु देशपाण्डे का बलिदान

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नई दिल्ली. छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा हिन्दू पद-पादशाही की स्थापना में जिन वीरों ने नींव के पत्थर की भांति स्वयं को विसर्जित किया, उनमें बाजीप्रभु देशपाण्डे का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. एक बार शिवाजी 6,000 सैनिकों के साथ पन्हालगढ़ में घिर गये. किले के बाहर सिद्दी जौहर के साथ एक लाख सेना डटी थी. बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह ने अफजलखां के पुत्र फाजल खां के शिवाजी को पराजित करने में विफल होने पर उसे भेजा था. चार महीने बीत गये. एक दिन तेज आवाज के साथ किले का एक बुर्ज टूट गया. शिवाजी ने देखा कि अंग्रेजों की एक टुकड़ी भी तोप लेकर वहां आ गयी है. किले में रसद भी समाप्ति पर थी.

साथियों से परामर्श में यह निश्चय हुआ कि जैसे भी हो, शिवाजी 40 मील दूर स्थित विशालगढ़ पहुंचें. 12 जुलाई, 1660 की बरसाती रात में एक गुप्त द्वार से शिवाजी अपने विश्वस्त 600 सैनिकों के साथ निकल पड़े. भ्रम बनाये रखने के लिए अगले दिन एक दूत यह सन्धिपत्र लेकर सिद्दी जौहर के पास गया कि शिवाजी बहुत परेशान हैं, अतः वे समर्पण करना चाहते हैं. यह समाचार पाकर मुगल सैनिक उत्सव मनाने लगे. यद्यपि एक बार उनके मन में शंका तो हुई, पर फिर सब शराब और शबाब में डूब गये. समर्पण कार्यक्रम की तैयारी होने लगी. उधर, शिवाजी का दल तेजी से आगे बढ़ रहा था. अचानक गश्त पर निकले कुछ शत्रुओं की निगाह में वे आ गये. तुरन्त छावनी में सन्देश भेजकर घुड़सवारों की एक टोली उनके पीछे लगा दी गयी.

पर, इधर भी योजना तैयार थी. एक अन्य पालकी लेकर कुछ सैनिक दूसरी ओर दौड़ने लगे. घुड़सवार उन्हें पकड़कर छावनी ले आये, पर वहां आकर उन्होंने माथा पीट लिया. कारण, पालकी में नकली शिवाजी थे. नये सिरे से फिर पीछा शुरू हुआ. तब तक महाराज तीस मील पारकर चुके थे, पर विशालगढ़ अभी दूर था. इधर शत्रुओं के घोड़ों की पदचाप सुनायी देने लगी थी. इस समय शिवाजी एक संकरी घाटी से गुजर रहे थे. अचानक बाजीप्रभु ने उनसे निवेदन किया कि मैं यहीं रुकता हूं. आप तेजी से विशालगढ़ की ओर बढ़ें. जब तक आप वहां नहीं पहुंचेंगे, तब तक मैं शत्रु को पार नहीं होने दूंगा. शिवाजी के सामने असमंजस की स्थिति थी, पर सोच-विचार का समय नहीं था. आधे सैनिक बाजीप्रभु के साथ रह गये और आधे शिवाजी के साथ चले. निश्चय हुआ कि पहुंच की सूचना तोप दागकर दी जाएगी.

घाटी के मुख पर बाजीप्रभु डट गये. कुछ ही देर में सिद्दी जौहर के दामाद सिद्दी मसूद के नेतृत्व में घुड़सवार वहां आ पहुंचे. उन्होंने दर्रे में घुसना चाहा, पर सिर पर कफन बांधे हिन्दू सैनिक उनके सिर काटने लगे. भयानक संग्राम छिड़ गया. सूरज चढ़ आया, पर बाजीप्रभु ने उन्हें घाटी में घुसने नहीं दिया. एक-एक कर हिन्दू सैनिक धराशायी हो रहे थे. बाजीप्रभु भी सैकड़ों घाव खा चुके थे, पर उन्हें मरने का अवकाश नहीं था. उनके कान तोप की आवाज सुनने को आतुर थे. विशालगढ़ के द्वार पर भी शत्रु सेना का घेरा था. उन्हें काटते मारते शिवाजी किले में पहुंचे और तोप दागने का आदेश दिया.

इधर, तोप की आवाज बाजीप्रभु के कानों ने सुनी, उधर उनकी घायल देह धरती पर गिरी. शिवाजी विशालगढ़ पहुंचकर अपने उस प्रिय मित्र की प्रतीक्षा ही करते रह गये, पर उसके प्राण तो लक्ष्य पूरा करते-करते अनन्त में विलीन हो चुके थे. बाजीप्रभु देशपाण्डे की साधना सफल हुई. तब से वह बलिदानी घाटी (खिण्ड) पावन खिण्ड कहलाती है.

July 12th 2019, 6:14 pm

पशु तस्करों ने बीएसएफ जवान पर बम से हमला किया, गंभीर रूप से घायल

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पश्चिम बंगाल के रास्ते पशु तस्करी करने वाले तस्करों ने 11 जुलाई को ड्यूटी पर तैनात एक बीएसएफ (BSF) जवान को बम से निशाना बनाया. जवान का नाम कॉन्स्टेबल अनीसुर रहमान है. हमले में जवान ने अपना एक हाथ गंवा दिया है, गंभीर रूप से घायल जवान का उपचार कोलकाता के अस्पताल में चल रहा है. घटना नॉर्थ 24 परगना जिले में अंगरेल सीमा चौकी के समीप सुबह-सुबह साढ़े तीन बजे घटी.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 11 जुलाई की सुबह करीब 3:30 बजे 25 पशु तस्कर 10 से 15 पशुओं की तस्करी का प्रयास कर रहे थे. ये तस्कर अपनी सुरक्षा के लिए हथियारों से लैस होकर बॉर्डर में दाखिल हुए थे. पशुओं को लेकर बांग्लादेश में दाखिल होने ही वाले थे कि तभी सीमा पर तैनात जवान को इन तस्करों की गतिविधि की भनक लग गई. जवान ने इन तस्करों को रोकने का प्रयास किया, लेकिन तस्करों ने पहले अनीसुर की दृष्टि बाधित करने के लिए उनकी आंखों में हाईबीम लाइट से रौशनी डाली और फिर देसी बम से हमला कर दिया. ये बम अनीसुर के एकदम नजदीक आकर फटा, लेकिन उन्होंने (जवान ने) तब भी हार नहीं मानी. उन्होंने आत्मरक्षा में नॉन-लीथल पीएजी गन से उन तस्करों की ओर फायर किया, जिससे तस्कर बौखला गए और उन्होंने दोबारा जवान की ओर बम फेंका. इस बार ये बम अनीसुर के दाएं हाथ के पास आकर फटा, जिस कारण वो हाथ कोहनी के नीचे से अलग हो गया.और बम के छर्रे उनके शरीर में धँस गए.

जी न्यूज की  रिपोर्ट के अनुसार बीएसएफ के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अनीसुर के शरीर में बम के छर्रे धंसने से उनके लीवर, फेफड़े और पेट पर गंभीर चोटें आई हैं.

हमले को अंजाम देने के बाद तस्कर जंगली घास, अंधेरा और जानवरों की ओट लेकर फरार हो गए. घटना को लेकर बीएसएफ ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर क्षेत्र में अलर्ट जारी किया है, और दक्षिण बंगाल फ्रंटियर के इंस्पेक्टर जनरल ने इस मामले पर सख्त रवैया अपनाते हुए सभी फील्ड फॉर्मेशन को निर्देश दिए हैं कि ट्रांस बॉर्डर क्रिमिनल के खिलाफ सख्‍त कार्रवाई की जाए.

July 12th 2019, 10:10 am

द वर्ल्ड हिन्दू इकॉनॉमिक फोरम के ‘चाणक्य’ एप्प लोकार्पण

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मुंबई (विसंकें). ‘द वर्ल्ड हिन्दू इकॉनॉमिक फोरम’ उद्योगपति, व्यापारी, विचारवंत, अर्थशास्त्रियों, व्यवसायियों के समूह के साथ समन्वय करता है. इन क्षेत्रों में कार्यरत लोगों का ज्ञान, उनका अनुभव, इन क्षेत्रों में जाने या उद्योग लगाने के इच्छुक लोगों के लिए प्रेरणादायी और मार्गदर्शक होगा. ‘वर्ल्ड हिन्दू इकॉनॉमिक फोरम’ के संस्थापक और विश्व हिन्दू परिषद के संयुक्त महासचिव स्वामी विज्ञानानंद ने फोरम के ‘चाणक्य’ एप्प के उद्घाटन अवसर पर पत्रकारों से बातचीत में जानकारी दी. विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्रीराज नायर भी उनके साथ उपस्थित थे.

उन्होंने कहा कि सब हिन्दुओं को एक साथ मिलकर व्यापार करना चाहिए और अधिकाधिक अर्थार्जन करके समृद्ध होना चाहिए. ‘द वर्ल्ड हिंदू इकॉनॉमिक फोरम’ विश्व के अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों को एकसाथ लाने के लिए विश्वसनीय मंच है.

विज्ञानानंद जी ने कहा कि एक लाख 80 हजार सदस्यों का तपशील ‘चाणक्य’ एप्प के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने में सहायता मिलेगी. इसके अलावा रोजगार से संबंधित (जॉब वेकेंसी) जानकारी भी एप्प पर डाली जा सकती है.उन्होंने कहा कि सक्षम भारत बनाने के लिए अपनी आर्थिक स्थिति भी सक्षम होनी चाहिए, इसलिए अधिक से अधिक लोग इस ऐप का उपयोग करें, ऐसा प्रयास हम सभी को करना है.

July 12th 2019, 6:18 am

पश्चिम बंगाल – कक्षा में जय श्रीराम बोलने पर शिक्षक ने छात्र को पीटा

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ऐसा लग रहा है, कि पश्चिम बंगाल में ‘जय श्री राम’ का नारा लगाना किसी अपराध से कम नहीं है. चाहे जय श्री राम का नारा कोई बुजुर्ग लगाए, या फिर कोई स्कूल का छात्र. अपराध की सजा हर किसी को भुगतनी पड़ती है. पश्चिम बंगाल में ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने पर टीएमसी गुंडों द्वारा मारपीट की जा रही है. अब छोटे-छोटे मासूम बच्चों को भी नहीं बख्शा जा रहा.

हावड़ा के श्री रामकृष्ण शिक्षालय स्कूल में जुलाई 11, 2019 को एक शिक्षक ने पहली कक्षा में पढ़ने वाले छात्र को सिर्फ इसलिए बेरहमी से पिटा कि उसने कक्षा में जय श्रीराम बोल दिया था. पिटाई से छात्र काफी सहमा हुआ है, और स्कूल जाने से मना कर रहा है.

पीड़ित छात्र के पिता चंदन सिंह का कहना है कि स्कूल की छुट्टी के बाद जब वो आर्यन को लेने गए तो उसने घटना के बारे में बताया. छात्र ने बताया कि पहली क्लास खत्म होने और दूसरी क्लास शुरू होने के बीच उसके एक दोस्त ने उससे जय श्रीराम बोलने के लिए बोला तो उसने बोल दिया. उसी समय कमरे के पास से गुजर रहे एक शिक्षक ने सुन लिया और फिर कक्षा में आकर उसकी पिटाई कर दी और जय श्रीराम का नारा लगाने से मना किया.

चंदन सिंह ने कहा कि वे शुक्रवार (जुलाई 12, 2019) को हेडमास्टर से शिकायत करेंगे. उन्होंने कहा कि मामले में कोई राजनीति नहीं, बल्कि स्कूल से स्पष्टीकरण चाहते हैं. आखिर जय श्रीराम कहने में दिक्कत क्या है? स्कूल के नाम से राम का नाम जुड़ा है, ऐसे में जय श्रीराम कहने में परेशानी क्या है? चंदन सिंह ने स्कूल संचालान कमेटी को पत्र लिखकर अपने बेटे के अपराध के बारे में पूछा है.

July 12th 2019, 4:51 am

केशवपुरा आदर्श ग्राम – सामूहिक भोज में प्लास्टिक से बने गिलास, चम्मच नहीं

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पर्यावरण संरक्षण-संवर्धन की दिशा में सकारात्मक पहल जयपुर. राजधानी के निकट केशवपुरा आदर्श ग्राम में रहने वाले ग्रामवासियों ने पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में सकारात्मक पहल की है. ग्रामीणों ने गांव में होने वाले सामूहिक भोज के दौरान प्लास्टिक से बने गिलास, चम्मच इत्यादि का उपयोग नहीं करने का सर्वसहमति से निर्णय लिया है. स्थानीय केशवपुरा आदर्श ग्राम विकास समिति के उपाध्यक्ष दयाराम सैनी ने बताया कि गांव में समय-समय पर सामाजिक एवं धार्मिक आयोजन होते रहते हैं, जिसमें सामूहिक भोज का कार्यक्रम भी रहता है. सामान्यतः प्रेरणा के अभाव में अब तक ऐसे भोज में प्लास्टिक से बने गिलास, चम्मच आदि का उपयोग किया जाता रहा है. हमें ध्यान में आया कि प्लास्टिक के पात्रों से न केवल गांव का पर्यावरण दूषित हो रहा था, बल्कि इनके खाने से पशुओं को भी हानि हो रही थी. प्लास्टिक गिलास, चम्मच एवं पॉलिथीन का सेवन करने से कुछ पशु अकाल मौत के ग्रास बने. इन सब को ध्यान में रखते हुए ग्राम विकास समिति के कुछ सदस्यों ने भोज में प्लास्टिक सामग्री का उपयोग न करने का मन बनाया. समिति के सदस्यों ने जब इसकी चर्चा युवाओं व प्रबुद्धजन से की तो उन्होंने भी इस दिशा में सकारात्मक पहल को अपनी सहमति दी. गांव ने सर्व सहमति से सामूहिक भोज में प्लास्टिक से बने सामानों का उपयोग नहीं करने का निर्णय लिया है. समिति के उपाध्यक्ष मुकेश सैनी ने बताया कि गांव ने इसकी शुरुआत भी कर दी है. बुधवार 10 जुलाई को गांव के कालूराम सैनी के परिवार में सामूहिक भोज का आयोजन था तो निर्णयानुसार उसमें पेड़ के पत्ते से बनी पत्तल-धोने पर ही भोजन कराया. प्लास्टिक के गिलास एवं चम्मच काम में नहीं ली गई. आगे भी प्रयत्नपूर्वक इसे जारी रखा जाएगा. 1981 में संघ ने बसाया था केशवपुरा ग्रामीण राम रमेश ने बताया कि जुलाई 1981 में भयंकर बाढ़ के कारण जयपुर की चाकसू तहसील का ग्राम छादेल खुर्द त्रासदी का शिकार हुआ था, तब 2 पक्के मकानों को छोड़कर अन्य सभी मकान, पशु और पशु बाड़े सब पानी के साथ बह गए. त्रासदी की सूचना मिलते ही जयपुर महानगर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक छादेल खुर्द पहुंचे और 2 दिन से भूखे प्यासे छादेल खुर्द वासियों को  भोजन उपलब्ध करवाया. बाढ़ पीड़ितों को भी छत मिले, इसी उद्देश्य से संघ की प्रेरणा से गठित राजस्थान बाढ़ पीड़ित सहायता एवं पुनर्वास समिति द्वारा गांव बसाने का निर्णय हुआ. कार्तिक शुक्ल नवमी तदानुसार 6 नवंबर 1981 में केशवपुरा आदर्श ग्राम की नींव रखी. मात्र 5 माह में करीब 11 लाख रु से समिति द्वारा 64 पक्के मकान, सामुदायिक केंद्र, शिवालय एवं मीठे पानी का कुआं तैयार किया. चैत्र शुक्ल नवमी तदानुसार 02 अप्रैल, 1982 के दिन केशवपुरा आदर्श ग्राम के लोकार्पण समारोह में संघ के तृतीय सरसंघचालक स्वर्गीय बाला साहब देवरस का आगमन हुआ. 37 साल बाद 05 अक्तूबर 2018 में केशवपुरा आदर्श ग्राम को सरकार के भू-राजस्व रिकॉर्ड में स्थान यानी ग्राम का नाम भू राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करने के आदेश हुए, जिसकी खुशी में केशवपुरा आदर्श ग्राम विकास समिति की ओर से पिछले साल 10 अक्तूबर को नामकरण महोत्सव एवं सामूहिक महाआरती का आयोजन भी किया गया. अन्य कार्यक्रम ग्राम विकास प्रमुख सुरेश कुमार ने बताया कि संघ की प्रेरणा से स्वयंसेवक एवं ग्राम विकास समिति के संयुक्त तत्वाधान में गांव में समय-समय पर अनेक प्रेरणायक कार्यक्रमों का आयोजन होता रहता है. दीपावली पर केशवपुरा आदर्श ग्राम में सामूहिक रूप से गोवर्धन पूजा की जाती है जो सामाजिक दृष्टि से सामाजिक समरसता का बड़ा उदाहरण है. हर माह की अमावस्या को ग्रामवासियों की ओर से सामूहिक श्रमदान किया जाता है. माह में एक बार सामूहिक सत्संग होता है. इसके अलावा धार्मिक त्योहारों पर गांव के चौराहे, गलियों में रंगोली कर सजावट की जाती है. आगामी 15 दिन में सामूहिक पौधारोपण कार्यक्रम के तहत 101 पौधे रोपे जाएंगे.

July 12th 2019, 4:03 am

12 जुलाई / पुण्यतिथि – जुगल किशोर जी – घड़ी बेच, उधार लेकर भी जारी रखा संघकार्य

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नई दिल्ली. मध्यभारत प्रांत की प्रथम पीढ़ी के प्रचारकों में से एक जुगल किशोर जी का जन्म इंदौर के एक सामान्य परिवार में वर्ष 1919 में हुआ था. भाई-बहिनों में सबसे बड़े होने के कारण घर वालों को उनसे कुछ अधिक ही अपेक्षाएं थीं, पर उन्होंने संघकार्य का व्रत अपनाकर आजीवन उसका पालन किया.

जुगल जी किशोरावस्था में संघ के सम्पर्क में आकर शाखा जाने लगे. उन्होंने इंदौर के होल्कर महाविद्यालय से इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण की थी. घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण वे अन्यु बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई करते थे. संघ कार्य की लगन के कारण वर्ष 1940 में वे पढ़ाई अधूरी छोड़कर प्रचारक बन गये. सर्वप्रथम उन्हें मंदसौर भेजा गया. उन दिनों संघ के पास पैसे का अभाव रहता था. अतः यहां भी ट्यूशन पढ़ाकर संघ कार्य करते रहे. मंदसौर के बाद वे उज्जैन, देवास की हाट, पिपल्या व बागली तहसीलों में प्रचारक रहे. इसके बाद मध्यभारत प्रांत का पश्चिम निमाड़ ही मुख्यतः उनका कार्यक्षेत्र बना रहा. बड़वानी को अपना केन्द्र बनाकर उन्होंने पूरे खरगौन जिले के दूरस्थ गांवों में संघ कार्य को फैलाया. उनके कार्यकाल में पहली बार उस जिले में 100 से अधिक शाखाएं हो गयीं.

वर्ष 1950 में संघ पर से प्रतिबन्ध हटने के बाद बड़ी विषम स्थिति थी. बड़ी संख्या में लोग संघ से विमुख हो गये थे. संघ कार्यालयों का सामान पुलिस ने जब्त कर लिया था. न कहीं ठहरने का ठिकाना था और न भोजन का. ऐसे में अपनी कलाई घड़ी बेच कर उन्होंने कार्यालय का किराया चुकाया. संघ के पास पैसा न होने से प्रवास करना भी कठिन होता था, पर जुगल जी ने हिम्मत नहीं हारी. वे पूरे जिले में पैदल प्रवास करने लगे. प्रतिबन्ध काल में उन्होंने कुछ कर्ज लिया था. उसे चुकाने तक उन्होंने नंगे पैर ही प्रवास किया, लेकिन ऐसी सब कठिनाइयों के बीच भी उनका चेहरा सदा प्रफुल्लित ही रहता था.

जुगल जी का स्वभाव बहुत मिलनसार था, पर इसके साथ ही वे बहुत अनुशासनप्रिय तथा कर्म-कठोर भी थे. वे सबको साथ लेकर चलने तथा स्वयं नेपथ्य में रहकर काम करना पसंद करते थे. काम पूर्ण होने पर उसका श्रेय सहयोगी कार्यकर्ताओं को देने की प्रवृत्ति के कारण शीघ्र ही उनके आसपास नये और समर्थ कार्यकर्ताओं की टोली खड़ी हो जाती थी. कुछ समय तक विदिशा जिला प्रचारक और फिर वर्ष 1974 तक वे इंदौर के विभाग प्रचारक रहे. मध्य भारत में विश्व हिन्दू परिषद का काम शुरू होने पर उन्हें प्रांत संगठन मंत्री की जिम्मेदारी दी गयी. इसे उन्होंने अंतिम सांस तक निभाया. आपातकाल में वे भूमिगत हो गये, पर फिर पकड़े जाने से उन्हें 16 महीने कारावास में रहना पड़ा. जेल में भी वे अनेक धार्मिक आयोजन करते रहते थे. इससे कई खूंखार अपराधी तथा जेल के अधिकारी भी उनका सम्मान करने लगे.

जुगल जी स्वदेशी के प्रबल पक्षधर थे. वे सदा खादी या हथकरघे के बने वस्त्र ही पहनते थे. धोती-कुर्ता तथा कंधे पर लटकता झोला ही उनकी पहचान थी. प्रवास में किसी कार्यकर्ता के घर नहाते या कपड़े धोते समय यदि विदेशी कंपनी का साबुन उन्हें दिया जाता, तो वे उसे प्रयोग नहीं करते थे. ऐसे कर्मठ कार्यकर्ता का देहांत भी संघ कार्य करते हुए ही हुआ. 12 जुलाई, 1979 को वे भोपाल में प्रातःकालीन चौक शाखा में जाने के लिए निकर पहन कर निकले. मार्ग में आजाद बाजार के पास सड़क पर उन्हें भीषण हृदयाघात हुआ और तत्काल ही उनका प्राणांत हो गया.

कहते हैं कि अंतिम यात्रा पर हर व्यक्ति अकेला ही जाता है, पर यह भी विधि का विधान ही था कि जीवन भर लोगों से घिरे रहने वाले जुगल जी उस समय सचमुच अकेले ही थे.

July 11th 2019, 8:30 pm

उत्तर प्रदेश में मदरसे से मिले हथियार व जिंदा कारतूस, मदरसा संचालक मोहम्मद साजिद सहित 6 गिरफ्तार

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उत्तर प्रदेश के बिजनौर में एक मदरसे पर पुलिस की छापेमारी में पुलिस ने मदरसे से अवैध हथियार और जिंदा कारतूस बरामद किए हैं. जिसके बाद पुलिस ने मदरसा संचालक सहित 6 को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है. मदरसे में 25 बच्चे पढ़ते हैं. मदरसे से हथियारों की आपूर्ति का खुलास होने के पश्चात पुलिस के भी होश उड़े हुए हैं. पुलिस ने हथियारों की सप्लाई में उपयोग होने वाली स्विफ्ट डिजायर कार भी जब्त की है, जिस पर ‘शिवसेना’ लिखा है. मदरसे में हिकमत (हकीम द्वारा दवा देने) की आड़ में हथियार सप्लाई किए जाते थे.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सभी आरोपितों से पूछताछ की जा रही है. सीओ अफजलगढ़ कृपाशंकर कनौजिया ने बुधवार (जुलाई 10, 2019) को पुलिस टीम के साथ शेरकोट में कंदला रोड स्थित मदरसा दारुल कुरान हमीद में छापेमारी की थी. मदरसे से 36 बोर का एक पिस्टल व आठ कारतूस, 315 बोर के तीन तमंचे व 32 कारतूस, 32 बोर का एक रिवॉल्वर व 16 कारतूस बरामद हुए.

पुलिस ने मदरसे से स्योहारा के मोहल्ला शेखान निवासी फईम अहमद, शेरकोट निवासी साजिद, धामपुर के मोहल्ला अफगान निवासी जफर इस्लाम, अफजलगढ़ के गांव फतेहपुर जमाल निवासी सिकंदर अली, बिहार निवासी साबिर व शेरकोट निवासी अजीजुर्रहमान को पकड़ा है.

इसके बाद पुलिस ने मोहल्ला नोंदला में आरिफ के मकान में छापा मारा. पुलिस का कहना है कि आरिफ तांत्रिक का काम भी करता है. बताया गया है कि मदरसे में एक सेफ में दवाइयों के डिब्बे रखे थे, इन्हीं में से हथियार मिले हैं. सीओ कृपा शंकर कनौजिया का कहना है कि पुलिस को सूचना मिली थी कि मदरसे में कुछ बाहरी लोगों का आना जाना है, इसी आधार पर छापेमारी की गई.

पुलिस आरोपियों से पूछताछ में जुटी है. पुलिस के अनुसार, मदरसे में हिकमत का काम होता है. माना जा रहा है कि हथियार खरीदने वाले ग्राहक मरीज बनकर ही मदरसे में आते थे. हिकमत की आड़ में हथियार बेचने व सप्लाई करने का काम मदरसे से किया जा रहा था. किसी को शक भी नहीं होता था कि दवाई लेने के नाम पर मदरसे में आया व्यक्ति हथियार लेकर जा रहा है. साजिद मदरसे का संचालक बताया जाता है.

मदरसे से पकड़ा गया साबिर बिहार का रहने वाला है. पुलिस का मानना है कि वह बिहार से हथियार लाकर सप्लाई करता था, किसी को शक न हो इसलिए गाड़ी पर शिवसेना लिख रखा था. मदरसे में पकड़े गए आरोपितों का पुराना आपराधिक इतिहास भी बताया जा रहा है. पुलिस का मानना है कि एक आरोपित आगरा में हुई लूट में भी वांछित है. एक अन्य आरोपी देहरादून में एक व्यक्ति की गला काटकर हत्या करने का दोषी है. पुलिस का मानना है कि वारदातों को अंजाम देने के बाद सभी आरोपी मदरसे में आकर छिप जाते थे.

July 11th 2019, 4:47 am

भारत सरकार ने खलिस्तानी संगठन SFJ पर लगाया प्रतिबंध, पंजाब के मुख्यमंत्री व सिक्ख संगठनों ने किया स्

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केन्द्र सरकार ने अलगाववादी संगठन सिक्ख फॉर जस्टिस (SFJ) पर प्रतिबंध लगा दिया है. संगठन के अलगाववादी एजेंडे के कारण सरकार ने प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया. ‘सिक्ख जनमत संग्रह 2020’ इसके एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा है. पंजाब व अन्य राज्य सरकारों से विचार विमर्श के बाद केन्द्र सरकार ने एसएफजे पर प्रतिबंध लगाया है. उसकी अलगाववादी गतिविधियों को लेकर कई सिक्ख संगठनों ने भी चिंता जताई थी.पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सरकार के फैसले का समर्थन किया है.

कहा जाता है कि एसएफजे की गतिविधियों को पाकिस्तान का समर्थन हासिल है. हालांकि पाकिस्तान ने इसी साल अप्रैल में सिक्ख फॉर जस्टिस को प्रतिबंधित करने का दावा किया था. लेकिन, इसके ठोस साक्ष्य नहीं हैं. SFJ  अपने अलगाववादी एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए करतारपुर कॉरिडोर का इस्तेमाल करने की फिराक में भी था. यह कार्रवाई ‘गौर कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA)’ के तहत की गई है.

पंजाब पुलिस ने SFJ  के खिलाफ भारत में आतंकी गतिविधियों को लेकर डेढ़ दर्जन से ज्यादा मामले दर्ज कर रखे हैं. उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में भी कई मामले दर्ज हैं. संगठन के लीगल हेड और प्रवक्ता गुरपतवंत पन्नू ने पिछले दिनों पंजाब के डीजीपी दिनकर गुप्ता को एक वीडियो मैसेज के माध्यम से धमकी दी थी.

पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने कहा कि एसएफजे को प्रतिबंधित करना पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई की छत्रछाया में पल रहे भारत-विरोधी संगठनों से देश को बचाने की दिशा में उठाया गया कदम है.

मैनचेस्टर में भारत और न्यूजीलैंड के मध्य मैच के दौरान कुछ लोगों ने खलिस्तान समर्थक नारे लगाए थे, जिन्हें स्टेडियम से बाहर निकाल दिया था.

July 11th 2019, 3:47 am

11 जुलाई / जन्मदिवस – पहाड़ी गांधी बाबा कांशीराम

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नई दिल्ली. बाबा कांशीराम का नाम हिमाचल प्रदेश के स्वतन्त्रता सेनानियों की सूची में शीर्ष पर लिया जाता है. उनका जन्म ग्राम पद्धयाली गुर्नाड़ (जिला कांगड़ा) में 11 जुलाई, 1888 को हुआ था. इनके पिता लखनु शाह जी तथा माता रेवती जी थीं. लखनु शाह जी और उनके परिवार की सम्पूर्ण क्षेत्र में बहुत प्रतिष्ठा थी. स्वतन्त्रता आन्दोलन में अनेक लोकगीतों और कविताओं ने राष्ट्रभक्ति की ज्वाला को प्रज्वलित करने में घी का काम किया. इन्हें गाकर लोग सत्याग्रह करते थे और प्रभातफेरी निकालते थे. अनेक क्रान्तिकारी ‘वन्दे मातरम्’ और ‘मेरा रंग दे बसन्ती चोला’ जैसे गीत गाते हुए फांसी पर झूल गये. उन क्रान्तिवीरों के साथ वे गीत और उनके रचनाकार भी अमर हो गये.

इसी प्रकार बाबा कांशीराम ने अपने गीत और कविताओं द्वारा हिमाचल प्रदेश की बीहड़ पहाड़ियों में पैदल घूम-घूम कर स्वतन्त्रता की अलख जगायी. उनके गीत हिमाचल प्रदेश की स्थानीय लोकभाषा और बोली में होते थे. पर्वतीय क्षेत्र में ग्राम देवताओं की बहुत प्रतिष्ठा है. बाबा कांशीराम ने अपने काव्य में इन देवी-देवताओं और परम्पराओं की भरपूर चर्चा की. इसलिए वे बहुत शीघ्र ही आम जनता की जिह्वा पर चढ़ गये.

वर्ष 1937 में गद्दीवाला (होशियारपुर) में सम्पन्न हुए सम्मेलन में नेहरू जी ने इनकी रचनाएं सुनकर और स्वतन्त्रता के प्रति इनका समर्पण देखकर इन्हें ‘पहाड़ी गान्धी’ कहकर सम्बोधित किया. उसके बाद से इसी नाम से प्रसिद्ध हो गये. जीवन में अनेक विषमताओं से जूझते हुए बाबा कांशीराम ने अपने देश, धर्म और समाज पर अपनी चुटीली रचनाओं द्वारा गहन टिप्पणियां कीं. इनमें कुणाले री कहाणी, बाबा बालकनाथ कनै फरियाद ,पहाड़ेया कन्नै चुगहालियां आदि प्रमुख हैं.

उन दिनों अंग्रेजों के अत्याचार चरम पर थे. वे चाहे जिस गांव में आकर, जिसे चाहे जेल में बन्द कर देते थे. दूसरी ओर स्वतन्त्रता के दीवाने भी हंस-हंसकर जेल और फांसी स्वीकार कर रहे थे. ऐसे में बाबा कांशीराम ने लिखा –

भारत मां जो आजाद कराणे तायीं

मावां दे पुत्र चढ़े फांसियां

हंसदे-हंसदे आजादी दे नारे लाई..

बाबा स्वयं को राष्ट्रीय पुरुष मानते थे. यद्यपि पर्वतीय क्षेत्र में जाति-बिरादरी को बहुत महत्त्व दिया जाता है, पर जब कोई बाबा से यह पूछता था, तो वे गर्व से कहते थे –

मैं कुण, कुण घराना मेरा, सारा हिन्दुस्तान ए मेरा

भारत मां है मेरी माता, ओ जंजीरां जकड़ी ए.

ओ अंग्रेजां पकड़ी ए, उस नू आजाद कराणा ए..

उनकी सभी कविताओं में सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक चेतना के स्वर सुनाई देते हैं

काशीराम जिन्द जवाणी, जिन्दबाज नी लाणी

इक्को बार जमणा, देश बड़ा है कौम बड़ी है.

जिन्द अमानत उस देस दी

कुलजा मत्था टेकी कने, इंकलाब बुलाणा..

इसी प्रकार देश, धर्म और राष्ट्रीयता के स्वर बुलन्द करते हुए बाबा कांशीराम 15 अक्तूबर, 1943 को दुनिया से विदा हो गये. हिमाचल प्रदेश में आज भी 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर उनके गीत गाकर उन्हें याद किया जाता है.

July 10th 2019, 6:14 pm

सूरत हिंसा – कांग्रेस पार्षद असलम सहित 49 गिरफ्तार, 5000 लोगों के खिलाफ दर्ज है मामला

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नई दिल्ली. सूरत में मुस्लिमों की भीड़ द्वारा किये हंगामे (शुक्रवार, जुलाई 05, 2019 को) में कई पुलिस कर्मियों को चोटें आई थीं. अब तक इस मामले में 49 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जिनमें एक कांग्रेस नेता भी शामिल है. सूरत म्युनिस्पल कॉर्पोरेशन के पार्षद असलम साइकिलवाला के खिलाफ 6 जुलाई को मामला दर्ज किया गया था. दंगा फैलाने के मामले में पुलिस ने 05 हजार अज्ञात लोगों के खिलाफ भी मामला दर्ज किया है. मुस्लिम संगठनों द्वारा निकाली रैली के दौरान हुए बवाल को थामने के लिए पुलिस को आँसू गैस के गोले भी छोड़ने पड़े थे.

ये लोग झारखण्ड में चोर तबरेज अंसारी की मॉब लिंचिंग के विरोध में सड़क पर उतरे थे. भीड़ ने पुलिस पर पथराव करना शुरू कर दिया, जिसके बाद पुलिस को हवाई फायरिंग करनी पड़ी. भीड़ ने पांच सिटी बसों को भी निशाना बनाया और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया था. पूरे क्षेत्र में तनाव फैलने के बाद पुलिस को धारा 144 लागू करनी पड़ी. इसके बाद रैली के आयोजकों को हिरासत में ले लिया गया था. भीड़ अनुमति न होने के बावजूद प्रशासन को धता बताते हुए आगे बढ़ती जा रही थी.

मामले में पहले 9 लोग गिरफ्तार किए गए थे, उसके बाद 40 अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार किया गया है. ट्विटर पर पोस्ट वीडियो में भीड़ किसी अधिवक्ता बाबू पठान नामक व्यक्ति और उसके संगठन का बैनर हाथ में लेकर हिंसा पर उतारू दिख रही है. यह व्यक्ति ट्विटर प्रोफाइल के अनुसार, वह सूरत सिटी कमेटी का उपाध्यक्ष है. गिरफ्तार आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है.

सूरत के मुस्लिम संगठनों ने पुलिस को निर्दोष लोगों के खिलाफ कार्रवाई न करने की सलाह दी है. मुस्लिम संगठनों ने डीएम को ज्ञापन सौंप कर केवल अभियुक्तों के खिलाफ कार्रवाई करने की अपील की. संगठनों ने आरोप लगाया कि पुलिस निर्दोष लोगों को परेशान कर रही है.

July 10th 2019, 10:23 am

शब्द ही पत्रकार के धर्म और अधर्म को तय करते हैं – तरुण विजय

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शिमला (विसंकें). विश्व संवाद केंद्र शिमला द्वारा नारद जयंती के उपलक्ष्य में राज्य स्तरीय पत्रकार सम्मान समारोह का आयोजन होटल होली-डे होम में किया गया. कार्यक्रम में शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज मुख्य अतिथि तथा पाञ्चजन्य के पूर्व संपादक एवं पूर्व राज्यसभा सदस्य तरुण विजय जी मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे. कार्यक्रम की अध्यक्षता शिमला प्रेस क्लब के अध्यक्ष अनिल हेडली ने की.

मुख्य वक्ता तरुण विजय जी ने कहा कि शब्द ही पत्रकार के धर्म और अधर्म को तय करते हैं. धर्म और अधर्म का ज्ञान एक पत्रकार को होना बहुत जरूरी है. यह ज्ञान जब प्राप्त हो जाएगा तो राष्ट्र निर्माण में स्वयं ही भूमिका तय हो जाएगी. वैचारिक पक्ष की अदूरदर्शिता के कारण सत्य और असत्य को विकृत पत्रकारिता के स्वरूप में आज सर्वत्र दिखाया जा रहा है. इसका विवेकपूर्ण निर्णय करने की आवश्यकता है. उन्होंने आजादी से पूर्व की संघर्षपूर्ण पत्रकारिता के विषय का मार्मिक विवेचन प्रस्तुत किया. आजादी से पूर्व महात्मा गांधी, भगत सिंह, लोकमान्य तिलक, आदि क्रांतिकारियों ने पत्रकार के रूप में स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान दिया. कहा भी जाता है जो युद्ध हथियारों, तोपों से नहीं जीते जाते, वह कलम से जीते जा सकते हैं. आज के परिवेश में पत्रकारिता एक बाज़ार बन चुकी है. लेकिन फिर भी पत्रकारिता में एक मिशन के रूप में काम करने वाले पत्रकार समाज में अमिट छाप छोड़ रहे हैं. सोशल मीडिया के दौर में भ्रामक जानकारियां जनता के सामने आती हैं, इन्हें परखना आवश्यक है. सोशल मीडिया के विषय में कहा कि इसके अधिक प्रयोग के कारण प्रत्येक व्यक्ति एक पत्रकार की तरह व्यवहार करने लगा है, लेकिन इसकी अधूरी प्रामाणिकता पर भी सवाल उठाया. वर्तमान परिदृश्य में पत्रकारिता के सामने मुख्य चुनौतियां हैं, कंटेंट, भाषा व वैचारिकता.

हिमाचल प्रदेश के शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज ने कहा कि पत्रकारिता में धर्म की आवश्यकता है. आजकल विज्ञापन एकत्रित कर धन अर्जन करना समाचार एजेंसियों का काम रह गया है. पत्रकारिता में मानदंड स्थापित करने की आवश्यकता है. आजादी के बाद का दौर पत्रकारिता के क्षेत्र में काफी प्रभावी रहा है. लेकिन जब देश में आपातकाल लगा तो मीडिया का गला घोंट दिया गया. आज ऐसी भाषा उपयोग हो रही है जो समाज में सही संदेश नहीं देती है. पत्रकारों से आह्वान किया कि नकारात्मक के स्थान पर सकारात्मक समाचार भी बताएं.

कार्यक्रम में विश्व संवाद केंद्र के साप्ताहिक विचार पत्र हिम संचार के विशेषांक का विमोचन किया गया. विश्व संवाद केंद्र के प्रमुख दलेल ठाकुर ने बताया कि पिछले 12 वर्षों से नारद जयंती के अवसर पर पत्रकार सम्मान समारोह आयोजित किया जा रहा है और अब तक 60 पत्रकारों को सम्मानित कर चुके हैं.

विश्व संवाद केंद्र शिमला न्यास के अध्यक्ष प्रोफेसर नरेंद्र शारदा ने धन्यवाद किया. कार्यक्रम का संचालन केंद्र की सदस्य नीतू वर्मा ने किया.

पत्रकार सम्मान समारोह में मातृवंदना के संपादक डॉ. दयानंद शर्मा जी को वरिष्ठ पत्रकार, दिव्य हिमाचल के पूर्व स्टेट ब्यूरो स्वर्गीय सुनील शर्मा को विशेष स्मृति सम्मान, दैनिक जागरण के संवाददाता अजय बन्याल को युवा पत्रकार, दिव्य हिमाचल की दीपिका शर्मा को महिला पत्रकार, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में टीवी 100 के पराक्रम चंद को सम्मानित किया गया. मंडी जिला के छायाकार जय कुमार को सम्मानित किया गया. कार्यक्रम में पत्रकार, सूचना जनसंपर्क विभाग के अधिकारी व गणमान्यजन उपस्थित थे.

July 10th 2019, 8:24 am

राष्ट्र निर्माण में संघ की भूमिका, विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का इतिहास और ‘राष्ट्र निर्माण’ में इसकी भूमिका को नागपुर स्थित एक विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है. राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय ने बीए (इतिहास) के द्वितीय वर्ष के पाठ्यक्रम में आरएसएस के इतिहास को शामिल किया है.
पाठ्यक्रम के तीसरे खंड में राष्ट्र निर्माण में आरएसएस की भूमिका का वर्णन है. प्रथम खंड में कांग्रेस की स्थापना और जवाहर लाल नेहरू के उभार के बारे में बात की गई है. पाठ्यक्रम के द्वितीय खंड में सविनय अवज्ञा आंदोलन जैसे मुद्दों की बात की गई है. एक सूत्र ने कहा कि यह कदम इतिहास में ‘‘नई विचारधारा’’ के बारे में छात्रों को जागरूक करने के प्रयास का हिस्सा है. विश्वविद्यालय अध्ययन बोर्ड के सदस्य सतीश ने मंगलवार को पीटीआई को बताया कि भारत का इतिहास (1885-1947) इकाई में एक अध्याय राष्ट्र निर्माण में संघ की भूमिका का जोड़ा गया है, जो बीए (इतिहास) द्वितीय वर्ष पाठ्यक्रम के चौथे सेमेस्टर का हिस्सा है.

उन्होंने कहा कि 2003-2004 में विश्वविद्यालय के एमए (इतिहास) पाठ्यक्रम में एक अध्याय ‘आरएसएस का परिचय’ था. ‘इस साल हमने इतिहास के छात्रों के लिए राष्ट्र निर्माण में आरएसएस के योगदान का अध्याय रखा है, जिससे कि वे इतिहास में नई विचारधारा के बारे में जान सकें.’ उन्होंने कहा कि इतिहास के पुनर्लेखन से समाज के समक्ष नए तथ्य आते हैं.

 

 

 

July 10th 2019, 2:29 am

10 जुलाई / जन्मदिवस – संकल्प के धनी जयगोपाल जी

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नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की परम्परा में अनेक कार्यकर्ता प्रचारक जीवन स्वीकार करते हैं, पर ऐसे लोग कम ही होते हैं, जो बड़ी से बड़ी व्यक्तिगत या पारिवारिक बाधा आने पर भी अपने संकल्प पर दृढ़ रहते हैं. जयगोपाल जी उनमें से ही एक थे. उनका जन्म अविभाजित भारत के पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त स्थित डेरा इस्माइल खां नगर के एक प्रतिष्ठित एवं सम्पन्न परिवार में 10 जुलाई, 1923 को हुआ था. अब यह क्षेत्र पाकिस्तान में है. वे चार भाइयों तथा तीन बहनों में सबसे बड़े थे. विभाजन से पूर्व छात्र जीवन में ही वे संघ के सम्पर्क में आ गये थे. जयगोपाल जी ने लाहौर से प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण प्राप्त किया. इसके बाद उन्होंने हीवेट पॉलीटेक्निक कॉलेज, लखनऊ से प्रथम श्रेणी में स्वर्ण पदक के साथ अभियन्ता की परीक्षा उत्तीर्ण की. यहीं उनकी मित्रता भाऊराव देवरस जी से हुई. उसके बाद तो दोनों ‘दो देह एक प्राण’ हो गये.

घर में सबसे बड़े होने के नाते माता-पिता को आशा थी कि अब वे नौकरी करेंगे, पर जयगोपाल जी तो संघ के माध्यम से समाज सेवा का व्रत ले चुके थे. अतः शिक्षा पूर्ण कर वर्ष 1942 में वे संघ के प्रचारक बन गये. भारत विभाजन के समय उस (पाकिस्तान) ओर के हिन्दुओं ने बहुत शारीरिक, मानसिक और आर्थिक संकट झेले. जयगोपाल जी के परिवारजन भी खाली हाथ बरेली आ गये. ऐसे में एक बार फिर उन पर घर लौटकर कुछ काम करने का दबाव पड़ा, पर उन्होंने अपने संकल्प को लेशमात्र भी हल्का नहीं होने दिया और पूर्ववत संघ के प्रचारक के रूप में काम में लगे रहे.

संघ कार्य में नगर, जिला, विभाग प्रचारक के नाते उन्होंने उत्तर प्रदेश के कई स्थानों विशेषकर शाहजहांपुर, बरेली, लखनऊ तथा प्रयाग आदि में संघ कार्य को प्रभावी बनाया. उन्होंने तीन वर्ष तक काठमाण्डू में भी संघ-कार्य किया और नेपाल विश्वविद्यालय से उपाधि भी प्राप्त की. वे वर्ष 1973 में पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रान्त प्रचारक बने. वर्ष 1975 में देश में आपातकाल लागू होने पर उन्होंने भूमिगत रहकर अत्यन्त सक्रिय भूमिका निभाई और अन्त तक पकड़े नहीं गये. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रान्त प्रचारक माधवराव देवड़े जी की गिरफ्तारी के बाद वे पूरे उत्तर प्रदेश में भ्रमण कर स्वयंसेवकों का उत्साहवर्धन करते रहे.

जयगोपाल जी ने वर्ष 1989 में क्षेत्र प्रचारक के नाते जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा तथा दिल्ली का कार्य संभाला. उनका केन्द्र चण्डीगढ़ बनाया गया. उस समय पंजाब में आतंकवाद चरम पर था और संघ की कई शाखाओं पर आतंकवादी हमले भी हुए थे. इन कठिन परिस्थितियों में भी वे अडिग रहकर कार्य करते रहे. स्वास्थ्य खराब होने के बाद भी वे लेह-लद्दाख जैसे क्षेत्रों में गये और वहां संघ कार्य का बीजारोपण किया. वर्ष 1994 में उन्हें विद्या भारती (उत्तर प्रदेश) का संरक्षक बनाकर फिर लखनऊ भेजा गया. यहां रह कर भी वे यथासम्भव प्रवास कर विद्या भारती के काम को गति देते रहे. वृद्धावस्था तथा अन्य अनेक रोगों से ग्रस्त होने के कारण दो अगस्त, 2005 को दिल्ली में अपने भाई के घर पर उनका देहान्त हुआ.

जयगोपाल जी ने जो तकनीकी शिक्षा और डिग्री पाई थी, उसका उन्होंने पैसा कमाने में तो कोई उपयोग नहीं किया, पर लखनऊ में संघ परिवार की अनेक संस्थाओं के भवनों के नक्शे उन्होंने ही बनाये. इनमें विद्या भारती का मुख्यालय निराला नगर तथा संघ कार्यालय केशव भवन प्रमुख हैं.

July 9th 2019, 5:53 pm

लाल कुआं, दुर्गा मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के पश्चात देव प्रतिमाएं विराजित

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चावड़ी बाजार में संतों के मार्गदर्शन में भव्य शोभा यात्रा का आयोजन

नई दिल्ली. रविवार 30 जून को असामाजिक मुस्लिम उपद्रवियों द्वारा क्षतिग्रस्त किए गए चावड़ी बाजार के दुर्गा मंदिर में देव प्रतिमाओं की पुनः प्राण प्रतिष्ठा के निमित्त विश्व हिन्दू परिषद एवं संत समाज ने विशाल शोभायात्रा व पूजा का आयोजन किया.

अखिल भारतीय संत समाज तथा गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री दंडी स्वामी जितेन्द्रानंद सरस्वती ने कहा कि बहुत मजबूरियों में यह चेतावनी सभा करने की जरूरत आन पड़ी है. 5 वक्त की नमाज पर हिन्दू समाज को कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन नमाज के बहाने जुम्मे के दिन जो तकरीरें उठती हैं कि काफिरों का कत्ल करो, यह सब भाषा हिन्दू समाज अब सुनने को तैयार नहीं है. इस सभा का संदेश सारे भारत और दुनिया भर के हिन्दुओं तक जाएगा. हिन्दू अब पलायन नहीं करेगा.

पूज्य संत महामंडलेश्वर रामानंद जी महाराज ने कहा कि हमारे देवी देवताओं का अपमान हुआ है, उसका प्रतिकार करने के लिए संत समाज यहां एकत्र हुआ है. सामान्य मुसलमानों से कोई विरोध नहीं है, लेकिन तथाकथित जो अपने समाज को भड़काकर अनैतिक कार्य द्वारा दंगे करवाते हैं, ऐसे व्यक्तियों के प्रति विरोध है.

इन्द्रप्रस्थ विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष वागीश ईसर ने बताया कि क्षतिग्रस्त दुर्गा मंदिर में देव प्रतिमाओं की पुनः प्राण प्रतिष्ठा के निमित्त आयोजित शोभा यात्रा में स्थानीय निवासियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया. शोभायात्रा में भगवान गणेश, देवी दुर्गा, भगवान शिव, भगवान राम, भगवान कृष्ण, जटायू आदि देवों की झांकियां लालकुआं, चावड़ी बाजार मेट्रो स्टेशन से चलकर दुर्गा मंदिर, होते हुए फतेहपुरी मस्जिद, और वापस दुर्गा मंदिर चावड़ी बाजार में सम्पन्न हुई. संत समाज ने अपने आर्शीवचन दिए. जिनमें महामंडलेश्वर स्वामी नवलकिशोर जी महाराज, महामंडलेश्वर स्वामी अभूतानन्द जी महाराज, विहिप के संयुक्त महामंत्री डॉ. सुरेन्द्र जैन, विहिप के क्षेत्रीय संगठन मंत्री मुकेश खाण्डेकर आदि सम्मिलित थे.

विश्व हिन्दू परिषद के दिल्ली प्रांत उपाध्यक्ष सुरेन्द्र कुमार कुमार ने बताया कि 100 साल पुराने हिन्दू मंदिर के साथ दुष्कृत्य किया गया है. हिन्दू समाज की तरफ से इसका उचित जवाब दिया जाना जरूरी है. इसलिए मंदिर की प्रतिमाओं की पुर्न प्राण प्रतिष्ठा के साथ भव्य शोभा यात्रा का आयोजन किया गया. ऐसी घटनाएं पहले भी होती थीं, लेकिन दुर्भाग्यवश मीडिया इसे दिखाता नहीं था, न ही समाज के अंदर से यह बातें बाहर आती थीं. हिन्दू समाज चुपचाप लुटता पिटता और डरा हुआ रहता था. अब समाज खुलकर उसकी प्रतिक्रिया में सामने आ रहा है और मीडिया में भी खबरें आ रही हैं क्योंकि समाज भी अब इसका प्रतिकार कर रहा है.

July 9th 2019, 10:06 am

2019 में आतंकी घुसपैठ में 43 प्रतिशत की कमी, 22 प्रतिशत अधिक आतंकी मारे – गृह मंत्रालय

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साल 2018 की तुलना में 2019 में जम्मू कश्मीर में पाकिस्तानी घुसपैठ में कमी आई है. इसके अलावा एनकाउंटर में अधिक आतंकी मारे गए हैं. लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में गृह मंत्रालय ने बताया कि पिछले साल के मुकाबले में इस साल घुसपैठ में 43 फीसदी की कमी आई है, इसके अलावा घाटी में लोकल रिक्रूटमेंट में भी 28 फीसदी तक की कमी देखने को मिली है. साथ ही घाटी में मौजूद आतंकियों के खिलाफ जारी ऑपरेशन में भी सुरक्षा एजेंसियों सफलता मिली है. आंकड़ों के अनुसार साल 2018 की तुलना में 22 फीसदी ज्यादा आतंकी मारे गए हैं.

इस साल अब तक 126 आतंकी मारे जा चुके हैं. जबकि 2 दर्जन से ज्यादा गिरफ्तार किये गए हैं.

July 9th 2019, 7:30 am

09 जुलाई / जन्मदिवस – राजनीतिक क्षेत्र में संघ के दूत रामभाऊ म्हालगी

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नई दिल्ली. भारत ने ब्रिटेन समरूप लोकतंत्रीय संसदीय प्रणाली को स्वीकार किया है. इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाचित प्रतिनिधियों की है, पर दुर्भाग्यवश वे अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा पाते हैं. उनकी भूमिका को लेकर शोध एवं प्रशिक्षण देने वाले संस्थान का नाम है – रामभाऊ म्हालगी प्रबोधिनी, मुंबई.

रामचंद्र म्हालगी जी का जन्म नौ जुलाई, 1921 को ग्राम कडूस (पुणे, महाराष्ट्र) में काशीनाथ जी पंत एवं सरस्वतीबाई के घर में हुआ था. मेधावी रामभाऊ ने वर्ष 1939 में पुणे के सरस्वती मंदिर से एक साथ तीन परीक्षा देने की सुविधा का लाभ उठाते हुए मैट्रिक उत्तीर्ण की. बसंतराव देवकुले के माध्यम से संघ के स्वयंसेवक बने और प्रचारक बन कर केरल चले गये. कोयंबटूर तथा मंगलोर क्षेत्र में काम करते हुए उन्हें अपनी शिक्षा की अपूर्णता अनुभव हुई. अतः वे वापस पुणे आ गये, पर उसी समय डॉ. हेडगेवार जी का निधन हो गया. श्री गुरुजी ने युवकों से बड़ी संख्या में प्रचारक बनने का आह्वान किया. अतः वे फिर सोलापुर में प्रचारक होकर चले गये.

अब संघ कार्य के साथ ही पढ़ाई करते हुए वर्ष 1945 में उन्होंने बीए की परीक्षा उत्तीर्ण की. वर्ष 1948 के प्रतिबंध काल में वे भूमिगत रहकर काम करते रहे. प्रतिबंध समाप्ति के बाद उन्होंने प्रचारक जीवन को विराम दिया और क्रमशः एमए तथा कानून की उपाधियां प्राप्त कीं. वर्ष 1951 में बार काउंसिल की परीक्षा उत्तीर्ण कर वकालत करने लगे. तथा वर्ष 1955 में उन्होंने गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया.

प्रचारक जीवन छोड़ने के बाद भी वे संघ की योजना से पहले विद्यार्थी परिषद और फिर नवनिर्मित भारतीय जनसंघ में काम करने लगे. राजनीति में रुचि न होने पर भी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के आग्रह पर इस क्षेत्र में उतर गये. वर्ष 1952 में जनसंघ के मंत्री पद पर रहते हुए उन्होंने महाराष्ट्र के हर नगर और जिले में युवा कार्यकर्ताओं को ढूंढा और उन्हें प्रशिक्षित किया. आज उस राज्य में भारतीय जनता पार्टी के प्रायः सभी वरिष्ठ कार्यकर्ता रामभाऊ की देन हैं.

वर्ष 1957 में वे मावल विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने. कार्यकाल के दौरान विधानसभा में इतने प्रश्न पूछते थे कि सत्तापक्ष परेशान हो जाता था. वे प्रतिवर्ष अपने काम का लेखा-जोखा जनता के सम्मुख रखते थे, इससे बाकी विधायक भी ऐसा करने लगे. रामभाऊ कई बार विधायक और सांसद रहे. उनके चुनावी जीवन में भी जय और पराजय चलती रही, पर वे क्षेत्र में लगातार सक्रिय बने रहते थे.

आपातकाल में वे यरवदा जेल में बन्दी रहे. वहां से भी वे विधानसभा में लिखित प्रश्न भेजते रहे. वर्ष 1977 में वे ठाणे से सांसद बने. वर्ष 1980 के चुनाव में इंदिरा गांधी की लहर होने के बावजूद वे फिर जीत गये. उनके द्वार झोपड़ी वालों से लेकर उद्योगपतियों तक के लिए खुले रहते थे. शाखा के प्रति निष्ठा के कारण वे विधायक और सांसद रहते हुए भी प्रतिदिन शाखा जाते थे. निरन्तर भागदौड़ करने वालों को छोटे-मोटे रोग तो लगे ही रहते हैं, पर वर्ष 1981 में चिकित्सकों ने रामभाऊ को कैंसर घोषित कर दिया. मुंबई के अस्पताल में जब उनसे मिलने तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहब देवरस जी आये, तो तेज दवाओं के दुष्प्रभाव से जर्जर हो चुके रामभाऊ की आंखों में यह सोचकर आंसू आ गये कि कि वे उठकर उनका अभिवादन नहीं कर पाये. छह मार्च, 1982 को राजनीति में संघ के दूत रामभाऊ का देहांत हुआ. रामभाऊ म्हालगी प्रबोधिनी आज भी उनके आदर्शों को आगे बढ़ा रही है.

July 8th 2019, 7:36 pm

09 जुलाई / जन्मदिवस – दुर्लभ चित्रों के संग्रहक : सत्यनारायण गोयल

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नई दिल्ली. प्रसिद्ध फोटो चित्रकार सत्यनारायण गोयल जी का जन्म नौ जुलाई, 1930 को आगरा में हुआ था. वर्ष 1943 में वे संघ के स्वयंसेवक बने. वर्ष 1948 के प्रतिबन्ध के समय वे कक्षा 12 में पढ़ रहे थे. जेल जाने से उनकी पढ़ाई छूट गयी. अतः उन्होंने फोटो मढ़ने का कार्य प्रारम्भ कर दिया. कला में रुचि होने के कारण उन्होंने वर्ष 1956 में ‘कलाकुंज’ की स्थापना की. वे पुस्तक, पत्र-पत्रिकाओं आदि के मुखपृष्ठों के डिजाइन बनाते थे. इससे उनकी प्रसिद्धि बढ़ने लगी. अब उन्होंने फोटोग्राफी भी प्रारम्भ कर दी. वर्ष 1963 में वे दैनिक समाचार पत्र ‘अमर उजाला’ से जुड़े और उसके संस्थापक डोरीलाल जी के जीवित रहते तक वहां निःशुल्क काम करते रहे.

वर्ष 1975 के आपातकाल में उन्होंने अपने दो पुत्रों विजय गोयल और संजय गोयल को सहर्ष सत्याग्रह कर जेल जाने की अनुमति दी. वर्ष 1977 में उन्हें देश की हिंदी की पहली संवाद समिति हिन्दुस्थान समाचार का संवाददाता बनाया गया, जिसके लिये वे आजीवन अवैतनिक कार्य करते रहे.  आगरा के सरस्वती शिशु मंदिर, गोशाला, अग्रसेन इंटर कॉलेज तथा अग्रोहा न्यास आदि सामाजिक कार्यों में वे सदा आगे रहते थे. आगरा के प्रसिद्ध सभागार का नाम ‘सूर सदन’ रखने के लिये उन्होंने हस्ताक्षर अभियान चलाया.

शिवाजी आगरा के जिस किले में बन्दी रहे थे, उसके सामने शिवाजी की भव्य प्रतिमा मुख्यतः उन्हीं के प्रयास से लगी. देश में किसी भी प्राकृतिक आपदा के समय वे धन संग्रह कर वहां भेजते थे. रंगमंच एवं ललित कलाओं के लिये समर्पित संस्था ‘संस्कार भारती’ के वे केन्द्रीय मंत्री रहे. उसकी मुखपत्रिका आज भी ‘कलाकुंज भारती’ के नाम से ही छप रही है.

विश्व हिन्दू परिषद द्वारा वनवासी क्षेत्रों में चलाये जा रहे एकल विद्यालयों की सहायतार्थ उन्होंने आगरा में ‘वनबन्धु परिषद’ की स्थापना की. वे कई बार उद्योगपतियों को वनयात्रा पर ले गये. वर्ष 1984 में राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह के साथ सद्भाव यात्रा में वे सपत्नीक मॉरीशस गये. मुंबई की महिलाओं ने कारगिल जैसे कठिन सीमाक्षेत्र में तैनात वीर सैनिकों का साहस बढ़ाने के लिये उन्हें वहां जाकर राखी बांधी. सत्यनारायण जी इसमें भी सहभागी हुये.

फोटो चित्रकार होने के नाते उनके पास दुर्लभ चित्रों का विशाल संग्रह था. द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी अपना चित्र नहीं खिंचवाते थे. एक बार उनके आगरा प्रवास के समय वे दरवाजे के पीछे खड़े हो गये. श्री गुरुजी के कमरे में आते ही उन्होंने दरवाजे से निकल कर चित्र खींचा और बाहर चले गये. यद्यपि बाद में उन्हें डांट खानी पड़ी, पर चित्र तो उनके पास आ ही गया.

आगरा आने वाले संघ के हर प्रचारक, राजनेता, समाजसेवी और प्रसिद्ध व्यक्ति का चित्र उनके संग्रह में मिलता है. वे देश की वर्तमान दशा के बारे में उनका आंकलन, उनके हस्तलेख में ही लिखवाते थे. इसका संग्रह उन्होंने ‘देश दशा दर्शन’ के नाम से छपवाया था. ऐसे पांच लोग प्रधानमंत्री भी बने. उनके पास प्रसिद्ध लोगों के जन्म व देहांत की तिथियों का भी विशाल संग्रह था. अटल जी के प्रधानमंत्री बनने पर पुणे से प्रकाशित ‘जननायक’ नामक सचित्र स्मारिका के लिये अटल जी के 500 पुराने चित्र सत्यनारायण जी ने अपने संग्रह से दिये. मेरठ के समरसता महाशिविर (1998) और आगरा में राष्ट्र रक्षा महाशिविर (2000) के चित्र भी उन्होंने ही लिये थे. श्री गुरुजी जन्मशती पर प्रकाशित पत्रिकाओं में सभी जगह उनके लिये गये चित्र छपे.

कलाकुंज की प्रसिद्धि और काम बढ़ने पर भी उन्होंने चित्र मढ़ने वाला पुराना काम नहीं छोड़ा. 29 अक्तूबर, 2011 को उनका देहांत हुआ. आगरा में उनकी दुकान वाला चौराहा ‘कलाकुंज चौक’ के नाम से प्रसिद्ध है.

July 8th 2019, 6:53 pm

मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश की याचिका SC में खारिज, कहा याचिकाकर्ता मुस्लिम नहीं

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सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार (08 जुलाई) को मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश और उन्हें पर्दा प्रथा से मुक्ति दिलाने की अपील करने वाली याचिकाएं खारिज कर दीं. सर्वोच्च न्यायालय ने कारण यह बताया कि याचिकाकर्ता खुद मुस्लिम नहीं है, इसलिए केरल उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर इस याचिका पर सुनवाई का कोई औचित्य नहीं है.

इस याचिका को खारिज करने वाली पीठ में सर्वोच्च सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई भी शामिल थे. उनके अलावा न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस और दीपक गुप्ता भी हिन्दू महासभा द्वारा दायर याचिका को खारिज करने वाली पीठ में थे. याचिका को खारिज करते हुए मुख्य न्याधीश ने कहा कि, “पहले किसी मुस्लिम महिला को आने दो, फिर हम (इस पर) सोचेंगे.”

सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका एक स्पेशल लीव पेटिशन थी, जो केरल हाई कोर्ट के 11 अक्तूबर के निर्णय के खिलाफ दायर की गई थी. केरल उच्च न्यायालय में इसे खारिज करने वाले जस्टिस एके जयशंकरण और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश हृषिकेश रॉय थे.

गौर करने लायक यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने मामले के विषय (मस्जिद और मुस्लिम महिलाओं) से याचिकाकर्ताओं का संबंध न होने को आधार बनाकर याचिका खारिज की. जबकि उच्च न्यायालय ने याचिका इसलिए खारिज की, क्योंकि याचिकाकर्ता हिन्दू महासभा उसे यह आश्वस्त नहीं कर पाई थी कि महिलाओं को मस्जिदों में प्रवेश से रोका जा रहा है. इसके अलावा ‘सस्ती लोकप्रियता’ के लिए याचिका दायर करने की टिप्पणी भी उच्च न्यायालय ने याचिका ख़ारिज करते समय की थी. उच्च न्यायालय ने कहा था कि उसके मतानुसार अनुच्छेद 226 का दुरुपयोग ऐसे कारणों के लिए नहीं किया जा सकता.

सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख शबरीमला मामले में उसके फैसले के ठीक विपरीत है. तब सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं में केरल (जहाँ शबरीमला मंदिर स्थित है) के निवासी नहीं होने और न ही मंदिर की परम्पराओं की जानकार होने के बावजूद भी याचिका सुनी थी. न केवल सुनी थी, उस पर निर्णय भी सुनाया था.

https://barandbench.com/supreme-court-dismisses-pil-to-allow-muslim-women-into-mosques-ban-purdah/

https://www.livelaw.in/top-stories/sc-dismisses-hindu-mahsabhas-plea-for-allowing-muslim-womens-entry-in-mosques-146162

July 8th 2019, 8:44 am

वैद्यकीय क्षेत्र में बढ़ती व्यावसायिकता चिंताजनक – प्रो. अनिरूद्ध देशपांडे

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मुंबई (विसंकें). नाना पालकर स्मित समिति ने राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस के उपलक्ष्य में 07 जुलाई को कार्यक्रम का आयोजन किया था. कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख प्रो, अनिरुद्ध देशपांडे ने कहा कि आज वैद्यकीय क्षेत्र में बढ़ रही व्यावसायिकता चिंताजनक है और उसकी जड़ें बहुत गहरी हैं.

उन्होंने कहा कि वैद्यकीय शिक्षा के क्षेत्र में सीट्स उपलब्ध नहीं. शिक्षा के लिये खर्च होता है. प्रवेश मिल भी जाए तो रोजगार उपलब्ध नहीं. मांग और उपलब्धता के बीच दूरी बढ़ रही है. आज समाज के सभी आर्थिक स्तरों तक वैद्यकीय सुविधाओं का लाभ नहीं मिल रहा है. ऐसी स्थिति में नाना पालकर स्मृति समिति जैसी संस्थाओं का काम प्रशंसनीय है. आज वैद्यकीय क्षेत्र में नए-नए अनुसंधान हो रहे हैं. इन अनुसंधानों के कारण नई-नई उपचार पद्धतियों का लाभ हमें मिल रहा है. आरोग्य के बारे में समाज में जागृति आ रही है. परंतु, इन उपलब्धियों के पश्चात भी आज आरोग्य की समस्याएं कम नहीं हो रहीं है. बाल मृत्यु, माता मृत्यु आज भी समाप्त नहीं हुई है, यह अत्यंत दुःखद है. सामाजिक विषमता का प्रभाव आरोग्य की सुविधाओं पर हो रहा है.

शिक्षा एवं स्वास्थ्य दोनों क्षेत्रों को महान जाता है. इन क्षेत्रों में कार्यरत व्यक्तियों के कंधों पर महत्वपूर्ण दायित्व है, दायित्व पूर्ति अपेक्षित है. समाज के सभी स्तरों में स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता नहीं है. संपूर्ण समाज को सुलभता से स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हों, इसके लिए ध्यान दिया जाना आवश्यक है. क्षेत्र की समस्याओं का निदान हो जाए तो लोगों को जीवन प्रदान करना और भी आसान हो जाएगा.

नाना पालकर स्मृति समिति ने टाटा मेमोरियल रुग्णालय के उप संचालक डॉ. सुदीप गुप्ता, नागालैंड जैसे दुर्गम क्षेत्रों में वैद्यकीय शिविरों का आयोजन करने वाली डॉ. सुपर्णा निरगुडकर और सोहम ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं गरीबों के डॉ. अभिजीत सोनावणे को सम्मानित किया. मंच पर समिति के अध्यक्ष रवींद्र कर्वे, उपाध्यक्ष डॉ. हेमा, कार्यवाह अविनाश खरे, डॉ. सुपर्णा निरगुडकर, डॉ. सुदीप गुप्ता और डॉ. अभिजीत सोनावणे भी उपस्थित थे.

July 8th 2019, 8:33 am

मीडिया की जवाबदेही देश-समाज के प्रति भी होनी चाहिए – नरेंद्र ठाकुर

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राजघाट स्थित गांधी दर्शन में सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड एनालिसिस द्वारा दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया. कार्यशाला का उद्देश्य युवाओं को मीडिया क्षेत्र की बारीकियों से रूबरू करवाना था. कार्यशाला में दिल्ली विश्वविद्यालय, माखनलाल चतुर्वेदी व जामिया सहित 20 कॉलेजों के छात्रों ने भाग लिया. कार्यशाला का शुभारंभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया.

उन्होंने कहा कि देश व समाज के प्रति मीडिया की जवाबदेही होनी चाहिए. हमारे मीडिया को देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी निभाना चाहिए. भारत से संबंधित मुद्दों को पश्चिम के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए.

कार्यशाला के संयोजक रवींद्र कुमार ने कहा कि कार्यशाला से मीडिया के क्षेत्र में भविष्य संवारने वाले छात्रों को क्षेत्र की बारीकियों को समझने का अवसर प्राप्त होगा. मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार व विशेषज्ञ छात्रों को जानकारी प्रदान करेंगे. रिपोर्टिंग, एंकरिंग, लघु फिल्म व पटकथा, के संबंध में तकनीकी जानकारी प्रदान की जाएगी.

July 8th 2019, 3:14 am

वीर सावरकर की ऐतिहासिक छलांग

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भारत के स्वाधीनता संग्राम में वीर विनायक दामोदर सावरकर का अद्वितीय योगदान है. उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर देश ही नहीं, तो विदेश में भी क्रांतिकारियों को तैयार किया. इससे अंग्रेजों की नाक में दम हो गया. अतः ब्रिटिश शासन ने उन्हें लंदन में गिरफ्तार कर मोरिया नामक पानी के जहाज से मुंबई भेजा, जिससे उन पर भारत में मुकदमा चलाकर दंड दिया जा सके.

पर, सावरकर बहुत जीवट के व्यक्ति थे. उन्होंने ब्रिटेन में ही अंतरराष्ट्रीय कानूनों का अध्ययन किया था. 08 जुलाई, 1910 को जब वह जहाज फ्रांस के मार्सेलिस बंदरगाह के पास लंगर डाले खड़ा था, तो उन्होंने एक साहसिक निर्णय लेकर जहाज के सुरक्षाकर्मी से शौच जाने की अनुमति मांगी.

अनुमति पाकर वे शौचालय में चले गए तथा अपने कपड़ों से दरवाजे के शीशे को ढककर दरवाजा अंदर से अच्छी तरह बंद कर लिया. शौचालय से एक रोशनदान खुले समुद्र की ओर खुलता था. सावरकर ने रोशनदान और अपने शरीर के आकार का सटीक अनुमान किया और समुद्र में छलांग लगा दी.

बहुत देर होने पर सुरक्षा कर्मी ने दरवाजा पीटा और कुछ उत्तर न आने पर दरवाजा तोड़ दिया; पर तब तक तो पंछी उड़ चुका था. सुरक्षाकर्मी ने समुद्र की ओर देखा, तो पाया कि सावरकर तैरते हुए फ्रांस के तट की ओर बढ़ रहे हैं. उसने शोर मचाकर अपने साथियों को बुलाया और गोलियां चलानी शुरू कर दीं.

कुछ सैनिक एक छोटी नौका लेकर उनका पीछा करने लगे; पर सावरकर उनकी चिन्ता न करते हुए तेजी से तैरते हुए बंदरगाह पर पहुंच गए. उन्होंने स्वयं को फ्रांसीसी पुलिस के हवाले कर वहां राजनीतिक शरण मांगी. अंतरराष्ट्रीय कानून का जानकार होने के कारण उन्हें मालूम था कि उन्होंने फ्रांस में कोई अपराध नहीं किया है, इसलिए फ्रांस की पुलिस उन्हें गिरफ्तार तो कर सकती है; पर किसी अन्य देश की पुलिस को नहीं सौंप सकती. इसलिए उन्होंने यह साहसी पग उठाया था. उन्होंने फ्रांस के तट पर पहुंच कर स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया. तब तक ब्रिटिश पुलिसकर्मी भी वहां पहुंच गए और उन्होंने अपना बंदी वापस मांगा.

सावरकर ने अंतरराष्ट्रीय कानून की जानकारी फ्रांसीसी पुलिस को दी. बिना अनुमति किसी दूसरे देश के नागरिकों का फ्रांस की धरती पर उतरना भी अपराध था; पर दुर्भाग्य से फ्रांस की पुलिस दबाव में आ गयी. अतः उन्होंने सावरकर को ब्रिटिश पुलिस को सौंप दिया. उन्हें कठोर पहरे में वापस जहाज पर ले जाकर हथकड़ी और बेड़ियों में कस दिया गया. मुंबई पहुंचकर उन पर मुकदमा चलाया गया, जिसमें उन्हें 50 वर्ष कालेपानी की सजा दी गयी.

अपने प्रयास में असफल होने पर भी वीर सावरकर की इस छलांग का ऐतिहासिक महत्व है. इससे भारत की गुलामी वैश्विक चर्चा का विषय बन गयी. फ्रांस की इस कार्यवाही की उनकी संसद के साथ ही विश्व भर में निंदा हुई और फ्रांस के राष्ट्रपति को त्यागपत्र देना पड़ा. हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में भी इसकी चर्चा हुई और ब्रिटिश कार्यवाही की निंदा की गयी; पर सावरकर तो तब तक मुंबई पहुंच चुके थे, इसलिए अब कुछ नहीं हो सकता था.

July 8th 2019, 2:28 am

08 जुलाई / इतिहास स्मृति – टाइगर हिल पर फहराया तिरंगा

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नई दिल्ली. पाकिस्तान अपनी मजहबी मान्यताओं के कारण जन्म के पहले दिन से ही भारत विरोध का मार्ग अपनाया है. जब भी उसने भारत पर हमला किया, उसे मुंह की खानी पड़ी. ऐसा ही एक प्रयास उसने 1999 में किया, जिसे ‘कारगिल युद्ध’ कहा जाता है. भारतीय सेना ने पाक सेना को बुरी तरह से धूल चटाई थी, टाइगर हिल की जीत युद्ध का एक महत्वपूर्ण अध्याय है.

सियाचिन भारत की सर्वाधिक ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है. चारों ओर बर्फ ही बर्फ होने के कारण यहां भयानक सर्दी पड़ती है. शीतकाल में तो तापमान पचास डिग्री तक नीचे गिर जाता है. उन चोटियों की सुरक्षा करना कठिन ही नहीं, बहुत खर्चीला भी है. इसलिए दोनों देशों के बीच यह सहमति बनी थी कि गर्मियों में सैनिक यहां रहेंगे, लेकिन सर्दी में वे वापस चले जायेंगे. वर्ष 1971 के बाद से यह व्यवस्था ठीक से चल रही थी.

पर, वर्ष 1999 की गर्मी में जब हमारे सैनिक वहां पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय क्षेत्र में सामरिक महत्व की अनेक चोटियों पर कब्जा कर बंकर बना लिये हैं. पहले तो बातचीत से उन्हें वहां से हटाने का प्रयास किया, पर जनरल मुशर्रफ कुछ सुनने को तैयार नहीं थे. अतः जब सीधी उंगली से घी नहीं निकला, तो फिर युद्ध ही एकमात्र उपाय था. तीन जुलाई की शाम को खराब मौसम और अंधेरे में 18 ग्रेनेडियर्स के चार दलों ने टाइगर हिल पर चढ़ना प्रारम्भ किया. पीछे से तोप और मोर्टार से गोले दागकर उनका सहयोग किया जा रहा था. एक दल ने रात को डेढ़ बजे उसके एक भाग पर कब्जा कर लिया.

कैप्टेन सचिन निम्बालकर के नेतृत्व में दूसरा दल खड़ी चढ़ाई पर पर्वतारोही उपकरणों का प्रयोग कर अगले दिन सुबह पहुंच पाया. तीसरे दल का नेतृत्व लेफ्टिनेण्ट बलवान सिंह कर रहे थे. इसमें कमाण्डो सैनिक थे, उन्होंने पाक सैनिकों को पकड़कर भून डाला. चौथे दल के ग्रेनेडियर योगेन्द्र यादव व उनके साथियों ने भी साहस दिखाकर दुश्मनों को खदेड़ दिया. इस प्रकार पहले चरण का काम पूरा हुआ.

अब आठ माउण्टेन डिवीजन को शत्रु की आपूर्ति रोकने को कहा गया, क्योंकि इसके बिना पूरी चोटी को खाली कराना सम्भव नहीं था. मोहिन्दर पुरी और एमपीएस बाजवा के नेतृत्व में सैनिकों ने यह काम कर दिखाया. सिख बटालियन के मेजर रविन्द्र सिंह, लेफ्टिनेण्ट सहरावत और सूबेदार निर्मल सिंह के नेतृत्व में सैनिकों ने पश्चिमी भाग पर कब्जा कर लिया. इससे शत्रु द्वारा दोबारा चोटी पर आने का खतरा टल गया.

इसके बाद भी युद्ध पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ था. यद्यपि दोनों ओर के सैनिक हताहत हो चुके थे. सूबेदार कर्नल सिंह और राइफलमैन सतपाल सिंह चोटी के दूसरी ओर एक बहुत खतरनाक ढाल पर तैनात थे. उन्होंने पाक सेना के कर्नल शेरखान को मार गिराया. इससे पाकिस्तानी सैनिकों की बची हिम्मत भी टूट गयी और वे वहां से भागने लगे.

तीन जुलाई को शुरू हुआ यह संघर्ष पांच दिन तक चला. अन्ततः 2,200 मीटर लम्बे और 1,000 मीटर चौड़े क्षेत्र में फैले टाइगर हिल पर पूरी तरह भारत का कब्जा हो गया. केवल भारतीय सैनिक ही नहीं, तो पूरा देश समाचार को सुनकर प्रसन्नता से झूम उठा. आठ जुलाई को सैनिकों ने विधिवत तिरंगा झण्डा वहां फहरा दिया. इस प्रकार करगिल युद्ध की सबसे कठिन चोटी को जीतने का अभियान पूरा हुआ.

July 7th 2019, 6:53 pm

महिलाओं को पारिवारिक दायित्व निभाते हुए राष्ट्रनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए

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नई दिल्ली. परिवार, समाज और राष्ट्र में सामंजस्य बिठाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति का जीवन राष्ट्रीय विचारों से ओतप्रोत होना चाहिए. व्यक्ति नश्वर है, राष्ट्र चिरंतन है. जो व्यक्ति राष्ट्र को श्रेष्ठ समझेगा, वही स्वयं को राष्ट्र का स्तर बढ़ाने का साधन मात्र समझेगा क्योंकि व्यक्ति नहीं, बल्कि संगठन और राष्ट्र सर्वोपरि हैं. राष्ट्र सेविका समिति की अखिल भारतीय सह कार्यवाहिका चित्रा ताई जोशी दिल्ली में वैचारिक सामंजस्य - एक चुनौती विषय पर आयोजित गोष्ठी में संबोधित कर रही थीं. यह कार्यक्रम राष्ट्र सेविका समिति की संस्थापक स्वर्गीय लक्ष्मीबाई केलकर जी की 114वीं जयंती के अवसर पर समिति के दिल्ली प्रांत के प्रबुद्ध वर्ग मेधाविनी सिंधु सृजन ने आयोजित किया था. लक्ष्मीबाई केलकर को सम्मान से मौसीजी भी कहते हैं. कार्यक्रम की अध्यक्षता बिंदु डालमिया जी, अध्यक्ष, राष्ट्रीय विषय समावेशन समिति, नीति आयोग ने की. उन्होंने कहा कि पिछली शताब्दी के तीसरे दशक में लक्ष्मीबाई केलकर ने भारतीय महिलाओं के लिए जिन आदर्शों को आधार मानकर महिलाओं के संगठन (राष्ट्र सेविका समिति) की स्थापना की, वे आज भी समाज के आधारभूत अंग हैं. मौसी जी का मानना था कि राष्ट्र के निर्माण में महिलाओं की अहम भूमिका है. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण का उल्लेख भी किया, जिसमें उन्होंने मौसी जी के उस विचार का पुरजोर समर्थन किया था कि महिलाओं को पारिवारिक दायित्व निभाते हुए राष्ट्रनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए. लक्ष्मीबाई केलकर का जन्म 6 जुलाई 1905, आषाढ़ शुक्ल दशमी शक 1827 को नागपुर में हुआ. उनके बचपन का नाम कमल था. लेकिन एडवोकेट पुरुषोत्तम राव से विवाह के पश्चात उन्हें लक्ष्मीबाई नाम मिला. उनके पिता भास्करराव दाते और मां यशोदाबाई थीं. पिता सरकारी सेवा में थे. यशोदाबाई जागरूक महिला थीं और देश और समाज की घटनाओं से भली भांति परिचित रहती थीं. तब लोकमान्य तिलक के अखबार केसरी को खरीदना या पढ़ना देशद्रोह के समान माना जाता था, लेकिन यशोदाबाई न केवल केसरी खरीदती थीं, अपितु आसपास की महिलाओं को एकत्र कर उसका सामूहिक पारायण भी करती थीं. अपनी मां से मिले संस्कारों और व्यक्तिगत अनुभवों ने लक्ष्मीबाई को सिखाया कि भारत के लिए राजनीतिक आजादी तो आवश्यक है ही, लेकिन साथ ही महिलाओं का सशक्तिकरण, जागरण और स्वालंबन भी आवश्यक है. लक्ष्मीबाई के बेटे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य थे. उनके माध्यम से वो संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के संपर्क में आईं और उनकी प्रेरणा से उन्होंने 25 अक्तूबर, 1936 को विजयदशमी के दिन राष्ट्र सेविका समिति की नींव रखी. समिति के माध्यम से उन्होंने भारतीय नारी को अपना जीवन स्वपरिवार के साथ राष्ट्रधर्म के लिए समर्पित करने की प्रेरणा दी. उन्होंने जो पौधा रोपा था वो आज वट वृक्ष बन चुका है. आज राष्ट्र सेविका समिति भारत का सबसे बड़ा महिला संगठन है. देशभर में समिति की 3 लाख से अधिक सेविकाएं और 584 जिलों में 4,350 नियमित शाखाएं हैं. समिति 855 से अधिक सेवाकार्य कर रही है. इनमें छात्रावास, निःशुल्क चिकित्सा केंद्र, लघु उद्योग से जुड़े स्वयं सहायता समूह, रूग्णोपयोगी साहित्य केंद्र, संस्कार केंद्र, निःशुल्क ट्यूशन कक्षाएं आदि शामिल हैं. समिति के सक्रिय बौद्धिक और धार्मिक विभाग हैं, जिनकी गतिविधियां वर्ष भर चलती हैं. समिति सामाजिक व राष्ट्रीय विषयों पर 25 से अधिक प्रदर्शनी लगा चुकी है. समिति देश के पिछड़े और अभावग्रस्त वनवासी क्षेत्रों में विशेष रूप से कार्य कर रही है. वो नक्सलवाद और आतंकवाद से ग्रस्त क्षेत्रों की बच्चियों के लिए अनेक छात्रावास चला रही है, जहां उनके निःशुल्क आवास और पढ़ाई की व्यवस्था की जाती है. इन छात्रावासों की अनेक लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त कर स्वाबलंबी बन चुकी हैं. वर्ष 1953 में समिति ने सेविका प्रकाशन आरंभ किया जो विभिन्न भाषाओं में सामाजिक-राष्ट्रीय साहित्य प्रकाशित करता है. वर्ष 1965 से प्रतिवर्ष नववर्ष प्रतिपदा पर दिनदर्शिका का प्रकाशन होता है. चाहे प्राकृतिक आपदा हो या देश पर हमला, समिति सदा ही सेवा, बचाव और सहायता कार्य में आगे रही है. मेधाविनी सिंधु सृजन समिति की प्रबुद्ध महिलाओं का समूह है, जिसमें वकील, कलाकार, लेखक, पत्रकार आदि शामिल हैं. ये समय-समय पर राष्ट्रहित के विषयों पर सेमीनार और संगोष्ठी आदि आयोजित करता है और सेविकाओं को ज्वलंत विषयों की जानकारी और विश्लेषण उपलब्ध करवाता है.

July 7th 2019, 7:00 am

09 जुलाई को हिन्दुओं पर बढ़ते जिहादी आक्रमणों के विरोध में बजरंग-दल करेगा देश व्यापी प्रदर्शन

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नई दिल्ली. हिन्दू समाज पर लगातार बढ़ते जिहादी आक्रमणों के विरुद्ध बजरंग-दल मंगलवार (9 जुलाई) को देश भर में प्रदर्शन करेगा. इस सम्बन्ध में एक संयुक्त बयान में विश्व हिन्दू परिषद् के अंतर्राष्ट्रीय महामंत्री मिलिंद परांडे तथा बजरंग-दल के राष्ट्रीय संयोजक सोहन सिंह सोलंकी ने कहा कि इन विरोध-प्रदर्शनों के बाद स्थानीय कार्यकर्ता महामहिम राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए एक ज्ञापन भी देंगे, जिससे देश में बढ़ते इस्लामिक जिहादी हमलों पर रोक लगाई जा सके.

विहिप महामंत्री ने कहा कि गत 30 जून की रात्रि में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सबसे बड़े व्यावसायिक केंद्र चांदनी चौक क्षेत्र में एक 100 वर्ष पुराने मंदिर पर इस्लामिक जिहादियों द्वारा हमला तथा उसके बाद मोब लिंचिंग की कुछ झूँठी घटनाओं के नाम पर हिन्दू समाज, पुलिस प्रशासन व देश के शान्ति पूर्ण व्यवस्था को बदनाम करने हेतु मुस्लिम समाज द्वारा किये गए हिंसक प्रदर्शनों में जो हिन्दू विरोध, राष्ट्रविरोध व खुल्लमखुल्  गुंडागर्दी देखी गई, वह बेहद निंदनीय व चिंतनीय है.

July 7th 2019, 5:00 am

07 जुलाई / जन्मदिवस – शौर्यपूर्ण व्यक्तित्व राव हमीर

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रणथम्भौर

नई दिल्ली. भारत के इतिहास में राव हमीर को वीरता के साथ ही उनके हठ के लिए भी याद किया जाता है. उनके हठ के बारे में कहावत प्रसिद्ध है –

सिंह सुवन, सत्पुरुष वचन, कदली फलै इक बार, तिरिया तेल हमीर हठ, चढ़ै न दूजी बार..

अर्थात सिंह एक ही बार संतान को जन्म देता है. सज्जन लोग बात को एक ही बार कहते हैं. केला एक ही बार फलता है. स्त्री को एक ही बार तेल एवं उबटन लगाया जाता है अर्थात उसका विवाह एक ही बार होता है. ऐसे ही राव हमीर का हठ है. वह जो ठानते हैं, उस पर दोबारा विचार नहीं करते.

राव हमीर का जन्म सात जुलाई, 1272 को चौहानवंशी राव जैत्रसिंह के तीसरे पुत्र के रूप में अरावली पर्वतमालाओं के मध्य बने रणथम्भौर दुर्ग में हुआ था. बालक हमीर इतना वीर था कि तलवार के एक ही वार से मदमस्त हाथी का सिर काट देता था. उसके मुक्के के प्रहार से बिलबिला कर ऊंट धरती पर लेट जाता था. इस वीरता से प्रभावित होकर राजा जैत्रसिंह ने अपने जीवनकाल में ही 16 दिसम्बर, 1282 को उनका राज्याभिषेक कर दिया. राव हमीर ने अपने शौर्य एवं पराक्रम से चौहान वंश की रणथम्भौर तक सिमटी सीमाओं को कोटा, बूंदी, मालवा तथा ढूंढाढ तक विस्तृत किया. हमीर ने अपने जीवन में 17 युद्ध लड़े, जिसमें से 16 में उन्हें सफलता मिली. 17वां युद्ध उनके विजय अभियान का अंग नहीं था.

उन्होंने अपनी हठ के कारण दिल्ली के तत्कालीन शासक अलाउद्दीन खिलजी के एक भगोड़े सैनिक मुहम्मदशाह को शरण दे दी. हमीर के शुभचिंतकों ने बहुत समझाया, पर उन्होंने किसी की नहीं सुनी. उन्हें रणथम्भौर दुर्ग की अभेद्यता पर भी विश्वास था, जिससे टकराकर जलालुद्दीन खिलजी जैसे कई लुटेरे वापस लौट चुके थे.

कुछ वर्ष बाद जलालुद्दीन की हत्याकर दिल्ली की गद्दी पर उसका भतीजा अलाउद्दीन खिलजी बैठ गया. वह अति समृद्ध गुजरात पर हमला करना चाहता था, पर रणथम्भौर उसके मार्ग की बाधा बना था. अतः उसने पहले इसे ही जीतने की ठानी, पर हमीर की सुदृढ़ एवं अनुशासित वीर सेना ने उसे कड़ी टक्कर दी.

11 मास तक रणथम्भौर से सिर टकराने के बाद सेनापतियों ने उसे लौट चलने की सलाह दी, पर अलाउद्दीन ने कपट नीति अपनाकर किले के रसद वाले मार्ग को रोक लिया तथा कुछ रक्षकों को भी खरीद लिया, लेकिन हर बार की तरह इस बार भी उसे पराजित होना पड़ा.

कहते हैं कि जब हमीर की सेनाओं ने अलाउद्दीन को हरा दिया, तो हिन्दू सैनिक उत्साह में आकर शत्रुओं से छीने गये झंडों को ही ऊंचाकर किले की ओर बढ़ने लगे. इससे दुर्ग की महिलाओं ने समझा कि शत्रु जीत गया है. अतः उन्होंने जौहर कर लिया. राव हमीर जब दुर्ग में पहुंचे, तो यह दृश्य देखकर उन्हें राज्य और जीवन से वितृष्णा हो गयी. उन्होंने अपनी ही तलवार से सिर काटकर अपने आराध्य भगवान शिव को अर्पित कर दिया. इस प्रकार केवल 29 वर्ष की अल्पायु में 11 जुलाई, 1301 को हमीर का शरीरांत हुआ. राव हमीर पराक्रमी होने के साथ ही विद्वान, कलाप्रेमी, वास्तुविद एवं प्रजारक्षक राजा थे. प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य महर्षि शारंगधर की ‘शारंगधर संहिता’ में हमीर द्वारा रचित श्लोक मिलते हैं. रणथम्भौर के खंडहरों में विद्यमान बाजार, व्यवस्थित नगर, महल, छतरियां आदि इस बात के प्रमाण हैं कि उनके राज्य में प्रजा सुख से रहती थी. यदि एक मुसलमान विद्रोही को शरण देने की हठ वे न ठानते, तो शायद भारत का इतिहास कुछ और होता. वीर सावरकर ने हिन्दू राजाओं के इन गुणों को ही ‘सद्गुण विकृति’ कहा है.

July 6th 2019, 6:53 pm

रथयात्रा के दौरान 700 स्वयंसेवकों ने 8 व्यवस्थाओं में निभाई भूमिका

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भुवनेश्वर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं उत्कल बिपन्न सहायता समिति के स्वयंसेवकों ने भगवान जगन्नाथ रथयात्रा (2019) के दौरान 8 श्रेणियों में सेवा प्रदान की. प्राथमिक उपचार – डॉ. अंजन कुमार साहू और डॉ. सुब्रत कुमार मिश्र ने 458 से अधिक व्यक्तियों का उपचार किया, साथ ही निःशुल्क दवाएं वितरित कीं. चिकित्सकों की सहायता के लिये 05 फार्मासिस्ट तथा 05 स्वयंसेवक उपस्थित थे. पानी के छिड़काव के लिए 20 स्वयंसेवक, पीने के पानी के वितरण के लिए 20 स्वयंसेवक, स्ट्रेचर सेवा के लिए 25 स्वयंसेवक, एम्बुलेंस सेवा के लिए 8 स्वयंसेवक, अन्य स्वयंसेवक एंबुलेंस को बिना किसी असुविधा के मार्ग प्रदान करने, व अस्पताल में रोगियों की सहायता के लिए सहयोगी के रूप में स्वयंसेवक उपस्थित थे.

रथयात्रा के दौरान सेवा कार्य का शुभारंभ वरिष्ठ प्रचारक सुनील गोस्वामी, क्षेत्र कार्यवाह गोपाल प्रसाद महापात्रा, उड़ीसा पूर्व प्रांत कार्यवाह अनिल कुमार मिश्र, सह प्रांत कार्यवाह सुदर्शन दास, प्रांत प्रचारक बिपिन प्रसाद नंदा, सह प्रांत प्रचारक श्रस्तिधर बिस्वाल, और उत्कल बिपन्न सहायता समिति के उपाध्यक्ष बिपिन बिहारी पाण्डेय, संयुक्त सचिव दिबाकर प्रसाद हरिचंदन ने किया.

सेवा कार्य के शुभारंभ अवसर पर अतिथियों ने कहा कि सेवा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उत्कल बिपन्न सहायता समिति के कार्य का अहम हिस्सा है. उन्होंने रथयात्रा के दौरान सेवा कार्य में स्वप्रेरणा से लगे 700 स्वयंसेवकों का उत्साहवर्धन व आभार व्यक्त किया.

KIIMS अस्पताल के मुख्य हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. बनबिहारी मिश्र ने दीप प्रज्ज्वलित कर चिकित्सा व एंबुलेंस सेवा का विधिवत शुभारंभ किया.

समिति के संयुक्त सचिव दिबाकर प्रसाद हरिचंदन ने अतिथियों का परिचय करवाया. डॉ. बिजय कुमार स्वैन ने सभी प्रतिभागियों के साथ-साथ गणमान्य व्यक्तियों को आभार व्यक्त किया. रुद्र नारायण महापात्रा ने पूरी रथ यात्रा के दौरान सेवा कार्यों का संचालन किया.

July 6th 2019, 8:59 am

केरल वन विभाग की पर्यावरण रिपोर्ट – शबरीमाला के भजन-कीर्तन से ध्वनि प्रदूषण

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नई दिल्ली. केरल वन विभाग द्वारा केंद्र को सौंपी गई पर्यावरण पर्यटन रिपोर्ट में शबरीमाला में भजन -कीर्तन को ध्वनि प्रदूषण की सूची में डाला गया है और तीर्थस्थल को पर्यावरण के लिए खतरे की सूची में डाला गया है. त्रावणकोर देवासम बोर्ड ने रिपोर्ट पर विरोध किया जताया है तथा बोर्ड के अध्यक्ष ए पद्मकुमार ने इन कथनों को तीर्थस्थल के लिए अपमानजनक बताया है.

वन विभाग की रिपोर्ट में लिखा गया है, “जंगल से जलाने की लकड़ी इकट्ठा करना, छाया के लिए बनाए गए आश्रय स्थल, प्लास्टिक कूड़ा, धार्मिक उद्घोषों से ध्वनि प्रदूषण, तीर्थयात्रियों के लिए बनाए गए मार्गों से मिट्टी का कटाव, रात में मंदिर दर्शन के लिए जाने पर उजाला किया जाना, अस्थाई शिविर आदि, इस तीर्थस्थल में होने वाले ये सभी कारण पर्यावरण के लिए प्रमुख खतरे हैं.”

इसके आगे रिपोर्ट में लिखा गया है कि इन सबके बावजूद वन विभाग ने शायद ही कभी तीर्थस्थल की गतिविधियों में हस्तक्षेप किया है. पद्मकुमार ने कहा कि बोर्ड के साथ मिलकर सुधार करने की बजाय वन विभाग की रिपोर्ट तीर्थस्थल की छवि को नुकसान पहुंचा रही है.

July 6th 2019, 8:17 am

भारतीय ज्ञान का खजाना – 2

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भारत का प्राचीन जल व्यवस्थापन

‘पंच महाभूत मंदिरों का रहस्य’ नामक लेख पर लोगों ने प्रतिक्रियाओं की अक्षरशः वर्षा ही कर दी. सोशल मीडिया के माध्यम से यह लेख बड़े पैमाने पर वायरल हुआ. फेसबुक पर इस लेख को अनेकों ने शेयर किया, वही व्हाट्स एप्प पर अनेक समूहों में यह लेख घूमता रहा. निश्चित रूप से कुछ लाख लोगों तक यह लेख पहुँचा ही है.

अनेक प्रतिक्रियाओं में अधिकांश लोगों का यह कहना था कि, हमें ऐसे अदभुत मंदिरों के बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी. इसमें उनकी भी गलती नहीं. हम सभी का यह दुर्भाग्य है कि भारत की वैज्ञानिक, वैभवशाली, सांस्कृतिक विरासत हमें मालूम ही नहीं है. अनेक मामलों में हमें ऐसा प्रतीत होता है. वर्तमान में पड़ रहे सूखे के कारण यह बात प्रमुख रूप से सभी के सामने उभरकर आई है.

इस बार सूखे ने समूचे देश में, अत्यधिक नुकसान किया है. पानी के लिए मनुष्य दूर-दूर भटक रहा है. महाराष्ट्र के लातूर जैसे शहर में तो स्थिति भयावह हो चुकी है. दो वर्ष पूर्व यहाँ पानी को लेकर दंगे हुए और धारा १४४ लगानी पड़ी. इस विकट परिस्थिति से यह बात  साफ होती है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में पानी का नियोजन और व्यवस्थापन ठीक से नहीं किया गया. ना ही अच्छे बाँध बनाए गए, ना ही नहरें बनाई गईं और ना ही जमीन के अंदर पानी वापस पहुँचाने के, पानी को रिसाने के कोई उपाय किए गए. इसीलिए देश के एक बड़े भूभाग में भूजल का स्तर बहुत ही नीचे जा चुका है.

परन्तु यह ध्यान रखने वाली बात है कि सूखे की ऐसी प्राणघातक परिस्थिति भारत में प्राचीनकाल में कभी नहीं आई. सूखा तो पहले भी पड़ता था, किन्तु उस कालखंड में जल की व्यवस्था एवं नियोजन उत्तम था. बल्कि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि हमारे देश में जल का नियोजन उत्कृष्ट था, इसीलिए हमारा देश ‘सुजलाम सुफलाम’ कहलाता था…!

जल संसाधन का नियोजन कितना अच्छा होना चाहिए..? तो, भारत में कितने लोग यह बात जानते हैं कि विश्व का पहला ज्ञात और आज भी उपयोग किया जाने वाला बाँध भारत में है? ईस्वी सन दूसरी शताब्दी में चोल राजा करिकलन द्वारा बनाया गया ‘अनईकट्टू’ अथवा अंग्रेजी भाषा में ‘ग्रांड एनीकट’ (Grand Anicut) अथवा आधुनिक भाषा में कहें तो ‘कलानाई बाँध’, ही वह बाँध है, जिसका पिछले अठारह सौ वर्षों से लगातार उपयोग किया जा रहा है. आज के जमाने में, जब बनाए जाने वाले बाँधों में तीस-पैंतीस वर्ष के बाद ही दरारें पड़ने लगती हैं, वहाँ लगातार अठारह सौ वर्षों तक कोई बाँध उपयोग में रहे, क्या यह अदभुत आश्चर्य नहीं है…?

कावेरी नदी के मुख्य प्रवाह क्षेत्र में निर्माण किया गया यह बाँध ३२९ मीटर लंबा और २० मीटर चौड़ा है. त्रिचनापल्ली से केवल 15 किमी दूर स्थित यह प्राचीन बाँध कावेरी नदी के डेल्टा प्रदेश में बनाया गया है. अंग्रेजों ने भी इस बाँध पर अपना अंग्रेजी ज्ञान लगाने का प्रयास किया, परन्तु सफलता नहीं मिली. अत्यंत ऊबड़खाबड़ पथरीले प्रदेश में निर्मित इस बाँध को देखकर निश्चित रूप से यह प्रतीत होता है कि उस प्राचीनकाल में भी बाँध निर्माण की तकनीक और विज्ञान उत्तम रूप से विकसित था. क्योंकि यह बाँध प्रायोगिक रूप से नहीं बनाया गया था, वरन कुशल एवं अनुभवी अभियंताओं ने नदी के मुख्य प्रवाह में पूरे अनुभव के साथ बनाया हुआ है. ज़ाहिर सी बात है कि भारत में बाँध निर्माण करने अर्थात् ‘जल-व्यवस्थापन एवं नियोजन’ की तकनीक बहुत-बहुत प्राचीन है. आगे चलकर तमाम विदेशी आक्रमणों के कारण इस प्राचीन बाँध शास्त्रों के प्रमाण नष्ट हो गए, और अब केवल इतिहास में कलानाई बाँध जैसा शानदार उदाहरण ही बचा रह गया.

विश्व के इतिहास में देखा जाए तो ऐसे प्राचीन बाँध निर्माण के कई उल्लेख प्राप्त होते हैं. नाईल नदी पर कोशेश नामक स्थान पर ईस्वी सन से २९०० वर्ष पहले 15 फुट ऊँचा निर्माण किया गया बाँध सबसे प्राचीन बाँध माना जाता है, परन्तु आज वह अस्तित्त्व में नहीं है. संभवतः इतिहासकारों ने इस बाँध को कभी देखा नहीं है, केवल इस बाँध का उल्लेख ही मिलता है.

इजिप्त में ईसा पूर्व 2700 वर्ष पहले नाईल नदी पर बने बाँध के कुछ अवशेष जरूर आज भी देखने को मिलते हैं. इस बाँध का नाम साद-अल-कफारा रखा गया था. काहिरा से लगभग तीस किमी दूरी पर यह बाँध बनाया गया था, परन्तु यह जल्दी ही धराशायी हो गया था. इस कारण अगली अनेक शताब्दियों तक इजिप्त के लोगों की हिम्मत नहीं हुई कि वे पुनः कोई बाँध बनाएं. इसी प्रकार चीन में भी ईसा पूर्व 2280 वर्ष पहले बाँध निर्माण के उल्लेख मिलते हैं. परन्तु वर्तमान में उपयोग किया जा सकने वाला एक भी प्राचीन बाँध पूरी दुनिया में कहीं भी दिखाई नहीं देता.

परन्तु भारत में कलानाई बाँध के पश्चात बनाए गए अनेक प्राचीन बाँध आज भी कार्यरत हैं. ईस्वी सन् 500 से 1300 के बीच दक्षिण भारत में पल्लव राजाओं द्वारा निर्माण किए गए मिट्टी के अनेक बाँध आज भी काम कर रहे हैं. सन् 1011 से 1037 के बीच तमिलनाडु में बनाए गए वीरनाम बाँध का एक उदाहरण हमारे सामने है.

पानी का प्रबंधन, व्यवस्थापन इत्यादि के सन्दर्भ में निर्माण की गई अनेक वास्तु रचनाएं आज भी भारत में अस्तित्त्व में हैं. प्राचीन समय में गुजरात की राजधानी रही पाटन में निर्माण की गई ‘रानी का वाव’ नामक बावड़ी (राजशाही कुआँ) आज यूनेस्को के संरक्षित स्मारकों की सूची में शामिल है. भूगर्भीय जल के संचय एवं संरक्षण का यह एक अत्यंत उत्तम उदाहरण है. ईस्वी सन १०२२ से १०६३ के बीच निर्मित की यह सात मंजिला बावड़ी आज भी अच्छी स्थिति में है. सोलंकी राजवंश की रानी उदयामती ने अपने पति भीमदेव की स्मृति में इस बावड़ी का निर्माण किया था. यह वही कालखंड था, जब सोमनाथ पर महमूद गजनी ने आक्रमण किया था. इस बावड़ी के निर्माण के कुछ वर्षों पश्चात गुजरात मुस्लिम शासकों के कब्जे में चला गया. इस कारण अलगे 700 वर्षों तक यह राजशाही बावड़ी कीचड़ और गन्दगी के बीच उपेक्षित ही रही…! अर्थात भूजल की व्यवस्था एवं संरक्षण के बारे में भारत को बहुत पहले से ही परम्परागत ज्ञान था, यह तो निश्चित ही है.

पंचमहाभूत मंदिरों से पहले लिखे गए एक लेख एवं सम्बन्धित लेखमाला में इसका उल्लेख आ चुका है. उसमें ‘जल’ संबंधी उल्लेख एवं जल-व्यवस्थापन की जानकारी प्राचीनकाल से ही भारतीयों को है, इस बारे में अनेक प्रमाण आपके समक्ष रखे जा चुके हैं. ऋग्वेद में और यजुर्वेद में भी हमें पानी के संरक्षण संबंधी अनेक सूक्त दिखाई देते हैं. धुलिया के श्री मुकुंद धाराशिवकर ने इस विषय पर गहन अध्ययन करते हुए लेखन किया है. उन्हीं ने प्राचीन जल व्यवस्थापन के बारे में स्व. गो. ग. जोशी का भी उल्लेख किया है. तारापुर स्थित वरिष्ठ अभियंता रहे जोशी जी का प्राचीन शास्त्रों के बारे में अच्छा-खासा ज्ञान था एवं रूचि थी.

‘स्थापत्य वेद’ को अथर्ववेद का ही उप-वेद माना जाता है. दुर्भाग्य से इसकी एक भी प्रति भारत में उपलब्ध नहीं है. यूरोप के ग्रंथालयों में ही इस वेद की कुछ प्रतियाँ मिलती हैं. इसके परिशिष्टों में तडाग विधि (जलाशय निर्माण) के बारे में सम्पूर्ण जानकारी दी गई है.

मुकुंद धाराशिवकर ने एक और ग्रन्थ का उल्लेख किया है, दुर्भाग्य से जिसका नाम भी हमें मालूम नहीं है. चूँकि उसका केवल अंतिम पृष्ठ ही उपलब्ध है, इसलिए यह भी ज्ञात नहीं कि इसका लेखक कौन है. ‘अथ जलाशय प्रारम्यते…’ इस पंक्ति से आरम्भ होने वाले ग्रन्थ में दीवार बनाकर जलाशय कैसे निर्माण किया जाए, इस बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है. यह ग्रन्थ २८०० वर्ष पहले का माना जाता है.

कृषि पाराशर, कश्यप कृषि सूक्त, छठवीं शताब्दी में लिखे गए ‘सहदेव भालकी’ इत्यादि ग्रंथों में पानी के संचय, पानी के वितरण, बारिश का अनुमान, तालाब निर्माण इत्यादि के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है.

नारद शिल्पशास्त्र एवं भृगु शिल्पशास्त्र में समुद्री किलों, नदी में स्थित किलों जैसे विषयों से लेकर इन किलों में पानी के संचय, वितरण एवं खराब पानी की व्यवस्था के बारे में गहराई से विवेचन किया गया है. भृगु शिल्पशास्त्र में पानी के दस गुणधर्म बताए गए हैं. अलबत्ता पाराशर मुनि ने प्रतिपादित किया है कि पानी के उन्नीस गुणधर्म होते हैं. पानी के बारे में वेदों एवं विविध पुराणों में अनेक उल्लेख आते हैं. विशिष्ट परिस्थिति में जल का नियोजन कैसे किया जाए, इस बारे में भी विस्तार से जानकारी मिलती है.

सन् 2007 में योजना आयोग ने विशेषज्ञों द्वारा लिखित ‘ग्राउंड वाटर मैनेजमेंट एंड ओनरशिप’ की एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इंटरनेट पर भी यह उपलब्ध है. मोंटेकसिंह अहलूवालिया ने इसकी प्रस्तावना लिखी है. इस रिपोर्ट के शुरुआत में ही पानी के बारे में ऋग्वेद की एक ऋचा का उल्लेख किया गया है –

The waters of sky

The waters of rivers,

And water in the well,

Whose source is the ocean

May all these sacred waters protect me..

इसके पश्चात रिपोर्ट लिखने का आरम्भ करते समय प्राचीन भारतीय शास्त्रों के अनुसार पानी की व्यवस्था एवं मैनेजमेंट कितना वैज्ञानिक था, इस बात का भी विवेचन किया गया है.

जल के व्यवस्थापन के बारे में अत्यंत विस्तार से विवेचन किया है, ‘वराहमिहिर’ ने. यह ऋषि उज्जैन में रहते थे. उस समय उज्जैन के महाराजा सम्राट विक्रमादित्य थे. वराहमिहिर ने सन 505 के आसपास विविध विषयों पर अपना अभ्यास एवं शोध आरम्भ किया, और सन 587 में उनकी मृत्यु हुई. अर्थात् लगभग अस्सी वर्ष वराहमिहिर ने अपनी ज्ञान-साधना में व्यतीत किए.

वराहमिहिर का प्रमुख कार्य है उनके द्वारा लिखित ‘बृहत्संहिता’ नामक ज्ञानकोष. इस ज्ञान कोष में उदकार्गल (अर्थात् पानी का संचय) नामक 54वां अध्याय है. 125 श्लोकों के इस अध्याय में वराहमिहिर ने जो जानकारी दी है, वह अदभुत है, अक्षरशः चमत्कृत कर देने वाली है.

भूगर्भ में पानी की खोज कैसे की जा सकती है, इस सम्बन्ध में इसमें अनेक श्लोक हैं, जो हमें आज भी चकित कर देते हैं. वराहमिहिर ने जमीन की गहराई में स्थित पानी की खोज करते समय मुख्यतः तीन बातों का निरीक्षण करने पर जोर दिया है. इस निरीक्षण में उस भूभाग पर उपलब्ध पेड़-पौधे, उन पेड़-पौधों के आसपास स्थित बाम्बियाँ, उन बाम्बियों की दिशा, उन बाम्बियों में रहने वाले प्राणी, उस जमीन का रंग इत्यादि बातों का समावेश है. वराहमिहिर का कहना है कि इन निरीक्षणों के आधार पर जमीन के भीतर उपलब्ध पानी की खोज निश्चित रूप से होती है. ध्यान दें, कि डेढ़ हजार वर्ष पहले, जबकि कोई आधुनिक संसाधन नहीं थे, फिर भी वराहमिहिर मजबूती से यह बात सप्रमाण रखते हैं.

यह खोज करते समय वराहमिहिर ने आजकल के वैज्ञानिकों की तरह महत्त्वपूर्ण बातों को अपने शोध में लिपिबद्ध किया. उन्होंने लगभग पचपन वृक्षों एवं वनस्पतियों का अभ्यास करते हुए अपने मत रखे. इसी प्रकार उन्होंने मिट्टी का भी वर्गीकरण बड़े विस्तार से किया है. इन सभी निरीक्षणों का निष्कर्ष भी उन्होंने लिख रखा है… उनमें से कुछ इस प्रकार हैं –

१) बहुत सी शाखाओं वाले तथा तैलीय छाल वाले छोटे पेड़ पौधे हों, तो वहां पानी मिलता है.

२) गर्मी के दिनों में यदि जमीन से भाप निकलती दिखाई दे, तो उस जमीन में पानी है.

३) किसी वृक्ष की एक ही डाली जमीन की तरफ झुकी हुई हो, तो उस स्थान पर पानी मिलने की संभावना होती है.

४) जब गर्मी के दिनों में जमीन गर्म हो रही हो, लेकिन एकाध स्थान पर जमीन ठण्डी हो, तो वहाँ भी पानी की मौजूदगी होती है.

५) यदि किसी कांटेदार पेड़-पौधे के काँटे भोथरे हो गए हों, तो उस स्थान पर निश्चित ही पानी की प्राप्ति होती है.

ऐसे अनेक निरीक्षण उन्होंने अपने ज्ञानकोष में लिख रखे हैं. मजेदार बात यह कि वराहमिहिर के यह प्रतिपादन सच्चे हैं या झूठे, अथवा कितने वैज्ञानिक हैं, यह सिद्ध करने के लिए आंध्रप्रदेश के तिरुपति स्थित श्रीवेंकटेश्वर विश्वविद्यालय ने लगभग पन्द्रह-सोलह वर्ष पहले इन निरीक्षणों के आधार पर वराहमिहिर के इन दावों के अनुसार कुंए खोदकर (बोअर लेकर परीक्षण करने का फैसला किया. उन्होंने वराहमिहिर के ग्रन्थ के आधार पर जो योग्य स्थान होते हैं, ऐसे लगभग 300 स्थानों का चयन किया और उन सभी स्थानों पर बोरिंग मशीन से खुदाई की. आश्चर्य की बात यह है कि 95 % स्थानों पर उन्हें पानी प्राप्त हुआ. अर्थात् वराहमिहिर का निरीक्षण एकदम सटीक था, यह सिद्ध होता है. परन्तु दुर्भाग्य से यह परियोजना सरकारी लालफीताशाही में उलझ गई और जनता तक नहीं पहुँच सकी.

पानी के मैनेजमेंट संबंधी अनेक उदाहरण हमें अंग्रेजों का शासन आने से पहले ही विभिन्न स्थानों पर दिखाई देते हैं. पेशवाई के बाद औरंगाबाद में निर्मित ‘थत्ते नहर’ हो, अथवा पुणे में पानी का वितरण करने वाली पेशवाकालीन रचनाएं हों. जल के परिवहन हेतु पाँच सौ वर्ष पुरानी रचना आज भी बुरहानपुर में अस्तित्त्व में है. इसी प्रकार पाँच सौ वर्ष पुरानी पंढरपुर-अकलूज मार्ग पर स्थित बेलापुर गाँव में सातवाहन कालीन निर्माण की गई नहर हो अथवा ‘समरांगण सूत्रधार’ नामक ग्रन्थ के आधार पर राजा भोज द्वारा निर्मित भोपाल का तालाब हो… ऐसे अनेकानेक उदाहरण दिए जा सकते हैं.

गढा-मंडला (जबलपुर संभाग) एवं चंद्रपुर क्षेत्र में प्राचीनकाल में गोंड राजाओं का शासन था. मुग़ल हों, आदिलशाही हों, अथवा कुतुबशाही हों, कोई भी इन गोंड राजाओं को नहीं हरा पाया था. परन्तु फिर भी हमारे देश में इस भूभाग को पिछड़ा हुआ माना गया. जबकि वास्तव में स्थिति ऐसी नहीं थी. एक बहुत ही उत्तम हिन्दी पुस्तक है – ‘गोंडकालीन जल-व्यवस्थापन’. इस पुस्तक में लगभग 500 से 800 वर्ष पूर्व गोंड साम्राज्य में पानी का कितना उत्कृष्ट व्यवस्थापन था, इसका वर्णन किया गया है. इस जल नियोजन का लाभ यह हुआ कि किसी भी सूखे के समय अथवा अल्पवर्षा के समय इस गोंड प्रदेश को कभी भी कोई कष्ट नहीं हुआ.

हमारे जबलपुर शहर में गोंड रानी दुर्गावती के कालखंड में (अर्थात् ५०० वर्ष पूर्व) ‘बावनताल और बहत्तर तलैया’ निर्माण किए गए (तलैया अर्थात छोटे तालाब). यह तालाब केवल यूँ ही नहीं खोद दिए गए थे, बल्कि जमीन की स्थिति एवं ‘कंटूर’ के अनुसार उनकी रचना की गई है. कुछ तालाब तो अंदर ही अंदर आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए भी थे. इनमें से अधिकाँश तालाब अब समाप्त हो चुके हैं, लेकिन बचे हुए तालाबों के कारण ही जबलपुर नगर में आज भी भूजल का स्तर काफी ऊँचा बना हुआ है और यहाँ पर पानी की कोई कमी नहीं दिखाई देती. अब विचार कीजिए कि उस कालखंड में खेती और पर्यावरण कितना समृद्ध रहा होगा…!

इसका साफ़ अर्थ है कि, हमारे पास प्राचीनकाल से ही पानी का महत्त्व, पानी की खोज एवं पानी के नियोजन-व्यवस्थापन के बारे में सम्पूर्ण रूप से विकसित वैज्ञानिक पद्धति उपलब्ध थी. कुछ हजार वर्षों तक निरंतर प्रभावी तरीके से हम उसका उपयोग भी करते रहे, इसीलिए यह देश सुजलाम-सुफलाम था.

परन्तु हमारे बीच ही अनेक लोग ऐसे हैं, जिनके मनोमस्तिष्क पर अंग्रेजों एवं अंग्रेजी का इतना जबरदस्त प्रभाव है कि उनकों आज भी यही लगता है कि भारत देश को पानी का महत्त्व सिखाने वाले अंग्रेज ही थे. बाँध बनाने की कला हमें अंग्रेजों ने ही सिखाई…!

दुर्भाग्य से हम अपनी प्राचीन जल व्यवस्था एवं नियोजन को भूल गए हैं और आज पानी के लिए त्राहि-त्राहि करते हैं, धारा 144 लगानी पड़ रही है, पानी के लिए युद्ध लड़ने जा रहे हैं..!!

हम अपने ही समृद्ध ज्ञान, विरासत, परंपरा एवं तंत्र को यदि बिसरा देंगे, तो यह स्थिति आगे भी बनी रहेगी, यह अटल सत्य है…!!

–  प्रशांत पोळ

July 6th 2019, 7:17 am

06 जुलाई / जन्मदिवस – नारी जागरण की अग्रदूत वन्दनीय मौसीजी (लक्ष्मीबाई केलकर)

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नई दिल्ली. बंगाल विभाजन के विरुद्ध हो रहे आन्दोलन के दिनों में छह जुलाई, 1905 को नागपुर में कमल नामक बालिका का जन्म हुआ. तब किसे पता था कि भविष्य में यह बालिका नारी जागरण के एक महान संगठन का निर्माण करेगी. कमल के घर में देशभक्ति का वातावरण था. उसकी मां जब लोकमान्य तिलक का अखबार ‘केसरी’ पढ़ती थीं, तो कमल भी गौर से उसे सुनती थी. केसरी के तेजस्वी विचारों से प्रभावित होकर उसने निश्चय किया कि वह दहेज रहित विवाह करेगी. इस जिद के कारण उसका विवाह 14 वर्ष की अवस्था में वर्धा के एक विधुर वकील पुरुषोत्तम राव केलकर से हुआ, जो दो पुत्रियों के पिता थे. विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई हो गया.

अगले 12 वर्ष में लक्ष्मीबाई ने छह बच्चों को जन्म दिया. वे एक आदर्श व जागरूक गृहिणी थीं. मायके से प्राप्त संस्कारों का उन्होंने गृहस्थ जीवन में पूर्णतः पालन किया. उनके घर में स्वदेशी वस्तुएं ही आती थीं. अपनी कन्याओं के लिए वे घर पर एक शिक्षक बुलाती थीं. वहीं से उनके मन में कन्या शिक्षा की भावना जन्मी और उन्होंने एक बालिका विद्यालय खोल दिया. रूढ़िग्रस्त समाज से टक्कर लेकर उन्होंने घर में हरिजन नौकर रखे. गान्धी जी की प्रेरणा से उन्होंने घर में चरखा मंगाया. एक बार जब गान्धी जी ने एक सभा में दान की अपील की, तो लक्ष्मीबाई ने अपनी सोने की जंजीर ही दान कर दी.

वर्ष 1932 में उनके पति का देहान्त हो गया. अब अपने बच्चों के साथ बाल विधवा ननद का दायित्व भी उन पर आ गया. लक्ष्मीबाई ने घर के दो कमरे किराये पर उठा दिये. इससे आर्थिक समस्या कुछ हल हुई. इन्हीं दिनों उनके बेटों ने संघ की शाखा पर जाना शुरू किया. उनके विचार और व्यवहार में आये परिवर्तन से लक्ष्मीबाई के मन में संघ के प्रति आकर्षण जगा और उन्होंने संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी से भेंट की.

डॉ. हेडगेवार जी ने उन्हें बताया कि संघ में स्त्रियां नहीं आतीं. उसके पश्चात डॉ. साहब से विचार विमर्श और प्रेरणा से वर्ष 1936 में स्त्रियों के लिए ‘राष्ट्र सेविका समिति’ नामक एक नया संगठन प्रारम्भ किया. समिति के कार्यविस्तार के साथ ही लक्ष्मीबाई ने नारियों के हृदय में श्रद्धा का स्थान बना लिया. सब उन्हें ‘वन्दनीया मौसीजी’ कहने लगे. आगामी दस साल के निरन्तर प्रवास से समिति के कार्य का अनेक प्रान्तों में विस्तार हुआ. वर्ष 1945 में समिति का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ. देश की स्वतन्त्रता एवं विभाजन से एक दिन पूर्व वे कराची, सिन्ध में थीं. उन्होंने सेविकाओं से हर परिस्थिति का मुकाबला करने और अपनी पवित्रता बनाये रखने को कहा. उन्होंने हिन्दू परिवारों के सुरक्षित भारत पहुंचने के प्रबन्ध भी किये.

मौसीजी स्त्रियों के लिए जीजाबाई के मातृत्व, अहिल्याबाई के कर्तृत्व तथा लक्ष्मीबाई के नेतृत्व को आदर्श मानती थीं. उन्होंने अपने जीवनकाल में बाल मन्दिर, भजन मण्डली, योगाभ्यास केन्द्र, बालिका छात्रावास आदि अनेक प्रकल्प प्रारम्भ किये. वे रामायण पर बहुत सुन्दर प्रवचन देतीं थीं. उनसे होने वाली आय से उन्होंने अनेक स्थानों पर समिति के कार्यालय बनवाये. 27 नवम्बर, 1978 को नारी जागरण की अग्रदूत वन्दनीय मौसीजी का देहान्त हुआ. उन द्वारा स्थापित राष्ट्र सेविका समिति आज विश्व के 25 से भी अधिक देशों में सक्रिय है.

July 5th 2019, 6:54 pm

ममता सरकार का फरमान – पश्चिम बंगाल में सड़क पर नहीं बनेंगे दुर्गा पूजा पंडाल

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दिल्ली/कोलकाता. पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने दुर्गा पूजा को लेकर नया फरमान जारी किया है. राज्य सचिवालय नवान्न की तरफ से गुरुवार को राज्यभर के सभी थानों के लिए एक निर्देश जारी किया गया है. इसमें स्पष्ट किया गया है कि राज्यभर में कहीं भी दुर्गा पूजा के आयोजन सड़क पर नहीं होने चाहिए, ताकि यातायात बाधित न हो. पश्चिम बंगाल में अब कहीं भी पूजा पंडाल बनाने के लिए सड़क के इस्तेमाल की मनाही होगी. इतना ही नहीं यदि पूजा को लेकर कहीं भी सड़क जाम की स्थिति पैदा होती है तो इसे भी सहन नहीं किया जाएगा. इस संदर्भ में सभी पूजा कमेटियों के साथ भी जानकारी साझा करने की बात कही गई है. तर्क दिया गया है कि आम लोगों को कोई परेशानी न हो इसे लेकर ही उक्त कदम उठाया है. यह निर्देश कोलकाता के साथ राज्य के सभी जिलों के लिए भी लागू होगा. आदेश की प्रति सभी पुलिस थानों के साथ ही पूजा कमेटियों को भी भेज दी गई है.

उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल में प्रसिद्ध दुर्गापूजा को अब दो महीने ही बचे हैं. महानगर समेत राज्य में कई जगह छोटे-बड़े पूजा पंडालों का निर्माण होता है. महानगर में कई जगह स्थान अभाव के कारण पूजा पंडालों के लिए सड़क का भी उपयोग किया जाता है. जब लोग विभिन्न पंडालों में दर्शन को उमड़ते हैं तो सड़क जाम परेशानी का सबब बनता है. सचिवालय की ओर से कहा गया है कि उक्त निर्देश लोगों की परेशानियों को कम करने के लिए जारी किया गया है.

साभार – दैनिक जागरण

July 5th 2019, 10:51 am

05 जुलाई / पुण्यतिथि – हंसकर मृत्यु को अपनाने वाले अधीश जी

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नई दिल्ली. किसी ने लिखा है – तेरे मन कुछ और है, दाता के कुछ और. संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अधीश जी के साथ भी ऐसा ही हुआ. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए उन्होंने जीवन अर्पण किया, पर विधाता ने 52 वर्ष की अल्पायु में ही उन्हें अपने पास बुला लिया.

अधीश जी का जन्म 17 अगस्त, 1955 को आगरा के एक अध्यापक जगदीश भटनागर तथा उषा देवी के घर में हुआ. बालपन से ही उन्हें पढ़ने और भाषण देने का शौक था. वर्ष 1968 में विद्याभारती द्वारा संचालित एक इंटर कॉलेज के प्राचार्य लज्जाराम तोमर ने उन्हें स्वयंसेवक बनाया. धीरे-धीरे संघ के प्रति प्रेम बढ़ता गया और बीएससी, एलएलबी करने के बाद 1973 में उन्होंने संघ कार्य हेतु घर छोड़ दिया. अधीश जी ने सर्वोदय के सम्पर्क में आकर खादी पहनने का व्रत लिया और उसे आजीवन निभाया. वर्ष 1975 में आपातकाल लगने पर वे जेल गये और भीषण अत्याचार सहे. आपातकाल के बाद उन्हें विद्यार्थी परिषद में और वर्ष 1981 में संघ कार्य हेतु मेरठ भेजा गया. मेरठ महानगर, सहारनपुर जिला, विभाग, मेरठ प्रान्त बौद्धिक प्रमुख, प्रचार प्रमुख आदि दायित्वों के बाद उन्हें वर्ष 1996 में लखनऊ भेजकर उत्तर प्रदेश के प्रचार प्रमुख का काम दिया गया.

प्रचार प्रमुख के नाते लखनऊ के ‘विश्व संवाद केन्द्र’ के काम में नये आयाम जोड़े. अत्यधिक परिश्रमी, मिलनसार और वक्तृत्व कला के धनी अधीश जी से जो भी एक बार मिलता, वह उनका होकर रह जाता. बहुमुखी प्रतिभा को देखकर संघ नेतृत्व ने उन्हें अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख और फिर प्रचार प्रमुख का काम दिया और पूरे देश में उनका प्रवास होने लगा. अधीश जी अपने शरीर के प्रति प्रायः उदासीन रहते थे. दिन भर में अनेक लोग उनसे मिलने आते थे, अतः बार-बार चाय पीनी पड़ती थी. इससे उन्हें कभी-कभी शौचमार्ग से रक्त आने लगा. उन्होंने इस ओर ध्यान नहीं दिया. जब यह बहुत बढ़ गया, तो दिल्ली में इसकी जांच करायी गयी. चिकित्सकों ने बताया कि यह कैंसर है और काफी बढ़ गया है.

यह जानकारी मिलते ही सब चिन्तित हो गये. अंग्रेजी, पंचगव्य और योग चिकित्सा जैसे उपायों का सहारा लिया गया, पर रोग बढ़ता ही गया. मार्च 2007 में दिल्ली में जब फिर जांच हुई, तो चिकित्सकों ने अन्तिम घण्टी बजा दी. उन्होंने साफ कह दिया कि अब दो-तीन महीने से अधिक का जीवन शेष नहीं है. अधीश जी ने इसे हंसकर सुना और स्वीकार कर लिया. इसके बाद उन्होंने एक विरक्त योगी की भांति अपने मन को शरीर से अलग कर लिया. अब उन्हें जो कष्ट होता, वे कहते यह शरीर को है, मुझे नहीं. कोई पूछता कैसा दर्द है, तो कहते, बहुत मजे का है. इस प्रकार वे हंसते-हंसते हर दिन मृत्यु की ओर बढ़ते रहे. जून के अन्तिम सप्ताह में ठोस पदार्थ और फिर तरल पदार्थ भी बन्द हो गये.

चार जुलाई, 2007 को वे बेहोश हो गये. इससे पूर्व उन्होंने अपना सब सामान दिल्ली संघ कार्यालय में कार्यकर्ताओं को दे दिया. बेहोशी में भी वे संघ की ही बात बोल रहे थे. घर के सब लोग वहां उपस्थित थे. उनका कष्ट देखकर पांच जुलाई शाम को माता जी ने उनके सिर पर हाथ रखकर कहा – बेटा अधीश, निश्चिन्त होकर जाओ. जल्दी आना और बाकी बचा संघ का काम करना. इसके कुछ देर बाद ही अधीश जी ने देह त्याग दी.

July 4th 2019, 8:08 pm

जनजाति समाज के विकास एवं हितों की रक्षा हेतु प्रतिबद्ध हों – जगदेवराम उरांव

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नई दिल्ली. वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष जगदेवराम उरपांव ने कहा कि “लोगों ने भारी बहुमत देकर भाजपा को देश में नई सरकार बनाने का जनादेश दिया है. देश ने यह जनादेश प्रधानमंत्री की सुरक्षा नीतियों, राष्ट्रवाद, और विकास के लिए दिया है. देश का जनजाति समाज भी इसमें पीछे नहीं रहा”. वे कांस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित जनजाति सांसदों के अभिनन्दन एवं स्नेह-मिलन कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि विकास की भूख जनजाति समाज में भी उतनी ही है, जैसी बाकी लोगों में. इसलिए  जनजाति की 47 आरक्षित सीटों में से 31 सीधे भाजपा को मिली हैं, उसके सहयोगी दलों और स्वतंत्र उम्मीदवारों को जोड़ दिया जाए तो यह संख्या 35 हो जाती है. सभी नव-निर्वाचित जनजाति सांसदों की जिम्मेदारी है कि वे देश विशेषकर जनजाति समाज के विकास और उनके न्यायोचित अधिकारों की रक्षा के लिए हमेशा प्रतिबद्ध रहें. दीनदयाल जी की पॉलिटिकल डायरी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वे जिस दल की टिकट पर जीत कर आए हैं, केवल उसी के सदस्य नहीं हैं, बल्कि जनजाति समाज के भी प्रतिनिधि हैं.

जनजाति कार्य मंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा कि समाज ने प्रधानमंत्री पर जो विश्वास दिखाया है, यह सरकार उस विश्वास को पूरा करते हुए पूरी ताक़त से जनजातियों के शैक्षिक व आर्थिक विकास को समर्पित रहेगी.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र संघचालक डॉ. बजरंगलाल जी ने सभी सांसदों का आह्वान किया कि सरकार की नीतियों को ठीक से समझकर, उसमें उपयुक्त समय–स्थान पर हस्तक्षेप करने के लिए यह आवश्यक है कि सभी सांसद इन नीतियों-विषयों का गहराई से अध्ययन करें.

वनवासी कल्याण आश्रम के संयुक्त महामंत्री विष्णुकांत ने प्रारंभ में कार्यक्रम की भूमिका रखते हुए कहा कि हमारे सामने चुनौतियाँ भी हैं और फेड के अध्यक्ष, उपाध्यक्षा एवं एमडी, जनजाति समाज के विकास का अवसर भी है. सम्मान कार्यक्रम में केन्द्रीय युवा एवं खेल मंत्री किरण रिजीजू, स्टील राज्य मंत्री फग्गनसिंह कुलस्ते, खाद्य प्रसंस्करण मंत्री रामेश्वर तेली, जनजाति कार्य राज्य मंत्री रेणुका सिंह और  भाजपा जनजाति मोर्चा के प्रमुख राम विचार नेताम सहित 34 सांसद उपस्थित थे, जिनमें 4 राज्यसभा के थे. सभी का सम्मान अंग-वस्त्र तथा स्मृति-चिन्ह देकर किया.

इस अवसर पर त्र्यंबकेश्वर के पूज्य स्वामी रघुनाथजी महाराज भी उपस्थित थे. कार्यक्रम का संचालन हर्ष चौहान ने किया. कार्यक्रम के प्रारंभ में शहीद जादोनांग छात्रावास वनवासी कल्याण आश्रम नरेला-दिल्ली के छात्र ओमजांग ने देशभक्ति गीत व अंत में इसी छात्रावास के छात्रों ने वन्देमातरम गीत प्रस्तुत किया.

July 4th 2019, 10:16 am

संघ में तेजी से हो रहा नई पीढ़ी का प्रवेश – अरुण कुमार

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झांसी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार जी ने कहा कि संघ कार्य में नई पीढ़ी का प्रवेश तेजी से हो रहा है। संघ ने बदलते हुए परिवेश को ध्यान में रखकर 6 नई गतिविधियां प्रारम्भ की हैं। इनमें पर्यावरण, ग्राम विकास, गौ संरक्षण, सामाजिक समरसता व कुटुम्ब प्रबोधन शामिल हैं। ग्राम की सामूहिक शक्ति का जागरण करना जरूरी है, जिससे समाज की विभिन्न कमजोरियों को दूर किया जा सके। अम्बाबॉय स्थित एसआर इंजीनियरिंग कॉलेज में चल रहे योजक वर्ग में अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार पत्रकारों से वार्ता कर रहे थे। उन्होंने कहा कि 2010 से संघ के कार्य में लगातार वृद्धि हो रही है। इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि समाज में संघ कार्य की स्वीकारोक्ति व अनुकूलता बढ़ी है। इसके कारण जहां 2010 में संघ की 40 हजार शाखाएं थीं, जो 2019 में बढ़कर 60 हजार हो गई हैं। लोगों में संघ को जानने और संघ से जुड़ने की प्रबल इच्छा हुई है। सन् 2012 से जून 2019 तक 6 लाख लोगों ने संघ से ऑनलाइन जुड़ने की इच्छा व्यक्त की है। इसमें 2018 में 1.5 लाख और 2019 में अब तक मात्र 6 माह में 67 हजार लोगों ने संघ से जुड़ने की इच्छा व्यक्त की है। कुल शाखाओं में से 6 हजार शाखाओं में 40 वर्ष से ऊपर के स्वयंसेवक आते हैं। 16 हजार शाखाओं में 20-40 वर्ष के स्वयंसेवक आ रहे हैं। जबकि 37 हजार शाखाओं में स्कूल और कॉलेज विद्यार्थी आते हैं। उन्होंने कहा कि संघ में नई पीढ़ी का तेजी से प्रवेश हो रहा है। पूरे देश में संघ के 1 हजार प्रशिक्षण वर्ग लगते हैं। जिसमें 7 दिवसीय प्राथमिक शिक्षावर्ग में प्रति वर्ष 1 लाख 25 हजार लोग प्रशिक्षण लेते हैं। इसलिए समाज की अपेक्षा है कि संघ सभी वर्गो में पहुंचकर कुरीतियां दूर कर सके। उन्होंने बताया कि संघ ने देश में बढ़ते पर्यावरण संकट को देखते हुए जल सरंक्षण, वृक्षारोपण व प्लास्टिक प्रबंधन की दिशा में भी कार्य करने का फैसला किया है। इतना ही नहीं ग्राम विकास की दिशा में गौसेवा व गौसंरक्षण की ओर भी संघ का ध्यान तेजी से गया है। समाज में सामाजिक समरसता का निर्माण हो इसको ध्यान में रखते हुए धार्मिक, सामाजिक व सभी संगठनों को साथ में लेकर सामाजिक सद्भाव बनाने का कार्य संघ कर रहा है। उन्होंने कहा कि परिवार हमारे समाज की ताकत है। इसलिए संघ ने कुटुम्ब प्रबोधन का भी कार्य शुरू हुआ किया है। संघ कार्य बढ़ने से समाज की अपेक्षाएं संघ से बढ़ी हैं। इसके लिए संघ ने 5 वर्ष पूर्व प्रशिक्षण का कार्य प्रारम्भ किया। जिससे कार्यकर्ता की क्षमता का विकास व गुणात्मकता में वृद्धि हो सके। क्योंकि संघ कार्य का आधार कार्यकर्ता ही है। उन्होंने कहा कि देश में संघ ने 300 विभाग व 800 जिलों की रचना की है। जिसमें जिला व ऊपर के 9 हजार व प्रान्त व क्षेत्र स्तर के 1 हजार कार्यकर्ताओं को पिछले 5 वर्षों में शिक्षण दिया गया है। इस योजक वर्ग में देशभर से 140 कार्यकर्ता भाग ले रहे हैं। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि समाज में समरसता बढ़नी चाहिए। इस अवसर पर संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र कुमार ठाकुर व सह प्रान्त कार्यवाह इंजीनियर अनिल श्रीवास्तव उपस्थित रहे।

July 4th 2019, 9:57 am

संघ मानहानि मामला – राहुल गांधी और सीताराम येचुरी को मिली जमानत

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मुंबई (विसंकें). राष्ट्रीय सवयंसेवक संघ मानहानि मामले में महाराष्ट्र की एक कोर्ट से राहुल गांधी तथा सीताराम येचुरी को वीरवार 04 जुलाई को जमानत मिल गई. मानहानि मामले में दोनों वीरवार को न्यायालय में पेश हुए थे. कांग्रेस नेता राहुल गांधी और माकपा नेता सीताराम येचुरी ने आरोप लगाया था कि पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हाथ है. उनके इस वक्तव्य के विरूद्ध दायर मानहानि मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और माकपा नेता सीताराम येचुरी को 15 हजार के मुचलके पर जमानत मिल गई है. मामला मुंबई के माझगाव न्यायालय में चल रहा है. सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि वे दोषी नहीं हैं. अधिवक्ता धृतिमान जोशी ने 2017 में मानहानि का मामला कोर्ट में दायर किया था. राहुल गांधी की तरफ से पूर्व सांसद एकनाथ गायकवाड़ ने जमानत दी.

वामपंथ समर्थक और हिन्दू विरोधी विचारों के लिए परिचित लेखिका गौरी लंकेश की कुछ लोगों ने हत्या कर दी थी. घटना को अभी 24 घंटे भी नहीं हुए थे कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने, इस मामले में संघ का नाम घसीटा था. ‘संघ विचारधारा से प्रभावित संघ कार्यकर्ताओं ने गौरी लंकेश की हत्या की है’, ऐसा वक्तव्य सीताराम येचुरी ने एक चर्चासत्र के दौरान दिया था.

जिस पर अधिवक्ता धृतिमान जोशी ने राहुल गांधी और सीताराम येचुरी के खिलाफ मानहानि मामला दायर किया था. मामले की अगली सुनवाई 21 सितंबर को होगी.

भिवंडी न्यायालय में राहुल गांधी के खिलाफ एक अन्य मानहानि मामले में भी सुनवाई चल रही है. 2014 लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने कहा कि ‘संघ ने महात्मा गांधी जी की हत्या की है’. इस पर राजेश कुंटे ने न्यायालय में राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि का मामला दायर किया था.

July 4th 2019, 5:56 am

04 जुलाई – तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा का उद्घोष गूंजा

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नई दिल्ली. सामान्य धारणा यह है कि आजाद हिन्द फौज और आजाद हिन्द सरकार की स्थापना नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने जापान में की थी. पर, इससे पहले प्रथम विश्व युद्ध के बाद अफगानिस्तान में महान क्रान्तिकारी राजा महेन्द्र प्रताप ने आजाद हिन्द सरकार और फौज बनायी थी, इसमें 6,000 सैनिक थे.

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इटली में क्रान्तिकारी सरदार अजीत सिंह ने ‘आजाद हिन्द लश्कर’ की स्थापना की तथा ‘आजाद हिन्द रेडियो’ का संचालन किया. जापान में रासबिहारी बोस ने भी आजाद हिन्द फौज बनाकर उसका जनरल कैप्टेन मोहन सिंह को बनाया था. भारत को अंग्रेजों के चंगुल से सैन्य बल द्वारा मुक्त करवाना ही फौज का उद्देश्य था.

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस 5 दिसम्बर, 1940 को जेल से मुक्त हो गये, पर उन्हें कोलकाता में अपने घर पर ही नजरबन्द कर दिया गया. 18 जनवरी, 1941 को नेताजी गायब होकर काबुल होते हुए जर्मनी जा पहुंचे और हिटलर से भेंट की. वहीं सरदार अजीत सिंह ने उन्हें आजाद हिन्द लश्कर के बारे में बताकर और व्यापक रूप देने को कहा. जर्मनी में बन्दी ब्रिटिश सेना के भारतीय सैनिकों से सुभाष जी ने भेंट की. जब उनके सामने ऐसी सेना की बात रखी गयी, तो उन सबने योजना का स्वागत किया.

जापान में रासबिहारी द्वारा निर्मित ‘इण्डिया इण्डिपेंडेंस लीग’ (आजाद हिन्द संघ) का जून 1942 में एक सम्मेलन हुआ, जिसमें अनेक देशों के प्रतिनिधि उपस्थित थे. इसके बाद रासबिहारी जी ने जापान शासन की सहमति से नेताजी को आमन्त्रित किया. मई 1943 में जापान आकर नेताजी ने प्रधानमन्त्री जनरल तोजो से भेंट कर अंग्रेजों से युद्ध की अपनी योजना पर चर्चा की. 16 जून को जापानी संसद में नेताजी को सम्मानित किया गया. नेताजी 4 जुलाई, 1943 को आजाद हिन्द फौज के प्रधान सेनापति बने. जापान में कैद ब्रिटिश सेना के 32,000 भारतीय तथा 50,000 अन्य सैनिक भी फौज में सम्मिलित हो गये. इस सेना की कई टुकड़ियां गठित की गयीं. वायुसेना, तोपखाना, अभियन्ता, सिग्नल, चिकित्सा दल के साथ गान्धी ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड, आजाद ब्रिगेड तथा रानी झांसी ब्रिगेड बनायी गयी. इसका गुप्तचर विभाग और अपना रेडियो स्टेशन भी था.

9 जुलाई को नेताजी ने एक समारोह में 60,000 लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा – यह सेना न केवल भारत को स्वतन्त्रता प्रदान करेगी, अपितु स्वतन्त्र भारत की सेना का भी निर्माण करेगी. हमारी विजय तब पूर्ण होगी, जब हम ब्रिटिश साम्राज्य को दिल्ली के लाल किले में दफना देंगे. आज से हमारा परस्पर अभिवादन ‘जय हिन्द’ और हमारा नारा ‘दिल्ली चलो’ होगा. नेताजी ने 4 जुलाई, 1943 को ही ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का उद्घोष किया. कैप्टन शाहनवाज के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज ने रंगून से दिल्ली प्रस्थान किया और अनेक महत्वपूर्ण स्थानों पर विजय पाई, पर अमरीका द्वारा जापान के हिरोशिमा और नागासाकी नगरों पर परमाणु बम गिराने से युद्ध का पासा पलट गया और जापान को आत्मसमर्पण करना पड़ा. भारत की स्वतन्त्रता के इतिहास में आजाद हिन्द फौज का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है. यद्यपि नेहरू जी के सुभाषचन्द्र बोस से गहरे मतभेद थे. इसलिए आजाद भारत में नेताजी, आजाद हिन्द फौज और उसके सैनिकों को समुचित सम्मान नहीं मिला. यहां तक कि नेताजी का देहान्त किन परिस्थितियों में हुआ, इस रहस्य से आज तक पर्दा उठने नहीं दिया गया.

July 3rd 2019, 7:05 pm

ऑपरेशन ड्रीम्स – पिज्जा-डिलीवरी ब्वॉय से सब इंसपेक्टर बनने की कहानी

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आईपीएस संदीप चौधरी की मदद से पूरा किया सपना

शोपियां जिले के एसएसपी संदीप चौधरी ने एक युवक के परिश्रम और सफलता की कहानी बताई है. संदीप चौधरी ने ट्वीट में एक फोटो शेयर कर एक नौजवान मोईन खान के बारे में जानकारी दी और बताया कि कैसे लगन और मेहनत के साथ एक पिज्जा डिलीवरी ब्वॉय की नौकरी करने वाला आज पुलिस ऑफिसर बनने वाला है.

मोईन खान जम्मू में आईपीएस संदीप चौधरी के फ्री कोचिंग क्लास ऑपरेशन ड्रीम्स में पढ़ने आता था. मोईन खान जम्मू में शाम के 6 बजे से रात के 2 बजे तक पिज्जा हट में डिलीवर ब्वॉय की नौकरी करता था. इसके अलावा मोईन कार वॉशिंग का काम भी करता था. इसके बाद भी मोईन कोचिंग क्लास और पढ़ाई के लिए समय निकाल लेता. जिसके परिणामस्वरूप मोईन खान जम्मू कश्मीर पुलिस में सब इंस्पेक्टर पद के लिए आयोजित परीक्षा उत्तीर्ण की तथा अब ऊधमपुर पुलिस अकादमी में प्रशिक्षण ले रहा है.

जम्मू जिले के नागरोटा इलाके के ठंडा पानी गांव के रहने वाले 28 साल के मोईन खान के माता-पिता अनपढ़ हैं. मोईन अपने परिवार में पहला ग्रेजुएट है. बड़ा भाई डाउन-सिंड्रोम का शिकार है, घर में कमाई का कोई साधन नहीं था. वर्ष 2012 में ग्रेजुएशन करने के बाद मोईन ने पिज्जा डिलीवरी ब्वॉय के रूप में काम करने के साथ ही पढ़ना भी जारी रखा.

साल 2016 में मोईन खान ने सब-इंस्पेक्टर पद के लिए आवेदन भरा. तो किसी दोस्त ने आईपीएस संदीप चौधरी द्वारा चलायी जा रही फ्री कोचिंग क्लास – ऑपरेशन ड्रीम्स के बारे में बताया और मोईन ने वहां कोचिंग लेना शुरू किया. पिछले दिसंबर में परिणाम घोषित हुआ, जिसमें मोईन खान को चयनित घोषित किया गया. मोईन खान अकेला युवक नहीं है, जिसने ऑपरेशन ड्रीम्स में कोचिंग लेकर सफलता प्राप्त की हो. उसके जैसे युवकों की सूची काफी लंबी है.

ऑपरेशन ड्रीम्स की कहानी

आईपीएस बनने के बाद संदीप चौधरी ने जम्मू में तैनाती के दौरान तय किया कि वे समाज के कमज़ोर वर्ग के लिए कुछ सकारात्मक करेंगे. इसके लिए संदीप चौधरी ने जम्मू के एक बैंक्वेट हॉल में फ्री-कोचिंग क्सास शुरू की. जिसमें गरीब तबके के करीब 150 छात्रों को संदीप चौधरी ने कंपीटीशन की तैयारी करवाई. संदीप चौधरी सुबह 8 बजे से 10 बजे तक क्लास लेते थे.

हाल ही में शोपियां में एसएसपी पद पर ट्रांसफर होने के बाद संदीप चौधरी ने शोपियां में भी ऑपरेशन ड्रीम्स का साथ नहीं छोड़ा है. यहां भी एसएसपी संदीप 6 नौजवानों को सफलता के गुर सिखा रहे हैं.

 

July 3rd 2019, 10:16 am

आपरेशन ड्रीम्स – पिज्जा-डिलीवरी ब्वॉय से सब इंसपेक्टर बनने की कहानी

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आईपीएस संदीप चौधरी की मदद से पूरा किया सपना

शोपियां जिले के एसएसपी संदीप चौधरी ने एक युवक के परिश्रम और सफलता की कहानी बताई है. संदीप चौधरी ने ट्वीट में एक फोटो शेयर कर एक नौजवान मोईन खान के बारे में जानकारी दी और बताया कि कैसे लगन और मेहनत के साथ एक पिज्जा डिलीवरी ब्वॉय की नौकरी करने वाला आज पुलिस ऑफिसर बनने वाला है.

मोईन खान जम्मू में आईपीएस संदीप चौधरी के फ्री कोचिंग क्लास ऑपरेशन ड्रीम्स में पढ़ने आता था. मोईन खान जम्मू में शाम के 6 बजे से रात के 2 बजे तक पिज्जा हट में डिलीवर ब्वॉय की नौकरी करता था. इसके अलावा मोईन कार वॉशिंग का काम भी करता था. इसके बाद भी मोईन कोचिंग क्लास और पढ़ाई के लिए समय निकाल लेता. जिसके परिणामस्वरूप मोईन खान जम्मू कश्मीर पुलिस में सब इंस्पेक्टर पद के लिए आयोजित परीक्षा उत्तीर्ण की तथा अब ऊधमपुर पुलिस अकादमी में प्रशिक्षण ले रहा है.

जम्मू जिले के नागरोटा इलाके के ठंडा पानी गांव के रहने वाले 28 साल के मोईन खान के माता-पिता अनपढ़ हैं. मोईन अपने परिवार में पहला ग्रेजुएट है. बड़ा भाई डाउन-सिंड्रोम का शिकार है, घर में कमाई का कोई साधन नहीं था. वर्ष 2012 में ग्रेजुएशन करने के बाद मोईन ने पिज्जा डिलीवरी ब्वॉय के रूप में काम करने के साथ ही पढ़ना भी जारी रखा.

साल 2016 में मोईन खान ने सब-इंस्पेक्टर पद के लिए आवेदन भरा. तो किसी दोस्त ने आईपीएस संदीप चौधरी द्वारा चलायी जा रही फ्री कोचिंग क्लास – ऑपरेशन ड्रीम्स के बारे में बताया और मोईन ने वहां कोचिंग लेना शुरू किया. पिछले दिसंबर में परिणाम घोषित हुआ, जिसमें मोईन खान को चयनित घोषित किया गया. मोईन खान अकेला युवक नहीं है, जिसने ऑपरेशन ड्रीम्स में कोचिंग लेकर सफलता प्राप्त की हो. उसके जैसे युवकों की सूची काफी लंबी है.

ऑपरेशन ड्रीम्स की कहानी

आईपीएस बनने के बाद संदीप चौधरी ने जम्मू में तैनाती के दौरान तय किया कि वे समाज के कमज़ोर वर्ग के लिए कुछ सकारात्मक करेंगे. इसके लिए संदीप चौधरी ने जम्मू के एक बैंक्वेट हॉल में फ्री-कोचिंग क्सास शुरू की. जिसमें गरीब तबके के करीब 150 छात्रों को संदीप चौधरी ने कंपीटीशन की तैयारी करवाई. संदीप चौधरी सुबह 8 बजे से 10 बजे तक क्लास लेते थे.

हाल ही में शोपियां में एसएसपी पद पर ट्रांसफर होने के बाद संदीप चौधरी ने शोपियां में भी ऑपरेशन ड्रीम्स का साथ नहीं छोड़ा है. यहां भी एसएसपी संदीप 6 नौजवानों को सफलता के गुर सिखा रहे हैं.

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July 3rd 2019, 10:00 am

03 जुलाई / पुण्यतिथि – विरक्त सन्त : स्वामी रामसुखदास जी

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नई दिल्ली. धर्मप्रयाण भारत में एक से बढ़कर एक विरक्त सन्त एवं महात्माओं ने जन्म लिया है. ऐसे ही सन्तों में शिरोमणि थे परम वीतरागी स्वामी रामसुखदेव जी महाराज. स्वामी जी के जन्म आदि की ठीक तिथि एवं स्थान का प्रायः पता नहीं लगता, क्योंकि इस बारे में उन्होंने पूछने पर भी कभी चर्चा नहीं की. फिर भी जिला बीकानेर (राजस्थान) के किसी गाँव में उनका जन्म 1902 ई. में हुआ था, ऐसा कहा जाता है.

उनका बचपन का नाम क्या था, यह भी लोगों को नहीं पता, पर इतना सत्य है कि बाल्यावस्था से ही साधु-सन्तों के साथ बैठने में उन्हें बहुत सुख मिलता था. जिस अवस्था में अन्य बच्चे खेलकूद और खाने-पीने में लगे रहते थे, उस समय वे एकान्त में बैठकर साधना करना पसन्द करते थे. बीकानेर में ही उनका सम्पर्क श्री गम्भीरचन्द दुजारी से हुआ. दुजारी जी भाई हनुमानप्रसाद पोद्दार एवं सेठ जयदयाल गोयन्दका के आध्यात्मिक विचारों से बहुत प्रभावित थे. इस प्रकार रामसुखदास जी भी इन महानुभावों के सम्पर्क में आ गये.

जब इन महानुभावों ने गोरखपुर में ‘गीता प्रेस’ की स्थापना की, तो रामसुखदास जी भी उनके साथ इस काम में लग गये. धर्म एवं संस्कृति प्रधान पत्रिका ‘कल्याण’ का उन्होंने काफी समय तक सम्पादन भी किया. उनके इस प्रयास से ‘कल्याण’ ने विश्व भर के धर्मप्रेमियों में अपना स्थान बना लिया. इस दौरान स्वामी रामसुखदास जी ने अनेक आध्यात्मिक ग्रन्थों की रचना भी की. धीरे-धीरे पूरे भारत में उनका एक विशिष्ट स्थान बन गया.

आगे चलकर भक्तों के आग्रह पर स्वामी जी ने पूरे देश का भ्रमणकर गीता पर प्रवचन देने प्रारम्भ किये. वे अपने प्रवचनों में कहते थे कि भारत की पहचान गाय, गंगा, गीता, गोपाल तथा गायत्री से है. स्वाधीनता प्राप्ति के बाद जब-जब शासन ने हिन्दू कोड बिल और धर्मनिरपेक्षता की आड़ में हिन्दू धर्म तथा संस्कृति पर चोट करने का प्रयास किया, तो रामसुखदास जी ने डटकर शासन की उस दुर्नीति का विरोध किया. स्वामी जी की कथनी तथा करनी में कोई भेद नहीं था. सन्त जीवन स्वीकार करने के बाद उन्होंने जीवन भर पैसे तथा स्त्री को स्पर्श नहीं किया. यहाँ तक कि अपना फोटो भी उन्होंने कभी नहीं खिंचने दिया. उनके दूरदर्शन पर आने वाले प्रवचनों में भी केवल उनका स्वर सुनाई देता था, पर चित्र कभी दिखायी नहीं दिया.

स्वामी जी ने अपनी कथाओं में कभी पैसे नहीं चढ़ने दिये. उनका कोई बैंक खाता भी नहीं था. उन्होंने अपने लिये आश्रम तो दूर, एक कमरा तक नहीं बनाया. उन्होंने किसी पुरुष या महिला को अपना शिष्य भी नहीं बनाया. यदि कोई उनसे शिष्य बना लेने की प्रार्थना करता था, तो वे ‘कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम’ कहकर उसे टाल देते थे.

तीन जुलाई, 2005 (आषाढ़ कृष्ण 11) को ऋषिकेश में 103 वर्ष की आयु में उन्होंने अपना शरीर छोड़ा. उनकी इच्छानुसार देहावसान के बाद गंगा के तट पर दो चितायें बनायी गयीं. एक में उनके शरीर का तथा दूसरी पर उनके वस्त्र, माला, पूजा सामग्री आदि का दाह संस्कार हुआ. इस प्रकार परम वीतरागी सन्त रामुसखदास जी ने देहान्त के बाद भी अपना कोई चिन्ह शेष नहीं छोड़ा, जिससे कोई उनका स्मारक न बना सके. चिताओं की अग्नि शान्त होने पर अचानक गंगा की एक विशाल लहर आयी और वह समस्त अवशेषों को अपने साथ बहाकर ले गयी. इस प्रकार माँ गंगा ने अपने प्रेमी पुत्र को बाहों में समेट लिया.

 

July 2nd 2019, 6:38 pm

नारद नाम आलोचना का पर्याय नहीं, अपितु जनकल्याण का प्रणेता है – मनोज माथुर

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जयपुर. विश्व संवाद केंद्र जयपुर की सांगानेर महानगर में टोंक रोड स्थित गीतांजलि होटल में देवर्षि नारद जयंती के उपलक्ष्य में पत्रकार सम्मान समारोह का आयोजन किया गया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अखिल भारतीय खंडेलवाल वैश्य महासभा के कोषाध्यक्ष जितेंद्र गुप्ता एवं मुख्य वक्ता ज़ी न्यूज़ राजस्थान के एडिटर मनोज माथुर रहे. कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन व देवर्षि नारद के चित्र पर माल्यार्पण से हुआ. मुख्य अतिथि जितेन्द्र गुप्ता ने कहा कि खबरें कैसी हों, इस पर हमें  विचार करना चाहिए क्योंकि पत्रकारिता भी समाज को दिशा देने का कार्य करती है.

मुख्य वक्ता मनोज माथुर ने कहा कि नारद जयंती समारोहों का आयोजन नारद जी की धूमिल होती प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करने का एक सफल प्रयास है. नारद जी जिस तरह से तीनों लोकों में घूम घूमकर समाचारों का प्रचार प्रसार करते थे, उनके द्वारा प्रदत्त समाचार कई बार अप्रिय होते हुए भी लोक कल्याणकारी होते थे. वे पत्रकारिता का आदर्श थे. पत्रकारों के लिये आदर्श स्थिति यही है कि वे निष्पक्ष भाव से देवर्षि नारद की तरह अपनी भूमिका समाज के उत्थान के लिए तय करें. कई बार हमारी जिम्मेदारियां हमें महत्वाकांक्षी बना देती हैं, जिस कारण हम अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं.

व्यवसायीकरण के दौर में जीविका व पत्रकारिता के आदर्शों का पालन करते हुए मिशन व व्यवसाय के बीच मध्य का रास्ता निकालने की जरूरत है. पत्रकारों के सामने चुनौतियां मौजूद हैं. हमें मीडिया अर्थात् माध्यम कहा जाता है. हम माध्यम के माध्यम से समाज को स्वस्थ दिशा दें. समाज की यही चाह है कि हम पत्रकार उनकी आकांक्षाओं पर खरे उतरें. हम समय के साथ दौड़ लगा रहे हैं, लेकिन किस दिशा में जा रहे हैं, यह हमें पता ही नहीं है. समाज हमारी ओर बहुत उम्मीद के साथ देखता है.

छोटी खबर मेरे अखबार में नहीं चलेगी, यह पद्धति गलत है. प्रॉफिट ही सब कुछ नहीं है. हमें मध्य मार्ग अपनाना पड़ेगा. उन्होंने कहा कि पहलू खान प्रकरण की रिपोर्ट तथ्यों की बिना प्रमाणिक जानकारी के गलत रूप से प्रस्तुत की गई जो हम सभी के लिए शर्मनाक है. हम पत्रकारों का कर्तव्य है कि हमें समाज के सामने आदर्श एवं तथ्यपरक समाचार ही प्रस्तुत करने चाहिए. पत्रकारिता समाज में जागृति पैदा करने की भूमिका में होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि केवल प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, वेब पोर्टल आदि पर कार्य करने वाले ही पत्रकार नहीं हैं, बल्कि व्हाट्सएप सोशल मीडिया पर क्रियाशील रहने वाले भी पत्रकार हैं. ये सब पत्रकारिता का ही हिस्सा बन गए हैं.

मनोज माथुर ने कहा कि आने वाला समय सोशल मीडिया का है. हमें संवेदनशील होकर समाचारों को प्रसारित करना चाहिए. संवेदनशीलता हमारा प्रथम गुण है. हमारा आदर्श हमारा विवेक ही है. नारद नाम आलोचना का पर्याय नहीं है, वह तो जनकल्याण का प्रणेता है.

कार्यक्रम के अध्यक्ष देवी नारायण पारीक ने बताया कि सामूहिक चिंतन सकारात्मक चेतना पैदा करता है. समाज में पत्रकार शब्दों से खेलते हैं. शब्द ही हैं जो वेद बनाते हैं. भारत विश्व में अच्छाई का केंद्र है. पत्रकार शब्दों के जादूगर होते हैं, भारत को विश्व गुरु बनाने के लिए आप अपनी जादूगरी दिखाइए. कार्यक्रम में पत्रकार दिलीप चौधरी, सोनू गंगवाल, कमल कुमार जांगिड़ व रविकांत रोलीवाल को विभिन्न श्रेणियों में सम्मानित किया गया.

July 2nd 2019, 10:31 am

पत्रकारिता में गंगा जैसी निर्मलता का भाव रहना जारूरी है – हितेश शंकर

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सीकर. पाञ्चजन्य के सम्पादक हितेश शंकर ने कहा कि पत्रकारिता जीवन की आवश्यक एवं महत्वपूर्ण विधा है. पत्रकारिता का समाज में बड़ा महत्व है तथा नारद जी ने पत्रकारिता को दिव्यता प्रदान की थी. पत्रकारिता में तथ्यों के साथ खबर प्रकाशित करने से पाठकों में खबर की विश्वसनियता कायम रहती है. हितेश शंकर शनिवार को भारतीय शिक्षा संकुल में आयोजित नारद जयन्ती एवं पत्रकार सम्मान समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि झूठी खबरें देना, पत्रकारिता नहीं है. देश में सामाजिक मूल्यों को स्थापित करना ही सच्चे अर्थों में पत्रकारिता धर्म है. आज पत्रकारिता मुख्य विषयों से भटक गई है, जिससे जनहित के मुद्दे गौण हो गए हैं. पत्रकारिता में गलती, गफलत, लत से सतर्क रहना आवश्यक है. पत्रकारिता में गंगा जैसी निर्मलता का भाव रहना जारूरी है. उन्होंने पत्रकारों का आह्वान किया कि वे खबर देने वाले की भी खबर लेने का कार्य करें.

समारोह के विशिष्टि अतिथि गेंदालाल ने कहा कि नारद जी अपनी स्पष्टवादिता के लिए प्रसिद्ध रहे. सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना के लिए जीवन पर्यन्त कार्य किया. नारद जी सत्य व मानव कल्याण के लिए निष्पक्ष भाव से कार्य करते थे तथा उनकी बात को तीनों लोकों में महत्व दिया जाता था. उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति विश्व का कल्याण करने वाली संस्कृति है. जनकल्याण के लिए पत्रकारिता का सकारात्मक उपयोग किया जाए.

समारोह के अध्यक्ष पूर्व प्राचार्य हीरालाल जांगिड़ ने कहा कि पत्रकार स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रह कर अपने पत्रकारिता के कर्तव्य का पालन  करें. पत्रकारिता में वह ताकत है जो समाज की दशा व दिशा बदल सकती है. पत्रकारों से आह्वान किया कि वे सकारात्मक खबरों को अपने समाचार पत्रों में प्रकाशित करें. उन्होंने सामाजिक सरोकारों से संबंधित राष्ट्रवाद, देश प्रेम, वृक्षारोपण, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, भामाशाहों के समाज के लिए दिए गए योगदान सहित अन्य खबरों को भी प्रमुखता से स्थान दिए जाने का आग्रह किया.

विशिष्ट अतिथि भारतीय शिक्षा संकुल के निदेशक एवं नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष हरीराम रणवां ने कहा कि पत्रकार सजग, स्वाभिमानी, गरिमामय होकर लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में सकारात्मक सोच के साथ अपने पत्रकारिता धर्म को बखूबी निभाएं.

समारोह में पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण सहित अन्य सामाजिक सरोकारों से संबंधित उल्लेखनीय खबरों के प्रकाशन में श्रेष्ठ कार्य करने पर दैनिक भास्कर के संवाददाता राजेश सिंघल, राजस्थान पत्रिका के जोगेन्द्र सिंह गौड़, शेखावाटी अब तक न्यूज चैनल के इकबाल खान, दैनिक उद्योग आस-पास के मनोज शर्मा को शाल, श्रीफल, स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया.

इससे पूर्व अतिथियों ने सरस्वती व देवर्षि नारद जी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया.

July 2nd 2019, 10:01 am

हिन्दुओं की सुरक्षा, मंदिर का पुनर्निर्माण, तथा दोषियों को सख्त सजा की मांग

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पुलिस आयुक्त से मिला विश्व हिन्दू परिषद का प्रतिनिधिमंडल

नई दिल्ली. हिन्दू समाज के घरों पर हमला करने तथा देवी मंदिर में तोड़फोड़ करने वालों को पुलिस 4 दिन में गिरफ्तार करे. विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष आलोक कुमार जी के नेतृत्व में 12 सदस्यीय उच्च स्तरीय प्रतिनिधि मंडल ने दिल्ली पुलिस आयुक्त से मिलकर यह मांग की. प्रतिनिधिमंडल में कुलभूषण आहूजा जी (प्रान्त संघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ), विवेकानन्द जी (सह प्रान्त संघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ), वागीश जी (प्रान्त कार्याध्यक्ष विहिप), बचन सिंह जी (प्रान्त मंत्री विहिप), सुरेन्द्र गुप्ता जी (प्रान्त उपाध्यक्ष विहिप), ब्रज मोहन सेठी (प्रान्त उपाध्यक्ष विहिप), सहित अन्य शामिल थे.

प्रतिनिधिमंडल ने पुलिस कमिश्नर को हिन्दू समाज की भावनाओं से अवगत कराते हुए मांग की कि पुलिस हौज काजी लाल कुआं स्थित देवी मंदिर में तोड़फोड़ करने वाले तथा हिन्दू समाज के घरों पर हमला करने वाले मुस्लिमों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करके दोषी लोगों को 4 दिन के अंदर गिरफ्तार करे. गुप्ता परिवार के युवक (आयु 16-17 वर्ष) को मुस्लिम लोगों की गिरफ्त से मुक्त कराया जाए. यदि पुलिस 04 दिन में कदम नहीं उठाती है तो हिन्दू समाज के धार्मिक तथा सामाजिक संगठन आगामी दिनों में विश्व हिन्दू परिषद के नेतृत्व में एक महापंचायत करेंगे और महापंचायत में निर्णय के अनुसार आगामी रणनीति तय की जाएगी.

विश्व हिन्दू परिषद के प्रतिनिधिमंडल ने पुलिस कमिश्नर को बताया कि स्कूटी खड़ी करने को लेकर हुए मामूली से झगड़े से मंदिर पर हमला करने तथा हिन्दू समाज के लोगों को भयभीत एवं आतंकित करने का कोई कारण नहीं बनता है. यह सारी घटना किसी बड़ी साजिश की ओर संकेत करती है. जिससे पता चलता है कि दूसरे संप्रदाय के लोग हिन्दू व्यापारी और लोगों को वहां से हटाकर डेमोग्राफी बदलना चाहते हैं. जिसके दीर्घकालीन प्रभाव होंगे.

इस घटना से हिन्दू समाज में भारी रोष व्याप्त है. पुलिस का कर्तव्य है कि वहां रह रहे हिन्दू परिवारों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करे तथा हिन्दू व्यापारियों को निडरता पूर्वक व्यापार करने का माहौल दिया जाए तथा क्षतिग्रस्त मंदिर को बनाने के लिए विधि विधान के साथ मूर्ति प्रतिस्थापित करने के लिए मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा करने की व्यवस्था शीघ्र की जाए क्योंकि मंदिर में मूर्तियों को चोरी-छिपे स्थापित नहीं किया जा सकता है. उसके लिए पर्याप्त विधि-विधान की आवश्यकता होती है.

विहिप के प्रतिनिधिमंडल ने पीड़ित हिन्दू परिवारों से मुलाकात कर उन्हें हर संभव सहायता करने का आश्वासन दिया तथा उन्हें आश्वास्त किया कि समाज उनके साथ खड़ा है.

July 2nd 2019, 9:16 am

देव, दानव, मानव सभी में देवर्षि नारद की स्वीकार्यता थी

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हिंडौन. विश्व संवाद केन्द्र द्वारा 30 जून को “देवर्षि नारद महोत्सव एवं पत्रकार सम्मान समारोह” आयोजित किया गया. मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार मनीष शुक्ला ने कहा कि देवर्षि नारद लोक कल्याण की भावना से सभी लोकों में भ्रमण करते हुए संदेशों व सूचनाओं का आदान-प्रदान करते थे. नारद जी देवता, दानव और मानव, सभी में समान रूप से सहज संपर्क रखते थे और निष्पक्ष रहते हुए संवाद का कार्य करते थे. किन्तु दुर्भाग्य की बात है कि फिल्मों में नारद की छवि को बिगाड़कर उन्हें विदूषक और चुगलखोर के रूप में प्रस्तुत किया गया.

उन्होंने कहा कि देवर्षि नारद दुनिया के पहले पत्रकार थे. हिन्दी के प्रथम समाचार पत्र उद्दंत मार्तण्ड का प्रकाशन सन 1826 में हुआ, उस दिन ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया थी, जो नारद जी की जयंती है. उस समय समाचार पत्र के संपादक ने नारद जी को आदि पत्रकार बताते हुए इस दिवस पर समाचार पत्र की शुरुआत पर हर्ष व्यक्त करते हुए संपादकीय लिखा था.

समारोह कार्यक्रम में एक सत्र परिचर्चा का भी रहा, जिसमें उपस्थित पत्रकारों ने भाग लिया. परिचर्चा का विषय था – “सोशल मीडिया की विश्वसनीयता और इसकी प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को चुनौती”. कार्यक्रम का शुभारंभ भारत माता और देवर्षि नारद के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्लन से हुआ. कार्यक्रम में कुल 37 पत्रकार उपस्थित रहे. इन्हें पुस्तकों का संच व स्मृति चिह्न प्रदान किया गया. कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार चन्द्रकेतु बैनीवाल ने की.

July 2nd 2019, 8:14 am

02 जुलाई / जन्मदिवस – स्वदेशी अर्थचेतना की संवाहक : डॉ. कुसुमलता केडिया

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नई दिल्ली. स्वदेशी अर्थचेतना की संवाहक डॉ. कुसुमलता केडिया का जन्म दो जुलाई, 1954 को पडरौना (उ.प्र.) में हुआ. इनके पिता श्री राधेश्याम जी संघ के स्वयंसेवक थे. उन्होंने नानाजी देशमुख के साथ गोरखपुर में पहले ‘सरस्वती शिशु मंदिर’ की स्थापना में सहयोग किया था. द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी इनके ननिहाल में प्रायः आते थे. घर में संघ विचार की पत्र-पत्रिकायें भी आतीं थीं. अतः इनके मन पर देशप्रेम के संस्कार बचपन से ही पड़ गये.

कुसुमलता जी प्रारम्भ से ही पढ़ाई में आगे रहती थीं. 1975 में उन्होंने स्वर्ण पदक लेकर अर्थशास्त्र में एम.ए. किया. इसके बाद इनका विवाह हो गया, पर किसी कारण यह सम्बन्ध चल नहीं सका. 1980 में वे काशी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हो गयीं, पर किताबी ज्ञान के साथ वे गरीबी का कारण और उसके निवारण का रहस्य भी समझना चाहतीं थीं. जब वे बड़े अर्थशास्त्रियों के विचारों की तुलना धरातल के सच से करतीं, तो उन्हें वहां विसंगतियां दिखाई देतीं थीं. अतः उन्होंने इसे ही अपने शोध का विषय बना लिया.

1984 में उन्होंने काशी विश्वविद्यालय से ‘डॉक्टर’ की उपाधि प्राप्त की. इस अध्ययन के दौरान उन्होंने देखा कि भारत आदि जिन देशों को पिछड़ा कहा जाता है, उनके संसाधनों को लूट कर ही पश्चिम के तथाकथित विकसित देश समृद्ध हुये हैं. इस प्रकार उन्होंने गांधी जी और प्रख्यात अध्येता श्री धर्मपाल के विचारों को एक बार फिर तथ्यों के आधार पर सिद्ध किया. अब उन्हें यह जिज्ञासा हुई कि पश्चिमी देशों को इस लूट और संहार की प्रेरणा कहां से मिली ? इसके लिये उन्होंने यूरोप का इतिहास पढ़ा. उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि इसके पीछे ईसाई मान्यताएं हैं. प्राचीन यूरोप में भारत जैसी बहुदेववादी सभ्यतायें अस्तित्व में थीं, पर ईसाई हमलावरों ने 400 वर्ष में उस सभ्यता और संस्कृति को पूरी तरह नष्ट कर दिया.

यह अध्ययन उन्होंने अपनी पुस्तक ‘जेनेटिक एसम्पशन्स ऑफ डेवलेपमेंट थ्योरी’ में प्रस्तुत किया. उन्होंने प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ के साथ ‘गांधी जी और ईसाइयत’ तथा स्वतन्त्र रूप से स्त्री प्रश्न – हिन्दू समाज में पैठती ईसाई मानसिकता, स्त्रीत्व – धारणायें एवं यथार्थ, दृष्टि दोष तो विकल्प कैसे ? गांधी दर्शन में स्त्री की छवि, स्त्री सम्बन्धी दृष्टि एवं स्थिति, आर्थिक समृद्धि की अहिंसक अवधारणा, सभ्यागत संदर्भ आदि पुस्तकें लिखीं. 1997 में श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी ने उनकी पुस्तक ‘डैब्ट ट्रैप और डैथ ट्रैप’ का विमोचन किया. इन पुस्तकों की सराहना देश और विदेश के कई अर्थशास्त्रियों ने की है.

1992 से वे गांधी विद्या संस्थान, वाराणसी में समाजशास्त्र की प्राध्यापक एवं वरिष्ठतम संकाय सदस्य हैं. इसके साथ ही वे भारतीय दर्शन अनुसंधान परिषद, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (शिमला), ऋत: हिन्दू विद्या केन्द्र जैसी अनेक संस्थाओं से जुड़ी हैं.

उनके काम के लिये उन्हें देश एवं विदेश से अनेक सम्मान मिले हैं. वामपंथी पत्रिका ‘सेमिनार’ ने तो उन्हें ‘लिबरेशन ऑफ इंडियन माइंड’ कहा है. अपने गुरु श्री रामस्वरूप जी की स्मृति में स्थापित न्यास द्वारा उन्होंने कई पुस्तकें तथा पत्रिकायें प्रकाशित की हैं.

 

July 1st 2019, 7:54 pm

02 जुलाई / जन्मदिवस – सत्रावसान की तिथि याद रही

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नई दिल्ली. सरस्वती शिशु मंदिर योजना का जैसा विस्तार आज देश भर में हुआ है, उसके पीछे जिन महानुभावों की तपस्या छिपी है. उनमें से ही एक थे ….. दो जुलाई, 1929 को मैनपुरी (उत्तर प्रदेश) के जागीर गांव में जन्मे राणा प्रताप सिंह जी. उनके पिता रामगुलाम सक्सेना जी मैनपुरी जिला न्यायालय में प्रतिष्ठित वकील थे.

उन्होंने अपने चारों पुत्रों और एक पुत्री को अच्छी शिक्षा दिलाई. राणा जी ने भी 1947 में आगरा से बीएससी की शिक्षा पूरी की. उसके बाद उनका चयन चिकित्सा सेवा (एमबीबीएस) के लिए हो गया, पर तब तक उन्हें संघ की धुन सवार हो चुकी थी. अतः वे सब छोड़कर प्रचारक बन गये. प्रचारक जीवन में वे उत्तर प्रदेश के इटावा, औरैया, फिरोजाबाद आदि में रहे. इसके बाद गृहस्थ जीवन अपनाकर वे औरैया के इंटर कॉलेज में पढ़ाने लगे. वर्ष 1952 में उत्तर प्रदेश में अनेक स्थानों पर सरस्वती शिशु मंदिर प्रारम्भ हुए. तत्कालीन प्रांत प्रचारक भाऊराव देशमुख जी तथा नानाजी देशमुख योजना के सूत्रधार थे. वर्ष 1958 में इन विद्यालयों के व्यवस्थित संचालन के लिए ‘शिशु शिक्षा प्रबंध समिति, उ.प्र.’ का गठन कर राणा जी को उसका मंत्री बनाया गया. अब तो वे तन-मन से शिुश मंदिर योजना से एकरूप हो गये.

राणा जी ने जहां पूरे प्रदेश में व्यापक प्रवास कर सैकड़ों नये विद्यालयों की स्थापना कराई, वहीं दूसरी ओर शिशु मंदिर के अनेक प्रशासनिक तथा शैक्षिक विषयों को एक सुदृढ़ आधार दिया. पाठ्यक्रम एवं पुस्तकों का निर्माण, वेतनक्रम, आचार्य नियमावली, आय-व्यय एवं शुल्क पंजी, आचार्य कल्याण कोष, आचार्य प्रशिक्षण आदि का जो व्यवस्थित ढांचा आज बना है, उसके पीछे राणा जी का परिश्रम और अनुभव ही छिपा है. इसी प्रकार शिशु मंदिर योजना का प्रतीक चिन्ह (शेर के दांत गिनते हुए भरत), वंदना (हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी) तथा वंदना के समय प्राणायाम आदि को भी उन्होंने एक निश्चित स्वरूप दिया. वे वाणी के धनी तो थे ही, पर एक अच्छे लेखक भी थे. उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं, जिनमें इतिहास गा रहा है, स्वामी विवेकानंद – प्रेरक जीवन प्रसंग, धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे, महर्षि व्यास की कथाएं, भगिनी निवेदिता, क्रांतिकारियों की गौरव गाथा, भारतीय जीवन के आधारभूत तत्व, भारतीयता के आराधक हम, सरस्वती शिशु मंदिर योजना : एक परिचय, बाल विकास, बाल रामायण, बाल महाभारत आदि प्रमुख हैं.

उनके अनुभव को देखते हुए कुछ समय के लिए उन्हें बिहार और उड़ीसा का काम दिया गया. इसके बाद लखनऊ में भारतीय शिक्षा शोध संस्थान की स्थापना होने पर उन्हें उसका सचिव तथा विद्या भारती प्रदीपिका का सम्पादक बनाया गया. विद्या भारती की सेवा से अवकाश लेने के बाद भी वे संघ तथा विद्या भारती के कार्यक्रमों से जुड़े रहे, पर दुर्भाग्यवश उन्हें स्मृतिलोप के रोग ने घेर लिया. वे बार-बार एक ही बात को दोहराते रहते थे. इस कारण धीरे-धीरे वे सबसे दूर अपने घर में ही बंद होकर रह गये. उनका पुत्र मर्चेंट नेवी में अभियंता था. दुर्भाग्यवश विदेश में ही एक दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गयी. जब उसका शव घर लाया गया, तो राणा जी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की. उनकी स्मृति पूरी तरह लोप हो चुकी थी. जब कोई उनसे मिलने जाता, तो वे उसे पहचानते तक नहीं थे. इसी प्रकार उन्होंने जीवन के अंतिम 10-12 साल बड़े कष्ट में बिताये. उनकी पत्नी तथा बरेली में विवाहित पुत्री ने उनकी भरपूर सेवा की.

विद्या भारती के विद्यालयों में 20 मई को सत्रावसान होता है. सादा जीवन और उच्च विचार के धनी राणा जी के जीवन का वर्ष 2008 में इसी दिन सदा के लिए सत्रावसान हो गया.

July 1st 2019, 6:23 pm

भारतीय संस्कृति में विद्यमान है समन्वय का तत्व – रामकृपाल सिंह

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भोपाल. वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह ने कहा कि भारतीय संस्कृति में समन्वय का तत्व विद्यमान है. भारतीय संस्कृति सबको साथ लेकर चलती है. सबकी चिंता और सबके कल्याण की कामना करती है. हम जो शांति पाठ करते हैं, उसमें प्रकृति के सभी अव्यवों की शांति की प्रार्थना शामिल है. हमारी यह संस्कृति ही हमें सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाती है. रामकृपाल जी देवर्षि नारद जयंति के उपलक्ष्य में आयोजित पत्रकार सम्मान समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे.

पत्रकारिता में विशिष्ट योगदान के लिए वरिष्ठ पत्रकार जयराम शुक्ल को ‘देवर्षि नारद सम्मान-2019’ से सम्मानित किया गया. इसके साथ ही पत्रकार हेमंत जोशी, हर्ष पचौरी, हरेकृष्ण दुबोलिया और पल्लवी वाघेला को सकारात्मक समाचारों के लिए ‘देवर्षि नारद पत्रकारिता पुरस्कार’ प्रदान किया गया.

उन्होंने कहा कि सत्ता जब हिंसा को स्वीकार करती है, तब प्रतिहिंसा होती है. बंगाल में राजनीतिक हिंसा को कम्युनिस्टों ने आगे बढ़ाया. कम्युनिस्ट और माओवादी मजबूरी में लोकतंत्र को स्वीकार कर रहे हैं, जबकि उनकी विचारधारा में यह नहीं है. वह तो वर्ग संघर्ष से परिवर्तन के हामी हैं, जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ग संघर्ष के विचार को खत्म कर दिया है. प्रधानमंत्री ने स्थापित कर दिया है कि परिवर्तन समन्वय से आएगा. सबके साथ, सबका विकास हो सकता है. किसी से मतभिन्नता का अर्थ यह नहीं कि हम उसके सकारात्मक पक्ष को भी खारिज कर दें. विरोध अपनी जगह है, लेकिन जो सत्य है उसको भी स्वीकार करना चाहिए. वर्ष 2014 में राजनैतिक परिवर्तन ही नहीं हुआ, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक बदलाव भी आया है. उन्होंने कहा कि आज के समय में मीडिया जड़ों से कट गया है. इसलिए धरातल पर क्या चल रहा है, उसका ठीक अनुमान उसे नहीं होता है. इसकी अनुभूति 2019 के आम चुनावों से हो जाती है.

षड्यंत्र के तहत हमारी गर्व की अनुभूति को खत्म किया गया – आनंद पाण्डेय

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार आनंद पाण्डेय ने कहा कि किसी सुनियोजित षड्यंत्र के तहत आक्रांताओं और इतिहासकारों ने हमारी गर्व की अनुभूति को खत्म कर दिया. इस प्रकार की शिक्षा प्रणाली बनाई और ऐसा इतिहास लिखा कि हम अपनी संस्कृति पर गौरव करना भूल गए. जब हमें अपने कार्य पर गौरव होता है, तब हम सर्वोत्तम परिणाम देते हैं. आनंद पाण्डेय ने लार्ड मैकाले का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे उसने भारतीयों को अधिक समय तक गुलाम बनाए रखने के लिए भारतीय शिक्षा पद्धति को समाप्त कर मैकाले शिक्षा पद्धति को लागू किया. मैकाले ने अपने पत्र में लिखा था कि हमारी शिक्षा पद्धति ऐसे लोग तैयार करेगी जो बाहर से देखने पर भारतीय होंगे, लेकिन मन और आत्मा से अंग्रेज ही होंगे.

उन्होंने कहा कि हमारा धर्म हमें प्रकृति से प्रेम करना सिखाता है. परंतु, जब भारतीय संस्कृति पर गर्व की अनुभूति समाप्त हो गई तो हम अपनी संस्कृति से दूर हो गए और यह सब छूट गया. आज अभियान चलाकर हमें पेड़ बचाना-नदी बचाना सिखाया जा रहा है. उन्होंने पूछा कि आखिर क्यों श्रीमद्भगवत गीता हमारे पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं हो सकती? नये भारत को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है.

मीडिया और समाज के संबंध में उन्होंने कहा कि समाज मीडिया से अपेक्षा तो बहुत करता है, लेकिन सहयोग नहीं करता. मीडिया को अधिक जिम्मेदार बनाने के लिए समाज को अधिक सहयोग करना होगा. 1947 के पहले के मीडिया के सामने देश को स्वतंत्र कराने का लक्ष्य था. उसके बाद देश को सशक्त बनाने में मीडिया ने अपनी भूमिका को खोज लिया था. परंतु, 1991 के बाद मीडिया और पत्रकारों के पास कोई स्पष्ट लक्ष्य नहीं रह गया है. मीडिया बाजार और राज्य दोनों पर आश्रित हो गया है. इसलिए आज मीडिया वह समझदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी और ईमानदारी नहीं दिखा पाता है, जिसकी उससे अपेक्षा है.

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्व संवाद केंद्र के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. अजय नारंग ने कहा कि योग्य और समर्थ भारत की कल्पना तब ही साकार हो सकती है, जब भारत सांस्कृतिक रूप से समृद्ध हो. सांस्कृतिक समृद्धि से अभिप्राय जीवन मूल्यों से है. यह सांस्कृतिक समृद्धि राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक सभी क्षेत्रों में अपेक्षित है. मीडिया को इसमें अपनी सकारात्मक भूमिका का निर्वहन करना चाहिए. डॉ. राघवेन्द्र शर्मा ने आभार व्यक्त किया. कार्यक्रम का संचालन डॉ. कृपा शंकर चौबे ने किया.

July 1st 2019, 9:46 am

चांदनी चौक में अराजक भीड़ ने मंदिर में मूर्तियां खंडित कीं, तनाव की स्थिति

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रविवार रात को करीब 12 – 12.30 बजे थाना हौज काजी के अंतर्गत बाजार लाल कुआं के दुर्गा मंदिर में अराजक भीड़ ने तोड़फोड़ की. तथा एक परिवार के सदस्यों के साथ मारपीट भी की. जिसके पश्चात क्षेत्र में तनाव का माहौल है. प्रशासन ने सुरक्षा की दृष्टि से काफी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती की है. स्थानीय लोगों ने बताया कि प्रशासन ने मंदिर में रातों रात शीशे भी लगवा दिये और मूर्तियां भी रखवा दी हैं. घटना के पश्चात क्षेत्र के लोगों में रोष है तथा आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं. अराजक भीड़ पुलिस थाना के बाहर भी पहुंच गई थी, तथा अल्ला हू अकबर के नारे लगा रही थी.

स्थानीय लोगों से प्राप्त जानकारी के अनुसार रविवार रात करीब दस बजे लाल कुआं के व्यवसायी संजीव गुप्ता और एक युवक के मध्य पार्किंग को लेकर विवाद हो गया. युवक संजीव गुप्ता के घर के सामने वाहन पार्क करना चाहता था और संजीव गुप्ता मना कर रहे थे. बहस बढ़ने के पश्चात नौबत हाथापाई तक पहुंच गई, जिसके युवक के साथ आए लोगों ने संजीव गुप्ता के घर में घुसकर पत्नी व बेटियों से मारपीट की.

इसके पश्चात रात करीब 12 बजे 400-500 लोगों की भीड़ ने उनके घर के सामने गली दुर्गा मंदिर में स्थित मंदिर में तोड़फोड़ की तथा मूर्तियों को खंडित कर दिया, मंदिर को पूरी तरह से नष्ट करने का प्रयास किया. कहा जा रहा है कि भीड़ ने आसपास के घरों में पत्थरबाजी भी की है. अराजक भीड़ ने पुलिस थाने को भी घेर लिया था, जिस कारण पुलिस नहीं निकल पा रही थी.

तनाव बढ़ता देख प्रशासन ने अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर दिया है. क्षेत्र में दुकानों को जबरन बंद करवाया जा रहा है, जिससे स्थानीय व्यापारियों में रोष है. घटना को लेकर अलग-अलग वीडियो सामने आ रहे हैं, जिसमें भीड़ अल्ला हू अकबर के नारे लगाती सुनी जा सकती है.

सोमवार को स्थानीय लोग भी आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग को लेकर डटे रहे.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

कपिल मिश्रा

 

अंकित शर्मा

मयंक

Posted by Mayank Kanodiya on Monday, July 1, 2019

 

July 1st 2019, 6:12 am

01 जुलाई / जन्मदिवस – श्रमिक हित को समर्पित राजेश्वर दयाल जी

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नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यह विशेषता ही है कि उसके कार्यकर्त्ता को जिस काम में लगाया जाता है, वह उसमें ही विशेषज्ञता प्राप्त कर लेता है. राजेश्वर जी भी ऐसे ही एक प्रचारक थे, जिन्हें भारतीय मजदूर संघ के काम में लगाया गया, तो उसी में रम गये. कार्यकर्त्ताओं में वे ‘दाऊ जी’ के नाम से प्रसिद्ध थे.

राजेश्वर जी का जन्म एक जुलाई, 1933 को ताजगंज (आगरा) में पण्डित नत्थीलाल शर्मा जी तथा चमेली देवी के घर में हुआ था. चार भाई बहनों में वे सबसे छोटे थे. दुर्भाग्यवश राजेश्वर जी के जन्म के दो साल बाद ही पिता जी चल बसे. ऐसे में परिवार पालने की जिम्मेदारी माताजी पर ही आ गई. वे सब बच्चों को लेकर अपने मायके फिरोजाबाद आ गयीं.

राजेश्वर जी ने फिरोजाबाद से हाईस्कूल और आगरा से इण्टर, बीए किया. इण्टर करते समय वे स्वयंसेवक बने. आगरा में उन दिनों ओंकार भावे जी प्रचारक थे. कला में रुचि के कारण मुम्बई से कला का डिप्लोमा लेकर राजेश्वर जी मिरहची (एटा, उत्तर प्रदेश) के एक इण्टर कॉलेज में कला के अध्यापक बन गए. वर्ष 1963 में उन्होंने संघ का तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण पूर्ण किया और वर्ष 1964 में नौकरी छोड़कर संघ के प्रचारक बन गये.

प्रारम्भ में उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर और मेरठ जिलों में भेजा गया. शीघ्र ही इस क्षेत्र में समरस हो गये. उन्हें तैरने का बहुत शौक था. पश्चिम के क्षेत्र में नहरों का जाल बिछा है. प्रायः वे विद्यार्थियों के साथ नहाने चले जाते थे और बहुत ऊंचाई से कूदकर, कलाबाजी खाकर तथा गहराई में तैरकर दिखाते थे. इसी क्रम में उन्होंने कई कार्यकर्ताओं को तैरना सिखाया. इसके बाद वे पूर्वी उत्तर प्रदेश के बांदा और हमीरपुर में भी प्रचारक रहे.

वर्ष 1970 में उन्हें भारतीय मजदूर संघ में काम करने के लिए लखनऊ भेजा गया. तब दत्तोपन्त ठेंगड़ी जी केन्द्र में तथा उत्तर प्रदेश में बड़े भाई कार्यरत थे. बड़े भाई ने उनसे कहा कि इस क्षेत्र में काम करने के लिए मजदूर कानूनों की जानकारी आवश्यक है. जिसके बाद उन्होंने विधि स्नातक की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली. भारतीय मजदूर संघ, उत्तर प्रदेश के सहमन्त्री के नाते वे आगरा, कानपुर, प्रयाग, सोनभद्र, मुरादाबाद, मेरठ आदि अनेक स्थानों पर काम करते रहे. वर्ष 1975 के आपातकाल में वे लखनऊ जेल में बन्द रहे.

राजेश्वर जी पंजाब तथा हरियाणा के भी प्रभारी रहे. इन क्षेत्रों में कार्य विस्तार में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा. वे सन्त देवरहा बाबा, प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, श्री गुरुजी, ठेंगड़ी जी तथा बड़े भाई से विशेष प्रभावित थे. उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं, जिनमें ‘उत्तर प्रदेश में भारतीय मजदूर संघ’ तथा‘कार्यकर्ता प्रशिक्षण वर्ग में मा. ठेंगड़ी जी के भाषणों का संकलन’ विशेष हैं.

स्वास्थ्य खराबी के बाद वे संघ कार्यालय, आगरा (माधव भवन) में रहने लगे. आध्यात्मिक रुचि के कारण वे वहां आने वालों को श्रीकृष्ण कथा मस्त होकर सुनाते थे. 10 जून, 2007 को अति प्रातः सोते हुए ही किसी समय उनकी श्वास योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में लीन हो गयी.

राजेश्वर जी के बड़े भाई रामेश्वर जी भी संघ, मजदूर संघ और फिर विश्व हिन्दू परिषद में सक्रिय रहे. 1987 में सरकारी सेवा से अवकाश प्राप्त कर वे विश्व हिन्दू परिषद के केन्द्रीय कार्यालय, दिल्ली में अनेक दायित्व निभाते रहे. राजेश्वर जी के परमधाम जाने के ठीक तीन वर्ष बाद उनका देहांत भी 10 जून, 2010 को आगरा में अपने घर पर ही हुआ.

June 30th 2019, 6:36 pm

विहिप प्रस्ताव – जम्मू कश्मीर में अलगाववादी व हिन्दू विरोधी नीतियों व प्रावधानों के कारण विस्फोटक स्

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जम्मू कश्मीर में 29-30 जून को विश्व हिन्दू परिषद की केंद्रीय प्रबंध समिति की दो दिवसीय बैठक आयोजित की जा रही है. जिसमें देशभर से प्रतिनिधि उपस्थित हैं. बैठक के पहले दिन जम्मू कश्मीर को लेकर दो विषयों जम्मू कश्मीर में अलगाववादी व हिन्दू विरोधी नीतियों व प्रावधानों, हिन्दू तीर्थस्थलों व तीर्थयात्राओं के विकास पर प्रस्ताव पारित किये गए.

विश्व हिन्दू परिषद केन्द्रीय प्रबन्ध समिति बैठक-29-30 जून, 2019,

काँगड़ा फोर्ट बैंक्वेट हाल, (मुठी बरनाई), जम्मू (जम्मू कश्मीर)

प्रस्ताव – जम्मू कश्मीर में अलगाववादी व हिन्दू विरोधी नीतियों व प्रावधानों के कारण विस्फोटक स्थिति

भारत की स्वतत्रंता के बाद से ही पाकिस्तान जम्मू कश्मीर को भारत से अलग करके उसे हिन्दू शून्य बनाना चाहता है. दुर्भाग्यवश भारत के कुछ राजनीतिज्ञ व कथित बुद्धिजीवी पाकिस्तान के इस एजेण्डे को जाने-अनजाने में लागू करने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं. शेख अब्दुल्ला की मांग पर अनुच्छेद 370 को बहुत ही विचित्र तरीके से डाला जाना, इसी एजेण्डे का एक प्रयास है. संविधान के भाग XXI में अनुच्छेद 370 को अस्थाई व परिवर्तनशील प्रावधान के रूप में ड़ाला गया. संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वरा बनाए गए मूल प्रारूप में इसका वर्णन नहीं है. 25 जनवरी 1957 को जम्मू कश्मीर की संविधान सभा का काम पूरा होते ही धारा 370 समाप्त हो जानी चाहिए थी, परन्तु इसको जारी रखा गया. इस प्रावधान का स्वरूप अलगाव के पोषक के रूप में ही रहा है. इस प्रावधान का अनेक राष्ट्रीय संगठन प्रारंभ से ही विरोध करते रहे हैं. विश्व हिन्दू परिषद की प्रबंध समिति का अभिमत है कि वर्तमान समय इसको हटाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है. केन्द्र सरकार को इसे हटाने का अविलम्ब प्रयास करना चाहिए. अलगाववादी तत्वों को परास्त कर शेष देश के साथ जम्मू-कश्मीर का मजबूती से जुड़ाव करने का यह प्रभावी मार्ग है.

अनुच्छेद 370 का दुरुपयोग करके अनुच्छेद 35-ए का निर्माण किया गया. यह अनुच्छेद 370 के अलगाववाद को तो मजबूत करता ही है, महिलाओं, अनुसूचित जातियों व दशकों से पीड़ित-प्रताड़ित शरणार्थियों के अधिकारों का भी हनन करती है. इस धारा के अन्तर्गत राज्य सरकार स्थाई निवासी (State Subject) का प्रमाण पत्र जारी करती है. पाक अधिक्रान्त जम्मू कश्मीर व पंजाब से आए लाखों शरणार्थी, पंजाब से लाए गए अनुसूचित जाति के बंधु/भगिनी तथा जम्मू कश्मीर से बाहर शादी करने वाली लड़कियों की संतानों को स्थाई नागरिक प्रमाण पत्र नहीं मिलता. लाखों की इस आबादी को सरकारी नौकरी, छात्रवृत्ति, स्थानीय निकायों व विधानसभाओं में मतदान का अधिकार, जमीन खरीदने के अधिकार आदि से वंचित होकर अपमान व पीड़ा की स्थिति को लम्बे समय से भोगना पड़ रहा है. इसको समाप्त करने के लिए वर्तमान केन्द्र सरकार भी वचनबद्ध है. विश्व हिन्दू परिषद की प्रबंध समिति इस शोषणकारी व अलगाववादी धारा को तत्काल समाप्त करने के लिए केन्द्र सरकार से आग्रह करती है.

80-90 के दशक में आतंकवाद से त्रस्त होकर लाखों कश्मीरी हिन्दुओं को अपनी जन्मभूमि से पलायन करना पड़ा था. वे 30-35 वर्ष के बाद भी अपनी जन्मभूमि के दर्शन करने के लिए तरस रहे हैं. इनकी जन्मभूमि पर इनके पुनर्वास का सपना प्रत्येक सरकार ने दिखाया, परन्तु वह अभी भी अधूरा है. विश्व हिन्दू परिषद केन्द्रीय सरकार व सभी संबंधित पक्षों से यह अपील करती है कि वे इन सबके सुरक्षित  पुनर्वास को सुनिश्चित करने के लिए हरसंभव प्रयास करें.

जम्मू कश्मीर में अलगाववाद की साम्प्रदायिक राजनीति का बीजारोपण करने वाले शेख अब्दुल्ला व अन्य राजनीतिज्ञ 1951 से ही विधानसभा क्षेत्रों का इस प्रकार परिसीमन करते रहे हैं, जिससे जम्मू कश्मीर की राजनीति घाटी परस्त ही बनी रही. पाक अधिक्रान्त जम्मू कश्मीर के नागरिकों के लिए 25 सीटें खाली छोड़ी जाती रही हैं. उस क्षेत्र के 15 लाख विस्थापित भारत के विभिन्न क्षेत्र में रहते हैं. उनके लिए इन सीटों में उचित प्रतिनिधित्व की व्यवस्था रहनी चाहिए. षड़यन्त्र पूर्वक किए गए इस परिसीमन को राष्ट्रहितों को ध्यान में रखकर न्यायपूर्ण बनाना अत्यंत आवश्यक है. कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि राज्यपाल को इस काम के लिए कोई जनादेश नहीं है. उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि 1995 में राष्ट्रपति शासन में ही परिसीमन का आदेश दिया गया था. विश्व हिन्दू परिषद का केन्द्र सरकार से यह आग्रह है कि न्यायोचित परिसीमन के लिए आवश्यक कार्यवाही सुनिश्चित करें, जिससे जम्मू कश्मीर की राजनीति सम्पूर्ण राज्य की भावनाओं और आकांक्षाओं को परिलक्षित कर सके और संपूर्ण राज्य का संतुलित विकास हो सके.

जम्मू क्षेत्र में जनसंख्या संतुलन की बिगड़ती हुई स्थिति के कारण विश्व हिन्दू परिषद की प्रबंध समिति चिंतित है. कश्मीर घाटी में हिन्दुओं का नरसंहार कर उसको हिन्दू शून्य बनाने के बाद अब वे जम्मू क्षेत्र में मुस्लिम समाज का प्रभुत्व स्थापित करना चाहते हैं. जेहादी तत्व जम्मू क्षेत्र में बड़े सुनियोजित तरीके से मुस्लिम समाज के लोगों को बाहर से लाकर बसा रहे हैं. बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों के लिए तो जम्मू एक सुरक्षित शरणस्थली बन गया है. अपनी बर्बरता के लिए कुख्यात दस हजार से अधिक रोहिंग्या अब जम्मू की कानून व्यवस्था के लिए भी सिरदर्द बन गए हैं. रेलवे स्टेशन से लेकर संपूर्ण जम्मू क्षेत्र में और उसकी सीमा पर नई मुस्लिम बस्तियों का निर्माण चिंता का विषय है. जंगलों की व सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जा करके कई मुस्लिम बस्तियों का भी निर्माण किया जा रहा है.

आज यह दुर्भाग्य है कि हिन्दू शिक्षा व रोजगार के लिए जम्मू से जा रहा है तथा इसको मुस्लिम बहुल बनाने के लिए मुस्लिम तेजी से आ रहे हैं. ये सब षड़यन्त्र पूर्व राज्य सरकारों के संरक्षण में ही फलते-फूलते थे. विहिप की प्रबंध समिति महामहिम राज्यपाल से अपील करती है कि वे जम्मू में शिक्षा व रोजगार के अवसर निर्माण करें, जिससे हिन्दू का पलायन रूक सके. सरकारी व जंगलों की जमीन पर अवैध रूप से बसे मुसलमानों को हटाने के लिए प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है. विहिप जम्मू क्षेत्र के हिन्दुओं से अपील करता है कि वे इन परिस्थितियों पर सजग निगाह रखें व इनको रोकने के लिए संगठित प्रयास करें. वरना जम्मू को कश्मीर बनाने की दिशा में रचे जा रहे इन अपवित्र षड़यन्त्रों के परिणामस्वरूप देवभूमि जम्मू पर जेहादी काली छाया और गहरी हो जाएगी.

प्रस्तावक – दिलीप भाई, गुजरात

अनुमोदक – अमिया सरकार, बंगाल

 

June 30th 2019, 9:17 am

विहिप प्रस्ताव – हिन्दू तीर्थस्थलों व तीर्थयात्राओं का विकास ही जम्मू-कश्मीर को धरती का स्वर्ग बना स

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जम्मू कश्मीर में 29-30 जून को विश्व हिन्दू परिषद की केंद्रीय प्रबंध समिति की दो दिवसीय बैठक आयोजित की जा रही है. जिसमें देशभर से प्रतिनिधि उपस्थित हैं. बैठक के पहले दिन जम्मू कश्मीर को लेकर दो विषयों जम्मू कश्मीर में अलगाववादी व हिन्दू विरोधी नीतियों व प्रावधानों, हिन्दू तीर्थस्थलों व तीर्थयात्राओं के विकास पर प्रस्ताव पारित किये गए.

विश्व हिन्दू परिषद केन्द्रीय प्रबन्ध समिति बैठक-29-30 जून, 2019,

काँगड़ा फोर्ट बैंक्वेट हाल, (मुठी बरनाई), जम्मू (जम्मू कश्मीर)

प्रस्ताव – हिन्दू तीर्थस्थलों व तीर्थयात्राओं का विकास ही जम्मू-कश्मीर को धरती का स्वर्ग बना सकता है

जम्मू कश्मीर केवल यहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण ‘धरती का स्वर्ग’नहीं है, अपितु विहिप की प्रबंध समिति का यह स्पष्ट अभिमत है कि यहाँ के तीर्थस्थल, तीर्थयात्राएँ, मंदिर एवं ऐतिहासिक स्थल समग्र रूप से मिलकर ही इस स्वर्ग को अलौकिक रूप प्रदान करते हैं. इन पावन स्थलों के बिना यह धरती न स्वर्ग बन सकती है और न यहाँ का वैशिष्टय बना रह सकता है. इन तीर्थयात्राओं का विकास करके, तीर्थस्थलों को भव्यता प्रदान करके तथा मंदिरों को सुरक्षा प्रदान करके एवं वहाँ परम्परागत रूप से पूजा-अर्चना सुनिश्चित करके ही जम्मू-कश्मीर की आत्मा को पुष्ट किया जा सकता है.

पाक-अधिकृत जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा के नजदीक स्थित शारदा पीठ न केवल शक्तिपीठ है, अपितु ज्ञान अर्जन का बहुत बड़ा केन्द्र रही है. यहाँ पर स्थित विश्वविद्यालय में एक समय में पाँच हजार छात्र पढ़ा करते थे. यह पीठ जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य के साथ भी जुड़ी है. कल्हन व अभिनव गुप्त जैसे प्रकाण्ड विद्वान भी इस विश्वविद्यालय से जुड़े थे. पूरे देश के हिन्दुओं की आस्था का यह महत्वपूर्ण केन्द्र रही है. कांगड़ा फोर्ट जम्मू में आयोजित विहिप की प्रबंध समिति की यह सभा भारत सरकार से आग्रह करती है कि वे पाकिस्तान सरकार से पुरजोर आग्रह करके शारदा पीठ को हिन्दुओं के लिए खुलवाए और इसके संचालन का अधिकार आस्थावान हिन्दुओं को सौंपना सुनिश्चित करवाए, जिससे परंपरागत रूप से पूजा-अर्चना की जा सके. विश्व हिन्दू परिषद केन्द्र सरकार से यह भी अपील करती है कि वे शारदा कॉरीडोर का निर्माण करवाए, जिससे यात्री बिना वीजा व परमिट के यात्रा सम्पन्न कर सकें.

तिब्बत स्थित कैलाश मानसरोवर की यात्रा विश्व की सबसे दुर्गम यात्राओं में से एक है. परन्तु इसके सबसे छोटे, अच्छे और सुविधाजनक मार्गों में से एक मार्ग लद्दाख की ओर से जाता है. लेह से केवल 2 दिन में सड़क मार्ग द्वारा मानसरोवर के बेस कैम्प में पहुँचा जा सकता है. विहिप केन्द्र सरकार से माँग करती है कि वे चीन सरकार से बातचीत करके इस मार्ग को खुलवाए.

अमरनाथ यात्रा हिन्दुओं की भारत में सबसे पावन व दुरुह यात्राओं में से एक है. उनको सुविधाएँ देना व मार्ग की कठिनाइयों को न्यूनतम करना राज्य सरकार व बाबा अमरनाथ श्राइन बोर्ड का वैधानिक दायित्व है. कुछ सुविधाएं दी भी गई हैं, इसके लिए बोर्ड प्रशंसा का पात्र है; परन्तु अभी यात्रा को और अधिक सुगम किया जाना शेष है. इस यात्रा के लिए केबल कार (CABLE CAR) की अनुशंसा कई बार की जा चुकी है. बोर्ड के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी ने ग्रीन ट्रिब्यूनल की एक बैठक में यह लिखकर भी दिया है कि वे इस पर काम कर रहे हैं. विहिप की प्रबंध समिति जम्मू-कश्मीर के महामहिम राज्यपाल से अनुरोध करती है कि वे इस विषय पर तीव्रता से काम करने का आदेश संबंधित अधिकारियों को दें, जिससे अगली यात्रा में केबल कार (CABLE CAR) का उपयोग हो सके. यह सबसे सुरक्षित व प्रदूषण मुक्त साधन सिद्ध होगा. ऐतिहासिक रूप से यात्रा 6 अलग-अलग मार्गों से जाती रही है. एक मार्ग जो सबसे छोटा व सुरक्षित है, वह कारगिल से होकर जाता है. उस पर विशेष करणीय कार्य भी नहीं है. अतः इस मार्ग से भी यात्रियों को जाने की अनुमति दी जानी चाहिए.

कश्मीर घाटी में हिन्दुओं के सैकड़ों मंदिरों और उनकी जमीनों पर अवैध कब्जे किए जा चुके हैं. कई मंदिरों के ऐतिहासिक व पवित्र स्वरूपों को खण्डित भी किया जा चुका है. महामहिम राज्यपाल महोदय से अपील है कि उन सभी मंदिरों व उनकी जमीनों को चिह्नित करके उन पर अवैध कब्जे हटाए जाएँ. इन मंदिरों की ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, जिससे उन सब मंदिरों में परंपरागत रूप से पूजा-अर्चना प्रारंभ की जा सके तथा जम्मू-कश्मीर में पीड़ित हिन्दू समाज को न्याय दिलाने व जम्मू-कश्मीर की न्याय व्यवस्था में उनका विश्वास लौटाने में उपरोक्त कदम निर्णायक सिद्ध हो सके.

प्रस्ताव – अभिषेक गुप्ता, जम्मू

अनुमोदक – गाला रेड्डी, भाग्यनगर

June 30th 2019, 8:44 am

पत्रकारिता में आध्यात्मिकता के समावेश से आएगा समाज में परिवर्तन – डॉ. मनमोहन वैद्य

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नई दिल्ली. पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में पत्रकारों को देवर्षि नारद पत्रकार सम्मान प्रदान किए गए. इन्द्रप्रस्थ विश्व संवाद केंद्र के तत्वाधान में आयोजित देवर्षि नारद पत्रकार सम्मान समारोह-2019 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य मुख्य वक्ता, महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं. डॉ. मनमोहन वैद्य ने कहा कि जो बिकेगा वही चलेगा, ऐसी भावना आदर्श पत्रकारिता में नहीं होनी चाहिए. पत्रकार भी समाज का अंग है. समाज मेरा है, यह यदि पत्रकार सोचकर चलता है तो समाज का हित और उत्थान स्वतः ही उसकी पत्रकारिता से जुड़ जाता है. उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति विविधता को स्वीकार करती है, हमारे जीवन का आधार आध्यात्मिकता है, इसलिए हम विविध होते हुए भी एक हैं. उन्होंने चिंता प्रकट करते हुए कहा कि साम्राज्यवाद के कारण अपनी मातृभाषा के बहुत से शब्द हम भूलते चले गए, जिनका अंग्रेजी उच्चारण तो आज हमें पता है, लेकिन हिन्दी उच्चारण नहीं. अपनी शब्दावली के अर्थ की गंभीरता पश्चिमी अनुवाद से अधिक व्यापक है. मातृभाषा की अस्मिता के लिए अपनी शब्दावली को संजोकर रखना अत्यंत आवश्यक है, तभी हम भाषा के साम्राज्यवाद से मुकाबला कर सकते हैं. भारत की विशेषता आध्यात्मिकता है, यह आध्यात्मिकता कोई एक रिलीजन नहीं है, सभी रिलीजन को एक मानना ही भारत की आध्यात्मिकता है. इसलिए यदि स्कूली शिक्षा में यह हम सिखाते हैं तो समाज के साथ व्यक्ति का आपसी सम्बन्ध प्रगाढ़ होगा, उसके व्यवहार में, राष्ट्र के प्रति, स्त्री के प्रति देखने की दृष्टि में व्यापक परिवर्तन आएगा और वह समाज के लिए सोचेगा. जो वास्तव में भारत की मूल परम्परा रही है. व्यवस्था में शायद यह बाद में आए, लेकिन पत्रकारों के हाथ में भी पत्रकारिता के माध्यम से यह परिवर्तन लाने की क्षमता है. स्मृति ईरानी ने वर्ष 2018 में दंतेवाड़ा में चुनाव की कवरेज के दौरान नक्सली हमले में शहीद हुए दूरदर्शन के छायाचित्रकार अच्युतानंद साहू को मरणोपरांत नारद सम्मान देने के लिए इन्द्रप्रस्थ विश्व संवाद केन्द्र की ज्यूरी की प्रशंसा करते हुए कहा कि आज के टीवी पत्रकारिता के युग में तकनीकी दृष्टि से जो लोग कार्य करते हैं, उनके साथ हुई घटना पर किसी का ध्यान नहीं जाता. कैमरामैन, फोटोग्राफर भी पत्रकारिता के इस बदलते युग का अभिन्न अंग हैं. वैज्ञानिक और सांस्कृतिक पत्रकारिता आज लुप्त सी हो गई है, जिसे सामने लाने की आवश्यकता है. वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय को आजीवन सेवा नारद पुरस्कार तथा बिजनेस टीवी इंडिया के संपादक सिद्धार्थ जराबी को समग्र उत्कृष्ट नारद सम्मान से अलंकृत किया गया. इंडिया टुडे मैगजीन के डिप्टी एडिटर उदय माहूरकर को प्रिंट पत्रकार नारद सम्मान, स्वतंत्र पत्रकार नलिन चौहान को उत्कृष्ट स्तम्भकार नारद सम्मान, फर्स्ट पोस्ट के मुख्य संवाददाता देवव्रत घोष को डिजिटल पत्रकारिता नारद सम्मान, इंडिया टीवी के डिप्टी एडिटर व वरिष्ठ एंकर सुशांत सिन्हा टी.वी पत्रकारिता नारद सम्मान, क्लीन द नेशन टीम को सोशल मीडिया नारद सम्मान, पांचजन्य के संवाददाता अरुण कुमार सिंह को ग्रामीण पत्रकारिता नारद सम्मान, ऋचा अनिरुद्ध को स्त्री सरोकार-महिला संवेदना पत्रकारिता नारद सम्मान, गणेश कृष्णन को युवा पत्रकार नारद सम्मान तथा  दंतेवाड़ा में नक्सली हमले में शहीद हुए दूरदर्शन के छाया चित्रकार स्व. अच्युतानंद साहू को मरणोपरांत उत्कृष्ट छायाचित्रकार नारद सम्मान से सम्मानित किया गया. कार्यक्रम में मंच संचालन विकास कौशिक ने किया, अध्यक्षता समाजसेवी वह उद्यमी राकेश बंधु ने की. इन्द्रप्रस्थ विश्व संवाद केन्द्र के अध्यक्ष अशोक सचदेवा ने पत्रकार सम्मान समारोह में आए सभी पत्रकारों व अतिथियों का धन्यवाद व आभार व्यक्त किया.

June 30th 2019, 6:00 am

30 जून / इतिहास स्मृति – संथाल परगना में 20 हजार वीरों ने दी प्राणाहुति

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नई दिल्ली. स्वाधीनता संग्राम में वर्ष 1857 एक मील का पत्थर है, लेकिन वास्तव में अंग्रेजों के भारत आने के कुछ समय बाद से ही विद्रोह का क्रम शुरू हो गया था. कुछ हिस्सों में रवैये से परेशान होकर विरोध करना शुरू कर दिया था. वर्तमान झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र में हुआ ‘संथाल हूल’ या ‘संथाल विद्रोह’ इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है. संथाल परगना उपजाऊ भूमि वाला वनवासी क्षेत्र है. वनवासी बंधु स्वभाव से धर्म और प्रकृति के प्रेमी तथा सरल होते हैं. इसका जमींदारों ने सदा लाभ उठाया है. कीमती वन उपज लेकर उसी के भार के बराबर नमक जैसी सस्ती चीज देना वहां आम बात थी. अंग्रेजों के आने के बाद ये जमींदार उनके साथ मिल गये और संथालों पर दोहरी मार पड़ने लगी. घरेलू आवश्यकता हेतु लिये गये कर्ज पर कई बार साहूकार 50 से 500 प्रतिशत तक ब्याज ले लेते थे.

वर्ष 1789 में संथाल क्षेत्र के एक वीर बाबा तिलका मांझी ने अपने साथियों के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध कई सप्ताह तक सशस्त्र संघर्ष किया था. उन्हें पकड़ कर अंग्रेजों ने घोड़े की पूंछ से बांधकर सड़क पर घसीटा और फिर उनकी खून से लथपथ देह को भागलपुर में पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दी. 30 जून, 1855 को तिलका मांझी की परम्परा के अनुगामी दो सगे भाई सिद्धू और कान्हू मुर्मु के नेतृत्व में 10,000 संथालों ने अंग्रेजों के शोषण के विरुद्ध विद्रोह कर दिया. इनका जन्म भोगनाडीह गांव में हुआ था. उन्होंने एक सभा में ‘संथाल राज्य’ की घोषणा कर अपने प्रतिनिधि द्वारा भागलपुर में अंग्रेज कमिश्नर को सूचना भेज दी कि वे 15 दिन में अपना बोरिया-बिस्तर समेट लें. इससे बौखला कर शासन ने उन्हें गिरफ्तार करने का प्रयास किया, पर ग्रामीणों के विरोध के कारण वे असफल रहे. अब दोनों भाइयों ने सीधे संघर्ष का निश्चय कर लिया. इसके लिए शालवृक्ष की टहनी घुमाकर क्रांति का संदेश घर-घर पहुंचा दिया गया. परिणाम यह हुआ कि उस क्षेत्र से अंग्रेज शासन लगभग समाप्त ही हो गया. इससे उत्साहित होकर एक दिन 50,000 संथाल वीर अंग्रेजों को मारते-काटते कोलकाता की ओर चल दिये.

यह देखकर शासन ने मेजर बूरी के नेतृत्व में सेना भेज दी. पांच घंटे के खूनी संघर्ष में शासन की पराजय हुई और संथाल वीरों ने पकूर किले पर कब्जा कर लिया. सैकड़ों अंग्रेज सैनिक मारे गये. जिससे कम्पनी के अधिकारी घबरा गये. अतः पूरे क्षेत्र में ‘मार्शल लॉ’ लगाकर उसे सेना के हवाले कर दिया गया. अब अंग्रेज सेना को खुली छूट मिल गयी. अंग्रेज सेना के पास आधुनिक शस्त्रास्त्र थे, जबकि संथाल वीरों के पास तीर-कमान जैसे परम्परागत हथियार. अतः बाजी पलट गयी और चारों ओर खून की नदी बहने लगी.

इस युद्ध में लगभग 20,000 वनवासी वीरों ने प्राणाहुति दी. प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार हंटर ने युद्ध के बारे में अपनी पुस्तक ‘एनल्स ऑफ रूरल बंगाल’ में लिखा है, ‘‘संथालों को आत्मसमर्पण जैसे किसी शब्द का ज्ञान नहीं था. जब तक उनका ड्रम बजता रहता था, वे लड़ते रहते थे. जब तक उनमें से एक भी शेष रहा, वह लड़ता रहा. ब्रिटिश सेना में एक भी ऐसा सैनिक नहीं था, जो इस साहसपूर्ण बलिदान पर शर्मिन्दा न हुआ हो.’’

इस संघर्ष में सिद्धू और कान्हू के साथ उनके अन्य दो भाई चांद और भैरव भी मारे गये. इस घटना की याद में 30 जून को प्रतिवर्ष ‘हूल दिवस’ मनाया जाता है. कार्ल मार्क्स ने अपनी पुस्तक ‘नोट्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री’ में घटना को जनक्रांति कहा है. भारत सरकार ने भी वीर सिद्धू और कान्हू की स्मृति को चिरस्थायी बनाये रखने के लिए एक डाक टिकट जारी किया है.

June 29th 2019, 6:19 pm

भारतीय ज्ञान का खजाना – १

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पंचमहाभूतों के मंदिरों का रहस्य..!

इस लेखमाला, अर्थात् ‘भारतीय ज्ञान का खजाना’ का उद्देश्य है कि हमारे देश में छिपी हुई अनेक अदभुत एवं ज्ञानपूर्ण बातों को जनता के सामने लाना. इस पुस्तक का प्रत्येक लेख प्रिंट मीडिया एवं सोशल मीडिया के माध्यम से अक्षरशः लाखों लोगों तक पहुँचता है. संभवतः इसीलिए पत्र, फोन एवं सोशल मीडिया के माध्यम से प्रतिक्रियाओं की मानो वर्षा ही हो रही है.

परन्तु ऐसी अनेक बातें हैं, जो हमें पता चलने पर हम भौचक्के रह जाते हैं, सुन्न हो जाते हैं. आज जो बातें हमें असंभव की श्रेणी में लगती हैं, वह आज से ढाई-तीन हजार वर्षों पहले भारतीयों ने कैसे निर्माण की होंगी, कैसे बनाई होंगी… यह एक प्रश्नचिन्ह हमारे सामने निरंतर बड़ा होता जाता है.

हिन्दू दर्शन में पंचमहाभूतों का विशेष महत्त्व है. पश्चिमी जगत ने भी इस संकल्पना को मान्य किया है. डेन ब्राउन जैसे प्रसिद्ध लेखक ने भी इस संकल्पना का उल्लेख किया है और इस विषय पर ‘इन्फर्नो’ जैसा उपन्यास भी लिखा. यह पंचमहाभूत हैं, जल, वायु, आकाश, पृथ्वी एवं अग्नि. ऐसी मान्यता है कि हम सभी का जीवनचक्र इन पाँचों महाभूतों के आधार पर ही आकार ग्रहण करता है.

यह बात कितने लोगों की जानकारी में है कि हमारे देश में इन पंचमहाभूतों के भव्य एवं विशिष्टताओं से भरे मंदिर हैं? बहुत ही कम लोगों को इसकी जानकारी है. जो लोग भगवान शंकर के उपासक हैं, उन लोगों को इन मंदिरों की जानकारी होने की थोड़ी बहुत संभावना है. क्योंकि इन पंचमहाभूतों के मंदिर अर्थात् शिव मंदिर, भगवान शंकर के मंदिर हैं. लेकिन इसमें कोई बड़ी विशेषता अथवा रहस्य तो नहीं है… फिर इनकी विशेषता किस बात में है…?

पंचमहाभूतों के इन पाँच मंदिरों की विशेषता अथवा रहस्य यह है कि इनमें से तीन मंदिर, जो एक-दूसरे से कई सौ किमी दूरी पर स्थित हैं, यह तीनों एक ही रेखा पर स्थित हैं. जी हाँ..! बिलकुल एक सीधी रेखा में हैं… यह तीन मंदिर हैं –

पृथ्वी पर किसी स्थान को चिन्हित या तय करने के लिए हम जिन कॉर्डिनेट्स का उपयोग करते हैं, एवं जिसे हम अक्षांश व रेखांश कहते हैं. इनमें से अक्षांश (Latitude) अर्थात् पृथ्वी के नक़्शे पर खींची गई (काल्पनिक) आड़ी रेखाएं. जैसे कि विषुवत, कर्क रेखा इत्यादि… जबकि रेखांश इसी नक़्शे पर खींची गई लम्बवत रेखाएं. इन तीनों मंदिरों के अक्षांश और रेखांश इस प्रकार से हैं –

क्र.    मंदिर                           अक्षांश    रेखांश    पंचमहाभूत तत्त्व

१.  श्री कालहस्ती मंदिर       13.76 N    79.41 E    वायु

२.  श्री एकाम्बरेश्वर मन्दिर    12.50 N    79.41 E   पृथ्वी

३.  श्री तिलई नटराज मन्दिर 11.23 N    79.41 E  आकाश

यह तीनों मंदिर एक ही रेखांश बिंदु 79.41E पर स्थित हैं, अर्थात् एक ही सीधी रेखा पर हैं. कालहस्ती और एकाम्बरेश्वर मंदिर के बीच लगभग सवा सौ किमी की दूरी है और एकाम्बरेश्वर तथा नटराज मंदिर के बीच लगभग पौने दो सौ किमी का अंतर है. यह तीनों मंदिर कब निर्माण किए गए, यह बताना कठिन है. इस क्षेत्र में जिन्होंने शासन किया है, वे पल्लव, चोल इत्यादि राजाओं द्वारा इन मंदिरों का नवीनीकरण किए जाने का उल्लेख अवश्य मिलता है. परन्तु लगभग तीन – साढ़े तीन हजार वर्ष पुराने तो हैं ही, यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है.

अब इसमें वास्तविक आश्चर्य यही है कि लगभग साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व आपस में इतनी दूरी पर स्थित ये तीनों मंदिर एक ही सीधी रेखा यानि रेखांश पर कैसे निर्मित किए गए होंगे?

इसका अर्थ यह है कि उस कालखंड में भी भारत में नक्शा शास्त्र इतना उन्नत था कि, उन्हें अक्षांश-रेखांश इत्यादि का ठोस ज्ञान था..? परन्तु यदि किसी को अक्षांश-रेखांश का परिपूर्ण ज्ञान हो, तब भी एक सीधी रेखा में मंदिर निर्माण करने के लिए नक्शा शास्त्र के अलावा “कंटूर मैप” का ज्ञान भी आवश्यक है. तो इन मंदिरों के निर्माण में कौन सी प्रक्रिया, सूत्र एवं समीकरण उपयोग किए गए, यह अब समय की गर्त में खो गया है…

सब कुछ अविश्वसनीय सा प्रतीत होता है. और आश्चर्य यहीं पर समाप्त नहीं होता है. बल्कि जब अन्य दो मंदिरों को इस सीधी रेखा में स्थित मंदिरों से जोड़ा जाता है, तब उसमें एक विशिष्ट कोण निर्माण होता है.

इसका दूसरा अर्थ भी है. उस कालखंड में हमारे वास्तुविदों के ज्ञान की गहराई कितनी होगी, यह दिखाई देता है? भूमि के कुछ हजार किमी में फैले हुए भूभाग पर ये वास्तुविद, पंचमहाभूतों के पाँच शैव मंदिरों का बड़ा सा बड़ा सा आकार बनाते हैं और उस रचना के माध्यम से हमें कोई विशेष संकेत देने का प्रयास करते हैं. यह हमारा ही दुर्भाग्य है कि हम उस प्राचीन ज्ञान की कूट भाषा को समझ नहीं पाते हैं.

इन पंचमहाभूतों के मंदिरों में से एक मंदिर आंध्रप्रदेश में स्थित है, जबकि चार मंदिर तमिलनाडु में निर्मित हैं. इनमें से वायु तत्त्व का प्रतिनिधित्व करने वाला मंदिर है कालहस्ती मंदिर. यह आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले में, तिरुपति से लगभग 35 किमी दूरी पर स्थित है. स्वर्णमुखी नामक छोटी सी नदी के किनारे पर यह मंदिर स्थापित किया गया है. हजारों वर्षों से इस मंदिर को ‘दक्षिण का कैलाश’ अथवा ‘दक्षिण काशी’ कहा जाता है.

भले ही यह मंदिर अत्यंत प्राचीन हो, तब भी मंदिर का अंदरूनी गर्भगृह वाला भाग पाँचवीं शताब्दी में, जबकि बाहरी गोपुर वाला भाग ग्यारहवीं शताब्दी में बनाया गया है. पल्लव, चोल और उसके पश्चात विजयनगर साम्राज्य के राजाओं ने इस मंदिर की मरम्मत और निर्माण किए जाने के उल्लेख मिलते हैं. इस मंदिर में आदि शंकराचार्य भी आ चुके हैं, ऐसा साहित्य में उल्लेख है. स्वयं शंकराचार्य ने ‘शिवानंद लहरी’ में इस मंदिर एवं यहाँ के परम भक्त कणप्पा का उल्लेख किया है.

यह मंदिर पंचमहाभूतों में से ‘वायु’ का प्रतिनिधित्व करता है. इस बात के भी आश्चर्यजनक संदर्भ हमें प्राप्त हो जाते हैं. जैसे कि इस मंदिर में शिवलिंग सफ़ेद रंग का है एवं इसे स्वयंभू शिवलिंग माना जाता है. इस शिवलिंग में वायु तत्व होने के कारण इसे कभी भी स्पर्श नहीं किया जाता है. मंदिर के मुख्य पुजारी भी इस शिवलिंग को स्पर्श नहीं करते हैं. अभिषेक एवं पूजा करने के लिए एक ‘उत्सव शिवलिंग’ पास में स्थापित किया गया है. विशेष बात यह है कि इस मंदिर के गर्भगृह में एक दीपक अखंड रूप से जलता रहता है एवं उस गर्भगृह में कहीं से भी हवा आने का साधन नहीं होने के बावजूद वह दीपक सदैव फड़फड़ाते रहता है. यहां तक कि पुजारियों द्वारा मंदिर का मुख्य द्वारा बन्द करने के बाद भी इस दीपक की ज्योति फड़फड़ाती ही रहती है…! आज तक किसी भी वैज्ञानिक को इस का कारण समझ नहीं आया है. परन्तु स्थानीय लोगों का यही कहना है कि चूँकि शिवलिंग में वायु तत्त्व है, इसी कारण गर्भगृह के उस दीपक की ज्योति सदैव फड़कती रहती है.

इसी मंदिर से लगभग 125 किमी दूरी पर दक्षिण में एकदम सीधी रेखांश बिन्दु पर स्थित दूसरा मंदिर है ‘एकाम्बरेश्वर मंदिर’. यह तमिलनाडु के प्रसिद्ध कांचीपुरम स्थित, पृथ्वी तत्त्व का प्रतिनिधित्व करने वाला मंदिर है.

पृथ्वी तत्त्व होने के कारण ही इस मंदिर का शिवलिंग मिट्टी का बना हुआ है. ऐसा माना जाता है कि भगवान शंकर को प्राप्त करने के लिए आम के वृक्ष के नीचे माता पार्वती ने मिट्टी के शिवलिंग की तप-आराधना की थी, यही वह शिवलिंग है. इसीलिए इसे एकाम्बरेश्वर मंदिर कहा जाता है. तमिल भाषा में एकाम्बरेश्वर’ अर्थात् आम के वृक्ष वाले देवता. आज भी मंदिर के परिसर में एक बहुत प्राचीन आम का वृक्ष लगा हुआ है. कार्बन डेटिंग जाँच के अनुसार इस वृक्ष की आयु भी लगभग साढ़े तीन हजार वर्ष पुरानी ही निकली है. इस आम के वृक्ष को चार वेदों का प्रतीक समझा जाता है. ऐसा कहा जाता है कि इस एक ही पेड़ से चार भिन्न-भिन्न स्वादों के आम निकलते हैं.

यह मंदिर ‘कांचीपुरम’ नामक मंदिरों की नगरी में है. कांचीपुरम शहर ‘कांजीवरम’ साड़ियों के लिए विश्वप्रसिद्ध है. इस मंदिर में तमिल, तेलुगु, अंग्रेजी एवं हिन्दी में एक फलक (बोर्ड) लगा हुआ है कि यह मंदिर 3500 वर्ष प्राचीन है. हालाँकि ठोस रूप से यह कहना कठिन है कि वास्तव में मंदिर कितना पुराना है. आगे चलकर पाँचवीं शताब्दी में पल्लव, चोल एवं विजयनगर साम्राज्य के राजाओं ने इस मंदिर की मरम्मत एवं देखरेख किए जाने के उल्लेख ग्रंथों में मिलते हैं.

इन दोनों मंदिरों की ही सीधी रेखा में दक्षिण दिशा में, एकाम्बरेश्वर मंदिर से लगभग पौने दो सौ किमी दूरी पर स्थित है पंचमहाभूतों का तीसरा मंदिर अर्थात् तिलई नटराज मंदिर. आकाश तत्त्व का प्रतिनिधित्व करने वाला यह मंदिर तमिलनाडु के चिदम्बरम शहर में स्थित है.

ऐसा माना जाता है कि स्वयं पतंजलि ऋषि ने इस मंदिर की स्थापना की थी. इसलिए ठीक-ठीक कहना कठिन है कि इस मंदिर का निर्माण कब हुआ. परन्तु इसकी भी देखभाल एवं मरम्मत पल्लव, चोल एवं विजयनगर साम्राज्य के राजाओं द्वारा पाँचवी शताब्दी में की गई, इसका उल्लेख ग्रंथों में मिलता है. इस मंदिर के अंदर ‘भरतनाट्यम’ नृत्य की विभिन्न 108 मुद्राओं को पत्थर के स्तंभों पर उकेरा गया है. इसका अर्थ यही है कि भरतनाट्यम नामक नृत्य शास्त्र भारत में कुछ हजार वर्षों से पहले से ही काफी विकसित था. मंदिर में पत्थर के अनेक स्तंभों पर भगवान शंकर की अनेक मुद्राएं भले ही खुदी हुई हों, परन्तु नटराज की मूर्ति एक भी नहीं बनाई गई है… यह मूर्ति केवल गर्भगृह में ही विराजमान है.

इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान शंकर, नटराज के रूप में हैं, और साथ में शिवकामी अर्थात् पार्वती की मूर्ती भी है. अलबत्ता नटराज रूपी शिव प्रतिमा के दाँयी तरफ थोड़ा सा रिक्त स्थान है, जिसे ‘चिदंबरा रहस्यम’ कहा जाता है. इस खाली स्थान को स्वर्ण की गिन्नियों वाले हार से सजाया जाता है. यहाँ की मान्यता के अनुसार यह रिक्त स्थान, खाली नहीं है, बल्कि वह आकारहीन आकाश तत्त्व है.

पूजा के समय को छोड़कर बाकी के पूरे समय पर यह रिक्त स्थान लाल परदे से आच्छादित रहता है. पूजा करते समय लाल परदा सरका कर उस आकारहीन शिव तत्त्व अर्थात् आकाश तत्त्व की भी पूजा की जाती है. ऐसी मान्यता है कि यहाँ पर शिव एवं कालीमाता के रूप में पार्वती, दोनों ने नृत्य किया था.

चिदम्बरम से लगभग चालीस किमी दूरी पर कावेरी नदी समुद्र में जाकर मिलती है. इस क्षेत्र में आठवीं / नौवीं शताब्दी में चोल राजाओं ने जहाज़ों के लिए बंदरगाह का निर्माण किया था. इस स्थान का नाम है पुम्पुहार. एक समय पर यह पूर्वी तट का बहुत बड़ा बंदरगाह था, परन्तु आजकल अब वह एक छोटा सा गाँव मात्र रह गया है.

इस पुम्पुहार में कुछ वर्ष पहले पुरातत्व विभाग ने उत्खनन किया था, और तब समझिए कि उन्हें अक्षरशः विशाल खजाना ही मिला था. पुराविदों को यहाँ लगभग ढाई हजार वर्ष प्राचीन एक अत्यंत समृद्ध एवं विकसित शहर का पता चला. इस विशाल नगर का नियोजन, इस नगर के मार्ग, घर, नालियाँ, जल निकासी की व्यवस्था देखकर हम आज भी आश्चर्यचकित हो जाते हैं.

कुल मिलाकर यह कहना उचित ही होगा कि आज से लगभग तीन हजार वर्ष पहले इस परिसर में एक अत्यंत समृद्ध एवं विकसित संस्कृति मौजूद थी. जिस संस्कृति द्वारा पंचमहाभूतों के पाँचों मंदिरों हेतु एक भव्य प्रांगण, इस विशाल स्थान पर निर्माण किया था.

इन तीनों ही मंदिरों द्वारा एक ही रेखांश पर तैयार की गई सीधी रेखा से एक विशेष कोण बनाते हुए इन पंचमहाभूतों में से चौथा मंदिर है – जम्बुकेश्वर मंदिर.

त्रिचनापल्ली के पास, तिरुवनैकवल गाँव में यह मंदिर स्थित है. पंचमहाभूतों में से एक अर्थात् ‘जल’ का प्रतिनिधित्व करने वाला, कावेरी नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ पर शिवलिंग के नीचे पानी का एक छोटा सा झरना है, जिस कारण यह शिवलिंग निरंतर पानी में डूबा हुआ रहता है.

ब्रिटिश काल में फर्ग्युसन नामक पुरातत्वविद ने इस मंदिर के बारे में काफी शोधकार्य किया, जिसे अनेक लोगों ने ठोस प्रमाण माना. उसके मतानुसार चोल वंश के प्रारंभिक काल में इस मंदिर का निर्माण हुआ. परन्तु उसका यह निरीक्षण गलत था, यह बात अब सामने आ रही है. क्योंकि मंदिर में प्राप्त एक शिलालेख के आधार पर यह अब सिद्ध किया जा चुका है कि ईसा पूर्व कुछ सौ वर्ष पहले ही यह मंदिर अस्तित्व में था.

उस सीधी रेखांश पंक्ति के तीन मंदिरों के साथ विशिष्ट कोण पर बनाए गए पंचमहाभूतों के मंदिरों में से अंतिम मंदिर है – अरुणाचलेश्वर मंदिर. तमिलनाडु में ही तिरुअन्नामलाई में यह मंदिर स्थित है.

पंचमहाभूतों में से अग्नि तत्त्व का प्रतिनिधित्व करने वाला यह मंदिर भारत के बड़े मंदिरों में से एक है. यह मंदिर एक पहाड़ी पर एक विशाल परिसर में निर्मित किया गया है. सात सौ फुट से अधिक ऊँचाई वाली दीवारों के अंदर निर्माण किए गए इस मंदिर के प्रमुख गोपुर की ऊँचाई 14 मंजिली इमारत के बराबर है.

यह पांचों शिव मंदिर एवं जमीन पर उनकी संरचना अक्षरशः चमत्कृत करने वाली है. इन पाँच में से तीन मंदिर एक सीधी रेखा में होना कोई साधारण संयोग नहीं हो सकता. तमिलनाडु के विशाल भूभाग पर इन मंदिरों का ऐसा सटीक निर्माण एक अदभुत घटना ही है. इन मंदिरों की रचना के माध्यम से निर्मित होने वाली कूट भाषा यदि हम आधुनिक काल में समझ पाते तो प्राचीन काल के अनेक रहस्य हमारे समक्ष खुल सकते थे…!!

– प्रशांत पोळ

June 29th 2019, 3:49 pm

पहलू खान के खिलाफ गोतस्करी के आरोप में चार्जशीट दाखिल

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राजस्थान सरकार ने पहलू खान और उसके बेटे के खिलाफ गैर कानूनी तरीक़े से मवेशी ले जाने के आरोप में चार्जशीट दाख़िल की है. पहलू ख़ान की एक अप्रैल 2017 को लोगों ने गौ तस्करी के संदेह में पहलू खान की पिटाई कर दी थी, जिसके कुछ दिन बाद अस्पताल में पहलू की मौत हो गई थी. लोगों का आरोप था कि गौवंश की तस्करी में शामिल है.

पुलिस ने इस मामले में दो FIR दर्ज की थी. एक FIR पहलू खान की हत्या के मामले में 8 लोगों के ख़िलाफ़ और दूसरी बिना कलेक्टर की अनुमति के गौवंश ले जाने पर पहलू और उसके परिवार के खिलाफ़ दर्ज हुई थी. दूसरे मामले में पहलू खान और उसके दो बेटों के खिलाफ़ अब चार्जशीट दाखिल की गई है. पहलू ख़ान की मौत हो चुकी है, ऐसे में उनके ख़िलाफ़ तो केस बंद हो जाएगा, लेकिन उनके बेटों के ख़िलाफ़ केस चलेगा.

पुलिस द्वारा कोर्ट में दाखिल चार्जशीट के अनुसार पहलू खान के खिलाफ राजस्थान में गोहत्या और तस्करी को लेकर जारी कानून के तहत धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है. राजस्थान के गौ जातीय पशु (वध निषेध और अस्थायी प्रवासन या निर्यात पर प्रतिबंध) अधिनियम, 1995 और नियम, 1995 की धारा 5, 8 और 9 के तहत पहलू खान व उनके बेटों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई है.

June 29th 2019, 8:48 am

ऋषि-मुनियों ने भारतीय संस्कृति, भारतीय जीवन मूल्यों के मापदंड का अनुसंधान किया

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नई दिल्ली. स्वदेशी जागरण मंच उत्तर प्रदेश उत्तराखंड क्षेत्र का राष्ट्रीय विचार वर्ग का 28 जून 2019 को मुख्य अतिथि विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित जी के कर कमलों से विधिवत उद्घाटन हुआ. स्वदेशी जागरण मंच उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड का राष्ट्रीय विचार वर्ग 28 से 30 जून 2019 तक चलेगा. राष्ट्रीय विचार वर्ग में पूर्वी उत्तर प्रदेश प्रांत,अवध प्रांत, पश्चिमी उत्तर प्रदेश प्रांत एवं उत्तराखंड प्रांत के 200 कार्यकर्ता 3 दिन प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे. वर्ग में 3 दिन में लगभग 11 तकनीकी सत्र चलेंगे, जिसमें देश के प्रतिष्ठित विद्वानों द्वारा स्वदेशी जागरण मंच के विभिन्न मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की जाएगी.

स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय विचार वर्ग का उद्घाटन करते हुए मुख्य अतिथि हृदय नारायण दीक्षित जी ने कहा कि नैमिषारण्य की यह पवित्र भूमि इस बात की गवाह है कि प्राचीन भारत में हमने चर्चाएं और पंचायतें की हैं. ऋषि-मुनियों के सान्निध्य में भारतीय जीवन, भारतीय संस्कृति के मापदंड, जीवन मूल्य और जीवन चर्या के लिए आवश्यक मूल्यों का अनुसंधान किया तथा उनको जीवन में उतारने के लिए आवश्यक जीवन चर्या का मार्ग तय किया. नैमिषारण्य की पवित्र तपोभूमि पर स्वदेशी जागरण मंच के कार्यकर्ताओं का यह विचार वर्ग निश्चित तौर पर देश में स्वदेशी के विचार को आगे ले जाने का एक मजबूत वैचारिक मार्ग तय करेगा.

राष्ट्रीय संयोजक अरुण ओझा ने उद्घाटन सत्र में कहा कि भारत की आजादी के बाद जो रास्ता हमारी सत्ता ने तय किया, वह हमारी जमीन से जुड़ा हुआ नहीं था. जिसका परिणाम हुआ कि हम विकास के ऐसे पथ पर अग्रसर हुए जो हमारे विनाश का मार्ग साबित हुआ. इसके प्रमाण आपको समाज में, प्रकृति में और हमारी तमाम व्यवस्थाओं में विसंगतियों के रूप में देखने को आसानी से मिल जाएंगे. आजादी के बाद सत्ता के दृष्टि का मतिभ्रम ही था कि हम जनस्वास्थ्य के लिए अपने परंपरागत मार्ग को त्याग कर एक ऐसे रास्ते पर चल पड़े, जिसमें आज हमारा देश शुगर बीपी और डिप्रेशन के एक माया जाल में उलझ गया है.

एक सत्र में अखिल भारतीय संगठक कश्मीरी लाल जी ने दैनिक जीवन में किस प्रकार से स्वदेशी को उपयोग में लाया जाए, जनसंख्या के आधार पर दैनिक रोजमर्रा के सामान क्रय करने पर प्रति व्यक्ति की स्वदेशी ओर विदेशी क्रय को तुलना की गई.

उद्घाटन सत्र में स्वदेशी जागरण मंच के अखिल भारतीय संगठक कश्मीरी लाल, अखिल भारतीय विचार विभाग प्रमुख सतीश जी, राष्ट्रीय सह संयोजक डॉ. अश्विनी महाजन, सहित अन्य उपस्थित रहे.

उद्घाटन सत्र का संचालन क्षेत्रीय विचार विभाग प्रमुख अजय कुमार जी ने किया.

June 29th 2019, 7:10 am

29 जून / पुण्यतिथि – देहदानी : शिवराम जोगलेकर जी

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नई दिल्ली. वर्ष 1943 की बात है. द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी ने युवा प्रचारक शिवराम जोगलेकर से पूछा – क्यों शिवराम, तुम्हें रोटी अच्छी लगती है या चावल ? उत्तर में शिवराम जी ने कुछ संकोच से कहा – गुरुजी, मैं संघ का प्रचारक हूं. रोटी या चावल, जो मिल जाए, वह खा लेता हूं. तब, श्री गुरुजी ने कहा – अच्छा, तो तुम चेन्नई चले जाओ, अब तुम्हें वहां संघ का काम करना है. इस प्रकार शिवराम जी संघ कार्य के लिए तमिलनाडु में आये, तो फिर अंतिम सांस भी उन्होंने वहीं ली.

शिवराम जी का जन्म 1917 में बागलकोट (कर्नाटक) में हुआ था. उनके पिता यशवंत जोगलेकर जी डाक विभाग में काम करते थे, पर जब शिवराम जी केवल एक वर्ष के थे, तब ही पिता का देहांत हो गया. ऐसे में उनका पालन मां सरस्वती जी जोगलेकर ने अपनी ससुराल सांगली में बड़े कष्टपूर्वक किया.

छात्र जीवन में वे अपने अध्यापक चिकोडीकर जी के राष्ट्रीय विचारों से बहुत प्रभावित हुए. उनके आग्रह पर शिवराम जी ने ‘वीर सावरकर’ के जीवन पर एक ओजस्वी भाषण भी दिया. युवावस्था में पूज्य मसूरकर महाराज की प्रेरणा से शिवराम जी ने जीवन भर देश की ही सेवा करने का व्रत ले लिया. सांगली में पढ़ते समय वर्ष 1932 में डॉ. हेडगेवार जी के दर्शन के साथ ही उनके जीवन में संघ यात्रा प्रारम्भ हुई. वर्ष 1936 में इंटर उत्तीर्ण कर पुणे आ गये. यहां उन्हें नगर कार्यवाह की जिम्मेदारी दी गयी. 1938 में बीएससी पूर्ण कर उन्होंने ‘वायु में धूलकणों की गति’ पर एक लघु शोध प्रबंध भी लिखा.

21 जून, 1940 को जब उन्हें डॉ. हेडगेवार जी के देहांत का समाचार मिला, उस दौरान पुणे में मौसम विभाग की प्रयोगशाला में काम कर रहे थे. उन्होंने तत्काल प्रचारक बनने का निश्चय कर लिया, पर पुणे के संघचालक विनायकराव जी आप्टे ने पहले उन्हें अपनी शिक्षा पूरी करने का आग्रह किया. अतः शिवराम जी वर्ष 1942 में स्वर्ण पदक के साथ एमएससी की डिग्री हासिल कर प्रचारक बने.

सर्वप्रथम उन्हें मुंबई भेजा गया और फिर वर्ष 1943 में चेन्नई. तमिलनाडु संघ कार्य के लिए प्रारम्भ में बहुत कठिन क्षेत्र था. वहां के राजनेताओं ने जनता में यह भ्रम निर्माण किया था कि उत्तर भारत वालों ने सदा से हमें दबाकर रखा है. वहां हिन्दी के साथ ही हिन्दू का भी व्यापक विरोध होता था. ऐसे वातावरण में शिवराम जी ने सर्वप्रथम मजदूर वर्ग के बीच शाखाएं प्रारम्भ कीं. इसके लिए उन्होंने व्यक्तिगत संबंध बनाने पर अधिक जोर दिया. उन दिनों संघ के पास पैसा तो था नहीं, अतः शिवराम जी पैदल घूमते हुए नगर की निर्धन बस्तियों तथा निकटवर्ती गांवों में सम्पर्क करते थे. वहां की पेयजल, शिक्षा, चिकित्सा जैसी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उन्होंने अनेक सेवा केन्द्र प्रारम्भ किये. इससे उनके उठने-बैठने और भोजन-विश्राम के स्थान  क्रमशः बढ़ने लगे. इसमें से ही फिर कुछ शाखाएं भी प्रारम्भ हुईं. सेवा से हिन्दुत्व जागरण एवं शाखा प्रसार का यह प्रयोग अभिनव था.

शिवराम जी अपने साथ समाचार पत्र रखते थे तथा गांवों में लोगों को उसे पढ़कर सुनाते. वे शिक्षित लोगों को सम्पादक के नाम पत्र लिखने को प्रेरित करते थे. इसमें से ही आगे चलकर ‘विजिल’ नामक संस्था की स्थापना हुई. इस प्रकल्प से हजारों शिक्षित लोग संघ से जुड़े. आज तमिलनाडु में संघ कार्य का जो सुदृढ़ आधार है, उसके पीछे शिवराम जी की ही साधना है. 60 वर्ष तक तमिलनाडु में संघ के विविध दायित्व निभाते हुए 29 जून, 1999 को शिवराम जी का देहांत हुआ. उनकी इच्छानुसार मृत्योपरांत उनकी देह चिकित्सा कार्य के लिए दान कर दी गयी.

June 28th 2019, 7:05 pm

पृथ्वी-2 मिसाइल का सफल रात्रि परीक्षण, 350 किमी तक वार करने में सक्षम

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भारत ने स्वदेश में विकसित परमाणु क्षमता युक्त मिसाइल पृथ्वी-द्वितीय का बृहस्पतिवार रात को सफल परीक्षण किया. यह परीक्षण सेना के यूजर ट्रायल का हिस्सा है. यह मिसाइल 350 किलोमीटर तक वार करने में सक्षम है.

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा विकसित और परमाणु आयुध ले जाने में सक्षम सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल का रात करीब साढ़े आठ बजे चांदीपुर स्थित एकीकृत परीक्षण केंद्र के प्रक्षेपण परिसर-3 से परीक्षण किया गया.

यह अत्याधुनिक मिसाइल 350 किलोमीटर की दूरी तक मार कर सकती है तथा 500 से एक हजार किलोग्राम तक वजनी मुखास्त्र (वारहेड्स) ले जाने में सक्षम है. इसमें लगे दो इंजन इसकी क्षमता को और बढ़ाते हैं. इसमें लक्ष्य को भेदने के लिए आधुनिक जड़त्वीय दिशा-निर्देशन प्रणाली लगी है और यह अपने प्रक्षेपण पथ पर बड़ी कुशलता से आगे बढ़ती है.

पृथ्वी को एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम के तहत विकसित किया गया है. इस परीक्षण के अवसर पर डीआरडीओ के कई वैज्ञानिक और आईटीआर के अधिकारी उपस्थित थे.

June 28th 2019, 5:54 am

कारगिल युद्ध के अमर बलिदानी – कैप्टन विजयंत थापर, मेजर पद्मपाणि आचार्य, कैप्टन नेइकझुको केंगरुस, मेज

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अमर बलिदानी कैप्टन विजयंत थापर

कैप्टन विजयंत थापर की बटालियन ने जब 13 जून 1999 को तोलोलिंग जीता, तब वो कारगिल में भारतीय सेना की पहली बड़ी विजय थी.

22 साल की उम्र में अमर बलिदानी विजयंत थापर ने जी भर के ज़िन्दगी जी. खेले, प्यार किया, अपनी पसंद के पेशे को चुना और जब मौका आया, वतन के लिए जान देने से पीछे नहीं हटे. 26 दिसंबर 1976 को जन्मे विजयंत सैनिक परिवार से थे. परदादा डॉ. कैप्टन कर्ता राम थापर, दादा जेएस थापर और पिता कर्नल वीएन थापर सब फौज में थे. इसलिए विजयंत क्या बनेंगे, ये सवाल कभी उनके मन में उठा ही नहीं. वो ‘बॉर्न सोल्जर’ थे. जब उनके पिता रिटायर हुए, लगभग तभी उन्होंने कमिशन लिया, 2 राजपूताना राइफल्स में, दिसंबर 1998 में. तब से बमुश्किल 6 महीने पहले जब पाकिस्तान ने वादाखिलाफ़ी करते हुए गैरकानूनी ढंग से कारगिल की चोटियों पर कब्ज़ा कर लिया. कुपवाड़ा में आतंक विरोधी अभियान चला रही विजयंत की यूनिट को घुसपैठियों को भगाने तोलोलिंग की ओर द्रास भेजा गया.

इसके बाद उन्हें नोल एंड लोन हिल पर ‘थ्री पिम्पल्स’ से दुश्मन को खदेड़ने की ज़िम्मेदारी मिली. चांदनी रात में पूरी तरह से दुश्मन की फायरिंग रेंज में होने के बावजूद विजयंत आगे बढ़ते रहे. विजयंत थापर ‘थ्री पिम्पल्स’ जीत गए, लेकिन इस अभियान में देश ने अमर सपूत विजयंत को खो दिया. उन्होंने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया.

मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित कैप्टन विजयंत थापर ने बलिदान से पहले 13 जून 1999 को तोलोलिंग की पहाड़ियों पर जीत का झंडा फहराया था. ये महत्वपूर्ण जीत करगिल की जंग के दौरान भारत के लिए निर्णायक साबित हुई.

कैप्टन विजंयत के कमरे में वो यूनिफॉर्म आज भी टंगी है, जो उनकी शहादत के बाद करगिल से भेजी गई थी. तोलोलिंग की उस चोटी की तस्वीर भी लगी है, जिस पर उन्होंने जीत का तिरंगा फहराया था. कमरे में शहीद विजयंत की तस्वीरें और उनसे जुड़ी तमाम चीजें आज भी वैसे ही रखी हैं.

अमर बलिदानी कैप्टन नेइकझुको केंगुरुस

जब घायल केंगुरुस ने दुश्मनों को घुटने के बल पर टेकने के लिए मजबूर कर दिया.

वर्ष 1999 में, जब कारगिल युद्ध शुरू हुआ, तो कप्तान केंगुरुस राजपूताना राइफल्स बटालियन में जूनियर कमांडर थे. अपने दृढ़ संकल्प और कौशल के लिए, उन्हें घातक पलटन बटालियन का मुख्य कमांडर बनाया गया था. शारीरिक रूप से फिट और प्रेरित सैनिक ही इस पलटन में जगह बना सकते हैं. 28 जून 1999 की रात को इस पलटन को ब्लैक रॉक पर दुश्मन द्वारा रखी मशीन गन पोस्ट को हासिल करना था. इसकी फायरिंग के चलते भारतीय सेना उस क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ पा रही थी. जैसे ही कमांडो पलटन ने चट्टान को पार किया, उन पर मोर्टार और ऑटोमेटिक गन फायरिंग होने लगी. जिसमें सभी सैनिकों को चोटें आईं. कप्तान केंगुरुस को भी पेट में गोली लगी. अपनी चोट के बावजूद उन्होंने अपनी सेना को आगे बढ़ते रहने को कहा. जब वे अंतिम चट्टान पर पहुंच गए तो उनके और दुश्मन पोस्ट के बीच केवल एक दीवार थी. उनके सैनिक आगे बढ़ें और इस दीवार को भी पार करें, इसके लिए कप्तान केंगुरुस ने एक रस्सी जुटाई. हालाँकि, बर्फीली चट्टान पर उनके जूते फिसल रहे थे. वे चाहते तो आसानी से वापस जाकर अपना इलाज करवा सकते थे. लेकिन कप्तान केंगुरुस ने कुछ अलग करने की ठानी थी. 16,000 फीट की ऊंचाई पर और -10 डिग्री सेल्सियस के ठंडे तापमान में, कप्तान केंगुरुस ने अपने जूते उतार दिए. उन्होंने नंगे पैर रस्सी की पकड़ बना कर आरपीजी रॉकेट लॉन्चर के साथ ऊपर चढ़ाई की.

ऊपर पहुंचने के बाद, उन्होंने सात पाकिस्तानी बंकरों पर रॉकेट लॉन्चर फायर किया. पाकिस्तान ने गोलीबारी से जवाब दिया, लेकिन उन्होंने भी तब तक गोलीबारी की जब तक कि पाकिस्तानी बंकरों को खत्म नहीं कर दिया. इसी बीच दो दुश्मन सैनिक उनके पास आ पहुंचे थे, जिन्हें उन्होंने लड़ते हुए चाकू से मार गिराया. लेकिन दुश्मन की गोली लगने से वे भी चट्टान से गिर गए. पर, उनके कारण बाकी सेना को दुश्मन पर हमला बोलने का मौका मिल गया. मिशन पूरा करने के बाद जब उनके साथियों ने नीचे गहराई में देखा, जहां उनके कैप्टन साहब का मृत शरीर पड़ा था, तो उन्होंने आंसुओं के साथ ये जीत उन्हें समर्पित की.

 कारगिल में मेजर पद्मपाणि आचार्य का पराक्रम

28 जून 1 999 को, राजपूताना राइफल्स के मेजर पद्मपाणि आचार्य को कंपनी कमांडर के रूप में दुश्मन के कब्जे वाली अहम चौकी को मुक्त कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई. यहां दुश्मन न सिर्फ अत्याधुनिक हथियारों से लैस था, बल्कि माइंस बिछा रखी थी. मेजर पद्मपाणि की अगुवाई में फोर्स ने फायरिंग और गोलों की बारिश के बीच अपना अभियान जारी रखा. मेजर पद्मपाणि को कई गोलियां लग चुकी थीं, इसके बावजूद वो आगे बढ़ते रहे और साहस से पाकिस्तानियों को खदेड़ कर चौकी पर कब्जा किया, हालांकि खुद मेजर पद्मपाणि इस मिशन को पूरा करने के बाद बलिदान हो गए. मेजर पद्मपाणि को पराक्रम के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया.

अमर बलिदानी मेजर अजय सिंह जसरोटिया

अपनी जान देकर 6 साथियों की जान बचाई

लेह हाईवे पर 17 हजार फीट ऊंची तोलोलिंग चोटी पर कब्जा जमाए बैठे पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों की लगातार जारी बमबारी के बीच मेजर अजय जसरोटिया ने दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दिया. खुद गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद अपने छह घायल साथियों को बमबारी के बीच से सुरक्षित निकाल कर खुद को मातृभूमि की बलिवेदी को समर्पित कर दिया. मेजर अजय जसरोटिया को ऑपरेशन विजय में अदम्य साहस का प्रदर्शन करने पर सेना मेडल से (मरणोपरांत) सम्मानित किया गया.

13 अप्रैल 1971 में बीएसएफ के डीआईजी रहे अर्जुन सिंह जसरोटिया के घर पैदा हुए मेजर अजय सिंह जसरोटिया के दादा ले. कर्नल खजूर सिंह भी भारतीय सेना में अपनी बहादुरी का परिचय दे चुके थे. अपने परिवार की गौरव गाथा को आगे बढ़ाते हुए 1996 में अजय सिंह जसरोटिया भारतीय सेना में शामिल हुए.

सेना में शामिल होने के तीन साल बाद ही वह दिन आ गया, जिसका हर सैनिक को बेसब्री से इंतजार रहता है. ऑपरेशन विजय में उन्हें मातृ भूमि की सेवा करने का मौका मिला और उन्होंने देश की एकता और अखंडता के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया.

हम अमर बलिदानी कारगिल नायकों का पुण्य स्मरण करते हुए उन्हें शत-शत नमन करते हैं.

June 28th 2019, 3:06 am

28 जून / जन्मदिवस – अपना सर्वस्व दान करने वाला अनुपम दानी भामाशाह

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नई दिल्ली. दान की चर्चा होते ही भामाशाह का चरित्र स्वयं ही आंखों के सामने आ जाता है. देश के लिए सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाला दूसरे उदाहरण कम ही मिलेंगे. देश रक्षा के लिए महाराणा प्रताप के चरणों में अपनी सब जमा पूंजी अर्पित करने वाले दानवीर भामाशाह का जन्म अलवर (राजस्थान) में 28 जून, 1547 को हुआ था. उनके पिता भारमल्ल तथा माता कर्पूरदेवी थीं. भारमल्ल राणा सांगा के समय रणथम्भौर के किलेदार थे. अपने पिता की तरह भामाशाह भी राणा परिवार के लिए समर्पित थे. एक समय ऐसा आया, जब अकबर से लड़ते हुए राणा प्रताप को अपनी प्राणप्रिय मातृभूमि का त्याग करना पड़ा. वे अपने परिवार सहित जंगलों में रह रहे थे. महलों में रहने और सोने चांदी के बर्तनों में स्वादिष्ट भोजन करने वाले महाराणा प्रताप के परिवार को अपार कष्ट उठाने पड़ रहे थे. राणा को बस एक ही चिन्ता थी कि किस प्रकार फिर से सेना जुटाएं, जिससे अपने देश को मुगल आक्रमणकारियों के चंगुल से मुक्त करा सकें.

पर, इसमें राणा के सम्मुख सबसे बड़ी समस्या धन की थी. उनके साथ जो विश्वस्त सैनिक थे, उन्हें भी काफी समय से वेतन नहीं मिला था. कुछ लोगों ने राणा को आत्मसमर्पण करने की सलाह दी, पर राणा जैसे देशभक्त एवं स्वाभिमानी को यह स्वीकार नहीं था. भामाशाह को जब राणा प्रताप के कष्टों का पता लगा, तो उनका मन भर आया. भामाशाह के पास स्वयं का तथा पुरखों का कमाया हुआ अपार धन था. उन्होंने यह सब राणा के चरणों में अर्पित कर दिया. इतिहासकारों के अनुसार उन्होंने 25 लाख रुपए तथा 20,000 अशर्फी राणा को दीं. राणा ने आंखों में आंसू भरकर भामाशाह को गले से लगा लिया.

राणा की पत्नी महारानी अजवान्दे ने भामाशाह को पत्र लिखकर इस सहयोग के लिए कृतज्ञता व्यक्त की. इस पर भामाशाह रानी जी के सम्मुख उपस्थित हो गये और नम्रता से कहा कि मैंने तो अपना कर्त्तव्य निभाया है. यह सब धन मैंने देश से ही कमाया है. यदि यह देश की रक्षा में लग जाये, तो यह मेरा और मेरे परिवार का अहोभाग्य ही होगा. महारानी यह सुनकर क्या कहतीं, उन्होंने भामाशाह के त्याग के सम्मुख सिर झुका दिया.

उधर, जब अकबर को यह घटना पता लगी, तो वह भड़क गया. वह सोच रहा था कि सेना के अभाव में राणा प्रताप उसके सामने झुक जायेंगे, पर इस धन से राणा को नयी शक्ति मिल गयी. अकबर ने क्रोधित होकर भामाशाह को पकड़ लाने को कहा. अकबर को उसके कई साथियों ने समझाया कि एक व्यापारी पर हमला करना उसे शोभा नहीं देता. इस पर उसने भामाशाह को कहलवाया कि वह उसके दरबार में मनचाहा पद ले ले और राणा प्रताप को छोड़ दे, पर दानवीर भामाशाह ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया. इतना ही नहीं उन्होंने अकबर से युद्ध की तैयारी भी कर ली. यह समाचार मिलने पर अकबर ने अपना विचार बदल दिया.

भामाशाह से प्राप्त धन के सहयोग से राणा प्रताप ने नयी सेना बनाकर अपने क्षेत्र को मुक्त करा लिया. भामाशाह जीवन भर राणा की सेवा में लगे रहे. महाराणा के देहान्त के बाद उन्होंने उनके पुत्र अमरसिंह के राजतिलक में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी. इतना ही नहीं, जब उनका अन्त समय निकट आया, तो उन्होंने अपने पुत्र को आदेश दिया कि वह अमरसिंह के साथ सदा वैसा ही व्यवहार करे, जैसा उन्होंने राणा प्रताप के साथ किया है.

June 27th 2019, 6:13 pm

24 जून, 1990, इस्लामिक आतंकियों व अस्पतालों के मध्य साजिश की कहानी

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जब एक मेधावी छात्र गोलियों से छलनी कर दिया गया, और श्रीनगर के अस्पतालों ने भर्ती करने से इंकार कर दिया

1990 के दशक में कश्मीर घाटी में इस्लामिक आतंकी कश्मीरी हिन्दुओं की जान के पीछे पड़े थे. हिन्दुओं को खदेड़ने में आतंकियों का साथ सरकारी संस्थानों में बैठे अधिकारी, कर्मचारी भी खुलकर दे रहे थे. सबको लग रहा था कि कश्मीर में निजाम-ए-मुस्तफा आना तय है.इसीलिए खौफ से या फिर समर्थन से सरकारी कर्मचारियों का एक बड़ा तबका आतंकियों के साथ था.

25 साल के अश्विनी कुमार, अपने माता-पिता और दो भाई-बहन के साथ श्रीनगर के छत्ताबल में रहते थे. चार्टर्ड अकाउंटेंट की पढ़ाई कर रहा अश्विनी एक मेधावी छात्र था. पड़ोसियों और आतंकियों को शक होने लगा कि वो सरकार के लिए मुखबिरी कर रहा है. 24 जून, 1990 को जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के 5 आतंकी मुंह ढंककर अश्विनी के घर में घुसे और स्टडी रूम में पढ़ाई कर रहे अश्विनी पर आरोप लगाया कि वो सरकारी इन्फॉर्मर है और इलाके में इस्लामिक आतंकियों के मूवमेंट की खबर सुरक्षा एजेंसियों को देता. अश्विनी ने इंकार किया तो आतंकी अश्विनी के पेट और सिर में 5 गोलियां मारकर फरार हो गए.

05 गोलियां लगने के बाद भी अश्विनी की सांस चल रही थी. घर से अस्पताल पहुंचने के लिए कोई साधन नहीं था. अश्विनी के पिता शंभूनाथ लोकल पुलिस थाने पहुंचे, गिड़गिड़ाए कि उनके घायल बेटे को अस्पताल पहुंचाया जाए. लेकिन थानेदार ने उनकी कोई मदद नहीं की. उल्टे मज़ाक उड़ाया.

बुरी तरह घबराए परिवारजनों ने घायल अश्विनी को किसी तरह श्रीनगर के SMHS अस्पताल तक पहुंचाया. लेकिन अस्पताल ने भरती करने से मना कर दिया. इसके बाद परिजन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, सौरा लेकर गए. लेकिन यहां भी डॉक्टर्स ने अश्विनी को चेक नहीं किया और मर जाने दिया. इसके बाद जब अश्विनी के पोस्टमार्टम के लिए शव जवाहर लाल नेहरू मेमोरियल अस्पताल, रैनावारी ले जाया गया. यहां भी अश्विनी के घरवालों को शव के लिए घंटों इंतजार करवाया गया, यहां तक कि उन्हें शव देने के लिए पैसे भी मांगे गए.

यह घटना साबित करती है कि कैसे सरकारी संस्थानों में बैठे कर्मचारी आतंकियों की मदद कर रहे थे. जिससे कश्मीरी हिन्दुओं में अविश्वास पैदा हुआ. नतीज़ा यह रहा कि अगले कुछ सालों में ढाई लाख से ज्यादा कश्मीरी हिन्दुओं को घाटी हमेशा के लिए छोड़नी पड़ी.

June 27th 2019, 8:13 am

भारत की कूटनीतिक जीत, एशिया पैसिफिक ग्रुप के 55 देशों ने UNSC में नॉन-परमानेंट सीट के लिए समर्थन किय

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यूनाइटेड नेशंस में भारत ने एक और बड़ी कूटनीतिक जीत हासिल की है. एशिया पैसिफिक ग्रुप के तमाम 55 देशों ने UNSC में साल 2021-2022 के 2 साल की समायावधि के लिए तय नॉन परमानेंट सीट का समर्थन किया है. खास बात यह है कि समर्थन करने वाले देशों में चीन, पाकिस्तान, ईरान, जापान, मलेशिया, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश शामिल हैं. चीन और पाकिस्तान के समर्थन को बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है. यूएन में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरूद्दीन ने ट्वीट कर तमाम देशों का आभार व्यक्त किया है.

भारत इससे पहले यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में अस्थायी सदस्य के तौर पर 1950-51, 1957-68, 1972-73, 1977-78, 1984-85, 1991-92 और 2011-12 में चुना जा चुका है. भारत सरकार ने किर्गीस्तान में पिछले महीने हुई शंघाई कॉपरेशन ऑर्गनाइज़ेशन की बैठक के दौरान ही 2 साल टर्म के लिए प्रयास शुरू कर दिये थे, परिणामस्वरूप भारत को सफलता मिली है. अक्तूबर 2010 में भारत यूएन में 2011-12 टर्म के लिए 190 में से 187 वोट पाने में सफल रहा था.

June 27th 2019, 6:18 am

अस्थायी है आर्टिकल 370, गृह मंत्रालय का स्पष्ट उत्तर

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जम्मू कश्मीर से संबंधित भारतीय संविधान के प्रावधान आर्टिकल 370 को लेकर मोदी सरकार की राय बेहद सपाट और स्पष्ट है. राज्य सभा में सांसदों द्वारा पूछे गए प्रश्नों को उत्तर में भी गृह मंत्रालय ने वही तथ्य दोहराया है कि आर्टिकल 370 एक अस्थायी और ट्रांज़िशनल प्रोविज़न है. यानि देर-सवेर इसका हटना संविधान के अनुरूप तय है.

दरअसल ताजा मामले में कांग्रेस की राज्यसभा सांसद छाया वर्मा, सुखराम सिंह यादव और विशम्भर प्रसाद निषाद के अलावा बीजेपी सांसद प्रभात झा ने आर्टिकल 370 की मौजूदा संवैधानिक स्थिति की स्पष्टता का सवाल पूछा था. जिसके जवाब में गृह मंत्रालय ने सीधे शब्दों में 370 को अस्थायी प्रावधान करार दिया है.

June 27th 2019, 3:36 am

27 जून / पुण्यतिथि – कर्तव्य व अनुशासनप्रिय दादाराव परमार्थ

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नई दिल्ली. बात एक अगस्त, 1920 की है. लोकमान्य तिलक के देहान्त के कारण पूरा देश शोक में डूबा था. संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी किसी कार्य से घर से निकले. उन्होंने देखा कुछ लड़के सड़क पर गेंद खेल रहे हैं. डॉ. जी क्रोध में उबल पड़े – तिलक जी जैसे महान् नेता का देहान्त हो गया और तुम्हें खेल सूझ रहा है. सब बच्चे सहम गये. इन्हीं में एक थे गोविन्द सीताराम परमार्थ, जो आगे चलकर दादाराव परमार्थ के नाम से प्रसिद्ध हुए.

दादाराव का जन्म नागपुर के इतवारी मौहल्ले में 1904 में हुआ था. इनके पिता डाक विभाग में काम करते थे. केवल चार वर्ष की अवस्था में दादाराव जी की मां का देहान्त हो गया. पिताजी ने दूसरा विवाह कर लिया. इस कारण से दादाराव को मां के प्यार के बदले सौतेली मां की उपेक्षा ही अधिक मिली. मैट्रिक में पढ़ते समय इनका सम्पर्क क्रान्तिकारियों से हो गया. साइमन कमीशन के विरुद्ध आन्दोलन के समय पुलिस इन्हें पकड़ने आयी, पर ये फरार हो गये. पिताजी ने इन्हें परीक्षा देने के लिए पंजाब भेजा, पर परीक्षा में उत्तर पुस्तिका अंग्रेजों की आलोचना से भर दी. ऐसे में परिणाम क्या होना था, यह स्पष्ट है.

दादाराव का सम्बन्ध भगतसिंह तथा राजगुरू से भी था. भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी के बाद हुई तोड़फोड़ में पुलिस इन्हें पकड़कर ले गयी थी. जब इनका सम्बन्ध डॉ. हेडगेवार जी से अधिक हुआ, तो दादाराव संघ के लिए पूरी तरह समर्पित हो गये. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रारम्भ में डॉ. हेडगेवार जी के साथ काम करने वालों में बाबासाहब आप्टे तथा दादाराव परमार्थ प्रमुख थे. वर्ष 1930 में जब डॉ. साहब ने जंगल सत्याग्रह में भाग लिया, तो दादाराव भी उनके साथ गये तथा अकोला जेल में रहे.

दादाराव बहुत उग्र स्वभाव के थे. पर उनके भाषण बहुत प्रभावी होते थे. उनकी अंग्रेजी बहुत अच्छी थी. भाषण देते समय वे थोड़ी देर में ही उत्तेजित हो जाते थे और अंग्रेजी बोलने लगते थे. दादाराव को संघ की शाखाएं प्रारम्भ करने हेतु मद्रास, केरल, पंजाब आदि कई स्थानों पर भेजा गया. डॉ. हेडगेवार जी के प्रति उनके मन में अटूट श्रद्धा थी. कानपुर में एक बार शाखा पर डॉ. जी के जीवन के बारे में उनका भाषण था, इसके बाद उन्हें अगले स्थान पर जाने के लिए रेल पकड़नी थी. पर, वे बोलते हुए इतने तल्लीन हो गये कि समय का ध्यान ही नहीं रहा, परिणामस्वरूप रेल छूट गयी.

वर्ष 1963 में बरेली के संघ शिक्षा वर्ग में रात्रि कार्यक्रम में डॉ. जी के बारे में दादाराव को बोलना था. कार्यक्रम का समय सीमित था. अतः वे एक घण्टे बाद बैठ गये, पर उन्हें रात भर नींद नहीं आयी. रज्जू भैया उस समय प्रान्त प्रचारक थे. दो बजे उनकी नींद खुली, तो देखा दादाराव टहल रहे हैं. पूछने पर वे बोले – तुमने डॉ. जी की याद दिला दी. ऐसा लगता है मानो बांध टूट गया है और अब वह थमने का नाम नहीं ले रहा. फिर कभी मुझे रात में इस बारे में बोलने को मत कहना.

दादाराव अनुशासन के बारे में बहुत कठोर थे. स्वयं को कितना भी कष्ट हो, पर निर्धारित काम होना ही चाहिए. वे प्रचारकों को भी कभी-कभी दण्ड दे देते थे, पर अन्तर्मन से वे बहुत कोमल थे. वर्ष 1963 में सोनीपत संघ शिक्षा वर्ग से लौटकर वे दिल्ली कार्यालय पर आये. वहीं उन्हें बहुत तेज बुखार हो गया. इलाज के बावजूद 27 जून, 1963 को उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया.

June 26th 2019, 6:30 pm

26 जून / जन्मदिवस – वन्देमातरम् के रचयिता बंकिमचन्द्र चटर्जी

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नई दिल्ली. भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में वन्देमातरम् नामक जिस महामन्त्र ने उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक जन-जन को उद्वेलित किया, उसके रचियता बंकिमचन्द्र चटर्जी का जन्म ग्राम कांतलपाड़ा, जिला हुगली, पश्चिम बंगाल में 26 जून, 1838 को हुआ था. प्राथमिक शिक्षा हुगली में पूर्ण कर उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय के प्रेसीडेंसी कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की. पढ़ाई के साथ-साथ छात्र जीवन से ही उनकी रुचि साहित्य के प्रति भी थी.

शिक्षा पूर्ण कर उन्होंने प्रशासनिक सेवा की परीक्षा दी और उसमें उत्तीर्ण होकर वे डिप्टी कलेक्टर बन गये. सेवा में आने वाले वे प्रथम भारतीय थे. नौकरी के दौरान ही उन्होंने लिखना प्रारम्भ किया. पहले वे अंग्रेजी में लिखते थे. उनका अंग्रेजी उपन्यास ‘राजमोहन्स वाइफ’ भी खूब लोकप्रिय हुआ, पर आगे चलकर वे अपनी मातृभाषा बंगला में लिखने लगे. 1864 में उनका पहला बंगला उपन्यास ‘दुर्गेश नन्दिनी’ प्रकाशित हुआ. यह इतना लोकप्रिय हुआ कि इसके पात्रों के नाम पर बंगाल में लोग अपने बच्चों के नाम रखने लगे. इसके बाद 1866 में ‘कपाल कुण्डला’ और 1869 में ‘मृणालिनी’ उपन्यास प्रकाशित हुए. 1872 में उन्होंने ‘बंग दर्शन’ नामक पत्र का सम्पादन भी किया, पर उन्हें अमर स्थान दिलाया ‘आनन्द मठ’ नामक उपन्यास ने, जो 1882 में प्रकाशित हुआ.

आनन्द मठ में देश को मातृभूमि मानकर उसकी पूजा करने और उसके लिए तन-मन और धन समर्पित करने वाले युवकों की कथा थी, जो स्वयं को ‘सन्तान’ कहते थे. इसी उपन्यास में वन्देमातरम् गीत भी समाहित था. इसे गाते हुए वे युवक मातृभूमि के लिए मर मिटते थे. जब यह उपन्यास बाजार में आया, तो वह जन-जन का कण्ठहार बन गया. इसने लोगों के मन में देश के लिए मर मिटने की भावना भर दी. वन्देमातरम् सबकी जिह्ना पर चढ़ गया. 1906 में अंग्रेजों ने बंगाल को हिन्दू तथा मुस्लिम आधार पर दो भागों में बांटने का षड्यन्त्र रचा. इसकी भनक मिलते ही लोगों में क्रोध की लहर दौड़ गयी. 7 अगस्त, 1906 को कोलकाता के टाउन हाल में एक विशाल सभा हुई, जिसमें पहली बार यह गीत गाया गया. इसके एक माह बाद 7 सितम्बर को वाराणसी के कांग्रेस अधिवेशन में भी इसे गाया गया. इससे इसकी गूंज पूरे देश में फैल गयी. फिर क्या था, स्वतन्त्रता के लिए होने वाली हर सभा, गोष्ठी और आन्दोलन में वन्देमातरम् का नाद होने लगा.

यह देखकर शासन के कान खड़े हो गये. उसने आनन्द मठ और वन्देमातरम् गान पर प्रतिबन्ध लगा दिया. इसे गाने वालों को सार्वजनिक रूप से कोड़े मारे जाते थे, लेकिन प्रतिबन्धों से भला भावनाओं का ज्वार कभी रुक सका है ? अब इसकी गूंज भारत की सीमा पारकर विदेशों में पहुंच गयी. क्रान्तिवीरों के लिए यह उपन्यास गीता तथा वन्देमातरम् महामन्त्र बन गया. वे फांसी पर चढ़ते समय यही गीत गाते थे. इस प्रकार गीत ने भारत के स्वाधीनता संग्राम में अतुलनीय योगदान दिया.

बंकिम के प्रायः सभी उपन्यासों में देश और धर्म के संरक्षण पर बल रहता था. उन्होंने विभिन्न विषयों पर लेख, निबन्ध और व्यंग्य भी लिखे. इससे बंगला साहित्य की शैली में आमूल चूल परिवर्तन हुआ. 8 अप्रैल, 1894 को उनका देहान्त हो गया. स्वतन्त्रता मिलने पर वन्देमातरम् को राष्ट्रगान के समतुल्य मानकर राष्ट्रगीत का सम्मान दिया गया.

June 25th 2019, 7:25 pm

25 जून / इतिहास स्मृति – …..और अंग्रेज सेना को करना पड़ा समर्पण

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नई दिल्ली. जिन अंग्रेजों के अत्याचार की पूरी दुनिया में चर्चा होती है,  भारतीय वीरों ने कई बार उनके छक्के छुड़ाए थे. ऐसे कई प्रसंग इतिहास के पृष्ठों पर सुरक्षित हैं. ऐसा ही एक स्वर्णिम पृष्ठ कानपुर (उ.प्र.) से सम्बन्धित है.

वर्ष 1857 में जब देश के अनेक भागों में भारतीय वीरों ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल बजा दिया, तो इसकी आंच से कानपुर भी सुलग उठा. यहां अंग्रेज इतने भयभीत थे कि 24 मई, 1857 को रानी विक्टोरिया की वर्षगांठ के अवसर पर हर साल की तरह तोपें नहीं दागी गयीं. अंग्रेजों को भय था कि इससे भारतीय सैनिक कहीं भड़क न उठें. फिर भी चार जून को पुराने कानपुर में क्रान्तिवीर उठ खड़े हुए. मेरठ के बाद सर्वाधिक तीव्र प्रतिकिया यहीं हुई थी. इससे अंग्रेज अधिकारी घबरा गये. वे अपने और अपने परिवारों के लिए सुरक्षित स्थान ढूंढने लगे. उस समय कानपुर का सैन्य प्रशासक मेजर जनरल व्हीलर था. वह स्वयं भी बहुत भयभीत था.

पुराने कानपुर को जीतने के बाद सैनिक दिल्ली की ओर चल दिये. जब ये सैनिक रात्रि में कल्याणपुर में ठहरे थे, तो नाना साहब पेशवा, तात्या टोपे और अजीमुल्ला खान भी इनसे आकर मिले. उन्होंने उन विद्रोही सैनिकों को समझाया कि कानपुर को इस प्रकार भगवान भरोसे छोड़कर आधी तैयारी के साथ दिल्ली जाने की बजाय पूरे कानपुर पर ही नियन्त्रण करना उचित है. जब नेतृत्व का प्रश्न आया, तो इसके लिए सबने नाना साहब को अपना नेता बनाया. नाना साहब ने टीका सिंह को मुख्य सेनापति बनाया और यह सेना कानपुर की ओर बढ़ने लगी. व्हीलर को जब यह पता लगा, तो वह सब अंग्रेज परिवारों के साथ प्रयाग होते हुए कोलकाता जाने की तैयारी करने लगा, पर भारतीय सैनिकों ने इस प्रयास को विफल कर दिया. इतना ही नहीं, उन्होंने गलियों और सड़कों पर ढूंढ-ढूंढकर अंग्रेजों को मारना प्रारम्भ कर दिया.

यह देखकर व्हीलर ने एक बैरक को किले का रूप दे दिया. यहां 210 अंग्रेज और 44 बाजा बजाने वाले भारतीय सैनिक, 100 सैन्य अधिकारी, 101 अंग्रेज नागरिक, 546 स्त्री व बच्चे अपने 25-30 भारतीय नौकरों के साथ एकत्र हो गये. नाना साहब ने व्हीलर को कानपुर छोड़ने की चेतावनी के साथ एक पत्र भेजा, पर जब इसका उत्तर नहीं मिला, तो उन्होंने इस बैरक पर हमला बोल दिया. 18 दिन तक लगातार यह संघर्ष चला. 14 जून को व्हीलर ने लखनऊ के जज गोवेन को एक पत्र लिखा. इसमें उसने कहा कि हम कानपुर के अंग्रेज मिट्टी के कच्चे घेरे में फंसे हैं. अभी तक तो हम सुरक्षित हैं, पर आश्चर्य तो इस बात का है कि हम अब तक कैसे बचे हुए हैं. हमारी एक ही याचना है सहायता, सहायता, सहायता. यदि हमें निष्ठावान 200 अंग्रेज सैनिक मिल जाएं, तो हम शत्रुओं को मार गिराएंगे.

पर, उस समय लखनऊ में भी इतनी सेना नहीं थी कि कानपुर भेजी जा सके. अन्ततः व्हीलर का किला ध्वस्त हो गया. इस संघर्ष में बड़ी संख्या में अंग्रेज सैनिक हताहत हुए. देश की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष कर रहे अनेक भारतीय सैनिक भी बलिदान हुए. 25 जून को व्हीलर ने बैरक पर आत्मसमर्पण का प्रतीक सफेद झण्डा लहरा दिया. वर्ष 1857 के संग्राम के बाद अंग्रेजों ने इस स्थान पर एक स्मृति चिन्ह (मैमोरियल क्रास) बना दिया, जो अब कानपुर छावनी स्थित राजपूत रेजिमेण्ट के परिसर में स्थित है.

June 24th 2019, 5:47 pm

आपातकाल, पुलिसिया कहर और संघ – भाग 3

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संघर्ष की भूमिगत सञ्चालन व्यवस्था

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 25 जून 1975 को समूचे देश में थोपा गया आपातकाल एक तरफा सरकारी अत्याचारों का पर्याय बन गया. इस सत्ता प्रायोजित आतंकवाद को समाप्त करने के लिए संघ द्वारा संचालित किया गया सफल भूमिगत आन्दोलन इतिहास का एक महत्वपूर्ण पृष्ठ बन गया. सत्ता के इशारे पर बेकसूर जनता पर जुल्म ढा रही पुलिस की नजरों से बचकर भूमिगत आन्दोलन का सञ्चालन करना कितना कठिन हुआ होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.

भूमिगत प्रेस

सरकार ने प्रेस की आजादी का गला घोंटकर आपातकाल से सम्बंधित सभी प्रकार की खबरों पर प्रतिबन्ध लगा दिया. जिन अख़बारों तथा पत्रिकाओं ने आपातकाल की घोषणा का समाचार छापा उन पर तुरन्त ताले जड़ दिए गये. राष्ट्रवादी अथवा प्रखर देशभक्त पत्रकारों को घरों से उठाकर जेलों में बंद कर दिया गया. जनसंघर्ष/ सत्याग्रह की सूचनाओं और समाचारों को जनता तक पहुँचाने के लिए संघ के कार्यकर्ताओं ने लोकवाणी, जनवाणी, जनसंघर्ष इत्यादि नामों से भूमिगत पत्र पत्रिकाएं प्रारंभ कर दी.

इन पत्र पत्रिकाओं को देर रात के अँधेरे में छापा जाता था. कहीं-कहीं तो हाथ से लिखकर भी पर्चे बांटे जाते थे. साइक्लो स्टाइल मशीन से छापे गये इन पत्रों को संघ के बाल स्वयंसेवक घर घर बांटने जाते थे. इन्हीं पत्रों में सत्याग्रह की सूचना, संख्या, स्थान इत्यादि की जानकारी होती थी. देश भर में छपने और बंटने वाले इन पत्रों ने तानाशाही की जड़ें हिलाकर रख दीं.

कई स्थानों पर छापे पड़े, कार्यकर्त्ता पकड़े गए, बाल स्वयंसेवक भी पत्र बांटते हुए गिरफ्तार कर लिए गए. देश के विभिन्न स्थानों पर 500 से ज्यादा बाल एवं शिशु स्वयंसेवकों को भी हिरासत में लेकर यातनाएं दी जाती थी. इन वीभत्स यातनाओं को बर्दाश्त करने वाले इन स्वयंसेवकों ने कहीं भी कोई भी जानकारी पुलिस को नहीं दी. भूमिगत पत्र पत्रिकाओं द्वारा आपातकाल में हो रहे पुलिसिया कहर की जानकारी आम जनता तक पहुंचा दी जाती थी.

भूमिगत बैठकें  

जनांदोलन को संचालित करने से सम्बंधित प्रत्येक प्रकार की व्यवस्था के लिए बैठकों का आयोजन होता था. ये बैठकें मंदिरों की छतों, पार्कों, जेल में जा चुके कार्यकर्ताओं के घरों, शमशान घाटों इत्यादि स्थानों पर होती थीं. भूमिगत कार्यकर्ताओं ने अपने नाम, वेशभूषा, यहाँ तक की अपनी भाषा भी बदल ली थी. एक रोचक अनुभव ऐसे रहा –

एक बैठक स्थान के बाहर कार्यकर्ताओं ने अपने जूते पंक्ति में रख दिए. एक CID वाला समझ गया कि भीतर ‘संघी’ ही होंगे. उसकी सूचना पर सभी गिरफ्तार हो गए. इस घटना के बाद जूते अपने साथ ही रखने की सूचना दी गयी. ये बैठकें ऐसे स्थान पर होती थीं, जिसके दो रास्ते हों, ताकि विपत्ति के समय दूसरे रास्ते से निकला जा सके. इन बैठकों में सत्याग्रहियों की सूची, उनके घरों की व्यवस्था, धन इत्यादि का बंदोबस्त और अधिकारीयों के गुप्त प्रवास इत्यादि विषयों पर विचार होता था. बैठकों के स्थानों को भी बार बार बदलते रहना पड़ता था.

भूमिगत गुप्तचर विभाग

जनांदोलन के प्रत्येक सक्रिय कार्यकर्ता विशेषतया संघ के स्वयंसेवकों की टोह लेने के लिए पुलिस का गुप्तचर विभाग बहुत सक्रिय रहता था. सत्याग्रह से पहले ही गिरफ्तारियां करना, गली मोहल्लें वालों से पूछताछ करना, भूमिगत स्वयंसेवकों के ठहरने का, उठने-बैठने, खाने इत्यादि के स्थानों की जानकारी लेकर सत्याग्रह को किसी भी प्रकार से विफल करने का प्रयास होता था. अतः सरकारी गुप्तचरों की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिय संघ ने भी अपना गुप्तचर विभाग बना लिया. वेश बदलकर पुलिस थानों में जाना, पुलिस अफसरों के साथ दोस्ताना सम्बन्ध बनाना और सत्याग्रह के समय पुलिस की तादाद की पूर्ण जानकारी ले ली जाती थी. कई बार तो जानबूझकर सत्याग्रह के स्थान की गलत जानकारी देकर पुलिस को वन्चिका भी दी जाती थी.

संघ के इस गुप्तचर विभाग में ऐसे वृद्ध स्वयंसेवक कार्यरत थे जो शारीरिक दृष्टी से कमजोर होने पर सत्याग्रह नहीं कर सकते थे.

सत्याग्रहियों के परिवारों की देखभाल

पुलिस द्वारा पकड़े जाने अथवा सत्याग्रह करके जेलों में जाने वाले अनेक स्वयंसेवकों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. परिवार में एक ही कमाने वाला होने के कारण दाल रोटी, बच्चों की फ़ीस, मकान का किराया इत्यादि संकट आते थे. संघ की ओर से एक सहायता कोष की स्थापना की गयी. संघ के धनाड्य स्वयंसेवकों ने इस अति महत्वपूर्ण कार्य को संपन्न करने का बीड़ा उठाया. ऐसे परिवार जिनका कमाने वाला सदस्य जेल में चला गया, उस परिवार की सम्मानपूर्वक आर्थिक व्यवस्था कर दी गयी. ऐसे भी परिवार हैं, जिनके बच्चों ने स्वयं मेहनत करके पूरे 19 महीने तक घर में पिता की कमी महसूस नहीं होने दी. इधर पुलिस ने ऐसे लोगों को भी पकड़कर जेल में ठूंस दिया जो इन जरूरतमंद परिवारों की मदद करते थे. उल्लेखनीय है कि स्वयंसेवकों ने एक दूसरे की सहायता अपना राष्ट्रीय एवं संगठात्मक कर्तव्य समझकर की.

रामसेवा समिति

संघ पर प्रतिबन्ध लग चुका था. स्वयंसेवक आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे. पुलिसिया कहर अपने चरम सीमा पर था. ऐसे में संगठन के काम में अनेक प्रकार की बाधाएं आना स्वाभाविक ही थीं. शाखाएं लगाना संभव नहीं था. इस संकट से निपटने के लिए राम सेवा समिति (आरएसएस) का गठन किया गया. इसी नाम से पार्कों, मंदिरों इत्यादि स्थानों पर योग कक्षाएं, वॉलीबाल, बैडमिन्टन इत्यादि के कार्यक्रम प्रारंभ हो गए अर्थात् संगठन और संघर्ष को एक साथ चलाने की नीति पर संघ सफ़ल हुआ. परिणामस्वरूप सरकार झुकी आपातकाल हटाया गया और चुनावों  की घोषणा हो गयी.

नरेंद्र सहगल

 

June 24th 2019, 8:43 am

संघ का लक्ष्य सबल व संगठित शक्ति से भारत को विश्व गुरु बनाना है – रवींद्र जोशी जी

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दिल्ली का संघ शिक्षा वर्ग (प्रथम वर्ष) हरिनगर में संपन्न

नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दिल्ली प्रान्त का संघ शिक्षा वर्ग, प्रथम वर्ष (सामान्य) 23 जून 2019 को संपन्न हो गया. समापन समारोह हरीनगर स्थित महाशय चुन्नी लाल सरस्वती बाल मंदिर विद्यालय में आयोजित किया गया. वर्गाधिकारी ओम प्रकाश जी ने बताया कि वर्ग में शामिल शिक्षार्थियों ने शारीरिक, बौद्धिक, योग, सेवा, प्रबंधन और संघकार्य का प्रशिक्षण प्राप्त किया.

कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ एवं जाने-माने अधिवक्ता सरदार रुपिंदर सिंह सूरी मुख्य अतिथि रहे. वर्ग में कुल 219 शिक्षार्थी, 35 शिक्षक, 82 प्रबंधक और 8 विभाग प्रमुखों की सहभागिता रही.

समापन समारोह के मुख्य वक्ता डॉ. रवीन्द्र जोशी (अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य, रा.स्व.संघ) ने कहा कि संघ का कार्य सबल व संगठित शक्ति से भारत को विश्व गुरु बनाना है, अतः स्वयंसेवक व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं अपितु परमार्थ की बात करता है और समाज हित को निजी हितों से ऊपर मानता है. हिन्दू समाज का संगठन विरोध के लिए नहीं, अपितु समाज की सर्वांगीण उन्नति के लिए है एवं इसका स्वरूप सकारात्मक व राष्ट्रपोषक है. उन्होंने कहा देश की सभी समस्याओं का समाधान चरित्र संपन्न व्यक्तियों द्वारा ही संभव है, इसलिए सज्जन शक्ति को मिलकर जाति, भाषा, प्रांत, वर्ग आदि विभेदों से ऊपर उठकर सूत्रबद्ध एवं सुसंगठित समाज का निर्माण करना होगा.

समापन कार्यक्रम में दिल्ली की गणमान्य नागरिक व प्रशिक्षणार्थियों के परिवार जन उपस्थित रहे और स्वयंसेवकों द्वारा किए गए शारीरिक प्रदर्शन को विशेष रूप से सराहा.

June 24th 2019, 8:28 am

“मैं युद्ध भूमि छोड़कर नहीं जाऊंगी, इस युद्ध में मुझे विजय अथवा मृत्यु में से एक चाहिए” – रानी दुर्ग

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अकबर ने वर्ष 1563 में आसफ खान नामक बलाढ्य सेनानी को गोंडवाना पर आक्रमण करने भेज दिया. यह समाचार मिलते ही रानी दुर्गावती ने अपनी व्यूहरचना आरंभ कर दी. सर्वप्रथम अपने विश्वसनीय दूतों द्वारा अपने मांडलिक राजाओं तथा सेनानायकों को सावधान हो जाने की सूचनाएं भेज दीं. अपनी सेना की कुछ टुकड़ियों को घने जंगल में छिपा रखा और शेष को अपने साथ लेकर रानी निकल पड़ी. रानी ने सैनिकों को मार्गदर्शन किया. एक पहाड़ की तलहटी पर आसफ खान और रानी दुर्गावती का सामना हुआ. बड़े आवेश से युद्ध हुआ. मुगल सेना विशाल थी. उसमें बंदूकधारी सैनिक अधिक थे. इस कारण रानी के सैनिक मरने लगे, परंतु इतने में जंगल में छिपी सेना ने अचानक धनुष-बाण से आक्रमण कर, बाणों की वर्षा की. इससे मुगल सेना को भारी क्षति पहुंची और रानी दुर्गावती ने आसफ खान को पराजित किया. आसफ खान ने एक वर्ष की अवधि में तीन बार आक्रमण किया और तीनों ही बार वह पराजित हुआ.

अंत में वर्ष 1564 में आसफ खान ने सिंगौरगढ़ पर घेरा डाला, परंतु रानी वहां से भागने में सफल हुई. यह समाचार पाते ही आसफ खान ने रानी का पीछा किया. पुनः युद्ध आरंभ हो गया. दोनों ओर से सैनिकों को भारी क्षति पहुंची. रानी प्राणों पर खेलकर युद्ध कर रही थीं. इतने में रानी के पुत्र वीरनारायण सिंह के अत्यंत घायल होने का समाचार सुनकर सेना में भगदड़ मच गई. सैनिक भागने लगे. रानी के पास केवल 300 सैनिक थे. उन्हीं सैनिकों के साथ रानी स्वयं घायल होने पर भी आसफ खान से शौर्य से लड़ रही थी. उसकी अवस्था और परिस्थिति देखकर सैनिकों ने उसे सुरक्षित स्थान पर चलने की विनती की, परंतु रानी ने कहा – ‘‘मैं युद्ध भूमि छोड़कर नहीं जाऊंगी, इस युद्ध में मुझे विजय अथवा मृत्यु में से एक चाहिए. अंत में घायल तथा थकी हुई अवस्था में उसने एक सैनिक को पास बुलाकर कहा, “अब हमसे तलवार घुमाना असंभव है, परंतु हमारे शरीर का नख भी शत्रु के हाथ न लगे, यही हमारी अंतिम इच्छा है. इसलिए आप भाले से हमें मार दीजिए. हमें वीर मृत्यु चाहिए और वह आप हमें दीजिए”; परंतु सैनिक वह साहस न कर सका, तो रानी ने स्वयं ही अपनी तलवार गले पर चला ली.

वह दिन था 24 जून 1564 का. इस प्रकार युद्ध भूमि पर गोंडवाना के लिए अर्थात् अपने देश की स्वतंत्रता के लिए अंतिम क्षण तक वह झूझती रही. गोंडवाना पर 15 वर्ष तक रानी दुर्गावती का शासन था, जो मुगलों ने नष्ट किया. इस प्रकार महान पराक्रमी रानी दुर्गावती का अंत हुआ. इस महान वीरांगना को हमारा शतशः प्रणाम !

June 23rd 2019, 6:19 pm

आपातकाल, पुलिसिया कहर और संघ – भाग 2

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सत्ता प्रायोजित आतंकवाद

इलाहबाद हाईकोर्ट द्वारा सजा मिलने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने अपने राजनीतिक अस्तित्व और सत्ता को बचाने के उद्देश्य से जब 25 जून 1975 को रात के 12 बजे आपातकाल की घोषणा की तो देखते ही देखते पूरा देश पुलिस स्टेट में परिवर्तित हो गया. सरकारी आदेशों के प्रति वफ़ादारी दिखाने की होड़ में पुलिस वालों ने बेकसूर लोगों पर बेबुनियाद झूठे आरोप लगाकर गिरफ्तार करके जेलों में ठूंसना शुरू कर दिया. लाठीचार्ज, आंसू गैस, पुलिस हिरासत में अमानवीय अत्याचार, इत्यादि पुलिसिया कहर ने अपनी सारी हदें पार कर दी. स्वयं इंदिरा गाँधी द्वारा दिए जा रहे सीधे आदेशों से बने हिंसक तानाशाही के माहौल को सत्ता प्रायोजित आतंकवाद कहने में कोई भी अतिश्योक्ति नहीं होगी.

इस तरह के निरंकुश सरकारी अत्याचारों की सारे देश में झड़ी लग गयी. एक ओर आपातकाल की घोषणा के साथ लोकतंत्र की हत्या कर दी गयी और दूसरी ओर पुलिसिया कहर ने आम नागरिकों के सभी प्रकार के मौलिक अधिकारों को कुचल डाला. सत्ता द्वारा ढहाए जाने वाले इन जुल्मों के खिलाफ देश की राष्ट्रवादी संस्थाओं, नेताओं और देशभक्त लोगों ने सड़कों पर उतरकर लोकतंत्र को बचाने का निश्चय किया. संघ के भूमिगत कार्यकर्ताओं ने ऐसी सामाजिक शक्तियों को एकत्रित करके देश के कोने-कोने में प्रचंड सत्याग्रह का श्रीगणेश कर दिया. प्रतिकार, संघर्ष, बलिदान की भावना से ओतप्रोत बाल, युवा वृद्ध सत्याग्रहियों के काफिलों ने जोर पकड़ लिया.

ये सत्याग्रह रेलवे स्टेशनों, भीड़ वाले चौराहों, सिनेमा घरों, सरकारी, गैर सरकारी सार्वजनिक सम्मेलनों, बसों अड्डों, मंदिरों, गुरुद्वारों में जुटी भक्तों की भीड़, अदालतों और इंदिरा गाँधी की सभाओं इत्यादि में किये जाते थे. सत्याग्रहियों द्वारा लगाए जाने वाले नारों से देश की समस्त जनता के आक्रोश, उत्पीड़न और विरोध का आभास होता है.

सत्याग्रही चुपचाप छोटी छोटी गलियों से निकलकर जैसे ही चौक चौराहों पर पहुंचते, उनके गगनभेदी नारों से आकाश भी थर्रा उठता था. तभी सत्ता प्रेरित पुलिसिया कहर शुरू हो जाता. जख्मी सत्याग्रहियों सहित सभी लड़कों को पुलिस गाड़ियों में ठसाठस भरकर निकटवर्ती थाने में ले जाना और पूछ-ताछ के नाम पर अमानवीय हथकंडों का इस्तेमाल आम बात थी. दूसरे या तीसरे दिन इन (स्वतन्त्रता सेनानियों को) जेलों के सीखचों में बंद कर दिया जाता था. इन पर पुलिस पर पथराव करने, बिजली की तारें तोड़ने, आगजनी करने, समाज का माहौल बिगाड़ने और देश को तोड़ने जैसे आरोप जड़ दिए जाते थे.

दिल्ली के लालकिले में विदेशों से आए लगभग 200 सांसदों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के एक कार्यक्रम को इन्दिरा गाँधी संबोधित करने वाली थीं. इस कार्यक्रम का उद्देश्य विदेशों में ये सन्देश देना था कि “भारत में लोग प्रसन्न हैं, इमरजेंसी का कहीं विरोध नहीं हो रहा, सभी राजनीतिक दल अपना कार्य कर रहें है, देश में अनुशासनपर्व चल रहा है. जैसे ही इंदिरा जी का भाषण प्रारंभ हुआ, लगभग 20 युवा सत्याग्रहियों (स्वयंसेवकों) ने स्टेज पर चढ़कर वन्देमातरम, भारत माता की जय, जयप्रकाश जिंदाबाद इत्यादि नारों से मंच को हिला दिया. विदेशी लोगों ने अपने कैमरों में ये सारा दृश्य कैद कर लिया.

सारे संसार के सामने इंदिरा जी के अनुशासन पर्व की पोल खुल गयी. पुलिस ने इन सत्याग्रहियों को गिरफ्तार कर लिया. इनके साथ क्या व्यवहार किया होगा, इसकी भयानकता को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता.  इसी तरह से दिल्ली में चांदनी चौक इत्यादि लगभग सौ स्थानों पर छोटे बड़े सत्याग्रह सम्पन्न हुए. कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे भारतवर्ष में हजारों स्थानों पर सत्याग्रह का आयोजन संघ के भूमिगत नेतृत्व और कार्यकर्ताओं ने किया. इस छोटे से लेख में मैंने मात्र एक ही सत्याग्रह की जानकारी दी है. उसी से निरंकुश तानाशाही और जनता द्वारा की गयी बगावत की झलक मिल जाती है.

तनाशाही के विरुद्ध शुरू हुआ ये जनसंघर्ष आपातकाल के हट जाने तक निरतंर अपने उग्र रूप में चलता रहा. सत्ता के इशारे पर चलने वाले इस पुलिसिया कहर के अनेक भयावह रूप थे. लाठियों, लात घूसों से पिटाई, भूखे रखना, नाख़ून उखाड़ देना, सिगरेट से शरीर को जलाना, सत्याग्रहियों के परिवार वालों को तरह-तरह से तंग करना और उनके घरों पर ताले लगवाना और जबरन नसबंदी करवाना इत्यादि सभी प्रकार के अमानवीय अत्याचारों को सहन करने वाले देशवासियों ने अपना संघर्ष जारी रखा और आपातकाल को हटवाकर ही दम लिया.

नरेंद्र सहगल

June 22nd 2019, 8:07 pm

23 जून / बलिदान दिवस – डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी

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छह जुलाई, 1901 को कोलकाता में श्री आशुतोष मुखर्जी एवं योगमाया देवी के घर में जन्मे डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को दो कारणों से सदा याद किया जाता है. पहला तो यह कि वे योग्य पिता के योग्य पुत्र थे. श्री आशुतोष मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के संस्थापक उपकुलपति थे. 1924 में उनके देहान्त के बाद केवल 23 वर्ष की अवस्था में ही श्यामाप्रसाद को विश्वविद्यालय की प्रबन्ध समिति में ले लिया गया. 33 वर्ष की छोटी आयु में ही उन्हें कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति की उस कुर्सी पर बैठने का गौरव मिला, जिसे किसी समय उनके पिता ने विभूषित किया था. चार वर्ष के अपने कार्यकाल में उन्होंने विश्वविद्यालय को चहुँमुखी प्रगति के पथ पर अग्रसर किया. दूसरा जिस कारण से डॉ. मुखर्जी को याद किया जाता है, वह है जम्मू कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय की माँग को लेकर उनके द्वारा किया गया सत्याग्रह एवं बलिदान. 1947 में भारत की स्वतन्त्रता के बाद गृहमन्त्री सरदार पटेल के प्रयास से सभी देसी रियासतों का भारत में पूर्ण विलय हो गया; पर प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू के व्यक्तिगत हस्तक्षेप के कारण जम्मू कश्मीर का विलय पूर्ण नहीं हो पाया. उन्होंने वहाँ के शासक राजा हरिसिंह को हटाकर शेख अब्दुल्ला को सत्ता सौंप दी. शेख जम्मू कश्मीर को स्वतन्त्र बनाये रखने या पाकिस्तान में मिलाने के षड्यन्त्र में लगा था. शेख ने जम्मू कश्मीर में आने वाले हर भारतीय को अनुमति पत्र लेना अनिवार्य कर दिया. 1953 में प्रजा परिषद तथा भारतीय जनसंघ ने इसके विरोध में सत्याग्रह किया. नेहरू तथा शेख ने पूरी ताकत से इस आन्दोलन को कुचलना चाहा; पर वे विफल रहे. पूरे देश में यह नारा गूँज उठा - एक देश में दो प्रधानदो विधानदो निशान नहीं चलेंगे. डॉ. मुखर्जी जनसंघ के अध्यक्ष थे. वे सत्याग्रह करते हुए बिना अनुमति जम्मू कश्मीर में गये. इस पर शेख अब्दुल्ला ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. 20 जून को उनकी तबियत खराब होने पर उन्हें कुछ ऐसी दवाएं दी गयीं, जिससे उनका स्वास्थ्य और बिगड़ गया. 22 जून को उन्हें अस्पताल में भरती किया गया. उनके साथ जो लोग थे, उन्हें भी साथ नहीं जाने दिया गया. रात में ही अस्पताल में ढाई बजे रहस्यमयी परिस्थिति में उनका देहान्त हुआ. मृत्यु के बाद भी शासन ने उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया. उनके पार्थव शरीर को वायुसेना के विमान से दिल्ली ले जाने की योजना बनी; पर दिल्ली का वातावरण गरम देखकर शासन ने विमान को अम्बाला और जालन्धर होते हुए कोलकाता भेज दिया. कोलकाता में दमदम हवाई अड्डे से रात्रि 9.30 बजे चलकर पन्द्रह कि.मी दूर उनके घर तक पहुँचने में सुबह के पाँच बज गये. 24 जून को दिन में ग्यारह बजे शुरू हुई शवयात्रा तीन बजे श्मशान पहुँची. हजारों  लोगों ने उनके अन्तिम दर्शन किये. आश्चर्य की बात तो यह है कि डॉ. मुखर्जी तथा उनके साथी शिक्षित तथा अनुभवी लोग थे; पर पूछने पर भी उन्हें दवाओं के बारे में नहीं बताया गया. उनकी मृत्यु जिन सन्देहास्पद स्थितियों में हुई तथा बाद में उसकी जाँच न करते हुए मामले पर लीपापोती की गयी, उससे इस आशंका की पुष्टि होती है कि यह चिकित्सकीय हत्या थी. डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने अपने बलिदान से जम्मू-कश्मीर को बचा लिया. अन्यथा शेख अब्दुल्ला उसे पाकिस्तान में मिला देता.  

June 22nd 2019, 6:52 pm

देश व समाज पर आने वाली आपदा के समय स्वयंसेवक सबसे आगे रहता है – आलोक कुमार

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मेरठ. हापुड़ में संघ शिक्षा वर्ग के समापन समारोह में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, पश्चिम उत्तर प्रदेश क्षेत्र प्रचारक आलोक कुमार जी ने कहा कि ‘संघ में 1927 से शिविर प्रारम्भ हुए. शिविर में साथ रहने, खाने, कार्य करने से सामूहिकता का भाव निर्माण होता है. यह भाव ही संघ की शक्ति है और इस शक्ति द्वारा ही संघ कार्यकर्ता देश के बड़े-बड़े कठिन दिखने वाले कार्य करते आए हैं. देश व समाज पर आने वाली दैवीय, प्राकृतिक या मानवीय आपदा के समय पर स्वयंसेवक सबसे आगे रहता आया है.

उन्होंने कहा कि अब संघ ने कुछ विशेष कार्य अपने हाथ में लिये हैं, जिन्हें संघ में गतिविधि कहा जाता है. हिन्दू संस्कृति का प्रतीक गौ माता है. इसका संरक्षण एवं संवर्धन होना चाहिये. इसलिये एक गतिविधि बनायी है गौ-सेवा. जिसका उद्देश्य है – शहरों में गौशाला खुलें और गांवों में लोग गाय पालें, गौ वंश वृद्धि हो, संरक्षण हो. देश में परिवर्तन दिखायी दे रहा है, गौशालाएं बढ़ी हैं, देशी गायों के दूध के प्रति आकर्षण बढ़ा है, दूध की मांग बढ़ी है.

दूसरी गतिविधि है ग्राम विकास – शहरीकरण बढ़ा है. जिसके कारण गन्दगी और सभी प्रकार का प्रदूषण बढ़ा है. गाँव में रहना स्वास्थ्य के लिये लाभप्रद है और देश के लिये हितकर भी है. गाँव का समग्र विकास हो, गाँवों में रहने की रुचि बढ़े, यह समय और देश की आवश्यकता है.

तीसरी गतिविधि है धर्म जागरण – किसी कारण से अपना हिन्दू धर्म छोड़ गए, परन्तु अपने पूर्वजों की स्मृति है और अपने धर्म में स्वेच्छा से वापस आना चाहते हैं. ऐसे लोगों की घर वापसी कराने का कार्य कर रहा है धर्म जागरण विभाग.

चौथी गतिविधि है सामाजिक समरसता. समाज में जाति भले ही रहे, परन्तु जातीय आधार पर छुआछूत, छोटा-बड़ा नहीं होना चाहिये. सरसंघचालक मोहन भागवत जी तो कहते हैं – सम्पूर्ण हिन्दू समाज के जल स्थान, देवस्थान (मंदिर) और शमशान एक होने चाहिये.

भारतीय संस्कृति परिवार संस्कृति है. हमारा चिन्तन विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ परिवार मानने वाला है. परन्तु आज शहरीकरण के कारण परिवार घट रहे हैं, छोटे हो रहे हैं. परिवार टूटें नहीं, इसके लिये प्रयास कर रही है परिवार प्रबोधन गतिविधि.

हिन्दू समाज में बहुत सारे मत सम्प्रदाय हैं, जातीय संगठन हैं, मठ, मंदिरों के ट्रस्ट हैं. ये सभी हिन्दू समाज के हित और उन्नति के लिये साथ मिलकर बैठें, विचार करें. इस प्रयास को करने वाली गतिविधि का नाम है सामाजिक सद्भाव.

एक कार्य संघ ने इसी वर्ष अपने हाथ में लिया है, पयार्वरण एवं जल संरक्षण. तेजी से बढ़ती जनसंख्या के कारण आज अच्छा भोजन, पानी, वायु मिलना कठिन हो गया है, भूजल का स्तर घट रहा है. इसीलिये पर्यावरण की रक्षा वृक्षारोपण एवं जल की वृद्धि वर्षा जल को संग्रह से होगी. तेजी से इसके प्रयास करने होंगे. अब कृतिरूप में होना चाहिये. संघ की सामूहिक संगठित शक्ति द्वारा किये गये प्रयासों द्वारा परिवर्तन दिखना चाहिये.

इस वर्ष मेरठ प्रान्त के 1080 स्वयंसेवकों ने प्रशिक्षण लिया.

 

June 22nd 2019, 9:17 am

शिवाजी सम्पूर्ण भारत के आदर्श – संभाजी राजे

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हिन्दू साम्राज्य दिवस

गाजियाबाद. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गाजियाबाद महानगर द्वारा हिन्दू साम्राज्य दिवस पर कार्यक्रम का आयोजन शहीद चौक नवयुग मार्केट पर किया गया. यह उत्सव प्रतिवर्ष क्षत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक दिवस ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी के दिन मनाया जाता है.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि छत्रपति महाराज शिवाजी के वंशज संभाजी राजे रहे. मुख्य अतिथि संभाजी राजे ने कहा कि आज हम महाराज शिवाजी के जन्म स्थान से सैकड़ों किलोमीटर दूर राज्याभिषेक दिवस मना रहे हैं. यह दर्शाता है कि शिवाजी महाराज किसी क्षेत्र विशेष के नहीं, अपितु सम्पूर्ण भारत के आदर्श स्वरूप हैं. समाज के किसी भी वर्ग और व्यवस्था से जुड़े व्यक्ति को छत्रपति महाराज शिवाजी के जीवन से सीख लेकर स्वयं का भी वैसा ही राष्ट्रीय, सामाजिक और शासक चरित्र निर्माण करना चाहिए. आज हम जिस उत्साह से 350 साल बाद भी राज्याभिषेक उत्सव मनाते हैं,  वह दर्शाता है कि हमारे समाज में उनके जीवन के प्रति कितना विश्वास और सम्मान है.

कार्यक्रम में उपस्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गाजियाबाद महानगर के संघचालक कैलाश जी ने कार्यक्रम में उपस्थित माताओं बहनों का आह्वान करते हुए कहा कि जिस प्रकार माता जीजाबाई ने बाल्यकाल से शिक्षा एवं संस्कार देते हुए एक बालक से छत्रपति शिवाजी महाराज का निर्माण किया. आज आवश्यकता है कि हर माता जीजाबाई बने और भारत के भविष्य हमारे युवा होते बच्चों का वैसा ही चरित्र निर्माण करे.

कार्यक्रम में युवा कवियों द्वारा काव्य पाठ और नाट्य कर्मियों द्वारा शिवाजी पर नाट्य मंचन किया गया. उपस्थित मुख्य अतिथियों द्वारा माता जीजाबाई ओर महाराज शिवाजी बने बालक बालिकाओं को सम्मानित किया गया.

jijabai

 

June 22nd 2019, 6:16 am

आपातकाल, पुलिसिया कहर और संघ

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भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून 1975 में उस समय एक काला अध्याय जुड़ गया, जब देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सभी संवैधानिक व्यवस्थाओं, राजनीतिक शिष्टाचार तथा सामाजिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर मात्र अपना राजनीतिक अस्तित्व और सत्ता बचाने के लिए देश में आपातकाल थोप दिया. उस समय इंदिरा गांधी की अधिनायकवादी नीतियों, भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा और सामाजिक अव्यवस्था के विरुद्ध सर्वोदयी नेता जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में ‘समग्र क्रांति आंदोलन’ चल रहा था. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ तथा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पूर्ण समर्थन मिल जाने से यह आंदोलन एक शक्तिशाली, संगठित देशव्यापी आंदोलन बन गया.

उन्हीं दिनों इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव में ‘भ्रष्ट तौर तरीके’ अपनाने के आरोप में चल रहे एक केस में उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट की इलाहाबाद खंडपीठ ने इंदिरा जी को सजा देकर छह वर्षों के लिए राजनीति से बेदखल कर दिया था. कोर्ट के फैसले से बौखलाई इंदिरा गांधी ने बिना केन्द्रीय मंत्रिमंडल की सहमति एवं कांग्रेस कार्यकारिणी की राय लिये सीधे राष्ट्रपति महोदय से मिलकर सारे देश में इमरजेंसी लागू करवा दी. इस एकतरफा तथा निरंकुश आपातकाल के सहारे देश के सभी गैर कांग्रेसी राजनीतिक दलों, कई सामाजिक संस्थाओं, राष्ट्रवादी शैक्षणिक संस्थाओं, सामाचार पत्रों, वरिष्ठ पत्रकारों/नेताओं को काले कानून के शिकंजे में जकड़ दिया गया. डीआईआर (डिफेंस ऑफ इंडिया रूल) तथा मीसा (मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट) जैसे सख्त कानूनों के अंतर्गत लोकनायक जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, चौधरी चरण सिंह, प्रकाश सिंह बादल, सामाजवादी नेता सुरेन्द्र मोहन और संघ के हजारों अधिकारियों और कार्यकर्ताओं को 25 जून 1975 की रात्रि को गिरफ्तार करके जेलों में बंद कर दिया गया. न्यायपालिका को प्रतिबंधित तथा संसद को पंगु बनाकर प्रचार के सभी माध्यमों पर सेंसरशिप की क्रूर चक्की चला दी गई. आम नागरिकों के सभी मौलिक अधिकारों को एक ही झटके में छीन लिया गया.

इस समय देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही एकमात्र ऐसी संगठित शक्ति थी, जो इंदिरा गांधी की तानाशाही के साथ टक्कर लेकर उसे धूल चटा सकती थी. इस संभावित प्रतिकार के मद्देनजर इंदिरा जी ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया. मात्र दिखावे के लिए और भी छोटी मोटी 21 संस्थाओं को प्रतिबंध की लपेट में ले लिया गया. किसी की ओर से विरोध का एक भी स्वर न उठने से उत्साहित हुई इंदिरा गांधी ने सभी प्रांतों के पुलिस अधिकारियों को संघ के कार्यकर्ताओं की धरपकड़ तेज करने के आदेश दे दिये. संघ के भूमिगत नेतृत्व ने उस चुनौती को स्वीकार करके समस्त भारतीयों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने का बीड़ा उठाया और एक राष्ट्रव्यापी अहिंसक आंदोलन के प्रयास में जुट गए. थोड़े ही दिनों में देशभर की सभी शाखाओं के तार भूमिगत केन्द्रीय नेतृत्व के साथ जुड़ गए.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भूमिगत नेतृत्व (संघचालक, कार्यवाह, प्रचारक) एवं संघ के विभिन्न अनुषांगिक संगठनों जनसंघ, विद्यार्थी परिषद, विश्व हिन्दू परिषद एवं मजदूर संघ इत्यादि लगभग 30 संगठनों ने भी इस आंदोलन को सफल बनाने हेतु अपनी ताकत झोंक दी. संघ के भूमिगत नेतृत्व ने गैर कांग्रेसी राजनीतिक दलों, निष्पक्ष बुद्धिजीवियों एवं विभिन्न विचार के लोगों को भी एक मंच पर एकत्र कर दिया. सबसे बड़ी शक्ति होने पर भी संघ ने अपने संगठन की सर्वश्रेष्ठ परम्परा को नहीं छोड़ा. संघ ने नाम और प्रसिद्धी से दूर रहते हुए राष्ट्रहित में काम करने की अपनी कार्यपद्धति को बनाए रखते हुए यह आंदोलन लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा घोषित ‘लोक संघर्ष समिति’ तथा ‘युवा छात्र संघर्ष समिति’ के नाम से ही चलाया. संगठनात्मक बैठकें, जन जागरण हेतु साहित्य का प्रकाशन और वितरण, सम्पर्क की योजना, सत्याग्रहियों की तैयारी, सत्याग्रह का स्थान, प्रत्यक्ष सत्याग्रह, जेल में गए कार्यकर्ताओं के परिवारों की चिंता/सहयोग,प्रशासन और पुलिस की रणनीति की टोह लेने के लिए स्वयंसेवकों का गुप्तचर विभाग आदि अनेक कामों में संघ के भूमिगत नेतृत्व ने अपने संगठन कौशल का परिचय दिया.

आपातकाल के दौरान जेलों में बंद रहने वाले स्वयंसेवकों का सम्मान किया गया था, इसी कार्यक्रम के दौरान का फोटो (फाइल)

इस आंदोलन में भाग लेकर जेल जाने वाले सत्याग्रही स्वयंसेवकों की संख्या डेढ़ लाख से ज्यादा थी. सभी आयुवर्ग के स्वयंसेवकों ने गिरफ्तारी से पूर्व और बाद में पुलिस के लॉकअप में यातनाएं सहीं. उल्लेखनीय है कि पूरे भारत में संघ के प्रचारकों की उस समय संख्या 1356 थी, अनुषांगिक संगठनों के प्रचारक इसमें शामिल नहीं हैं, इनमें से मात्र 189 को ही मात्र पुलिस पकड़ सकी, शेष भूमिगत रहकर आंदोलन का संचालन करते रहे. विदेशों में भी स्वयंसेवकों ने प्रत्यक्ष वहां जाकर इमरजेंसी को वापस लेने का दबाव बनाने का सफल प्रयास किया. विदेशों में इन कार्यकर्ताओं ने ‘भारतीय स्वयंसेवक संघ’ तथा ‘फ्रेंड्स ऑफ इंडिया सोसायटी’ के नाम से विचार गोष्ठियों तथा साहित्य वितरण जैसे अनेक कामों को अंजाम दिया.

जब देश और विदेश दोनों जगह संघ की अनवरत तपस्या से आपातकालीन सरकारी जुल्मों की पोल खुलनी शुरु हुई और इंदिरा गांधी का सिंहासन डोलने लगा, तब चारों ओर से पराजित इंदिरा गांधी ने संघ के भूमिगत नेतृत्व एवं जेलों में बंद नेतृत्व के साथ एक प्रकार की राजनीतिक सौदेबाजी करने का विफल प्रयास किया था – ‘‘संघ से प्रतिबंध हटाकर सभी स्वयंसेवकों को जेलों से मुक्त किया जा सकता है, यदि संघ इस आंदोलन से अलग हो जाए’’. परंतु संघ ने आपातकाल हटाकर लोकतंत्र की बहाली से कम कुछ भी स्वीकार करने से मना कर दिया. इंदिरा जी के पास स्पष्ट संदेश भेज दिया गया – ‘‘देश की जनता के इस आंदोलन का संघ ने समर्थन किया है, हम देशवासियों के साथ विश्वासघात नहीं कर सकते, हमारे लिए देश पहले है, संगठन बाद में’’. इस उत्तर से इंदिरा गांधी के होश उड़ गए.

अंत में देश में हो रहे प्रचंड विरोध एवं विश्वस्तरीय दबाव के कारण आम चुनाव की घोषणा कर दी गई. इंदिरा जी ने समझा था कि बिखरा हुआ विपक्ष एकजुट होकर चुनाव नहीं लड़ सकेगा, परन्तु संघ ने इस चुनौती को भी स्वीकार करके सभी विपक्षी पार्टियों को एकत्र करने जैसे अति कठिन कार्य को भी कर दिखाया. संघ के दो वरिष्ठ अधिकारियों प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैय्या) और दत्तोपंत ठेंगडी ने प्रयत्नपूर्वक चार बड़े राजनीतिक दलों को अपने दलगत स्वार्थों से ऊपर उठकर एक मंच पर आने को तैयार करा लिया. सभी दल जनता पार्टी के रूप में चुनाव के लिए तैयार हो गए.

चुनाव के समय जनसंघ को छोड़कर किसी भी दल के पास कार्यकर्ता नाम की कोई चीज नहीं थी, सभी के संगठनात्मक ढांचे शिथिल पड़ चुके थे, इस कमी को भी संघ ने ही पूरा किया. लोकतंत्र की रक्षा हेतु संघर्षरत स्वयंसेवकों ने अब चुनाव के संचालन का बड़ा उत्तरदायित्व भी निभाया. ‘द इंडियन रिव्यू’ के संपादक एम.सी. सुब्रह्मण्यम ने लिखा था – ‘‘जिन लोगों ने आपात काल के दौरान संघर्ष को वीरतापूर्वक जारी रखा, उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों का विशेष उल्लेख करना आवश्यक है. उन्होंने अपने व्यवहार से न केवल अपने राजनीतिक सहयोगी कार्यकर्ताओं की प्रशंसा प्राप्त की, बल्कि जो कभी उनके राजनीतिक विरोधी थे, उनसे भी आदर प्राप्त कर लिया’.

प्रसिद्ध पत्रकार एवं लेखक दीनानाथ मिश्र ने लिखा था – ‘‘भूमिगत आंदोलन किसी न किसी विदेशी सरकार की मदद से ही अक्सर चलते हैं, पर भारत का यह भूमिगत आंदोलन सिर्फ स्वदेशी शक्ति और साधनों से चलता रहा. बलात नसबंदी, पुलिसिया कहर, सेंसरशिप, तथा अपनों को जेल में यातनाएं सहते देखकर आक्रोशित हुई जनता ने अधिनायकवाद की ध्वजवाहक इंदिरा गांधी का तख्ता पलट दिया.

जनता विजयी हुई और देश को पुनः लोकतंत्र मिल गया. जेलों में बंद नेता छूटकर सांसद व मंत्री बनने की होड़ में लग गए, परंतु संघ के स्वयंसेवक अपने राष्ट्रीय कर्तव्य की पूर्ति करके अपनी शाखा में जाकर पुनः संगठन कार्य में जुट गए”.

नरेन्द्र सहगल

 

June 22nd 2019, 12:16 am

22 जून / बलिदान दिवस – बेटे व स्वयं की आहुति देने वाले नगर सेठ अमरचन्द बांठिया

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नई दिल्ली. स्वाधीनता समर के अमर सेनानी सेठ अमरचन्द मूलतः बीकानेर (राजस्थान) के निवासी थे. वे अपने पिता अबीर चन्द बांठिया के साथ व्यापार के लिए ग्वालियर आकर बस गये थे. जैन मत के अनुयायी अमरचन्द जी ने अपने व्यापार में परिश्रम, ईमानदारी एवं सज्जनता के कारण इतनी प्रतिष्ठा पायी कि ग्वालियर राजघराने ने उन्हें नगर सेठ की उपाधि देकर राजघराने के सदस्यों की भांति पैर में सोने के कड़े पहनने का अधिकार दिया. आगे चलकर उन्हें ग्वालियर के राजकोष का प्रभारी नियुक्त किया गया.

अमरचन्द जी बड़े धर्मप्रेमी व्यक्ति थे. 1855 में उन्होंने चातुर्मास के दौरान ग्वालियर पधारे सन्त बुद्धि विजय जी के प्रवचन सुने. इससे पूर्व वे 1854 में अजमेर में भी उनके प्रवचन सुन चुके थे. उनसे प्रभावित होकर वे विदेशी और विधर्मी राज्य के विरुद्ध हो गये. 1857 में जब अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय सेना और क्रान्तिकारी ग्वालियर में सक्रिय हुए, तो सेठ जी ने राजकोष के समस्त धन के साथ अपनी पैतृक सम्पत्ति भी उन्हें सौंप दी. उनका मत था कि राजकोष जनता से ही एकत्र किया गया है. इसे जनहित में स्वाधीनता सेनानियों को देना अपराध नहीं है और निजी सम्पत्ति वे चाहे जिसे दें, पर अंग्रेजों ने उन्हें राजद्रोही घोषित कर उनके विरुद्ध वारण्ट जारी कर दिया. ग्वालियर राजघराना भी उस समय अंग्रेजों के साथ था.

अमरचन्द जी भूमिगत होकर क्रान्तिकारियों का सहयोग करते रहे, पर एक दिन वे शासन के हत्थे चढ़ गये और मुकदमा चलाकर उन्हें जेल में ठूंस दिया गया. सुख-सुविधाओं में पले सेठ जी को वहां भीषण यातनाएं दी गयीं. मुर्गा बनाना, पेड़ से उल्टा लटका कर चाबुकों से मारना, हाथ पैर बांधकर चारों ओर से खींचना, लोहे के जूतों से मारना,  मूत्र पिलाना आदि अमानवीय अत्याचार उन पर किये गये. अंग्रेज चाहते थे कि वे क्षमा मांग लें, पर सेठ अमरचन्द जी तैयार नहीं हुए. क्रोधित अंग्रेजों ने उनके आठ वर्षीय निरपराध पुत्र को भी पकड़ लिया. और धमकी दी कि यदि तुमने क्षमा नहीं मांगी, तो तुम्हारे पुत्र की हत्या कर दी जाएगी. यह बहुत कठिन घड़ी थी, पर सेठ जी विचलित नहीं हुए. जिसके बाद अंग्रेजों ने उनके पुत्र को तोप के मुंह पर बांधकर गोला दाग दिया गया. बच्चे का शरीर चिथड़े-चिथड़े हो गया. तथा अमर चन्द जी के लिए 22 जून, 1858 को फांसी की तिथि निश्चित कर दी गयी. इतना ही नहीं, नगर और ग्रामीण क्षेत्र की जनता में आतंक फैलाने के लिए अंग्रेजों ने यह भी तय किया कि सेठ जी को ‘सर्राफा बाजार’ में ही फांसी दी जाएगी.

अन्ततः 22 जून भी आ गया. सेठ जी तो अपने शरीर का मोह छोड़ चुके थे. अन्तिम इच्छा पूछने पर उन्होंने नवकार मन्त्र जपने की इच्छा व्यक्त की. उन्हें इसकी अनुमति दी गयी, धर्मप्रेमी सेठ जी को फांसी देते समय दो बार ईश्वरीय व्यवधान आ गया. एक बार तो रस्सी और दूसरी बार पेड़ की वह डाल ही टूट गयी, जिस पर उन्हें फांसी दी जा रही थी. तीसरी बार उन्हें एक मजबूत नीम के पेड़ पर लटकाकर फांसी दी गयी और शव को तीन दिन वहीं लटके रहने दिया गया. सर्राफा बाजार स्थित जिस नीम के पेड़ पर सेठ अमरचन्द बांठिया जी को फांसी दी गयी थी, उसके निकट ही सेठ जी की प्रतिमा स्थापित है. हर साल 22 जून को वहां बड़ी संख्या में लोग आकर देश की स्वतन्त्रता के लिए प्राण देने वाले उस अमर हुतात्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.

June 21st 2019, 7:42 pm

आर्ट ऑफ लिविंग की प्रेरणा से नदी को पुनर्जीवित करने में जुटी 20 हजार महिलाएं

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तमिलनाडु के वेल्लोर जिले की महिलाओं ने सालों से सूखी पड़ी एक नदी को फिर से जिंदा करने का कार्य शुरु किया है. और संभावना है कि हजारों महिलाओं का प्रयास सफल होगा. देश के कई क्षेत्रों में पानी की भारी कमी है, जिसकी आपूर्ति के लिए ज्यादातर लोग और सरकार बारिश के भरोसे हैं. इस सबके बीच तमिलनाडु के वेल्लोर जिले की 20,000 महिलाओं ने सालों से सूखी पड़ी एक नदी को फिर से जिंदा करने का प्रयास शुरू किया.

टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित समाचार के अनुसार वेल्लोर तमिलनाडु के 24 सूखाग्रस्त जिलों में से एक है. यहां नागानदी नाम की एक नदी कुछ दशक पहले पानी का मुख्य स्रोत हुआ करती थी. लेकिन करीब 15 साल पहले यह खत्म हो गई. पानी कम होते चले जाने के चलते यहां के कृषि मजदूर काम की तलाश में शहरों में चले गए. इनमें अधिकतर पुरुष थे.

आर्ट ऑफ लिविंग (एओएल) फाउंडेशन के कुछ लोग जिले में पहुंचे और नदी को पुनर्जीवित करने का सुझाव दिया. क्योंकि कर्नाटक में इस तरह की परियोजनाओं से सूख चुकी दो नदियों को फिर से जिंदा किया जा चुका है, इसलिए वेल्लोर की नागानदी को फिर से बहाने के लिए सरकार की मंजूरी आसानी से मिल गई. इसके बाद एक टीम गठित की गई और सैटेलाइट के माध्यम से नदी को मापा गया. फिर वेल्लोर क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए कार्य योजना तैयार की गई. इसके तहत महिलाओं को परियोजना का हिस्सा बनाया गया और उन्हें मनरेगा के तहत मजदूरी देना सुनिश्चित किया गया.

इन महिलाओं को यह काम अंजाम देने में चार साल लगे हैं. इस दौरान उन्होंने बारिश का पानी रोकने के लिए 3500 छोटे-छोटे बांध और कुंए बनाए. इनमें इकट्ठा पानी का इस्तेमाल नदी को जिंदा करने में किया गया. इन बांधों और कुंओं से आज यहां कई क्षेत्रों में पानी की जरूरत पूरी हो रही है. गांव की महिलाएं बताती हैं कि अब जिले के कुछ इलाकों में फिर से खेती भी होने लगी है. कई क्षेत्रों और गावों में लोगों को पीने और सिंचाई के लिए पानी मिल रहा है.

नागानदी पुनर्जीवन परियोजना के निदेशक चंद्रशेखरन कुप्पन ने बताया कि, ‘नदी की सतह पर पानी भूजल की पूर्ति के बाद ही बहता है. इसलिए नदी को फिर से जिंदा करने का मतलब केवल उसके बहाव से नहीं जुड़ा है, बल्कि इसमें जमीन के अंदर तक पर्याप्त मात्रा पानी पहुंचाना है. दूसरे शब्दों में कहें तो वर्षा जल को मिट्टी के जरिये नीचे तक पहुंचने देना है. इस साल बारिश के बाद नदी तेजी से बह रही होगी.’

उधर, वेल्लोर से सैकड़ों मील दूर उत्तराखंड में भी कई ग्रामीण पानी इकट्ठा करने की तकनीकें इस्तेमाल कर रहे हैं. यहां गढ़वाल में बच्चों द्वारा शुरू किए गए प्रयास के तहत अलग-अलग आकार के जलाशय निर्मित किए जा रहे हैं. वहीं, मॉनसून का पानी इकट्ठा करने के लिए लोग लिखित प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर कर रहे हैं. ये दोनों मामले उदाहरण पेश करते हैं कि कैसे जल संकट से जूझ रहे भारत को स्थानीय स्तर पर जल स्रोतों का संरक्षण करने की जरूरत है.

Photo Courtesy – TOI

June 21st 2019, 5:50 am

डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय दृष्टि जागृत कर समाज को संगठित करने का कार्य शुरू किया

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संघ संस्थापक के व्यक्तित्व को समझे बिना संघ को समझना संभव नहीं

चुनाव के समय भारत में युद्ध सी स्थिति दिख रही थी. अब सारी धूल बैठने के बाद चित्र स्पष्ट हो गया है. देश की जनता ने राष्ट्रीय पक्ष को मज़बूत समर्थन दे कर सत्तासीन किया है. आरोप-प्रत्यारोप के घमासान में विभाजनवादी राजनीति करने वाले खेमे से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी अकारण-आधारहीन आरोप लगते रहे.

स्वातंत्र्यवीर सावरकर और द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) के वक्तव्यों को बिना संदर्भ, बिना आधार के उल्लेख कर संघ का नाम अनावश्यक घसीटा गया, पर किसी ने भी संघ संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार का उल्लेख तक नहीं किया. यह ध्यान देने वाली बात है कि संघ का मूल तो डॉक्टर हेडगेवार से ही है. ऐसे में उनके व्यक्तित्व को समझे बिना संघ को समझना सम्भव नहीं.

अभी 21 जून को उनके महानिर्वाण को 89 वर्ष हो रहे हैं. इस निमित्त उनका एक स्मरण भ्रामक सन्दर्भों की धूल छांटने तथा सही परिप्रेक्ष्यों को समझने के लिए आवश्यक हो जाता है.

डॉक्टर हेडगेवार देशभक्त और श्रेष्ठ संगठक थे. भारतीय दर्शन, संस्कृति तथा इतिहास को गहराई से अनुभव करने के कारण उन्हें तत्कालीन चुनौतियां, इनके समाधान की राह तथा भविष्य की संकल्पनाएं स्पष्ट थीं. वे एक दृष्टा (visionary) थे. He was deeply rooted in the philosophy, culture and history of Bharat and simultaneously had a farsighted vision for future.

संक्षेप में कहें तो सामान्य से दिखने वाले असामान्य प्रतिभा के धनी थे डॉक्टर जी.

ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध उनके मन में कैसी चिढ़ थी, यह उनके बचपन के अनेक प्रसंगों से दिखता है. स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए चलने वाले, अहिंसक सत्याग्रह से लेकर सशस्त्र क्रांति तक सभी मार्गों में वे सतत सक्रिय रहे. परंतु इसके साथ ही स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए आवश्यक मानसिक, धार्मिक, सामाजिक क्रांति का महत्व वे बख़ूबी जानते थे. इसीलिए उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए सम्पूर्ण समाज के संगठन का कार्य आरम्भ किया. केवल जेल जाना ही देशभक्ति नहीं है, बाहर रहकर समाज जागृति करना भी जेल जाने के समान ही देशभक्ति का कार्य है, ऐसा उन्होंने प्रथम सत्याग्रह में भाग लेते समय 1921 में कहा था. तब उनकी आयु केवल 31 वर्ष की थी. उनका मन तत्कालीन ‘राष्ट्रीय मानस’ के साथ एकरस था. His mind was in tune with the ‘National Mind’ of his times.

दो वर्ष भारत भ्रमण करने के बाद 1893 में स्वामी विवेकानंद अमेरिका और बाद में यूरोप गए. चार वर्ष के बाद 1897 में  पश्चिम के देशों से भारत वापस आने के बाद उन्होंने भारतवासियों को साररूप में तीन बातें कहीं. पहली – “पश्चिम से हमें संगठन करना सीखना चाहिए.”

दूसरी – “हमें मनुष्य निर्माण करने की कोई पद्धति, तंत्र विकसित करना चाहिए.”

तीसरी – “सभी भारतवासियों को आने वाले कुछ वर्षों के किए अपने-अपने देवी-देवताओं को एक ओर रखकर केवल एक ही देवता की आराधना करनी चाहिए, और वह है अपनी भारतमाता.”

संघकार्य और संघ शाखा इन तीनों बातों का ही मूर्तरूप है.

‘जातिप्रथा और उसका निर्मूलन’ पुस्तक में बाबासाहेब आम्बेडकर जी ने इस बात को अधोरेखित किया है कि “राजकीय क्रांति हमेशा सामाजिक और धार्मिक क्रांति के बाद ही हुई है, ऐसा इतिहास बताता है. मार्टिन लूथर किंग के द्वारा शुरू हुआ सुधार आंदोलन यूरोप के लोगों के राजकीय मुक्ति की पूर्वपीठिका थी. नैतिकतावाद (Puritanism ) ने ही इंग्लैंड और अमेरिका में राजकीय स्वतंत्रता की नींव रखी. मुस्लिम साम्राज्य की भी यही कहानी है. अरबों के हाथ राजकीय शक्ति आने के पूर्व हज़रत मोहम्मद द्वारा किए गए मजहबी क्रांति के मार्ग से ही उन्हें जाना पड़ा. भारतीय इतिहास भी इसी निष्कर्ष को बल देता है. चंद्रगुप्त के नेतृत्व में हुई राजकीय क्रांति के पहले भगवान बुद्ध की धार्मिक-सामाजिक क्रांति हो चुकी थी. महाराष्ट्र में भी संतों के द्वारा किए गए धार्मिक- सामाजिक सुधार के बाद ही शिवाजी के नेतृत्व में वहाँ राजकीय क्रांति सम्भव हुई. गुरुनानक देव के धर्म और सामाजिक क्रांति के बाद ही सिक्खों की राज्य क्रांति हुई. यह समझने के लिए कि ‘किसी भी राष्ट्र के राजकीय मुक्ति के लिए प्रारम्भिक आवश्यकता के नाते उसका मन और आत्मा की मुक्तता आवश्यक है,’ – और अधिक उदाहरण देना अनावश्यक होगा.

इसीलिए यह तथ्य ध्यान रखने वाला है कि स्वतंत्रता आंदोलन को सफल और सबल बनाने के लिए ही डॉक्टर हेडगेवार ने राष्ट्र के मन और आत्मा की मुक्ति का कार्य, समाज संगठन का कार्य, प्रारम्भ किया.

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी अपने ‘स्वदेशी समाज’ नामक पुस्तक में यह बात आग्रह पूर्वक कही है कि कल्याणकारी राज्य (Welfare state) भारतीय परम्परा नहीं है. भारत में समाज के सभी आवश्यक कार्य राज्य के अधीन नहीं रहते थे. कुछ ही महत्व के विभाग राज्य के अधीन रहकर अन्न, जल, स्वास्थ्य, विद्या आदि सभी विषय समाज के अधीन रहते आए हैं. यदि एक तंबू एक ही खम्भे पर खड़ा और वह खंभा टूट जाए तो सारी व्यवस्था धराशायी हो जाती है. परंतु तंबू 4-5 खम्भों पर खड़ा हो और किसी एक खंभा को क्षति पहुंचे, तब भी वह धराशायी नहीं होता, उसे अंदर से ही मरम्मत कर फिर से खड़ा करने की गुंजाइश रहती है. इसी तरह इस्लामिक जिहाद और ईसाई क्रूसेड द्वारा, ऐसे राज्यों को, जहाँ सभी व्यवस्थाएँ केवल राज्य-आधारित थीं, शासक को परास्त करने पर, उस राज्य के सभी को इस्लाम या ईसाईयत में कन्वर्ट कर सके. किन्तु भारत में 850 वर्षों तक इस्लामिक शासकों का और 150 वर्षों तक ईसाइयों का शासन रहने पर भी वे केवल 15% को इस्लाम में और 3% को ईसाईयत में कन्वर्ट कर सके. ऐसा केवल भारत में ही सम्भव हुआ, कारण भारत की समाज रचना राज्य आधारित व्यवस्था के एकमात्र खम्भे पर नहीं टिकी थी. समाज की राज्य से स्वतंत्र अपनी भी व्यवस्थाएँ थी.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रचना भी इन्हीं तत्वों पर हुई है. संघ का कार्य तो सम्पूर्ण स्वावलम्बी है, राज्य पर आधारित क़तई नहीं है. संघ के स्वयंसेवकों द्वारा 1 लाख 30 हज़ार से अधिक सेवा कार्य जो समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में चल रहे हैं, उनमें से भी 90 प्रतिशत सेवा कार्य सरकारी सहायता पर अवलंबित नहीं हैं. मैं जब गुजरात में प्रांत प्रचारक था, तब श्री केशुभाई पटेल के नेतृत्व में भाजपा के शासनकाल में जनजातीय विकास हेतु आवंटित राशि को वनवासी कल्याण आश्रम को देने की पहल भाजपा द्वारा हुई. वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा जनजातीय क्षेत्र में अनेक सेवाकार्य चलते है. परंतु कल्याण आश्रम के कार्यकर्ताओं ने इसे स्वीकार करने से मना कर दिया. कुछ वर्ष पूर्व संघ के एक कार्यकर्ता ने मुझे जब पूछा कि कल्याण आश्रम सरकारी सहायता क्यों नहीं लेते हैं? मैंने उसे श्री विनोबा भावे की भाषा में जवाब दिया कि “सरकार के पास पैसा कहाँ से आता है? समाज ही सरकार को टैक्स के रूप में पैसा देता है. माने सरकार नौकर है और समाज मालिक है. हम नौकर से क्यों माँगें? मालिक से माँग रहे हैं और वह दे भी रहा है.”

ओरी ब्रेफमेन तथा रॉड बेकस्ट्रॉम द्वारा लिखित ‘दि स्टारफिश एंड स्पाईडर’ नामक पुस्तक में संस्था या समाज के ‘पावर स्ट्रक्चर’ कैसे होते हैं, इसकी तुलना की गई है. इसके लिये दो उपमाओं का प्रयोग हुआ है. एक स्पाईडर (मकड़ी) है, जिसके अनेक पैर होते हैं. एक-दो पैर टूट भी जाएं तो भी उसका काम चलता रहता है. उसकी सारी जीवन शक्ति उसके छोटे से सिर में केन्द्रित होती है. एक बार यह सिर नष्ट हुआ तो स्पाईडर मर जाती है. दूसरी और स्टारफिश ऐसी मछली है जिसकी जीवन शक्ति एक जगह केन्द्रित ना रहकर सारे शरीर में अनेक केन्द्रों में बिखरी होती है, इसलिए ऐसा कोई एक स्थान नहीं, जिसे नष्ट करने से स्टारफिश तुरंत मर जाए. आप उसके दो टुकड़े करोगे तो उससे दो स्टारफिश बन सकती हैं. यह समझाने के लिए इस पुस्तक में लेखक ने एक उदाहरण दिया है.

लैटिन अमेरिकन हिस्ट्री के विशेषज्ञ प्रोफेसर नेविन ने अपनी पुस्तक में एक घटनाक्रम बताया है. सोलहवीं शताब्दी में यूरोप और स्पेन से अनेक लोग अपनी सेना लेकर अन्य क्षेत्रों को लूटने के लिए, सोना खोजने के लिए जहाज लेकर निकले. यह दौर ‘सी एक्सपेडिशन’ नाम से ज्ञात है. इसी तरह स्पेन से सेना की एक टुकड़ी अपने जहाज लेकर लैटिन अमेरिकन भू-भाग की तरफ गई. जहाँ जमीन दिखे वहाँ जाकर कब्जा करना था. 1519 में स्पैनिश सेना की एक टुकड़ी ‘एज़्टेक’ नामक जनजाति के राज्य में जा पहुँची. वहां के मुखिया के सिर पर बन्दूक तान कर कहा कि सारा सोना दे दो, वर्ना मार डालेंगे. उस मुखिया ने स्वप्न में भी यह सोचा नहीं था कि ऐसे लूटने वाले लोगों से भी कभी पाला पड़ेगा. उसने स्वाभाविक ही अपनी जान बचाने हेतु सारा सोना दे दिया. उन्होंने सोना लेकर भी उसे मार डाला. दो ही वर्ष में, 1521 तक सारा ‘एज़्टेक’ राज्य स्पैनिश कब्जे में आ गया. सन् 1534 में ऐसी ही एक स्पैनिश टुकड़ी लैटिन अमेरिका के ऐसे भूभाग पर पहुँची, जहां ‘इंका’ नामक जनजाति का राज्य था. वहां भी यही इतिहास दोहराया गया और दो ही वर्षों में, 1536 तक ‘इंका’ का राज्य स्पैनिश सेना के अधीन हो गया. इसी तरह एक के बाद एक जनजाति के राज्य को स्पैनिश सेना निगलते चली. परन्तु 1618 में एक अजीब घटना हुई. स्पेन से एक सैनिक टुकड़ी सन् 1618 में ‘अपाची’ नामक जनजाति के राज्य में पहुंची. वहां भी उन्होंने वहां के मुखिया को मार डाला. यह जनजाति लूटने के लिए बहुत संपन्न नहीं थी. इसलिए स्पैनिश लोगों ने उन्हें कन्वर्ट करते हुए खेतों में काम पर लगाना शुरू किया. परन्तु धीरे- धीरे उनके ध्यान में आया कि मुखिया को मारने के बाद भी समाज में विरोध लगातार बढ़ रहा है और अब तक सभी स्थान पर जैसे दो-तीन वर्षों में सारा राज्य स्पैनिश कब्जे में आता था, वैसा यहां नहीं हुआ. 200 वर्षों तक संघर्ष चला और आखिर स्पैनिश सेना को वहाँ से वापिस जाना पड़ा.

यह कहकर प्रोफेसर नेविन लिखते हैं कि ‘एज़्टेक’ और ‘इंका’ के पास जो सेना थी, उनकी तुलना में ‘अपाची’ की सेना अधिक सशक्त नहीं थी. और ना ही ‘अपाची’ पर आक्रमण करने वाली स्पैनिश सेना अन्य दो स्पैनिश सेनाओं से कमजोर थी. फिर ऐसा कैसे हुआ? वे लिखते हैं, उस समाज की संरचना राज्याधारित नहीं थी. यहां पर समाज के सारे शक्ति केंद्र मुखिया के पास एकत्रित नहीं थे. समाज की अपनी व्यवस्थाएं थीं, जो राज्य से स्वतन्त्र थीं. इसलिए राज्य पराजित होने के बाद भी समाज पराजित नहीं हुआ और लम्बा संघर्ष कर सका. इस रचना को समझना आवश्यक है.

इसलिए डॉक्टर अम्बेडकर के द्वारा कहा गया तत्व कि “किसी भी राष्ट्र के राजकीय मुक्ति के लिए प्रारम्भिक आवश्यकता के नाते उसका मन और आत्मा की मुक्तता आवश्यक है.” स्वामी विवेकानंद द्वारा “हमको राष्ट्र के नाते संगठित होने की आवश्यकता है” इस को अधोरेखित करना, और समाजाधिपति, समाज नायक के माध्यम से “स्वदेशी समाज” की निर्मिति करना और उसे बनाए रखना यह कितना महत्व का, Vitally Importatant, मूलभूत कार्य है, यह ध्यान में आ सकता है. स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रयासों में इस कार्य की आवश्यकता और अनिवार्यता को ध्यान में रखकर ही डॉक्टर हेडगेवार जी ने सम्पूर्ण समाज को राष्ट्रीय दृष्टि से जागृत एवं सक्रिय करते हुए सम्पूर्ण समाज को संगठित करने का कार्य ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के रूप में शुरू किया, इस के महत्व को समझना चाहिए. इसीलिए डॉक्टर हेडगेवार एक महान दृष्टा एवं कुशल संगठक के नाते जाने जाते है.

डॉ. मनमोहन वैद्य

सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

 

June 20th 2019, 5:13 pm

उफनती नदी में बोट पलटी, मरीन कमांडो ने बचायी मां-बेटी की जान

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कश्मीर में सुरक्षाबल आम लोगों की सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं. बुधवार को उत्तरी कश्मीर के बांदीपोरा में इंडियन नेवी मरीन कमांडो दो महिलाओं के लिए फिर लाइफ-सेवर साबित हुए. दरअसल, मां-बेटी वूलर नदी से होते हुए बोट से बांदीपोरा से सोपोर जा रही थी. बोट घर के सामान से लदी थी. अचानक उफनती नदी के बहाव में बोट पलट गयी. जिसमें मां रफिया बेगम और बेटी लाली दोनों नदी के बहाव में बहनें लगीं.

इसकी जानकारी घटनास्थल के नजदीक तैनात इंडियन नेवी के मरीन कमांडो और मार्कोज़ डाइवर्स को दी गयी. उन्होंने तुरंत कार्रवाई करते हुए दोनों महिलाओं को बचा लिया. अपनी जान जोखिम में डालकर दोनों की जान बचाने पर मां रफिया बेगम ने कमांडोज़ को ढेरों आशीर्वाद दिये, कमांडोज़ की त्वरित कार्रवाई की हर स्थानीय कश्मीरी प्रशंसा कर रहा है.

MARCOS इंडियन नेवी की स्पेशल फोर्स यूनिट है, जिसको कश्मीर में बाढ़ जैसी स्थितियों से निपटने के लिए तैनात किया गया है.

June 20th 2019, 6:22 am

प्यारे लाल बेरी जी का जीवन

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प्यारे लाल बेरी जी सन् 1946 में अमृतसर में तत्कालीन संघ प्रचारक ठाकुर राम सिंह जी के संपर्क में आने के बाद संघ के स्वयंसेवक बने. दुर्भाग्यवश 1947 में भारत का विभाजन हो गया. आप तब अमृतसर में ही संघ कार्य कर रहे थे. पाकिस्तान से भारत आने वाले लोगों के ठहरने, भोजन की व्यवस्था तथा उनको गंतव्य तक पहुंचाने के लिये बनी ‘पंजाब रक्षा समिति’ के भी सदस्य थे. अमृतसर में मुस्लिमों द्वारा पाकिस्तान जाने के समय खाली किये गये घरों में, पाकिस्तान से आने वाले हिन्दू-सिख शरणार्थीयों को बसाने का काम भी आपके जिम्मे लगा हुआ था.

सन् 1955 ई. में भारतीय मजदूर संघ शुरू हुआ. संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी जी की प्रेरणा से भारतीय मज़दूर संघ में कार्य करना आरंभ किया. सन् 1957 में पंजाब महाअंदोलन के समय 6 महीने फिरोजपुर जेल में रहे. 1960 में आपने भारतीय मजदूर संघ में प्रचारक बनाने का निर्णय लिया.

सन् 1974 में मज़दूर हितों के लिए रेलवे में बड़ी हड़ताल हुई, जिसमें आपका बहुत बड़ा सहयोग था. इसी कारण आपको चंडीगढ़ से शिमला जाते समय कालका में गिरफ्तार कर लिया गया. आपको अंबाला जेल में रखा गया. वहां पर कामरेडों द्वारा लगाए गए नारे ‘लाल किले पर लाल निशान’ के कारण आपका उनसे झगड़ा हुआ, जिस कारण जेल प्रशासन ने आपको जेल में अलग स्थान पर रखा. दो अथवा तीन महीने की जेल काटकर आप मुक्त हुए. तत्पश्चात आपने उत्तर रेलवे में भारतीय मज़दूर संघ का काम खड़ा कर दिया.

जून 1975 में इंदिरा गांधी की केन्द्र सरकार द्वारा देश में अकस्मात आपातकाल लागू किया गया. आप तब हिमाचल के भारतीय मज़दूर संघ के महामंत्री के नाते दायित्व निभा रहे थे. आपने आपातकाल के विरुद्ध लगातार मंडी, बिलासपुर, शिमला, नाहन आदि शहरों में भूमिगत रहकर पर्चे लिखकर बांटे और आपातकाल का विरोध जारी रखा. एक दिन पुलिस द्वारा शिमला में गिरफ्तार कर लिये गए. आपातकाल का पूरा समय जेल में रहे. आपके साथ शांता कुमार जी भी जेल में रहे जो बाद में हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. आपातकाल खत्म होने पर भी आपको बड़े मज़दूर नेता होने के कारण रिहा नहीं किया गया. सन् 1977 में चुनाव होने के पश्चात् तथा सरकार बनने के बाद ही आपको रिहा किया गया.

1980 में अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (I.L.O.) के जिनेवा (स्विट्जरलैंड) सम्मेलन में आप भारतीय मज़दूर संघ के प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए. वापसी में आप यूनान भी प्रवास पर गए. 1989 में आप पुन: अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (I.L.O.) के फ्रांस में हुए अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारतीय मज़दूर संघ के प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए. वापसी में प्रवास के दौरान पैरिस भी जाना हुआ.

आपने 1987 ई. से 1992 ई. तक भारतीय मज़दूर संघ के राष्ट्रीय सचिव तथा क्षेत्रीय संगठन मंत्री के नाते दायित्व का निर्वहन किया. 1992 तक आप भारतीय मज़दूर संघ में सीधे दायित्व पर कार्यरत रहे. 1992 से 1997 तक आप अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (I.L.O.) से भारतीय मज़दूर संघ के प्रतिनिधि के रूप में संवाद करते रहे.

1997 में विश्व संवाद केन्द्र पंजाब के प्रमुख बने और 1997 ई. से 2002 ई. तक विश्व संवाद केन्द्र प्रमुख का दायित्व निभाया. 2002 ई. में आपका केन्द्र अमृतसर हो गया और आपके पास ‘सेवा संस्कार’ पत्रिका के संपादक का दायित्व आया.

10 जून को प्यारे लाल जी का निधन हो गया था. 23 जून को अमृतसर में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया है.

 

June 20th 2019, 5:50 am

सरकार व मुख्य न्यायाधीश से अपील, शीघ्र प्रारम्भ हो राम मंदिर का निर्माण

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केन्द्रीय मार्गदर्शक मण्डल की हरिद्वार बैठक में संतों ने पारित किया प्रस्ताव

हरिद्वार. विश्व हिन्दू परिषद् के केंद्रीय मार्गदर्शक मण्डल की बैठक के दूसरे व अंतिम दिन श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य राममंदिर के निर्माण का मामला प्रमुख रहा. आध्यात्मिक नगरी हरिद्वार पधारे पूज्य संतों का कहना था कि मंदिर को भव्यता देने का कार्य शीघ्रातिशीघ्र प्रारंभ हो. इस सम्बन्ध में आयोजित प्रेस वार्ता को सम्बोधित करते हुए पूज्य जगद्गुरु द्वाराचार्य श्री श्यामदेवाचार्य जी महाराज, नृसिंह पीठ, जबलपुर ने कहा कि हिन्दू समाज का सन् 1528 ई. से ही इस सम्बन्ध में दृढ़ संकल्प रहा है तथा पूज्य संतों के मार्गदर्शन में 1984 से विश्व हिन्दू परिषद् सम्पूर्ण हिन्दू समाज के साथ इसके लिए संघर्षरत है. अब इस पुनीत राष्ट्रीय कार्य में किसी भी प्रकार का विलम्ब उचित नहीं है.

विहिप कार्याध्यक्ष एडवोकेट आलोक कुमार तथा उपाध्यक्ष चम्पत राय के साथ आयोजित प्रेसवार्ता में उन्होंने याद दिलाया कि भारतीय जनता पार्टी ने 1989 में अपनी पालमपुर की बैठक में प्रस्ताव पारित किया, आडवाणी जी ने रथ यात्रा निकाली तथा 1990 की कारसेवा में अटल जी ने गिरफ्तारी भी दी थी. 2019 के संकल्प पत्र में इस विषय को सम्मिलित करके प्रधानमंत्री मोदी द्वारा इस संकल्प को दोहराने से जनता में सरकार से अपेक्षाएं बढ़ी हैं. सम्पूर्ण विश्व ने यह देखा है कि सभी राम विरोधियों ने मिलकर किस प्रकार न्यायिक प्रक्रिया को भी बाधित करने का कुचक्र रचा.

युगपुरुष पूज्य परमानंद जी महाराज की अध्यक्षता में पूज्य आचार्य अविचल दास जी महाराज द्वारा आज के सत्र में पारित एक प्रस्ताव में कहा गया है कि “देश का संत समाज सरकार से आह्वान करता है कि भव्य श्रीराममंदिर निर्माण में आने वाली समस्त बाधाओं को अतिशीघ्र दूर करे, जिससे करोड़ों राम भक्तों की आशाओं के अनुरूप श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य राममंदिर का निर्माण हो और ‘श्रीराम जन्मभूमि न्यास’ ही मन्दिर का निर्माण करेगा.

प्रस्ताव पढ़े जाने से पूर्व विहिप उपाध्यक्ष चम्पत राय ने बैठक में उपस्थित पूज्य संतों को इस मामले के विधिक, सामाजिक व अन्य पहलुओं तथा अब तक की स्थिति से उन्हें अवगत कराया.

प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि “न्यायपालिका का भी अपनी जिम्मेवारी से मुँह मोड़ना ठीक नहीं रहेगा”. 1950 में पहला मुकदमा दर्ज करने के 60 वर्ष पश्चात 2010 में एक निर्णय मिला था; परन्तु इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच की न्यायिक विसंगति के कारण हिन्दू समाज को पूर्ण न्याय नहीं मिल पाया. राष्ट्रीय महत्व का यह विषय 2011 से सर्वोच्च न्यायालय में न सिर्फ लंबित है, बल्कि दुर्भाग्य से अभी भी उसकी प्राथमिकता में नहीं है तथा राम विरोधी न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करने में जी जान से लगे हैं. अविश्वास का यह वातावरण किसी भी तरह उचित नहीं है.

मार्गदर्शक मण्डल प्रस्ताव के माध्यम से भारत के मुख्य न्यायाधीश का भी आह्वान करते हुए कहा कि “वे इस मामले में शीघ्रातिशीघ्र सुनवाई पूरी करें, जिससे श्रीरामजन्मभूमि के इस मामले का अतिशीघ्र निर्णय हो सके”.

बैठक के सत्र में पूज्य युगपुरुष स्वामी परमानन्द जी महाराज, पू. जगद्गुरु शंकराचार्य ज्ञानानन्द तीर्थ जी महाराज, पू. द्वाराचार्य श्याम देवाचार्य जी महाराज, पू. स्वामी अविचलदास जी महाराज, पू. म.म. हरिहरानन्द जी महाराज, पू. सतपाल जी महाराज, पू. स्वामी जितेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज (महामंत्री-सन्त समिति), पू. श्रीमहंत सुरेशदास जी महाराज (दिगम्बर अखाड़ा), पू. श्रीमहंत रविन्द्रपुरी जी महाराज (महानिर्वाणी), पू. श्रीमहंत देवानन्द सरस्वती जी महाराज (जूना अखाड़ा), पू. श्रीमहंत रामजीदास महाराज (निर्मोही अनी अखाड़ा), पू. श्री प्रेमदास जी महाराज (उदासीन जूना अखाड़ा), पू. श्रीमहंत फूलडोल बिहारीदास जी महाराज (चार सम्प्रदाय), पू. साध्वी ऋतम्भरा जी, पू. स्वामी चिन्मयानन्द जी महाराज, पू. म.म. ज्योतिर्मयानन्द जी महाराज, पू. म.म. विज्ञानानन्द जी महाराज, पू. स्वामी रविन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज आदि के अलावा विहिप अध्यक्ष श्री वी.एस. कोकजे उपस्थित थे.

June 20th 2019, 5:50 am

सर्वत्र समरसता का भाव हो –  इन्द्रेश कुमार

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नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार जी ने कहा कि हमें वनवासियों को दया भाव से नहीं, समरसता के भाव से देखना चाहिए. जैसा भगवान राम ने अपने वनवास के दौरान माता शबरी, निषाद व सुग्रीव आदि वनवासियों को गले लगाया और सम्मान दिया. माता शबरी के जूठे बेर खाकर ही वे भगवान राम कहलाए. इसी प्रकार भगवान कृष्ण ने गरीब सुदामा का सत्कार किया और वे द्वारिकाधीश कहलाए. इंद्रेश कुमार जी वनवासी कल्याण आश्रम, दिल्ली के वार्षिकोत्सव में संबोधित कर रहे थे. वार्षिकोत्सव 16 जून 2019 को  विवेकानन्द विद्यालय,आनंद विहार दिल्ली में सम्पन्न हुआ. उन्होंने कहा कि जिंदगी में केवल बड़ा काम करने की मत सोचिए, छोटे-छोटे काम करते रहिये, बड़ा काम अपने आप चलकर आ जाएगा. जिंदगी में कभी आसान रास्ता ढूंढने की आदत मत डालिए, कठिन प्रश्नों का हल ढूंढने की कोशिश करिए.

देश की राजधानी दिल्ली वनवासी क्षेत्र नहीं है, फिर भी कल्याण आश्रम के कार्यकर्ता वर्ष भर क्रियाशील रहकर कल्याण आश्रम की गतिविधियों जैसे वनयात्रा, चिकित्सा सेवा, वनवासी बच्चों के छात्रावास (निःशुल्क आवासीय शिक्षा हेतु) से जुड़े रहते हैं.

कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ. उपेन्द्र कुमार चौधरी, मुख्य अतिथि अंजु कमलकांत (महापौर, पूर्वी दिल्ली नगर निगम), विशिष्ट अतिथि डॉ. अरविंद कुमार गुप्ता, विनोद कुमार, सूर्यप्रकाश जालान तथा मुख्य वक्ता इन्द्रेश कुमार जी ने शंखनाद व दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया.

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के सहयोग से राजस्थान की सहरिया जनजाति के वनवासी बंधु मुन्नालाल, सुग्रीव व उनके साथी कलाकारों ने राई नृत्य गणेश वंदना की. पशु पक्षियों की नकल पर होली के अवसर पर किया जाने वाला स्वांग नृत्य प्रस्तुत किया.

इसके अतिरिक्त नव्या गोयल, आर्यवर्त शुक्ला, अर्णव शुक्ला व दीपक शुक्ला ने भी सांस्कृतिक प्रस्तुति दी. प्रान्त सचिव आनंद भारद्वाज जी ने पिछले वर्ष का कार्यवृत प्रस्तुत किया. अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट किये गए तथा कलाकारों को शाल प्रदान कर सम्मान किया गया. प्रान्त अध्यक्ष शांति स्वरूप बंसल जी ने अतिथियों का आभार व्यक्त किया. कार्यक्रम का संचालन सीमा ओझा जी ने किया. कार्यक्रम स्थल पर कल्याण आश्रम के साहित्य का वितरण किया गया.

June 20th 2019, 5:04 am

हिन्दू धर्म को लील रहे मिशनरी – तमिलनाडु में मतांतरण का ‘धंधा’

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स्वराज्य पत्रिका ने तमिलनाडु में चल रही ईसाई मिशनरियों की मतांतरण की फैक्ट्री का पर्दाफाश करते हुए एक रिपोर्ट जारी की है. द्रविड़ आंदोलन, ‘आर्य-द्रविड़ विभाजन’ जैसे बोगस मुद्दों के ज़रिए तमिलनाडु में हिन्दुत्व/हिन्दू धर्म की जड़ों को दीमक की तरह चाट रहे पादरियों का कच्चा चिट्ठा रिपोर्ट में बयान है, और किस तरह से ‘सेक्युलरिज़्म’ के पिछले दरवाजे और द्रविड़वादी पार्टियों की साँठ-गाँठ से लोकप्रथाओं के साथ खिलवाड़ कर हिन्दुओं को ईसाई बनाने का खेल चल रहा है, इस पर विस्तार से बताया गया है.

‘द्रविड़ आंदोलन हमारा टाइम बम है हिन्दुत्व के खिलाफ’

रिपोर्ट की शुरुआत में ही स्वराज्य उद्धृत करती है कि तमिलनाडु के प्रख्यात आध्यात्मिक गुरु और शिक्षाविद चित् भावानन्द को. बकौल स्वराज्य, चित भावानंद के सामने एक बार एक मदुरै के ईसाई बिशप ने (शेखी बघारते हुए?) कहा था कि द्रविड़ आंदोलन चर्च की ओर से लगाया हुआ एक टाइम बम है, हिन्दुत्व को नष्ट करने के लिए. कैसे तमिलनाडु में एक झूठा इतिहास पढ़ाया जा रहा है, जिसमें द्रविड़वादी नस्लभेद और ईसाई प्रोपागैंडा का मिश्रण होता है. और इसमें तीन मुख्य किरदारों के नाम और उनकी करतूतें भी स्वराज्य खुल कर बताती है.

बिशप एज़रा सरगुनाम

“हिन्दू धर्म/हिन्दुत्व जैसी कोई चीज़ नहीं होती; जो बोले होती है, उसे पीट-पीटकर अक्ल ठिकाने पर ले आओ” जैसी साम्प्रदायिक रूप से भड़काऊ बातें करने वाला यह पादरी स्वराज्य के अनुसार कोई हाशिए पर पड़ा ‘fringe element’ नहीं है, बल्कि द्रविड़वादी सत्ता के गलियारों में खासी पहुंच रखता है. हिंसा भड़काने की अपील के अलावा सत्ता की दलाली, गठबंधन बनवाना-बिगड़वाना भी इसके शगल हैं. सन् 1960 के दशक में सरगुनाम ने कुम्भ में आकर भी हिन्दुओं के बीच उनके देवताओं को ‘शैतान’ बताने की हिमाकत की थी. श्रद्धालुओं के कोप से उलटे पैर वापिस होना पड़ा था.

सरगुनाम का दावा है कि उसने एक करोड़ तमिल हिन्दुओं को ईसाई बनाया है और पाँच लाख चर्च राज्य भर में खड़े किए हैं. बकौल स्वराज्य, उसकी ‘ट्रेनिंग’ बिली ग्राहम नामक अमेरिकी पादरी के अंतर्गत हुई थी, जो डार्विन के जैवीय विकास सिद्धांत का विरोधी था, और यहूदियों के खिलाफ नस्लवादी बातें करने के लिए बदनाम था.

फादर जगत गास्पर

इस कैथोलिक पादरी के उभार को स्वराज्य सीधे-सीधे द्रमुक से जोड़ती है. आरोप है कि यह तमिल हिन्दुओं की लोक परम्पराओं को पहले ‘सेक्युलर’ बनाता है, और बाद में धीरे-धीरे जब लोग यह भूल जाते हैं कि यह ‘सेक्युलर’ नहीं, हिन्दू परम्पराएँ हैं, तो चर्च हिन्दुओं के टैक्स के पैसे से सहायता पाने वाले ईसाई शिक्षा संस्थानों के ज़रिए उन पर ईसाई बाना चस्पा कर लोगों के मतांतरण का खेल चालू कर देता है. इसके अलावा गास्पर एक तथाकथित ‘विद्वान’ मा. से. विक्टर के लेखन का प्रसार करने वाला प्रकाशन भी चलाता है, जिसमें तमिलों को ईसाईयत की ओर आकर्षित करने वाला प्रचार किया जाता है; उदाहरण के तौर पर, यह दावा किया जाता है कि एडम (ईसाई मिथकों के अनुसार परमात्मा का बनाया पहला इंसान) तमिल बोलता था. ऐसे दावों को द्रमुक शासन राज्य में जब भी आता है तो ऊपर से धकेला जाता है.

ऐसे प्रचार से पहले भरे गए द्रविड़ अलगाववाद को हवा दी जाती है, और उसके बाद उसकी आग से तमिलों की हिन्दुत्व से गर्भनाल को जला दिया जाता है. बकौल स्वराज्य, “अतः जब द्रमुक बिशपों का समर्थन करती है, तो यह केवल तात्कालिक वोट-बैंक की राजनीति नहीं होती.” यह हिन्दुओं और हिन्दुत्व के खिलाफ नस्लवाद और ईसाईयत का ‘कॉकटेल’ होता है.

मोहन सी लज़ारस

मोहन सी लज़ारस ईसाई प्रचारक है, जिसका दावा है कि ईसा मसीह ने उसके हृदय रोग का इलाज कर उसे ईसाईयत के प्रचार का आदेश दिया था. धार्मिक, श्रद्धालु तमिल हिन्दू परिवार में पैदा हुए मोहन लज़ारस का जन्म का नाम मुरुगन था. आज लज़ारस को कट्टर और रूढ़िवादी ईसाई के रूप में देखा जाता है, और स्टरलाइट प्लांट के खिलाफ तुतुकुडी में हुए आँदोलन में भी उसकी भूमिका मानी जाती है.

स्वराज्य के अनुसार उसके मंच पर अक्सर स्टालिन जैसे द्रमुक नेता देखे जा सकते हैं और उसने अपना हेडक्वार्टर एक रणनीति के तहत प्राचीन हिन्दू तीर्थस्थल तिरुचेंडूर के बगल में नालूमावाडी में बनाया है. बकौल स्वराज्य, उसका एक विवादास्पद वीडियो सामने आया था, जहाँ उसने तमिलनाडु में मंदिरों की बड़ी संख्या को इंगित करते हुए राज्य को ‘शैतान’ का गढ़ करार दिया था.

तमिलनाडु महत्वपूर्ण क्यों?

तमिलनाडु कई कारणों से हिन्दुत्व का वह गढ़ है, जिसकी हिन्दुओं को सबसे अधिक रक्षा करने की आवश्यकता है, और हिन्दू-विरोधियों की सबसे गिद्ध-दृष्टि भी इस पर है. पहला कारण तो यह कि हिन्दू आध्यात्मिक परम्पराएँ अपने विशुद्ध, मूल रूप में दक्षिण भारत में, विशेषतः तमिलनाडु में सर्वाधिक सुरक्षित हैं. उत्तर भारत और उत्तरी दक्षिण भारत में इस्लामी आक्रमण और इस्लाम के राजनीतिक रूप से थोपे जाने से कई हिन्दू परम्पराएं (जैसे वाराह मूर्ति, नरसिंह आदि का पूजन) केवल तमिलनाडु में आज भी जीवंत हैं. हाल ही में जब काशी विश्वनाथ मंदिर में 238 वर्ष बाद कुम्भाभिषेकं को पुनर्जीवित करने का प्रयास हुआ तो यह अहसास हुआ कि काशी में सभी को यह विधि विस्मृत हो चुकी थी- तब एक तमिल व्यक्ति ने इसकी विधि बताई थी. इसके अलावा चिदंबरम नटराजा समेत पाँच में से चार पंचभूतस्थळं, अरुणाचलम पहाड़ी समेत कई सारे विशिष्ट मंदिर और आध्यात्मिक महत्व के स्थान भी तमिलनाडु में हैं.

राजनीतिक दृष्टि से भी देखें तो तमिलनाडु का द्रविड़ आंदोलन कहीं-न-कहीं अन्य दक्षिणी भाषाई समूहों- मलयाली, तेलुगु, कन्नड़ को भी प्रभावित करता है. जब तमिलनाडु में हिंदी-विरोधी या द्रविड़ नस्लवादी आंदोलन जोर पकड़ता है तो वह इन राज्यों में प्रतिध्वनित हुए बगैर नहीं रहता.

ऐसे में तमिलनाडु में हिन्दू धर्म के खिलाफ बन रहे इस चक्रव्यूह के बारे में अगर राजनीतिक रूप से ज़्यादा कुछ न भी हो सके तो कम-से-कम एक सांस्कृतिक वार्तालाप शुरू किए जाने की तत्काल आवश्यकता है.

यह धर्म और संस्कृति की भी ज़रूरत है, और इस देश की राजनीति की भी. और अगर किसी को लगता है कि कृत्रिम रूप से बदली जा रही पंथिक पहचान अगर इस देश के राजनीतिक भविष्य और स्थिरता को खतरे में नहीं डालेगी, तो उन्हें पाकिस्तान मूवमेंट के उद्भव को एक बार और पढ़ने की ज़रूरत है.

साभार – Opindia.com

June 20th 2019, 5:04 am

20 जून / बलिदान दिवस – राजा दाहरसेन का बलिदान

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नई दिल्ली. भारत को लूटने और इस पर कब्जा करने के लिए पश्चिम के रेगिस्तानों से आने वाले मजहबी हमलावरों का वार सबसे पहले सिन्ध की वीरभूमि को ही झेलना पड़ता था. सिन्ध के राजा थे दाहरसेन, जिन्होंने युद्धभूमि में लड़ते हुए प्राणाहुति दी. उनके बाद उनकी पत्नी, बहिन और दोनों पुत्रियों ने भी अपना बलिदान देकर भारत में एक परम्परा का सूत्रपात किया.

सिन्ध के महाराजा के असमय देहांत के बाद उनके 12 वर्षीय पुत्र दाहरसेन गद्दी पर बैठे. राज्य की देखभाल उनके चाचा चन्द्रसेन करते थे, पर छह वर्ष बाद चन्द्रसेन का भी देहांत हो गया. अतः राज्य की जिम्मेदारी 18 वर्षीय दाहरसेन पर आ गयी. उन्होंने देवल को राजधानी बनाकर अपने शौर्य से राज्य की सीमाओं का कन्नौज, कंधार, कश्मीर और कच्छ तक विस्तार किया. राजा दाहरसेन एक प्रजावत्सल राजा थे. गोरक्षक के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक थी. यह देखकर ईरान के शासक हज्जाम ने 712 ई0 में अपने सेनापति मोहम्मद बिन कासिम को एक विशाल सेना देकर सिन्ध पर हमला करने के लिए भेजा. कासिम ने देवल के किले पर कई आक्रमण किये, पर राजा दाहरसेन और हिन्दू वीरों ने हर बार उसे पीछे धकेल दिया.

सीधी लड़ाई में बार-बार हारने पर कासिम ने धोखा किया. 20 जून, 712 ई. को उसने सैकड़ों सैनिकों को हिन्दू महिलाओं जैसा वेश पहना दिया. लड़ाई छिड़ने पर वे महिला वेशधारी सैनिक रोते हुए राजा दाहरसेन के सामने आकर मुस्लिम सैनिकों से उन्हें बचाने की प्रार्थना करने लगे. राजा ने उन्हें अपनी सैनिक टोली के बीच सुरक्षित स्थान पर भेज दिया और शेष महिलाओं की रक्षा के लिए तेजी से उस ओर बढ़ गये, जहां से रोने के स्वर आ रहे थे.

इस दौड़भाग में वे अकेले पड़ गये. उनके हाथी पर अग्निबाण चलाये गये, जिससे विचलित होकर वह खाई में गिर गया. यह देखकर शत्रुओं ने राजा को चारों ओर से घेर लिया. राजा ने बहुत देर तक संघर्ष किया, पर अंततः शत्रु सैनिकों के भालों से उनका शरीर क्षत-विक्षत होकर मातृभूमि की गोद में सदा के लिए सो गया. इधर महिला वेश में छिपे मुस्लिम सैनिकों ने भी असली रूप में आकर हिन्दू सेना पर हमला कर दिया. हिन्दू वीर दोनों ओर से घिर गये और मोहम्मद बिन कासिम का पलड़ा भारी हो गया.

राजा दाहरसेन के बलिदान के बाद उनकी पत्नी लाड़ी और बहिन पद्मा ने भी युद्ध में वीरगति पाई. कासिम ने राजा का कटा सिर, छत्र और उनकी दोनों पुत्रियों (सूर्या और परमाल) को बगदाद के खलीफा के पास उपहार स्वरूप भेज दिया. जब खलीफा ने उन वीरांगनाओं का आलिंगन करना चाहा, तो उन्होंने रोते हुए कहा कि कासिम ने उन्हें अपवित्र कर आपके पास भेजा है. इससे खलीफा भड़क गया. उसने तुरन्त दूत भेजकर कासिम को सूखी खाल में सिलकर हाजिर करने का आदेश दिया. जब कासिम की लाश बगदाद पहुंची, तो खलीफा ने उसे गुस्से से लात मारी. दोनों बहिनें महल की छत पर खड़ी थीं. जोर से हंसते हुए उन्होंने कहा कि हमने अपने देश के अपमान का बदला ले लिया है. यह कहकर उन्होंने एक दूसरे के सीने में विष से बुझी कटार घोंप दी और नीचे खाई में कूद पड़ीं. खलीफा अपना सिर पीटता रह गया.

June 19th 2019, 5:57 pm

राष्ट्रहित के मुद्दों पर मंथऩ के साथ विहिप केन्द्रीय मार्गदर्शक मंडल की बैठक प्रारम्भ

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हरिद्वार. विश्व हिन्दू परिषद् के केंद्रीय मार्गदर्शक मण्डल की बैठक पूज्य स्वामी विवेकानन्द सरस्वती जी महाराज तथा युगपुरुष पूज्य महामण्डलेश्वर स्वामी परमानन्द जी महाराज की अध्यक्षता में हरिद्वार में प्रारम्भ हुई. बैठक के प्रारम्भ में विश्व हिन्दू परिषद के कार्याध्यक्ष आलोक कुमार जी ने सभी सन्तों का स्वागत करते हुए अपने प्रस्ताविक उद्बोधन में लोकसभा चुनावों के परिणामों पर संतोष व्यक्त किया और कहा कि इस चुनाव में राष्ट्रवाद, हिन्दुत्व और विकास के मुद्दों की विजय हुई है, परिवारवाद, जातिवाद, तुष्टिकरण और भ्रष्टाचार की राजनीति परास्त हुई है. विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष वी.एस. कोकजे ने धारा 370 तथा 35ए की विस्तृत जानकारी पूज्य सन्तों के समक्ष रखी. देश भर से पधारे पूज्य संतों ने यह माना कि पिछली नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा राष्ट्रहित में जो महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए थे, उन्हीं पर देश की जनता ने अपनी स्वीकृति प्रदान की है.

प्रेसवार्ता में हरिद्वार के अखंड परमधाम आश्रम के पूज्य संत युगपुरुष परमानंद जी महाराज ने कहा कि इस सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में राष्ट्रहित में अनेक महत्वपूर्ण कार्य सफलतापूर्वक प्रारंभ किये थे. जिनमें गो-वंश के संरक्षण, संवर्धन व सुरक्षा की दृष्टि से राष्ट्रीय कामधेनु आयोग की स्थापना, पतित पावनी माँ गंगा की निर्मलता, जिसे कुम्भ के अवसर पर सम्पूर्ण विश्व ने सराहा है, नागरिकता संशोधन अधिनियम के माध्यम से पाकिस्तान, बांग्लादेश व अफगानिस्तान में जिहादी अभियानों से पीड़ित अल्पसंख्यक हिन्दू, बौद्ध, जैन समाज को भारत में सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार, असम में संकल्पपूर्वक भारतीय राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को बनाने का सफल प्रयास तथा इसे सम्पूर्ण देश में लागू करने का संकल्प भी चुनाव अभियान में प्रकट किया था.

उन्होंने कहा कि देश में समान जनसंख्या नीति लागू करने, धारा 370 व 35ए को हटाना व कश्मीरी हिन्दुओं का घाटी में पुनर्वसन करना तथा जम्मू कश्मीर की राजनीति सम्पूर्ण प्रदेश की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करे, इसके लिए विधानसभा क्षेत्रों का पुनः सीमन भी भाजपा के संकल्प पत्र में शामिल था. इसी संकल्प पत्र में श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य श्री राममंदिर निर्माण के रास्ते में आने वाली सब बाधाओं को दूर करने का संकल्प भी किया गया है. जिसको भी अब शीघ्रता से मूर्त रूप देना आवश्यक है.

बैठक में मार्गदर्शक मण्डल ने विश्वास जताया कि नवनिर्वाचित केंद्र सरकार इन सब दिशाओं में शीघ्र आवश्यक कदम उठाएगी तथा देश और समाज के हित में, राष्ट्रीयता, हिन्दुत्व और विकास के सब कार्यों में देश की जनता सरकार को सहयोग देगी. उपस्थित संतों ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में गठित सरकार के प्रति अपनी शुभेच्छा व्यक्त करते हुए प्रभु से कामना की है कि सरकार देश के हित और विकास में सफल हो.

विहिप महासचिव मिलिंद परांडे ने बताया कि कल के सत्र में श्री राम जन्मभूमि के सम्बन्ध में विस्तृत चर्चा होने की सम्भावना है. हो सकता है कि पूज्य संत इस सम्बन्ध में कोई प्रस्ताव भी लाएं.

हरिद्वार के भोपतवाला स्थित अखंड परमधाम में प्रारम्भ हुई दो दिवसीय बैठक में देशभर से आए पूजनीय संत उपस्थित थे.

June 19th 2019, 8:22 am
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