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साहस, स्वाभिमान एवं स्वानुशासन के जीवंत प्रतीक नेताजी सुभाष चंद्र बोस

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प्रणय कुमार

महापुरुष या स्वतंत्रता सेनानी  किसी जाति, प्रांत या मज़हब के नहीं होते. वे सबके होते हैं और सब उनके. उन पर गौरव-बोध रखना स्वाभाविक है. महापुरुषों या स्वतंत्रता सेनानियों को वर्गों या खांचों में बांटना अनुचित चलन है. यह उनके व्यक्तित्व एवं विचारों को संकीर्णता में आबद्ध करना है, उन्हें छोटा करना है. बल्कि यों कहना चाहिए कि राष्ट्रीय जीवन एवं चेतना को ऊर्जा एवं गति देने के बावजूद महापुरुष या स्वतंत्रता-सेनानी संपूर्ण मानव-जाति के होते हैं. और उनके व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व से किसी-न-किसी स्तर पर संपूर्ण मानव-जाति पाथेय एवं प्रेरणा ग्रहण करती है. हां, सार्वजनिक जीवन में प्रतीकों का विशेष महत्त्व होता है और यदि किसी राजनीतिक दल या सामाजिक संगठन की पहल-प्रेरणा से विमर्श की दिशा राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक हो उठती हो तो यह अनुकरणीय एवं स्वागत योग्य बदलाव है.

संपूर्ण विश्व में न्याय, समानता एवं स्वतंत्रता के पैरोकार एवं प्रशंसक उनसे प्रेरणा ग्रहण करते हैं और करते रहेंगे. उनकी प्रतिभा एवं देशभक्ति, जीवटता एवं संघर्षशीलता, साहस एवं स्वाभिमान, स्वानुशासन एवं आत्मविश्वास, संगठन एवं नेतृत्व-कौशल, ध्येय एवं समर्पण सहसा विस्मित करने वाला है. जिस दौर में ऐसा माना जाता था कि ब्रिटिश साम्राज्य का कभी सूर्यास्त नहीं होता, उस दौर में उसे खुली चुनौती देते हुए भारत को स्वतंत्र कराने का स्वप्न संजोना, संकल्प लेना और कुछ अर्थों में उसे सच कर दिखाना – उस तेजस्वी व्यक्तित्व की महत्ता को उद्भासित करने के लिए पर्याप्त है. यह अकारण नहीं है कि वे आज भी युवाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं. उनके द्वारा दिए गए नारे ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा’, ‘दिल्ली चलो’, या ”जय हिंद”- प्रमाणित करते हैं कि वे युवाओं के मन और मिज़ाज की कितनी गहरी समझ रखते थे! ये नारे आज भी युवाओं की धमनियों में साहसिक उबाल लाते हैं, राष्ट्रभक्ति की अलख जगाते हैं, राष्ट्र की शिराओं में गति, ऊर्जा एवं उत्साह का संचार करते हैं. युवा-नब्ज़ पर इतनी गहरी पकड़ रखने, असाधारण शौर्य एवं पराक्रम दिखाने के कारण भारत सरकार द्वारा उनके जन्मदिन को पराक्रम दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा सर्वथा उपयुक्त ही है. निश्चित ही यह सुभाष पर केंद्रित विमर्श को नई दिशा प्रदान करेगा.

उनमें भारतवर्ष के प्रति एक गौरव-बोध था. पर वह गौरव-बोध किसी को छोटा समझने-जतलाने की पश्चिमी कुंठा या दंभ से ग्रसित नहीं था. प्रतिभा एवं सफलता किसी की बपौती नहीं होती. नस्लवादी श्रेष्ठता का दंभ रखने वाले अंग्रेजों को सुभाष ने 1920 में आईसीएस (सिविल सेवा) की परीक्षा उत्तीर्ण करके साफ़ संदेश दिया कि भारतीय किसी से कमतर नहीं, पर प्रखर राष्ट्रप्रेम और 1919 में हुए नृशंस एवं जघन्य जलियांवाला बाग-हत्याकांड के विरोध में उन्होंने अपनी उम्मीदवारी ठुकरा दी और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े. असाधारण व्यक्तित्व, ओजस्वी वाणी, मौलिक-अभिनव चिंतन, दूरगामी दृष्टि के बल पर वे शीघ्र ही कांग्रेस एवं देश में लोकप्रिय हो गए. उनकी लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि 1938 में वे सर्वसम्मति से कांग्रेस का अध्यक्ष तो मनोनीत हुए ही, साथ ही 1939 में उस समय के सर्वमान्य नेता महात्मा गांधी के विरोध के बावजूद उनके घोषित उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया को मिले 1377 के मुकाबले 1578 वोट पाकर कांग्रेस-अध्यक्ष के लिए दोबारा चुन लिए गए, जिसे बाद में सार्वजनिक रूप से गांधी ने अपनी नैतिक हार बताया. नतीज़न सुभाष को महज कुछ महीनों के भीतर ही कांग्रेस-अध्यक्ष के पद से त्यागपत्र देना पड़ा. पर आज के राजनेताओं के लिए यह सीखने वाली बात है कि गांधी जी के विरोध के बावजूद नेताजी के मन में उनके प्रति कोई कटुता या दूरी घर नहीं करने पाई. 04 जून, 1944 को सिंगापुर से एक रेडियो संदेश प्रसारित करते हुए सबसे पूर्व उन्होंने ही महात्मा गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ कहकर संबोधित किया था.

भले ही 1939 में उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया, जिसकी विरासत पर वामपंथी दावा करते हैं. पर सुभाष उनकी तरह राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता को अछूत नहीं मानते-बताते थे. इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि 1928 में कलकत्ता में आयोजित कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन के समय उनकी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की भेंटवार्ता हुई थी. और कहते हैं कि दोनों ने एक-दूसरे के विचारों को जाना-समझा-सराहा था. और वे खोखले नारों या सस्ती लोकप्रियता की सीमाओं को भी ख़ूब समझते थे. इन दिनों कतिपय दल एवं राजनेताओं द्वारा उद्योगपतियों को खलनायक घोषित करने का फैशन चल पड़ा है, जबकि उल्लेखनीय है कि सुभाष ने 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष मनोनीत होने के ठीक बाद से ही भारत में ठोस एवं व्यापक औद्योगीकरण के लिए नीतियां गठित की थीं. वे कुटीर उद्योग पर आधारित गांधीवादी आर्थिक-दर्शन को युगानुकूल एवं आज की बहुविध आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक नहीं मानते थे. इसे लेकर गांधी जी से उनकी मतभिन्नता थी. राष्ट्र के निर्माण में उद्योगपतियों की सकारात्मक भूमिका का उन्हें आभास था. कदाचित वे जानते थे कि ग़रीबी से जूझा जा सकता है, मेहनत कर उससे पार पाया जा सकता है, परंतु उसे राष्ट्रीय गौरव का विषय कदापि नहीं बनाया जा सकता. स्त्रियों को लेकर भी उनकी प्रगतिशील एवं आधुनिक सोच द्रष्टव्य है. आज़ाद हिंद फ़ौज में उन्होंने स्वतंत्र महिला रेजीमेंट का गठन किया था, जिसकी कमान कैप्टन लक्ष्मी सहगल के हाथों में थी. इसे रानी झांसी रेजीमेंट भी कहा जाता था. 1857 के प्रथम स्वाधीनता आंदोलन को चंद देसी रियासतों द्वारा अपना साम्राज्य बचाने का विद्रोह मात्र बताने वालों को उनके इस इतिहास-बोध से सीख लेनी चाहिए.

यह सर्वविदित है कि महान देशभक्त एवं क्रांतिकारी रास बिहारी बोस द्वारा गठित भारतीय स्वतंत्रता लीग को ही उन्होंने 1943 में आज़ाद हिंद फ़ौज का नाम देकर भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रयासरत सबसे प्रभावी एवं सशक्त संगठनों में से एक बनाया. इसमें उन्होंने 4,5000 सैनिक शामिल किए, जो युद्धबंदियों के साथ-साथ दक्षिण-पूर्वी एशिया में बसे भारतीय थे. 21 अक्तूबर, 1943 को उन्होंने सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की अंतरिम सरकार के गठन की घोषणा की, जिसे तत्कालीन जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको, आयरलैंड सरकार ने मान्यता भी दी थी. अंडमान-निकोबार द्वीप समूह पर भारतीय झंडा फ़हराने के बाद वे वहीं नहीं रुके. जबरदस्त आत्मविश्वास एवं युद्धकौशल के बल पर 1944 के प्रारंभ में, कोहिमा सहित उत्तर-पूर्व के बड़े भूभाग को अंग्रेजों से मुक्त कराने में उन्होंने क़ामयाबी पाई. उनकी रहस्यमय एवं आकस्मिक मृत्यु आज भी हर देशभक्त भारतीय के मन को कचोटती और व्यथित करती है. उनकी असमय हुई मृत्य से मां भारती ने अपना सबसे होनहार लाल खो दिया. महापुरुषों का जीवन और दर्शन एक ऐसा दर्पण होता है, जिसमें समाज और सरकार दोनों को अपना-अपना आकलन करना चाहिए और देखना चाहिए कि वे उनके द्वारा गढ़े गए निकर्ष पर कितना खरा उतर पाए हैं?

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January 23rd 2021, 8:38 am

पराक्रम दिवस – जब नेताजी ने अंग्रेजों के संसाधनों से लड़ी अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई

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सौरभ कुमार

देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा था. भारत का एक वीर सपूत देश से सैकड़ों किमी दूर बैठा देश की आजादी के लिए योजना बना रहा था, लेकिन सामने चुनौतियां बड़ी थीं और संसाधन कम. आजादी की लड़ाई के लिए सेना बनानी थी, लेकिन सेना के लिए न रसद की व्यवस्था थी, न हथियारों की. सबसे बड़ी चुनौती थी कि सैनिकों को ट्रेनिंग कैसे दी जाए? ऐसे में रास्ता निकाला गया कि क्यों न अपने दुश्मनों के संसाधनों का इस्तेमाल उनके ही खिलाफ किया जाए. जिन अंग्रेजों से लड़ना था, उन्हीं अंग्रेजों की ट्रेनिंग और हथियार उनके खिलाफ इस्तेमाल करने की योजना बनाई. इस योजना के सूत्रधार थे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और विनायक दामोदर सावरकर.

हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया में एसएन सेन लिखते हैं कि 21 जून, 1940 को बोस की मुलाकात सावरकर से हुई. सावरकर ने बोस को भारत छोड़कर यूरोप जाने और वहां पर भारतीय सैनिकों को व्यवस्थित करने तथा जापान द्वारा ब्रिटेन पर युद्ध की घोषणा करते ही तुरंत हमला करने की सलाह दी थी. आजादी के दो दीवाने एक साथ काम कर रहे थे, नेताजी सेनापति की भूमिका में थे. वहीं छरहरे कदकाठी के सावरकर योजना बनाने में लगे थे. हिन्दू महासभा के दिनों से ही रास बिहारी बोस और वीर सावरकर के अच्छे सम्बन्ध थे. जब भारत में यह योजना बनाई जा रही थी, उस समय रास बिहारी बोस जापान में एक सेना का संगठन कर रहे थे. सावरकर इस बात से भली भांति परिचित थे. इसलिए उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस को जापान जाने की सलाह दी. लेकिन अफ़सोस जुलाई 1940 में बोस को गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन जनवरी 1941 में वह बच निकले और भारत छोड़कर चले गए. जब बोस ने भारत की आजादी के लिए युद्ध और अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति का फायदा उठाने का फैसला लिया, तो उनके इस मिशन में सावरकर और रास बिहारी बोस अहम सहयोगी बन गए.

जापान में सुभाष चन्द्र बोस जब आजाद हिन्द फ़ौज को मजबूत बना रहे थे, तब भारत में सावरकर युवाओं को अंग्रेजी फ़ौज में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहे थे. बड़ी संख्या में भारतीय युवक सावरकर की प्रेरणा से अंग्रेजों की सेना में शामिल होकर हथियार चलाना सीख रहे थे. आज भी कई लोग सावरकर के इस आह्वान का इस्तेमाल उनके खिलाफ करते हैं. उस समय भी सावरकर को खरी खोटी सुना रहे थे. उन्हें अंग्रेजों का पिट्ठू बता रहे थे, लेकिन सावरकर इन आलोचनाओं से परे अपनी योजना में व्यस्त थे. देश-हित के लिए अन्य त्यागों के साथ जन-प्रियता का त्याग करना सबसे बड़ा और ऊंचा आदर्श है, क्योंकि शास्त्रों में कहा गया है – “वर जनहित ध्येयं केवल न जनस्तुति”.

अंग्रेजों को कानों कान खबर नहीं लगी कि किस तरह उनके ही संसाधनों का इस्तेमाल उनके खिलाफ किया जा रहा है. इस योजना के बारे में देश को पता तब चला जब 25 जून 1944 को आजाद हिंद रेडियो पर एक सन्देश सुनाई दिया –

“जब राजनीतिक गुमराही और दूरदर्शिता की कमी के कारण, कांग्रेस पार्टी का हर नेता हिंद फौज के जवानों को भाड़े का सिपाही कहकर निंदित कर रहा है, वैसे समय में यह जानकर अपार खुशी हो रही है कि वीर सावरकर निर्भयतापूर्वक भारत के युवाओं को फौज में शामिल होने के लिए लगातार भेज रहे हैं. ये सूचीबद्ध युवा हमारी आजाद हिंद फौज के लिए सैनिकों और प्रशिक्षित पुरूषों के लिए स्वयं को हमें सौंपते हैं.”

नेताजी के इस मिशन में एक और अहम् सहयोगी थी अनुशीलन समिति. सावरकर से मिलने के बाद जब बोस ने विदेश जाने का फैसला लिया, अनुशीलन समिति भी सहयोग के लिए तैयार हो गयी. नेताजी सुभाष चंद्र बोस एंड इंडियन फ्रीडम स्ट्रगलः सुभाष चंद्र बोसः हीज आइडियाज़ एंड विजन’ में डॉ. मंजू गोपाल मुखर्जी लिखते हैं “इस मिशन में अनुशीलन समिति ने बोस की मदद की थी. सावरकर और रास बिहारी बोस के साथ संपर्क स्थापित किया गया था. अनुशीलन के त्रिदिब चौधरी इस मार्ग से बोस के भागने की संभावनाओं का पता लगाने और पहाड़ी जनजातियों की सहायता प्राप्त करने के लिए उत्तर पश्चिम फ्रंटियर प्रांत में एक सर्वेक्षण के लिए गए.”

इस अनुशीलन समिति के सदस्यों में एक नाम नागपुर के एक डॉक्टर का भी था, वो कोई और नहीं डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार थे. डॉ. हेडगेवार की मृत्यु से कुछ दिन पहले ही हितवाद (23 जून, 1940) और एक अंग्रेजी पत्रिका मॉर्डन रिव्यू दोनों ने ही बोस और हेडगेवार की मुलाकात की सूचना दी थी – “डॉ. हेडगेवार की 51 साल की उम्र में ही नागपुर में मृत्यु हो गई. उनकी मृत्यु से सिर्फ एक दिन पहले ही सुभाष चंद्र बोस उन्हें देखने गए थे.”

इस मुलाकात में क्या बात हुई, क्या योजना बनी इसका जिक्र कहीं नहीं मिलता. लेकिन एक बात तय है कि इस मुलाकात में भारत की स्वाधीनता संग्राम का एक महत्वपूर्ण अध्याय लिखा गया.

आज आजादी के 70 से ज्यादा सालों के बाद नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को वो सम्मान मिला है, जिसके वो असल हकदार हैं. भारत के वीर सपूत की जयंती अब पराक्रम दिवस के तौर पर मनाई जाएगी. आजाद हिन्द फ़ौज के शौर्य को अब लाल किले से सलामी दी जाएगी. लेकिन जब इस सलामी के लिए आप अपना सर ऊंचा उठाएं तो नेताजी के पराक्रम के साथ उन लोगों को भी पहचानने की कोशिश कीजिये, जिन्होंने कदम कदम पर उनका अपमान किया. मुखौटा लगाकार बैठे उन वामपंथियों को पहचानिए जिन्होंने नेताजी की ऐसे अपमानजनक कार्टून बनाए. ये तब भी भ्रम फैला रहे थे, ये आज भी भ्रम फैला रहे हैं. वो तब भी देशभक्तों का मखौल बना रहे थे वो आज भी बना रहे हैं.

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January 23rd 2021, 8:38 am

अंग्रेजों का भारत में प्रवेश

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प्रशांत पोळ

ईस्ट इंडिया कंपनी –

२४ सितंबर, १५९९ को शुक्रवार था. इस दिन, लंदन के फाउंडर्स हॉल में, इंग्लैंड के ८० व्यापारी इकट्ठा हुए थे. १५९९ का इंग्लैंड, यह शेक्सपिअर का इंग्लैंड था. ‘एज यू लाइक इट’ और ‘हेम्लेट’ के कारण पूरे इंग्लैंड में शेक्सपिअर का नाम चर्चा में था. नाट्य, नृत्य, संगीत के वे दिन थे. किंतु इस वातावरण में भी इन व्यापारियों में से अनेक, समुद्रपार व्यापार करने का साहस और रुचि रखते थे. इस बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे, लंदन के तत्कालीन ‘लॉर्ड मेयर’ अर्थात महापौर, सर निकोलस मूसली! इन व्यापारियों ने भारत की समृद्धि के अनेक किस्से सुन रखे थे. भारत से व्यापार करके यूरोप के अनेक देश कैसे तरक्की कर रहे हैं, यह भी उनको दिख रहा था. स्वाभाविकत: इन सब की भारत के साथ व्यापार करने की इच्छा थी.

इस बैठक में शामिल उन ८० व्यापारियों को यह यत्किंचित भी आभास नहीं था कि उनकी इस बैठक से, भविष्य में भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास और भूगोल दोनों बदलने जा रहा है !

इन व्यापारियों ने इस बैठक में तय किया कि इंग्लैंड की रानी एलिजाबेथ (प्रथम) के पास वे अपनी कंपनी प्रारंभ करने की अर्जी देंगे. इस कंपनी का नाम रहेगा – लंदन की ईस्ट इंडिया कंपनी.

क्वीन एलिजाबेथ (प्रथम) ने इस अर्जी पर निर्णय लेने में लगभग पंद्रह महीने लगाए. और सन् १६०० के अंतिम दिवस, अर्थात ३१ दिसंबर को रानी ने कंपनी को मान्यता दी. साथ ही १५ वर्ष के लिये पूर्व की दिशा में व्यापार करने का एकाधिकार भी इस कंपनी को दिया. उन दिनों, रानी की भाषा में पूर्व का अर्थ होता था, केप ऑफ गुड होप से आगे का क्षेत्र. अर्थात् अफ्रीका से पूरब की ओर का सारा क्षेत्र. जब इस कंपनी को चार्टर मिला, तब इसमें २१८ लोग शेयर होल्डर थे. कंपनी का पंजीकृत नाम था – ‘Governor and Company of Merchants of London, Trading into the East Indies.’ हालांकि कंपनी का प्रचलित नाम हुआ ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’.

आगे चलकर सन् १६९५ में ५ सितंबर को एक और ईस्ट इंडिया कंपनी बनी, जिसका पंजीकृत नाम था ‘The English Company, Trading to the East Indies’. इसे इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी कहा गया. मात्र १० वर्षों में यह दोनों कंपनियां मर्ज हुईं और २९ सितंबर, १८०५ को दोनों को मिलाकर एक नई कंपनी बनी – ‘The United Company of Merchants of England, Trading to the East-Indies’ ये सारे कागजों के खेल थे. ये नई कंपनी भी ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ कहलाई.

इस कंपनी में एक गवर्नर और २४ लोगों की कमिटी रहती थी, जो कंपनी की सारी गतिविधियां देखती थी. क्रिस होल्टे अपने ब्लॉग में लिखते हैं, “ईस्ट इंडिया कंपनी यह आज के कॉर्पोरेट्स के लिये मॉडेल कंपनी थी. यह असाधारण सच था, क्योंकि इस कंपनी के पास अपनी फौज थी, यह अपने बूते पर विदेशी संबंध बनाती थी, इसने खुद अपनी लड़ाईयां भी लड़ीं. लड़ाईयां जीतने के लिये और जमीन की चौथ वसूलने के लिये घूस दी…ऐसा सब इसने किया. नीति, नियम तो इसके कोष्ठक में थे ही नहीं.” लगभग १०० वर्षों के इसके इतिहास में इसके मुख्यालय में मात्र ३५ स्थायी कर्मचारी थे.

कपड़ा, मसाले आदि वस्तुओं के व्यापार के लिये बनी यह कंपनी, बाद में व्यापार के साथ बहुत कुछ करने लगी. कंपनी की अधिकृत स्थापना हुई थी, ३१ दिसंबर, १६०० को. इसके ८ वर्ष बाद अर्थात, गुरुवार २४ अगस्त सन् १६०८ को ईस्ट इंडिया कंपनी का पहला जहाज, सूरत के किनारे पर लगा. इस जहाज का कप्तान था विलियम हॉकिन्स. उन दिनों सूरत पर मुगलों का राज था और दिल्ली में मुगल बादशाह जहांगीर बैठा था. किंतु ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुगल बादशाह से अधिकारिक भेंट की सन् १६१२ में. इसके पहले १६११ में कंपनी ने अपना पहला कारखाना लगाया, भारत के पूर्व तट पर, आंध्र प्रदेश के मछलीपटनम में और अगले ही वर्ष १६१२ के पश्चिमी किनारे पर, सूरत में कंपनी ने दूसरा कारखाना खोला.

इसी वर्ष १६१२ में थॉमस रो ने दिल्ली में मुगल बादशाह जहांगीर से भेंट की. और बादशाह से, ‘जहां जहां मुगल सत्ता है, वहां वहां कंपनी को कारखाने लगाने की अनुमति तथा व्यापार करने का एकाधिकार’ मांगा. बदले में ईस्ट इंडिया कंपनी, बादशाह को यूरोप की विशेष वस्तुएं बेचेगी, ऐसा प्रस्ताव दिया. जहांगीर बादशाह ने लगभग तीन वर्ष के पश्चात इस प्रस्ताव को स्वीकार किया.

ब्रिटेन की रानी एलिजाबेथ ने कंपनी को १५ वर्ष तक पूर्व के देशों में व्यापार करने का एकाधिकार दिया था. १६०९ में कंपनी के प्रमुख ‘जेम्स द वन’ ने, रानी से बात कर के कंपनी को अनिश्चित काल तक व्यापार करने का चार्टर (लाइसेंस) दिलाया.

भारत में अंग्रेजों की प्रमुख स्पर्धा पोर्तुगीज व्यापारियों से थी. बाद में फ्रेंच और डच भी इस स्पर्धा में शामिल हुए. पोर्तुगीज लगभग सौ वर्षों से भारत के साथ व्यापार कर रहे थे. भारत के पश्चिमी तट पर उन्होंने अपना स्थान बनाया था. गोवा उनके कब्जे में था और नीचे कालीकट से लेकर ऊपर, दमन दीव तक उन्होंने व्यापार का एक तंत्र बनाया था. अंग्रेज तुलना में नए थे. इसलिये उन्होंने पश्चिमी तट के साथ, भारत के पूर्व तट पर अपने व्यापारी ठिकाने बनाए. कलकत्ता में व्यापारी केंद्र खोला और इसी बंगाल से सत्ता का रास्ता भी बनाया.

आगे जब १६६१ में पोर्तुगाल के राजा की लड़की, कॅथरीन ब्रिगेंजा का विवाह इंग्लैंड के राजपुत्र चार्ल्स (द्वितीय) के साथ हुआ, तो भारत के अंग्रेजों को, अर्थात ईस्ट इंडिया कंपनी को, पोर्तुगीजों की सत्ता वाला मुंबई (तत्कालीन बाँबे) द्वीप दहेज में मिला. कंपनी ने १६६५ तक मुंबई को, एक बड़े व्यापारी केंद्र के रूप में प्रस्थापित किया.

कंपनी के अफसर, मुगल बादशाह जहांगीर को खुश रखने का हर प्रयास कर रहे थे. अंग्रेजों का, जहांगीर के दरबार में तैनात राजदूत थॉमस रो, ने इस बारे में बहुत कुछ लिख रखा है. ये अंग्रेज बादशाह जहांगीर को और उसके कुछ सरदारों को विलायती लड़कियां भेंट करते थे. १६१७ में भारत आए हुए, कंपनी के ‘एने’ जहाज से तीन महिलाएं भी भारत पहुंची. ये तीनों कंपनी के बनाए हुए कानून को तोड़कर भारत पहुंची थी. ये थी – मरियम बेगम, फ्रांसेस स्टील और श्रीमति हडसन. इनमें से फ्रांसेस स्टील यह ब्रिटिश जहाज पर प्रवास के समय में ही गर्भवती थी. उसी जहाज से चलने वाले रिचर्ड स्टील से उसने गुप्त रूप से विवाह किया था. उसका बच्चा भारत की भूमि पर पैदा होने वाला दूसरा अंग्रेज था. ये फ्रांसेस स्टील, दो वर्ष तक जहांगीर बादशाह के अंत:पुर में रही. शायद यह मरियम बेगम से उसकी नजदीकी के कारण हुआ होगा. मरियम बेगम यह आर्मेनियन ईसाई थी और वह भी जहांगीर के अंत:पुर में उसकी रखेली बनकर रही थी. यह सिलसिला आगे भी चलता रहा.

इन सब से खुश होकर, जहांगीर के बाद दिल्ली की गद्दी पर बैठे शाहजहां बादशाह ने १६३४ में अंग्रेज व्यापारियों को, बंगाल प्रांत में मुक्त व्यापार करने की अनुमति दी. आगे चलकर सन् १७१६ में, तत्कालीन मुगल बादशाह फर्रुख सियार ने अंग्रेजों के व्यापार से सारे कर हटा लिये. इसके एवज में उसको अंग्रेजों ने दिये, मात्र ३,००० रुपये ! इस करमुक्त व्यापार का अंग्रेजों को बहुत लाभ हुआ और ठीक चालीस वर्ष के अंदर, अर्थात १७५७ में प्लासी की लड़ाई जीतकर उन्होंने बंगाल पर कब्जा कर लिया. अर्थात व्यापार, और व्यापार के माध्यम से जमीनी सत्ता हथियाने के लिये अंग्रेजों ने छल, कपट, व्यभिचार, भ्रष्टाचार, लड़ाई… सारे रास्ते अपनाए.

भारत की लूट….

भारत से संबंध आने के बाद, अंग्रेजों के शब्दकोष में हिंदी व अन्य भारतीय शब्द प्रवेश करने लगे. अब तो ‘जुगाड़’, ‘दादागिरी’, ‘ सूर्य नमस्कार’, ‘अच्छा’, ‘चड्डी’ आदि शब्द भी ऑक्सफोर्ड अंग्रेजी शब्दकोष में अपना स्थान बनाए हुए हैं. किंतु इस ऑक्सफोर्ड अंग्रेजी शब्दकोष में शामिल होने वाला पहला हिंदी शब्द कौन सा था?

वह शब्द था… ‘लूट…!’

विलियम डार्लिंपल (William Darlymple) ने ईस्ट इंडिया कंपनी पर एक विस्तृत पुस्तक लिखी है ‘The East India Company : The Original Corporate Riders’ इस पुस्तक में वे लिखते हैं –

“One of the very first Indian words to enter the English language was the Hindustani slang for plunder: “loot”. According to the Oxford English Dictionary, this word was rarely heard outside the plains of north India until the late 18th century, when it suddenly became a common term across Britain.”

ऐसा कहते हैं कि ईस्ट इंडिया कंपनी पर इंग्लैंड की संसद का नियंत्रण था. यदि यह सच है, तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत को जो जी भरकर लूटा है, उसमें इंग्लैंड की संसद अर्थात ब्रिटिश शासन भागीदार था.

क्रिस व्होल्टे लिखते हैं, “The East India Company would have a tradition of smuggling, piracy, trafficking, all kinds of fraud, privatizing government functions, private militaries and looting. All enabled by that first charter.”

(In his blog ‘Holte’s Thoughts’ on Sunday, August 6, 2017)

क्रिस होल्ट आगे लिखते हैं, The reality of East India Company, was that it was basically an organization of pirates, privateers in that everything they did was ‘legal’, at least from the point of view of the British Crown.

अंग्रेज कितने लुटेरे थे, ये उन्होंने भारत के एक हिस्से, बंगाल पर हुकूमत कायम करते ही साथ दिखा दिया. १७५७ में प्लासी के युद्ध में बंगाल के नवाब को परास्त करने के बाद अंग्रेजों ने कोई विवेक नहीं दिखाया, और न ही ‘सोफेस्टिकेशन’. उन्होंने तो ठेठ लुटेरों के जैसे, बंगाल के पूरे खजाने को १०० जहाजों में भरा और गंगा में, नवाब महल से, कलकत्ता के उनके मुख्यालय, ‘फोर्ट विलियम’ में पहुंचाया.

उन दिनों बंगाल देश का संपन्न प्रांत था. बंगाल का खजाना अत्यंत समृद्ध था. ऐसे भरे पूरे खजाने का अंग्रेजों ने क्या किया ?

इसमें का अधिकतम हिस्सा इंग्लैंड पहुंचाया गया, और उसी पैसों के एक बड़े हिस्से से, इंग्लैंड के वेल्स प्रांत में स्थित पोविस के किले का जीर्णोद्धार किया गया. इस किले का मालिकाना हक, बाद में रोबर्ट क्लाईव के परिवार के पास आया.

बंगाल की इस लूट के बाद भी, सत्ता में होने के कारण अंग्रेज, बंगाल को निचोड़ते रहे, और ज्यादा लूटते रहे. किंतु कुछ ही वर्षों बाद जब बंगाल का महाभयानक सूखा पड़ा, तब इन अंग्रेज शासकों ने क्या किया ?

कुछ नहीं ! कुछ भी नहीं..!!

१७६९ से १७७१ यह तीन वर्ष भयानक सूखे के रहे. लेकिन आज लोकतंत्र का दंभ भरने वाले अंग्रेजों ने क्या किया ? लूटे हुए खजाने का एक छोटा हिस्सा भी सूखाग्रस्तों को दिया ?

उत्तर नकारात्मक है.

इस महाभयानक सूखे में लगभग एक करोड़े लोगों की जानें गईं. अर्थात् एक तिहाई जनसंख्या मारी गई. लेकिन कंपनी, बंगाल का सारा राजस्व इंग्लैंड भेजती रही, और बंगाल में लोग मरते रहे. क्रिस होल्टे लिखते हैं, “The East India Company was devoted to organized theft. Bengal’s wealth rapidly drained into Britain.”

बंगाल में सूखे के कारण हुई मौतें यह प्राकृतिक आपदा नहीं थी, यह था नरसंहार !

अमेरिका के UCLA कॉलेज के Social Sciences के वेब पेज पर लिखा है – “Years of its administration were calamitous for the people of Bengal. The Company’s servants were largely a rapacious and self-aggrandizing lot, and the plunder of Bengal left the formerly rich province in a state of utter destitution. The famine of 1769-70, which the Company’s policies did nothing to alleviate, may have taken the lives of as many as a third of the population.” In other words, genocidal.”

मैथ्यू व्हाइट यह प्रख्यात अमेरिकन इतिहासकार हैं. वर्ष २०११ में उन्होंने एक पुस्तक लिखी, जिसकी चर्चा सारे विश्व में हो रही हैं. पुस्तक हैं – The Great Big Book of Horrible Things. इस पुस्तक में उन्होंने विश्व की १०० सबसे ज्यादा क्रूरतापूर्ण घटनाओं का वर्णन किया है. इस सूची में चौथे क्रमांक पर हैं, अंग्रेजों की हुकूमत में भारत में पड़ा अकाल..! इस विपदा मे, मेथ्यू व्हाइट के अनुसार २ करोड़ ६६ लाख भारतीयों की मृत्यु हुई थी. इसमें द्वितीय विश्व युद्ध के समय बंगाल के अकाल में मृत ३० से ५० लाख भारतीयों की गिनती नहीं है. अर्थात भारत में अंग्रेजी सत्ता के रहते ३ करोड़ से ज्यादा भारतीयों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था.

नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने भी वर्ष १७६९ के अकाल में मरने वालों की संख्या १ करोड़ से ऊपर बताई है. बंगाल उन दिनों अत्यंत उपजाऊ और समृद्ध प्रदेश माना जाता था. ऐसे बंगाल में इतनी ज्यादा संख्या में लोक भुखमरी से मारे गए, यह समझ से बाहर है.

अकाल यह तो प्राकृतिक आपदा थी. इसमें भला अंग्रेजी हुकूमत का क्या कसूर.? ऐसा प्रश्न सामने आना स्वाभाविक है. किन्तु इस संदर्भ में प्रख्यात इतिहासकार एवं तत्ववेत्ता विल ड्यूरांट लिखते हैं –

“भारत में १७६९ में आए महाभयंकर अकाल की जड़ में निर्दयता से किया गया शोषण, संसाधनों का असंतुलन और अकाल के समय में भी अत्यंत क्रूरता से वसूल किए गए महंगे कर थे. अकाल के कारण हो रही भुखमरी से तड़पते किसान कर भरने की स्थिति में नहीं थे. किन्तु ऐसे मरणासन्न किसानों से भी अंग्रेज़ अधिकारियों ने अत्यंत बर्बरतापूर्वक कर वसूली की.”

जिस भ्रष्टाचार द्वारा अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से भारत में सत्ता हथियाई, उसी भ्रष्टाचार की घुन, कंपनी को बड़ी संख्या में लगी थी. कुछ अनुपात में तो, प्रारंभ से ही कंपनी ने अपने कर्मचारियों को व्यक्तिगत कमाने की छूट दे रखी थी. अन्यथा इतने साहसी, कठिन और अनिश्चित अभियान पर कर्मचारी मिलना, कंपनी को कठिन जा रहा था.

राबर्ट क्लाईव ने सारे छल कपट का प्रयोग करके बंगाल की सत्ता हथियाई थी. उसके बाद अंग्रेजों ने बंगाल को जी भर के लूटा. इस लूट का एक बड़ा हिस्सा रॉबर्ट क्लाईव के पास गया. वो जब ब्रिटन वापस गया, तब उसके व्यक्तिगत संपत्ति की कीमत आंकी गई थी – २,३४,००० पाउंड. तत्कालीन यूरोप का वह सबसे अमीर व्यक्ति बन गया था. प्लासी की लड़ाई में जीतने के बाद, बंगाल के नवाब का जो खजाना, कंपनी के पास पहुंचा, उसकी कीमत आंकी गई थी, २५ लाख पाउंड.

अर्थात आज के दर से निकालें तो प्लासी की लड़ाई के बाद कंपनी को मिले थे २५ करोड़ पाउंड और रॉबर्ट क्लाईव को मिले थे २.३ करोड़ पाउंड !

स्टर्लिंग मीडिया के चेयरमन एवं प्रख्यात पत्रकार मेहनाज मर्चंट ने इस संदर्भ काफी खोजबीन कर के लिखा है, जो देश के अधिकतम बुद्धिजीवियों को स्वीकार्य है. मर्चेंट लिखते हैं, “१७५७ से १९४७ इन १९० वर्षों में अंग्रेजों ने भारत की जो लूट की है, वह २०१५ के विदेशी मुद्रा विनिमय के आधार पर ३ लाख करोड़ डॉलर होती हैं. इसकी तुलना में १७३८ में नादिरशाह ने दिल्ली लूटी थी, उसकी कीमत, १४,३०० करोड़ डॉलर छोटी लगने लगती है.

अंग्रेजों की इस लूट में, उन्होंने भारतीय सैनिकों का उपयोग, पूरी दुनिया में अलग अलग लोगों से लड़ने में किया, उसका समावेश नहीं है. ब्रिटिश हुकूमत ने, पूरे विश्व पर अपना दबदबा कायम करने के लिए भारतीय सैनिकों को दुनिया के कोने कोने में लड़ने के लिए भेजा. यह सूची लंबी चौड़ी है. चीन में १८६० और १९०० – १९०१, इथिओपिया में १८६७ – ६८, मलाया में १८७५, माल्टा में १८७८, इजिप्त में १८८२, सूडान में १८८५ और १८९६, ब्रम्ह्देश (म्यानमार) में १८८५, पूर्व अफ्रिका में १८९६, १८९७ और १८९८; सोमालीलैंड में १८९० और १९०३ – ०४, तिब्बत में १९०३. इन युद्धों के अलावा प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध में लाखों भारतीय जवान, अंग्रेजों की सेना से लड़े. किसी भी प्रकार के कठिन युद्ध में, अंग्रेज़ अफसर, भारतीय सैनिकों को ही भेजते थे. इथिओपिया के अबिसिनीया में कैद अंग्रेजों को छुड़ाने के लिए १२,००० भारतीय सैनिक भेजे गए थे. इजिप्त के विद्रोह को कुचलने के लिए ९,४४४ सैनिक भेजे गए. ब्रम्ह्देश के युद्ध में भेजे गए सात में से छह भारतीय सैनिक युद्ध में या बीमारी से, मारे गए. ऐसे लगभग सभी युद्धों में भारतीय सैनिकों की असीम हानि हुई.

उन्नीसवी शताब्दी के अंत में अंग्रेजों के पास ३ लाख २५ हजार की खड़ी फौज थी. इन में से दो तिहाई सैनिकों को भारत के कर दाताओं के पैसों से ही वेतन और अन्य सुविधाएं दी जाती थी. भारत में तैनात अंग्रेज़ सैनिकों को वेतन तो भारत से मिलता ही था, साथ ही सेवानिवृत्ति के पश्चात का सारा खर्चा भी भारत से ही किया जाता था. और फिर ये सब करते हुए, भारतीय सैनिक और अंग्रेज़ सैनिकों में बहुत ज्यादा असमानता रहती थी. उनके वेतन में, पदोन्नति में, सुख-सुविधाओं में, राशन-पानी में खूब अंतर रहता था. कितना भी शौर्य दिखाया, तो भी भारतीय सैनिक कभी भी अंग्रेज़ सैनिक की बराबरी नहीं कर सकता था.

भारत छोड़ते समय अंग्रेजों के सेना प्रमुख थे, जनरल आचीनलेक. उन्होंने प्रकट रूप से कहा है कि ‘प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में यदि हमारे साथ भारतीय सैनिक नहीं होते, तो हमे जीतना संभव नहीं था’.

संक्षेप मे, अंग्रेज़ अठारवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में विश्व के पटल पर महाशक्ति थे, तो भारतीयों की बदौलत. किन्तु अंग्रेजों ने हमें क्या दिया…? जब अंग्रेज़ भारत आए, तो वर्ष १७०० में, विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी २५% से ज्यादा, अर्थात एक चौथाई थी. उस समय इंग्लैंड का वैश्विक व्यापार में हिस्सा था, मात्र २%. १७०० में इंग्लैंड का कुल आर्थिक उत्पादन मात्र २०० मिलियन पाउंड से भी कम था. किन्तु भारत छोड़ने के बाद, वर्ष १९५० में कुल आर्थिक उत्पादन हो जाता हैं २०० बिलियन पाउंड्स से भी ऊपर..! अर्थात भारत को उपनिवेश बनाकर, इंग्लैंड ने, मात्र २५० वर्षों में अपना कुल आर्थिक उत्पादन एक हजार गुना से भी ज्यादा बढ़ाया ! और भारत की स्थिति क्या थी ? वर्ष १९५० में, विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी रह गई थी ३% से भी कम.

अंग्रेज़ो ने हमें खूब लूटा. जी भर के लूटा. और ऊपर से तुर्रा ये, कि हम तो भारत की भलाई कर रहे थे.

(आगामी ‘विनाशपर्व’ इस पुस्तक के अंश)

References –

  1. Between Monopoly and Free Trade : The English East India Company. – Emily Erikson
  2. The East India Company : The World’s Most Powerful Corporation – Tirthankar Roy
  3. Landmarks in the Constitutional History of India – Atul Chandra Patra
  4. The Anarchy – William Darlymple
  5. Pirates, Loot and the East India Company – Holte’s Thoughts (His blog on August 6th, 2017)
  6. The East India Company : The Original Corporate Riders – William Darlymple
  7. The Great Big Book of Horrible Things – Matthew White
  8. An Era of Darkness : The British Empire in India – Shashi Tharoor

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January 23rd 2021, 8:38 am

23 जनवरी – ब्रिटिश साम्राज्य पर अंतिम निर्णायक प्रहार करने वाले नेता जी सुभाष चंद्र बोस

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यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर अंतिम निर्णायक प्रहार किया था. 21 अक्तूबर, 1943 को नेता जी द्वारा सिंगापुर में गठित आजाद हिन्द सरकार को जापान और जर्मनी सहित नौ देशों ने मान्यता दे दी थी. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर इस सरकार ने 30 दिसंबर को भारत का राष्ट्रध्वज तिरंगा फहरा कर आजाद भारत की घोषणा कर दी थी. अंडमान और निकोबार के नाम बदल कर ‘शहीद’ और ‘स्वराज’ कर दिए गए.

अत: यह कहने में कोई भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि नेताजी द्वारा गठित सरकार स्वतंत्र भारत की पहली सरकार थी. नेताजी सुभाषचंद्र बोस स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे. 30 दिसंबर, 1943 ही वास्तव में भारत का स्वतंत्रता दिवस है. इसी दिन नेताजी ने अखण्ड भारत की सर्वांग एवं पूर्ण स्वतंत्रता का बिगुल बजाया था. दुर्भाग्य से कांग्रेस द्वारा देश का विभाजन स्वीकार कर लिया गया और 15 अगस्त को खण्डित भारत का स्वतंत्रता दिवस स्वीकृत हो गया.

उपरोक्त तथ्यों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में झांक कर देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि स्वतंत्रता संग्राम के इस महत्वपूर्ण एवं निर्णायक अध्याय को जानबूझ कर इतिहास के कूड़ेदान में डाल देने का राष्ट्रीय अपराध किया गया. आजाद हिन्द सरकार के 75 वर्ष पूर्ण हुए हैं, इस अवसर पर देश के नागरिकों, युवा पीढ़ी को ऐतिहासिक तथ्य से अवगत करवाकर गलती को सुधारने का सुनहरा अवसर हमारे पास है.

यही ऐतिहासिक अन्याय वीर सावरकर, सरदार भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, रासबिहारी बोस, डॉक्टर हेडगेवार जैसे सैकड़ों देशभक्त क्रांतिकारियों एवं आजाद हिन्द फौज के 30 हजार बलिदानी सैनिकों के साथ किया गया है. आर्य समाज, हिन्दू महासभा इत्यादि के योगदान को भी नकार दिया गया.

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस कांग्रेस के प्रखर राष्ट्रीय नेता थे. वे किसी भी प्रकार के तुष्टिकरण के घोर विरोधी थे. नेताजी के अनुसार केवल अहिंसक सत्याग्रहों से ही देश आजाद नहीं हो सकता. नेताजी के इसी एक निर्विवाद सिद्धांत के कारण गांधीवादी नेताओं ने उन्हें 29 अप्रैल 1939 को कांग्रेस का अध्यक्ष पद छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया. नेताजी ने 03 मई 1939 को अपने सहयोगियों की सहायता से एक स्वतंत्र संगठन फॉरवर्ड ब्लाक की स्थापना की. उन्होंने समस्त राष्ट्रीय शक्तियों को एकत्रित करने का अभियान छेड़ दिया.

सितंबर 1939 में पोलैण्ड पर जर्मनी के हमले के साथ द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारंभ हो गया. ब्रिटेन और फ्रांस भी युद्ध में कूद पड़े. नेताजी ने इस अवसर का लाभ उठाकर अंग्रेजों की सत्ता उखाड़ने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास प्रारंभ कर दिए. उन्होंने अनेक क्रांतिकारी नेताओं वीर सावरकर, डॉक्टर हेडगेवार एवं डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे स्वातंत्र्य योद्धाओं के साथ मिलकर निर्णायक प्रहार का ऐतिहासिक फैसला किया.

इसी उद्देश्य से नेताजी गुप्त रूप से विदेश चले गए. वहां उन्होंने हजारों क्रांतिकारी देशभक्त भारतीय युवाओं की योजनाबद्ध ढंग से इस फौज में भर्ती की. इधर, वीर सावरकर ने भारतीय सेना में विद्रोह करवाने की मुहिम छेड़ दी. आजाद हिन्द फौज अपने उद्देश्य के अनुसार सफलता की ओर बढ़ने लगी.

नेताजी के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज ने जिस स्वाधीनता संग्राम का श्रीगणेश किया, उसने तो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विनाश का बिगुल ही बजा दिया. इस फौज के सेनापति सुभाष चन्द्र बोस ने जैसे ही दिल्ली चलो का उद्घोष किया, भारतीय सेना में विद्रोह की आग लग गई. डॉक्टर हेडगेवार, सावरकर और सुभाष चन्द्र के बीच पूर्व में बनी एक गुप्त योजना के अनुसार भारतीय सेना में भर्ती हुए युद्ध सैनिकों ने अंग्रेज सरकार को उखाड़ डालने के लिए कमर कस ली. यह जवान सैनिक प्रशिक्षण लेकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ेंगे, इसी उद्देश्य से भर्ती हुए थे.

राष्ट्रीय अभिलेखागार में उपलब्ध गुप्तचर विभाग की रपटों में कहा गया है कि “20 सितंबर 1943 को नागपुर में हुई संघ की एक गुप्त बैठक में जापान की सहायता से आजाद हिन्द फौज के भारत की ओर कूच के समय संघ की सम्भावित योजना के बारे में विचार हुआ था.” एक दिन अवश्य ही इस दबी हुई सच्चाई पर से पर्दा उठेगा कि वीर सावरकर एक महान उद्देश्य के लिए तथाकथित माफीनामा लिख कर जेल से बाहर आए थे. यह अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंकने जैसा कदम था. अभिनव भारत का गठन, सेना में विद्रोह, और आजाद हिंद फौज की स्थापना इस रणनीति का हिस्सा थे.

सन् 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के तुरंत पश्चात ब्रिटिश शासक इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि अब भारत में उनका रहना और शासन करना संभव नहीं होगा. दुनिया के अधिकांश देशों पर अपना अधिपत्य जमाए रखने की उनकी शक्ति और संसाधन पूर्णतया समाप्त हो चुके हैं. वास्तव में यही वजह थी अंग्रेजों के भारत छोड़ने की.

लखनऊ से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘राष्ट्रधर्म’ के नवंबर 2009 के अंक में के.सी. सुदर्शन जी का एक लेख ‘पाकिस्तान के निर्माण की व्यथा’ छपा था. जिसमें लिखा था – “जिस ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली के काल में भारत को स्वतंत्रता मिली, वे 1965 में एक निजी दौरे पर कोलकत्ता आए थे और उस समय के कार्यकारी राज्यपाल और कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी सी.डी. चक्रवर्ती के साथ राजभवन में ठहरे थे.

बातचीत के दौरान चक्रवर्ती ने सहजभाव से पूछा कि 1942 का आंदोलन तो असफल हो चुका था और द्वितीय विश्वयुद्ध में भी आप विजयी रहे, फिर आपने भारत क्यों छोड़ा? तब एटली ने कहा था कि हमने 1942 के कारण भारत नहीं छोड़ा, हमने भारत छोड़ा नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के कारण. नेताजी अपनी फौज के साथ बढ़ते-बढ़ते इंफाल तक आ चुके थे और उसके तुरंत बाद नौसेना एवं वायु सेना में विद्रोह हो गया था.” जाहिर है कि अंग्रेज शासकों का दम निकल चुका था. अगर उस समय कांग्रेस ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, वीर सावरकर, डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी और संघ के बड़े अधिकारियों के साथ संयुक्त संग्राम छेड़ा होता तो देश स्वतंत्र भी होता और भारत का दुःखद विभाजन भी नहीं होता.

नरेंद्र सहगल

पूर्व प्रचारक, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभ लेखक

9811802320

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January 23rd 2021, 6:53 am

शिक्षा स्वजनों के प्रति गौरव, स्वदेश के प्रति भक्ति जगाने वाली होनी चाहिए – डॉ. मोहन भागवत

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वृंदावन. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि शिक्षा समाज जीवान का एक महत्वपूर्ण अंग है, मनुष्य के जीवन का अविभाज्य अंग है. जीवन की आवश्यकता जो हम मानते हैं, उसमें अन्न, स्वास्थ्य और शिक्षा यह सबसे प्रमुख हैं और इसलिए विद्यालय समाज में प्रारंभ करना यह सदा सर्वदा सर्वत्र आवश्यकता है और उसको पूर्ण करना एक अत्यंत समाजोपयोगी कार्य है. शिक्षा रोजगारपरक होनी चाहिए. शिक्षा प्राप्त करने वाले व्यक्ति को शिक्षा समाप्त होने के बाद इतना आत्मविश्वास मिलना चाहिए कि वह अपने बलबूते पर अपने परिवार को चलाते हुए समाज के प्रति अपने कर्तव्य को पूर्ण कर सके. उसका स्व-निर्भर होना, उसके स्व-ज्ञान पर निर्भर करता है. इसलिए शिक्षा स्व का ज्ञान देने वाली होती है. स्वजनों के प्रति गौरव, स्वदेश के प्रति भक्ति उसके मन में पैदा होनी चाहिए. स्वजनों की स्थिति के प्रति संवेदनशील उसका हृदय शिक्षा में से बनना चाहिए. आत्मनिर्भर भारत में भारत की आत्मा का शब्द पहला है तो हम कौन हैं, हम क्या हैं, हमारा गौरव क्या है, हमारी क्षमता क्या है, आज की हमारी आवश्यकता क्या है, आज की हमारी स्थिति क्या है? इन सबको ठीक करते हुए आज के विश्व को मार्गदर्शन करने वाला एक वैभव संपन्न, बल संपन्न, ऐसा देश खड़ा करने में मैं उपकरण कैसे बनूंगा, इसकी समझ देने वाली शिक्षा चाहिए. सरसंघचालक जी रामकली देवी सरस्वती बालिका विद्या मंदिर के नव निर्मित भवन के लोकार्पण कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि विद्या भारती के तहत चलने वाले विद्यालयों की कीर्ति है कि उसमें यह सब मिलता है. ऐसी शिक्षा प्राप्त करने के लिए हमको विश्व में अन्यत्र देखने की आवश्यकता नहीं है. हमारी पुरानी शिक्षा पद्धति ऐसी थी जो सभी को रोजगार देती थी. सभी जाति, धर्म, पंथ के लोग इसको आकर सीखते थे. अपने बलबूते अपना जीवन खड़ा करते थे. अपनी शक्ति के अनुसार देश में योगदान करते थे. ऐसी हमारी शिक्षा को अंग्रेज इंग्लैंड में ले गए, उस समय वहां पर 17 प्रतिशत साक्षरता थी जो बढ़कर 70 प्रतिशत हो गई. और उन्होंने अपने देश के काउंट्री एजुकेशन सिस्टम को हम पर लाद दिया.

इसलिए मनुष्य के जीवन की सर्वांगीण शिक्षा कैसी होनी चाहिए, हमें अपने स्व की ओर, अपनी आत्मा के अंदर झांकना होगा. विदेशियों की बातों को समझना चाहिए, मानना भी चाहिए, लेकिन सभी बातों को कॉपी करना सही नहीं है. उनकी अच्छी बातों को मानना चाहिए.

उन्होंने कहा कि शिक्षा के कारण मनुष्य की स्वभाव प्रवृत्ति बनती है. माता उसकी पहली शिक्षक होती है. माता के दिए हुए संस्कार जीवनभर साथ देते हैं. एक माता शिक्षित होती है तो उसकी संतानें अपने आप शिक्षित होती हैं. ऐसे विद्यालय का शुभारंभ हुआ है, जिसमें बालिकाएं शिक्षित होंगी. इससे उसकी क्षमता बढ़ेगी. भारत की महिलाएं जब सशक्त बनेंगी तो अपने देश के पुरुषों सहित देश का उद्धार तो करेगी हीं, लेकिन पूरे जगत के लिए उसका वरदहस्त एक सुखद वरदान लेकर आएगा. महिला वर्ग को परंपरा की कुछ बातों में जकड़ रखा है, उससे उसे मुक्त करना है. उसको पढ़ाना, उसको बड़ा करना और उसको अपना प्रबुद्ध दिखाने के लिए स्वतंत्र रखना. स्वभाव से महिला वात्सल्य देने वाली है. भारत की महिला अपने परिवार को संभालते हुए समाज का काम करती है. इसलिए निःशंक मन से बालिकाओं को शिक्षा देना, बड़ा करना, सक्षम बनाना और उनकी इच्छानुसार अपने कर्तव्य को दिखाने का अवसर देना चाहिए.

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January 21st 2021, 11:35 am

हेमू कालाणी के 78वें बलिदान दिवस पर श्रद्धांजलि श्रृंखला का आयोजन

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जयपुर. भारतीय सिंधु सभा जयपुर महानगर द्वारा अमर बलिदानी हेमू कालाणी के 78वें बलिदान दिवस पर श्रद्धांजलि श्रृंखला का आयोजन किया गया. 23 मार्च, 1923 को जन्मे हेमू कालाणी ने भारत की स्वतंत्रता के लिए 21 जनवरी, 1943 को अपना बलिदान दिया था. जयपुर में सिन्धु सभा द्वारा कुल 26 स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किए गए. 20 जनवरी सायंकाल 11 अलग-अलग स्थान पर कार्यक्रम आयोजित किए गए. 10 स्थान पर आज प्रातः कार्यक्रमों का आयोजन किया गया. अन्य स्थानों पर शाम को कार्यक्रम आयोजित किए गए.

मानसरोवर के हेमू कलाणी पार्क में आयोजित श्रद्धांजलि-ए-दीपदान कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक कैलाश जी, पूर्व विधायक ज्ञानदेव आहूजा, सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे.

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January 21st 2021, 11:35 am

पुणे के सीरम इंस्टिट्यूट में लगी भीषण आग, दमकल विभाग की गाड़ियां मौके पर मौजूद

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पुणे. पुणे के सीरम इंस्टीट्यूट में गुरुवार दोपहर आग लगने से अफरातफरी मच गई है. जानकारी के अनुसार सीरम इंस्टीट्यूट की इमारत में आग लगी है. बीसीजी टीका बनाने वाली इमारत में आग लगी है. पुणे के सीरम इन्स्टीट्यूट के दूसरी मंजिल पर आग लगी है. आग बुझाने का काम युद्ध स्तर पर शुरू है.

दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन निर्माता कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के पुणे स्थित मंजरी प्लांट में आज (21 जनवरी) आग लग गई. इस हादसे में हुए नुकसान की फिलहाल जानकारी नहीं मिली है, लेकिन यह पता चला है कि इस प्लांट में कोरोना वैक्सीन कोविशील्ड नहीं बनाई जा रही थी.

सीरम इंस्टीट्यूट के गेट नंबर एक पर मंजरी प्लांट है, जहां आग लगी. वहीं, गेट नंबर-तीन, चार और पांच पर मौजूद प्लांट में कोविड वैक्सीन का निर्माण व भंडारण आदि किया जाता है. ये तीनों गेट हादसे वाली जगह से एकदम विपरीत दिशा में हैं.

मौके पर फायर ब्रिगेड की 10 गाड़ियां भेजी गई हैं. इससे वैक्सीन के उत्पादन पर असर नहीं पड़ेगा. साथ ही वैक्सीन स्टोरेज भी सुरक्षित है. कोई भी व्यक्ति निर्माणाधीन इमारत में नहीं फंसा है. आग लगने की वजह अभी तक मालूम नहीं चल सकी है.

सीरम इंस्टीट्यूट के सीईओ अदार पूनावाला ने कहा, ”आपकी चिंता और प्रार्थनाओं के लिए सभी को धन्यवाद. आग लगने से किसी की जान नहीं गई है और न कोई घायल हुआ है. कुछ मंजिलों को नुकसान पहुंचा है.”

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January 21st 2021, 11:35 am

श्रीराम मंदिर निर्माण को लेकर अभूतपूर्व उत्साह – डॉ. आरएन सिंह

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पटना. बिहारवासियों में अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण को लेकर उत्साह देखने को मिल रहा है. हर कोई अपनी ओर से बढ़-चढ़कर योगदान देना चाहता है. राज्य में भिक्षुक हो या अमीर; सभी श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर बनने में अपना समर्पण देना चाहते हैं. छातापुर के विधायक नीरज कुमार ‘बबलू’ एवं विधान पार्षद् नूतन सिंह ने ढाई-ढाई लाख रुपये की राशि समर्पित की. बिहार के प्रख्यात चिकित्सक डॉ. सहजानंद सिंह ने 1 लाख रूपये की समर्पण राशि दी.

श्रीराम मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान समिति के बिहार प्रदेश अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. आर.एन. सिंह ने कतिपय मीडिया संस्थानों में प्रकाशित व प्रसारित खबर का खंडन करते हुए कहा कि समर्पण के लिए रसीद की कोई कमी नहीं है. यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. रसीद आती है और लोगों में बांट दी जाती है, फिर उसका हिसाब किया जाता है और रसीद व कूपन से प्राप्त राशि को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए अधिकृत बैंक खाते में जमा कर दिया जाता है. समिति के पास पर्याप्त रसीद व कूपन उपलब्ध है.

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January 21st 2021, 11:35 am

राजधानी भोपाल में धर्म स्वातंत्र्य विधेयक के अंतर्गत पहला मामला, व्हाट्सएप स्टेटस लगाकर दी चुनौती

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भोपाल. राजधानी में  ‘धार्मिक स्वतंत्रता अध्यादेश-2020′ के तहत अशोका गार्डन थाने में पहला मामला दर्ज किया गया है. आरोपी ने धर्म छिपाकर एक लड़की से प्रेम प्रसंग किया. उसके बाद उस पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने लगा. पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है. यह प्रदेश का दूसरा और भोपाल का पहला मामला है. मामले में आरोपी असद ने न सिर्फ लड़की पर धर्मपरिवर्तन का दबाव बनाया, बल्कि जब लड़की ने उससे दूरी बनानी शुरू की तो उसने व्हाट्सएप्प के स्टेटस में चुनौती देते हुए एक दूसरी लड़की की फोटो के साथ लिखा “My new girlfriend, और ये भी हिन्दू”, दूसरे स्टेटस में उसने लिखा “अब देखते हैं कौन भक्त आएगा बीच में…..”. ये दो स्टेटस आरोपी युवक की विकृत मानसिकता को दर्शाते हैं.

एएसपी राजेश सिंह भदौरिया ने बताया, आरोपी असद ने आशु बनकर छात्रा से दोस्ती की. आरोपी ने अपना धर्म छिपाकर उसके साथ कई बार दुष्कर्म भी किया. दोनों की दोस्ती वर्ष 2019 से थी. दोनों जब रायसेन गए, तब युवक के धर्म के बारे में लड़की को पता चला. इसके बाद आरोपी ने उस पर धर्म परिवर्तन करने का दबाव बनाया. इतना ही नहीं, उसके साथ मारपीट भी की.

यह है पूरा मामला

पीड़िता मूलत: बालाघाट की रहने वाली 23 वर्षीय युवती इंजीनियरिंग द्वितीय वर्ष की छात्रा है. वह अशोका गार्डन इलाके में किराये पर कमरा लेकर रहती है. वर्ष 2019 में वह जिस बस स्टॉप से बस पकड़ती थी, वहां एक 30 वर्षीय आशु नाम का युवक उसका पीछा कर बात करने की कोशिश करता था. वह अपने आप को मैकेनिकल इंजीनियर बताता था. नवंबर 2019 में धीरे- धीरे दोनों की दोस्ती हो गई. 12 दिसंबर, 2019 को आरोपी युवक छात्रा के घर पहुंचा और खुद को हिंदू बताकर उससे शादी करने की इच्छा जाहिर की और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए. इसके बाद साल 2020 में मई महीने में आशु एक फंक्शन में गया था, उसी दौरान वह मस्जिद गया और मस्जिद में नमाज पढ़ने लगा. पीड़िता ने जब उससे पूछा तो उसने बताया कि वह मुस्लिम है और उसका असली नाम असद है. वह मैकेनिकल इंजीनियर नहीं, बल्कि एक साधारण मैकेनिक है. यह बात सुनकर पीड़िता ने आरोपी से कहा कि तुमने धोखा दिया है. इसके बाद युवती ने उससे दूरी बना ली. तो अक्तूबर 2020 में आरोपी ने छात्रा के साथ सड़क पर ही गाली-गलौज और मारपीट भी की. बीती 11 जनवरी को भी उसने युवती को रोका और धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया.

मंगलवार को उसने युवती की तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए आपत्तिजनक टिप्पणी की. परेशान होकर युवती ने इसकी शिकायत भाजपा भोपाल जिला कार्यसमिति सदस्य संजय मिश्रा से की और उनके साथ अशोका गार्डन थाने पहुंची. पीड़ित की शिकायत पर पुलिस ने धार्मिक स्वतंत्रता अध्यादेश-2020’ के तहत मामला दर्ज किया. आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है. आरोपी ऐशबाग भोपाल का रहने वाला है.

 

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January 21st 2021, 11:35 am

गुरु गोविंद सिंह जी ने श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए दो बार युद्ध किया – विनोद बंसल

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नई दिल्ली. खालसा पंथ के संस्थापक दशमेश गुरु जी का हमारे देश, धर्म व संस्कृति की रक्षा हेतु योगदान विश्व इतिहास में अनुपम है. उन्होंने मात्र नौ वर्ष की उम्र में गुरु गद्दी संभाली तथा अपनी तीन पीढ़ियों के नौ रक्त संबंधियों को राष्ट्र की बलिवेदी पर बलिदान कर दिया. विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने आज गुरु गोविंद सिंह जी के प्रकाश पर्व पर आयोजित प्रकाश यज्ञ के उपरांत कहा कि महान गुरु ने अपनी निहंग सेना के साथ अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए भी दो बार युद्ध किया. हमें खुशी है कि गुरु जी का वह प्रयास आज फलीभूत होकर भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर एक भव्य मंदिर का निर्माण प्रारंभ हो रहा है.

आज प्रात: दक्षिणी दिल्ली के संत नगर स्थित आर्य समाज मंदिर में आयोजित कार्यक्रम में विनोद बंसल ने कहा कि आज भी अयोध्या में मौजूद गुरुद्वारा श्री ब्रह्मकुंड साहिब के दर्शन के लिए देश और दुनिया के कोने-कोने से श्रद्धालु आते हैं. कहा जाता है कि गुरु नानकदेव जी महाराज, नवम् गुरु तेग बहादुर जी महाराज तथा दशमेश गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड में ध्यान किया था. गुरुद्वारे में रखी एक किताब के अनुसार मां गुजरीदेवी एवं मामा कृपाल सिंह के साथ पटना से आनंदपुर जाते हुए दशम् गुरु गोविंद सिंह जी ने रामनगरी में ही धूनी रमाई थी. अयोध्या प्रवास के दौरान उन्होंने मां एवं मामा के साथ रामलला का दर्शन भी किया था. गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड में गुरु गोविंद सिंह जी के अयोध्या आने की कहानियों से जुड़ी तस्वीरें व खंजर, तीर और दस्तार चक्र जैसी निशानी आज भी भक्तों की श्रद्धा का केंद्र हैं. अयोध्या के चिमटाधारी साधु बाबा वैष्णवदास के आह्वान पर लड़ी उनकी सेना ने मुगल शासक औरंगजेब की शाही सेना को बुरी तरह से परास्त किया था.

उन्होंने कह कि गुरु नानक देव जी महाराज भी सन 1528 से पूर्व तब अयोध्या गए थे, जब भव्य राम मंदिर वहां था. किन्तु लाहौर में जब उन्हें खबर लगी कि औरंगजेब ने मंदिर तोप से उड़ा दिया तो उन्होंने अपना दुख व्यक्त करते हुए अपने प्रिय शिष्य मरदाने को कहा था कि मेरा वंशज ही एक दिन उसके लिए लड़ेगा. गुरु तेग बहादुर जी महाराज भी अयोध्या गए थे.

कार्यक्रम में मंदिर की संचालिका व वैदिक विदुषी दर्शनाचार्या विमलेश आर्या सहित अन्य उपस्थित थे.

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January 20th 2021, 1:22 pm

तेरा तुझको अर्पण – मिस्त्री का काम करने वाले राम ने श्रीराम को समर्पित किए 51000 रु

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आर्थिक हालात भले ही कमजोर हों, लेकिन भगवान राम में आस्था इतनी मजबूत कि अब श्रीराम मंदिर के लिए अपनी मेहनत से कमाई जमा पूंजी को मंदिर निर्माण में देने से पीछे नहीं हट रहे. निधि समर्पण अभियान के दौरान देशभर से ऐसे अनेक उदाहरण सामने आ रहे हैं.

रतलाम में एक ऐसा ही भगवान राम का भक्त सामने आया है. जो मिस्त्री का काम करता है. रोज के कुछ रुपये कमाने के लिए लोगों के सपनों के घर की एक-एक ईंट को बारीकी से नापतोल कर जोड़कर उनका आशियाना तैयार करता है. लेकिन अपनी सालों की कमाई पूँजी से बचाई 51 हजार की राशि भगवान श्रीराम के चरणों में समर्पित कर दी.

रतलाम के राम कुमावत, जो रोज भगवान के समक्ष हाथ जोड़कर इस आस्था के साथ घर से निकलता है कि भगवान उसे आज कुछ नया काम देगा. मिस्त्री का काम करने वाला राम प्रतिदिन दिहाड़ी में एक-एक ईंट जोड़कर लोगों के आशियाने बनाता है.

सपना था राम मंदिर बने

मेहनत मजदूरी से मिले पैसे से राम ने 51 हजार रुपये जमा किये थे. ये राशि उन्होंने अपने भगवान राम के मंदिर निर्माण के लिए सहयोग के रूप में दे दी. श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान समिति को मिस्त्री राम कुमावत ने 51 हजार रुपये का चेक दिया है. उनका कहना है कि यह उनका सपना था कि राम मंदिर का निर्माण हो.

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान समिति के पालक शुभम चौहान ने कहा कि संपन्न लोग तो श्रीराम मंदिर निर्माण में सहयोग के लिए आगे आ ही रहे हैं. लेकिन इस तरह सामर्थ्य से अधिक बढ़कर लोगों का समर्पण बताया है कि श्रीराम मंदिर का निर्माण सिर्फ आस्था का ही नहीं, बल्कि भारत के हर व्यक्ति का स्वप्न है.

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January 20th 2021, 1:22 pm

श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निधि समर्पण अभियान के निमित्त शोभायात्रा

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हरिद्वार. श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण निधि समर्पण अभियान के तहत श्रीनारायण घाट आर्य नगर से भगवान श्रीराम की शोभा यात्रा निकाली गई. शोभायात्रा आर्य नगर चौक, शंकर आश्रम, प्रेम नगर आश्रम, मॉडल कॉलोनी, भगत सिंह चौक, शिवलोक कॉलोनी, टिबड़ी से घूमते हुए वापस टिबड़ी फाटक, विवेक विहार सलोनी से निकलते हुए चंद्राचार्य चौक से खन्ना नगर होते हुए रामनगर स्थित शिव मंदिर पर संपन्न हुई. इस अवसर पर सैकड़ों राम भक्त शोभायात्रा में सम्मिलित हुए. यही नहीं जगह जगह पर माता बहनों द्वारा भगवान राम की आरती उतारी गई व पुष्प वर्षा की. श्री नारायण घाट पर पूजा अर्चना हवन के बाद शोभा यात्रा का प्रारंभ हुआ.

वक्ताओं ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाने का सपना देखा था. जिसे वह अपने जीते जी तो पूरा नहीं कर सके, लेकिन उनके जाने के बाद आज हमें यह अवसर मिला है कि हम श्रीराम जन्मभूमि पर प्रभु श्रीराम का भव्य मंदिर बनवा सकें. श्रीराम मंदिर निर्माण में समर्पण- सहयोग के लिए देशव्यापी अभियान चलाया जा रहा है. जिसमें प्रत्येक हिन्दू अपने सामर्थ्य के अनुसार समर्पण कर भगवान श्री राम के मंदिर में सहयोग कर सकता है.

शोभा यात्रा

19 जनवरी, 2021 को श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण निधि समर्पण अभियान के अंतर्गत जन-जागरण हेतु रामभक्तों की विशाल शोभायात्रा हरजिंदर नगर कानपुर से निकली. जिसका शुभारम्भ श्री पनकी हनुमान मन्दिर के पूज्य महंत महामंडलेश्वर श्री जितेंद्रदास जी महाराज और विश्व हिन्दू परिषद के प्रांत अध्यक्ष राजीव महाना जी ने किया.. शोभायात्रा में श्रीराम दरबार पर जगह-जगह श्रद्धालु जनमानस ने पुष्प वर्षा की, माताओं ने भावविभोर होकर श्री रामलला की सुंदर झांकी की आरती उतारी और श्रीराम जन्मभूमि निधि समर्पण अभियान में अधिक से अधिक सहयोग करने का संकल्प लिया. शोभायात्रा हरजिंदर नगर से प्रारम्भ होकर लाल बंगला होते हुए ओमपुरवा के प्रभुधाम मन्दिर में सम्पन्न हुई.

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January 20th 2021, 1:22 pm

समाज में जल संरक्षण, प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए कार्य करना है – डॉ. मोहन भागवत

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वृंदावन. ब्रज प्रांत में तीन दिवसीय प्रवास के दूसरे दिन मंगलवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने प्रांत कार्यकारणी व गतिविधियों के कार्यकर्ताओं की ठक में कहा कि वैश्विक महामारी कोरोना के कारण समाज में अनेक प्रकार की समस्याओं ने जन्म लिया है. जिनके समाधान के लिए संघ के स्वयंसेवक बंधुओं को समाज को जागरूक करने की आवश्यकता है. साथ ही जिलास्तर पर अध्ययन करके समाज में स्वास्थ्य के प्रति प्रबोधन करना है.

वृंदावन के केशव धाम में आयोजित बैठक में कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन करते हुए सरसंघचालक जी ने कहा कि शैक्षिक स्तर पर अभावों में जीवन यापन वाले वर्ग के बालकों की कोचिंग, पुस्तकें व शुल्क आदि के लिए समाज को अपना दायित्व मानकर सहयोग करने हेतु जागरूक करने की आवश्यकता है. रोजगार की दृष्टि से पलायन कर लौटे बन्धुओं को, जिससे परिवार का भरण-पोषण ठीक प्रकार से हो सके, ऐसी योजना बनाकर उनके लिये काम की योजना तथा प्रशिक्षण की महती व्यवस्था करने की भी आवश्यकता है. अनेक प्रकार से अवसाद में आए बन्धुओं की काउंसलिंग की व्यवस्था के लिए स्वयंसेवक बन्धुओं को आगे आकर अपना दायित्व पूर्ण करने की योजना बनानी चाहिए.

सरसंघचालक जी ने कहा कि शाखा द्वारा व्यक्ति निर्माण तथा गतिविधियों के माध्यम से समाज जीवन में परिवर्तन – इस दृष्टि से परिवार प्रबोधन, सामाजिक समरसता तथा पर्यावरण जैसी प्रमुख गतिविधियों को छोटी-छोटी इकाइयों पर टोली बनाकर समाज को जोड़कर उनके दायित्व का बोध कराना है. साथ ही व्यक्ति आचरण से समाज में परिवर्तन हो, ऐसे प्रयासों को गति देनी है.

उन्होंने कहा कि संघ के स्वयंसेवकों द्वारा संचालित गतिविधियों का प्रत्यक्ष आचरण हमारे परिवार, व्यवसाय, सामाजिक व व्यक्तिगत जीवन में प्रारंभ हो,  ऐसा प्रयास किया जाना चाहिए. समाज में जल संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़े और हरियाली और प्रकृति संरक्षण के लिए समाज में चेतना का प्रवाह हो, प्रकृति संरक्षण समाज-परिवार में आचरण बने, इसका भी प्रयास स्वयंसेवकों को करना है.

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January 20th 2021, 1:22 pm

समाधान के लिए बीच का रास्ता निकालना चाहिए – भय्याजी जोशी

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ने कहा कि कहा कि कृषि कानून से जुड़े मुद्दों को सुलझाने के लिए बीच का रास्ता निकाला जाना चाहिए. सरकार और प्रदर्शनकारी किसानों, दोनों को इस दिशा में सकारात्मक पहल करना चाहिए. अंग्रेजी दैनिक द इंडियन एक्सप्रेस के साथ साक्षात्कार में संघ सरकार्यवाह ने विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की.

बातचीत के कुछ अंश –

किसानों के आंदोलन पर

किसानों को सरकार के साथ उन मुद्दों पर जरूर चर्चा करनी चाहिए, जिनको लेकर उनको संदेह है. अब तक, ऐसा लगता है कि सरकार इस तरह की चर्चा के लिए तैयार है. दोनों ओर से सकारात्मक पहल होनी चाहिए. अगर आंदोलनकारी भी सकारात्मक रुख अपनाते हैं तो यह अच्छा होगा. किसी को भी आंदोलन करने से कोई समस्या नहीं होनी चाहिए. लेकिन एक बीच का रास्ता निकलना चाहिए. एक आंदोलन न केवल इससे जुड़े लोगों को प्रभावित करता है, बल्कि समाज को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भी प्रभावित करता है. किसी भी आंदोलन का बहुत लंबे समय तक चलना समाज की सेहत के लिए अच्छा नहीं है. इसलिए एक बीच का रास्ता निकलना जरुरी है और दोनों पक्षों को समाधान खोजने के लिए काम करना चाहिए.

सीएए पर

हमारी लंबे समय से यह मांग रही है कि भारत को छोड़कर हिंदुओं के पास कोई दूसरा देश नहीं है. इसलिए भारत को बाहर से आने वाले हिंदुओं को नागरिकता देने के बारे में सोचना होगा. पाकिस्तान से इतने लोग वहां अत्याचार सहने के बाद भारत आए हैं और दिल्ली में फुटपाथों पर रह रहे हैं. भारत, पाकिस्तान के मुसलमानों को भी नागरिकता दे रहा है. अगर सरकार अल्पसंख्यकों के खिलाफ होती, तो उन्हें नागरिकता नहीं दी जाती.

लव जिहाद पर

लोगों के प्यार करने और शादी करने से कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन लव मैरिज और लव जिहाद में अंतर है. एक तरफ प्यार और सहमति है, दूसरी तरफ प्रलोभन है. इसलिए अगर झूठ के माध्यम से कुछ किया जा रहा है, तो इससे निपटने के लिए एक कानून होना चाहिए. अब कानून कितना सख्त बनना चाहिए और उससे किसे संरक्षित किया जाना चाहिए, यह केवल विशेषज्ञ ही बता सकते हैं.

चीन-पाकिस्तान पर

यदि संबंधों में सुधार करना है, तो यह दोनों पक्षों पर निर्भर करेगा. भारत ने कभी चीन या पाकिस्तान के प्रति आक्रामकता नहीं दिखाई. हमने केवल उनकी आक्रामकता का जवाब दिया है.

 

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January 20th 2021, 1:22 pm

त्याग, बलिदान, परमार्थ और पराक्रम की अनूठी परंपरा और खालसा-पंथ

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प्रणय कुमार

जब राष्ट्राकाश गहन अंधकार से आच्छादित था, विदेशी आक्रांताओं एवं आतताइयों द्वारा निरंतर पदाक्रांत किए जाने के कारण संस्कृति-सूर्य का सनातन प्रकाश कुछ मद्धम-सा हो चला था, अराष्ट्रीय-आक्रामक शक्तियों के प्रतिकार और प्रतिरोध की प्रवृत्तियां कुछ क्षीण-सी हो चली थी, जब पूरी दुनिया में धर्म और संस्कृति, उदारता और विश्व-बंधुत्व का गौरव-ध्वज फहराने वाले महान भारतवर्ष का पहली बार किसी क्रूर एवं बर्बर सुलतान से सीधे तौर पर  पाला पड़ा था, जब दिल्ली के तख़्त पर बैठा एक मज़हबी सुलतान पूरे देश को एक ही रंग में रंगने की ज़िद्द और जुनून पाले बैठा था. जब कतिपय अपवादों को छोड़कर शेष भारत ने उस अन्याय-अत्याचार को ही अपना भाग्य मान स्वीकार करना प्रारंभ कर दिया था. जब साहस और संघर्ष की गौरवशाली सनातनी परंपरा का परित्याग कर समाज के अधिसंख्य जनों ने भीरूता और पलायन-वृत्ति का सुरक्षित, किंतु कायरतापूर्ण मार्ग ढूंढना प्रारंभ कर दिया था, तब ऐसे अंधेरे वक्त में राष्ट्रीय क्षितिज पर एक तेजस्वी-दैदीप्यमान व्यक्तित्व का उदय हुआ, जिसके तेज़ एवं ओज, त्याग एवं बलिदान, साहस एवं पराक्रम ने मुग़लिया सल्तनत की चूलें हिला कर रख दीं. जिसने ऐसी अनूठी परंपरा की नींव रखी, जिसकी मिसाल विश्व-इतिहास में ढूंढे नहीं मिलती. जिन्हें हम सब सिक्खों के दसवें गुरु- गुरु गोबिंद सिंह जी, दशमेश गुरु, कलगीधर, बाजांवाले, सरबंसदानी आदि नामों, उपनामों और उपाधियों से जानते-मानते और श्रद्धा से उनके श्रीचरणों में शीश नवाते हैं.

गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा स्थापित खालसा पंथ और उनकी बलिदानी परंपरा के महात्म्य को समझने के लिए हमें तत्कालीन धार्मिक-सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि और परिस्थितियों पर विचार करना होगा. औरंगज़ेब के शासनकाल में समस्त भारतवर्ष में हिन्दुओं पर अत्याचार बढ़ने लगे. जम्मू-कश्मीर तथा पंजाब में यह अत्याचार बर्बरता और पाशविकता की भी सीमाएं लांघने लगा. विधर्मी शासकों  के अत्याचारों से पीड़ित कश्मीरी पंडितों का एक समूह गुरु तेग बहादुर साहब के दरबार में यह फ़रियाद लेकर पहुंचा कि उनके सामने यह शर्त रखी गई है कि यदि कोई महापुरुष इस्लाम न स्वीकार करके अपना बलिदान दे तो उन सबका बलात धर्म परिवर्तन नहीं किया जाएगा. उस समय नौ वर्ष की अल्प आयु में गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने पिता से कहा कि ‘आपसे बड़ा महापुरुष कौन हो सकता है!’ उन कश्मीरी पंडितों को ज़ुनूनी एवं मज़हबी इस्लामी शासक औरंगज़ेब की क्रूरता एवं कहर से बचाने के लिए गुरु तेग बहादुर ने 11 नवंबर, 1675 को सहर्ष अपना बलिदान दे दिया. कदाचित उस सनकी शासक को यह लगता हो कि दिल्ली के चांदनी चौक पर सार्वजनिक रूप से गुरु तेगबहादुर का सर क़लम करवाने के बाद मुगल साम्राज्य द्वारा चलाए जा रहे इस्लामिक अभियान को गति मिलेगी और प्रतिरोध के लिए कोई सम्मुख आने का साहस नहीं दिखाएगा. गुरु साहब के बलिदान के बाद उसी दिन गुरु गोबिंद सिंह जी सिक्खों के दसवें गुरु नियुक्त किए गए.

राष्ट्र के सांस्कृतिक उत्थान की दृष्टि से गुरु गोबिंद सिंह जी ने 30 मार्च, 1699 को बैसाखी के दिन आनंदपुर साहिब में लगभग 80000 गुरुभक्तों के समागम में पांच शिष्यों के शीश मांगे तो वहां उपस्थित भक्तों का समूह सन्न रह गया. पूरे वातावरण में सन्नाटा पसर गया. ऐसे शून्य वातावरण में लाहौर का युवक दयाराम खड़ा हो गया. गुरु जी उसका हाथ पकड़कर पीछे तंबू में ले गए. थोड़ी देर बाद गुरु जी ख़ून से लथपथ शमशीर लेकर पुनः संगत को संबोधित करते हुए बोले – ‘और शीश चाहिए.’ अब जाट धर्मदास शीश झुकाकर बोला ‘यह शीश आपका है.’  पुनः गुरु जी की वही पुकार, इस बार उनके आह्वान पर द्वारका (गुजरात)  का मोहकम चंद खड़ा हुआ, फिर बीदर (कर्नाटक) का युवक साहिब चंद और सबसे अंत में जगन्नाथपुरी का हिम्मत राय खड़ा हुआ. सभी पांचों संगत को अंदर ले जाकर गुरु जी कुछ देर बाहर न आए. संगत के हर्ष एवं आश्चर्य का उस समय कोई ठिकाना न रहा, जब गुरुजी पांचों सिक्खों को पूर्ण सिंह वेश शस्त्रधारी और सजे दस्तारों (पगड़ियों) के साथ बाहर लेकर आए और घोषणा की कि यही मेरे पंज प्यारे हैं. इनकी प्रतीकात्मक बलि लेकर गुरु जी ने एक नए खालसा पंथ की नींव रखी. उन्होंने खालसा पंथ को एक नया सूत्र दिया, ”वाहे गुरु जी का खालसा, वाहे गुरु जी की फ़तेह.” उन्होंने खालसाओं को ‘सिंह’ का नया उपनाम देते हुए युद्ध की प्रत्येक स्थिति में तत्पर रहने हेतु पांच चिह्न – केश, कड़ा, कृपाण, कंघा और कच्छा धारण करना अनिवार्य घोषित किया. खालसा यानि जो मन, कर्म और वचन से शुद्ध हो और जो समाज के प्रति समर्पण का भाव रखता हो. दरअसल गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की सिरजना कर एक ऐसे वर्ग को तैयार किया जो सदैव समाज एवं राष्ट्रहित के लिए सर्वास्वार्पण को तत्पर रहे. अमृत के चंद छीटों से उन्होंने मानव-मन में ऐसी प्रेरणा भर दी कि उसमें से विद्वान, योद्धा, शूरवीर, धर्मात्मा, सेवक और संत आगे आए. उन्होंने वर्ग-हीन, वर्ण-हीन, जाति-हीन व्यवस्था की रचना कर एक महान धार्मिक एवं सामाजिक  क्रांति को मूर्त्तता प्रदान की.

प्राणार्पण से पीछे न हटने वाले वीरों के बल पर ही गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने जीवनकाल में मुगलों के विरुद्ध प्रमुख युद्ध लड़े – सन् 1690 में राजा भीमचंद के अनुरोध पर मुग़लों के विरुद्ध नादौन का युद्ध, सन् 1703 में केवल 40 सिक्ख योद्धाओं के साथ मुगल सेना के विरुद्ध प्रसिद्ध एवं ऐतिहासिक ‘चमकौर का युद्ध’ और सन् 1704 में महत्त्वपूर्ण एवं अंतिम मुक्तसर का युद्ध. ‘चमकौर’ का युद्ध तो गुरु जी के अद्वितीय रणकौशल और सिक्ख वीरों की अप्रतिम वीरता एवं धर्म के प्रति अटूट आस्था के लिए जाना जाता है. इस युद्ध में वज़ीर खान के नेतृत्व में लड़ रही दस लाख मुग़ल सेना के केवल 40 सिक्ख वीरों ने छक्के छुड़ा दिए थे. वज़ीर खान गुरु गोबिंद सिंह जी को ज़िंदा या मुर्दा पकड़ने का इरादा लेकर आया था, पर सिक्ख वीरों ने अपराजेय वीरता का परिचय देते हुए उसके इन मंसूबों पर पानी फेर दिया. मुगल आक्रांता औरगंजेब की सेना को धूल चटाकर गुरु जी ने – ‘चिडियन से मैं बाज तड़ाऊँ, सवा लाख से एक लड़ाऊँ, तबै गोबिंद सिंह नाम कहाऊँ” उक्ति को सचमुच चरितार्थ कर दिखाया. इस युद्ध में गुरु जी के दोनों साहिबजादे अजीत सिंह और जुझार सिंह, 40 सिंह सैनिक भी शहीद हो गए. 27 दिसंबर, 1704 को उनके दोनों छोटे साहिबज़ादों जोरावर सिंह जी और फ़तेह सिंह जी को भी सनकी सल्तनत ने ज़िंदा दीवारों में चिनबा दिया. दो पठानों द्वारा धोखे से किए गए घातक वार के कारण 7 अक्तूबर, 1708 को गुरु जी भी नांदेड़ साहिब में दिव्य ज्योति में लीन हुए. गुरु जी महाप्रयाण से पूर्व ऐसी गौरवशाली परंपरा छोड़ गए जो आज भी राष्ट्र की धमनियों में ऊर्जादायी लहू बन दौड़ता है.

ऐसी महान परंपराओं का अनुगामी, श्रद्धाभिमुख समाज उन उत्तेजक, अलगाववादी, देश-विरोधी स्वरों को भली-भांति पहचानता है जो उन्हें दिग्भ्रमित या इस महान विरासत से विमुख करने का षड्यंत्र रचते रहते हैं. ऐसी कुचक्री-षड्यंत्रकारी ताक़तें तब तक अपने मंसूबों में क़ामयाब न होने पाएंगी, जब तक गुरुओं की इस बलिदानी परंपरा की पावन स्मृतियां उनके सभी अनुयायियों और समस्त देशवासियों के हृदय में स्थित और जीवित हैं.

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January 19th 2021, 8:30 pm

समर्पण राम के नाम

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भट्टा क्यारकुली गांव निवासी महमूद हसन की स्वयं की माली हालत बहुत अच्छी नहीं है, फिर भी एक उदाहरण प्रस्तुत करते 70 वर्षीय महमूद हसन ने अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए 1100 रुपये समर्पण निधि दी. महमूद कहते हैं कि अगर उनके पास 11 हजार रुपये होते तो वह भी राम मंदिर के लिए देने से पीछे नहीं हटते. महमूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी प्रशंसक हैं.

मसूरी के एक होटल में काम करने वाले महमूद ने बताया कि श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए कुछ युवा गांव में कूपन काट रहे थे, तब मैंने भी गांव के राकेश रावत से सहयोग करने की बात कही. इस पर कुछ युवा संकोच भी कर रहे थे, लेकिन राकेश रावत ने खुशी जताई और कहा कि आप भी सहयोग कर सकते हैं. मंदिर निर्माण के लिए दान देने से मुझे बड़ी खुशी हुई है.

महमूद हसन मूल रूप से छुटमलपुर उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं. वहीं, महमूद के बेटे नौशाद अली का कहना है कि हमें खुशी हुई कि उनके पिता ने श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए सहयोग किया है. 1972 में जब वह मसूरी आए थे तो क्यारकुली गांव के डालू भाई, रतन और प्रेम सिंह ने उनकी बहुत मदद की थी. उस समय उनके पास सिर्फ 20 रुपये थे. महमूद हसन कहते हैं कि जब भी उनके जीवन में कोई संकट आया तो हिन्दू भाइयों ने ही उनकी मदद की. लॉकडाउन के दौरान भी गांव के राकेश रावत सहित कई लोगों ने सहयोग किया.

उधर, दूसरी ओर हरियाणा के गांव माजरा गुरदास निवासी उदयभान राव व डॉ. इंदु राव की बेटी पूर्णिमा राव ने उदाहरण प्रस्तुत किया. उदयभान ने तीन माह पूर्व गुरुग्राम के एमिटी इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ रही अपनी बेटी पूर्णिमा को जन्मदिवस पर मोबाइल फोन के लिए एक लाख रुपये की राशि दी थी. बेटी ने तभी मन बनाया था कि यह राशि अयोध्या में बनने वाले राम मंदिर को समर्पित करेगी. रविवार को अपना संकल्प पूरा किया तथा एक लाख रुपये का चेक श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र को श्रीराम मंदिर के लिए समर्पित कर दिया. पूर्णिमा ने अपने गुरुग्राम आवास पर विश्व हिन्दू परिषद के गुरुग्राम जिला अध्यक्ष अजीत सिंह को चेक सौंपा.

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January 19th 2021, 12:41 pm

मजहबी स्वतंत्रता के नाम पर आर्थिक युद्ध

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डॉ. नीलम महेंद्र

धर्म अथवा पंथ जब तक मानव के व्यक्तिगत जीवन का हिस्सा बनने तक सीमित रहे, वो उसकी आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम बन कर उसमें एक सकारात्मक शक्ति का संचार करता है. लेकिन जब वो मानव के व्यक्तिगत जीवन के दायरे से बाहर निकल कर समाज के सामूहिक आचरण का माध्यम बन जाता है तो समाज में एक सामूहिक शक्ति का संचार करता है. लेकिन यह कहना कठिन होता है कि समाज की यह समूहिक शक्ति उस समाज को सकारात्मकता की ओर ले जाएगी या फिर नकारात्मकता की ओर. शायद इसीलिए कार्ल मार्क्स ने धर्म को जनता की अफीम कहा था.

दरअसल, पिछले कुछ समय से मजहबी मान्यताओं के आधार पर विभिन्न उत्पादों का हलाल सर्टिफिकेशन राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में है. हाल ही में यूरोपीय महाद्वीप के देश बेल्जियम में हलाल मीट और कोशर मीट पर एक अदालती फैसला आया. पशु अधिकारों को ध्यान में रखते हुए यूरोपीय संघ की अदालत ने बिना बेहोश किए जानवरों को मारे जाने पर लगी रोक को बरकरार रखा है. इसका मतलब यह है कि बेल्जियम में किसी भी जानवर को मारने से पहले उसे बेहोश करना होगा ताकि उसे कष्ट ना हो. यूरोपीय संघ की अदालत के इस फैसले ने यूरोपीय संघ के अन्य देशों में भी इस प्रकार के कानून बनने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है. मजहबी स्वतंत्रता के नाम पर बेल्जियम के मुसलमान और यहूदी संगठन इस कानून का विरोध कर रहे हैं.

राष्ट्रीय स्तर पर अगर बात करें तो यह चर्चा में इसलिए है कि अप्रैल 2020 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें कोविड महामारी के मद्देनजर हलाल मीट पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी. जिसे कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अदालत लोगों की भोजन करने की आदतों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती. इसी से संबंधित ताजा मामला दक्षिण दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के अंतर्गत आने वाले होटलों के लिए लागू किए गए एक नियम का है. जिसमें दक्षिण दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के अंतर्गत आने वाले होटल या मीट की दुकान पर अब हलाल या झटका का बोर्ड लगाना अनिवार्य होगा. दरअसल, एसडीएमसी की सिविक बॉडी की स्टैंडिंग कमेटी ने एक प्रस्ताव पास किया, जिसमें लिखा है कि हिन्दू और सिक्ख के लिए हलाल मीट खाना वर्जित है. इससे पहले क्रिसमस के दौरान केरल के ईसाइयों ने भी हलाल मांस के विरोध में प्रदर्शन किया था. इस मामले में क्रिश्चियन एसोसिएशन ऑफ चर्च के ऑक्सीलरी फ़ॉर सोशल एक्शन ने ईसाइयों से एक अपील भी की थी, जिसमें हलाल मांस को उनके धार्मिक लोकाचार के खिलाफ होने के कारण इन्हें खाद्य पदार्थों के रूप में खरीदने से मना किया था.

मजहब के नाम पर जिस हलाल पर विश्व भर में हायतौबा मची हुई है, पहले थोड़ा उसे समझ लेते हैं.

हलाल दरअसल एक अरबी शब्द है, जिसका उपयोग क़ुरान में भोजन के रूप में स्वीकार करने योग्य वस्तुओं के लिए किया गया है. इस्लाम में आहार संबंधी कुछ नियम बताए गए हैं, जिन्हें हलाल कहा जाता है. लेकिन इसका संबंध मुख्य रूप से मांसाहार से है. जिस पशु को भोजन के रूप में ग्रहण किया जाता है, उसके वध की प्रक्रिया विशेष रूप से बताई गई है. इसी के चलते मुस्लिम देशों में सरकारें ही हलाल का सर्टिफिकेट देती हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जो मीट वहां परोसा जा रहा है वो उनकी मजहबी मान्यताओं के अनुरूप है.

हमारे देश में भी भारतीय रेल और विमानन सेवा जैसे प्रतिष्ठानों से लेकर फाइव स्टार होटल तक हलाल सर्टिफिकेट हासिल करते हैं जो यह सुनिश्चित करता है कि जो मांस परोसा जा रहा है, वो हलाल है. मैकडोनाल्ड डोमिनोज़, जोमाटो जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां तक इसी सर्टिफिकेट के साथ काम करती हैं. लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे देश में यह सर्टिफिकेट सरकार द्वारा नहीं दिया जाता. दरअसल, भारत में अलग-अलग वस्तुओं के लिए अलग-अलग सर्टिफिकेट का प्रावधान है जो उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करते हैं. जैसे औद्योगिक वस्तुओं के लिए ISI मार्क, कृषि उत्पादों के लिए एगमार्क, प्रॉसेस्ड फल उत्पाद जैसे जैम अचार के लिए एफपीओ, सोने के लिए हॉलमार्क, आदि. लेकिन हलाल का सर्टिफिकेट भारत सरकार नहीं देती है. भारत में यह सर्टिफिकेट कुछ प्राइवेट संस्थान जैसे हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, हलाल सर्टिफिकेशन सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, जमायत उलमा ए हिन्द हलाल ट्रस्ट आदि. अभी तक देश से निर्यात होने वाले डिब्बाबंद मांस के लिए वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत आने वाले खाद्य उत्पादन निर्यात विकास प्राधिकरण को हलाल प्रमाणपत्र देना पड़ता था क्योंकि दुनिया के अधिकांश मुस्लिम देश हलाल मांसाहार ही आयात करते हैं. लेकिन यह बात जितनी साधारण दिखाई दे रही है, उससे कहीं अधिक पेचीदा है. क्योंकि तथ्य यह बताते हैं कि जो बात मजहबी मान्यताओं के अनुसार पशु वध के तरीके (हलाल) से शुरू हुई थी. अब दवाईयों से लेकर सौंदर्य उत्पाद जैसे लिपस्टिक और शैम्पू, अस्पतालों से लेकर फाइव स्टार होटल, रियल एस्टेट से लेकर हलाल टूरिज्म और तो और आटा, मैदा, बेसन जैसे शाकाहारी उत्पादों तक के हलाल सर्टिफिकेशन पर पहुंच गई है. आयुर्वेदिक औषधियों के लिए भी हलाल सर्टिफिकेट! ऐसा क्यों है? क्योंकि जो भी कंपनी अपना सामान मुस्लिम देशों को निर्यात करती है, उन्हें इन देशों को यह सर्टिफिकेट दिखाना आवश्यक होता है.

अगर हलाल फूड मार्किट के आंकड़ों की बात करें तो यह वैश्विक स्तर पर 19% है, जिसकी कीमत लगभग 2.5 ट्रिलियन $ बैठती है. आज मुस्लिम देशों में हलाल सर्टिफिकेट उनकी जीवनशैली से जुड़ गया है. वे उस उत्पाद को नहीं खरीदते जिस पर हलाल सर्टिफिकेट नहीं हो. हलाल सर्टिफिकेट वाले अस्पताल में इलाज, हलाल सर्टिफिकेट वाले कॉम्प्लेक्स में फ्लैट औऱ हलाल टूरिज्म पैकेज देने वाली एजेंसी से यात्रा. यहां तक कि हलाल की मिंगल जैसी डेटिंग वेबसाइट.

अब प्रश्न उठता है कि उपर्युक्त तथ्यों के क्या मायने हैं. दरअसल, जो बात एक सर्टिफिकेट से शुरू होती है वो बहुत दूर तक जाती है. क्योंकि जब हलाल मांस की बात आती है तो स्वाभाविक रूप से उसे काटने की प्रक्रिया के चलते वो एक मुस्लिम द्वारा ही कटा हुआ होना चाहिए. इसके परिणामस्वरूप जो हिन्दू इस कारोबार से जुड़े थे वे बाहर हो गए. इसी प्रकार जब हलाल सर्टिफिकेट मांस तक सीमित ना होकर रेस्टोरेंट या फाइव स्टार होटल पर लागू होता है तो वहां परोसी जाने वाली हर चीज जैसे तेल, मसाले चावल, दाल सब कुछ हलाल सर्टिफिकेट की होनी चाहिए. और जब यह हलाल सर्टिफाइड मांसाहार रेल या विमानों में परोसा जाता है तो हिंदुओं और सिक्खों जैसे गैर मुस्लिम मांसाहारियों को भी परोसा जाता है. ये गैर मुस्लिम जिनकी धार्मिक मान्यताएं हलाल के विपरीत झटका मांस की इजाजत देती हैं वो भी इसी का सेवन करने के लिए विवश हो जाते हैं. लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात जो समझने वाली है वो यह कि इस हलाल सर्टिफिकेट को लेने के लिए भारी भरकम रकम देनी पड़ती है जो गैर सरकारी मुस्लिम संगठनों की झोली में जाती है. मांस से आगे बढ़ कर चावल, आटा, दालों, कॉस्मेटिक जैसी वस्तुओं के हलाल सर्टिफिकेशन के कारण अब यह रकम धीरे धीरे एक ऐसी समानांतर अर्थव्यवस्था का रूप लेती जा रही है, जिस पर किसी भी देश की सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है और इसलिए यह एक वैश्विक चिंता का विषय भी बनता जा रहा है. ऑस्ट्रेलियाई नेता जॉर्ज क्रिस्टेनसेन ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हलाल अर्थव्यवस्था का पैसा आतंकवाद के काम में लिया जा सकता है. वहीं अंतरराष्ट्रीय लेखक नसीम निकोलस ने अपनी पुस्तक “स्किन इन द गेम” में इसी विषय पर “द मोस्ट इंटॉलरेंट विंस” नाम का लेख लिखा है. इसमें उन्होंने यह बताया है कि अमरीका जैसे देश में मुस्लिम और यहूदियों की अल्पसंख्यक आबादी कैसे पूरे अमेरिका में हलाल मांसाहार की उपलब्धता मुमकिन करा देते हैं. अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के देश इस बात को समझ चुके हैं कि मजहबी मान्यताओं के नाम पर हलाल सर्टिफिकेट के जरिए एक आर्थिक युद्ध की आधारशिला रखी जा रही है, जिसे हलालोनोमिक्स भी कहा जा रहा है. यही कारण है कि ऑस्ट्रेलिया की दो बड़ी मल्टी नेशनल कंपनी केलॉग्स और सैनिटेरियम ने अपने उत्पादों के लिए हलाल सर्टिफिकेट लेने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि उनके उत्पाद शुद्ध शाकाहारी होते हैं, इसलिए उन्हें हलाल सर्टिफिकेशन की कोई आवश्यकता नहीं है.

आज के युग में जब युद्ध हथियारों के बजाए अर्थव्यवस्ताओं के सहारे खेला जाता है तो योद्धा देश की सेना नहीं, देश का हर नागरिक होता है. इसलिए हलाल के नाम पर एक आर्थिक युद्ध की घोषणा तो की जा चुकी है, चुनाव अब आपको करना है कि इस युद्ध में सैनिक बनना है या फिर मूकदर्शक.

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January 19th 2021, 12:41 pm

कच्छ – निधि समर्पण अभियान के निमित्त आयोजित राम रथ यात्रा पर हमला

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गांधीधाम (कच्छ-भुज). श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान मकर संक्रांति से पूरे देश में प्रारंभ हो चुका है. गुजरात में भी अभियान चल रहा है. इसी क्रम में गांधीधाम तहसील के अंतर्गत भी अभियान चल रहा है. जिसमें मुन्द्रा में निधि समर्पण अभियान समिति के कार्यकर्ता राम रथ के साथ गांव-गांव में जनजागरण और निधि समर्पण के लिए जा रहे हैं.

यात्रा के दौरान राम रथ जब मुन्द्रा-गांधीधाम तहसील के कीडाणा गांव पहुंचा तो पूर्व नियोजित साजिश के तहत राम रथ पर पत्थरों व घातक हथियारों से हमला कर दिया. भीड़ ने घात लगाकर राम रथ को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया. कार्यकर्ताओं ने रथ को बचाने का प्रयास किया. इसी दौरान पथराव में कुछ कार्यकर्ताओं को गंभीर चोटें आई हैं.

पथराव के बीच ही पुलिस को घटना के बारे में जानकारी दी गई. पुलिस के पहुंचने से पूर्व ही दंगाईयों ने कुछ वाहनों को आग के हवाले कर दिया, कुछ घरों में भी आग लगा दी.

पुलिस ने घटनास्थल पर पहुंचकर भीड़ को तितर-बितर करने के लिए टीयरगैस का उपयोग किया. लेकिन, मौके पर पहुंची पुलिस का रवैया भी पक्षपात पूर्ण और हिन्दू विरोधी रहा. पुलिस यात्रा में शामिल राम रथ को बचाने का प्रयास कर रहे कार्यकर्ताओं को ही गिरफ्तार करके थाने ले गई और मुकदमा दर्ज किया.

घटनास्थल से 300 से 400 मीटर की दूरी पर एक श्रमिक का शव मिला है. इसकी मौत के कारणों को लेकर भी पुलिस छानबीन कर रही है.

समुदाय के दंगाईयों द्वारा भय का माहौल निर्माण करने तथा पुलिस के पक्षपाती रवैये को लेकर लोगों ने रोष जताया और 18 जनवरी को एसपी मुख्यालय तक शांति मार्च निकाला. इस दौरान पुलिस अधिकारियों ने बातचीत में निर्दोष लोगों को छोड़ने का आश्वासन दिया, लेकिन उन्हें छोड़ा नहीं गया है.

इसके पश्चात विश्व हिन्दू परिषद के प्रदेश महामंत्री अशोक भाई रावल ने पुलिस मुख्यालय के सामने धरना दिया. पुलिस ने उन्हें भी हिरासत में लिया था, लेकिन देर शाम छोड़ दिया गया.

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January 19th 2021, 12:41 pm

साहस, शौर्य, पराक्रम, त्याग और बलिदान का इतिहास है हमारा

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प्रणय कुमार

जिनका नाम लेते ही नस-नस में बिजलियां-सी कौंध जाती हों; धमनियों में उत्साह, शौर्य और पराक्रम का रक्त प्रवाहित होने लगता हो; मस्तक गर्व और स्वाभिमान से ऊंचा हो उठता हो – ऐसे परम प्रतापी महाराणा प्रताप पर भला किस देशभक्त को गर्व नहीं होगा..! उनका व्यक्तित्व स्वयं के मूल्यांकन-विश्लेषण का दर्पण है. क्या हम अपने गौरव, अपनी धरोहर, अपने अतीत को सहेज-संभालकर रख पाए? क्या हम अपने महापुरुषों, उनके द्वारा स्थापित मानबिन्दुओं, जीवन-मूल्यों की रक्षा कर सके? क्या हमने अपनी नौजवान पीढ़ी को साहस, शौर्य और पराक्रम का पाठ पढ़ाया, क्या त्याग और बलिदान की पुण्य सलिला भावधारा को हम अबाध आगे ले जा सकेंगे? ऐसे तमाम प्रश्न आज भी राष्ट्र के सम्मुख यथावत खड़े हैं और पीढ़ियों की पीढ़ियां मौन हैं. स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात जिनके कंधों पर इस राष्ट्र को आगे ले जाने का भार था, उन्होंने जान-बूझकर इन प्रश्नों के समाधान की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया. गुलामी की ग्रन्थियां उनमें गहरे पैठी थीं. और उन्होंने इन्हीं ग्रन्थियों को पालने-पोसने-सींचने-फैलाने का काम किया. इन ग्रन्थियों के रहते क्या हम अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान की रक्षा कर सकेंगे? और जो पीढ़ी अपने मानबिन्दुओं, जीवन-मूल्यों, महापुरुषों के गौरव आदि की रक्षा न कर पाए, क्या उनका कोई भविष्य होता है?

स्वाभिमान शून्य पीढ़ियों के निर्माण का दोष हम किनके माथे धरें? यह उत्तर मांगने का समय है कि क्यों और किसने हमारे नौनिहालों के भीतर हीनता की इतनी गहरी ग्रन्थियां विकसित कीं कि आज उनमें से उनका निकल पाना कठिन लगता है? किसने उनके मन-मस्तिष्क में यह भर दिया कि भारत का इतिहास तो पराजय का इतिहास है? क्या भारत का इतिहास पराजय का इतिहास है? नहीं, वह संघर्षों का इतिहास है, विजय का इतिहास है. लड़खड़ाकर फिर-फिर खड़े होने का इतिहास है. साहस, शौर्य, पराक्रम, त्याग और बलिदान का इतिहास है. समय साक्षी है, हमने कभी किसी के सामने घुटने नहीं टेके, बिना लड़े आत्मसमर्पण नहीं किया. सामर्थ्य भर प्रतिकार किया. जब हमें यह पढ़ाया जाता है कि भारत तो निरंतर आतताइयों-आक्रांताओं के पैरों तले रौंदा गया, तब यह क्यों नहीं बताया जाता कि हर युग और हर काल में ऐसे रणबांकुरे हुए, जिन्होंने आक्रमणकारियों के छक्के छुड़ा दिए. उनके प्रतिकार ने या तो उन आक्रमणकारियों को लौटने पर विवश कर दिया या बार-बार के प्रतिरोध-प्रतिकार से उन्हें भी निरापद शासन नहीं करने दिया. और परिणामस्वरूप ऐसे आक्रांताओं के शासन का भी असमय-अस्वाभाविक अंत हुआ. क्या यह सत्य नहीं कि जिन-जिन देशों पर विदेशी-विधर्मी आक्रांताओं ने आक्रमण किया, वहाँ की संस्कृति समूल नष्ट हो गई? पर भारत अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण रखने में सफल रहा, क्या कोई पराजित जाति ऐसा कर सकती है? हमने अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के लिए अनेक स्तरों पर संघर्ष किए, उन संघर्षों पर गौरव करने की बजाय हम उसे भी विस्मृति के गर्त्त में धकेलते जा रहे हैं, जो सर्वथा अनुचित और अराष्ट्रीय है. बल्कि राष्ट्रद्रोह है. क्या पराजय का वृत्तांत सुना-सुना हम उत्साहहंता नहीं बन रहे? क्या कर्ण के पराजय में शल्य की महती भूमिका का दृष्टांत हमें याद नहीं?

महाराणा की स्मृति पर क्या यह प्रश्न सर्वथा उपयुक्त नहीं होगा कि क्या हमारे इतिहासकारों ने उनके विराट व्यक्तित्व के साथ न्याय किया? क्या अकबर के साथ ‘द ग्रेट’ का स्थायी विशेषण जोड़कर, जान-बूझकर महाराणा को संकुचित और छोटा सिद्ध करने की कुचेष्टा नहीं की गई? मातृभूमि की मान-मर्यादा, स्वाभिमान-स्वतंत्रता के लिए जंगलों-बीहड़ों की ख़ाक छानने वाले, घास की रोटी खाने वाले और अपने जांबाज सैनिकों के बल पर दुश्मन के छक्के छुड़ा देने वाले महाराणा के संघर्ष, साहस, त्याग और बलिदान की तुलना साम्राज्य-विस्तार की लपलपाती-अंधी लिप्सा से भला कैसे की जा सकती है? वह भी तब जब उसने संधि के अत्याकर्षक प्रस्ताव को ठुकराकर स्वेच्छा से संघर्ष और स्वाभिमान का पथ चुना हो! इतिहास में महाराणा का नाम इसलिए भी स्वर्णाक्षरों में अंकित होना चाहिए कि युद्ध-कौशल के अतिरिक्त उनका सामाजिक-सांगठनिक कौशल भी अनुपमेय था. उन्होंने भीलों के साथ मिलकर ऐसा सामाजिक गठजोड़ बनाया था, जिसे भेद पाना तत्कालीन साम्राज्यवादी ताकतों के लिए असंभव था. ऊँच-नीच का भेद मिटाए बिना समरसता का ऐसा दिव्य रूप साकार-संभव न हुआ होगा. मिथ्या अभिमान पाले जातियों में बंटे समाज के लिए महाराणा का यह उदाहरण आज भी प्रासंगिक और अनुकरणीय है. सोचिए, उनकी प्रजा का उन पर कितना अपार विश्वास होगा कि भामाशाह ने उन्हें अपनी सेना का पुनर्गठन करने के लिए सारी संपत्ति दान कर दी. कहते हैं कि यह राशि इतनी बड़ी थी कि इससे 25000 सैनिकों के लिए 5 साल तक निर्बाध रसद की आपूर्त्ति की जा सकती थी. क्या महाराणा के व्यक्तित्व के इन धवल-उज्ज्वल पक्षों को प्रखरता से सामने नहीं लाया जाना चाहिए? क्यों कथित इतिहासकार इस पर मौन रह जाते हैं?

बिना किसी रणनीतिक कौशल के हल्दी घाटी के युद्ध में हारे भूभाग को पुनः प्राप्त कर पाना क्या महाराणा के लिए संभव था? शासन के अंतिम दिनों में न केवल उनका मेवाड़ के अधिकांश भूभाग पर कब्ज़ा था, बल्कि उन्होंने अपने राज्य की सीमाओं में पर्याप्त विस्तार भी किया था.

खलनायकों को नायकों की तरह प्रस्तुत करने वाले फिल्मकारों-इतिहासकारों ने जोधा-अकबर की कहानी को एक अमर प्रेम कहानी की तरह प्रस्तुत करने में कोई कोर कसर बाक़ी नहीं रखी. यह जानते हुए भी कि जोधाबाई का अकबर से विवाह पराजय से उत्पन्न अपमानजनक संधि का परिणाम था, उसे महिमामण्डित किया जाता रहा. लोक ने जिसे कलंक का अमिट टीका माना, कतिपय इतिहासकारों-फिल्मकारों ने उसे सहिष्णुता का मान-मुकुट पहनाने का षड्यंत्र किया. जबकि चारित्रिक शुचिता की दृष्टि से अकबर महाराणा के समक्ष कहीं टिकता नहीं. एक घटना का उल्लेख ही इसे सिद्ध करने के लिए पर्याप्त होगा. एक बार उनके पुत्र शत्रु पक्ष की बेग़मों को बंदी बनाकर ले आए. प्रसन्न होने की बजाय महाराणा इससे क्षुब्ध और क्रुद्ध हुए. सहिष्णुता एवं सच्ची उदारता का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने शत्रु-पक्ष की महिलाओं को ससम्मान उनके शिविर वापस भिजवाने का आदेश दिया. कवि रहीम ने इस प्रसंग का सादर उल्लेख भी किया है. महाराणा के ऐसे उच्चादर्शों की तुलना एक कामुक-भोगी-विलासी-विधर्मी से करना क्या सरासर अन्याय नहीं है?

महाराणा की पावन पुण्यस्मृति पर यह विचार आवश्यक है कि वर्तमान पीढ़ी को कैसा और कौन-सा इतिहास पढ़ाया जाए? वह जो पराजय की ग्रन्थियां विकसित और मज़बूत करे या वह जो विजय का पथ प्रशस्त करे? वह जो परमुखापेक्षी, परावलंबी, स्वाभिमानशून्य बनाए या वह जो आत्मनिर्भर, स्वावलंबी और स्वाभिमानी बनाए? निर्णय न केवल हमें-आपको, अपितु संपूर्ण राष्ट्र को करना है.

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January 19th 2021, 11:26 am

मुख्यमंत्री ने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए किया निधि समर्पण

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शिमला. मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने मंगलवार को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान के निमित्त समिति सदस्यों को दो लाख ग्यारह हजार एक सौ ग्यारह रूपये की निधि समर्पित की. उनकी धर्मपत्नी डॉ. साधना ठाकुर ने भी 51 हजार रुपये की निधि समर्पित की. इस अवसर पर उत्साहवर्धक क्षण यह रहा कि उनकी बेटी प्रिया ने भी अपनी इंटरर्नशिप की राशि से बचाकर 11 हजार की राशि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए समर्पित की.

इस अवसर पर अभियान समिति के प्रांत उपाध्यक्ष राजकुमार वर्मा, विश्व हिन्दू परिषद के प्रांत संगठन मंत्री नीरज दौनेरिया, अभियान समिति के प्रचार प्रमुख महीधर प्रसाद, सदस्य वीरेंद्र सिंह सिपहिया, संपर्क प्रमुख बलराम शर्मा उपस्थित रहे. अभियान समिति ने मुख्यमंत्री को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का चित्र स्मृति चिन्ह के रूप में भेंट किया.

शिशु भाई धर्मा ने भी पत्नी सहित निधि समर्पित की

इसके अलावा मुख्यमंत्री के ओ.एस.डी. शिशुभाई धर्मा ने अपने पिता जी के नाम से श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए एक लाख एक सौ ग्यारह रुपये की निधि समर्पित की. और  उनकी पत्नी लता धर्मा ने भी इक्कीस हजार की निधि समर्पित की.

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January 19th 2021, 11:26 am

मेरे पिताजी श्री मा.गो. (बाबूराव) वैद्य – कुटुंबवत्सल, ध्येयनिष्ठ और साधन शुचिता को समर्पित आदर्श व

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मनमोहन वैद्य

श्री मा. गो. (बाबूराव) वैद्य नाम से सुपरिचित श्री माधव गोविंद वैद्य, मेरे पिताजी 97 वर्ष का सक्रिय, कृतार्थ और प्रेरणादायी जीवन पूर्ण कर 19 दिसंबर को पूर्णत्व में विलीन हो गए. उनका जीवन कुटुंबवत्सल, ध्येयनिष्ठ और संघ को समर्पित था. 1931 में अपने गांव से पढ़ाई हेतु नागपुर आए और आठ वर्ष की आयु से ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बन गए. 1938 में संघ का दायित्व ले कर, 15 वर्ष की आयु से 95 वर्ष की आयु तक वे नियमित दैनंदिन शाखा में जाते थे. आरम्भ में संघ का दायित्व, फिर जनसंघ, पत्रकारिता, महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य, संघ के अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख, अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख, संघ के प्रवक्ता और बाद में स्वयंसेवक – इस रूप से उनका दैनंदिन शाखा में जाने का आग्रह सतत बना रहा. 95 वर्ष की आयु के बाद कोरोना काल के लॉकडाउन तक वे शाखा में साप्ताहिक जाते थे. उनकी जीवन दृष्टि, समय का नियोजन, आर्थिक नियोजन, आर्थिक शुचिता, साधन शुचिता का आग्रह और मृत्यु का नियोजन भी लक्षणीय था.

जीवन दृष्टि

केवल आर्थिक रूप से सफल होना, प्रतिष्ठापूर्ण पद प्राप्त करना जीवन का ध्येय न हो सकता है, न होना चाहिए. क्योंकि, जीवन यापन करने के लिये अर्थार्जन का साधन प्राप्त करना जीवन का ध्येय नहीं होता! जीवन की सफलता या सार्थकता को विचार की इस कसौटी पर कसने वाले थे पिताजी. इसी कारण उनके स्वयं के जीवन में तथा परिवार में हम भाई-बहनों में पद केंद्रित careerist सोच की बजाय समाज केंद्रित सकारात्मक जीवन का विचार जड़ जमा सका.

जिन घटनाओं के कारण जीवन की ओर देखने की एक दृष्टि विकसित हुई, ऐसी पहली घटना जब मैं दसवीं कक्षा में था, उस समय की है. हमें तेलंग सर अंग्रेजी पढ़ाने आते थे. उन्होंने ‘My Aim in life’ (मेरे जीवन का लक्ष्य), इस विषय पर निबंध लिखकर लाने के लिये कहा. 1969-70 की यह घटना है. मेरी कक्षा के बहुसंख्य विद्यार्थियों नें ‘माय एम इज टू बी ए डॉक्टर’ इस विषय पर निबंध लिखा. किसी ने इंजीनियर बनने, किसी ने आई.ए.एस. अधिकारी बनने, तो किसी ने मिलिटरी ऑफिसर बनने का ध्येय लिखा. मैंने पिताजी से चर्चा करके निबंध लिखा था. तब बाबा ने मेरे निबंध का प्रारंभ ‘द एम ऑफ माय लाइफ इज टू बी ए सोशल रिवॉल्युशनरी’ ऐसा करने के लिये कहा. उसके आगे का वाक्य था ‘टू अर्न माय लाइवलीहुड, आय मे बी एन इंजीनियर, डॉक्टर, आई.ए.एस ऑफिसर ऑर अ मिलिटरी ऑफिसर’. अर्थात् जीवन यापन करने के लिये अर्थार्जन का साधन प्राप्त करना जीवन का ध्येय नहीं होता, जीवन का ध्येय अलग होता है. यह विचार जाने अनजाने मन पर प्रतिबिंबित होता गया.

दसवीं की परीक्षा में मुझे अच्छे अंक प्राप्त हुए थे. रसायनशास्त्र मेरा मनपसंद विषय था. जिनको अच्छे अंक प्राप्त हुए थे, ऐसे बहुसंख्य विद्यार्थी मेडिकल में प्रवेश लेने के लिये इच्छुक रहते थे. मेरी एक बहन भी मेडिकल में पढ़ रही थी. मैंने इस विषय पर पिताजी से चर्चा की, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, “अपने देश को केवल डॉक्टर्स की ही अवश्यकता नहीं है.” फिर एक वर्ष बाद 1971 में मेरे इंजीनियरिंग में दाखिला लेने की चर्चा हुई, तब भी पिताजी का मानना था कि “अपने देश को केवल इंजीनियर्स की आवश्यकता नहीं है.” ऐसी छोटी-छोटी बातों से अपने देश की क्या आवश्यकता हो सकती है, इस विषय में सोचने की आदत उन्होंने हम सभी भाई बहनों को लगाई. इस बात का अनुभव मुझे अब हो रहा है.

पिताजी नियमित पढ़ते थे. काल्पनिक अंग्रेजी उपन्यासों से ले कर तत्वज्ञानात्मक गंभीर पुस्तकों तक उनका पढ़ने का दायरा रहता था. मैं एमएससी (M.SC.) कर रहा था, तब मैंने देखा कि साधारणतः मेरे पढ़ने के समय से अधिक समय वे पढ़ रहे होते. उनका पुस्तक संग्रह भी विपुल, वैविध्यपूर्ण और व्यवस्थित रखा हुआ था, जिससे कोई भी पुस्तक तुरंत प्राप्त हो सके.

पढ़ते रहो

पीएचडी का प्रबंध विश्वविद्यालय में जमा करके मैंने 1983 में प्रचारक के रूप में कार्य करना प्रारंभ किया. मुझे गुजरात में कार्य के लिये भेजा गया. गुजरात में कहां काम करना, यह मुझे पता नहीं था. अहमदाबाद में पहुंचने के बाद आगे की व्यवस्था तय होनी थी. रात को 10 बजे नागपुर से निकलने वाली दादर एक्सप्रेस से मुझे प्रवास करना था. सायं शाखा के पश्चात घर में भोजन करते समय पिताजी ने एक बात बताई. हमारे कोई रिश्तेदार या निकट परिचित गुजरात में नहीं थे. अलग प्रांत, नयी अपरिचित भाषा, प्रचारक के रूप में नया अनुभव, ऐसी स्थिती होने के बावजूद ‘अच्छे से रहना, स्वास्थ्य की चिंता करना, पत्र भेजते रहना’, ऐसी सूचनाएं देने के बजाय उन्होंने कहा, “प्रचारक को नित्य नया कुछ पढ़ना चाहिये. जो कार्यक्षेत्र मिलेगा वहां ग्रंथालय होगा, वहां की सदस्यता ले लेना. अच्छी पुस्तकें पढ़ने के लिये उपलब्ध होंगी. मान लो अगर छोटा स्थान, ग्रामीण क्षेत्र मिला, और वहां ग्रंथालय नहीं होगा, तो ऐसे परिवार में परिचय बढ़ाओ जहां अच्छी पुस्तकों का संग्रह होगा.” मतलब पुस्तकें कैसे प्राप्त हो सकती हैं, इसका भी मार्गदर्शन किया और नित्य नया वाचन होना भी प्रचारक के लिये कितना आवश्यक है, इसका भी महत्व समझाया.

कुटुम्बवत्सल

पिताजी ‘कुटुम्बवत्सल’ थे. हमारे शालेय जीवन के समय मनोरंजन के अन्य साधन नहीं थे. तब गर्मी और दीपावली के अवकाश में वे नियमित हमारे साथ ताश खेलते थे. ताश में ब्रिज, हार्ट ऐसे नए खेल भी उन्होंने ही हमें सिखाए. हमारे रिश्तेदारों का जमावड़ा बहुत बड़ा था, आज भी है. इन सभी के साथ रिश्तेदारी निभाने के लिए वे अवश्य समय निकालते थे. उन सभी के पारिवारिक प्रसंगों में वे सहभागी होते थे. वे खेती भी करना जानते थे. अच्छे किसान थे. खेती में अनेक नए प्रयोगों की पहल हमारे गांव में हुई थी. मनुष्यों की परख के साथ उन्हें बैलों की भी अच्छी परख थी. खेती बैल आधारित ही होती थी. अच्छी बैलजोड़ी खरीदने के लिए वे सुदूर तेलंगाना तक भी जाते थे. गांव के साथी किसानों के लिए भी वहां से बैल खरीद कर लाते थे. मैं भी अनेक बार उनके साथ बैल बाजार में गया हूं. गांव में हमारी खेती की जमीन बेचने के बाद भी उनका गांव के साथ जीवंत संपर्क बना रहा था. हमारे गांव की प्रसिद्ध यात्रा और ‘पोला’ नामक किसानों के सबसे महत्त्व के त्यौहार के समय वे अवश्य गांव जाते थे. ‘पोला’ के समय सबसे अच्छी बैलजोड़ी को पुरस्कृत कर वे बैलों की अच्छी देखभाल करने को प्रोत्साहन देते थे.

जीवन के पचास वर्ष पूर्ण होते ही उन्होंने घर पर समय देने हेतु एक क्रम शुरू किया. आषाढ़ एकादशी से कार्तिक एकादशी तक चातुर्मास के समय रात्रि नौ बजे से दस बजे तक परिवार के सभी जन एकत्र होकर एक स्तोत्र, भगवद्गीता के अध्याय का पाठ और गीता सम्बंधित पुस्तक का सामूहिक पठन करते. सभी के लिए नियम था कि वे रात्रि नौ बजे के पहले घर आ जाएं. पिताजी स्वयं भी इन चार महीनों में रात नौ बजे के बाद के किसी सार्वजनिक कार्यक्रम को स्वीकार नहीं करते थे. यह क्रम कई वर्षों तक अनवरत चलता रहा.

आत्मानुशासन

साठ वर्ष होते ही संपादक पद से निवृत्त होने का उनका आग्रह था. ‘तरुण भारत’ के संचालकों का आग्रह था कि वे आगे भी कुछ वर्ष तक संपादक रहें. पर पिताजी ने अपनी योजना के अनुसार ही संपादक पद से निवृत्ति का निर्णय लिया. बाद में ‘तरुण भारत’ का संचालन करने वाले नरकेसरी प्रकाशन के प्रबंध संचालक और बाद में उस के अध्यक्ष के नाते उनकी सेवाएं ली गयीं. यह कार्य भी उन्होंने 70 वर्ष की आयु तक ही करने का निर्णय लिया था. स्वास्थ्य अच्छा होते हुए भी संघ के अखिल भारतीय दायित्व में 75 वर्ष की आयु के बाद नहीं रहने का अपना निर्णय उन्होंने आग्रहपूर्वक लिया. यह बात 1998 की है. उसके बाद सामान्य स्वयंसेवक के नाते वे सक्रिय रहे. सन् 2000 में संघ में पहली बार प्रवक्ता की योजना बनी. विशेष आग्रह पर ‘केवल तीन वर्ष तक ही यह दायित्व निभाऊंगा’ कह कर उन्होंने स्वीकृति दी. और ठीक तीन वर्ष के बाद सामाजिक जीवन में एक स्वयंसेवक के नाते वे सतत सक्रिय रहे.

समय का नियोजन

उनका समय का नियोजन भी निश्चित रहता था. शाखा, परिवार का समय, पढ़ने का समय- पहले रेडियो पर समाचार सुनने और बाद में टेलीविजन आने के बाद समाचार देखने का समय निश्चित होता था. समय पालन का आग्रह भी विलक्षण था. मेरे प्रचार प्रमुख के दायित्व के दौरान कई पत्रकार ऐसे मिले जिन्होंने कहा कि पांच मिनट देरी से पहुंचने पर आपके पिताजी ने हमें वापस भेज दिया था. ऐसे एक पत्रकार जो पांच मिनट देरी से पहुंचने पर वापस लौटा दिए गए थे, अगली बार शाम चार बजे का समय मिलने पर, देरी ना हो इसलिए साढ़े तीन बजे ही पहुंच गए. पिताजी पुस्तक पढ़ रहे थे. पिताजी को अकेले बैठे देख कर उस पत्रकार ने बातचीत शुरू करनी चाही तो पिताजी ने टोका कि अभी चार नहीं बजे हैं और वे पुस्तक पढ़ने में लगे रहे. ठीक चार बजे पुस्तक पढ़ना रोक कर उन्होंने बातचीत शुरू की.

आर्थिक अनुशासन

संघ के अधिकारियों के कहने पर 17 वर्ष की जमी-जमाई प्राध्यापक की नौकरी छोड़ कर पत्रकारिता के एकदम नए क्षेत्र में कदम रखने का निर्णय वैसे अव्यावहारिक ही कहा जाना चाहिए. वह भी बढ़ता हुआ विस्तृत परिवार होते हुए भी पहले की तुलना में कम वेतन पर ! पर जगत के व्यवहार में अव्यावहारिक माना जाने वाला यह निर्णय ध्येयनिष्ठ जीवन के लिए सहज था. पिताजी ने मां की सहमति और सहायता से यह निर्णय लिया. जब पूछा गया कि इतने कम वेतन में परिवार का गुज़ारा कैसे होगा, तब पिताजी ने कहा कि इतने कम वेतन में अपना गुज़ारा चलाने वाले अनेक परिवार उन्हें पता है. और आर्थिक आवश्यकताओं में कटौती कर, स्वाभिमानपूर्वक, किसी की सहायता लिए बिना, स्वयं अधिक कष्ट करते हुए माँ की सहायता से उन्होंने परिवार की  आवश्यकताओं का आर्थिक नियोजन किया.

आर्थिक स्रोत को ध्यान में रख कर उनका आर्थिक नियोजन भी पूर्ण रहता था. मेरा छोटा भाई राम, जो आजकल विश्व विभाग में प्रचारक है, स्नातक के अंतिम वर्ष में था. तब महाराष्ट्र में आर्थिक दृष्टि से अक्षम छात्रों के लिए शुल्क (फीस) माफी की योजना थी. पिताजी सेवानिवृत्त हो चुके हैं, यह जानकर कॉलेज के कार्यालयीन कर्मचारी के सुझाने पर राम ने शुल्क माफी का पर्याय चुना. वह मंजूर भी हुआ. चार महीने तक राम द्वारा शुल्क के लिए पैसे नहीं मांगने पर जब पिताजी ने उसे पूछा, तब उसने शुल्क माफी की बात कही. पिताजी ने कहा कि ‘तुम्हारी पढ़ाई के लिए आवश्यक आर्थिक व्यवस्था मैंने कर रखी है’ और महाविद्यालय को पत्र लिखा कि गलती से शुल्क माफी हो गयी है, इसलिए वे उन चार महीनों का शुल्क और देरी के लिए दंड (फाइन) देंगे. और वैसा उन्होंने किया.

जिन दिनों पिताजी ‘तरुण भारत’ के संपादक थे, उन दिनों मेरे बड़े भाई धनंजय ने बैंक में नौकरी के साथ एक छोटा सा व्यवसाय भी प्रारंभ किया था. उस व्यवसाय के लिये उसे नागपूर के बाहर भी फोन करने पड़ते थे. फोन ‘तरुण भारत’ का था. हर महीने टेलिफोन बिल आने के बाद पिताजी धनंजय ने किये हुए एसटीडी कॉल के पैसे तरुण भारत में जमा करते थे.

नरकेसरी प्रकाशन के अध्यक्ष के नाते उन्हें कार तथा चालक की सुविधा थी. जिस दिन उन्होंने अध्यक्ष पद से निवृत्ति ली उस दिन तरुण भारत कार्यालय से कार से आने के स्थान पर वे रिक्शा से आए. कार चालक उन्हें घर छोड़ने के लिए तैयार खड़ा था. प्रबंध संचालक के बार-बार कहने पर भी उन्होंने कार का उपयोग करने से मना कर दिया. प्रबंध संचालक ने मेरे बड़े भाई धनंजय को टेलिफोन कर कहा कि डेप्रिसिएशन (मूल्य ह्रास) के कारण वही कार 11 हजार रुपये में वे खरीद लें ताकि पिताजी के काम आ सके. पर पिताजी ने उसे भी अस्वीकार कर दिया. बाद में जब वही कार 55,000/- रुपये में बिकी तब पिताजी ने यह ध्यान दिलाया कि उनका निर्णय कितना सही था. ऐसा था उनका आर्थिक अनुशासन और साधन शुचिता का आग्रह.

सम्मान, पद की चाह नहीं

तत्कालीन जनता पार्टी से गठबंधन कर सरकार बनाकर शरद पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने. उस समय राज्यपाल द्वारा विधान परिषद में पिताजी की नियुक्ति करने का विचार चल रहा होगा. राजनैतिक पद प्राप्त करने के लिए लोग कैसे-कैसे प्रयास करते हैं, यह सार्वजनिक जीवन के कार्यकर्ता बखूबी जानते हैं. जब तरुण भारत, पुणे के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में शरद पवार जी की पिताजी से मुलाकात हुई तब शरद जी ने पिताजी से कहा कि विधान परिषद में राज्यपाल द्वारा मनोनीत करने हेतु आप के नाम की चर्चा है. पर केवल आपके लोगों द्वारा ही आपके नाम की प्रस्तुति हो रही है. अन्य लोगों द्वारा भी प्रस्तुति आए वह ऐसा प्रयत्न करेंगे तो आसान होगा. तब पिताजी ने कहा था कि मेरे नाम के लिए मैं प्रयत्न करूंगा, यह बात आप छोड़ ही दीजिए, मेरा नाम भी छोड़ दीजिए. मैं आपको विदर्भ से दो तीन योग्य व्यक्तियों के नाम कुछ समय बाद भेजूंगा.

इस सबके बावजूद पिताजी का नाम विधान परिषद के मनोनीत सदस्य के लिए चुना गया. पिताजी को यह निर्णय बताने के लिये तत्कालीन जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता सुमतिताईजी सुकलीकर घर आयीं थीं. शाम का समय था. मैं सायं शाखा से जब घर पंहुचा तब ताईजी निकल रहीं थीं. पिताजी उनको छोड़ने के लिये बाहर तक आए थे. तब ताई जी के शब्द सुनाई दिये, ‘बाबूराव जी, आप मना नहीं करना!’ तब पिताजी ने कहा, ‘ताईजी, जिन्होंने मुझे तरुण भारत की जिम्मेदारी सौंपी है, उन्हें पूछे बिना, बताए बिना, मैं हां कैसे कह दूं?’ असल में ऐसी नियुक्ति होने के लिये लोग/कार्यकर्ता क्या-क्या प्रयत्न करते हैं, यह सर्वविदित है. उस दौरान सरसंघचालक प.पू. बालासाहेब देवरस प्रवास में थे. तीन दिन बाद उनके नागपुर आने के बाद उनसे भेंट कर और उनकी अनुमति के बाद ही पिताजी ने ‘हां’ कहा था. इन तीन दिनों में पिताजी को अभिनंदन के लिये निरंतर फोन आए. परंतु हमारे घर में नियुक्ति की खुशी में तीन दिन बाद ही मिठाई लाई गई.

इसी संदर्भ में एक और घटना याद आ रही है. रोज अपनी शाखा में आने वाला एक स्वयंसेवक विधान परिषद का सदस्य बना, महाराष्ट्र का विधायक बना – इस बात की खुशी स्वाभाविक रूप से शाखा में सभी को हुई थी. इस प्रसंग के कुछ दिन बाद ही गोरक्षण शाखा का शरद पूर्णिमा का कार्यक्रम था. उसमें पिताजी का बौद्धिक होने वाला था. शाखा स्वयंसेवकों ने इसी कार्यक्रम में विधायक होने पर पिताजी का सम्मान कार्यक्रम भी तय किया था. उस कार्यक्रम में मैं भी उपस्थित था. पिताजी का परिचय और सम्मान होने के बाद वे बोलने के लिये खड़े हुए और प्रारंभ में ही सब स्वयंसेवकों को खरी खरी सुनाई. उन्होंने कहा, ‘एक राजनैतिक पद मिलने के बाद मुझमें क्या बदलाव आया? मैं तो वही हूं, स्वयंसेवक! राजनैतिक उपलब्धि का उत्सव मनाने का प्रचलन संघ स्वयंसेवकों में कबसे प्रारंभ हुआ? अन्य कोई इसे उपलब्धि माने तो अलग बात है. परंतु संघ स्वयंसेवक ऐसा मानें तो यह गलत ही है. एक स्वयंसेवक प्रचारक के रूप में अपना जीवन प्रारंभ कर रहा हो तो उसका अभिनंदन अवश्य करना चाहिए.

मृत्यु आने पर उसका स्वागत

मृत्यु का भी उन्होंने पूर्व आयोजन किया था. ‘विना दैन्येन जीवनम् अनायासेन मरणम्’ ऐसा सूत्र वे अनेक बार कहते थे. सौ वर्ष तक जीने का संकल्प था उनका. अभी 11 मार्च 2021 को, केवल तीन महीने बाद ही, वे 98 वर्ष पूर्ण कर 99वें वर्ष में प्रवेश करने वाले थे. परंतु मृत्यु आने पर उसका स्वागत करने की बात भी वे साथ-साथ करते थे. 2017 में ही उन्होंने यह लिख कर रखा था कि जिस स्थान (गांव) पर मेरी मृत्यु होगी, वहीं अंत्यसंस्कार करना चाहिए. मृत शरीर को घर पर लाने के बाद 12 घंटों से अधिक नहीं रखना चाहिए. विद्युत दाहिनी या डीजल दाहिनी में दाह करना चाहिए. और आगे यह भी लिख रखा था कि श्मशान में श्रद्धांजलि के भाषण नहीं करने चाहिए. अलग-अलग संस्थाएं चाहें तो अपने कार्यक्रम रखें.

वचन की प्रतिबद्धता

वचन की प्रतिबद्धता का भी विलक्षण आग्रह उनका रहता था. 1947 में उनके विवाह की बातें चल रही थीं. तब नागपुर शहर के कार्यवाह श्री बालासाहब देवरस जी ने उन्हें पूछा कि 9 मई से शुरू होने वाले मद्रास के वर्ग में मुख्य शिक्षक के नाते जा सकते हो क्या? उनका उत्तर सकारात्मक था. उसके लिए 7 मई को नागपुर से निकलना आवश्यक था.

तीस दिन का वर्ग होने के कारण 9 जून के बाद नागपुर वापस आना था. विवाह सम्बंधित सारी बातें होकर विवाह की तिथि 15 मई की तय हो रही थी. तब पिताजी ने कहा कि वे 7 मई से 11 जून तक उपलब्ध नहीं हैं, कारण – उन्हें वर्ग में जाना है. वधु पक्ष के लोगों ने श्री बालासाहब देवरस जी को मिलकर सारी बात बताई, तब श्री बालासाहब जी ने कहा कि ‘उसे मुझे मिलने के लिए कहिये, उसे बाद में शुरू होने वाले दूसरे प्रान्त के वर्ग में भेजेंगे.’ यह बात जब पिताजी को बताई गई तब उन्होंने कहा कि एक बार बालासाहब को हां कहा है तो मैं दोबारा मिलने नहीं जाऊंगा और विवाह के लिए वर्ग से आने के बाद की तिथि तय कर सकते हैं. यह बात सुनकर वधु पक्ष को स्वाभाविक गुस्सा आया और उन्होंने कहा कि ‘फिर हम पर अवलम्बित न रहें’. बस! यह सुनते ही हमारे दादाजी भी गुस्से में कह गए कि ‘ठीक है! दोबारा आओगे तो फिर से लड़की देखने से शुरुआत करेंगे!’

दीपावली बाद फिर से वे दोबारा आए तो दादाजी ने फिर लड़की देखने की बात की. वे मान भी गए. पर जब दादाजी ने पिताजी से लड़की देखने चलने के लिए कहा तो पिताजी ने कहा, ‘एक बार देख कर हां कहा है तो दोबारा नहीं आऊंगा. मेरी हां ही है. यदि इन दस महीने के कालखंड में लड़की को लकवा हुआ हो, वह अपाहिज  हुई हो या और कोई बीमारी हुई हो – तो भी मेरी हां ही है.’ इस तरह मई 1947 में होने वाली शादी मार्च 1948 में हुई. इस  प्रकार से अपने वचन के पक्के थे पिताजी.

राज्यपाल द्वारा पिताजी के महाराष्ट्र विधान परिषद का सदस्य मनोनीत होने की बात पहले की जा चुकी है. उसका शपथ ग्रहण समारोह तुरंत तीन दिन के अंदर रखा गया. कारण विधानपरिषद के सभापति श्री रा.सू. गवई दो महीने के लिए विदेश जाने वाले थे. परन्तु पिताजी ने शपथ ग्रहण के लिए निर्धारित दिन ही नागपुर के विनायकराव देशमुख विद्यालय को किसी कार्यक्रम के लिए समय दे रखा था. जब पिताजी से शपथ ग्रहण समारोह में आने का आग्रह किया गया और यह भी बताया गया कि बाद में दो माह तक सभापति भारत में नहीं रहेंगे… तब पिताजी ने कहा कि वे दो माह बाद शपथ लेंगे और उन्होंने विद्यालय को दिया वचन पूर्ण किया.

संघ के प्रति अद्भुत समर्पण

‘संघशरणता’ का महत्वपूर्ण गुण नियमित शाखा जाने से ही व्यक्तित्व में आता है. अनेक वर्षों से संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक हर तीसरे वर्ष नागपुर में होती है. ऐसी ही एक बैठक मार्च 2018 में नागपुर में हो रही थी. पिताजी अनेक वर्षों से इस बैठक में उपस्थित रहते थे. परंतु अब अधिक आयु होने के कारण वे इस बैठक में नहीं आते थे. देशभर के प्रमुख कार्यकर्ताओं की और पिताजी की भेंट होनी चाहिये, इस उद्देश्य से माननीय सरकार्यवाह श्री भय्याजी जोशी ने पिताजी को कुछ समय के लिये बैठक स्थान पर आमंत्रित किया. 11 मार्च, 2018 को दोपहर के बाद पिताजी बैठक स्थान पर पहुंचे. 11 मार्च पिताजी का अंग्रेजी दिनांक के अनुसार जन्मदिन होता है. यह सरकार्यवाह जी को पता चला, इसलिये उनकी आयु के 95 वर्ष पूर्ण होने पर पूजनीय सरसंघचालक मोहनराव भागवत जी द्वारा पिताजी का सम्मान किया गया. पिताजी व्हीलचेयर पर बैठे थे, इसलिये सरसंघचालक जी ने मंच से उतर कर पिताजी को शाल एवं श्रीफल देकर सम्मानित किया. पिताजी (आयु 95 वर्ष) ने सरसंघचालक जी (आयु 68 वर्ष) को झुककर नमस्कार करना चाहा, तब सरसंघचालक जी ने हाथ पकड़ कर उनको रोका. यह सबने देखा. अत्यंत हृदयस्पर्शी प्रसंग था. उसके बाद पिताजी को पांच मिनट बोलना था. तब पिताजी ने भाषण के प्रारंभ में ही कहा कि, ‘पूजनीय सरसंघचालक जी ने मुझे प्रणाम नहीं करने दिया, इसलिये मैं मन से ही उनके चरणस्पर्श करता हूं.’ यह सुनकर सब भावविभेर हो गए. अगले तीन मिनट पिताजी ने जो भाषण दिया वह बहुत सारभूत और मार्मिक था. उन्होंने कहा, ‘संघ को समझना आसान नहीं है. संघ को समझने के लिये ‘ईशावास्योपनिषद’ समझना आवश्यक है. इस उपनिषद के एक श्लोक में ‘आत्मतत्व’ का वर्णन करते समय परस्पर विरोधी बातें एकसाथ कही गई हैं.’ वह श्लोक इस प्रकार है :

‘तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके. तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यत:..’

अर्थात ‘वह (आत्म तत्व) हलचल करता है, और वह हलचल नहीं करता. वह दूर है और वह पास है. वह सब के अंदर है और वह सब के बाहर है.’ यही सब वर्णन संघ के लिये भी लागू होता है! ‘संघ राजनैतिक है भी और नहीं भी. संघ धार्मिक संगठन है भी और नहीं भी. संघ एक सामाजिक संस्था है, और संघ एक सामाजिक संस्था नहीं भी है. क्योंकि संघ पूरे समाज का संगठन करता है. संघ समाज से एकात्म है. संघ पूर्ण समाज है.’

इतनी मूलभूत बात केवल कुछ मिनटों में अपने वक्तव्य में उन्होंने सहजता से बताई. प्रतिनिधि सभा होने के बाद मैं घर गया. पिताजी से बात करते समय, ‘सबको आपका भाषण बहुत अच्छा लगा’ यह बताने पर उन्होंने कहा, ‘मैं प्रकृति अस्वस्थ होने के कारण मंच पर नहीं जा पाया, इसलिये पूजनीय सरसंघचालक जी को मेरे लिये मंच से उतर कर नीचे आना पड़ा. इसका मुझे दु:ख है और संकोच लग रहा है.’ यह प्रसंग मेरे मन में बस गया है.

ऐसे छोटे छोटे प्रसंगों ने, बातों ने, जाने-अनजाने हम सबका जीवन गढ़ा है, आकार दिया है.

अब पिताजी का शरीर तो नहीं रहा. पर ऐसा लगता है कि इन सभी दिशादर्शक विचार तथा आदर्शों के रूप में वे हमारे साथ ही हैं. उनके द्वारा प्रशस्त किये मार्ग पर चलने का सामर्थ्य प्राप्त हो यही उनसे और सर्वशक्तिमान परमेश्वर से प्रार्थना है.

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January 18th 2021, 10:48 pm

सोनभद्र – माता शबरी की तरह ही समय की प्रतीक्षा में निधि संग्रह कर रही थीं सीतादेवी

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सोनभद्र, काशी (विसंकें). काशी प्रान्त के सोनभद्र जिले में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान में माता शबरी का रूप देखने को मिला. अभियान हेतु जन जागरण कार्यक्रम में उस समय भावुक कर देने वाला क्षण उत्पन्न हो गया, जब एक महिला ने विवादित ढांचा विध्वंस के समय से अपने घर में दानपात्र बनाकर श्रीराम मंदिर के लिए एकत्र कर रही अपनी श्रद्धानिधि को निधि समर्पण हेतु जनजागरण में लगे कार्यकर्ताओं को सौंपा.

सोनभद्र नगर में रविवार को सुबह प्रभात फेरी का कार्यक्रम रखा गया था. श्रीराम नाम धुन जपते हुए कार्यकर्ता गली-गली प्रभात फेरी लगा रहे थे. उसी समय एक महिला उनसे मिली. महिला ने प्रभात फेरी करने वाले कार्यकर्ताओं से अपने द्वारा संकल्पित धनराशि को लेने का आग्रह किया.

कार्यकर्ताओं ने बताया कि महिला की जितनी महिमा गाई जा सके कम है. महिला की तुलना माता शबरी से करते हुए उन्होंने कहा कि जिस तरह माता शबरी भगवान श्रीराम के इंतजार में बेर इकट्ठा करती रही, उसी तरह माता सीता देवी ने भी 6 दिसंबर, 1992 से एक-एक रुपये का सिक्का जुटाकर मंदिर निर्माण के लिए धनराशि समर्पित करने का संकल्प लिया था.

कार्यकर्ता सीतादेवी पत्नी रामनिहोर केशरी की दुकान पर पहुंचे, जो छोटी सी मिट्टी के बर्तन दीपक आदि की दुकान थी. जिसमें बिक्री हेतु सामान भी बहुत कम था. महिला ने अपने बच्चे को संकल्पित धनराशि लाने के लिए कहा, तो दो लोग मिलकर उस धनराशि को लेकर आए जो एक और दो रुपये के सिक्कों में थी. महिला ने बताया कि जिस दिन ढांचा गिरा, उस दिन मन में यह विश्वास उत्पन्न हो गया कि मेरे जीते जी मंदिर अवश्य बनेगा और वह प्रत्येक दिन एक व दो रुपये का सिक्का मंदिर निर्माण के लिए सहयोग राशि के रूप में इकट्ठा करने लगी. कभी-कभी बिक्री न होने पर शेष रह जाता था. लगभग 9300 रुपये इकट्ठे हो चुके थे, शेष राशि उनके पुत्र उमेश कुमार केशरी ने मिलाकर 11000 की राशि समर्पित की. उनका यह भी कहना था कि उनका संकल्प था कि यदि उनके जीवन काल में मंदिर निर्माण चालू नहीं हुआ तो जब भी मंदिर निर्माण शुरू होगा, उनकी आने वाली पीढ़ी इसी भांति धन संग्रहित कर मंदिर निर्माण हेतु समर्पित करेंगे.

कलयुग में भी माता शबरी का दर्शन साक्षात होगा, ऐसा केवल रामकाज में ही संभव था. वह सभी लोग अत्यंत भाग्यशाली थे, जिनको ऐसी माता का आज निधि समर्पण के दौरान अद्भुत स्वरूप देखने को मिला.

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January 18th 2021, 12:14 pm

काजी साहब का ऐलान – जब फतवा जारी होगा, तब मस्जिदों से ऐलान कर लगवाएंगे वैक्सीन

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उज्जैन. एक तरफ पूरा देश कोरोना वैक्सीन को लेकर उत्साहित है, साल भर के बाद उम्मीद की किरण जगी है. वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग इसे धर्म से जोड़ रहे हैं, समुदाय विशेष में भ्रम पैदा कर रहे हैं. यही काम कुछ लोगों ने कोरोना महामारी के प्रसार के दौरान भी किया था. अब, वैक्सीन को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा करने वाला बयान मध्यप्रदेश के उज्जैन से आया है.

यहां सुन्नी मुस्लिम समाज के मज़हबी रहनुमा नायब काजी ने बेतुका बयान दिया है. उन्होंने कहा कि वे टीका तब तक नहीं लगवाएंगे, जब तक सुन्नी उलेमा कलाम और मुस्लिम डॉ. फतवा नहीं जारी करेंगे.

काजी ने कहा कि वैक्सीन सबके लिए है. टीका लगवाने के लिए जब भी फतवा जारी होगा, मस्जिदों से ऐलान करवाकर वैक्सीन लगवाई जाएगी. उनका दावा है कि वैक्सीन को लेकर सब की एक ही राय नजर आ रही है. उनके अनुसार यह इस्लाम का मामला है, इसलिए हम फतवे का इंतजार कर रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा कि जब कोई भी बीमारी का हल ना हो तो ऐसे में शरीयत में गुंजाइश होती है. ये काम इस्लाम से जुड़ा हुआ है. इसलिए इसमें थोड़ा वक्त लगेगा. फतवा जारी होने के बाद पता चल जाएगा कि हमें कोरोना से बचने के लिए वैक्सीन का इस्तेमाल करना है या नहीं.

इस तरह के बयानों से मुस्लिम समाज में बढ़ती धार्मिक कट्टरता की झलक दिखाई देती है. गौर करने वाली बात है कि बीते दिनों उज्जैन में श्रीराम मंदिर निधि समर्पण के लिए निकाली जा रही शांतिपूर्ण बाइक रैली पर छत से पथराव किया गया था. पथराव की इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था.

CAA विरोधी आंदोलनों के दौरान भी पैदा की थी टकराव की स्थिति

उज्जैन के बेगमबाग इलाके में सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान सड़क जाम करने की घटना को अंजाम दिया गया. बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग महाकाल मंदिर को जाने वाले मार्ग को जाम करके बैठ गए थे. सैकड़ों की संख्या में बैठे लोगों ने ऐलान कर दिया था कि जब तक सीएए कानून वापस नहीं हो जाता, तब तक वह उसी जगह पर बैठे रहेंगे. इस धरने के कारण महाकाल मंदिर को जाने वाली मुख्य सड़क बंद हो गयी थी.

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January 18th 2021, 12:14 pm

अनूपगढ़ – जीवन पटल पर मेहनत के कसीदे

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रश्मि दाधीच

मांग में सिंदूर, हाथों में मेहंदी और सुर्ख लाल जोड़े में सजी राखी, उषा व सीमा की खुशियां आज नए जीवन की अंगड़ाइयां ले रही थी. सेवा भारती अनूपगढ़ द्वारा आयोजित सामूहिक विवाह कार्यक्रम में दुल्हन बनी ये युवतियां कभी जिन गलियों में भीख मांगती, आज जब उन गलियों से उनकी डोली उठी तो इनके माता-पिता ही नहीं मोहल्ले वालों ने भी सेवाभारती के कार्यकर्ताओं को आशीर्वाद की झड़ियों में भिगो दिया. भीख मांगने वाले परिवारों की इन बालिकाओं को सिलाई, मेंहदी, पार्लर व अन्य रोजगारपरक प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भरता की राह दिखाई अनूपगढ़ सेवाभारती स्वावलंबन केंद्र ने. खाने के लिए हाथ पसारती सीमा जिन घरों से झिड़क और अपमान सहती, आज उन्हीं घरों में दुल्हन के अरमानों की मेहंदी सजाने के लिए जानी जाती है. सालों से घर-घर में दाल मांगने जाती पूनम का तो नाम ही दाल पड़ गया था. आज वही पूनम, स्वावलंबन केंद्र में सिलाई सीखने के बाद “पूनम बुटीक” खोलने की तैयारी कर रही है.

अनूपगढ़ में सांसी, बिहारी, ढोली, बाजीगर बस्ती के करीब 110 परिवार हैं. जो कभी गलियों में आटा, दाल, चावल मांगते कचरे में हाथ और आंखें गड़ाए शिक्षा, रोजगार और सभ्य समाज के तौर तरीकों से कोसों दूर, बस अपने मैले और फीके जीवन को ढो रहे थे.

आज सेवा भारती जोधपुर प्रांत स्वावलंबन प्रमुख दिनकर पारीक व क्षेत्रीय प्रशिक्षण प्रमुख गोविंद कुमार जी के सात-आठ वर्षों के प्रयासों से इन सभी परिवारों ने जीवन पटल पर मेहनत के कसीदे निकाल स्वाभिमान से जीना सीख लिया है. फूल लगाने वाले माली को यह नहीं पता होता कि फूलों की खुशबू कितनी दूर तक अपनी पहचान बनाएगी.

आठवीं कक्षा में पढ़ने वाला अनाथ राम, स्वयंसेवकों के सहयोग से सरकारी योजनाओं का लाभ उठाकर, अपने हुनर से अपने भविष्य की दिशा तय कर रहा है. पढ़ाई के साथ ही गैराज में गाड़ियों की सीट बनाने में माहिर अपने काम से 7000 रु महीना कमा रहा है. इसी बस्ती की सीमा फिजियोथैरेपिस्ट की ट्रेनिंग ले रही है, तो सुनीता बीए करते हुए बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रही है.

गोविंद जी बताते हैं, अज्ञानता के अंधेरे में शराब के नशे में डूबे, दो वक्त की रोटी तलाशते इन बस्तियों के लोग बच्चों को पढ़ाने के ख्याल से कोसों दूर थे. कार्यकर्ताओं के निरंतर  प्रयासों से अब 250 से अधिक बच्चे  नजदीक के सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं. किशोरी केंद्रों में किशोरियों के प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान देती जयविजय चौधरी (तहसील अध्यक्ष, महिला मंडल अनूपगढ़) अपने सेवा कार्यों के दौरान बहुत करीब से बस्तियों में महिलाओं की स्थिति में आए परिवर्तन की साक्षी बन रही हैं. सेवा भारती स्वावलंबन केंद्र के माध्यम से 17 प्रकल्प यहां वर्षभर चलते हैं. जहां महिलाएं सिलाई सीखते हुए, थैले, लंगोट, बंडिया, ऊं की पताकाएं निरंतर सिलाई कर रही है. सावन में राखियां बनाकर तो दीपावली में दीप व लक्ष्मी गणेश बनाकर बस्ती की महिलाएं परिवार में आर्थिक योगदान कर रही हैं.
यह कहानी शुरू होती है 8 वर्ष पहले, जब संघ के स्वयंसेवक दिनकर पारीक जी बस में अनूपगढ़ से दिल्ली जा रहे थे. तभी उन्होंने खिड़की से दो मासूम बच्चों को कचरे के डिब्बे से कुछ खाने का सामान निकालते हुए देखा और वे वहीं, बस से उतर गए. उनकी वेदना और इन बस्ती के लोगों के लिए कुछ करने की चाहत ने एक लंबी सेवायात्रा को जन्म दिया. भजन संध्या और संस्कारशाला से शुरू किया गया कार्य आज घर-घर में स्वावलंबन द्वारा सम्मान का उजाला कर रहा है.

दिनकर भैया व रामरत्न जी (तहसील अध्यक्ष, अनूपगढ़) के प्रयासों से इन बस्तियों में विधिक चेतना शिविर लगे, जिनसे इन परिवारों को पहचान मिली. चार बेटियों को बोझ मानते विकलांग पवन जैसे 5 अन्य परिवारों को भी सरकारी योजनाओं का लाभ  मिला. पुरुषों को कौशल विकास के अंतर्गत बार्बर (नाई) की ट्रेनिंग दी गई. आज वे जेल के कैदियों, बीएसएफ के जवानों की तथा कुछ अपनी दुकान को खोल कर लोगों की कटिंग कर सम्मान पूर्वक जीविका चला रहे हैं. दिव्यांग पवन ने भी हेयर कट की छोटी सी दुकान खोली है.

तुम कदम तो बढ़ाओ रास्ते खुद ब खुद दिखाई देने लगते हैं. सोमदत जी कचोरिया (जिला सह मंत्री, सूरतगढ़) बताते हैं कि, अपने बच्चों को स्कूल पढ़ने भेजेंगे, काम करते समय नशा नहीं करेंगे और अपने अकाउंट में हर महीने एक हजार रुपये बचत करेंगे. इन तीनों शर्तों को पूरा करने वाले कई युवाओं को हाथ ठेले बांटें गए. जिनमें ढोल बजाने वाले, मोची का काम करने वाले व प्लास्टिक की बोतल इकट्ठा कर मुश्किल से गुजारा करते राकेश, कालूराम,ओमजी, और पवन ढोली शामिल हैं.

भगवती जी पारीक (सह विभाग संयोजिका महिला मंडल श्रीगंगानगर विभाग) की पहल और विचार से ही आज ये युवा स्वाभिमान से रेहड़ी (हाथ ठेला) लगाकर अपने परिवार को रोटी खिला रहे हैं. लोहा पीटकर जैसे तैसे गुजारा कर रहे गाड़ियां लोहारों के किसान कार्ड बनवाए गए. जो अब धान मंडी में, कृषि के उपयोगी औजार बनाकर स्वाभिमान से जीवन यापन कर रहे हैं.

यदि मन में संकल्प सच्चा हो और मेहनत पूरी हो, तो वक्त बदलते देर नहीं लगती. समाज का सहयोग और अच्छा मार्गदर्शन किसी की भी परिस्थिति बदलने के लिए काफी है. जो लोग स्वयं दूसरों के सामने भोजन के लिए हाथ फैलाते थे, उन्हीं स्वावलंबी परिवारों ने वर्ष 2019 दिसंबर में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्राथमिक शिक्षा वर्ग अनूपगढ़ में लगा तो 7 दिन तक 100 स्वयंसेवकों को बड़े हर्षोल्लास से भोजन कराया. सारे भेदभाव भुलाकर समरसता की मिसाल कायम कर रही है स्वावलंबन की ओर अग्रसर ये बस्तियां.

https://www.sewagatha.org/know_more_content1.php?id=2&page=297

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January 18th 2021, 12:14 pm

निधि समर्पण अभियान – श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने जारी किए टोल फ्री नंबर

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अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण को लेकर निधि समर्पण अभियान देशभर में प्रारंभ हो चुका है. अपने सामर्थ्य से अधिक बढ़कर लोग सहयोग प्रदान कर रहे हैं. इसी कड़ी में रविवार को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र व बैंकों ने टोल फ्री नंबर जारी किए. इन नंबरों पर फोन करके सहयोग राशि प्रदान करने के संबंध में पूरी जानकारी ली जा सकती है. जिससे देश का कोई भी नागरिक छूट न जाए, जिसके मन में श्रीराम मंदिर निर्माण में सहयोग की इच्छा हो.

स्टेट बैंक आफ इंडिया का टोल फ्री नंबर 18001805155 और पंजाब नेशनल बैंक का टोल फ्री नंबर 18001809800 है. विश्व हिन्दू परिषद ने संतों के मार्गदर्शन में निधि समर्पण अभियान के निमित्त देश के 13 करोड़ से अधिक परिवारों में संपर्क करने का लक्ष्य रखा है.

निधि समर्पण अभियान के तहत श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए विश्व हिन्दू परिषद लोगों का समर्पण और सहयोग राशि लेगी. इस दौरान 10 रुपये, 100 रुपये और 1000 रुपये के कूपन होंगे. 2000 रुपये से ज्यादा सहयोग करने वालों को रसीद दी जाएगी. देश के करोड़ों नागरिकों के सहयोग से अयोध्या में भव्य राम मंदिर का कार्य पूर्ण होगा. कार्यकर्ता टोलियां बनाकर घर-घर जा रहे हैं और राममंदिर निर्माण के लिए समर्पण निधि का आग्रह कर रहे हैं.

इसी क्रम में विश्व हिन्दू परिषद (VHP) के एक प्रतिनिधिमंडल ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की. योगी आदित्यनाथ ने प्रतिनिधिमंडल को अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए निधि समर्पित की. वहीं, संगमनगरी प्रयागराज में कैबिनेट मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी और मेयर अभिलाषा गुप्ता ने सवा करोड़ रुपये की निधि समर्पित की.

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January 18th 2021, 12:14 pm

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए राज्यपाल का निधि समर्पण

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पटना (विसंकें). अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए बिहार के राज्यपाल फागू चौहान ने 2,01,000/- (दो लाख एक हजार) रुपये की राशि समर्पित की. उन्होंने अपना समर्पण चेक से प्रदान किया. विश्व हिन्दू परिषद् के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद्मश्री डॉ. आर.एन. सिंह ने समर्पण राशि प्राप्त की. डॉ. आर. एन. सिंह श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण समिति के बिहार प्रदेश अध्यक्ष भी हैं. इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक (बिहार-झारखंड) रामदत्त चक्रधर, समिति के प्रदेश मंत्री डॉ. मोहन सिंह, क्षिण बिहार प्रांत प्रचारक राणा प्रताप, बिहार भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री नागेन्द्र एवं विश्व हिन्दू परिषद् के क्षेत्रीय संगठन मंत्री (बिहार-झारखंड) केशव राजू भी उपस्थित थे.

राज्यपाल से मिलने के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए विश्व हिन्दू परिषद् के क्षेत्र संगठन मंत्री केशव राजू ने बताया कि महामहिम अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए उत्साहित हैं. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद अयोध्या में भव्य मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ है.

गत वर्ष अयोध्या से जनकपुर के लिए एक यात्रा निकली थी. उस यात्रा का स्मरण करते हुए महामहिम ने कहा कि नेपाल की एक प्रमुख महिला राजनेता यात्रा को देखकर भावुक हो गयी थी. उनके यहां भगवान श्रीराम को पहुना कहा जाता है. लेकिन, दुर्भाग्य है कि पहुना का अपना घर नहीं है. ऐसे में वे लोग जनकपुर से अपनी बेटी को कैसे विदा कर सकते हैं? माता जानकी का जन्म स्थान जनकपुर है, जो नेपाल में पड़ता है. उन्होंने केन्द्र सरकार को धन्यवाद देते हुए कहा कि राम सर्किट में अयोध्या से जनकपुर तक एक अच्छी सड़क बनवाई जा रही है. इससे श्रद्धालुओं को दोनों स्थान की यात्रा करने में सुविधा होगी.

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January 18th 2021, 12:14 pm

हम दान नहीं ले रहे, समर्पण मांग रहे हैं – चंपत राय

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श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए देशभर में निधि समर्पण अभियान प्रारंभ हो गया है. मंदिर की नींव को लेकर विशेषज्ञ मंथन कर रहे हैं. जल्द ही निर्माण कार्य प्रारंभ होने की आशा है. निधि समर्पण अभियान और श्रीराम मंदिर निर्माण को लेकर एक चैनल ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चंपत राय जी से बातचीत की, कुछ संपादित अंश……

चंपत राय जी ने कहा कि श्रीराम जन्मभूमि पर राम मंदिर निर्माण में सारे हिंदुस्तान की भागीदारी होनी चाहिए. गरीब से गरीब भी हो और उच्च पदस्थ व्यक्ति भी हो. इसके प्रारंभ की अवधि हमने मकर संक्रांति निर्धारित की थी. इसलिए दिल्ली के कार्यकर्ता बंधु सबसे पहले भारत के प्रथम नागरिक, संविधान के रक्षक महामहिम राष्ट्रपति के पास पहुंचे थे. भिन्न-भिन्न राज्यों के लोग अपने-अपने स्थानों के राज्यपाल और मुख्यमंत्री के पास पहुंचे थे. मैं भी लखनऊ में मुख्यमंत्री के पास गया था. परन्तु मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि हम ये दान नहीं मांग रहे हैं. भगवान के काम के लिए दान नहीं है.

समाज स्वयं मंदिर में जाता है. अपने घर में पूजा करता है. आरती होती है, आरती की थाली घूमती है. समाज स्वेच्छा से उसमें कुछ डालता है. भगवान का ये घर बन रहा है. मंदिर यानि भगवान का घर, इसके लिए दान नहीं, समर्पण है.

इसलिए राष्ट्रपति महोदय ने स्वेच्छा से समर्पण किया है. दान मांगा जाता है. दान मांगने वाले लोग दान की राशि तय करते हैं. इस पूरे अभियान में मांगने की बात नहीं है. समर्पण को आदरपूर्वक स्वीकार करने की बात है. हमने राष्ट्रपति महोदय का समर्पण स्वीकार किया. देश का प्रथम नागरिक, प्रथम समर्पण.

हमने धन संग्रह कहीं नहीं लिखा है. हमने लिखा है – निधि समर्पण. सारा समाज नहीं आ सकता है अयोध्या. सारा समाज बैंक में लाइन नहीं लगा सकता. सिस्टम फेल हो जाएगा. जिस प्रकार देश का प्रत्येक बालक स्कूल नहीं जा सकता, तो विवेकानंद जी ने कहा कि स्कूल बच्चे के घर जाए. हमने भी सोचा है कि गरीब-मजदूर तक कैसे पहुंचा जाए. महामहिम राष्ट्रपति और राज्यपाल महोदय बैंक के काउंटर तक कैसे जाएं. इसलिए हम ही घर-घर तक जाएंगे.

हमने सोचा था कि यदि जून से प्रारंभ कर देंगे, तो हम 39 महीने में पूरा कर लेंगे. लेकिन अभी 7 महीने से तकनीकी, वैज्ञानिक, इंजीनियरिंग, स्टडी, एक्सपेरिमेंट, ट्रायल और टेस्टिंग हो रहा था. अब लगभग देश की बड़ी-बड़ी आईआईटी के प्रोफेसर सब एक मत हो गए हैं, भिन्न-भिन्न प्रकार के एक्सपेरिमेंट करके. अब मैं ऐसा कह सकता हूं कि वहां फाउंडेशन की तैयारियां शुरू हो गई हैं. फाउंडेशन बनने से पहले कहीं मिट्टी हटाई जाती है, ये काम प्रारंभ हो गया है. अगर मैं 01 फरवरी, 2021 से मान लूं, तो जो हमने प्रारंभ में 39 महीने सोचा था, उसी कार्यावधि में समाज को समर्पित हो जाएगा.

अगर पत्थर की आयु सीबीआरआई (Central Building Research Institute) की लेबोरेटरी में जांच कराएंगे या जो भी देश में इस प्रकार के पत्थरों की उम्र को स्टडी करते हैं, तो वे बताएंगे कि हवा, धूप और पानी का जो पत्थर पर परिणाम होता है, जिस कारण पत्थर का क्षरण होता है. ये प्रारंभ हो जाता है, तो पत्थर 1000 साल की आयु के माने जाते हैं. प्राचीन मंदिर जो पत्थरों के बने हैं, वो टिके हैं.  महत्वपूर्ण बात ये थी कि पत्थर का वजन, जिस नींव के कंधों पर रहना है, उसकी आयु कैसी हो? दूसरी बात की ड्रॉइंग किस ढंग से बनाया जाए कि वो लंबे काल तक उस वजन को सहन कर सके. अब उसका प्रारूप आ गया है. इसलिए ये कार्य अब होगा. एक ऐसी नींव देश के इंजीनियर्स ने प्रस्तुत कर दी है. ऐसी ड्रॉइंग्स और ऐसे प्रपोजल्स दे दिए हैं, जो निश्चित ही शताब्दियों के लिए होंगे और भारतीय इंजीनियरिंग ब्रेन के लिए दुनिया में उदाहरण बनेंगे.

पहले मैं विदेशों में रहने वाले राम भक्तों की बात पर आता हूं. विदेश का मतलब, भारत के लिए नेपाल भी विदेश है. लंका-भूटान ये विदेश में आएंगे. बांग्लादेश और पाकिस्तान भी आएंगे. लेकिन भारतवर्ष में भारत के बाहर की मुद्रा में अगर कोई धन आता है, तो उसके लिए कोई कानून है, व्यवस्था है, सिस्टम है. उसमें हमें पंजीकरण कराना होता है. अभी हमारे पास उस काम के लिए समय नहीं है. उस पंजीकरण की जो शर्तें हैं, उसको पूरा करने में अभी हमको समय लगेगा. इसलिए भारत के बाहर अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया या अन्य देश में रहने वाले भारतीयों से निवेदन करूंगा कि कुछ दिन और धैर्य रखना होगा. दूसरी बात आई, धन. अभी भगवान का घर है और लक्ष्मी भगवान के चरणों में बैठती है. तो ये सोचना इसमें कोई कमी पड़ेगी, ये अपने ऊपर ही अविश्वास करना होगा. परमात्मा के काम में मनुष्य की बाधा नहीं पड़ सकती है. बुद्धि का देना और बुद्धि का छीन लेना, उसी के हाथ में है. धन का देना, धन कम देना और अधिक देना ये भी उन्हीं के हाथ में है. जो कुछ है उन्हीं का है.

निधि समर्पण अभियान

कोई कल्पना ही नहीं हो पा रही है. अकल्पनीय लग रहा है. कल मैं लखनऊ में रहा. सवेरे रायबरेली के एक कार्यक्रम में गया. एक महीने पहले से एक व्यक्ति का निजी आग्रह था कि मेरे घर आइए, मैं कुछ देना चाहता हूं. वो चाहते थे कि अयोध्या आएं. मैं कहता था कि मकर संक्रांति के बाद सूर्य उत्तरायण हो जाएंगे. मैं कल घर चला गया. एक आदमी ने 1 करोड़, 11 लाख, 11 हजार, 1 सौ 11 रुपये का चेक दिया. लखनऊ के कार्यकर्ताओं के साथ अंतिम टोली में रहा. रात्रि को 6:30 पर, मैंने पूछा क्या है आज का पुरुषार्थ?  राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले साथ में थे. 12 परिवारों में गए और 87 लाख का चेक लेकर आए. हमें, तो कल्पना भी नहीं हो रही है कि क्या आएगा. मैं कुछ भी नहीं कह सकता. अनंत के कार्य में लगे हैं. जिनकी बुद्धि और शक्ति सीमित है, वो कार्य कर रहे हैं. कितने करोड़ लोग कार्य कर रहे हैं. कितने लाख लोग कार्य कर रहे हैं. सब अपने-अपने मन से बोल सकते हैं. लेकिन कोई अनुमान नहीं कर सकते. जो अनुमान करोगे, भगवान हो सकता है सब फेल कर दे.

https://zeenews.india.com/hindi/india/up-uttarakhand/trending-news/ayodhya-ram-temple-will-become-an-example-of-indian-engineering-in-the-world-says-champat-rai-to-dileep-tiwari-in-an-interview-on-zee-media/829426

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January 18th 2021, 12:14 pm

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन हेतु अभाविप के प्रतिनिधि मंडल ने यूजीसी अध्यक्ष को सौंपा ज्ञापन

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नई दिल्ली. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति – 2020 के क्रियान्वयन हेतु विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष डीपी सिंह को अपने सुझाव सौपे. शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न हितधारकों से व्यापक चर्चा के बाद समग्र शिक्षा, संस्थागत अनुसंधान, भारतीय ज्ञान पद्धति का प्रसार तथा एकीकृत उच्च शिक्षा इत्यादि विषयों पर मिले सुझावों को सौंपा है. ज्ञापन में प्रमुखता से रखे गए सुझाव शिक्षा के क्षेत्र में समानता, उच्च शिक्षा में सर्वसमावेशी प्रारूप तथा भारत को वैश्विक शिक्षा के अग्रणी केंद्र के रूप में स्थापित करने की ओर केंद्रित हैं.

अभाविप ने आईआईटी पाठ्यक्रम के पुनरीक्षण, अन्तर्विषयी अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित करते हुए स्नातक स्तर पर मानविकी और STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) के एकीकरण की अनुशंसा की है. शोध संस्थानों के रूप में चुनिंदा सार्वजनिक और निजी विश्वविद्यालयों की पहचान कर यूनिवर्सिटी रिसर्च फंड के रूप में अनिवार्य रूप से इन-हाउस कॉरपस फंड होना चाहिए, जिसका उपयोग राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंतर्गत नेशनल रिसर्च फाउंडेशन के मार्गदर्शन के साथ नवाचार और अनुसंधान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया जाना है.

समावेशी उच्च शिक्षा के लिए, अभाविप ने जनजातीय, पिछड़े तथा दिव्यांग छात्रों के लिए, जिन्हें राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सामूहिक रूप से सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों के रूप में वर्णित किया गया है, विशेष कार्यक्रमों की संस्था के लिए शिक्षा मंत्रालय, जनजातीय और सामाजिक कल्याण मंत्रालय के बीच अधिक से अधिक सहयोग की अनुशंसा की है. प्रत्येक जिले में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों के साथ-साथ जेंडर इंक्लूजन फंड का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में महिला और परलैंगिक छात्रों के लिए परिवहन और स्वास्थ्य सुविधाओं का विकास एबीवीपी की प्रमुख सुझावों में से एक रहा है.

शोध में उत्कृष्टता के लिए ‘अर्ली करियर अवार्ड’ का परिचय, अस्थायी, तदर्थ और संविदा शिक्षकों की नियुक्तियों को स्थायी में परिवर्तित करना, भारत में कैम्पस स्थापित करने के लिए शीर्ष 100 वैश्विक शिक्षण संस्थानों को आमंत्रित करने के साथ-साथ अग्रणी भारतीय शैक्षणिक संस्थानों को विदेश में परिसर स्थापित करने का आह्वान करने के लिए भी विद्यार्थी परिषद ने प्रस्ताव रखा है. विशिष्ट भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं, व्यंजनों एवं वस्त्रों पर अध्ययन करने के लिए संपन्न अध्येतावृत्ति के साथ साथ राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय परोपकारी पहलों द्वारा समर्थित दायित्वों की स्थापना, Indology Research Foundation की स्थापना एवं भारतीय तत्वज्ञान, भारतीय विज्ञान एवं योग, आयुर्वेद जैसे भारतीय ज्ञान प्रणालियों का अध्ययन करने का प्रस्ताव भी विद्यार्थी परिषद ने प्रस्तुत किया है.

अभाविप की राष्ट्रीय महामंत्री निधि त्रिपाठी ने कहा कि, “राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 अपने आप में एक बहुत व्यापक दस्तावेज है और बहु-आयामी चुनौतियों को संतोषजनक तरीके से संबोधित करने में सक्षम है, जो क्षेत्र में सभी हितधारकों के साथ हमारी व्यापक बातचीत पर आधारित है. परंतु फिर भी हमने अतिरिक्त सुझावों के लिए विशेषज्ञ समूहों को नियुक्त करने की आवश्यकता महसूस की जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन को अधिक प्रभावशाली बनाने में उपयोगी हो सकते हैं. हमें आशा है कि सुझावों को भारत के विद्यार्थी समुदाय के सर्वोत्तम हितों के लिए शामिल किया जाएगा और उन्हें लागू किया जाएगा.”

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January 18th 2021, 12:14 pm

भगवान श्री राम के मंदिर निर्माण से होगी राम राज्य की स्थापना – डॉ. सुरेंद्र जैन

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रोहतक. विश्व हिन्दू परिषद के संयुक्त महामंत्री डॉ. सुरेंद्र जैन ने कहा कि भगवान श्रीराम जन-जन के हैं, उनके जन्म स्थान पर निर्मित होने वाले मंदिर में जन-जन का समर्पण आवश्यक है. इस हेतु राम भक्त देश के 12 करोड़ परिवारों से प्रत्यक्ष संपर्क कर निधि समर्पण हेतु आग्रह करेंगे. डॉ. जैन रविवार को शिक्षा भारती विद्यालय रामनगर रोहतक में आयोजित कार्यकर्ताओं की बैठक को सम्बोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि अभियान के तहत प्रमाणिकता के साथ सभी परिवारों से संपर्क करना है ताकि कोई यह नहीं कह सके कि हमारे परिवार में कोई नहीं आया. इस कार्य का शुभारम्भ देश के प्रथम नागरिक रामनाथ कोविन्द जी द्वारा निधि समर्पण से हो चुका है, साथ ही वाल्मीकि समाज के महामंडलेश्वर कृष्ण शाह विद्यार्थी जी से मोहन भागवत जी ने निधि समर्पण स्वीकार कर समाज में समरसता का संदेश दिया.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत कार्यवाह सुभाष आहूजा ने कहा कि हरियाणा में यह अभियान 31 जनवरी से 27 फरवरी तक चलेगा, जिसमें प्रांत के सभी हिन्दू परिवारों से संपर्क किया जाएगा. महामंडलेश्वर स्वामी परमानंद जी महाराज जनसेवा संस्थान रोहतक तथा स्वामी अमरदास जी रोपड़ पंजाब का भी आशीर्वाद कार्यकर्ताओं को मिला.

स्वामी परमानंद जी महाराज ने अपने निजी कोष से 2,51,000 की राशि समर्पण की घोषणा की, साथ ही ईश्वर जी तथा नवीन गोयल जी अलग-अलग 1,51,000 की समर्पण राशि देने की घोषणा की.

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January 17th 2021, 2:18 pm

“राम काज कीन्हे बिनु मोहि कहां विश्राम”

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गंजबासौदा. “राम काज कीन्हे बिनु मोहि कहां विश्राम” त्रेता युग में इसी ध्येय वाक्य को लेकर भगवान हनुमान प्रभु श्री राम के काम में बगैर किसी विश्राम के लगे. लंका विजय तक बिना किसी विश्राम के हनुमान जी ने राम काज किया, ठीक उसी तरह कलयुग में भी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त होते ही राम भक्त मंदिर निर्माण में अपना सहयोग देने जुट गए हैं.

श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण हेतु देशभर में निधि समर्पण अभियान प्रारंभ हो गया है. अभियान के दौरान अनेक अनूठे, प्रेरक व उत्साहवर्धक अनुभव भी सामने आ रहे हैं. ऐसा ही एक उदाहरण विदिशा जिले के गंजबासौदा से सामने आया, जहां निधि समर्पण अभियान में लगे एक कार्यकर्ता ने अनूठा संकल्प लिया है. अभियान के खंड प्रमुख जितेंद्र दांगी ने अभियान पूरा होने तक चप्पल-जूता न पहनने का संकल्प लिया है. पूरे अभियान के दौरान जितेंद्र अपने कार्य क्षेत्र में नंगे पैर ही घूम कर लोगों से समर्पण राशि एकत्रित करेंगे.

नहीं खाएंगे घर का खाना

यही नहीं जितेंद्र दांगी ने बताया कि वह निधि समर्पण अभियान के पूरे होने तक अपने घर में रात्रि विश्राम नहीं करेंगे और ना ही वह घर (अपने घर का) का भोजन करेंगे. इस दौरान समाज में संपर्क करते हुए लोगों के घर ही भोजन करेंगे और अपने कार्य क्षेत्र के किसी कार्यकर्ता के यहां पर रात्रि विश्राम करेंगे.

60 से 70 गांवों तक करेंगे नंगे पैर संपर्क

कुरवाई खंड में लगभग 140 गांव आते हैं, जिनमें से वह अभी तक 30 से 40 गांव की यात्रा बगैर चप्पलों के कर चुके हैं. इसके साथ ही यह अभियान जब तक चलेगा तब तक वह खंड के लगभग 60 से 70 गांव तक संपर्क करने जाएंगे, इस दौरान वह पदवेश धारण नहीं करेंगे.

श्रीराम मंदिर निधि समर्पण अभियान से संगठनों की बैठक की गई थी, इसी दौरान गंजबासौदा में भी पूरे जिले के कार्यकर्ताओं को धन संग्रह से संबंधित बैठक में बुलाया गया था. इसी बैठक में जितेंद्र दांगी जी ने निर्णय कर लिया था कि वह पूरे अभियान के दौरान अपने संकल्प पर अडिग रहेंगे, उन्होंने अपने संकल्प के पीछे रामायण को अपनी प्रेरणा बताया. जब भगवान श्री राम वनवास गए थे, तब वे भी 14 बरस नंगे पैर जंगलों में घूमे थे तो अब तो लगभग 500 वर्षों के संघर्ष के बाद मंदिर निर्माण का शुभ समय आया है तो मेरा यह संकल्प तो कुछ भी नहीं.

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January 17th 2021, 2:18 pm

17 जनवरी / बलिदान दिवस – रामसिंह कूका और उनके गोभक्त शिष्य

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नई दिल्ली. 17 जनवरी, 1872 की प्रातः ग्राम जमालपुर (मालेरकोटला, पंजाब) के मैदान में भारी भीड़ एकत्र थी. एक-एक कर 50 गोभक्त सिख वीर वहां लाये गये. उनके हाथ पीछे बंधे थे. इन्हें मृत्युदण्ड दिया जाना था. ये सब सद्गुरु रामसिंह कूका जी के शिष्य थे.

अंग्रेज जिलाधीश कोवन ने इनके मुंह पर काला कपड़ा बांधकर पीठ पर गोली मारने का आदेश दिया, पर इन वीरों ने साफ कह दिया कि वे न तो कपड़ा बंधवाएंगे और न ही पीठ पर गोली खाएंगे. तब मैदान में एक बड़ी तोप लायी गयी. अनेक समूहों में इन वीरों को तोप के सामने खड़ा कर गोला दाग दिया जाता. गोले के दगते ही गरम मानव खून के छींटे और मांस के लोथड़े हवा में उड़ते. जनता में अंग्रेज शासन की दहशत बैठ रही थी. कोवन का उद्देश्य पूरा हो रहा था. उसकी पत्नी भी इस दृश्य का आनन्द उठा रही थी.

इस प्रकार 49 वीरों ने मृत्यु का वरण किया, पर 50वें को देखकर जनता चीख पड़ी. वह तो केवल 12 वर्ष का एक छोटा बालक बिशन सिंह था. अभी तो उसके चेहरे पर मूंछें भी नहीं आयी थीं. उसे देखकर कोवन की पत्नी का दिल भी पसीज गया. उसने अपने पति से उसे माफ कर देने को कहा. कोवन ने बिशन सिंह के सामने रामसिंह को गाली देते हुए कहा कि यदि तुम उस धूर्त का साथ छोड़ दो, तो तुम्हें माफ किया जा सकता है.

यह सुनकर बिशनसिंह क्रोध से जल उठा. उसने उछलकर कोवन की दाढ़ी को दोनों हाथों से पकड़ लिया और उसे बुरी तरह खींचने लगा. कोवन ने बहुत प्रयत्न किया, पर वह उस तेजस्वी बालक की पकड़ से अपनी दाढ़ी नहीं छुड़ा सका. इसके बाद बालक ने उसे धरती पर गिरा दिया और उसका गला दबाने लगा. यह देखकर सैनिक दौड़े और उन्होंने तलवार से उसके दोनों हाथ काट दिये. इसके बाद उसे वहीं गोली मार दी गयी. इस प्रकार 50 कूका वीर उस दिन बलिपथ पर चल दिये.

गुरु रामसिंह कूका का जन्म 1816 ई0 की वसन्त पंचमी को लुधियाना के भैणी ग्राम में जस्सासिंह बढ़ई के घर में हुआ था. वे शुरू से ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे. कुछ वर्ष वे महाराजा रणजीत सिंह की सेना में रहे. फिर अपने गांव में खेती करने लगे. वे सबसे अंग्रेजों का विरोध करने तथा समाज की कुरीतियों को मिटाने को कहते थे. उन्होंने सामूहिक, अन्तरजातीय और विधवा विवाह की प्रथा चलाई. उनके शिष्य ही ‘कूका’ कहलाते थे.

कूका आन्दोलन का प्रारम्भ 1857 में पंजाब के विख्यात बैसाखी पर्व (13 अप्रैल) पर भैणी साहब में हुआ. गुरु रामसिंह जी गोसंरक्षण तथा स्वदेशी के उपयोग पर बहुत बल देते थे. उन्होंने ही सर्वप्रथम अंग्रेजी शासन का बहिष्कार कर अपनी स्वतन्त्र डाक और प्रशासन व्यवस्था चलायी थी.

मकर संक्रान्ति मेले में मलेरकोटला से भैणी आ रहे गुरुमुख सिंह नामक एक कूका के सामने मुसलमानों ने जानबूझ कर गोहत्या की. यह जानकर कूका वीर बदला लेने को चल पड़े. उन्होंने उन गोहत्यारों पर हमला बोल दिया, पर उनकी शक्ति बहुत कम थी. दूसरी ओर से अंग्रेज पुलिस एवं फौज भी आ गयी. अनेक कूका मारे गये और 68 पकड़े गये. इनमें से 50 को 17 जनवरी को तथा शेष को अगले दिन मृत्युदण्ड दिया गया. अंग्रेज जानते थे कि इन सबके पीछे गुरु रामसिंह कूका की ही प्रेरणा है. अतः उन्हें भी गिरफ्तार कर बर्मा की जेल में भेज दिया. 14 साल तक वहाँ काल कोठरी में कठोर अत्याचार सहकर 1885 में सदगुरु रामसिंह कूका ने अपना शरीर त्याग दिया.

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January 17th 2021, 2:18 pm

सरकार के नाम दर्ज होगी जौहर विवि की 70 हेक्टेयर भूमि, एडीएम कोर्ट का फैसला

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लखनऊ. जौहर विश्वविद्यालय की भूमि से संबंधित मामले में उत्‍तर प्रदेश के पूर्व मंत्री और समाजवादी पार्टी के सांसद आजम खां को शनिवार को एडीएम कोर्ट से करारा झटका लगा. कोर्ट ने जौहर विवि की 70.05 हेक्टेयर जमीन उत्‍तर प्रदेश सरकार के नाम दर्ज करने का आदेश दिया है. यह जमीन अभी तक आजम खां के जौहर ट्रस्ट के नाम पर थी.

जौहर ट्रस्ट के नाम पर 2005 से लेकर अब तक लगभग 75.0563 हेक्टेयर जमीन खरीदी गई थी. मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार ने कैबिनेट के फैसले में जौहर ट्रस्ट द्वारा खरीदे जाने वाली जमीन पर स्टांप शुल्क से छूट दी थी. ट्रस्ट के नाम पर जो 70.005 हेक्टेयर जमीन खरीदी गई, उसके लिए स्टांप शुल्क का भुगतान नहीं किया गया. कैबिनेट से पारित प्रस्ताव में शर्त थी कि ट्रस्ट की ओर से लोकहित से जुड़े कार्य कराने होंगे. अल्पसंख्यक, गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा देनी होगी. लेकिन, शर्तों का उल्लंघन हुआ.

करीब साल भर पहले डीएम के आदेश पर एसडीएम सदर ने जौहर ट्रस्ट की इस जमीन की जांच की, जिसमें पाया गया कि जौहर ट्रस्ट ने जौहर विवि के लिए खरीदी 70.005 हेक्टेयर जमीन में शासन की शर्तों का उल्लंघन किया है. कोर्ट में जौहर ट्रस्ट की ओर से उनके अधिवक्ता ने दलील दी थी कि आरोप निराधार हैं.

जिला शासकीय अधिवक्ता अजय तिवारी ने बताया कि वर्ष 2005 में शासनादेश के तहत साढ़े बारह एकड़ से अधिक भूमि खरीदने की अनुमति सरकार ने प्रदान की थी. शासनादेश में जो शर्तें थीं, उसमें एक शर्त यह भी थी कि शासनादेश की किसी शर्त का उलंघन किया जाता है तो यह भूमि राज्य सरकार में निहित मानी जाएगी. एसडीएम की जांच में शासनादेश में दी गई शर्तों का उल्लंघन पाया गया.

अजय तिवारी ने बताया कि जमीन की खरीद के लिए शर्त थी कि इसका उपयोग चैरिटी के कार्यों के लिए होगा, जिसका उल्लंघन हुआ. इस मामले में एडीएम कोर्ट ने संबंधित भूमि राज्य सरकार में निहित करने के आदेश दिए हैं. एसडीएम सदर को आदेश दिए हैं कि वह इस भूमि पर कब्जा लेकर इसे अभिलेखों में इंद्राज कराएं.

जांच रिपोर्ट के अनुसार, जौहर ट्रस्‍ट की इस जमीन पर जौहर विश्वविद्यालय का काम चल रहा है, लेकिन पिछले दस वर्षों में चैरिटी का कोई कार्य न होने की बात भी सामने आई है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ट्रस्ट को एक सीमा के तहत ही जमीन आवंटित की जा सकती है, लेकिन इस मामले में नियम-कायदों का उल्लंघन किया गया. तत्कालीन एसडीएम सदर ने जौहर ट्रस्ट मामले में जांच की थी. इस पर एडीएम कोर्ट में वाद दायर कराया गया था। एडीएम जेपी गुप्ता की कोर्ट ने शनिवार को अपना फैसला सुनाया है.

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January 17th 2021, 2:18 pm

आतंक परस्त का पाकिस्तान का टेंटुआ भारत के हाथ में..?

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राकेश सैन

दिल्ली में चल रहे कथित किसान आंदोलन के नाम पर हो रही सस्ती राजनीति व मीडिया का पूरा ध्यान इस पर होने के कारण देशवासियों का ध्यान भारत को मिली अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि पर नहीं गया. दुनिया में बदलती परिस्थितियों के चलते पाकिस्तान का टेंटुआ अब भारत के हाथों में आता दिखाई दे रहा है. दुनिया में आतंकवाद, तालिबान का पोषण करने सहित अनेक मुद्दों पर फैसले करने में भारत की भूमिका महत्त्वपूर्ण होने जा रही है और पाकिस्तान पशोपेश में है कि नई परिस्थितियों से बचे तो बचे कैसे? संयुक्त राष्ट्र में भारत को सुरक्षा परिषद् की तीन समितियों की अध्यक्षता का जिम्मा मिला है. इनमें तालिबान प्रतिबंध समिति (सेंक्शन कमेटी), आतंकरोधी समिति और लीबिया प्रतिबंध समिति शामिल हैं. बीबीसी लंदन में सहर बलोच की रिपोर्ट के अनुसार, काउंटर टेररिज़्म और तालिबान सेंक्शन कमेटी दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिनके तहत भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को परेशान कर सकता है और साथ ही उस पर और प्रतिबंध भी लगवा सकता है. तालिबान सेंक्शन कमेटी उन देशों की सूची तैयार करती है, जो तालिबान का आर्थिक रूप से समर्थन करते हैं, या उनके साथ किसी और तरह से सहयोग करते हैं. इसके आधार पर, दुनिया भर के 180 से अधिक देश अपने कानूनों में संशोधन करते हैं और उन लोगों के नाम को प्रतिबंधित संगठनों और व्यक्तियों की सूची में जोड़ दिया जाता है. इसके बाद उन पर मनी लॉन्ड्रिंग और वित्तीय सहायता पर बनने वाले कानून लागू होते हैं. संयुक्त राष्ट्र की इन कमेटियों के मामले आधिकारिक रूप से संचालित होते हैं और ये इन्हें लागू कराते आ रहे हैं.

जैसा कि सभी जानते हैं कि पाकिस्तान इस समय दो से तीन समस्याओं का सामना कर रहा है, उनमें से एक फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स यानि एफएटीएफ का आगामी ऑनलाइन सत्र है. यह टास्क फोर्स मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवादियों को वित्तीय सहायता की रोकथाम करने वाली एजेंसी है. अक्तूबर 2020 में पाकिस्तान ने एफएटीएफ की 27 सिफारिशें में से 21 को पूरा कर लिया था, लेकिन शेष छह सिफारिशों को टास्क फोर्स ने बहुत महत्वपूर्ण माना है. इसकी समय सीमा फरवरी 2021 में पूरी होगी. पाकिस्तान को भय है कि भारत अपनी पूरी ताकत लगा कर उसे एफएटीएफ की काली सूची में शामिल करवा सकता है. इसके भारत पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता भी रुकवा सकता है.

पाकिस्तान के पूर्व सूचना मंत्री मुशाहिद हुसैन सैयद ने पत्रकार को बताया, कि यह पाकिस्तान के लिए अच्छा समाचार नहीं है, क्योंकि तालिबान सेंक्शन कमेटी और काउंटर टेररिज़्म कमेटी, जिसकी भारत 2022 में अध्यक्षता करेगा, ये दोनों पाकिस्तान के मूलभूत हित हैं. भारत इन दोनों मुद्दों पर पाकिस्तान का विरोध करता रहा है. अब भारत को पिछले दरवाजे से अफगान शांति प्रक्रिया में शामिल होने का मौका मिल गया है. अफगानिस्तान में पाकिस्तान ने एक तरफ अमरीका और तालिबान के बीच और दूसरी तरफ अफगान सरकार और अफगान तालिबान के बीच, बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. भारत इन मूलभूत हितों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर सकता है.

साल 1996 में भारत ने कॉम्प्रिहेंसिव कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल टेरर के तहत आतंकवाद की वित्तीय सहायता और आतंकवाद की रोकथाम पर विस्तृत बात करने की कोशिश की थी और भारत एक बार फिर से इसे लागू कराने की पूरी कोशिश करेगा. तालिबान कमेटी पर संयुक्त राष्ट्र के गैरस्थायी सदस्य इन कमेटियों की अध्यक्षता करते आ रहे हैं, लेकिन सुरक्षा परिषद् भी अक्सर उन देशों को चुनती है जो पड़ोसी नहीं हैं, और अक्सर क्षेत्र के बाहर के देशों को अध्यक्षता करने का अवसर दिया जाता है. लेकिन अब जब भारत को तालिबान सेंक्शन कमेटी का अध्यक्ष चुना गया है यह भारत सरकार के लिए बहुत महत्वपूर्ण बात है.

चाहे देश का आतंरिक मामला हो या बाहरी आतंकवाद के मोर्चे पर भारत विशेषकर मोदी सरकार का बहुत सख्त दृष्टिकोण रहा है. मोदी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दुनिया को ‘गुड टैरेरिज़्म-बैड टेरेरिज़्म’ के बीच अंतर न करने व आतंकवाद की व्याख्या करने पर जोर देते रहे हैं. अभी पिछले साल 27 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र में अपने संबोधन के दौरान मोदी ने आतंकवाद को लेकर दुनिया को भारतीय दृष्टिकोण से अवगत करवाया था और आतंकवाद के स्रोत पर कार्रवाई की जरूरत पर जोर दिया था. पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राईक व एयर स्ट्राईक आदि बहुत सी कार्रवाईयां है जो साबित करती हैं कि मोदी सरकार ने केवल ऐसा कहा ही नहीं, बल्कि करके भी दिखाया है. अब कूटनीतिक क्षेत्र में भारत को जो सफलता हासिल हुई है, उससे आतंकवाद और इसको स्तनपान करवाने वाले पाकिस्तान का टेंटुआ भारत के हाथों आता दिखाई दे रहा है.

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January 17th 2021, 2:18 pm

सीमा सड़क संगठन – 110 फीट लंबा वेली पुल रिकॉर्ड 60 घंटे में तैयार किया

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जम्मू. सीमा सड़क संगठन ने वेली ब्रिज का 60 घंटे में निर्माण कर रिकॉर्ड बनाया. सीमा सड़क संगठन ने जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर रामबन के समीप केला मोड़ पर 110 फीट लंबे वेली पुल का निर्माण रिकार्ड 60 घंटे में शनिवार को पूरा किया.

सीमा सड़क संगठन के अधिकारियों ने बताया कि वेली पुल की जरूरत इसलिए उत्पन्न हुई क्योंकि 11 जनवरी को वर्तमान पुल से संबंधित एक दीवार ढह गयी थी और घाटी का देश के बाकी हिस्सों से संपर्क कट गया था. वेली ब्रिज पूर्व निर्मित स्टील पैनल से तैयार किया जाता है और ये पैनल शीघ्र ही जोड़े जा सकते हैं. अधिकारियों ने बताया कि राष्ट्रीय राजमार्ग-44 (जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग) के रखरखाव के लिए उत्तरदायी भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) और नागरिक प्रशासन ने बीआरओ से इस काम में सहयोग करने का अनुरोध किया था.

”सर्वेक्षण के बाद 14 जनवरी को सुबह साढ़े सात बजे पुल का निर्माण शुरू हुआ. कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल वरूण खरे के नेतृत्व में 99 आरसीसी (सड़क निर्माण कंपनी) की टीम ने 60 घंटे तक अनथक कार्य किया. इस दल में छह अधिकारी, 10 सुपरवाइजर और 50 श्रमिक शामिल थे.” मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार शनिवार को करीब ढाई बजे पुल पर पूर्वाभ्यास किया गया और शाम को पुल को नियमित यातायात के लिए खोल दिया गया.

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January 17th 2021, 2:18 pm

तांडव – हिन्दूफोबिक बॉलीवुड से कुछ सवाल….

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तांडव वेब सीरीज को अमेजॉन प्राइम वीडियो पर रिलीज किया गया है. वेब सीरीज का डायरेक्शन जफर अली अब्बास ने किया है. तांडव वेब सीरीज रिलीज होते ही विवादों में आ गई है. वेब सीरीज के पहले एपिसोड में जीशान अय्यूब भगवान शिव के वेश में नजर आ रहे हैं और यूनिवर्सिटी के छात्रों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि आखिर आपको किससे आजादी चाहिए. उनके मंच पर आते ही एक मंच संचालक कहता है, ‘नारायण-नारायण. प्रभु कुछ कीजिए. रामजी के फॉलोअर्स लगातार सोशल मीडिया पर बढ़ते ही जा रहे हैं. मुझे लगता है कि हमें भी कुछ नई स्ट्रेटेजी बना ही लेनी चाहिए.’ इस पर शिव के रूप में नजर आ रहे जीशान अय्यूब कहते हैं, ‘क्या करूं मैं तस्वीर बदल दूं क्या?’ इस पर मंच संचालक कहता है कि भोलेनाथ आप तो बहुत ही भोले हैं.

वेब सीरीज को लेकर लोग सोशल मीडिया पर आपत्ति जता रहे हैं. ट्विटर पर लोगों ने कहा कि इस तरह से शिव का रूप दिखाना और भगवान राम के बारे में टिप्पणी करना स्वीकार नहीं. एक यूजर ने वेब सीरीज के इस हिस्से को ट्वीट करते हुए लिखा है, ‘अली अब्बास तांडव वेब सीरीज के डायरेक्टर हैं और इसमें पूरी तरह से लेफ्ट विंग के एजेंडे को आगे बढ़ाने में जुटे हैं. वह टुकड़े-टुकड़े गैंग को ग्लोरिफाई कर रहे हैं.’ सोशल मीडिया पर लोगों का कहना है कि वेब सीरिज के माध्यम से जानबूझकर हिन्दुओं और हिन्दू धर्म को टारगेट किया जा रहा है.

इसके अलावा वेब सीरीज के एक और हिस्से पर भी लोग आपत्ति जता रहे हैं.

इस वीडियो में कॉलेज का एक युवा लड़की से कहता है, ‘जब एक छोटी जाति का आदमी एक ऊंची जाति की औरत को डेट करता है न तो वह बदला ले रहा होता है, सिर्फ उस एक औरत से.’ वीडियो को लेकर आपत्ति जताते हुए कुछ यूजर्स ने इसे हिंदू विरोधी प्रॉपेगेंडा करार दिया है. पॉलिटिकल ड्रामा पर आधारित इस वेब सीरीज में सैफ अली खान, डिंपल कपाड़िया, तिग्मांशू धूलिया, जीशान अय्यूब, सुनील ग्रोवर, गौहर खान सहित कई बड़े सितारे नजर आ रहे हैं.

अब हिन्दूफोबिक बॉलीवुड से कुछ सवाल….

– दिखाना है तो फिर सभी धर्मों को दिखाया करो, सिर्फ एक धर्म को ही क्यों?

– शिव, नारद, राम की जगह मौलवी, मदरसा, या अन्य क्यों नहीं?

– दिखाना ही था तो दिखाते कि किस तरह लव जिहाद करके लड़कियों को छोड़ दिया जा रहा है?

– जेएनयू को स्टारडम बनाने की कवायद दिखी, कभी किसी और विश्वविद्यालय को दिखाना था?

– दलित दिखा रहे, पर शिया-सुन्नी पर मौन क्यों हो जाते हैं?

– वेब सीरीज तांडव नाम से ही क्यों, हलाल, हलाला या अन्य नाम से क्यों नहीं?

– बॉलीवुड में हजार बुराइयां हैं, नशे के कारोबार व कॉकस पर बनाने में क्या समस्या है?

– धर्म को फिल्म-वेब सीरिज से दूर ही रखना चाहिए, जब बार-बार एक ही धर्म को टारगेट करोगे तो समस्या होगी ही……

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January 16th 2021, 1:32 pm

NCERT – पुस्तक में पढ़ाया शाहजहां और औरंगजेब ने मंदिरों की मरम्मत करवाई, स्रोत पूछा तो कहा पता नहीं

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वामपंथी विचार के लेखकों ने शिक्षण संस्थानों में पढ़ाए जाने वाले विषयों व इतिहास को किस कदर तोड़ मरोड़कर लिखा है, इसे लेकर समय-समय पर सवाल खड़े होते रहे हैं और चर्चाएं भी होती रही हैं. लेकिन अब इनकी सच्चाई सामने आने लगी है. इतिहास में ऐसे अनेक तथ्यों को स्थापित किया गया है, जिनके प्रमाण ही नहीं हैं. अभी हाल ही में ऐसा ही एक उदाहरण सामने आया है.

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की कक्षा 12 की इतिहास की पुस्तक थीम्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री पार्ट-2 के पेज नंबर 234 के दूसरे पैरा में पढ़ाया जा रहा है कि युद्ध के दौरान मंदिरों को ढहा दिया गया था, बाद में शाहजहां और औरंगजेब ने मंदिरों की मरम्मत करवाई.

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, रायपुर के छात्र शिवांक वर्मा ने पत्र लिखकर RTI के माध्यम से NCERT से पूछा – कृपया वह स्रोत बताएं, जहां से यह जानकारी मिली कि युद्ध में ढहाए मन्दिरों की मरम्मत औरंगजेब और शाहजहां ने करवाई थी, साथ ही यह भी बताएं कि औरंगजेब और शाहजहां ने कितने मंदिरों की मरम्मत करवाई?

शिवांक बताते हैं कि इस पर 18 नवंबर 2020 को एनसीईआरटी ने उनके दोनों प्रश्नों का उत्तर देते हए एक पत्र जारी किया, जिसमें लिखा था कि आपकी ओर से मांगी गई जानकारी सूचना फाइलों में उपलब्ध नहीं है. उन्होंने कहा कि वर्ष 2018 में 12वीं कक्षा में पढ़ते समय इन दावों को लेकर मेरे मन में सवाल उठे थे और इसलिए मैंने आरटीआई दायर करके NCERT से इस बारे में पूछा था.

इसके अलावा दिसम्बर 2020 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के केंद्रीय विद्यालय में कक्षा सात के विद्यार्थियों को तथ्यों से इतर महाभारत पढ़ाए जाने का मामला भी सामने आया था. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की इतिहासकार चक्रवर्ती राजगोपालाचारी द्वारा लिखित पुस्तक बाल महाभारत कथा में बच्चों को पढ़ाया जा रहा था कि जरासंध ने भगवान श्रीकृष्ण को युद्ध में हरा दिया था. इस कारण श्रीकृष्ण को द्वारका जाना पड़ा था. पुस्‍तक के पेज नंबर 33 के अध्‍याय 14 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस यज्ञ में सबसे बड़ा बाधक मगध देश का राजा जरासंध है. जरासंध को हराए बिना यह यज्ञ कर पाना संभव नहीं है. हम तीन बरस तक उसकी सेनाओं से लड़ते रहे और हार गए. हमें मथुरा छोड़कर दूर पश्चिम द्वारका में जाकर नगर और दुर्ग बनाकर रहना पड़ा.

जबकि मूल महाभारत में कहीं भी भगवान श्रीकृष्ण के जरासंध से हारने का उल्लेख नहीं है. राजस्थान में भी स्कूली पाठ्यक्रम के माध्यम से वीर सावरकर वीर नहीं थे, महाराणा प्रताप हारे हुए योद्धा थे, अकबर महान था, जैसे गलत व अप्रमाणिक तथ्यों को स्थापित करने के प्रयास होते रहे हैं.

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January 16th 2021, 1:32 pm

आतंक के खिलाफ अभियान – त्राल से आतंकियों के मददगार गिरफ्तार, कुपवाड़ा में एक सक्रिय आतंकी ठिकाना ध्व

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जम्मू-कश्मीर. प्रदेश में आतंकियों के खिलाफ सुरक्षाबलों का अभियान निरंतर जारी है. सुरक्षा बलों ने आतंकियों के मददगारों को पकड़ने में सफलता हासिल की है. इसके अलावा सुरक्षा बलों ने आतंकियों के सक्रिय ठिकाने को ध्वस्त कर हथियार बरामद किए हैं.

सुरक्षा बलों ने पुलवामा के त्राल में धमकी भरे पोस्टर चिपकाने के मामले में आतंकियों के पांच मददगारों को गिरफ्तार किया है. सुरक्षाबलों ने गिरफ्तार आतंकियों के कब्जे से एक लैपटॉप, धमकी भरे पोस्टर व अन्य सामग्री बरामद की है. जम्मू कश्मीर पुलिस ने मामले में एफआईआर दर्ज करके पूछताछ शुरू कर दी है.

गिरफ्तार आतंकियों ने त्राल क्षेत्र के सीर और बटागुंड गांवों में 13 जनवरी को आतंकी संगठन के धमकी भरे पोस्टर चिपकाये थे. जिसके बाद मामले को संज्ञान में लेते हुये पुलिस ने कार्रवाई शुरू की थी. इसी क्रम में कई स्थानों पर छापे मारे गए और संदिग्धों को हिरासत में लिया गया. संदिग्धों से पूछताछ और अन्य सबूतों के साथ पांच आतंकवादी सहयोगियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है. गिरफ्तार आतंकी सहयोगियों की पहचान जहांगीर अहमद पर्रे, ऐजाज़ अहमद पर्रे, तौसीफ अहमद लोन, सबजार अहमद भट और क़ैसर अहमद डार के रूप में हुई है. गिरफ्तार सभी आतंकी सहयोगी पुलवामा जिले के त्राल के रहने वाले हैं.

दूसरी ओर सुरक्षाबलों ने शुक्रवार शाम को कुपवाड़ा में एक सक्रिय आतंकी ठिकाने को ढूंढ निकाला. यहां से सुरक्षाबलों ने हथियार सहित आपत्तिजनक सामग्री बरामद की है.

सुरक्षाबलों को जानकारी मिली थी कि कुपवाड़ा लोलाब के नवा बहक इलाके में कुछ आतंकी मौजूद हैं. जिसके बाद पुलिस, सीआरपीएफ और 28 राष्ट्रीय राइफल्स की संयुक्त टीम ने इलाके में घेराबंदी करके सर्च ऑपरेशन शुरू किया. सर्च ऑपरेशन के दौरान आतंकी अपने ठिकाने पर मौजूद नहीं थे. लेकिन सुरक्षाबलों को आतंकी ठिकाने से हथियार बरामद हुए. जिसमें 4 एके 47 की मैगजीन, 15 एके 47 राउंड, 2 हैंड ग्रेनेड, एक दूरबीन, एक कंपास, एक वायर कटर विस्फोटक सामग्री शामिल है. सुरक्षाबलों ने सारा सामान जब्त करके आतंकी ठिकाने को ध्वस्त कर दिया है.

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January 16th 2021, 10:29 am

निधि समर्पण अभियान – राज्यपाल कलराज मिश्र ने 1 लाख 1 हजार का दिया सहयोग

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जयपुर (विसंकें). अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए निधि समर्पण अभियान का शुक्रवार से विधिवत शुभारंभ हुआ. अभियान के पहले दिन राज्य के प्रथम नागरिक राज्यपाल कलराज मिश्र ने अभियान के लिए शुभकामनाओं के साथ 1 लाख 1 हजार रुपये का समर्पण प्रदान किया. महानगर के 7 लाख परिवारों में जाकर 35 लाख व्यक्तियों से संपर्क करेंगे. इसके लिए श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निधि सर्मपण अभियान समिति जयपुर ने 30 जनवरी तक चलने वाले प्रथम चरण में अभियान के लिए 5 -5 सदस्यों की 50 टोलियां बनाई हैं. 31 जनवरी से 15 फरवरी तक दूसरे चरण के लिए 10-10 कार्यकर्ताओं की 3000 टोलियां बनाई हैं. यह रामभक्त परिवारों से घर-घर जाकर संपर्क कर मंदिर निर्माण के लिए निधि संग्रहण करेंगी.

जयपुर महानगर को गालव, मालवीय, मानसरोवर, विद्याघर व सांगानेर और आमेर को अलग जिला मानते हुए संगठन की रचना बनाई गई है. जिससे की महानगर में प्रत्येक रामभक्त परिवार से संपर्क हो सकेगा.

राजभवन से अभियान की शुरूआत

राजभवन में राज्यपाल कलराज मिश्र ने राजस्थान क्षेत्र संघचालक डॉ. रमेश अग्रवाल व विहिप केन्द्रीय मार्गदर्शक मंडल के सदस्य दिनेश चन्द्र, एकल अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष बजरंग बागड़ा व विहिप के क्षेत्रीय मंत्री सुरेश उपाध्याय को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के नाम 1 लाख 1 हजार रुपये की राशि का चेक भेंट किया.

भक्तों ने जताया उत्साह

व्यापारी व समाजसेवी एस.के पौद्दार ने परिवार के सदस्यों के साथ मंदिर निर्माण के लिए निधि समर्पण किया. उन्होंने कहा कि हमारी पीढ़ी सौभाग्यशाली है जो 492 साल के लंबे संघर्ष के स्वप्न को अपनी आंखों से साकार होते देख रही है. यह मंदिर, महज मंदिर नहीं हमारी सनातन संस्कृति के पुनर्जागरण का केन्द्र बनेगा.

सब कुछ राम ही का है

ज्योति कुमार माहेश्वरी ने 21 लाख की निधि समर्पित कर कहा कि हम देने वाले कोई भी नहीं हैं, सभी कुछ श्रीराम का है. हमें प्रसन्नता है कि मंदिर निर्माण में हमें भी सहयोग करने का अवसर मिला है. गिलहरी की भांति मंदिर निर्माण में हम भी योगदान दे रहे है.

बच्चों ने सुनाई राम पर कविता

रामभक्तों में श्रद्धा और उत्साह ही है, जिस कारण निधि संग्रहण के लिए आने वाले कार्यकताओं का घर द्वार पर तिलक व मोली बांधकर परिवार के सदस्य स्वागत कर रहे है. जवाहरात व्यवसायी बजरंग बाहेती ने जब 11 लाख रुपये की निधि समर्पित की तो पोते व पोती ने श्रीराम चरित को अपने शब्दों में कविता में अभिव्यक्त किया. व्यवसायी संजय साबू ने 5 लाख 1 हजार रुपये की निधि समर्पित की.

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January 16th 2021, 10:29 am

भगवान श्रीराम ने जिनकी सेवा की, आज उनके बीच पहुंचकर मुझे अपार हर्ष है – साध्वी ऋतम्भरा

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मुंबई. भगवान श्रीराम ने 14 वर्ष नंगे पांव रह कर, भू शैया पर सोकर, वंचित समाज के कष्ट हरे तथा उनकी व सन्तों की सेवा की तथा उन्हें भयमुक्त किया. आज ऐसी सेवा बस्ती में पहुंच कर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है कि मैं भगवान के भक्तों से उनके मन्दिर के लिए समर्पण निधि भी अपने हाथों से ले कर अयोध्या पहुंचाऊंगी. हम सब धन्य हैं, जिन्हें इस पुनीत कार्य से जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.

मुंबई के जूहू विले पार्ले पश्चिम स्थित नेहरू नगर बस्ती में आज श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़ी रहीं पूज्य दीदी मां ऋतंभरा आज दोपहर जब पहुंचीं तो बस्ती के लोगों का उत्साह चरम पर था. बस्ती के लोगों ने न सिर्फ दीदी मां का पुष्प वर्षा कर स्वागत किया, बल्कि उन्हें फूलों से लाद दिया.

बस्ती के लोगों ने भगवान श्रीराम के मंदिर के लिए अपना समर्पण भी दिया और दीदी मां से आशीर्वाद भी लिया. दीदी माँ ने उन्हें समर्पण राशि के एवज में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के कूपन, मंदिर तथा भगवान राम का सुंदर चित्र भेंट किया.

कार्यक्रम में सैकड़ों लोग उपस्थित थे. लोगों को दीदी मां के दर्शन कर ऐसा लगा जैसे कि राम जन्मभूमि आंदोलन की 90 के दशक की यादों को ताजा हो गईं. कुछ लोग कह रहे थे कि हम में से कुछ लोग 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में थे. मंच से दीदी मां का भाषण चल रहा था. वह भाषण आज भी हमारे कानों में गूंजता है. इतनी दूर से दीदी मां का हमारी बस्ती में आना भगवान की बड़ी कृपा है. अब जल्दी से जल्दी मंदिर का निर्माण पूरा हो और हम सब लोग दर्शनार्थ अयोध्या पहुंचे, यह हमारी मनोकामना है. कार्यक्रम में उपस्थित जन समूह को दीदी मां ने शुभ आशीष दिया तथा विश्व हिन्दू परिषद के पदाधिकारियों और कुछ अन्य संतों के साथ दूसरे कार्यक्रम में चली गई.

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January 16th 2021, 10:29 am

गजपति महाराज दिव्य सिंह देव के कर कमलों से निधि समर्पण व संपर्क अभियान का शुभारंभ

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राज्यपाल, केन्द्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान सहित अन्य लोगों ने निधि समर्पित की

भुवनेश्वर. अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण के लिए पुरी के गजपति महाराज दिव्य सिंह देव महाराज के कर कमलों से निधि समर्पण व संपर्क अभियान का शुभारंभ हुआ. श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण समिति ओडिशा के अध्यक्ष प्रो. प्रफुल्ल मिश्रा, उपाध्यक्ष मनसुखलाल सेठिया, सचिव गोपाल प्रसाद महापात्र  तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्व ओडिशा के प्रांत संघचालक समीर महंती भुवनेश्वर के शहीद नगर स्थित गजपति महाराज के आवास पर पहुंचे. गजपति महाराज व  महारानी ने उनका स्वागत किया. समिति की ओर गजपति महाराज को निधि समर्पण की रसीद श्रीराम मंदिर की फोटो श्रीराम मंदिर से संबंधित तथ्य प्रदान किए.

गजपति महाराज ने निधि समर्पण करते हुए कहा कि श्रीराम मंदिर का निर्माण का काम शीघ्र प्रारंभ हो और शीघ्र समाप्त हो. सभी को इस मंदिर निर्माण के कार्य में सहयोग देना चाहिए.

इसके बाद समिति के कार्यकर्ताओं ने राजभवन जाकर राज्यपाल प्रोफेसर गणेशी लाल से भेंट की. राज्यपाल ने भी पुनीत कार्य के लिए निधि समर्पण किया. समिति के पदाधिकारी केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बैजयंत पांडा, ओड़िया समाचार पत्र संवाद के संपादक तथा विधायक सौम्य रंजन पटनायक तथा भुवनेश्वर से सांसद अपराजिता सारंगी से मिले. इन लोगों ने भी मंदिर निर्माण हेतु समर्पण राशि प्रदान की. भुवनेश्वर के अनेक गणमान्य लोगों ने समर्पण राशि मंदिर निर्माण हेतु प्रदान की.

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January 16th 2021, 7:12 am

मुंबई – पुलिस पर निधि समर्पण अभियान से संबंधित बैनर हटाने का आरोप, विहिप कार्यकर्ताओं को हिरासत में

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मुंबई (विसंकें). मुंबई में पुलिस एक बार फिर विवादों में घिरी है. पुलिस द्वारा श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान के निमित्त लगाए बैनर हटाने का मामला प्रकाश में आया है. कहा जा रहा है कि पुलिस ने एक स्थानीय नेता के दबाव के चलते कार्रवाई की. कार्रवाई के विरोध में विहिप कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया.

पश्चिमी मुंबई के मालाड उपनगर के मालवाणी क्षेत्र में शुक्रवार देर रात विश्व हिन्दू परिषद के तीन कार्यकर्ताओं ने दो पुलिस कर्मचारियों को श्रीराम मंदिर निधि समर्पण अभियान हेतु लगाए बैनर उतारते हुए देख लिया और उनका विरोध करने लगे. एक कार्यकर्ता ने घटना की वीडियो बनाना शुरू कर दिया. यह देख तिलमिलाए पुलिस कर्मियों ने उन्हें धमकाते हुए कहा कि ऊपर से दबाव के चलते यह कार्यवाही की जा रही है, इसके बाद पुलिस ने विहिप के दो कार्यकर्ताओं देव गोस्वामी, और संदीप सिंह को हिरासत में लिया.

घटना की जानकारी मिलने पर विश्व हिन्दू परिषद,  भारतीय जनता पार्टी तथा अन्य सामाजिक धार्मिक संगठनों के कार्यकर्ता पुलिस थाने में जमा हुए और उन्होंने पुलिस के खिलाफ धरना प्रदर्शन शुरू किया. धरना प्रदर्शन के कारण पुलिस के तेवर कुछ ढीले पड़े और, ‘यह बैनर वादग्रस्त है तथा सर्वसामान्य की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकते हैं’, ऐसा कारण बताते हुए उन्होंने बैनर वापिस नहीं किए, लेकिन कार्यकर्ताओं को रिहा कर दिया.

सोशल मीडिया पर घटना का वीडियो भी वायरल हो रहा है, जिसमें बैनर हटाए जाने तथा कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेने के विरोध में कार्यकर्ता पुलिस स्टेशन में धरने पर बैठे हैं.

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण हेतु निधि समर्पण अभियान 15 जनवरी से देशभर में प्रारंभ हो गया है, जो माघ पूर्णिमा यानि 27 फरवरी तक चलेगा. इसी अभियान के निमित्त क्षेत्र में बैनर लगाए गए थे, जिन्हें पुलिस ने उतार दिया.

स्मरण रहे कि कुछ समय पूर्व एक वर्ग के लोगों के कारण मालवाणी क्षेत्र से नौ दलित हिन्दू परिवारों ने पलायन किया था.

 

 

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January 16th 2021, 7:12 am

पटना – श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान का शुभारंभ

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पटना (विसंकें). पटना के उपेक्षित एवं झुग्गी बस्तियों में रहने वालों ने भी अपना समर्पण श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए अर्पित किया. बेली रोड स्थित बड़ा हनुमान मंदिर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेन्द्र ठाकुर एवं बिहार के उप मुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद को दिव्यांगों ने भी अपनी समर्पण निधि भेंट की. संघ के क्षेत्र प्रचारक रामदत्त चक्रधर एवं बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री व सांसद सुशील कुमार मोदी ने भी कंकड़बाग के झुग्गी बस्तियों में घूम कर समर्पण निधि एकत्रित की.

बेली रोड के हनुमान मंदिर के समीप भिक्षाटन करने वाले योगेश्वर राम अपना निधि समर्पित करते हुए भाव-विह्वल हो गए. उन्होंने कहा कि कई पीढ़ियों के संघर्ष के बाद यह सुअवसर आया है कि अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण होने जा रहा है. वे स्वयं रोज भिक्षाटन करके अपना जीवन-बसर करते हैं. स्वयं तो निधि समर्पित करने नहीं जा सकते. लेकिन, जब राम मंदिर के नाम पर अभियान चल रहा हो, तो वे पीछे कैसे हट सकते हैं. आज सुबह से जो भी कमाई थी, उन्होंने राम मंदिर के निर्माण के लिए अर्पित कर दी. उन्होंने कार्यकर्ताओं को आश्वस्त किया कि भविष्य में भी अभियान में सहयोग करेंगे. उनकी उत्कट इच्छा है कि वे स्वयं अयोध्या जाएं. बिहार के उप मुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद ने कहा कि यह दृश्य रोमांचित करने वाला है.

कंकड़बाग के गायत्री मंदिर में कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक रामदत्त चक्रधर ने कहा कि हम लोग सौभाग्यशाली हैं कि अपने सामने भव्य राम मंदिर का निर्माण होते देख रहे हैं. वास्तव में यह राम मंदिर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नवजागरण का अभियान है. राज्यसभा सांसद एवं बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने राम मंदिर के संघर्ष के बारे में विस्तृत जानकारी दी. पटना विश्वविद्यालय स्थित कालीघाट के कार्यक्रम को विश्व हिन्दू परिषद् के क्षेत्र संगठन मंत्री केशव राजू एवं विधायक नितिन नवीन ने संबोधित किया. पटना साहिब गुरुद्वारा में कार्यक्रम को संबोधित करते हुए स्थानीय विधायक एवं बिहार के पूर्व मंत्री नंद किशोर यादव ने राम जन्मभूमि के संघर्ष की गाथा बतायी.

बड़ी पटन देवी के कार्यक्रम में पटना की महापौर सीता साहू एवं प्रख्यात शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. साह अद्वैतकृष्ण उपस्थित थे. चक बैरिया स्थित दुर्गा मंदिर के कार्यक्रम में प्रख्यात समाजसेवी पद्मश्री बिमल जैन ने अभियान का प्रारंभ किया. पटना जंक्शन स्थित हनुमान मंदिर के कार्यक्रम को आचार्य किशोर कुणाल, रा.स्व.संघ के क्षेत्र संपर्क प्रमुख अनिल ठाकुर ने संबोधित किया. चौधरी टोला के राधा कृष्ण मंदिर से टिकुली कला के प्रख्यात कलाकार अशोक विश्वास ने स्थानीय लोगों से समर्पण निधि एकत्रित की. शीतला माता मंदिर स्थित कार्यक्रम में प्रख्यात शल्य चिकित्सक डॉ. सहजानंद सिंह एवं बिहार के मंत्री रामसूरत राय उपस्थित थे.

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January 16th 2021, 2:10 am

झारखंड के प्रथम नागरिक के निधि समर्पण से अभियान का शुभारंभ

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रांची. झारखंड में प्रथम नागरिक महामहिम राज्यपाल द्रौपदी मुरमू द्वारा निधि समर्पण से निधि समर्पण अभियान का शुभारंभ हुआ.

प्रातः 11:00 बजे राजभवन स्थित राज्यपाल महोदय के आवास में अभियान टोली के सदस्यों ने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण हेतु राज्यपाल महोदया से समर्पण निधि प्राप्त की. इस अवसर पर राज्यपाल महोदया ने कहा कि भगवान श्रीराम हम सभी के आराध्य हैं. उनका जीवन अतुलनीय है. उनका जीवन समस्त मानवों में सद्भाव की प्रेरणा जगाता है. ऐसे आराध्य देव के मंदिर निर्माण में सहयोग कर हम अपने आप को भाग्यशाली समझ रहे हैं. भगवान श्रीराम 14 वर्षों के वनवास के दौरान वनों और कंदराओं में रहे, वनवासी बंधुओं के साथ आत्मीय संबंध स्थापित किए.  झारखंड में भी सभी लोग इस महाअभियान में सहयोग करेंगे, ऐसा उन्होंने शुभकामनाएं दीं.

विहिप के केंद्रीय उपाध्यक्ष जगन्नाथ शाही ने प्रेस को संबोधित करते हुए कहा कि यह मात्र एक मंदिर नहीं, बल्कि हिन्दू समाज के पिछले एक हजार वर्षों के तिरस्कार, उपेक्षा व गुलामी का परिमार्जन कर संपूर्ण देश को भारतीय संस्कृति व स्वाभिमान से जोड़ने का अभियान है. 110 करोड़ हिन्दुओं को लगना चाहिए कि यह उनका मंदिर है. इसके लिए उन सभी का इसमें समर्पण आवश्यक है. यह हम सब की जिम्मेदारी है कि इस पुण्य रामकाज से कोई वंचित ना रहने पाए.

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान झारखंड प्रांत के अभियान प्रमुख डॉ. वीरेंद्र साहू ने कहा कि पूरे प्रांत में अभियान का शुभारंभ किया गया. अभियान को लेकर हर आवश्‍यक तैयारी कर ली गई है. भक्‍तजनों में राम मंदिर निर्माण को लेकर काफी उत्‍साह है. प्रत्येक गांव में आज यह अभियान प्रारंभ हो गया है. अभियान के निमित्त कार्यकर्ता सभी के घर जाएंगे. और भगवान राम का प्रतीक स्वरूप कूपन देते हुए समर्पण राशि ग्रहण कर रहे हैं.

राज्यपाल से मिलने वाले अभियान टोली के प्रतिनिधिमंडल में  विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय उपाध्यक्ष जगन्नाथ शाही जी, झारखंड प्रान्त अभियान प्रमुख व विहिप के प्रांत मंत्री डॉ. वीरेंद्र साहू, सह प्रमुख व संघ के सह प्रांत कार्यवाह राकेश लाल, विहिप के क्षेत्रीय अध्यक्ष रामस्वरूप रुंगटा, क्षेत्र मंत्री वीरेंद्र विमल, वनवासी कल्याण केंद्र के प्रांत संगठन मंत्री सत्येंद्र सिंह, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नाथू गाड़ी, भारतीय किसान संघ के प्रशांत, अभियान कार्यालय सह प्रमुख अमर प्रसाद शामिल थे.

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January 16th 2021, 1:40 am

भारत ने पूरे विश्व में विश्वसनीयता हासिल की – प्रधानमंत्री

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नई दिल्ली. प्रधानमंत्री ने आज विश्व के सबसे बड़े टीकाकरण अभियान का शुभारंभ किया. इसके पश्चात देशभर में कोरोना वैक्सीन देने का भियान प्रारंभ हुआ. इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने वैज्ञानिकों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की प्रशंसा की.

इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आज वो वैज्ञानिक, वैक्सीन रिसर्च से जुड़े अनेकों लोग विशेष प्रशंसा के हकदार हैं, जो बीते कई महीनों से कोरोना के खिलाफ वैक्सीन बनाने में जुटे थे. आमतौर पर एक वैक्सीन बनाने में बरसों लग जाते हैं. लेकिन इतने कम समय में एक नहीं, दो मेड इन इंडिया वैक्सीन तैयार हुई हैं. भारत के वैक्सीन वैज्ञानिक, हमारा मेडिकल सिस्टम, भारत की प्रक्रिया की पूरे विश्व में बहुत विश्वसनीयता है. हमने ये विश्वास अपने ट्रैक रिकॉर्ड से हासिल किया है.

मैं ये बात फिर याद दिलाना चाहता हूं कि कोरोना वैक्सीन की 2 डोज लगनी बहुत जरूरी है. पहली और दूसरी डोज के बीच, लगभग एक महीने का अंतराल भी रखा जाएगा. दूसरी डोज़ लगने के 2 हफ्ते बाद ही आपके शरीर में कोरोना के विरुद्ध ज़रूरी शक्ति विकसित हो पाएगी.

उन्होंने कहा कि इतिहास में इस प्रकार का और इतने बड़े स्तर का टीकाकरण अभियान पहले कभी नहीं चलाया गया है. दुनिया के 100 से भी ज्यादा ऐसे देश हैं, जिनकी जनसंख्या 3 करोड़ से कम है. और भारत वैक्सीनेशन के अपने पहले चरण में ही 3 करोड़ लोगों का टीकाकरण कर रहा है.

दूसरे चरण में हमें इसको 30 करोड़ की संख्या तक ले जाना है. जो बुजुर्ग हैं, जो गंभीर बीमारी से ग्रस्त हैं, उन्हें इस चरण में टीका लगेगा. आप कल्पना कर सकते हैं, 30 करोड़ की आबादी से ऊपर के दुनिया के सिर्फ तीन ही देश हैं – भारत, चीन और अमेरिका.

प्रधानमंत्री ने कहा कि कोरोना से हमारी लड़ाई आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की रही है. इस मुश्किल लड़ाई से लड़ने के लिए हम अपने आत्मविश्वास को कमजोर नहीं पड़ने देंगे, ये प्रण हर भारतीय में दिखा. संकट के उसी समय में, निराशा के उसी वातावरण में, कोई आशा का भी संचार कर रहा था, हमें बचाने के लिए अपने प्राणों को संकट में डाल रहा था. हमारे डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ, एंबुलेंस ड्राइवर, आशा वर्कर, सफाई कर्मचारी, पुलिस और दूसरे Frontline Workers.

भारत ने 24 घंटे सतर्क रहते हुए, हर घटनाक्रम पर नजर रखते हुए, सही समय पर सही फैसले लिए. भारत में 30 जनवरी को कोरोना का पहला मामला मिला, लेकिन इसके दो सप्ताह से भी पहले भारत एक हाईलेवल कमेटी बना चुका था. पिछले साल आज का ही दिन था, जब हमने बाकायदा सर्विलांस शुरु कर दिया था. 17 जनवरी, 2020 वो तारीख थी, जब भारत ने अपनी पहली एडवायजरी जारी कर दी थी. भारत दुनिया के उन पहले देशों में से था, जिसने अपने एयरपोर्ट्स पर यात्रियों की स्क्रीनिंग शुरू कर दी थी.

उन्होंने कहा कि जनता कर्फ्यू, कोरोना के विरुद्ध हमारे समाज के संयम और अनुशासन का भी परीक्षण था, जिसमें हर देशवासी सफल हुआ. जनता कर्फ्यू ने देश को मनोवैज्ञानिक रूप से लॉकडाउन के लिए तैयार किया. हमने ताली-थाली और दीए जलाकर, देश के आत्मविश्वास को ऊंचा रखा. ऐसे समय में जब कुछ देशों ने अपने नागरिकों को चीन में बढ़ते कोरोना के बीच छोड़ दिया था, तब भारत, चीन में फंसे हर भारतीय को वापस लेकर आया. और सिर्फ भारत के ही नहीं, हम कई दूसरे देशों के नागरिकों को भी वहां से वापस निकालकर लाए.

मुझे याद है, एक देश में जब भारतीयों को टेस्ट करने के लिए मशीनें कम पड़ रहीं थीं तो भारत ने पूरी लैब भेज दी थी ताकि वहां से भारत आ रहे लोगों को टेस्टिंग की दिक्कत ना हो. भारत ने इस महामारी से जिस प्रकार से मुकाबला किया उसका लोहा आज पूरी दुनिया मान रही है. केंद्र और राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय, हर सरकारी संस्थान, सामाजिक संस्थाएं, कैसे एकजुट होकर बेहतर काम कर सकते हैं, ये उदाहरण भी भारत ने दुनिया के सामने रखा.

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January 16th 2021, 1:40 am

निधि समर्पण अभियान – पहले ही दिन रामभक्तों ने समर्पित की 97,62, 878 रुपये की राशि

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भीलवाड़ा. श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान का उद्घाटन हरीशेवा सनातन आश्रम भीलवाड़ा में हुआ. हरीशेवा आश्रम में पूज्य महामंडलेश्वर हंसराम उदासीन व प्रमुख उद्योगपति गौ भक्त अशोक कोठारी के सान्निध्य में संपन्न हुआ. पहले ही दिन रामभक्तों ने 97,62, 878 की राशि का समर्पण किया. दीप प्रज्ज्वलन से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ, और तत्पश्चात राकेश आसावा ने विजयमहामंत्र श्री राम जय राम जय जय राम मंत्र का तेरह बार जप किया.

अशोक कोठारी ने कहा कि यह हमारे जीवन का सौभाग्य है कि हम 492 वर्ष पश्चात इस भव्य मंदिर के निर्माण में सहभागी बन रहे हैं. शताब्दियों तक सुरक्षित रहने वाले इस मंदिर में हमारा भी योगदान हो रहा है, यह हमारे लिए बड़े ही गर्व की बात है.

कार्यक्रम के अंत में आशीर्वचन देते हुए पूज्य महामंडलेश्वर ने कहा कि यह मंदिर मात्र राम मंदिर ही नहीं है, यह राष्ट्र मंदिर है. इसके माध्यम से भारतीय संस्कृति का विश्व भर में प्रसार होगा और भगवान श्रीराम के प्रेरणादाई जीवन की झांकियां और उनके प्रेरक प्रसंग रामायण म्यूजियम में संग्रहित किए जाएंगे. संपूर्ण मंदिर की भव्यता-दिव्यता और स्थान की आवश्यकता देखते हुए उन्होंने संपूर्ण देशवासियों से आह्वान किया कि आपके जीवन में यह अवसर आया है तो अधिक से अधिक समर्पण करने से नहीं चूकें क्योंकि यह राशि हमारे पूर्वजों द्वारा संचित धन में से है और हमारे लगभग 4 लाख रामभक्तों ने अपने आप को समर्पित किया है. यह मंदिर देश और दुनिया को दिशा देने में समर्थ होगा और उन बलिदानी रामभक्तों को सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी.

कार्यक्रम में स्वर्गीय भगवती लाल जी बहेड़िया की पत्नी ने 10,00,000 रुपये की राशि पूज्य महामंडलेश्वर को भेंट करते हुए कहा कि काश, वह भी इस कार्यक्रम में उपस्थित होते और अपनी आंखों से राम मंदिर को बनते हुए देखते. बेगराज राधा किशन सोमानी चैरिटेबल ट्रस्ट की रुचि सोमानी ने 11,11,111 की  निधि समर्पित की. कहा कि हमारे जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्य है कि हम इतनी तुच्छ भेंट भगवान श्रीराम के मंदिर के लिए कर पा रहे हैं, हम चाहेंगे कि हम और भी देवें. कार्यक्रम के अंत में शांति पाठ किया गया.

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January 15th 2021, 11:35 am

राष्ट्रपति की शुभकामनाओं के साथ प्रारंभ हुआ श्रीराम मंदिर निधि समर्पण अभियान

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नई दिल्ली. अयोध्या में भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर भव्य मंदिर के निर्माण हेतु निधि समर्पण अभियान का श्रीगणेश आज देश के महामाहिम राष्ट्रपति के कर कमलों से हुआ. आज प्रात: 11 बजे श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के कोषाध्यक्ष पूज्य गोविंद देव गिरी जी महाराज, विहिप कार्याध्यक्ष एडवोकेट आलोक कुमार, न्यास के न्यासी व भवन निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत संघचालक कुलभूषण आहूजा के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मण्डल ने भेंट कर उनकी शुभकामनाएं अभियान हेतु लीं.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने आज दिल्ली के मंदिर मार्ग स्थित वाल्मीकि मंदिर से अभियान का श्री गणेश किया. इस अवसर पर वे स्वयं वाल्मीकि मंदिर पहुंचे तथा मंदिर में पूजन अर्चन के उपरांत पूज्य संत कृष्ण शाह विद्यार्थी जी महाराज का आशीर्वाद लिया तथा उनका योगदान भी प्राप्त किया. जूना पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी अवधेशानन्द गिरी जी महाराज ने नागपुर की लाल गंज सेवा बस्ती में अनुसूचित जाति के समुदाय के साथ सभी वंचित समाज के लोगों से भिक्षा मांग कर उनसे समर्पण प्राप्त किया. इसी के साथ ही देश भर में असंख्य रामभक्तों ने गांव-गांव गली-गली व घर-घर जाकर इस अभियान हेतु लाखों लोगों से उनकी समर्पण निधि प्राप्त कर उनको इस पुनीत कार्य से जोड़ा.

अनेक राज्यों की राजधानियों में भी प्रमुख लोगों ने राशि समर्पित की. उत्तराखंड की राज्यपाल बेबी रानी मौर्य जी से विहिप के केन्द्रीय मंत्री व प्रवक्ता अशोक तिवारी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमण्डल ने भेंट की. राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्ररावत ने अपनी धर्म पत्नी की उपस्थिति में 1,51,000/- रुपये का चेक समर्पित किया. मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में विहिप के केन्द्रीय संगठन महामंत्री विनायकराव देशपांडे के नेतृत्व में प्रतिनिधि मण्डल राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मिला. मुख्यमंत्री ने अपनी व्यक्तिगत निधि समर्पित की. कर्णावती में विहिप के प्रांत कार्यालय में हुए एक भव्य निधि समर्पण कार्यक्रम में विहिप की केन्द्रीय प्रबंध समिति के सदस्य दिनेश चंद्र ने राजधानी के कुछ गणमान्य लोगों के साथ राज्य के उप-मुख्यमंत्री नितिन पटेल का भी समर्पण प्राप्त किया.

उत्तरप्रदेश के रायबरेली स्थित बैसवारा जनपद के तेजगांव के पूर्व विधायक सुरेन्द्र बहादुर सिंह ने रामभक्तों की उपस्थिति में एक भव्य कार्यक्रम में विहिप उपाध्यक्ष व श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महामंत्री चंपतराय जी को 1,11,11,111/- का एक चेक समर्पित किया. बाद में चंपत राय जी ने राज्य की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल से राजभवन में भेंट कर अभियान के संबंध में उनकी शुभकामनाएं प्राप्त कीं.

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January 15th 2021, 9:34 am

स्वामी जी का दर्शन और जीवन आदर्श युवाओं का मार्गदर्शक – जे. नन्दकुमार

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स्वामी विवेकानन्द जयन्ती पर व्याख्यानमाला

मेरठ. चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ में स्वामी विवेकानन्द जयन्ती पर ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ का आयोजन किया गया. कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में पं. दीनदयाल शोध पीठ, प्रज्ञा प्रवाह एवं विवेकानन्द अध्ययन केन्द्र के संयुक्त तत्वाधान में किया गया.

मुख्य वक्ता प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे. नन्दकुमार ने कहा कि स्वामी विवेकानंद जी का दर्शन और जीवन आदर्श युवाओं को मार्ग दिखाने के लिये सर्वश्रेष्ठ प्रेरणास्रोत है. स्वामी जी स्वाधीनता आंदोलन, अध्यात्म, आर्थिक आदि सभी क्षेत्रों में भगिनी निवेदिता, जमशेद जी टाटा, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष, सरदार भगत सिंह आदि महापुरुषों के आदर्श और प्रेरक थे.

शिकागो धर्म सभा का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि स्वामी जी धर्मसभा में देवियों एवं सज्जनों शब्द बोल सकते थे, परन्तु वे उस सभा में सारे विश्व को परिवार मानने वाले सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. इसलिये उन्होंने सभा को मेरे अमेरिकावासी भाईयों-बहनों कहकर सम्बोधित किया.

स्वामी जी धर्म सभा से बहुत समय पहले अमेरिका पहुंच गए थे. एक स्थान पर उनका भाषण सुनने विश्व प्रसिद्ध दार्शनिक जे.एस. राईट से किसी ने कहा कि स्वामी जी के पास धर्म सभा में सम्मिलित होने का अनुमति पत्र नहीं है, तो राईट ने आश्चर्यचकित होकर कहा, ‘‘सूर्य को प्रकाश देने के लिये अनुमति पत्र चाहिये.’’

उन्होंने कहा कि स्वाधीनता आंदोलन के अधिकांश क्रांतिकारियों के स्वामी जी प्रेरणास्रोत थे. महात्मा गांधी ने बेलूर मठ में दर्शक पंजिका में लिखा – ‘‘स्वामी जी को पढ़ने के बाद मेरी देशभक्ति हजार गुना बढ़ गई.’’

स्वामी जी ने भारत का आदर्श क्या है? बताते हुए कहा था कि समर्पण और सेवा मात्र इस देश का आदर्श है. भारत के उत्थान के लिये देश के युवाओं में यही भाव जगाकर स्वामी जी के दर्शन के अनुसार आगे बढ़ने की आवश्यकता है.

विशिष्ट अतिथि डॉ. दर्शन लाल अरोड़ा एवं प्रति उपकुलपति प्रो. वाई. विमला ने भी अपने विचार रखे. कार्यक्रम के अध्यक्ष कुलपति प्रो. एन.के. तनेजा ने कहा कि हमें अपनी प्राचीन संस्कृति की श्रेष्ठता पर विश्वास रखना चाहिये. कार्यक्रम में उद्यान विभाग में कार्यरत स्वच्छता कर्मी उषा देवी को शॉल पहनाकर सम्मानित किया गया.

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January 15th 2021, 9:34 am

मेरा समर्पण स्वीकार नहीं करेंगे क्या..?

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श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान
 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य जी ने आज हिमाचल प्रदेश के शाहपुर में अभियान का शुभारंभ किया. इस अवसर पर राकेश कटोच जी व उनके परिवार की ओर से उनकी बुआ ने समर्पण राशि का चेक भेंट किया.
प्रेरणादायक क्षण यह रहा कि निधि समर्पण अभियान के बारे में जानकारी मिलते ही आस-पड़ोस के परिवार भी अपना समर्पण लेकर पहुंच गए. पड़ोस में रहने वाले भेड़ पालक जगत राम जी की बेटी अनुराधा ने भी भावुकता के साथ पूछा कि मंदिर निर्माण के लिए मेरा समर्पण स्वीकार नहीं करेंगे क्या? तो सह सरकार्यवाह जी ने कहा – अवश्य स्वीकार करेंगे और अनुराधा ने राम मंदिर निर्माण हेतु अपनी समर्पण निधि अर्पित की.

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January 15th 2021, 8:31 am

पूरी दुनिया में भारत की नई पहचान बनेगा श्रीराम जन्मभूमि मंदिर – भय्याजी जोशी

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धर्मशाला. भारत सहित पूरी दुनिया में श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण के लिए श्रीरामजन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान की शुरुआत 15 जनवरी से हो गई. इसी क्रम में हिमाचल प्रदेश में निधि समर्पण अभियान का प्रारंभ धर्मशाला नगर के भगवान वाल्मीकि मंदिर से हुआ. अभियान की शुरुआत वाल्मीकि समुदाय के रतन हंस, विक्रम हंस और मायादेवी द्वारा निधि समर्पण से हुई. भय्याजी जोशी ने महर्षि वाल्मीकि मंदिर में शीष नवाया.

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के लिए निधि समर्पण अभियान की शुरूआत करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह माननीय भय्या जी जोशी ने कहा कि सम्पूर्ण देश में निधि समर्पण अभियान का कार्य श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ-क्षेत्र न्यास की तरफ से चलाया जा रहा है. इसमें देश भर के सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन सहयोग कर रहे हैं. एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन होने के कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी इसमें सहयोगी के नाते अपनी भूमिका निभा रहा है.

उन्होंने कहा कि हिन्दू समाज की हमेशा से यह मान्यता रही है कि मन्दिर निर्माण सरकार का कार्य नहीं है, बल्कि यह समाज का कार्य रहा है. सोमनाथ मन्दिर के निर्माण के समय भी जनसहयोग से ही मन्दिर का निर्माण किया गया था. उसी तरह श्रीराम जन्मभूमि मंदिर भी जनसहयोग और रामभक्तों के समर्पण से बनेगा. श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर पूरी दुनिया में भारत की नई पहचान बनेगा. इससे भारत के सांस्कृतिक-आत्मविश्वास में बढ़ोतरी होगी और हिन्दू समाज में गौरव-बोध बढ़ेगा.

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान में पहली निधि समर्पित करने वाले रतन हंस, विक्रम हंस और मायादेवी ने कहा कि यह हमारे लिए बहुत ही गौरव का क्षण है कि हमें श्रीराम जन्मभूमि निधि समर्पण अभियान में पहला योगदान करने का अवसर प्राप्त हुआ. भगवान वाल्मीकि ने प्रभु श्रीराम का जीवन चरित्र लोगों के सामने रखकर दुनिया को मर्यादा का पाठ पढ़ाया. अब उनका मन्दिर बन रहा है तो उससे जुड़ना कई पीढ़ियों के स्वप्न के साकार होने जैसा है.

इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उत्तर क्षेत्र सह क्षेत्र कार्यवाह विजय कुमार, प्रांत संघचालक प्रो. वीर सिंह रांगड़ा, प्रांत कार्यवाह किस्मत कुमार, प्रांत प्रचारक संजय सिंह सहित धर्मशाला नगर के गणमान्य लोग उपस्थित रहे.

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January 15th 2021, 8:17 am

दिल्ली – सरसंघचालक जी ने मंदिर मार्ग स्थित महर्षि वाल्मीकि मंदिर में माथा टेका

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नई दिल्ली. आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने दिल्ली में मंदिर मार्ग स्थित महर्षि वाल्मीकि मंदिर में माथा टेक कर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान का शुभारंभ किया. इस अवसर पर मंदिर के पूज्य संत स्वामी कृष्ण शाह विद्यार्थी जी महाराज ने सरसंघचालक जी का स्वागत किया.

सरसंघचालक जी ने स्वामी जी को श्रीराम मंदिर का प्रारूप भेंट किया.

निधि समर्पण महा-अभियान में स्वामी कृष्ण शाह विद्यार्थी जी महाराज जी ने भी अपना योगदान दिया और अयोध्या में भगवान श्रीराम जन्मभूमि मंदिर परिसर में भगवान वाल्मीकि जी की गरिमा के अनुरूप उनका विग्रह स्थापित करने पर भी चर्चा हुई. इस दौरान महर्षि वाल्मीकि मंदिर परिसर में महात्मा गांधी जी से जुड़ी स्मृतियों को सरसंघचालक जी से साझा किया.

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January 15th 2021, 8:17 am

यह अभियान और श्रीराम मंदिर का निर्माण समाज को संगठित कर समरसता से भर देगा

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श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन को खड़ा करने, से लेकर श्रीराम मंदिर निर्माण तक की पूरी प्रक्रिया में विहिप का बड़ा योगदान रहा है. वर्तमान में श्रीराम मंदिर निर्माण हेतु पूरे देश में निधि समर्पण अभियान चलाया जा रहा है. श्रीराम मंदिर निर्माण तथा निधि समर्पण अभियान से जुड़े विभिन्न विषयों पर विहिप के कार्याध्यक्ष आलोक कुमार जी की ‘हिंदी विवेक’ से बातचीत के कुछ प्रमुख सम्पादित अंश –

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए विश्व का सबसे बड़ा निधि समर्पण अभियान चलाया जा रहा है, इसकी कुछ प्रमुख बातें क्या हैं?

भारत के राष्ट्रपति जी से लेकर उन लोगों तक जो झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं या फुटपाथ पर भी रहते हैं. शुरू में हमने अपनी शक्ति का अंदाजा लगा कर यह घोषणा की थी कि हम देश भर के कुल ४ लाख गांवों में जाएंगे, ११ करोड़ परिवारों तक जाएंगे. जब हमने पूरे देश में प्रांत–प्रांत की बैठक कर ली तब हमें यह बात ध्यान में आई कि देश तो इस अभियान में आगे बढ़ कर तैयार है. अब हमारा अंदाजा है कि हम साढ़े ५ लाख गांवों में जाएंगे, १३ करोड़ परिवारों में जाएंगे. १३ करोड़ परिवार का मतलब है कि लगभग ६५ करोड़ लोग इस अभियान में प्रत्यक्ष रूप से समर्पण करेंगे. ५-५ लोगों की टोली बनाकर जाएंगे, जो समर्पण निधि लेंगे उसकी रसीद और कूपन देंगे. वह निधि प्रत्येक ४८ घंटे में बैंक खाते में जमा की जाएगी. और पूरी तरह पारदर्शी तरीके से हम १५ जनवरी से इस अभियान का शुभारंभ करके २७ फरवरी तक संपन्न करेंगे.

इस महाभियान का उद्देश्य क्या है और इसमें विश्व हिन्दू परिषद् की भूमिका क्या होगी ?

विश्व हिन्दू परिषद ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र से प्रार्थना की थी कि उनके धन संग्रह के काम में हम भी देशभर में लगना चाहते हैं. उन्होंने इस पर विचार किया और यह कार्य करने के लिए उन्होंने हमें नियुक्त किया है. श्रीराम मंदिर से राष्ट्रनिर्माण करने के उद्देश्य से जन-जन तक और घर-घर तक जाने हेतु विश्व हिन्दू परिषद ने इस अभियान में हिस्सा लिया है और यही हमारी भूमिका है.

समाज के विभिन्न घटकों खासकर वनवासी बंधू और समाज के निचले वर्ग को इस अभियान के अंतर्गत जोड़ने के लिए क्या कुछ विशेष प्रयास किये जाएंगे ?

हम लोग पूरे समाज के पास जा रहे हैं और जैसे इन सब भेदों को अस्वीकार करके समरस हिन्दू समाज का निर्माण करने हेतु हम सभी के पास जाएंगे. रामजी नंगे पैर गए थे, तापस वेश में गए थे. उस प्रक्रिया में उन्होंने सारे समाज को जोड़ दिया था. अनुसूचित जाति-जनजाति, वनवासी आदि निचले वर्ग को भी उन्होंने अपने आत्मीय स्नेह-प्रेम से मित्र और भाई बना लिया था. इसलिए यह अभियान और मंदिर का निर्माण इस तरह के भेदों को नष्ट कर देगा और समाज को संगठित एवं समरसता से भर देगा.

राम मंदिर भूमिपूजन के अलौकिक और ऐतिहासिक प्रसंग के समय विहिप अध्यक्ष के रूप में तब आपकी क्या मनोभावना थी ?

उसको शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते. प्रधानमंत्री जी जब रामलला के चरणों में साष्टांग समर्पित हुए तब वह भारत की राज सत्ता अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड नायक के समक्ष अवनत हो रही थी और देश की राजनीति में मानव शास्त्र का जो धर्म शास्त्र है, उसकी सत्ता को स्वीकार कर रही थी. कुल १३६ लोग ही भूमिपूजन कार्यक्रम में आमंत्रित किये गए थे, वह सब तो ऐसे लोग थे जो १९८४ से श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे. उसमें से एक-एक व्यक्ति ऐसे सेना के नायक थे, जिन्हें पूरा देश जानता था. एक बार तो मेरा ऐसा मन हुआ कि मैं कहीं रास्ते में लेट जाऊं. यह सब मेरे शरीर से होकर के गुजरें, इन सभी के चरणों की रज मुझे प्राप्त हो. बस मेरे मन में यही भावना थी और दूसरी बात यह है कि जब मैं पहले आंखे बंद करके सोता था तो सपने में मुझे मीरबांकी की सेना मंदिर को ध्वस्त करती हुई दिखाई देती थी. हमारे भगवान की मूर्तियों को तोड़ती हुई दिखाई देती थी. लेकिन ५ अगस्त भूमिपूजन के बाद से जब मैं सोता हूं तो मैं आकाश को छूता हुआ भव्य दिव्य मंदिर देखता हूं. अपने कलंक को धो कर स्वाभिमान पूर्वक गर्व से विश्व में यह घोषणा करता हूं कि हां यह शताब्दी हिन्दू शताब्दी है और इसका प्रतीक होगा राम मंदिर.

रामजन्मभूमि पर राम मंदिर का निर्माण भारत के स्वर्णयुग की दिशा में बढ़ने का प्रवास है. राममंदिर से राष्ट्रमंदिर कैसे बनेगा ? इस पर आपका क्या मानना है ?

राम कथा का प्रचार ही राम मंदिर से राष्ट्रमंदिर का निर्माण करेगा. जब रामजी केवट के पास गए और उसको राम जी ने अपने पास बुलाया, इस सन्दर्भ में तुलसी रामायण में लिखा है कि केवट ने संकोच से कहा कि मैं तो छोटी जाति का हूं, तब राम ने उत्तर दिया मैं छोटे-बड़े में विश्वास ही कहां करता हूं. मेरे लिए तो केवल भक्ति का मोल है. जब सबरी ने रामजी से अपनी जाति के बारे में जिक्र किया, लेकिन राम मगन रहे उसके बेर खाने में. राम मंदिर की प्रेरणा और आदर्श से ऐसा ही हमारा समरस समाज बनेगा. राम वनवासियों के अर्थात् अनुसूचित जनजातियों की बस्तियों में पैदल नंगे पैर गए थे. उनको अपना परम मित्र बनया था. मैंने वह गुफा देखी है. थोड़ा जंगल का रास्ता है, कुछ समय नदी से होकर गुजरना पड़ता है. थोड़ा ऊपर चढ़ना पड़ता है. वह किष्किन्धा की सुग्रीव गुफा है. वहां पर थोड़ी अग्नि जल रही थी. जिसमें राम ने सुग्रीव से मित्रता के लिए अग्नि की प्रदक्षिणा कर वचन लिया था. तो यह अनुसूचित जाति-जनजातियों को मुख्यधारा में लाना और उनकी आर्थिक, शैक्षणिक उन्नति कर के उनको सभी प्रकार से समर्थ बनाना, यही राम का सामाजिक उद्देश्य था. राम अहिल्या के आश्रम में गए तो उन्होंने समाज से पूछा कि अहिल्या जड़ क्यों हो गई ? दोष तो इंद्र का था, धोखा उसने किया था, इंद्र को दण्डित नहीं किया ? सारा अपमान अहिल्या को सहना पड़ा. राम ने उसकी गरिमा उसे वापस कर दी तो इस तरह महिलाओं की गरिमा और सहभागिता रामजी ने सुनिश्चित की. इसके अलावा राम ने धनुष उठा कर यह प्रतिज्ञा की थी कि इस धरती को मैं निशिचर विहीन कर दूंगा और उन्होंने किया भी, आतंकवाद का नाश करना ही रामराज्य की ओर प्रयाण है. यह भारत के जगतगुरु होने का प्रयाण है और यह वह यशोभूमि है, जिसने पुस्तक से नहीं अपितु अपने चरित्र से लोगों को शिक्षा दी है. दुनिया के लोगों को सुख और शांति का मार्ग भारत अपनी प्रतिमा से बता सके, ऐसे स्वर्णयुग की ओर हम प्रस्थान कर रहे है.

लगभग ५०० वर्षों के लम्बे संघर्ष के बाद रामजन्मभूमि पर राममंदिर बनने का सुअवसर आया है, इसे आप राष्ट्र के लिए कितनी बड़ी उपलब्धि मानते हैं और क्या इससे भारतीय संस्कृति का पुनरोत्थान होगा ?

अवश्य होगा, मंदिर का जो निर्माण होगा वह ऐसा नहीं है कि लोग सुबह के समय हवाई जहाज से आएंगे और रात को चले जाएंगे. वहां एक सुंदर म्यूजियम होगा, जिसमें राम कथा होगी, राममंदिर के संघर्ष का इतिहास होगा, दुनियाभर की विविध राम कथाओं का प्रक्षेपण होगा, लोग यह अनुभव करेंगे कि हम रामजी के राजतिलक के समारोह में साक्षात भाग ले रहे है. एक बड़े सत्संग मंडप में भारत के बड़े-बड़े साधू-संतों द्वारा रामकथा अनवरत होती रहेगी. एक बड़े एमपी थियेटर में प्रतिदिन रामलीला और नृत्य-नाटिकाएं होंगी. सीता रसोई में भक्तों के लिए प्रसाद की व्यवस्था होगी. पूरे विश्व से रामभक्त अयोध्या जाएंगे और सरयू में स्नान कर के रामजी के दर्शन करेंगे. एक दिन म्यूजियम में बिताएंगे और २ दिन कथा सुनेंगे, एक दिन राम लीला देखेंगे और अपने ह्रदय में विराजित राम को विकसित करेंगे. राम के सबसे नजदीक होंगे, मर्यादाओं का वर्धन करेंगे और फिर सोचेंगे कि यहां पर हर वर्ष आना है. यह वह आदर्श भूमि बनेगी जो अखिल भारत में शुचिता, पवित्रता, आध्यात्मिकता और सामर्थ्यशाली जीवन का संदेश देगी.

भगवान रामजी को आदर्श राष्ट्र पुरुष माना जाता है. राममंदिर देश की एकता, सामाजिक समरसता के लिए किस तरह से विद्यमान हो सकता है ?

‘आसेतु हिमाचल सारा देश’. रामजी के बारे में कहा गया है कि वह हिमायल से अधिक धैर्यवान थे, सागर से गंभीर थे. ‘रामो विग्रहवान धर्म’ अर्थात धर्म का साक्षात रूप थे और सांस्कृतिक अखंड भारत के वह रूप थे. इसलिए साढ़े ६ लाख गांवों में से साढ़े ५ लाख गांव इस अभियान में शामिल हो रहे हैं. जन-जन में राम और घर-घर में राम व्याप्त करने के लिए जन अभियान चलाया जा रहा है. जिसमें देश की ६५ करोड़ जनता भाग ले रही है. राम सबको सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बांध रहे है, मर्यादाओं के रूप में, राष्ट्र जीवन के लिए अभूतपूर्व कार्य हो रहा है. मुझे पूर्ण विश्वास है कि राममंदिर का निर्माण राष्ट्र के निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा और देश की एकता, अखंडता, सामाजिक समरसता के आदर्श स्तंभ के रूप में स्थापित होगा.

देश की विविधता और सांस्कृतिक विरासतों को दर्शाने के लिए क्या राम मंदिर परिसर में सभी राज्यों एवं प्रान्तों की प्रदर्शनियां लगाई जाएगी ?

मुझे मुश्किल लगता है ऐसा होना क्योंकि हमारे पास स्थान सीमित है. पर, इस विविधता को स्वीकार करना और इस विविधता में एकत्व के सूत्रों को ढूंढना यह हमारी भारतीय संस्कृति का भाग है. राम ने लंका पर प्रयाण करने से पहले रामेश्वर में भगवान शिव के शिवलिंग की स्थापना करके और उस क्षेत्र के सभी पुण्यवान लोगों को बुलाकर के उनकी उपस्थिति में भोलेशंकर की पूजा की थी और कहा था कि यदि कोई मेरी भक्ति करता है और शिव से द्रोह करता है तो उसको मोक्ष नहीं मिल सकता. मुझसे कोई द्रोह करे और शिव की भक्ति करे तो मोक्ष जरुर मिल सकता है, ऐसे रामेश्वर हैं राम. शिव से पूछो तो वह कहते हैं कि राम जिसके ईश्वर हैं, वह रामेश्वर और राम से पूछो तो वह कहते हैं शिव जिसके ईश्वर है, वह रामेश्वर. यह विविधताओं को और एकता के सूत्रों को दोनों को समन्वित रूप से स्वीकार करना आवश्यक है और हम करते भी हैं.

निधि समर्पण अभियान को जनता का कितना प्रतिसाद मिल रहा है ?

मैं यह अवश्य यह देख रहा हूं कि मैं और मेरे साथी इस अभियान के बारे में जो भी कल्पनाएं करते हैं वह कल्पना छोटी हो जाती है. हम किसी से १ करोड़ मांगने जाते हैं और वह ११ करोड़ रुपये देने की तैयारी में बैठा होता है. ऐसा ही मेरे साथ बैठकों में हुआ. शुरू में किसी ने कहा कि हम २१ हजार रू. देंगे, लेकिन बैठक समाप्त होने के बाद ४-५ लोगों ने खड़े होकर कहा कि हम ५१ हजार रू. देंगे.

राममंदिर के निर्माण से क्या हिन्दुओं का स्वाभिमान जागृत हुआ है ?

अकुला रहा था मन और अपने डीएनए में हम अवसाद में पैदा होते थे. हिन्दू , २५ पीढ़ियों से इस तकलीफ में पैदा होते थे कि देखो हमारा मंदिर टूटा पड़ा है. हमारे राम जी और सीता माता की मूर्तियों का चूरा उस जमीन पर पड़ा हुआ है. जिस पर से हम चल कर जाते हैं. हम उस अपमान को धो रहे हैं, उस कलंक को धो रहे हैं. हम अपने स्वाभिमान की पताका को एक हजार वर्ष तक रहने वाले भवन से बना रहे हैं. यह भवन इस बात की दुनिया में घोषणा करता है कि अब हिन्दू कमजोर नहीं है. अब हिन्दू असंगठित नहीं है. अब हिन्दू दुनिया में अपना दायित्व निभाने के लिए संगठित सामर्थ्यवान होकर खड़ा होगा और विश्व को बताएगा कि शक्ति जो होती है, वह केवल साम्राज्यवादी विस्तार के लिए नहीं होती, विश्व शांति और सुख के लिए भी होती है. ऐसा हमारे पीढ़ी के समय में हो रहा है, यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है. हम अपनी आंखों के सामने राममंदिर बनता हुआ देख रहे हैं, यह हमारा सौभाग्य है और हनुमान जी की वानर सेना में उन्होंने हमको भी शामिल किया हुआ है और हम सब भी इसके पुरुषार्थ का हिस्सा बनाए गए हैं, इस सौभाग्य से मैं स्वयं से ही इर्ष्या करता हूं.

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January 15th 2021, 6:46 am

उपद्रवियों के समर्थन में आया एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्टशन ऑफ सिविल राइट्स

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संगठन की फैक्ट फाइंडिंग टीम बनी कोर्ट, पत्थरबाजों को दी क्लीन चिट

भोपाल. अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए निधि समर्पण के लिए निकाली जा रही हिन्दू संगठनों की रैलियों पर घात लगाकर हमला, पत्थरबाजी व मारपीट करने वाले उपद्रवियों के समर्थन में एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्टशन ऑफ सिविल राइट्स आया है. एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्टशन ऑफ सिविल राइट्स की फैक्ट फाइंडिंग टीम ने बीते दिनों उज्जैन के बेगमबाग, इंदौर के चंदनखेड़ी और मंदसौर के डोराना का दौरा किया और संबंधित घटना के आरोपियों को न्यायालय बनकर क्लीन चिट दे दी. टीम में सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता एहतेशाम हाशमी, सीआईपी-एमएल के मुकेश किशोर, अधिवक्ता शोएब इमानदार, ज्वलंत सिंह चौहान, पत्रकार काशिफ अहमद फराज के साथ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र एम हुफैजा और सैय्यद अली शामिल हैं.

गुरुवार दोपहर भोपाल में पत्रकारवार्ता कर टीम के सदस्यों ने उज्जैन के बेगमबाग, इंदौर के चंदनखेड़ी और मंदसौर में हिन्दू संगठनों की निधि संग्रह के लिए निकाली गई रैली पर पत्थरबाजी करने वालों का बचाव करते हुए घटना को हिन्दू संगठनों का पूर्वनियोजित कदम बता दिया. जबकि पुलिस तीनों घटनाओं को अंजाम देने वालों के खिलाफ आपराधिक धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज कर गिरफ्तारी कर जांच कर रही है.

तीनों स्थानों पर हिन्दू संगठनों की रैलियों पर घात लगाकर सुनियोजित तरीके से की गई पत्थरबाजी और तोड़फोड़ को संगठन की फैक्ट फाइंडिंग टीम ने उकसावे की कार्रवाई बताया है. जबकि पुलिस की जांच में स्पष्ट आया है कि तीनों स्थानों पर शांतिपूर्वक निकाली जा रही रैलियों पर सुनियोजित तरीके से पत्थरबाजी की गई. टीम के सदस्यों का तर्क था कि तीनों घटनाएं हिन्दू संगठनों के उत्तेजनापूर्ण नारों व स्थानीय निवासियों को लेकर लगाए गए अपमानजनक नारेबाजी के कारण हुई. लेकिन, घरों की छतों पर पत्थर, हथियार, कहां से आए, इसका कमेटी के पास कोई जवाब नहीं है.

नहीं दे पाए पत्रकारों के सवालों के जवाब

पत्रकार वार्ता के दौरान टीम के सदस्य एहतेशाम हाशमी और मुकेश किशोर ने पत्रकारों के इस सवाल का जवाब नहीं दे पाए कि अगर अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा घटनाएं सुनियोजित नहीं थीं तो एक साथ सैकड़ों की संख्या में समुदाय के लोग पत्थर, धारदार हथियार लेकर रैली पर कैसे टूट पड़े.

टीम के सदस्यों से जब पत्रकारों ने सवाल किया कि अगर इस तरह की घटनाएं प्रदेश के अन्य जिलों में होंगीं, तब क्या होना चाहिए. तब टीम के सदस्यों ने कहा कि जो भी व्यक्ति अपराध करता है, हिंसा फैलाता है उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए. पुलिस को अपना काम करना चाहिए.

अधिवक्ता एहतेशाम हाशमी जो फैक्ट फाइंडिंग टीम के सदस्य हैं, एहतेशाम हाशमी कांग्रेस पार्टी के विधि प्रकोष्ठ के सदस्य भी हैं. हाशमी पहले तीन तलाक कानून के खिलाफ भी कोर्ट जा चुके हैं.

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January 15th 2021, 6:46 am

समाज ने संभाला संकट

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‘संवाद दर्शन’ के कोरोना सेवा विशेषांक का विमोचन कार्यक्रम संपन्न

पटना (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर ने कहा कि कोरोना जैसी बीमारी पूरे विश्व में कभी किसी ने नहीं देखी होगी. एक से एक भयंकर बीमारी का सामना पहले किया गया था. लेकिन, ऐसी बीमारी, जिसमें स्वयं को बचाए रखने का खतरा सर्वाधिक था, किसी ने नहीं देखा. इसमें कोई सामने नहीं आ रहा था. स्वयं को बचाते हुए दूसरों की सहायता कैसे की जा सकती है, इसका उदाहरण स्वयंसेवकों ने दिखाया. वे पटना में संवाद दर्शन के कोरोना सेवा विशेषांक के विमोचन कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे.

पटना के विश्व संवाद केन्द्र में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए नरेन्द्र ठाकुर ने कहा कि प्रारंभ के 10-15 दिन तक किंकर्तव्यविमुढ़ता की स्थिति थी. लेकिन, धीरे-धीरे सेवा के लिए समाज के बंधु सामने आने लगे. लगभग 25 प्रकार की अलग-अलग सेवाएं समाज द्वारा की गयी. पहले सबसे बड़ी समस्या लॉकडाउन के कारण फंसे हुए लोगों को निकालना था. इसके बाद लोगों के राशन की व्यवस्था करनी थी. संघ के स्वयंसेवकों ने कई स्थानों पर हेल्पलाइन नंबर जारी किये. इससे समाज के लोगों के बीच एक आत्मविश्वास का माहौल बना. दिल्ली में उत्तर-पश्चिम (पूर्वांचल) के लोगों के लिए यह हेल्पलाइन जीवन-रेखा बन गयी थी. एक से दो घंटे के अंदर त्वरित सहायता पहुंचने लगी थी. विश्व की सबसे बड़ी स्लम धारावी में स्वयंसेवकों ने एक दिन के अंदर 10 हजार से अधिक लोगों का कोरोना टेस्ट कर दिया. नासिक में कोरोना के कारण मृत लोगों के अंतिम संस्कार का कार्य स्वयंसेवकों ने किया. प्रियजन और प्रशासन के लोगों ने भी जब अंतिम संस्कार करने से हाथ खड़े कर दिये तो स्वयंसेवकों ने यह कार्य करने का बीड़ा उठाया था.

बिहार के सेवा कार्य की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि समाज के द्वारा तो कई कार्य बिहार प्रांत में किये गये. कई स्थानों पर तो बाहर से आये श्रमिकों ने अपने श्रम से उस स्थान का कायाकल्प कर दिया. कई विद्यालयों को क्वारंटाइन सेंटर बनाया गया था. ऐसे उपेक्षित स्थान को भी श्रमिकों ने अपने श्रम द्वारा संवार दिया. चंपारण में मजदूरों ने तो इतिहास ही रच दिया. अपने श्रम से उन्होंने उद्योग स्थापित किया. आज उनके कपड़ों की धूम पूरे विश्व में हो रही है.

‘संवाद दर्शन’ के कोरोना सेवा विशेषांक की चर्चा करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक रामदत्त चक्रधर ने कहा कि इस कोरोना के संकट काल में सभी तरह की सेवाएं संघ के स्वयंसेवकों ने की. केवल मनुष्य ही नहीं अपितु पशु-पक्षियों की भी चिंता की गयी. दरभंगा में गौवंश के लिए चारे का प्रबंध किया, तो कई स्थानों पर प्रशासन के लोगों के लिए अल्पाहार की भी व्यवस्था की गयी. बाहर से आये श्रमिकों के लिए समाज के साथ मिलकर स्वयंसेवकों ने जगह-जगह राहत केन्द्र शुरु किये. इन श्रमिकों के लिए यह केन्द्र बड़े ही सहायता के केन्द्र थे. यह विशेषांक पानी के बाहर दिखने वाली बर्फ की सिल्ली की तरह है. सिर्फ कुछ उदाहरणों का यहां संकलन किया गया है.

धन्यवाद ज्ञापन संस्था के अध्यक्ष श्रीप्रकाश नारायण सिंह ने किया. मंच संचालन विश्व संवाद केन्द्र के संपादक संजीव कुमार ने किया.

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January 15th 2021, 4:12 am

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निधि समर्पण अभियान का शुभारंभ

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नई दिल्ली. दशकों के इंतजार के बाद प्रत्येक रामभक्त का सपना साकार होने जा रहा है. जल्द ही मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम अयोध्या के भव्य राम मंदिर में विराजेंगे. भव्य मंदिर निर्माण के लिए ‘निधि समर्पण अभियान’ आज से देशभर में शुरू हो गया, जो माघ पूर्णिमा यानि 27 फरवरी तक चलेगा.

आज श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान समिति का प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी से मिला. रामनाथ कोविंद जी ने परिवार सहित अपना व्यक्तिगत समर्पण समिति सदस्यों को सौंपा तथा अभियान के लिए शुभकामनाएं प्रदान कीं. पूज्य़ स्वामी गोविंददेव गिरी जी महाराज ने बताया कि रामनाथ कोविंद जी ने समर्पण के रूप में 5 लाख 100 रुपये की राशि प्रदान की. उप-राष्ट्रपति वैकेया नायडू पहले ही अपनी समर्पण राशि प्रदान कर चुके हैं. राष्ट्रपति से मिलने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी जी महाराज, VHP कार्याध्यक्ष एडवोकेट अलोक कुमार, श्रीराम मंदिर भवन निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दिल्ली प्रांत संघचालक कुलभूषण आहूजा गए थे.

इसके साथ ही आज प्रातः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने दिल्ली में मंदिर मार्ग स्थित महर्षि वाल्मीकि मंदिर में शीष नवाया. तथा निधि समर्पण अभियान के निमित्त महामंडलेश्वर पूज्य संत कृष्ण शाह विद्यार्थी जी महाराज से निधि समर्पण हेतु भेंट की.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ने 14 जनवर को जम्मू कश्मीर में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण एवं संपर्क अभियान का शुभारंभ किया. उन्होंने कहा कि यह धन संग्रह नहीं, बल्कि समर्पण का कार्यक्रम है और समाज अपनी श्रद्धा एवं इच्छा से जो सहयोग करेगा, वह सब स्वीकार्य है. श्रीराम मंदिर भव्य बनेगा और भगवान के लिए समाज अपने सामर्थ्य के अनुसार स्वयं प्रेरणा से सहयोग करेगा. श्रीराम जन्मभूमि की प्रत्येक कारसेवा में जम्मू कश्मीर के लोगों की अविस्मरणीय भूमिका रही है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर ने पटना में हनुमान मंदिर से निधि समर्पण अभियान का शुभारंभ किया.

श्रीराम मंदिर के लिए ‘निधि समर्पण अभियान’

‘निधि समर्पण अभियान’ में 13 करोड़ परिवारों से संपर्क का लक्ष्य रखा गया है. श्रीराम मंदिर निर्माण में सहयोग के लिए 10 रुपये, 100 रुपये, 1000 रुपये के कूपन उपलब्ध हैं. इससे अधिक राशि पर रामभक्तों को रसीद प्रदान की जाएगी. देशभर में 5.25 लाख गांवों में कार्यकर्ताओं के माध्यम से संपर्क किया जाएगा. इस अभियान में 35 से 40 लाख कार्यकर्ता जुटेंगे. अभियान का लक्ष्य 65 करोड़ लोगों तक पहुंचना है.

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January 15th 2021, 4:12 am

शिमला में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान कार्यालय का शुभारंभ

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शिमला. प्रदेश की राजधानी में स्थित डॉ. हेडगेवार भवन, नाभा में मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर वीरवार 14.01.2021 को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान समिति के प्रांत कार्यालय का उद्घाटन हुआ. समिति के प्रांत संयोजक और विश्व हिन्दू परिषद के प्रांत सह मंत्री सुनील जसवाल ने बताया कि शिमला में प्रांत कार्यालय के उद्घाटन के साथ ही श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण से संबंधित कूपन, रसीदें और श्रीराम जन्मभूमि के इतिहास के संबंधित पत्रक भी प्रदेश के सभी जिलों को भेज दिए गए हैं. इसके साथ ही, शुक्रवार 15.01.2021 को समिति के सदस्य हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल से श्रीराम जन्मभूमि निर्माण के लिए समर्पित निधि प्राप्त करने के साथ ही पूरे प्रांत में एक साथ अभियान को शुरू करेंगे.

सुनील जसवाल ने कहा कि करीब डेढ़ महीने तक चलने वाले इस अभियान में हिमाचल प्रदेश के 20 हजार 960 गांवों में सभी हिन्दू परिवारों तक पहुंचने का लक्ष्य है. ताकि सभी हिन्दुओं की श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण में सहभागिता हो सके. हिमाचल के राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय से समिति के सदस्य मिलेंगे और उन्हीं के कर कमलों से यहां अभियान को शुरू किया जाएगा. प्रदेश के सभी जिलों केन्द्रो में इससे संबंधित सामग्री का वितरण किया जा चुका है.

इसके अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरकार्यवाह भय्याजी जोशी कल जिला कांगड़ा के धर्मशाला से और सह सरकार्यवाह मनमोहन वैद्य और क्षेत्र प्रचारक बनवीर शाहपुर से अभियान का शुभारंभ करने जा रहे हैं.

समिति के प्रांत कार्यालय में आयोजित हवन व पूजन में समिति के सदस्यों के अलावा मातृशक्ति सहित 50 लोगों ने हवन व पूजन में पूर्णाहुति दी.

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January 15th 2021, 4:12 am

हिंसक मानसिकता – मुस्लिम युवती से विवाह करने वाले युवक की हत्या, गोकशी रोकने गई महिला कांस्टेबल को ग

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नई दिल्ली. मुस्लिम युवती से विवाह करने के कारण एक युवक की गला रेतकर हत्या कर दी गई. गार्डन मेट्रो स्टेशन के पास सार्वजनिक शौचालय में युवक का शव मिला है. दूसरी घटना, रविवार देर रात की है. मवाना के सठला गांव में दबिश देने गई पुलिस टीम पर गोकशी करने वालों ने हमला कर दिया. आरोपियों ने पशु बांधने वाली रस्सी का फंदा बनाया और महिला कांस्टेबल के गले में फंदा डालकर घसीटा. दो घटनाएं उदाहरण मात्र हैं, हिंसक मानसिकता को समझने के लिए. ऐसी हिंसक घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए इसके पीछे की मानसिक प्रवृत्ति को समझना होगा. पहले इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना होगा, तभी इन घटनाओं को रोका जा सकता है.

1). सेक्टर-39 थाना क्षेत्र स्थित बॉटेनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन के पास सार्वजनिक शौचालय में युवक का शव मिला. युवक की हत्या चाकू से गला रेतकर की गई है. सार्वजनिक शौचालय में शव मिलने की सूचना मिलते ही हड़कंप मच गया.

डीसीपी राजेश एस ने बताया कि थाना सेक्टर-39 पुलिस सूचना मिली थी कि एक युवक का शव बॉटेनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन के पास सार्वजनिक शौचालय में पड़ा है. पुलिस मौके पर पहुंची तो देखा कि युवक के गले पर चाकू के निशान हैं. युवक का शव पूरी तरह लहूलुहान था. पुलिस को उसकी जेब और शौचालय से दो अलग-अलग चाकू मिले हैं. जांच के दौरान युवक की पहचान सेक्टर-55 झुग्गी निवासी 27 वर्षीय राधे चौहान के रूप में हुई है.

पुलिस से जानकारी मिलते ही मौके पर पहुंचे परिजनों ने बताया कि राधे ने करीब छह महीने पहले ही शहनाज नाम की मुस्लिम युवती से प्रेम विवाह किया था. पुलिस हर पहलू से मामले की जांच कर रही है.

दो महिलाओं सहित तीन गिरफ्तार, आफरिन, वसीम सहित दस के खिलाफ मुकदमा दर्ज

2). मवाना के सठला गांव में रविवार देर रात को दबिश देने गई पुलिस टीम पर गोकशों ने हमला कर दिया. आरोपियों ने पशु बांधने वाली रस्सी का फंदा बनाया और महिला कांस्टेबल के गले में लपेटकर घसीटा. पुलिस टीम पर पथराव भी किया. पुलिस टीम ने पहले महिला कांस्टेबल को बचाया और फिर हमले की सूचना फ्लैश की.

घटना की रिपोर्ट इंस्पेक्टर ने खुद दर्ज कराई है. रिपोर्ट के अनुसार गोकशी की सूचना पर मवाना पुलिस रविवार देर रात सठला गांव में दबिश देने पहुंची थी. गोकशों ने टीम पर हमला कर दिया. महिला सिपाही बीता उनके बीच फंस गई, आरोपियों ने बीता के गले में रस्सी डालकर घसीटना शुरू कर दिया. सूचना पर फलावदा, हस्तिनापुर और बहसूमा थाने की फोर्स मौके पर पहुंची. इस दौरान, आरोपी पथराव करते हुए फरार हो गए.

पुलिस ने गांव में ताबड़तोड़ दबिश देकर तीन क्विंटल मीट, कटान में प्रयुक्त सामान, छुरा, गंडासे, लकड़ी का बोटा, प्लास्टिक की थैलियां व तीन बाइक बरामद की हैं.

पुलिस ने दो महिलाओं सहित तीन लोगों को गिरफ्तार किया है. साथ ही गांव सठला निवासी उवेश, महराज, आफरिन, वसीम कुरैशी, डिर्रा उर्फ फिरोज कुरैशी, अमजद कुरैशी, फुरकान कुरैशी, इकराम कुरैशी, जैद कुरैशी, आफाक कुरैशी समेत कुल दस आरोपियों के खिलाफ बलवा, हत्या के प्रयास, गोकशी, साजिश रचने व अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है.

मेरठ देहात के एसपी केशव कुमार ने कहा कि पुलिस टीम गोकशी की सूचना पर दबिश देने सठला गांव गई थी. यहां पर पुलिस टीम पर हमला किया गया. इस दौरान पुलिस ने दो महिला समेत तीन लोगों की गिरफ्तारी की है. पुलिस की ओर से ही मुकदमा दर्ज किया गया है.

 

 

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January 14th 2021, 12:50 pm

दिल्ली – श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र कार्यालय के उद्घाटन के साथ ही निधि समर्पण अभियान का शुभारंभ

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नई दिल्ली. जूना पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी अवधेशानन्द गिरी जी महाराज ने आज दक्षिणी दिल्ली स्थित कैलाश कॉलोनी में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के कैंप कार्यालय का उद्घाटन किया. इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह माननीय डॉ. कृष्ण गोपाल जी तथा विश्व हिन्दू परिषद के कार्याध्यक्ष एडवोकेट आलोक कुमार सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे. कार्यालय के उद्घाटन के उपरांत दिल्ली के कुछ गणमान्य उद्योगपतियों के साथ राजधानी के दो सांसदों ने भी श्रीराम जन्मभूमि मंदिर हेतु पूज्य स्वामी जी के कर कमलों में निधि समर्पित की.

सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने कहा कि यह मात्र एक मंदिर नहीं, अपितु हिन्दू समाज के पिछले एक हजार वर्षों के तिरस्कार, उपेक्षा व गुलामी का परिमार्जन कर सम्पूर्ण देश को भारतीय संस्कृति व स्वाभिमान से जोड़ने का अभियान है. 110 करोड़ हिंदुओं को लगना चाहिए कि यह उनका मंदिर है. इसके लिए उन सभी का इस हेतु समर्पण आवश्यक है. यह हम सब की जिम्मेदारी है कि इस पुण्य रामकाज से कोई वंचित ना रहने पाए.

विश्व हिन्दू परिषद के केन्द्रीय कार्याध्यक्ष एडवोकेट आलोक कुमार ने कहा कि जब से हमने इस अभियान की योजना रचना की, हिन्दू समाज व कार्यकर्ताओं के उत्साह के कारण हमारा लक्ष्य दिन ब दिन बढ़ता चला जा रहा है. अब हम देश के 5.25 लाख गावों व शहरों के 13 करोड़ परिवारों के लगभग 65 करोड़ लोगों को इस अभियान से जोड़ेंगे. एक ओर जहां अभियान के प्रथम दिन, देश के प्रथम नागरिक महामहिम राष्ट्रपति से हम शुभकामनाएं लेंगे. वहीं, दूसरी ओर इसी दिन पूज्य अवधेशानन्द गिरी जी महाराज स्वयं बाबा साहेब आंबेडकर की दीक्षा भूमि नागपुर में वंचित समाज के समक्ष जाकर श्रीराम मंदिर के लिए भिक्षा मांगेंगे. इसी दिन दीदी माँ ऋतंभरा जी भी मुंबई में अनुसूचित जाति के समाज के बंधु-भगिनियों को इस अभियान से स्वयं जोड़कर सामाजिक समरसता का एक और स्तम्भ खड़ा करेंगीं.

आशीर्वचन में पूज्य स्वामी अवधेशानन्द गिरी जी महाराज ने कहा कि हम उस समाज के प्रतिनिधि हैं, जिसके पूज्य संतों ने अपनी हड्डियों तक को दान कर दिया. उन्होंने पूज्य महंत अवैद्यनाथ जी महाराज, देवराजा बाबा तथा स्वर्गीय अशोक सिंहल जी सहित जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के योद्धाओं का स्मरण करते हुए कहा कि हम परमार्थशाली संस्कृति के वाहक हैं, जिसमें अर्पण, तर्पण व समर्पण की बड़ी महत्ता है. गिलहरी की भांति सम्पूर्ण हिन्दू समाज को इस राष्ट्र-मंदिर से जोड़ना हम सब की जिम्मेदारी है.

दिल्ली प्रांत में निधि समर्पण अभियान का प्रारंभ आगामी 01 फरवरी से होगा. किन्तु मकर संक्रांति पर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के दक्षिणी दिल्ली स्थित इस कैंप कार्यालय के उद्घाटन अवसर पर आयोजित विशिष्ट कार्यक्रम में लगभग दो दर्जन महानुभावों ने अपना समर्पण पूज्य स्वामी जी के समक्ष किया.

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January 14th 2021, 12:50 pm

NCERT की पाठ्यपुस्तकों में विकृतियों, विसंगतियों के बारे में संसदीय समिति के समक्ष रखे तथ्य

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नई दिल्ली. शिक्षा, महिला, युवा एवं खेल सम्बन्धी संसदीय समिति की बैठक 13 जनवरी को संसद भवन में आयोजित की गयी थी. विनय सहस्त्रबुद्धे की अध्यक्षता में बनी समिति ने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की पाठ्यपुस्तकों में विकृतियों, विसंगतियों एवं भारत के इतिहास में देश के महनायकों के योगदान को पाठ्यपुस्तकों से बाहर रखने जैसे गम्भीर विषय पर बैठक आयोजित की थी. बैठक में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास को भी अपना प्रतिवेदन रखने का अवसर दिया गया. न्यास के प्रतिनिधिमंडल में देशरज शर्मा, एड्वर्ड मेंढे सम्मिलित थे.

न्यास के प्रतिनिधिमंडल ने समिति के समक्ष प्रस्तुतीकरण दिया….

पाठ्य-पुस्तकों की विषय-वस्तु और डिजाइन में प्रस्तुत बिन्दुओं में सुधार –

  1. हमारे राष्ट्रीय नायकों के प्रति गैर-ऐतिहासिक तथ्यों और विकृतियों के संदर्भो को पाठ्यपुस्तकों से हटाने के विषय में —

– न्यास ने एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों का अध्ययन कर केवल इतिहास नहीं तो राजनीति विज्ञान एवं हिंदी की पाठ्यपुस्तकों में व्याप्त विकृतियों को समिति के समक्ष रखा.

– इतिहास की पाठ्यपुस्तकों के कुछ प्रमुख उदाहरण – कक्षा-6 की पुस्तक में संस्कृत एवं अन्य भारतीय भाषाओं का परिचय केवल कुछ पंक्तियों में अत्यंत संक्षिप्त दिया गया है.

– कक्षा-6 की ही इतिहास की पुस्तक में अनेक स्थानों पर जातिगत द्वेष उत्पन्न करने का प्रयास किया गया है. उदाहरण के तौर पर पृष्ठ 47-48 के कुछ वाक्य प्रस्तुतीकरण में दिए..

– कक्षा-7 की पुस्तक में विदेशी आक्रांताओं के प्रति सहानुभूति पूर्वक लेखन दिखाई देता है.

– कक्षा-8 की पुस्तक हमारे अतीत भाग-3 में अध्याय ‘जब जनता बगावत करती है 1857 और उसके बाद’ में विद्रोह तथा बगावत के स्थान पर ‘स्वतंत्राता संग्राम’ शब्द का प्रयोग करना ज्यादा उचित होगा.

– कक्षा-8 की ही इसी पुस्तक में स्वतंत्रता संग्राम की ज्योत जलाने वाले मंगल पांडे की फांसी की दिनांक भी गलत दी गई है.

– कक्षा 12 की पुस्तक भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग-1 में अध्याय ‘बंधुत्व, जाति तथा वर्ग’ में समाज के एक वर्ग के प्रति द्वेष निर्माण करने का प्रयास किया गया है.

– कक्षा-12 की इतिहास की पुस्तक ‘भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग-2’ एवं ‘भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग-3’, में अनेक स्थानों पर विदेशी आक्रांताओं को निर्मल ह्दय वाला सहिष्णु शासक दिखाने का प्रयास किया गया है.

– इसी प्रकार राजनीति विज्ञान की कक्षा-11 की पाठ्यपुस्तक के अध्याय ‘विधायिका’ में एक राजनीतिक दल के प्रति द्वेष तथा दूसरे राजनीतिक दल के लिए स्तुति, पुस्तक निर्माताओं की पक्षपाती सोच को दर्शाता है.

– इसी प्रकार हिंदी की कक्षा-1 से कक्षा-11 की पुस्तकों में अभद्र, गैर-कानूनी एवं असंवैधनिक शब्दों का प्रयोग अनेक स्थानों पर किया गया है.

इस संदर्भ में न्यास ने कुछ सुझाव दिए —

– किसी भी विषय की पुस्तक के प्रथम पाठ में उस विषय से संबंधित भारत के ज्ञान व गौरव को व्यक्त किया जाना चाहिए.

– आयु, स्तर अनुसार भारत के संविधान की प्रस्तावना, कर्तव्यों आदि का उल्लेख प्रत्येक कक्षा में हो.

– विद्यार्थियों के पिछले कक्षा के ज्ञान को आधार बनाकर अगली पुस्तक हो तथा इसमें ऐतिहासिक, सांस्कृतिक ज्ञान को समृद्ध करने, सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने और आजीवन सीखने को बढ़ावा देने की उनकी क्षमता में अभिवृद्धि हेतु सहायक हो.

– विद्यार्थियों को अपने समुदाय, देश, संस्कृति के ज्ञान के साथ विश्व की संस्कृतियों से परिचय करवाना, जिम्मेंदारी की भावना, खोजी स्वभाव को विकसित करना, निर्णय लेने का कौशल, प्रभावी संचार कौशलता, निष्पक्ष भाव से अतीत और वर्तमान की घटनाओं को देखने की क्षमता विकसित करने में पुस्तकें सहायक हों.

– इतिहास / सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों में राष्ट्रीय गौरव, राजनीतिक इतिहास के साथ-साथ सांस्कृतिक इतिहास, तथ्यों की सटीकता, क्रमबद्ध तथा अतीत को जानने में रूचि विकसित करने, अपने पूर्वजों पर गर्व करने, प्राचीन वस्तुओं और स्मारकों, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की जिम्मेदारी लेने के लिए विद्यार्थियों को तैयार करे.

– मूल्य आधारित प्रेरणादायी घटनाएं, नक्शों, चित्रों, प्रसंगों को पाठ में प्रयोग प्रयो ग करने से पढ़ने की रूचि बढ़ती है तथा जिज्ञासा उत्पन्न होगी.

– प्रश्न पूछना, चर्चा, रोल प्ले, कम्प्यूटर सिमुलेशन गेम, प्रोजेक्ट कार्य, सूचना एकत्र करना, सर्वेक्षण आदि के सुझाव पुस्तकों में हों.

– प्रत्येक अध्याय को रोचक प्रश्न पूछने से प्रारम्भ करना तथा अध्याय के अंत में एक सिंहावलोकन या निष्कर्ष रखा जाए.

– पाठ्यपुस्तकों में भाषा का स्तर विद्यार्थियों की भाषा क्षमता और उनकी अवस्था अनुसार हो, शब्दों व वाक्यों के चयन में देशभक्ति, संस्कार, पर्यावरण सुरक्षा, आपसी स्नेह, भावात्मकता, एकता, आपसी समानता आदि भाव जागृत हो.

– भाषा पुस्तकों में अनुवादित नामों, स्थानों के लिए हिंदी के ही मूल शब्दों का प्रयोग हो. लेखक को भाषा, सूचना, चित्राण, संरचना सहित सभी बिन्दुओं का ध्यान रखना चाहिए.

एन.सी.ई.आर.टी की कक्षा 1 से 12 तक की सभी विषयों की पाठ्यपुस्तकों की तुरन्त समीक्षा की जानी चाहिए ताकि उपरोक्त विसंगतियों को तत्काल प्रभाव से दूर किया जा सके.

भारतीय इतिहास के सभी कालखण्डों के उचित प्रतिनिधित्व से संबंधित —

– पाठ्यपुस्तकों में केवल राजनैतिक इतिहास के साथ-साथ सामाजिक/आर्थिक/ शैक्षणिक आदि पक्षों का भी समावेश होना चाहिए.

– भारत के भौगोलिक क्षेत्रफल के अंतर्गत सभी क्षेत्रों के इतिहास को पाठ्यपुस्तकों में अनुपातिक स्थान मिलना चाहिए. वर्तमान पुस्तकों में उत्तरपूर्वी भारत आदि का इतिहास नगण्य है.

– पाठ्यपुस्तकों में राष्ट्र के प्रति स्वाभिमान जगाने वाला इतिहास होना चाहिए. उदाहरण चन्द्रगुप्त, शिवाजी, राणा प्रताप, राजेंद्र चोल, सिक्ख समुदाय आदि का गौरवशाली इतिहास पुस्तकों में होना चाहिए.

शिक्षा के आधरभूत उद्देश्य के संदर्भ में स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘‘मेन मेकिंग एवं करेक्टर बिल्डिंग’’. यही बात राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में दोहराते हुए ‘चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व के समग्र विकास’ को शिक्षा की आधारभूत बात माना है. सारे पाठ्यक्रमों का आधर यही होना चाहिए.

इसके साथ ही राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद को आगामी पाठ्यक्रम में कोरोना काल में भारत का योगदान तथा आत्मनिर्भर भारत संबंधी पाठ को भी जोड़ना चाहिए. अभी तक पाठ्य-पुस्तकें पहले अंग्रेजी में तथा बाद में अन्य भाषाओं में अनुवाद किया जाता है. इसे बदलकर पहले हिन्दी में पुस्तकें तैयार होनी चाहिएं.

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास पिछले एक दशक से भी अधिक समय से शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहा है. न्यास की मानना है कि शिक्षा देश की संस्कृति, प्रकृति एवं प्रगति के अनुरूप हो जो देश की सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं को पूर्ण कर सके.

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने वर्ष 2004 से ही ‘शिक्षा बचाओ आन्दोलन’ के माध्यम से एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में व्याप्त विकृतियों, विसंगतियों के विरुद्ध अपना कार्य प्रारंभ किया था. समय-समय पर चर्चा, सुझाव, न्यायालय एवं आंदोलन के रास्ते न्यास पाठ्यक्रमों में सुधार हेतु कार्यरत रहा है.

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January 14th 2021, 12:50 pm

सैन फ्रांसिस्को से बेंगलुरु – एयर इंडिया की महिला पायलटों ने रचा इतिहास, नॉर्थ पोल पर भरी उड़ान

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नई दिल्ली. भारतीय महिलाओं के उत्साह और बहादुरी की धमक पूरी दुनिया सुन रही है. अभी हाल ही में एयर इंडिया की 4 महिला पायलटों की साहस ने पूरी दुनिया में प्रशंसा बटोरी. महिला पायलटों की टीम ने दुनिया के सबसे लंबे हवाई मार्ग नॉर्थ पोल पर उड़ान भर एक नया इतिहास रचा. महिला पायलटों की टीम अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को से उड़ान भरने के बाद नॉर्थ पोल से होते हुए बेंगलुरु के केम्पेगौड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुंची. उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान लगभग 16,000 किमी. की दूरी तय की.

फ्लाइट के भारत में लैंड करते ही एयर इंडिया ने अपने ट्विटर हैंडल से स्वागत किया. एयर इंडिया ने ट्वीट किया – ‘वेलकम होम, हमें आप सभी (महिला पायलटों) पर गर्व है. हम AI176 के यात्रियों को भी बधाई देते हैं, जो इस ऐतिहासिक सफर का हिस्सा बने.’

विमान की महिला पायलट टीम में कैप्टन जोया अग्रवाल, कैप्टन पापागरी तनमई, कैप्टन शिवानी और कैप्टन आकांक्षा सोनवरे शामिल थीं. इस विमान को लीड कैप्टन जोया अग्रवाल कर रही थीं.

बेंगलुरु एयरपोर्ट पर लैंडिंग के बाद कैप्टन जोया अग्रवाल ने कहा – आज हमने न केवल उत्तरी ध्रुव पर उड़ान भरकर, बल्कि केवल महिला पायलटों द्वारा इसे सफलतापूर्वक करके एक विश्व इतिहास रचा है. हम इसका हिस्सा बनकर बेहद खुश और गर्व महसूस कर रहे हैं. इस मार्ग ने 10 टन ईंधन बचाया है.

Today, we created world history by not only flying over the North Pole but also by having all women pilots who successfully did it. We are extremely happy and proud to be part of it. This route has saved 10 tonnes of fuel – Captain Zoya Aggarwal at Bengaluru airport

सैन फ्रांसिस्को-बेंगलुरु की उद्घाटन फ्लाइट का संचालन करने वाली टीम में से एक पायलट शिवानी ने कहा कि यह एक रोमांचक अनुभव था, क्योंकि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. यहां पहुंचने में लगभग 17 घंटे लग गए.

It was an exciting experience since it was never done before. It took almost 17 hours to reach here: Shivani Manhas, one of the four pilots who operated Air India’s inaugural San Francisco-Bengaluru flight

जब यह विमान सैन फ्रांसिस्को से चला था, उसके बाद से ही इसकी हर लोकेशन की जानकारी खुद एयर इंडिया अपने ट्विटर हैंडल से समय-समय पर दे रहा था. इतना ही नहीं, सिविल एविएशन मिनिस्टर हरदीप पुरी ने भी इसे लेकर ट्वीट किया.

सिविल एविएशन मंत्री हरदीप पुरी ने अपने ट्वीट में लिखा – ‘सैन फ्रांसिस्को से बेंगलुरु तक का ये ऐतिहासिक सफर महिला पायलटों की वजह से वंदे भारत मिशन को और भी खास बनाता है. मिशन ने अब तक 46.5 लाख से अधिक लोगों की अंतरराष्ट्रीय यात्रा की सुविधा प्रदान की है.

एयर इंडिया के पायलट पहले भी ध्रुवीय मार्ग पर उड़ान भर चुके हैं, मगर ऐसा पहली बार है जब कोई महिला पायलट टीम ने उत्तरी ध्रुव पर उड़ान भरी है.

जानकारी के अनुसार उड़ान संख्या एआई-176 शनिवार को सैन फ्रांसिस्को से रात 8:30 बजे (स्थानीय समयानुसार) रवाना हुई और यह सोमवार तड़के 3:45 बजे यहां पहुंची. एयर इंडिया ने ट्वीट किया, ‘इसकी कल्पना कीजिए – सभी महिला कॉकपिट सदस्य – भारत आने वाली सबसे लंबी उड़ान – उत्तरी ध्रुव से गुजरना और यह सब हो रहा है! रिकॉर्ड टूट गए. एआई-176 द्वारा इतिहास रचा गया. एआई-176, तीस हजार फुट की ऊंचाई पर उड़ान भर रहा है.’

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January 14th 2021, 10:18 am

आन्दोलन से मुक्ति की दरकार – अपनी सनक कब छोड़ेंगे..?

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी

कृषि सुधार कानूनों पर सर्वोच्च न्यायालय की अस्थायी रोक एवं एक समिति के गठन के आदेश के पश्चात भी हाय-तौबा मचा हुआ है. विपक्षी दलों एवं आन्दोलन की बागडोर थामने वाले किसान नेताओं ने अब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित समिति के सदस्यों पर ही प्रश्नचिन्ह लगाना शुरु कर दिया है. आन्दोलन में विभिन्न कारणों से कृषकों की मृत्यु एवं सार्वजनिक जीवन अस्त-व्यस्त होने से बचाने के लिए न्यायालय ने समाधान का रास्ता निकालने के लिए कानूनों को स्थगित करते हुए इन कानूनों की कमियों को दूर करने के लिए समिति गठित की है. तब भी यदि किसान नेता सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से सहमति दर्ज नहीं करवा रहे तो उनकी मंशा पर प्रश्नचिन्ह उठना लाज़मी है.

यह ठीक है कि लोकतांत्रिक तरीकों से असहमति, धरना प्रदर्शन, आन्दोलनों के नाते अपना विरोध दर्ज करवाया जाना चाहिए. कृषि कानूनों पर न्यायालय ने हल निकालने की कवायद प्रारंभ की है, तब भी तथाकथित किसान नेता आन्दोलन को समाप्त करने के बजाय खेल खेलने की दिशा में आतुर दिख रहे हैं.

अब इसे क्या माना जाए? आप सरकार की नहीं सुनेंगे. सर्वोच्च न्यायालय नहीं सुनेंगे, तो आप किसकी बात सुनेंगे? किसी भी मुद्दे का हल बातचीत से ही होता है. संसद द्वारा पारित कानून ही विधिमान्य होता है तथा सरकार के पास शक्ति है कि वह कानूनों को कैसे लागू करेगी. हमारी न्यायपालिका केवल यह देखती है कि विधायिका द्वारा बनाए गए या संशोधित कानून के लिए विधिसम्मत तरीकों का पालन किया गया है या नहीं. न्यायपालिका इसी आधार पर कोई निर्णय सुनाती है.

पहले सरकार और अब न्यायालय ने समाधान निकालने का प्रयास किया है. लेकिन सरकार विरोध में मदान्ध ‘गैंग’ इस पर भी छद्म नैरेटिव की तोप चलाने को तैयार है. कह रहे हैं कि हम न तो सरकार की सुनेंगे, न सर्वोच्च न्यायालय की – जो हम कहेंगे, वही स्वीकार किया जाए. आखिर यह कैसी सनक है? कानूनों को वापिस लेने की जिद पर अड़े हैं, कानूनों में संशोधन के लिए न तो आप सुझाव दे पा रहे हैं, न ही समाधान के लिए तत्पर दिख रहे हैं. आप सरकार एवं न्यायपालिका की बातें नहीं सुनेंगे तो किसकी सुनेंगे..?

सवाल तो इन तथाकथित किसान नेताओं से भी है. क्या ये सम्पूर्ण देश के किसानों का प्रतिनिधित्व करते हैं? सभी लोग सहमत हैं कि कृषक हितैषी हल निकलना चाहिए. लेकिन किसान नेताओं के राजनैतिक स्टंट देखने पर तो यही प्रतीत होता है, जैसे कठपुतली को इशारों पर नचाया जा रहा हो. किसान नेता अपनी सनक कब छोड़ेंगे व आन्दोलन को समाप्त कर समाधान की ओर रुख करेंगे?

दूसरी ओर पैनी दृष्टि के साथ घटनाक्रमों एवं इन सबके पीछे के निहितार्थ को समझने का प्रयास किया जाए तो सब कुछ स्पष्ट सा दिख रहा है. किसान आन्दोलन के सहारे बौद्धिक नक्सलियों की फौज व भारतीयता के विरोधी तत्वों द्वारा उन कई सारे प्रयोगों को किया जा रहा है, जिन्हें प्रत्यक्ष तरीके से कर पाना असंभव एवं दुष्कर है. कृषकों के नाम की सहानुभूति हासिल कर उन एजेंडों को मूर्तरूप देने के प्रयास चल रहे हैं, जिनके पीछे राष्ट्रघात है. इस मुद्दे को भी ‘प्रयोग’ की तरह देखा जा रहा है, यदि सरकार झुके और कानूनों को वापस ले ले. तो इनकी गैंग कहीं भी ऐसे प्रायोजित धरना प्रदर्शन आन्दोलन कर देश की संसद के विभिन्न कानूनों को रद्द करने के लिए देश को आग में झोंकने के लिए तत्पर हो जाएंगे. ये एक ‘इको सिस्टम’ के तहत काम कर रहे हैं, जिसमें प्रमुख तोपची वही हैं जो देशविरोधी, हिन्दू विरोधी, कुकृत्यों, गतिविधियों को संचालित, प्रायोजित करने का दुस्साहस कर स्वयं को ‘विक्टिम’ की तरह पेश करते रहते हैं.

सरकार व समस्त देशवासियों की कृषकों के साथ सम्वेदनाएं, सहानुभूति है तथा कृषकों की खुशहाली के लिए सभी प्रतिबद्ध हैं.

पर, असल में किसान आन्दोलन की आड़ लेकर अपने मंसूबों को अमलीजामा पहनाने वाली गैंग यह चाहती ही नहीं कि कृषक आन्दोलन समाप्त हो व समाधान के रास्ते समन्वयपूर्ण कृषक हितैषी नीति के अन्तर्गत संशोधन के साथ कृषि कानून लागू हों. बस इसी कारण के चलते वे इस पर सरकार को घेरकर घेराबंदी करने की फिराक में हैं, जिससे उन्हें राजनैतिक-अकादमिक वॉक ओवर मिले और वे प्रभुत्व स्थापित कर सकें. 26 जनवरी के दिन कृषकों की परेड वाला नैरेटिव क्या है? वही न कि राजनैतिक स्टंट दिखलाकर सरकार के विरुद्ध विषवमन करते हुए अप्रिय घटनाओं की स्थिति निर्मित की जाए. पंजाब, हरियाणा इत्यादि से सटे इलाकों में सार्वजनिक स्थान विवरण बोर्डों के ‘हिन्दी’ में लिखे नामों को मिटाया जाना, सीएए, एनारसी वापस लो के नारे व पोस्टर…..क्या यह किसान आन्दोलन के मुद्दे हैं? इसी तरह विदेशों में सिक्ख समूह के लोगों द्वारा किसान आन्दोलन के नाम पर भारत विरोध के नारे. प्रधानमंत्री के मरने के लिए बद्दुआएं देती कम्युनिस्ट पार्टी की महिलाएं. क्या यह अराजकता नहीं है? ऐसा कौन सा देश है, जहां वहां की संसद द्वारा बनाए कानून के विरोध में इस तरह के कृत्य किए जाते हैं और वहां की सरकार सब आसानी से बर्दाश्त कर लेती है? यह सब सिर्फ़ भारत में लोकतंत्र की दुहाई देकर किया जा सकता है.

राममंदिर निर्माण के फैसले, धारा-३७० की समाप्ति, तीन तलाक कानून से उपजी छटपटाहट के बाद सीएए के विरोध के नाम पर दिल्ली को दंगों की आग में झोंककर नरंसहार का षड्यंत्र रचने वाले चेहरे कौन थे? किन लोगों ने दिल्ली की सड़क को कैद करने के लिए भड़काया? किस गैंग के लोग ‘हिन्दुत्व’ की कब्र खोदने की बात कह रहे थे? जब इन सभी प्रश्नों एवं घटनाक्रमों के उत्तर ढूंढ लेंगे तो सब कुछ दर्पण की तरह सुस्पष्ट हो जाएगा. किसान नेताओं को अब यह समझना चाहिए कि कहीं वे सचमुच में तो इसी गैंग की कठपुतली बनकर किसानों के साथ धोखा तो नहीं कर रहे?

इसलिए, यह देश हमारा है, किसान हमारे हैं. उसकी पीड़ा एवं दुर्दशा को दूर करने का कार्य सरकार एवं विधि का शासन स्थापित करने का दायित्व न्यायपालिका तथा सत्य मार्ग पर चलते हुए राष्ट्र निर्माण को गति देने के लिए ‘राष्ट्रघातियों’ का विनाश कर सभी को अपनी भूमिका निभानी पड़ेगी.

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January 14th 2021, 10:18 am

यह धन संग्रह नहीं, बल्कि समर्पण का कार्यक्रम है – भय्याजी जोशी

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जम्मू. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ने जम्मू कश्मीर प्रांत में श्रीराम जन्म भूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण व संपर्क अभियान का शुभारंभ किया. उन्होंने इस अभियान का शुभारंभ जम्मू शहर के गांधीनगर में स्थित वाल्मीकि मोहल्ला में जाकर मंदिर निर्माण के लिए निधि समर्पण हेतु संपर्क करके किया. तदोपरांत अभियान के निमित्त डिगियाना स्थित श्री संत मेला सिंह जी दस्तकारी आश्रम के पूज्य महंत मंजीत सिंह जी से भेंट कर मंदिर निर्माण के लिए सहयोग राशि ली.

जम्मू कश्मीर प्रांत में यह अभियान मकर संक्रांति से लेकर माघ पूर्णिमा, 27 फरवरी तक चलेगा.

इस अवसर पर भय्याजी जोशी ने कहा कि यह धन संग्रह नहीं, बल्कि समर्पण का कार्यक्रम है और समाज अपनी श्रद्धा एवं इच्छा से जो सहयोग करेगा, वह सब स्वीकार्य है. श्रीराम मंदिर भव्य बनेगा और भगवान के लिए समाज अपने सामर्थ्य के अनुसार स्वयं प्रेरणा से सहयोग करेगा. श्रीराम जन्मभूमि की प्रत्येक कारसेवा में जम्मू कश्मीर के लोगों की अविस्मरणीय भूमिका रही है. सर्वोच्च न्यायालय के सर्मसम्मत निर्णय और प्रभु श्रीराम की इच्छा अनुसार अयोध्या में भव्य मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ हो गया है.

उन्होंने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए सिक्ख समाज के बंधुओं ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया था. 30 नवंबर, 1858 को दर्ज एक एफआईआर की रिपोर्ट में लिखा है, “निहंग सिक्ख, विवादास्पद ढांचे में घुस गए थे और राम नाम के साथ वहां हवन किया. निहंग सिक्खों ने वहां न सिर्फ हवन और पूजा की, बल्कि उस परिसर के भीतर श्रीराम का प्रतीक भी बनाया. उस समय उनके साथ 25 और सिक्ख थे, जिन्होंने वहां धार्मिक झंडे उठाए और उसकी दीवारों पर चारकोल के साथ ‘राम-राम’ लिखा था.”

इस अवसर पर श्रीराम जन्म भूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण व संपर्क अभियान के पालक ब्रिगेडियर सुचेत सिंह, अभियान के प्रांत प्रमुख अभिषेक गुप्ता, महानगर संयोजक शक्ति दत्त और सनातन धर्म सभा के अध्यक्ष पुरुषोत्तम दधीचि भी उपस्थित रहे.

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January 14th 2021, 10:18 am

चार साल की राधिका ने गुल्लक की राशि श्रीराम मंदिर निर्माण को समर्पित की

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गाज़ियाबाद. चार साल की बालिका राधिका की भावनाएं अन्य लोगों को भी प्रेरित कर रही हैं. कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान टीवी पर रामायण देखी तो प्रभु श्रीराम की भक्त हो गई. वहीं, अब अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर निर्माण की बात सुनी तो राधिका ने अपनी गुल्लक तोड़कर दादी को पैसे देकर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के नाम चेक बनवाया. समर्पण का यह चेक राधिका ने श्रीराम मंदिर निधि समर्पण अभियान समिति को सौंप दिया है.

राधिका ऑनलाइन क्लास में अपने शिक्षकों और सहपाठियों से भी समर्पण कर प्रभु श्रीराम से जुड़ने का आग्रह कर रही है. राधिका बिश्नोई अपने माता-पिता गीता, अंकित और दादी ललिता बिश्नोई के साथ गाजियाबाद के गोविंदपुरम में रहती है. चार वर्षीय राधिका गुरुकुल द स्कूल में नर्सरी कक्षा की छात्रा है.

कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान राधिका ने परिवार के साथ रामायण देखी. इसी से प्रभु श्रीराम के बारे में बोध हुआ. राम मंदिर निर्माण कार्य शुभारंभ की खबर देखी तो उन्होंने अपनी दादी से अयोध्या के बारे में पूछा. दादी ने प्रभु श्रीराम के बारे में बताया. प्रधानमंत्री ने 05 अगस्त को अयोध्या में निर्माण कार्य का शुभारंभ किया था.

राधिका पिछले करीब आठ माह से गुल्लक में पैसा एकत्र कर रही थी. राधिका ने अपना गुल्लक तोड़ा तो उसमें से 2100 रुपये निकले. राम मंदिर के लिए सिर्फ चेक से योगदान देना था तो उन्होंने अपनी दादी से चेक बनवाया. अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के लिए संतों के मार्गदर्शन में श्रीराम मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान प्रारंभ हो रहा है. यह अभियाम माघ पूर्णिमा तक चलेगा.

राधिका का यह सहयोग लोगों में चर्चा का विषय बना हुआ है. राधिका दूसरों को भी जागरूक कर रही है. राधिका ने अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए समर्पण की बात शिक्षकों व सहपाठियों से की. साथ ही शिक्षकों व सहपाठियों से भी अपनी क्षमता के समर्पण करने का आग्रह किया. राधिका जिससे भी मिलती है, राम-राम कहती है. इसके बाद मंदिर के लिए सहयोग करने की अपील भी करती है.

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January 14th 2021, 8:48 am

निधि समर्पण अभियान – पूर्वी ओडिशा में 15 से 30 जनवरी तथा पश्चिम ओडिशा में 25 जनवरी से 10 फरवरी तक अभ

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भुवनेश्वर (विसंकें). अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के लिए निधि समर्पण अभियान 15 जनवरी से प्रारंभ होने वाला है. पूरे देश में यह अभियान 15 जनवरी से 27 फरवरी तक चलेगा. वहीं  पूर्वी ओडिशा में यह अभियान 15 जनवरी से प्रारंभ होकर 30 जनवरी तक चलेगा, जबकि पश्चिम ओडिशा में निधि समर्पण अभियान 25 जनवरी से 10 फरवरी तक चलेगा. पूरे देश के राम भक्त इसमें आगे आकर भव्य मंदिर निर्माण के लिए अपना समर्पण पावन कार्य के लिए प्रदान करें.

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निधि समर्पण समिति ओडिशा के सचिव गोपाल प्रसाद महापात्र ने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि मकर संक्रांति पर अभियान का शुभारंभ हो रहा है. ओडिशा के कुल 51 हजार गांव के लोगों के पास निधि समर्पण अभियान से जुड़े कार्यकर्ता पहुंचेंगे. इसके लिए समिति की ओर से व्यापक तैयारी की गई है. जिला, तहसील, पंचायत, यहां तक कि गांव तक में समितियों का गठन किया गया है.

पूर्वी ओडिशा में कार्यकर्ताओं के माध्यम से राज्य के कुल 30 जिलों में से 16 जिलों के 32 हजार गांवों में संपर्क किया जाएगा. इसी तरह पश्चिम ओडिशा के 14 जिलों में कार्यकर्ताओं द्वारा 19 हजार से अधिक गांवों में संपर्क करने की योजना बनाई गई है.

उन्होंने कहा कि ओडिशा में संपर्क अभियान के तहत 3 करोड़ से अधिक लोगों से संपर्क कर उनसे समर्पण निधि संग्रह किया जाएगा. समिति के कार्यकर्ता घर-घर संपर्क करने के साथ-साथ निधि संग्रह करेंगे. उन्होंने कहा कि इस भव्य अभियान के संचालन के लिए स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती, स्वामी असीमानंद सरस्वती, स्वामी प्रज्ञानंद, स्वामी शंकर आनंद गिरि, संत नित्यानंद दास, अविनाश बाबा, स्वामी जीवनमुक्त आनंदपुरी, स्वामी तेजोमयानंद, स्वामी संत गिरी जैसे प्रमुख संतों को लेकर एक मार्गदर्शक मंडल भी गठन किया गया है. निधि समर्पण समिति के अध्यक्ष के रूप में पूर्व कुलपति डॉ. प्रफुल्ल कुमार मिश्र,  विशिष्ट समाजसेवी मनसुखलाल सेठिया व हरिश्चंद्र परेड उपाध्यक्ष बनाए गए हैं.

उन्होंने कहा कि समिति समस्त समाज को श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए एक समर्पण देने का आह्वान करती है.

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January 14th 2021, 8:48 am

14 जनवरी / जन्मदिवस – दिव्यांग विश्वविद्यालय के निर्माता जगदगुरु स्वामी रामभद्राचार्य

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नई दिल्ली. किसी भी व्यक्ति के जीवन में नेत्रों का अत्यधिक महत्व है. नेत्रों के बिना उसका जीवन अधूरा है, पर नेत्र न होते हुए भी अपने जीवन को समाज सेवा का आदर्श बना देना सचमुच किसी दैवी प्रतिभा का ही काम है. जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य जी महाराज ऐसे ही व्यक्तित्व हैं. स्वामी जी का जन्म ग्राम शादी खुर्द (जौनपुर, उत्तर प्रदेश) में 14 जनवरी, 1950 को पं. राजदेव मिश्र एवं शचीदेवी के घर में हुआ था. जन्म के समय ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि यह बालक अति प्रतिभावान होगा, पर दो माह की अवस्था में इनके नेत्रों में रोहु रोग हो गया. नीम हकीम के इलाज से इनकी नेत्र ज्योति सदा के लिए चली गयी. पूरे घर में शोक छा गया, पर इन्होंने अपने मन में कभी निराशा के अंधकार को स्थान नहीं दिया.

चार वर्ष की अवस्था में ये कविता करने लगे. 15 दिन में गीता और श्रीरामचरित मानस तो सुनने से ही याद हो गये. इसके बाद सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से नव्य व्याकरणाचार्य, विद्या वारिधि (पीएचडी) व विद्या वाचस्पति (डीलिट) जैसी उपाधियां प्राप्त कीं. छात्र जीवन में पढ़े एवं सुने गये सैकड़ों ग्रन्थ उन्हें कण्ठस्थ हैं. हिन्दी, संस्कृत व अंग्रेजी सहित 14 भाषाओं के ज्ञाता हैं. अध्ययन के साथ-साथ मौलिक लेखन के क्षेत्र में भी स्वामी जी का काम अद्भुत है. इन्होंने 80 ग्रन्थों की रचना की है. इन ग्रन्थों में जहां उत्कृष्ट दर्शन और गहन अध्यात्मिक चिन्तन के दर्शन होते हैं, वहीं करगिल विजय पर लिखा नाटक ‘उत्साह’ इन्हें समकालीन जगत से जोड़ता है. सभी प्रमुख उपनिषदों का आपने भाष्य किया है. ‘प्रस्थानत्रयी’ के इनके द्वारा किये गये भाष्य का विमोचन अटल बिहारी वाजपेयी जी ने किया था.

बचपन से ही स्वामी जी को चौपाल पर बैठकर रामकथा सुनाने का शौक था. आगे चलकर वे भागवत, महाभारत आदि ग्रन्थों की भी व्याख्या करने लगे. जब समाजसेवा के लिए घर बाधा बनने लगा, तो इन्होंने वर्ष 1983 में घर ही नहीं, अपना नाम गिरिधर मिश्र भी छोड़ दिया. स्वामी जी ने अब चित्रकूट में डेरा लगाया और श्री रामभद्राचार्य के नाम से प्रसिद्ध हो गये. वर्ष 1987 में इन्होंने यहां तुलसी पीठ की स्थापना की. वर्ष 1998 के कुम्भ में स्वामी जी को जगद्गुरु तुलसी पीठाधीश्वर घोषित किया गया.

तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा के आग्रह पर स्वामी जी ने इंडोनेशिया में आयोजित अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन में भारतीय शिष्टमंडल का नेतृत्व किया. इसके बाद वे मॉरीशस, सिंगापुर, ब्रिटेन तथा अन्य अनेक देशों के प्रवास पर गये. स्वयं नेत्रहीन होने के कारण स्वामी जी को नेत्रहीनों एवं विकलांगों के कष्टों का पता है. इसलिए उन्होंने चित्रकूट में विश्व का पहला आवासीय दिव्यांग विश्विविद्यालय स्थापित किया. इसमें सभी प्रकार के दिव्यांग शिक्षा अर्जन करते हैं. इसके अतिरिक्त दिव्यांगों के लिए गौशाला व अन्न क्षेत्र भी है. राजकोट (गुजरात) में महाराज जी के प्रयास से सौ बिस्तरों का जयनाथ अस्पताल, बालमन्दिर, ब्लड बैंक आदि का संचालन हो रहा है. विनम्रता एवं ज्ञान की प्रतिमूर्ति स्वामी रामभद्राचार्य जी अपने जीवन दर्शन को निम्न पंक्तियों में व्यक्त करते हैं.

मानवता है मेरा मन्दिर, मैं हूँ उसका एक पुजारी
हैं विकलांग महेश्वर मेरे, मैं हूँ उनका एक पुजारी.

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January 14th 2021, 8:48 am

चैन्नई – पोंगळ (मकर संक्रांति) उत्सव पर आयोजित कार्यक्रम में आरएसएस सरसंघचालक जी का उद्बोधन

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माननीय क्षेत्र संघचालक जी, माननीय महानगर संघचालक जी, मंच पर उपस्थित सभी मान्यवर एवं नागरिक सज्जन, माता भगिनी.

मैं पहले तो आपका शुभचिंतन करता हूं. पोंगळ तिरुळावाळटिक्कळ, ऐसा कहते हैं न अपने यहां. यह पर्व पूरे भारत में संपन्न होता है. मेरे लिए आनंद की बात है कि आज, इससे पहले भी एक बार तिरुपुर में पोंगळ के दिन मैं उपस्थित था. आज सूर्य पोंगळ है, तिरुपुर में माट्टु पोंगळ था. तीन दिन पूरा पर्व यहां होता है, भारत में और कहीं तीन दिन नहीं होता. इस उत्सव का पूर्ण स्वरूप तमिलनाडु में हमें देखने को मिलता है. पहली बात है, नई फसल, नवान्न घर में आता है. समृद्धि का प्रतीक है तो लक्ष्मी की पूजा होती है. सूर्य की पूजा होती है क्योंकि सूर्य ऊर्जा बढ़ाता है, दिन बड़ा होने लगता है. सूर्य की तपस्या है. ऐसा कहते हैं सूर्य का एक रथ है, लेकिन रथ को एक ही पहिया है. घोड़े सात हैं, लगाम सातों की है. और रास्ता है नहीं, फिर भी रोज सूर्य इधर से उधर जाता हुआ दिखता है. ऐसी तपस्या करके पूरे विश्व को प्रकाश देने वाला सूर्य है. स्वाभाविक रूप से हम उसकी पूजा करते हैं. पूजा करना यानि जिसकी पूजा करते हैं, उसके जैसा होने का प्रयास करना. लक्ष्मी की पूजा करते हैं, लक्ष्मी शक्ति रूपा है तो शक्तिवान बनना है, तपवान बनना है. सूर्य का तप है. सूर्य के पास प्रकाश है, ज्ञान है. कर्म करने का उत्साह है. और कोई गौ पूजा करते हैं. अपने लिए काम करने वाले पशु, उनके प्रति भी हम कृतज्ञ हैं. हमारे लिए काम कौन करता है, सभी काम करते हैं. तो गौ एक प्रतीक है पूरे पर्यावरण का. पूरे पर्यावरण के लिए हम कृतज्ञता व्यक्त करते हैं, यह साल भर करना है, आज प्रतीक रूप में किया है. और आखिरी दिन काणुम पोंगळ. उसमें जाते हैं, सबको मिलते हैं, जो-जो अपने हैं उनको मिलना. तो अपने कौन हैं, अपने रिश्तेदार भी हैं. अपने लिए काम करने वाले अनेक लोग हैं. जो हमारे बाल काटता है, उससे भी मिलना. धोबी को हम कपड़े देते हैं, वो भी हमारे लिए काम करता है उससे भी मिलना.

हमारा कुटुंब, ब्लड रिलेशन ये एक बात है. जब हम परिवार कहते हैं तो परिसर में जो कुछ है, जो हमारा काम करते हैं, हमारे मित्रवर, हमारे जीवन को चलाते हैं सबको मिलना, सबको शुभचिंतन देना. और शर्करा पोंगळ खाना, वो मीठा है. सबके साथ मधुर संबंध होना चाहिए, मधुर भाषा होनी चाहिए. भाषा कटु होगी तो झगड़ा होगा, झगड़ा नहीं करना है. भाषा कटु हुई तो दूसरे को तकलीफ होती है. कुरल में कहा है – “तीयिनाल सुट्ट पुण उल्लारुम इरादे नाविनाल सुट्ट वडु”, तो ये जो तीन है, ती से घाव नहीं करना, ती से जलाना नहीं.

यह सब स्मरण करके इसको आगे अपने जीवन में चलाना. इसका संकल्प करना. पोंगळ आनंद का दिन है, पोंगळ संकल्प का भी दिन है. सूर्य जैसे तपश्चर्या करता है, वैसे सबके साथ स्नेह मधुर संबंध रखना, सबकी गलतियों को क्षमा करना. और अपने लोगों को साथ रखना, अपने लोगों को शुभचिंतन करके सारा कर्म करना, यह तपस्या सालभर करनी. ऐसा पूरा अर्थ पोंगळ का तमिलनाडु में आने पर अनुभव होता है, तीन दिन. बाकी जगह एक ही दिन में थोड़ा-थोड़ा करते हैं. अर्थ तो यही है सर्वत्र. परंतु उसके प्रत्यक्ष आचरण के लिए कुछ प्रतीक रूप कार्यक्रम तीनों दिन यहां पर होता हुआ मैंने देखा. बहुत संतोष हुआ, बहुत उत्साह मिला, बहुत प्रेरणा मिली. तिरुपुर में भी और यहां पर भी. आज पर्व त्यौहार का दिन है, तो कहीं न कहीं करना ही है. तो अपने बंधुओं ने कहा कि आप यहां चलिए, तो मैं आपसे मिलने के लिए आया. मुझे नये अपने लोग, हैं तो पुराने ही अपने, लेकिन प्रत्यक्ष दर्शन उनका हुआ. इसलिए आप सब लोगों का मैं धन्यवाद करता हूं. फिर एक बार ‌आपका शुभचिंतन करता हूं, और मेरे शब्दों को विराम देता हूं.

 

इससे पूर्व सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने मकर संक्रांति के अवसर पर चेन्नई महानगर के पेरंबूर भाग, कुमरन नगर, पोनियम्मन मेडु बस्ती के नवशक्ति काडमबाड़ी अमन मंदिर में गौ पूजन किया तथा मंदिर में पूजन कर आशीर्वाद ग्रहण किया.

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January 14th 2021, 3:44 am

दुनियाभर में मेड इन इंडिया वैक्सीन की मांग, अनेक देशों से भारत को मिला अनुरोध

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नई दिल्ली. वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण रही. पहले त्वरित निर्णयों से कोरोना को नियंत्रित करने में सफलता हासिल की और विश्व को राह दिखाई. उसके पश्चात विभिन्न देशों की सहायता के लिए हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन (HCQ) की आपूर्ति में सबसे आगे रहा. वहीं, अब भारत में कोरोना वायरस की दो वैक्सीन को इमरजेंसी उपयोग की अप्रूवल मिलने के पश्चात विश्व के विभिन्न देश वैक्सीन के लिए भारत से आस लगाए बैठे हैं. कई देशों से भारत को अनुरोध प्राप्त हो चुके हैं, कुछ देशों ने सीधे कंपनी से भी संपर्क किया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोहराया कि भारत मानवता को बचाने के लिए बड़ी भूमिका निभाने को तैयार है. प्रवासी भारतीय दिवस पर कहा था कि भारत पीपीई किट्स, मास्क, वेंटिलेटर और टेस्टिंग किट्स बाहर से मंगवा रहा था. पर अब देश आत्मनिर्भर है. आज भारत मेड इन इंडिया कोरोना वैक्सीन के साथ मानवता को बचाने के लिए तैयार है.

कोरोना वैक्सीन के बॉक्स पर सर्वे संतु निरामयाः उद्घोषित है, इसका अर्थ है सभी निरोगी हों…..और भारत अपनी इस भूमिका को निभाने के लिए तैयार है.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पड़ोसी देशों के अलावा अन्य देशों से भी वैक्सीन की डिमांड आ रही है. हाल ही में सीरम के CEO अदार पूनावाला और भारत बायोटेक के चेयरमैन व  MD डॉ. कृष्णा ऐल्ला ने संयुक्त बयान में कहा था कि दोनों कंपनियां भारत और दुनिया के अन्य देशों को जल्द से जल्द वैक्सीन उपलब्ध कराने की तैयारी कर रही हैं. अमेरिका और यूके सहित 12-14 देशों ने स्वदेशी (मेड इन इंडिया) वैक्सीन में रुचि दिखाई है. यह सभी देश सुरक्षित टेक्नोलॉजी चाहते हैं. लॉन्ग टर्म साइड-इफेक्ट्स नहीं चाहते. हम बांग्लादेश सरकार से भी बातचीत कर रहे हैं ताकि वहां क्लीनिकल ट्रायल्स शुरू किए जा सकें.

भारत ने वैक्सीन का उत्पादन बढ़ा दिया है. पाकिस्तान को छोड़कर सभी पड़ोसी देशों को भारत से वैक्सीन सप्लाई होगी. इसके साथ ही ब्राजील, मोरक्को, सऊदी अरब, म्यांमार, बांग्लादेश, दक्षिण अफ्रीका ने तो औपचारिक रूप से घोषणा भी कर दी है कि वे मेड इन इंडिया वैक्सीन का इस्तेमाल करने वाले हैं.

मेड इन इंडिया वैक्सीन की मांग…..पड़ोसी पहले की नीति

नेपाल – नेपाल ने 20% आबादी को वैक्सीनेट करने की योजना बनाई है. इसके लिए काठमांडू ने 12 मिलियन डोज मांगे हैं. विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली ने 14 जनवरी को अपनी प्रस्तावित यात्रा से पहले कहा कि वे भारत सरकार के साथ वैक्सीन सप्लाई पर डील कर सकते हैं.

भूटान – भूटान ने ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की कोवी-शील्ड वैक्सीन के 10 लाख डोज मांगे हैं. इस वैक्सीन को पुणे का सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया बना रहा है.

म्यांमार – म्यांमार ने सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के साथ पर्चेज कॉन्ट्रैक्ट किया है. आंग सान सु की ने नए वर्ष में देश के नाम संदेश में कहा था कि भारत से पहले बैच की वैक्सीन खरीदने के लिए पर्चेज कॉन्ट्रैक्ट किया जा चुका है. म्यांमार ने अपने देश के गरीब लोगों के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के कोवैक्स प्रोग्राम और ग्लोबल अलायंस फॉर वैक्सीन एंड इम्युनाइजेशन (GAVI) से भी मदद मांगी है.

बांग्लादेश – बांग्लादेश ने भी कोवी-शील्ड के 30 मिलियन डोज का अनुरोध किया है. नवंबर में बांग्लादेश के बेक्सिमको फार्मा ने सीरम से 30 मिलियन डोज खरीदने के लिए सहमति पत्र पर साइन किए थे. बांग्लादेश का ड्रग रेगुलेटर इस वैक्सीन को पहले ही अप्रूवल दे चुका है.

श्रीलंका – श्रीलंका ने भी वैक्सीन मांगी है और विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कोलंबो में राष्ट्रपति गोताबया राजपक्षे से बातचीत के दौरान भरोसा भी दिलाया है. इस बीच, श्रीलंका की कोशिश यूएन-समर्थित कोवैक्स फैसिलिटी से भी वैक्सीन हासिल करने की है.

मालदीव – नंबर अभी तय नहीं है, पर मालदीव भी वैक्सीन पर बातचीत कर रहा है.

अफगानिस्तान – भारत और अफगानिस्तान के विदेश मंत्रियों की बैठक में वैक्सीन का मसला उठा था. इसके बाद अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अतमार ने सोशल मीडिया पर कहा था कि हम वैक्सीन के लिए भारत की ओर देख रहे हैं.

ज्यादातर देश विश्व स्वास्थ्य संगठन के गावी (ग्लोबल अलायंस फॉर वैक्सीन एंड इम्युनाइजेशन)-कोवैक्स अलायंस के माध्यम से भारत में बनी वैक्सीन हासिल करेंगे. गावी के तहत दी जाने वाली वैक्सीन में भी भारत का अधिकांश योगदान होगा. इस बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन ने देशों से कहा है कि वे द्विपक्षीय वैक्सीन डील्स न करें. अगर किसी देश ने अपनी जरूरत से ज्यादा वैक्सीन सिक्योर कर ली है तो उसे कोवैक्स के तहत डोनेट करें.

ब्राजील – राष्ट्रपति जायर बोलसोनारो ने पत्र लिखकर 2 मिलियन कोवी-शील्ड वैक्सीन अर्जेंट बेसिस पर उपलब्ध कराने की अपील की है. ब्राजील में केस तेजी से बढ़ रहे हैं और इस वजह से वह जल्द से जल्द वैक्सीन चाहता है.

दक्षिण अफ्रीका – दक्षिण अफ्रीका के स्वास्थ्य मंत्रालय ने पिछले सप्ताह कहा था कि सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से उसे 1.5 मिलियन वैक्सीन मिलेंगी.

जापान – सरकार ने फाइजर-बायोएनटेक की वैक्सीन के 120 मिलियन डोज, ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन के 120 मिलियन, मॉडर्ना के 50 मिलियन और नोवावैक्स से 250 मिलियन डोज की डील की है.

दक्षिण कोरिया – सरकार ने फाइजर-बायोएनटेक और ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका से 20-20 मिलियन डोज की डील की है. कोवैक्स फैसिलिटी से उसे 10 मिलियन डोज मिलेंगी.

ऑस्ट्रेलिया – ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने 140 डोज की व्यवस्था की है. ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका से 53.8 मिलियन, नोवावैक्स से 51 मिलियन और फाइजर-बायोएनटेक से 10 मिलियन डोज की डील की है. कोवैक्स से उसे 25.5 मिलियन डोज मिलेंगी.

फिलीपींस – सरकार ने 50 मिलियन डोज की व्यवस्था की है. ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन के 2.6 मिलियन डोज का प्री-ऑर्डर किया है. फिलीपींस सरकार ने कहा है कि नोवावैक्स वैक्सीन की 30 मिलियन डोज के लिए उसकी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से बातचीत चल रही है. यह वैक्सीन जुलाई 2021 तक तैयार हो जाएगी.

इंडोनेशिया – इंडोनेशिया ने 338 मिलियन वैक्सीन डोज के ऑर्डर दिए हैं. इसमें चीनी कंपनियों सिनोवेक से 60 मिलियन, सिनोफार्म से 60 मिलियन और कैनसिनो बायोलॉजिक्स से 20 मिलियन डोज के ऑर्डर शामिल है. उसे ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका वैक्सीन के 100 मिलियन और नोवावैक्स की वैक्सीन के 30 मिलियन डोज मिलेंगे.

थाईलैंडः सरकार ने ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका वैक्सीन के 26 मिलियन डोज खरीदी हैं. यह जून तक मिलेंगी. अगले साल तक 66 मिलियन डोज खरीदने की योजना है. बाकी डोज अमेरिका, चीन, ब्रिटेन और रूस के मैन्युफैक्चर्स और कोवैक्स के जरिए जुटाई जाएंगी.

इनपुट – दैनिक भास्कर

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January 13th 2021, 3:21 pm

वैदिक, पौराणिक और अरण्य जगत सब एक ही हैं – डॉ. धर्मेन्‍द्र पारे

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भोपाल. जनजातीय संग्रहालय में दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान व आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, संस्‍कृति विभाग के संयुक्‍त तत्‍वाधान में ‘जनजातीय धार्मिक परंपरा और देवलोक’ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्‍ठी में कई शोध पत्र प्रस्‍तुत हुए. विद्वानों ने भारतीय आख्‍यान परंपरा, पौराणिक लोक और जनजाति आख्‍यान परंपरा और जनजा‍तीय समुदाय में धार्मिक अंतर्संबंधों पर प्रकाश डाला.

‘भारतीय आख्‍यान परंपरा-पौराणिक, लोक और जनजातीय आख्‍यान’ विषय पर चर्चा करते हुए डॉ. महेन्‍द्र मिश्र ने कहा कि पुराने समय में जिन लोगों ने अग्नि को स्‍वीकर नहीं किया, उन्हें असुर कहा गया. भारतीय सभ्‍यता के चार स्‍तंभ – मूलाचार, लोकाचार, देशाचार, शिष्‍टाचार हैं. शिष्‍टाचार सभी में है, चारों तत्‍व आपस में जुड़े हुए हैं. भारत के बाहर शोध करने जाएंगे तो भारतीय विखंडन को पाएंगे.

भारतीय जीवन धार्मिक परंपरा है, आध्यात्मिक परंपरा है. प्रकृति पूजा के मानवीकरण को विदेशी लोगों ने विखंडन के रूप में प्रचलित किया है. वास्तव में जनजातीय स्‍वरूप वैदिक स्‍वरूप है.

सांसद दुर्गादास उइके ने कहा कि जनजाति समाज का गौरवशाली इतिहास है. जनजाति समाज में देवी-देवताओं की सार्थकता है, जनजाति समाज प्रकृति पूजक है. हमारे पूर्वजों ने नदियों को मां माना है. जनजाति समाज शिव-पार्वती के ही वंशज हैं. इस कारण से पूजन करने की मान्‍यता है.

इतिहासकारों ने जो इतिहास लिखा है, उसमें विषयों की संवेदनशीलता में जाकर अन्‍तरमन को स्‍पर्श नहीं कर सके. इतिहास में गलतियां हुई हैं. रामायण में भी जनजाति समाज का गौरव है.

धनेश परस्‍ते ने कहा कि आदिम जनजाति प्रकृति पूजक है, सभी क्षेत्रों के अलग-अलग देवी-देवता हैं. इन क्षेत्रों के लोग अपनी-अपनी तरह से पूजा करते हैं. जनजातियों के आख्‍यान उनके दार्शनिक चिंतन होते हैं. जल, जंगल, जमीन जनजातियों के जीवन दर्शन कला का मूल है. आधुनिकता के प्रभाव से धीरे-धीरे जनजातियों की संस्‍कृतियां खत्‍म हो रही हैं.

‘भारत में जनजातीय धार्मिक अंतर्संबंध’ विषय पर लेखिका संध्‍या जैन ने कहा कि जनजाति और हिन्‍दुओं में कोई फर्क नहीं है, जनजाति को हिन्‍दू कहो या हिन्‍दू को जनजाति. जाति व गोत्र के प्रति हीन भावना नहीं होनी चाहिए. ऐसा होने पर जनजाति समाज को खतरा है.

जनजातीय, वैदिक तथा पौराणिक देवलोक विषय पर डॉ. धर्मेंद्र पारे ने कहा कि वैदिक, पौराणिक और अरण्य जगत सब एक ही है. जिस प्रकार ऋचाएं जो वेद की किसी ऋचा में अभिमंत्रित हैं, वही लोकगीतों के मनुहार में है. देव वही है, अनुष्ठान वही है, भावभूति, विचार और आकांक्षाएं समान हैं.

डॉ. श्रीराम परिहार जी ने कहा कि लोक और वेद में कोई विभेद नहीं है जो लोक में है, वही शास्त्र में है. दोनों के मूल में प्रकृति के पंचतत्व ही हैं, वही विभिन्न रूपों में पूजनीय है.

इस क्रम में जनजातीय नृत्‍य गीतों में अभिव्‍यक्‍त देवलोक पर डॉ. बसंत निर्गुणे और डॉ. मन्‍नालाल रावत के व्‍याख्‍यान हुए.

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January 13th 2021, 3:21 pm

कोरोना काल ने बदला जीवन के प्रति महिलाओं का दृष्टिकोण, सामाजिक सरोकार, परोपकार की भावना बढ़ी

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राष्ट्र सेविका समिति के तरुणी विभाग द्वारा किए सर्वेक्षण की रिपोर्ट का विमोचन

नई दिल्ली. कोरोना काल ने भारतीय महिलाओं को आर्थिक, सामाजिक, स्वास्थ्य, मनोवैज्ञानिक, पारिवारिक रिश्तों, जीवन शैली में बदलाव आदि कई प्रकार से प्रभावित किया. सबसे ज्यादा 74 फीसदी महिलाएं आर्थिक कारणों से प्रभावित हुईं. उन्हें तनाव और अवसाद हुआ तो कुछ महिलाओं का जीवन के प्रति दृष्टिकोण ही बदल गया. उनमें आत्म विश्वास पैदा हुआ, स्वावलंबन बढ़ा, सामाजिक सरोकार, परोपकार और मनुष्यता की भावना बढ़ी, प्रकृति पर्यावरण के प्रति चिंता बढ़ी, समाज से जुड़ाव बढ़ा और उन्होंने सीखा कि जितनी चादर हो उतने ही पैर पसारे जाएं. उन्होंने बचत करना भी सीखा. कोरोना के कठिन काल और विषम परिस्थितियों में भारतीय महिलाओं ने जिम्मेदारी से अपने परिवारों को संभाला और उनकी खुशियों का ध्यान रखा. घरेलू हिंसा के मामलों में धैर्य और सहनशक्ति से विकट समय निकाला. कुछ परिवारों ने केवल नमक चावल खा कर गुज़ारा किया.

राष्ट्र सेविका समिति के तरुणी विभाग द्वारा कोरोना लॉकडाउन के दौरान किये गए सर्वे के कुछ निष्कर्ष हैं. तरुणी विभाग ने देश की चारों दिशाओं में और समाज के हर वर्ग की स्थिति का सर्वेक्षण किया. 28 प्रांतों के, 567 जिलों में, 1200 टीनएजर्स लड़कियों ने लगभग 17000 हज़ार महिलाओं, युवतियों और किशोरियों से मुलाकात की. सर्वे की प्रश्नावली के अनुसार सवाल पूछे.

अखिल भारतीय तरुणी प्रमुख भाग्यश्री साठे ने बताया कि 25 जून से 4 जुलाई तक देश भर में व्यापक सर्वेक्षण किया गया और इस सर्वेक्षण के माध्यम से जो विश्लेषण तैयार हुआ है, वह पुस्तक के रूप में संकलित किया गया. मंगलवार को सर्वेक्षण पुस्तक का वर्चुअल विमोचन किया गया. इस अवसर पर राष्ट्र सेविका समिति की अखिल भारतीय सह कार्यवाहिका सीता गायत्री अन्नदानम ने कहा कि इस सर्वे ने देश के युवा वर्ग में समाज के लिए कुछ करने का भाव जागृत किया. उन्हें समाज के दुख दर्द को अनुभव करने का अवसर मिला. महिलाओं की शक्ति पहचानने का अवसर मिला.

युवतियों ने करोना समस्या को चुनौती की तरह लिया और इस सर्वेक्षण में उन्होंने यह बात खुलकर कही कि कोरोना हमारे लिए कोई समस्या नहीं थी. युवा वर्ग ने भी पैसा बचाने की पारपंरिक जीवन शैली के बारे में सीखा. मोटी सैलरी वाली नौकरी भी जा सकती है, ये उन्होंने पहली बार अनुभव किया और बचत की आदत डाली. कुछ और सकारात्मक बातें भी अनुभव की गईं, जैसे करोना काल के समय में पूरे परिवार के साथ रहने का मौका मिला है. लोग वापस अपनी संस्कृति से जुड़े हैं. लोगों ने योग, प्राणायाम कर व्यवस्थित दिनचर्या जीने का प्रयास किया.

तरुणियों की टोलियां शहरी, ग्रामीण, सेवा बस्तियों (झुग्गी, झोंपड़ी, बस्तियों) और वनवासी क्षेत्रों में गईं और उनसे सवाल पूछे. सर्वे से बहुत चौंकाने वाले तथ्य  भी सामने आए. सर्वे में आर्थिक रूप से अति पिछड़े वर्ग की युवतियां भी टीम का हिस्सा बनीं. और सर्वे करते करते उनकी धारणा ही बदल गयी. उन्होनें देखा कि लोग उनसे से भी अधिक विषम परिस्थितियों में जी रहे हैं. उन्होंने उन परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रशिक्षण दिया.

सर्वे में एक बात यह भी सामने आयी कि समाज का मध्यम वर्ग अब भी अपना सुख-दुख किसी के सामने नहीं कहना चाहता. कितनी भी आर्थिक मुश्किलें हों वो बाहर से खुश और सब कुछ सामान्य दिखाने की कोशिश करता है. जबकि निचला तबका अपने आर्थिक हालात पर खुल कर चर्चा करता है. महिलाओं को जहां राशन, दवाई, किराए, कपड़े लत्ते, बच्चों की फीस और परिवहन को लेकर समस्याओं का सामना करना पड़ा तो युवतियों को स्वास्थ्य और पढ़ाई को लेकर परेशानी झेलनी पड़ी. उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ा. अपने परिवारों में भी किसी से वे अपनी समस्याएं साझा नहीं कर पायीं. पढ़ाई चूंकि ऑनलाइन हो गयी थी, इसलिए सबके पास न तो स्मार्ट फोन थे, न लैपटॉप, न कंप्यूटर. यदि थे भी तो एक परिवार में अमूमन एक ही कंप्यूटर या स्मार्ट फोन था. शिक्षा को लेकर युवतियां बहुत तनाव में आ गयीं थीं. एक परिवार ने तो ऑनलाइन क्लास के लिए अपनी तीन बकरियां बेच कर स्मार्ट फोन खरीदा.

उच्च संपन्न वर्ग की महिलाओं को आर्थिक, परिवहन आदि की  परेशानी तो नहीं हुईं, लेकिन घर के कामकाज को लेकर लॉकडाउन में बहुत परेशानी हुई. क्योंकि काम वाली बाई नहीं आ रही थी. लेकिन फिर धीरे-धीरे उनकी मानसिकता बदलती गयी. उन्होंने सोचा जिम नहीं जाना तो घर के कामकाज को ही जिम समझ लो. कई महिलाओं ने बताया कि उनका वजन कम हुआ और घर को संभालने देखने का अवसर भी मिला. अनेक महिलाओं ने बताया कि उनके बच्चे लॉकडाउन में आत्मनिर्भर बने, अपना काम खुद करना सीखा, घर के काम में मदद करना, अपना कमरा साफ करना, अपने बर्तन खुद साफ करना आदि. एक मध्यम वर्गीय महिला ने तो ये भी बताया कि लॉकडाउन उनके लिए खुशियां ले कर आया. उनके पति ने शराब पीना बंद करके परिवार के साथ समय बिताना शुरू किया. अनेक महिलाओं ने नए कौशल सीखे जैसे मास्क बनाना, बागवानी करना आदि.

कोरोना काल के लॉकडाउन में किया गया ये सर्वेक्षण भारत के सभी प्रांतों में महिलाओं की समस्याओं और उनकी संकल्प शक्ति, विषम परिस्थियों से धैर्य और संयम के साथ निपटने की उनकी सूझबूझ का परिचय भी देता है. राष्ट्र सेविका समिति ने सर्वेक्षण की रिपोर्ट केंद्रीय महिला और बाल कल्याण मंत्री स्मृति ईरानी को सौंपी है.

 

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January 13th 2021, 3:21 pm

कांग्रेस और राम भक्ति….!!!!

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सौरभ कुमार

बड़ी मशहूर कहावत है कि ‘नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली’. लेकिन जब से देश की हवा बदली है, हिन्दू समाज जागृत हुआ है, तब से बिल्लियां हज की जगह राम मंदिर निर्माण के लिए निकल रही हैं. कभी कुर्ते के ऊपर से जनेऊ पहनते हैं तो कभी जूते पहने हुए मंदिर में पहुंच जाते हैं. जिस कांग्रेस को कभी ‘श्री राम’ साम्प्रदायिक लगते थे, अब उनके नाम की माला दिन रात जपी जा रही है.

ताजा मामला मध्यप्रदेश का है. बीते मंगलवार भोपाल में कुछ बड़े-बड़े पोस्टर देखने को मिले. जिनमें कांग्रेस खुद को भगवान् श्री राम की झंडाबरदार बता रही है. श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए मकर संक्रांति से निधि समर्पण अभियान प्रारंभ होने वाला है. देशभर में जनजागरण अभियान चल रहा है. मध्यप्रदेश में जब जनजागरण रैली पर पथराव हुआ तो कांग्रेस चिठ्ठी लेकर शिकायत करने पहुंच गयी थी. पत्थरबाजों की शिकायत नहीं..! पत्थरबाजों पर हुई कार्यवाही की शिकायत करने. खैर अब बात निकली है तो दूर तलक जाएगी. और फिर कांग्रेस के नेता साहिर लुधियानवी की पंक्तियाँ गुनगुनाएंगे –

कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया

बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया

जो कांग्रेसी कभी राम के अस्तित्व को मानने के लिए तैयार नहीं थे, वह आज चीख-चीख कर कह रहे हैं कि राम मंदिर का ताला तो सबसे पहले राजीव गांधी ने खुलवाया. दिग्विजय सिंह पहले भी चीख-चीख कर यही बातें दुहरा चुके हैं. मगर अफ़सोस कांग्रेस के झूठ का भांडा कांग्रेसी ही फोड़ देते हैं. अपनी किताब माई इयर्स विद राजीव गांधी ट्रिंफ एंड ट्रेजडी’ में राजीव गांधी के करीबी, जम्मू कश्मीर कैडर के पूर्व आईएएस रह चुके वजाहत हबीबुल्लाह ने लिखा है कि विवादित परिसर में ताला खुल रहा है, ये बात राजीव गांधी को तब पता चली जब आदेश पारित हो गया. किताब के मद्देनजर दिलचस्प बात ये है कि विवादित परिसर में ऐसा कुछ होने वाला है, इसके बारे में किसी ने भी न तो राजीव गांधी से कंसल्ट किया न ही किसी ने ऐसा कुछ होने की सूचना राजीव गांधी को दी. तो फिर अगर ताला राजीव गांधी ने खुलवाया कहने वाले कल ये भी दावा कर दें कि गांव में सुबह इसलिए होती है क्यूंकि उनका मुर्गा बांग देता है तो हैरानी नहीं होनी चाहिए.

पूर्व मंत्री पीसी शर्मा दरवाजे-दरवाजे जाकर कह रहे हैं कि चंदा लेने वालों के फेर में मत पड़िए. राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के खाते में सीधा पैसा जमा करें. मंत्री जी कह रहे हैं कि ऐसा नहीं किया तो धोखेबाजी हो जाएगी. अब गलती उनकी है नहीं, सावन के अंधे को सब हरा ही दिखता है. बात धोखेबाजी की हो रही है तो जरा इस पोस्टर को देखिये –

 

पोस्टर में लगी फोटो और उस फोटो का कैप्शन दिया है ….पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी 1989 में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण भूमिपूजन करते हुए.

वो बात अलग है कि तस्वीर किसी ‘भूमि पूजन’ की नहीं है. ये तस्वीर उस समय की है ​जब 1989 में, नई दिल्ली में पूर्व पीएम राजीव गांधी इस्कॉन के सोवियत सदस्यों से रूसी भाषा में भगवद्गीता की प्रति प्राप्त कर रहे थे. ये तस्वीर कई वेबसाइट्स के अलावा ‘Wikimedia Commons ‘ पर भी उपलब्ध है. यहां फोटो के विवरण में लिखा गया है – भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी सोवियत के हरे कृष्णा सदस्यों से भगवद्गीता की प्रति प्राप्त करते हुए जो कि रूसी भाषा में है. नई दिल्ली 1989.

इस फोटो का कॉपीराइट रूसी इस्कॉन के पास बताया गया है. खैर कांग्रेसियों का इतिहास बताता है कि रूस उनके लिए हमेशा से ‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव’ रहा है, तो हो सकता है कि चूक कर बैठे हों. लेकिन क्या वो भी चूक थी, जब कांग्रेस ने देश की संसद में कहा था कि राम काल्पनिक हैं?

कांग्रेस की सरकार एक समय रामसेतू को तोड़ने का प्रस्ताव संसद में ले कर आई थी. जब इस परियोजना का विरोध हुआ तो तत्कालीन संस्कृति मंत्री अंबिका सोनी ने राज्यसभा (14 अगस्त, 2007) में पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर देते हुए दावा किया कि रामसेतू के संबंध में कोई पुरातात्विक अध्ययन नहीं किया गया है.

यही नहीं सुप्रीम कोर्ट में भी सरकार ने हलफनामा दिया कि भगवान राम थे ही नहीं और रामसेतू जैसी कोई चीज़ नहीं है, यह एक कोरी कल्पना है. उस समय कांग्रेस नेता कपिल सिब्ब्ल केंद्र सरकार की ओर से वकील थे.

भगवान राम के प्रति भक्ति कैमरे के सामने है मन में नहीं. मन में भक्ति होती तो मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ राम का अपमान नहीं करते. पहुंचे तो थे भगवान राम का तिलक करने, लेकिन राम के सम्मान को धूल करते देर नहीं लगी. भगवान श्रीराम का तिलक करने के बाद हाथ उन्हीं की माला से पोंछ डाली, वरना कुर्ता गंदा हो जाता.

माला पर लगे दाग को रामभक्त एक बार गलती मान कर माफ भी कर दे… लेकिन कांग्रेस ने तो राम के चरित्र पर भी दाग लगाने के प्रयास किये हैं. याद कीजिये राज्यसभा में चर्चा हो रही थी तीन तलाक और हलाला की, लेकिन कांग्रेस हिन्दू देवी-देवताओं को इस चर्चा में ले आई. पार्टी के सांसद हुसैन दलवई ने कहा, ‘हमारे समाज में पुरुष वर्ग का महिलाओं पर वर्चस्व है. यहां तक कि श्रीरामचंद्र जी ने भी एक बार शक करते हुए अपनी पत्नी सीता जी को छोड़ दिया था.’

 

16 मई, 2016 को तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही थी. बहस सामान्य थी कि ट्रिपल तलाक और हलाला मुस्लिम महिलाओं के लिए कितना अमानवीय है, लेकिन सुनवाई के दौरान कांग्रेस नेता और AIMPLB के वकील कपिल सिब्बल ने तीन तलाक और हलाला की तुलना राम के अयोध्या में जन्म से कर डाली. कपिल सिब्बल ने दलील दी, जिस तरह से राम हिन्दुओं के लिए आस्था का सवाल है, उसी तरह तीन तलाक मुसलमानों की आस्था का मसला है. साफ है कि भगवान राम की तुलना, तीन तलाक और हलाला जैसी परंपराओं से करना कांग्रेस और उसके नेतृत्व की हिन्दुओं के प्रति उनकी सोच को ही दर्शाती है.

इसी कांग्रेस ने दशकों तक मंदिर निर्माण को लटकाए रखा और जब सर्वोच्च न्यायालय ने राम मंदिर की सुनवाई में तेजी लायी तो कपिल सिब्बल ने मामले को लटकाने का प्रयास किया था और कहा था कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे पर अब जुलाई 2019 के बाद सुनवाई हो.

एक समय इसी कांग्रेस का अखबार ‘नेशनल हेराल्ड’ भगवान् राम का अपमान करने वाली लेखिका के समर्थन में उतर आया था. Audrey Truschke नाम की महिला, जिसे संस्कृत का विद्वान बताया जा रहा है, उसने एक ट्वीट किया था, जिसमें उसने दावा किया कि वाल्मीकि रामायण में अग्निपरीक्षा के समय माता सीता ने भगवान राम को महिला से द्वेष करने वाला और असभ्य बताया था.

जब इस अधकचरे ज्ञान पर “संस्कृत के विद्वान” की सोशल मीडिया पर क्लास लगी तो कांग्रेसी अखबार की खबर का हैडलाइन था –

तो अब आपका निर्णय आप खुद कीजिये. सोशल मीडिया के इस दौर में देश की जनता अपने आराध्य प्रभु श्रीराम के अपमान के लिए उन्हें माफ करने वाली नहीं है…..

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January 13th 2021, 3:21 pm

एबीवीपी – प्रतिनिधिमंडल ने संसदीय स्थाई समिति अध्यक्ष के समक्ष रखे सुझाव

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नई दिल्ली. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रतिनिधिमंडल ने शिक्षा, महिला एवं बाल, युवा तथा खेल मामले पर संसदीय स्थाई समिति के अध्यक्ष विनय सहस्त्रबुद्धे को ज्ञापन सौपा. ज्ञापन के माध्यम से सामाजिक विज्ञान तथा मानविकी आदि विषयों के पाठ्यक्रमों में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बदलाव की नेतृत्वकर्ता महिलाओं के वर्णन, विभिन्न इतिहास कालखंडों के समुचित प्रतिनिधित्व के साथ समावेशन, भारत के सभी भौगोलिक क्षेत्रों के विषयों जैसे पूर्वोत्तर, दक्षिण भारत के राज्यों, जनजातीय क्षेत्रों को पाठ्यक्रमों में उचित स्थान देने की मांग की गई. ज्ञापन के माध्यम से विभिन्न सुझाव उनके समक्ष रखे.

साथ ही अभाविप ने संसदीय स्थाई समिति के अध्यक्ष को लॉकडाउन के पश्चात पुनः शिक्षण संस्थानों को खोलने संबंधी विभिन्न सुझाव दिए. इंटरमीडिएट तथा हाईस्कूल बैच के लिए परीक्षा कम से कम 2 माह पूर्व प्रत्यक्ष रूप से विद्यालय में कक्षाएं संचालित करने, ऑफलाइन पढ़ाने वाले शिक्षकों का प्रारंभिक चरण में ही कोविड वैक्सीनेशन, शिक्षकों तथा विद्यार्थियों को तकनीकी रूप से सक्षम करने हेतु डिजिटल माध्यमों का शिक्षण देने, प्रयोगशालाएं तथा पुस्तकालयों को खोलने एवं ऑनलाइन माध्यम से शिक्षण को आसान बनाने हेतु उपलब्ध विकल्पों पर काम करते हुए शीघ्र क्रियान्वयन जैसे आदि सुझाव दिए.

अभाविप की राष्ट्रीय महामंत्री निधि त्रिपाठी ने कहा, “कई विश्वविद्यालयों तथा विभिन्न बोर्डों के मानविकी विषयों के पाठ्यक्रमों में विसंगतियां लगातार देखने को मिल रही हैं. अभाविप की स्थानीय इकाइयों ने पाठ्यक्रमों की विसंगतियों को दूर करने के लिए स्थानीय स्तर पर प्रयास भी किए हैं. हमने आज संसदीय स्थाई समिति से मानविकी तथा समाज विज्ञान आदि विषयों के पाठ्यक्रमों में व्यापक सुधार की मांग को रखा है, पाठ्यक्रमों में व्यापक संशोधन की हमारी लंबे समय से मांग रही है. हमने समिति के अध्यक्ष को लॉकडाउन के उपरांत शिक्षण संस्थानों को धीरे-धीरे खोले जाने की मांग रखी है, जिससे महीनों से बंद पड़ी ऑफलाइन शिक्षा व्यवस्था शुरू की जा सके. हम आशा करते हैं कि हमारी मांगों तथा सुझावों पर सरकार शीघ्र कार्यवाही करेगी.”

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January 13th 2021, 10:21 am

अयोध्या में राम मंदिर सच्चे अर्थों में राष्ट्र मंदिर होगा

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पुणे (विसंकें). विश्व हिन्दू परिषद के महामंत्री मिलिंद परांडे ने कहा कि भगवान श्रीराम लाखों लोगों की आकांक्षाओं, विश्वास और आदर्शों के प्रतीक हैं. इसलिए उनका मंदिर पूरे समाज का होना चाहिए, यह किसी एक व्यक्ति का नहीं होना चाहिए. इसीलिए इस मंदिर को आम जनता के योगदान से बनाने का निर्णय लिया गया है. यह राम मंदिर नहीं, बल्कि राष्ट्र मंदिर होगा.

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर बनने वाले भव्य मंदिर के लिए निधि समर्पण अभियान 15 जनवरी से शुरू होगा. इस उपलक्ष्य में पुणे में कुछ संपादकों और पत्रकारों के साथ मिलिंद परांडे से अनौपचारिक बातचीत का कार्यक्रम आयोजित किया गया था. विश्व संवाद केंद्र के अध्यक्ष मनोहर कुलकर्णी, कार्यवाह रवींद्र घाटपांडे और निधि संग्रहण अभियान के प्रांत प्रमुख मिलिंद देशपांडे उपस्थित थे.

उन्होंने कहा, “यह निधि समर्पण अभियान देश के इतिहास में अभूतपूर्व स्तर का अराजनीतिक अभियान होगा. देश के 6 लाख गांवों में से 5 लाख गांवों तक पहुंचना इस अभियान का लक्ष्य है और 35 से 40 लाख कार्यकर्ता पूरे देश में इसके अंतर्गत यात्रा करेंगे. इसके माध्यम से करोड़ों परिवारों तक पहुंचेंगे और अभी से ही जनता का उत्स्फूर्त प्रतिसाद मिल रहा है.”

उन्होंने कहा कि बाबर द्वारा श्रीराम मंदिर को ध्वस्त किए जाने के बाद हिन्दू समाज ने लगातार इसके पुनर्निर्माण के लिए लड़ाई जारी रखी. इस संघर्ष की निरंतरता कभी नष्ट नहीं हुई. श्रीराम न केवल भक्ति के प्रतीक हैं, बल्कि सांस्कृतिक-सामाजिक आदर्शों के भी प्रतीक हैं. इसलिए यह केवल एक संप्रदाय या पंथ का मंदिर नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए एक सचेत प्रयास किया गया है कि हर कोई इसमें योगदान दे. इसलिए विश्व हिन्दू परिषद ने न्यास से अनुरोध किया कि चूंकि लाखों हिन्दुओं की आस्था श्रीराम से जुड़ी हुई है, इसलिए पूरे समाज को इसमें शामिल होना चाहिए. यह श्रीराम किसी के देवता होने की बात नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक प्रतीक होगा. यह सिर्फ राम मंदिर नहीं बल्कि राष्ट्र मंदिर होगा क्योंकि हमारे पास राष्ट्र की अवधारणा भू-राजनीतिक नहीं, बल्कि भू-सांस्कृतिक है. इसके कारण, सभी संप्रदाय और धर्म इस कार्य में शामिल रहे हैं.

उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रीराम के जन्मस्थान पर मंदिर का कुल क्षेत्रफल 70 एकड़ होगा और यह तय किया गया है कि इस निर्माण के लिए सरकार से कोई पैसा नहीं लिया जाएगा. उन्होंने विभिन्न शंकाओं का स्पष्ट रूप से समाधान भी किया.

विश्व संवाद केंद्र के अध्यक्ष मनोहर कुलकर्णी ने अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में कहा, “वर्तमान समय संक्रमण का समय है. कोरोना महामारी के बाद कुछ सकारात्मक बदलाव हो रहे हैं और कोरोना पर एक टीका भी विकसित किया गया है. श्रीराम मंदिर का निर्माण उसी सकारात्मक घटनाओं की एक कड़ी है.”

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January 13th 2021, 10:21 am

भारत केंद्रित शिक्षा से ही भारत का भाग्योदय संभव – शिवप्रसाद

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चित्तौड़. विद्या भारती राजस्थान क्षेत्र के संगठन मंत्री शिवप्रसाद ने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत की शिक्षा का केंद्र पश्चिम ही रहा क्योंकि अंग्रेजों ने भारतीयों के मस्तिष्क में इस बात को गहराई तक बैठा दिया कि जो कुछ अच्छा है और श्रेष्ठ है, वह पश्चिम में ही है. भारत तो सदैव से ही अनपढ़ लोगों का देश रहा. वे विद्या भारती चित्तौड़ प्रांत की वेबसाइट और ई-पत्रिका के लोकार्पण कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश, स्वतंत्रता के पश्चात प्रारंभिक नेतृत्वकर्ताओं ने भी अंग्रेजों के पढ़ाए गए इस पाठ को अक्षरश: स्वीकार कर लिया. यही कारण रहा कि स्वतंत्रता के बाद से अब तक भारत की शिक्षा पश्चिम की नकल पर ही आधारित रही. जबकि भारत सदियों से संपूर्ण विश्व के लिए शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा. नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय इसके महत्वपूर्ण प्रमाण हैं. शिक्षा नीति 2020 एक बार फिर भारत केंद्रित शिक्षा की बात करती है जो एक स्वागत योग्य कदम है क्योंकि भारत केंद्रित शिक्षा से ही भारत का भाग्योदय संभव है.

उन्होंने कहा कि विद्या भारती अपने जन्म से अब तक भारत केंद्रित संस्कार युक्त शिक्षा के लिए ही प्रयत्नशील है. शिक्षा नीति-2020 के कई प्रावधान जैसे मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा, शिशु केंद्रित शिक्षा, कौशल विकास आदि सभी विषयों पर विद्या भारती शिक्षण संस्थान द्वारा संचालित सभी विद्यालयों में पहले से ही प्रयत्न किए जाते रहे हैं.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि दैनिक भास्कर अजमेर के संपादक रमेश अग्रवाल ने कहा कि शिक्षक और पत्रकार की भूमिका एक जैसी ही है, जहां एक शिक्षक अपनी कक्षा के बालकों का प्रबोधन करता है. वहीं पत्रकार का भी दायित्व है कि वह संपूर्ण समाज का प्रबोधन करे. लेकिन शिक्षक और पत्रकार तभी प्रभावी हो सकते हैं, जब उनके पास स्वयं का नैतिक और चारित्रिक बल हो. चरित्र बल के अभाव में न ही कोई शिक्षक सफल हो सकता है और ना ही कोई पत्रकार. अतः जो सुधार एक शिक्षक अपने विद्यार्थी और एक पत्रकार अपने समाज में चाहता है. यह आवश्यक है कि पहले वे सभी बातें स्वयं शिक्षक और पत्रकार के जीवन में समाज अनुभव करे, तभी यह सभी अच्छाइयां समाज में स्थापित हो पाएंगी.

जयदेव पाठक स्मृति सम्मान के बारे में विद्या भारती चित्तौड़ प्रांत के सचिव किशन गोपाल कुमावत ने बताया कि श्रद्धेय जयदेव पाठक राजस्थान में विद्या भारती के संस्थापक लोगों में से एक थे. उनका सरल, त्यागपूर्ण और शिक्षा के लिए समर्पित जीवन प्रत्येक शिक्षक के लिए अनुकरणीय है. इसी प्रेरणा के लिए प्रतिवर्ष विद्या भारती की योजना से तीन श्रेष्ठ आचार्य और तीन प्रधानाचार्य इस पुरस्कार के लिए चयनित किए जाते हैं.

इस वर्ष यह पुरस्कार आचार्यों में गणेश लाल लोहार झाडोल उदयपुर, जीवराज तेली बेगू चित्तौड़, पंकज बैरागी पिडावा झालावाड़ को तथा प्रधानाचार्य में सुरेश चंद्र पालोदा बांसवाड़ा, अविनाश कुमार शास्त्री नगर भीलवाड़ा तथा भूपेंद्र उबाना पुष्कर मार्ग अजमेर को दिया गया है.

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January 13th 2021, 10:21 am

प्रत्येक जाति, वर्ग और प्रांत के लोगों के सहयोग से राम मंदिर बनेगा राष्ट्र मंदिर

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जयपुर. देश और दुनिया में चल रहे श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण अभियान के अंतर्गत जयपुर महानगर के मानसरोवर में कार्यालय का उद्घाटन करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य दुर्गादास ने कहा कि राम मंदिर निर्माण के लिए यह निधि समर्पण अभियान विश्वव्यापी है. इस अभियान के अंतर्गत प्रत्येक जाति, वर्ग और प्रांत के 12 करोड़ से अधिक परिवारों के लगभग 65 करोड़ लोगों तक व्यापक जनसंपर्क किया जाएगा. प्रत्येक गांव, नगर और प्रांत से मंदिर निर्माण के लिए सहयोग प्राप्त कर यह राम मंदिर राष्ट्र मंदिर का रूप लेगा. इस भव्य परिसर में संग्रहालय, सत्संग सभागार, लंगर हाल, शोध केंद्र, कन्वेन्शन सेंटर, यज्ञशाला सहित अनेकों प्रमुख आकर्षण होंगे.

मानसरोवर के अग्रसेन भवन में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण समिति के कार्यालय उद्घाटन समारोह में सैकड़ों लोग उपस्थित थे, जिसमें मौके पर ही 20 महानुभावों ने 30 लाख रुपए का सहयोग करने की घोषणा की. समारोह में मुख्य अतिथि के रुप में हाथोज धाम के श्री बालमुकुंदाचार्य उपस्थित थे. उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों द्वारा किए गए 492 वर्षो के लंबे संघर्ष और प्रयासों के पश्चात आज वर्तमान पीढ़ी का सौभाग्य है कि हमको यह शुभ समय देखने को मिल रहा है. कार्यक्रम में श्री अवधेशाचार्य एवं श्री राजेश्वरानंद सहित अन्य संतगण भी उपस्थित रहे.

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January 13th 2021, 10:21 am

ग्राम सभा के पास हो लघु वन उपज का स्वामित्व – वनवासी कल्याण परिषद्

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भोपाल (विसंकें). वनवासी कल्याण परिषद मध्यप्रदेश ने लघु वनोपज के उत्पाद उपार्जन संबंधित वर्तमान नीति में आवश्यक संशोधन के संबंध में आयोजित की गई बैठक में अपनी तरफ से 9 बिंदु प्रस्तुत किये हैं.

परिषद् द्वारा पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अपर मुख्य सचिव को एक पत्र के माध्यम से बिंदु भेजे गए. जिनमें मुख्य रुप से फलिया /टोला/ पाड़ा या बस्ती को ग्राम सभा गठित करने हेतु एक निश्चित प्रक्रिया तय करने की बात कही गई है. जिसमें उस गांव के मतदाताओं से प्रस्ताव लिया जाए व कलेक्टर द्वारा प्राधिकृत अधिकारी द्वारा विमर्श बैठक ली जाए और गांव की घोषणा राजपत्र में की जाए. MPPRGSA अधिनियम की धारा 129 -B में इसका प्रावधान है और मध्यप्रदेश अनुसूचित क्षेत्र ग्रामसभा नियम 1988 के नियम 4(2) व 4(3) में भी यह बात कही गई है, लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ. अतः जनजाति विभाग हर फलिया तक यह जानकारी पहुंचाने हेतु प्रचार मुहिम चलाए और राजस्व विभाग निश्चित समय सीमा में गांव घोषित करने की प्रक्रिया पूरी करे. महाराष्ट्र के पेसा नियम अवश्य देखें, जिसमें ग्राम वासियों से प्रस्ताव आने के बाद 4 महीने के भीतर राजस्व विभाग को कार्रवाई करनी होती है, अन्यथा गांव स्वयं घोषित माने जाते हैं.

दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु बताते हुए वनवासी कल्याण परिषद द्वारा कहा गया कि सारे लघु वन उपज का स्वामित्व अधिकार ग्राम सभा के पास होना चाहिए. पेसा के साथ वन अधिकार कानून में भी यह अधिकार दिया है और वन अधिकार कानून धारा 2 (i)  में लघु वनोपज की व्याख्या पूरे देश में मान्य है. इसमें तेंदू व बांस भी शामिल है, अतः मध्यप्रदेश तेंदूपत्ता व्यापार विनिमय अधिनियम 1964, मध्यप्रदेश वन उपज व्यापार विनियमन अधिनियम 1969, दोनों कानूनों में बदलाव कर इनके दायरे से पूरे अनुसूचित क्षेत्र तथा सामुदायिक वन अधिकार प्राप्त अन्य क्षेत्र को मुक्त करना होगा.

वनवासी कल्याण परिषद् ने सुझाव दिया कि लघु वनोपज सहकारी सोसायटी व महासंघ आदि जो पुरानी रचनाएं हैं, इनको विसर्जित कर ग्राम सभा तथा वनाधिकार धारकों के सहकारी संघ बनाकर लघु वनोपज का व्यापार तथा परिवहन की रचना बनानी होगी. पुरानी रचना में जिन्हें संग्राहक माना है उन्हें पेसा और वनाधिकार कानून में मालिक माना गया है.

वनवासी कल्याण परिषद मध्यप्रदेश के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य व जनजाति मंत्रणा परिषद के सदस्य कालू सिंह मुजाल्दा ने पत्र के माध्यम से अपर मुख्य सचिव से अनुरोध किया कि इन सभी बिंदुओं पर विचार करते हुए निर्धारित समयावधि में पेसा कानून के नियम बनाना आवश्यक है एवं जनजाति समाज के सरल भाषा में अनुवाद करते हुए सभी पंचायतों में जनजागरण हो. वनवासी कल्याण परिषद् ने वनवासियों के अधिकारों की रक्षा एवं सरकार द्वारा लागू योजनाओं का सीधा लाभ उन तक पहुंचाने के लिए अन्य सुझाव भी दिए.

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January 13th 2021, 10:21 am

देश, धर्म और समाज के लिए त्याग करने वाले मनीषियों का सम्मान होता है – हनुमान सिंह

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चित्तौड़. समाजसेवी, चिंतक, विचारक व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राजस्थान क्षेत्र के क्षेत्र कार्यवाह हनुमान सिंह ने कहा कि हमारे देश में उनका स्थान सर्वोच्च है जो देश, धर्म और समाज के लिए त्याग करता है. ऐसे मनीषियों का हर जगह सम्मान होता है. वे मंगलवार को उदयपुर में अलका होटल में आयोजित श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र निधि समर्पण समिति की गोष्ठी में संबोधित कर रहे थे.

उदयपुर के प्रमुख उद्योगपतियों, व्यवसायियों, समाज के प्रबुद्धजनों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि कोरोना काल में भी हमारे देश में सेवा का जो भाव दृष्टिगोचर हुआ, यह हमारी सनातन संस्कृति के संस्कारों में समाहित त्याग की भावना का परिचायक है. जो व्यक्ति समाज के प्रत्येग वर्ग के लिए सेवा और त्याग की भावना रखता है, समाज उसका हर जगह सम्मान करता है.

उन्होंने अयोध्या में बन रहे भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर को राष्ट्रीय स्वाभिमान की पुनर्स्थापना का प्रतीक बताते हुए कहा कि रामलला की जन्मभूमि के लिए 492 साल के संघर्ष में न जाने कितने ही रामभक्तों ने अपनी आहुति दी. रामभक्तों ने भगवान श्रीराम के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया. उनके इस बलिदान को आज नमन करने का अवसर मंदिर निर्माण के रूप में प्राप्त हुआ है. राम इस देश के हर व्यक्ति के मन में विराजमान हैं, ऐसे में हर व्यक्ति अपनी श्रद्धा का प्रकटीकरण किसी न किसी रूप में कर सके, सभी की इच्छा है. इसी भावना से संकल्पित होकर 15 जनवरी से श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र निधि समर्पण समिति की ओर से घर-घर समर्पण भाव जागरण व श्रद्धानुसार समर्पण को ग्रहण करने का अभियान शुरू किया जा रहा है. उन्होंने आह्वान किया कि हर व्यक्ति अपनी श्रद्धानुसार अधिक से अधिक समर्पण करे.

गोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उदयपुर महानगर संघचालक गोविन्द अग्रवाल ने कहा कि अब तक उदयपुर के प्रमुख लोगों ने भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण के लिए बढ़-चढ़ कर राशि समर्पण का संकल्प लिया है. अब तक समर्पण की यह राशि 12 करोड़ रुपये हो चुकी है. गोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक प्रमुख श्रीवर्धन, विभाग संघचालक हेमेन्द्र श्रीमाली आदि ने भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण में अधिक से अधिक सहयोग का आह्वान किया. मंच का संचालन वीरेन्द्र डांगी ने किया.

उल्लेखनीय है कि 15 जनवरी को संत-महंतों के आशीर्वाद से यह अभियान शुरू होगा. 30 जनवरी तक चलने वाले पहले चरण में प्रभात फेरियां, कलश यात्रा, वाहन रैली, मंदिर-स्थानों पर हनुमान चालीसा के पाठ आदि आयोजन होंगे. साथ ही निधि समर्पण की अलख जगाने घर-घर पत्रक वितरित किए जाएंगे. अभियान का दूसरा चरण 31 जनवरी से 15 फरवरी तक चलेगा, जिसमें रामभक्त घर-घर 10 रुपये, 100 रुपये व 1000 रुपये के कूपन लेकर पहुंचेंगे. जिस परिवार की जैसी श्रद्धा होगी, वे वैसा समर्पण सहयोग कर सकेंगे. दो हजार से अधिक की राशि पर 80-जी की छूट रहेगी.

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January 13th 2021, 10:21 am

पुलिस की चार्जशीट में दावा – दिल्ली दंगों में ISI-खालिस्तानियों की भी भूमिका थी

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नई दिल्ली. पिछले साल फरवरी में दिल्ली में हुए दंगों में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और अलगाववादी खालिस्तानियों का भी कनेक्शन था. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल इस कनेक्शन की जांच कर रही है. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गहन जांच और छापामारी के बाद जून, 2020 में कुछ खालिस्तानियों को गिरफ्तार किया था. जिनमें से एक का नाम लवप्रीत है, दिल्ली पुलिस इन मामलों को लेकर विस्तृत चार्जशीट तैयार कर रही है.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार चार्जशीट के डिस्क्लोजर स्टेटमेंट में आरोपियों ने अपने बयान में खुलासा किया है कि दिल्ली दंगों में खालिस्तानियों और ISI एजेंटों की भी भूमिका थी. आईएसआई एजेंट और खालिस्तान समर्थक दिल्ली दंगों से पहले सीएए के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों में भी लगातार सक्रिय रहे थे. आईएसआई के इशारे पर कुछ खालिस्तानी समर्थक पंजाब से दिल्ली आए थे और शाहीनबाग आन्दोलन में सक्रिय रहे थे.

शाहीनबाग में सक्रिय रहे खालिस्तान समर्थक लवप्रीत सिंह को खुफिया एजेंसियों और स्पेशल सेल ने एक बड़े ऑपरेशन के बाद जून में उस वक्त गिरफ्तार किया था, जब लवप्रीत टारगेट किलिंग को अंजाम देकर पाकिस्तान में आतंकी ट्रेनिंग लेने जा रहा था. लवप्रीत और बगीचा सिंह, पंजाब से आए कई लोगों के साथ शाहीनबाग मे रुके थे, इसके अलावा कुछ खालिस्तानी समर्थक दिल्ली के चांद बाग भी गए थे और भड़काने वाले भाषण दिए थे.

दिल्ली दंगों में साजिश की जांच कर रही स्पेशल सेल के सामने, चांद बाग दंगों में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार अतहर खान और शादाब ने 25 अगस्त, 2020 के दिन खुलासा किया था कि ”चांद बाग प्रोटेस्ट साइट शुरू करने वालों में से एक डॉक्टर रिजवान सिद्दकी शाहीनबाग साइट पर आता जाता रहता था. 10-11 फरवरी के आस-पास जब रिजवान सिद्दकी शाहीनबाग से वापस आया, तो उसने हम लोगों को बताया कि शाहीनबाग पर उसकी मुलाकात खालिस्तान समर्थक बगीचा सिंह और लवप्रीत सिंह हुई है जो भारत के खिलाफ अपने मिशन के लिए काम कर रहे हैं और उन्होंने कहा कि उन लोगों को पाकिस्तान की ISI का सपोर्ट है और वहां से मैसेज आया है कि खालिस्तान समर्थकों को भी CAA के विरोध में साथ देना चाहिए और भारत सरकार के खिलाफ लड़ाई में हर तरीके से मदद करनी चाहिए.”

डॉ. रिजवान ने यह भी बताया, ”इन लोगों ने दंगों के लिए हमारी हर तरीके से मदद करने का वादा किया है और ये भी कहा था कि हमारी Protest site पर भी अपने आदमी भेजेंगे. इसके तकरीबन 8/10 दिन बाद सरदार जबरजंग सिंह चांद बाग आए थे और जबरजंग सिंह ने मंच से भारत सरकार के खिलाफ भाषण भी दिया था.”

इनपुट – आजतक

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January 12th 2021, 1:00 pm

आखिर इस्लाम के कट्टर स्वरूप से विश्व कैसे निपटे..?

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बलबीर पुंज

फ्रांस पुन: सुर्खियों में है. इस बार कारण उसका वह प्रस्तावित अलगाववाद विरोधी विधेयक है, जो आगामी दिनों में कानून का रूप लेगा. इस विधेयक का प्रत्यक्ष-परोक्ष उद्देश्य इस्लामी कट्टरता से अपने सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को सुरक्षित रखना है. फ्रांस का मानना है कि जिहादियों ने मजहब के नाम पर जैसी हिंसा की है – उससे फ्रांसीसी एकता, अखंडता और उसके सदियों पुराने जीवनमूल्यों पर गंभीर खतरा हो गया है. फ्रांस के इन निर्णयों से तिलमिलाए कई इस्लामी देशों ने “फ्रांसीसी वस्तुओं के बहिष्कार” संबंधी आंदोलन को तेज कर दिया है.

प्रस्तावित कानून के माध्यम से मस्जिदों को केवल पूजास्थल के रूप में पंजीकृत किया जाएगा. इस समय फ्रांस में 2,600 छोटी-बड़ी मस्जिदें है, इनमें से अधिकांश में मदरसों का संचालन होता है. ऐसा माना जाता है कि बहुत से मदरसे ही फसाद की असल जड़ हैं, जहां नौनिहालों में बचपन से ही विषाक्त अलगाववादी बीज बो दिए जाते हैं. इमामों को सरकारी देखरेख में प्रशिक्षण दिया जाएगा. किसी भी न्यायाधीश को आतंकवाद, घृणा या हिंसा के दोषी को मस्जिद जाने से रोकने का भी अधिकार होगा. बहुपत्नी विवाह (लव-जिहाद सहित) को भी काबू किया जाएगा. पेरिस-नीस आतंकवादी घटना के बाद से फ्रांस 75 प्रतिबंध लगा जा चुका है, तो 76 मस्जिदों के खिलाफ अलगाववाद भड़काने की जांच कर रहा है.

इस कानून का सीधा प्रभाव फ्रांस की कुल आबादी, 6.5 करोड़, के 8-9 प्रतिशत, अर्थात्- 55-60 लाख मुसलमानों पर पड़ेगा. इस देश में बसे अधिकांश मुसलमान अप्रवासी मूल के हैं, जिनका संबंध गृहयुद्ध से जूझते या युद्धग्रस्त मध्यपूर्वी इस्लामी देशों से है. इस परंपरा की शुरूआत 1960-70 के दशक में अल्जीरिया आदि अफ्रीकी देशों से हुई थी.

हाल के वर्षों में “असुरक्षा” की भावना से त्रस्त होकर अधिकांश मुस्लिम “सुरक्षित” ठिकाने की तलाश में किसी घोषित इस्लामी राष्ट्रों के बजाय गैर-मुस्लिम/इस्लामी देशों का रूख करते हैं. म्यांमार, जहां का सत्ता-अधिष्ठान बौद्ध परंपराओं से प्रभावित है – उसे “असुरक्षित” बताकर बड़ी संख्या में रोहिंग्या अवैध रूप से भारत में न केवल प्रवेश कर चुके हैं, अपितु उन्हें बांग्लादेशी घुसपैठियों की भांति देश के विभिन्न स्थानों पर बसा भी दिया गया है. यह स्थिति तब है – जब “काफिर” भारत के पश्चिम में घोषित इस्लामी राष्ट्र- पाकिस्तान, अफगानिस्तान और मध्यपूर्व है.

विश्वभर (भारत सहित) के स्वघोषित उदारवादी, सेकुलरिस्ट और वामपंथी- लाखों रोहिंग्या मुसलमानों के विस्थापन के लिए म्यांमार सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराते हैं. नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित और म्यांमार की स्टेट काउंसलर आंग सांग सूकी संयुक्त राष्ट्र की शीर्ष अदालत में रोहिंग्याओं के खिलाफ हुए सैन्य अभियान का बचाव कर चुकी हैं. उनके अनुसार, 2017 में सैकड़ों आतंकवादी हमले के बाद म्यांमार सेना कार्रवाई को विवश हुई थी. भारत में रोहिंग्या पैरोकारों को सोचना चाहिए कि म्यांमार जैसा देश, जो भगवान गौतमबुद्ध के शांति संदेश और सिद्धांतों में विश्वास करता है – वह रोहिंग्याओं के खिलाफ सख्त कदम उठाने को आखिर क्यों मजबूर हुआ?

रोहिंग्या मुस्लिमों ने जिन मुस्लिम देशों में शरण ली है – वहां उनकी स्थिति कैसी है? इसका उत्तर बांग्लादेश में मिल जाता है. तीन वर्ष पहले यहां लगभग 10 लाख रोहिंग्या मुसलमान शरण लेने पहुंचे थे, जिन्हें पहले कॉक्स बाजार के शरणार्थी शिविरों में अमानवीय रूप से बसाया गया, फिर इस वर्ष उन्हें जबरन बंगाल की खाड़ी स्थित “भाषन चार द्वीप” पर बनाए गए अस्थायी आवासों में भेज दिया गया. यह निर्जन द्वीप काफी खतरनाक है, क्योंकि इसके कभी भी किसी बड़े समुद्री तूफान या बाढ़ में डूबने की संभावना है.

कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार, उस निर्जन द्वीप में रोहिंग्या दुर्गंध भरे बसावट में रहने को मजबूर हैं, जहां उन्हें न ही पर्याप्त भोजन मिल रहा है और ना ही स्वास्थ्य सेवा. कई रोहिंग्या महिलाएं स्थानीय मजदूरों के यौन-उत्पीड़न का शिकार हो चुकी हैं. अंतरराष्ट्रीय आलोचना के बाद रोहिंग्याओं के स्थानांतरण पर फिलहाल रोक लगा दी है. अंदाजा लगाना कठिन नहीं कि यदि यह सब भारत में होता, तो मोदी सरकार को “मुस्लिम/इस्लाम विरोधी” बताकर उलटा पेड़ से लटका दिया जाता.

हाल की में खुलासा हुआ था कि हिन्दू बहुल जम्मू का जनसांख्यिकी स्वरूप बदलने के उद्देश्य से कई कश्मीरी नेताओं (अलगाववादी सहित) और इस्लामी गैर-सरकारी संगठनों ने रोहिंग्या मुसलमानों को अवैध तरीके से बसा दिया. फरवरी 2018 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा में प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार- प्रदेश में 6,523 रोहिंग्या थे, जिनमें से पांच हजार केवल जम्मू में बसाए गए थे. वास्तव में, यह उसी “काफिर-कुफ्र” चिंतन के गर्भ से जनित षड्यंत्र है, जिससे प्रेरित होकर जिहादियों ने 1980-90 के दशक में कश्मीरी पंडितों की हत्या की, उनकी महिलाओं का बलात्कार किया – जिसके परिणामस्वरूप, पांच लाख हिन्दू रातों-रात कश्मीर से पलायन को विवश हुए.

क्या वाकई “इस्लामोफोबिया” है या फिर यह सच पर पर्दा डालने का प्रयास है? क्या यह सत्य नहीं कि इस्लाम का अनुयायी जब भी किसी नए देश में अतिथि या फिर शरणार्थी बनकर जाता है, तब कालांतर में उन्हीं मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग संबंधित देश की मूल संस्कृति, परंपरा और जीवनमूल्यों को नष्ट कर वहां शरीयत लागू करने का प्रयास करता है? हाल ही में पेरिस में दो जिहादियों द्वारा चार निरपराध लोगों की निर्मम हत्या – इसका प्रमाण है. क्या ऐसे दर्शन से किसी भी देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता को खतरा नहीं?

इसी प्रकार की आशंका को फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी व्यक्त कर चुके हैं. उनके अनुसार- “इस्लामी कट्टरपंथी चाहते हैं कि एक समानांतर व्यवस्था बनाई जाए, अन्य मूल्यों का निर्माण करके समाज में एक और संगठन विकसित किया जाए – जो प्रारंभ में अलगाववादी लगे, जिसका अंतिम लक्ष्य पूर्ण नियंत्रण हो.”

वस्तुत: इस पीड़ा को भारतीय उपमहाद्वीप के लोग सहज समझेंगे. विश्व के इस भूखंड में बसे 99 प्रतिशत लोग या तो हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिक्ख हैं या फिर उनके पूर्वज इन पंथों के अनुयायी थे. यहां मुस्लिमों के अधिकांश पूर्वजों ने आठवीं शताब्दी के बाद भय या लालच में आकर इस्लाम अपनाया था. एक विदेशी मजहबी चिंतन को अंगीकार करते ही वे पहले अपनी मूल बहुलतावादी सनातन संस्कृति से कट गए. फिर कालांतर में अपने भीतर अपनी मूल पहचान के प्रति निंदा, घृणा और शत्रुता को इतना भर लिया कि 1947 में भारत के रक्तरंजित विभाजन के बाद पाकिस्तान का जन्म हो गया. आज वही 73 वर्ष पुराना इस्लामी देश – “खंडित” भारत, जो यहां की मूल बहुलतावादी सनातन संस्कृति का वाहक है – उसे “हजार घाव देकर” मौत के घाट उतारना चाहता है.

यह बात सही है कि इस्लाम के अधिकांश अनुयायी एक साधारण मानव की तरह ही शांति के साथ रहना चाहते हैं, जिनकी अपनी स्वाभाविक अपेक्षाएं और इच्छाएं है. परंतु यह भी एक सच है कि बहुत बड़ी संख्या में स्वयं को “इस्लाम का सच्चा अनुयायी” बताने वाले विश्व को “काफिर-कुफ्र” मुक्त देखना चाहते हैं – उसके लिए चाहे हिंसा और आतंकवाद का सहारा ही क्यों न लेना पड़े. वह केवल “इस्लाम के अनुकूल” दुनिया की कल्पना करते हैं.

ऐसी जिहादी मानसिकता से आखिर विश्व कैसे निपटे? इस मजहबी संकट का हल तभी संभव है, जब इस्लामी दुनिया मध्यकालीन मानसिकता से बाहर निकले और अपनी पहचान के साथ-साथ गैर-मुस्लिमों की भी पहचान, सभ्यता, संस्कृति और परंपरा को भी बराबर सम्मान दे. क्या वर्तमान परिदृश्य में ऐसा संभव है?

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार, पूर्व राज्यसभा सांसद हैं.)

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January 12th 2021, 10:57 am

इमरान के नए पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की घटनाएं निरंतर बढ़ रहीं

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नई दिल्ली. पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यकों (हिन्दू, सिक्ख और ईसाई) पर धार्मिक अत्याचार की घटनाएं निरंतर बढ़ती जा रही हैं. अब नया मामला पाकिस्तान के हिंसाग्रस्त क्षेत्र बलूचिस्तान से सामने आया है. जहां, कट्टरपंथियों ने एक हिन्दू महिला शिक्षक का अपहरण कर उसे जबरदस्ती इस्लाम कबूल करवाया. कट्टरपंथियों ने महिला का नाम आयशा रखा है.

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिन्दुओं, सिक्खों और ईसाइयों के लिए काम करने वाली संस्था वायस ऑफ मॉइनारिटी ने घटना पर चिंता जताई. दुनिया भर में इस्लाम के पैरोकार बनने के प्रयास में जुटे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान भी जबरन धर्मपरिवर्तन के मुद्दे पर चुप्पी साध लेते हैं. पुलिस और स्थानीय प्रशासन भी मामले में लीपापोती करने में जुटा हुआ है.

पाकिस्तान में कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान हिन्दू और ईसाई लड़कियों के धर्मांतरण की घटनाएं अधिक हुईं. इससे अल्पसंख्यकों के मन में असुरक्षा की भावना भी तेजी से बढ़ी है. इमरान खान की सरकार में पुलिस के ढुलमुल रवैये और सख्त कानून न होने के कारण कट्टरपंथियों के हौसले बुलंद हुए हैं.

लड़कियों को आम तौर पर अगवा किया जाता है और फिर इनका निकाह करवाया जाता है. ऐसी लड़कियों में अधिकतर सिंध प्रांत से गरीब हिन्दू लड़कियां होती हैं. अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान को धार्मिक आजादी के उल्लंघन को लेकर खास चिंता वाला देश घोषित किया.

ईसाई लड़की का अपहरण कर निकाह किया

अक्तूबर के अंतिम सप्ताह में धर्म परिवर्तन के लिए बदनाम सिंध सूबे की राजधानी कराची में 13 साल की एक ईसाई लड़की आरजू का 44 साल के एक अधेड़ ने अपहरण कर लिया था. जिसके बाद उसने जबरदस्ती लड़की का धर्म परिवर्तन करवाया और उससे निकाह कर लिया. जिस शख्स से आरजू का निकाह हुआ है, उसके बच्चों की उम्र भी उससे दोगुनी है. आरजू का पति बाल विवाह और बलात्कार के आरोप में फिलहाल जेल में है, लेकिन वह डर से छिपी हुई है.

अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के लिए बदनाम सिंध में यह पहली घटना नहीं है. जून के अंतिम सप्ताह में आई रिपोर्ट के अनुसार, सिंध प्रांत में बड़े स्तर पर हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कराकर उन्हें मुस्लिम बनाए जाने का मामला सामने आया था. सिंध के बादिन में 102 हिन्दुओं को जबरन इस्लाम कबूल कराया गया.

मानवाधिकार संस्था मूवमेंट फॉर सॉलिडेरिटी एंड पीस (MSP) के अनुसार, पाकिस्तान में हर साल 1000 से ज्यादा ईसाई और हिन्दू महिलाओं या लड़कियों का अपहरण किया जाता है. जिसके बाद उनका धर्म परिवर्तन करवा कर इस्लामिक रीति रिवाज से निकाह करवा दिया जाता है. पीड़ितों में ज्यादातर की उम्र 12 साल से 25 साल के बीच में होती है.

यह आंकड़े इससे भी अधिक हो सकते हैं क्योंकि ज्यादातर मामले पुलिस दर्ज नहीं करती. अगवा होने वाली लड़कियों में से अधिकतर गरीब वर्ग से जुड़ी होती हैं. जिनकी कोई खोज-खबर लेने वाला नहीं होता.

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January 12th 2021, 10:57 am

भारत का भारत से साक्षात्कार कराने वाले अद्भुत संत – स्वामी विवेकानंद

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युग के सरोकारों और संवेदनाओं को समझने वाले योद्धा संत

प्रणय कुमार

यह कहना अनुचित नहीं होगा कि जहां आदि शंकराचार्य ने संपूर्ण भारतवर्ष को सांस्कृतिक एकता के मज़बूत सूत्र में पिरोया, वहीं स्वामी विवेकानंद ने आधुनिक भारत को उसके स्वत्व एवं गौरव का बोध कराया. बल्कि यह कहना चाहिए कि उन्होंने भारत का भारत से साक्षात्कार करा उसे आत्मविस्मृति के गर्त्त से बाहर निकाला. लंबी गुलामी से उपजी औपनिवेशिक मानसिकता एवं औद्योगिक क्रांति के बाद पश्चिम से आई भौतिकता की आंधी का व्यापक प्रभाव भारतीय जन-मन पर भी पड़ा. पराभव और परतंत्रता ने हममें हीनता-ग्रंथि विकसित कर दी. हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक चेतना मृतप्राय अवस्था को प्राप्त हो चुकी थी. नस्लभेदी मानसिकता के कारण पश्चिमी देशों ने न केवल हमारी घनघोर उपेक्षा की, अपितु हमारे संदर्भ में तर्कों-तथ्यों से परे नितांत अनैतिहासिक-पूर्वाग्रहग्रस्त-मनगढ़ंत स्थापनाएं भी दीं. और उससे भी अधिक आश्चर्यजनक यह रहा कि विश्व के सर्वाधिक प्राचीन एवं गौरवशाली संस्कृति के उत्तराधिकारी होने के बावजूद हम भी उनके सुर-में-सुर मिलाते हुए उनकी ही भाषा बोलने लगे.

उन्होंने (पश्चिम) कहा कि वेद गडरियों द्वारा गाया जाने वाला गीत है और हमने मान लिया, उन्होंने कहा कि पुराण-महाकाव्य-उपनिषद आदि गल्प व कपोल कल्पनाएं हैं और हमने मान लिया. उन्होंने कहा कि राम-कृष्ण जैसे हमारे संस्कृति-पुरुष मात्र मिथकीय चरित्र हैं और हमने मान लिया. वे हमारी अस्मिता, हमारी पहचान, हमारी संस्कृति को मिट्टी में मिलाने के लिए शोध और गवेषणा की आड़ में तमाम निराधार बौद्धिक-साहित्यिक-ऐतिहासिक स्थापनाएं देते गए और हम मानते गए. वे आक्षेप लगाते गए और हम सिर झुकाकर सहमति से भी एक कदम आगे की विनत मुद्रा में उसे स्वीकारते चले गए. हमारे वैभवशाली अतीत, गौरवपूर्ण इतिहास, विशद साहित्य, विपुल ज्ञानसंपदा, प्रकृति केंद्रित समरस-सात्विक जीवन-पद्धत्ति आदि को धता बताते हुए उन्होंने हमें पिछड़ा, दकियानूसी, अंधविश्वासी घोषित किया और हम उनसे भी ऊंचे, लगभग कोरस के स्वरों में पश्चिमी सुर और शब्दावली दुहराने लगे. हम भूल गए कि रीढ़विहीन, स्वाभिमान शून्य देश या जाति  का न तो कोई वर्तमान होता है, न कोई भविष्य.

स्वामी विवेकानंद ने हमारी इस जातीय एवं राष्ट्रीय दुर्बलता को पहचाना और समस्त देशवासियों को इसका सम्यक बोध कराया. भारतवर्ष के सांस्कृतिक गौरव की प्रथम उद्घोषणा उन्होंने 1893 के शिकागो-धर्मसभा में संपूर्ण विश्व से पधारे धर्मगुरुओं के बीच की. उन्होंने वहां हिन्दू धर्म और भारतवर्ष का विजयध्वज फहराया और संपूर्ण विश्व को हमारी परंपरा, हमारे विश्वासों, हमारे जीवन-मूल्यों और व्यवहार्य सिद्धांतों के पीछे की वैज्ञानिकता एवं अनुभवसिद्धता से परिचित कराया. उन्होंने पश्चिम को उसके यथार्थ का बोध कराते हुए याद दिलाया कि जब वहां की सभ्यता शैशवावस्था में थी, तब भारत विश्व को प्रेम, करुणा, सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, बंधुत्व के पाठ पढ़ा रहा था. हमने सहिष्णुता को केवल खोखले नारों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उससे आगे सह-अस्तित्ववादिता पर आधारित जीवन-पद्धत्ति विकसित की. यहूदी-पारसी से लेकर संसार भर की पीड़ित-पराजित-बहिष्कृत जातियों को भी हमने बड़े सम्मान एवं सद्भाव से गले लगाया. सृष्टि के अणु-रेणु में एक ही परम सत्य को देखने की दिव्य दृष्टि हमने सहस्राब्दियों पूर्व विकसित कर ली थी और इस नाम रूपात्मक जगत के भीतर समाविष्ट ऐक्य को पहचान लिया था. स्वामी विवेकानंद के  शिकागो-भाषण के संबोधन से जुड़े प्रसिद्ध प्रसंग – ”मेरे प्यारे अमेरिकावासी बंधुओं एवं भगनियों” के पीछे यही ऐक्य की भारतीय भावना और जीवन-दृष्टि थी. और सर्वाधिक उल्लेखनीय तो यह है कि हमारे इस सांस्कृतिक गौरवबोध में भी दुनिया की सभी संस्कृतियों व धार्मिक मान्यताओं के प्रति स्वीकार व सम्मान का भाव है, न कि उपेक्षा, हीनता या तिरस्कार का.

स्वामी विवेकानंद ने वेदांत को न केवल ऊंचाई दी, बल्कि उसे जनसाधारण को समझ आने वाली भाषा में समझाया भी. तत्त्वज्ञान की उनकी मीमांसा- कर्मयोग, ज्ञानयोग,  भक्तियोग, राजयोग आदि में क्या विद्वान, क्या साधारण -सभी समान रूप से रुचि लेते हैं! युवाओं में वे यदि सर्वाधिक लोकप्रिय थे और हैं तो यह भी समय की धड़कनों को सुन सकने की उनकी असाधारण समझ और अपार सामर्थ्य का ही सुपरिणाम था. उनकी जयंती युवा-दिवस के रूप में मनाया जाना सर्वथा उपयुक्त ही है. किसी एक क्षण की कौंध किसी के जीवन में कैसा युगांतकारी बदलाव ला सकती है, यह स्वामी जी के जीवन से सीखा-समझा जा सकता है. परमहंस रामकृष्ण के साक्षात्कार ने उनके जीवन की दिशा बदलकर रख दी. कहते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता. पर स्वामी विवेकानंद ने अकेले अपने दम पर पूरी दुनिया में रामकृष्ण मिशन और उसके सेवा-कार्यों की वैश्विक श्रृंखला खड़ी कर दी. वे कहा करते थे कि उन्हें यदि 1000 तेजस्वी युवा मिल जाएं तो वे देश की तस्वीर और तक़दीर दोनों बदल सकते हैं. युवा स्वप्न और तदनुकूल संकल्पों के पर्याय थे – स्वामी विवेकानंद. उनका जीवन भौतिकता पर आध्यात्म और भोग पर त्याग एवं वैराग्य की विजय का प्रतीक है. पर त्याग, भक्ति एवं वैराग्य की आध्यात्मिक भावभूमि पर खड़े होकर भी वे युगीन यथार्थ से अनभिज्ञ नहीं हैं. वे युग के सरोकारों और संवेदनाओं को भली-भांति समझते हैं. अन्यथा वे दीनों-दुःखियों की निःस्वार्थ सेवा को ही सबसे बड़ा धर्म नहीं घोषित करते. युवाओं के लिए गीता-पाठ से अधिक उपयोगी रोज फुटबॉल खेलने और वर्ज़िश करने को नहीं बताते. दरिद्रनारायण की सेवा में मोक्ष के द्वार न ढूंढते. और परिश्रम, पुरुषार्थ, परोपकार को सबसे बड़ा कर्त्तव्य नहीं बताते. हिंदुत्व की अवधारणा के वास्तविक और आधुनिक जनक स्वामी विवेकानंद ही हैं. धर्म-संस्कृति, राष्ट्र-राष्ट्रीयता हिंदू-हिंदुत्व आदि का नाम सुनते ही नाक-भौं सिकोड़ने वाले, आंखें तरेरने वाले, महाविद्यालय-विश्वविद्यालय में उनकी मूर्त्ति के अनावरण पर  हल्ला-हंगामा करने वाले, धर्म को अफ़ीम बताने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों एवं वैचारिक खेमेबाजों को खुलकर यह बताना चाहिए कि स्वामी जी के विचार और दर्शन पर उनके क्या दृष्टिकोण हैं? क्या उन्हें भी वे सेलेक्टिव नज़रिए या आधे-अधूरे मन से स्वीकार करेंगे? यदि वे उन्हें समग्रता से स्वीकार करते हैं तो क्या अपनी उन सब स्थापनाओं व धारणाओं के लिए वे देश से माफ़ी माँगने को तैयार हैं जो स्वामी जी के विचार एवं दर्शन से बिलकुल भिन्न, बेमेल एवं विपरीत हैं? क्या वे यह स्पष्टीकरण देने को तैयार हैं कि क्यों उन्होंने आज तक पीढ़ियों को ऐसी बौद्धिक घुट्टियां पिलाईं जो उन्हें अपनी जड़ों, संस्कारों, सरोकारों और संस्कृति की सनातन धारा से काटती हैं? विचारधारा के चौखटे एवं चौहद्दियों में बंधे लोग कदाचित ही ऐसा कर पाएं! पर क्या यह अच्छा नहीं हो कि निहित स्वार्थों, दलगत संकीर्णताओं एवं वैचारिक आबद्धताओं से परे स्वामी जी के इस ध्येय-वाक्य को हम सब अपना जीवन-ध्येय बनाएं –  ” आगामी पचास वर्षों के लिए हमारा केवल एक ही विचार-केंद्र होगा और वह है हमारी महान मातृभूमि भारत. दूसरे सब व्यर्थ के देवताओं को उस समय तक के लिए हमारे मन से लुप्त हो जाने दो. हमारा भारत, हमारा राष्ट्र-केवल यही एक देवता है जो जाग रहा है, जिसके हर जगह हाथ हैं, हर जगह पैर हैं, हर जगह कान हैं – जो सब वस्तुओं में व्याप्त है. हमें उस राष्ट्र-देवता की – उस विराट की आराधना करनी है.”

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January 11th 2021, 10:50 pm

अंग्रेज़ भारत से क्यों भागे…? / 3

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हां, इसलिए अंग्रेज़ भारत छोडकर भागे..!

प्रशांत पोळ

हमें यह पढ़ाया गया कि हमारी स्वतंत्रता हमने अहिंसक पद्धति से प्राप्त की. ‘दे दी हमें आजादी बिना खड्ग, बिना ढाल…’ जैसे गीत भी बचपन से हमारी मानसिकता को बनाते रहे. परंतु वास्तविकता क्या थी ?

महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस ने जो अहिंसक आंदोलन चलाए, उनका महत्व निश्चित ही था. जनजागरण के लिये यह आंदोलन उपयोगी सिद्ध हुए. सामान्य व्यक्ति इन आंदोलनों के माध्यम से देश के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ता गया. किंतु क्या अंग्रेज केवल इन आंदोलनों से ही भारत छोड़ने के लिये विवश हुए ?

वास्तविकता कुछ और ही चित्र प्रस्तुत करती है !

न्यायमूर्ति फणी भूषण चक्रवर्ती, कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश रह चुके हैं. १९५२ से १९५८ तक उनका कार्यकाल रहा है. इसी दरम्यान सन् १९५६ में, डॉ. हरेंद्र कुमार मुखर्जी के अचानक देहावसान के बाद, वे तीन महिने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल भी रहे हैं. इन्होंने ३० मार्च, १९७६ को लिखे पत्र में, उनके राज्यपाल के कार्यकाल का एक अनुभव लिखा है, जो महत्वपूर्ण है.

वे लिखते हैं, “जब मैं १९५६ में कुछ दिनों के लिये पश्चिम बंगाल का कार्यकारी राज्यपाल बना था, उन्हीं दिनों लॉर्ड क्लेमेंट एटली का कलकत्ता दौरा हुआ. वे दो दिन राजभवन में रहे. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वे ही ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने थे. और उन्हीं के कार्यकाल में भारत को स्वतंत्रता मिली थी. इसलिये मैंने उनसे सीधा प्रश्न किया, ‘गांधी जी के नेतृत्व वाला भारत छोड़ो आंदोलन तो १९४७ के बहुत पहले ही समाप्त हो गया था. बाद में कोई ऐसी परिस्थिति भी नहीं बन रही थी, जिसके कारण आप लोग भारत छोड़ कर चले जाएं. फिर ऐसा क्या कारण था कि इतनी जल्दबाजी में अंग्रेजों ने भारत से विदा ली ?”

“इसके उत्तर में एटली ने अनेक कारण गिनाएँ. उनमें से दो कारण प्रमुख थे –

१. नेताजी सुभाषचंद्र बोस, उनकी आजाद हिंद फौज और उनके प्रति भारतीय सैनिकों का आकर्षण.

२. ब्रिटिश सेना में हुए विद्रोह.

इनके कारण अंग्रेजों की सत्ता भारत में आमूलचूल हिल गई थी.

“मैंने फिर एटली से पूछा ‘गांधी जी के भारत छोड़ो आंदोलन का अंग्रेजों के जाने में कितना योगदान है?’  इस पर मुस्कुराते हुए एटली कहते हैं, “नगण्य’ !”

न्यायमूर्ति चक्रवर्ती जी का यह अनुभव अपने आप में बहुत कुछ कह देता है.

जनरल वीके सिंह ने अपनी पुस्तक, ‘The contribution of the Indian Armed forces to the freedom movement’ में लिखा है, “Though the mutiny at Jubbulpore was at that time not considered as ‘serious’ as the naval mutiny, its repercussions were immense. The earlier revolts in the RIAF and RIN, though more widespread and larger in scale, did not really worry the British authorities, because the Indian Army, on which they depended for meeting external and internal threats, was still considered reliable, having proved its fidelity during World War II. The mutiny at Jubbulpore was the first major uprising in the Indian Army during or after the war. This set alarm bells ringing from Delhi to London, and doubts began to be expressed on the steadfastness of the Indian Army. Ultimately, it forced Britain to reach a settlement with the political parties and quit India.” (Page 139-140)

निकोलस मेनसर्ग (Philip Nicholas Seton Mansergh : १९१० – १९९१) यह प्रख्यात ब्रिटिश इतिहासकार थे. कॉमनवैल्थ के कारण प्रारंभिक दिनों में उनका भारत से काफी संबंध आया. इन्होने भी इसी प्रकार के विचार व्यक्त किये. उनके अनुसार ब्रिटिश भारत छोड़ कर गए, क्योंकि उन्हें विश्वास हो गया कि सेना की निष्ठा अब ब्रिटिश हुकूमत पर नहीं बची है. उसमें से भी थल सेना में उपजा असंतोष उनके लिये ज्यादा चिंताजनक था, बनिस्बत नौसेना और वायुसेना के असंतोष से. उनके शब्द हैं, “It is pertinent to remember that one of the compelling reasons for the departure of the British from India was the apprehension that the loyalty of Indian armed forces was doubtful. Due to obvious reason, the staunchness of the Army was more worrisome than that of the other two Services.” इसीलिये ५ सितंबर, १९४६ को ब्रिटिश आर्मी चीफ जनरल आचिनलेक ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को जो पत्र लिखा उसमें जबलपुर के असंतोष का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं – “The importance of keeping the Indian Army steady is emphasised. It is the one disciplined force in which communal interests are subordinated to duty, and on it depends the stability of the country.  The steadiness of the RIN and the RIAF is of lesser import but any general disaffection in them is likely seriously to affect the reliability of the army.”

दिल्ली में इंदिरा गांधी सेंटर फॉर फ्रीडम स्ट्रगल स्टडीज है. इसके डायरेक्टर हैं – फ्रोफेसर कपिल कुमार. वे कहते हैं, “The 1946 revolt in the Royal Navy by Indians was a major reason why India got Independence, apart from the desertions to Netaji’s Azad Hind Fauj or the Indian National Army (INA). The British got unnerved as they could no longer depend on their armed forces in India. This was the main reason why they decided to quit.”

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अंग्रेजों को भारत का सहयोग चाहिये था. ब्रिटिश सरकार को लगा कि भारतीयों के स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में कुछ करने की आवश्यकता है. इसलिये ब्रिटन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने, मार्च १९४२ में युद्ध मंत्रीमंडल के मदस्य सर स्टेफोर्ड क्रिप्स को भारत भेजा. यह क्रिप्स मिशन कहलाता है.

क्रिप्स ने भारतीय नेताओं को यह प्रस्ताव दिया कि युद्ध के पश्चात निर्वाचित संविधान सभा का गठन किया जाएगा और भारत को ब्रिटन के उपनिवेश का दर्जा दिया जाएगा. प्रांतों को नया संविधान स्वीकार या अलग संविधान निर्माण की स्वतंत्रता होगी.

अर्थात विश्व युद्ध के चलते, कठिन परिस्थिति में भी ब्रिटिश सत्ता, भारत को पूर्ण स्वतंत्रता देने के पक्ष में नहीं थी.

यही सर स्टेफोर्ड क्रिप्स, बाद में ब्रिटेन की संसद, अर्थात ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ में चर्चा में भाग लेते हुए कहते हैं, “भारतीय सेना ने हमारे अधिकारियों की बात सुनना बंद कर दिया है.” ब्रिटिश संसद में बोले गए उनके शब्द हैं, “…The Indian Army in India is not obeying the British officers. We have recruited our workers for the war; they have been demobilised after the war. They are required to repair the factories damaged by Hitler’s bombers. Moreover, they want to join their kith and kin after five and a half years of separation. Their kith and kin also want to join them. In these conditions if we have to rule India for a long time, we have to keep a permanent British army for a long time in a vast country of four hundred million. We have no such army and money….”

कांग्रेस ने यह क्रिप्स मिशन ठुकराया और ९ अगस्त १९४२ से ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन प्रारंभ किया. यह आंदोलन प्रभावी रहा. किंतु ज्यादा चल नहीं पाया. इस आंदोलन के बाद १९४७ में भारत स्वतंत्र होने तक कांग्रेस ने कोई बड़ा आंदोलन नहीं छेड़ा था.

अर्थात ब्रिटिश सत्ता, जो भारत को सहज रूप से नहीं छोड़ना चाहती थी, वो अभी कम से कम ५-१० वर्ष, किसी न किसी रूप से भारत में रहने की सोच रही थी. उस पर कांग्रेस का या अन्य किसी आंदोलन का दबाव भी नहीं था.

तो फिर ब्रिटिश सत्ता ने भारत छोड़ने का निर्णय क्यों लिया ?

जनरल वी. के. सिंह ने अपने पुस्तक में इसे स्पष्ट किया है. वे लिखते हैं, “Had the Indian armed forces remained staunch, there is little doubt that British rule would have continued for at least another 10 to 15 years. The nationalistic feeling that had entered the heart of the Indian soldier was one of the most important factors in the British decision to grant complete independence to India, and also to advance the date from June 1948 to August 1947.”

हम घटनाक्रम देखेंगे तो बातें स्पष्ट होती हैं.

जनवरी १९४६ में वायु सेना के जवान हड़ताल पर जाते हैं, आंदोलन करते हैं. २३ फरवरी १९४६ को मुंबई में नौसेना का आंदोलन होता है. फिर तुरंत २७ फरवरी को जबलपुर में थल सेना के सिग्नल्स कोर में आंदोलन होता है.

इसको देखते हुए आर्मी चीफ आचिनलेक, ५ सितंबर, १९४६ को प्रधानमंत्री एटली को चिट्ठी लिखते हैं कि, ब्रिटिश हुकूमत को जल्द से जल्द भारत छोड़ना चाहिये. भारत और ब्रिटेन की ब्रिटिश सत्ता को यह विश्वास हो जाता है कि भारत की सेना के सभी अंगों (नौसेना, थलसेना, वायुसेना) के जवानों की निष्ठा अब ब्रिटिश सत्ता के प्रति नहीं रही है. उनके मन में सुभाष चंद्र बोस का आकर्षण कायम रहा है.

इसलिये १८ फरवरी, १९४७ को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली, लंदन में हाउस ऑफ कॉमन्स में घोषणा करते हैं कि ‘ब्रिटेन भारत को स्वतंत्रता देने जा रहा है’.

और अगले माह, अर्थात २० मार्च, १९४७ को इस सत्ता हस्तांतरण को सुलभ बनाने के लिये लॉर्ड माउंट बेटन दिल्ली पहुंचते हैं. भारत पहुंचने के बाद, जनरल आचिनलेक से चर्चा कर के वे निर्णय लेते हैं कि भारत को सत्ता का हस्तांतरण, पहले से तय तिथि, अगस्त १९४८ के बजाय एक वर्ष पहले, अर्थात् अगस्त १९४७ को करना ठीक रहेगा. और फिर १५ अगस्त, १९४७ यह तिथि तय होती है.

अर्थात् भारतीय सैनिकों में जगे ‘स्व’ के कारण, अंग्रेजों को गिरते – भागते, भारत छोड़ने पर विवश होना पड़ा..!

इस लघु लेखमाला की संदर्भ सूची –

  1. ‘The contribution of the Indian Armed Forces to the Freedom Movement’ – Maj. Gen. V. K. Singh
  2. ‘Constitutional Relations between British and India : The Transfer of Power 1942 – 47. – Nicholas Mansergh
  3. ‘RIN Mutiny 1946 : Reference and Guide for All.’ – Biswanath Bose
  4. ‘Mutiny of Innocents’ – B. C. Datta
  5. ‘Transfer of Power’ – V. P. Menon
  6. ‘Revisiting Talwar’ – Dipak Kumar Das
  7. ‘The Army of Occupation’ – Kusum Nair
  8. ‘How Gandhi, Patel and Nehru colluded with Brits to suppress Naval Mutiny of 1946’ – Saraswati Sarkar, Shanmukh and Dikgaj
  9. ‘Declassify files on 40s Mutinies, rewrite History’ – Navtan Kumar (An article in Sunday Guardian on 18th October, 2015).
  10. ‘Fidelity and Honour’ – Lt. Gen S. L. Menezes

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January 11th 2021, 10:50 pm

11 जनवरी / बलिदान दिवस – भरी अदालत में बदला लेने वाला देशभक्त सरदार सेवासिंह

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नई दिल्ली. भारत की आजादी के लिए भारत में हर ओर लोग प्रयत्न कर रहे थे. पर अनेक वीर ऐसे थे, जो विदेशों में आजादी की अलख जगा रहे थे. वे भारत के क्रान्तिकारियों को अस्त्र-शस्त्र भेजते थे. ऐसे ही एक क्रान्तिवीर थे – सरदार सेवासिंह, जो कनाडा में रहकर यह काम कर रहे थे. सेवासिंह मूलतः पंजाब के रहने वाले थे, पर वे अपने अनेक मित्रों एवं सम्बन्धियों की तरह काम की खोज में कनाडा चले गये थे. उनके दिल में देश को स्वतन्त्र कराने की आग जल रही थी. प्रवासी सिक्खों को अंग्रेज अधिकारी अच्छी निगाह से नहीं देखते थे. मिस्टर हॉप्सिन नामक एक अधिकारी ने एक देशद्रोही बेलासिंह को अपने साथ मिलाकर दो सगे भाइयों भागा सिंह और वतन सिंह की गुरुद्वारे में हत्या करवा दी. इससे सेवासिंह की आंखों में खून उतर आया. उन्होंने सोचा कि यदि हॉप्सिन को सजा नहीं दी गयी, तो वह इसी तरह अन्य भारतीयों की भी हत्याएं करवाता रहेगा.

सेवासिंह ने हॉप्सिन को दोस्ती के जाल में फंसाकर मारने की योजना बनाई. इसलिए उसने हॉप्सिन से अच्छे सम्बन्ध बना लिये. हॉप्सिन ने सेवासिंह को लालच दिया कि यदि वह बलवन्त सिंह को मार दे, तो उसे अच्छी नौकरी दिला दी जाएगी. सेवासिंह इसके लिए तैयार हो गया. हॉप्सिन ने उसे इसके लिए एक पिस्तौल और सैकड़ों कारतूस दिये. सेवासिंह ने उसे वचन दिया कि शिकार कर उसे पिस्तौल वापस दे देगा. अब सेवासिंह ने अपना पैसा खर्च कर सैकड़ों अन्य कारतूस भी खरीदे और निशानेबाजी का खूब अभ्यास किया. जब उनका हाथ सध गया, तो वह हॉप्सिन की कोठी पर जा पहुंचा. उनके वहां आने पर कोई रोक नहीं थी. चौकीदार उन्हें पहचानता ही था. सेवासिंह के हाथ में पिस्तौल थी.

यह देखकर हॉप्सिन ने ओट में होकर उसका हाथ पकड़ लिया. सेवासिंह एक बार तो हतप्रभ रह गया, पर फिर संभल कर बोला,‘‘ये पिस्तौल आप रख लें. इसके कारण लोग मुझे अंग्रेजों का मुखबिर समझने लगे हैं.’’ इस पर हॉप्सिन ने क्षमा मांगते हुए उसे फिर से पिस्तौल सौंप दी. अगले दिन न्यायालय में वतन सिंह हत्याकांड में गवाह के रूप में सेवासिंह की पेशी थी. हॉप्सिन भी वहां मौजूद था. जज ने सेवासिंह से पूछा, जब वतन सिंह की हत्या हुई, तो क्या तुम वहीं थे. सेवासिंह ने हां कहा. जज ने फिर पूछा, हत्या कैसे हुई ? सेवासिंह ने देखा कि हॉप्सिन उसके बिल्कुल पास ही है. उसने जेब से भरी हुई पिस्तौल निकाली और हॉप्सिन पर खाली करते हुए बोला – इस तरह.  हॉप्सिन का वहीं प्राणान्त हो गया.

न्यायालय में खलबली मच गयी. सेवासिंह ने पिस्तौल हॉप्सिन के ऊपर फेंकी और कहा, ‘‘ले संभाल अपनी पिस्तौल. अपने वचन के अनुसार मैं शिकार कर इसे लौटा रहा हूँ.’’ सेवासिंह को पकड़ लिया गया. उन्होंने भागने या बचने का कोई प्रयास नहीं किया, क्योंकि वह तो बलिदानी बाना पहन चुके थे. उन्होंने कहा, ‘‘मैंने हॉप्सिन को जानबूझ कर मारा है. यह दो देशभक्तों की हत्या का बदला है. जो गालियां भारतीयों को दी जाती है, उनकी कीमत मैंने वसूल ली है. जय हिन्द.’’

उस दिन के बाद पूरे कनाडा में भारतीयों को गाली देने की किसी की हिम्मत नहीं हुई. 11 जनवरी, 1915 को इस वीर को बैंकूवर की जेल में फांसी दी गयी.

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January 11th 2021, 4:02 pm

भोपाल –  लव जिहाद, `आदिल खान मेरी मौत का जिम्मेदार…“ लिख पूजा ने लगाई फांसी

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भोपाल. शहर में लव जिहाद के एक सनसनीखेज मामले में पीड़ित 26 साल की लड़की ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. उसने 5 लाइन का सुसाइड नोट भी छोड़ा है. लड़की ने सुसाइड नोट में लिखा है, ”मेरा नाम पूजा है. मैं आत्महत्या करने जा रही हूं. इसका जिम्मेदार आदिल खान पुत्र खलीक खान है.” इस नोट में लड़की ने आरोपी का पता और मोबाइल नंबर भी लिखा है.

मृत लड़की के परिजनों का आरोप है कि आदिल ने अपना नाम छिपाकर उनकी बेटी से दोस्ती की थी. वह तकरीबन 8 साल से अच्छे दोस्त थे. भोपाल के टीटी नगर निवासी पूजा के भाई राहुल ने पुलिस को बताया कि शुक्रवार शाम पूजा अपने कमरे में चली गई और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. उस वक्त सभी घर पर मौजूद थे. मां ने दरवाजा खटखटाया, लेकिन पूजा ने नहीं खोला. किसी अनहोनी की आशंका पर जब बलपूर्वक दरवाजा खोला गया तो पूजा फांसी के फंदे पर लटकी मिली.

भाई का आरोप – आदिल ने हिन्दू नाम बताकर की बहन से दोस्ती

मृत लड़की के भाई राहुल ने आदिल को अपनी बहन की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार बताया है. भाई का कहना है कि आदिल से पूजा करीब 8 साल पहले मिली थी. तब उसने अपना धर्म हिन्दू बताया था. दोनों की अच्छी दोस्ती थी. राहुल ने पुलिस को बताया कि आदिल उसकी बहन पूजा पर लगातार मुस्लिम बनने के लिए दबाव डालता, उसके साथ मारपीट करता. जब उसने धर्म परिवर्तन से इनकार कर दिया तो आदिल ने दूसरी लड़की से सगाई कर ली. इससे आहत होकर पूजा ने आत्महत्या कर ली.

पुलिस ने लड़की के सुसाइड नोट और परिजनों के बयान के आधार पर आदिल के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में केस दर्ज किया है. ”मध्यप्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2020” अध्यादेश के बाद यह पहला मामला है. इस अध्यादेश के लागू होने के बाद आदिल पर संबंधित धाराओं में कार्रवाई हो सकती है. ”मध्यप्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2020” अध्यादेश में इस तरह के मामलों में 5 से 10 साल तक की सजा का प्रावधान है.

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January 11th 2021, 4:02 pm

“माई-वे या हाईवे” – एक घातक सिद्धांत

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राकेश सैन

दिल्ली की सीमा पर धरना दे रहे पंजाब-हरियाणा के किसान जो ‘माई वे या हाईवे’ सिद्धांत अपनाए हुए हैं. वह कुछ ऐसी ही जिद्द है जो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को हार कर भी पराजय न मानने और भारत के विपक्ष को हर चुनावी पटकनी के बाद ईवीएम पर संदेह जताने को विवश करती है.

धरनाकारी किसान इस जिद्द पर अड़े हैं कि केंद्र सरकार अपने तीन कृषि सुधार कानूनों को वापिस ले, अन्यथा उनका धरना चलता रहेगा. आंदोलनकारी किसान सरकार को दो ही विकल्प दे रहे हैं, या तो उनका रास्ता अपनाया जाए, अन्यथा वे रास्ता बंद किए रहेंगे. ‘माई वे या हाईवे’ का जिद्दी सिद्धांत न तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में है और न ही देश के. कल को कोई भी संगठन अपनी उचित-अनुचित मांग को ले ‘हाईवे’ रोक कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को ‘माई वे’ पर चलने को विवश कर सकता है. किसी भी आंदोलन की सफलता के लिए उसका सत्यनिष्ठ होना, लक्ष्य जनहित व साधन नैतिक होने आवश्यक है, परंतु मौजूदा किसान आंदोलन में इनका अभाव दिख रहा है.

समय बीतने के साथ-साथ देश के सामने साफ होता जा रहा है कि किसानों के नाम पर धरना दे रहे अधिकतर लोग कौन हैं. इनकी असली मंशा क्या है और यही कारण है कि किसान आंदोलन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. देश में घटित घटनाक्रमों को श्रृंखलाबद्ध जोड़ा जाए तो एक भयावह तस्वीर सामने आती है. विगत माह 12 दिसम्बर को कर्नाटक के कोलार में विस्ट्रान के प्लाट में हुई तोड़फोड़ ने पूरे देश को झिंझोड़ कर रख दिया. ताईवान की कंपनी विस्ट्रान भारत में ‘एपल’ के उत्पाद बनाती है. तोड़फोड़ को पहले तो कर्मचारियों व कंपनी के बीच विवाद के रूप में प्रचारित किया गया, लेकिन ये घटना कई मायनों में अलग थी. विरोध प्रदर्शन में कंपनी के अतिरिक्त बाहर के लोग भी शामिल हो गए. प्रदर्शनकारियों ने प्लांट की मशीनरी को नुक्सान पहुंचाया और फोन भी लूट लिए. इस घटना के बाद न केवल विस्ट्रान का उत्पादन रुका, बल्कि विस्ट्रान व एपल की समझौता भी खटाई में पड़ता नजर आने लगा है. पुलिस जांच में इसके पीछे वामपंथी संगठन इंडियन ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक) और वामपंथियों के छात्र संघ स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के नाम सामने आ रहे हैं.

देशवासियों को याद होगा कि वामपंथी इससे कई साल पहले जापानी कंपनी मारुती सूजुकी व होंडा कंपनी में भी हिंसा करवा चुके हैं क्योंकि जापान चीन का जबरदस्त प्रतिद्वंद्वी माना जाता है. यूपीए सरकार के कार्यकाल में वामपंथियों द्वारा पतंजलि के खिलाफ झूठ-फरेब के आधार पर खोला गया मोर्चा भी किसी को भूला नहीं है जो आज स्वदेशी उत्पाद की अग्रणी कंपनी बन कर सामने आई है.

भारतीय वामपंथियों की गतिविधियां इसके जन्म से ही संदिग्ध रही हैं. संदेह को उस समय बल मिलता है, जब चीन का सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ विस्ट्रान हिंसा की खबर को प्रमुखता से न केवल प्रकाशित करता है, बल्कि यह संदेश देने का भी प्रयास करता है कि भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियां सुरक्षित नहीं हैं. कोरोना के चलते बहुत सी बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन छोड़ने और भारत आने को बेताब हैं. विस्ट्रान का उदाहरण देकर चीनी अखबार की चीफ रिपोर्टर चिंगचिंग चेन फॉक्सान कंपनी का मजाक उड़ाती है जो अपनी आईफोन कंपनी चीन से भारत ले आई है.

बात करते हैं किसान आंदोलन की तो सभी जानते हैं कि भारत में कृषि क्षेत्र की उत्पादकता दुनिया की तमाम बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले कहीं पीछे है. अधिकांश किसानों की गरीबी का यह सबसे बड़ा कारण है. यह उत्पादकता तब तक नहीं बढ़ने वाली जब तक कृषि के आधुनिकीकरण के कदम नहीं उठाए जाएंगे. यह काम सरकार अकेले नहीं कर सकती है. इसमें निजी क्षेत्र का सहयोग आवश्यक है. निजी क्षेत्र अगर कृषि में निवेश के लिए आगे आएगा तो इसके लिए कानूनों की आवश्यकता तो होगी ही. जो लोग इस मामले में किसानों को बरगलाने का काम कर रहे हैं, वे वही वामपंथी हैं जो भारत में अस्थिरता का महौल बनाने के प्रयास में दिखते हैं. यह वह सोच है जो सबकुछ सरकार से चाहने-मांगने पर भरोसा करती है. सच्चाई यह है कि जो देश विकास की होड़ में आगे हैं, उन सभी ने मुक्त बाजार की अवधारणा पर ही आगे बढ़कर कामयाबी हासिल की है. देश के किसानों को भी आगे आकर मुक्त बाजार की अवधारणा को अपनाना चाहिए. तीनों नए कृषि सुधार कानून किसानों को बंधे-बंधाए तौर-तरीकों से आजाद कर वैश्विक पटल पर ले जाने वाले हैं. इनके विरोध का मतलब है सुधार और विकास के अवसर खुद ही बंद कर लेना. लेकिन किसान आंदोलन में सक्रिय वामपंथी नेता सच्चाई समझने की बजाए ‘माई वे या हाईवे’ का सिद्धांत अपनाए हुए हैं. शुरू-शुरू में इस आंदोलन में छिपी ताकतें भूमिगत थीं, परंतु अब सामने आने लगी हैं. 10 जनवरी को करनाल में हरियाणा के मुख्यमंत्री के कार्यक्रम से पहले किसान प्रदर्शनकारियों द्वारा की गई हरकत के बाद इस आंदोलन को शांतिपूर्ण कहना भी मुश्किल हो गया. आखिर धरने पर बैठे मुट्ठी भर किसान किस आधार पर कह सकते हैं कि वे पूरे देश के करोड़ों किसानों का प्रतिनिधित्व करते हैं? आखिर पूरा जोर लगाने के बाद भी देश के बाकी हिस्सों का किसान आंदोलनकारियों के साथ क्यों नहीं आ रहा है? अब तो समाचार मिलने लगे हैं कि आंदोलन में किसानों की संख्या बनाए रखना किसान नेताओं के लिए चुनौतीपूर्ण बनने लगा है. किसानों को मोर्चे पर बैठाए रखने के लिए तरह-तरह की सुविधाएं दी जा रही हैं. किसान नेता श्री राकेश टिकैत साफ शब्दों में कहते हैं कि वे मई 2024 तक यहां बैठने को तैयार हैं. आंदोलनकारी साफ-साफ केंद्र में मोदी व हरियाणा की भाजपा सरकार गिराने की बात कर रहे हैं और वहां पर भाजपा की सहयोग जजपा को समर्थन वापिस लेने के लिए उकसाते रहे हैं. केवल इतना ही नहीं किसानों व सरकार के बीच मध्यस्थता का प्रयास कर रहे नानकसर संप्रदाय के बाबा लक्खा सिंह पर वामपंथी नेता राशन पानी लेकर चढ़ चुके हैं.

किसान आंदोलन की फीकी पड़ती चमक की एक और उदाहरण है कथित किसान नेता योगेंद्र यादव का वह ट्वीट है, जिसमें उन्होंने शिकवा किया है कि हरियाणा के किसान आंदोलन में पूरे मन से हिस्सा नहीं ले रहे. किसान अब कहने लगे हैं कि जब सरकार कृषि सुधार कानून में आंदोलनकारियों की मांग के अनुसार चर्चा व संशोधन करने को तैयार है तो ‘माई वे या हाईवे’ की जिद्द का औचित्य क्या है ? किसानों को लगने लगा है कि उनके नेता या तो अपने अहं की तुष्टि के लिए या फिर किसी और के इशारे पर ‘मैं ना मानूं-मैं ना मानूं’ की माला फेर रहे हैं. अमेरिका के व्हाइट हाऊस में ट्रंप समर्थकों के हमले की घटना के बाद ‘लोकतंत्र बनाम भीड़तंत्र’ पर चर्चा हो रही है. भीड़तंत्र की तानाशाही अमेरिका में औचित्यपूर्ण नहीं कही जा सकती तो यह भारत में भी स्वीकार्य नहीं है, चाहे यह किसान आंदोलन के रूप में ही क्यों न हो.

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January 11th 2021, 4:02 pm

स्वामी विवेकानंद – भारत के विश्वपुरुष

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प्रवीण गुगनानी

स्वामी विवेकानंद जी ने भारत को व भारतत्व को कितना आत्मसात कर लिया था, यह कविवर रविन्द्रनाथ टैगोर के इस कथन से समझा जा सकता है. जिसमें उन्होंने कहा था कि –‘यदि आप भारत को समझना चाहते हैं तो स्वामी विवेकानंद को संपूर्णतः पढ़ लीजिये’.

नोबेल से सम्मानित फ्रांसीसी लेखक रोमां रोलां ने स्वामी जी के विषय में कहा था –‘उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असंभव है, वे जहां भी गए, सर्वप्रथम ही रहे. प्रत्येक व्यक्ति उनमें अपने मार्गदर्शक व आदर्श को साक्षात पाता था. वे ईश्वर के साक्षात प्रतिनिधि थे व सबसे घुल मिल जाना ही उनकी विशिष्टता थी. हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा – ‘शिव!’. यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो.’

ज्ञानपिपासु और घोर जिज्ञासु नरेन्द्र का बाल्यकाल तो स्वाभाविक विद्याओं और ज्ञान अर्जन में व्यतीत हो रहा था, किन्तु ज्ञान और सत्य के खोजी नरेन्द्र अपने बाल्यकाल में अचानक जीवन के चरम सत्य की खोज के लिए छटपटा उठे और वे यह जानने के लिए व्याकुल हो उठे कि क्या सृष्टि नियंता जैसी कोई शक्ति है, जिसे लोग ईश्वर कहते हैं? सत्य और परमज्ञान की यही अनवरत खोज उन्हें दक्षिणेश्वर के संत श्री रामकृष्ण परमहंस तक ले गई और परमहंस ही वह सच्चे गुरु सिद्ध हुए, जिनका सान्निध्य और आशीर्वाद पाकर नरेन्द्र की ज्ञान पिपासा शांत हुई और वे सम्पूर्ण विश्व के स्वामी विवेकानंद के रूप में स्वयं को प्रस्तुत कर पाए.

स्वामी विवेकानंद एक ऐसे युगपुरुष थे, जिनका रोम-रोम राष्ट्रभक्ति और भारतीयता से सराबोर था. उनके सारे चिंतन का केंद्र बिंदु राष्ट्र और राष्ट्रवाद था. भारत के विकास और उत्थान के लिए अद्वित्तीय चिंतन और कर्म इस तेजस्वी संन्यासी ने किया. उन्होंने कभी सीधे राजनीति में भाग नहीं लिया, किंतु उनके कर्म और चिंतन की प्रेरणा से हजारों ऐसे कार्यकर्ता तैयार हुए, जिन्होंने राष्ट्र रथ को आगे बढ़ाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया. इस युवा संन्यासी ने निजी मुक्ति को जीवन का लक्ष्य नहीं बनाया था. बल्कि करोड़ों देशवासियों के उत्थान को ही अपना जीवन लक्ष्य बनाया. राष्ट्र के दीन-हीन जनों की सेवा को ही वह ईश्वर की सच्ची पूजा मानते थे.

सेवा की इस भावना को उन्होंने प्रबल शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा था – ‘भले ही मुझे बार-बार जन्म लेना पड़े और जन्म-मरण की अनेक यातनाओं से गुजरना पड़े. लेकिन मैं चाहूंगा कि मैं उस एकमात्र ईश्वर की सेवा कर सकूं, जो असंख्य आत्माओं का ही विस्तार है. वह और मेरी भावना से सभी जातियों, वर्गों, धर्मों के निर्धनों में बसता है, उनकी सेवा ही मेरा अभीष्ट है.’

क्यों उन्होंने निजी मुक्ति से भी बढ़कर राष्ट्रसेवा को ही अपना लक्ष्य बनाया? अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस से प्रेरित स्वामी विवेकानंद ने साधना प्रारंभ की और परमहंस के जीवनकाल में ही समाधि प्राप्त कर ली थी. किंतु विवेकानंद का इस राष्ट्र के प्रति प्रारब्ध कुछ और ही था. इसलिए जब स्वामी विवेकानंद ने दीर्घकाल तक समाधि अवस्था में रहने की इच्छा प्रकट की तो उनके गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें एक महान लक्ष्य की ओर प्रेरित करते हुए कहा – ‘मैंने सोचा था कि तुम जीवन के एक प्रखर प्रकाश पुंज बनोगे और तुम हो कि एक साधारण मनुष्य की तरह व्यक्तिगत आनंद में ही डूब जाना चाहते हो, तुम्हें संसार में महान कार्य करने हैं, तुम्हें मानवता में आध्यात्मिक चेतना उत्पन्न करनी है और दीनहीन मानवों के दु:खों का निवारण करना है.’

स्वामी विवेकानंद अपने आराध्य के इन शब्दों से अभिभूत हो उठे और अपने गुरु के वचनों में सदा के लिए खो गए. स्वयं रामकृष्ण परमहंस भी विवेकानंद के आश्वासन को पाकर अभिभूत हो गए और उन्होंने अपनी मृत्यशैया पर अंतिम क्षणों में कहा – ‘मैं ऐसे एक व्यक्ति की सहायता के लिए बीस हजार बार जन्म लेकर अपने प्राण न्योछावर करना पसंद करूंगा.’

जब 1886 में पूज्य रामकृष्ण परमहंस ने अपना नश्वर शरीर त्यागा, तब उनके 12 युवा शिष्यों ने संसार छोड़कर साधना का पथ अपना लिया. लेकिन स्वामी विवेकानंद ने दरिद्र-नारायण की सेवा के लिए एक कोने से दूसरे कोने तक सारे भारत का भ्रमण किया. उन्होंने देखा, देश की जनता भयानक गरीबी से घिरी हुई है और तब उनके मुख से रामकृष्ण परमहंस के शब्द अनायास ही निकल पड़े- ‘भूखे पेट से धर्म की चर्चा नहीं हो सकती.’

स्वामी विवेकानंद जी ने रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन नाम से दो पृथक संस्थाएं गठित कीं. यद्यपि इन दोनों संस्थाओं में परस्पर नीतिगत सामंजस्य था, तथापि इनके उद्देश्य भिन्न किन्तु पूरक थे. रामकृष्ण मठ समर्पित संन्यासियों की श्रृंखला तैयार करने के लि‍ए था, जबकि रामकृष्ण मिशन जनसेवा की गतिविधियों के लिए था. ये संस्थाएं शिक्षा, चिकित्सा, संस्कृति, अध्यात्म और अन्यान्य सेवा प्रकल्पों के लिए विश्वव्यापी व प्रख्यात हो चुकी हैं.

स्वामी विवेकानंद ने कहा कि पेड़ों और पौधों तक को जल देने वाले धर्म में जातिभेद का कोई स्थान नहीं हो सकता; ये वि‍कृति धर्म की नहीं, हमारे स्वार्थों की देन है. ‘जाति प्रथा की आड़ में शोषण चक्र चलाने वाले धर्म को बदनाम न करें.’

विवेकानंद एक सुखी और समृद्ध भारत के निर्माण के लिए बेचैन थे. इसके लिए जाति भेद ही नहीं, उन्होंने हर बुराई से संघर्ष किया. उन्होंने कहा- ‘जब तक करोड़ों लोग गरीबी, भुखमरी और अज्ञान का शिकार हो रहे हैं, मैं हर उस व्यक्ति को शोषक मानता हूं, जो उनकी ओर जरा भी ध्यान नहीं दे रहा है.’

उन्होंने कहा था – ‘समता का विचार सभी समाजों का आदर्श रहा है. संपूर्ण मानव जाति के विरुद्ध जन्म, जाति, लिंग भेद अथवा किसी भी आधार पर समता के विरुद्ध उठाया गया कोई भी कदम एक भयानक भूल है, और ऐसी किसी भी जाति, राष्ट्र या समाज का अस्ति‍त्व कायम नहीं रह सकता, जो इसके आदर्शों को स्वीकार नहीं कर लेता.’

स्वामी विवेकानंद का स्मरण इन अभिशापों से मुक्ति का मूलमंत्र है.

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January 11th 2021, 4:02 pm

अमेरिका में दोहरे मापदंडों की मार

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बलबीर पुंज

अमेरिका में 6 जनवरी को जो कुछ हुआ, उससे शेष विश्व स्वाभाविक रूप से भौचक है. परंतु क्या यह सत्य नहीं है कि अमेरिकी सार्वजनिक जीवन में हिंसा का अतिक्रमण पहले ही हो चुका था? जब तक ट्रंप विरोधी भीड़ हिंसक थी, तब तक उनका प्रदर्शन- जनाक्रोश और देशभक्ति था. 25 मई, 2020 को एक श्वेत पुलिसकर्मी द्वारा अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की गर्दन दबाकर निर्मम हत्या के बाद भड़की हिंसा ने अमेरिका के 2,000 कस्बों-शहरों को अपनी कब्जे में ले लिया था. भीषण लूटपाट के साथ करोड़ों-अरबों की निजी-सार्वजनिक संपत्ति को फूंक दिया गया था. हिंसा में 19 लोग मारे गए थे, जबकि 14 हजार लोगों की गिरफ्तारियां हुई थी. इस हिंसा का नेतृत्व वामपंथी अश्वेत संगठन – एंटिफा (Antifa) कर रहा था. तब कई वाम-वैचारिक अमेरिकी राजनीतिज्ञों और पत्रकारों ने इस अराजकता को न केवल उचित ठहराया, अपितु इसे प्रोत्साहन भी दिया.

एंटिफा प्रायोजित उत्पात पर सीएनएन के प्रख्यात टीवी एंकर क्रिस कूमो ने कहा था, “किसने कहा है कि प्रदर्शनकारियों को शांतिपूर्ण रहना चाहिए?” वही भारतीय मूल की अमेरिकी सांसद और कश्मीर मामले में पाकिस्तान हितैषी प्रमिला जयपाल ने एक ट्वीट में अश्वेतों के हिंसक प्रदर्शन को देशभक्ति की संज्ञा दी थी. इसी तरह एक अन्य अमेरिकी सांसद अलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज़ ने तो ट्वीट करते हुए यहां तक लिख दिया था, “प्रदर्शनकारियों का लक्ष्य ही होना चाहिए कि अन्य लोगों असुविधा हो.” सबसे बढ़कर अमेरिका की भावी उप-राष्ट्रपति और भारतीय मूल की कमला हैरिस ने एंटिफा प्रोत्साहित हिंसा का समर्थन करते हुए कहा था, “अब यह रुकने वाला नहीं है.”

सच तो यह है कि पराजित ट्रंप के समर्थकों द्वारा कैपिटल हिल पर हमला अमेरिकी इतिहास में पहली बार नहीं हुआ है. 24 अगस्त, 1814 को अमेरिका-इंग्लैंड युद्ध और 16 अगस्त, 1841 को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा जॉन टायलर द्वारा अमेरिकी बैंक की पुनर्स्थापित संबंधी निर्णय के समय भी कैपिटल हिल पर बेकाबू भीड़ ने हमला किया था.

अमेरिकी संसद पर भीड़ द्वारा हालिया हमले की पृष्ठभूमि में यदि भारतीय संदर्भ देखें, तो यहां भी स्थिति लगभग एक जैसी ही है. भारत का एक विकृत वर्ग, जिसका संचालन वामपंथी-जिहादी मिलकर कर रहे है – वह मुखर होकर पराजित ट्रंप समर्थित भीड़ द्वारा अमेरिकी संसद पर हमले को लोकतांत्रिक पवित्रता पर आघात की संज्ञा तो दे रहा है, किंतु पिछले छह वर्षों से भारतीय लोकतंत्र के प्रतीक संसद द्वारा पारित कानूनों की पवित्रता को भंग करना और देश में हिंसा को भड़काने के लिए “एंटिफा मॉडल” को दोहराना चाहते हैं.

भारतीय संसद द्वारा पारित नागरिकता संशोधन कानून (सी.ए.ए.) का विरोध करते हुए मजहबी शाहीन-बाग प्रदर्शन, जिहादी हिंसा और नाकेबंदी करना, तो अब कृषि सुधार संबंधित कानून विरोधी आंदोलन के नाम पर दिल्ली की सीमा को जबरन बंद रखकर करोड़ों लोगों के संवैधानिक अधिकारों को कुचलना- इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है. क्या यह सत्य नहीं कि भाजपा को प्रचंड जनादेश उसके घोषणापत्र पर भी मिला है? अब तक उसने जितने भी निर्णय लिए हैं और नीतियां-कानून बनाए हैं, वह सब उसके घोषित वादों के अनुरूप ही है.

इसी बीच किसान आंदोलन में शामिल प्रदर्शनकारियों के एक वर्ग का नेतृत्व कर रहे भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष टिकैत ने धमकी दी है कि यदि सरकार ने उनकी बात नहीं मानी, तो 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के दिन राजपथ पर किसान-मजदूर कब्जा करेंगे. इन लोगों को वामपंथियों-जिहादी के अतिरिक्त मोदी विरोधी विपक्षी दलों और स्वघोषित सेकुलरिस्टों-उदारवादियों का भी प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन प्राप्त है. क्या राजपथ को कब्जाने की घुड़की दिल्ली में कैपिटल हिल प्रकरण को दोहराने का प्रयास नहीं है?

विरोधाभास देखिए कि भारत में वामपंथी-जिहादी कुनबे के लिए अमेरिकी संसद पर हमला और बिडेन के निर्वाचन को अस्वीकार करना अलोकतांत्रिक है. किंतु 2014 से लगातार दो बार विशाल बहुमत पाकर निर्वाचित मोदी सरकार द्वारा संसद में पारित कानूनों को भीड़तंत्र से रोकना, आतंकवादियों-अलगाववादियों को घूमने की स्वतंत्रता देना, शहरी-नक्सलियों द्वारा मोदी की हत्या का पड्यंत्र रचना, कश्मीर से पांच लाख हिन्दुओं का पलायन और भारत/हिन्दू हितों का खुला विरोध- लोकतांत्रिक है.

कटु सत्य तो यह है कि अमेरिका में ट्रंप समर्थकों ने उसी रूग्ण युक्ति को अपनाया है, जिसका उपयोग वामपंथी-जिहादी गठबंधन वर्ष 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विकृत तथ्यों और झूठे विमर्श के आधार पर सत्ता से हटाने हेतु कर रहे हैं, ताकि एक स्वस्थ लोकतांत्रिक जनादेश को हाईजैक किया जा सके. वास्तव में, इस वामपंथी-जिहादी कुनबे को भ्रम है कि दुनिया यदि किसी के पास बुद्धि और ज्ञान है, तो वह उनके पास है. यदि किसी ने उनके विचारों से असहमति रखने का दुस्साहस किया, तो वह स्वाभाविक रूप से उनका न केवल विरोधी होगा, अपितु शत्रु भी होगा.

कैपिटल हिल पर पराजित ट्रंप समर्थकों के हमले को लेकर अमेरिका के भावी राष्ट्रपति बिडेन ने एक महत्वपूर्ण वक्तव्य दिया है. उनके अनुसार, “हमने जो कुछ देखा, वह असहमति/असंतोष नहीं था. यह कोई अव्यवस्था नहीं थी. वह विरोध भी नहीं था. यह अराजकता थी. वे प्रदर्शनकारी नहीं थे. उन्हें प्रदर्शनकारी कहने की हिम्मत मत करना. वे दंगाई भीड़ थी. विद्रोही और घरेलू आतंकवादी थे.” इस बयान की पृष्ठभूमि में भारतीय संसद द्वारा पारित कानूनों के खिलाफ हिंसक प्रदर्शनों को अब किस श्रेणा में रखा जाएगा?

सच तो यह है कि कश्मीर में सेना पर पथराव को सही ठहराने, सीएए विरोधी शाहीन बाग रूपी जिहादी प्रदर्शन, मजहबी हिंसा और किसान आंदोलन के नाम पर 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के दिन राजपथ को कब्जाने की धमकी के साथ अमेरिका में अश्वेत अधिकारों के नाम पर हुई वीभत्स आगजनी लूटपाट को प्रोत्साहन देने और समर्थन देने वालों को कोई अधिकार नहीं कि वे ट्रंप समर्थित हिंसक भीड़ द्वारा कैपिटल हिल पर हमले की आलोचना करें. निःसंदेह, अमेरिकी संसद पर बौखलाई भीड़ का हमला निंदनीय और अस्वीकार्य है, क्योंकि सभ्य समाज में हिंसा और बलप्रयोग का कोई स्थान नहीं. क्या इस संदर्भ में हम दोहरे मापदंडों को स्वीकार करने का खतरा मोल ले सकते हैं?

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार, पूर्व राज्यसभा सांसद हैं.)

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January 11th 2021, 4:02 pm

निधि समर्पण अभियान – 40 लाख परिवारों में जाएंगे एक लाख कार्यकर्ता

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चित्तौड़ (विसंकें). अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर के लिए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र की ओर से पूरे देश में 15 जनवरी से शुरू होने जा रहे निधि समर्पण अभियान के निमित्त भीलवाड़ा में आदर्श विद्या मंदिर परिसर में विभाग और प्रान्त के समिति के कार्यकर्ताओ की बैठक हुई.

चित्तौड़ प्रान्त के अभियान प्रमुख कौशल गौड़ ने बताया कि बैठक में उपस्थित बांसवाड़ा, उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़, भीलवाड़ा, अजमेर, कोटा, और बारां विभाग के अभियान के कार्यकर्ताओं ने भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण में बढ़-चढ़ कर सहयोग व समर्पण करने का संकल्प लिया और तय किया कि चित्तौड़ प्रांत के 27 जिलों में 154 खंड के 15302 ग्रामों और 66 नगरों की 578 बस्ती के 40 लाख परिवारों में, बीस हज़ार टोलियों के माध्यम से एक लाख राम भक्त समर्पण संग्रह करने के लिए पहुंचेंगे.

बैठक में आह्वान किया गया कि हर रामभक्त स्वयं भी निधि समर्पण का संकल्प ले, अपने परिवार के सदस्यों को श्रीराम के इस कार्य हेतु संकल्प दिलवाना है. अपने आसपास रहने वाले परिवारों से भी भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर बनाने में सहयोग समर्पण करने का आग्रह करे.

बैठक में पत्रक, फोल्डर एवं श्रीराम मंदिर के चित्र का विमोचन किया गया. जिसमें अयोध्या में बनने वाले भव्य राम मंदिर हेतु अभियान की, और मंदिर की सम्पूर्ण जानकारी उपलब्ध है. यह पत्रक समर्पण संग्रह करते हुए दान दाताओं को गृह संपर्क के समय दिए जाएंगे.

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January 11th 2021, 4:02 pm

अयोध्या – ‘श्री’ की पुनर्स्थापना से संवरेगी श्रीराम की नगरी

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उदयपुर (विसंकें). विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक दिनेश चंद्र ने कहा कि मंदिर परिसर में ही जगतजननी सीता मैया का भी भव्य मंदिर स्थापित होगा. अयोध्या में बन रहे भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर के साथ अयोध्या नगरी ‘श्री’ से भी संवर जाएगी. तब धरती माता में समा जाने के दौरान श्री-हीन हुई अयोध्या नगरी पुनः अपना वैभव प्राप्त करेगी.

उदयपुर में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र निधि समर्पण समिति के कार्यालय में पत्रकारों को उन्होंने जानकारी दी कि मंदिर के 70 एकड़ परिसर में ही माता सीता का भी मंदिर बनेगा, साथ ही अभी मौजूद सीता रसोई में ही मुख्य प्रसाद तैयार होगा जो दर्शनार्थियों को दर्शनोपरांत बांटा जाएगा. अयोध्या में सिर्फ श्रीराम मंदिर की ही योजना नहीं बनी है, अपितु पूरी अयोध्या नगरी को ही वैभवपूर्ण बनाने की कार्ययोजना पर विचार हुआ है. वहां विविध भाषाओं में लिखी गई रामायण का संग्रहालय भी बनेगा और शोध केन्द्र भी. वास्तु के मद्देनजर 70 एकड़ जमीन में आ रहे कोनों को सही करने के लिए जिन भी परिवारों की भूमि-भवन वहां आ रहे हैं, उन्हें आग्रहपूर्वक और उनकी समुचित व्यवस्था के साथ भगवान श्रीराम के कार्य में समाहित किया जाएगा.

एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि धर्मशालाएं आदि भी बनेंगी, लेकिन वे मंदिर परिसर में नहीं होंगी. इसके लिए सरकार व स्थानीय प्रशासन स्थान चिह्नित कर चुके हैं. विभिन्न समाजों ने वहां धर्मशालाएं व अन्य सुविधाओं की स्थापना के लिए अनुमति मांगी है. मंदिर निर्माण के साथ वहां आने वाले रामभक्तों के लिए इन सुविधाओं की भी उपलब्धता हो जाएगी. मंदिर परिसर में अधिकृत कार्मिकों के अलावा किसी को भी रात में रुकने की अनुमति नहीं होगी. उन्होंने बताया कि मंदिर का पहला चरण ढाई से तीन साल में पूरा करने का लक्ष्य है, जिसमें गर्भगृह और पहली मंजिल का कार्य शामिल है, ताकि इस चरण के साथ ही मंदिर में दर्शन का क्रम शुरू किया जा सके.

उन्होंने कहा कि देश इतिहास लिखने जा रहा है. 492 वर्ष के संघर्ष में मंदिर के लिए 76 युद्ध लड़े गए, 77वां संघर्ष 1990 व 1992 में किया गया. इसके बाद लम्बी कानूनी लड़ाई रही और 09 नवम्बर, 2019 को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने मंदिर निर्माण की राह प्रशस्त की. करोड़ों देशवासियों की अटूट श्रद्धा के केन्द्र भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर के लिए नगरवासी, ग्रामवासी, गिरिवासी, द्वीपवासी, तटवासी, हर समाज, हर वर्ग का योगदान रहे, इसी विचार को लेकर मंदिर निर्माण के लिए निधि समर्पण अभियान मकर संक्रांति (15 जनवरी) से शुरू हो रहा है. इस अभियान में चाहे कण मात्र भी हो, हर परिवार में समर्पण का भाव जगाकर उनसे सहयोग लिए जाने के लिए लाखों कार्यकर्ता घर-घर पहुंचेंगे. देश के 11 करोड़ से अधिक परिवारों तक रामभक्त कार्यकर्ता पहुंचेंगे और उनमें समर्पण की प्रेरणा जगाकर मंदिर निर्माण में सहयोग का आग्रह करेंगे.

कोरोना काल में उत्पन्न आर्थिक स्थितियों के मद्देनजर एक सवाल पर उन्होंने कहा कि समर्पण भाव से हमारा समाज युगों से परिपूर्ण है. पीढ़ियों के संस्कार आज भी विद्यमान हैं जो विषम परिस्थितियों में भी दान-समर्पण की भावना को स्थापित किए हुए हैं. उन्होंने उदाहरण दिया कि अयोध्या में ही मंदिर के पूर्वी द्वार पर भिक्षावृत्ति से जीवनयापन करने वाले एक याचक ने अचानक समिति कार्यालय पहुंचकर यह भावना प्रकट की कि पिछले माह की प्राप्त भिक्षा में से वह 10 प्रतिशत मंदिर निर्माण में समर्पित करना चाहता है. दूसरा उदाहरण उन्होंने एक परिवार का दिया कि जिस परिवार के सदस्य कोरोना ग्रस्त होकर स्वस्थ हुए, उस परिवार की माता ने बेटे के एक लाख और पांच लाख तक के समर्पण को कम बताते हुए कहा कि कम से कम 11 लाख रुपये से कम समर्पण मत करना. ऐसे उदाहरणों से यह भावना स्थापित है कि राम रोम-रोम में विद्यमान हैं, राम के काज के लिए कोई भी नहीं चूकना चाहेगा. उन्होंने कहा कि समिति के कार्यकर्ता सभी के पास पहुंचेंगे, यहां तक कि विरोधियों के पास भी पहुंचकर समर्पण का आग्रह किया जाएगा.

उन्होंने कहा कि 11 करोड़ परिवारों तक पहुंचने के आंकड़े तीर्थक्षेत्र के समर्पण कूपन से स्वतः सामने आएंगे. कूपन पर कोड अंकित किया गया है ताकि कोई नकल करने का प्रयास करता है तो पकड़ में आ सकेगा. इस अभियान में जुटे कार्यकर्ता दिन भर में जमा राशि रात को अपने पास नहीं रख सकेंगे, साथ ही अभियान में कोई भी अकेला किसी के घर नहीं जाएगा. स्थानीय क्षेत्र के 4-5 कार्यकर्ताओं की टोलियां ही घर-घर पहुंचेंगी.

इस अवसर पर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के फोल्डर व पत्रक का विमोचन भी किया गया.

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January 11th 2021, 4:02 pm

अंग्रेज़ भारत से क्यों भागे…? / 2

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जबलपुर में सेना का आंदोलन

प्रशांत पोळ

मुंबई के नौसैनिकों के आंदोलन से अंग्रेजी शासन दहल गया था. नौसेना में इतना असंतोष होगा और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के प्रति सैनिकों में इतना ज्यादा आकर्षण होगा, इसका अंदाज ब्रिटिश हुकूमत को नहीं था. इसलिये भारत में अभी ५-१० वर्ष और रहना या फिर वापस ब्रिटेन चले जाना इस विषय पर उनमें मंथन चल रहा था.

तभी एक और घटना हुई और अंग्रेजों का भारत छोड़ने का निर्णय पक्का हुआ…!

जबलपुर में सेना के सिग्नल कोर के जवानों ने आंदोलन छेड़ दिया !

मुंबई का आंदोलन शनिवार २३ फरवरी, १९४६ को थमा. और एक सप्ताह भी गुजरा नहीं कि जबलपुर से समाचार आया, ‘सेना के जवानों ने आंदोलन छेड़ दिया है’. अंग्रेज अधिकारियों को बैरेक्स में बंधक बना कर रखा है, और अस्त्र शस्त्रों पर कब्जा कर लिया है !

जबलपुर यह देश के बीचोंबीच बसा एक सुंदर सा शहर है. सन् १८१८ में मराठों को परास्त कर अंग्रेजों ने जबलपुर में प्रवेश किया था. यहां का वातावरण, हरियाली, पहाड़ी और आबोहवा देखकर अंग्रेजों ने यहां सैन्यतल बनाने का निर्णय लिया.

सन् १९११ में, प्रथम विश्वयुद्ध के प्रारंभ में, अंग्रेजों को संचार सेवा की महत्ता समझी थी. उन्हीं दिनों बेतार (Wireless) संचार का आविष्कार हुआ था. इसलिये संचार सेवा के प्रशिक्षण की एक कोर, अंग्रेजों ने १५ फरवरी, १९११ को जबलपुर में स्थापना की, जिसे ‘Signal Training Centre’ नाम दिया गया. तब से आज तक, सेना के सिग्नल कोर में आने वाले प्रत्येक जवान और अधिकारी को प्रशिक्षण के लिये जबलपुर आना ही पड़ता है.

सन् १९४६ में जबलपुर में इंडियन सिग्नल कॉर्प्स के दो बड़े केंद्र थे. एक था सिग्नल ट्रेनिंग सेंटर (STC), जिसमें नंबर १ सिग्नल ट्रेनिंग बटालियन (सेना) और नंबर २ और ३ सिग्नल ट्रेनिंग बटालियन (तकनीकी) ये तीन यूनिट शामिल थे.

दूसरा था ‘इंडियन सिग्नल डेपो एंड रेकॉर्ड्स’. एसटीसी के कमांडेंट थे कर्नल एल. सी. बॉईड और कर्नल आर. टी. एच गेलस्टन, सिग्नल डेपो एंड रेकॉर्ड्स के कमांडेंट थे. ये दोनों आस्थापनाएं जबलपुर में स्थित ब्रिगेडिअर एच. यु. रिचर्ड्स के अधीन थीं, जो १७ इंडियन इन्फेंट्री ब्रिगेड के प्रमुख थे. उन दिनों, जबलपुर का सैन्य क्षेत्र नागपुर मुख्यालय के अंतर्गत आता था. नागपुर के मुख्यालय में बैठे मेजर जनरल एच. एफ. स्किनर इस सारे परिक्षेत्र के प्रमुख थे. और उनकी रिपोर्टिंग रहती थी, आगरा में स्थित सेंट्रल कमांड प्रमुख को.

संचार प्रशिक्षण के इस मुख्यालय के सैनिकों ने, मुंबई का सैनिकी आंदोलन थमने के ठीक चार दिन बाद, अर्थात् बुधवार २७ फरवरी, १९४६ को, अचानक आंदोलन की घोषणा की. इसकी शुरुआत की, नंबर २ सिग्नल ट्रेनिंग बटालियन की G कंपनी ने, सुबह ठीक ९:२० बजे. इस दिन सुबह ७ बजे की परेड ठीक से हुई जो सुबह ८.३० बजे समाप्त हुई. इसके बाद, जब सब लोग नाश्ता ले रहे थे, तभी लगभग २०० वर्कशॉप ट्रेनी कतार में खड़े होकर घोषणाएं देने लगे. ये सभी आर्मी यूनिफॉर्म में थे और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘जय हिंद’ की नारे लगा रहे थे. इनमें से कुछ लोगों ने कांग्रेस का झंडा भी उठाया था.

इनके सूबेदार मेजर अहमद खान ने जब इन्हें रोकने का प्रयास किया, तो जवानों ने मना किया. खान ने नाश्ता कर रहे अफसरों को टेलिफोन किया. वे भी दौड़े भागे आए. कंपनी कमांडर डी. सी. डेशफिल और ट्रेनिंग ऑफिसर जे नॉल्स भी पहुंच गए थे. लेकिन ये जवान किसी की भी सुनने के मूड में नहीं थे.

इन जवानों की बुलंद आवाज, नंबर २ सिग्नल ट्रेनिंग बटालियन में पहुंच रही थी. वहां के बाकी बचे जवानों को साथ लेकर यह जुलूस नंबर ३ सिग्नल ट्रेनिंग बटालियन पहुंचा. अब तक डेढ़ हजार से ज्यादा जवानों का, अनुशासित जुलूस तैयार हो गया था.

इन सबके असंतोष के कारण वही थे जो, मुंबई के नौसैनिकों के थे. इन्हें भी अंग्रेज अफसरों का भारतीय जवानों के प्रति दुर्व्यवहार अखरता था. इन्हें भी नेताजी सुभाषचंद्र बोस की ‘आजाद हिंद फौज’ के सेनानियों को सजा देना, मृत्युदंड देना मंजूर नहीं था.

ये सभी रेडियो सिग्नल यूनिट के जवान थे. संचार के क्षेत्र में होने के कारण, इन सभी को मुंबई में नौसेना के जवानों ने जो हिम्मत दिखाई थी, उसकी जानकारी थी. बाद में इन नौसैनिकों को अपने हथियार ब्रिटिश अफसरों के सामने डालने पड़े थे, ये भी उन्हें मालूम था. इन सबके बावजूद जबलपुर के इन सैनिकों नें आंदोलन छेड़ा था.

ये जवान जब रास्तों पर आ गए, तो उनकी संख्या बढ़ने लगी थी. धीरे धीरे यह १७०० तक जा पहुंची. ये जवान अहिंसक थे. देशभक्ती के, आजाद हिंद सेना के और सुभाष बाबू के ये नारे लगा रहे थे. इनका प्रिय नारा था – ‘जय हिंद’ !

लगभग ४ दिनों तक यह आंदोलन चला. दूसरे दिन अर्थात २८ फरवरी, १९४६ को सिग्नल डिपो और रिकॉर्ड्स में भी आंदोलन की आग भड़क चुकी थी. लगभग २०० क्लर्कों ने जुलूस की शक्ल में डिपो बटालियन पर धावा बोला. १९४६ का फरवरी, २८ दिनों का था. दिनांक १ मार्च को सिग्नल बटालियन और सिग्नल डिपो के जवानों ने सदर की सड़कों पर नारे लगाते हुए जुलूस निकाला.

२ मार्च को अंग्रेजों ने ‘सोमरसेट लाईट इंफंट्री’ को इन आंदोलनकारी जवानों के सामने खड़ा किया. यह पूर्णत: अंग्रेज सिपाहियों की फौज थी. इसे प्रिंस अल्बर्ट की सेना भी कहा जाता था. (ठीक २ वर्ष बाद यह सेना, दिनांक २८ फरवरी, १९४८ को इंग्लैंड वापस लौट गई थी.)

सोमरसेट लाईट इंफेंट्री के अंग्रेज सैनिकों को इन आंदोलनकारी सिग्नल्स के जवानों के प्रति सहानुभूति होने का प्रश्न ही नहीं था. उन्होंने अत्यंत बर्बरता से जवानों के इस आंदोलन को कुचला. इस आंदोलन के ८ प्रमुख नेताओं को गोलियों से जख्मी किया. ३२ जवान गंभीर रूप से घायल हो गए.

इन आंदोलनकारी जवानों ने स्थानीय कांग्रेस से आंदोलन को समर्थन देने के लिये संपर्क किया था. किंतु उन्हें निराशा हाथ लगी. कांग्रेस के नेताओं ने उनका समर्थन करने से साफ मना किया. उन्होंने आंदोलन कर रहे जवानों से मिलकर, उन्हें तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना आजाद का पत्र दिखाया. जिसमें उन्हें बैरेक्स में वापस जाकर सामान्य व्यवहार करने के लिये कहा गया था.

३ मार्च, १९४६ को एक पत्रकार वार्ता में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ‘जबलपुर विद्रोह’ का उल्लेख किया और कहा – “There were also some political demands. Such demands should not normally be made on the basis of a strike. We have seen recently strikes by American and British servicemen.”

उन दिनों जबलपुर से ‘सेंट्रल असेंब्ली’ में सेठ गोविंददास प्रतिनिधित्व करते थे. जबलपुर का यह आंदोलन जब चल रहा था, तब दिल्ली में ‘सेंट्रल असेंब्ली’ का सत्र भी चल रहा था. शुक्रवार दिनांक १५ मार्च को सेठ गोविंददास ने यह मुद्दा दिल्ली की सेंट्रल असेंब्ली में उठाया. सरकार के वॉर सेक्रेटरी फिलिप मेसन ने इस पूरे घटनाक्रम का सरकारी निवेदन किया. उनके अनुसार जबलपुर के इस ‘विद्रोह’ में १७१६ सिग्नल के जवान शामिल थे. इनमें से ३५ जवान गंभीर रूप से घायल हुए. इन्होंने किसी भी गोली चलने की घटना से इंकार किया.

३ मार्च, १९४६ की रात होते होते, बचे खुचे सिग्नल्स के जवान अपने अपने बैरेक्स में लौट गए. और जबलपुर की सेना का यह आंदोलन शांत हो गया. बाद में ८० जवानों का कोर्ट मार्शल होकर उन्हें पगार और पेंशन से हाथ होना पड़ा. ४१ जवानों को जेल भेजा गया.

लेकिन इसका परिणाम गहरा था, बहुत ज्यादा गहरा. अंग्रेजी हुकूमत ऊपर से नीचे तक हिल गई. नौसेना के आंदोलन से, अंग्रेजी हुकूमत को जबरदस्त धक्का अवश्य लगा था. फिर भी उनको लग रहा था कि, नौसेना में यदि असंतोष बढ़ता भी है, तो भी वह देश की बाहरी सीमा तक ही सीमित रहेगा. लेकिन यदि थल सेना के किसी भी यूनिट में असंतोष पनपता है, तो वह पूरे देश में और देश की सेना में फैलेगा. आज नहीं तो कल हमें वापस इंग्लैंड जाना ही है. किंतु यदि इस प्रकार से सेना में असंतोष पनपेगा, तो हमें बेईज्जत होकर लौटना पड़ेगा. और शायद अनेक अंग्रेज अफसरों / जवानों को जीवित वापस लौटना संभव न हो!

इसलिये उस समय के अखंड भारत के आर्मी चीफ जनरल सर क्लॉडे आचिनलेक ने लंदन में अनेक गोपनीय केबल (टेलिग्राम) भेजे. ५ सितंबर, १९४६ को उन्होंने स्पष्ट रूप से ब्रिटिश प्रशासन से और प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली से यह आग्रह किया कि जितनी जल्दी हो सके भारत को सत्तातंरण (Transfer of Power) कर दें !

जनरल वी के सिंह ने भारत की स्वतंत्रता में सैन्य शक्ति का योगदान इस विषय पर एक विस्तृत पुस्तक लिखी है, “Contribution of the Armed Forces to the Freedom Movement of India.” इस पुस्तक में उन्होंने जबलपुर में सिग्नल्स के जवानों ने किये हुए आंदोलन के महत्व को अधोरेखित किया है.

विंग कमांडर (रिटायर्ड) प्रफुल बक्शी ने भी जबलपुर के इस आंदोलन के बारे में विस्तृत लिखा है. वे लिखते हैं, “There is little information about the mutiny in the Army’s Signals Training Centre in Jabalpur, in February 1946. A series of mutinies took place and the British thought it’s time to leave. They, in fact, brought Independence forward and left the country in a hurry.”

Sunday Guardian के १८ अक्तूबर, २०१५ के अंक में छ्पे लेख में नवतन कुमार लिखते हैं, “The Jabalpur mutiny, taking place soon after the Naval mutiny, became a matter of grave concern for the British. It is believed that around 40-50 soldiers were court-martialled and dismissed without pay and pension. Many others were sent to prison. The British hushed up the incident and destroyed most records.

जबलपुर का यह आंदोलन, जिसने तत्कालीन आर्मी चीफ आचिनलेक को भी, सोचने पर विवश कर दिया, इतिहास में लुप्त क्यों है, इसका बहुत ज्यादा उल्लेख नहीं मिलता. इसका कारण है, अंग्रेज इस आंदोलन के समाचार को दबाना चाहते थे. इसलिये सॉमरसेट लाइफ इंफेंट्री के अंग्रेज अफसरों ने, इस आंदोलन को शांत करने के बाद पहला काम किया, तो इस आंदोलन से संबंधित सभी कागजात / दस्तावेज नष्ट कर दिये. अंग्रेज नहीं चाहते थे कि जबलपुर का यह समाचार, सेना के अन्य यूनिट्स में पहुंचे और वहां असंतोष निर्माण हो.

स्वाभिमानी और स्वतंत्र रहे गोंडवाना की राजधानी जबलपुर (पुराना नाम गढ़ – मंडला) ने अंग्रेजों को तय समय से पहले भगाने के लिये विवश करने में अपनी भूमिका निभाई थी, जो अभी तक इतिहास के पन्नों में कहीं गुम सी हो गयी थी..!

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January 11th 2021, 4:02 pm

नौ देशों से मिला कोरोना वैक्सीन उपलब्ध करवाने का आग्रह

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नई दिल्ली. भारत सरकार द्वारा कोरोना वायरस की दो वैक्सीन को इमर्जेंसी उपयोग की स्वीकृति प्रदान करने के साथ ही दुनिया की निगाहें अब भारत पर टिकी हैं. दुनिया के अधिकांश देश भारत की कोरोना वैक्सीन मंगाना चाहते हैं. विभिन्न देशों ने भारत से वैक्सीन उपलब्ध करवाने का अनुरोध करना प्रारंभ कर दिया है. वहीं भारत भी मानवा सेवा का अपने उद्देश्य पूरा करने के लिए तत्पर है.

ब्राजील के राष्ट्रपति जायर बोलसोनारो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर भारत बायोटेक- एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन की 20 लाख डोज तत्काल देने का अनुरोध किया है. अमेरिका के बाद ब्राजील में कोरोना के सबसे ज्यादा केस सामने आए हैं. यहां कोरोना से अब तक 2,01,542 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि इस बीमारी की चपेट में 80,15,92O लाख लोग आ चुके हैं.

हालांकि, अभी भारत की ओर से तैयार योजना के अनुसार कोरोना वैक्सीन पहले पड़ोसी देशों को दी जाएगी, उसके बाद अन्य देशों का नंबर आएगा.

कोरोना महामारी के बीच दुनिया को इसकी वैक्सीन का बेसब्री से इंतजार है. भारत में कोरोना की दो वैक्सीन के इस्तेमाल की इजाजत मिलने के बाद ब्राजील, मोरक्को, सऊदी अरब, म्यांमार, बांग्लादेश, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों ने भारत से वैक्सीन की आधिकारिक तौर पर मांग की है. हालांकि, कोरोना वैक्सीन के वितरण में भारत सरकार बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, श्रीलंका और अफगानिस्तान जैसे पड़ोसी देशों को तवज्जो देगी. अभी भारत की ओर से तैयार योजना के अनुसार कोरोना वैक्सीन पहले पड़ोसी देशों को दी जाएगी, उसके बाद अन्य देशों का नंबर आएगा.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि भारत शुरू से ही दुनिया के साथ कोरोना की जंग लड़ रहा है. हम इस दिशा में सहयोग करने को अपने कर्तव्य के तौर लेते हैं. हमारी कोशिश है कि इस जंग में हम दुनिया की ज्यादा से ज्यादा मदद कर सकें.

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January 11th 2021, 4:02 pm

जम्मू कश्मीर – “28,400 करोड़ रुपये की नई औद्योगिक नीति से बदलेगी राज्य की किस्मत”

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जम्मू कश्मीर. प्रदेश में उद्योगों के माध्यम से विकास के लिए सरकार ने 28, 400 करोड़ रुपये की नई औद्योगिक नीति को प्रभावी बनाने का महत्वपूर्ण निर्णय किया है. नए साल में नई औद्योगिक नीति लागू होने की घोषणा करते हुए उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने कहा कि अगले 18 वर्षों में नीति से केंद्र शासित जम्मू-कश्मीर की किस्मत बदल जाएगी.

जम्मू में संवाददाता सम्मेलन में नई औद्योगिक योजना को लागू करने की घोषणा करते हुए उपराज्यपाल ने कहा कि इसके माध्यम से प्रदेश में बीस हजार करोड़ रुपयों का निवेश जुटाया जाएगा. यह योजना प्रदेश में साढ़े चार लाख लोगों को रोजगार देगी. योजना के तहत शहरों, कस्बों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों को अधिक महत्व दिया जाएगा व इस योजना के तहत ब्लॉक स्तर तक रोजगार मुहैया करवाने में मदद की जाएगी.

मनोज सिन्हा ने कहा कि नई औद्योगिक नीति के तहत प्रदेश में रोजगार स्थापित करने वालों को चार तरह की राहतें दी जाएंगी. नई औद्योगिक नीति के तहत 17 सेक्टरों को बल दिया जाएगा. यह पहली बार है, जब जम्मू-कश्मीर में पर्यटन उद्योग को बढ़े पैमाने पर बल मिलेगा. सरकारी जमीन के साथ निजी जमीन पर उद्योग स्थापित करने में सहयोग मिलेगा. उपराज्यपाल ने बताया कि इस नीति को सफल बनाने के लिए तीन हजार एकड़ जमीन चिन्हित की गई है व लैंड बैंक बनाकर उद्योगों को बल देने की नीति भी तय की जा रही है.

वहीं सुरक्षाबलों को लेकर उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में सराहनीय कार्य कर रहे सुरक्षाबलों का मनोबल नहीं गिराया जा सकता है. लावेपोरा मुठभेड़ मामले में सारे तथ्य सामने आए हैं और उन पर गौर किया जा रहा है. प्रदेश में किसी भी प्रकार का संदेह होने की स्थिति में जांच होना एक सामान्य प्रक्रिया है.

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January 9th 2021, 6:31 am

अंग्रेज़ भारत से क्यों भागे…? / 1

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मुंबई का नौसेना आंदोलन

– प्रशांत पोळ

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की परिस्थिति सभी के लिए कठिन थी. ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल भारत को स्वतंत्रता देने के पक्ष में नहीं थे. वे अपनी युवावस्था में भारत में रह चुके थे. ब्रिटिश आर्मी में सेकेंड लेफ्टिनंट के नाते वे मुंबई, बंगलोर, कलकत्ता, हैदराबाद आदि स्थानों पर तैनात थे. नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रॉविंस में उन्होंने अफगान पठानों के विरोध में युद्ध भी लड़ा था. 1896 और 1897 ये दो वर्ष उन्होंने भारत में गुजारे. भारत की समृद्धि, यहां के राजे – रजवाडे, यहां के लोगों का स्वभाव… यह सब उन्होंने देखा था. यह देखकर उन्हें लगता था कि अंग्रेज भारत पर राज करने के लिये ही पैदा हुए हैं. इसलिये द्वितीय विश्वयुद्ध के समय विंस्टन चर्चिल की ओर से सर स्टेफोर्ड किप्स को भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने के लिए भारत भेजा गया. इस क्रिप्स मिशन ने भारतीय नेताओं को यह आश्वासन दिया कि युद्ध समाप्त होते ही भारत को सीमित स्वतंत्रता दी जाएगी.

इस आश्वासन को देने के बाद भी चर्चिल, भारत से अंग्रेजी सत्ता को निकालना नहीं चाहते थे. किंतु 26 जुलाई, 1945 में, ब्रिटेन में आम चुनाव हुए और इस चुनाव में चर्चिल की पार्टी परास्त हुई. क्लेमेंट एटली के नेतृत्व में लेबर पार्टी चुनाव जीत गई.

लेबर पार्टी ने भी चुनाव जीतने के पश्चात भारत को स्वतंत्रता देने की घोषणा नहीं की. किंतु २६ जुलाई १९४५ और १८ जुलाई १९४७ (जब स्वतंत्र भारत के बिल को ब्रिटेन की संसद ने और राजघराने ने स्वीकृति दी), इन दो वर्षों में तीन बड़ी घटनाएं घटीं, जिनके कारण अंग्रेजों को यह निर्णय लेने के लिये बाध्य होना पड़ा.

इनमें से पहली घटना थी, १९४६ के प्रारंभ में ‘शाही वायुसेना’ में ‘विद्रोह’….

जनवरी १९४६ में, ‘रॉयल एयर फोर्स’, जो आर ए एफ के नाम से जानी जाती थी, के जवानों ने असंतोष के चलते जो आंदोलन छेड़ा, उसमें वायुसेना के ६० अड्डों (एयर स्टेशन्स) में स्थित ५०,००० लोग शामिल थे.

इस आंदोलन की शुरुआत हुई ब्रह्मरौली, अलाहाबाद से. आंदोलन (हड़ताल) के इस समाचार के मिलते ही, कराची के मौरिपुर एयर स्टेशन के २,१०० वायुसैनिक और कलकत्ता के डमडम एयर स्टेशन के १,२०० जवान इस आंदोलन के साथ जुड़ गए. इसके बाद यह आंदोलन वायुसेना के अन्य अड्डों पर, अर्थात कानपुर, पालम (दिल्ली), विशाखापटनम, पुणे, लाहौर आदि स्थानों पर फैलता गया. कुछ स्थानों पर यह आंदोलन कुछ घंटों में समाप्त हुआ, तो अलाहाबाद, कलकत्ता आदि स्थानों पर इसे समाप्त होने में चार दिन लगे.

दूसरी घटना थी फरवरी १९४६ का ‘नौसेना विद्रोह..!’

घटना के पहले अनेक दिनों से, भारतीय नौसेना में बेचैनी थी. इसके अनेक कारण थे. विश्वयुद्ध समाप्त हुआ था. ब्रिटेन की हालत बहुत खराब हो गई थी. आर्थिक व्यवस्था चरमरा गई थी. इस कारण अपनी नौकरी रहेगी या नहीं, यह शंका नौसेनिकों के मन में आना स्वाभाविक था. अधिकारियों तक यह बात पहुंची भी थी. किंतु ब्रिटिश नौसेना से या ब्रिटिश सरकार से, इस बारे में स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं दिये गए थे. और न ही कोई टिप्पणी की गई थी. नौसैनिकों के वेतन में असमानता, सुविधाओं का अभाव ये कारण भी थे. लेकिन इससे भी बड़ा कारण था, आजाद हिन्द सेना के अधिकारियों पर दिल्ली के लाल किले में चल रहा कोर्ट मार्शल. इससे पहले भी ब्रिटिश सेना ने कलकत्ता में आजाद हिन्द सेना के अधिकारियों को मृत्युदंड दिया था. भारतीय सैनिकों की सहानुभूति आजाद हिन्द सेना के सेनानियों के साथ थी.

इन सभी बातों का विस्फोट हुआ १८ फरवरी, १९४६ को, मुंबई की ‘गोदी’ में, जब किनारे पर खड़ी एचएमआईएस (हिज मॅजेस्टिज इंडियन शिप) ‘तलवार’ के नौसैनिकों ने निकृष्ट दर्जे के भोजन और नस्लीय भेदभाव के विरोध में आंदोलन छेड़ दिया. उस समय नौसेना के २२ जहाज मुंबई बंदरगाह पर खड़े थे. उन सभी जहाजों को यह संदेश गया और उन सभी जहाजों पर आंदोलन का शंखनाद हुआ. ब्रिटिश अधिकारियों को उनके बैरेक्स में बंद कर दिया गया. और नेताजी सुभाषचंद्र बोस का बड़ा सा चित्र लेकर, हजारों की संख्या में इन नौसैनिकों ने एक ‘केंद्रीय नौसेना आंदोलन समिति’ बनाई और इस आंदोलन की आग फैलने लगी.

वरिष्ठ पेटी ऑफिसर मदन सिंह और वरिष्ठ सिग्नल मैन एम एस खान, सर्वानुमति से इस आंदोलन के नेता चुने गए. दूसरे दिन १९ फरवरी को इन नौसैनिकों के समर्थन में मुंबई बंद रही. कराची और मद्रास के नौसैनिकों ने भी आंदोलन में शामिल होने की घोषणा की. ‘केंद्रीय नौसेना आंदोलन समिति’ के द्वारा एक मांगपत्र जारी किया गया, जिसमें प्रमुख मांगें थी –

१. इंडियन नेशनल आर्मी (INA) और अन्य राजनैतिक बंदियों को रिहा किया जाए.

२. इंडोनेशिया से भारतीय सैनिकों को हटाया जाए.

३. अफसरों के पद पर केवल भारतीय अधिकारी ही रहें, अंग्रेज नहीं.

नौसैनिकों का आंदोलन यह सारे ब्रिटिश स्थापनाओं में, जहां-जहां भारतीय सैनिक तैनात थे, वहां फैलने लगा. एडन और बहारीन के भारतीय नौसैनिकों ने भी आंदोलन की घोषणा की. एचएमआईएस तलवार पर उपलब्ध दूरसंचार उपकरणों की सहायता से आंदोलन का यह संदेश सभी नौसैनिक अड्डों पर और जहाजों पर पहुंचाया जा रहा था.

एचएमआईएस तलवार के कमांडर एफ. एम. किंग ने, इन आंदोलन करने वाले सैनिकों को ‘सन्स ऑफ कुलीज एंड बिचेस’ कहा, जिसने आंदोलन की आग में घी डाला. लगभग बीस हजार नौसैनिक कराची, मद्रास, कलकत्ता, मंडपम, विशाखापट्टनम, अंदमान – निकोबार आदि स्थानों से शामिल हुए.

आंदोलन प्रारंभ होने के दूसरे ही दिन, अर्थात १९ फरवरी को कराची में भी आंदोलन की ज्वालाएं धधक उठी. कराची बंदरगाह में, मनोरा द्वीप पर ‘एचएमआईएस हिंदुस्तान’ खड़ी थी. आंदोलनकारियों ने उस पर कब्जा कर लिया. बाद में पास में खड़ी ‘एचएमआईएस बहादुर’ जलपोत को भी अपने अधिकार में ले लिया. इन जहाजों से अंग्रेज़ अधिकारियों को उतारने के बाद, ये नौसैनिक मनोरा की सड़कों पर अंग्रेजों के विरोध में नारे लगाते हुए घूमने लगे. मनोरा के स्थानीय वासी भी बड़ी संख्या में इस जुलूस में शामिल हो गए.

वहां के स्थानीय आर्मी कमांडर ने, बलूच सैनिकों की एक प्लाटून, इस तथाकथित ‘विद्रोह’ को कुचलने के लिए मैदान में उतारी. परंतु बलूच सैनिकों ने गोली चलाने से इंकार किया. बाद में अंग्रेजों के विश्वासपात्र, गोरखा सैनिकों को इन आंदोलनकारी सैनिकों के सामने लाया गया. लेकिन गोरखा सैनिकों ने भी गोली चलाने से मना किया.

अंततः संपूर्ण ब्रिटिश सैनिकों की प्लाटून को लाकर, इन आंदोलनकारियों को घेरा गया. ब्रिटिश सैनिकों ने इन आंदोलनकारी सैनिकों पर निर्ममता पूर्वक गोली चलाई. जवाब में नौसैनिकों ने भी गोलीबारी की. लगभग चार घंटे यह युद्ध चलता रहा. छह सैनिकों की मृत्यु हुई और तीस घायल हुए. यह समाचार कराची शहर में हवा की गति से फैला. तुरंत श्रमिक संगठनों ने ‘बंद’ की घोषणा की. कराची शहर ठप्प हो गया. शहर के ईदगाह में ३५,००० से ज्यादा लोग इकठ्ठा हुए और अंग्रेजों के विरोध में घोषणाएं देने लगे.

इससे पहले भी, १९४५ में कलकत्ता में नौसेना के सैनिकों में असंतोष पनपा था, जिसका कारण था, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ जाने वाले सैनिकों पर किया गया कोर्ट मार्शल. मुंबई के आंदोलन से कुछ पहले, कलकत्ता में ही रशीद अली को मृत्युदंड देने के कारण नौसैनिकों में बेचैनी थी, जो मुंबई आंदोलन के माध्यम से बाहर निकली.

इन सैनिकों को ‘रेटिंग्स’ (Ratings) कहा जाता था. आंदोलन के दूसरे और तीसरे दिन ये सैनिक पूरी मुंबई में लॉरियों में भरकर घूम रहे थे. रास्ते में जो भी अंग्रेज दिखा, उसे पकड़ने का भी प्रयास हुआ. १९ और २० फरवरी को मुंबई, कलकत्ता और कराची पूरी तरह से ठप हुए थे. सब कुछ बंद था. पूरे देश में, अनेक शहरों में छात्रों ने इन नौसैनिकों के समर्थन में कक्षाओं का बहिष्कार किया.

किनारों पर खड़े कुल ७८ जहाज, नौसेना के २० बड़े तल (नौसैनिक अड्डे) और लगभग २० हजार नौसैनिक इस आंदोलन में शामिल थे.

२२ फरवरी को मुंबई में यह आंदोलन चरम सीमा तक पहुंचा. मुंबई का कामगार वर्ग, इन नौसैनिकों के समर्थन में आगे आया. पुन: मुंबई बंद हुई. सारे दैनिक व्यवहार ठप्प हुए. लोकल्स को आग लगाई गई.

जब ब्रिटिश सेना ने, वायुसेना को मुंबई भेजना चाहा, तो अनेक सैनिकों ने मना कर दिया. फिर आर्मी की एक बटालियन को मुंबई में उतारा गया. तीन दिन तक आंदोलन की यह आग फैलती रही. अंग्रेजी शासन ने इन आंदोलनकारी नौसैनिकों से वार्तालाप करने के लिये वल्लभभाई पटेल और जिन्ना से अनुरोध किया. इन दोनों के आश्वासन पर २३ फरवरी १९४६ को, आंदोलन करने वाले नौसैनिकों ने आत्मसमर्पण किया और १८ फरवरी से प्रारंभ हुआ, यह नौसेना का आंदोलन शांत हुआ.

कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने इस आंदोलन का विरोध किया था.

इस आंदोलन में ग्यारह नौसैनिक और एक अफसर मारा गया था. सौ से ज्यादा नौसैनिक और ब्रिटिश सोल्जर्स घायल हुए थे.

इस आंदोलन के थमने के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने इन आंदोलनकारी सैनिकों पर कड़ाई के साथ कोर्ट मार्शल की कार्यवाही की. ४७६ सैनिकों की ‘पे एंड पेंशन’ समाप्त की. दुर्भाग्य से, डेढ़ वर्ष के बाद जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब इन निलंबित सैनिकों को भारतीय नौसेना में नहीं लिया गया. इनका अपराध इतना ही था कि आंदोलन करते समय इन सैनिकों ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस के चित्र लहराए थे !

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January 9th 2021, 6:31 am

श्रीराम मंदिर निधि समर्पण अभियान – मुस्लिम समाज के लोग भी करेंगे निधि समर्पण

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अयोध्या. संतों के मार्गदर्शन में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निधि समर्पण अभियान मकर संक्रांति से प्रारंभ होने वाला है. माघ पूर्णिमा तक देशभर में अभियान चलेगा. देशभर में कार्यकर्ताओं की टोलियों का गठन हो गया है. संतों ने समस्त लोगों से अभियान में सहयोग कर पुण्य प्राप्त करने का आह्वान किया था.

समाज के सभी वर्गों से सकारात्मक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं. आगरा में सिंधी समाज ने 50 हजार परिवारों से संपर्क करने निर्णय लिया है. वहीं, अब श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण में सहयोग के लिए मुस्लिम समाज के लोग भी आगे आने लगे हैं.

प्रख्यात समाजसेवी एवं लायंस क्लब के डिस्ट्रिक्ट चेयरमैन डॉ. नेहाल रजा तीन माह पूर्व ही मंदिर निर्माण के लिए जिलाधिकारी को 11 हजार का चेक समर्पित करने गए थे, पर उस समय मंदिर निर्माण के लिए रामलला का बैंक खाता सुनिश्चित न होने के कारण जिलाधिकारी चेक स्वीकार नहीं कर सके थे. डॉ. नेहाल जल्द ही पुन: चेक समर्पित करने के लिए जिलाधिकारी या रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के सदस्य से भेंट करने की योजना बना रहे हैं. श्रीराम की चर्चा पर, वे इकबाल की मशहूर रचना सुनाते हैं – है राम के वजूद पे, हिंदोस्तां को नाज.. अहले नजर समझते हैं, उनको इमामे हिंद.

एक अन्य समाजसेवी आफाक अहमद उर्फ भोलू भाई भी श्रीराम मंदिर के लिए निधि समर्पण की तैयारी में हैं. भोलू उन हाजी फेकू के पौत्र हैं, जो बाबरी मस्जिद के मुद्दई थे. भोलू कहते हैं – निर्णय आने के साथ विवाद खत्म हो गया और हमारे लिए श्रीराम खुदा न हों, पर खुदा के विशेष दूत के रूप में हम उनका आदर करते हैं और यदि हमें अवसर मिला, तो हमें राम मंदिर के लिए दान देकर खुशी होगी.

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January 8th 2021, 10:58 am

श्रीराम मंदिर निर्माण – सिंधी समाज के 50 हजार परिवार अर्पित करेंगे सहयोग राशि

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आगरा. अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर निर्माण में सिंधी समाज भी आर्थिक सहयोग प्रदान करेगा. समाज के प्रतिनिधि 50 हजार परिवारों से संपर्क कर सहयोग राशि लेंगे, तथा श्रीराम मंदिर निर्माण में सहयोग प्रदान करेंगे. सिंधी समाज के 50 हजार परिवारों से 51-51 रुपये सहयोग राशि के रूप में एकत्र किए जाएंगे.

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के आग्रह व योजना से मकर संक्रांति से श्रीराम मंदिर निधि समर्पण अभियान प्रारंभ हो रहा है. स्थान-स्थान पर जनजागरण के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, अभियान में लगने वाले कार्यकर्ताओं में उत्साह है.

सिंधी समाज की बैठक में सर्वसम्मति से श्रीराम मंदिर निर्माण को धनराशि एकत्र करने का प्रस्ताव पारित किया गया. जय झूलेलाल सेवा समिति के संरक्षक कमल छाबड़िया ने राम मंदिर निर्माण में सिंधी समाज के प्रत्येक परिवार की ओर से कम से कम 51 रुपये की सहयोग राशि देने का प्रस्ताव रखा. बैठक में उपस्थित समाज के लोगों ने इस पर सहमति दी. सिंधी सेंट्रल पंचायत के अध्यक्ष जीवतराम करीरा ने कहा कि शहर में करीब 50 हजार सिंधी परिवार हैं. प्रभु श्रीराम के मंदिर निर्माण में समाज भी अपनी सहभागिता दर्ज कराएगा. बैठक की अध्यक्षता कर रहे घनश्याम दास देवनानी ने कहा कि समाज हमेशा से धर्म के कामों में आगे रहा है, इसलिए हमें एक बार फिर धर्म सेवा करने का अवसर मिला है. श्रीराम मंदिर के निर्माण के लिए धनराशि एकत्र करने के लिए तीन टीमों का गठन किया गया है. अमृत मखीजा और चंद्रप्रकाश सोनी की देखरेख में यह टीमें धन एकत्रित करने का काम करेंगी.

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January 8th 2021, 7:43 am

भारत का बढ़ता प्रभाव – कोरोना वैक्सीन ऑर्डर करने की तैयारी में कजाकिस्तान, गेट्स, WHO ने की प्रशंसा

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नई दिल्ली. विश्व में भारत का प्रभाव निरंतर बढ़ रहा है. चाहे भारतीय संस्कारों, परिवार व्यवस्था, योग, आयुर्वेद को अपनाने की बात हो या फिर कोरोना से जंग में भारत का नेतृत्व करना. वहीं, अब अनेक देश कोरोना वैक्सीन को लेकर भारत के प्रयासों से आशान्वित हैं.

हाल ही में भारत में कोरोना वायरस की दो वैक्सीन भारत बायोटेक की को-वैक्सीन और सीरम इंस्टीट्यूट की कोवि-शील्ड के इमरजेंसी उपयोग को स्वीकृति प्रदान की गई. अब देश में जल्द ही टीकाकरण शुरू होने वाला है. इसके बाद से दुनिया भर में भारत के प्रयासों की सराहना हो रही है, साथ ही वैक्सीन खरीदने को लेकर कजाकिस्तान ने रुचि दिखाई है. भारत में कजाकिस्तान के राजदूत ने इसकी जानकारी दी.

कजाकिस्तान, भारत से वैक्सीन ऑर्डर करने की तैयारी में है. इसकी जानकारी भारत में कजाकिस्तान के राजदूत येरलान अलीम्बेव ने दी. इसके अनुसार कई देशों ने भारत के वैक्सीन को खरीदने के लिए रुचि व्यक्त की है.

अलीम्बेव ने कहा कि कजाकिस्तान तीन वैक्सीन का उत्पादन कर रहा है, जो दूसरे या तीसरे चरण में हैं. भारत के साथ कोई आधिकारिक बातचीत नहीं हुई है, लेकिन हम जानते हैं कि भारत में दो टीके हैं. हम दोनों देशों के अनुमोदन के बाद टीके का ऑर्डर देने के लिए भारत से बात करने के लिए तैयार हैं. भारत में पहले चरण में स्वास्थ्यकर्मियों सहित तीन करोड़ लोगों को टीका लगाया जाना है.

वहीं, भारत में महामारी को समाप्त करने के लिए एक के बाद एक फैसले लिए जा रहे हैं, जिसकी प्रशंसा में माइक्रोसॉफ्ट के सह संस्‍थापक बिल गेट्स और विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के महासचिव टेड्रोस अधनम घेब्रेसस ने ट्वीट किया.

माइक्रोसॉफ्ट के सह संस्‍थापक बिल गेट्स ने ट्वीट में कहा कि – ‘कोविड-19 से दुनिया की जंग में भारत के वैज्ञानिक पहलों और वैक्‍सीन निर्माण की क्षमता को देख खुशी हो रही है.’

इसके अलावा विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के महासचिव टेड्रोस अधनम घेब्रेसस ने भी ट्वीट कर भारत की सराहना की. कहा – ‘कोविड-19 महामारी को खत्‍म करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताते हुए भारत निर्णायक कदम उठा रहा है. यदि हम साथ मिलकर काम करेंगे तो हर जगह प्रभावी व सुरक्षित वैक्‍सीन की मौजूदगी को सुनिश्चित करा सकेंगे.’

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January 8th 2021, 7:43 am

जितनी गहरी जड़ें तुम्हारी उतने ही तुम हरियाओगे

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डॉ. मनमोहन वैद्य

सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

झारखंड की राज्य सरकार ने बहुमत से विधेयक पारित कर घोषित किया कि सरना धर्म को मानने वाले हिन्दू नहीं हैं. सरना, हिन्दू से अलग धर्म है. तभी दूसरी ओर आंध्र प्रदेश की सरकार ने भी निर्णय लिया कि अनुसूचित जनजाति के लोग हिन्दू नहीं हैं और यह मानते हुए 2021 में होने वाली जनगणना के समय उन्हें हिन्दू के स्थान पर ‘अनुसूचित जनजाति श्रेणी के अंतर्गत सूचीबद्ध किया जाएगा. यह दोनों समाचार पढ़कर इन दोनों निर्णय करने वालों में ‘भारतबोध’ व ‘हिंदुत्व’ की समझ का अभाव और राजकीय सत्ता के अहंकार का दर्शन हुआ.

हिंदुत्व कोई एक रिलिजन नहीं है. वह एक जीवन दृष्टि है ऐसा सर्वोच्च न्यायालय ने भी मान्य किया है. इस जीवन दृष्टि की विशेषता है कि यह अध्यात्म आधारित है. और भारतीय उपखंड में सदियों से रहते आए विभिन्न पद्धति से उपासना करने वाले, विविध भाषा बोलने वाले सभी लोग अपने आप को इसके साथ जोड़ते हैं. इस कारण इसके मानने वालों की, इस भूखंड में रहने वालों की एक अलग पहचान, एक व्यक्तित्व तैयार हुआ है.

उसकी एक विशेषता है – “एकं सत् विप्राः बहुधा वदन्ति.” सत्य या ईश्वर एक है, उसे अनेक नाम से लोग जानते हैं, उसे जानने के अनेक विभिन्न मार्ग हो सकते हैं. ये सभी समान हैं. इसीलिए यहूदी, पारसी, सिरीयन ईसाई अलग-अलग समय पर अपने देश से प्रताड़ित हो कर आश्रय लेने हेतु भारत के भिन्न-भिन्न भू-भागों में आए. वहां के राजा, लोगों की भाषा, लोगों की उपासना पद्धति अलग-अलग होने पर भी भिन्न वंश, भाषा और उपासना वाले, आश्रयार्थ आए लोगों के साथ यहां के लोगों का व्यवहार समान था, सम्मान का और उदारता का था. इसके मूल में यह कारण है. उस व्यक्तित्व की दूसरी विशेषता है – “विविधता में एकता को देखना.” एक ही चैतन्य विविध रूपों में अभिव्यक्त हुआ है, इसलिए इन विविध रूपों में अंतर्निहित एकता देखने की दृष्टि भारत की रही है. इसलिए भारत विविधता को भेद नहीं मानता. विविध रूपों में निहित एकता को पहचानकर उन सब की विशेषताओं को सुरक्षित रखते हुए सब को साथ लेने की विलक्षण क्षमता भारत रखता है. तीसरी विशेषता है – प्रत्येक मनुष्य (स्त्री या पुरुष) में दिव्यत्व विद्यमान है. मनुष्य जीवन का लक्ष्य ही इस दिव्यत्व को प्रकट करते हुए उस परम-दिव्यत्व के साथ एक होने का प्रयत्न करना है. यह दिव्यत्व प्रकट करने का मार्ग प्रत्येक का अलग अलग हो सकता है. वह उसका रिलिजन या उपासना होगी., इन विशेषताओं से युक्त इस व्यक्तित्व को दुनिया अनेक वर्षों से ‘हिंदुत्व’ के नाते जानती आयी है. उसे कोई भारतीय, सनातन, इंडिक अन्य कोई नाम भी दे सकता है. सभी का आशय एक ही है.

इन में से कौन सी बात सरना या जनजातीय समाज को स्वीकार नहीं है?

डॉक्टर राधाकृष्णन ने हिंदुत्व को ‘Common Wealth of all Religions’ कहा. स्वामी विवेकानंद ने 1893 के अपने शिकागो व्याख्यान में हिंदुत्व को ‘Mother of all Religions’ बताया. सर्वसमावेशकता, सर्वस्वीकार्यता, विविध मार्ग और विविध रूपों का स्वीकार करने की दृष्टि ही हिंदुत्व है. 10,000 वर्षों से भी प्राचीन इस समाज में समय-समय पर लोगों के उपास्य देवता बदलते गए हैं. ऐसे परिवर्तन को स्वीकार करना यही हिंदुत्व है.

स्वामी विवेकानन्द ने 1893 के अपने सुप्रसिद्ध शिकागो व्याख्यान में यह श्लोक उद्धृत किया था.

त्रयी साङ्ख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च.

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥ 

अर्थ- हे परमपिता!!! आपको पाने के अनगिनत मार्ग हैं – सांख्य मार्ग, वैष्णव मार्ग, शैव मार्ग, वेद मार्ग आदि. लोग अपनी रुचि के अनुसार कोई एक मार्ग पसंद करते हैं. मगर अंत में जैसे अलग अलग नदियों का पानी बहकर समुद्र में जा मिलता है, वैसे ही, ये सभी मार्ग आप तक पहुंचते हैं. सच, किसी भी मार्ग का अनुसरण करने से आपकी प्राप्ति हो सकती है.

इस भारत के विचार की सुंदरता और सार यह है कि नए नए देवताओं का उद्भव होता रहेगा. पुराने देवताओं को साथ रखते हुए नए को भी समाविष्ट करने की प्रवृत्ति – यही ‘हिंदुत्व’ है.

गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर ने स्पष्ट कहा – “अनेकता में एकता देखना और विविधता में ऐक्य प्रस्थापित करना यही है भारत का अन्तर्निहित धर्म. भारत विविधता को भेद नहीं मानता और पराये को दुश्मन नहीं मानता. इसलिए नए मानव समूह के संघात से हम भयभीत नहीं होंगे. उनकी (नए लोगों की) विशेषता पहचान कर उन्हें अपने साथ लेने की विलक्षण क्षमता भारत की है. इसलिए भारत में हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध, ईसाई परस्पर लड़ते हुए दिखेंगे, पर वे लड़ कर मर नहीं जाएंगे. वे एक सामंजस्य स्थापित करेंगे ही. यह सामंजस्य अहिन्दु  नहीं होगा. वह होगा विशेष भाव से हिन्दू.”

यह सामंजस्य की, एकता की दृष्टि ‘हिंदुत्व’ की है. अब कोई सरना या अनुसूचित जनजाति के बंधु यह कहें कि वे हिंदुत्व से कैसे अलग है. क्योंकि ‘हिंदुत्व’ किसी एक रूप (form) की बात नहीं करता, बल्कि जिस एक ही चैतन्य के ये सभी रूप हैं, उस एकता या एकत्व की दृष्टि माने ‘हिंदुत्व’ है.

कुछ वर्ष पूर्व पूर्वोत्तर (असम) के जनजाति बहुल क्षेत्र में एक प्रयोग हुआ. वहाँ के विभिन्न राज्यों की 18 जनजातियों के सम्मेलन में ये कुछ प्रश्न पूछे गए थे. 1- ईश्वर  के बारे में हमारी संकल्पना.  2- धरती के बारे में हमारी अवधारणा? 3- हम प्रार्थना में क्या मांगते हैं? 4- पाप और पुण्य की संकल्पना? 5- दूसरों की पूजा पद्धति के बारे में हमारा अभिमत क्या है? 6- क्या आप दूसरी पूजा परंपरा वालों को उनकी पूजा छुड़वाकर अपनी पूजा वालों में मिला लेना चाहते हैं?

इन प्रश्नों के पूछने पर सभी के उत्तर वही थे जो देश के किसी भी भाग में बसा हिंदू देता है. इनकी प्रस्तुति के पश्चात् यह सभी के लिए आश्चर्यजनक था कि अलग-अलग भाषाएं बोलने वाली इन सभी जनजातियों के विचार में सभी विषयों पर साम्य है और इन का भारत की आध्यात्मिक परंपरा से परस्पर मेल है.

इस भू-सांस्कृतिक इकाई में पूजा या उपासना के विविध रूपोंमें अन्तर्निहित एकता का आधार ‘हिंदुत्व’ और भारत की अध्यात्म आधारित एकात्म, सर्वांगीण, सर्व-समावेशक हिन्दू जीवन दृष्टि ही है.

ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनैतिक दृष्टि से जनजाति समाज हिन्दू ही है. राजनैतिक, सांस्कृतिक और उपासना की दृष्टि से वे अनादि काल से हिन्दू समाज का अभिन्न अंग रहे हैं.

सेमेटिक मूल के होने के कारण ईसाई और मुस्लिम रिलीजन्स में यह सामंजस्य की दृष्टि नहीं है. वे मानवता को दो हिस्सों में बाँटते हैं. और दोनों एक साथ नहीं रह सकते हैं. इसीलिए इनका कन्वर्जन का इतिहास रक्तरंजित तथा  हिंसा, लालच और धोखे का रहा है. ईशान्य भारत के जनजातियों में भी ईसाई चर्च द्वारा वहां के जनजातीय लोग हिन्दू नहीं हैं ऐसा झूठा प्रचार करने का प्रयास पहले ब्रिटिश शासक और बाद में भारतीय शासकों की सहायता से वर्षों से चलते आए हैं. इसी कारण वहाँ अलगाववादी शक्तियां भी अधिक सक्रिय हुईं. यहाँ भी नयी और अलग पहचान देने के नाम पर उनकी सांस्कृतिक जड़ों को  गहराई से धीरे धीरे उखाड़ना और फिर आत्माओं की खेती, यानि soul harvesting, करने की योजना चल रही थी. परन्तु अब वहां के जनजातियों को यह आभास हो गया है कि ईसाई के साथ रहकर हमारी सांस्कृतिक और पूजा पद्धति की पहचान खोने का संकट दिखता है. वे यह भी अनुभव कर रहे हैं कि हिन्दू समाज में, इसके साथ रहेंगे तो उनकी अलग सांस्कृतिक और पूजा की पहचान बनी रहेगी, सुरक्षित रहेगी. यह उनका विश्वास दिनों दिन बढ़ता जा रहा है. इसलिए वहां ‘डोनी पोलो’ ‘सेंग खासी’ जैसे भारतीय आस्था अभियान’ शुरू हो गए हैं और बढ़ रहे हैं. सरना आदि अन्य जनजाति के नेताओं को भी एक बार इन भारतीय आस्था अभियान (‘indigenous faith movements’) के लोगों के अनुभव से सीख लेनी चाहिए. और अपनी संस्कृति और पूजा पद्धति की विशेष पहचान सुरक्षित बचाकर उन्हें और अधिक समृद्ध करने की दृष्टि से ‘हिंदुत्व’ से अपना नाता बनाये रखना चाहिए.

जब देवताओं के कोई रूप (forms) या नाम भी नहीं थे, तब निर्गुण निराकार ईशत्व की चर्चा, आराधना और उपासना सभी करते थे. “ईशावास्यं इदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्” यही उसका आधार था.

फिर तरह  तरह के विभिन्न देवताओं के रूप के माध्यम से उसी परम तत्व की उपासना और आराधना शुरू हुई. परन्तु ये सभी प्रकृति की पूजा, पंच-महाभूत की पूजा तो करते ही थे. आगे भी अनेक अवतारी पुरुषों के माध्यम से नए नए उपासना मार्ग जुड़ते चले गए. ये सभी फिर भी भूमि, अग्नि, वृक्ष, पहाड़, सागर के माध्यम से प्रकृति पूजा करते ही हैं. इसलिए प्रकृति पूजा तो आरम्भ से ही है. उसके आगे कालक्रमानुसार नित नयी बातें जुड़ती चली गयीं. पर अन्यान्य माध्यम से प्रकृति पूजा तो हिन्दू समाज के सभी वर्गों में आज भी चल रही है. इसलिए केवल प्रकृति पूजा करने वालों के साथ सम्पूर्ण हिन्दू समाज का तादात्म्य वैसा ही बरकरार है. केवल कुछ तत्व विविधता को भेद बता कर बुद्धि भ्रम का प्रयास कर रहे हैं, उनसे सभी को सावधान रहना होगा.

केवल सरना या अनुसूचित जनजाति बंधु ही नहीं, भारत में विविध समाज वर्गों में गत कुछ वर्षों से यह प्रचलित करने का योजनाबद्ध प्रयास चल रहा है कि हम हिन्दू नहीं हैं. हिंदुत्व की जो विविधता में एकता देखने की विशेष दृष्टि है उसे भुला कर इस विविधता को भेद नाते बता कर, उभारकर हिन्दू समाज में विखंडन निर्माण करने के अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र हो रहे हैं. हिन्दू एक रहेगा तो समाज एक रहेगा, देश एक रहेगा. देश एक रहेगा तभी देश आगे बढ़ेगा. ऐसा ना हो, इसमें जिनके स्वार्थ निहित हैं वे सभी तत्व भारत विखंडन के कार्य में लिप्त हैं.

भारत विखंडन के प्रयास कैसे चल रहे हैं, इस पर अनेक शोधपरक पुस्तकें उपलब्ध हैं. इसमें एक शक्ति ईसाई चर्च की भी है. उन्हें भारत में कन्वर्जन कर ईसाई संख्या बढ़ानी है. उनकी कन्वर्जन करने वाली सभी संस्थाओं की वेबसाइट पर इसका स्पष्ट उल्लेख है. कुछ ईसाई संस्था छद्म रूप से विभिन्न नामों से समाज में पहले भ्रम, फिर विरोध, फिर विखंडन और बाद में अलगाववाद निर्माण करने के कार्य में लगी हैं. कन्वर्जन के प्रयास को वे फसल काटना (harvesting) संज्ञा देते हैं. यह फसल काटने के प्रयास ब्रिटिश शासन के समय से ही चल रहे हैं. पर भारत की सांस्कृतिक जड़ें बहुत गहरी हैं और अनेक साधु-संतों द्वारा समय समय पर आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना जगाने के प्रयास यहां पीढ़ियों से चल रहे हैं. ऐसी कोई जाति या जनजाति भारत में नहीं है, जिसमें ऐसे संत-साधु पैदा नहीं हुए. इसलिए ईसाई कन्वर्जन के सभी प्रयास अन्य देशों की तुलना में भारत में कम सफल होते दिखते हैं. तभी नए-नए हथकंडे भी अपनाये जा रहे हैं. भारत विखंडन के प्रयास करने वाले सभी तत्व आपस में अच्छा तालमेल बनाकर अपना अपना एजेंडा चलाने का प्रयास कर रहे हैं.

प्रत्येक जाति और जनजाति में आध्यात्मिक-सांस्कृतिक जागरण का काम पीढ़ी दर पीढ़ी चलते रहने से इन सभी समाज में सांस्कृतिक जड़ें गहरी उतर चुकी है. कन्वर्जन आसानी से हो इस हेतु आवश्यक हैं कि जिनका कन्वर्जन करना है, उनकी सांस्कृतिक जड़ें जिस गहराई तक पहुंची है, वहां से उखाड़ना. जब जड़ें कमजोर और उथली होंगी तो उनकी (harvesting) फसल काटना आसान होगा. इस लिए तरह तरह के तर्क देकर और हथकंडे अपनाकर भ्रम फैलाने का षड्यंत्र चल ही रहा है. इसे सभी को समझना होगा, चेतना होगा, जागृत रहना होगा. प्रसिद्ध कवि श्री प्रसून जोशी की एक कविता है –

“उखड़े उखड़े क्यों हो वृक्ष सूख जाओगे.

जितनी गहरी जड़ें तुम्हारी उतने ही तुम हरियाओगे.

जिन दो राज्यों में ये निर्णय लिए गए, वे राज्य अनेक वर्षों से ईसाई गतिविधि और कन्वर्ज़न के केंद्र रहे हैं यह महज संयोग नहीं मानना चाहिए. harvesting के लिए जड़ों की गहराई कम करना उपयोगी होता है.

तरह तरह के भ्रम फैलाकर, उसके लिए बहुत बड़ी मात्रा में धन का प्रयोग करने के व्यापक षड्यंत्र का ही यह हिस्सा है. देश भर में जड़ों से उखाड़ने के ऐसे जितने भी प्रयास चल रहे हैं, उनके पीछे के तत्व और उनकी फंडिंग को देखेंगे तो यह समझ आएगा.

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January 8th 2021, 7:43 am

चीन – तिब्बतियों के नरकीय जीवन की जिम्मेदार कम्युनिस्ट सरकार

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साल 2021 की शुरुआत हो चुकी है. बीते वर्ष में मानव जाति ने एक ऐसा भयावह रूप भी देखा है जो पूरे विश्व को ठहर कर सोचने को मजबूर करता है.

चीन और चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने जिस तरह के हथकंडे अपनाए, वह अब दुनिया के सामने आ चुके हैं. चीन का वैश्विक विरोध हो रहा है. भारत में भी चीन को लेकर इतनी नकारात्मकता बन चुकी है कि आम जनमानस में भी प्रत्येक वस्तु को लेकर सतर्कता है कि चीनी सामान से लेकर चीनी विचार का बहिष्कार किया जाए.

बीते 7 दशकों में चीन ने दुनिया में जो कुछ कमाया था, वह सब कुछ 2020 में समाप्त हो चुका है. पूरा विश्व अब चीन को संदेह के नजरिए से देखता है. लेकिन यह सब सिर्फ कोरोना वायरस (वैश्विक महामारी) की वजह से नहीं है, बल्कि ऐसे अनेक कारण हैं, जिनकी वजह से चीन आज पूरी दुनिया में बदनाम हो चुका.

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने वर्ष 2020 में तिब्बत क्षेत्र का जमकर दोहन किया. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने ना सिर्फ तिब्बती क्षेत्र का, बल्कि तिब्बती नागरिकों का भी शोषण किया. चीन तिब्बत को स्वायत्त क्षेत्र कहता है, लेकिन असल में वह तिब्बत को एक उपनिवेश की भांति उपयोग करता है. तिब्बत के प्राकृतिक संसाधनों को चीन अपनी मुख्य भूमि के लिए उपयोग करता है और तिब्बती नागरिकों को उन्हीं संसाधनों को निकालने के लिए श्रमिकों के रूप में उपयोग में लेता है.

इसे तिब्बती नागरिकों को रोजगार देने के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि वहां तिब्बतियों को जबरन बनाए श्रम शिविरों में रखा जाता है. सिर्फ इतना ही नहीं तिब्बतियों को सांस्कृतिक तौर पर भी अधीन करने के हर तरह के हथकंडे चीन द्वारा अपनाए जा रहे हैं.

तिब्बत के खनिजों का शोषण चीन की बढ़ती अर्थव्यवस्था में खासा योगदान देता है. यहां से निकलने वाली कमाई अरबों डॉलर में मानी जाती है. तिब्बत में बड़ी संख्या में क्रोमियम, तांबा, के अलावा अन्य ऐसे खनिज मौजूद है जो सिर्फ इन्हीं क्षेत्रों में पाए जाते हैं. चीन सरकार इन क्षेत्रों में खनिज संसाधनों का दोहन लंबे समय से कर रही है. लेकिन संचार साधनों की पहुंच ना होने की वजह से दुनिया के सामने यह नहीं आ पाता. तिब्बत में चीनी सरकार तिब्बतियों के दमन या उनके खिलाफ कठोर फैसले लेने में कोई कमी नहीं करती. जो चीनी सरकार के फैसलों को नहीं मानता, उन्हें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा बनाए गए यातना शिविर में डाल दिया जाता है जहां उन्हें तरह-तरह की यातनाएं दी जाती है.

चीनी कम्युनिस्ट सरकार ने कच्चे माल में लागत को कम करने के लिए बड़े पैमाने पर स्थानीय आबादी को मजदूरों के रूप में उपयोग करना शुरू कर दिया है. स्थानीय गांवों और बस्तियों की पिछले कई दशकों से उपेक्षा की गई है और वहां की आबादी बंधुआ मजदूर की तरह जिंदगी व्यतीत कर रही है.

तिब्बत के गांव में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के भवनों का निर्माण किया जाता है और वहां के लोग उन भवनों में बेहद कम तनख्वाह में कार्य करते हैं. इन भवनों के माध्यम से चीनी कम्युनिस्ट सरकार तिब्बती नागरिकों पर निगरानी रखती है.

क्षेत्र के बौद्ध मठों में दी जाने वाली धार्मिक शिक्षाओं पर भी चीनी सरकार ने रोक लगा रखी है. तिब्बती नागरिकों को चीनी माध्यम से ही शिक्षा लेने का अधिकार दिया गया है, दूसरी भाषा में भी तिब्बतियों को कोई अध्ययन नहीं कराया जाता. तिब्बती भाषा और संस्कृति को खत्म करने के लिए चीनी कम्युनिस्ट सरकार हर तरह के हथकंडे अपना रही है.

सांस्कृतिक वर्चस्व और धार्मिक पराधीनता का रास्ता चीनी सरकार की ओर से संचालित एजेंसी और कंपनियों की मदद करने के लिए अपनाया गया है. चीनी कम्युनिस्ट सरकार द्वारा स्थानीय तिब्बतियों का जमकर शोषण किया जाता है. उनकी जिंदगी दोयम दर्जे की बन चुकी है. चीनी कम्युनिस्ट सरकार लगातार उनके खिलाफ षड्यंत्र रच रही है.

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January 8th 2021, 7:43 am

दिल्ली – आरएसएस का नाम लेकर फर्जीवाड़ा करने वाले को क्राइम ब्रांच ने गिरफ्तार किया

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नई दिल्ली. दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने फर्जीवाड़ा करने वाले एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया है. आरोपी की पहचान देवेंद्र मिश्रा के रूप में हुई है. आरोपी सेना सहित अन्य अस्पतालों के डॉक्टरों को ट्रांसफर-पोस्टिंग व पदोन्नति के नाम पर झांसा दे रहा था. क्राइम ब्रांच ने आरोपी के पास से कई फर्जी पहचान पत्र और दस्तावेज भी बरामद किए हैं. आरोपी आरएसएस सरकार्यवाह भय्याजी जोशी से जान-पहचान होने का हवाला भी दे रहा था.

पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार, डॉ. प्रवीण कुमार ने क्राइम ब्रांच को शिकायत की थी कि चार अक्तूबर को उनके पास देवेंद्र मिश्रा नाम के व्यक्ति का कॉल आया. उसने खुद को एम्स और आर्मी के आरआर अस्पताल में विजिटिंग फैकेल्टी और नीति आयोग का सलाहकार बताया. उसने डॉ. प्रवीण को दिल्ली कैंट स्थित आरआर अस्पताल के ऑफिसर मेस में मिलने के लिए बुलाया. बीते 10 अक्तूबर को उनकी मुलाकात हुई, जहां गेस्ट रूम के बाहर डॉ. देवेंद्र (नीति आयोग) की नेम प्लेट लगी हुई थी. देवेंद्र ने उन्हें बताया कि रक्षा मंत्री सहित कई मंत्री व ब्यूरोक्रेट से उनका रोजाना मिलना जुलना है. वह उनकी मनचाही प्रमोशन और पोस्टिंग में मदद कर सकता है. उसने अपने मोबाइल में कई अधिकारियों और मंत्रियों की तस्वीरें दिखाईं. एक मोबाइल नंबर दिखाते हुए उसने कहा कि यह नंबर आरएसएस के सरकार्यवाह भय्याजी जोशी का है. जिनके संपर्क में वह रहता है.

इसके बाद डॉ. प्रवीण को शक हुआ और उन्होंने इसकी शिकायत क्राइम ब्रांच की साइबर सेल को दी. क्राइम ब्रांच की टीम ने जब टेक्निकल सर्विलांस की मदद ली तो पता चला कि आरोपी के पास मौजूद मोबाइल नंबर मध्यप्रदेश के रीवा निवासी देवेंद्र कुमार मिश्रा का है. साइबर सेल को पता चला कि वह पंचकुइयां रोड पर आने वाला है. यह सूचना मिलने के पश्चात क्राइम ब्रांच की टीम ने पहाड़गंज में उसे गिरफ्तार कर लिया. डीसीपी भीष्म सिंह, इंस्पेक्टर राजीव कुमार, इंस्पेक्टर संदीप मल्होत्रा की टीम ने उसे दबोचा.

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January 8th 2021, 7:43 am

पुण्यतिथि – हिन्दुस्थान समाचार के उद्धारक श्रीकांत जोशी जी

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नई दिल्ली. असम में संघ कार्य सब जिलों तक पहुंचाने वाले श्रीकांत शंकरराव जोशी जी का जन्म 21 दिसम्बर, 1936 को ग्राम देवरुख (रत्नागिरि, महाराष्ट्र) में हुआ था. उनसे छोटे तीन भाई और एक बहन थी. मुंबई में बीए की पढ़ाई के दौरान वह संघ के स्वयंसेवक बने. कुछ समय जीवन बीमा निगम में काम करने के बाद वर्ष 1960 में वे तत्कालीन प्रचारक शिवराय तैलंग जी की प्रेरणा से प्रचारक बने. सर्वप्रथम उन्हें श्री गुरु गोविन्द सिंह जी की पुण्यस्थली नांदेड़ भेजा गया. तीन वर्ष बाद उन्हें असम में तेजपुर विभाग प्रचारक बनाकर भेजा गया. इसके बाद वे लगातार 25 वर्ष तक असम में ही रहे. वर्ष 1967 में विश्व हिन्दू परिषद ने गुवाहाटी में पूर्वोत्तर की जनजातियों का विशाल सम्मेलन किया. सरसंघचालक श्री गुरुजी तथा विश्व हिन्दू परिषद के महासचिव दादासाहब आप्टे भी कार्यक्रम में आये थे. कुछ समय बाद विवेकानंद शिला स्मारक (कन्याकुमारी) के लिए धन संग्रह हुआ. असम में इन दोनों कार्यक्रमों के संयोजक श्रीकांत जी ही थे. उनकी संगठन क्षमता देखकर वर्ष 1971 में उन्हें असम का प्रांत प्रचारक बनाया गया. वर्ष 1987 तक उन्होंने इस जिम्मेदारी को निभाया. इस दौरान उन्होंने जहां एक ओर विद्या भारती के माध्यम से सैकड़ों विद्यालय खुलवाये, वहां सभी प्रमुख स्थानों पर संघ कार्यालयों का भी निर्माण कराया.

आज का पूरा पूर्वोत्तर उन दिनों असम प्रांत ही कहलाता था. वहां सैकड़ों जनजातियां, उनकी अलग-अलग भाषा, बोली और रीति-रिवाजों के बीच समन्वय बनाना आसान नहीं था. पर, श्रीकांत जी ने प्रमुख जनजातियों के नेताओं के साथ ही सब दलों के राजनेताओं से भी अच्छे सम्बन्ध बना लिये. वर्ष 1979 से 85 तक असम में घुसपैठ के विरोध में भारी आंदोलन हुआ. आंदोलन के कई नेता बंगलादेश से लुटपिट कर आये हिन्दुओं तथा भारत के अन्य राज्यों से व्यापार या नौकरी के लिए आये लोगों के भी विरोधी थे. अर्थात क्षेत्रीयता का विचार राष्ट्रीयता पर हावी हो रहा था. ऐसे माहौल में श्रीकांत जी ने उन्हें समझा-बुझाकर आंदोलन को भटकने से रोका. इस दौरान उनकी लिखी पुस्तक ‘घुसपैठ: एक निःशब्द आक्रमण’ भी बहुचर्चित हुई.

वर्ष 1987 से 96 तक तृतीय सरसंघचालक पू. बालासाहब देवरस जी के निजी सचिव रहे. अंतिम दो-तीन वर्षों में उन्होंने एक पुत्र की तरह रोगग्रस्त बालासाहब जी की सेवा की. वर्ष 1996 से 98 तक अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख माधव गोविंद वैद्य के सहायक तथा फिर 2004 तक अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख रहे. इस दौरान उन्होंने आपातकाल में सरकारी हस्तक्षेप के कारण मृतप्रायः हो चुकी ‘हिन्दुस्थान समाचार’ संवाद समिति को पुनर्जीवित किया. वर्ष 2001 में जब उन्होंने यह बीड़ा उठाया, तो न केवल संघ के बाहर, इसे समर्थन नहीं मिला. पर श्रीकांत जी अपने संकल्प पर डटे रहे. आज ‘हिन्दुस्थान समाचार’ के कार्यालय सभी राज्यों में हैं. अन्य संस्थाएं केवल एक या दो भाषाओं में समाचार देती हैं, पर यह संस्था संस्कृत, सिन्धी और नेपाली सहित भारत की प्रायः सभी भाषाओं में समाचार देती है.

श्रीकांत जी ने भारतीय भाषाओं के पत्रकार तथा लेखकों के लिए कई पुरस्कारों की व्यवस्था कराई. इसके लिए उन्होंने देश भर में घूमकर धन जुटाया तथा कई न्यासों की स्थापना की. एक बार विदेशस्थ एक व्यक्ति ने कुछ शर्तों के साथ एक बड़ी राशि देनी चाही, पर सिद्धांतनिष्ठ श्रीकांत जी ने उसे ठुकरा दिया. वे बाजारीकरण के कारण मीडिया के गिरते स्तर से बहुत चिंतित थे. वर्ष 2004 के बाद वे संघ की केन्द्रीय कार्यकारिणी के सदस्य के नाते प्रचार विभाग के साथ ही सहकार भारती, ग्राहक पंचायत, महिला समन्वय आदि को संभाल रहे थे. आठ जनवरी, 2013 की प्रातः मुंबई में हुए भीषण हृदयाघात से उनका निधन हुआ.

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January 8th 2021, 3:28 am

सिंधु महाकुंभ – 25 वर्ष पूर्ण होने पर 19 से 27 जून तक लेह लद्दाख में होगा प्रथम महाकुंभ

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जयपुर. सिंधु दर्शन यात्रा के 25 वर्ष पूर्ण होने पर हिमालय परिवार द्वारा 19 से 27 जून तक लेह लद्दाख में प्रथम सिंधु महाकुंभ का आयोजन होगा. सिंधु महाकुंभ में दो चरणों में सिंधु दर्शन यात्रा निकलेगी. प्रथम चरण की यात्रा में राजस्थान प्रदेश से दो हजार से अधिक यात्री शामिल होंगे. सिंधु महाकुंभ को लेकर आयोजित हिमालय परिवार की बैठक में यह जानकारी संगठन के केन्द्रीय महामंत्री दिलबाग सिंह जसरोटिया व विधायक वासुदेव देवनानी ने दी. उन्होंने बताया कि यात्रा को लेकर प्रदेशवासियों में काफी उत्साह है. इच्छुक यात्रियों का यात्रा के लिए रजिस्ट्रेशन हो जाए, यह प्रयास सब कार्यकर्ता कर रहे हैं.

केन्द्रीय महामंत्री जसरोटिया ने बताया कि प्रथम सिंधु महाकुंभ के लिए प्रथम चरण की यात्रा 19 जून से 23 जून तक महाकुंभ के रूप में सिंधु नदी के तट पर लेह लद्दाख में होगी. यात्रा तीन स्थानों से निकल रही है. प्रथम यात्रा चंडीगढ़ से मनाली होते हुए लेह लद्दाख सिंधु नदी तट पर पहुंचेगी. चार दिन सिंधु नदी में स्नान, पूजा पाठ व भ्रमण करने के बाद कश्मीर होते हुए जम्मू में समाप्त होगी. दूसरी यात्रा जम्मू से प्रारंभ होकर कश्मीर भ्रमण करते हुए लेह लद्दाख सिंधु नदी पर स्नान, पूजा पाठ व भ्रमण करने के पश्चात मनाली होते हुए चंडीगढ़ में समाप्त होगी. तीसरी यात्रा दिल्ली हवाई जहाज से लेह लद्दाख पहुंचेगी और लेह लद्दाख सिंधु नदी पर स्नान, पूजा पाठ व भ्रमण करने के बाद वापस दिल्ली पहुंचकर समाप्त होगी.

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January 7th 2021, 10:07 am

देश में फैल रहा बर्ड फ्लू का संक्रमण, मध्यप्रदेश में पक्षियों की मौत

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भोपाल (विसंकें).देश में कोरोना महामारी के बीच अब बर्ड फ्लू ने दस्तक देकर प्रशासन व जनता की चिंता बढ़ा दी है. अब तक देश के अलग-अलग प्रदेशों में फ्लू के कारण 84 हजार से ज्यादा पक्षियों की मौत हो चुकी है. मध्यप्रदेश के भी दो जिलों में बर्ड फ्लू से 200 से ज्यादा कौए और बगुले मृत पाए गए है और इंदौर तथा मंदसौर में मृत पक्षियों की रिपोर्ट भी बर्ड फ्लू पॉजिटिव मिली है.

पिछले वर्ष कोरोना वायरस की तबाही के घाव अब तक भरे नहीं थे कि देश में बर्ड फ्लू ने फिर एक बार दस्तक दे दी है. देश के अलग-अलग राज्यों से लगातार हुए बगुले और बत्तखों के बर्ड फ्लू से मरने की खबरें सामने आ रहीं हैं. अब तक हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान और केरल में बर्ड फ्लू की पुष्टि हो चुकी है. जबकि हरियाणा और गुजरात के सैंपल की रिपोर्ट आना बाकी है. केरल की सरकार ने बर्ड फ्लू से बचाव के लिए अनोखा फैसला लिया है. केरल सरकार ने आदेश दिए हैं कि जिस भी जगह पर बर्ड फ्लू से संक्रमित पंक्षी मिलेंगे, उसके एक किमी के दायरे के सभी पंक्षियों को मार दिया जाएगा.

पहले जहां पीपीई किट पहनकर कोरोना संक्रमित मरीजों का इलाज करते थे तो वहीं अब यही पीपीई किट पहन कर कौवा और पक्षियों को दफनाने का कार्य किया जा रहा है. भोपाल में स्थित लैब में अब कोरोना वायरस पॉजिटिव मरीज और बर्ड फ्लू से संक्रमित पक्षियों की एक साथ जांच की जा रही है, ऐसा पहली बार हुआ है – जब पक्षियों और इंसानों के सैंपल एक ही लैब में जांचे जा रहे हैं.

बर्ड फ्लू से इंसानों को भी काफी खतरा बताया जा रहा है एबीएन इनफ्लुएंजा या एवियन फ्लू को बर्ड फ्लू कहा जाता है, यह मृत एवं जिंदा पक्षियों से इंसान में फैल सकता है. संक्रमित पक्षी को खाने या संक्रमित पानी पीने से यह रोग जनसामान्य में फैलने की संभावना ज्यादा रहती है आमतौर पर यह संक्रमण कौवे के माध्यम से आसानी से इंसानी रहवासी क्षेत्रों में पहुंच जाता है.

क्या है बर्ड फ्लू के लक्षण

बर्ड फ्लू के संक्रमण के लक्षण कुछ दिन में दिखाई देते हैं. इससे इस वयारस का प्रभाव कोविड की अपेक्षा जल्दी दिखने लगता है. अगर आपमें ये लक्षण दिखाई दें तो आपको सतर्क हो जाना चाहिए एवं अपने नजदीकी डॉक्टर से संपर्क करें –

– पूरी तरह से सांस न ले पाना.

– खांसी की दिक्कत होना.

– कफ का बनना और जमा होना.

– सिर में दर्द बने रहना.

– उल्टी का एहसास होना.

– बुखार आने के साथ शरीर अकड़ना.

– शरीर में दर्द बने रहना.

– थोड़ा काम करने पर थकान आ जाना.

– पेट में दर्द होना.

बचाव के लिए सावधानियां

– घर में पालतू पक्षियों को न रखें

– मौजूदा समय में खुले बाजार या छोटी जगहों से मांस की खरीदारी न करें.

– संक्रमण से बचने के लिए हाथों को लगातार धोते और सेनेटाइज करते रहें.

– पक्षियों के संपर्क में आने से बचें.

– बर्ड फ्लू वायरस का प्रभाव दिखने पर 48 घंटे के अंदर चिकित्सकीय सलाह पर तुरंत दवा लें.

केंद्र ने जारी की एडवाइजरी

देश में गहराते बर्ड फ्लू या एवियन इन्फ्लूएंजा के संकट को देखते हुए केंद्र सरकार ने बुधवार को सभी राज्यों के लिए एडवाइजरी जारी कर पक्षियों की संदिग्ध मौत पर नजर रखने को कहा है.

– केरल (अधिकतर पोल्ट्री), हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में हजारों की संख्या में पक्षियों की मौत हुई. इसकी शुरुआत दिसंबर महीने के आखिर में हुई थी.

सरकार ने स्थिति पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए नई दिल्ली में एक कंट्रोल रूम बनाया है.

अकेले हरियाणा के पंचकूला में ही बीते 20 दिनों में 4 लाख के करीब पक्षी मर चुके हैं.

उत्तराखंड के देहरादून में भी 3 कौओं के इसी फ्लू के कारण मरने की आशंका है. हालांकि, अभी इनकी रिपोर्ट आनी बाकी है.

झारखंड, गुजरात में भी अलर्ट जारी.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने केरल के दो एपिकसेंटरों के अलावा हरियाणा के पंचकूला में भी विशेष टीमों को तैनात किया है.

सरकार ने बर्ड फ्लू के 12 एपिकसेंटर की पहचान की है. ये हैं – राजस्थान के बारन, कोटा, झालावाड़, मध्य प्रदेश के मंदसौर, इंदौर और मालवा, हिमाचल प्रदेश का कांगड़ा और केरल का कोट्टायम-अलेप्पी.

बुधवार को केरल के कोट्टायम और अलेप्पी में 69 हजार से ज्यादा पक्षियों (बत्तख और मुर्गा-मुर्गी सहित) को नष्ट किया गया.

केरल ने बर्ड फ्लू को राज्य आपदा घोषित कर दिया है और पक्षियों को नष्ट करने के साथ ही स्थिति पर नजर रखने के लिए रैपिड रिस्पॉन्स टीमों को तैनात किया है.

मध्य प्रदेश ने दूसरे राज्यों से पोल्ट्री उत्पाद की आवाजाही पर रोक लगा दी है.

हिमाचल प्रदेश ने देहरा, फतेहपुर, जवाली और इंदौरा इलाकों में पोल्ट्री उत्पादों की बिक्री और निर्यात को प्रतिबंधित कर दिया है.

The post देश में फैल रहा बर्ड फ्लू का संक्रमण, मध्यप्रदेश में पक्षियों की मौत appeared first on VSK Bharat.

January 7th 2021, 7:20 am
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