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23 सितम्बर / जन्मदिवस – नवदधीचि अनंत रामचंद्र गोखले जी

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नई दिल्ली. अनुशासन के प्रति अत्यन्त कठोर श्री अनंत रामचंद्र गोखले जी का जन्म 23 सितम्बर, 1918 (अनंत चतुर्दशी) को म.प्र. के खंडवा नगर में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था. ‘’ संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के पिता श्री सदाशिव गोलवलकर जब खंडवा में अध्यापक थे, तब वे उनके घर में ही रहते थे. नागपुर से इंटर करते समय गोखले जी धंतोली सायं शाखा में जाने लगे. एक सितम्बर, 1938 को वहीं उन्होंने प्रतिज्ञा ली. इंटर की प्रयोगात्मक परीक्षा वाले दिन उन्हें सूचना मिली कि डॉ. हेडगेवार ने सब स्वयंसेवकों को तुरंत रेशिम बाग बुलाया है. उन दिनों शाखा पर ऐसे आकस्मिक बुलावे के कार्यक्रम भी होते थे. जब गोखले जी वहां पहुंचे, तो डॉ. जी ने कहा कि तुम्हारी परीक्षा है, इसलिये तुम वापस जाओ. युवा गोखले जी इससे बहुत प्रभावित हुये कि डॉ. जी जैसे बड़े व्यक्ति को भी उनकी परीक्षा का ध्यान था. डॉ. जी के निधन के बाद दिसम्बर, 1940 में नागपुर में अम्बाझरी तालाब के पास तरुण-शिविर लगा था. उसमें श्री गुरुजी ने युवाओं से प्रचारक बनने का आह्वान किया. गोखले जी कानून की प्रथम वर्ष की परीक्षा दे चुके थे, पर पढ़ाई छोड़कर वे प्रचारक बन गये. सर्वप्रथम उन्हें उ.प्र. के कानपुर नगर में भेजा गया. वहां के बाद उन्होंने उरई, उन्नाव, कन्नौज, फर्रुखाबाद, बांदा आदि में भी शाखाएं शुरू कीं. प्रवास और भोजन आदि के व्यय का कुछ भार कानपुर के संघचालक जी वहन करते थे, शेष गोखले जी अपने घर से मंगाते थे. सन् 1948-49 में संघ पर प्रतिबंध लगा हुआ था, पर तब तक ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ का गठन हो चुका था. गोखले जी ने 150 स्वयंसेवकों को परिषद की ओर से ‘साक्षरता प्रसार’ के लिये गांवों में भेजा. ये युवक बालकों को खेल खिलाते थे तथा बुजुर्गो में भजन मंडली चलाते थे. प्रतिबंध हटने पर ये खेलकूद और भजन मंडली ही शाखा में बदल गयीं. इस प्रकार उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता से प्रतिबंध काल में भी सैकड़ों शाखाओं की वृद्धि कर दी. गोखले जी 1942 से 51 तक कानुपर, 1954 तक लखनऊ, 1955 से 58 तक कटक (उड़ीसा) और फिर 1973 तक दिल्ली में रहे. आपातकाल के दौरान उनका केन्द्र नागपुर रहा. तब उन पर मध्यभारत, महाकौशल और विदर्भ का काम था. आपातकाल के बाद उन पर कुछ समय मध्य भारत प्रांत का काम रहा. इस समय उनका केन्द्र इंदौर था. 1978 में वे फिर उ.प्र. में आ गये और पूर्वी उ.प्र. में जयगोपाल जी के साथ सहप्रांत प्रचारक बनाये गये. गोखले जी को पढ़ने और पढ़ाने का शौक था. जब प्रवास में कष्ट होने लगा, तो उन्हें लखनऊ में ‘लोकहित प्रकाशन’ का काम दिया गया. उन्होंने इस दौरान 150 नयी पुस्तकें प्रकाशित कीं. तथ्यों की प्रामाणिकता और प्रूफ आदि पर वे बहुत ध्यान देते थे. वर्ष 2002 में वृद्धावस्था के कारण उन्होंने सब दायित्वों से मुक्ति ले ली और लखनऊ के ‘भारती भवन’ कार्यालय पर ही रहने लगे. घंटे भर की शाखा के प्रति उनकी श्रद्धा अंत तक बनी रही. चाय, भोजन आदि के लिये समय से पहुंचना उनके स्वभाव में था. अपने कमरे की सफाई और कपड़े धोने से लेकर पौधों की देखभाल तक वे बड़ी रुचि से करते थे. 1991 में पुश्तैनी सम्पत्ति के बंटवारे से उन्हें जो भूमि मिली, वह उन्होंने संघ को दे दी. कुछ साल बाद प्रशासन ने पुल बनाने के लिये 19 लाख रु. में उसका 40 प्रतिशत भाग ले लिया. उस धन से वहां संघ कार्यालय भी बन गया, जिसका नाम ‘शिवनेरी’ रखा गया है. इसके बाद वहां एक इंटर कॉलेज की स्थापना की गयी, जिसमें दो पालियों में 2,500 छात्र-छात्रायें पढ़ते हैं. नारियल की तरह ऊपर से कठोर, पर भीतर से मृदुल, सैकड़ों प्रचारक और हजारों कार्यकर्ताओं के निर्माता गोखले जी का 25 मई, 2014 को लखनऊ में ही निधन हुआ.

September 22nd 2019, 7:30 pm

22 सितम्बर / जन्मदिवस – मधुर वाणी के धनी देबव्रत सिंह जी

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नई दिल्ली. ‘देबू दा’ के नाम से प्रसिद्ध देबव्रत सिंह जी का जन्म 22 सितम्बर, 1929 को बंगाल के दीनाजपुर में हुआ था. आजकल यह क्षेत्र बांग्लादेश में है. मुर्शिदाबाद जिले के बहरामपुर में उनका पैतृक निवास था. भवानी चरण सिंह जी उनके पिता तथा वीणापाणि देवी जी उनकी माता थीं. चार भाई और तीन बहनों वाले परिवार में देबू दा सबसे बड़े थे. उनकी शिक्षा अपने पैतृक गांव बहरामपुर में ही हुई. पढ़ने में वे बहुत अच्छे थे. मैट्रिक की परीक्षा में अच्छे अंक लाने के कारण उन्हें छात्रवृत्ति भी मिली थी. बंगाल में श्री शारदा मठ का व्यापक प्रभाव है. यह परिवार भी परम्परागत रूप से उससे जुड़ा था. अतः घर में सदा अध्यात्म का वातावरण बना रहता था. उनकी तीनों बहनें मठ की शरणागत होकर संन्यासी बनीं. देबू दा भी वहां से दीक्षित थे. यद्यपि वे और उनके छोटे भाई सत्यव्रत सिंह प्रचारक बने.

देबू दा छात्र जीवन में ही स्वयंसेवक बन गये थे. बाल और शिशुओं को खेल खिलाने में उन्हें बहुत आनंद आता था. उनका यह स्वभाव जीवन भर बना रहा. अतः लोग उन्हें ‘छेले धोरा’ (बच्चों को घेरने वाला) कहते थे. संघ पर प्रतिबंध के विरोध में सन् 1949 में सत्याग्रह कर वे जेल गये. इसके बाद उन्होंने कुछ समय सरकारी नौकरी की. शिक्षानुरागी होने के कारण इसी दौरान उन्होंने होम्योपैथी की पढ़ाई करते हुए डीएमएस की उपाधि भी प्राप्त कर ली. उन दिनों शाखा में एक गीत गाया जाता था, जो देबू दा को बहुत प्रिय था. इसमें देशसेवा के पथिकों को सावधान किया जाता था कि इस मार्ग पर स्वप्न में भी सुख नहीं है. यहां तो केवल दुख ही दुख है. अपने पास यदि कुछ धन-दौलत है, तो उसे भी देश के लिए ही अर्पण करना है. इस गीत से प्रभावित होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी और प्रचारक बन गये.

सर्वप्रथम उन्हें आसनसोल जिले में भेजा गया. क्रमशः उनका कार्यक्षेत्र बढ़ता गया और वे उत्तर बंगाल के संभाग प्रचारक बने. देबू दा से भेंट और उनकी प्यार भरी मधुर वाणी से प्रचारक और विस्तारकों की आधी समस्याएं स्वतः हल हो जाती थीं. आपातकाल में वे पुलिस की निगाह में आ गये और जेल भेज दिये गये. वे बहुत कम खाते और कम ही बोलते थे. बंगाल में ‘विद्या भारती’ का काम प्रारम्भ करने तथा कई नये विद्यालय खोलने का श्रेय उन्हें ही है. सन् 1992 में भारत सरकार ने ‘तीन बीघा क्षेत्र’ बंगलादेश को देने का निर्णय किया. बंगाल की जनता इसके घोर विरुद्ध थी. अतः भारतीय जनता पार्टी, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसी कई देशभक्त संस्थाओं ने ‘सीमांत शांति सुरक्षा समिति’ बनाकर देबू दा के नेतृत्व में इसके विरुद्ध जनांदोलन किया. 25 जून, 1992 को आडवानी जी भी इस आंदोलन में शामिल हुए. इस आंदोलन में देबू दा की समन्वयकारी प्रतिभा तथा नेतृत्व की क्षमता प्रगट हुई. वे इसमें गिरफ्तार भी हुए थे. सन् 1993 में उन्हें बंगाल में भारतीय जनता पार्टी का संगठन मंत्री बनाया गया. इस दायित्व पर वे 2003 तक रहे.

गुणग्राही देबू दा कला, साहित्य और संस्कृति के प्रेमी थे. वे ‘अवसर’ नामक पत्रिका के संचालक सदस्य थे. व्यस्तता के बीच भी वे प्रतिदिन ध्यान एवं पूजा अवश्य करते थे. वृद्धावस्था में वे सिलीगुड़ी के संघ कार्यालय (माधव भवन) में रहते थे. 13 अप्रैल को मस्तिष्काघात के बाद उन्हें चिकित्सालय ले जाया गया, जहां 26 अप्रैल, 2013 को उनका देहांत हुआ. देबू दा ने काफी समय तक बंगाल के प्रांत प्रचारक वसंतराव भट्ट जी के निर्देशन में काम किया था. यह भी एक संयोग है कि उसी दिन प्रातः कोलकाता के संघ कार्यालय पर वसंतराव जी ने भी अंतिम सांस ली थी.

September 21st 2019, 6:12 pm

अब देश में पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर को वापस लेने पर हो रही चर्चा – शक्ति सिन्हा

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पटना. कश्मीर से अनुच्छेद 370 के हटने के बाद अब पूरे देश में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को वापस लेने की चर्चा शुरू हो गई. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का गिलगित-बाल्तिस्तान चर्चा में बना हुआ है. गिलगित-बाल्तिस्तान पर अफवाहों को दूर करने और इसके इतिहास से लोगों को रुबरु कराने के लिए शनिवार को बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन हॉल में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया. संगोष्ठी का आयोजन आद्य नारद स्मृति कार्यक्रम के दौरान किया गया. मुख्य वक्ता के रूप में पूर्व आईएएस और नेहरू मेमोरियल म्यूजियम लाइब्रेरी, नई दिल्ली के निदेशक शक्ति सिन्हा उपस्थित रहे.

उन्होंने कहा कि गिलगित-बाल्तिस्तान अविभाजित डोगरा राज्य का 40 फीसद हिस्सा था. इसे अंग्रेजों ने 1935 में जम्मू-कश्मीर के राजा से 60 साल के लिए लीज पर लिया था. क्योंकि उन्हें डर था कि सोवियत यूनियन कहीं इस पर कब्जा न कर ले. पाकिस्तान का गिलगित-बाल्तिस्तान पर पिछले 70 वर्षों से अवैध कब्जा है. लेकिन पाकिस्तान अभी भी इसे अपना राज्य इसलिए नहीं कहता क्योंकि अगर उसने ऐसा किया तो उसका जम्मू-कश्मीर पर दावा खत्म हो जाएगा.

विश्व संवाद केंद्र द्वारा पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए तीन पत्रकारों को सम्मानित किया गया. वरिष्ठ पत्रकार रविन्द्रनाथ भैया को देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पत्रकारिता शिखर सम्मान, अखिलेश चंद्रा को केशवराम भट्ट पत्रकारिता सम्मान तथा शशि शंकर को बाबूराव पटेल रचनाधर्मिता सम्मान दिया.

विश्व संवाद केंद्र के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह ने कहा कि जिस प्रकार जम्मू-कश्मीर के बिना भारत अधूरा है, उसी प्रकार गिलगित-बाल्तिस्तान के बिना जम्मू-कश्मीर अधूरा है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्रय प्रचारक रामदत्त चक्रधर सहित गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे. कार्यक्रम में विश्व संवाद केंद्र की वार्षिक स्मारिका प्रत्यंचा का लोकार्पण भी किया गया.

September 21st 2019, 9:18 am

अब नहीं लगाएंगे आजादी के नारे, मीरवाइज़ सहित अन्य नेताओं ने भरा बॉंड, हुए रिहा

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श्रीनगर. अनुच्छेद 370, 35ए हटने के पश्चात जम्‍मू कश्‍मीर में नजरबंद मीरवाइज, नेकां के दो पूर्व विधायकों और पीडीपी नेता समेत पांच ने बॉंड भरा है कि रिहाई के बाद ऐसा कोई काम नहीं करेंगे, जिससे कानून व्यवस्था बिगड़े या जनभावनाएं भड़कें. पीपुल्स कांफ्रेस के महासचिव एवं पूर्व मंत्री इमरान रजा अंसारी के साथ नेशनल कांफ्रेंस के पूर्व विधायक मोहम्मद सईद आखून और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के एमएलसी खुर्शीद आलम को शुक्रवार को एहतियातन हिरासत से मुक्ति मिल गई है. तीनों नेताओं ने बॉंड भरा है. अलबत्ता, बॉंड भरे जाने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.

संबंधित अधिकारियों ने बताया कि नेशनल कांफ्रेंस के पूर्व विधायक मोहम्मद सईद आखून को उनके स्वास्थ्य के आधार पर रिहा किया गया है, जबकि पीडीपी नेता एमएलसी खुर्शीद आलम को उनके भाई की मौत के मद्देनजर छोड़ा गया है. पीडीपी छोड़ पीपुल्स कांफ्रेंस में शामिल होने वाले पूर्व मंत्री इमरान रजा अंसारी को मुहर्रम से पहले ही प्रशासन ने सेंतूर उप जेल से उनके घर में स्थानांतरित कर नजरबंद कर दिया था. शुक्रवार वह भी दिल्ली रवाना हो गए. वह अपने उपचार के लिए दिल्ली गए हैं. उन्हें भी उनके स्वास्थ्य के आधार पर ही प्रशासन ने रिहा किया है.

आजादी, ऑटोनामी या सेल्फ रूल नहीं, रिहाई चाहिए

सूत्रों ने बताया कि उदारवादी हुर्रियत चेयरमैन मीरवाइज मौलवी उमर फारूक, नेशनल कांफ्रेंस के दो पूर्व विधायकों, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और पीपुल्स कांफ्रेंस से जुड़े दो नेताओं ने राज्य प्रशासन को बॉंड लिखकर दिया है कि वह अपनी रिहाई के बाद कोई ऐसा काम नहीं करेंगे, जिससे माहौल बिगड़े.

धारा 107 के तहत हिरासत में हैं लगभग 1200 नेता

पांच अगस्त को जम्मू कश्मीर की संवैधानिक स्थिति में बदलाव के मद्देनजर प्रशासन ने कानून व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के करीब 1200 नेताओं व कार्यकर्ताओं को एहतियातन हिरासत में लिया था या फिर उन्हें उनके घरों में नजरबंद किया गया था. इन सभी को सीआरपीसी की धारा 107 के तहत हिरासत में लिया गया है.

संबंधित अधिकारियों ने बताया कि रिहाई के लिए बॉंड भरने वालों में मीरवाइज मौलवी उमर फारूक पहले प्रमुख अलगाववादी नेता बताए जा रहे हैं. वह कश्मीर समस्या के समाधान के लिए हमेशा जनमत संग्रह या फिर कश्मीर की आजादी पर जोर देते रहे हैं. उनके अलावा ऑटोनामी का नारा देने वाली नेशनल कांफ्रेंस के दो वरिष्ठ नेता जो पूर्व विधायक भी हैं और कश्मीर में सेल्फ रूल की वकालत करने वाली पीडीपी के एक पूर्व विधायक शामिल हैं. अलगाववाद की सियासत को गुडबाय करने के बाद मुख्यधारा की सियासत में लौटने वाले सज्जाद गनी लोन के नेतृत्व वाली पीपुल्स कांफ्रेंस का भी एक युवा नेता अपनी रिहाई के लिए बॉंड भरकर दे चुका है.

कानून के उल्लंघन पर फिर लिया जा सकता है हिरासत में

अगर सीआरपीसी की धारा 107 के तहत बॉंड के आधार पर रिहाई प्राप्त करने के बाद कोई व्यक्ति कानून का उल्लंघन करता है, राजनीतिक जलसों में भड़काऊ बयानबाजी करता है तो उसे तुरंत गिरफ्तार कर उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है.

अधिकारिक स्तर पर बॉंड भरने वाले इन पांच लोगों के नामों को उजागर नहीं किया गया है, लेकिन सूत्रों ने बताया कि पांच अगस्त को एहतियातन हिरासत में लिए गए लोगों की चरणबद्ध तरीके से रिहाई की प्रक्रिया पर काम शुरू हो चुका है.

नजरबंद नेताओं की रिहाई को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सीधा अपने हाथ में रखा है. जिस तरह से इन पांच लोगों ने अपनी रिहाई के लिए बॉंड भरा है, उससे साफ है कि जम्मू कश्मीर की संवैधानिक स्थिति में बदलाव के साथ आजादी, ऑटोनामी और सेल्फ रूल के नारे भी बंद होने जा रहे हैं.

साभार – दैनिक जागरण

September 21st 2019, 8:37 am

हमें प्राकृतिक खेती की ओर लौटना होगा – पद्मश्री सुभाष पालेकर

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मेरठ. चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय के नेताजी सुभाष सभागार में लोक भारती मेरठ क्षेत्र के प्राकृतिक कृषि प्रशिक्षण शिविर में मेरठ-सहारनपुर मंडल से आए किसानों से पद्मश्री सुभाष पालेकर जी ने प्रकृति के माध्यम से ही खेती करने का आह्वान किया.

उन्होंने कहा कि प्रकृति ने पेड़-पौधों के भोजन और पानी के लिये पूरी व्यवस्था की है, हमने ही उसे नष्ट किया है. हमें बताया गया कि बिना कीटनाशक और रासायनिक खाद के खेती हो ही नहीं सकती. खेत में जितना खाद और कीटनाशक डालोगे, उत्पादन उतना ही अधिक मिलेगा, लेकिन यह झूठ निकला. इस झूठ ने खेती की लागत बढ़ा दी. उत्पादन घट रहा है. खेती की लागत नहीं निकल रही. मौसम की मार झेलने में ये फसलें विफल हैं. नतीजा यह है कि किसान आत्महत्या कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि इस वक्त जैविक खाद आधारित खेती करना भी असम्भव है. आखिर इतनी जैविक खाद (गोबर से निर्मित) आएगी कहां से. समय की आवश्यकता है कि किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर लौटना होगा. यही उनकी समस्त समस्याओं का समाधान है. यही तरीका खेती की लागत शून्य करते हुए आय दोगुनी कर सकता है.

उन्होंने कहा कि पृथ्वी पर प्रकृति का एक पूरा तंत्र है. इस धरती पर प्रकृति पहले आई और इंसान लाखों साल बाद. तब कोई खाद या कीटनाशक नहीं था. आप जंगल में देखें, वहां पौधों को कौन खाद-पानी और कीटनाशक देता है. फलों से लदे रहते हैं, इन पौधों का पत्ता कहीं से भी तोड़कर दुनिया के किसी भी लैब में टेस्ट करा लीजिये, पोषक तत्वों की कमी नहीं मिलेगी. ऐसा क्यों है? क्योंकि इनका संरक्षण, संवर्धन प्रकृति करती है. हमें इसी तंत्र को समझना होगा.

देसी गाय के गोबर और गौमूत्र में मिट्टी को उर्वर और शक्ति सम्पन्न बनाने की क्षमता है. 14 वर्षों के प्रयोगों से यह सिद्ध हुआ कि देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र में मिट्टी में जीवाणुओं को सक्रिय करने की शक्ति होती है. देसी गाय एक दिन में 11 किलो गोबर करती है. दस किलो गोबर एक एकड़ में पर्याप्त है. तीन दिन के गोबर से 30 एकड़ खेती की जा सकती है.

पालेकर ने कहा कि खेतों में रासायनिक खाद का अंधाधुंध प्रयोग ग्लोबल वार्मिंग के लिये भी जिम्मेदार है. तापमान जैसे-जैसे बढ़ता है, रसायनिक खादों में शामिल कार्बन मुक्त होकर वातावरण में पहुंचता है. फिर  यह ऑक्सीजन से क्रिया करके कार्बन डाईऑक्साइड बनाता है. यह पृथ्वी को गर्म करने के लिये सबसे जिम्मेदार गैस है. उन्होंने किसानों से आग्रह किया कि वे अपने दिमाग से खाद और कीटनाशकों पूरी तरह निकाल दें. 2050 में आज की तुलना में दोगुने उत्पादन की जरुरत होगी और यह केवल प्राकृतिक खेती से ही संभव है.

September 21st 2019, 8:03 am

विदेशी मीडिया के साथ चर्चा करेंगे सरसंघचालक

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नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी नियमित अंतराल पर समाज के विभिन्न वर्गों से भेंट कर संघ का विचार, कार्य तथा समसामायिक विषयों पर चर्चा करते हैं.

इसी क्रम में आगामी 24 सितंबर को वह दिल्ली में भारत में उपस्थित विदेशी मीडिया के पत्रकारों से भेंट करेंगे. यह कार्यक्रम एक निश्चित सूची से परस्पर संवाद का है. मोहन भागवत जी इस संवाद में विदेशी मीडिया के पत्रकारों को संघ के कार्य व प्रासंगिक विषयों पर संघ के विचारों से अवगत करवांएगे तथा उनसे इसी संदर्भ में एक रचनात्मक चर्चा करेंगे.

 

अरूण कुमार

अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

September 21st 2019, 3:28 am

भारतीय भोजन से दूर होते हैं अनुवांशिक रोग, जर्मन यूनिवर्सिटी में दो साल के शोध से हुआ सिद्ध

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जिस तथ्य को सिद्ध करने में विश्व के वैज्ञानिकों को दो साल लग गए, औऱ करोड़ों रुपये खर्च करने पड़े. उस बात को हमारे पूर्वज दादा-परदादा हजारों साल से जानते हैं. इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे पूर्वज, हमारी परंपराएं, खान-पान विज्ञान सम्मत है. हमारा देश अनपढ़-पिछड़ा नहीं, अपितु वैज्ञानिक परंपराओं का देश रहा है. दो साल के शोध में सामने आया है कि भारतीय भोजन (दाल-चावल व अन्य) से अनुवांशिक रोग भी दूर होते हैं.

जर्मनी की ल्यूबेक यूनिवर्सिटी के शोध में पता चला है कि भारतीय आहार अनुवांशिक बीमारियों को भी समाप्त कर सकता है. यह भी सामने आया है कि बीमारियों का मुख्य कारक केवल डीएनए में गडबड़ी नहीं है, बल्कि आहार उससे भी अधिक अहम है, जो बीमारी पैदा कर सकता है और उस पर लगाम भी लगा सकता है. यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रॉल्फ लुडविज के नेतृत्व में तीन वैज्ञानिकों द्वारा किया गया शोध ‘नेचर’ के ताजा अंक में प्रकाशित हुआ है. शोधकर्ताओं में रूस के डॉ. अर्तेम वोरोवयेव, इजराइल की डॉ. तान्या शेजिन और भारत के डॉ. यास्का गुप्ता शामिल हैं.

चूहों पर दो साल तक किए गए शोध में पाया गया कि पश्चिमी देशों के उच्च कैलोरी आहार आनुवांशिक माने जाने वाले रोगों को बढ़ाते हैं, जबकि भारतीय उपमहाद्वीप के लो कैलोरी आहार रोगों से बचाते हैं.

डॉ. गुप्ता ने एक समाचार पत्र से कहा कि अभी तक तमाम आनुवांशिक रोगों को केवल डीएनए के नजरिए से ही देखा जाता है, इस शोध में इसे आहार केंद्रित करके परखा गया. शोधकर्ताओं ने चूहों के उस समूह पर प्रयोग किया जो ल्यूपस नामक रोग से ग्रसित थे. ल्यूपस रोग का सीधा संबंध डीएनए से है. ल्यूपस ऑटोइम्यून रोग की श्रेणी में आता है और इसमें शरीर का प्रतिरोधक तंत्र अपने ही अंगों पर प्रहार करता है और शरीर के विभिन्न अंग व विभिन्न प्रणालियों जैसे जोड़ों, किडनी, दिल, फेफड़े, ब्रेन व ब्लड सेल को नष्ट करता है.

फास्टफूड आनुवांशिक रोगों को उभारते हैं 

इस शोध के नतीजे सीधे तौर पर बता रहे हैं कि पश्चिमी देशों में आहार में लिए जाने वाले पिज्जा, बर्गर जैसे फास्टफूड आनुवांशिक रोगों को उभारने और बढ़ाने में मददगार बनते हैं, जबकि भारत का शाकाहारी आहार- स्टार्च, सोयाबीन तेल, दाल-चावल, सब्जी और विशेषकर हल्दी का इस्तेमाल इन रोगों से शरीर की रक्षा करने में सक्षम है.

 

September 20th 2019, 6:04 am

जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय से संपर्क न कर पाने का दावा गलत – सर्वोच्च न्यायालय

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सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से प्राप्त रिपोर्ट जम्मू-कश्मीर में लोगों के उच्च न्यायालय से संपर्क करने में असमर्थ होने संबंधी दावे का समर्थन नहीं करती है.

बाल अधिकार कार्यकर्ता इनाक्षी गांगुली और शांता सिन्हा की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने 16 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय में कहा था कि कश्मीर घाटी के लोग उच्च न्यायालय से संपर्क नहीं साध पा रहे हैं. इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने जम्मू-कश्मीर के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से इस बारे में रिपोर्ट मांगी थी. रिपोर्ट जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय को सौंप दी है. इस रिपोर्ट में सीनियर एडवोकेट हुजेफा अहमदी के दावे को गलत बताया गया है.

जस्टिस एस.ए. बोबडे और जस्टिस एस.ए. नजीर ने सीनियर एडवोकेट हुजेफा अहमदी से कहा कि, ‘‘हमें उच्च न्यायालय (जम्मू कश्मीर) के मुख्य न्यायाधीश से रिपोर्ट मिली है जो उस दावे का समर्थन नहीं करती, जिसमें कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर में लोग उच्च न्यायालय से संपर्क करने में असमर्थ हैं.’’

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि वह कश्मीर में बच्चों को कथित तौर पर हिरासत में लिए जाने का मुद्दा उठाने संबंधी याचिका पर सुनवाई करेगी क्योंकि याचिका में नाबालिगों से संबंधित ‘‘महत्वपूर्ण मुद्दे’’ उठाए गए हैं.

शुक्रवार को सुनवाई के दौरान सर्वोच्च ने कश्मीर में बच्चों को कथित तौर पर हिरासत में लिए जाने के मुद्दे पर जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय की चाइल्ड जस्टिस कमेटी से एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट देने को भी कहा है.

September 20th 2019, 5:48 am

कार्यकर्ताओं ने ‘चरैवेति चरैवेति’ को अपना मंत्र बनाया – जगदेव उरांव

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वनवासी कल्याण आश्रम, पंजाब ने अमृतसर महानगर में अपना पहला वार्षिकोत्सव मनाया. इस दौरान मुख्य वक्ता के रूप में अ. भा. वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगदेव उरांव, मुख्य अतिथि के रूप में प्रांत संघचालक बृजभूषण सिंह बेदी व केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग राज्यमंत्री सोम प्रकाश उपस्थित थे.

कार्यक्रम में जगदेव उरांव जी ने कहा कि बाला साहेब जी ने जशपुर नगर में मात्र एक छात्रावास के माध्यम से कार्य का बीजारोपण किया और कैसे कार्यकर्ताओं के अथक प्रयासों से कल्याण आश्रम शून्य से आज अखिल भारतीय स्तर पर शिक्षा, आरोग्य, खेलकूद, ग्राम विकास, श्रद्धा जागरण आदि के 20,000 से अधिक विभिन्न प्रकार के प्रकल्प चला रहा है, और यह सब संभव हुआ है कार्यकर्ताओं की अथक मेहनत के चलते. कार्यकर्ताओं ने ‘चरैवेति चरैवेति’ को अपना मंत्र बनाया, जिसका नतीजा यह है कि आश्रम आज विश्व में वनवासी समाज के लिए कार्य करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा संगठन है. उन्होंने कहा कि वनवासी समाज के आगे बढ़े बिना देश का पूर्ण विकास नहीं हो सकता. इसलिए हमें वनवासी समाज के सर्वांगीण विकास के लिए आगे बढ़कर उनका सहयोग करना चाहिए.

इस दौरान प्रांत अध्यक्ष पवन गर्ग ने बताया कि लुधियाना से कमल चेतली जी ने अपने पिता जी की स्मृति में कल्याण आश्रम को लुधियाना में 252 गज जमीन भेंट की है. कार्यक्रम की अध्यक्षता अमृतसर ग्रुप ऑफ कॉलेज के चेयरमैन अमित शर्मा ने की.

September 20th 2019, 4:18 am

20 सितम्बर / पुण्यतिथि – संस्कृति के संवाहक डॉ. हरवंशलाल ओबराय जी

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नई दिल्ली. भारत में अनेक मनीषी ऐसे हुये हैं, जिन्होंने दुनिया के अन्य देशों में जाकर भारतीय धर्म एवं संस्कृति का प्रचार किया. बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. हरवंशलाल ओबराय जी ऐसे ही एक विद्वान् थे, जो एक दुर्घटना के कारण असमय ही दुनिया छोड़ गये. डॉ. हरवंशलाल जी का जन्म 1926 में वर्तमान पाकिस्तान के एक गाँव में हुआ था. प्रारम्भ से ही उनकी रुचि हिन्दू धर्म के अध्ययन के प्रति अत्यधिक थी. सन् 1947 में देश विभाजन के बाद वे अपनी माता जी एवं छह भाई-बहनों सहित भारत आ गये. यहाँ उन्होंने सम्मानपूर्वक हिन्दी साहित्य, भारतीय संस्कृति (इण्डोलॉजी) एवं दर्शनशास्त्र में एमए किया. इसके बाद सन् 1948 में उन्होंने दर्शनशास्त्र में पीएचडी पूर्ण की. इस दौरान उनका स्वतन्त्र अध्ययन भी चलता रहा और वे प्राच्य विद्या के अधिकारी विद्वान माने जाने लगे.

सामाजिक क्षेत्र में वे ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ से जुड़े और सन् 1960 एवं 61 में उसके अध्यक्ष रहे. सन् 1963 में यूनेस्को के निमन्त्रण पर वे यूरोप, अमेरिका, कनाडा और एशियाई देशों में भारतीय संस्कृति पर व्याख्यान देने के लिये गये. इसके बाद भी उनका विदेश यात्राओं का क्रम चलता रहा. उन्होंने 105 देशों की यात्रा की. हर यात्रा में वे उस देश के प्रभावी लोगों से मिले और वहाँ भारतीय राजाओं, संन्यासियों एवं धर्माचार्यों द्वारा किये कार्यों को संकलित किया. इस प्रकार ऐसे शिलालेख, भित्तिचित्र और प्रकाशित सामग्री का एक अच्छा संग्रह उनके पास हो गया.

एक बार अमेरिका में उनका भाषण सुनकर बिड़ला प्रौद्योगिकी संस्थान, राँची के चन्द्रकान्त बिड़ला ने उन्हें अपने संस्थान में काम करने का निमन्त्रण दिया. सन् 1964 में वहाँ दर्शन एवं मानविकी शास्त्र का विभाग खोलकर डॉ. ओबराय को उसका अध्यक्ष बनाया गया. उनके सुझाव पर सेठ जुगलकिशोर बिड़ला ने छोटा नागपुर में ‘सरस्वती विहार’ की स्थापना कर भारतीय संस्कृति के शोध, अध्ययन एवं प्रचार की व्यवस्था की. सेठ जुगलकिशोर बिड़ला को इस बात का बहुत दुःख था कि वनवासी क्षेत्र में ईसाई मिशनरियाँ सक्रिय हैं तथा वे निर्धन,  अशिक्षित लोगों को छल-बल से ईसाई बना रही हैं. यह देखकर डॉ. ओबराय ने ‘सरस्वती विहार’ की गतिविधियों में ऐसे अनेक आयाम जोड़े, जिससे धर्मान्तरण को रोका जा सके. इसके साथ ही उन्होंने शुद्धीकरण के काम को भी तेज किया.

डॉ. ओबराय हिन्दी, संस्कृत, पंजाबी, उर्दू, अंग्रेजी तथा फ्रेंच के विद्वान थे. सम्पूर्ण भागवत, रामायण, गीता एवं रामचरितमानस उन्हें कण्ठस्थ थे. उनके सैकड़ों शोध प्रबन्ध देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपे. अनेक भारतीय एवं विदेशी छात्रों ने उनके निर्देशन में शोध कर उपाधियाँ प्राप्त कीं. उनकी विद्वता देखकर देश-विदेश के अनेक मठ-मन्दिरों से उनके पास गद्दी सँभालने के प्रस्ताव आये, पर उन्होंने विनम्रतापूर्वक सबको मना कर दिया.

एक बार वे रेल से इन्दौर जा रहे थे. मार्ग में रायपुर स्टेशन पर उनके एक परिचित मिल गये. उनसे वे बात कर ही रहे थे कि गाड़ी चल दी. डॉ. ओबराय ने दौड़कर गाड़ी में बैठना चाहा, पर अचानक ठोकर खाकर वे गिर पड़े. उन्हें तत्काल राँची लाया गया, पर चोट इतनी घातक थी कि उन्हें बचाया नहीं जा सका. इस प्रकार सैकड़ों देशों में हिन्दुत्व की विजय पताका फहराने वाला योद्धा 20 सितम्बर, 1983 को चल बसा.

September 19th 2019, 5:48 pm

19 सितम्बर / जन्मदिवस – वेदमूर्ति : पंडित श्रीपाद सालवलेकर

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वेदों के सुप्रसिद्ध भाष्यकार पंडित श्रीपाद दामोदर सातवलेकर का जन्म 19 सितम्बर, 1867 को महाराष्ट्र के सावंतवाड़ी रियासत के कोलगाव में हुआ था. जन्मपत्री के अनुसार 16 वें वर्ष में उनकी मृत्यु का योग था; पर ईश्वर की कृपा से उन्होंने 102 की आयु पाई. वेदपाठी परिवार होने से उनके कानों में सदा वेदमंत्र गूंजते रहते थे. मामा श्री पेंढारकर के घर सावंतवाड़ी में रहकर उन्होंने प्राथमिक शिक्षा ली. 1887 में एक अंग्रेज वेस्ट्रॉप ने वहां चित्रशाला प्रारम्भ की. श्रीपाद ने यहां चित्र और मूर्तिकला का रुचिपूर्वक गहन अध्ययन किया.

22 वर्ष की अवस्था में विवाह के बाद वे मुंबई आ गये. यहां उनकी कला परिमार्जित हुई तथा अनेक पुरस्कार मिले. इसके साथ वे संस्कृत अध्ययन की अपनी परम्परा भी निभाते रहे. वेदों के बारे में लिखे उनके लेख लोकमान्य तिलक ने ‘केसरी’ में प्रकाशित किये. 1900 ई. में हैदराबाद आकर वे आर्य समाज से जुड़े और ऋषि दयानंद के कई ग्रन्थों का अनुवाद किया. वेदों में बलिप्रथा नहीं है, इसे सिद्ध करते हुए उन्होंने कई लेख लिखे. उन्होंने अथर्ववेद के पृथ्वीसूक्त को ‘वैदिक राष्ट्रगीत’ बताकर एक पुस्तिका लिखी. कुछ समय बाद वे थियोसोफिकल सोसायटी के सदस्य भी बने.

श्रीपाद जी की स्वाधीनता आंदोलन में सक्रियता को देखकर अंग्रेजों ने अपने मित्र हैदराबाद के निजाम को इसे रोकने को कहा. अतः वे गुरुकुल कांगड़ी (हरिद्वार) आकर चित्रकला तथा वेद पढ़ाने लगे. उनके एक लेख के लिए कोल्हापुर में उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला, जिसमें तीन वर्ष की सजा सुनाई गयी. वे चुपचाप वहां से निकल गये; पर हरिद्वार पुलिस ने उन्हें हथकड़ी और बेड़ी डालकर बिजनौर जेल में बंद कर दिया. रेल से कोल्हापुर ले जाते समय रास्ते भर लोगों ने उनका भव्य सत्कार किया. कोल्हापुर न्यायालय में हुई बहस में पंडित जी ने स्वयं को वेदों का पुजारी कहकर देश के क्षत्रियत्व को जाग्रत करना अपना धर्म बताया. अतः न्यायाधीश ने उन्हें छोड़ दिया.

सातवलेकर जी फिर हरिद्वार आये; पर प्रशासन उनके कारण गुरुकुल के छात्रों को परेशान न करे, यह सोचकर वे लाहौर आ गये. यहां उन्होंने ‘सातवलेकर आर्ट स्टूडियो’ स्थापित कर चित्रकला के साथ फोटोग्राफी भी प्रारम्भ कर दी. ‘हिन्द केसरी’ पत्र में उनके वेद-विषयक लेख छपने से उन्हें व्याख्यान के लिए भी निमन्त्रण मिलने लगे. कांग्रेस में सक्रियता के कारण पुलिस फिर उनके पीछे पड़ गयी. उनके बच्चे छोटे थे. अतः 1919 में वे लाहौर छोड़कर औंध आ गये. यहां ‘स्वाध्याय मंडल’ स्थापित कर वे वेदों का अनुवाद करने लगे. दक्षिण की अनेक रियासतों में उन्होंने ‘प्रजा परिषद’ का गठन कर जागृति फैलाई. उनके प्रयास से औंध में स्वराज्य का संविधान लागू हुआ.

1936 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और औंध में संघचालक बने. देश स्वाधीन होने पर वे वे बलसाड़ (गुजरात) के पारडी ग्राम में बस गये. यहां उन्होंने एक चर्च खरीद कर उसमें वेदमंदिर स्थापित किया. 90 वर्ष पूर्ण होने पर मुंबई में उनका भव्य सत्कार किया गया. 100 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित समारोह में सरसंघचालक श्री गुरुजी ने उन्हें मानपत्र समर्पित किया.

31 जुलाई, 1969 को वेदों के भाष्यकार, स्वाधीनता सेनानी तथा श्रेष्ठ चित्रकार पंडित सातवलेकर जी के सक्रिय जीवन का समापन हुआ.

(संदर्भ : पं. सातवलेकर, श्री भारती प्रकाशन, नागपुर)

September 18th 2019, 7:37 pm

कर्म ही हमें धर्म की ओर प्रेरित करता है – डॉ. मोहन भागवत

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सोलन (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि भारतीय सभ्यता-संस्कृति, पांच हजार वर्ष से भी अधिक प्राचीन है तथा विविधता में एकता के सह-अस्तित्व की विशिष्टता को दर्शाती है. धर्म वास्तविकता में एकता का एकीकृत दृश्य प्रदान करता है क्योंकि भगवान एक हैं और उनके द्वारा बनाई गई वास्तविकता, एकता और अखंडता का प्रतीक है. धर्म का उद्देश्य मानवता को एकजुट करना है और मानव जाति की सेवा ईश्वर की सेवा है. हममें से प्रत्येक को अपने समाज और राष्ट्र के विकास के लिए ईमानदारी और समर्पण के साथ कार्य करना चाहिए क्योंकि यह कर्म ही है जो हमें धर्म की ओर प्रेरित करता है. सरसंघचालक जी ने सोलन में नवनिर्मित श्री कृष्ण मंदिर का विधिवत पूजा अर्चना के पश्चात लोकार्पण किया. उनके साथ मंदिर के संरक्षक कविश्वर कुलाचार्य स्वामी महंत परमहंस कारंजेकर जी, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर भी उपस्थित थे. सरसंघचालक जी ने कहा कि विविधता में एकता हमारे राष्ट्र की पहचान है, जो बहु-समाज और संस्कृतियों का भंडार है. उन्होंने कहा कि भागवद् गीता हमें बिना फल की चिंता किए अपने कर्तव्य का पालन समर्पण और परिश्रम के साथ करने का उपदेश देती है. आशा व्यक्त की कि सोलन में निर्मित श्रीकृष्ण मंदिर न केवल पूजा के लिए, बल्कि समाज के कल्याण के लिए भी एक उपयुक्त स्थान होगा. मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने सरसंघचालक जी का स्वागत करते हुए कहा कि भारत विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों और भाषाओं का देश है. यहां विभिन्न जातियों और समुदायों के लोगों ने कई कठिनाइयों के बावजूद एकता और सामंजस्य को बरकरार रखा है. धर्म समाज के हर वर्ग को एकजुट बनाए रखने वाली एक आलौकिक शक्ति है. आज के आधुनिक युग में, हमें अपने धर्म और संस्कृति को बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए. मुख्यमंत्री ने कहा कि मूल्यों और संस्कृति का त्याग कर कोई भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता. जीवन्त राष्ट्र के लिए विज्ञान और धर्म को साथ चलना होगा. वर्तमान सरकार के नेतृत्व में राष्ट्र ने गरिमा प्राप्त की है और विश्व के शक्तिशाली देशों ने भारत के सामर्थ्य को स्वीकारा है. उन्होंने कहा कि सोलन में श्रीकृष्ण मन्दिर क्षेत्र के लोगों की धार्मिक आस्था का केन्द्र बनकर उभरेगा. मंदिर के संरक्षक कारंजेकर जी ने महाभारत के प्रेरक प्रसंग साझा कर भगवान की महिमा पर प्रकाश डाला. श्रीकृष्ण वृन्दावन ट्रस्ट के अध्यक्ष राजीव कोहली ने मोहन भागवत, मुख्यमंत्री एवं उपस्थित अन्य गणमान्यजनों का स्वागत किया. उन्होंने ट्रस्ट की गतिविधियों के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी दी.

September 18th 2019, 10:57 am

राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की सार्थक भूमिका होनी चाहिए – डॉ. मोहन भागवत

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विभिन्न पूजा पद्धतियां होने के बावजूद हमारी संस्कृति संपूर्ण देश को जोड़ती है – डॉ. मोहन भागवत

सोलन (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि संतों, महात्माओं ने भारत की विशेषता सदियों से चली आ रही संस्कृति को बताया है, सदियों से अपने देश की एक संस्कृति रही है, जो विभिन्न पूजा-पद्धतियां होते हुए भी सम्पूर्ण देश को जोड़ती है. इसलिए हमें अपनी संस्कृति का गौरव होना चाहिए. जिस मनुष्य को अपने राष्ट्र की पहचान नहीं, उसका जीवन व्यर्थ है. राष्ट्र हमको जोड़े रखने के लिए एक शक्ति व प्रेम देता है. अपने कर्तृत्व से से सुख-शांति प्राप्त कर अपना जीवन ठीक करो, ये सब अपनी संस्कृति कहती है. इस प्रकार प्रामाणिकता, निस्वार्थ बुद्धि से नई पीढ़ी को तैयार करेंगे तो ही राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की भूमिका सार्थक होगी.

सरसंघचालक हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला में स्थित डॉ. यशवंत सिंह परमार वानिकी एवं बागवानी विश्वविद्यालय, नौणी में प्राध्यापक संगोष्ठी में संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि आज के दौर में शिक्षकों को राष्ट्र की परिकल्पना स्पष्ट चाहिए. जैसे कई वर्षों से हमको पढ़ाया गया कि आर्य बाहर से आए. लेकिन, हिसार के राखीगढ़ी के उत्खनन से अब ये एक मिथक साबित हो रहा है. आर्य भारत के ही निवासी थे, ये सिद्ध हुआ है.

उन्होंने यूरोप में उत्तम शिक्षा प्रणाली के लिए प्रसिद्ध देश फिनलैंड में शिक्षा प्रणाली के विषय में बताया कि वहां पर अभिभावक बच्चों पर अधिक अंक लाने का जोर नहीं देते हैं, वह कहते हैं कि हम अपने बच्चों को वर्तमान समय में जीने के लिए संघर्ष करना सिखाते हैं. इसलिए वे स्वतः ही अध्ययन के क्षेत्र में उल्लेखनीय स्थान प्राप्त करते हैं. स्कूलों में चौथी कक्षा तक का पाठ्यक्रम मातृभाषा में रहता है. इसके बाद यदि छात्र या उनके अभिभावकों का विचार छात्र को अन्य व विदेशी भाषा का भी ज्ञान देने का हो तो आगामी कक्षाओं में उसकी व्यवस्था रहती है. उन्होंने कहा कि हम भी भारत वर्ष में ऐसी और इससे बेहतर शिक्षा की व्यवस्था कर सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी शिक्षकों की है जो उस व्यवस्था की अहम कड़ी है. उन्होंने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि कैसे पोस्ट ग्रैजुएशन करते हुए उनके एक शिक्षक ने कक्षा के अलावा उन्हें अतिरिक्त समय देकर पढ़ाया, जबकि शिक्षा की पद्धति वही रही जो अभी भी है. इसलिए एक विद्यार्थी के निर्माण में शिक्षक की भूमिका ही अहम मानी जाएगी.

इस अवसर पर प्राध्यापकों की ओर से पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में सरसंघचालक जी ने कहा कि टीवी और मीडिया में मनगढ़ंत चरित्र अब युवा पीढ़ी के आदर्श बताए जा रहे हैं. राम के आदर्शों की चर्चा परिवारों में कम हो गई है, फिर भी युवा पीढ़ी में कुछ युवा उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं. इसलिए हमें भी अपना उत्तम उदाहरण प्रस्तुत करना होगा.

उन्होंने ने कहा कि किसान अन्नदाता है, दूसरों के लिए खेती उसका दायित्व रहा. यह बोध न होने पर किसानों ने अब कृषि छोड़ दी है, पैसा ज्यादा कमाना उद्देश्य हो गया है. किसानों को ऐसे वैज्ञानिक उपाय सुझाने होंगे, जिससे वे कम लागत में बेहतर खेती कर सकें. इसके लिए उनकी फसल के संरक्षण के लिए गोदाम बनाना और उनके उत्पादों को बेहतर बाजार उपलब्ध करवाना व बगीचों के पास माल शीघ्रता से भेजने लिए निकट ही मंडियां, लघु उद्योग या बड़ी फैक्टी होनी चाहिए. प्रकृति की मार से सरकार को राहत की व्यवस्था व लागत के आधार पर मूल्य तय करना चाहिए. इससे किसान लाभान्वित होगा और किसी अनिष्ट की संभावना समाप्त हो जाएगी.

September 18th 2019, 9:12 am

जम्‍मू कश्‍मीर – कुछ मीडिया संस्थान और संगठन स्थिति को लेकर भ्रम फैलाने का प्रयास कर रहे

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नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्‍ट्स द्वारा जम्‍मू कश्‍मीर – आंखों देखा हाल विषय पर परिचर्चा का आयोजन

नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्‍ट्स (इंडिया) ने जम्‍मू-कश्‍मीर में अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी होने के बाद से कुछ पत्रकारों और मीडिया संस्थानों द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम पर चिंता प्रकट की.

जम्‍मू-कश्‍मीर – आंखों देखा हाल विषय पर आयोजित परिचर्चा में कहा कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ मीडिया संस्थान और संगठन कश्मीर की स्थिति को लेकर तथ्यों को तोड़ मरोड़ रहे हैं और कश्मीर की गलत तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हैं. कश्मीर में न तो कोई अखबार बंद हैं और न किसी प्रकार का कोई अंकुश. श्रीनगर सहित कश्मीर के कुछ हिस्सों में आतंकवादियों और अलगाववादियों ने भय का वातावरण बनाने की कोशिश की है. प्रशासन में स्थानीय राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की घुसपैठ, फैसलों और योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधक बन रही है. लोग कश्मीर के प्रमुख नेताओं और अलगाववादियों की नजरबंदी और गिरफ़्तारी को लेकर खुश दिखे. दूसरी ओर अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने के बाद से जम्मू और लद्दाख में खुशी का माहौल है और इन दोनों क्षेत्रों के लोग केंद्र सरकार के फैसले का खुलकर समर्थन कर रहे हैं.

मंगलवार को हरियाणा भवन में आयोजित परिचर्चा में जम्‍मू-कश्‍मीर और लद्दाख से हाल ही में लौटे एनयूजे (आई) के प्रतिनिधिमंडल में शामिल पत्रकारों ने अपने विचार साझा किए.

नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्‍ट्स (इंडिया) के राष्‍ट्रीय महासचिव और प्रतिनिधिमंडल के सदस्य मनोज वर्मा ने कहा कि अनुच्छेद 370 निरस्‍त किए जाने के बाद प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में जम्‍मू-कश्‍मीर और लद्दाख का अलग अलग दौरा किया. जम्मू कश्मीर और लदृदाख की जमीनी स्थिति को जानना इसका उद्देश्य था. प्रतिधिनिमंडल ने श्रीनगर सहित कश्मीर के अलग अलग हिस्सों में करीब डेढ़ सौ लोगों से बात की. इनमें दुकानदार, पत्रकार, वकील, किसान, पंचायतों के सदस्य, छात्र- छात्राओं सहित सिक्ख समाज, कश्मीरी पंडितों और अन्य वर्गों के प्रतिनिधि और उनके समूह शामिल थे. मनोज वर्मा ने कहा कि श्रीनगर और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का एक वर्ग गलत तथ्यों के आधार फेक नैरेटिव बनाने की कोशिश कर अलगावादियों की भाषा बोल रहा है.

वरिष्ठ पत्रकार हितेश शंकर ने कहा कि हम जो जम्‍मू-कश्मीर और लद्दाख से देखकर आ रहे हैं, उसकी सच्चाई कुछ और है. 05 अगस्‍त के बाद से एक भी गोली नहीं चली है. सरकार की तरफ से कोई कर्फ्यू नहीं है. अलबत्ता, घाटी के कुछ क्षेत्रों में अलगाववादी ताकतों ने स्‍वआरोपित कर्फ्यू जैसा माहौल बनाया हुआ है. मोबाइल और इंटनेट पर पांबदी को लेकर लोगों और सुरक्षा कर्मियों के अपने अपन पक्ष हैं, तर्क हैं.

वास्तव में अलगाववादी और अतंकियों ने पूर्व में इंटरनेट और मोबाइल का उपयोग हिंसा भड़काने के लिए किया. राज्य में किसान इसलिए खुश हैं क्योंकि सरकार ने सेब की खेती करने वाले किसानों का सेब खरीदने का ऐलान किया है. लेकिन अभी एक वर्ग है जो माहौल बिगाड़ने का प्रयास कर रहा है.

प्रतिनिधिमंडल के सदस्य सचिन बुधौलिया ने कहा कि हमने जो कुछ वहां देखा, उससे हमारा स्‍पष्‍ट मत बना है कि कुछ पत्रकार गलत नैरेटिव खड़ा कर रहे हैं. इससे अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर भारत का कुछ नुकसान न हो जाए, इसके लिए हमें लगातार सत्‍य को सामने लाने की जरूरत है. हमारे प्रतिनिधिमंडल को किसी भी सुरक्षा बलों के जवान ने रोकने की कोशिश नहीं की. रास्‍ते में भी किसी ने रोक-टोक नहीं की. वहां की हवा में कोई डर या दहशत है, हमें महसूस नहीं हुआ.

वरिष्‍ठ टीवी पत्रकार अशोक श्रीवास्‍तव ने कहा कि जम्‍मू-कश्मीर को लेकर फेक नैरेटिव खड़ा किया जा रहा है. समाचार-पत्र नियमित प्रकाशित हो रहे हैं. सरकार की ओर से मीडिया सेंटर बनाए गए हैं. कुछ पत्रकार कश्‍मीर के नाम पर झूठ फैला रहे हैं, वे ऐसा करना बंद करें. जम्मू कश्मीर में टीवी चैनल सब चल रहे हैं, पर इसके बावजूद कुछ संगठन और पत्रकार यह बताने में लगे हैं कि कश्मीर में सबकुछ बंद है.

एनयूजे (आई) के राष्‍ट्रीय कोषाध्‍यक्ष राकेश आर्य ने कहा कि अनुच्‍छेद 370 हटने के बाद जम्‍मू-कश्मीर और लद्दाख के लोगों को लगने लगा है कि उन्‍हें दो खास राजनीतिक परिवारों की मनमानी से मुक्‍ति मिलेगी और वे देश की मुख्‍यधारा में आ सकेंगे. यह कहने वाले तमाम लोग मिले कि कुछ नेताओं को नजरबंद कर ठीक किया.

पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी ने चित्रों व वीडियो के माध्यम से बताया कि जम्‍मू-कश्‍मीर में कर्फ्यू जैसी कोई स्थिति नहीं है. लोग सहजता से रह रहे हैं. पर्यटक भी आराम से घूम रहे हैं. जबकि वहां के पत्रकारों पर अलगाववादी ताकतों का असर दिखा. इसलिए वहां की सही खबरें सामने नहीं आ पा रहीं. श्रीनगर में मीडिया पर अलगववादियों को साफ भय नजर आया.

आलोक गोस्‍वामी ने कहा कि जो हमें बताया जाता है, उसके विपरीत हमें देखने को मिला. कश्‍मीर में तिरंगा लहरा रहा था. सड़कों पर ट्रैफिक सामान्य था. लोगों को अनुच्‍छेद 370 हटने के बाद विकास की नई उम्‍मीद की किरण दिखाई देने लगी है.

दिल्‍ली जर्नलिस्‍ट्स एसोसिएशन के अध्‍यक्ष अनुराग पुनेठा ने कहा कि जम्मू कश्मीर के निर्माण में मीडिया की सकारात्मक भूमिका की अत्यंत आवश्यकता है.

September 18th 2019, 6:11 am

राम मंदिर – मामले की सुनवाई 18 अक्तूबर तक पूरी होने की उम्मीद

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मुख्य न्यायाधीश ने कहा, आवश्यक हुआ तो शनिवार को भी होगी सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ में अयोध्या केस की 26वें दिन की सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश के निर्देशों की पृष्‍ठभूमि में सभी पक्षों ने केस के संबंध में अपनी दलीलों की समय सीमा बताई. राजीव धवन ने कहा कि मुस्लिम पक्षकारों को मौजूदा और अगला पूरा सप्ताह अपनी दलीलें खत्म करने में लग जाएगा. हिन्दू पक्षकारों ने कहा कि उस पर क्रॉस आर्गुमेंट के लिए हमें 2 दिन लगेंगे. धवन ने कहा कि उसके बाद मुझे भी 2 दिन लगेंगे. इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, आप लोगों ने जो समय-सीमा दी है, उससे उम्‍मीद है कि 18 अक्तूबर तक सभी पक्ष न्यायालय के समक्ष अपनी दलीलें रख लेंगे. इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सभी पक्ष अपनी दलीलें 18 अक्तूबर तक पूरी कर लें. उन्‍होंने संकेत दिया कि अगर समय कम रहा तो हम शनिवार को भी मामले की सुनवाई कर सकते हैं. हमें मिलजुल कर प्रयास करना चाहिए कि ये सुनवाई 18 अक्तूबर तक समाप्त हो जाए. यदि सुनवाई 18 अक्तूबर तक पूरी हो गई तो 17 नवंबर को मुख्य न्यायाधीश (CJI) रंजन गोगोई के रिटायर होने से पहले सर्वोच्च न्यायालय को अपना फैसला लिखने और सुनाने के लिए एक महीने का वक्‍त मिलेगा. मध्यस्थता का मसला सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या मामले पर मध्यस्थता को लेकर कहा कि मध्यस्थता को लेकर पत्र मिला है. CJI ने कहा कि अगर पक्ष आपसी बातचीत कर मसले का समझौता करना चाहते हैं तो करके न्यायालय के समक्ष रखें. CJI ने कहा कि मध्यस्थता कर सकते हैं. मध्यस्थता को लेकर गोपनीयता बनी रहेगी. मध्यस्थता पर सर्वोच्च न्यायालय ने ये भी कहा कि सुनवाई काफी आगे आ पहुंची है, इसे रोका नहीं जाएगा. कोई पक्ष मध्यस्थता के ज़रिए हल करने की कोशिश करना चाहता है तो ऐसा कर सकता है, लेकिन इसे गोपनीय रखा जाएगा. मध्यस्थता पैनल ने सर्वोच्च न्यायालय को जानकारी भेज कर बताया था कि कुछ पक्ष इसे जारी रखना चाहते हैं. इससे पहले बुधवार को CJI ने सभी पक्षकारों से यह बताने को कहा था कि उनको अपनी दलीलें पूरी करने के लिए और कितने दिन का वक्त चाहिए. मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय ने सभी पक्षकारों से कहा था कि वो दलील पूरी करने की समय सीमा बताएं.  

September 18th 2019, 2:49 am

18 सितम्बर / जन्मदिवस – सतनामी पन्थ के संस्थापक गुरु घासीदास जी

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नई दिल्ली. छत्तीसगढ़ वन, पर्वत व नदियों से घिरा प्रदेश है. यहाँ प्राचीनकाल से ही ऋषि मुनि आश्रम बनाकर तप करते रहे हैं. ऐसी पवित्र भूमि पर 18 सितम्बर, 1756 (माघ पूर्णिमा) को ग्राम गिरोदपुरी में एक सम्पन्न कृषक परिवार में विलक्षण प्रतिभा के धनी एक बालक ने जन्म लिया. माँ अमरौतिन बाई तथा पिता महँगूदास जी ने प्यार से उसका नाम घसिया रखा. वही आगे चलकर गुरु घासीदास के नाम से प्रसिद्ध हुये. घासीदास जी प्रायः सोनाखान की पहाड़ियों में जाकर घण्टों ध्यान में बैठे रहते थे. सन्त जगजीवनराम के प्रवचनों का उन पर बहुत प्रभाव पड़ा. इससे उनके माता पिता चिन्तित रहते थे. उनका एकमात्र पुत्र कहीं साधु न हो जाये, इस भय से उन्होंने अल्पावस्था में ही उसका विवाह ग्राम सिरपुर के अंजोरी मण्डल की पुत्री सफूरा देवी से कर दिया. इस दम्पति के घर में तीन पुत्र अमरदास,  बालकदास, आगरदास तथा एक पुत्री सुभद्रा का जन्म हुआ. उन दिनों भारत में अंग्रेजों का शासन था. उनके साथ-साथ स्थानीय जमींदार भी निर्धन किसानों पर खूब अत्याचार करते थे. सिंचाई के साधन न होने से प्रायः अकाल और सूखा पड़ता था. किसान, मजदूर भूख से तड़पते हुए प्राण त्याग देते थे, पर इससे शासक वर्ग को कोई फर्क नहीं पड़ता था. वे बचे लोगों से ही पूरा लगान वसूलते थे. हिन्दू समाज अशिक्षा, अन्धविश्वास, जादू टोना, पशुबलि, छुआछूत जैसी कुरीतियों में जकड़ा था. इन समस्याओं पर विचार करने के लिये घासीदास जी घर छोड़कर जंगलों में चले गये. वहाँ छह मास के तप और साधना के बाद सन् 1820 में उन्हें ‘सतनाम ज्ञान’ की प्राप्ति हुई. अब वे गाँवों में भ्रमण कर सतनाम का प्रचार करने लगे. पहला उपदेश उन्होंने अपने गाँव में ही दिया. उनके विचारों से प्रभावित लोग उन्हें गुरु घासीदास कहने लगे. वे कहते थे कि सतनाम ही ईश्वर है. उन्होंने नरबलि, पशुुबलि, मूर्तिपूजा आदि का निषेध किया. पराई स्त्री को माता मानने, पशुओं से दोपहर में काम न लेने, किसी धार्मिक सिद्धान्त का विरोध न करने, अपने परिश्रम की कमाई खाने जैसे उपदेश दिये. वे सभी मनुष्यों को समान मानते थे. जन्म या शरीर के आधार पर भेदभाव के वे विरोधी थे. धीरे-धीरे उनके साथ चमत्कारों की अनेक कथायें जुड़ने लगीं. खेत में काम करते हुए वे प्रायः समाधि में लीन हो जाते थे, पर उनका खेत जुता मिलता था. साँप के काटे को जीवित करना, बिना आग व पानी के भोजन बनाना आदि चमत्कारों की चर्चा होने लगी. निर्धन लोग पण्डों के कर्मकाण्ड से दुःखी थे, जब गुरु घासीदास जी ने इन्हें धर्म का सरल और सस्ता मार्ग दिखाया, तो वंचित वर्ग उनके साथ बड़ी संख्या में जुड़ने लगा. सतनामी पन्थ के प्रचार से एक बहुत बड़ा लाभ यह हुआ कि जो निर्धन वर्ग धर्मान्तरित होकर ईसाइयों के चंगुल में फँस रहा था, उसे हिन्दू धर्म में ही स्वाभिमान के साथ जीने का मार्ग मिल गया. गुरु घासीदास जी ने भक्ति की प्रबल धारा से लोगों में नवजीवन की प्रेरणा जगाई. गान्धी जी ने तीन बन्दरों की मूर्ति के माध्यम से ‘बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो’ नामक जिस सूत्र को लोकप्रिय बनाया, उसके प्रणेता गुरु घासीदास जी ही थे. सतनामी पन्थ के अनुयायी मानते हैं कि ब्रह्मलीन होने के बाद भी गुरुजी प्रायः उनके बीच आकर उन्हें सत्य मार्ग दिखाते रहते हैं.

September 17th 2019, 7:19 pm

स्वयं प्रेरणा से माता की सेवा का व्रत धारा है, सत्य स्वयंसेवक बनने का सतत प्रयत्न हमारा है

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मालवा प्रान्त

मन्दसौर विभाग के तीन जिलों मंदसौर, नीमच एवं गरोठ में भारी बारिश एवं जलभराव से जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है. प्राकृतिक प्रलय के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी प्रशासन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर राहत कार्य कर रहा है. एक क्षेत्र में पुलिया क्षतिग्रस्त होने के कारण दो दिन से यातायात बंद था, स्वयंसेवकों ने पुलिस की मरम्मत करवाकर यातायात बहाल करवाया.

मनासा – बाढ़ प्राभावित क्षेत्र रामपुरा, देवरान, ढाणी में संघ के स्वयंसेवक लगातार सहायता पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं. मनासा से लगभग 750 भोजन पैकेट, बिस्किट, सेव, आचार सहित अन्य सामग्री प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचाई. गांव देवरान एवं ढाणी में भी स्थिति सामान्य नहीं है. देवरान के कुछ क्षेत्रों में भोजन पहुंचाने के लिए गर्दन तक पानी में उतरना पड़ रहा है.

ढाणी में लगभग 23 घर पूर्णतया गिर चुके हैं, लेकिन अभी तक कोई प्रशासनिक सहायता वहां नहीं पहुंची है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने वहां पहुंचकर कुछ सहायता उपलब्ध करवाई है.

संघ रचना अनुसार गरोठ जिले के खड़ावदा मंडल के गांव बर्रामा, रूपपुरा, खेड़ा, पानी से घिर गए हैं. स्वयंसेवक रात 2 बजे गांव से लोगों को निकाल कर लाए. तथा खड़ावदा रामेश्वर धर्मशाला में लोगों को ठहराया गया. अभी लगभघ 300 व्यक्ति ठहरे हुए हैं, जिनके भोजन की व्यवस्था की गई है. आने वाले समय में प्रभावितों की संख्या बढ़ सकती है.

इसी तरह शामगढ़ तहसील के आवरा गांव में संघ के स्वयंसेवकों द्वारा सेवाकार्य किया जा रहा है. इसके अलावा बहुत से अन्य गांव हैं, जहां संघ के कार्यकर्ता प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को राहत पहुंचाने में जुटे हैं.

September 17th 2019, 5:23 am

हैदराबाद विलय दिवस – निजामशाही से हैदराबाद की मुक्ति में जनता ने भी भागीदारी निभाई

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भारत पर ब्रिटेन के लंबे शोषण, उत्पीड़नपूर्ण औपनिवेशिक शासन से 1947 में स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद लौह व्यक्तित्व और अदम्य साहस के धनी तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभभाई पटेल के अथक प्रयासों से 562 देशी रियासतों में से अधिकतर का भारत में विलय हो गया. जिन्ना जहां एक ओर द्विराष्ट्र सिद्धांत के आधार पर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को मिलाकर पाकिस्तान बनाने की योजना में सफल हो गया, वहीं भारत में अन्य रियासतें जहां पर सत्ता मुस्लिम शासकों के हाथ में थी, उन्हें उकसाकर भारत को विखंडित करके इस्लामिक राज्य तैयार करने की योजना पर भी काम कर रहा था. भोपाल, जूनागढ़, हैदराबाद, त्रावणकोर, कश्मीर, जोधपुर भारत में शामिल होने को तैयार नहीं थे. ये अलग स्वतंत्र देश के रूप में रहना चाहते थे. बाद में मुस्लिम राजा शासित भोपाल और हिन्दू राजा शासित त्रावणकोर और जोधपुर भी भारत में सम्मिलित हो गए. जूनागढ़ और कश्मीर का भी भारत में विलय हो गया. किन्तु हैदराबाद के निजाम की योजना भारत से अलग अपनी अलग सत्ता बनाए रखने पर अडिग थी.

हैदराबाद राज्य की स्थापना औरंगज़ेब के सेनापति गाज़ीउद्दीन खान फ़िरोज़ जंग के पुत्र मीर क़मरुद्दीन चिन किलिच खान ने की थी, जो खुद को खलीफा, अबू बकर का वंशज मानता था. हैदराबाद राज्य मुग़ल साम्राज्य का एक अंतिम अवशेष था, जिसकी राजनीतिक दृष्टि से भौगोलिक स्थिति अत्यन्त महत्वपूर्ण थी, क्योंकि यह उत्तर में मध्य प्रांत, पश्चिम में बाम्बे और दक्षिण एवं पूर्व मद्रास राज्य से घिरा था. हैदराबाद ब्रिटिश भारत का एक प्रमुख राज्य था, जिसकी जनसंख्या लगभग 1.6 करोड़, वार्षिक राजस्व 26 करोड़ रुपये और क्षेत्रफल लगभग 82000 वर्ग मील था जो इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुल क्षेत्रफल से भी बड़ा था और इसकी अपनी मुद्रा भी थी.

भू-राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से हैदराबाद के इतने महत्वपूर्ण स्थान के बावजूद ब्रिटिश प्रशासन ने कभी भी हैदराबाद को कोई विशेष स्थान नहीं दिया, जिसकी निज़ाम हमेशा से इच्छा रखता था. हैदराबाद राज्य की 85% जनसंख्या हिन्दू थी, लेकिन प्रशासन के महत्वपूर्ण विभाग जैसे नागरिक प्रशासन, पुलिस और सेना के पदों से हिन्दुओं को पूर्णतया वंचित रखा गया था. ये विभाग केवल मुसलमानों के लिए संरक्षित थे. निजाम द्वारा गठित 132 सदस्यीय विधान सभा में भी, अधिकांश मुस्लिम थे. निज़ाम ने छेत्री के नवाब के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल लॉर्ड माउंटबेटन से मिलने के लिए भेजा, जिसमें निज़ाम द्वारा बेरार क्षेत्र को पुनः हैदराबाद को वापस सौंपने और हैदराबाद को ब्रिटिश राज्य का स्वतंत्र डोमिनियन का दर्जा देने की मांग पर चर्चा करने की बात कही गयी थी.

निजाम की दोनों मांगों को तकनीकी रूप से अस्वीकार कर दिया गया क्योंकि माउंटबेटन का मानना था कि बेरार क्षेत्र व्यावहारिक रूप से और लंबे समय से केंद्रीय प्रांत का अभिन्न अंग बन चुका था. इसलिए क्षेत्र के लोगों की सहमति से ही यथास्थिति में कोई भी बदलाव किया जा सकता है. इसी तरह, हैदराबाद के लिए डोमिनियन की स्थिति को भी अस्वीकार कर दिया गया क्योंकि माउंटबेटन का विचार था कि ब्रिटेन की महामहिम सरकार प्रस्तावित दो नए देशों भारत और पाकिस्तान में से किसी एक के माध्यम से ही किसी देशी रियासत को स्वीकार करेगी. प्रस्तावों के अस्वीकार होने के बाद निज़ाम का प्रतिनिधि मण्डल वापस हैदराबाद लौट गया.

08 अगस्त को निज़ाम ने फिर से माउंटबेटन को भारत के साथ विलय न करने की मांग दोहराते हुए लिखा कि हैदराबाद अपनी स्वतंत्र संप्रभु राज्य की स्थिति को नहीं त्यागेगा, किन्तु भारत के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर करने को तैयार है, जिसमें हैदराबाद के लिए स्वायत्तता की शर्तें रखी गईं जो प्रायः एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के पास होती हैं. इन शर्तों में विशेष रूप से पाकिस्तान के साथ भारत के किसी भी युद्ध की स्थिति में भारत के साथ शामिल न होने के विशेषाधिकार की मांग की गई.

इस प्रस्ताव की शर्तें इतनी षड्यंत्रपूर्ण और अस्वीकार्य थीं कि उन्हें स्वीकार करना कदापि संभव नहीं था. इसलिए एक बार फिर प्रतिनिधिमण्डल बिना किसी निष्कर्ष के वापस चला गया. भारत के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने मामले मे सीधे हस्तक्षेप करते हुए निज़ाम से भारत में विलय का आग्रह किया. लेकिन निजाम ने पटेल के आग्रह को खारिज करते हुए 15 अगस्त 1947 को हैदराबाद को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया.

सरदार पटेल ने लॉर्ड माउंटबेटन को एक पत्र लिखा, जिसमें निज़ाम के दुराग्रह की विस्तृत चर्चा की गयी और भारत के लिए हैदराबाद विलय की सामरिक आवश्यकता का विस्तार से उल्लेख किया. लॉर्ड माउंटबेटन भारत के साथ हैदराबाद के विलय को लेकर आशान्वित थे और उन्होंने निवेदन किया कि निज़ाम को कुछ अतिरिक्त समय दिया जाना चाहिए ताकि 15% अल्पसंख्यकों को शिक्षित किया जा सके जो हैदराबाद प्रशासन मे शीर्ष स्थानों पर विराजमान हैं.

माउंटबेटन ने पटेल को सलाह दी कि इस चुनौती को भारत बिना बल प्रयोग के निपटे. माउंटबेटन की तरह प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की भी मंशा मामले के शांतिपूर्ण समाधान के पक्ष में थी, हालांकि पटेल इससे बिल्कुल असहमत थे. वे खुफिया सूत्रों के माध्यम से निज़ाम की गतिविधियों पर दृष्टि रखे हुए थे. हैदराबाद का निज़ाम भारत में विलय बिल्कुल नहीं कराना चाहता था. वह एक तरफ बार-बार प्रतिनिधि मण्डल भेजकर भारत सरकार को उलझाए रखना चाहते थे, दूसरी ओर विदेशों से हथियारों की खरीद भी कर रहे थे और जिन्ना के भी संपर्क में थे. निज़ाम ने इसी बीच अपना प्रतिनिधिमण्डल पाकिस्तान भी भेजा और यह जानने की कोशिश की कि क्या वह भारत के खिलाफ उनके राज्य का समर्थन करेंगे? जिन्ना ने निजाम के इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया.

निज़ाम की महत्वाकांक्षाएं और गतिविधियां केवल राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर तक सीमित नहीं थीं, बल्कि निज़ाम एक मुस्लिम चरमपंथी संगठन मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (एम्आईएम) के माध्यम से बहुसंख्यक हिन्दुओं में आतंक और डर पैदा करके सत्ता पर अपनी पकड़ बना रखी थी. इस संगठन के पास लगभग 20 हजार स्वैच्छिक कार्यकर्ता थे, जिन्हें रजाकार कहा जाता था. ये निजाम के संरक्षण में समाज में आतंक का माहौल बनाने के लिए काम करते थे.

कई दौर की बातचीत के बाद, नवंबर 1947 में, हैदराबाद ने भारत के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें राज्य में भारतीय सैनिकों को तैनात करने के अलावा अन्य सभी व्यवस्थाओं को जारी रखा गया. इसी बीच उग्रवादी रज़ाकारों द्वारा हिंसा, लूट और बलात्कार की गतिविधियों से राज्य के बहुसंख्यक हिन्दुओं का जीवन नरक बन गया. हैदराबाद में आतंक का पर्याय बन चुके रजाकारों और निज़ाम द्वारा भारत के विरुद्ध सिडनी कॉटन जैसे विदेशियों के हथियार खरीदने, स्थानीय फैक्टरियों को आयुध निर्माण इकाइयों में बदलने और पाकिस्तान से संपर्क साधने जैसे कदमों को देखते हुए सरदार पटेल ने हैदराबाद रियासत द्वारा समझौते का उल्लंघन करने का एक ज्ञापन दिया. निज़ाम की तरफ से भारत सरकार की आपत्तियों का उचित उत्तर और समाधान देने के बजाय एक सिरे से खारिज कर दिया गया.

सरदार पटेल ने हैदराबाद के निज़ाम के दुस्साहस को गंभीरता से लेते हुए सेना को सितंबर 1948 में हैदराबाद राज्य के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई का आदेश दिया. 13 से 17 सितंबर 1948 तक चले 109 घंटे के अभियान को “ऑपरेशन पोलो” नाम दिया गया. 17 सितंबर को हैदराबाद के निजाम ने अपनी सेना के साथ आत्म समर्पण कर दिया और हैदराबाद का सफलतापूर्वक भारत में विलय हो गया.

हैदराबाद का भारत विलय भारतीय इतिहास की अद्वितीय घटना है क्योंकि यह अपने आप में पहला अभियान था, जिसमें अब तक भारत में प्रचलित शासन और सत्ताओं के बीच संघर्ष की परंपरा से हटकर सीधे जनता भी भागीदार बनी.

संघ के स्वयंसेवकों ने वारंगल में फहराया था तिरंगा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सत्याग्रहियों ने हैदराबाद मुक्ति अभियान में बढ़ चढ़कर भाग लिया. अगस्त 1946 में जब वारंगल शहर में रजाकारों ने मारकाट मचाई तो स्वयंसेवकों ने वारंगल किले के उत्तर क्षेत्र में कतार बनाकर विरोध प्रदर्शन किया और तिरंगा फहराकर “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झण्डा ऊंचा रहे हमारा” का नारा लगाया. स्वयंसेवकों ने तिरंगे की सौगंध खाकर शपथ ली कि अपनी जान दे देंगे, किन्तु तिरंगे को नहीं झुकने देंगे. पूरा क्षेत्र “भारत माता की जय” “इंकलाब ज़िंदाबाद”, “महात्मा गांधी की जय” के नारों से गूंज रहा था. सबसे महत्वपूर्ण यह कि वारंगल का किला निज़ाम के लोगों का केंद्र था और वहां न केवल तिरंगा फहराया जा रहा था, बल्कि देश भक्ति के नारे भी लग रहे थे.

राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के अलावा अ-राजनीतिक प्रकृति के युवाओं की राष्ट्र की मुख्यधारा में सम्मिलित होने के लिए निज़ाम, और उसकी रजाकार निजी सेना के अत्याचारों के विरुद्ध किया गया सशस्त्र संघर्ष जन राष्ट्रवाद का एक अनुपम उदाहरण है. हैदराबाद पर सैन्य कार्यवाही से पूर्व युवाओं और किसानों द्वारा निज़ाम की पुलिस और रजाकारों के विरुद्ध मोर्चा खोलना हैदराबाद के भारत विलय का एक स्वर्णिम अध्याय है. बिदार क्षेत्र के किसानों द्वारा उस समय के संघर्ष के लोकगीत आज भी गाए जाते हैं.

September 17th 2019, 4:38 am

17 सितम्बर / जन्मदिवस – अक्षर पुरुष बापू वाकणकर जी

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नई दिल्ली. दुनिया भर में लिपि विशेषज्ञ के नाते प्रसिद्ध लक्ष्मण श्रीधर वाकणकर जी लोगों में बापू के नाम से जाने जाते थे. उनके पूर्वज बाजीराव पेशवा के समय मध्य प्रदेश के धार नगर में बस गये थे. उनके अभियन्ता पिता जब गुना में कार्यरत थे, उन दिनों 17 सितम्बर, 1912 को बापू का जन्म हुआ था. ग्वालियर, नीमच व धार में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर बापू इंदौर आ गये. यहां उनका परिचय कई क्रांतिकारियों से हुआ. वे जिस अखाड़े में जाते थे, उसमें अगस्त 1929 में संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी आये थे. यहां पर ही मध्य भारत की पहली शाखा लगी, जिसमें बापू भी शामिल हुए थे. इस प्रकार वे प्रांत की पहली शाखा के पहले दिन के स्वयंसेवक हो गये.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा क्रांतिकारियों से बढ़ते सम्बन्धों से चिंतित पिताजी ने उन्हें अभियन्ता की पढ़ाई करने मुंबई भेज दिया. वहां उनका आवास बाबाराव सावरकर के घर के पास था. इससे उनके मन पर देशभक्ति के संस्कार और दृढ़ हो गये. पुणे में लोकमान्य तिलक द्वारा स्थापित केसरी समाचार पत्र के कार्यालय में पत्रकारिता का अध्ययन करते समय सन् 1935 में उन्होंने संघ का द्वितीय वर्ष का प्रशिक्षण लिया. निशानेबाजी एवं परेड में वे बहुत तज्ञ थे. इसके बाद उज्जैन आकर उन्होंने दशहरा मैदान में शाखा प्रारम्भ की.

बापू वाकणकर जी ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में भी शिक्षा ग्रहण की थी. वहां उनके गुरु प्रो. गोडबोले तथा श्रीगुरू जी ने उनके मन में स्वदेशी का भाव भरा. इससे प्रेरित होकर उन्होंने ‘आशा’ नामक उद्योग स्थापित कर सुगन्धित द्रव्य तथा दैनिक उपयोग की कई चीजें बनाईं. ये उत्पाद इतने अच्छे थे कि द्वितीय विश्व युद्ध के समय विदेशी भी उन्हें खरीदने को लालायित रहते थे. यह काम एक युवा उद्यमी को देकर बापू ने सिरेमिक्स के छोटे बर्तनों पर छपाई की सुगम तकनीक विकसित की. फिर इसे भी एक सहयोगी को देकर भारतीय लिपियों को संगणक (कम्प्यूटर) पर लाने के शोध में लग गये. उनकी प्रतिभा देखकर केन्द्र शासन ने उन्हें ‘लिपि सुधार समिति’ का सदस्य बना दिया. फिर भूटान, सिक्किम और श्रीलंका सरकार के आमन्त्रण पर उन्होंने वहां की स्थानीय लिपियों को भी सफलतापूर्वक कम्प्यूटरीकृत किया.

इसके बाद संगणक निर्माण में अग्रणी जर्मनी तथा डेनमार्क ने उन्हें अपने यहां बुलाया. उनके शोध की उपयोगिता देखकर बड़ोदरा के उद्योगपति अमीन जी ने उन्हें आवश्यक आर्थिक सहायता देकर पुणे में अंतरराष्ट्रीय लिपि के क्षेत्र में शोध को कहा. इस प्रकार ‘इंटरनेशनल टायपोग्राफी इंस्टीट्यूट’ की स्थापना हुई. यहां ‘अक्षर’ नामक प्रकाशन भी प्रारम्भ हुआ. बापू के प्रयास से भारतीय लिपि के क्षेत्र में एक नये युग का सूत्रपात हुआ. विश्व की अनेक भाषा एवं लिपियों के ज्ञाता होने से लोग उन्हें ‘अक्षरपुरुष’ और ‘पुराणपुरुष’ कहने लगे.

पद्मश्री से अलंकृत उनके छोटे भाई डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर अंतरराष्ट्रीय ख्याति के पुरातत्ववेत्ता थे. उन्होंने उज्जैन में इतिहास संबंधी शोध के लिए ‘वाकणकर शोध संस्थान’ स्थापित किया था. सन् 1988 में उनके असमय निधन के बाद बापू उज्जैन में रहकर उनके अधूरे शोध को पूरा करने लगे. उन्होंने सरस्वती नदी के लुप्त यात्रा पथ को खोजने में महत्वपूर्ण योगदान दिया. बापू ने गणेश जी की स्तुति में रचित ‘अथर्वशीर्ष’ नामक स्तवन का अध्ययन कर यह बताया कि आद्य अक्षर ‘ओम्’ में से लिपि का उदय कैसे हुआ है ? आज संगणक और उसमें भारतीय भाषा व लिपियों का महत्व बहुत बढ़ गया है. इसे पर्याप्त समय पूर्व पहचान कर, इसके शोध में जीवन समर्पित करने वाले श्री वाकणकर जी का 15 जनवरी, 1999 को उज्जैन में ही निधन हुआ.

September 16th 2019, 7:49 pm

16 सितम्बर / जन्मदिवस – जन्मजात संघचालक बबुआ जी

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नई दिल्ली. बिहार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बहुविध गतिविधियों के पर्याय बने कृष्णवल्लभ प्रसाद नारायण सिंह जी (बबुआ जी) का जन्म 16 सितम्बर, 1914 को नालन्दा जिले के रामी बिगहा ग्राम में रायबहादुर ऐदल सिंह जी के घर में हुआ था. बाल्यकाल में परिवार के सभी सदस्यों के नालन्दा से गया आ जाने के कारण उनका अधिकांश समय गया में ही बीता. संघ की स्थापना के बाद डॉ. हेडगेवार जब बिहार गये, तो वहाँ उनका सम्पर्क बबुआ जी से हुआ. डॉ. जी की पीठ में बहुत दर्द रहता था. इसीलिये वे राजगीर (राजगृह) गये थे. वहाँ के गर्म झरने में बैठने से इस रोग में आराम मिलता है. उस समय डॉ. जी की सब प्रकार की चिन्ता और व्यवस्था बबुआ जी ने ही की थी. डॉ. जी की दृष्टि बहुत पारखी थी. वे समझ गये कि बबुआ जी संघ कार्य के लिये बहुत उपयोगी होंगे. डॉ. जी ने उन्हें सर्वप्रथम गया नगर का संघचालक नियुक्त किया. इस प्रकार 24 वर्ष की युवावस्था में वे संघ से जुड़े और फिर जीवन भर काम करते रहे. बबुआ जी से डॉ. जी का परिचय हिन्दू महासभा के भागलपुर अधिवेशन में हुआ था. वहाँ डाक्टर हेडगेवार ने उन्हें पुणे और नागपुर के संघ शिक्षा वर्गों को देखने के लिये आमन्त्रित किया. बबुआ जी मुम्बई होते हुए डॉ. हेडगेवार जी के साथ नागपुर आये. रेलवे स्टेशन पर डॉ. जी का स्वागत करने के लिये नागपुर वर्ग के सर्वाधिकारी श्री गुरुजी माला लेकर उपस्थित थे. डॉ. हेडगेवार जी ने हँसते हुए कहा कि माला मुझे नहीं इन्हें पहनाइये. इस पर गुरुजी ने बबुआ जी का माला पहनाकर अभिनन्दन किया. बबुआ जी का सम्पर्क सामाजिक क्षेत्र की सैकड़ों महान हस्तियों से था. पटना स्थित उनके घर पर अनेक ऐसे लोग पधारे थे. उन्होंने आँगन में एक शिलापट पर ऐसे महान् लोगों के नाम लिखे थे, जिनके आने से वह घर पवित्र हुआ. बबुआ जी ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने संघ के पाँच सरसंघचालकों के साथ काम किया. ऐसे सौभाग्यशाली लोग कम ही होते हैं. जब तक उनका शरीर सक्रिय रहा, वे संघ कार्य करते रहे. अत्यधिक सम्पन्न परिवार के होने के बाद भी बबुआ जी सदा स्वयं को सामान्य स्वयंसेवक ही समझते थे. जब भी कोई संकट का समय आया, उन्होंने आगे बढ़कर उसे अपने सीने पर झेला. वीर सावरकर के कहने पर वे वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन के समय भागलपुर जेल में बन्द रहे. सन् 1948 और 1977 में संघ पर प्रतिबन्ध के समय तथा सन् 1992 में श्री रामजन्मभूमि आन्दोलन के समय भी वे जेल गये. जीवन की चौथी अवस्था में भी उन्होंने जेल का भोजन किया और सबके साथ जमीन पर ही सोये. बबुआ जी को डॉ. हेडगेवार जी ने संघचालक नियुक्त किया था. इस प्रकार वे जन्मजात संघचालक थे. नगर संघचालक से लेकर क्षेत्र संघचालक और अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य तक के दायित्व उन्होंने निभाये. जब शरीर थकने लगा, तो उन्होंने संघ के वरिष्ठ अधिकारियों से निवेदन किया कि अब उन्हें दायित्व से मुक्त किया जाये, वे सामान्य स्वयंसेवक की तरह भी कुछ समय रहना चाहते हैं. उनकी इच्छा का सम्मान किया गया. 18 दिसम्बर, 2007 को 93 वर्ष की सुदीर्घ आयु में उनका देहान्त हुआ. उनकी इच्छानुसार उनका अन्तिम संस्कार अधिकांश समय तक उनके कार्यक्षेत्र रहे गया नगर में ही किया गया.

September 15th 2019, 7:21 pm

देश में जिला केंद्रों पर आदर्श विद्यालय स्थापित करेगी विद्या भारती

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उदयपुर. उदयपुर के विद्या निकेतन विद्यालय में चल रही विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान की तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक के दूसरे दिन शनिवार को देश की शिक्षा व्यवस्था में गुणवत्ता विकास, सूचना एवं संचार की नवीनतम तकनीकों का प्रयोग कर शिक्षा के क्षेत्र में नवाचारी प्रयोग पर मंथन सहित भारत सरकार द्वारा प्रस्तुत नई शिक्षा नीति के प्रारूप पर भी चर्चा हुई.

उपस्थित विद्वातजनों ने न केवल विद्या भारती से संबद्ध विद्यालयों तक सीमित रहकर, अपितु संपूर्ण शिक्षा जगत में स्तर उन्नयन पर विचार करने और उसमें विद्या भारती की रचनात्मक भूमिका सुनिश्चित करने का विचार रखा. विद्या भारती के कार्य विस्तार और विकास की दृष्टि से जिला केंद्रों पर एक मॉडल विद्यालय स्थापित करने का निर्णय किया गया. यह मॉडल विद्यालय न केवल आवश्यक संसाधनों से युक्त होगा, बल्कि उच्च शैक्षिक स्तर वाला होगा.

अखिल भारतीय महामंत्री श्रीराम आरावकर ने बताया कि शिक्षा क्षेत्र के विद्वतजनों से संपर्क कर उनसे शैक्षिक मार्गदर्शन लेने, शिक्षा शोध के कार्यक्रमों को गति देने, शिक्षक प्रशिक्षण के कार्यक्रमों को प्रभावी व परिणामकारी बनाने तथा भाषा शिक्षण के उच्च मानकों को प्राप्त करने के संबंध में भी विस्तृत चर्चा की गई.

September 15th 2019, 10:44 am

शिक्षा में गुणात्मकता के लिए नए प्रयोगों को स्वीकार करने की मानसिकता बनानी होगी – दत्तात्रेय होसबले

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‘स्कूलिंग विद स्किलिंग’ पर हर विद्यालय करे विचार - राव उदयपुर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले जी ने कहा कि ‘नित्य नूतन चिर पुरातन’ यह भारत की परंपरा है. शिक्षा क्षेत्र में गुणात्मकता की दृष्टि से नए प्रयोगों को स्वीकार करने की मानसिकता बननी चाहिए. विद्या भारती के शैक्षिक विषयों एवं प्रयोगों को समाज सहज रूप से स्वीकार करे, ऐसा भगीरथ प्रयास करना होगा. विद्या भारती शिक्षा क्षेत्र में राष्ट्रीय आंदोलन के नाते प्रयासरत है. सह सरकार्यवाह रविवार (15 सितंबर) को विद्या निकेतन में चल रही विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान की तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक के समापन सत्र में संबोधित कर रहे थे. विद्या भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री काशीपति जी ने कहा कि विद्या भारती में दो प्रकार के कार्य हैं, एक विद्यालय गुणवत्ता पूर्वक चले और भारतीय शिक्षा के समग्र मॉडल के नाते समाज में स्थापित हो. दूसरा समाजोन्मुख कार्य, पूर्व छात्र, संस्कृति बोध, विद्वत परिषद, शोध, प्रचार विभाग, संपर्क विभाग, अभिलेखागार, इन सभी के कार्यों से भी शिक्षा जगत में प्रभावी योगदान देकर मूल्य स्थापित करना है. अध्यक्षीय उद्बोधन में रामकृष्ण राव ने कहा कि शिक्षा जगत में परिवर्तन लाना हमारा लक्ष्य है. देशभर में आदर्श विद्यालय, एकल विद्यालय व संस्कार केंद्रों की संख्या बढ़ाएंगे. देशभर में ‘स्कूलिंग विद स्किलिंग’ के बारे में समस्त शिक्षा जगत को विचार करने की आवश्यकता है. कार्यकारिणी बैठक में आए 200 से अधिक कार्यकर्ता नई ऊर्जा, नई उमंग, नए उत्साह और नए संकल्प के साथ अपने कार्य क्षेत्र को लौट रहे हैं. बैठक में शिक्षा जगत से जुड़ी 10 पुस्तकों का भी परिचय कराया गया. विद्यालय में कार्यक्रम सफलतापूर्वक आयोजित करने वाले प्रबंधकों, आचार्य, छात्र, छात्राओं, अभिभावकों और पूर्व छात्रों का उत्साहवर्धन किया गया. वंदे मातरम के साथ तीन दिवसीय बैठक संपन्न हुई.

September 15th 2019, 10:44 am

नए भारत के निर्माण में महिलाओं का स्वयंसिद्ध होना आवश्यक है – शांताक्का जी

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राष्ट्र सेविका समिति की प्रमुख संचालिका शांताक्का का नए भारत की महिलाओं से आह्वान है कि वे घिघियाना छोड़ दें और अपने भीतर ऐसी शक्ति पैदा करें कि हम नेतृत्व कर सकें. उनसे समिति के कार्यों, नए भारत में महिलाओं की स्थिति आदि पर हिन्दी विवेक की विशेष बातचीत के महत्वपूर्ण अंश – नए भारत की संकल्पना के बारे में आपके क्या विचार हैं? भारत के लिए नित्य नूतन और चिरपुरातन दोनों शब्दों का प्रयोग किया जाता है. पहली बात तो मुझे लगता है कि भारत हमेशा ही नया रहा है. कई वर्षों से हम देखते आ रहे हैं कि युगानुकूल परिवर्तन को भारत ने हमेशा ही स्वीकार किया है. हमारे ॠषि-मुनियों ने सभी दिशाओं से अच्छे विचारों को आत्मसात किया और समाज में आवश्यक परिवर्तन करवाए. इसलिए भारत परिवर्तनों को स्वीकार करने वाला हमेशा ही नया भारत रहा है. दूसरी बात अभी हमारे प्रधानमंत्री जी ने नए भारत की जो संकल्पना दी है, मुझे ऐसा लगता है कि वह नया भारत हिन्दू आध्यात्मिक जीवन पद्धति और नैतिक मूल्यों के आधार पर खड़ा भारत होगा. जब हमारी जीवन पद्धति इस प्रकार की हो जाएगी तो अपने आप नया भारत आतंकवादमुक्त, भ्रष्टाचारमुक्त और नैतिक मूल्यों से युक्त होगा. चिरपुरातन भारत और नए भारत में क्या समानताएं व क्या अंतर हैं? भारत ने हजारों साल से कुछ जीवन मूल्यों को स्वीकार किया है. इन जीवन मूल्यों का नए भारत में ह्रास नहीं होना चाहिए, बल्कि इन पर आधारित ही हमारी जीवन पद्धति होनी चाहिए. परंतु साथ ही साथ, आज विश्व जिस दिशा की ओर जिस गति से आगे बढ़ रहा है, भारत को भी उसी प्रकार सिद्ध होना आवश्यक है और वह हो भी रहा है. हाल ही में भारत ने चंद्रयान-2 का सफल प्रक्षेपण किया. तकनीक के अन्य क्षेत्रों में भी भारत प्रगति कर रहा है. अत: अपने जीवन मूल्यों और संस्कारों को साथ लेकर नवीन तकनीकों के आधार पर आगे बढ़ने वाला भारत ही नया भारत होगा. आपका विदेशों में भी बहुत प्रवास होता है. क्या आपको भारत की ओर देखने के वैश्विक दृष्टिकोण में परिवर्तन दिखाई देता है? पहले जब हम विदेशों में प्रवास करते थे तो हमारी बातें सुनने के लिए विदेशी नागरिक या वहां बसे भारतीय नागरिक भी अधिक उत्सुक नहीं दिखाई देते थे. परंतु आज जब हम जाते हैं, तो लोग हमारी ओर बहुत सम्मान से देखते हैं. उनके मन में भारत के प्रति कई जिज्ञासाएं दिखाई देती हैं. वे उत्सुकतावश हमसे कई प्रश्न पूछते हैं. अब हमें भी लगता है कि उनके सामने जाने के पहले हमारी भी पूरी तैयारी होनी आवश्यक है, जिससे उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया जा सके. इसे नए भारत की बानगी भी कहा जा सकता है कि भारत की ओर आज विश्व एक सम्मानित दृष्टि से देखने लगा है. क्या आप कुछ उदाहरण ऐसे बता सकती हैं, जिनसे ये साबित हो कि भारत को विदेशों में सम्मान प्राप्त हो रहा है? एक बहुत बड़ा उदाहरण है योग. कई वर्षों से योग भारत की जीवनशैली का अंग रहा है. विदेशों में भी इसका प्रचार-प्रसार करने के लिए कई लोग कई वर्षों से प्रयत्न कर रहे थे. परंतु अब जाकर योग दिवस के रूप में इसे वैश्विक मान्यता मिली है और कई देशों में लोगों ने इसे अपनाया है. विदेशों में लोगों के पास बहुत पैसा है, परंतु मानसिक स्वास्थ्य की कमी है. यह मानसिक स्वास्थ्य उन्हें योग से प्राप्त हुआ. भारत ने चंद्रयान-2 का सफल परीक्षण किया. इसके पहले भी कई मिसाइलों और पीएसएलवी आदि का परीक्षण किया गया. भारत की अंतरिक्ष में मिल रही इस कामयाबी को भी दुनिया सम्मानपूर्वक देख रही है. एक और क्षेत्र है सुरक्षा, जिसमें भारत द्वारा किए गए कार्यों ने पूरी दुनिया को अचंभित कर दिया है. हमारी भारतीय सेना ने जो एयर स्ट्राइक की, उसकी चर्चा अमेरिका और इजराइल जैसे विदेशों के अखबारों में भी हुई थी. केवल आतंकवादियों के ठिकानों के अंदर घुसकर उनको निशाना बनाकर उन पर हमला करना, बिना किसी निर्दोष नागरिक को नुकसान पहुंचाए और वह भी कुछ ही मिनिटों में… यह सचमुच बहुत कठिन कार्य है, जो हमारी सेना ने कर दिखाया है. इसके साथ ही आज भारत के नेतृत्व ने विदेशों के साथ अपनत्व का भाव रखकर मैत्रीपूर्ण सम्बंध बनाए हैं. वसुधैव कुटुम्बकम् की हमारी भावना को चरितार्थ कर रहे हैं. अत: भारत को सभी जगह सम्मान मिल रहा है. राष्ट्र सेविका समिति का उद्देश्य है, तेजस्वी हिन्दू राष्ट्र का पुनर्निर्माण. क्या नए भारत में इसकी परिपूर्ति होगी? तेजस्वी हिन्दू राष्ट्र का पुनर्निर्माण से अर्थ है, अपने राष्ट्र की तेजस्विता बढ़ाना. अर्थात् विभिन्न क्षेत्रों में भारत की प्रगति होना. यही नए भारत की भी संकल्पना है. किसी भी समाज का उत्थान महिलाओं की भागीदारी के बिना नहीं हो सकता. नया भारत बनाने के लिए महिलाओं से क्या अपेक्षाएं हैं? नए भारत की ओर आगे बढ़ते समय महिलाओं को अपनी सोच और अपनी कृति में परिवर्तन करना आवश्यक है. महिलाओं को स्वयंसिद्ध होना आवश्यक है. उन्हें उनके आस-पास और पूरी दुनिया में क्या हो रहा है, इसकी जानकारी रखनी चाहिए. नई तकनीकों को सीखने की कोशिश करनी चाहिए. अभी तक हम भारत की महिलाओं में मातृत्व और कर्तृत्व के गुण देखते थे. अब भारतीय महिलाओं को अपने अंदर के नेतृत्व गुणों को भी जगाना होगा. हमारे देश में ऐसी कई महिलाएं हुई हैं, जिन्होंने नेतृत्व करके इतिहास बना दिया है. आप देश के सबसे बड़े महिला संगठन का प्रतिनिधित्व करती हैं. इसकी स्थापना से लेकर अभी तक समाज में तथा स्वयं समिति में किस तरह के परिवर्तन हुए हैं? जिस समय राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना हुई थी, उस समय समाज में महिलाओं में घर से बाहर निकलकर समाज के लिए कुछ कार्य करने की मानसिकता ही नहीं थी. उस काल में वं. लक्ष्मीबाई केलकर उपाख्य मौसीजी ने महिलाओं के लिए इतना चिंतन किया और महिलाओं को बाहर निकालने के लिए अत्यधिक प्रयत्न किया. आज महिलाएं स्वयं राष्ट्र सेविका समिति से जुड़ना चाहती हैं. सेविकाओं की संख्या बढ़ी है और आज हमें सम्पर्क करने की आवश्यकता कम पड़ती है, वरन वे स्वयं आने की उत्सुकता प्रदर्शित करती हैं. राष्ट्र सेविका समिति में भी कई परिवर्तन हुए. गणवेश से लेकर अन्य कई बातों में समिति ने परिवर्तन किया है. मुख्यत: हमने समय के साथ अपने विचारों में परिवर्तन किए हैं. मूल उद्देश्य कायम रखते हुए उनके प्रस्तुतिकरण में परिवर्तन किए हैं. इसका लाभ यह हुआ कि पहले शाखा में तरुणियों की संख्या कम हुआ करती थी, परंतु अब तरुणियों की संख्या भी बढ़ रही है. हमने तरुणी विभाग शुरू किया है, जिसके माध्यम से अलग-अलग कॉलेजों में कार्यक्रम होते रहते हैं. पहले हम समाज की प्रबुद्ध महिलाओं के सीधे सम्पर्क में नहीं थे. वे केवल हमारी ‘दक्ष-आरम’ की कार्य पद्धति से ही परिचित थीं, समिति में आने से कतराती थीं. परंतु अब हम अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से उन्हें अपने साथ जोड़ रहे हैं. कई स्थानों पर मेधाविनी मंडल के माध्यम से हम अलग-अलग कार्यक्रम कर रहे हैं. सेवा कार्यों के माध्यम से भी कई महिलाएं हमसे जुड़ रही हैं. महिलाओं की शिक्षा को लेकर अभी भी समाज पूरी तरह से जागृत दिखाई नहीं देता. नया भारत बनाने के लिए महिलाओं की शिक्षा कितनी मायने रखती है? बिलकुल! हर बालिका, महिला शिक्षित होनी ही चाहिए. समाज को इस दिशा में प्रयास करना बहुत आवश्यक है. राष्ट्र सेविका समिति द्वारा भी बालिकाओं को विद्यालयीन औपचारिक शिक्षा तथा अनौपचारिक सामाजिक प्रशिक्षण देने का कार्य किया जाता है. समिति द्वारा पूरे देश में 22 छात्रावास चलाए जा रहे हैं. जिन क्षेत्रों में बलिकाओं की शिक्षा की व्यवस्था नहीं है, वहां से हम इन बालिकाओं को लाते हैं और उनकी सम्पूर्ण शिक्षा की जिम्मेदारी लेते हैं. उदाहरणार्थ पूर्वोत्तर की बालिकाओं, कुष्ठ रोगियों की निरोगी बालिकाओं, नक्सलवाद से प्रभावित इलाकों की बालिकाओं आदिे क्षेत्रों की बालिकाओं की शिक्षा की जिम्मेदारी हम उठाते हैं. हमें बहुत आनंद होता है, जब इन छात्रावासों से शिक्षा ग्रहण करने के बाद ये बालिकाएं अपने स्थानों पर वापस जाती हैं और वहां समाज में जागृति लाने का प्रयत्न करती हैं. देश में होने वाले विभिन्न अपराधों में महिलाओं के संदर्भ में होने वाले अपराधों की संख्या अत्यधिक है. इससे बचने के लिए क्या करना चाहिए? इन अपराधों को कम करने के लिए समाज तथा महिलाओं की ओर से व्यक्तिगत प्रयास भी आवश्यक हैं. राष्ट्र सेविका समिति बालिकाओं को, तरुणियों को सदैव इस बात के लिए प्रेरित करती है कि स्वयं सोचें कि उनकी ओर देखने का समाज का द़ृष्टिकोण कैसा होना चाहिए. समाज में सम्माननीय जीवन बिताने के लिए हमारी सोच, हमारे विचार कैसे होने चाहिएं. युवतियों से संवाद करके हम उनका मार्गदर्शन करने का प्रयत्न करते हैं. समाज की ओर से हमें अपेक्षा है कि महिलाओं के प्रति अत्याचारों, अपराधों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई जल्द तथा सख्त होनी चाहिए, जिससे अपराधियों को कड़ी सजा मिले. तीसरा प्रयास हमारा होता है, पुरुषों के दृष्टिकोण में परिवर्तन लाने का. इसके लिए भी हमने कॉलेज के विद्यार्थियों की काउंसिलिंग की. उन्हें यह समझाने का प्रयास किया कि महिलाओं की ओर देखने का उनका दृष्टिकोण कैसा होना चाहिए. हमारा मानना है कि ये अपराध कानून की कठोरता से कम नहीं होंगे. ये अपराध जब समाज के दृष्टिकोण में परिवर्तन होगा, तभी कम होंगे. हम कुटुंब प्रबोधन के माध्यम से यह भी बताते हैं कि घर में मां अपने बच्चों को भी यह संस्कार दे कि महिलाओं को सम्मान दिया जाना चाहिए. इसके साथ ही बस्तियों में जाकर भी महिलाओं की सुरक्षा से सम्बंधित जागृति लाने का कार्य विभिन्न स्थानों पर किया जा रहा है. महिलाओं और तरुणियों को हम शाखा, कॉलेज, अपार्टमेंट्स आदि में आत्मसुरक्षा की तकनीक भी सिखाते हैं. इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता कि मैं स्वयं अपनी रक्षा कर सकती हूं. इन सभी प्रयत्नों के माध्यम से हम महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को कम करने की कोशिश कर रहे हैं. भारतीय समाज पुरुष प्रधान समाज रहा है. अभी भी समाज में महिला पुरुष समानता दिखाई नहीं देती है. समानता लाने के लिए किन प्रयासों की आवश्यकता है? हमारे चिंतन में अर्धनारीश्वर की संकल्पना रही है. अर्धनारीश्वर समानता का ही द्योतक है. भारतीय समाज में महिला और पुरुष समान ही हैं. वे पस्पर पूरक हैं. हमारी संस्कृति में सब सांकेतिक हैं. उसे समझना आवश्यक है. कालांतर में आक्रमणों के कारण इसमें परिवर्तन होने लगा. अत: आज हमें ऐसा दिखाई देने लगा है कि हमारा समाज पुरुष प्रधान है, परंतु हम पुन: अपने चिंतन के प्रति लोगों को जागृत कर रहे हैं. परिवारों से सम्पर्क के दौरान हम पुरुषों से चर्चा करते हैं कि जिस तरह वे घर से बाहर निकलकर सामाजिक कार्य कर रहे हैं, उसी तरह उनकी पत्नी या घर की अन्य महिलाएं भी सामाजिक कार्य करें. उसके लिए पारिवारिक दायित्वों को भी मिलजुलकर निभाना आवश्यक है. महिलाओं को हम कहते हैं, आप अपनी क्षमताओं का विकास करें. अपने अंदर के नेतृत्व गुण को जगाएं. आप स्वयं इतनी सामर्थ्यवान बनें कि सम्मान या समानता आपको मांगना न पड़े, बल्कि अपने-आप मिले. ‘वी शुड नॉट डिमांड, वी शुड कमांड’ अर्थात्, घिघियाओ नहीं, नेतृत्व करने की क्षमता प्राप्त करो. आज लगभग समाज के हर क्षेत्र में महिलाएं अपना स्थान बना रही हैं. आज के दौर की किन महिलाओं को आप आदर्श के रूप में समाज के सामने रखना चाहेंगी? राष्ट्र सेविका समिति उन सभी महिलाओं को आदर्श के रूप में देखती है जो नैतिक मूल्यों के आधार पर अपना जीवन जीती हैं तथा जिन्होंने अपने जीवन में कोई बड़ा संकल्प लिया और उसे पूर्ण किया. वह महिला एक सामान्य परिवार की या अशिक्षित भी हो सकती है. परंतु उसके विचार उच्च होने चाहिए. बिहार के एक छोटे से गांव के सैनिक पुलवामा की घटना में शहीद हुए. उनका चार वर्ष का बेटा है और तरुण पत्नी है. अपने पति की मृत्यु की खबर सुनने के बाद उस युवती ने कहा - मैं अपने बेटे को भी सेना में भेजूंगी. यह आदर्श है. राजनीति में सुमित्रा ताई महाजन, मृदुला सिन्हा, निर्मला सीतारमण आदि महिलाओं ने आदर्श प्रस्तुत किए हैं. इसके अलावा खेल जगत में भारतीय वेट लिफ्टर मीराबाई चानू का नाम अवश्य लेना चाहूंगी. वे मणिपुर के एक सामान्य गांव से हैं. वे जब अमेरिका में कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए गईं तो वहां की पद्धति के अनुसार अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सभी को भोजन के लिए बुलाया था. वहां उपस्थित सभी खिलाड़ियों के सामने पकवानों सजी सुंदर थालियां थीं, परंतु मीराबाई चानू सामान्य थाली में सामान्य भोजन कर रही थीं. जब डोनाल्ड ट्रंप ने उनसे पूछा कि आप ऐसे अलग क्यों खाना खा रही हैं तो उन्होंने उत्तर दिया, “मैं अपने घर से अपना भोजन लेकर आई हूं. क्योंकि मेरी मां और गुरू ने मुझे सिखाया है कि जैसा हम अन्न खाते हैं, वैसा हमारा मन होता है. इसलिए मैं हमेशा भारत का ही अन्न खाती हूं.” ट्रम्प उनसे काफी प्रभावित हुए और उन्होंने कहा, “मैं आपके गांव आना चाहता हूं, वहां की मिट्टी के दर्शन करना चाहता हूं.” तब मीराबाई चानू ने उत्तर दिया, “आप मेरे गांव अवश्य आइये. परंतु आप अगर मेरे गांव की मिट्टी के दर्शन करना चाहते हैं तो वो मैं अभी भी करवा साकती हूं. क्योंकि मैं अपने गांव की मिट्टी हमेशा साथ में रखती हूं और रोज इसे प्रणाम करती हूं.” ये उनकी राष्ट्रभक्ति का आदर्श है. भारत सबसे अधिक युवाओं का देश है. इन युवाओं को नए भारत की संकल्पना में किस प्रकार शामिल करेंगे? आज की तरुण पीढ़ी को एक लक्ष्य रखकर संकल्पित जीवन बिताने की आवश्यकता है. आज की तरुण पीढ़ी में नैतिकता का ह्रास होता दिखता है, जो गलत है. आज के युवा आराम का जीवन चाहते हैं, नौकरी करना चाहते हैं. हमारे देश में पहले कई अनुसंधान, शोधकार्य होते थे. पिछले कुछ वर्षों में ये अनुसंधान होने बहुत कम हो गए हैं. अत: आज की युवा पीढ़ी से यह अपेक्षा है कि वे हमारे देश की आवश्यकताओं को पहचानकर नए-नए अनुसंधान करें. केवल नौकरी करने की इच्छा न करें, बल्कि अपनी मानसिकता कुछ इस प्रकार बनाएं कि हम स्वयं बहुत कुछ नया कर सकते हैं. साथ ही समाज से भी यह अपेक्षा है कि वे भारतीय युवाओं द्वारा किए गए अनुसंधानों को अपनाएं तथा उसके लिए पोषक वातावरण का निर्माण करें. नया भारत वैश्विक स्तर पर कैसे प्रस्तुत होगा? जिस दिन भारतीय विचार को, भारतीय चिंतन सम्पूर्ण दुनिया में स्वीकार्य होने लगेगा, उस दिन हम कह सकते हैं कि भारत नया भारत बन गया है. समस्याओं में ही विकास के अंकुर होते हैं. वर्तमान की किन समस्याओं को हम भविष्य के अवसरों में बदल सकते हैं? मेरे विचार से आज की सबसे बड़ी समस्या आतंकवाद है. सबसे अधिक युवा इसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं. हमें सबसे पहले इसके मूल कारण तक जाना जरूरी है. युवा, अर्थात् ऊर्जा. अगर इस ऊर्जा को सकारात्मक तरीके से सही दिशा में प्रवाहित किया गया तो वे समाजोपयोगी कार्य कर सकते हैं. उदाहराणार्थ कश्मीर में अफशन आशीष नामक एक लड़की पहले पत्थरबाजों की गैंग का हिस्सा थी. वहां की कुछ समाजसेवी संस्थाओं ने जब उसकी रुचियों के बारे में जानने की कोशिश की तो उन्हें पता चला कि उसे फुटबॉल में रुचि है. उसे उन संस्थाओं ने इस खेल का प्रशिक्षण दिया और अन्य कई प्रकार की सहायता की. आज यह अफशन आशीष राज्य की महिला फुटबाल टीम की कप्तान हैं. वह न सिर्फ पत्थरबाजी भूल चुकी है, वरन वहां के युवाओं को भी समझाती है कि ये गलत कार्य छोड़कर सही दिशा चुनो. इसी प्रकार नक्सल प्रभावित भागों के युवाओं को पर्वतारोहण का प्रशिक्षण दिया गया. उनमें से 11 युवा एवरेस्ट पादाक्रांत कर चुके हैं. प्रधानमंत्री ने भी इन युवाओं का सम्मान किया था. अत: समस्याओं को शक्ति रूप में परिवर्तित करने से निश्चित ही नया भारत बन सकता है. समिति की स्थापना हुए आठ दशक पूर्ण हो चुके हैं. इस प्रवास का सिंहावलोकन करते समय आपको कौन से महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देते हैं? समिति की जब स्थापना हुई, तब गृहिणियों के बीच सबसे अधिक काम था. अभी तरुणियों और समाज की विभिन्न उच्चपदस्थ महिलाओं तक भी राष्ट्र सेविका समिति पहुंची है. पहले केवल शाखा के आधार पर ही समिति का कार्य आगे बढ़ता था, परंतु अब विविध आयामों में यह विस्तार हो चुका है. शिक्षा, योग, उद्योग आदि विविध क्षेत्रों में हम कार्य कर रहे हैं. हमारा कार्य धीरे-धीरे सर्वव्यापी, सर्वस्पर्शी हो रहा है. भविष्य में हम भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अपने बलबूते पर कार्य करने वाली और समाज में अपना स्थान निर्माण करने वाली महिलाओं के साथ सम्पर्क बढ़ाकर उनके माध्यम से राष्ट्रीय विचार कोने कोने तक पहुंचाने के लिए प्रयत्न करेंगे. साथ ही मीडिया में भी आने का हमारा विचार है. समूह चर्चा के माध्यम से हमारे विचारों को समाज तक पहुंचाने के लिए भी हम प्रयत्नशील रहेंगे. मातृत्व और कर्तृत्व के साथ महिलाओं में नेतृत्व को भी जागृत करना यह मुख्य उद्देश्य होगा. साभार – हिन्दी विवेक

September 15th 2019, 1:24 am

भारतीय ज्ञान का खजाना – 12

VSK Bharat

हां, भारत ही है प्लास्टिक सर्जरी का जनक..!

पहली बार दिल्ली में भाजपा की सरकार आए हुए बमुश्किल पांच महीने हो रहे थे. ठीक से कहें, तो वह दिन था, 25 अक्तूबर, 2014. इस दिन, मुंबई में, एचएन रिलायंस फाउंडेशन हॉस्पिटल के उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री मोदी जी के भाषण में “भारत ने दुनिया को प्लास्टिक सर्जरी सिखाई” इस आशय का एक वाक्य था. उनके शब्द थे, “महाभारत का कहना है कि कर्ण मां की गोद से पैदा नहीं हुआ था. इसका मतलब यह की उस समय जेनेटिक साइंस मौजूद थी. हम गणेश जी की पूजा करते हैं. कोई तो प्लास्टिक सर्जन होगा उस जमाने में, जिसने मनुष्य के शरीर पर हाथी का सर रखकर प्लास्टिक सर्जरी का प्रारंभ किया होगा…”

उनके द्वारा कहे गए इन शब्दों से तथाकथित बुद्धिजीवी लोगों में खलबली मची. शेखर गुप्ता ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के संपादक हैं. उन्होंने ‘इंडिया टुडे’ साप्ताहिक में ‘राष्ट्र हित’ नाम से प्रकाशित होने वाले अपने स्तंभ में मोदी जी के इन विचारों की खिल्ली उड़ाईं. उन्होंने अपने आलेख में कहा कि ‘मोदी सरकार आधुनिक तकनीकी की बात तो करती है, लेकिन वास्तव में यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भूतकालीन कल्पनाओं पर ही जी रही है.’

शेखर गुप्ता का कहना था कि ‘प्राचीन वैदिक काल से संबंधित संशोधनों पर गर्व करने का अर्थ है, घड़ी की सुईयों को उलटा घुमाना. पश्चिम के देशों को मूलभूत ज्ञान भारत ने दिया है, यह कहना गलत और हास्यास्पद है’. ‘इंडिया टुडे’ के अपने आलेख में उन्होंने आगे लिखा है, “हो सकता है, किसी ने प्लास्टिक सर्जरी, इंसान में पशु में अंगों का प्रत्यारोपण, स्टेम सेल अनुसंधान, किराए की कोख जैसी चीजों की भी कल्पना की हो, मगर इसके आधार पर यह कहना कि यह सारा ज्ञान हमारे पास पहले से था, यह न केवल हास्यास्पद है, वरन खतरनाक भी है.”

इसी प्रसंग पर, ‘इंडिया टुडे’ के इस आलेख से पहले, करण थापर ने, उनके ‘हिन्दू’ समाचार पत्र में प्रकाशित होने वाले स्तंभ में यही विषय छेड़ा था. ‘टू फेसेस ऑफ़ मिस्टर मोदी’ इस शीर्षक से प्रकाशित आलेख में उन्होंने मोदी जी की कड़ी आलोचना की थी. उनका कहना था, “भारत के प्रधानमंत्री के नाते, एक हॉस्पिटल के उद्घाटन के समय, जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, ऐसी पौराणिक कहानियां बताना ठीक नहीं है. प्लास्टिक सर्जरी को अपने हिन्दू शास्त्र में कोई वैज्ञानिक आधार न होने के कारण इस प्रकार के वक्तव्य देना भारतीय संविधान के धारा 51 A (h) का उल्लंघन है. संविधान की इस धारा के अनुसार प्रत्येक भारतीय नागरिक को ‘शास्त्रीय/वैज्ञानिक वातावरण’ जतन करने का अधिकार है. मोदी जी का वक्तव्य ‘अशास्त्रीय’ है, इसीलिए उसका विरोध करना आवश्यक है.”

शेखर गुप्ता और करण थापर, इन दोनों ने प्लास्टिक सर्जरी का जिक्र किया था, इसलिए उस के बारे में खोजबीन करना आरंभ किया और विस्मयजनक जानकारी मिलती गयी.

भारत में हैदर – टीपू के साथ हुई लड़ाईयों में अंग्रेजों को दो नए आविष्कारों की जानकारी हुई. (अंग्रेजों ने ही यह लिख रखा है)

  1. युद्ध में उपयोग किया हुआ रॉकेट और
  2. प्लास्टिक सर्जरी

अंग्रेजों को प्लास्टिक सर्जरी की जानकारी मिलने का इतिहास बड़ा रोचक है. सन् 1769 से 1799 से तक, तीस वर्षों में, हैदर अली – टीपू सुलतान इन बाप-बेटे और अंग्रेजों में 4 बड़े युद्ध हुए. इनमें से एक युद्ध में अंग्रेजों की ओर से लड़ने वाला ‘कावसजी’ नाम का मराठा सैनिक और 4 तेलगु भाषी लोगों को टीपू सुलतान की फौज ने पकड़ लिया. बाद में इन पाचों लोगों की नाक काटकर टीपू के सैनिकों ने, उनको अंग्रेजों के पास भेज दिया.

इस घटना के कुछ दिनों के बाद एक अंग्रेज कमांडर को एक भारतीय व्यापारी के नाक पर कुछ निशान दिखे. कमांडर ने उनको पूछा तो पता चला कि उस व्यापारी ने कुछ ‘चरित्र के मामले में गलती’ की थी, इसलिए उसको नाक काटने की सजा मिली थी. लेकिन नाक कटने के बाद, उस व्यापारी ने एक वैद्य जी के पास जाकर अपना नाक पहले जैसा करवा लिया था. अंग्रेज कमांडर को यह सुनकर आश्चर्य लगा. कमांडर ने उस कुम्हार जाति के वैद्य को बुलाया और कावसजी व उसके साथ के चार लोगों का नाक पहले जैसा करने के लिए कहा.

कमांडर की आज्ञा से, पुणे के पास के एक गांव में यह ऑपरेशन हुआ. इस ऑपरेशन के समय दो अंग्रेज डॉक्टर्स भी उपस्थित थे. उनके नाम थे – थॉमस क्रूसो और जेम्स फिंडले. इन दोनों डॉक्टरों ने, उस अज्ञात मराठी वैद्य द्वारा किए ऑपरेशन का विस्तृत समाचार ‘मद्रास गजेट’ में प्रकाशन के लिए भेजा. वह छपकर भी आया. विषय की नवीनता एवं रोचकता देखते हुए, यह समाचार इंग्लैंड पहुंचा. लन्दन से प्रकाशित होने वाली ‘जेंटलमैन’ नामक पत्रिका ने इस समाचार को अगस्त, 1794 के अंक में पुनः प्रकाशित किया. इस समाचार के साथ, ऑपरेशन के कुछ छायाचित्र भी दिए गए थे.

जेंटलमैन में प्रकाशित ‘स्टोरी’ से प्रेरणा लेकर इंग्लैंड के जे.सी. कॉर्प नाम के सर्जन ने इसी पद्धति से दो ऑपरेशन किये. दोनों सफल रहे. और फिर अंग्रेजों को और पश्चिम की ‘विकसित’ संस्कृति को प्लास्टिक सर्जरी की जानकारी मिली. पहले विश्व युद्ध में इसी पद्धति से ऐसे ऑपरेशंस बड़े पैमाने पर हुए और वह सफल भी रहे.

असल में प्लास्टिक सर्जरी से पश्चिमी जगत का परिचय इससे भी पुराना है. वह भी भारत की प्रेरणा से. ऐसा माना जाता है – ‘एडविन स्मिथ पापिरस’ ने पश्चिमी लोगों के बीच प्लास्टिक सर्जरी के बारे में सबसे पहले लिखा. लेकिन रोमन ग्रंथों में इस प्रकार के ऑपरेशन का जिक्र एक हजार वर्ष पूर्व से मिलता है. अर्थात् भारत में यह ऑपरेशंस इससे बहुत पहले हुए थे. आज से पौने तीन हजार वर्ष पहले, ‘सुश्रुत’ नाम के शस्त्र-वैद्य (आयुर्वेदिक सर्जन) ने इसकी पूरी जानकारी दी है. नाक के इस ऑपरेशन की पूरी विधि सुश्रुत के ग्रंथ में मिलती है.

किसी विशिष्ट वृक्ष का एक पत्ता लेकर उसे मरीज के नाक पर रखा जाता है. उस पत्ते को नाक के आकार का काटा जाता है. उसी नाप से गाल, माथा या फिर हाथ/पैर, जहां से भी सहजता से मिले, वहां से चमड़ी निकाली जाती है. उस चमड़ी पर विशेष प्रकार की दवाइयों का लेपन किया जाता है. फिर उस चमड़ी को जहां लगाना है, वहां बांधा जाता है. जहां से निकाली हुई है, वहां की चमड़ी और जहां लगाना है, वहां पर विशिष्ट दवाइयों का लेपन किया जाता है. साधारणतः तीन हफ्ते बाद दोनों जगहों पर नई चमड़ी आती है, और इस प्रकार से चमड़ी का प्रत्यारोपण सफल हो जाता है. इसी प्रकार से उस अज्ञात वैद्य ने कावसजी पर नाक के प्रत्यारोपण का सफल ऑपरेशन किया था.

नाक, कान और होंठों को व्यवस्थित करने का तंत्र भारत में बहुत पहले से चलता आ रहा है. बीसवीं शताब्दी के मध्य तक छेदे हुए कान में भारी गहने पहनने की रीति थी. उसके वजन के कारण छेदी हुई जगह फटती थी. उसको ठीक करने के लिए गाल की चमड़ी निकाल कर वहां लगाई जाती थी. उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक इस प्रकार के ऑपरेशन्स भारत में होते थे. हिमाचल प्रदेश का ‘कांगड़ा’ जिला तो इस प्रकार के ऑपरेशन्स के लिए मशहूर था. कांगड़ा यह शब्द ही ‘कान + गढ़ा’ ऐसे उच्चारण से तैयार हुआ है. डॉ. एस.सी. अलमस्त ने इस ‘कांगड़ा मॉडल’ पर बहुत कुछ लिखा है. वे कांगड़ा के ‘दीनानाथ कानगढ़िया’ नाम के नाक, कान के ऑपरेशन्स करने वाले वैद्य से स्वयं जाकर मिले. इन वैद्य के अनुभव डॉ. अलमस्त जी ने लिख कर रखे हैं. सन् 1404 तक की पीढ़ी की जानकारी रखने वाले ये ‘कान-गढ़िया’, नाक और कान की प्लास्टिक सर्जरी करने वाले कुशल वैद्य माने जाते हैं. ब्रिटिश शोधकर्ता सर अलेक्झांडर कनिंघम (1814-1893) ने कांगड़ा के इस प्लास्टिक सर्जरी को बड़े विस्तार से लिखा है.

अकबर के कार्यकाल में ‘बिधा’ नाम का वैद्य कांगड़ा में इस प्रकार के ऑपरेशन्स करता था, ऐसा फारसी इतिहासकारों ने लिख रखा है.

‘सुश्रुत’ की मृत्यु के लगभग ग्यारह सौ (११००) वर्षों के बाद ‘सुश्रुत संहिता’ और ‘चरक संहिता’ का अरबी भाषा में अनुवाद हुआ. यह कालखंड आठवीं शताब्दी का है. ‘किताब-ई-सुसरुद’ इस नाम से सुश्रुत संहिता मध्यपूर्व में पढ़ी जाती थी. आगे जाकर, जिस प्रकार से भारत की गणित और खगोलशास्त्र जैसी विज्ञान की अन्य शाखाएं, अरबी (फारसी) के माध्यम से यूरोप पहुंची, उसी प्रकार ‘किताब-ई-सुसरुद’ के माध्यम से सुश्रुत संहिता यूरोप पहुंच गई. चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में इस ऑपरेशन की जानकारी अरब – पर्शिया (ईरान) – इजिप्त होते हुए इटली पहुंची. इसी जानकारी के आधार पर इटली के सिसिली आयलैंड के ‘ब्रांका परिवार’ और ‘गास्परे टाग्लीया-कोसी’ ने कर्णबंध और नाक के ऑपरेशन्स करना प्रारंभ किया. किन्तु चर्च के भारी विरोध के कारण उन्हें ऑपरेशन्स बंद करने पड़े. और इसी कारण उन्नीसवीं शताब्दी तक यूरोपियन्स को प्लास्टिक सर्जरी की जानकारी नहीं थी.

ऋग्वेद का ‘आत्रेय (ऐतरेय) उपनिषद’ अति प्राचीन उपनिषदों में से एक है. इस उपनिषद में (१-१-४) ‘मां के उदर में बच्चा कैसे तैयार होता है’, इसका विवरण है. इस में कहा गया है कि गर्भावस्था में सर्वप्रथम बच्चे के मुंह का कुछ भाग तैयार होता है. फिर नाक, आंख, कान, ह्रदय (दिल) आदि अंग विकसित होते हैं. आज के आधुनिक विज्ञान का सहारा लेकर, सोनोग्राफी के माध्यम से अगर हम देखते हैं, तो इसी क्रम से, इसी अवस्था से बच्चा विकसित होता है.

भागवत में लिखा है (२-१०२२ और ३-२६-५५) की मनुष्य में दिशा पहचानने की क्षमता कान के कारण होती है. सन् 1935 में डॉक्टर रोंस और टेट ने एक प्रयोग किया. इस प्रयोग से यह साबित हुआ कि मनुष्य के कान में जो वेस्टीब्यूलर (vestibular apparatus) होता है, उसी से मनुष्य को दिशा पहचानना संभव होता है.

अब यह ज्ञान हजारों वर्ष पहले हमारे पुरखों को कहां से मिला होगा..?

संक्षेप में, प्लास्टिक सर्जरी का भारत में ढाई से तीन हजार वर्ष पूर्व से अस्तित्व था. इसके पक्के सबूत भी मिले हैं. शरीर विज्ञान का ज्ञान और शरीर के उपचार यह हमारे भारत की सदियों से विशेषता रही है. लेकिन ‘पश्चिम के देशों में जो खोज हुई है, वही आधुनिकता है और हमारा पुरातन ज्ञान याने दकियानूसी है’, ऐसी गलत धारणाओं के कारण हम हमारी समृद्ध विरासत को नकार रहे हैं..!

–  प्रशांत पोळ

September 14th 2019, 9:23 pm

15 सितम्बर / जन्मदिवस – आधुनिक विश्वकर्मा विश्वेश्वरैया जी

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नई दिल्ली. आधुनिक भारत के विश्वकर्मा मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया जी का जन्म 15 सितम्बर, 1861 को कर्नाटक के मैसूर जिले में मुदेनाहल्ली ग्राम में पण्डित श्रीनिवास शास्त्री जी के घर हुआ था. निर्धनता के कारण विश्वेश्वरैया ने घर पर रहकर ही अपने परिश्रम से प्राथमिक स्तर की पढ़ाई की. जब वे 15 वर्ष के थे, तब इनके पिता का देहान्त हो गया. इस पर ये अपने एक सम्बन्धी के घर बंगलौर आ गये. घर छोटा होने के कारण ये रात को मन्दिर में सोते थे. कुछ छात्रों को ट्यूशन पढ़ाकर पढ़ाई का खर्च निकाला. मैट्रिक और बीए के बाद मुम्बई विश्वविद्यालय से अभियन्ता की परीक्षा सर्वोच्च स्थान लेकर उत्तीर्ण की. इस पर इन्हें तुरन्त ही सहायक अभियन्ता की नौकरी मिल गयी. उन दिनों प्रमुख स्थानों पर अंग्रेज अभियन्ता ही रखे जाते थे. भारतीयों को उनका सहायक बनकर ही काम करना पड़ता था, पर विश्वेश्वरैया ने हिम्मत नहीं हारी. प्रारम्भ में इन्हें पूना जिले की सिंचाई व्यवस्था सुधारने की जिम्मेदारी मिली. इन्होंने वहाँ बने पुराने बाँध में स्वचालित फाटक लगाकर ऐसे सुधार किये कि अंग्रेज अधिकारी भी इनकी बुद्धि का लोहा मान गये. ऐसे ही फाटक आगे चलकर ग्वालियर और मैसूर में भी लगाये गये. कुछ समय के लिए नौकरी से त्यागपत्र देकर विश्वेश्वरैया जी विदेश भ्रमण के लिए चले गये. वहाँ उन्होंने नयी तकनीकों का अध्ययन किया. वहाँ से लौटकर वर्ष 1909 में उन्होंने हैदराबाद में बाढ़ से बचाव की योजना बनायी. इसे पूरा करते ही उन्हें मैसूर राज्य का मुख्य अभियन्ता बना दिया गया. उनके काम से प्रभावित होकर मैसूर नरेश ने उन्हें राज्य का मुख्य दीवान बना दिया. यद्यपि उनका प्रशासन से कभी सम्बन्ध नहीं रहा था, पर इस पद पर रहते हुए उन्होंने अनेक जनहित के काम किये. इस कारण वे नये मैसूर के निर्माता कहे जाते हैं. मैसूर भ्रमण पर जाने वाले 'वृन्दावन गार्डन' अवश्य जाते हैं. यह योजना भी उनके मस्तिष्क की ही उपज थी. विश्वेश्वरैया जी ने सिंचाई के लिए कृष्णराज सागर और लौह उत्पादन के लिए भद्रावती का इस्पात कारखाना बनवाया. मैसूर विश्वविद्यालय तथा बैंक ऑफ़ मैसूर की स्थापना भी उन्हीं के प्रयासों से हुई. वे बहुत अनुशासन प्रिय व्यक्ति थे. वे एक मिनट भी व्यर्थ नहीं जाने देते थे. वे किसी कार्यक्रम में समय से पहले या देर से नहीं पहुँचते थे. वे अपने पास सदा एक नोटबुक और लेखनी रखते थे. जैसे ही वे कोई नयी बात वे देखते या कोई नया विचार उन्हें सूझता, वे उसे तुरन्त लिख लेते. विश्वेश्वरैया निडर देशभक्त भी थे. मैसूर का दशहरा प्रसिद्ध है. उस समय होने वाले दरबार में अंग्रेज अतिथियों को कुर्सियों पर बैठाया जाता था, जबकि भारतीय धरती पर बैठते थे. विश्वेश्वरैया ने इस व्यवस्था को बदलकर सबके लिए कुर्सियाँ लगवायीं. उनकी सेवाओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए शासन ने वर्ष 1955 में उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया. शतायु होने पर उन पर डाक टिकट जारी किया गया. जब उनके दीर्घ एवं सफल जीवन का रहस्य पूछा गया, तो उन्होंने कहा - मैं हर काम समय पर करता हूँ. समय पर खाता, सोता और व्यायाम करता हूँ. मैं क्रोध से भी सदा दूर रहता हूँ. 101 वर्ष की आयु में 14 अप्रैल, 1962 को उनका देहान्त हुआ.

September 14th 2019, 6:31 pm

धर्मांतरण के कार्य में लगी ईसाई मिशनरीज़ को प्रदेश से बाहर करे सरकार – विहिप

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‘छुटकारा सभा’ की सूचना मिलने पर हिन्दू संगठनों ने किया विरोध प्रदर्शन

शिमला (विसंकें). हिमाचल प्रदेश के सुंदरनगर में धर्मांतरण की सूचना मिलने पर हिन्दू संगठनों ने प्रदर्शन किया. आरोप है कि एक निजी गेस्ट हाउस में आयोजित प्रार्थना सभा के नाम पर लोगों को धर्मांतरण के लिए भरमाया जा रहा था. शहर के एक निजी गेस्ट हाउस में ईसाई मिशनरीज़ द्वारा ‘छुटकारा सभा’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया. गरीबों के उपचार की आड़ में धर्मांतरण की प्रक्रिया को अंजाम दिया जा रहा था. जानकारी मिलने पर विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ता मौके पर पहुंच गए तथा ईसाई मिशनरीज़ गो बैक के नारे लगाए. प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि उन्हें कई प्रकार के प्रलोभन देकर धर्मान्तरण के लिए प्रेरित किया जा रहा था. यह कार्यक्रम धर्मांतरण के उद्देश्य से ही आयोजित किया गया था.

विवाद की सूचना मिलने पर प्रशासन ने पुलिस बल को तैनात कर दिया. इस दौरान विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ताओं की पुलिस के साथ बहस भी हुई. नायब तहसीलदार सुंदरनगर ने मौके पर पहुंचकर आयोजकों से सभा के आयोजन से संबंधित स्वीकृति के बारे में पूछा. उनके पास आयोजन की स्वीकृति नहीं थी. आयोजक धर्मांतरण के आरोपों को नकार रहे थे और केवल गरीबों का उपचार करने का दावा कर रहे थे. स्थानीय लोगों के विरोध के कारण आयोजकों को ‘छुटकारा सभा’ को बंद करना पड़ा. मौके पर ईसाई धर्म से संबंधित सामग्री भी बरामद की गई, जो संभवतया वितरण के लिये रखी गई थी.

विश्व हिन्दू परिषद के प्रांत समन्वय प्रमुख शमशेर ठाकुर, प्रेस सचिव विजय शर्मा, गोविंद ठाकुर, जिला अध्यक्ष कृष्ण चंद शर्मा ने प्रशासन से मांग की कि भविष्य में मिशनरीज़ की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जाए, तथा लालच व धोखाधड़ी से धर्मांतरण करने के प्रयास में लगे लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कड़ी कार्रवाई की जाए. उन्होंने सरकार से मांग की कि धर्मांतरण के कार्य में लगी ईसाई मिशनरीज़ को प्रदेश से बाहर किया जाए.

September 14th 2019, 8:26 am

कश्मीर : अतीत से आज तक – अंतिम भाग

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भावी स्वर्णिम कश्मीर

पाकिस्तान प्रेरित मजहबी आतंकवाद को जन्म और संरक्षण देकर कश्मीर को भारत की मुख्य राष्ट्रीय धारा से काटने वाली अलगाववादी व्यवस्था समाप्त हो गई है. भारतीय सविधान के अस्थाई अनुच्छेद 370 और कश्मीर के कुछ गिने-चुने परिवारों की राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक रोजी-रोटी सुरक्षित रखने का बंदोबस्त करने वाला अध्यादेश 35ए अब नहीं रहे. जम्मू-कश्मीर के सरकारी और गैर सरकारी भवनों, मंत्रियों, सरकारी अफसरों की गाड़ियों पर अलगाववादी लाल झंडा उतर गया है. भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा शान से लहरा रहा है. कश्मीर अब अपने सनातन गौरवशाली वैभव को प्राप्त करेगा, ऐसा विश्वास प्रत्येक भारतीय के मन में जाग उठा है. कश्मीर के गौरवशाली अतीत की संक्षिप्त जानकारी पूर्व के दो लेखों - ‘धर्मरक्षक आध्यात्मिक कश्मीर’ और ‘वीरव्रती दिग्विजयी कश्मीर’ में दी है. इसी तरह इस वैभव की पतनावस्था की जानकारी तीसरे लेख ‘कट्टरपंथी धर्मान्तरित कश्मीर’ नामक लेख में दी गई है. भारत के नंदनवन कश्मीर के वैभव और पतन के बाद अब भविष्य के ‘स्वर्णिम कश्मीर’ का खाका तैयार करने और उसके अमल पर चिंतन करने का समय है.

धार्मिक दहशतगर्दी को सरकारी संरक्षण

उपरोक्त संदर्भ में इस ऐतिहासिक सच्चाई को भी समझना जरूरी है कि अनुच्छेद 370 और अध्यादेश 35ए ने केवल मात्र पिछले 70 वर्षों से पनप रही पाकिस्तान प्रेरित दहशतगर्दी को ही संरक्षण नहीं दिया हुआ था, बल्कि पिछले सात सौ वर्षों से हो रहे हिन्दू उत्पीड़न को भी वैधानिक संरक्षण दे रखा था. कश्मीर की धरती पर खून की नदियां बहाने वाला वर्तमान आतंकवाद तो उस हिन्दू विरोधी एवं भारत विरोधी जेहादी मानसिकता का दुष्परिणाम है, जिसकी शुरुआत विधर्मी तथा विदेशी हमलावरों ने सन् 1339 में ही कर दी थी. कश्मीर का बलात् इस्लामीकरण और आतंकवाद एक ही सिक्के के दो छोर हैं. यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे सब जानते हैं, परंतु बोलता/लिखता कोई नहीं. उल्लेखनीय है कि कश्मीर में व्याप्त आतंकी अलगाववाद को सहारा देने वाले पाकिस्तान का अस्तित्व भी इसी भारत एवं  हिन्दू विरोधी जेहादी मानसिकता पर टिका हुआ है. इसी आधार पर ‘आजाद कश्मीर’ और ‘निजामे मुस्तफा की हुकूमत’ के ख्वाब देखे जा रहे थे. ध्यान देने की बात है कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने इसी भारत विरोधी मजहबी कट्टरपन के आगे घुटने टेक कर अनुच्छेद 370 एवं अध्यादेश 35ए  की संवैधानिक व्यवस्था करते हुए मजहबी जेहाद को सुरक्षा कवच प्रदान कर दिया था. दुर्भाग्य से इस मजहबी जेहाद को ही कश्मीरियत आधारित संघर्ष मान लिया गया.

विदेशी बनाम स्वदेशी कश्मीरियत

जिस कश्मीरियत की दुहाई देकर पाकिस्तान और उसके कश्मीरी एजेंट खूनी जिहाद कर रहे हैं, उस कश्मीरियत का रचनाकार कोई कश्मीरी नहीं था और ना ही इस कश्मीरियत का विकास कश्मीर की धरती पर ही हुआ. यह जेहादी कश्मीरियत तो कश्मीर पर हमला करने वाले विदेशी आक्रान्ताओं के साथ आई दहशतगर्द तहजीब है. यह कश्मीरियत मात्र सात सौ साल पुरानी है, जिसका कश्मीर की अपनी विरासत से कुछ भी लेना देना नहीं है. इस जेहादी कश्मीरियत के विदेशी मालिकों और अपना धर्म छोड़कर हमलावरों के तलुए चाटने वाले स्थानीय कश्मीरियों ने सर्वधर्म समभाव पर आधारित सनातन कश्मीरियत को तहस-नहस कर दिया. अपने धर्म और धरती पर अडिग रहने वाले कश्मीरी पंडितों को जोर जबरदस्ती से खदेड़ दिया गया. ऐसे लगभग पांच लाख कश्मीर हिन्दुओं को जब तक अपने घरों में सम्मान एवं सुरक्षा के साथ बसाया नहीं जाता, तब तक ‘भावी स्वर्णिम कश्मीर’ का उद्देश्य प्राप्त नहीं हो सकता. कश्मीरी बहुसंख्यक समाज अर्थात् धर्मान्तरित कश्मीरियों को आगे आकर अपने इन पंडित भाइयों (असली कश्मीरियों) की सुरक्षा की गारंटी लेनी चाहिए. समय करवट ले रहा है. एक दिन ऐसा जरूर आएगा, जब हमारे इन धर्मान्तरित कश्मीरी भाइयों को अपने बाप-दादाओं की विरासत का भान होगा और वे पंडित भाइयों को गले लगाकर अपनी वास्तविक कश्मीरियत की ओर लौट आएंगे. यह बदलाव कश्मीर, कश्मीरियत और भारत/भारतीयता के ‘स्वर्णिम भविष्य’ के लिए अतिआवश्यक समायोचित कार्य होगा. कश्मीर के ‘स्वर्णिम भविष्य’ के लिए यह भी आवश्यक होगा कि विदेशी/विधर्मी आक्रान्ताओं द्वारा तोड़ दिए गए विशाल मंदिरों, मठों और शिक्षा केंद्रों के खंडहरों को पुन: उनके पुराने वैभव में बदला जाए. धर्मान्तरित हिन्दुओं (वर्तमान मुसलमानों) का यह कर्तव्य बनता है कि वे इस कार्य के लिए आगे आकर अपने अतीत की रक्षा करें. हमारे धर्मान्तरित हिन्दू, सुल्तान सिकंदर बुतशिकन और सूबेदार इफ़्तार खान जैसे जालिम हाकमों की गैरइनसानी विरासत के रक्षक ना बनकर, सम्राट ललितादित्य, अवन्तिवर्मन और शंकरवर्मन की मानवीय संस्कृति के रक्षक बन कर अपने पूर्वजों का आदर सम्मान करें. समस्त कश्मीरी समाज (हिन्दू एवं मुसलमान) कालिदास, चरक, पाणिनी, पतंजलि, कल्हण, वामनाचार्य, अभिनवगुप्त, आनंदवर्धन जैसे महार्षियों, वेदान्ताचार्यों, वैद्यों, साहित्यकारों और समाज सुधारकों की संतानें हैं. अतः विदेशी/विधर्मी हमलावरों की हिंसक और अभारतीय तहजीब के स्थान पर कश्मीर की धरती पर कश्मीरियों द्वारा विकसित कश्मीरियत के आधार पर ही भविष्य का कश्मीर स्वर्णिम, सुरक्षित और सुखमय हो सकता है. ऐसा वैभवशाली कश्मीर ही पुन: विश्व का प्रेरणा स्थल बनेगा. प्रसन्नता की बात यह है कि यह समझ अब धीरे-धीरे विकसित हो रही है.

लेकर रहेंगे पाक अधिकृत कश्मीर

जब हम भारतीय संस्कृति पर आधारित एक वैभवशाली कश्मीरियत की बात करते हैं तो यह समझना भी जरूरी है कि पाक अधिकृत कश्मीर के बिना कश्मीर और कश्मीरियत अधूरे हैं. भारत के विभाजन के समय महाराजा हरि सिंह ने जिस कश्मीर का पूर्ण विलय भारत में किया था, उसमें वर्तमान पाक अधिकृत कश्मीर, चीन अधिकृत कश्मीर दोनों शामिल थे. कश्मीर के इन भागों को पुन: भारत में शामिल किए बिना हम पूरे कश्मीर की संस्कृति, समाज रचना, भूगोल को सुरक्षित नहीं कर सकते हैं. उपरोक्त संदर्भ में पड़ोसी पाकिस्तान की मजहबी संकीर्णता, आतंक आधारित विदेश नीति, कश्मीर में उसके सैनिक हस्तक्षेप और इस्लामिक विस्तारवाद पर भी विचार करना चाहिए. “हंस के लिया है पाकिस्तान और लड़कर लेंगे हिन्दुस्तान” की मंशा पालने वाले पाकिस्तान ने इसी पूरे कश्मीर के लिए भारत पर चार बड़े युद्ध थोपे हैं. इसी क्षेत्र को हथियाने के लिए पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन जिबराल्टर’ तथा ‘ऑपरेशन टोपक’ जैसे सैनिक आतंकवाद का संचालन किया है. परिणाम स्वरुप पिछले तीस वर्षों से कश्मीर में दहशतगर्दी की आग लगी हुई है. लाखों कश्मीरी पंडित अपने घरों से बेघर कर दिए गए हैं. अतः पाकिस्तान पर लगाम कसना भी कश्मीर के सुरक्षित भविष्य के लिए आवश्यक है. वर्तमान सरकार के कदम इस ओर बढ़ रहे हैं. लगता है कि बहुत शीघ्र ही यह काम भी एक ही झटके में संपन्न हो जाएगा. रक्षामंत्री महोदय ने तो यहां तक कह दिया है कि पाकिस्तान के साथ अब बात पी.ओ.के पर ही होगी. जब पाकिस्तान और चीन अधिकृत क्षेत्र पुन: भारत के कब्जे में लौटेंगे तो संसार के अनेक देशों के साथ भारत का सीधा संपर्क स्थापित हो जाएगा. व्यापारिक आदान-प्रदान का रास्ता सुगम और सुरक्षित होगा. यह क्षेत्र सैनिक रणनीति के लिए भी महत्वपूर्ण है. इस क्षेत्र के जंगल, पहाड़, झीलें, नदियां और खनिज पदार्थ भी पूरे भारत की समृद्धि के लिए अत्यंत लाभ वाले होंगे. भारत का जमीनी मार्ग भी रूस, अफगानिस्तान, सीरिया, मंगोलिया और चीन जैसे देशों  से सीधा जुड़ जाएगा.

भेदभाव के शिकार थे जम्मू और लद्दाख

जब तक जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 और अध्यादेश 35ए की तलवार लटकी रही, तब तक जम्मू और लद्दाख के साथ राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक भेदभाव होता रहा. भेदभाव पूर्ण आर्थिक, शैक्षणिक, वैधानिक नीतियों ने इन दोनों क्षेत्रों में विकास की गति को रोके रखा. कश्मीर केंद्र सरकारी तंत्र के शिकंजे में फंसे हुए इन दोनों क्षेत्रों के लोग अपने अधिकारों के लिए कराहते रहे. वोट बैंक आधारित राजनीति करने वाले दलों और नेताओं ने अपने अधिकारों से वंचित इन लोगों की कभी परवाह नहीं की. वर्तमान में हुए प्रशासनिक और राजनीतिक परिवर्तन से यह आशा बंधी है कि यह भेदभाव समाप्त हो जाएगा. जम्मू और लद्दाख के लोगों को उनकी जनसंख्या और क्षेत्रफल के हिसाब से सभी प्रकार के अधिकार मिलेंगे. सरकारी नौकरियों, उद्योग धन्धों और जमीन की खरीद-फरोख्त इत्यादि सभी क्षेत्रों में अब न्याय होगा. अनेक वर्षों से जम्मू कश्मीर में परिसीमिन करवाने की मांग उठ रही थी. प्रदेश की विधानसभा और देश की संसद में सीटों की संख्या में भी जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लोगों से भेदभाव किया जा रहा था. परिसीमिन की कार्रवाई के बाद जम्मू के विधायकों और सांसदों की संख्या में वृद्धि होगी. ‘देश के विभाजन के समय पश्चिमी पंजाब से आए लोगों (हिन्दुओं) को अभी तक मताधिकार नहीं मिला था, जबकि पाकिस्तान और भारत के अन्य प्रदेशों के मुसलमान भाई यहां आकर सरकारी तंत्र की सहायता से प्रदेश का ‘स्टेट सब्जैक्ट’ प्राप्त करके सभी अधिकारों पर कब्जा जमा लेते थे. यह अन्धी व्यवस्था भी अब समाप्त हो जाएगी. यह ‘स्टेट सब्जैक्ट’ व्यवस्था जम्मू कश्मीर के लोगों को दोहरी नागरिकता प्रदान कर रही थी. इस प्रदेश के लोग भारत के किसी भी प्रदेश में जाकर सभी प्रकार के अधिकारों को प्राप्त कर सकते थे, परंतु भारत के लोग वहां के नागरिक ना होने की वजह से सभी अधिकारों से वंचित थे. जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान था, जिसकी अनुमति के बिना भारत की संसद द्वारा बनाए गए कानून वहां लागू नहीं होते थे. अब भारत का संविधान पूरी तरह लागू हो गया है. जम्मू-कश्मीर और लद्दाख अब केंद्र शासित प्रदेश बना दिए गए हैं. अब ना रहा बांस, ना बजेगी बांसुरी. समस्त कश्मीरियों सहित पूरे भारतवर्ष के लिए यह हर्ष का ऐतिहासिक विषय है कि वर्तमान सरकार ने अलगाववाद के सुरक्षा कवच को हटाकर कश्मीर के लिए फिर से अपने सनातन वैभव की ओर लौटने के सभी रास्ते खोल दिए हैं. कश्मीर के धन-दौलत पर अब कुछ परिवारों का नहीं, सभी कश्मीरियों का अधिकार होगा. विकास के सभी प्रकल्प प्रारंभ होंगे. मजहबी कट्टरपंथियों द्वारा दिशाभ्रमित किए गए युवा मुख्यधारा में लौटेंगे. इनके हाथों में हथियार नहीं कंप्यूटर दिए जाएंगे. संसार देखेगा कि बहुत शीघ्र ‘पाकिस्तान जिंदाबाद नहीं’ ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष शेष भारत की तरह कश्मीर के आकाश पर भी गूंजेगा. मजहबी दहशतगर्दी ने जिस कश्मीर को बर्बाद किया है, वहां अब मानवीय सभ्यता आबाद होगी. अलगाववादियों द्वारा नरक बना दिया गया कश्मीर बहुत शीघ्र फिर से धरती का स्वर्ग बन कर सामने आएगा. कश्मीर का सांस्कृतिक और आर्थिक पुनरुत्थान अब मजहबी संकीर्णता नहीं, सहअस्तित्व (सनातन कश्मीरियत) के आधार पर होगा. भारतीयों सहित सारा विश्व कश्मीर पर गर्व करेगा. नरेन्द्र सहगल (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.)

September 14th 2019, 5:56 am

सरसंघचालक के काफिले की गाड़ी से टकराया असन्तुलित बाइक सवार

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अलवर. आज (11 सितंबर) गहनकर आश्रम से बहरोड जाते समय दोपहर करीब 12:10 बजे हरसौली-मुंडावर के बीच चतरपुरा गांव के निकट एक बाईक सवार सामने से आ रहा था, उसके आगे गाड़ी  थी. बाईक पर बुजुर्ग व एक बच्चा सवार थे. बाईक तेज रफ्तार में थी व हेंडल पर सामान लटका हुआ था. बाइक सवार गाड़ी ओवरटेक करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक के काफिले की गाड़ी से टकराकर असंतुलित होकर गिर गया. बाइक काफिले की मुख्य गाड़ी से दो गाड़ी आगे चल रही जैमर वाली गाड़ी के पीछे आकर गिरी, बाइक सवार को बचाने के लिए पीछे चल रही कमांडो अस्कोर्ट ने अपनी गाड़ी नीचे खेत में उतार ली. दुर्घटना में बाइक सवार व बच्चा घायल हो गए.

जानकारी मिलते ही सरसंघचालक जी ने काफिला रुकवाया तथा मोटर साइकिल सवार व बच्चे को काफिले में चल रहे एम्बुलेन्स से तुरन्त चिकित्सालय रवाना किया, सरसंघचालक उसके पश्चात बेहरोड के लिये रवाना हुए. चिकित्सालय में प्राथमिक उपचार दिया गया. उपचार के दौरान चिकित्सालय में बालक की मृत्यु हुई व बाइक चालक बुर्जुग घायल है. उनका उपचार जयपुर में महात्मा गांधी अस्पताल में चल रहा है.

सरसंघचालक ने घटना में मृतक बालक के प्रति शोक संवेदना व्यक्त की, तथा घायल के स्वास्थ्य से बारे में जानकारी ली.

September 13th 2019, 8:18 pm

12 सितम्बर / पुण्य तिथि – तमिल काव्य में राष्ट्रवादी स्वर : सुब्रह्मण्य भारती

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नई दिल्ली. भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम से देश का हर क्षेत्र और हर वर्ग अनुप्राणित था. ऐसे में कवि भला कैसे पीछे रह सकते थे. तमिलनाडु में इसका नेतृत्व कर रहे थे सुब्रह्मण्य भारती. यद्यपि उन्हें अनेक संकटों का सामना करना पड़ा, पर उनका स्वर मन्द नहीं हुआ. सुब्रह्मण्य भारती का जन्म एट्टयपुरम् (तमिलनाडु) में 11 दिसम्बर, 1882 को हुआ था. पाँच वर्ष की अवस्था में ही वे मातृविहीन हो गये. इस दुःख को भारती ने अपने काव्य में ढाल लिया. इससे उनकी ख्याति चारों ओर फैल गयी. स्थानीय सामन्त के दरबार में उनका सम्मान हुआ और उन्हें ‘भारती’ की उपाधि दी गयी. 11 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह कर दिया गया. अगले साल पिताजी भी चल बसे. अब भारती पढ़ने के उद्देश्य से अपनी बुआ के पास काशी आ गये. चार साल के काशीवास में भारती ने संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेजी भाषा का अध्ययन किया. अंग्रेजी कवि शैली से वे विशेष प्रभावित थे. उन्होंने एट्टयपुरम् में ‘शेलियन गिल्ड’ नामक संस्था भी बनाई. तथा ‘शेलीदासन्’ उपनाम से अनेक रचनाएँ लिखीं. काशी में ही उन्हें राष्ट्रीय चेतना की शिक्षा मिली, जो आगे चलकर उनके काव्य का मुख्य स्वर बन गयी. काशी में उनका सम्पर्क भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा निर्मित ‘हरिश्चन्द्र मण्डल’ से रहा. काशी में उन्होंने कुछ समय एक विद्यालय में अध्यापन किया. वहाँ उनका सम्पर्क डॉ. एनी बेसेण्ट से हुआ, पर वे उनके विचारों से पूर्णतः सहमत नहीं थे. एक बार उन्होंने अपने आवास शैव मठ में महापण्डित सीताराम शास्त्री की अध्यक्षता में सरस्वती पूजा का आयोजन किया. भारती ने अपने भाषण में नारी शिक्षा, समाज सुधार, विदेशी का बहिष्कार और स्वभाषा की उन्नति पर जोर दिया. अध्यक्ष महोदय ने इसका प्रतिवाद किया. फलतः बहस होने लगी और अन्ततः सभा विसर्जित करनी पड़ी. भारती का प्रिय गान बंकिम चन्द्र का वन्दे मातरम् था. वर्ष 1905 में काशी में हुए कांग्रेस अधिवेशन में सुप्रसिद्ध गायिका सरला देवी ने यह गीत गाया. भारती भी उस अधिवेशन में थे. बस तभी से यह गान उनका जीवन प्राण बन गया. मद्रास लौटकर भारती ने उस गीत का उसी लय में तमिल में पद्यानुवाद किया, जो आगे चलकर तमिलनाडु के घर-घर में गूँज उठा. सुब्रह्मण्य भारती ने जहाँ गद्य और पद्य की लगभग 400 रचनाओं का सृजन किया, वहाँ उन्होंने स्वदेश मित्रम, चक्रवर्तिनी, इण्डिया, सूर्योदयम, कर्मयोगी आदि तमिल पत्रों तथा बाल भारत नामक अंग्रेजी साप्ताहिक के सम्पादन में भी सहयोग किया. अंग्रेज शासन के विरुद्ध स्वराज्य सभा के आयोजन के लिए भारती को जेल जाना पड़ा. कोलकाता जाकर उन्होंने बम बनाना, पिस्तौल चलाना और गुरिल्ला युद्ध का भी प्रशिक्षण लिया. वे गरम दल के नेता लोकमान्य तिलक के सम्पर्क में भी रहे. भारती ने नानासाहब पेशवा को मद्रास में छिपाकर रखा. शासन की नजर से बचने के लिए वे पाण्डिचेरी आ गये और वहाँ से स्वराज्य साधना करते रहे. निर्धन छात्रों को वे अपनी आय से सहयोग करते थे. वर्ष 1917 में वे गान्धी जी के सम्पर्क में आये और वर्ष 1920 के असहयोग आन्दोलन में भी सहभागी हुए. स्वराज्य, स्वभाषा तथा स्वदेशी के प्रबल समर्थक इस राष्ट्रप्रेमी कवि का 12 सितम्बर, 1921 को मद्रास में देहान्त हुआ.

September 13th 2019, 8:18 pm

विद्या भारती की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक उदयपुर में प्रारंभ

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उदयपुर. विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक शुक्रवार को उदयपुर के विद्या निकेतन सेक्टर-4 में प्रारंभ हुई. दीप प्रज्ज्वलन के साथ बैठक का शुभारंभ हुआ.

राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री यतींद्र शर्मा ने बैठक की प्रस्तावना में कहा कि विद्या भारती का कार्य शिक्षा के क्षेत्र में एक आदर्श स्थापित करना है. इसके लिए देश भर में चल रहे 25 हजार शिक्षा केंद्रों को समाज के सामने संस्कार और शैक्षिक गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने वाले विद्या मंदिरों के रूप में प्रतिष्ठित किया जाएगा. बैठक में 200 से अधिक प्रतिनिधि उपस्थित हैं.

राष्ट्रीय मंत्री अवनीश भटनागर ने देश में चल रहे विद्या भारती के कार्यों की झलक पावर प्वाइंट के माध्यम से प्रस्तुत की. उन्होंने बताया कि नगरों, ग्रामों, वनवासी क्षेत्रों, दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों और आतंकवाद, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विद्या भारती के 25 हजार से अधिक विद्यालय शिक्षा व संस्कार की अलख जगा रहे हैं. देशभर में चल रहे इन विद्यालयों में एक लाख 40 हजार से अधिक शिक्षक हैं, तथा 38 लाख से अधिक विद्यार्थी हैं.

बैठक 15 सितंबर तक चलेगी, जिसमें विद्या भारती के कार्य के विस्तार, शैक्षिक गुणवत्ता के विकास, सूचना तकनीकी का उपयोग कर शिक्षा क्षेत्र में नए प्रयोग, आगामी सत्र के लिए होने वाले खेल कूद, गणित-विज्ञान मेला, अखिल भारतीय संस्कृति महोत्सव जैसे शैक्षणिक विषयों के साथ ही पर्यावरण सुरक्षा, पॉलीथीन मुक्ति, ऊर्जा एवं जल संरक्षण, फिजिकल फिटनेस जैसे समाजोपयोगी विषयों पर भी मंथन कर कार्य योजना बनाई जाएगी.

September 13th 2019, 8:18 pm

DUSU में विद्यार्थी परिषद का डंका, अध्यक्ष सहित 3 सीटों पर कब्जा

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दिल्ली छात्र संघ (दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन, DUSU 2019) चुनावों में एक बार फिर बाजी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के हाथ लगी है. विद्यार्थी परिषद ने अध्यक्ष सहित तीन सीटों पर जीत हासिल की है. एनएसयूआई को केवल सचिव पद पर जीत हासिल हुई है. विद्यार्थी परिषद ने तीनों सीटें बड़े अंतर से जीती हैं.

घोषित चुनाव परिणामों में डूसू चुनाव में अध्यक्ष पद पर विद्यार्थी परिषद के अक्षित दहिया ने 19 हजार मतों के अंतर से जीत हासिल की है. उपाध्यक्ष पद पर परिषद के प्रदीप तंवर ने 8574 मतों के अंतर से जीत हासिल की है. संयुक्त सचिव का पद विद्यार्थी परिषद की ही शिवांगी खरवाल ने 3 हजार मतों के अंतर से जीता है.

अध्यक्ष पद के लिए अक्षित दहिया को 29685 मिले, वहीं एनएसयूआई को 10646, आइसा 5886 और नोटा को 5886 मिले हैं. उपाध्यक्ष पद के लिये प्रदीप तंवर को 19858 मत, एनएसयूआई के अंकित को 11284 मत, आइसा के आफताब को 8217 मत और नोटा को 7879 मिले हैं. संयुक्त सचिव पद के लिये शिवांगी को 17234 मत मिले. एनएसयूआई उम्मीदवार आशीष लांबा ने सचिव पद पर जीत दर्ज की है. उन्हें 20934 वोट मिले.

September 13th 2019, 8:18 pm

तबरेज की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से सेकुलर गैंग के षड्यंत्र का पर्दाफाश – विहिप

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जिहादियों के साथ खान मार्केट गेंग पर भी हो कार्यवाही

Dr. Surender Jain

नई दिल्ली. विश्व हिन्दू परिषद् (विहिप) का कहना है कि सघन जांच के बाद जारी तबरेज की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से न केवल उसकी मृत्यु के कारण स्पष्ट हुए हैं, अपितु सेकुलर गैंग के एक बड़े षड्यंत्र का भी पर्दाफाश हुआ है. विहिप के संयुक्त महामंत्री डॉ. सुरेन्द्र जैन ने कहा कि जिहादी आतंकवाद के सफाए के लिए इसके पैरोकार खान मार्केट गैंग पर प्रभावी अंकुश लगाया जाना भी जरूरी है जो हिन्दू समाज भारत व मानवता को बारम्बार बदनाम कर आतंकियों व अतिवादियों के लिए खाद-पानी का कार्य कर रहे हैं.

विहिप के संयुक्त महामंत्री ने कहा कि जब भी कभी हिन्दू मुस्लिम के बीच में किसी भी कारण से कोई झगड़ा होता है और उसमें किसी मुस्लिम को चोट भी लग जाती है तो समस्त खान मार्केट गैंग सक्रिय हो जाता है. किसी भी साक्ष्य या रिपोर्ट की प्रतीक्षा किए बिना ये मुस्लिम समाज को भड़काना शुरू कर देते हैं, जिससे वे सड़कों पर उतरें और सांप्रदायिक दंगे हों.

तबरेज की मृत्यु के बाद चलाए गए अभियान के कारण 20 से ज्यादा मंदिर तोड़े गए और 32 स्थानों पर जिहादियों ने उग्र प्रदर्शन कर हिन्दुओं पर हमले किए. सूरत और रांची के प्रदर्शनों की भीषणता कभी भुलाई नहीं जा सकती. परंतु अगर किसी दंगे में किसी भी मुस्लिम को चोट लगती है तो इन्हें हिन्दू समाज, संगठनों तथा केंद्र सरकार को बदनाम करने का एक और मौका मिल जाता है.

विश्व हिन्दू परिषद ने सेकुलर बिरादरी के सभी राजनीतिज्ञों और कथित बुद्धिजीवियों पर आरोप लगाया कि वे अपने निहित स्वार्थों के कारण देश को दंगों की आग में झोंकना चाहते हैं. वे देश की समस्त न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास जगाकर “मॉब लिंचिंग” “पुरस्कार वापसी” आदि अभियान चलाकर राष्ट्र विरोधियों के हाथ मजबूत करते हैं.

ट्रेड टावर पर हमले की बरसी पर विश्व हिन्दू परिषद स्पष्ट करना चाहती है कि आतंकियों के साथ-साथ सेकुलर बिरादरी में बैठे इनके सहायकों का भी पर्दाफाश कर इनके विरुद्ध भी सख्त कार्यवाही करनी चाहिए, तभी आतंकवाद पर प्रभावी रोक लग सकती है.

September 13th 2019, 8:08 pm

कश्मीर : अतीत से आज तक – भाग तीन

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नरेंद्र सहगल

कट्टरपंथी धर्मान्तरित कश्मीर

सारे देश में चलती धर्मान्तरण की खूनी आंधी की तरह ही कश्मीर में भी विदेशों से आए हमलावरों की एक लंबी कतार ने तलवार के जोर पर हिन्दुओं को इस्लाम कबूल करवाया है. इन विदेशी और विधर्मी आक्रमणकारियों ने कश्मीर के हिन्दू राजाओं और प्रजा की उदारता, धार्मिक सहनशीलता, अतिथि सत्कार इत्यादि मानवीय गुणों का भरपूर फायदा उठाया है. यह मानवता पर जहालत की विजय का उदाहरण है. हालांकि कश्मीर की अंतिम हिन्दू शासक कोटा रानी (सन् 1939) के समय में ही कश्मीर में अरब देशों के मुस्लिम व्यापारियों और लड़ाकू इस्लामिक झंडाबरदारों का आना शुरू हो गया था, परंतु कोटा रानी के बाद मुस्लिम सुल्तान शाहमीर के समय हिन्दुओं का जबरन धर्मान्तरण शुरू हो गया. इसी कालखण्ड में हमदान (तुर्किस्तान–फारस) से मुस्लिम सईदों की बाढ़ कश्मीर आ गई.

महाषड्यंत्रकारी सईदों का वर्चस्व

सईद अली हमदानी और सईद शाहे हमदानी इन दो मजहबी नेताओं के साथ हजारों मुस्लिम धर्मप्रचारक भी कश्मीर में आ धमके (सन् 1372). इन्हीं सईद सूफी संतों ने मुस्लिम शासकों की मदद से कश्मीर के गांव-गांव में मस्जिदें, दरगाहें, मदरसे, खानकाह और इसी प्रकार के अन्य इस्लामिक केंद्र खोल दिए. ऊपर से दिखने वाले इन मानवीय कृत्यों के पीछे वास्तव में कश्मीरी हिन्दुओं के बलात् धर्मान्तरण के कुकृत्य छिपे हैं.

सूफ़ी सईद हमदानी ने कश्मीर के तत्कालीन सुल्तान कुतुबुद्दीन को धार्मिक फतवा सुनाकर मुस्लिम देशों की वेशभूषा, राज्य का इस्लामी मॉडल, शासन-प्रणाली में शरियत के कानून लागू करवाए और राज्य के भवनों पर हरे इस्लामी झंडे लगाने जैसी व्यवस्थाएं लागू करवा दीं. इन सबका विरोध करने वाले हिन्दुओं को सताने और सजाए मौत देने का सिलसिला शुरू हो गया. कश्मीर में धर्मान्तरित मुसलमानों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी.

इसे समस्त मानवता, भारत, हिन्दू समाज और कश्मीर का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इन्हीं धर्मान्तरित कश्मीरियों ने विदेशी धर्म-प्रचारकों का धार्मिक स्तर पर ना केवल सहयोग ही किया, बल्कि उनकी ओर से चलाई जाने वाली धर्मान्तरण की प्रक्रिया में शामिल भी हो गए. अपने ही बाप-दादाओं द्वारा बनाए गए मठों, मंदिरों, शिक्षा केंद्रों को तोड़कर वहां मस्जिदें खड़ी करने में शर्म नहीं आई.

मुस्लिम सुल्तानों ने पढ़े लिखे कश्मीरी हिन्दुओं को अपने राज दरबारों में वजीर बनाया, ऊंचे पदों पर रखा और बाद में इन कथित वजीरों को जागीरें देकर राजा शमसुद्दीन और राजा सैफ़ुद्दीन बनाकर इन्हीं से हिन्दुओं पर जुल्म की चक्की चलवाई. अन्यथा मुठी भर विदेशी हमलावरों की क्या हिम्मत थी कि इस धरती पर अपने पांव जमाने में कामयाब होते.

हिंसक धर्मान्तरण की क्रूर चक्की

मुस्लिम इतिहासकार हसन ने अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ कश्मीर’ में इस एकतरफा जबरन धर्मान्तरण की खूनी कहानी का वर्णन इस प्रकार किया है – सुल्तान सिकंदर बुतशिकन (सन् 1393) ने हिन्दुओं को सबसे ज्यादा दबाया. शहरों में यह घोषणा कर दी गई कि जो हिन्दू मुसलमान नहीं बनेगा, वह देश छोड़ दे या मार डाला जाए. परिणाम स्वरूप अनेक हिन्दू परिवार पलायन करके देश के अन्य प्रांतों में चले गए और कईयों ने इस्लाम कबूल कर लिया. अनेक ब्राह्मणों ने मरना बेहतर समझा और प्राण दे दिए.

इस तरह सुल्तान ने तीन खिर्बार (सात क्विंटल) जनेऊ हिन्दू धर्म परिवर्तन करने वालों से एकत्रित करके जला डाले हैं… हिन्दुओं के सारे धर्मग्रंथ डल झील में फेंक दिए गए अथवा जला दिए गए….. अनेक ग्रंथों को जमीन में दबा दिया गया….. “इस देश (कश्मीर) में हिन्दू राजाओं के समय में अनेकों मंदिर थे जो संसार के आश्चर्य की तरह थे…. सुल्तान सिकंदर ने ईर्ष्या और घृणा से भर कर इन मंदिरों को तुड़वा कर मिट्टी में मिला दिया. मंदिरों के मलवे से ही अनेक मस्जिदें और खनकाहें बनवाईं.”

इस्लाम, मौत अथवा देश निकाला

अंग्रेज इतिहासकार डॉ. अर्नेस्ट ने अपनी पुस्तक ‘बियोंड दा पीर पंजाल’ में मुस्लिम सुल्तानों के अत्याचारों को इस तरह लिखा है – “दो-दो हिन्दुओं को जीवित ही एक बोरे में बंद कर झील में फेंक दिया जाता था. हिन्दुओं के सामने केवल तीन ही विकल्प थे. या तो वे मुसलमान बनें, या मौत को स्वीकार करें, या फिर संघर्ष करते हुए बलिदान दे दें. सिकंदर ने सरकारी आदेश जारी कर दिया – इस्लाम – मौत अथवा देश निकाला.”

क्रूर और पाश्विक वृत्ति वाले सुल्तानों ने हिन्दुओं के आध्यात्मिक श्रद्धा केंद्रों पर भी अपनी आंखें गाड़ दीं. सईद सूफ़ी संतों ने सुल्तानों को समझाया कि जब तक इन बुतपरस्त काफिरों के मंदिरों में लगे बुतों को तबाह नहीं किया जाता, तब तक धर्मान्तरण का लाभ नहीं होगा. यही देवस्थल इनकी प्रेरणा के केंद्र हैं.

अतः इन नए मुसलमानों को भारत की मूलधारा से तोड़ने का एक ही तरीका है, मंदिरों मठों को तोड़ डालो.

सईदों के इन फतवों को सुल्तानों ने शिरोधार्य करते हुए मानव इतिहास की सर्वश्रेष्ठ कलाकृतियों को धूलधूसरित करने का गैर इनसानी कुकृत्य शुरू कर दिया. मुसलमान इतिहासकार हसन के अनुसार सबसे पहले सुल्तान सिकंदर की दृष्टि मटन (कश्मीर) के विश्व प्रसिद्ध मार्तण्ड सूर्य मंदिर पर पड़ी. इस मंदिर को तोड़ने, जलाने और पूरी तरह बर्बाद करने में ही लगभग दो वर्ष लग गए.

बर्बाद कर दी गई सनातन संस्कृति

मार्तण्ड मंदिर के चारों ओर के गांव को इस्लाम कबूल करने के आदेश दे दिए गए. जो नहीं माने वे परिवारों सहित तलवार की भेंट चढ़ा दिए गए. इसी प्रकार कश्मीर के प्रसिद्ध बिजविहार स्थान पर एक अति विशाल सुंदर देवस्थल बिजवेश्वर मंदिर और उसके आसपास के तीन सौ से ज्यादा मंदिर सुल्तान के आदेश से तुड़वा दिए गए. इतिहासकार मुहम्मद हसन के मुताबिक इस बिजवेश्वर मंदिर की मूर्तियों और पत्थरों से वहीं एक मस्जिद का निर्माण किया गया और इसी क्षेत्र में कई खनकाहें बनवाई गई, जिसे आज बिजवेश्वर खनकाह कहते हैं.

हिन्दू उत्पीड़न और बलात् धर्मान्तरण का यह खूनी फ़ाग प्रत्येक मुस्लिम सुल्तान के समय तेजी से चला. औरंगज़ेब ने अपने शासनकाल के 49 वर्षों में 14 सूबेदार इसी काम के लिए कश्मीर में भेजें. हिन्दुओं के हाथ-पांव काटने, उनकी संपत्ति हथियाने, उन्हें कारावास में डालने, सजाए मौत देने, अपहरण करने महिलाओं के साथ बलात्कार करने और हिन्दुओं पर जज़िया टैक्स लगाने जैसे जुल्म, एक-साथ युद्ध स्तर पर शुरू हो गए.

परिणाम स्वरूप हिन्दू कश्मीर की सनातन संस्कृति बर्बाद हो गई. मानव इतिहास की दुर्लभ कलाकृतियां खंडहरों में तब्दील हो गईं. भारतीय संस्कृति के इन अनूठे प्रतीकों, स्मृतियों और ध्वंसावशेषों को देखकर इन्हें तोड़ने और बर्बाद करने वाले जालिम यवन सुल्तानों और उनके जमीर से गिरे हुए कुकृत्यों का परिचय मिलता है. यह टूटे और बिखरे खण्डहर जहालत और अमानवीय विचारदर्शन का जीता जागता सबूत हैं.

सनातन हिन्दू कश्मीर के धर्मान्तरण और बर्बादी की यह रक्तरंजित कहानी बहुत लंबी है. सन् 1339 से शुरू हुआ कश्मीर का असली चेहरा बिगाड़ने वाला यह काला इतिहास 1989 में हुए कश्मीरी हिन्दुओं के सामूहिक नरसंहार एवं पलायन तक जारी रहा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं)

September 13th 2019, 8:08 pm

13 सितम्बर / बलिदान दिवस – अनशनव्रती यतीन्द्रनाथ दास

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नई दिल्ली.  यतीन्द्रनाथ दास का जन्म 27 अक्तूबर, 1904 को कोलकाता में हुआ था. 16 वर्ष की अवस्था में ही वे असहयोग आंदोलन में दो बार जेल गये थे. इसके बाद वे क्रांतिकारी दल में शामिल हो गये. शचीन्द्रनाथ सान्याल से उन्होंने बम बनाना सीखा. वर्ष 1928 में वे फिर पकड़ लिये गये. वहां जेल अधिकारी द्वारा दुर्व्यवहार करने पर ये उससे भिड़ गये. इस पर इन्हें बहुत निर्ममता से पीटा गया. इसके विरोध में इन्होंने 23 दिन तक भूख हड़ताल की तथा जेल अधिकारी द्वारा क्षमा मांगने पर ही अन्न ग्रहण किया. क्रांतिकारी गतिविधियों में संलग्न रहने के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा. हर बार वे बंदियों के अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहे. लाहौर षड्यंत्र केस में वे छठी बार गिरफ्तार हुए. उन दिनों जेल में क्रांतिवीरों से बहुत दुर्व्यवहार होता था. उन्हें न खाना ठीक मिलता था और न वस्त्र, जबकि सत्याग्रहियों को राजनीतिक बंदी मान कर सब सुविधा दी जाती थीं. जेल अधिकारी क्रांतिकारियों से प्रायः मारपीट भी करते थे. इसके विरोध में भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त आदि ने लाहौर के केन्द्रीय कारागार में भूख हड़ताल प्रारम्भ कर दी. जब इन अनशनकारियों की हालत खराब होने लगी, तो इनके समर्थन में बाकी क्रांतिकारियों ने भी अनशन प्रारम्भ करने का विचार किया. अनेक लोग इसके लिए उतावले हो रहे थे. जब सबने यतीन्द्र की प्रतिक्रिया जाननी चाही, तो उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि मैं अनशन तभी करूंगा, जब मुझे कोई इससे पीछे हटने को नहीं कहेगा. मेरे अनशन का अर्थ है ‘विजय या मृत्यु.’ यतीन्द्रनाथ का मत था कि संघर्ष करते हुए गोली खाकर या फांसी पर झूलकर मरना आसान है. क्योंकि उसमें अधिक समय नहीं लगता, पर अनशन में व्यक्ति क्रमशः मृत्यु की ओर आगे बढ़ता है. ऐसे में यदि उसका मनोबल कम हो, तो संगठन के व्यापक उद्देश्य को हानि होती है. यतीन्द्रनाथ का मनोबल बहुत ऊंचा था. अतः उनके नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने 13 जुलाई, 1929 से अनशन प्रारम्भ कर दिया. जेल में यों तो बहुत खराब खाना दिया जाता था, पर अब जेल अधिकारी स्वादिष्ट भोजन, मिष्ठान और केसरिया दूध आदि उनके कमरों में रखने लगे. सब क्रांतिकारी यह सामग्री फेंक देते थे, पर यतीन्द्र कमरे में रखे होने पर भी इन्हें छूते तक नहीं थे. अब जेल अधिकारियों ने जबरन अनशन तुड़वाने का निश्चय किया. वे बंदियों के हाथ पैर पकड़कर, नाक में रबड़ की नली घुसेड़कर पेट में दूध डाल देते थे. जब यतीन्द्र के साथ ऐसा किया गया, तो वे जोर से खांसने लगे. इससे दूध उनके फेफड़ों में चला गया और उनकी हालत बहुत बिगड़ गयी. यह देखकर जेल प्रशासन ने उनके छोटे भाई किरणचंद्र दास को उनकी देखरेख के लिए बुला लिया, पर यतीन्द्रनाथ दास ने उसे इसी शर्त पर अपने साथ रहने की अनुमति दी कि वह उनके संकल्प में बाधक नहीं बनेगा. इतना ही नहीं, यदि उनकी बेहोशी की अवस्था में जेल अधिकारी कोई खाद्य सामग्री, दवा या इंजैक्शन देना चाहें, तो वह ऐसा नहीं होने देगा. 13 सितम्बर, 1929 को अनशन का 63वां दिन था. आज यतीन्द्र के चेहरे पर विशेष प्रकार की मुस्कान थी. उन्होंने सब मित्रों को अपने पास बुलाया. छोटे भाई किरण ने उनका मस्तक अपनी गोद में ले लिया. विजय सिन्हा ने यतीन्द्र का प्रिय गीत ‘एकला चलो रे’ और फिर ‘वन्दे मातरम्’ गाया. गीत पूरा होते ही संकल्प के धनी यतीन्द्रनाथ दास का सिर एक ओर लुढ़क गया.

September 13th 2019, 8:08 pm

14 सितम्बर / बलिदान दिवस – लाला जयदयाल जी का बलिदान

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नई दिल्ली. सन् 1857 में जहाँ एक ओर स्वतन्त्रता के दीवाने सिर हाथ पर लिये घूम रहे थे, वहीं कुछ लोग अंग्रेजों की चमचागीरी और भारत माता से गद्दारी को ही अपना धर्म मानते थे. कोटा (राजस्थान) के शासक महाराव अंग्रेजों के समर्थक थे. पूरे देश में क्रान्ति की चिनगारियाँ 10 मई के बाद फैल गयीं थी, पर कोटा में यह आग अक्तूबर में भड़की. महाराव ने एक ओर तो देशप्रेमियों को बहकाया कि वे स्वयं कोटा से अंग्रेजों को भगा देंगे, तो दूसरी ओर नीमच छावनी में मेजर बर्टन को समाचार भेज कर सेना बुलवा ली. अंग्रेजों के आने का समाचार जब कोटा के सैनिकों को मिला, तो वे भड़क उठे. उन्होंने एक गुप्त बैठक की और विद्रोह के लिए लाला हरदयाल को सेनापति घोषित कर दिया.

लाला हरदयाल महाराव की सेना में अधिकारी थे, जबकि उनके बड़े भाई लाला जयदयाल दरबार में वकील थे. जब देशभक्त सैनिकों की तैयारी पूरी हो गयी, तो उन्होंने अविलम्ब संघर्ष प्रारम्भ कर दिया. 16 अक्तूबर को कोटा पर क्रान्तिवीरों का कब्जा हो गया. लाला हरदयाल गम्भीर रूप से घायल हुए. महाराव को गिरफ्तार कर लिया गया और मेजर बर्टन के दो बेटे मारे गये. महाराव ने फिर चाल चली और सैनिकों को विश्वास दिलाया कि वे सदा उनके साथ रहेंगे. इसी के साथ उन्होंने मेजर बर्टन और अन्य अंग्रेज परिवारों को भी सुरक्षित नीमच छावनी भिजवा दिया.

छह माह तक कोटा में लाला जयदयाल ने सत्ता का संचालन भली प्रकार किया, पर महाराव भी चुप नहीं थे. उन्होंने कुछ सैनिकों को अपनी ओर मिला लिया, जिनमें लाला जयदयाल का रिश्तेदार वीरभान भी था. निकट सम्बन्धी होने के कारण जयदयाल जी उस पर बहुत विश्वास करते थे. इसी बीच महाराव के निमन्त्रण पर मार्च 1858 में अंग्रेज सैनिकों ने कोटा को घेर लिया. देशभक्त सेना का नेतृत्व लाला जयदयाल, तो अंग्रेज सेना का नेतृत्व जनरल राबर्टसन के हाथ में था. इस संघर्ष में लाला हरदयाल को वीरगति प्राप्त हुई. बाहर से अंग्रेज तो अन्दर से महाराव के भाड़े के सैनिक तोड़फोड़ कर रहे थे. जब लाला जयदयाल को लगा कि अब बाजी हाथ से निकल रही है, तो वे अपने विश्वस्त सैनिकों के साथ कालपी आ गये.

तब तक सम्पूर्ण देश में 1857 की क्रान्ति का नक्शा बदल चुका था. अनुशासनहीनता और अति उत्साह के कारण योजना समय से पहले फूट गयी और अन्ततः विफल हो गयी. लाला जयदयाल अपने सैनिकों के साथ बीकानेर आ गये. यहाँ उन्होंने सबको विदा कर दिया और स्वयं सन्यासी होकर जीने का निर्णय लिया. देशद्रोही वीरभान इस समय भी उनके साथ लगा हुआ था. उसके व्यवहार से कभी लाला जी को शंका नहीं हुई. अंग्रेजों ने उन्हें पकड़वाने वाले को दस हजार रुपए इनाम की घोषणा कर रखी थी. वीरभान हर सूचना महाराव तक पहुँचा रहा था. उसने लाला जी को जयपुर चलने का सुझाव दिया. 15 अप्रैल, 1858 को जब लाला जी बैराठ गाँव में थे, तो उन्हें पकड़ लिया गया. अदालत में उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और फिर 14 सितम्बर, 1858 को उन्हें कोटा के रिजेन्सी हाउस में फाँसी दे दी गयी. इस प्रकार मातृभूमि की बलिवेदी पर दोनों भाइयों ने अपने शीश अर्पित कर दिये. गद्दार वीरभान को शासन ने दस हजार रुपए के साथ कोटा रियासत के अन्दर एक जागीर भी दी.

September 13th 2019, 8:08 pm

विद्या भारती अखिल भारतीय कार्यकारिणी की बैठक 13 सितंबर से उदयपुर में

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विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान की अखिल भारतीय कार्यकारिणी की बैठक का आयोजन ऐतिहासिक नगरी एवं वीर भूमि उदयपुर में हो रहा है. इसमें देश भर के लगभग 250 शिक्षाविद्, विद्वान एवं विद्या भारती के कार्यकर्ता सम्मिलित होंगे. 13, 14, 15 सितंबर को आयोजित बैठक में विभिन्न विषयों पर विचार विमर्श होगा.

विद्या भारती के अखिल भारतीय महामंत्री श्रीराम आरावकर ने प्रेस वार्ता में बताया कि विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान देश में शिक्षा जगत का सर्वाधिक बड़ा, महत्वपूर्ण एवं प्रभावी संगठन है. सन् 1952 में एक विद्यालय से लेकर अब 13,067 औपचारिक विद्यालय तथा 11,333 एकल विद्यालय एवं संस्कार केंद्रों का संचालन इसके अंतर्गत हो रहा है. लगभग 36 लाख विद्यार्थियों को 1 लाख 50 हजार से अधिक आचार्य शिक्षा के साथ ही संस्कार देने का पवित्र कार्य कर रहे हैं. अत्यंत श्रेष्ठ परीक्षा परिणाम, अनेक शिक्षा बोर्ड की प्रवीणता सूची (मेरिट लिस्ट) में विद्यार्थियों के नाम, देश के खेल जगत में, विविध खेलों में ऊंचे प्रतिमान बनाते हुए अनेक पदक, विदेशों में भी खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए हमारे छात्र, विज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र में हमारे विद्यार्थियों की उपलब्धियां, विद्या भारती की यशोगाथा कहती हैं. हमारे पूर्व छात्रों ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता और उच्च पद प्राप्त किए हैं और वे उसका श्रेय भी विद्या भारती को देते हैं.

उन्होंने बताया कि बदलते सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं शैक्षिक परिप्रेक्ष्य में नई आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर नई पीढ़ी की रचना एवं विकास विद्या भारती की प्राथमिकताओं में है. भारतीय शिक्षा दर्शन पद्धति और नवीन वैज्ञानिक, डिजिटल युग का समन्वय करते हुए शिक्षा के स्वरूप और व्यवहार में उसकी परिणीति के मार्गों का अनुसंधान विद्या भारती की निरंतर चिंताओं में सम्मिलित है.

बैठक में विद्वान शिक्षाविद सांगठनिक विषयों के साथ-साथ उक्त बातों पर भी विचार विमर्श करेंगे कि हमारे विद्यालय कैसे सशक्त बनें, उपक्रमशील बनें. समाज गांव से लेकर ऊपर तक अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों को कैसे पूरा कर सकते हैं, यह विषय हमारी चिंतन की प्राथमिकता में है. आगामी 3 वर्षों के कार्य विस्तार, विकास की दिशा आदि के साथ अनेक शैक्षिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विषयों पर बैठक में विचार होने वाला है.

September 13th 2019, 8:08 pm

कश्मीर : अतीत से आज तक – भाग दो

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वीरव्रती दिग्विजयी कश्मीर

नरेन्द्र सहगल

हम सभी भारतीयों को कश्मीर की गौरवमयी क्षात्र परंपरा और अजय शक्ति पर गर्व है. विश्व में मस्तक ऊंचा करके 4000 वर्षों तक स्वाभिमान पूर्वक स्वतंत्रता का भोग कश्मीर ने अपने बाहुबल पर किया है. इस धरती के हिन्दू शूरवीरों ने कभी विदेशी आक्रमणकारियों और उनके शस्त्रों के सम्मुख मस्तक नहीं झुकाए.

मध्य एशिया तक फैला कश्मीर राज्य

अनेक शताब्दियों तक इस वीरभूमि के रणबांकुरों ने विदेशों से आने वाली घोर रक्तपिपासु तथा जालिम कहलाने वाली जातियों और कबीलों के जबरदस्त हमलों को अपनी तलवारों से रोका है. आधुनिक इतिहास के पन्ने भी साक्षी हैं कि कश्मीर  की खड़ग के वार मध्य एशिया के सुदूर क्षेत्रों तक पड़े थे. कश्मीर की इस दिग्विजयी विरासत को नकारा नहीं जा सकता.

सनातन कश्मीर का विस्तृत इतिहास राजतरंगिणी नामक ग्रंथ में मिलता है. यह सारा इतिहास महाभारत काल से प्रारम्भ होता है. इस दिग्विजयी कालखंड का प्रारंभ गोनंद नामक सम्राट के शासनकाल में हुआ था. पाण्डव वंश के राजाओं ने भी कश्मीर पर राज किया. पाण्डव नरेश संदीपन की देखरेख में ही प्रसिद्ध शंकराचार्य मंदिर का निर्माण हुआ था. संदीपन के समय कश्मीर राज्य की सीमाएं आज के गंधार (अफगानिस्तान) से कन्नौज तक फैली हुई थीं. इसी वंश परंपरा के एक राजा भीमसेन ने सैन्यशक्ति के बल पर मध्य एशिया के बड़े क्षेत्रों पर शासन किया था. इस कालखण्ड में पूरे भारत में एक ही प्रकार की राज्यव्यवस्था होने के प्रमाण मिलते हैं.

इतिहासकार कल्हण के अनुसार मगध के सम्राट अशोक (250 ईसा पूर्व) ने कश्मीर को अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया. राजा अशोक ने ही श्रीनगरी (श्रीनगर) शहर को बसाया था. प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्येनसांग, जो कश्मीर में कई वर्ष रहा था, ने लिखा है कि अशोक के राज्यकाल में पांच हजार बौद्ध भिक्षुओं को कश्मीर में बसाया गया था. उल्लेखनीय है कि इन बौद्ध उपासकों और स्थानीय शिव उपासकों में कभी भी संघर्ष नहीं हुआ. स्वयं राजा अशोक ने शिव की उपासना की.

सम्राट अशोक के बाद उसका पुत्र जालौक कश्मीर के सिंहासन पर बैठा. प्रतिदिन शिव की पूजा अर्चना करने वाला राजा जालौक एक निडर एवं वीर शासक था. जालौक के नेतृत्व में कश्मीरी सैनिकों ने अनेक बार विदेशी आक्रमणों से कश्मीर घाटी को पूर्णरूप से सुरक्षित रखा.

हूणों और कुषाणों का भारतीयकरण

राजा जलौक के पश्चात तीन शताब्दियों तक कश्मीर में किसी प्रतिभाशाली शासक के ना होने के कारण राज्यव्यवस्था चरमरा गई. कश्मीर पर विदेश (तुर्किस्तान) से आए कुषाण जाति के आक्रान्ता राजा कनिष्क ने सैन्यबल से अपना आधिपत्य जमा लिया. राजनीति, कूटनीति और सैन्य अभियान में सिद्धहस्त कुषाण राजाओं पर भारतीय संस्कृति (कश्मीरियत) का प्रभाव पड़ा. कनिष्क ने बौद्धमत अपना लिया और इसे राजधर्म घोषित कर दिया. इसी कालखण्ड में तृतीय अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध परिषद का सम्मेलन कश्मीर में हुआ.

तुर्क – कुषाण राजाओं के बौद्धमत को स्वीकार करते ही भारत में विदेशी/विधर्मी कुषाण जाति का भारतीयकरण हो गया और बौद्ध मत दूरस्थ क्षेत्रों, लंका, बर्मा, जावा, केंद्रीय एशिया, तिब्बत और चीन तक फैला.

छठी शताब्दी के प्रारंभ (525 ई॰) में हूणों ने कश्मीर पर विजय प्राप्त कर ली. हूणों का नेता मिहिरकुल,  कश्मीर के इतिहास में ‘क्रूर शासक’ के नाते जाना जाता है. उसने बौद्ध मत एवं शैवमत के उपासकों पर जघन्य अत्याचार शुरू कर दिए. वास्तव में यह राजनीतिक षड्यंत्रों के सहारे ही कश्मीर पर अपना अधिपत्य जमाने में सफल हुआ था.

उस समय कश्मीर में शैवमत इतना प्रभावी था कि शिव उपासकों की संगठित शक्ति ने मिहिरकुल को शिव की शरण में आने के लिए बाध्य कर दिया. उसने ना केवल शैवमत अपनाया, अपितु प्रसिद्ध मिहिरेश्वर मंदिर का निर्माण भी करवाया. यह मंदिर आजकल पहलगांव में मामलेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है. इस प्रकार कनिष्क और उसकी कुषाण जाति और मिहिरकुल तथा उसकी हूण जाति का भी भारतीयकरण कश्मीर की धरती पर ही हुआ.

हिमालय से सुदूर दक्षिण तक

राजा कनिष्क के प्रयासों के फलस्वरूप बौद्ध मत अफगानिस्तान एवं तुर्किस्तान तक फैल चुका था. अतः कनिष्क के पश्चात कश्मीर के सिंहासन पर बैठे प्रतिभाशाली राजा मेघवाहन ने भी बौद्धमत के प्रचार हेतु एक अनूठा अभियान प्रारंभ किया जो विश्व के इतिहास में अतुलनीय है. उसने समूचे विश्व में प्राणी हिंसा के निषेध का निश्चय करके कश्मीर में पशुओं के वध पर प्रतिबंध लगा दिया.

तत्पश्चात मेघवाहन ने इस कार्य को संपन्न करने के लिए दक्षिण की ओर प्रस्थान किया. कश्मीर के राजभवन पर जो ध्वज (भगवा) लहराता था, उसका ध्वजदण्ड राजा मेघवाहन को श्रीलंका के राजा ने प्रदान किया था (राजतरंगिणी 3/27). हिमालय से सुदूर दक्षिण तक भारत के एकत्व का यह एक अनूठा उदाहरण है.

मेघवाहन के कालखण्ड के बाद कश्मीर के इतिहास के उज्ज्वल पृष्ठों पर कर्कोटा वंश का 254 वर्षों का राज्य स्वर्णिम अक्षरों में वर्णित है. इसी वंश में चन्द्रापीड़ नामक राजा ने कश्मीर में एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना की (सन् 713 ई॰). इसने चीन के राजदरबार में अपना एक दूत इस आशय से भेजा कि चीन के सहयोग से अरब से युद्ध करें. इसी राजा के कालखण्ड में अरब की ओर से होने वाले आक्रमणों पर नकेल कसी गई.

पराक्रमी योद्धा सम्राट ललितादित्य और कर्मयोगी अवन्तिवर्मन

साहस और पराक्रम की प्रतिमूर्ति सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड़ का नाम कश्मीर के इतिहास में सर्वोच्च स्थान पर है (आठवीं शताब्दी). इस सम्राट का सैंतीस वर्षों का राज्यकाल उसके सफल सैनिक अभियानों, अद्भुत युद्ध कौशल और विश्वविजेता बनने की दृढ़ इच्छा से पहचाना जाता है. इसका राज्य क्षेत्र पूर्व में तिब्बत से लेकर पश्चिम के इरान और तुर्कीस्तान तक तथा उत्तर में मध्य एशिया से लेकर दक्षिण में उड़ीसा और द्वारिका समुद्र तटों पर पहुंच गया था.

सम्राट ललितादित्य का अत्यंत सुंदर और चिरस्मरणीय कार्य है. उसके द्वारा निर्मित विशाल मार्तण्ड मंदिर, जिसे सम्राट ने भगवान सूर्य देव को समर्पित किया था. सम्राट ललितादित्य एक अद्वितीय योद्धा, विजेता, वास्तुकला प्रेमी एवं साहित्य प्रेमी तो था ही, वह एक अतिकुशल प्रशासक भी था. अपने राज्य में उसने किसी भी प्रकार के विद्रोह, आंतरिक संघर्ष और सांप्रदायिक वैमनस्य को उभरने नहीं दिया.

सम्राट ललितादित्य के पश्चात कश्मीर की राजगद्दी पर कर्मयोगी सम्राट अवन्तिवर्मन का अट्ठाइस वर्षों का शासनकाल विशेष महत्व रखता है. रणक्षेत्र में अपना समय बिताने के स्थान पर उसने अपने राज्य के विकास कार्यों की और ध्यान दिया. उसने सारे प्रदेश में जन-सुविधाएं जुटाने हेतु अनेक परियोजनाएं प्रारंभ की. उसने अनेक मठ मंदिर अपनी देखरेख में बनवाए.

अवन्तिवर्मन के पश्चात उसका पुत्र शंकरवर्मन राज्यसिंहासन पर बैठा. इस सम्राट ने भी अपने राज्य को अफगानिस्तान तक मजबूत कर लिया. उल्लेखनीय है कि सम्राट ललितादित्य के समय कश्मीर सैन्य दृष्टि से शक्तिशाली बना. सम्राट अवन्तिवर्मन के समय कश्मीर आर्थिक दृष्टि से संपन्न हुआ, परंतु शंकरवर्मन के समय कश्मीर दोनों ही क्षेत्रों में प्रगति करने लगा.

विजय के बाद पराजय का युग

कश्मीर के इतिहास का एक उज्ज्वल अध्याय यह भी है कि इरान, तुर्कीस्तान तथा भारत के कुछ हिस्सों को अपने पांव तले रौंदने वाला सुल्तान महमूद गज़नवी  दो बार कश्मीर की धरती से पराजित होकर लौटा. कश्मीर में इस शौर्य को इतिहास के पन्नों पर लिखा गया महाराज संग्रामराज के शासनकाल में. इस शूरवीर राजा ने कश्मीर प्रदेश पर सन् 1003 ई॰ से सन् 1028 तक राज किया. महमूद गज़नवी का अंतिम आक्रमण भारत पर 1030 ई॰ में हुआ था.

संग्रामराज द्वारा महमूद गज़नवी के साथ लड़े गए दोनों युद्धों में काबुल के राजवंश के अंतिम हिंदू राजा त्रिलोचन पाल ने बहादुरी से साथ दिया. त्रिलोचन पाल ने प्रबल मुस्लिम आक्रमणों को विफल करने में सफलता पाई थी. इसके बाद सन् 1128 से सन् 1150 तक कश्मीर में राजा जयसिंह का राज रहा.

इस कालखण्ड में कश्मीर पर विदेशी राजाओं विशेषतया मुस्लिम सुल्तानों की कुदृष्टि पड़ चुकी थी. इसी समय में कश्मीर के एक अत्यंत विलासी हिंदू राजा हर्षदेव की कमजोर मानसिकता एवं अव्यवहारिक उदार नीतियों के दुष्परिणाम सामने आने लगे. कश्मीर की सेना और प्रशासन में पेशेवर मुस्लिम सैनिकों का प्रवेश बढ़ता चला गया.

कश्मीर में विकसित हुई इस नई उदारता ने कश्मीर की पारंपरिक एवं स्वाभाविक एकता को भंग करना प्रारंभ किया. कश्मीर की शक्ति घटनी शुरू हो गई. सहअस्तित्व की भावना में दरारें पड़ गई. आंतरिक संघर्षो की शुरुआत हो गई. बलात् धर्मान्तरण का जहर फैला और हिन्दू कश्मीर को मुस्लिम कश्मीर बनाने का मार्ग प्रशस्त होता चला गया.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं.)

September 13th 2019, 8:08 pm

11 सितम्बर / जन्मदिवस – भूदान यज्ञ के प्रणेता : विनोबा भावे

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नई दिल्ली. स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद निर्धन भूमिहीनों को भूमि दिलाने के लिये हुए ‘भूदान यज्ञ’ के प्रणेता विनायक नरहरि (विनोबा) भावे का जन्म 11 सितम्बर, 1895 को महाराष्ट्र के कोलाबा जिले के गागोदा ग्राम में हुआ था. इनके पिता नरहरि पन्त जी तथा माता रघुमाई जी थीं. विनायक बहुत ही विलक्षण बालक था. वह एक बार जो पढ़ लेता, उसे सदा के लिये कण्ठस्थ हो जाता. उनकी प्रारम्भिक शिक्षा बड़ौदा में हुई. वहाँ के पुस्तकालय में उन्होंने धर्म, दर्शन और साहित्य की हजारों पुस्तकें पढ़ीं. विनोबा पर उनकी माँ तथा गांधी जी की शिक्षाओं का बहुत प्रभाव पड़ा. अपनी माँ के आग्रह पर उन्होंने ‘श्रीमद भगवद्गीता’ का ‘गीताई’ नामक मराठी काव्यानुवाद किया. काशी विश्वविद्यालय में संस्कृत का अध्ययन करते समय उन्होंने गांधी जी के विचार समाचार पत्रों में पढ़े. उससे प्रभावित होकर उन्होंने अपना जीवन उन्हें समर्पित कर दिया और गांधी जी के निर्देश पर साबरमती आश्रम के वृद्धाश्रम की देखरेख करने लगे. उनके मन में प्रारम्भ से ही नौकरी करने की इच्छा नहीं थी. इसलिये काशी जाने से पूर्व ही उन्होंने अपने सब शैक्षिक प्रमाण पत्र जला दिये. वर्ष 1923 में वे झण्डा सत्याग्रह के दौरान नागपुर में गिरफ्तार हुये. उन्हें एक वर्ष की सजा दी गयी. वर्ष 1940 में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ प्रारम्भ होने पर गान्धी जी ने उन्हें प्रथम सत्याग्रही के रूप में चुना. इसके बाद वे तीन साल तक वर्धा जेल में रहे. वहाँ गीता पर दिये गये उनके प्रवचन बहुत विख्यात हैं. बाद में वे पुस्तक रूप में प्रकाशित भी हुये. गीता की इतनी सरल एवं सुबोध व्याख्या अन्यत्र दुर्लभ है. वर्ष 1932 में उन्होंने वर्धा के पास पवनार नदी के तट पर एक आश्रम बनाया. जेल से लौटकर वे वहीं रहने लगे. विभाजन के बाद हुये दंगों की आग को शान्त करने के लिये वे देश के अनेक स्थानों पर गये. स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद वर्ष 1948 में विनोबा ने ‘सर्वोदय समाज’ की स्थापना की. इसके बाद वर्ष 1951 में उन्होंने भूदान यज्ञ का बीड़ा उठाया. इसके अन्तर्गत वे देश भर में घूमे. वे जमींदारों से भूमि दान करने की अपील करते थे. दान में मिली भूमि को वे उसी गाँव के भूमिहीनों को बाँट देते थे. इस प्रकार उन्होंने 70 लाख हेक्टेयर भूमि निर्धनों में बाँटकर उन्हें किसान का दर्जा दिलाया. 19 मई, 1960 को विनोबा भावे ने चम्बल के बीहड़ों में आतंक का पर्याय बने अनेक डाकुओं का आत्मसमर्पण कराया. जयप्रकाश नारायण ने इन कार्यों में उनका पूरा साथ दिया. जब उनका शरीर कुछ शिथिल हो गया, तो वे वर्धा में ही रहने लगे. वहीं रहकर वे गांधी जी के आचार, विचार और व्यवहार के अनुसार काम करते रहे. गोहत्या बन्दी के लिये उन्होंने अनेक प्रयास किये, पर शासन द्वारा कोई ध्यान न देने पर उनके मन को भारी चोट लगी. वर्ष 1975 में इन्दिरा गांधी द्वारा लगाये गये आपातकाल का समर्थन करते हुए उसे उन्होंने ‘अनुशासन पर्व’ कहा. इस कारण उन्हें पूरे देश में आलोचना सहनी पड़ी. विनोबा जी ने जेल यात्रा के दौरान अनेक भाषायें सीखीं. उनके जीवन में सादगी तथा परोपकार की भावना कूट-कूटकर भरी थी. अल्पाहारी विनोबा वसुधैव कुटुम्बकम् के प्रबल समर्थक थे. सन्तुलित आहार एवं नियमित दिनचर्या के कारण वे आजीवन सक्रिय रहे. जब उन्हें लगा कि अब यह शरीर कार्य योग्य नहीं रहा, तो उन्होंने ‘सन्थारा व्रत’ लेकर अन्न, जल और दवा त्याग दी. 15 नवम्बर, 1982 को सन्त विनोबा जी का देहान्त हुआ. अपने जीवनकाल में वे ‘भारत रत्न’ का सम्मान ठुकरा चुके थे. अतः वर्ष 1983 में शासन ने उन्हें मरणोपरान्त ‘भारत रत्न’ से विभूषित किया.

September 10th 2019, 5:37 pm

कश्मीर : अतीत से आज तक – भाग एक

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धर्म – रक्षक आध्यात्मिक कश्मीर

नरेन्द्र सहगल

पिछले अनेक वर्षों से मजहबी कट्टरपन, भारत विरोध और हिंसक जिहाद के संस्कारों में पल कर बड़ी हुई कश्मीर घाटी की युवा पीढ़ी को भारत की मुख्य राष्ट्रीय धारा में लाना वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती है. इसके लिए कश्मीर के उज्ज्वल अतीत का इतिहास पढ़ाया जाना अतिआवश्यक है. तभी युवा कश्मीरियों को सनातन (वास्तविक) कश्मीरियत का ज्ञान होगा और वे हिंसक जिहाद के अमानवीय मक्कड़जाल से बाहर निकलकर अपने गौरवशाली अतीत से जुड़ सकेंगे.

नीलमत पुराण में स्पष्ट वर्णन मिलता है कि भारत का प्राय: सारा क्षेत्र एक भयानक जलप्रलय के परिणाम स्वरूप पानी से भर गया था. कालान्तर में भारत के सभी क्षेत्र पानी निकल जाने के कारण जीवन यापन के योग्य हो गए. परंतु भारत के उत्तर में हिमालय की गोद में एक विशाल क्षेत्र अभी भी जलमग्न ही था. इस अथाह जल ने एक बहुत बड़ी झील का आकार ले लिया.

कश्यप मुनि ने बसाया कश्मीर

तत्पश्चात् इस झील में ज्वालामुखी फटने जैसी क्रिया हुई. झील के किनारे वाली पर्वतीय चोटियों में अनेक दरारें पड़ने से सारा पानी बाहर निकल गया. एक सुंदर स्थान उभर कर सामने आया. क्योंकि यह स्थान (देश) अग्नि की शक्ति (ज्वालामुखी) से बना था, पौराणिक मतानुसार अग्नि की शक्ति ‘सती’ है. इसलिए तत्कालीन भूमि विशेषज्ञों ने इस स्थान का नाम सतीदेश (वर्तमान कश्मीर) रख दिया.

इसके पश्चात महर्षि कश्यप मुनि ने इस भू-खंड को लोगों के निवास योग्य बनाने का निश्चय करके अपने श्रमिक दल के साथ पर्वतों की कटाई तथा भूमि को समतल करने का काम प्रारंभ कर दिया. सारा कार्य सफलतापूर्वक संपन्न हो गया, परंतु पानी को स्थाई रूप से बहने का मार्ग देने के लिए एक नदी की आवश्यकता थी. कश्यप मुनि ने शंकर से सहायता मांगी.

शंकर ने तुरंत नदी बनाने के लिए विशेषज्ञों का दल भेजा. कश्यप मुनि ने खुदाई कार्य का उद्घाटन करने के लिए शंकर से ही आग्रह किया. शंकर ने अपने त्रिशूल से धरती में पहले चोट करके एक वितस्ति (बालिश्त) जितनी भूमि खोदकर खुदाई अभियान प्रारंभ कर दिया. अतः वितस्ति जितने स्थान से निकलने के कारण इस नदी का नाम ‘वितस्ता नदी’ (वर्तमान झेलम नदी) पड़ गया.

इस नदी के प्रवाह ने रास्ते में आने वाले बड़े-बड़े पत्थरों को हटाकर, तोड़कर अपना मार्ग स्वयं बना लिया और अनेक क्षेत्रों की प्यास बुझाती हुई, भूमि को उपजाऊ बनाती हुई, सिंधु नदी में जा में मिली. इसी सिंधु नदी के किनारे भारतीय संस्कृति विकसित हुई. इसी सिंधु क्षेत्र से हिन्दू नाम बना. आज भी इस क्षेत्र के लोग ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ करते हैं.

कश्मीर का प्रथम राजा नील

जब यह क्षेत्र पूरी तरह समतल हो गया, वितस्ता नदी के किनारे घाट इत्यादि तैयार हो गए, तब कश्यप मुनि ने भारत के अन्य क्षेत्रों से लोगों को यहां आकर बसने का विधिवत निमंत्रण भेजा. इस निमंत्रण को शिरोधार्य करके भारत के कोने-कोने से सभी वर्गो एवं जातियों के लोग यहां आकर बसने के लिए तैयार हो गए. उद्योगपति, कृषक, श्रमिक, वैद्य, ग्रह एवं मार्ग शिल्पी इत्यादि ने भूमि आरक्षण के लिए प्रयास प्रारंभ कर दिए.

योग्यतानुसार, नियमानुसार एवं क्रमानुसार कश्यप के ऋषि मण्डल ने सब को भूमि आबंटित कर दी. कश्यप मुनि की नाग जाति तथा अन्य वर्गों के लोगों ने नगर – ग्राम बसाए और देखते ही देखते सुंदर घर, मंदिर आदि बन गए. निर्माण एवं विकास के इस विस्तृत कार्य में कहीं कोई जातीय अथवा मजहबी व्यवधान नहीं पड़ा.

सारा निर्माण कार्य संपन्न हो. जाने के पश्चात अब प्रश्न खड़ा हुआ कि इस प्रदेश का शासन किसे सौंपा जाए.  इस नए सती देश (कश्मीर) की जनता ने सर्वसम्मति से कश्यप मुनि के पुत्र नील को राजा घोषित कर दिया. इस प्रकार नील कश्मीर के प्रथम राजा हुए. उन्होंने बहुत ही कुशलता से शासन को सम्भाला.

हिमालय की गोद में बसे इस प्रदेश के मनोरम सौंदर्य के समाचारों ने अनेक लोगों को यहां आकर बसने के लिए आकर्षित किया. भिन्न-भिन्न जातियों, मजहबों, क्षेत्रों के लोग यहां आकर रहने लगे. राजा नील ने सबका स्वागत किया. उन्हें अनेक प्रकार की सुविधाएं प्रदान की. चारों और शांति, भाईचारा, सहअस्तित्व और सामाजिक विकास का वातावरण था.

सर्वधर्म समभाव की धरती

सनातन कश्मीर घाटी में अनेक मतपंथ जन्मे और फले. परंतु कभी भी अपना मत दूसरे पर थोपने की वृत्ति तथा आक्रामक मानसिकता पनप नहीं सकी. इन सभी मतों में परस्पर संघर्ष कभी नहीं हुआ. सर्वप्रथम कश्मीर में नीलमुनि द्वारा नागपूजा मत पर आधारित दर्शन का विकास हुआ. पूजा का यह मार्ग निर्बाध गति से चला.

सम्राट अशोक के समय (ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के मध्य) कश्मीर में बौद्ध मत का प्रवेश हुआ. अहिंसा, सुख शांति इत्यादि बौद्ध सिद्धांतों का प्रचार/प्रसार हुआ. अशोक के समय अनेक बौद्ध विहार, मठ-मंदिरों का निर्माण हुआ. विश्व के अनेक देशों में कश्मीरी युवा बौद्ध भिक्षु बन कर मानवता की प्यास बुझाने गए.

कश्मीर शैवदर्शन का उद्गम स्थान है. शैवदर्शन कश्मीर जीवन की आत्मा है. कश्मीर की धरती पर जन्मे और विकसित हुए इस शैवदर्शन में मानव के संपूर्ण जीवन की कल्पना है, उसकी उन्नति का मार्ग है. शिव के स्वरूप में घर-गृहस्थी, कृषि, धर्मयुद्ध, गणतंत्र, योग, आत्मिक विकास, त्याग, शस्त्र विद्या और समन्यवय जैसे विषय और क्षेत्र समा गए हैं.

शिक्षा का सर्वोच्च केंद्र

कश्मीरी विद्वान आनंद कौल अपनी पुस्तक ‘द कश्मीरी पंडित’ में लिखते हैं- “भारत में पुरातन काल से ही काशी और कश्मीर शिक्षा के लिए विख्यात थे. परंतु कश्मीर काशी से भी आगे निकल गया . काशी के विद्वानों को अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए कश्मीर में आना पड़ता था. आज भी काशी के लोग बच्चों को अक्षर – ज्ञान समारोह के समय पवित्र जनेऊ सहित कश्मीर दिशा की ओर सात पग चलने को कहते हैं. कश्मीर की भूमि भारतीय संस्कृति की उद्गमस्थली रही है. पूरे विश्व में फैली भारतीय जीवन – पद्धति के प्रचार/प्रसार में कश्मीर का विशेष योगदान है.”

प्रसिद्ध विद्वान अल्बरूनी जिसने सन 1102 ईसवी में आक्रान्ता महमूद गजनवी के साथ उत्तर भारत का भ्रमण किया था, लिखता है- “कश्मीर हिन्दू विद्वानों की सबसे बड़ी पाठशाला है. दूरस्थ देशों के लोग यहां संस्कृत सीखने आते थे और उनमें से कई कश्मीर घाटी के सौंदर्य जलवायु से चमत्कृत होकर यहीं के ही हो जाते थे.

उल्लेखनीय है कि श्री गुरु नानक देव जी के पुत्र और उदासीन पंथ के संस्थापक बाबा श्रीचंद्र ने भी श्रीनगर के निकट एक बड़े संस्कृत महाविद्यालय में प्रशिक्षण प्राप्त किया था. मुगल शहज़ादा मुहम्मद दारा शिकोह भी कश्मीर में संस्कृत का अध्ययन करने आया था.

सनातन कश्मीर में अनेकों मतों – पंथों की उत्पत्ति हुई. अनेकों सामाजिक परिवर्तन हुए. परंतु इन परिवर्तनों में किसी का अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ. नए और पुराने के समन्वय के साथ हुआ परिवर्तन किसी का विनाश नहीं करता. ‘सभी मतों का आदर’ यही वह भारतीय जीवन मूल्य है जिसे हमने कश्मीर की सीमा में कश्मीरियत कहा है.

आज भले ही कश्मीर और कश्मीरियत पर विदेशी और विधर्मी रंग चढ़ा कर उसके सनातन उज्ज्वल स्वरूप को क्षत-विक्षत कर दिया गया है, परंतु यह एक ध्रुव सत्य है कि कश्मीरियत कभी हिन्दू/भारतीय संस्कृति ही थी. आज जो लोग अपने ही पूर्वजों की सांस्कृतिक धरोहर को समाप्त करने पर तुले हैं वे भी हिन्दू पूर्वजों की ही संताने हैं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

September 10th 2019, 3:58 am

10 सितम्बर / पुण्य तिथि – प्रेमावतार नीम करौली बाबा

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नई दिल्ली. बात बहुत पुरानी है. अपनी मस्ती में एक युवा योगी लक्ष्मण दास हाथ में चिमटा और कमण्डल लिये फरुर्खाबाद (उत्तर प्रदेश) से टूण्डला जा रही रेल के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में चढ़ गया. गाड़ी कुछ दूर ही चली थी कि एक एंग्लो इण्डियन टिकट निरीक्षक वहाँ आया. उसने बहुत कम कपड़े पहने, अस्त-व्यस्त बाल वाले बिना टिकट योगी को देखा, तो क्रोधित होकर अंट-शंट बकने लगा. योगी अपनी मस्ती में चूर था. अतः वह चुप रहा. कुछ देर बाद गाड़ी नीब करौरी नामक छोटे स्टेशन पर रुकी. टिकट निरीक्षक ने उसे अपमानित करते हुए उतार दिया. योगी ने वहीं अपना चिमटा गाड़ दिया और शान्त भाव से बैठ गया. गार्ड ने झण्डी हिलाई, पर गाड़ी बढ़ी ही नहीं. पूरी भाप देने पर पहिये अपने स्थान पर ही घूम गये. इंजन की जाँच की गयी, तो वह एकदम ठीक था. अब तो चालक, गार्ड और टिकट निरीक्षक के माथे पर पसीना आ गया. कुछ यात्रियों ने टिकट निरीक्षक से कहा कि बाबा को चढ़ा लो, तब शायद गाड़ी चल पड़े. मरता क्या न करता, उसने बाबा से क्षमा माँगी और गाड़ी में बैठने का अनुरोध किया. बाबा बोले - चलो तुम कहते हो, तो बैठ जाते हैं. उनके बैठते ही गाड़ी चल दी. इस घटना से वह योगी और नीब करौरी गाँव प्रसिद्ध हो गया. बाबा आगे चलकर कई साल तक उस गाँव में रहे और नीम करौरी बाबा या बाबा नीम करौली के नाम से विख्यात हुए. वैसे उनका मूल नाम लक्ष्मीनारायण शर्मा था तथा उनका जन्म अकबरपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था. बाबा ने अपना मुख्य आश्रम नैनीताल (उत्तरांचल) की सुरम्य घाटी में कैंची ग्राम में बनाया. यहाँ बनी रामकुटी में वे प्रायः एक काला कम्बल ओढ़े भक्तों से मिलते थे. बाबा ने देश भर में 12 प्रमुख मन्दिर बनवाये. उनके देहान्त के बाद भी भक्तों ने 9 मन्दिर बनवाये हैं. इनमें मुख्यतः हनुमान् जी की प्रतिमा है. बाबा चमत्कारी पुरुष थे. अचानक गायब या प्रकट होना, भक्तों की कठिनाई को भाँप कर उसे समय से पहले ही ठीक कर देना, इच्छानुसार शरीर को मोटा या पतला करना..आदि कई चमत्कारों की चर्चा उनके भक्त करते हैं. बाबा का प्रभाव इतना था कि जब वे कहीं मन्दिर स्थापना या भण्डारे आदि का आयोजन करते थे, तो न जाने कहाँ से दान और सहयोग देने वाले उमड़ पड़ते थे और वह कार्य भली-भाँति सम्पन्न हो जाता था. जब बाबा को लगा कि उन्हें शरीर छोड़ देना चाहिये, तो उन्होंने भक्तों को इसका संकेत कर दिया. इतना ही नहीं उन्होंने अपने समाधि स्थल का भी चयन कर लिया था. 09 सितम्बर, 1973 को वे आगरा के लिये चले. वे एक कॉपी पर हर दिन रामनाम लिखते थे. जाते समय उन्होंने वह कापी आश्रम की प्रमुख श्रीमाँ को सौंप दी और कहा कि अब तुम ही इसमें लिखना. उन्होंने अपना थर्मस भी रेल से बाहर फेंक दिया. गंगाजली यह कह कर रिक्शा वाले को दे दी कि किसी वस्तु से मोह नहीं करना चाहिये. आगरा से बाबा मथुरा की गाड़ी में बैठे. मथुरा उतरते ही वे अचेत हो गये. लोगों ने शीघ्रता से उन्हें रामकृष्ण मिशन अस्पताल, वृन्दावन में पहुँचाया, जहाँ 10 सितम्बर, 1973 (अनन्त चतुर्दशी) की रात्रि में उन्होंने देह त्याग दी. बाबा की समाधि वृन्दावन में तो है ही, पर कैंची, नीब करौरी, वीरापुरम (चेन्नई) और लखनऊ में भी उनके अस्थि कलशों को भू समाधि दी गयी. उनके लाखों देशी एवं विदेशी भक्त हर दिन इन मन्दिरों एवं समाधि स्थलों पर जाकर बाबा का अदृश्य आशीर्वाद ग्रहण करते हैं.  

September 9th 2019, 5:21 pm

केरल – शबरीमला श्राइन के मंदिरों को नियंत्रित करने के लिए नए नियम बना रही वामपंथी सरकार

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शबरीमला में भक्तों की भावना को पुलिस का उपयोग कर कुचलने वाली केरल की वामपंथी सरकार क्या मंदिर पर शिंकजा कसने की तैयारी कर रही है? क्या उसकी नजर मंदिर की आय पर है? यह सवाल इसलिए खड़ा हुआ है, क्योंकि केरल की सरकार शबरीमला श्राइन के 150 से अधिक मंदिरों के लिए नया नियम-कानून तैयार कर रही है. राज्य सरकार ने स्वयं सर्वोच्च न्यायालय में यह जानकारी दी है.

राज्य सरकार की इस कवायद पर कई लोगों ने तीखी आपत्ति दर्ज कराई है. त्रावणकोर देवासम बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष पी. गोपालकृष्णन ने कहा कि मंदिरों और उनके राजस्व पर कब्ज़ा करने के लिए सरकार यह कदम उठा रही है. हालांकि, केरल सरकार के मंत्री के. सुरेंद्रन ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि मंदिर के शासन-व्यवस्था से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी.

शबरीमला मंदिर महिलाओं के प्रवेश को लेकर काफी चर्चा में रहा था. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने के बाद लाखों श्रद्धालु (जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं) सड़क पर उतरे थे. केरल की वामपंथी सरकार ने इस विरोध-प्रदर्शन को दबाने के लिए पुलिस का भरपूर उपयोग किया था. हालांकि, राज्य सरकार का कहना है कि नए नियमों का इस विवाद से कोई लेना-देना नहीं है.

केरल सरकार के अधिवक्ता जी. प्रकाश ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि न सिर्फ़ शबरीमला, बल्कि त्रावणकोर देवासम बोर्ड के अंतर्गत आने वाले शबरीमला हॉल श्राइन के 150 से अधिक मंदिरों के लिए एक नया विधान बनाया जा रहा है. बोर्ड 1240 मंदिरों का शासन-प्रबंध देखता है.

मंदिरों के लिए नियम-कानून बनाने की प्रक्रिया ड्राफ्टिंग के अंतिम चरण में है. जी. प्रकाश ने यह भी बताया कि इसका शबरीमला मंदिर में महिलाओं द्वारा पूजा-पाठ या प्रवेश करने से कोई लेना-देना नहीं है. सरकार इसे मुख्य रूप से शासन-प्रबंधन से संबंधित कदम बता रही है.

बोर्ड ने निर्णय लिया है कि सभी 1,240 मंदिरों के लिए पूजा संबंधित साजो-सामान की सेंट्रलाइज्ड यानि केंद्रीकृत खरीद की जाएगी और उन्हें सभी मंदिरों में बांटा जाएगा. इससे पहले मंदिर पूजा साजो-सामान की खरीद के लिए टेंडर जारी करते थे और बोली लगाई जाती थी. अब बोर्ड इसके लिए स्टोर्स की स्थापना करने जा रहा है, जिसका प्रबंधन उसके कर्मचारी करेंगे.

साभार – Opindia

September 9th 2019, 10:31 am

गाय हमारी सृष्टि का आधार है – अजित प्रसाद महापात्रा

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मुजफ्फरनगर/शामली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय गौ सेवा सह प्रमुख अजित प्रसाद महापात्रा ने कहा कि गाय हमारी सृष्टि का आधार है. प्रकृति के पंचतत्व का उपचार गौ मूत्र से ही सम्भव है. विदेशी कुचक्र के कारण ही हम अपनी संस्कृति को भूलकर गौ संवर्द्धन एवं खेती में गाय के गोबर व गौमूत्र के उपयोग से दूर होते जा रहे हैं. यदि इसे नहीं रोका गया तो भारतीय संरचना बिगड़ जाएगी.

स्थानीय वृंदावन गार्डन में आयोजित गौ सेवा संगम कार्यक्रम में मुख्य वक्ता अजित प्रसाद महापात्रा ने कहा कि विदेशी ताकतें अपने लाभ और कुचक्र के लिये भारत की भूमि, पर्यावरण एवं प्रकृति को विषैला बनाने पर तुले हुए हैं. इसी कुचक्र के कारण देश की उर्वरक भूमि पर यूरिया, हानिकारक पेस्टीसाइड्स और विषैले कैमिकल डालकर खेती की जा रही है. इससे हमें विषैला अन्न और भोजन मिल रहा है और गंभीर बीमारियां बढ़ रही हैं. इसे रोकने के लिये गौ संवर्द्धन और खेती में गाय का गोबर और गौमूत्र का प्रयोग बढ़ाना जरुरी है. उन्होंने कहा कि प्राचीन युग में आम आदमी, किसान गौमूत्र व गोबर की उपयोगिता से भलीभांति परिचित थे. गौ आधारित खेती पेस्टीसाइड्स आधारित खेती से दस गुना सस्ती पड़ती है.

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि महर्षि पातंजलि अन्तर्राष्ट्रीय योग विद्यापीठ के स्वामी कर्मवीर जी महाराज ने कहा कि चिकित्सक भी जिन गंभीर बीमार मरीजों को जवाब दे देते हैं, उन्हें भी गौमूत्र की सहायता से बचाया जा सका है. गाय का जीवन में मां से अधिक महत्त्व है. मां एक बार दूध पिलाती है, लेकिन गाय हमें जीवन पर्यन्त दूध पिलाती रहती है. विदेशी नस्ल की गाय के दूध में वह गुण नहीं हैं जो देशी नस्ल की हमारी गायों के दूध में होते हैं. यह दूध अमृत के समान है.

कार्यक्रम में गौ सेवा, गौ पालन, गौ संरक्षण, गौ आधारित कृषि के संबंध में जानकारी दी गई. कार्यक्रम की अध्यक्षता शुक्रतीर्थ स्थित गौडीय मठ के स्वामी भक्ति भूषण गोविन्द महाराज ने की.

अखिल भारतीय गौ सेवा प्रमुख अजित महापात्रा द्वारा शामली में एक संविदा यंत्र का शुभारम्भ भी किया गया. गोबर से कंडे (उपले) बनाने वाला यह अग्नि संविदा यन्त्र जनपद में अपनी तरह का पहला यन्त्र है. अजित जी ने गौशाला में निवास कर रही गायों का पूजन भी किया.

September 9th 2019, 10:31 am

मोबाइल नेटवर्क बंद तो पोस्टरों के माध्यम से लोगों को धमकी – घाटी में सामान्य हालात से तिलमिलाए आतंकी

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श्रीनगर और दक्षिण कश्मीर के क्षेत्रों में पिछले 2-3 दिनों से आतंकी संगठनों के पोस्टर दिखायी देने लगे हैं. इन पोस्टर के माध्यम से हिज्बुल मुजाहिदीन, जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा और अल-बद्र जैसे आतंकी संगठन कश्मीरियों को धमकी दे रहे हैं कि दुकानें बंद रखें, ऑफिस का बायकॉट करें और पूरी तरह शट-डाउन रखा जाए. ये अक्सर सोशल मीडिया के माध्यम से आम जनता को बंद करने, आतंकी के जनाजे में शामिल होने को लेकर धमकियां देते रहे हैं. लेकिन घाटी में मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट बंद होने के कारण आतंकी कुछ कर नहीं पा रहे थे. ऐसे में अब घाटी में पोस्टरों के माध्यम से आम लोगों को धमकियां देना शुरू कर दिया है.

जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने के बाद पाकिस्तान और आतंकी संगठनों को उम्मीद थी कि कश्मीरी इसका जमकर विरोध करेंगे, कश्मीर जल उठेगा. लेकिन एक भी घटना ऐसी नहीं हुई, बल्कि बीता अगस्त महीना कश्मीर के इतिहास में शांतिपूर्ण महीना साबित हुआ. ऑफिसों में उपस्थिति रही, बाज़ार-मंडियां दोबारा खुलने लगी हैं. रोजाना सेब के 1 हजार से ज्यादा ट्रक घाटी से बाहर जा रहे हैं. स्पष्ट है इससे घाटी में सक्रिय आतंकी संगठन और अलगाववादी तिलमिलाए हुए हैं.

रविवार को श्रीनगर में आतंकी संगठन अल-बद्र के पोस्टर दिखायी दिये. जिसमें व्यापारियों और ट्रेडर्स को दुकानें बंद रखने की धमकी दी गयी है और घाटी के पूरी तरह से बंद करने के लिए कहा गया है. साथ ही पुलिस जवानों के परिवारों का भी बायकॉट करने को कहा गया है. बात न मानने पर नतीज़ा भुगतने की धमकी दी है.

इससे पहले दक्षिण कश्मीर में शोपियां सहित कुछ क्षेत्रों में हिज्बुल मुजाहिदीन के पोस्टर भी दिखायी दिये थे. जिसमें हिज्बुल ने डीसी ऑफिस के कर्मचारियों, बैंक कर्मचारियों, सेब व्यापारियों, ट्रक ट्रांसपोर्टर्स और ट्रेडर्स को काम बंद करने की धमकी दी थी. उधर, सुरक्षा एजेंसियां पोस्टर चिपकाने वालों की तलाश में जुट गई हैं, तथा जन सामान्य से न डरने की अपील की जा रही है.

 

September 9th 2019, 9:32 am

चंद्रयान 2 – विक्रम लैंडर की हुई थी हार्ड लैंडिंग, लेकिन लैंडर पूरी तरह सुरक्षित

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इसरो ने एक अच्छी खबर दी है. चंद्रयान-2 का लैंडर विक्रम पूरी तरह सुरक्षित है. विक्रम को जहां लैंड करना था, उसने वहां से कुछ ही दूरी पर हार्ड-लैंडिंग की है, मगर ये टूटा नहीं है. ऑर्बिटर ने उसकी थर्मल इमेज क्लिक की थी. इसका अर्थ यह है कि लैंडर में कोई टूट-फूट नहीं हुई है. और वह पूरी तरह सुरक्षित है. लैंडर को कोई नुक़सान नहीं पहुँचा है. लैंडर का इसरो से संपर्क टूट गया था, जिसके बाद से अभी तक उससे संपर्क साधने के प्रयास जारी हैं. अब इसरो ने बताया है कि विक्रम सुरक्षित है और उससे संपर्क साधने का प्रयास किया जा रहा है.

चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर से संपर्क टूटने के बाद बिना उम्मीद खोए इसरो लगातार कोशिश कर रहा है कि किसी तरह लैंडर से ऑर्बिट का संपर्क स्थापित हो सके. ऑर्बिटर द्वारा भेजी गई थर्मल इमेज में विक्रम लैंडर लुनर सरफेस पर सुरक्षित दिखा है.

ऑर्बिटर के ऑन-बोर्ड कैमरे द्वारा भेजी गई तस्वीरों से स्पष्ट हो गया है कि जहां पर लैंडिंग होनी थी, वहां लैंडर की हार्ड लैंडिंग हुई है. यह चांद की सतह पर झुकी हुई स्थिति में है. इसरो के एक अधिकारी ने कहा कि हम यह देखने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं कि क्या लैंडर के साथ संचार फिर से स्थापित किया जा सकता है.

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के प्रमुख के सिवन ने रविवार को कहा था कि चंद्रयान-2 ऑर्बिटर में लगे कैमरों ने लैंडर की मौजूदगी का पता लगाया है. सिवन ने कहा कि लैंडर ने संभवत: ‘हार्ड लैंडिंग की और उसके साथ संपर्क स्थापित करने के प्रयास किए जा रहे हैं.
“लैंडर मॉड्यूल की स्थिति बिना किसी संदेह के साबित करती है कि ऑर्बिटर बिल्कुल सही तरीके से काम कर रहा है. ऑर्बिटर मिशन का मुख्य हिस्सा था क्योंकि इसे एक साल से ज्यादा वक्त तक काम करना है.” ऑर्बिटर के सही ढंग से काम करने से मिशन के 90 से 95 फीसदी लक्ष्य हासिल कर लिए जाएंगे.

 

September 9th 2019, 9:32 am

पर्यावरण संरक्षण के लिए सभी संगठन मिलकर करेंगे काम – दत्तात्रेय होसबले

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पेड़ लगाओ, प्लास्टिक छोड़ो, जल बचाओ को बनाएंगे समाज का जनांदोलन सीमा क्षेत्र के प्रश्नों के समाधान के लिए समाज को जागरुक करने का संकल्प किया पुष्कर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तीन दिवसीय समन्वय बैठक 9 सितंबर सायं को संपन्न होगी. बैठक में 36 संगठनों के 195 कार्यकर्ता उपस्थित थे. समन्वय बैठक में ना ही कोई प्रस्ताव पारित होता है, ना ही यह कोई निर्णय लेने का मंच है. सभी संगठन स्वतंत्र एवं स्वायत्त हैं. बैठक का हेतू जानकारियों एवं अनुभवों का आदान-प्रदान, एक दूसरे के प्रयोगों-उपलब्धियों से प्रेरणा प्राप्त करना है. गत वर्ष मंत्रालय बैठक में सभी संगठनों ने ‘पेड़ लगाओ-जल बचाओ-प्लास्टिक का उपयोग कम करें’ का लक्ष्य लेकर काम करना प्रारंभ किया है तथा समाज जीवन में आ रहे सांस्कृतिक क्षरण को रोकने के लिए भी प्रयास प्रारंभ किये हैं. इन सभी विषयों पर सबने अपने अपने संगठनों में किये जा रहे प्रयासों की जानकारी दी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह दतात्रेय होसबले ने बैठक के अंतिम दिन आयोजित प्रेस वार्ता में जानकारी प्रदान की. उन्होंने कहा कि आगामी समय में मध्यवर्ती क्षेत्र के जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, विकास और संवैधानिक प्रावधानों के क्रियान्वयन सुनिश्चित करना आदि विषयों को लेकर विशेष प्रयास किया जाएगा. सीमावर्ती क्षेत्रों में शिक्षा, विकास, रोजगार के लिए सरकार के साथ समाज का भी दायित्व है, इस भाव को लेकर समाज जागरण, प्रबोधन के कार्यक्रम सभी संगठन लेंगे. उन सीमावर्ती क्षेत्रों में सभी संगठनों द्वारा राष्ट्रभाव जागरण के साथ वहां का समाज सुखी, स्वावलंबी हो, ऐसा प्रयास किया जाएगा. राष्ट्रीय नागरिक पंजीयिका (एन आर सी) का उन्होंने स्वागत किया और उसमें जो कमियां रह गई हैं, उनको दूर करने का उन्होंने आवाहन किया. आरक्षण पर पूछे गये प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि संघ आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था का समर्थन करता है, जब तक समाज में भेदभाव है तब तक यह व्यवस्था चलनी चाहिए. मॉब लिंचिंग के प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि हम किसी भी प्रकार की हिंसा का विरोध करते हैं और सभी को कानून का पालन करना चाहिए. उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार ने हाल ही में जम्मू एवं कश्मीर से धारा 370 को हटा दिया. इससे समूचे देश में खुशी की लहर है. अब इस क्षेत्र में विकास की जरूरत है. संघ सहित सभी संगठन बीते कई साल से एक राष्ट्र, एक संविधान, एक निशान की मांग करते रहे हैं. कश्मीर और लद्दाख में संघ द्वारा किए जा रहे सेवा कार्यों ने वहां राष्ट्रभाव को मजबूत किया है. कश्मीर में कुछ राजनेताओं की गिरफ्तारियां हुई हैं, सरकार ने तथ्यों, सबूतों के आधार पर राष्ट्रहित में ही फैसला लिया है. पूर्ववर्ती सरकारें तो कुर्सी बचाने के लिए किसी भी हद तक चली जाती थीं. स्वदेशी उत्पादों को लेकर स्वदेशी जागरण मंच द्वारा चलाए गए आंदोलनों के परिणाम स्वरूप चीनी माल की बिक्री में गिरावट देखी जा रही है. स्वदेशी की यह भावना केवल अभियानों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए.

September 9th 2019, 7:58 am

शिक्षा में सेवाभाव और देशप्रेम का समावेश आवश्यक है – ब्रह्माजी राव

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गुवाहाटी. पूर्वोत्तर जनजाति शिक्षा समिति की साधारण सभा की बैठक रविवार को असम प्रकाशन भारती कार्यालय के सभागृह में सम्पन्न हुई. पूर्वोत्तर जनजाति शिक्षा समिति के अध्यक्ष सदादत्त ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर सभा का शुभारंभ किया. शंकरदेव विद्या निकेतन की छात्राओं द्वारा वन्दना प्रस्तुत की. राष्ट्र तथा समाज के कल्याण में अपना योगदान देने वाली दिवंगत आत्माओं को श्रद्धांजलि दी गई.

सांचीराम पायंग ने मंचासीन महानुभाओं का परिचय करवाया. विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के राष्ट्रीय मंत्री ब्रह्माजी राव ने डॉ. भूपेन हजारिका की मानवता एवं सेवा भावना का स्मरण कराया. आज की शिक्षा व्यवस्था में असम के वीर पुत्र लाचित बरफुकन के देशप्रेम का आदर्श नई पीढ़ी में जगाने का आह्वान किया. सार्थक जीवन जीने के लिए शिक्षा और धन के अलावा कृतज्ञता, सेवा का भाव और देशप्रेम अति आवश्यक है. शिक्षा को देश एवं विश्व कल्याण के साथ जोड़ने से ही देश तथा समाज का सर्वांगीण विकास सम्भव होगा. उन्होंने बताया कि पूर्वोत्तर जनजाति शिक्षा समिति पूर्वोत्तर क्षेत्र के दुर्गम क्षेत्र में ज्ञान का प्रकाश फैला रही है. वर्तमान में 87 विद्यालय और 600 एकल विद्यालय चल रहे हैं. अपने कार्य का आधार कार्यकर्ता और समाज है. अगर कार्यकर्ता समर्पित और सेवा भाव से कार्य करेंगे और समाज के बन्धु ज्यादा से ज्यादा सहयोग करेंगे तो अपना कार्य विस्तार तेजी से होगा.

इसके बाद पूर्वोत्तर जनजाति शिक्षा समिति के मंत्री सांचीराम पायंग ने 2018-19 का वार्षिक प्रतिवेदन रखा. इसे सभा ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया.

पूर्वोत्तर जनजाति शिक्षा समिति के अध्यक्ष सदादत्त ने कहा कि समिति समाज के सहयोग से जनजाति समाज के उत्थान के लिए संकल्पबद्ध और कार्यरत रहेगी.

 

September 9th 2019, 4:27 am

संघ व सामाजिक संस्थाओं के कार्यकर्ताओं की हत्या के विरोध में संघ का प्रदर्शन

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रायपुर. जनजाति समाज के सामाजिक कार्यकर्ताओं, जिसमें संघ के स्वयंसेवक भी शामिल हैं, इन कार्यकर्ताओं की हत्या के विरोध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने विशाल मौन प्रदर्शन किया. रविवार, दिनांक 08 सितंबर, 2019 को राम मंदिर प्रांगण में विशाल सभा का आयोजन हुआ. सह प्रांत संघचालक डॉक्टर पूर्णेन्दु सक्सेना ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सभी का ध्यान छत्तीसगढ़ के जनजाति क्षेत्र में हो रही हिंसात्मक गतिविधियों की तरफ आकृष्ट कराना चाहता है. हाल ही में दुर्गु कोंदल क्षेत्र में एक पूर्व सरपंच दादू सिंह कोरेटिया जी की उनके घर में घुसकर हत्या कर दी गई. दादू सिंह जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक एवं सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता थे.

यह घटना अपने आप में ही सबके हृदय को विदीर्ण करने वाली है. परंतु ऐसा भी नहीं है, कि यही एकमात्र घटना हुई हो. हाल ही में संघ एवं अन्य सामाजिक संस्थाओं से जुड़े कई कार्यकर्ताओं को धमकियां दी गई हैं, उनके साथ हिंसात्मक व्यवहार किया गया है, हत्याएं हुई हैं एवं गांव छोड़कर जाने की स्थितियां उत्पन्न की गई हैं.

संघ इस बात का आग्रही है कि समाज में अलग-अलग मत रखने वाले लोग भी परस्पर सद्भाव, सम्मान और सहकार के साथ रहें. परंतु गत कुछ समय से होने वाली घटनाओं को देखकर प्रतीत होता है कि जनजातीय क्षेत्र के जनजातीय सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक नेतृत्व की योजनाबद्ध हत्याएं करके जनजाति समाज को कमजोर करने की साजिश चल रही है. विभिन्न जाति एवं जनजातीय समाजों को एक दूसरे के विरोध में खड़ा किया जा रहा है और परंपरागत धार्मिक उत्सवों और यात्राओं को मिलजुल कर मनाने की परंपरा में अवरोध उत्पन्न किया जा रहा है. यह भी ध्यान में आता है कि यह कार्य राष्ट्र विरोधी शक्तियां मिलकर कर रही हैं. इन शक्तियों के अंतर्संबंध की जांच होनी चाहिए और जिस प्रकार से यह षड्यंत्र क्षेत्र में अप्रिय स्थितियां उत्पन्न कर रहा है, उसका समाधान होना चाहिए.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अपेक्षा है कि घटनाओं की जांच के पश्चात आरोपियों के खिलाफ उचित दंडात्मक कार्रवाई होगी.

इस अवसर पर बालक दास जी महाराज, स्वामी प्रपन्नाचार्य जी, सहित अन्य संतों के साथ ही प्रांत संघचालक विसरा राम जी यादव, सह प्रांत संघचालक डॉक्टर पूर्णेन्दु सक्सेना, प्रांत कार्यवाह चंद्रशेखर वर्मा जी, सह प्रांत कार्यवाह गोपल यादव जी, सह प्रांत कार्यवाह चंद्रशेखर देवांगन जी, प्रांत प्रचारक प्रेम शंकर जी, कार्यकम के संयोजक सुशील यादव जी, मंचासीन थे.

राम मान्दिर से तेलिबंधा तालाब तक विशाल मौन रैली निकाल कर राज्यपाल, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री व छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के नाम जिलाधीश को ज्ञापन सौंपा गया. मौन प्रदर्शन में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह सहित अन्य गणमान्यजन, जन प्रतिनिधि, संस्थाओं के प्रतिनिधि, बड़ी संख्या में स्थानीय लोग उपस्थित रहे.

September 9th 2019, 3:57 am

भारतीय ज्ञान का खजाना – 11

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‘सिरी भूवलय’ – एक अदभुत एवं चमत्कारिक ग्रन्थ

अंकों में लिखा हुआ अद्भुत ग्रंथ, जिसे 18 लिपियों के माध्यम से 718 भाषाओं में पढ़ा जा सकता है

हमारे भारत के ज्ञान भण्डार में इतनी जबरदस्त एवं चमत्कारिक बातें छिपी हुई हैं, कि उन्हें देख-सुन-पढ़ कर हमारा मन हक्का-बक्का हो जाता है…! हम यह सोचने पर विवश हो जाते हैं कि आखिर यह विराट ज्ञान हमारे पास कहां से आया. फिर अगला विचार आता है कि जब उस प्राचीनकाल में यह जबरदस्त ज्ञानभंडार हमारे पास था, तो अब क्यों नहीं है..? यह ज्ञान कहां चला गया..? ऐसे प्रश्न लगातार हमें सताते रहते हैं.

इसी श्रेणी का एक अदभुत ग्रन्थ है – ‘सिरी भूवलय’ अथवा श्री भूवलय. जैन मुनि आचार्य कुमुदेंदू द्वारा रचित. जब कर्नाटक में राष्ट्रकूटों का शासन था, जब मुस्लिम आक्रांता दूर-दूर तक भारत में नहीं थे और सम्राट अमोघ-वर्ष नृपतुंग (प्रथम) का शासनकाल था, उस कालखंड का यह ग्रन्थ है. अर्थात् यह ग्रन्थ सन् 820 से 840 के बीच कभी लिखा गया है.

पिछले एक हजार वर्ष से यह ग्रन्थ गायब था. कहीं-कहीं इस ग्रन्थ का उल्लेख मिलता था, परन्तु यह ग्रन्थ विलुप्त अवस्था में ही था. यह ग्रन्थ कैसे मिला, इसके पीछे भी एक मजेदार किस्सा है –

राष्ट्रकूट राजाओं के कालखंड में किसी मल्लीकब्बेजी नामक स्त्री ने इस ग्रन्थ की एक प्रति की नक़ल बना ली और अपने गुरु माघनंदिनी को शास्त्रदान किया. इस ग्रन्थ की प्रति धीरे-धीरे एक हाथ से दूसरे हाथ होते हुए सुप्रसिद्ध आयुर्वेद चिकित्सक धरणेन्द्र पंडित के घर पहुंची. धरणेन्द्र पंडित, बंगलौर – तुमकुर रेलवे मार्ग पर स्थित डोड्डा बेले नामक छोटे से गांव में रहते थे. इस ग्रन्थ के बारे में भले ही उन्हें अधिक जानकारी नहीं थी, परन्तु इसका महत्त्व उन्हें अच्छे से मालूम था. इसीलिए वे अपने मित्र चंदा पंडित के साथ मिलकर ‘सिरी भूवलय’ नामक ग्रन्थ पर कन्नड़ भाषा में व्याख्यान देने लगे.

इन व्याख्यानों के कारण, बंगलौर के ‘येलप्पा शास्त्री’ नामक युवा आयुर्वेदाचार्य को यह पता चला कि यह ग्रन्थ धरणेन्द्र शास्त्री के पास है. येलप्पा शास्त्री ने इस ग्रन्थ के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था. इसलिए उनका निश्चय पक्का था कि उन्हें यह ग्रन्थ प्राप्त करना ही है. ऐसे में इस ग्रन्थ की हस्तलिखित प्रति को हासिल करने के लिए येलप्पा शास्त्री ने डोड्डाबेले जाकर धरणेन्द्र शास्त्री की भतीजी से विवाह भी किया.

आगे चलकर 1913 में धरणेन्द्र शास्त्री का निधन हो गया. अपने जीवन का अधिकांश समय विद्या अभ्यास को देने के कारण उनके घर की आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब हो चुकी थी. इसलिए उनके पुत्र ने, धरणेन्द्र शास्त्री की कुछ वस्तुओं को बेचने का निर्णय लिया. इन्हीं वस्तुओं में ‘सिरी भूवलय’ नामक ग्रन्थ भी था. ज़ाहिर है कि येलप्पा शास्त्री ने खुशी-खुशी यह ग्रन्थ खरीद लिया. इसके लिए उन्हें अपनी पत्नी के गहने भी बेचने पड़े. परन्तु यह ग्रन्थ हाथ लगने के बावजूद शास्त्रीजी को इस ग्रंथ का गूढ़ार्थ समझ में नहीं आ रहा था. 1270 पृष्ठों के इस हस्तलिखित ग्रन्थ में सब कुछ रहस्यमयी था. आगे चलकर 1927 में प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी करमंगलम श्रीकंठाय्याजी बंगलूर पधारे. उनकी सहायता से इस ग्रंथ में झांकने का एक छोटासा झरोखा मिला.

इस हस्तलिखित में दी गई जानकारी के आधार पर प्रयास करते-करते, उसमें दी गई सांकेतिक जानकारी का तोड़ निकालने में उन्हें लगभग चालीस वर्ष लग गए. सन् 1953 में कन्नड़ साहित्य परिषद् ने इस ग्रन्थ का पहली बार प्रकाशन किया. ग्रन्थ के संपादक थे – येलप्पा शास्त्री, करमंगलम श्रीकंठाय्या एवं अनंत सुब्बाराव. इन तीनों में अनंत सुब्बाराव एक तकनीकी व्यक्ति थे. इन्होंने ही पहले कन्नड़ टाईपराइटर का निर्माण किया था.

आखिर इस ग्रन्थ में इतना महत्त्वपूर्ण क्या था कि जिसके लिए कई लोग अपना पूरा जीवन इस पर निछावर करने के लिए तैयार थे…?

यह ग्रन्थ, अन्य ग्रंथों की तरह एक ही लिपि में नहीं लिखा गया है, अपितु अंकों में लिखा गया है. यह अंक भी 1 से 64 के बीच ही हैं. ये अंक अथवा आंकड़े एक विशिष्ट पद्धति से पढ़ने पर एक विशिष्ट भाषा में, विशिष्ट ग्रन्थ पढ़ सकते हैं. ग्रन्थ के रचयिता अर्थात् जैन मुनी कुमुदेंदू के अनुसार इस ग्रन्थ में 18 लिपियां हैं और इसे 718 भाषाओं में पढ़ा जा सकता है.

यह ग्रन्थ अक्षरशः एक विश्वकोश ही है. इस एक ग्रन्थ में अनेक ग्रन्थ छिपे हुए हैं. रामायण, महाभारत, वेद, उपनिषद, अनेक जैन दर्शन के ग्रंथ.. सभी कुछ इस एक ग्रन्थ में समाहित हैं. गणित, खगोलशास्त्र, रसायनशास्त्र, इतिहास, चिकित्सा, आयुर्वेद, तत्वज्ञान जैसे अनेकानेक विषयों के कई ग्रन्थ इस एक ही ग्रन्थ में पढ़े जा सकते हैं.

इसी ग्रन्थ में कहीं ऐसा उल्लेख है कि इसमें 16000 पृष्ठ थे, लेकिन उसमें से केवल 1270 पृष्ठ ही अब उपलब्ध हैं. कुल मिलाकर इसमें 56 अध्याय थे, परन्तु अभी तक केवल तीन अध्यायों का कुछ कुछ अर्थ निकालना ही संभव हुआ है. 18 लिपियों, एवं 718 भाषाओं में से अभी तक केवल कन्नड़, तमिल, तेलुगु, संस्कृत, मराठी, प्राकृत इत्यादि भाषाओं में ही यह ग्रन्थ पढ़ा जा सकता है. किसी विशाल कंप्यूटर विश्वकोश की तरह ही इस ग्रन्थ का स्वरूप है. जब भी इस ग्रन्थ की सम्पूर्ण संहिता का रहस्य खुलेगा, तभी इस की प्रमुख विशेषताएं और भी स्पष्ट हो सकेंगी.

यह ग्रन्थ लिपि में नहीं, बल्कि अंकों में लिखा गया है यह हम देख चुके हैं. इसमें भी केवल 1 से लेकर 64 तक के अंकों का ही उपयोग किया गया है. प्रश्न उठता है कि कुमुदेंदू मुनि ने केवल 64 तक के अंक ही क्यों लिए? क्योंकि 64 एक ध्वनि संकेत है, जिसमें ह्रस्व, दीर्घ एवं लुप्त मिलाकर 27 स्वर; क, च, न, प जैसे 25 वर्गीय वर्ण; य, र, ल, व, जैसे अवर्गीय व्यंजन इत्यादि मिलाकर 64 संख्या आती है.

ये संख्याएँ 27×27 के चौकोन में जमाई जाती हैं. इस प्रकार ये 729 अंक जिस चौकोन में आते हैं, वे ग्रन्थ में दिए गए निर्देशानुसार नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे, आड़े-सीधे सभी प्रकार से कैसे भी लिखे जाएं तो वह उस भाषा के वर्णक्रमानुसार लिखे जा सकते हैं (उदाहरणार्थ – यदि ४ अंक हुआ तो हिन्दी का वर्ण ‘घ’ आएगा, क, ख, ग, घ के अनुसार), इस प्रकार छंदोबद्ध काव्य अथवा धर्म, दर्शन, कला जैसे अनेक प्रकार के ग्रंथ तैयार हो जाते हैं.

कितना विराट है यह सब…! और कितना अदभुत भी…! हमें केवल एक छोटा सा ‘सुडोकू’ चौकोर तैयार करने के लिए कंप्यूटर की सहायता लेनी पड़ती है और इस ग्रन्थ को लगभग हजार, बारह सौ वर्ष पूर्व एक जैन मुनी ने अपनी कुशाग्र एवं अदभुत बुद्धि का परिचय देकर केवल अंकों ही अंकों के माध्यम से विश्वकोश तैयार कर दिया…!

यह पढ़कर सब कुछ तर्क से परे लगता है…!! इस ग्रन्थ का प्रत्येक पृष्ठ 27 x 27 अर्थात् 729 अंकों का बहुत ही विशाल चौकोर है. इस चौकोर को चक्र कहा जाता है. इस प्रकार के 1270 चक्र फिलहाल उपलब्ध हैं. इन चक्रों में 56 अध्याय हैं और कुल श्लोकों की संख्या छह लाख से अधिक है. इस ग्रन्थ के कुल 9 खंड हैं. वर्तमान में उपलब्ध 1270 चक्र पहले खंड के ही हैं, जिसका नाम है – ‘मंगला प्रभृता’. ऐसा कहा जा सकता है कि यह एकमात्र उपलब्ध खंड ही बाकी के 8 खण्डों की विराटता का दर्शन करवा देता है. अंकों के स्वरूप में इसमें 14 लाख अक्षर हैं. इनमें से ही 6 लाख श्लोक तैयार होते हैं.

इस प्रत्येक चक्र में कुछ ‘बंध’ हैं. ‘बंध’ का अर्थ है – इन अंकों को पढ़ने की विशिष्ट पद्धति अथवा एक चक्र के अंदर अंकों को जमाने की पद्धति. दूसरे शब्दों में कहें तो ‘बंध’ का अर्थ है – वह श्लोक, अथवा ग्रन्थ पढ़ने की चाबी (अथवा पासवर्ड). इस ‘बंध’ के कारण ही हमें उन चक्रों के भीतर मौजूद 729 अंकों का पैटर्न समझ में आता है और फिर उस सम्बन्धित भाषा के अनुसार वह ग्रन्थ हमें समझ में आने लगता है. इन बंध के प्रकार भी भिन्न-भिन्न हैं. जैसे – चक्रबंध, नवमांक-बंध, विमलांक-बंध, हंस-बंध, सारस-बंध, श्रेणी-बंध, मयूर-बंध, चित्र-बंध इत्यादि.

पिछले अनेक वर्षों से इस भूवलय ग्रन्थ को ‘डी-कोड’ करने का कार्य चल रहा है. अनेक जैन संस्थाओं ने यह ग्रन्थ एक प्रकल्प के रूप में स्वीकार किया है. इंदौर में जैन साहित्य पर शोध करने के लिए ‘कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ’ का निर्माण किया गया है, जहां पर डॉक्टर महेंद्र कुमार जैन ने इस विषय पर बहुत कार्य किया है. आईटी क्षेत्र के कुछ जैन युवाओं ने इस विषय पर वेबसाईट तो शुरू की ही है, परन्तु साथ ही कंप्यूटर की सहायता से इस ग्रन्थ को ‘डी-कोड’ करने का काम चल रहा है. बहुत ही छोटे पैमाने पर उन्हें सफलता भी प्राप्त हुई है.

परन्तु फिर भी… आज जबकि इक्कीसवीं शताब्दी के अठारह वर्ष समाप्त हो चुके हैं, दुनिया भर के जैन विद्वान इस ग्रन्थ पर काम कर रहे हैं… आधुनिकतम कंप्यूटर अल्गोरिथम का उपयोग करने के बावजूद… इस ग्रन्थ का रहस्य अभी तक पता नहीं चल रहा है..! अभी तक 56 में से केवल तीन अध्याय ही अंशतः ‘डी-कोड’ हो सके हैं… तो फिर आज से हजार, बारह सौ वर्ष पूर्व, आज के समान उपलब्ध आधुनिक साधनों के अभाव में भी जैन मुनी कुमुदेंदू ने इतना क्लिष्ट ग्रन्थ कैसे तैयार किया होगा..? दूसरा प्रश्न है कि मुनिवर्य तो कन्नड़ भाषी थे, फिर उन्होंने अन्य भाषाओं का इतना कठिन अलगोरिदम कैसे तैयार किया होगा? और सबसे बड़ी बात यह है कि मूलतः इतनी कुशाग्र एवं विराट बुद्धिमत्ता उनके पास कहां से आई..?

‘इंडोलॉजी’ के क्षेत्र में भारत से एक नाम बड़े ही आदर से लिया जाता है, श्री एस. श्रीकांत शास्त्री (1904-1974) का. इन्होंने ‘भूवलय’ ग्रन्थ के बारे में लिखा है कि – यह ग्रन्थ कन्नड़ भाषा, कन्नड़ साहित्य, साथ ही संस्कृत, प्राकृत, तमिल, तेलुगु साहित्य के अध्ययन की दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है. यह ग्रन्थ भारत और कर्नाटक के इतिहास पर प्रकाश डालता है. भारतीय गणित का अभ्यास करने के लिए यह ग्रन्थ महत्वपूर्ण सन्दर्भ ग्रन्थ है. भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र एवं जीव विज्ञान के विकास का शोध करने के लिए यह ग्रन्थ उपयोगी है. साथ ही यह ग्रन्थ शिल्प एवं प्रतिमा, प्रतीकों इत्यादि के अभ्यास के लिए भी उपयुक्त है. यदि इसमें रामायण, महाभारत, भगवद्गीता, ऋग्वेद एवं अन्य कई ग्रंथों की डी-कोडिंग कर सकें तो उनकी एवं वर्तमान में उपलब्ध अन्य ग्रंथों की तुलना, शोध की दृष्टि से काफी लाभदायक सिद्ध होगी. नष्ट हो चुके अनेक जैन ग्रन्थ भी इस सिरी भूवलय में छिपे हो सकते हैं.

जब इस ग्रन्थ की जानकारी भारत के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद को मिली, तब उनके सबसे पहले उत्स्फूर्त उद्गार यही थे कि – ‘यह ग्रन्थ विश्व का आठवां आश्चर्य है..’

एक दृष्टि से यही सच भी है. क्योंकि इस संसार के किसी भी देश में कहीं भी कूटलिपि में लिखा गया ‘एक ग्रन्थ में अनेक ग्रन्थ’ जैसा अद्भुत विश्वकोश नहीं मिलता. यह हमारा दुर्भाग्य है कि भारतीय ज्ञान का यह अनमोल खजाना कई वर्षों तक हमारी जानकारी में नहीं था..!

–  प्रशांत पोळ

September 8th 2019, 11:54 pm

09 सितम्बर / जन्मदिवस- भारती पत्रिका के संस्थापक – दादा भाई

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नई दिल्ली. आज सब ओर अंग्रेजीकरण का वातावरण है. संस्कृत को मृत भाषा माना जाता है. ऐसे में गिरिराज शास्त्री जी (दादा भाई) ने संस्कृत की मासिक पत्रिका ‘भारती’ का कुशल संचालन कर लोगों को एक नयी राह दिखाई है. दादा भाई का जन्म नौ सितम्बर, 1919 (अनंत चतुर्दशी) को राजस्थान के भरतपुर जिले के कामां नगर में आचार्य आनंदीलाल जी और चंद्राबाई जी के घर में हुआ था. इनके पूर्वज राजवैद्य थे. कक्षा छह के बाद दादा भाई ने संस्कृत की प्रवेशिका, उपाध्याय तथा शास्त्री उपाधियां ली. यजुर्वेद का विशेष अध्ययन करते हुए उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा भी उत्तीर्ण की. स्वस्थ व सुडौल शरीर होने के कारण लोग इन्हें पहलवान भी कहते थे.

13 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह हो गया था. शिक्षा पूर्णकर वे जयपुर के रथखाना विद्यालय में संस्कृत पढ़ाने लगे. वर्ष 1942 में वे जयपुर में ही स्वयंसेवक बने. व्यायाम के शौकीन दादाभाई को शाखा के खेल, सूर्यनमस्कार आदि बहुत अच्छे लगे और वे संघ में ही रम गये. इसके बाद उन्होंने वर्ष 1943, 44 तथा 45 में तीनों संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया.

स्वाधीनता से पूर्व जयपुर रियासत में संघ पर प्रतिबंध था. अतः शाखा ‘सत्संग’ के नाम से लगती थी. प्रान्त प्रचारक बच्छराज व्यास जी ने सावधानी रखने के लिए प्रमुख कार्यकर्ताओं को उपनाम दे दिये. गिरिराज जी को उन्होंने ‘दादा भाई’ नाम दिया. तब से उनका यही नाम सब ओर प्रचलित हो गया. तृतीय वर्ष कर दादा भाई जयपुर नगर कार्यवाह, नगर प्रचारक तथा सीकर और झुंझनु में जिला प्रचारक रहे. प्रतिबंध काल में नौकरी छूटने से सरकार्यवाह एकनाथ रानाडे जी ने संघ कार्यालय पर उनके रहने की व्यवस्था कर दी. बाबा साहब आप्टे के सुझाव पर दादा भाई के सम्पादन में वर्ष 1950 की दीपावली से देश की प्रथम मासिक संस्कृत पत्रिका ‘भारती’ प्रारम्भ हो गयी.

वर्ष 1953 से 92 तक दादा भाई राजस्थान के प्रान्त कार्यवाह रहे. इस दौरान श्री गुरुजी के 51 वें जन्मदिवस पर हुए धनसंग्रह, गोरक्षा हेतु हस्ताक्षर संग्रह, स्वामी विवेकानंद एवं श्री अरविन्द की जन्मशती, श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन आदि में दादा भाई की सक्रिय भूमिका रही. वर्ष 1975 के प्रतिबंध काल में दादा भाई वेश बदलकर पूरे प्रान्त में घूमते रहे. पुलिस लाख प्रयास करने पर भी उन्हें पकड़ नहीं सकी. वर्ष 1990 में कारसेवा के लिए अयोध्या जाते समय उन्हें मथुरा के नरहोली थाने में 15 दिन तक बन्दी बनाकर रखा गया.

वर्ष 1992 में उनके स्वास्थ्य के ढीलेपन को देखकर उन्हें क्रमशः प्रान्त संपर्क प्रमुख, क्षेत्र प्रचार प्रमुख तथा फिर क्षेत्रीय कार्यकारिणी का सदस्य बनाया गया. वर्ष 1997 से 2006 तक वे ‘पाथेय कण संस्थान’ के अध्यक्ष भी रहे. इस सबके बीच भारती पत्रिका की ओर उनका पूरा ध्यान रहता था.

वर्ष 2009 में उनके 90 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित समारोह में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी, उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत जी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी आदि गण्यमान्य लोग सम्मिलित हुए. इसके बाद दादा भाई की देह शिथिल होती गयी और 13 मार्च, 2012 को ब्रह्ममुहूर्त में उनका प्राणान्त हो गया. दादा भाई ने जीते जी देहदान का संकल्प पत्र भर दिया था. अतः उनकी देह छात्रों के उपयोग हेतु चिकित्सा महाविद्यालय को समर्पित कर दी गयी.

September 8th 2019, 11:54 pm

08 सितम्बर / जन्मदिवस – उदासीन सम्प्रदाय के प्रवर्तक : बाबा श्रीचंद

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नई दिल्ली. हिन्दू धर्म एक खुला धर्म है. इसमें हजारों मत, पंथ और सम्प्रदाय हैं. इस कारण समय-समय पर अनेक नये पंथ और सम्प्रदायों का उदय हुआ है. ये सब मिलकर हिन्दू धर्म की बहुआयामी धारा को सबल बनाते हैं. उदासीन सम्प्रदाय भी ऐसा ही एक मत है. इसके प्रवर्तक बाबा श्रीचंद सिख पंथ के प्रवर्तक गुरु नानकदेव के बड़े पुत्र थे. उनका जन्म आठ सितम्बर, 1449 (भादों शुक्ल 9, वि.संवत् 1551) को सुल्तानपुर (पंजाब) में हुआ था. जन्म के समय उनके शरीर पर विभूति की एक पतली परत तथा कानों में मांस के कुंडल बने थे. अतः लोग उन्हें भगवान शिव का अवतार मानने लगे. जिस अवस्था में अन्य बालक खेलकूद में व्यस्त रहते हैं, उस समय बाबा श्रीचंद गहन वन के एकांत में समाधि लगाकर बैठ जाते थे. कुछ बड़े होने पर वे देश भ्रमण को निकल पड़े. उन्होंने तिब्बत, कश्मीर, सिन्ध, काबुल, कंधार, बलूचिस्थान, अफगानिस्तान, गुजरात, पुरी, कटक, गया आदि स्थानों पर जाकर साधु-संतों के दर्शन किये. वे जहां जाते, वहां अपनी वाणी एवं चमत्कारों से दीन-दुखियों के कष्टों का निवारण करते थे. धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि चारों ओर फैल गयी. बाबा के दर्शन करने के लिए हिन्दू राजाओं के साथ ही मुगल बादशाह हुमायूं, जहांगीर तथा अनेक नवाब व पीर भी प्रायः आते रहते थे. एक बार जहांगीर ने अपने राज्य के प्रसिद्ध पीर सैयद मियां मीर से पूछा कि इस समय दुनिया में सबसे बड़ा आध्यात्मिक बादशाह कौन है ? इस पर मियां मीर ने कहा कि पंजाब की धरती पर निवास कर रहे बाबा श्रीचंद पीरों के पीर और फकीरों के शाह हैं. एक बार कश्मीर भ्रमण के समय बाबा अपनी मस्ती में धूप में बैठे थे. एक अहंकारी जमींदार ने यह देखकर कहा कि यह बाबा तो खुद धूप में बैठा है, यह दूसरों को भला क्या छाया देगा ? इस पर बाबा श्रीचंद ने यज्ञकुंड से जलती हुई चिनार की लकड़ी निकालकर धरती में गाड़ दी. कुछ ही देर में वह एक विशाल वृक्ष में बदल गयी. यह देखकर जमींदार ने बाबा के पैर पकड़ लिये. वह वृक्ष ‘श्रीचंद चिनार’ के नाम से आज भी वहां विद्यमान है. रावी नदी के किनारे चम्बा शहर के राजा के आदेश से कोई नाविक किसी संत-महात्मा को नदी पार नहीं करा सकता था. एक बार बाबा नदी पार जाना चाहते थे. जब कोई नाविक राजा के भयवश तैयार नहीं हुआ, तो उन्होंने एक बड़ी शिला को नदी में ढकेल कर उस पर बैठकर नदी पार कर ली. जब राजा को यह पता लगा तो वह दौड़ा आया और बाबा के पैरों में पड़ गया. अब बाबा श्रीचंद ने उसे सत्य और धर्म का उपदेश दिया, जिससे उसका अहंकार नष्ट हुआ. उसने भविष्य में सभी साधु-संतों का आदर करने का वचन दिया. इस पर बाबा ने उसे आशीर्वाद दिया. इससे उस राजा के घर में पुत्र का जन्म भी हुआ. यह शिला रावी के तट पर आज भी चम्बा में विद्यमान है. इसकी प्रतिदिन विधि-विधान से पूजा अर्चना की जाती है. बाबा का विचार था कि हमें हर सुख-दुख को साक्षी भाव से देखना चाहिए. उसमें लिप्त न होकर उसके प्रति उदासीन भाव रखने से मन को कष्ट नहीं होता. सिखों के छठे गुरु श्री हरगोविंद जी के बड़े पुत्र बाबा गुरदित्ता जी को अपना उत्तराधिकारी बनाकर बाबा ने अपनी देहलीला समेट ली.  

September 7th 2019, 5:31 pm

राखीगढ़ी – हजारों साल में भारत के लोगों के जीन में नहीं हुआ बड़ा बदलाव, आर्यों के बाहर से आने की थ्य

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आर्य बाहर (विदेश) से आए थे या यहीं (भारत) के निवासी थे? इस सवाल का जवाब मिल गया है. हरियाणा के हिसार जिले के राखीगढ़ी में हुई हड़प्पाकालीन सभ्यता की खोदाई में कई राज से पर्दा उठा है. राखीगढ़ी में मिले 5000 साल पुराने कंकालों के अध्ययन के बाद जारी की गई रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि आर्य बाहर से नहीं आए थे, दूसरा भारत के लोगों के जीन में पिछले हजारों सालों में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है.

रिसर्च में सामने आया है कि आर्य भारत के ही मूल निवासी थे. इसे लेकर वैज्ञानिकों ने राखीगढ़ी में मिले नरकंकालों के अवशेषों का डीएनए टेस्ट किया था. डीएनए टेस्ट से आर्यों के बाहर से आने की थ्योरी ही गलत साबित हो जाती है.

रिसर्च में सामने आया है कि 9000 साल पहले भारत के लोगों ने ही कृषि की शुरुआत की थी. इसके बाद ये ईरान व इराक होते हुए पूरी दुनिया में पहुंची. भारत के विकास में यहीं के लोगों का योगदान है. कृषि से लेकर विज्ञान तक, यहां पर समय समय पर विकास होता रहा है. भारतीय पुरातत्व विभाग (Archaeological Survey of India) और जेनेटिक डाटा से इस बात को पूरी दुनिया ने माना है.

इतिहास सिर्फ लिखित तथ्यों को मानता है, लेकिन वैज्ञानिक सबूतों का ज्यादा महत्व होता है. राखीगढ़ी में मिले 5000 साल पुराने कंकालों के अध्ययन के बाद जारी की गई रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई है कि हड़प्पा सभ्यता में सरस्वती की पूजा होती थी. इतना ही नहीं यहां पर हवन भी होता था.

इसी साल की शुरुआत में हड़प्‍पाकालीन सभ्‍यता के बारे में कई नई जानकारियां सामने आई हैं. नए मिले तथ्‍यों से अनुमान लगाया जा रहा है कि हड़प्‍पा काल में प्रेम का विस्‍तृत संसार था. खुदाई के दौरान एक युगल का कंकाल मिला है. इसमें पुरुष अपनी महिला साथी को निहार रहा है.

हिसार के राखीगढ़ी में काम कर रहे पुणे के डेक्कन कॉलेज के पुरातत्वविदों के अनुसार, खुदाई के वक्त युवक (कंकाल) का मुंह युवती की तरफ था. यह पहली बार है, जब हड़प्पा सभ्यता की खुदाई के दौरान किसी युगल की कब्र मिली है. अब तक हड़प्पा सभ्यता से संबंधित कई कब्रिस्तानों की जांच की गई, लेकिन आज तक किसी भी युगल के इस तरह दफनाने का मामला सामने नहीं आया था.

ये निष्कर्ष हाल ही में अंतरराष्ट्रीय पत्रिका, एसीबी जर्नल ऑफ अनैटमी और सेल बायॉलजी में प्रकाशित हुए हैं.

पहली बार मिला इस तरह युगल कंकाल

खुदाई और विश्लेषण का कार्य विश्‍वविद्यालय के पुरातत्व विभाग और इंस्टिट्यूट ऑफ फरेंसिक साइंस, सोल नेशनल यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिसिन द्वारा किया गया. इससे पूर्व लोथल में खोजे गए एक हड़प्पा युगल कब्र को माना गया था कि महिला विधवा थी और उसे अपने पति की मौत के बाद दफनाया गया था.

पुरातत्वविदों का कहना है कि जिस तरह से युगल के कंकाल राखीगढ़ी में दफन मिले, उससे साफ है कि दोनों के बीच प्रेम था और यह स्नेह उनके मरने के बाद उनके कंकाल में नजर आता है. सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है कि जिन लोगों ने दोनों को दफनाया था, वे चाहते थे कि दोनों के बीच मरने के बाद भी प्यार बना रहे. उन्होंने कहा कि युगलों के दफनाने का मामला दूसरी प्राचीन सभ्यताओं में दुर्लभ नहीं है. इसके बावजूद यह अजीब है कि उन्हें अब तक हड़प्पा कब्रिस्तान में नहीं खोजा गया.

साभार – दैनिक जागरण

September 7th 2019, 8:49 am

आर्य भारत के ही मूल निवासी थे – राखीगढ़ी में मिलने कंकाल के डीएनए जांच का निष्कर्ष

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अब तक हम इतिहास की पुस्तकों में पढ़ते आए हैं कि भारत में आर्य लोग बाहर से आकर बसे थे. मगर यह सत्य नहीं है. आर्य भारत के ही स्थाई निवासी थे. हिसार के नारनौंद क्षेत्र के राखीगढ़ी गांव में मिले मानव कंकालों की डीएनए रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है.

शुक्रवार को दिल्ली स्थित इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चर हैरिटेज में डेक्कन यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर वसंत शिंदे और डॉ नीरज राय ने प्रेस वार्ता कर शोध के निष्कर्षों के संबंध में जानकारी दी. प्रेस वार्ता में राखीगढ़ी में मिले 5000 वर्ष पुराने मानव कंकालों की डीएनए रिपोर्ट सार्वजनिक की गई.

उन्होंने बताया कि आर्य भारत के ही मूल निवासी थे. संपूर्ण दक्षिण एशिया वासियों के पूर्वज एक ही थे. वैज्ञानिकों ने देश के अलग-अलग हिस्सों से करीब 2500 लोगों के ब्लड सैंपल लेकर उनका डीएनए और राखीगढ़ी में मिले मानव कंकाल के डीएनए का मिलान किया तो पाया कि आज भी उनका और हमारा डीएनए मेल खाता है.

गांव राखीगढ़ी में अप्रैल 2015 में टीले नंबर-7 पर हुई खोदाई के दौरान दर्जनों मानव कंकाल मिले थे. इन कंकालों का डीएनए जांच भारत के हैदराबाद और अमेरिका में किया गया. चार साल के अध्ययन के बाद वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि यह लोग आर्यन हैं और बाहर से नहीं आए, बल्कि उन्होंने यहीं पर ही रहकर गांव से शहर तक का विकास किया. शुरुआती दौर में उन लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती-बाड़ी और पशुपालन था.

बाद में उन्होंने कुछ देशों से व्यापारिक संबंध भी बनाए. अगर ये लोग बाहर से आए होते तो उनकी संस्कृति अलग होती. वामपंथी इतिहासकारों ने अभी तक पढ़ाया था कि आर्य बाहर से आकर बसे थे. लेकिन, अब प्रमाण मिल चुका है कि आर्य ही यहां के मूल निवासी थे. शुरुआती दौर में उन लोगों ने एक गांव को बसाया और फिर धीरे-धीरे उन्होंने शहर के रूप में राखीगढ़ी को मेगा सिटी के रूप में विकसित किया. जिस तरह उन्होंने इस शहर को बसाया था, उसकी पूरी योजना तैयार की थी.

डीएनए में यह भी सामने आया है कि उस समय के लोग खाने में गेहूं, चना और सरसों का प्रयोग करते थे और कुछ लोग जानवरों का शिकार करके उन्हें भी खाने के रूप में प्रयोग करते थे.

डेक्कन यूनिवर्सिटी पुणे के वीसी प्रोफेसर वसंत शिंदे का कहना है कि हमारे इतिहास में जो गलत पार्ट लिखा गया है, हम उसे सही तथ्य सामने लाकर सुधारने का काम करेंगे और आगे भी हड़प्पा संस्कृति पर हमारी रिसर्च जारी रहेगी. इस संस्कृति से अभी और भी राज सामने आएंगे जो इतिहास के मायने बदल देंगे.

साभार – दैनिक जागरण

September 7th 2019, 8:38 am

पुष्कर में अ.भा. समन्वय बैठक प्रारंभ

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की त्रिदिवसीय अखिल भारतीय समन्वय बैठक पवित्र नगरी पुष्कर में आज 7 सितंबर प्रात: से प्रारंभ होकर 9 सितंबर सायं तक रहेगी. इस बैठक में सरसंघचालक मोहन जी भागवत, सरकार्यवाह भय्याजी जोशी, संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी एवं समाज जीवन में भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले 35 से अधिक संगठनों के अखिल भारतीय स्तर के लगभग 200 कार्यकर्ता भाग ले रहे हैं. अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर ने बताया कि कार्य करते हुए आने वाले अनुभवों एवं आंकलनों का परस्पर आदान-प्रदान, राष्ट्रीय महत्व के समसामायिक विषयों पर चर्चा ही इस बैठक का हेतू है. सभी संगठन स्वायत हैं एवं सबकी अपनी-अपनी निर्णय की पद्धति है. इस बैठक में कोई प्रस्ताव भी पारित नहीं होगा. 9 सितंबर दोपहर को पत्रकार वार्ता में बैठक के सभी विषयों की जानकारी एवं अन्य प्रश्नों के उत्तर सह सरकार्यवाह दतात्रेय होसबले जी देंगे.

September 7th 2019, 3:35 am

बांग्लादेशी आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहिद्दीन(जेएमबी) के 2 आतंकी अब्दुल व निजामुद्दीन गिरफ्तार

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कोलकाता पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स टीम ने उत्तर दिनाजपुर से बांग्लादेशी आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश (जेएमबी) के 2 आतंकियों अब्दुल बारी (28 साल) और निजामुद्दीन खान (19 साल) को गिरफ्तार किया है. एसटीएफ अधिकारियों ने बताया कि सोमवार को जेएमबी के सदस्य अबुल काशेम को कोलकाता के नारकेलडांगा से गिरफ्तार किया गया था. उससे पूछताछ के बाद अब्दुल और निजामुद्दीन का पता चला और उन्हें गिरफ्तार किया गया. उनके कब्जे से कुछ जिहादी किताबें, दस्तावेज व मोबाइल फोन जब्त किये गए हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार एसटीएफ सूत्रों ने बताया कि गिरफ्तारी के बाद इन दोनों से पूछताछ हुई और फिर इन दोनों के घरों की तलाशी ली गई. तलाशी में जो चीजें बरामद हुईं, उनसे पता चला कि ये लोग किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने वाले थे.

प्रभात खबर की रिपोर्ट के अनुसार एसटीएफ को निजामुद्दीन के ठिकाने से एक लैपटॉप, चार्जर, एक मोबाइल फोन, वायर कटर, टेबल घड़ी, ग्लू स्टिक, कैपेसिटर, छोटे आकार का एलइडी बल्ब, डेटोनेटर और हेक्सा ब्लेड मिला है. जबकि घर से थोड़ी दूर स्थित इनके दूसरे ठिकाने से पुलिस को सिमकार्ड के अलावा एक लैपटॉप और एक चार्जर भी बरामद हुआ है. लैपटॉप में High caliber explosive (तीव्र क्षमता वाला विस्फोटक) बनाने संबंधी वीडियो था.

इसे देखकर कयास लगाए जा रहे हैं कि ये आतंकी अपने नए ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए इन चीजों से विस्फोटक बनाने की तैयारी कर रहे थे. एसटीएफ के ज्वायंट सीपी शुभांकर सिन्हा सरकार ने जारी बयान में कहा कि जेएमबी के इन संदिग्ध आतंकियों से कई सवालों के जवाब जानने के लिए लगातार पूछताछ की जा रही है. जैसे- इन चीजों से क्या करने वाले थे, उनके मंसूबे क्या थे? वह वस्तुएं कहां से लाते थे? इन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उपयोग करके वह कितना घातक विस्फोटक बनाने की तैयारी में थे?

अब्दुल और निजामुद्दीन जेएमबी के शीर्षस्तरीय नेता अब्दुल सालेह और जेएमबी के भारत प्रमुख एजाज अहमद उर्फ मोती अहमद उर्फ जीतू उर्फ इजाज के संपर्क में थे. एजाज ने हाल के वर्षों में प्रतिबंधित आतंकी संगठन का उत्तर बंगाल मॉड्यूल भी तैयार कर लिया था. अब्दुल और निजामुद्दीन को उत्तर दिनाजपुर में आतंकी संगठन के विस्तार की जिम्मेदारी मिली थी.

 

 

September 6th 2019, 10:50 am

भारतीय सेना पर झूठे आरोप लगाने वाली शेहला रशीद के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज

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JNU की पूर्व छात्र नेता व शाह फैसल की पार्टी से नेतागिरी का आगाज करने वाली शेहला रशीद के खिलाफ दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने देशद्रोह के साथ कई अन्य धाराओं में एफआईआर दर्ज की है.

शेहला के खिलाफ आईपीसी की धारा 124-A के तहत देशद्रोह, 153A के तहत धर्म भाषा के आधार पर नफरत फैलाना, 153 में उपद्रव कराने के आशय से कोई काम करना, 504 के तहत शांति भंग करने के आशय से कोई काम करना और 505 के तहत अफवाह फैलाने के आरोप में मामला दर्ज किया गया है. अब मामले में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल शेहला रशीद से पूछताछ करेगी.

शेहला रशीद पर जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाए जाने के बाद मौजूदा हालात को लेकर भारतीय सेना के खिलाफ झूठी खबरें फैलाने का आरोप है.

शेहला ने भारतीय सेना पर रात में कश्मीर के लोगों के घरों में घुसने, गैर-कानूनी रूप से लड़कों को उठाने, घरों में छानबीन करने, चावलों में तेल मिलाने, शोपियाँ में कश्मीरी लड़कों को बंधक बनाकर दहशत फैलाने जैसे कई आरोप लगाए थे. शेहला के सेना पर लगाए आरोपों के बाद सोशल मीडिया पर काफी हंगामा हुआ था. शेहला इससे पहले भी फेक न्यूज़ फैलाने के अलावा सेना पर कई मनगढ़ंत आरोप लगा चुकी हैं.

शेहला ने अपने एक दूसरे ट्विट में लिखा था, “लोग कह रहे हैं कि जम्मू और कश्मीर पुलिस के पास कानून व्यवस्था का कोई अधिकार नहीं है. उन्हें शक्तिहीन कर दिया गया है. सब कुछ अर्धसैनिक बलों के हाथों में है. सीआरपीएफ के जवान की शिकायत पर एक SHO का ट्रांसफर कर दिया गया था. SHO डंडे के साथ दिखे उनके पास सर्विस रिवाल्वर नहीं देखी गई.”

यहां तक कि भारतीय सेना ने भी शेहला के इन आरोपों को बेबुनियाद और मनगढ़ंत बताया था. भारतीय सेना के बयान के बाद सुप्रीम कोर्ट के वकील अलख आलोक श्रीवास्तव ने शेहला रशीद पर फर्जी खबरें पोस्ट करने का आरोप लगाते हुए आपराधिक मामला दर्ज करने के साथ गिरफ्तारी की मांग भी की थी.

शेहला रशीद फिलहाल आईएएस से नेता बने शाह फैसल के साथ जम्मू-कश्मीर की राजनीति में स्थापित होने की कोशिश कर रही हैं. शाह फैसल वही नेता हैं, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निष्क्रिय किए जाने के बाद ‘बदला’ लेने की धमकी दी थी. उन्हें पिछले दिनों दिल्ली एयरपोर्ट पर उस समय रोक लिया गया था, जब वे देश छोड़ने की कोशिश कर रहे थे. फिलहाल वे श्रीनगर में नजरबंद हैं.

 

 

September 6th 2019, 10:50 am

बिगड़ी कानून व्यवस्था पर सीएम इधर चर्चा कर रहे थे, उधर हो गई हत्या

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जयपुर (विसंकें). प्रदेश में चरमराती कानून व्यवस्था को लेकर एक तरफ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जयपुर में राज्य के पुलिस अधीक्षकों व उच्चाधिकारियों के साथ वन-टू-वन मीटिंग करके निर्देश दे रहे थे कि दूसरी तरफ राजधानी के ही आगरा रोड के पास स्थित खोनागोरियन क्षेत्र में मुस्लिम युवक ने अखबार वितरण कर रहे मुन्ना वैष्णव नामक व्यक्ति की सरेराह हत्या कर दी. दिनदहाड़े युवक की हत्या के बाद लोगों रोष व्याप्त हो गया. बड़ी संख्या में लोगों ने जगतपुरा बायपास रोड़ पर जाम लगा दिया. जहां पुलिस ने भीड़ को हटाने के लिए लाठीचार्ज कर दिया. जिसमें दर्जनभर से अधिक लोग घायल हो गए.

जयपुर शहर सहित प्रदेश में प्रतिदिन बिगड़ती कानून व्यवस्था को लेकर अब आमजन में आक्रोश बढ़ने लगा है, लेकिन सरकार अपराध नियंत्रण की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है.

मुन्ना वैष्णव प्रतिदिन की तरह 05 सितंबर को भी अखबार वितरण करने के साथ ही बकाया कलेक्शन भी कर रहा था. खोनागोरियन क्षेत्र में रफीक से बकाया मांगने पर दोनों में कहासुनी हो गई. कुछ देर बाद ही रफीक ने कुल्हाड़ी से मुन्ना पर हमला कर दिया. आरोपित ने मोटरसाइकिल पर बैठे मुन्ना के सिर व पीठ पर कई वार करके निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी.

हत्या के बाद बवाल की सूचना पर मौके पर अतिरिक्त पुलिस दल पहुंचा. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन वे जाम खोलने के लिए तैयार नहीं हुए. इस पर पुलिस ने लाठीचार्ज कर भीड़ को वहां से खदेडऩा शुरू किया. जिससे अफरातफरी मच गई. लाठीचार्ज और भगदड़ के कारण कई लोग घायल हो गए. पुलिस ने मृतक के शव को स्थानीय अस्पताल की मोर्चरी में रखवाया.

इससे पूर्व भी झालावाड़ में ऋषि जिंदल, अलवर में हरीश जाटव व जोधपुर में जोरावरसिंह की बेरहमी से हत्या कर दी गई. इनके अलावा आए दिन पथराव व मारपीट की घटनाओं ने प्रदेश की कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

September 6th 2019, 8:15 am

समन्वय बैठक में सीमाओं की सुरक्षा को लेकर मंथन करेगा संघ

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पुष्कर में 07 सितंबर से शुरू होगी बैठक, 200 प्रतिभागी होंगे उपस्थित महिलाओं से संबंधित व्यापक सर्वेक्षण की रिपोर्ट के निष्कर्षों के आधार पर महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य, सुरक्षा पर भी होगी गहन चर्चा पुष्कर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार जी ने कहा कि देश की सीमाओं के प्रति सतत जागरूक रहना पड़ता है. किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा सीमाओं पर निर्भर करती है, सीमा सुरक्षित तो राष्ट्र सुरक्षित. सीमा पर रहने वाला समाज जागरूक, संस्कारित हो, एवं उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो तथा उनकी समस्याओं का समाधान हो. इसके लिए विभिन्न संगठन क्या-क्या कर सकते हैं, इस विषय पर विशेष रूप से चर्चा होने वाली है. अरुण कुमार जी ने 7 से 9 सितंबर तक होने वाली अखिल भारतीय समन्वय बैठक से पूर्व 06 सिंतबर को आयोजित प्रेस वार्ता में बैठक के संबंध में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि कि महिला समाज से जुड़े प्रश्नों का अध्ययन योजक नाम की संस्था ने किया है. इस विषय को लेकर दो वर्ष व्यापक अध्ययन (जनजातीय, कामकाजी, अनुसूचित जाति, छात्रावास में रहने वाली युवतियां, घरेलू महिलाएं, कृषक महिलाएं व अन्य) हुआ, इस अध्ययन में विविध संगठनों में कार्यरत हजारों महिलाओं ने भी सहयोग किया। इस अध्ययन से संबंधित रिपोर्ट भी सबके समक्ष रखी जाएगी, तथा उसके आधार पर महिला स्वास्थ्य, सशक्तिकरण, सुरक्षा, सम्मान आदि विषयों पर संगठन क्या कर सकते हैं, इसे लेकर भी विस्तृत चर्चा होने वाली है. उन्होंने कहा कि संघ के स्वयंसेवक 35 से अधिक संगठनों में काम करते हैं. ये संगठन समाज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कार्यरत हैं, सभी के कार्य क्षेत्र अलग-अलग है, सभी संगठन स्वायत्त हैं. समन्वय बैठक निर्णय लेने वाली बैठक या फोरम नहीं है. सभी संगठनों के निर्णय लेने के अपने फोरम हैं. इन संगठनों के पदाधिकारी देशभर में घूमते हैं, समाज के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से मिलते हैं. अनुभव-आंकलन करते हैं. ऐसे सभी व्यक्ति एकत्रित आकर अपने अनुभवों को साझा करें, इसके लिए ही समन्वय बैठक है. इस बैठक में सभी संगठनों के अ.भा. पदाधिकारी (अध्यक्ष, महामंत्री, संगठन मंत्री) उपस्थित रहने वाले हैं. बैठक में संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जी, सरकार्यवाह भय्याजी जोशी एवं अन्य अ.भा. कार्यकारिणी के सदस्य भी उपस्थित रहेंगे. उन्होंने बताया कि पिछली बार मंत्रालय (आंध्र प्रदेश) में बैठक हुई थी, जिसमें तय किया गया था कि सभी संगठन तीन प्रमुख विषयों पर वर्ष भर कार्य करेंगे. पर्यावरण व जल संकट को लेकर समाज में जागरण व प्रबोधन, प्रत्येक संगठन में युवा पीढ़ी आगे आए इस हेतु प्रयास, तथा समाज विशेषकर नई पीढ़ी में संस्कारों का दृढ़ीकरण, इन तीनों विषयों पर विविध संगठनों के प्रयास तथा अनुभवों की भी समीक्षा होगी. इस के अतिरिक्त समसामायिक सामाजिक, राष्ट्रीय महत्व के विषय पर भी अगर प्रतिभागी चाहेंगे तो उस पर चर्चा हो सकती है.

September 6th 2019, 6:59 am

06 सितम्बर / जन्मदिवस – क्रांतिवीर दिनेश गुप्त जी

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नई दिल्ली. क्रांतिवीर दिनेश गुप्त जी का जन्म छह सितम्बर, 1911 को पूर्वी सिमलिया (वर्तमान बांग्लादेश) में हुआ था. आगे चलकर वह भारत की स्वतंत्रता के समर में कूद गए. उनके साथियों में सुधीर गुप्त एवं विनय बोस प्रमुख थे. उन दिनों जेल में क्रांतिकारियों को शारीरिक एवं मानसिक रूप से तोड़ने के लिये बहुत यातनाएं दी जाती थीं. कोलकाता जेल भी इसकी अपवाद नहीं थी. वहां का जेल महानिरीक्षक कर्नल एनएस सिम्पसन बहुत क्रूर व्यक्ति था. अतः क्रांतिदल ने उसे मारने का निर्णय किया. इसकी जिम्मेदारी इन तीनों को सौंपी गयी. तीनों सावधानी से इस अभियान की तैयारी करने लगे.

इन दिनों बंगाल राज्य का मुख्यालय जिस भवन में है, कर्नल सिम्पसन का कार्यालय कोलकाता की उसी ‘राइटर्स बिल्डिंग’ में था. आठ दिसम्बर, 1930 को तीनों अंग्रेजी वेशभूषा पहन कर वहां जा पहुंचे. उनके प्रभावी व्यक्तित्व के कारण मुख्य द्वार पर उन्हें किसी ने नहीं रोका. सिम्पसन के कमरे के बाहर एक चपरासी बैठा था. उसने तीनों से कहा कि वे एक पर्चे पर अपना नाम और काम लिख दें, तो वह उस पर्चे को साहब तक पहुंचा देगा. पर उन्हें इतना अवकाश कहां था? वे चपरासी को धक्का देकर अंदर घुस गये. इस धक्कामुक्की और शोर से सिम्पसन चौंक गया, पर जब तक वह सावधान होता, इन तीनों ने उसके शरीर में छह गोलियां घुसा दीं. वह तुरंत ही धरती पर लुढ़क गया. तीनों अपना काम पूरा कर वापस लौट चले.

पर, इस गोलीबारी और शोर से पूरे भवन में हड़कम्प मच गया. वहां के सुरक्षाकर्मी भागते हुए तीनों क्रांतिवीरों के पीछे लग गये. कुछ ही देर में पुलिस भी आ गयी. तीनों गोली चलाते हुए बाहर भागने का प्रयास करने लगे. भागते हुए तीनों एक बरामदे में पहुंच गये, जो दूसरी ओर से बंद था. यह देखकर वे बरामदे के अंतिम कमरे में घुस गये और उसे अंदर से बंद कर लिया.

जो लोग उस कमरे में काम कर रहे थे, वे डर कर बाहर आ गये और उन्होंने बाहर से कमरे की कुंडी लगा दी. कमरे को पुलिस ने घेर लिया. दोनों ओर से गोली चलती रही, पर फिर अंदर से गोलियां आनी बंद हो गयीं. पुलिस से खिड़की से झांककर कर देखा, तो तीनों मित्र धरती पर लुढ़के हुए थे. वस्तुतः तीनों ने अभियान पर जाने से पहले ही यह निश्चय कर लिया था कि भले ही आत्मघात करना पड़े, पर वे पुलिस के हाथ नहीं आएंगे. इस संघर्ष में दिनेश गुप्त पुलिस की गोली से बुरी तरह घायल हुये थे. सुधीर ने अपनी ही पिस्तौल से गोली मार कर आत्मघात कर लिया. विनय ने भी अपनी दोनों कनपटियों पर गोली मार ली थी, पर उनकी मृत्यु नहीं हुई.

पुलिस ने तीनों को अपने कब्जे में ले लिया. दिनेश और विनय को अस्पताल भेजा गया. विनय ने दवाई खाना स्वीकार नहीं किया. अतः उसकी हालत बहुत बिगड़ गयी और 13 दिसम्बर को उनका प्राणांत हो गया. दिनेश गुप्त का ऑपरेशन कर गोली निकाल दी गयी और फिर उन्हें जेल भेज दिया गया. मुकदमे के बाद सात जुलाई, 1931 को उन्हें फांसी दे दी गयी.

इस प्रकार तीनों मित्रों ने देश के प्रति अपना कर्तव्य निभाते हुए अमर बलिदानियों की सूची में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में सम्मिलित करा दिया. फांसी के 20 दिन बाद कन्हाई लाल भट्टाचार्य ने उस जज को न्यायालय में ही गोली से उड़ा दिया, जिसने दिनेश गुप्त को फांसी की सजा दी थी.

September 5th 2019, 4:51 pm

पत्थरबाजी में घायल युवक की मौत, आतंकी-पत्थरबाजी की घटनाओं में 5वीं मौत

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श्रीनगर में प्रदर्शन के दौरान घायल हुए असरार अहमद खान की बुधवार सुबह अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई. 06 अगस्त को श्रीनगर के सौरा क्षेत्र में अनुच्छेद 370 हटने और जम्मू कश्मीर पुनर्गठन बिल पास होने के खिलाफ कुछ लोग प्रदर्शन कर थे और पत्थरबाजी कर रहे थे, उसी दौरान असरार अहमद नामक युवक को गंभीर चोट लग गई थी. जिसके बाद उसे श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में भर्ती करवाया गया था, जहां करीब एक महीने बाद बुधवार सुबह उसकी मौत हो गई.

अनुच्छेद 370 हटने के बाद आतंकी और पत्थरबाजी की घटनाओं में ये 5वीं मौत है. आतंकियों और पत्थरबाजों ने 4 लोगों की हत्या की है. अभी हाल ही में आतंकियों ने श्रीनगर के दुकानदार गुलाम मोहम्मद की गोली मार कर हत्या कर दी थी. इससे पहले अनंतनाग में कश्मीरी ट्रक चालक नूर मोहम्मद पर भी पत्थरबाजी की थी, नूर मोहम्मद की इलाज के दौरान अस्पताल में मौत हो गई थी.

भारतीय सेना के चिनार कॉर्प्स के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि बीते एक माह में आतंकी और पत्थराबाजी की घटनाओं में 5वीं मौत है. उन्होंने कहा कि सभी लोगों की जान आतंकियों, पत्थरबाजों और पाकिस्तानी कठपुतलियों ने ली है. प्रतिदिन पाकिस्तान की तरफ से घुसपैठ का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन भारतीय सेना उनके प्रयासों को सफल नहीं होने दे रही है.

उन्होंने बताया कि पाकिस्तानी घुसपैठियों का अभी तक एक भी प्रयास सफल नहीं हुआ है. कुछ घुसपैठियों को निकाल दिया जा रहा है और कुछ घुसपैठी वापस पाकिस्तानी सेना के पास लौट जा रहे हैं, जहां से वो आए थे.

जम्मू-कश्मीर का माहौल सामान्य है. लेकिन सुरक्षाबलों ने स्थानीय लोगों की सुरक्षा के दृष्टिगत एहतियातन श्रीनगर के आस-पास के क्षेत्रों में प्रतिबंध लगाया है.

September 5th 2019, 9:02 am

अपना ड्रामा (मंदिर जाना, पूजा करना) बंद करो, मुसलमानों की तरह रहो

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ससुराल वालों पर धर्म परिवर्तन के लिए प्रताड़ित करने का आरोप

झारखंड के सिंदरी में मुस्लिम युवक द्वारा एक हिन्दू लड़की से शादी कर उसे प्रताड़ित करने के आरोप में कोर्ट में सुनवाई होने वाली है. लड़की के पति के अलावा ससुर और जेठानी के विरुद्ध जबरदस्ती धर्म परिवर्तन और मारपीट को लेकर शिकायत की है मामले को लेकर 11 सितंबर को कोर्ट में सुनवाई होगी.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पीड़िता ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि उसने कामरान अहमद के साथ 02 जुलाई, 2013 को शादी की थी. शादी के समय उसने शपथ पत्र दायर किया था कि वो हिन्दू रीति-रिवाज़ को मानेगी और उस पर धर्मांतरण के लिए किसी भी तरह का दबाव नहीं बनाया जाएगा. शादी के बाद कामरान दिल्ली चला गया, जबकि पूजा सिंदरी में ही रहने लगी.

इसके बाद, कामरान के पिता अली अहमद खान ने पूजा को ताने देना शुरू कर दिया कि वो मुसलमान है, इसलिए हिन्दू रीति-रिवाज़ को न माने. उसकी जेठानी साज़िया ख़ान ने पूजा को प्रताड़ित करते हुए कहा कि वो अपनी नौटंकी (पूजा-पाठ) बंद करे. पूजा के आरोप के अनुसार, 20 जून 2017 को जब वो मंदिर में पूजा करने गई तो उसके ससुर अली अहमद ने उसका सारा सामान फेंक दिया और कहा कि वो मुसलमान है, इसलिए मुस्लिमों की तरह रहे और हिन्दू धर्म को मानने का ड्रामा बंद करे.

पूजा ने जब घटना की सूचना अपने पति को दी तो उसने पूजा का साथ न देते हुए कहा कि उससे जैसा कहा जा रहा है, वो चुपचाप वैसा ही करे. पूजा ने जब अपने ससुर और जेठानी की बात नहीं मानी तो उससे उसके जेवरात छीनकर, मारपीट कर उसे घर से बाहर निकाल दिया गया. इसके बाद वो अपने मायके आ गई.

पूजा ने बताया कि रविवार (01 सितंबर, 2019) को अपने मायके में थी. वहां उसके पति और ससुर आए और उसके साथ गाली-गलौच करने लगे और कहा कि अगर उसे अपना दांपत्य जीवन बिताना है तो इस्लाम कबूल कर ले. इस घटना की शिकायत पीड़िता ने थाने जाकर की. इसी संबंध में अब कोर्ट में 11 सितंबर को सुनवाई होगी.

September 5th 2019, 9:02 am

UAPA – सरकार ने अजहर, हाफ़िज़ सईद, दाऊद, लखवी को आतंकी घोषित किया, अमेरिका का भी मिला समर्थन

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भारत द्वारा संशोधित UAPA कानून के तहत मौलाना मसूद अजहर, हाफ़िज़ सईद, दाऊद इब्राहिम, ज़कीउर्रहमान लखवी को आतंकवादी घोषित करने के बाद अमेरिका ने भी भारत का समर्थन किया है. अमेरिका ने कहा कि – 04 कुख्यात आतंकियों को नामित करने के लिए भारत के कानूनी अधिकार का समर्थन करते हैं और इस कार्य के लिए प्रशंसा भी करते हैं. यह नया कानून भारत और अमेरिका की आतंकवाद के विरुद्ध संयुक्त लड़ाई में सहायक सिद्ध होगा.

सरकार ने बुधवार (04 सितंबर) को आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अज़हर, लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफ़िज़ सईद और ज़कीउर्रहमान लखवी को नए कानून के तहत आतंकवादी है. अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम भी इस सूची में शामिल है. यह कार्रवाई सरकार के नए विधि-विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) (UAPA) क़ानून के तहत की गई.

आतंकवाद पर लगाम कसने के लिए बनाए गए इस कानून के अंतर्गत व्यक्ति विशेष को भी आतंकी घोषित किया जा सकता है. सरकार ने संसद में दावा किया था कि यह कानून सुरक्षा एजेंसियों को आतंकवादियों से चार कदम आगे रखेगा.

गृह मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार सूची में पहले नंबर पर पुलवामा हमले का मास्टरमाइंड मसूद अज़हर है. मुंबई हमले का मास्टरमाइंड हाफ़िज़ सईद दूसरे, दाऊद को तीसरे नंबर पर रखा है.

अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद आतंकवाद विरोधी UAPA संशोधन विधेयक 2019 को संसद के दोनों सदनों ने पारित किया था. इस दौरान को विपक्षी दलों के प्रतिरोध का भी सामना करना पड़ा था. अज़हर और हाफ़िज़ सईद दोनों ही संयुक्त राष्ट्र द्वारा नामित वैश्विक आतंकवादी हैं.

September 5th 2019, 3:58 am

05 सितम्बर / इतिहास स्मृति – पर्यावरण संरक्षण हेतु अनुपम बलिदान

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नई दिल्ली. प्रतिवर्ष पांच जून को हम ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ मनाते हैं, लेकिन यह दिन हमारे मन में सच्ची प्रेरणा नहीं जगा पाता. क्योंकि इसके साथ इतिहास की कोई प्रेरक घटना नहीं जुड़ी है. इस दिन कुछ जुलूस, धरने, प्रदर्शन, भाषण तो होते हैं, पर उससे सामान्य लोगों के मन पर कोई असर नहीं होता. दूसरी ओर भारत के इतिहास में पांच सितम्बर, 1730 को एक ऐसी घटना घटी, जिसकी विश्व में कोई तुलना नहीं की जा सकती.

राजस्थान तथा भारत के अनेक अन्य क्षेत्रों में बिश्नोई समुदाय के लोग रहते हैं. उनके गुरु जम्भेश्वर जी ने अपने अनुयायियों को हरे पेड़ न काटने, पशु-पक्षियों को न मारने तथा जल गन्दा न करने जैसे 29 नियम दिये थे. इन 20 + 9 नियमों के कारण उनके शिष्य बिश्नोई कहलाते हैं. पर्यावरण प्रेमी होने के कारण इनके गांवों में पशु-पक्षी निर्भयता से विचरण करते हैं. वर्ष 1730 में इन पर्यावरण-प्रेमियों के सम्मुख परीक्षा की वह महत्वपूर्ण घड़ी आयी थी, जिसमें उत्तीर्ण होकर इन्होंने विश्व-इतिहास में स्वयं को अमर कर लिया. वर्ष 1730 में जोधपुर नरेश अजय सिंह को अपने महल में निर्माण कार्य के लिए चूना और उसे पकाने के लिए ईंधन की आवश्यकता पड़ी. उनके आदेश पर सैनिकों के साथ सैकड़ों लकड़हारे निकटवर्ती गांव खेजड़ली में शमी वृक्षों को काटने चल दिये.

जैसे ही यह समाचार उस क्षेत्र में रहने वाले बिश्नोइयों को मिला, वे इसका विरोध करने लगे. जब सैनिक नहीं माने, तो एक साहसी महिला ‘इमरती देवी’ के नेतृत्व में सैकड़ों ग्रामवासी, जिनमें बच्चे और बड़े, स्त्री और पुरुष सब शामिल थे, पेड़ों से लिपट गये. उन्होंने सैनिकों को बता दिया कि उनकी देह के कटने के बाद ही कोई हरा पेड़ कट पायेगा. सैनिकों पर भला इन बातों का क्या असर होना था ? वे  राजाज्ञा से बंधे थे, तो ग्रामवासी धर्माज्ञा से. अतः वृक्षों के साथ ही ग्रामवासियों के अंग भी कटकर धरती पर गिरने लगे. सबसे पहले वीरांगना ‘इमरती देवी’ पर ही कुल्हाड़ियों के निर्मम प्रहार हुए और वह वृक्ष-रक्षा के लिए प्राण देने वाली विश्व की पहली महिला बन गयी. इस बलिदान से उत्साहित ग्रामवासी पूरी ताकत से पेड़ों से चिपक गये. 20वीं शती में गढ़वाल (उत्तराखंड) में गौरा देवी, चण्डीप्रसाद भट्ट तथा सुन्दरलाल बहुगुणा ने वृक्षों के संरक्षण के लिए ‘चिपको आन्दोलन’चलाया, उसकी प्रेरणास्रोत इमरती देवी ही थीं.

भाद्रपद शुक्ल 10 (5 सितम्बर, 1730) को प्रारम्भ हुआ यह बलिदान – पर्व 27 दिन तक चलता रहा. इस दौरान 363 लोगों ने बलिदान दिया. इनमें इमरती देवी की तीनों पुत्रियों सहित 69 महिलाएं भी थीं. अन्ततः राजा ने स्वयं आकर क्षमा मांगी और हरे पेड़ों को काटने पर प्रतिबन्ध लगा दिया. ग्रामवासियों को उससे कोई बैर तो था नहीं, उन्होंने राजा को क्षमा कर दिया. उस ऐतिहासिक घटना की याद में आज भी वहां ‘भाद्रपद शुक्ल 10’ को बड़ा मेला लगता है. राजस्थान शासन ने वन, वन्य जीव तथा पर्यावरण-रक्षा हेतु ‘अमृता देवी बिश्नोई स्मृति पुरस्कार’ तथा केन्द्र शासन ने ‘अमृता देवी बिश्नोई पुरस्कार’ देना प्रारम्भ किया है. यह बलिदान विश्व इतिहास की अनुपम घटना है. इसलिए यही तिथि (भाद्रपद शुक्ल 10 या पांच सितम्बर) वास्तविक ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ होने योग्य है.

September 4th 2019, 5:05 pm

मां वैष्णो देवी तीर्थस्थल देश का सर्वश्रेष्ठ स्वच्छ प्रतिष्ठित स्थल, राष्ट्रपति सम्मानित करेंगे

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मां वैष्णो देवी तीर्थस्थल को देश के सर्वश्रेष्ठ प्रतिष्ठित स्थल के रूप में चुना गया है. जल शक्ति मंत्रालय, पेयजल और स्वच्छता विभाग ने मंगलवार को स्वच्छ प्रतिष्ठित स्थलों की रैंकिंग जारी की, जिसमें वैष्णो देवी का स्थान शीर्ष पर है. पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय द्वारा आयोजित होने वाले स्वच्छ महोत्सव के दौरान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद श्री मां वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड को प्रतिष्ठित पुरस्कार देकर सम्मानित करेंगे.

जलशक्ति मंत्रालय, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के अधिकारी ने कहा कि मंदिर में हर दिन हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए आते हैं. ऐसे में श्राइन बोर्ड द्वारा पूरे वैष्णो देवी तीर्थ स्थान की स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए पिछले कुछ वर्षों में कई पहल की गई. जिस कारण मंत्रालय ने वैष्णो देवी तीर्थस्थान को चुना है. वहीं श्राइन बोर्ड के प्रवक्ता ने कहा कि पानी के कियोस्क स्थापित करने, कचरे को निपटाने जैसी कई पहलों के साथ ही 1300 स्वच्छता कार्यकर्ताओं ने मिलकर इस तीर्थस्थल को शीर्ष रैंक हासिल करने में सक्षम बनाया है.

शीर्ष रैंक हासिल करने के लिए मां वैष्णो देवी तीर्थ स्थल के साथ ही देश के अन्य प्रतिष्ठित स्थानों के साथ था. इनमें छत्रपति शिवाजी टर्मिनल (महाराष्ट्र), ताजमहल (उत्तर प्रदेश), तिरुपति मंदिर (आंध्र प्रदेश), स्वर्ण मंदिर (अमृतसर), मणिकर्णिका घाट (वाराणसी), अजमेर शरीफ दरगाह (राजस्थान), मीनाक्षी मंदिर (तमिलनाडु), कामाख्या मंदिर (असम), जगन्नाथ पुरी (उड़ीसा), गंगोत्री, यमुनोत्री (उत्तराखंड), महाकालेश्वर मंदिर (उज्जैन), चार मीनार (हैदराबाद), चर्च एंड कॉन्वेंट ऑफ सेंट फ्रांसिस ऑफ अस्सी (गोवा), बैजनाथ धाम, देवघर (बिहार), सोमनाथ मंदिर (गुजरात), शबरीमला मंदिर (केरल) मुख्य रूप से शामिल थे.

September 4th 2019, 6:58 am

04 सितम्बर / जन्मदिवस – ईसाई षड्यन्त्रों के अध्येता कृष्णराव सप्रे

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नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की योजना से कई प्रचारक शाखा कार्य के अतिरिक्त समाज जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी काम करते हैं. ऐसा ही एक क्षेत्र वनवासी क्षेत्र भी है. ईसाई मिशनरियां उन्हें आदिवासी कहकर शेष हिन्दू समाज से अलग कर देती हैं. उनके षड्यन्त्रों से कई क्षेत्रों में अलगाववादी आंदोलन भी खड़े हुए हैं. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल को एक बार भ्रमण के दौरान जब वनवासी ईसाइयों ने काले झंडे दिखाये, तो उन्होंने मिशनरियों के षड्यन्त्रों की गहन जानकारी प्राप्त करने के लिए न्यायमूर्ति भवानीशंकर नियोगी के नेतृत्व में ‘नियोगी आयोग’ का गठन किया. संघ ने भी उनका सहयोग करने के लिए कुछ कार्यकर्ता लगाये. इनमें से ही एक थे कृष्णराव दामोदर सप्रे जी.

कृष्णराव सप्रे जी का जन्म मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर में चार सितम्बर, 1931 को हुआ था. उनका परिवार मूलतः महाराष्ट्र का निवासी था. छात्र जीवन से ही किसी भी विषय में गहन अध्ययन उनके स्वभाव में था. संघप्रेमी परिवार होने के कारण पिताजी संघ में, तो माताजी ‘राष्ट्र सेविका समिति’ में सक्रिय रहती थीं. इस कारण कृष्णराव और शेष तीनों भाई भी स्वयंसेवक बने. उनमें से एक डॉ. प्रसन्न दामोदर सप्रे प्रचारक के नाते आज भी ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ में सक्रिय हैं, जबकि डॉ. सदानंद सप्रे प्राध्यापक रहते हुए तथा अब अवकाश प्राप्ति के बाद पूरी तरह संघ के ही काम में लगे हैं.

जिन दिनों कृष्णराव जी ने शाखा जाना प्रारम्भ किया, उन दिनों युवाओं में कम्युनिस्ट विचार बहुत प्रभावी था. उसे पराजित करने के लिए कृष्णराव और उनके मित्रों ने गहन अध्ययन किया. इस प्रकार श्रेष्ठ विचारकों की एक टोली बन गयी. पांचवें सरसंघचालक सुदर्शन जी भी उस टोली के एक सदस्य थे. अपनी शिक्षा पूर्ण कर कृष्णराव प्रचारक बन गये. उन्हें शाखा कार्य के लिए पहले रायगढ़ और फिर छिंदवाड़ा विभाग का काम दिया गया. इसके बाद ‘नियोगी आयोग’ को सहयोग देने के लिए बालासाहब देशपांडे जी के साथ उन्हें भी लगाया गया. उनकी अध्ययनशीलता और अथक प्रयास से वनवासियों ने ईसाई मिशनरियों के षड्यन्त्र के विरुद्ध सैकड़ों शपथपत्र भर कर दिये, जिससे ‘नियोगी आयोग’ इस पूरे विषय को समझकर ठीक निष्कर्ष निकाल सका.

भारत में ईसाई मिशनरियों का सर्वाधिक प्रभाव पूर्वोत्तर भारत में है. इस आयोग के साथ काम करते हुए कृष्णराव को जो अनुभव प्राप्त हुए, उसके आधार पर उन्हें पूर्वोत्तर में काम करने को भेजा गया. वहां के जनजातीय समाज में मिशनरियों द्वारा धर्मान्तरण का खेल बहुत तेजी से खेला जा रहा था. कृष्णराव ने ‘भारतीय जनजातीय सांस्कृतिक मंच’ की स्थापना कर वहां अनेक गतिविधियां प्रारम्भ कीं. इससे हिन्दू समाज की मुख्यधारा से दूर हो चुके लोग फिर पास आने लगे. अतः धर्मान्तरण रुका और परावर्तन प्रारम्भ हुआ. जनता और कार्यकर्ताओं को जागरूक करने के लिए उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं. ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ के संस्थापक बालासाहब देशपांडे जी के प्रति उनके मन में बहुत श्रद्धा थी. उनके जीवन पर उन्होंने ‘वनयोगी बालासाहब देशपांडे की जीवन झांकी’ नामक पुस्तक भी लिखी.

वनवासी क्षेत्र में भाषा और भोजन की कठिनाई के साथ ही बीहड़ों में यातायात के साधन भी नहीं है. इसके बाद भी कृष्णराव सदा हंसते हुए काम करते रहे. वृद्धावस्था में शरीर अशक्त होने पर वे जबलपुर ही आ गये. वहां संघ कार्यालय पर कल्याण आश्रम के एक कार्यकर्ता शिवव्रत मोहंती ने पुत्रवत उनकी सेवा की. 27 जनवरी, 1999 को वहां पर ही उनका निधन हुआ. उनकी स्मृति में छिंदवाड़ा में प्रतिवर्ष व्याख्यानमाला का आयोजन किया जाता है.

September 3rd 2019, 5:51 pm

भगवान राम हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं – आरिफ मोहम्मद खान

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नई दिल्ली. पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं नवनियुक्त राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने अब्दुल अलीम द्वारा लिखित पुस्तक “इमाम-ए-हिन्द- राम” का विमोचन कर कार्यक्रम में उपस्थित जनों को संबोधित किया. उन्होंने कहा कि संस्कृति आस्था से संबंधित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण, जलवायु, संस्कृति और भौगोलिक परिस्थितियों से संबंधित है.

उन्होंने कहा कि भगवान राम इस राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति में विद्यमान हैं. “चाहे आप उन्हें भगवान के रूप में स्मरण करें, या अवतार के रूप में या मर्यादा पुरुषोत्तम, अयोध्या के राजा के रूप में. वे भारत के लाखों लोगों की आस्था का केंद्र हैं. राम को भारत की धरती से अलग नहीं किया जा सकता है और वह हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं.”

दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम इमाम-ए-हिन्द राम – सबके राम में डॉ. अब्दुल अलीम द्वारा लिखित पुस्तक का विमोचन किया गया. आरिफ मोहम्मद खान विमोचन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे.

उन्होंने कहा कि कबीर के राम प्रत्येक कण में थे और वाल्मीकि के राम मर्यादा पुरुषोत्तम थे. ये एक ही सूत्र से बंधे हैं, और हमें इस सूत्र को मजबूत करना चाहिए. उन्होंने देश में सांस्कृतिक एकता पर बल दिया. उन्होंने कहा “जब भगवान ने मनुष्य को बनाने का निर्णय किया, तो उसने सभी मनुष्यों में आत्मा का समावेश किया.”

विशिष्ट अतिथि इंदिरा गांधी जनजातीय विश्वविद्यालय के कुलपति टीवी कट्टीमनी ने कहा कि लोग अक्सर दावा करते हैं कि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं. उन्होंने कहा कि राम, सीता और लक्ष्मण हर आदिवासी भाषा में विद्यमान हैं और यह इस बात का प्रमाण है कि हम हिन्दू हैं.

कार्यक्रम अध्यक्ष पूर्व राज्यसभा सदस्य डॉ. महेश शर्मा ने कहा कि राम का धर्म पूछना सही नहीं है. राम भारत के कोने-कोने में विद्यमान हैं. वे प्रत्येक व्यक्ति में हैं और वे हर किसी के हैं. यही कारण है कि इमाम-ए-हिन्द जैसे प्रयासों को जारी रखना चाहिए.

इतिहास में पहली बार, इमाम-ए-हिन्द, रामकथा का उर्दू में मंचन होगा. अदबी कॉकटेल द्वारा उर्दू में रामकथा का मंचन अपनी तरह का प्रथम प्रयास है.

आलोचक प्रोफेसर बिस्मिल्लाह ने कहा कि रामलीला का विश्व के 14 देशों में मंचन होता है. इसलिए डॉ. अलीम द्वारा लिखित रामकथा का भी भारत के साथ ही संपूर्ण विश्व में मंचन होना चाहिए.

डॉ. अलीम ने भरत मिलाप का अध्याय सुनाया. डॉ. राकेश ने कहा कि विविधता के बावजूद, भारत की सभी जातियों, संस्कृतियों और समुदायों में राम को स्वीकार किया जाता है. प्रसिद्ध कवि अल्लामा इकबाल की उक्ति इमाम-ए-हिन्द, इस धारणा का एक उदाहरण है.

अदबी कॉकटेल के अतुल गंगवार ने पुष्टि की कि संगठन पूरे भारत में इस नाटक का मंचन करने की योजना बना रहा है.

September 3rd 2019, 10:33 am

पुष्कर में 07 सितम्बर से शुरू होगी संघ की अखिल भारतीय समन्वय बैठक

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जयपुर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तीन दिवसीय अखिल भारतीय समन्वय बैठक 07 सितम्बर से तीर्थ नगरी पुष्कर में आयोजित होगी. बैठक में शामिल होने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत आज पुष्कर पहुंच गए. सरसंघचालक 11 सितम्बर तक पुष्कर में ही रहेंगे. इस दौरान वे विभिन्न स्तर पर होने वाली बैठकों में उपस्थित होंगे.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र संघचालक डॉ. रमेश अग्रवाल ने बताया कि अखिल भारतीय समन्वय बैठक 07 सितम्बर से शुरू होकर 9 सितम्बर तक चलेगी. बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य और समाज जीवन के विविध क्षेत्रों (सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, शिक्षा, सेवा) में काम करने वाले तीन दर्जन संगठनों के करीब 200 अखिल भारतीय पदाधिकारी शामिल होंगे.

बैठक में सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक परिदृश्य, कृषि, पर्यावरण, जल संरक्षण समेत अन्य समसामायिक विषयों पर मंथन होगा. इस दौरान विविध क्षेत्रों में काम करने वाले संगठनों के कार्यकर्ता भी अनुभव, विचार और उपलब्धी साझा करेंगे. उन्होंने कहा कि बैठक की सभी व्यवस्थाओं की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं.

 

September 3rd 2019, 9:30 am

बापट जी ने सिद्धान्तों को आचरण का हिस्सा बनाया – भय्याजी जोशी

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बिलासपुर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ने कहा कि बापट जी सिद्धान्तों को जीवन का हिस्सा मानकर चलते थे. उन्होंने सिद्धान्तों को केवल शब्दों में नहीं रहने दिया, बल्कि उसका अपने जीवनपर्यन्त पालन किया. सरकार्यवाह पद्मश्री दामोदर गणेश बापट जी की श्रंद्धाजलि सभा में बोल रहे थे. श्रद्धांजलि सभा का आयोजन सोमवार को दयालबंद स्थित महाराजा रणजीत सिंह सभागार में भारतीय कुष्ठ निवारण संघ, कात्रे नगर चांपा ने किया था. भय्याजी जोशी ने बापट जी का स्मरण करते हुए कहा कि साधना के मार्ग पर चलते हुए बापट जी को प्रेरणा मिली. कुष्ठरोगी स्वाभिमान और सम्मान से जीवन जीएं, इसके लिए लोगों को प्रयास करना चाहिए, बापट जी ने इस मार्ग को प्रशस्त किया. ऐसे रोग से पीड़ित व्यक्ति को अपमानित जीवन का आभास न हो, इस बात का समाज को ध्यान रखना चाहिए. बापट जी के मन में समाज की एकात्मता का भाव था. वे सामाजिक कार्य के लिए पूर्णतः समर्पित थे तथा हर बाधा में एक रास्ता देखते थे. उन्होंने कुष्ठ रोगियों के जीवन को सम्मानजनक बनाने के लिए स्वावलंबन का रास्ता बनाया. इस अवसर पर राष्ट्र सेविका समिति की सह सरकार्यवाहिका सुलभा ताई देशपांडे ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि बालिकाओं की शिक्षा के लिए बापट जी ने बहुत सघन प्रयास किया. बिलासपुर में स्थित तेजस्विनी बालिका छात्रावास उन्हीं की देन है. उन्होंने बापट जी को समर्पित करते हुए एक गीत का भी गान किया साथ ही उन्होंने राष्ट्र सेविका समिति की पूर्व प्रमुख संचालिका वंदनीय प्रमिला ताई मेढे जी का शोक पत्र भी पढ़ा. मध्य क्षेत्र के क्षेत्र प्रचारक दीपक विस्पुते जी ने बापट जी को याद करते हुए कहा कि कुष्ठ रोग का नाम सुनकर लोगों का मन कांप जाता है. लेकिन बापट जी जैसे महान व्यक्तित्व ने इसे ईश्वरीय कार्य माना और उन्हें हर मुश्किलों से निकालने के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया. उन्होंने बापट जो को रामकृष्ण परमहंस का अवतार बताया. सक्षम के पूर्व राष्ट्रीय संगठन मंत्री डॉ. कमलेश जी ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि बापट जी मानवता के अभूतपूर्व उदाहरण थे. उन्होंने एक जीवन, एक ध्येय रखकर जीवन जिया. बापट जी के जीवन का हर एक क्षण प्रेरणा का स्रोत है. श्रद्धाजलि सभा में महामहीम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, राष्ट्र सेविका समिति की पूर्व प्रमुख संचालिका प्रमिला ताई मेढे, कुष्ठ निवारक केंद्र आनंदवन महाराष्ट्र के प्रमुख विकास आम्टे व विधानसभा अध्यक्ष चरणदास महंत जी का श्रद्धांजलि संदेश सुप्रिया जी ने पढ़ा. कार्यक्रम की प्रस्तावना भारतीय कुष्ठ निवारक संघ चांपा के सचिव सुधीर देव जी ने प्रस्तुत की. कार्यक्रम का संचालन बृजेन्द्र शुक्ल जी ने किया. इस अवसर पर क्षेत्र प्रचारक प्रमुख शिवराम समदरिया जी, संपर्क प्रमुख अनिल जी, प्रान्त संघ चालक बिसराराम यादव जी, प्रान्त सह संघचालक डॉ. पूर्णेन्द्रू सक्सेना जी, सहित मातृ शक्ति व गणमान्य नागरिकों ने बापट जी को श्रद्धांजलि अर्पित की.

September 3rd 2019, 4:12 am

चुनौतियों से घिरा कश्मीर का भविष्य

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नरेंद्र सहगल

केंद्र सरकार ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद (370) और राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा जारी एक पुराने अध्यादेश 35ए का निपटारा करके पाकिस्तान समर्थित अलगाववाद/आतंकवाद पर एक प्रचण्ड प्रहार कर दिया है. भारत के संविधान, पंथनिरपेक्षता लोकतंत्र, और संघीय ढांचे को चुनौती देने वाली राजनीतिक व्यवस्था अब  समाप्त हो गई है. भारत से अलग कश्मीर को भिन्न पहचान देने वाला रियासती झंडा और रियासती संविधान अब अपनी स्वयं की पहचान खो चुके हैं.

अभी जिंदा है अलगाववाद

प्रबल राजनीतिक इच्छा और साहसिक फैसले के साथ हुए इस ठोस ऐतिहासिक परिवर्तन के बावजूद भी अनेक विध चुनौतियां मुहं बाएं खड़ी हैं. एक हास्यास्पद परंतु गम्भीर चुटकुले से इस तथ्य को समझा जा सकता है. एक विद्यालय को आग लग गई. सारा भवन जलकर समाप्त हो गया . सभी बच्चे खुशी से नाचने लग गए. वाह-वाह छुट्टियां हो गई. परंतु एक बच्चा कोने पर खड़ा हो कर जोर-जोर से रोने लग गया. प्रसन्नता से नाच रहे बच्चों ने उससे पूछा- “तू क्यों रो रहा है? उसने रोते हुए कहा- अरे मूर्खो स्कूल ही तो जला है, मास्टर तो अभी भी जिंदा है.

बस यही सार इस लेख का. अलगाववाद, आतंकवाद, भारत विरोध को संरक्षण दे रहा संवैधानिक भवन (अनुच्छेद 370) अवश्य जल गया है, परंतु पाकिस्तान समर्थक और समर्थित तत्व तो अभी जिंदा हैं. गत सत्रह वर्षों से पनप रही मजहबी दहशतगर्दी एक प्रहार से राष्ट्रवाद में नहीं बदल सकती. बंदूक उठाने वाले हाथों में कलम और कंप्यूटर थमाना इतना आसान नहीं है. देशद्रोहियों को देशभक्त बनाने में समय लगेगा. कश्मीर को पाकिस्तान बनाने के इरादे से खूनखराबा कर रहे उन्मादी तत्वों की मानसिकता बदलने का काम असंभव नहीं तो कठिन जरूर है.

‘आज़ाद कश्मीर’ ‘स्वायत्तशासी कश्मीर’ और निजामे-मुस्तफा’ के वैचारिक आधार पर बगावत पर उतरे राजनीतिक नेताओं से निपटने में एक सोची समझी राजनीति की जरूरत है. परंतु आशा ही नहीं अपितु विश्वास भी किया जा सकता है कि जो सरकार अनुच्छेद 370 जैसे भारी-भरकम अवरोध को रास्ते से हटा सकती है सरकार कश्मीर से खूनी अलगाववाद को समाप्त करके प्रखर राष्ट्रवाद को जागृत भी करेगी.

राष्ट्रीय धारा में लौटेगा कश्मीर

जब हम कश्मीर के संदर्भ में भविष्य की चुनौतियों पर विचार करते हैं, तो इसे जान लेना भी जरूरी है कि यह एक नहीं अनेक है. कश्मीर के युवकों को भारत राष्ट्र की मुख्यधारा में लाना सबसे बड़ी चुनौती है. यह वर्तमान पीढ़ी मदरसों, स्कूलों और मजहबी स्थानों से संस्कारित होकर आई है, जिन पर कट्टरपंथी मुल्लों-मौलवियों का शिकंजा है. अब कश्मीर में एक ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली की समयोचित जरूरत रहेगी जो पाकिस्तान परस्त मजहबी मुल्लाओं और ‘निजामे मुस्तफा की हकूमत’ चाहने वाले नेताओं के निगरानी से दूर हो. वास्तव में इन्हीं लोगों ने इस्लाम की नकारात्मक परिभाषा करके कश्मीर के युवाओं को अपने ही सनातन कश्मीरियत (सह-अस्तित्व) से नफरत करना सिखाया है. इन्हीं लोगों ने स्वर्ग को नरक में तब्दील करके रख दिया है.

शिक्षा संस्थाओं में परिवर्तन के साथ राष्ट्रवादी साहित्य के प्रचार/प्रसार के लिए जरूरी आवश्यक पग  उठाने की योजना को साकार रूप देना होगा. कश्मीरी युवकों को अलगाववादियों की जकड़न से निकालने के लिए उन्हें यह समझाना पड़ेगा कि जिस कश्मीरियत के लिए जेहाद कर रहे हैं, उसका कश्मीर की धरती और सनातन (वास्तविक) कश्मीरियत से कुछ भी लेना देना नहीं है. यह तो कश्मीर पर हमला करने वाले विदेशी आक्रान्ताओं की दहशतगर्द तहजीब है.

इस मात्र छह सौ वर्ष पुरानी हमलावर तहजीब ने छह हजार  वर्ष पुरानी उस कश्मीरियत को तलवार के जोर पर समाप्त कर दिया है जिसमें ‘सर्वधर्म समभाव’, ‘सहअस्तित्व’, ‘समन्वय’ और ‘सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास’ जैसे मानवीय गुण थे. भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने इसी को इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत कहा था.

हिन्दुओं की सुरक्षित घर वापसी

दुर्भाग्य से विदेशी हमलावरों के आगे नतमस्तक होकर अपने ही पूर्वजों की उज्ज्वल संस्कृति को बर्बाद करने वाले कश्मीरी आज कश्मीर के मालिक बन बैठे हैं. और जिन लोगों ने विदेशियों के तलुए नहीं चाटे, अपने धर्म और धरती पर अडिंग रहे, अपने पूर्वजों के साथ गद्दारी करके हमलावरों की तहजीब (जेहादी कश्मीरियत) को नहीं अपनाया वे लोग विस्थापित होकर देश के कोने-कोने में बेसहारों की तरह अपने दिन काट रहे हैं. आश्चर्य की बात तो यह है कि विदेशी आक्रान्ताओं की तहजीब को कश्मीरियत कहने वाले लोग विस्थापित कश्मीरी हिन्दुओं का यह कहकर मजाक उड़ाते हैं-‘पंडितों के बिना कश्मीर अधूरा है’.

अतः अपने घरों से बेघर कर दिए गए इन विस्थापित कश्मीरियों की सुरक्षित एवं सम्मानजनक घर वापसी भाजपा सरकार तथा समस्त देश के समक्ष बहुत बड़ी चुनौती है. इस समस्या का समाधान करने के लिए कश्मीर के बहुसंख्यक मुस्लिम भाइयों को आगे आना चाहिए. जब तक मुसलमान बन्धु कट्टरपंथियों के खिलाफ एकजुट होकर अपने पंडित भाइयों (चचेरे भाइयों) के सम्मान और सुरक्षा की गारंटी नहीं लेते, तब तक पंडित भाइयों का वहां जाना संभव नहीं हो सकता. फौज के सहारे कब तक रहेंगे यह बेसहारे लोग. अपने पूर्वजों की धरती पर सम्मान पूर्वक रहना यही तो चुनौती है.

पाकिस्तानी घुसपैठ का अंत

कश्मीर को पुनः पटरी पर लाने के लिए पाकिस्तान की ओर से होने वाली सशस्त्र घुसपैठ को पूर्णतया समाप्त करने के लिए बालाकोट जैसी कई सैन्य कर्रवाइयां करने में भारतीय सेना पूर्णतया सक्षम है. अब तो अधिकांश बड़े देश भारत के साथ खड़े हो गए हैं. विश्वास है कि भारत की सरकार पहले से ज्यादा प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ सीमा पर से आने वाले आतंकियों का ना केवल सफाया ही करेगी अपितु उनको भेजने वालों का भी निपटारा करके दम लेगी. रक्षामंत्री राजनाथ सिंह तथा सेना प्रमुख जनरल रावत के बयानों से तो यही आभास होता है कि इस चुनौती का भी बेअसर करके भारत की सरकार इस समस्या को भी दफन करने में कामयाब रहेगी.

आतंकवाद को जन्म देकर इसका पालन पोषण करने वाले राजनीतिक नेताओं कट्टरपंथी मजहबी सरगनाओं पर सरकार ने नकेल कसी है. इसे और ज्यादा कसने की जरूरत है. सरकार ने ऐसे सरगनाओं को जेलों में बंद किया है. इन्हें छोड़ने की जल्दबाजी सरकार को नहीं करनी चाहिए. आतंकवाद के इन जन्मदाताओं पर देशद्रोह के मुकदमे चलाने में रत्ती भर भी संकोच नहीं करना चाहिए. अगर इन मजहबी अजगरों के सर  नहीं कुचले गए तो यह पुन: फुंकार भरने लगेंगे.

मोदी है तो मुमकिन है

इसी तरह जिन घरों में आतंकवादियों को पनाह मिलती है, उन परिवारों को भी आतंकवादी घोषित करके सख्त कारवाई  करना समयोचित कदम होगा. प्रदेश के प्रशासन में घुसे हुए पाकिस्तान समर्थकों को भी खोज-खोज कर जेल में सींखचों में बंद करना होगा. अन्यथा ऐसे तत्व सरकार के फैसलों को क्रियान्वित नहीं होने देंगे. कश्मीर में बेहिसाब धार्मिक स्थलों (मस्जिदों) को आतंकवादी जेहादी वारदातों के लिए इस्तेमाल करते हैं. इस परंपरा पर रोक लगाने से अलगाववाद दम तोड़ देगा.

ध्यान देने की बात है कि जम्मू-कश्मीर में अलगाववादियों की संख्या बहुत कम है. आम नागरिक शेष भारतीयों की तरह अमन चैन से जीना चाहता है. ऐसे अमन पसंद देशभक्त नागरिकों में से राष्ट्रवादी नेतृत्व उभर कर सामने आ सकता है. अलगाववादी सरगनाओं को ठिकाने लगाकर देशभक्त कश्मीरियों को एकजुट करना आसान हो जाएगा. सरकार द्वारा ग्राम स्तर तक पंचों सरपंचों द्वारा विकास की योजना बनाई जा रही है. विकास की गति जैसे-जैसे तेज होगी, वैसे-वैसे अलगाववाद गिरता चला जाएगा . इससे सरकार आम कश्मीरी का दिल जीतने में सफल होगी.

अनुच्छेद 370 की आड़ में जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को अनेक मौलिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया था. इस प्रकार की तथ्यात्मक जानकारी देने के लिए बकायदा सरकारी स्तर पर प्रयास करके माहौल को शांत किया जा रहा है. भारतीय संविधान को जम्मू कश्मीर में पूरी तरह लागू करने का प्रयास युद्ध स्तर पर शुरू हो चुका है. बहुत शीघ्र इस सीमावर्ती प्रदेश का प्रत्येक नागरिक यह महसूस करेगा कि सारा भारत उसका है.

लेखर वरिष्ठ पत्रकार हैं.

September 3rd 2019, 2:55 am

03 सितम्बर / जन्म दिवस – दक्षिण के सेनापति यादवराव जोशी

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नई दिल्ली. दक्षिण भारत में संघ कार्य का विस्तार करने वाले यादव कृष्ण जोशी जी का जन्म अनंत चतुर्दशी (3 सितम्बर, 1914) को नागपुर के एक वेदपाठी परिवार में हुआ था. वे अपने माता-पिता के एकमात्र पुत्र थे. उनके पिता कृष्ण गोविन्द जोशी जी एक साधारण पुजारी थे. अतः यादवराव जी को बालपन से ही संघर्ष एवं अभावों भरा जीवन बिताने की आदत हो गयी.

यादवराव जी का डॉ. हेडगेवार जी से बहुत निकट सम्बन्ध था. वे डॉ. जी के घर पर ही रहते थे. एक बार डॉ. जी बहुत उदास मन से मोहिते के बाड़े की शाखा पर आये. उन्होंने सबको एकत्र कर कहा कि ब्रिटिश शासन ने वीर सावरकर की नजरबन्दी दो वर्ष के लिए बढ़ा दी है. अतः सब लोग तुरन्त प्रार्थना कर शांत रहते हुए घर जाएंगे. इस घटना का यादवराव जी के मन पर बहुत प्रभाव पड़ा. वे पूरी तरह डॉ. जी के भक्त बन गये. यादवराव जी एक श्रेष्ठ शास्त्रीय गायक थे. उन्हें संगीत का ‘बाल भास्कर’ कहा जाता था. उनके संगीत गुरू शंकरराव प्रवर्तक उन्हें प्यार से बुटली भट्ट (छोटू पंडित) कहते थे. डॉ. हेडगेवार जी की उनसे पहली भेंट 20 जनवरी, 1927 को एक संगीत कार्यक्रम में ही हुई थी.

वहां आये संगीत सम्राट सवाई गंधर्व ने उनके गायन की बहुत प्रशंसा की थी, पर फिर यादवराव ने संघ कार्य को ही जीवन का संगीत बना लिया. वर्ष 1940 से संघ में संस्कृत प्रार्थना का चलन हुआ. इसका पहला गायन संघ शिक्षा वर्ग में यादवराव जी ने ही किया था. संघ के अनेक गीतों के स्वर भी उन्होंने बनाये थे. एमए तथा कानून की परीक्षा उत्तीर्ण कर यादवराव जी को प्रचारक के नाते झांसी भेजा गया. वहां वे तीन-चार मास ही रहे कि डॉ. जी का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया. अतः उन्हें डॉ. जी की देखभाल के लिए नागपुर बुला लिया गया. वर्ष 1941 में उन्हें कर्नाटक प्रांत प्रचारक बनाया गया. इसके बाद वे दक्षिण क्षेत्र प्रचारक, अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख, प्रचार प्रमुख, सेवा प्रमुख तथा वर्ष 1977 से 84 तक सह सरकार्यवाह रहे. दक्षिण में पुस्तक प्रकाशन, सेवा, संस्कृत प्रचार आदि के पीछे उनकी ही प्रेरणा थी. ‘राष्ट्रोत्थान साहित्य परिषद’ द्वारा ‘भारत भारती’ पुस्तक माला के अन्तर्गत बच्चों के लिए लगभग 500 छोटी पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है. यह बहुत लोकप्रिय प्रकल्प है.

छोटे कद वाले यादवराव जी का जीवन बहुत सादगीपूर्ण था. वे प्रातःकालीन अल्पाहार नहीं करते थे. भोजन में भी एक दाल या सब्जी ही लेते थे. कमीज और धोती उनका प्रिय वेष था, पर उनके भाषण मन-मस्तिष्क को झकझोर देते थे. एक राजनेता ने उनकी तुलना सेना के जनरल से की थी. उनके नेतृत्व में कर्नाटक में कई बड़े कार्यक्रम हुए. वर्ष 1948 तथा वर्ष 1962 में बंगलौर में क्रमशः आठ तथा दस हजार गणवेशधारी तरुणों का शिविर, वर्ष 1972 में विशाल घोष शिविर, वर्ष 1982 में बंगलौर में 23,000 संख्या का हिन्दू सम्मेलन, वर्ष 1969 में उडुपी में विहि परिषद का प्रथम प्रांतीय सम्मेलन, वर्ष 1983 में धर्मस्थान में विहि परिषद का द्वितीय प्रांतीय सम्मेलन, जिसमें 70,000 प्रतिनिधि तथा एक लाख पर्यवेक्षक शामिल हुए. विवेकानंद केन्द्र की स्थापना तथा मीनाक्षीपुरम् कांड के बाद हुए जनजागरण में उनका योगदान उल्लेखनीय है.

वर्ष 1987-88 में वे विदेश प्रवास पर गये. केन्या के एक समारोह में वहां के मेयर ने जब उन्हें आदरणीय अतिथि कहा, तो यादवराव बोले, मैं अतिथि नहीं आपका भाई हूं. उनका मत था कि भारतवासी जहां भी रहें, वहां की उन्नति में योगदान देना चाहिए. क्योंकि हिन्दू पूरे विश्व को एक परिवार मानते हैं. जीवन के संध्याकाल में वे अस्थि कैंसर से पीड़ित हो गये. 20 अगस्त, 1992 को बंगलौर संघ कार्यालय में ही उन्होंने अपनी जीवन यात्रा पूर्ण की.

September 2nd 2019, 7:36 pm

तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् में गैर हिन्दू नहीं कर पाएंगे नौकरी, सरकार का आदेश

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पिछले दिनों तिरुमला तिरुपति देवस्थान की एक महिला कर्मचारी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. वीडियो में मंदिर की एक कर्मचारी को परिसर के पास दूसरे धर्म की प्रार्थना करते हुए दिखाया गया था, जिसके बाद सोशल मीडिया और सार्वजनिक रूप से इसकी काफी आलोचना हुई थी. हिन्दू संगठनों और मठों ने तिरुमाला तिरुपति देवस्थान के प्रबंधन से उस कर्मचारी की शिकायत भी की थी.

अब आंध्र प्रदेश की जगन मोहन रेड्डी सरकार ने तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् (टीटीडी) के कर्मचारियों के लिए एक आदेश जारी किया. आंध्र प्रदेश सरकार ने तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् में कार्यरत गैर हिन्दू कर्मचारियों के लिए नौकरी छोड़ने का आदेश जारी किया है. इस आदेश के अनुसार, मंदिर ट्रस्ट में कार्यरत गैर हिन्दू या जिन्होंने हिन्दू धर्म को छोड़कर किसी अन्य पंथ या मजहब को अपना लिया है, उन कर्मचारियों को अपनी नौकरी छोड़नी होगी.

तिरुपति देवस्थानम् में कुल 48 गैर-हिन्दू अधिकारी/कर्मचारी हैं. इसके अलावा अपने आदेश में सरकार ने सभी कर्मचारियों की जांच करने के लिए भी कहा है. सरकार ने टीटीडी में काम करने वाले कर्मचारियों के बारे में जांच के आदेश दिए हैं. मुख्य सचिव एलवी सुब्रमण्यम ने सप्ताह के प्रारंभ में मंदिर का दौरा किया था. तब उन्होंने कहा था कि कर्मचारियों के घरों की भी एकाएक जांच की जाएगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे गैर-हिन्दू धर्म का पालन तो नहीं कर रहे हैं.

शुरुआती जांच में यह जानकारी भी मिली है कि नियमों के खिलाफ तिरुमला तिरुपति देवस्थान में कुल 48 गैर हिन्दुओं को नौकरी दी गई है.

सरकारी आदेश

राज्य के मुख्य सचिव एलवी सुब्रमण्यम ने कहा कि ट्रस्ट में काम करने वाले कई कर्मचारी ऐसे हैं, जिन्होंने हिन्दू धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपना लिया है. हालांकि यह उनका चयन है. उन्हें ऐसा करने से कोई नहीं रोक सकता, लेकिन वे तिरुपति की नौकरी नहीं कर सकते हैं. किसी को भी दूसरों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का अधिकार नहीं है. सुब्रमण्यम ने कहा, ये कर्मचारी दुनिया के सबसे अमीर हिन्दू मंदिर तिरुमला का प्रबंधन करते हैं. ऐसे में इन कर्मचारियों को खुद ही साहस दिखाते हुए सामने आकर इस्तीफा देना चाहिए.

आंध्र प्रदेश सरकार ने यह आदेश कुछ संगठनों द्वारा तिरुमला में बढ़ते कन्वर्जन को लेकर जताई गई चिंता के बाद जारी किया है. जिसके मुताबिक पवित्र तिरुपति मंदिर के कई कर्मचारियों का कन्वर्जन करा दिया गया है. बावजूद इसके वह तिरुपति मंदिर में अपनी सेवाएं देते रहे हैं.

September 2nd 2019, 9:11 am

पाकिस्तान में एक और हिन्दू लड़की का जबरन धर्मपरिवर्तन कर निकाह करवाया

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पाकिस्तान में एक और हिन्दू लड़की को अगवा करने का मामला सामने आया है. रेणुका कुमारी को 29 अगस्त को सिंध प्रांत के सुक्कुर स्थित उसके कॉलेज से अगवा कर जबरन इस्लाम कबूल करवाया गया. कहा जा रहा है कि लड़की को सियालकोट में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी के कार्यकर्ता मिर्जा दिलावर बेग के घर पर रखा गया है.

ऑल पाकिस्तान हिन्दू पंचायत ने फेसबुक पर घटना की जानकारी दी है. इसमें कहा गया है कि लड़की सुक्कुर के इंस्टीट्यूट ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की बीबीए की छात्रा है. पोस्ट के अनुसार बीते दो महीने में पाकिस्तान में इस तरह की यह तीसरी घटना है. अपहृत लड़की की पहचान रेणुका कुमारी के रूप में हुई है.

अखिल पाकिस्तान हिन्दू पंचायत, एक गैर-लाभकारी संगठन ने फेसबुक पोस्ट में दावा किया गया कि लड़की 29 अगस्त को अपने कॉलेज के लिए रवाना हुई और उसके बाद से लापता हो गई. इस बीच पुलिस ने मुस्लिम युवक के भाई को गिरफ्तार कर लिया और अभी भी हिरासत में है. दंपति सियालकोट में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के कार्यकर्ता मिर्जा दिलावर बेग के निवास पर रह रहा है.

फेसबुक पर लड़की के लापता होने की FIR कॉपी शेयर की गई है.

इससे पहले पाकिस्तान में ननकाना साहिब गुरुद्वारा तंबी साहिब के एक ग्रन्थी की 19 साल की बेटी को गुंडों ने उसके घर से उठा लिया था. इसके बाद जबरन इस्लाम क़बूल करवाकर उसका निकाह हाफ़िज सईद के आतंकी संगठन के जमात-उद-दावा के मोहम्मद हसन से करवा दिया था.

यह मामला सामने आने के बाद एक वीडियो जारी कर दावा किया गया कि लड़की ने अपनी मर्जी से इस्लाम कबूल किया है. बाद में लड़की के घर लौटने की भी खबर आई थी, जिसका उसके भाई ने खंडन किया था.

पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों को अगवा कर इस्लाम कबूल करवाने का सिलसिला पुराना है. ऐसे ज्यादातर मामलों में पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करती. बीते दिनों खबर आई थी कि इसके कारण पाकिस्तान में सिक्खों की आबादी 15 साल में 40 हजार से घटकर 8 हजार हो गई है.

September 2nd 2019, 7:21 am

पौधारोपण के साथ ही उनकी देखभाल भी आवश्यक

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विश्व संवाद केंद्र शिमला द्वारा पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन

शिमला. विश्व संवाद केंद्र शिमला ने शहर के टूटीकंडी क्षेत्र में में पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया. कार्यक्रम में विद्युत बोर्ड से सेवानिवृत निदेशक राजेश ठाकुर मुख्य अतिथि तथा नगर निगम महापौर कुसुम सदरेट विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे.

राजेश ठाकुर ने कहा कि विश्व संवाद केंद्र पौधारोपण अभियान से पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. उन्होंने कहा कि जब पूरा विश्व ग्लोबल वार्मिंग के खतरों से जूझ रहा है और विश्व का हर प्रांत इससे प्रभावित हो रहा है तो ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अपनी सहभागिता निभानी होगी.

महापौर कुसुम सदरेट ने कहा कि पौधारोपण के साथ ही रोपे गए पौधों की देखभाल करना आवश्यक है. पौधारोपण करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को एक-एक पौधा गोद लेकर उसकी देख-रेख करनी चाहिए, तभी पौधारोपण कार्यक्रम सफल होंगे.

विश्व संवाद केंद्र प्रमुख दलेल ठाकुर ने कहा कि हर वर्ष पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है तथा रोपे गए पौधों का संरक्षण भी विश्व संवाद केंद्र करता है.

विश्व संवाद केन्द्र न्यास के सचिव राजेश बंसल ने सभी का धन्यवाद किया और भविष्य में न्यास को सहयोग करने का आग्रह किया.

इस अवसर पर टुटीकंडी के आसपास के जंगल में देवदार के 100 से अधिक पौधे रोपे गए.

September 2nd 2019, 6:25 am

विंग कमांडर अभिनंदन ने वायुसेना प्रमुख के साथ उड़ाया मिग-21

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वीर चक्र विजेता विंग कमांडर अभिनंदन दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिए फिर तैयार हैं. सोमवार को पठानकोट एयरबेस से विंग अभिनंदन ने फिर से मिग-21 को उड़ाया, जिसमें भारतीय वायुसेना के प्रमुख एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ भी उनके साथ थे. इस दौरान अभिनंदन नये लुक और नये जोश में दिखायी दिए.

द इंस्टीट्यूट ऑफ एरोस्पेस मेडिसिन ने गहन मेडिकल चेक-अप के बाद अभिनंदन को पिछले महीने ही उड़ान की परमिशन दे दी थी. इसके बाद अभिनंदन ने एयर चीफ बीएस धनोआ के साथ फिर से लड़ाकू विमान मिग-21 की उड़ान का आगाज़ किया.

एयर चीफ धनोआ भी मिग-21 के फाइटर पायलट रह चुके हैं. सन् 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान एयरचीफ धनोआ 17 स्क्वैड्रन का नेतृत्व कर चुके हैं.

विंग कमांडर अभिनंदन के साथ मिग-21 की आधे घंटे की उड़ान के बाद एयर चीफ मार्शल धनोआ ने कहा कि उन्होंने भी पहले मिग-21 से इमरजेंसी इजेक्ट किया था. लेकिन उन्हें दोबारा विमान उड़ाने में 9 महीने का समय लगा. जबकि अभिनंदन ने इसे 6 महीने में ही हासिल कर लिया. ये गर्व की बात है.

September 2nd 2019, 6:25 am

कश्मीर की स्वतंत्रता और संस्कृति का रक्षक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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नरेंद्र सहगल

भारत की सर्वांग स्वतंत्रता, सुरक्षा एवं विकास के ध्येय के साथ आगे बढ़ रहे संघ के स्वयंसेवकों ने जम्मू-कश्मीर की रक्षा, भारत में विलय, अनुच्छेद 370 तथा 35/ए  का विरोध, भारतीय सेना की सहायता, कश्मीर से विस्थापित कर दिए गए लाखों हिंदुओं की सम्भाल, अमरनाथ भूमि आंदोलन, तिरंगे झण्डे के लिए बलिदान इत्यादि अनेकों मोर्चों पर स्वयंसेवकों ने मुख्य भूमिका निभाई है.

वर्तमान में भारत सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 तथा 35/ए को हटाने, जम्मू कश्मीर का पुनर्गठन करने, लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश घोषित करने एवं जम्मू और कश्मीर का ‘पूर्ण राज्य’ का दर्जा वापस लेने जैसे साहसिक एवं ऐतिहासिक कदम उठाए गए हैं . इतनी प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति के निर्माण में संघ शाखाओं में दिए जाने वाले राष्ट्रभक्ति के संस्कारों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता. जम्मू-कश्मीर की स्वतंत्रता, सुरक्षा एवं विकास के सभी मोर्चों पर स्वयंसेवकों ने बलिदान देकर अपनी राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया है . अतः वर्तमान में हुए ऐतिहासिक परिवर्तन को समझने के लिए स्वयंसेवकों द्वारा 72 वर्ष तक किए गए संघर्ष की जानकारी भी देशवासियों को होना आवश्यक है.

स्वयंसेवक बन गए सैनिक

देश विभाजन के समय संघ के तरुण स्वयंसेवकों ने कश्मीर की रक्षा के लिए जो बलिदान दिए, वे भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखने योग्य हैं. 15 अगस्त, 1947 प्रात: श्रीनगर में पाकिस्तानी तत्वों ने गड़बड़ी करनी शुरू कर दी. सभी सरकारी भवनों पर पाकिस्तान के हरे झ डे फहरा दिए. संघ के स्वयंसेवकों ने तुरंत संघ कार्यालय पर योजना बनाई. देखते ही देखते पाकिस्तान के झंडें उतार फेंके गए.

संघ के दो प्रमुख प्रचारकों हरीश भनोट और मंगल सेन ने पाकिस्तान की सैनिक गतिविधियों और संभावित आक्रमण की सूचना प्रमुख कार्यकर्ता बलराज मधोक को दी. महाराजा ने बलराज मधोक को बुलाया सारी जानकारी प्राप्त करने के बाद महाराजा ने संघ के 200  स्वयंसेवक उपस्थित करने का निर्देश दिया.

प्रात: 6 बजे 200 से आधिक स्वयंसेवक वहां उपस्थित थे. थोड़ी देर बाद फौजी ट्रक आए और इन तरुणों को लेकर बादामीबाग सैनिक छावनी में पहुँच गए. वहां तुरंत स्वयंसेवकों को राईफल चलानी सिखायी गई . शाम तक ये युवक मोर्चे पर जा पहुंचे. भारतीय फौजों के आने तक 2 दिन तक इन स्वयंसेवक सैनिकों ने रियासती फ़ौज की मदद की. शेख अब्दुल्ला श्रीनगर पर आक्रमण होने की जानकारी मिलते ही कश्मीरी जनता को उनके हाल पर छोड़ कर परिवार सहित बंबई भाग गया था . घाटी को सँभाला और बचाया था पहले संघ के स्वयंसेवकों ने बाद में भारतीय सेना ने, भगोड़े शेख अब्दुल्ला ने नहीं.

पाकिस्तान की सेना को खदेड़ते हुए भारतीय सैनिकों की अनेक प्रकार की कठिनाइयों को स्वयंसेवकों ने अपने परिश्रम तथा बलिदान से दूर कर दिया. जम्मू सम्भाग के कोटली नामक स्थान पर स्थित एक नदी के किनारे भारतीय सैनिकों के लिए गिराए गए बारूद के बक्से पाकिस्तानी फ़ौज के नियन्त्रण वाले क्षेत्र में गिर गये. सैनिक अफसरों ने संघ कार्यालय में जाकर सहायता मांगी.  संघ के 8 युवा स्वयंसेवकों ने इन बक्सों को उठा कर लाने का बीड़ा उठाया. वे जंगली रास्ते से रेंगते हुए वहाँ पहुंचे और बारूद के आठों बक्से उठा कर ले आये .  इस काम में 6 स्वयंसेवक पाकिस्तान की गोलियों से वीरगति को प्राप्त हुए.

विलय करवाने में श्री गुरुजी की भूमिका

महाराजा हरि सिंह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री गुरुजी गोलवलकर का बहुत सम्मान करते थे. गाँधी जी एवं सरदार पटेल भी इस मित्रता को जानते थे. अत: उन्होंने श्री गुरु जी से इस समस्या के समाधान हेतु निवेदन किया. श्री गुरुजी सरदार पटेल की व्यवस्था के अंतर्गत सरकारी विमान से पहले दिल्ली पहुंचे. उन्होंने सरदार पटेल से संक्षिप्त बातचीत की और उसी दिन 17 अक्टूबर, 1947 को वे श्रीनगर पहुंच गए. उनके साथ संघ के पंजाब प्रांत प्रचारक माधवराव मूले तथा उत्तर प्रदेश के प्रांत संघचालक बैरिस्टर नरेंद्रजीत सिंह भी थे. ये सब लोग श्रीनगर में बैरिस्टर साहब की ससुराल में ठहरे तथा 18 अक्टूबर, 1947 को महाराजा से भेंट हुई. इस भेंट के समय युवराज कर्णसिंह, रियासत के दीवान मेहरचंद महाजन एवं महाराज के निजी सहायक कैप्टन दीवान सिंह भी मौजूद थे.

बहुत ही प्रेमपूर्वक माहौल में हुए इस वार्तालाप में श्री गुरुजी ने महाराजा को सरदार पटेल के हवाले से आश्वस्त कराते हुए कहा, “आप हिन्दू राजा हैं”. पाकिस्तान में विलय करने से आपकी हिन्दू प्रजा को भीषण संकटों से संघर्ष करना पड़ेगा. यह ठीक है कि अभी हिंदुस्तान और कश्मीर के रास्ते में रेल लाईन नहीं है, परन्तु सब ठीक हो जाएगा. आपका और ‘जम्मू कश्मीर’ रियासत का भला इसी में है कि आप भारत में विलय करें.

श्री गुरुजी वापस दिल्ली आये और सरदार पटेल को सारी जानकारी दे कर नागपुर लौट गए. तत्पश्चात् महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर को जम्मू कश्मीर के भारत में विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए. 27 अक्टूबर को भारत के गवर्नर जनरल लार्ड माउन्टबेटन ने विलय स्वीकार करते हुए जम्मू कश्मीर को भारत में शामिल कर लिया. परन्तु देश के दुर्भाग्य से भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर नेहरू ने जम्मू कश्मीर के महाराजा हरी सिंह को रियासत की सत्ता शेख अब्दुल्ला को सौंपने का आदेश दे दिया.

महाराजा को जम्मू कश्मीर छोड़ देने की हिदायत दे दी. यहीं से जम्मू कश्मीर की समस्या का श्री गणेश हो गया. पाकिस्तान की सेना श्रीनगर तक आ पहुंची. जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय होते ही भारतीय सेना ने कश्मीर की ओर कूच कर दिया.

स्वयंसेवकों ने तैयार की हवाई पट्टियां

भारतीय वायु सेना को जम्मू कश्मीर में उतारने के लिए हवाई पट्टियाँ तो दयनीय हालत में थीं. उन्हें शीघ्र ठीक करने की जरूरत थी. अतः फौजी अफसरों और नागरिक अधिकारियों की निगाह संघ के स्वयंसेवकों पर गई. संघ के अधिकारी से बातचीत की गई. सब तैयार थे. आदेश मिलते ही हजारों स्वयंसेवकों ने कमर कस ली. श्रीनगर, पुंछ और जम्मू, इन तीन स्थानों पर हवाई पट्टियाँ बनाने और सँवारने का काम शुरू हो गया. यह काम दिन को तो चला ही था, परंतु समय की कमी और जरूरत की वजह से रात को भी चलता रहा. जमीन साफ करने का सामान अर्थात् गेंती-फावड़ा-खुर्पे इत्यादि की व्यवस्था भी संघ ने ही की.’देश को सबकुछ देंगे, बदले में कुछ नहीं लेंगे’ के सिद्धांत पर चलनेवाले स्वयंसेवकों ने न रात देखी और न दिन, अपने कड़े परिश्रम से निश्चित अवधि के भीतर तीनों हवाई पट्टियों को हवाई जहाजों के उतरने योग्य बना दिया.

डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी व स्वयंसेवकों का बलिदान

पंडित जवाहरलाल नेहरू के खास दोस्त मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के संस्थापक शेख मुहम्मद अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर के वजीरे आला (मुख्यमंत्री) बनते ही अपनी हिंदू विरोधी मानसिकता का प्रदर्शन करना प्रारंभ कर दिया. कश्मीर के अल्पसंख्यक हिंदुओं और जम्मू सम्भाग के हिंदुओं पर तरह-तरह के गैरकानूनी जुर्म ढाए जाने लगे. मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के लाल झण्डे को रियासत का झण्डा बना दिया गया. हिंदुओं को उनके धार्मिक एवं मौलिक अधिकारों से भी वंचित किया जाने लगा.

शेख अब्दुल्ला के द्वारा की जाने वाली एकतरफा तानाशाही के विरुद्ध जम्मू के लोगों ने एक प्रचण्ड जनान्दोलन करने का फैसला किया. संघ के प्रांत संघचालक पंडित प्रेमनाथ डोगरा के नेतृत्व में प्रजा परिषद नामक एक संगठन बनाया. इस संगठन में शेख के तानाशाही शासन एवं उसकी हिन्दू विरोधी राजनीतिक कार्य-प्रणाली को समाप्त करने के उद्देश्य से धरने, प्रदर्शनों, सत्याग्रहों एवं मुस्लिम कॉन्फ्रैंस के झण्डे (रियासती झण्डे) को उतारकर तिरंगा लहराने जैसे कार्यक्रमों की झड़ी लगा दी. यह आंदोलन जम्मू-कश्मीर सहित पूरे देश में फैल गया.

संघ ने अपनी पूरी शक्ति इस आंदोलन को सफल बनाने में झौंक दी. उस समय संघ के 27 प्रचारकों को भी इस आंदोलन की बागडोर संभालने के आदेश दे दिए गए. सरकारी भवनों पर तिरंगा लहराते हुए 17 स्वयंसेवक पुलिस की गोलियों से वीरगति को प्राप्त हुए. हजारों कार्यकर्ताओं को जेलों में बंद कर दिया गया. बलिदान देने, जख्मी होने और अमानवीय यातनाएं सहते हुए भी आम जनता की भागीदारी बढ़ती गई. इतने पर भी भारत के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू का दिल नहीं पसीजा.

इन परिस्थितियों में जनसंघ के अध्यक्ष डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने प्रजापरिषद के आंदोलन का समर्थन कर दिया. एक देश में दो प्रधान, दो निशान, और दो विधान नहीं चलेंगें के उद्घोष के साथ बिना परमिट लिए जम्मू कश्मीर में प्रवेश किया. कश्मीर मिलीशिया (पुलिस) ने शेख के आदेशानुसार डॉक्टर साहब को गिरफ्तार करके श्रीनगर की तन्हाई जेल में डाल दिया. वहां रहस्यमयी परिस्थितियों में डॉक्टर मुखर्जी की मृत्यु हो गई.

सारे देश में हाहाकार मच गया नेहरू जी भी घबरा गए. उन्होंने प्रजापरिषद की अधिकांश मांगें मान ली. परमिट सिस्टम समाप्त हो गया. सदर-ए-रियासत और वजीरे आला के स्थान पर राज्यपाल और मुख्यमंत्री नाम स्वीकार कर लिए गए. शेख अब्दुल्लाह को गिरफ्तार करके जेल में भेज दिया गया. परंतु नेहरु जी ने अनुच्छेद 370 को नहीं हटाया. अब केंद्र में स्थापित भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने डॉक्टर श्यामप्रसाद के एजेंडे को सफल कर दिया है. इसे संघ के स्वयंसेवकों द्वारा दिए गए बलिदानों का फल कहने में कोई भी अतिश्योक्ति नहीं होगी.

संघ के स्वयंसेवकों ने गत 72 वर्षों में जम्मू कश्मीर की स्वतंत्रता, सुरक्षा और सम्मान के लिए निरंतर संघर्ष किया है. पाकिस्तान द्वारा किए गए आक्रमणों के समय स्वयंसेवकों ने समाज का मनोबल बढ़ाने के साथ प्रत्यक्ष सीमा पर जाकर सैनिकों की प्रत्येक प्रकार की सहायता भी की है. आतंकवादियों का सामना करने के लिए स्थापित की गई सुरक्षा समितियों में संघ का महत्वपूर्ण योगदान रहा. 1989 में कश्मीर घाटी से निकाल दिए गए कश्मीरी हिंदुओं के देखभाल की जिम्मेदारी निभाई है.

एक और महत्वपूर्ण कार्य को सम्पन्न करके संघ ने वर्तमान में हुए ऐतिहासिक परिवर्तन में अपनी पार्श्व भूमिका निभाई है. आठ वर्ष पूर्व स्वयंसेवकों द्वारा गठित जम्मू कश्मीर स्टडी सर्कल ने कश्मीर समस्या की जड़ोंका गहराई से अध्ययन करके अनेक ऐतिहासिक तथ्य सरकार और जनता के समक्ष प्रस्तुत किए हैं. निश्चित रूप से इस शोध कार्य का परिणाम सामने आया है. इसमें कोई भी संशय नहीं हो सकता कि वर्तमान सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति, ठोस निर्णय करने की परिपक्व क्षमता से संयमित दूरदर्शिता और सूझबूझ के परिणाम स्वरूप एक ही झटके में इतना बड़ा परिवर्तन संभव हो सका. सरदार पटेल, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी, श्री गुरुजी, डॉ.आंबेडकर धारा 370 के विरोधी थे, वे इसे संविधान में शामिल करने के खिलाफ थे. उनका स्वप्न अब साकार हुआ है. और उनका स्वप्न राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने ही पूरा किया है.

(लेखक पूर्व संघ प्रचारक, व पत्रकार हैं)

September 2nd 2019, 3:08 am

भारतीय ज्ञान का खजाना – 10

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भारत का उन्नत धातुशास्त्र

हमारे भारत में, जहां-जहां भी प्राचीन सभ्यता के प्रमाण मिले हैं (अर्थात् नालन्दा, हड़प्पा, मोहन जोदड़ो, तक्षशिला, धोलावीरा, सुरकोटड़ा, दायमाबाग, कालीबंगन इत्यादि), इन सभी स्थानों पर खुदाई में प्राप्त लोहा, तांबा, चाँदी, सीसा इत्यादि धातुओं की शुद्धता का प्रतिशत 95% से लेकर 99% है. यह कैसे संभव हुआ? आज से चार, साढ़े चार हजार वर्ष पहले इन धातुओं को इतने शुद्ध स्वरूप में परिष्कृत करने की तकनीक भारतीयों के पास कहाँ से आई?

प्राचीनकाल में भारत को ‘सुजलाम सुफलाम’ कहा जाता था. हमारा देश अत्यंत संपन्न था. स्कूलों में पढ़ाया जाता है कि प्राचीनकाल में भारत से सोने का धुआं निकलता था. भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था. ज़ाहिर है कि अपने देश में भरपूर सोना था. अनेक विदेशी प्रवासियों ने अपने अनुभवों में लिख रखा है कि विजयनगर साम्राज्य के उत्कर्ष काल में हम्पी के बाज़ार में सोना और चाँदी को सब्जी की तरह आराम से बेचा जाता था.

उससे थोड़ा और पहले के कालखण्ड में हम जाएं तो अलाउद्दीन खिलजी ने जब पहली बार देवगिरी पर आक्रमण किया था, तब पराजित हुए राजा रामदेवराय ने उसे कुछ मन स्वर्ण दिया था. इसका अर्थ यही है कि प्राचीनकाल से ही भारत में सोना, चाँदी, ताम्बा, जस्ता इत्यादि धातुओं के बारे में जानकारी तो थी ही, बल्कि उन्हें शुद्ध करने की प्रक्रिया भी संपन्न की जाती थी.

मजे की बात यह कि बहुत से लोगों को पता ही नहीं है कि, विश्व की अत्यंत प्राचीन, और आज की तारीख में भी उपयोग की जाने वाली सोने की खदान भारत में है. सोने की इस खदान का नाम है ‘हट्टी’. कर्नाटक के उत्तर-पूर्व भाग में स्थित यह स्वर्ण खदान रायचूर जिले में है. सन् 1955 में ऑस्ट्रेलिया के डॉक्टर राफ्टर ने इस खदान में मिले लकड़ी के दो टुकड़ों की कार्बन डेटिंग करने से यह पता चला कि यह खदान लगभग दो हजार वर्ष पुरानी है. हालांकि संभावना यह बनती है कि यह खदान इससे भी पुरानी हो सकती है. वर्तमान में आज भी इस खदान से ‘हट्टी गोल्डमाईन्स लिमिटेड’ नामक कम्पनी सोने का खनन करती है.

इस खदान की विशिष्टता यह है कि लगभग दो हजार वर्ष पहले यह खदान 2300 फीट गहराई तक खोदी गई थी. अब सोचिये कि यह उत्खनन कैसे किया गया होगा…? कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह खनन कार्य ‘फायर सेटिंग’ पद्धति से किया गया. अर्थात् धरती के अंदर चट्टानों को लकड़ियों में आग लगाकर गर्म किया जाता है, और उस पर अचानक पानी डालकर ठंडा किया जाता है. इससे उस स्थान पर धरती में दरारें पड़ जाती हैं. इस प्रक्रिया से बड़े-बड़े चट्टानी क्षेत्रों में दरारें डालकर उन्हें फोड़ा जाता है. इसी खदान में 650 फीट गहराई वाले स्थान पर एक अत्यंत प्राचीन ऊर्ध्वाधर शाफ्ट मिला है, जो यह दर्शाता है कि धातु खनन के क्षेत्र में भारत का प्राचीन कौशल्य कितना उन्नत था.

परन्तु केवल सोना ही क्यों…? लोहा प्राप्त करने के लिए लगने वाली बड़ी विशाल भट्टियाँ और उनकी तकनीक भी उस कालखण्ड में बड़ी मात्रा में उपलब्ध थीं. इसी लेखमाला में ‘लौहस्तंभ’ नामक लेख में हमने दिल्ली के कुतुबमीनार प्रांगण में खड़े लौह स्तंभ के बारे में चर्चा की है. वह स्तंभ लगभग डेढ़-दो हजार वर्ष पुराना है, परन्तु आज भी उसमें आंधी -बारिश के बावजूद रत्ती भर की जंग भी नहीं लगी है. इक्कीसवीं शताब्दी के वैज्ञानिक भी उस अदभुत लौह स्तम्भ का रहस्य पता नहीं कर पाए हैं और आश्चर्यचकित हैं कि स्वभावतः जिस लोहे में जंग लगती है, तो इस लोह स्तंभ में जंग क्यों नहीं लगती?

इसी लौहस्तंभ के समान ही पूरी तरह ताम्बा धातु से बनी 7 फुट ऊँची एक बुद्ध मूर्ति है. यह मूर्ति चौथी शताब्दी की है और फिलहाल लन्दन के ब्रिटिश संग्रहालय में रखी है. बिहार में खुदाई में प्राप्त इस मूर्ति की विशेषता यही है कि इसका ताम्बा खराब ही नहीं होता, एक समान चमचमाता रहता है.

हाल ही में राकेश तिवारी नामक पुरातत्त्वविद ने गंगा किनारे कुछ उत्खनन किया, जिससे यह जानकारी प्राप्त हुई कि ईसा पूर्व लगभग 2800 वर्ष पहले से ही भारत में परिष्कृत किस्म का लौह तैयार करने की तकनीक और विज्ञान उपलब्ध था. इससे पहले भी उपलब्ध हो सकती है, परन्तु लगभग 4800 वर्ष पहले के प्रमाण तो प्राप्त हो चुके हैं.

इसी प्रकार छत्तीसगढ़ के ‘मल्हार’ में कुछ वर्षों पहले जो उत्खनन हुआ, उसमें अथवा उत्तरप्रदेश के दादूपुर में ‘राजा नाल का टीला’ तथा लहुरादेव नामक स्थान पर किए उत्खनन में ईसा पूर्व 1800 से 1200 वर्ष के लोहा और तांबा से बने अनेक बर्तन एवं वस्तुएँ मिली हैं जो एकदम शुद्ध स्वरूप की धातु है.

ईसा पूर्व तीन सौ वर्ष, लोहा /फौलाद को अत्यंत परिष्कृत स्वरूप में बनाने वाली अनेक भट्टियाँ दक्षिण भारत में मिली हैं. आगे चलकर इन भट्टियों को अंग्रेजों ने क्रूसिबल टेक्नीक (Crucible Technique) नाम दिया. इस पद्धति में शुद्ध स्वरूप में लोहा, कोयला और कांच जैसी सामग्री मूस पात्र में लेकर उस पात्र (बर्तन) को इतना गर्म किया जाता है कि लोहा पिघल जाता है तथा कार्बन को अवशोषित कर लेता है. इसी उच्च कार्बनिक लोहे को अरब लड़ाकों ने ‘फौलाद’ का नाम दिया.

वाग्भट्ट द्वारा लिखित ‘रसरत्न समुच्चय’ नामक ग्रन्थ में धातुकर्म हेतु लगने वाली भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार की भट्टियों का वर्णन किया गया है. महागजपुट, गजपुट, वराहपुट, कुक्कुटपुट और कपोतपुट जैसी भट्टियों का वर्णन इसमें है. इन भट्टियों में डाली जाने वाली गोबर के कंडों की संख्या एवं उसी अनुपात में निर्मित होने वाले तापमान का उल्लेख भी इसमें आता है. उदाहरणार्थ, महागजपुट भट्टी के लिए गोबर के 2000 कंडे लगते थे, जबकि कम तापमान पर चलने वाली कपोतपुट भट्टी के लिए केवल आठ कंडों की आवश्यकता होती थी.

आज के आधुनिक फर्नेस वाले जमाने में गोबर पर आधारित भट्टियाँ अत्यधिक पुरानी तकनीक एवं आउटडेटेड कल्पना लगेगी. परन्तु ऐसी ही भट्टियों के माध्यम से उस कालखंड में लौहस्तंभ जैसी अनेकों अदभुत वस्तुएँ तैयार की गईं, जो आज के आधुनिक वैज्ञानिक भी निर्मित नहीं कर पाए हैं.

प्राचीनकाल की इन भट्टियों द्वारा उत्पन्न होने वाली उष्णता को मापने का प्रयास आधुनिक काल में हुआ. इन ग्रंथों में लिखे अनुसार ही, वैसी भट्टियाँ तैयार करके, उनसे उत्पन्न होने वाली गर्मी को नापा गया, जो वैसी ही निकली जैसी उस ग्रन्थ में उल्लेख की गई थी. 9000 से अधिक प्रकार की उष्णता के लिए वाग्भट ने मुख्यतः चार प्रकार की भट्टियों का वर्ना किया हुआ है –

१.  अंगारकोष्टी

२.  पातालकोष्टी

३.  गोरकोष्टी

४.  मूषकोष्टी

इन भट्टियों में से पातालकोष्टी का वर्णन धातुशास्त्र में उपयोग किए जाने वाले आधुनिक ‘पिट फर्नेस’ के समान ही है.

विभिन्न धातुओं को पिघलाने के लिए भारद्वाज मुनि ने ‘बृहद विमानशास्त्र’ नामक ग्रन्थ में 532 प्रकार के लुहारों के औजारों की रचना का वर्णन किया हुआ है. इतिहास में दमिश्क नामक स्थान की तलवारें प्रसिद्ध होती थीं, उनका लोहा भी भारत से ही निर्यात किया जाता था. अनेक विदेशी प्रवासियों ने अपने लेखन में कहा है कि भारत में ही अत्यंत शुद्ध किस्म का तांबा और जस्ता निर्मित किया जाता था.

भारत में बहुत प्राचीनकाल से तांबे का उपयोग किया जाता रहा है. भारत में ईसा पूर्व तीन चार सौ वर्ष पहले तांबे का उपयोग किए जाने के प्रमाण मिल चुके हैं. हड़प्पाकालीन तांबे के बर्तन भी मोहन जोदड़ो सहित अनेक स्थानों की खुदाई में प्राप्त हुए हैं. आज पाकिस्तान में स्थित बलूचिस्तान प्रांत में प्राचीनकाल में तांबे की अनेक खदानें थीं, इसका उल्लेख एवं प्रमाण मिले हैं. इसी प्रकार राजस्थान में खेत्री नामक स्थान पर प्राचीनकाल में तांबे की अनेक खदानें थीं, इसका भी उल्लेख कई ग्रंथों में मिलता है. अब यह सभी मानते हैं कि विश्व में तांबे का धातुकर्म सर्वप्रथम भारत में ही प्रारंभ हुआ. मेहरगढ़ के उत्खनन में तांबे के 8000 वर्ष पुराने नमूने मिले हैं. उत्खनन में ही अयस्कों से तांबा प्राप्त करने वाली भट्टियों के भी अवशेष मिले हैं तथा फ्लक्स के प्रयोग से लौह को आयरन सिलिकेट के रूप में अलग करने के प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं.

जस्ता (जिंक) नामक धातु का शोध भारत में ही किया गया है, यह बात भी हम में से कई लोगों की जानकारी में नहीं है. ईसा पूर्व नौवीं शताब्दी में राजस्थान में जस्ते का उपयोग किए जाने के कई प्रमाण मिल चुके हैं. इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इतिहास में अब तक ज्ञात जस्ते की सर्वाधिक प्राचीन खदान भी भारत के राजस्थान में ही है.

जस्ते की यह प्राचीनतम खदान ‘जावर’ नामक स्थान पर है. उदयपुर से 40 किमी दूर यह खदान आज भी जस्ते का उत्पादन करती है. आजकल ‘हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड’ की ओर से यहाँ पर जस्ते का उत्खनन किया जाता है. ऐसा कहा जाता है कि, ईसा पूर्व छठवीं शताब्दी में भी जावर की यह खदान कार्यरत थी. इस बारे में प्रमाण मिल चुके हैं. हालांकि जस्ता तैयार करने के लिए अत्यंत कुशलता, जटिलता एवं वैज्ञानिक पद्धति आवश्यक है, परन्तु भारतीयों ने जस्ता निर्माण की प्रक्रिया में प्रवीणता एवं कुशलता हासिल कर ली थी. आगे चलकर ‘रस रत्नाकर’ ग्रन्थ लिखने वाले नागार्जुन ने जस्ता बनाने की विधि को विस्तृत स्वरूप में लिखा हुआ है. आसवन (डिस्टिलेशन), द्रावण (लिक्विफिकेशन) इत्यादि विधियों का भी उल्लेख उन्होंने अपने ग्रंथ में किया है.

इन विधियों में खदान से निकले हुए जस्ते के अयस्क को अत्यंत उच्च तापमान (900 डिग्री सेल्सियस से अधिक) पर पहले पिघलाया जाता है (boiling). इस प्रक्रिया से निकलने वाली भाप का आसवन (डिस्टिलेशन) किया जाता है. उसे ठंडा करते हैं एवं इस प्रक्रिया से सघन स्वरूप में जस्ता (जिंक) तैयार होता है.

यूरोपीय देशों में सन् 1740 तक जस्ता नामक धातु के उत्पादन एवं निर्माण की प्रक्रिया की कतई जानकारी नहीं थी. ब्रिस्टल में व्यापारिक पद्धति से तैयार किए जाने वाले जस्ते की उत्पादन प्रक्रिया बिलकुल भारत की ‘जावर’ प्रक्रिया के समान ही थी. अर्थात् ऐसा कहा जा सकता है कि भारत में उत्पन्न होने वाले जस्ते की प्रक्रिया को देखकर ही यूरोप ने, शताब्दियों के पश्चात उसी पद्धति को अपनाया और जस्ते का उत्पादन आरम्भ किया.

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि भारत के धातुशास्त्र का विश्व के औद्योगिकीकरण में एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. सन् 1000 के आसपास जब भारत वैश्विक स्तर पर उद्योग जगत का बादशाह था, उस कालखंड में विभिन्न धातुओं से बनी वस्तुओं का निर्यात बड़े पैमाने पर किया जाता था. विशेषकर जस्ता और हाई कार्बन स्टील में तो भारत उस समय पूरे विश्व से मीलों आगे था तथा बाद में भी इस विषय की तकनीक और विज्ञान भारत ने ही दुनिया को दिया.

धातुशास्त्र के वर्तमान विद्यार्थी केवल इतनी सी बात का स्मरण रख सकें तो भी बहुत है…!!

– प्रशांत पोळ

September 1st 2019, 7:15 pm

02 सितम्बर / बलिदान दिवस – अनाथ बन्धु एवं मृगेन्द्र दत्त का बलिदान

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नई दिल्ली. अंग्रेजों के जाने के बाद भारत की स्वतन्त्रता का श्रेय भले ही कुछ नेता स्वयं लेते हों, पर वस्तुतः इसका श्रेय उन क्रान्तिकारी युवकों को है, जो अपनी जान हथेली पर लेकर घूमते थे. बंगाल ऐसे युवाओं का गढ़ था. ऐसे ही दो मित्र थे अनाथ बन्धु तथा मृगेन्द्र कुमार दत्त, जिनके बलिदान से शासकों को अपना निर्णय बदलने को विवश होना पड़ा.

उन दिनों बंगाल के मिदनापुर जिले में क्रान्तिकारी गतिविधियां जोरों पर थीं. इससे परेशान होकर अंग्रेजों ने वहां जेम्स पेड्डी को जिलाधिकारी बनाकर भेजा. वह बहुत क्रूर अधिकारी था. छोटी सी बात पर 10-12 साल की सजा दे देता था. क्रान्तिकारियों ने शासन को चेतावनी दी कि वे इसके बदले किसी भारतीय को यहां भेजें, पर शासन तो बहरा था सो बात नहीं सुनी गई. अतः एक दिन जेम्स पेड्डी को गोली से उड़ा दिया गया. अंग्रेज इससे बौखला गये. अब उन्होंने पेड्डी से भी अधिक कठोर राबर्ट डगलस को भेजा. एक दिन जब वह अपने कार्यालय में बैठा फाइलें देख रहा था, तो अचानक दो युवक उसके सामने आये और उसे गोली मार दी. डगलस वहीं ढेर हो गया. दोनों में से एक युवक तो भाग गया, पर दूसरा प्रद्योत कुमार पकड़ा गया. शासन ने उसे फांसी की सजा दी.

दो जिलाधिकारियों की हत्या के बाद भी अंग्रेजों की आंख नहीं खुली. अबकी बार उन्होंने बीईजे बर्ग को भेजा. बर्ग सदा दो अंगरक्षकों के साथ चलता था. इधर क्रान्तिवीरों ने भी ठान लिया था कि इस जिले में किसी अंग्रेज जिलाधिकारी को नहीं रहने देंगे. बर्ग फुटबाल का शौकीन था और टाउन क्लब की ओर से खेलता था. 02 सितम्बर, 1933 को टाउन क्लब और मौहम्मदन स्पोर्टिंग के बीच मुकाबला था. खेल शुरू होने से कुछ देर पहले बर्ग आया और अभ्यास में शामिल हो गया. अभी बर्ग ने शरीर गरम करने के लिए फुटबाल में दो-चार किक ही मारी थी कि उसके सामने दो खिलाड़ी, अनाथ बन्धु प॰जा और मृगेन्द्र कुमार दत्त आकर खड़े हो गये. दोनों ने जेब में से पिस्तौल निकालकर बर्ग पर खाली कर दी. वह हाय कहकर धरती पर गिर पड़ा और वहीं मर गया.

यह देखकर बर्ग के अंगरक्षक दोनों पर गोलियाँ बरसाने लगे. इनकी पिस्तौल तो खाली हो चुकी थी, अतः जान बचाने के लिए दोनों दौड़ने लगे, पर अंगरक्षकों के पास अच्छे शस्त्र थे. दोनों मित्र गोली खाकर गिर पड़े. अनाथ बन्धु ने तो वहीं प्राण त्याग दिये. मृगेन्द्र को पकड़ कर अस्पताल ले जाया गया. अत्यधिक खून बह जाने के कारण अगले दिन वह भी चल बसा. घटना के बाद पुलिस ने मैदान को घेर लिया. हर खिलाड़ी की तलाशी ली गयी. निर्मल जीवन घोष, ब्रजकिशोर चक्रवर्ती और रामकृष्ण राय के पास भी भरी हुई पिस्तौलें मिलीं. ये तीनों भी क्रान्तिकारी दल के सदस्य थे. यदि किसी कारण से अनाथ बन्धु और मृगेन्द्र को सफलता न मिलती, तो इन्हें बर्ग का वध करना था. पुलिस ने इन तीनों को पकड़ लिया और मुकदमा चलाकर मिदनापुर के केन्द्रीय कारागार में फांसी पर चढ़ा दिया.

तीन जिलाधिकारियों की हत्या के बाद अंग्रेजों ने निर्णय किया कि अब कोई भारतीय अधिकारी ही मिदनापुर भेजा जाये. अंग्रेज अधिकारियों के मन में भी भय समा गया था. कोई वहां जाने को तैयार नहीं हो रहा था. इस प्रकार क्रान्तिकारी युवकों ने अपने बलिदान से अंग्रेज शासन को झुका दिया.

September 1st 2019, 5:29 pm

01 सितम्बर / जन्मदिवस – सबके हितचिंतक केशवराव गोरे

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नई दिल्ली. माता-पिता प्रायः अपने बच्चों के काम, मकान, दुकान, विवाह आदि की चिन्ता करते ही हैं. पर, 1 सितम्बर, 1915 को गोंदिया (महाराष्ट्र) में जन्मे केशव नरहरि गोरे ने प्रचारक बनने से पूर्व पिताजी के लिए मकान बनवाकर एक बहिन का विवाह भी किया. ये लोग मूलतः वाई (महाराष्ट्र) के निवासी थे. केशवराव के पिता नरहरि वामन गोरे तथा माता यशोदा गोरे थीं. रेलवे में तार बाबू होने के कारण नरहरि जी का स्थानान्तरण होता रहता था. अतः केशवराव की प्रारम्भिक शिक्षा गोंदिया तथा उच्च शिक्षा मिदनापुर (बंगाल) में हुई. मेधावी छात्र होने के कारण उन्होंने मराठी के साथ ही हिन्दी, अंग्रेजी, बंगला, उड़िया और संस्कृत बोलना सीख लिया था. वे नाटकों में अभिनय भी करते थे.

बचपन में बहुत क्रोधी थे. एक बार माताजी ने इन्हें किसी बात पर बहुत पीटा और कमरे में बंद कर दिया. उनके लौटने तक केशव ने अल्मारी में रखे सब कीमती वस्त्र फाड़ डाले. एक बार बड़ा भाई इनके कपड़े पहन कर विद्यालय चला गया, पर केशव ने बीच रास्ते से उन्हें लौटाकर कपड़े उतरवा लिये. विद्यालय से आने पर उनके जूते उनकी बहनें उतारती थी. वे अत्यधिक सफाई और व्यवस्था प्रिय भी थे.

वर्ष 1938 में उनके पिताजी का स्थानान्तरण बिलासपुर (म.प्र) में हुआ, तो केशवराव ने वहां किराने की दुकान खोल ली. साथ में जीवन बीमा का कार्य भी किया. कुछ समय में काम जम गया. फिर उन्होंने अपनी छोटी बहिन के लिए वर खोजकर धूमधाम से उसका विवाह किया. वर्ष 1939-40 में पूज्य श्रीगुरुजी प्रवास के समय इनके घर आये. उन्होंने नरहरि जी से कहा कि वे अपने चार में से एक बेटे को प्रचारक बनने दें, पर वे तैयार नहीं हुए. लेकिन केशवराव के बड़े भाई यशवंत गोरे के मन को बात लग गयी. एक पैर खराब होने पर भी वे संघ में सक्रिय थे. वे भी रेलवे में कर्मचारी थे. उन्होंने केशव को कहा कि घर की जिम्मेदारी मैं लेता हूं, पर तुम प्रचारक बनो. उनकी प्रेरणा और आज्ञा से अंततः केशवराव प्रचारक बनने को तैयार हो गये.

पर,  नरहरि जी के पास कोई निजी मकान नहीं था. उन दिनों पेंशन भी नहीं होती थी. अतः केशवराव ने बिलासपुर में एक भूखंड लेकर उस पर मकान बनवाया. दुकान एक मित्र मधु देशपांडे का सौंप दी और वर्ष 1942 में प्रचारक बन गये. प्रारम्भ में उन्हें दुर्ग भेजा गया. इसके बाद उन्होंने मुख्यतः मध्यभारत, महाकौशल, छत्तीसगढ़ में विभिन्न दायित्वों पर कार्य किया. बिलासपुर प्रवास के समय वे सदा संघ कार्यालय या किसी कार्यकर्ता के घर पर ही रहते थे. अपने परिजनों से मिलने के लिए वे कुछ देर ही घर आते थे. केशवराव की रुचि निर्माण कार्यों में बहुत थी. वे जन्मजात वास्तुकार थे. महाकौशल प्रांत प्रचारक रहते हुए उन्होंने जबलपुर में प्रांतीय कार्यालय केशव कुंज का निर्माण करवाया. इंदौर कार्यालय के निर्माण में भी उनकी प्रमुख भूमिका रही. आयु बढ़ने से वे अनेक रोगों के घिरते चले गये. अतः उनका केन्द्र नागपुर बनाकर उन्हें केन्द्रीय कार्यालय एवं व्यवस्था प्रमुख की जिम्मेदारी दी गयी.

धीरे-धीरे उनका शरीर शिथिल होता गया. अक्तूबर, 2001 में स्वास्थ्य बहुत बिगड़ने पर उनके भतीजे वामन गोरे उन्हें अपने घर भिलाई ले आये. कुछ सुधार न होने पर उन्हें बिलासपुर और फिर रायपुर के अस्पताल में भर्ती कराया गया, पर हालत बिगड़ती गयी और अंततः वहीं 28 अक्तूबर को उनका शरीरांत हुआ. अगले दिन बिलासपुर में ही उनका दाह संस्कार किया गया. उनकी शव यात्रा उसी मकान से निकली, जिसे उन्होंने अपने परिजनों के लिए स्वयं खड़े होकर बनवाया था.

August 31st 2019, 5:57 pm

भारतीय ज्ञान का खजाना – 9

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भारत का प्राचीन ‘संपन्न’ रसायनशास्त्र

पारे की खोज किसने की? इस प्रश्न का निश्चित एवं समाधानकारक उत्तर कोई नहीं देता. पश्चिमी दुनिया को सत्रहवीं शताब्दी तक पारे की पहचान भी नहीं थी. अर्थात् मिस्र के पिरामिडों में ईस्वी सन् 1800 वर्ष पूर्व पारा रखा जाना पाया गया है.

पारा जहरीला होता है, इस बारे में सभी एकमत हैं. इसीलिए 140 से अधिक देशों ने पारे का समावेश करने वाली भारतीय आयुर्वेदिक औषधियों पर तीन वर्ष पहले प्रतिबंध लगा दिया था, जो आगे चलकर हटा लिया गया.

मजे की बात यह है कि जहरीला माना जाने वाला पारा, ईसा से ढाई हजार वर्षों पहले तक भारतीय ऋषियों एवं चिकित्सकों द्वारा भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में उपयोग किया जाता रहा. ईसा से पाँच सौ वर्षों पूर्व इसका उपयोग आयुर्वेद में किया जाता था, यहाँ तक कि खाने के माध्यम से ली जाने वाली औषधियों में भी…! अर्थात् पश्चिमी दुनिया जिस पारे से तीन सौ वर्ष पहले तक पूर्ण रूप से अनजान थी, ऐसे जहरीले पारे का उपयोग ढाई-तीन हजार वर्षों पूर्व भारत के लोग औषधि के रूप में करते थे, यही अपने-आप में एक बड़ा आश्चर्य है. और इस प्रकार औषधि के रूप में पारे का उपयोग करते समय उसे पूरी तरह से ‘प्रोसेसिंग’ करके काम में लिया जाता था, यह भी बहुत महत्वपूर्ण है.

हिन्दू संस्कृति के अनुसार जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य पर सोलह संस्कार किए जाते हैं, ठीक इसी प्रकार पारे पर भी अठारह प्रकार के संस्कार करने के बाद ही वह औषधि के रूप में सेवन करने योग्य निर्मित होता है. यह अठारह संस्कार निम्नलिखित हैं –

१. स्वेदन,   २. मर्दन,   ३. मूर्च्छन,   ४. उत्थापन,   ५. पातन,   ६. रोधन,   ७. नियामन,   ८. संदीपन,   ९. गगनभक्षणमान,   १०. संचारण,   ११. गर्भद्रुति,   १२. बाह्यद्रुति,   १३. जारण,   १४. ग्रास,   १५. सारण, १६. संक्रामण,   १७. वेध,   १८. शरीरयोग

वाग्भट्ट आचार्य द्वारा लिखित ‘रस रत्न समुच्चय’ नामक ग्रन्थ में पारे से औधधि का उपयोग करने के बारे में विस्तार से लिखा गया है. सामान्यतः यह ग्रन्थ ईस्वी सन् 1300 के आसपास लिखा हुआ माना जाता है. अर्थात् जो ज्ञान पहले से ही ज्ञात था, उसे तेरहवीं/चौदहवीं शताब्दी में वाग्भटाचार्य ने शब्दांकित करके, विस्तार से समझाकर हमारे समक्ष रखा है. (ये वाग्भट्ट अलग हैं, पाँचवी शताब्दी में ‘अष्टांग ह्रदय’ नामक आयुर्वेद से परिपूर्ण ग्रन्थ लिखने वाले वाग्भट्ट दूसरे हैं).

इस ग्रन्थ में विभिन्न प्रकार की प्रक्रियाओं, विधियों के बारे में विस्तारपूर्वक लिखा गया है. अर्थात् आज से लगभग दो – ढाई हजार वर्ष पहले तक भारतीयों को यह ‘रसायनशास्त्र’ बड़े ही विस्तार से मालूम था एवं हमारे पूर्वजों ने व्यवस्थित पद्धति से इस ज्ञान का विकास किया था.

‘रस रत्न समुच्चय’ में दी गई जानकारी के अनुसार दोला यंत्र, पातना यंत्र, स्वेदनी यंत्र, अधःपतन यंत्र, कच्छप यंत्र, जारणा यंत्र, विद्याधर (उर्ध्वपातन) यंत्र, सोमानल यंत्र, बालुका यंत्र, लवण यंत्र, हंसपाक यंत्र, भूधर यंत्र, कोष्टी यंत्र, वलभी यंत्र, तिर्यकपातन यंत्र, पालिका यंत्र, नाभी यंत्र, इष्टिका यंत्र, धूप यंत्र, स्वेदन (कंदुक) यंत्र, तत्पखाल यंत्र… ऐसे अनेक यंत्रों का उपयोग ‘रसशाला’ में किया जाता था. इन तमाम यंत्रों द्वारा पारद (पारे), गंधक इत्यादि पर रासायनिक प्रक्रिया करते हुए औषधियों का निर्माण किया जाता था.

नागार्जुन ने ‘रस रत्नाकर’ ग्रन्थ में सिनाबार नामक खनिज से पारद (पारा) निकालने हेतु उसकी आसवन विधि का विस्तार से उल्लेख किया है. ऐसी ही विधि ‘रस रत्न समुच्चय’ एवं आगे चलकर चरक/सुश्रुत की संहिताओं में भी देखी जा सकती हैं. इसमें आसवन प्रक्रिया के लिए ‘ढेकी’ यंत्र का उपयोग करने के बारे में बताया गया है. मजे की बात यह है कि आज जिस आधुनिक पद्धति से पारे का निर्माण किया जाता है, वह विधि ठीक इसी ग्रन्थ में दी गई विधि के समान है, अंतर केवल इतना है कि साधन आधुनिक हैं, लेकिन प्रक्रिया आज भी वही है….!

यह बहुत ही महत्वपूर्ण है. ईसा से पांच-छह सौ वर्ष पहले हमारे पूर्वजों ने अत्यंत व्यवस्थित, well defined, systematic ऐसी अनेक रासायनिक प्रक्रियाओं का उपयोग करना आरम्भ कर दिया था, जिसका मानकीकरण (standardization) उसी कालखंड में हो चुका था.

आचार्य सर प्रफुल्लचंद्र राय (सन् 1861 से 1944) को आधुनिक समय का आद्य रसायनशास्त्रज्ञ कहा जाता है. इन्हीं के द्वारा भारत की पहली औषधि निर्माण कम्पनी ‘बेंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल’ की स्थापना की गई थी. अंग्रेजों के श्रेष्ठी वर्ग में भी इनका बहुत सम्मान किया जाता था. इन्हीं प्रफुल्लचंद्र राय ने एक बहुत ही उत्तम पुस्तक लिखी है – ‘हिन्दू केमिस्ट्री’. इस पुस्तक में उन्होंने स्पष्ट रूप से यह तथ्य रेखांकित किया है कि रसायनशास्त्र के निर्माण में हमारे हिन्दू पूर्वज बहुत ही उन्नत थे. इसी पुस्तक में उन्होंने वेदों में लिखे हुए भिन्न-भिन्न रसायनों का उल्लेख, अणु/परमाणु का विस्तृत विवेचन, चरक एवं सुश्रुत ऋषियों द्वारा रसायनों के बारे में किये गए विस्तृत प्रयोगों के बारे में विस्तार से लिखा है. उस कालखंड में उपलब्ध बालों को रंगने की कला से लेकर पारे जैसे घातक रसायन पर किए गए प्रयोगों तक के अनेक सन्दर्भ इस पुस्तक में प्राप्त होते हैं. धातुशास्त्र के बारे में भी इस पुस्तक में उन्होंने लिखा है.

1904 में लिखी गई इस पुस्तक ने आयुर्वेद एवं प्राचीन भारतीय रसायनशास्त्र की ओर पश्चिमी शोधकर्ताओं के देखने का दृष्टिकोण ही बदलकर रख दिया.

हमारे वेदों में रसायनशास्त्र संबंधी अनेक उल्लेख प्राप्त होते हैं. आयुर्वेद में अश्म्न, मृत्तिका (मिट्टी), सिकता (बालू, रेत), अयस (लोहा अथवा कांसा), श्याम (तांबा), सीस (सीसा) की मदद से किए गए विभिन्न प्रयोगों के उदाहरण मौजूद हैं.

तैत्तिरीय संहिता के भाष्यकार, ‘सायण’ ने श्याम का अर्थ काला लोहा के रूप में किया है. यजुर्वेद के एक मंत्र में अयस्ताप (Iron Smelter) का भी उल्लेख है. लोहे के खनिज को लकड़ी /कोयले की सहायता से कैसे गर्म करके लोहा धातु तैयार की जाती है, इसका वर्णन किया गया है. अथर्ववेद में भी सीसा नामक धातु पर ‘दघत्यम सीसम’ नामक एक पूरा सूक्त लिखा गया है. इसके माध्यम से सीसे के बने हुए छर्रे युद्ध में उन दिनों उपयोग किए जाते थे, यह भी ध्वनित होता है.

प्राचीनकाल में यज्ञशाला यही इस देश की मूल रसायनशाला हुआ करती थीं. तैत्तिरीय संहिता में यज्ञशाला/रसायनशाला में उपयोग किए जाने वाले विभिन्न उपकरणों की सूची दी गई है –

ईष्य   –  ईंधन

बर्ही    –  फुँकनी अथवा Straw

वेदी / घिष्ण्य –  आग उत्पन्न करने का स्थान, जहाँ से रासायनिक प्रक्रिया के लिए लगने वाली भट्टियों का निर्माण हुआ.

स्रुक   –  चमचे

चमस  –  गिलास  / पात्र

ग्रावस –  इमाम-दस्ते का लोहे का दस्ता

द्रोण, कलश  –  रसायन रखने वाले लकड़ी का पात्र

आघवनीय   –  रसायनों का मिश्रण करने वाले पात्र

यह सूची बहुत ही लंबी-चौड़ी है. परन्तु इससे यह स्पष्ट होता है कि उस वैदिक काल में शास्त्रीय पद्धति से तैयार की गई रसायनशालाएं बड़ी संख्या मौजूद थी, जहाँ कौन सी वस्तुएँ, कौन से बर्तन होने चाहिए यह निश्चित होता था. इसी प्रकार रसायन तैयार करने की प्रक्रिया भी एकदम निश्चित एवं तय रहती थी.

शतपथ ब्राह्मण, ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद इत्यादि ग्रंथों में विभिन्न रसायनों एवं उनके विविध क्षेत्रों में होने वाले उपयोग संबंधी विवेचन स्पष्ट दिखाई देता है.

जरा विचार कीजिए, कि उस कालखंड में विश्व के किसी भी क्षेत्र में, किसी भी देश में रसायनशास्त्र के सम्बन्ध में सुस्पष्ट, व्यवस्थित एवं सम्पूर्ण प्रक्रिया सहित किया गया विवेचन कहीं दिखाई-सुनाई देता है..? उत्तर नकारात्मक ही है. हालाँकि मिस्र में कुछ-कुछ उल्लेख जरूर प्राप्त होते हैं, तथा चीन में भी चीनियों द्वारा अनेक रसायनों पर उस कालखंड में काम किया गया है. परन्तु इन दो उदाहरणों को छोड़कर अन्य किसी भी देश में रसायनशास्त्र विषय में भारत के समान उन्नत अवस्था दिखाई नहीं देती है.

ग्यारहवीं शताब्दी में चक्रपाणि दत्त ने ‘चक्रदत्त’ नामक ग्रन्थ लिखा है. इस ग्रन्थ में वे प्राचीन जानकारियों को शब्दबद्ध करके सुसूत्र तरीके से हमारे सामने लाते हैं. इस ग्रन्थ में उन्होंने ताम्र-रसायन बनाने की विधि दी हुई है. पारा, तांबा और अभ्रक पर रासायनिक प्रक्रिया करते हुए उस पर गंधक की परत चढ़ाकर ताम्र-रसायन कैसे तैयार किया जाता है, यह विस्तारपूर्वक समझाया गया है. इसी पद्धति से बनाए जाने वाले ‘शिलाजीत-रसायन’ का भी विवरण दिया गया है.

चक्रपाणि के दो सौ वर्षों पश्चात शारंगधाराचार्य द्वारा लिखी गई, ‘शारंगधर संहिता’ में अनेक रसायन प्रक्रियाओं का उल्लेख किया गया है. हालांकि उन्होंने प्रारंभ में ही लिख दिया है कि प्राचीन ऋषि-मुनियों ने अपनी-अपनी संहिताओं में जो श्लोक दिए हुए हैं, एवं अनेक शोधकर्ताओं ने जिनके माध्यम से सफलता प्राप्त की है, ऐसे सभी श्लोकों का इसमें संकलन किया गया है. इस संहिता में आसव, काढ़ा इत्यादि बनाने की रासायनिक प्रक्रिया का अत्यंत विस्तारपूर्वक विवरण दिया गया है.

ये, अथवा ऐसे अनेक ग्रंथों में कणाद ऋषि के अणु/परमाणु सिद्धांत का उल्लेख भी किया हुआ दिखाई देता है. कणाद ऋषि ने कहा है कि एक प्रकार के दो परमाणु संयुक्त होकर ‘द्विनूक’ का निर्माण हो सकता है. द्विनूक का अर्थ वही है, जो आधुनिक वैज्ञानिकों ने ‘बाइनरी मॉलिक्यूल’ के रूप में परिभाषित किया है.

प्राचीन भारत में रासायनिक प्रक्रिया के सम्बन्ध में बहुत सी जानकारी थी. इसी लेखमाला में ‘अदृश्य स्याही का रहस्य’ नामक लेख में, भूर्जपत्र को पानी में डालने पर दिखाई देने वाली स्याही का वर्णन किया गया है. इस प्रकार की अदृश्य स्याही का निर्माण करते समय उस प्राचीनकाल में अनेक प्रयोग, अनेक रासायनिक प्रक्रियाओं का पालन किया गया होगा. वातावरण में मौजूद आर्द्रता, ऑक्सीजन, अनेक अम्लीय/क्षारीय पदार्थों के साथ धातु का संपर्क होने के बाद होने वाली प्रक्रियाओं, एवं उससे विभिन्न धातुओं के संरक्षण के उपाय… ये सारी महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ उस समय भी ऋषियों को पता थीं.

‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ में धातुओं को शुद्ध करने की प्रक्रिया दी गई है. ‘रसार्णव’ में कहा गया है कि सीसा, लोहा, तांबा, चाँदी एवं स्वर्ण जैसी धातुओं में स्व-संरक्षण की प्रवृत्ति इसी क्रमानुसार कम होती जाती है, और मजे की बात यह कि यह बात आज के आधुनिक रसायनशास्त्र के अनुसार भी सही है.

चूँकि भारतीय लोगों ने कभी अपने संपन्न रसायनशास्त्र की विरासत को आग्रह से दुनिया के सामने नहीं रखा, इसलिए अब कोई भी आता है, और रसायनशास्त्र की खोज का दावा करता है. मुस्लिम वेब साईट्स से इन दिनों यह प्रचार किया जा रहा है कि जाबिर बिन हियान यह रसायन शास्त्र के सबसे पहले जनक थे. सन् 733 में जन्मे व्यक्ति को मुस्लिम जगत, ‘रसायनशास्त्र का पिता’ कह रहा है.

यह सच है कि आज आधुनिक कालखंड में रसायनशास्त्र ने अत्यधिक प्रगति की है. परन्तु आज से लगभग दो-ढाई हजार वर्ष पूर्व रसायनशास्त्र के मूलभूत सिद्धातों को प्रतिपादित करते हुए, अत्यंत व्यवस्थित एवं परिपूर्ण तरीके से डॉक्युमेंटेड सिस्टम भारत में कार्यरत थी, जिसके माध्यम से अनेक क्षेत्रों में रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा अनेक कार्य किए जाते थे. औषधि शास्त्र, खनिज शास्त्र, धातुशास्त्र जैसे अनेक क्षेत्र थे, जिनमें रासायनिक प्रक्रिया अति-आवश्यक थीं. खास बात यह कि सभी महत्वपूर्ण रसायन, जैविक स्रोतों से प्राप्त किए जाते थे. यह प्रक्रिया पूर्णतः प्राकृतिक पद्धति से चलती थीं.

विशेष यह कि हमारे पूर्वजों ने इतनी महान विरासत हमारे लिए रखी हुई है कि आज भी उनमें से अनेक प्रक्रियाओं का सटीक अर्थ निकालना हमारे लिए संभव नहीं हो पाया है. अर्थात् यह सिद्ध है कि प्राचीन रसायनशास्त्र का गंभीर अध्ययन किया जाना आज के समय की नितांत आवश्यकता है…!!

–  प्रशांत पोळ

August 31st 2019, 9:07 am

मुस्लिम छात्र मोर्चा ने कॉलेज में फहराया PAK का झंडा

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केरल के एक कॉलेज के परिसर में पाकिस्तान का झंडा फहराने के आरोप में 30 से अधिक छात्रों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है.प्राप्त जानकारी के अनुसार, घटना गुरुवार (अगस्त 29, 2019) की है, मुस्लिम छात्र मोर्चा (MSF) के छात्र पेरम्बरा सिल्वर कॉलेज परिसर में छात्र संघ चुनाव के लिए रैली निकाल रहे थे.

केरल के कोझीकोड जिले के पेरम्बरा पुलिस ने कॉलेज परिसर के भीतर पाकिस्तानी झंडा लहराने के लिए उनके खिलाफ मामला दर्ज किया है. मुस्लिम छात्र मोर्चा के आरोपित छात्रों पर आईपीसी की धारा 143, 147, 153 और 149 के तहत मामला दर्ज किया गया. पुलिस का दावा है कि घटना में शामिल छात्रों की पहचान करने के बाद आगे की कार्यवाही की जाएगी.

August 31st 2019, 6:18 am

फारूक ने खुद कटवाई दाढ़ी, घर आकर बोला – ट्रेन में शरारती तत्‍वों ने काटी, पोल खुलने पर मांगी माफी

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बागपत. क्षेत्र के मुस्लिम युवक ने गर्मी के कारण पहले तो दिल्ली पहुंचकर खुद ही अपनी दाढ़ी कटवाई और फिर घर पहुंचकर समाज व परिवार के डर से ट्रेन में शरारती तत्व द्वारा मारपीट कर दाढ़ी काटने का ड्रामा रच दिया. युवक फटे कपड़ों में अपने घर पहुँचा तो हंगामा हो गया.

उसी के एक रिश्तेदार ने मामले को लेकर मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, डीआईजी समेत बागपत पुलिस को ट्वीट कर दिया. ट्वीट होते ही पुलिस हरकत में आई और युवक से घटना के बारे में पूछताछ की. जिसमें युवक की करतूत की पोल खुल गयी. इसके बाद उसे माफी मांगनी पड़ी.

मुगलपुरा मोहल्ला निवासी युवक मोहम्मद फारूक पुत्र मुन्ना छाता बनाने का काम करता है. वह गुरुवार सुबह अपने दोस्त के पास दिल्ली गया था. उसके अनुसार, खजूरी पुस्ते के पास पहुंचकर एक हेयर सैलून पर उसने अपनी दाढ़ी कटवा ली. रात करीब दस बजे वह बागपत में अपने घर पहुंचा. समाज व परिवार के डर से उसने अपने घरवालों को बताया कि ट्रेन में शरारती तत्‍वों ने उसके साथ मारपीट की और उसकी दाढ़ी भी काट दी. घरवालों ने उसकी बात पर विश्‍वास कर लिया.

कोई शक न करे, इसलिए अपने कपड़े भी फाड़ लिए. यह मामला आग की तरह पूरे क्षेत्र में फैल गया. लोगों ने सोशल मीडिया पर मैसेज वायरल किए. घटना की पुलिस को सूचना दी गई. एसपी प्रताप गोपेन्द्र यादव ने युवक से पूछताछ कर जांच-पड़ताल की. जिसमें युवक की हरकत का पता चल गया. बाद में मोहम्मद फारूक ने कोतवाली में हाथ जोड़कर और कान पकड़कर अपनी गलती के लिए माफी मांगी. एसपी का कहना है कि युवक के साथ कोई घटना नहीं हुई है. उसने गलत जानकारी दी थी.

साभार – दैनिक जागरण

August 31st 2019, 5:29 am

हबीबपुर सीकरी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता को गोली मारी

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मुजफ्फरनगर. फुगाना क्षेत्र के गांव हबीबपुर सीकरी में शुक्रवार सुबह खेत पर गए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता को एक व्यक्ति ने गोली मार दी. उन्हें घायल अवस्था में अस्पताल ले जाया गया, जहां उनका उपचार चल रहा है.

हबीबपुर सीकरी निवासी सोमपाल सैनी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जिला बौद्धिक प्रमुख हैं. गांव में वह अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ खेतीबाड़ी करते हैं. शुक्रवार सुबह करीब सात बजे वह खेत पर चारा लेने गए थे. इसी बीच ईख के खेत से निकले हमलावर ने सोमपाल को गोली मार दी. गोली सोमपाल के कूल्हे में लगी और वह घायल होकर जमीन पर गिर पड़े. गोली की आवाज सुन पास के खेत में काम कर रहा इस्लाम मौके पर पहुंचा और पुलिस को सूचना दी. पुलिस घायल अवस्था में सोमपाल को बुढ़ाना सीएचसी ले गई, जहां से मेरठ रेफर कर दिया गया.

एसपी देहात आलोक शर्मा भी मौके पर पहुंचे. उन्होंने बताया कि घायल की हालत खतरे से बाहर है. हमलावर से रंजिश को लेकर जांच की जा रही है. उसे जल्द गिरफ्तार किया जाएगा.

थानाध्यक्ष अक्षय शर्मा ने बताया कि सोमपाल के बेटे पीयूष की तहरीर पर गांव के ही रोहित पुत्र महिपाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है. रोहित सोमपाल आदि से रंजिश रखता था.

सोमपाल सैनी प्रतिदिन सुबह शाखा के बाद सात बजे के करीब खेत पर जाते थे. इस बात की जानकारी रोहित को भी रहती थी कि सोमपाल सुबह खेत पर चारा लेने जाते हैं. खेत में पहले से ही हमलावर घात लगाकर बैठा था. मौका मिलते ही गोली मार दी और भाग निकला.

सोमपाल सैनी पर जानलेवा हमले की सूचना जैसे ही फैली तो संघ व भाजपा कार्यकर्ता हबीबपुर गांव पहुंचने लगे. संघ के कार्यकर्ताओं ने मेरठ अस्पताल में सोमपाल का कुशलक्षेम पूछा.

August 31st 2019, 5:18 am

छल कपट व लालच से धर्मान्तरण पर होगी कठोर सजा

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हिमाचल प्रदेश विधानसभा ने जबरन, प्रलोभन देकर धर्मांतरण करने के खिलाफ शुक्रवार को विधेयक पारित किया. विपक्ष ने हिमाचल प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता विधेयक 2019 का समर्थन किया और विधेयक ध्वनिमत से पारित हुआ. चर्चा का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा कि नया कठोर कानून इसलिए जरुरी हो गया था क्योंकि खासकर रामपुर और किन्नौर में जबरन धर्मांतरण बढ़ता जा रहा है.

यह विधेयक हिमाचल प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2006 का स्थान लेगा. नये कानून के तहत सात साल तक की कैद का प्रावधान है, जबकि पुराने कानून में तीन साल की सजा की व्यवस्था थी. यह विधेयक बहकाने, जबरन, अनुचित तरीके से प्रभावित करने, दबाव, लालच, शादी या किसी भी धोखाधड़ी के तरीके से धर्म परिवर्तन पर रोक लगाता है. यदि कोई भी शादी बस धर्मांतरण के लिए होती है तो वह इस विधेयक की धारा पांच के तहत अमान्य माना जाएगा. धर्मान्तरण विरोधी विधेयक विधान सभा में पारित, मुख्य बिन्दु –

1. धारा तीन में प्रावधान किया कि कोई भी व्यक्ति प्रत्यक्ष या अन्य तरह से मिथ्या निरूपण, बलपूर्वक, असम्यक प्रभाव, प्रलोभन देकर  या किसी अन्य कपटपूर्ण तरीके से किसी का धर्म बदलवाने का प्रयास नहीं करेगा,  किसी को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाएगा और न षड्यंत्र करेगा.

2. यदिकोई अपने मूल धर्म में वापस आना चाहता है तो इस अधिनियम के तहत यह धर्म परिवर्तन नहीं माना जाएगा, जो इसका उल्लंघन करेगा उसे अपराध साबित होने पर कम से कम एक साल और पांच साल तक का कारावास होगा, जुर्माना भी देना होगा……

– हिमाचल प्रदेश में नाबालिग और महिला का जबरन धर्म परिवर्तन किया तो सात साल की कैद.

– अनुसूचित जाति या जनजाति के लोगों का धर्मान्तरण करवाने पर भी इतनी ही सजा.

– प्रलोभन, जालसाजी या जबरन धर्म परिवर्तन गैर जमानती.

– जिला मजिस्ट्रेट को सूचना न दी तो भी कैद.

– जबरन धर्मांतरण के खिलाफ बनाए गए हिमाचल प्रदेश धर्म की स्वायत्तता विधेयक 2006 में कई धाराएं जोड़ी गई हैं. विधेयक को बनाने से पहले उत्तराखंड के विधेयक के कुछ अंश भी जोड़े गए हैं.

 

August 31st 2019, 4:18 am

विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान को मिली संस्कृति मंत्रालय का लोगो प्रयोग करने की अनुमति

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कुरुक्षेत्र. संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार ने विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान, कुरुक्षेत्र को कार्याशाला आयोजन में अपना लोगो प्रयोग करने की अनुमति प्रदान की है. इस आशय का पत्र संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार से प्राप्त हुआ.

विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के निदेशक डॉ. रामेंद्र सिंह ने बताया कि मंत्रालय की ओर से लोगो प्रयोग करने की अनुमति पहले भी मिल चुकी है, जिसे संस्थान ने देशभर में आयोजित की जाने वाली चार विषयों की कार्यशालाओं के आयोजन में सफलतापूर्वक प्रयोग किया. केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रह्लाद सिंह पटेल ने संस्थान के कार्यों को मान्यता देते हुए यह अनुमति दिलवाई है.

डॉ. रामेन्द्र सिंह ने केंद्रीय मंत्री का आभार व्यक्त किया. उन्होंने कहा कि विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान देशभर में भारतीय संस्कृति की पताका को आगे बढ़ाने में निरन्तर प्रयासरत है, जिसके लिए संस्थान द्वारा देशभर में अखिल भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा, संस्कृति प्रवाह परीक्षा, निबन्ध प्रतियोगिताओं व चार विषयों पर कार्यशालाओं के माध्यम से लगभग 25 लाख छात्रों में भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत शिक्षा का मार्गदर्शन प्रतिवर्ष किया जा रहा है. विभिन्न स्थानों पर अखिल भारतीय संस्कृति महोत्सव का भी आयोजन किया जाता है, जिसके माध्यम से प्रश्नमंच प्रतियोगिता, कथा-कथन, आशु भाषण, पत्र-वाचन जैसी प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं, वहीं संस्कृति वार्ता एवं संस्कृति प्रदर्शनी भी आकर्षण का केन्द्र रहती है. कुरुक्षेत्र नगर में भी संस्थान द्वारा प्रतिमास शैक्षिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन अनेक वर्षों से किया जाता रहा है. कुरुक्षेत्र की महिमा से अवगत कराने के लिए संस्थान में संपूर्ण देश से विद्वत्जनों एवं कला विभूतियों का किसी न किसी निमित्त आगमन होता रहता है, जिन्हें कुरुक्षेत्र के पर्यटन स्थलों की जानकारी के साथ-साथ उससे प्रत्यक्ष परिचित करानास, इस दिशा में एक उल्लेखनीय प्रयास है. उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी जी की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में संस्थान द्वारा बाल साहित्य तथा संस्कृति ज्ञान परीक्षा पुस्तिकाओं में गांधी जी के विचारों को जन-जन तक पहुंचाया जा रहा है.

August 31st 2019, 4:18 am

31 अगस्त / प्रेरक प्रसंग – देशद्रोही का वध

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नई दिल्ली. स्वाधीनता प्राप्ति के प्रयत्न में लगे क्रांतिकारियों को जहां एक ओर अंग्रेजों से लड़ना पड़ता था, वहां कभी-कभी उन्हें देशद्रोही भारतीय, यहां तक कि अपने गद्दार साथियों को भी दंड देना पड़ता था. बंगाल के प्रसिद्ध अलीपुर बम कांड में कन्हाईलाल दत्त, सत्येन्द्रनाथ बोस तथा नरेन्द्र गोस्वामी गिरफ्तार हुए थे. अन्य भी कई लोग इस कांड में शामिल थे, जो फरार हो गये. पुलिस ने इन तीन में से एक नरेन्द्र को मुखबिर बना लिया. उसने कई साथियों के पते-ठिकाने बता दिये. इस चक्कर में कई निरपराध लोग भी पकड़ लिये गये. अतः कन्हाई और सत्येन्द्र ने उसे सजा देने का निश्चय किया और एक पिस्तौल जेल में मंगवा ली.

सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस ने नरेन्द्र गोस्वामी को जेल में सामान्य वार्ड की बजाय एक सुविधाजनक यूरोपीय वार्ड में रखा था. एक दिन कन्हाई बीमारी का बहाना बनाकर अस्पताल पहुंच गया. कुछ दिन बाद सत्येन्द्र भी पेट दर्द के नाम पर वहां आ गया. अस्पताल उस यूरोपीय वार्ड के पास था, जहां नरेन्द्र रह रहा था. एक-दो दिन बाद सत्येन्द्र ने ऐसा प्रदर्शित किया, मानो वह इस जीवन से तंग आकर मुखबिर बनना चाहता है. उसने नरेन्द्र से मिलने की इच्छा भी व्यक्त की. यह सुनकर नरेन्द्र को बहुत प्रसन्नता हुई. 31 अगस्त, 1908 को नरेन्द्र जेल के एक अधिकारी हिंगिस के साथ उससे मिलने अस्पताल चला गया. सत्येन्द्र अस्पताल की पहली मंजिल पर उसकी प्रतीक्षा कर रहा था. वहां कन्हाई को देखकर एक बार नरेन्द्र को शक हुआ, पर फिर वह सत्येन्द्र के संकेत पर हिंगिस को पीछे छोड़कर उनसे एकांत वार्ता करने के लिए कमरे से बाहर बरामदे में आ गया.

कन्हाई और सत्येन्द्र तो इस अवसर की प्रतीक्षा में ही थे. मौका देखकर कन्हाई ने नरेन्द्र गोस्वामी पर गोली दाग दी. वह चिल्लाते हुए नीचे की ओर भागा. इस पर सत्येन्द्र ने उसे पकड़ लिया. गोली की आवाज सुनकर हिंगिस और एक अन्य जेल अधिकारी लिंटन आ गये. लिंटन ने सत्येन्द्र को गिराकर कन्हाई को जकड़ लिया. इस पर कन्हाई ने पिस्तौल की नाल उसके सिर में दे मारी. इस हाथापाई में कई गोलियां व्यर्थ हो गयीं. अब केवल एक गोली शेष थी. कन्हाई ने झटके से स्वयं को छुड़ाकर बची हुई गोली नरेन्द्र पर दाग दी. इस बार निशाना ठीक लगा और देशद्रोही धरती पर लुढ़क गया.

दोनों ने अपना उद्देश्य पूरा होने पर समर्पण कर दिया. मुकदमे में कन्हाई ने अपना अपराध स्वीकार कर किसी वकील की सहायता लेने से मना कर दिया. अतः उसे फांसी की सजा सुनाई गयी. न्यायालय ने सत्येन्द्र को फांसी योग्य अपराधी नहीं माना. शासन ने इसकी अपील ऊपर के न्यायालय में की. वहां से सत्येन्द्र के लिए भी फांसी की सजा घोषित कर दी गयी. अलीपुर केन्द्रीय कारागार में 10 नवम्बर, 1908 को कन्हाई को फांसी दी गयी. वह इतना मस्त था कि फांसी वाले दिन तक उसका भार 16 पौंड बढ़ गया. फांसी वाली रात वह इतनी गहरी नींद में सोया कि उसे आवाज देकर जगाना पड़ा. उसके शव की विशाल शोभायात्रा निकालकर चंदन के ढेर पर उसका दाह संस्कार किया गया. अंतक्रिया पूरी होने तक हजारों लोग वहां डटे रहे. चिता शांत होने पर लोगों ने भस्म से तिलक किया. सैकड़ों लोगों ने भस्म के ताबीज बच्चों के हाथ पर बांधे. हजारों ने उसे पूजागृह में रख लिया.

21 नवम्बर, 1908 को सत्येन्द्र को भी फांसी दे दी गयी. कन्हाई की शवयात्रा से घबराये शासन ने सत्येंन्द्र का शव परिवार वालों को न देकर जेल में ही उसका दाह संस्कार कर दिया.

August 30th 2019, 5:54 pm

पाकिस्तान में सिक्ख ग्रंथी की नाबालिग बेटी अगवा, जबरन धर्म परिवर्तन करवाकर निकाह पढ़वाया

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पाकिस्तान में सिक्खों की हालत भी उतनी ही बदहाल है, जितनी हिन्दू और क्रिश्चियन समुदाय के लोगों की. नए पाकिस्तान में अब सिक्खों की नाबालिग बच्चियां भी सुरक्षित नहीं हैं. पाकिस्तान पंजाब के ननकाना साहिब में एक नया मामला सामने आया, जिसमें मुस्लिम गुंडों ने तांबू साहिब गुरूद्वारा के ग्रंथी भगवान सिंह के घर में जबरन घुसकर नाबालिग बेटी को 3 दिन पहले अगवा कर लिया. नाबालिग जगजीत कौर की उम्र मात्र 16 साल है.

घरवालों ने रिपोर्ट दर्ज करवाई लेकिन पुलिस ने कोई कदम नहीं उठाया. इसके बाद गुरूवार को एक वीडियो सामने आया है, जिसमें जगजीत का इस्लाम कबूल कराकर निकाह पढ़वाया जा रहा है. इस वीडियो के माध्यम से ये साबित करने की कोशिश की जा रही है कि नाबालिग सिक्ख लड़की जगजीत कौर ने अपनी मर्जी से इस्लाम कबूल किया है और अपनी मर्जी से शादी कर रही है. वीडियो में जगजीत कौर डरी-सहमी बैठी हुई है, जिसका नाम बदलकर आयशा रख दिया गया है और मोहम्मद एहसान नाम के शख्स के साथ निकाह पढ़ा जा रहा है.

जगजीत के घरवालों का दावा है कि जगजीत कौर को डरा-धमकाकर जबरन इस्लाम कबूल करवाया गया है और शादी करवाई गयी है. परिजनों की लाख मिन्नतों के बाद भी पुलिस ने आरोपियों पर कोई कार्रवाई नहीं की है.

ननकाना साहिब में ये वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद सिक्खों में रोष पनप रहा है.

August 30th 2019, 3:28 am

वनवासी क्षेत्र में सामाजिक विद्वेष फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्व सरपंच दादू सिंह कोरेटिया की हत्या की घोर भर्त्सना करता है. दादू सिंह कोरेटिया अपने क्षेत्र में सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के आग्रही होने के कारण बहुत ही सम्मानित व्यक्ति थे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे. वे स्वयं जनजातीय समाज से थे. छत्तीसगढ़ व बस्तर की प्राचीन परंपरा का निर्वाह करते हुए सभी जाति – जनजातियों के बीच सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहकर सभी के साथ मिलजुलकर रहने वाले व्यक्ति थे.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राज्य सरकार और केंद्र सरकार से मांग करता है कि दादू सिंह कोरेटिया की हत्या के जिम्मेदार तत्व कौन हैं? इसकी गहन जांच होनी चाहिए. दोषियों को दंड मिलना चाहिए तथा सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध ऐसे वनवासी क्षेत्र में सामाजिक विद्वेष फैलाने वाले असामाजिक तत्वों को पकड़कर उनपर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए.

August 30th 2019, 2:47 am

30 अगस्त / पुण्यतिथि – तरुण तपस्वी, रामानुज दयाल

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नई दिल्ली. उ.प्र. में गाजियाबाद के पास पिलखुआ नगर वस्त्र-निर्माण के लिए प्रसिद्ध है. यहीं के एक प्रतिष्ठित व्यापारी व निष्ठावान स्वयंसेवक श्री रामगोपाल तथा कौशल्या देवी के घर में 1943 में जन्मे रामानुज दयाल ने अपना जीवन संघ को अर्पित किया; पर काल ने अल्पायु में ही उन्हें उठा लिया. सन् 1948 में संघ पर प्रतिबंध लगा, तो पिलखुआ के पहले सत्याग्रही दल का नेतृत्व रामगोपाल जी ने किया. रामानुज पर इसका इतना प्रभाव पड़ा कि उनके लौट आने तक वह हर शाम मुहल्ले के बच्चों को लेकर खेलता और ‘भारत माता की जय’ के नारे लगवाता. पिलखुआ में हुए गोरक्षा सम्मेलन में संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी व लाला हरदेव सहाय के सामने उसने मैथिलीशरण गुप्त की कविता ‘दांतों तले तृण दाबकर...’ पढ़कर प्रशंसा पायी. सन् 1953 में भारतीय जनसंघ ने जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिये आंदोलन किया, तो कौशल्या देवी महिला दल के साथ सत्याग्रह कर जेल गयीं. रामानुज जनसंघ का झंडा लेकर नगर में निकले जुलूस के आगे-आगे चला. शाखा में सक्रिय होने के कारण वे अपने साथ स्वयंसेवकों की पढ़ाई की भी चिन्ता करते थे. ग्रीष्मावकाश में प्रायः हर साल वे विस्तारक बनकर जाते थे. सरधना, बड़ौत, दोघट आदि में उन्होंने शाखा कार्य किया. संस्कृत में रुचि के कारण बी.ए. में उन्होंने पिलखुआ से 10 कि.मी. दूर धौलाना के डिग्री कॉलेज में प्रवेश लिया. वहां छात्रों से खूब संपर्क होता था. इससे ग्रामीण क्षेत्र में शाखाओं का विस्तार हुआ. मेरठ के तत्कालीन विभाग प्रचारक कौशल किशोर जी तथा उ.प्र. के तत्कालीन प्रांत प्रचारक रज्जू भैया का उन पर विशेष प्रभाव था. शाखा के साथ ही अन्य सामाजिक कार्यों में भी वे आगे रहते थे. एक बार एक कसाई गोमांस ले जा रहा था. पता लगते ही उन्होंने गोमांस छुड़ाकर कसाई को मजा चखाया कि उसने फिर कभी गोहत्या न करने की शपथ ली. एक बार उन्हें पता लगा कि ग्रामीण क्षेत्र में एक पादरी धर्मान्तरण का प्रयास कर रहा है. वे अपने मित्रों तथा छोटी बहिन सरस्वती के साथ वहां गये और इस षड्यंत्र को विफल कर दिया. पिलखुआ में हो रहे भारत-सोवियत सांस्कृतिक मैत्री संघ के समारोह में तिरंगा झंडा उल्टा टंगा देख वे आयोजक से ही भिड़ गये. हिन्दी को सम्मान दिलाने के लिये हुए हस्ताक्षर अभियान में भी वे सक्रिय रहे. दुर्गाष्टमी की शोभायात्रा में अश्लील नाच का उन्होंने विरोध किया. सत्साहित्य में रुचि के कारण लखनऊ से प्रकाशित हो रहे राष्ट्रधर्म मासिक तथा पाञ्चजन्य साप्ताहिक के लिये उन्होंने कई ग्राहक बनाये. कुछ धन भी संग्रह कर वहां भेजा. सन् 1965 में तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण कर प्रचारक बनने पर उन्हें मुजफ्फरनगर की कैराना तहसील में भेजा गया. उनके परिश्रम से सब ओर शाखाएं लगने लगीं. उन्होंने कैराना में विवेकानंद पुस्तकालय की स्थापना कर उसके उद्घाटन पर वीर रस कवि सम्मेलन करवाया. पिलखुआ में जब उनके बड़े भाई परमानंद जी ने स्कूटर खरीदा, तो उन्होंने पिताजी से कहकर अपने लिये भी एक छोटा वाहन (विक्की) खरीद लिया. वे खूब प्रवास कर कैराना तहसील के हर गांव में शाखा खोलना चाहते थे; पर विधि का विधान किसे पता था? 30 अगस्त 1966 को रक्षाबंधन पर्व था. रामानुज जी अपनी विक्की पर बनत से शामली आ रहे थे कि सामने से आते हुए तांगे से टकरा गये. उनके सीने पर गहरी चोट आयी. लोगों ने एक बस में लिटाकर उन्हें शामली पहुंचाया; पर तब तक उनके प्राण पखेरू उड़ चुके थे. इस प्रकार एक तरुण तपस्वी असमय काल कवलित हो गया. पिलखुआ में उनके परिजनों ने उनकी स्मृति में रामानुज दयाल सरस्वती शिशु मंदिर का निर्माण किया है.

August 29th 2019, 6:50 pm

29 अगस्त / जन्मदिवस – उनकी हॉकी से गेंद मानो चिपक जाती थी – ऐसे हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचन्द

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नई दिल्ली. भारतीय हॉकी का पूरे विश्व में दबदबा था और उसका श्रेय मेजर ध्यानचन्द को जाता है. मेजर ध्यानचंद का जन्म प्रयाग, उत्तर प्रदेश में 29 अगस्त, 1905 को हुआ था. उनके पिता सेना में सूबेदार थे. उन्होंने 16 साल की अवस्था में ध्यानचन्द को भी सेना में भर्ती करा दिया. वहां वे कुश्ती में बहुत रुचि लेते थे, पर सूबेदार मेजर बाले तिवारी ने उन्हें हॉकी खेलने के लिए प्रेरित किया. इसके बाद तो ध्यानचंद और हॉकी एक दूसरे के पर्याय बन गये.

वे कुछ दिन बाद ही अपनी रेजिमेण्ट की टीम में चुन लिये गये. उनका मूल नाम ध्यान सिंह था, लेकिन वे प्रायः चांदनी रात में अकेले घण्टों तक हॉकी का अभ्यास करते रहते थे. इससे उनके साथी तथा सेना के अधिकारी उन्हें ‘चांद’ कहने लगे. फिर तो यह उनके नाम के साथ ऐसा जुड़ा कि वे ध्यान सिंह से ध्यानचन्द हो गये. आगे चलकर वे ‘दद्दा’ ध्यानचन्द कहलाने लगे. चार साल तक ध्यानचन्द अपनी रेजिमेण्ट की टीम में रहे. वर्ष 1926 में वे सेना एकादश और फिर राष्ट्रीय टीम में चुने गये. इसी साल भारतीय टीम ने न्यूजीलैण्ड का दौरा किया. इस दौरे में पूरे विश्व ने उनकी अद्भुत प्रतिभा को देखा. गेंद उनके पास आने के बाद फिर किसी अन्य खिलाड़ी तक नहीं जा पाती थी. कई बार उनकी हॉकी की जांच की गयी, कि उसमें गोंद तो नहीं लगी है. अनेक बार खेल के बीच में उनकी हॉकी बदली गयी, पर वे तो अभ्यास के धनी थे. वे उल्टी हॉकी से भी उसी कुशलता से खेल लेते थे. इसीलिए उन्हें लोग हॉकी का जादूगर’ कहते थे.

भारत ने सर्वप्रथम वर्ष 1928 के एम्सटर्डम ओलम्पिक में भाग लिया. ध्यानचन्द भी इस दल में थे. इससे पूर्व इंग्लैण्ड ही हॉकी का स्वर्ण जीतता था, पर इस बार भारत से हारने के भय से उसने हॉकी प्रतियोगिता में भाग ही नहीं लिया. भारत ने प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता. वर्ष 1936 के बर्लिन ओलम्पिक के समय ध्यानचंद को भारतीय दल का कप्तान बनाया गया. इसमें भी भारत ने स्वर्ण जीता. इसके बाद वर्ष 1948 के ओलम्पिक में भारतीय दल ने कुल 29 गोल किये थे. इनमें से 15 अकेले ध्यानचन्द के ही थे. इन तीन ओलम्पिक में उन्होंने 12 मैचों में 38 गोल किये. वर्ष 1936 के बर्लिन ओलम्पिक के तैयारी खेलों में जर्मनी ने भारत को 4-1 से हरा दिया था. फाइनल के समय फिर से दोनों टीमों की भिड़ंत हुई. प्रथम भाग में दोनों टीमें 1-1 गोल से बराबरी पर थीं. मध्यान्तर में ध्यानचन्द ने सब खिलाड़ियों को तिरंगा झण्डा दिखाकर प्रेरित किया. इससे सबमें जोश भर गया और उन्होंने धड़ाधड़ सात गोल कर डाले. इस प्रकार भारत 8-1 से विजयी हुआ. उस दिन 15 अगस्त था. कौन जानता था कि 11 साल बाद इसी दिन भारतीय तिरंगा पूरी शान से देश भर में फहरा उठेगा.

वर्ष 1926 से 1948 तक ध्यानचन्द दुनिया में जहां भी हॉकी खेलने गये, वहां दर्शक उनकी कलाइयों का चमत्कार देखने के लिए उमड़ आते थे. आस्ट्रिया की राजधानी वियना के एक स्टेडियम में उनकी प्रतिमा ही स्थापित कर दी गयी. 42 वर्ष की अवस्था में उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय हॉकी से संन्यास ले लिया. कुछ समय वे राष्ट्रीय खेल संस्थान में हॉकी के प्रशिक्षक भी रहे. भारत के इस महान सपूत को शासन ने वर्ष 1956 में ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया. 3 दिसम्बर, 1979 को उनका देहान्त हुआ. उनका जन्मदिवस 29 अगस्त भारत में ‘खेल दिवस’ के रूप में मनाया जाता है.

August 28th 2019, 6:38 pm

छत्तीसगढ़ – नक्सलियों ने आरएसएस स्वयंसेवक की हत्या की

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छत्तीसगढ़ के कांकेर में ज़िले में नक्सलियों ने मंगलवार (अगस्त 27, 2019) को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक स्वयंसेवक की हत्या कर दी. 40 वर्षीय स्वयंसेवक दादू सिंह कोरटिया को नक्सलियों ने पहले तो आवाज़ देकर घर से बाहर निकाला और फिर गोली मार कर हत्या कर दी. दुर्गुकोंदल स्थित कोंडेगांव में हुई इस घटना की पुलिस ने भी पुष्टि की है. रात 10.30 के क़रीब 25 के लगभग नक्सलियों ने उनके घर के बाहर जमा होकर उन्हें आवाज़ लगाई.

दादू मैकेनिकल इंजीनियर थे. उन्हें साल भर पहले भी मारने का प्रयास किया गया था. नक्सलियों ने पहले उन्हें कई बार चेतावनी दी थी कि वे सुरक्षा बलों से नजदीकी न बढ़ाएं. वह काफ़ी धार्मिक विचार वाले व्यक्ति थे और क्षेत्र में उन्होंने कई मंदिर भी बनवाए हैं.

गोली मारने से पहले नक्सलियों ने उनपर कुल्हाड़ी से भी वार किया. नक्सलियों ने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने को लेकर विरोध जताया. उन्होंने घटनास्थल पर इससे सम्बंधित पर्चे भी छोड़े. नक्सलियों ने पर्चे में भाजपा और आरएसएस को दलित और आदिवासी विरोधी बताया.

नक्सलियों ने अपने पर्चे में लिखा कि अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करना मोदी सरकार की तानाशाही और हिटलरशाही को दिखाता है. नक्सलियों ने दादू सिंह को मारने का कारण बताते हुए लिखा कि वह भाजपा और संघ से जुड़े हुए थे, इसीलिए उन्हें मारा गया. नक्सलियों ने केंद्र सरकार के निर्णय के ख़िलाफ़ 30 अगस्त को बंद का भी ऐलान किया है.

कुछ दिनों पहले कांकेर में ही कोयलीबेड़ा में नक्सलियों ने ‘जन अदालत’ लगा कर एक युवक की हत्या कर दी थी. उक्त युवक पर पुलिस की मुखबिरी का आरोप लगा कर उसे पीट पाट कर मार डाला गया था. उसकी लाश जंगल से बरामद हुई थी.

August 28th 2019, 2:53 pm

देश की सीमाएं माँ के आंचल की तरह पवित्र – डॉ. कृष्णगोपाल जी

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नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल जी ने कहा कि सेना के साथ देशवासियों को भी देश की रक्षा में सहभागी होना चाहिए. जागरूक देश वह है जो अपनी सीमाओं के प्रति जागरूक रहता है. सीमाओं का जानकार और उसको पवित्र मानने वाला ही देश का जागरूक नागरिक है. देश की सीमाएं माँ के आंचल की तरह पवित्र होती हैं, जिसे अपना देश कालांतर में भूल गया. चन्द्रगुप्त मौर्य सैल्यूकस के भारत पर आक्रमण के समय मगध से झेलम नदी के तट पर पौने दो हजार कि.मी. दूर उसे रोकने आया और उसे पराजित कर वहां से खदेड़ दिया. क्योंकि उसे अपने राष्ट्र की सीमा का भान था, जिसके लिए उसने सब राजाओं को इकट्ठा किया. डॉ. कृष्णगोपाल जी ने सीमा जागरण मंच की पत्रिका ‘सीमा संघोष’ के वार्षिक विशेषांक ‘सीमा सुरक्षा’ का विमोचन करते हुए नेहरू मेमोरियल पुस्तकालय के सभागार में संबोधित किया. उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने सीमाओं की महत्ता को ध्यान में रखकर हजारों साल पहले सीमाओं के निकट पवित्र तीर्थ चाहे वह उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वम-कन्याकुमारी, पश्चिम में द्वारका, पूर्व में जगन्नाथ धाम, गंगासागर, परशुराम कुंड आदि तीर्थों की स्थापना करके देश की सीमाओं को आस्था के सूत्र से चिन्हित कर दिया था. उन्होंने कहा कि सीमा के प्रति यह जागरण का कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक विद्याभारती आदि संस्थाओं के माध्यम से कर रहे हैं. बद्रीनाथ के निकट माणा गांव जैसे दुर्गम सीमांत क्षेत्रों के बच्चों को पढ़ाना, सुदूर क्षेत्रों में चिकित्सा सेवा उपलब्ध करवाना देश को सुरक्षित रखने का कार्य है. सीमाओं की सुरक्षा केवल सेना नहीं कर सकती, इसके लिए वहां के निवासियों में राष्ट्रीयता का भाव होना आवश्यक है, जिसे जागृत करने का कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व सीमा जागरण मंच कर रहा है. सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि देश में 12 हजार गांव सीमाओं पर स्थित हैं, वहां शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा सुनिश्चित केवल सरकार नहीं कर सकती, दिल्ली जैसे महानगरों में बैठे प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है कि वे सीमा पर जाकर वहां अभाव में रह रहे लोगों की सहायता करें. पर्यटन के लिए विदेशों में जाने वालों को देश की सीमाएं भी देखनी चाहिए. कश्मीर घाटी में मुस्लिम महिलाओं को घर पर शाल निर्माण का प्रशिक्षण व रोजगार दिया गया है, जिससे उन्हें लग रहा है दिल्ली भी ऐसे लोग है जो उनकी चिंता करते हैं. यह भावना देश के प्रत्येक नागरिक की होनी चाहिए. देश के दूरस्थ क्षेत्र में बैठे हुए हर नागरिक की कठिनाई हमको मालूम होनी चाहिए. हम अगर उनके कष्ट कठिनाइयों को दूर करने के लिए हर सम्भव कोशिश करेंगे तो वह नागरिक सैनिकों के साथ देश की सीमा की रक्षा के लिए अधिक ताकत से लड़ेगा और सीमा सुरक्षित होगी. https://www.youtube.com/watch?v=vDZreAjwrHs

August 28th 2019, 2:53 pm

सरसंघचालक तथा सरकार्यवाह जी का शोक संदेश

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प्रतिभाशाली, अध्ययनशील नेतृत्व श्री अरूण जेतली जी अपनी जीवन यात्रा पूर्ण कर आज प्रभु चरणों में लीन हो गए.
युवा आयु से ही उनका सामाजिक, राजनैतिक जीवन का प्रारंभ हुआ था.
आज देश कई क्षेत्रों में विकास पथ पर चल रहा है, ऐसी घड़ी में उनका योगदान आवश्यक भी था और महत्वपूर्ण भी ..
सभी परिवार जन एवं निकटवर्ती आज हृदय की वेदना अनुभव करते हैं.
हम सभी उनकी आत्मा की शांति और सद्गति के लिए ईश्वर के चरणों में प्रार्थना करते हैं.

ॐ शांति: शांति: शांति:
डॉ. मोहन भागवत, सरसंघचालक
सुरेश जोशी, सरकार्यवाह

August 28th 2019, 1:23 pm

28 अगस्त / जन्मदिवस – प्रथम प्रचारक बाबासाहब आप्टे

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नई दिल्ली. 28 अगस्त, 1903 को यवतमाल, महाराष्ट्र के एक निर्धन परिवार में जन्मे प्रचारकों की श्रृंखला में प्रथम प्रचारक उमाकान्त केशव आप्टे जी का प्रारम्भिक जीवन बड़ी कठिनाइयों में बीता. 16 वर्ष की छोटी अवस्था में पिता का देहान्त होने के कारण परिवार की सारी जिम्मेदारी इन पर ही आ गयी. इन्हें पुस्तक पढ़ने का बहुत शौक था. आठ वर्ष की अवस्था में इनके मामा ‘ईसप की कथाएं’ नामक पुस्तक लेकर आये. उमाकान्त देर रात तक उसे पढ़ता रहा. केवल चार घण्टे सोकर उसने फिर पढ़ना शुरू कर दिया. मामा जी अगले दिन वापस जाने वाले थे. अतः उमाकान्त खाना-पीना भूलकर पढ़ने में लगा रहा. खाने के लिए मां के बुलाने पर भी वह नहीं आया, तो पिताजी छड़ी लेकर आ गये. इस पर उमाकान्त अपनी पीठ उघाड़कर बैठ गया. बोला – आप चाहे जितना मार लें, पर इसे पढ़े बिना मैं अन्न-जल ग्रहण नहीं करूंगा. उसके हठ के सामने सबको झुकना पड़ा.

छात्र जीवन में वे लोकमान्य तिलक से बहुत प्रभावित थे. एक बार तिलक जी रेल से उधर से गुजरने वाले थे. प्रधानाचार्य नहीं चाहते थे कि विद्यार्थी उनके दर्शन करने जाएं. अतः उन्होंने फाटक बन्द करा दिया. विद्यालय का समय समाप्त होने पर उमाकान्त ने जाना चाहा, पर अध्यापक ने जाने नहीं दिया. जिद करने पर अध्यापक ने छड़ी से उनकी पिटाई कर दी. इसी बीच रेल चली गयी. अब अध्यापक ने सबको छोड़ दिया. उमाकान्त ने गुस्से में कहा कि आपने भले ही मुझे नहीं जाने दिया, पर मैंने मन ही मन तिलक जी के दर्शन कर लिये हैं और उनके आदेशानुसार अपना पूरा जीवन देश को अर्पित करने का निश्चय भी कर लिया है. अध्यापक अपना सिर पीटकर रह गये.

मैट्रिक करने के बाद घर की स्थिति को देखकर उन्होंने कुछ समय धामण गांव में अध्यापन कार्य किया, पर पढ़ाते समय वे हर घटना को राष्ट्रवादी पुट देते रहते थे. एक बार उन्होंने विद्यालय में तिलक जयन्ती मनाई. इससे प्रधानाचार्य बहुत नाराज हुए. इस पर आप्टे जी ने त्यागपत्र दे दिया तथा नागपुर आकर एक प्रेस में काम करने लगे. इसी समय उनका परिचय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी से हुआ. बस फिर क्या था, आप्टे जी क्रमशः संघ के लिए समर्पित होते चले गये. पुस्तकों के प्रति उनकी लगन के कारण डॉ. हेडगेवार जी उन्हें ‘अक्षर शत्रु’ कहते थे. आप्टे जी ने हाथ से लिखकर दासबोध तथा टाइप कर वीर सावरकर की प्रतिबन्धित पुस्तक ‘सन 1857 का स्वाधीनता संग्राम’ अनेक नवयुवकों को पढ़ने को उपलब्ध करायीं. उन्होंने अनेक स्थानों पर नौकरी की, पर नौकरी के अतिरिक्त शेष समय वे संघ कार्य में लगाते थे.

संघ कार्य के लिए अब उन्हें नागपुर से बाहर भी प्रवास करना पड़ता था. अतः उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पूरा समय संघ के लिए लगाने लगे. इस प्रकार वे संघ के प्रथम प्रचारक बने. आगे चलकर डॉ. जी उन्हें देश के अन्य भागों में भी भेजने लगे. इस प्रकार वे संघ के अघोषित प्रचार प्रमुख हो गये. उनकी अध्ययनशीलता, परिश्रम, स्वाभाविक प्रौढ़ता तथा बातचीत की निराली शैली के कारण डॉ. जी ने उन्हें ‘बाबासाहब’ नाम दिया था. दशावतार जैसी प्राचीन कथाओं को आधुनिक सन्दर्भों में सुनाने की उनकी शैली अद्भुत थी. संघ में अनेक दायित्वों को निभाते हुए बाबासाहब आप्टे 27 जुलाई, 1972 (गुरुपूर्णिमा) को दिवंगत हो गये.

August 27th 2019, 4:53 pm

गोली क्यों नहीं मारी? आप मुस्लिम समुदाय पर एक धब्बा हैं – हरियाणा के एक जज

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जिला बार एसोसिएशन, चरखी दादरी, हरियाणा के वकीलों के एक समूह द्वारा लिखा पत्र प्रकाश में आने के बाद मानसिकता पर सवाल खड़े होने लगे हैं. वकीलों ने पीठासीन अधिकारी पर आरोप लगाया है कि उन्होंने एक मामले की सुनवाई के दौरान मुस्लिम याचिकाकर्ताओं को हिन्दुओं के ख़िलाफ़ उकसाने वाली बातें कही.

वकीलों का आरोप है कि 20 अगस्त को राज्य बनाम परविंदर मामले की सुनवाई चल रही थी, जिसमें शिक़ायतकर्ता और गवाह दोनों उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के रहने वाले मुस्लिम थे. भारतीय दंड संहिता की धारा-365 (अपहरण और ग़लत कारावास), धारा-379 बी (चोरी) के तहत मामला दर्ज था. गवाहों से दुश्मनी निभाने के एवज़ में न्यायाधीश ने वकीलों से इस मामले के प्रत्येक गवाह को 1,000 रुपए देने के लिए कहा.

सुनवाई के दौरान, पीठासीन अधिकारी ने यह कहकर गवाहों को डांटा कि दूसरे (हिन्दू) समुदाय के सदस्यों द्वारा पीटे जाने पर वो (मुस्लिम) मुस्लिम समुदाय पर एक धब्बा हैं. जज साहब ने ग़ुस्से में सवाल किया कि उन्होंने अपने विरोधी (जो इस मामले में हिन्दू थे) को गोली क्यों नहीं मार दी?

पीठासीन न्यायाधीश ने गवाहों से कहा कि वे अगली बार पिस्तौल के साथ अदालत में आएं.

पत्र के अनुसार, न्यायाधीश ने हिन्दुओं के बारे में कहा कि उनके पास ऐसी कोई ताक़त नहीं है, जिससे वो मुसलमानों के सामने टिक सकें.

उन्होंने कहा, “आप एक पिस्तौल के साथ आएं. मैं यहीं हूँ. हर बात की ज़िम्मेदारी मैं लूगा.”

पत्र लिखने वाले वकीलों ने इस मामले में जल्द से जल्द कार्रवाई का अनुरोध किया है. साथ ही उन्होंने लंबित मामले स्थानांतरित करने की भी मांग की, क्योंकि उन्हें अदालत में न्याय की कोई उम्मीद नहीं है. इस शिक़ायती पत्र की कॉपी CJI रंजन गोगोई, कानून और न्याय मंत्री रवि शंकर प्रसाद, बार काउंसिल ऑफ पंजाब एंड हरियाणा और बार काउंसिल इंडिया के अध्यक्ष को भेजी है.

साभार – Opinidia

August 27th 2019, 1:22 pm

अंग्रेजों ने समाज को बांटने के लिये साजिश के तहत ‘दलित’ शब्द गढ़ा – डॉ. कृष्णगोपाल जी

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने कहा सिंध के अंतिम हिन्दू राजा दाहिर की पत्नियां जब जौहर करने जा रही थीं, तब उन्होंने ‘म्लेच्छ’ शब्द का प्रयोग किया था. रानियों का मानना था कि अगर उन्होंने जल्द से जल्द जौहर कर अपने प्राण नहीं त्यागे तो ‘म्लेच्छ’ लोग (इस्लामिक आक्रांता) आकर उन्हें छू लेंगे. भारत में छुआछूत की समस्या को लेकर अक्सर बहस होती रहती है और यह आज़ादी के काफ़ी पहले से चली आ रही है. सह सरकार्यवाह 26 अगस्त को दिल्ली में आयोजित पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल जी ने कहा कि भारत में छुआछूत की समस्या इस्लाम के आने के बाद शुरू हुई. उन्होंने ‘दलित’ शब्द पर कहा कि अंग्रेजों ने एक साज़िश के तहत समाज को बांटने के लिए इस शब्द का आविष्कार किया. संघ एक ऐसा समाज चाहता है, जहां कोई जात-पात नहीं हो, अर्थात् जातिविहीन समाज हो.

उन्होंने भारतीय ग्रंथों से उदाहरण देते हुए कहा कि प्राचीन काल में ऊंची और नीची जातियां तो थीं, लेकिन छुआछूत नहीं था. गौ का मांस खाने वालों को अछूत माना जाता था. आम्बेडकर भी ऐसा ही मानते थे. उन्होंने कई ऐसे उदाहरण गिनाए, जिनके कारण कभी ‘फॉरवर्ड’ जाति के लोग रहे, आज ‘बैकवर्ड’ हो गए हैं. उन्होंने कहा “आज मौर्य जाति के लोग ‘बैकवर्ड’ कहलाते हैं, लेकिन कभी वे ‘फॉरवर्ड’ थे. बंगाल में पाल लोग राजा हुआ करते थे, लेकिन आज वे भी ‘बैकवर्ड’ कहलाते हैं. इसी प्रकार भगवान बुद्ध की जाति शाक्य भी आज ओबीसी श्रेणी में आती है. हमारे समाज में ‘दलित’ शब्द था ही नहीं. ये ब्रिटिश आक्रांताओं की ‘फूट डालो और राज करो’ की साज़िश का एक हिस्सा था. यहां तक कि हमारी संविधान सभा ने भी ‘दलित’ शब्द का प्रयोग करने से मना कर दिया. भारत में इस्लामिक शासनकाल एक ‘अन्धकार युग’ था, लेकिन हमारी आध्यात्मिक जड़ों के कारण हम किसी तरह बचे रहे.”

उन्होंने कहा कि चन्द्रगुप्त मौर्य पहले शूद्र थे, लेकिन बाद में अखंड भारत के सम्राट बने. उन्होंने महर्षि वाल्मीकि का उदाहरण देते हुए कहा कि वे भी शूद्र थे, लेकिन बाद में एक महान ऋषि हुए. उन्होंने नास्तिकों की बढ़ती संख्या पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हिन्दू जीवन पद्धति और वेदांत में ही उन्हें उनके सवालों का उत्तर मिल सकता है.

August 27th 2019, 11:36 am

कानपुर में विहिप स्थापना दिवस मनाया

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विश्व हिन्दू परिषद् कानपुर महानगर द्वारा विहिप का स्थापना दिवस समारोह बी.एन.एस.डी शिक्षा निकेतन इण्टर कालेज बेनाझाबर कानपुर में आयोजित किया गया. कार्यक्रम के मुख्य वक्ता विश्व हिन्दू परिषद् पूर्वी उत्तर प्रदेश के संगठन मन्त्री अम्बरीष जी ने कहा कि अखिल विश्व में रहने वाले सभी हिन्दुओं के मन में हिन्दुत्व का भाव जागृत करने ओर उनको संगठित करने हेतु विश्व हिन्दू परिषद् कार्य कर रही है. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के शुभ मुहुर्त पर दिनांक 29-30 अगस्त, 1964 को पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द जी के पवई मुम्बई स्थित सांदीपनी आश्रम में विश्व हिन्दू परिषद् की स्थापना हुई थी.

उन्होंने कहा कि इन 55 वर्षों के कालखण्ड में 1984 से श्रीराम जन्म भूमि आन्दोलन, 1996 में बाबा अमरनाथ की यात्रा को आतंकवादियों की धमकी के बाद बजरंग दल के 50,000 से अधिक कार्यकर्ताओं ने कश्मीर घाटी स्थित पहलगांव में पहुंचकर अमरनाथ यात्रा को भव्य और दिव्य स्वरूप प्रदान किया था. 2005 में बाबा बूढ़ा अमरनाथ यात्रा को शुरू कराने का, 2007 में रामसेतु को बचाने हेतु पूरे देश में “चक्का जाम” करने का, इन सब विषयों पर विश्व हिन्दू परिषद् समय-समय पर आन्दोलन करता रहता है. हिन्दू चेतना को जागृत करने के लिए विश्व हिन्दू परिषद् हर संभव प्रयास करता रहेगा.

कार्यक्रम में कानपुर प्रान्त के संघचालक ज्ञानेन्द्र सचान जी, विश्व हिन्दू परिषद् कानपुर प्रान्त के अध्यक्ष राजीव महाना जी, पनकी मन्दिर के महन्त महामण्डलेश्वर जितेन्द्र दास जी महाराज, महामण्डलेश्वर योगेश्वरी देवी जी, विहिप के प्रान्त सहमन्त्री दीनदयाल गौड़ जी, आदि उपस्थित थे.

 

August 27th 2019, 11:36 am

विहिप स्थापना दिवस पर पर्यावरण रक्षा यज्ञ व वृक्षारोपण कर बच्चों को बनाया उनका संरक्षक

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नई दिल्ली. नियमित यज्ञ व वृक्षारोपण के साथ पर्यावरण की रक्षा तथा जल–वायु की शुद्धता व संरक्षण हिन्दू जीवन मूल्यों का अभिन्न अंग रहा है जो सम्पूर्ण प्राणी जगत के लिए आज एक महत्वपूर्ण कार्य बन गया है. प्रातः काल पर्यावरण रक्षा यज्ञ तथा बृहद वृक्षारोपण कार्यक्रम के अवसर पर विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने कहा कि यज्ञ – हवन के माध्यम से जहां पर्यावरण की शुद्धि होती है. वहीं, दूसरी ओर, वृक्षारोपण द्वारा सृष्टि के सम्पूर्ण प्राणी जगत को प्राण वायु (ऑक्सीजन) मिलती है.

विहिप के 55वें स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में नन्हें मुन्ने बच्चों के साथ महिलाओं व वरिष्ठ नागरिकों ने भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया. अधिकांश पौधे बच्चों के नाम पर उन्हें उनका संरक्षक नियुक्त कर लगवाए गए. अनेक लोगों ने अपने माता-पिता, परिजनों व पूर्वजों के नाम पर भी पौधे लगा कर उनकी सुरक्षा का संकल्प लिया.

वैदिक विदुषी दर्शनाचार्या  विमलेश आर्या के ब्रह्मत्व में संचालित देव यज्ञ (हवन) के उपरांत नन्हें मुन्ने बच्चों के साथ पौधारोपण करते हुए समाजसेवी राजेश कुमार ने क्षिति-जल-पावक-गगन-समीरा नामक पंच-तत्वों पर प्रकाश डाला. उन्होंने पर्यावरण की रक्षार्थ प्रत्येक व्यक्ति को आगे आने का आह्वान किया.

प्रसिद्ध गायक महेश लखेड़ा ने गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज के हिन्दू धर्म व राष्ट्र की रक्षार्थ तीन पीढ़ियों के वलिदान को नमन करते हुए ‘पिता वारिया ते लाल चार बारे, ते हिन्द तेरी शान बदले…’ गीत गाया. कार्यक्रम में विभिन्न संस्थानों के प्रतिनिधि उपस्थित थे.

August 27th 2019, 10:33 am

27 अगस्त / पुण्यतिथि – बहुमुखी प्रतिभा के धनी : प्रताप नारायण जी

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक मुख्यतः संगठन कला के मर्मज्ञ होते हैं; पर कई कार्यकर्ताओं ने कई अन्य क्षेत्रों में भी प्रतिभा दिखाई है. ऐसे ही थे श्री प्रताप नारायण जी. स्वास्थ्य की खराबी के कारण जब उन्हें प्रवास न करने को कहा गया, तो वे लेखन के क्षेत्र में उतर गये और शीघ्र ही इस क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हो गये.

प्रताप जी का जन्म 1927 में ग्राम करमाडीह, जिला गोण्डा, उत्तर प्रदेश के एक सामान्य परिवार में हुआ था. कक्षा 10 में पढ़ते समय वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से प्रभावित होकर शाखा जाने लगे. आगे चलकर वे संघ के प्रति ही पूर्णतः समर्पित हो गये. उन्होंने विवाह के झंझट में न पड़कर जीवन भर संघ कार्य करने की प्रतिज्ञा ली. घर-परिवार के सम्बन्ध पीछे छूट गये और वे विशाल हिन्दू समाज के साथ एकरस हो गये.

प्रचारक के रूप में उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करते हुए वे अवध के प्रान्त प्रचारक का गुरुतर दायित्व सम्भालते रहे. इस दौरान उनका केन्द्र लखनऊ था, जो सदा से राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र रहा है. प्रताप जी ने न केवल जनसंघ अपितु विरोधी दल के अनेक नेताओं से भी अच्छे सम्बन्ध बना लिये. उन दिनों भाऊराव जी का केन्द्र भी लखनऊ था. उनके दिशा निर्देश पग-पग पर मिलते ही थे. भाऊराव ने उन्हें जो भी काम उन्हें सौंपा, प्रताप जी ने तन-मन से उसे पूरा किया.

सबके साथ समन्वय बनाकर चलने तथा बड़ी-बड़ी समस्याओं को भी धैर्य से सुलझाने का उनका स्वभाव देखकर भाऊराव जी ने ही उन्हें भारतीय जनता पार्टी में काम करने को भेजा. यद्यपि प्रताप जी की रुचि का क्षेत्र संघ शाखा ही था; उनका मन भी युवाओं के बीच ही लगता था. फिर भी पूर्णतः अनासक्त की भाँति उन्होंने इस दायित्व को निभाया.

संघ और राजनीतिक क्षेत्र के काम में लगातार प्रवास करना पड़ता है. प्रवास, अनियमित खानपान और व्यस्त दिनचर्या के कारण प्रताप जी को हृदय रोग, मधुमेह और वृक्क रोग ने घेर लिया. अतः इन्हें फिर से संघ-कार्य में भेज दिया गया. चिकित्सकों ने इन्हें प्रवास न करने और ठीक से दवा लेने को कहा. भाऊराव ने प्रताप जी को लेखन कार्य की ओर प्रोत्साहित किया. प्रताप जी की इतिहास के अध्ययन में बहुत रुचि थी. संघ के शिविरों में वे रात में सब शिक्षार्थियों को बड़े रोचक ढंग से इतिहास की कथाएँ सुनाते थे. इन्हीं कथाओं को लिखने का काम उन्होंने प्रारम्भ किया.

प्रताप जी अब प्रवास बहुत कम करते थे; पर जहाँ भी जाते, थोड़ा सा समय मिलते ही तुरन्त लिखना शुरू कर देते थे. कागज और कलम वे सदा साथ रखते थे. इस प्रकार मेवाड़,  गुजरात,  असम,  पंजाब आदि की इतिहास-कथाओं की अनेक पुस्तकें तैयार हो गयीं. लोकहित प्रकाशन, लखनऊ ने उन्हें प्रकाशित किया. पूरे देश में इन पुस्तकों का व्यापक स्वागत हुआ. आज भी प्रायः उन पुस्तकों के नये संस्करण प्रतिवर्ष प्रकाशित होते रहते हैं.

इसके बाद भी हृदय रोग क्रमशः बढ़ रहा था. प्रताप जी यमराज की पास आती पदचाप सुन रहे थे. अतः जितना समय उनके पास था, उसमें अधिकतम साहित्य वे नयी पीढ़ी को दे जाना चाहते थे. अन्त समय तक लेखनी चलाते हुए 27 अगस्त, 1993 को उन्होंने अपने नश्वर शरीर को त्याग दिया.

August 26th 2019, 8:11 pm

26 अगस्त / इतिहास स्मृति – चित्तौड़ का पहला जौहर

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नई दिल्ली. जौहर की गाथाओं से भरे पृष्ठ भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं. ऐसे अवसर एक नहीं, कई बार आए हैं, जब हिन्दू ललनाओं ने अपनी पवित्रता की रक्षा के लिए ‘जय हर-जय हर’ कहते हुए हजारों की संख्या में सामूहिक अग्नि प्रवेश किया था. यही उद्घोष आगे चलकर ‘जौहर’ बन गया. जौहर की गाथाओं में सर्वाधिक चर्चित प्रसंग चित्तौड़ की रानी पद्मिनी का है, जिन्होंने 26 अगस्त, 1303 को 16,000 क्षत्राणियों के साथ जौहर किया था.

पद्मिनी का मूल नाम पद्मावती था. वह सिंहलद्वीप के राजा रतनसेन की पुत्री थी. एक बार चित्तौड़ के चित्रकार चेतन राघव ने सिंहलद्वीप से लौटकर राजा रतन सिंह को उसका एक सुंदर चित्र बनाकर दिया. इससे प्रेरित होकर राजा रतन सिंह सिंहलद्वीप गया और वहां स्वयंवर में विजयी होकर उसे अपनी पत्नी बनाकर ले आया. इस प्रकार पद्मिनी चित्तौड़ की रानी बन गयी. पद्मिनी की सुंदरता की ख्याति अलाउद्दीन खिलजी ने भी सुनी थी. वह उसे किसी भी तरह अपने हरम में डालना चाहता था. उसने इसके लिए चित्तौड़ के राजा के पास धमकी भरा संदेश भेजा, पर राव रतन सिंह ने उसे ठुकरा दिया. अब वह धोखे पर उतर आया. उसने रतन सिंह को कहा कि वह तो बस पद्मिनी को केवल एक बार देखना चाहता है. रतन सिंह ने खून-खराबा टालने के लिए यह बात मान ली. एक दर्पण में रानी पद्मिनी का चेहरा अलाउद्दीन को दिखाया गया. वापसी पर रतन सिंह उसे छोड़ने द्वार पर आए. इसी समय उसके सैनिकों ने धोखे से रतन सिंह को बंदी बनाया और अपने शिविर में ले गए. अब यह शर्त रखी गयी कि यदि पद्मिनी अलाउद्दीन के पास आ जाए, तो रतन सिंह को छोड़ दिया जाएगा.

यह समाचार पाते ही चित्तौड़ में हाहाकार मच गया, पर पद्मिनी ने हिम्मत नहीं हारी. उसने कांटे से ही कांटा निकालने की योजना बनाई. अलाउद्दीन के पास समाचार भेजा गया कि पद्मिनी रानी हैं. अतः वह अकेले नहीं आएंगी. उनके साथ पालकियों में 800 सखियां और सेविकाएं भी आएंगी. अलाउद्दीन और उसके साथी यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए. उन्हें पद्मिनी के साथ 800 हिन्दू युवतियां अपने आप ही मिल रही थीं, पर उधर पालकियों में पद्मिनी और उसकी सखियों के बदले सशस्त्र हिन्दू वीर बैठाये गए. हर पालकी को चार कहारों ने उठा रखा था. वे भी सैनिक ही थे. पहली पालकी के मुगल शिविर में पहुंचते ही रतन सिंह को उसमें बैठाकर वापस भेज दिया गया और फिर सब योद्धा अपने शस्त्र निकालकर शत्रुओं पर टूट पड़े.

कुछ ही देर में शत्रु शिविर में हजारों सैनिकों की लाशें बिछ गयीं. इससे बौखलाकर अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर हमला बोल दिया. इस युद्ध में राव रतन सिंह तथा हजारों सैनिक मारे गए. जब रानी पद्मिनी ने देखा कि अब हिन्दुओं के जीतने की आशा नहीं है, तो उसने जौहर का निर्णय किया. रानी और किले में उपस्थित सभी नारियों ने सम्पूर्ण श्रृंगार किया. हजारों बड़ी चिताएं सजाई गयीं. ‘जय हर-जय हर’ का उद्घोष करते हुए सर्वप्रथम पद्मिनी ने चिता में छलांग लगाई और फिर क्रमशः सभी हिन्दू वीरांगनाएं अग्नि प्रवेश कर गयीं. जब युद्ध में जीत कर अलाउद्दीन पद्मिनी को पाने की आशा से किले में घुसा, तो वहां जलती चिताएं उसे मुंह चिढ़ा रही थीं.

August 25th 2019, 6:08 pm

25 अगस्त / जन्मदिवस – शिक्षानुरागी सुशीला देवी

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नई दिल्ली. सुशीला देवी का जन्म 25 अगस्त, 1914 को जम्मू-कश्मीर राज्य के दीवान बद्रीनाथ जी, विद्यावती जी के घर में ज्येष्ठ पुत्री के रूप में हुआ था. उन्हें अपने पिताजी से प्रशासनिक क्षमता तथा माताजी से धर्मप्रेम विरासत में मिला था. जब वे कानपुर के प्रख्यात समाजसेवी रायबहादुर विक्रमाजीत सिंह की पुत्रवधू बन कर आयीं, तो ससुराल पक्ष से उन्हें शिक्षा संस्थाओं के प्रति प्रेम भी प्राप्त हुआ. इन गुणों को विकसित करते हुए उन्होंने समाजसेवा के माध्यम से अपार प्रतिष्ठा अर्जित की.

सुशीला जी के पूर्वज ऐमनाबाद (वर्तमान पाकिस्तान) के निवासी थे. पंजाब व जम्मू-कश्मीर में इनकी विशाल जागीरें थीं. इनके परदादा कृपाराम जी ने जम्मू के राजा गुलाब सिंह को कश्मीर राज्य खरीदने में सहयोग दिया था. बद्रीनाथ जी राजा हरिसिंह के निजी सचिव भी थे. इस परिवार की ओर से कई शिक्षा संस्थाओं, अनाथाश्रम, विधवाश्रम व धर्मशालाओं आदि का संचालन किया जाता था. विभाजन के बाद उनकी अथाह सम्पत्ति पाकिस्तान व पाक अधिकृत कश्मीर में रह गयी, पर सुशीला जी ने कभी उसकी चर्चा नहीं की. वर्ष 1935 में सुशीला जी का विवाह बैरिस्टर नरेन्द्रजीत सिंह जी से हुआ, जो आगे चलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत संघचालक बने. इस प्रकार उनके जीवन में धर्म के साथ समाज व संगठन प्रेम का भी समावेश हुआ. कानपुर में सुशीला जी को सब ‘रानी साहिबा’ कहने लगे, पर यह सम्बोधन धीरे-धीरे ‘बूजी’ में बदल गया.

विवाह के बाद भी सुशीला जी प्रायः कश्मीर जाती रहती थीं, चूंकि उनके पिता जी का देहांत वर्ष 1919 में ही हो चुका था. अतः उनकी सम्पत्ति की देखभाल उन्हें ही करनी पड़ती थी. विभाजन के समय और फिर वर्ष 1965 में जब श्रीनगर में संकट के बादल छा गये, तो सबने उन्हें तुरंत श्रीनगर छोड़ने को कहा, पर वे अपने सब कर्मचारियों के साथ ही जम्मू गयीं. धीरे-धीरे बूजी ने स्वयं को कानपुर के गरम मौसम व घरेलू वातावरण के अनुरूप ढाल लिया. बैरिस्टर साहब जब संघ में सक्रिय हुए, तो उनके घर वरिष्ठ कार्यकर्ता प्रायः आने लगे. बूजी स्वयं रुचि लेकर सबकी आवभगत करती थीं. इस प्रकार वे भी संघ से एकरूप हो गयीं. उन्होंने आग्रहपूर्वक अपने एक पुत्र को तीन वर्ष के लिए प्रचारक भी बनाया. जब भी उनके घर में कोई शुभ कार्य होता, वे हजारों निर्धनों को भोजन कराती थीं.

वर्ष 1947 में संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी से भेंट के बाद राजा हरिसिंह ने जम्मू-कश्मीर राज्य का भारत में विलय किया. इसमें सरदार पटेल के साथ ही पर्दे के पीछे बूजी की भी बड़ी भूमिका थी. वर्ष 1948 में संघ पर प्रतिबंध के समय बैरिस्टर साहब जेल चले गये. इस दौरान एक साध्वी की तरह बूजी भी साधारण भोजन करते हुए भूमि पर ही सोयीं. दीनदयाल जी से बूजी को बहुत प्रेम था. वे उनमें अपने भाई की छवि देखती थीं. उनकी हत्या के बाद बूजी ने श्रद्धांजलि सभा में ही संकल्प लिया कि एक दीनदयाल चला गया, तो क्या हुआ, मैं ऐसी संस्था बनाऊंगी, जिससे सैकड़ों दीनदयाल निकलेंगे.

इस प्रकार कानपुर में दीनदयाल उपाध्याय सनातन धर्म विद्यालय की स्थापना हुई. यों तो इस परिवार द्वारा कानपुर में अनेक विद्यालय चलाये जाते हैं, पर बूजी इस विद्यालय की विशेष देखरेख करती थीं. इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने सब पूर्वजों के नाम से भी शिक्षा संस्थाओं का निर्माण किया. अपनी पारिवारिक संस्थाओं के अतिरिक्त अन्य सामाजिक संस्थाओं को भी वे सहयोग करती थीं.  अनंतनाग के पास नागदंडी आश्रम के स्वामी अशोकानंद उनके आध्यात्मिक गुरु थे. बूजी द्वारा किया गया उनके प्रवचनों का संकलन ‘तत्व चिंतन के कुछ क्षण’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है. इस प्रकार जीवन भर सक्रिय रहते हुए दो मई, 1973 को शिक्षानुरागी सुशीला देवी का देहांत हुआ.

August 24th 2019, 6:58 pm

24 अगस्त / जन्मदिवस – बलिदान को उत्सुक शहीद राजगुरु

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नई दिल्ली. सामान्यतः लोग धन, पद या प्रतिष्ठा प्राप्ति के लिए एक-दूसरे से होड़ करते हैं, पर क्रांतिवीर राजगुरु सदा इस होड़ में रहते थे कि किसी भी खतरनाक काम का मौका भगत सिंह से पहले उन्हें मिलना चाहिए. हरि नारायण जी और पार्वतीबाई के पुत्र शिवराम हरि राजगुरु का जन्म 24 अगस्त, 1908 को पुणे के पास खेड़ा (वर्तमान राजगुरु नगर) में हुआ था. उनके एक पूर्वज पंडित कचेश्वर को छत्रपति शिवाजी के प्रपौत्र साहू जी ने राजगुरु का पद दिया था. तब से इस परिवार में यह नाम लगने लगा.

छह वर्ष की अवस्था में राजगुरु के पिताजी का देहांत हो गया. पढ़ाई की बजाय खेलकूद में अधिक रुचि लेने से उनके भाई नाराज हो गये. इस पर राजगुरु ने घर छोड़ दिया और कई दिन इधर-उधर घूमते हुए काशी आकर संस्कृत पढ़ने लगे. भोजन और आवास के बदले उन्हें अपने अध्यापक के घरेलू काम करने पड़ते थे. एक दिन उस अध्यापक से भी झगड़ा हो गया और पढ़ाई छोड़कर वे एक प्राथमिक शाला में व्यायाम सिखाने लगे. यहां उनका परिचय स्वदेश साप्ताहिक, गोरखपुर के सह सम्पादक मुनीश अवस्थी से हुआ. कुछ ही समय में वे क्रांतिकारी दल के विश्वस्त सदस्य बन गये. जब दल की ओर से दिल्ली में एक व्यक्ति को मारने का निश्चय हुआ, तो इस काम में राजगुरु को भी लगाया गया. राजगुरु इसके लिए इतने उतावले थे कि उन्होंने रात के अंधेरे में किसी और व्यक्ति को ही मार दिया.

राजगुरु मस्त स्वभाव के युवक थे. उन्हें सोने का बहुत शौक था. एक बार उन्हें एक अभियान के लिए कानपुर के छात्रावास में 15 दिन रुकना पड़ा. वे 15 दिन उन्होंने रजाई में सोकर ही गुजारे. राजगुरु को यह मलाल था कि भगत सिंह बहुत सुंदर है, जबकि उनका अपना रंग सांवला है. इसलिए वह हर सुंदर वस्तु से प्यार करते थे. यहां तक कि सांडर्स को मारने के बाद जब सब कमरे पर आये, तो राजगुरु ने सांडर्स की सुंदरता की प्रशंसा की. भगत सिंह से आगे निकलने की होड़ में राजगुरु ने सबसे पहले सांडर्स पर गोली चलाई थी. लाहौर से निकलते समय सूटधारी अफसर बने भगत सिंह  के साथ हाथ में बक्सा और सिर पर होलडाल लेकर नौकर के वेश में राजगुरु ही चले थे. इसके बाद वे महाराष्ट्र आ गये. संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने अपने एक कार्यकर्ता (उमरेड में भैय्या जी दाणी, जो बाद में संघ के सरकार्यवाह रहे) के फार्म हाउस पर उनके रहने की व्यवस्था की. जब दिल्ली की असेम्बली में बम फैंकने का निश्चय हुआ, तो राजगुरु ने चंद्रशेखर आजाद से आग्रह किया कि भगत सिंह के साथ उसे भेजा जाए, पर उन्हें इसकी अनुमति नहीं मिली. इससे वे वापस पुणे आ गये.

राजगुरु स्वभाव से कुछ वाचाल थे. पुणे में उन्होंने कई लोगों से सांडर्स वध की चर्चा कर दी. उनके पास कुछ शस्त्र भी थे. क्रांति समर्थक एक सम्पादक की शवयात्रा में उन्होंने उत्साह में आकर कुछ नारे भी लगा दिये. इससे वे गुप्तचरों की निगाह में आ गये. पुणे में उन्होंने एक अंग्रेज अधिकारी को मारने का प्रयास किया, पर दूरी के कारण सफलता नहीं मिली. इसके अगले ही दिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तथा सांडर्स वध के आरोप में मुकदमा चलाकर मृत्यु दंड घोषित किया गया. 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह और सुखदेव के साथ वे भी फांसी पर चढ़ गये. मरते हुए उन्हें यह संतोष रहा कि बलिदान प्रतिस्पर्धा में वे भगत सिंह से पीछे नहीं रहे.

August 23rd 2019, 5:50 pm
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