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न्यूजीलैंड – हिमाचल के हमीरपुर निवासी डॉ. गौरव शर्मा बने सांसद

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शिमला. हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिला से संबंध रखने वाले डॉ. गौरव शर्मा ने न्यूजीलैंड में सांसद निर्वाचित हुए हैं. डॉ. गौरव की चुनावों में सफलता पर हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने ट्विटर पर लिखा कि – डॉ. गौरव शर्मा ने अपने नाम को सार्थक करते हुए विदेश में हिमाचल प्रदेश का नाम भी गौरवान्वित किया है. हमीरपुर के गलोड़ गांव के रहने वाले डॉ. गौरव ने राज्य और देश के लिए नाम कमाया है और हिमाचल प्रदेश के लोग इस उपलब्धि पर गर्व महसूस कर रहे हैं.

गौरव शर्मा के पिता अपने परिवार के साथ न्यूजीलैंड जाने से पहले हिमाचल प्रदेश बिजली बोर्ड में कार्यकारी इजीनियर थे. तब गौरव नवमीं कक्षा में थे.

लेबर पार्टी की ओर से बताया गया है कि गौरव के पिता को अपने कार्यक्षेत्र में नौकरी पाने में 6 साल लग गए. इस दौरान उन्होंने बहुत संघर्ष किया बेघर होने का अनुभव किया, पार्क की बेंच पर सोए और ऑकलैंड सिटी मिशन और हरे कृष्णा में खाना खाया. गौरव मेडिसिन और सर्जरी में स्नातक किया है और हेमिल्टन में प्रैक्टिस करते हैं. न्यूजीलैंड निर्वाचन आयोग के अनुसार गौरव शर्मा हेमिल्टन वेस्ट सीट से चुनाव जीते हैं. और उन्होंने विरोधी नेशनल पार्टी के नेता टिम मैकिन्डो को हराया. गौरव शर्मा ने अपनी पार्टी के आधिकारिक वेब पेज पर कहा, एक स्थानीय चिकित्सक के रूप में, मैं हर दिन हमारे समुदाय की समस्याओं को सुनता हूं. स्वास्थ्य सेवा और प्रबंधन में अनुभव से मुझे महामारी से रिकवरी के बाद वाले चरण में हेमिल्टन के लिए एक मजबूत आवाज बनने में मदद मिलेगी. डॉ. शर्मा ने न्यूजीलैंड में इससे पहले भी चुनाव लड़ा था, लेकिन जीत नहीं मिल पाई थी. इस बार उन्होंने जीत दर्ज की है. कोरोना वायरस के खिलाफ देश को जंग जिताने वाली न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न ने भारी बहुमत के साथ चुनाव में जीत दर्ज की है. चुनाव पहले 19 सितंबर को होने वाला था, लेकिन कोविड-19 की दूसरी लहर के कारण इसे स्थगित कर दिया गया था. न्यूजीलैंड के इतिहास में इतनी विशाल जीत किसी पार्टी को पहली बार मिली. इसी के साथ जेसिंडा एक बार फिर देश की कमान संभालने के लिए तैयार हैं. जेसिंडा ने जीत के बाद कहा कि देश ने लेबर पार्टी को 50 साल में सबसे ज्यादा समर्थन दिखाया है. उन्होंने कहा कि देश के सामने अभी कठिन वक्त आने वाला है, लेकिन पार्टी हर देशवासी के लिए काम करेगी. मुख्य विपक्षी दल नेशनल पार्टी का वर्ष 2002 के बाद से पार्टी का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है. जबकि 64 सीटों और 49 फीसदी वोटों के साथ जेसिंडा पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएंगी.

साल 2017 में शिमला में एक टीवी इंटरव्यू में गौरव शर्मा ने कहा था कि उन्होंने अपने जन्म स्थान के साथ संबंध नहीं खोया है और जब हिमाचल में होते हैं, पहाड़ी में बोलना पसंद करते हैं. किसी भी अन्य खाने ने मुझे हिमाचली भोजन से अधिक खुशी नहीं दी.

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October 21st 2020, 4:20 am

राष्ट्र–जागरण के अग्रिम मोर्चे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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विजयादशमी – संघ स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में विशेष

नरेंद्र सहगल

वर्तमान राजनीतिक परिवर्तन के फलस्वरूप हमारा भारत ‘नए भारत’ के गौरवशाली स्वरूप की और बढ़ रहा है. गत् 1200 वर्षों की परतंत्रता के कालखण्ड में भारत और भारतीयता की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने वाले करोड़ों भारतीयों का जीवनोद्देश्य साकार रूप ले रहा है. भारत आज पुन: भारतवर्ष (अखंड भारत) बनने के मार्ग पर तेज गति से कदम बढ़ा रहा है. भारत की सर्वांग स्वतंत्रता, सर्वांग सुरक्षा और सर्वांग विकास के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास हो रहे हैं. वास्तव में यही कार्य संघ सन् 1925 से बिना रुके और बिना झुके कर रहा है. विजयादशमी संघ का स्थापना दिवस है.

अपने स्थापना काल से लेकर आज तक 94 वर्षों के निरंतर और अथक प्रयत्नों के फलस्वरूप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्र जागरण का एक मौन, परन्तु सशक्त आन्दोलन बन चुका है. प्रखर राष्ट्रवाद की भावना से ओतप्रोत डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार द्वारा 1925 में विजयादशमी के दिन स्थापित संघ के स्वयंसेवक आज भारत के कोने-कोने में देश-प्रेम, समाज-सेवा, हिन्दू-जागरण और राष्ट्रीय चेतना की अलख जगा रहे हैं. कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैले विशाल हिन्दू समाज, प्रत्येक पंथ, जाति और वर्ग के अनुयायियों को एक विजयशालिनी शक्ति के रूप में खड़ा करने में संघ ने सफलता प्राप्त की है.

इस शक्तिशाली हिन्दू संगठन की नींव रखने से पहले इसके संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने भारत के प्राचीन गौरवशाली इतिहास, संस्कृति, महान ग्रंथों, देश के परमवैभव व पतन के कारणों और तत्कालीन दयनीय स्थिति का गहरा अध्ययन किया था. इसी अध्ययन, मनन और अनुभव का संगम है – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ. संघ कार्य में व्यक्ति पूजा अथवा ‘गुरुढम’ का कोई स्थान नहीं है. संघ ने भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के प्रतीक भगवा ध्वज को अपना गुरु और प्रेरणास्रोत स्वीकार किया है. समाज के जागरण के माध्यम से अपने राष्ट्र को परमवैभवशाली बनाना संघ का उद्देश्य है.

भारतीय पराक्रम ने ली अंगड़ाई

संघ की स्थापना से पहले भी राष्ट्र – जागरण के अनेकों प्रयास हुए हैं. आचार्य चाणक्य के अथक प्रयासों के फलस्वरूप विदेशी एवं विधर्मी शक्तियां परास्त हुईं और सम्राट चन्द्रगुप्त के काल में अखण्ड भारत अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुआ. दक्षिण में स्वामी विद्यारण्य द्वारा किये गए राष्ट्र जागरण के महान कार्य के परिणाम स्वरुप विजयनगर का एक वैभवशाली हिन्दू साम्राज्य अस्तित्व में आया था. राजस्थान के महाराणा सांगा और महाराणा प्रताप ने मुगलों के नापाक इरादों को कभी पूरा नहीं होने दिया और राष्ट्रीय स्वाभिमान की लौ जलाए रखी.

इसी तरह समर्थ गुरु रामदास जैसे संतों के प्रयत्नों से छत्रपति शिवाजी का उदय हुआ और हिन्दवी स्वराज जैसे राष्ट्रीय जागरण के संघर्ष की शुरुआत हो सकी. श्री गुरु गोबिंद सिंह द्वारा खालसा पंथ की स्थापना और योद्धा सिक्खों द्वारा बलिदानों की अटूट श्रृंखला खड़ी कर विदेशी हमलावरों के हाथों हिन्दू धर्म और राष्ट्र की अस्मिता को बचाने के अनेक श्रेष्ठ कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न हुए. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राष्ट्र जागरण के इसी संघर्ष और गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाया है.

उपरोक्त संदर्भ में एक अतिमहत्वपूर्ण बिंदु पर विचार करना चाहिए . पूर्व में राष्ट्र जागरण के सभी प्रयासों में एक सूत्रबद्धता का अभाव सदैव बना रहा. परतंत्रता के कारणों की गहराई में जाए बिना परतन्त्रता को मिटाने के प्रयास होते रहे. विदेशी आक्रांता क्यों सफल हुए? राष्ट्र क्यों खंडित होता चला गया? देश क्यों बांटा गया? बुद्धि, बल, ज्ञान-विज्ञान सब कुछ होते हुए भी जगतगुरु भारत परतंत्रता की जंजीरों में क्यों जकड़ा गया? संघ ने इन सभी प्रश्नों के उत्तर समस्त भारतीयों के समक्ष रखे हैं.

भारत की पहचान है हिंदुत्व

संघ ने ऐतिहासिक सच्चाई को संसार के सामने दृढ़तापूर्वक रखा है कि भारत सनातन काल से चला आ रहा विश्व का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र है. हिन्दुत्व भारत की राष्ट्रीयता है. भारत का वैभव और पतन हिन्दुओं के वैभव और पतन के साथ जुड़ा हुआ है.

जब हिन्दू समाज संगठित और शक्तिशाली था तो शक और हूण जैसे हमलावरों को भी परास्त करके उन्हें भारतीय जीवन प्रणाली में समरस कर लिया गया. परंतु जब हिन्दुओं में आपसी फूट घर कर गई, संगठन व प्रतिकार की भावना लुप्त हुई और संस्कृतिक राष्ट्रीयता की लौ क्षीण हुई तो भारत तुर्कों, अफगानों, पठानों और मुगलों जैसी बर्बर जातियों के हाथों पराजित होता चला गया.

इसी एकमेव कारण से अंग्रेज भी भारत को अपने ईसाई शिकंजे में जकड़ने में सफल हो गये. हालांकि परतंत्रता के इस लंबे कालखंड में हमारे हिन्दू समाज ने कभी भी परतंत्रता को स्वीकार नहीं किया. किसी ना किसी रूप में हिन्दू समाज संघर्षरत रहा. परंतु राष्ट्रीय स्तर पर संगठित प्रतिकार का अभाव बना रहा. अंग्रेजों के कालखंड में यद्यपि महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में भारतीय समाज ने राष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रयास किए, परंतु सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के वास्तविक स्वरूप हिन्दुत्व का आधार ना होने से इस स्वतंत्रता संग्राम की परिणीति भारत के विभाजन के रूप में हुई.

अतः यह स्वीकार करने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हिन्दुत्व को अपने राष्ट्र जागरण के कार्य का आधार बनाकर समस्त भारतीय समाज को राष्ट्रीय दिशा प्रदान की है. वर्तमान में ‘नए भारत’ की ओर बढ़ रहे कदमों का धरातल भी यही है.

राष्ट्र पहले, संगठन बाद में

उल्लेखनीय है कि राष्ट्र के जागरण में वही संस्था अथवा नेतृत्व सफल हो सकता है, जिसके पास कार्यकर्ताओं के निर्माण की स्थाई व्यवस्था हो. संघ के पूर्व के काल में राष्ट्र जागरण के प्राय: सभी प्रयासों में निरंतर चलने वाली कार्यपद्धति का अभाव बना रहा. संघ की कार्यपद्धति (नित्य शाखा) में यह विशेषता है कि इसमें शिशु, बाल, तरुण और वृद्ध स्वयंसेवक बनते रहते हैं. यही वजह है कि संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार के देह छोड़ने के बाद भी संगठन निरंतर आगे बढ़ता चला गया. संघ की कार्यप्रणाली व्यक्ति, परिवार, आश्रम एवं जाति केंद्रित ना होकर राष्ट्र केंद्रित है.

संघ का कार्य क्योंकि राष्ट्र जागरण से सीधा जुड़ा हुआ है, इसीलिए संघ ने स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया और अपने व अपने संगठन के नाम को आगे ना रखते हुए स्वयंसेवकों ने प्रत्येक सत्याग्रह आंदोलन और संघर्ष में भाग लिया.

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी संघ ने अपने विस्तृत एवं विशाल संगठन की आदर्श परंपराओं का पालन करते हुए गोवा स्वतंत्रता आंदोलन, गौ रक्षा आंदोलन एवं श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन को बल प्रदान किया. यह सभी कार्य राष्ट्र जागरण के कारण ही सफल हो सके. विदेशी आक्रमणों के समय समाज का मनोबल बनाए रखने, सैनिकों को प्रत्येक प्रकार की सहायता देने और सरकार की पीठ थपथपाने में भी स्वयंसेवकों ने अग्रणी भूमिका निभाई है.

संघ का चतुष्कोणीय स्वरूप

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा किए जा रहे राष्ट्र जागरण के राष्ट्रव्यापी स्वरूप को समझने के लिए इसके चतुष्कोणीय स्वरूप को गहराई से समझना भी आवश्यक है. संघ कार्य का प्रथम स्वरूप है, प्रत्यक्ष शाखा का कार्य. शाखा एक ऐसा शक्तिपुंज है, जहां से राष्ट्रप्रेम की विद्युत तरंगें उठकर समाज के प्रत्येक क्षेत्र को जगमगाती हैं. संघ शाखाओं व संघ के विभिन्न कार्यक्रमों में गाए जाने वाले एकात्मता स्त्रोत, एकता मंत्र और गीतों में भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सौहार्द और राष्ट्र की आध्यात्मिक परंपराओं के दर्शन होते हैं. राष्ट्रीय महापुरुषों का स्मरण करते हुए संघ के स्वयंसेवक भारत माता की वंदना करते हैं.

शाखा में शारीरिक कार्यक्रमों की रचना इस तरह की जाती है, जिससे शारीरिक बल के साथ अपने समाज और देश के लिए जूझने की मानसिकता तैयार होती है. संघ द्वारा विकसित इस शाखा पद्धति ने राष्ट्र जागरण के कार्य के साथ न केवल विशाल हिन्दू समाज को संगठित किया है, अपितु अपने ऊपर होने वाले विधर्मी आघातों का सामना करने के लिए उसे शक्ति संपन्न भी बनाया है.

संघ कार्य का दूसरा स्वरूप है, संघ द्वारा संचालित अथवा मार्गदर्शित क्षेत्र –किसान, मजदूर, वनवासी, गिरीवासी, विद्यार्थी, शिक्षा, चिकित्सा, कला इत्यादि क्षेत्रों में संघ के स्वयंसेवकों ने छोटे-बड़े अनेक संगठन तैयार किए हैं. यह सभी संगठन अपने अपने क्षेत्र की परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार राष्ट्र जागरण का कार्य कर रहे हैं.

संघ कार्य का तीसरा स्वरूप है, स्वयंसेवकों द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर किए जा रहे राष्ट्र जागरण के कार्य, इस श्रेणी में विद्यालय, समाचार पत्र, औषधालय, मंदिरों की व्यवस्था और विविध प्रकार के सांस्कृतिक व सेवा के प्रकल्प आते हैं. स्वयंसेवकों द्वारा किये जा रहे इन सभी कार्यों के पीछे राष्ट्रीय एकता, सेवा एवं हिंन्दुत्व की प्रेरणा रहती है.

संघ कार्य अर्थात् राष्ट्र-जागरण का चौथा स्वरूप बहुत ही विशाल एवं महत्वपूर्ण है. इसमें वे सभी अभियान, आंदोलन, सम्मेलन, आध्यात्मिक संस्थान, धार्मिक संगठन आते हैं जो संघ के ही कार्य हिन्दू संगठन और संघ के ही उद्देश्य, ‘परम वैभवशाली- राष्ट्र’ के लिए सक्रिय हैं. संघ का इन सभी संगठनों को पूरा सहयोग रहता है. संघ के स्वयंसेवक अपने और संगठन के नाम से ऊपर उठकर एक देशभक्त नागरिक के नाते इन संगठनों में ना केवल सक्रिय भूमिका ही निभाते हैं, अपितु संगठन तंत्र के सूत्रों को भी सम्मिलित और संचालित करते हैं.

तपस्या का परिणाम

संघ के स्वयंसेवकों ने अपनी 94 वर्षों की सतत तपस्या के बल पर भारत में सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद अर्थात् हिन्दुत्व के जागरण का एक ऐसा सशक्त आधार तैयार कर दिया है, जिसमें से राष्ट्र-जागरण के अनेक अंकुर प्रस्फुटित होते जा रहे हैं. संघ ने सम्पूर्ण भारतीय समाज को एक नई दिशा प्रदान की है, जिसने राष्ट्र जीवन की उस दशा को बदल डाला है, जिसके कारण भारत निरंतर 1200 वर्षों तक विदेशियों के हाथों पराजित होता रहा. सर्वांग अजय शक्ति को प्राप्त कर रहा भारत वास्तव में अजय भारत बन रहा है. स्वदेश अब सुदेश बन रहा है.

संघ ने राष्ट्र-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त दुविधा और हीन भावना की स्थिति को बदल कर एक शक्तिशाली समाज के गठन का मौन आंदोलन छेड़ा हुआ है. राष्ट्रीय शक्तियों को बल मिल रहा है, जबकि अराष्ट्रीय तत्व अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं.

आज भारतवासियों का विश्वास बना है कि अपने राष्ट्र की सर्वांग स्वतंत्रता, सर्वांग सुरक्षा और सर्वांग विकास के कार्य में जुटे हुए संघ के स्वयंसेवक बहुत शीघ्र अपने लक्ष्य को प्राप्त करेंगे और भारत माता फिर से विश्व गुरु के सिंहासन पर शोभायमान होगी.

(लेखक स्तंभकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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October 21st 2020, 4:20 am

कोरोना वायरस के इलाज में आयुर्वेदिक दवाइयों के क्लिनिकल ट्रायल के सकारात्मक परिणाम

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नई दिल्ली. भारत में कोविड-19 को हराने के लिए ICIR और ICMR के तकनीकी सहयोग से व्यापक स्तर पर परीक्षण किया जा रहा है. प्रसन्नता की बात है कि आयुर्वेदिक पद्धति से किए जा रहे क्लीनिकल ट्रायल के परिणाम सकारात्मक पाए गए हैं. मीडिया से बातचीत में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने आयुर्वेदिक दवाइयों के क्लिनिकल ट्रायल को ऐतिहासिक कदम बताया है.

कोविड-19 वायरस को खत्म करने के लिए कई देशों की रिसर्च लैब में लगातार परीक्षण चल रहे हैं. लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिली है. भारत में कोविड-19 वायरस को लेकर चल रहे आयुर्वेदिक परीक्षण के परिणाम काफी सकारात्मक हैं. स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने बताया कि भारत की तीनों स्वास्थ्य संस्थाएं ICMR के तकनीकी सहयोग से आयुर्वेद की अश्‍वगंधा, यष्टिमधु, गुडूची पिप्पली, आयुष-64 दवाइयों का क्लिनिकल ट्रायल कर रही हैं. इसके द्वारा यह समझने का प्रयास किया जाएगा कि इन दवाओं की क्या भूमिका हो सकती है.

प्रमुख रूप से कोविड-19 टीके के विकास पर परीक्षण हो रहा है, इसमें के दूसरे चरण के क्लीनिकल परीक्षण को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है. इसके अलावा पहली जड़ी-बूटी आधारित (फाइटोफार्मास्युटिकल) दवा एसीक्यूएच का दूसरे चरण का क्लीनिकल ट्रायल चल रहा है.

आयुष मंत्रालय के अनुसार अश्वगंधा बैक्टीरिया के संक्रमण में घाव भरने, प्रतिरक्षा प्रणाली बढ़ाने, मधुमेह, मोतियाबिंद के इलाज में काम आने के साथ शक्तिवर्धक दवा है. इसी तरह यष्टिमधु (मुलेठी) बदहजमी, पेट में सूजन, सीने में जलन, पाचन संबंधी रोगों में फायदेमंद होती है. गुडूची पिप्पली का उपयोग बुखार, गैस, कब्ज, कफ, डायबिटीज, कैंसर, आंखों संबंधी है.

सरकार द्वारा कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए जो पारंपरिक उपचार अपनाया जा रहा है, उसके मुकाबले आयुर्वेद का प्राकृतिक उपचार 30 से 60 प्रतिशत सुधार कोरोना मरीजों में देखने को मिले हैं.

भारत के जिन अस्पतालों में आयुर्वेदिक परीक्षण किये गये हैं, उनमें लोकमान्य अस्पताल पुणे (महाराष्ट्र), पारुल सेवाश्रम अस्पताल बड़ोदरा (गुजरात), गवर्नमेंट मेडिकल अस्पताल श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश) शामिल हैं.

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October 19th 2020, 2:44 pm

किसान रेल – किसानों को किराये में मिलेगी 50 प्रतिशत छूट, केंद्र सरकार ने जारी किये आदेश

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नई दिल्ली. सरकार किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से विभिन्न कदम उठा रही है. सरकार ने आगामी कुछ वर्षों में किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है. किसान रेल, किसान सम्मान निधि योजनाएं इसी उद्देश्य से प्रारंभ की गई हैं. अब सरकार ने अधिसूचित फलों एवं सब्जियों की ढुलाई पर किसानों को 50 फीसदी सब्सिडी देने का आदेश जारी किया है. यह सब्सिडी आपरेशन ग्रीन-टॉप टू टोटल योजना के तहत दी जाएगी. यानि किसान अब कम लागत पर अपने उत्पाद मार्केट तक भेज सकेंगे. जिससे उनकी आय में वृद्धि होगी.

आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने घोषणा की थी कि 500 करोड़ रुपये के अतिरिक्त कोष के साथ ऑपरेशन ग्रीन योजना का विस्तार किया जाएगा. सरकार ने टमाटर, प्याज और आलू (टॉप) से लेकर सभी फल एवं सब्जियों (टोटल) को इसके दायरे में लाने की घोषणा की थी.

इसी के तहत रेलवे मंत्रालय ने कहा कि किसान रेल में फल-सब्जियों की ढुलाई भाड़े में 50 फीसदी छूट मिलेगी. मंत्रालय ने बताया कि केंद्र सरकार ने किसान रेल के माध्यम से अधिसूचित फल और सब्जियों के परिवहन भाड़े पर 50 फीसदी सब्सिडी देने का आदेश जारी किया है. यह आदेश तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है.

यह छूट मंत्रालय की ‘ऑपरेशन ग्रीन – टॉप टू टोटल’ योजना के तहत दी जाएगी. योजना में अधिसूचित सभी फल एवं सब्जियों पर लागू होगी. रेलवे ने सभी जोन के मुख्य वाणिज्यिक प्रबंधकों को लिखा है कि वे तत्काल प्रभाव से सभी अधिसूचित फलों एवं सब्जियों की ढुलाई पर किराये में 50 प्रतिशत की छूट दें.

अधिसूचित फल एवं सब्जियों की किसान रेल से ढुलाई पर किराये की 50 प्रतिशत राशि का भार खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय वहन करेगा. इसके लिए आरंभ में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय रेलवे को 10 हजार करोड़ रुपये की राशि देगा. एक बार पूरी राशि उपयोग कर लेने के बाद और राशि जारी की जाएगी.

ट्रेनों से अब तक टमाटर, प्याज व आलू की ढुलाई को प्राथमिकता दी जाती थी, लेकिन अब इस नीति को बदल दिया गया है. 20 फलों और 10 से अधिक सब्जियों की सूची बनाई गई है, जिनके पार्सल ट्रेनों में बुक किए जाएंगे. एक पार्सल ट्रेन में 10 से 25 तक डिब्बे जोड़कर चलाया जाएगा.

रेलवे बोर्ड में मालवहन विपणन निदेशक मुदित चंद्रा ने कहा कि सभी रेलवे स्टेशन पर मुख्य पार्सल निरीक्षक की जिम्मेदारी होगी कि सिर्फ अधिसूचित फल एवं सब्जियों के मालभाड़े में ही छूट दी जाए.

उद्घाटन के दिन 7 अगस्त 2020 को किसान (Farmer) रेल पर लोडिंग 90.92 टन की हुई थी, जो 14 अगस्त को 99.91 टन और 21 को 235.44 टन हो गई. इसके बाद इसे सप्ताह में दो बार किया गया. 01 सितंबर को 354.29 टन लोडिंग हुई. किसान रेल की भारी मांग को ध्‍यान में रखते हुए भारतीय रेलवे ने देवलाली-मुजफ्फरपुर किसान रेल और सांगोला-मनमाड-दौंड किसान रेल के फेरे को बढ़ाकर सप्ताह में तीन दिन कर दिया है.

यह आत्मनिर्भर भारत अभियान में उन क्षेत्रों में शामिल है, जिस पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. सरकार कृषि क्षेत्र के तेजी से विकास और किसानों की आय दोगुनी करने के इरादे से खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देने पर ध्यान दे रही है.

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October 19th 2020, 2:33 pm

विश्लेषण – अपनी जड़ों की ओर लौट रहा भारत

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भारत और भारतीयता को प्राथमिकता मिल रही

पश्चिमी आधुनिकता और भारतीयता के द्वंद ने लंबे समय तक भारतीय ज्ञान पद्धति को प्रभावित किया

अनंत विजय

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने एक भाषण में कहा कि ‘किसान क्षेत्र के हित के लिए काम करने वाला हमारा संगठन (भारतीय किसान संघ) सर्वमान्य संगठन बन गया है, और ऐसे हमारे संगठन को अनुकूलता भी प्राप्त हो गई है. क्योंकि जो हमारा विचार है, विज्ञान ने ही ऐसी करवट ले ली है कि जिन तत्वों का उद्घोष अपनी स्थापना के समय से हम करते आए, विरोधों के बावजूद, उनको मान्यता देने के बजाय दूसरा कोई पर्याय रहा नहीं अब दुनिया के पास. कृषि के क्षेत्र में और जो कॉलेज में से पढ़ा है, ऐसा कोई व्यक्ति आपकी सराहना करे ऐसे दिन नहीं थे.

आज हमारे महापात्र साहब भी आपके कार्यक्रम में आकर जैविक खेती का गुणगान करते हैं. जैविक खाद के बारे में पचास साल पहले विदर्भ के नैड़प काका बड़ी अच्छी स्कीम लेकर केंद्र सरकार के पास गए थे. ये स्कीम अपने भारत की है, भारत के दिमाग से उपजी है, केवल मात्र इसके लिए उसको कचड़े में डाला गया. आज ऐसा नहीं है. पिछले छह महीने से जो मार पड़ रही है कोरोना की, उसके कारण भी सारी दुनिया विचार करने लगी है और पर्यावरण का मित्र बनकर मनुष्य और सृष्टि का एक साथ विकास साधने वाले भारतीय विचार के मूल तत्वों की ओर लौट रही है, आशा से देख रही है.‘

मोहन भागवत के भाषण के इस छोटे से अंश में कई महत्वपूर्ण बातें हैं, जिनकी ओर उन्होंने संकेत किया है. पहली बात तो ये कि आज भारत और भारतीयता को प्राथमिकता मिल रही है. भारतीय पद्धति से की गई खोज या नवोन्मेष को या भारतीय पद्धतियों को मान्यता मिलने लगी है. उन्होंने ठीक ही इस बात को रेखांकित किया कि पूरी दुनिया भारत की ओर आशा से देख रही है.

मोहन भागवत के इस वक्तव्य के उस अंश पर विचार करने की जरूरत है, जिसमें वो कह रहे हैं कि पूरी दुनिया पर्यावरण का मित्र बनकर मनुष्य और सृष्टि का एक साथ विकास साधने वाले भारतीय विचार के मूल तत्वों की ओर लौट रही है. दरअसल हमारे देश में हुआ ये कि मार्कसवाद के रोमांटिसिज्म में पर्यावरण की लंबे समय तक अनदेखी की गई.

आजादी के बाद जब नेहरू से मोहभंग शुरू हुआ या यों भी कह सकते हैं कि नेहरू युग के दौरान ही मार्क्सवाद औद्योगीकरण की अंधी दौड़ में शामिल होने के लिए उकसाने वाला विचार लेकर आया. औद्योगिककरण में तो विकास पर ही जोर दिया जाता है और कहा भी जाता है कि किसी भी कीमत पर विकास चाहिए. अगर विकास नहीं होगा तो औद्योगिकीकण संभव नहीं हो पाएगा. लेकिन किसी भी कीमत पर विकास की चाहत ने प्रकृति को पूरी तरह से खतरे में डाल दिया.

औद्योगिकीकरण का समर्थन करने वाली विचारधारा में प्रकृति का आदर करने की जगह उसकी उपेक्षा का भाव है. ये उपेक्षा इस हद तक है कि मार्क्स ने ‘मास्टरी ओवर नेचर’ की बात की है यानि प्रकृत्ति पर प्रभुत्व. सृष्टि के इस महत्वपूर्ण अंग, प्रकृति पर प्रभुत्व की कल्पना मात्र से ही इस बात का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि मार्क्सवाद के सिद्धांत में बुनियादी दोष है. क्या ये मनुष्य के लिए संभव है कि वो प्रकृति पर प्रभुत्व कायम कर सके. लेकिन मार्क्स ऐसा चाहते थे. उनके प्रकृति को लेकर इस प्रभुत्ववादी नजरिए को उनके अनुयायियों ने जमकर बढ़ाया. इस बात का उल्लेख यहां आवश्यक है कि स्टालिन ने सोवियत रूस की सत्ता संभालने के बाद संरक्षित वन क्षेत्र को नष्ट किया.

औद्योगिक विकास के नाम पर पर्यावरण पर प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश की. नतीजा क्या हुआ ये सबके सामने है. बाद में इस गलती को सुधारने की कोशिश हुई, लेकिन तब तक बहुत नुकसान हो चुका था. खैर ये अवांतर प्रसंग है इस पर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी. अभी तो इसका उल्लेख सिर्फ ये बताने के लिए किया गया कि साम्यवादी और समाजवादी विचारधारा की बुनियाद प्रकृति को लेकर बेहद उदासीन और प्रभुत्ववादी रही है.

इसके विपरीत अगर हम विचार करें तो भारतीय विचार परंपरा में प्रकृति को भगवान का दर्जा दिया गया है. हम तो ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा’ को मानने वाले लोग हैं. इस पंचतत्व का निषेध या उससे आगे जाकर कुछ और नया खोज वैज्ञानिक अभी तक कर नहीं पाए हैं सिवा इसके कि वो इन पंच तत्वों के अंदर के अवयवों को ढूंढ निकालने का दावा कर रहे हैं. हमारी परंपरा में तो नदी पर्वत और जल को पूजे जाने की परंपरा रही है. कभी भी आप देख लें किसी भी शुभ अवसर पर प्रकृति को भी याद किया जाता है.

मोहन भागवत ने इस ओर भी इशारा किया है कि कोरोना के बाद स्थितियां बहुत बदल गई हैं. सचमुच बहुत बदली हैं और भारतीय ज्ञान परंपरा में जिन औषधियों की चर्चा मिलती है, आज वो अचानक बेहद महत्वपूर्ण हो गई हैं. हमारे जो वामपंथी प्रगतिशील मित्र आयुर्वेद का मजाक उड़ाया करते थे, उनको सुबह शाम काढ़ा पीते या फिर गिलोय चबाते देखा जा सकता है. आज पूरी दुनिया में भारतीय खान-पान की आदतों को लेकर विमर्श हो रहा है. हमारे यहां तो हर मौसम के हिसाब से भोजन तय है. मौसम तो छोड़िए सूर्यास्त और सूर्योदय के बाद या पहले क्या खाना और क्या नहीं खाना ये भी बताया गया है.

आज पश्चिमी जीवन शैली के भोजन या भोजन पद्धति से इम्यूनिटी बढ़ने की बात समझ में नहीं आ रही है. आज भारतीय पद्धति से भोजन यानि ताजा खाने की वकालत की जा रही है, फ्रिज में रखे तीन दिन पुराने खाने को हानिकारक बताया जा रहा है. कोरोना काल में पूरी दुनिया भारतीय योग विद्या को आशा भरी नजरों से देख रही है. आज जब कोरोना का कोई ज्ञात ट्रीटमेंट नहीं है तो ऐसे में श्वसन प्रणाली को ठीक रखने, जीवन शैली को संतुलित रखने की बात हो रही है. भारत में तो इन चीजों की एक सुदीर्घ परंपरा रही है.

इस परंपरा को अंग्रेजी के आभिजात्य मानसिकता और वामपंथ के विदेशी ज्ञान ने पिछले कई दशकों से नेपथ्य में धकेलने की कोशिश की. सफल भी हुए. मोहन भागवत जी ने विदर्भ के एक किसान का जो उदाहरण दिया वो बेहद सटीक है. किसी भी प्रस्ताव को इस वजह से रद्दी की टोकरी में फेंका जाता रहा कि वो भारतीय परंपरा और प्राचीन ग्रंथों पर आधारित होता था. अब देश एक बार फिर से अपनी जड़ों और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरास की ओर लौटता नजर आ रहा है.

अगर इस बात पर गंभीरता से विचार किया जाए तो हम पाते हैं कि हमारे देश में कथित तौर पर प्रगतिशील विचारों के शक्तिशाली होने की वजह से आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी विचारों का अंधानुकरण शुरू हो गया. भारतीय विचारों को, भारतीय चिकित्सा पद्धति को, भारतीय दर्शन को, भारतीय पौराणिक लेखन को सायास पीछे किया गया. उसको दकियानूसी, पुरातनपंथी या परंपरावादी आदि कहकर उपहास किया गया.

पश्चिमी आधुनिकता के आख्यान का गुणगान या उसके बढ़ते प्रभाव ने भारतीय जीवन शैली और भारतीय पद्धति को प्रभावित करना शुरू कर दिया. नतीजा यह हुआ कि हमारे देश में एक ऐसा समाज बनने लगा था जो पूरी तरह से न तो भारतीयता में यकीन करता था और न ही पूरी तरह से पश्चिमी रीति-रिवाज को आत्मसात कर पा रहा था. पश्चिमी आधुनिकता और भारतीयता के इस द्वंद ने लंबे समय तक भारतीय ज्ञान पद्धति को प्रभावित किया. कोरोना की वजह से और देश में बदले राजनीतिक हालात ने एक अवसर प्रदान किया है, जिसकी वजह से एक बार फिर से देश अपनी जड़ों की ओर लौटता दिख रहा है.

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October 19th 2020, 2:33 pm

पहली महिला जिलाधिकारी ने महाप्रभु श्री जगन्नाथ को दान की सारी संपत्ति

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भुवनेश्वर (विसंकें). राज्य की पहली महिला जिलाधिकारी चंद्रमणि नारायण स्वामी का निधन उनके भुवनेश्वर स्थित आवास पर हुआ. वे 81 वर्ष की थीं. उन्होंने अपनी वसीयत मे महाप्रभु श्री जगन्नाथ को अपनी सारी संपत्ति दान कर दी.

वर्ष 1964 में, उन्होंने पहले पुरी के उप जिला-आयुक्त और बाद में गंजम के उप जिला-आयुक्त के रूप में कार्यभार संभाला. कालाहांडी के जिला-आयुक्त रहने के दौरान उनकी कार्यप्रणाली की प्रशंसा की गई थी. ओडिशा सरकार में विभिन्न पदों पर रहने के दौरान उन्होंने निःस्वार्थ भाव से अपना काम किया. उन्होंने सामान्य प्रशासन विभाग में 7 साल और स्वास्थ्य विभाग में 7 साल काम किया. उन्होंने कृषि विभाग के सचिव और सरकार के विभिन्न विभागों जैसे राजस्व और पंचायती राज आदि में भी काम किया. स्वेच्छा से सेवानिवृत्त लेने के बाद, उन्होंने ओडिशा को ही अपने घर के रूप में स्थायी रूप से रहने के लिए चुना. एक कवि, लघु कथाकार और उपन्यासकार के रूप में उनकी प्रतिष्ठा रही. वह ओडिया भाषा में भी पारंगत थीं.

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October 19th 2020, 2:33 pm

मेडागास्कर में पहला हिन्दू मंदिर निर्माणाधीन

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नई दिल्ली. नवरात्र के मौके पर हिंद महासागर में स्थित सबसे बड़े द्वीप देश मेडागास्कर की राजधानी अंटानानारिवो में एक विशाल हिन्दू मंदिर हॉल का उद्घाटन किया गया है. देश की आबादी 26 लाख है. मेडागास्कर में बसे 20 हजार से ज्यादा भारतवंशियों में अधिकांश गुजरात के हैं.

यहां एक विशाल हिन्दू मंदिर का निर्माण चल रहा है, जिसके तीन से चार महीने में पूरा हो जाने की उम्मीद है. निर्माण पूरा हो जाने के बाद अंटानानारिवो में यह पहला हिन्दू मंदिर होगा. 18वीं सदी में भारतीय मेडागास्कर आए थे. एक छोटी नौका में यहां आए भारतीयों में से अधिकांश गुजरात के थे.

हिन्द महासागर में व्यापार में शामिल लोगों ने तब से मेडागास्कर में वाणिज्य एवं व्यापार के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया है. इसके साथ ही भारतवंशियों ने भारत और मेडागास्कर के बीच व्यापार बढ़ाने का काम किया है. मेडागास्कर में प्रवासी गुजराती पूरे देश में फैले हुए हैं. जिस नए मंदिर के हॉल का उद्घाटन शनिवार को किया गया है, वह आपसी मुलाकात में मददगार होने के साथ ही सामुदायिक भावना को मजबूती भी देगा.

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October 19th 2020, 2:33 pm

ट्विटर इंडिया के खिलाफ लोगों ने जताया रोष, सरकार से कार्रवाई की मांग की

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नई दिल्ली. ट्विटर इंडिया ने टाइमलाइंस पर जम्मू एवं कश्मीर को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का हिस्सा बताए जाने के बाद विवाद खड़ा हो गया. मामला ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की फेलो कंचन गुप्ता ने उठाया. उन्होंने देखा कि ट्वीट्स में जम्मू-कश्मीर को चीन का हिस्सा बताया जा रहा है.

जिसके पश्चात उन्होंने दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद को टैग करते हुए लिखा – “तो ट्विटर ने जम्मू एवं कश्मीर के भूगोल को बदलने का निर्णय लिया है और जम्मू एवं कश्मीर को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के हिस्से के रूप में दिखाने का निर्णय किया है. क्या यह भारत के कानून का उल्लंघन नहीं है? भारत में तो लोगों को छोटी-छोटी बातों पर सताया जाता है. क्या अमेरिका की बिग टेक कंपनी कानून से ऊपर है?”

सोशल मीडिया पर मामला आने के पश्चात लोगों ने केंद्रीय मंत्री सहित सरकार से ट्विटर इंडिया के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की. एक यूजर ने कहा, “ट्विटर इंडिया.. तो आपके अनुसार, लेह पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का हिस्सा है.” वहीं एक अन्य ने प्रसाद से मामले में कार्रवाई का आग्रह करते हुए कहा, “कृपया इस मामले को देखें और उचित कार्रवाई करें. यह उचित समय है कि इस बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को इसकी मूर्खता के लिए सबक सिखाया जाए.”

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October 19th 2020, 2:33 pm

स्वदेशी दीपावली – दीपावली में टेराकोटा और गोबर के दीये और मूर्तियों की रहेगी धूम

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लखनऊ. इस बार दीपावली पर चीन को जोर का झटका लगेगा. दीपावली स्वदेशी वस्तुओं के साथ मनाने को लेकर सरकार सहित समाज भी तैयारियों में जुटा है तथा अपने तरीके से योगदान दे रहा है. चीनी झालर के स्थान पर स्वदेशी लड़ियां तैयार की जा रही हैं, घरों को रोशन करने के लिए गाय के गोबर व गोमूत्र से दीये तैयार किये जा रहे हैं.

इसी क्रम में उत्तर प्रदेश सरकार के सहयोग से गोरखपुर के 200 मृदाशिल्पकार प्रतिदिन 14 हजार दीये और लक्ष्मी-गणोश की 1000 मूर्तियां बना रहे हैं. अब तक लक्ष्मी-गणोश की ढाई लाख प्रतिमाएं और 85 लाख दीये बना चुके हैं. लक्ष्य 10 लाख प्रतिमाएं और दो करोड़ दीये बनाने का है. कामधेनु आयोग के प्रोत्साहन पर अनेक जगह गोबर से दीये बनाए जा रहे हैं.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जून में घोषणा की थी कि इस बार चीन से दीये और मूर्तियां नहीं मंगाई जाएंगी, वरन स्वदेशी उत्पादों की आपूर्ति का प्रयास होगा. वह भी पिछले साल की अपेक्षा कम कीमत पर. इसके बाद प्रदेश के मृदाशिल्पकार को मूर्त रूप देने में जुट गए.

डिजाइनर दीये और मूर्तियां बनाने के लिए डाई, कलर स्प्रे मशीन, मिट्टी और इलेक्ट्रिक चाक प्रदान किए गए. गोरखपुर की बात करें तो एक जिला-एक उत्पाद योजना में शामिल टेराकोटा वर्क शहर से सटे गुलरिहा, औरंगाबाद, भरवलिया और एकला में होता है. जीआइ टैग मिलने के साथ कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान भी मिली है.

दीये वाले कलश की मांग पहले से है ही, इस बार सरकारी सहायता और प्रशिक्षण से खुश शिल्पकारों ने 21 दीये वाला हाथी बनाया है. ये स्पेशल दीये सरकार से मिली आधुनिक मशीन और कलर स्प्रे मशीन की सहायता से तैयार किए गए हैं. लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं बनाने के लिए कुम्हारों को प्लास्टर ऑफ पेरिस मिश्रित सीमेंट की डाई दी गई है. आठ और 12 इंच की ऊंचाई वाली इस डाई से मूर्तियों के कट और डिजाइन स्पष्ट बन रहे हैं. पूर्व में कुम्हार रबर के सांचे से मूर्ति बनाते थे, जिससे कट स्पष्ट नहीं होते थे. जिला खादी एवं ग्रामोद्योग के एक अधिकारी ने बताया कि इस बार बाजार में सामान्य दीये एक से दो रुपये, टेराकोटा दीये दो रुपये और डिजानइर दीये पांच रुपये में मिलेंगे. पहले इनकी कीमत पांच से बीस रुपये तक थी. लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा 50 से 250 रुपये तक में मिलेगी.

उत्तर प्रदेश के माटी कला बोर्ड अध्यक्ष धर्मवीर प्रजापति ने बताया कि उप्र में सरकार के सहयोग से स्वदेशी के लक्ष्य को पूरा करने में मृदाशिल्पकार जुटे हैं. गोरखपुर ही नहीं, पूरे प्रदेश के शिल्पकारों को जरूरी सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं.

 

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October 19th 2020, 2:33 pm

3 करोड़ दीपकों से जगमगाएगी दीवाली, चार हजार महिला समूह मिलकर बना रहे दीये

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लखनऊ. कोरोना संकट के बाद इस बार की दीवाली सबसे अलग होगी. स्वदेशी वस्तुओं के साथ अपना त्यौहार मनाया जाएगा. विभिन्न संगठनों के सहयोग से चीनी झालर के स्थान पर तीन करोड़ दीपकों की रोशनी से दीपोत्सव मनाया जाएगा. इसके लिए गाय के गोबर और गोमूत्र से पूरे प्रदेश में चार हजार महिला समूह मिलकर तीन करोड़ दीये बनाएंगे.

यह प्रयास दीवाली को प्रदूषणमुक्त बनाएगा. विशेष बात यह है कि ये दीये घर को रोशन करने के साथ-साथ पर्यावरण को भी सहारा देंगे. दीये पहले घर को रोशन करेंगे और इसके बाद गमलों में जाकर खाद बन जाएंगे. राजधानी लखनऊ की कई गोशालाओं में दीये और प्रतिमाओं का निर्माण भी गोबर से किया जा रहा है.

सहकार भारती द्वारा प्रशिक्षित समूह दीपावली के अवसर पर पर्यावरण के अनुकूल गाय के गोबर व गौमूत्र मिश्रित उत्पाद जैसे दीपक, गणेश लक्ष्मी की मूर्ति, वंदनवार, ऊं, स्वास्तिक तैयार कर रहे हैं. गोपेश्वर गौशाला मलिहाबाद के प्रबंधक उमाकांत के अनुसार गौशाला में लगभग 150 महिलाओं के जरिए पर्यावरण के अनुकूल गोबर मिश्रित उत्पाद जैसे दीपक, हवन के लिए लकड़ी आदि प्रमुख रूप से तैयार किये जा रहे हैं. वहीं राजाजीपुरम में चल रहे केंद्र पर प्रमुख तुषार श्रीवास्तव ने बताया कि उनके यहां दीपक, गणेश-लक्ष्मी की मूर्ति, बंदनवार, स्वास्तिक आदि उत्पाद तैयार किये जा रहे हैं.

महामारी कोरोना वायरस के बाद चाइनीज उत्पादों के प्रयोग पर रोक लगा दी गई है. लिहाजा त्योहारों पर भारतीय उत्पादों का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग किया जा रहा है. इस दीपोत्सव में भी मोमबत्ती व चाइनीज झालरों की जगह गौ आधारित उत्पादों का प्रयोग किया जा रहा है. कार्यकर्ताओं द्वारा स्वदेशी वस्तुएं खरीदने का आह्वान समाज से किया जा रहा है. सभी उत्पाद पर्यावरण की दृष्टि से बहुत ही लाभकारी होंगे. कुछ स्थानों पर सेवा भारती के कार्यकर्ताओं द्वारा भी प्रशिक्षण का कार्य चल रहा है.

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October 19th 2020, 2:33 pm

सेना ने भारतीय क्षेत्र में पीएलए सैनिक को पकड़ा

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नई दिल्ली. एलएसी पर भारत-चीन के मध्य चल रहे तनाव के बीच सुरक्षा बलों ने लद्दाख के चुमार-डेमचोक इलाके में एक चीनी सैनिक को पकड़ा है. चीनी सैनिक ने कहा कि उसने अनजाने में भारतीय क्षेत्र में प्रवेश किया होगा. फिलहाल चीनी सैनिक का आईकार्ड जब्त किया गया है, सैनिक से कुछ और दस्तावेज भी बरामद किए गए हैं. सैनिक का कहना है कि वो अपने याक की तलाश में भारतीय सीमा में घुस आया था. खुफिया एजेंसियां सैनिक से पूछताछ कर रही हैं.

सूत्रों का कहना है कि नियत प्रक्रिया का पालन करने के बाद स्थापित प्रोटोकॉल के अनुसार उसे चीनी सेना को वापस कर दिया जाएगा. PLA के सैनिक की पहचान कॉर्पोरल वांग या लांग (Corporal Wang Ya Long) के रूप में हुई है. भारतीय सेना ने उसे कठोर जलवायु परिस्थितियों से बचाने के लिए ऑक्सीजन, भोजन और गर्म कपड़े सहित चिकित्सा सहायता प्रदान की है.

बताया जा रहा है कि लापता सैनिक के बारे में PLA ने भारतीय सेना को एक अनुरोध भेजा है. प्रोटोकॉल के अनुसार, सैनिक से पूछताछ और बाकी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद चुशूल-मोल्डो बैठक बिंदु पर उसे चीनी अधिकारियों को सौंप दिया जाएगा.

 

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October 19th 2020, 2:33 pm

नवरात्रि – नारी शक्ति का पर्व, नारी शक्ति ने अपने कर्म से दिखाया मार्ग

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फोटो सोशल मीडिया

पौराणिक कथा के अनुसार जब एक राक्षस स्वर्ग और पृथ्वी में उत्पात मचाने लगा और उसे नियंत्रित करने के देवताओं के प्रयास विफल होने लगे तो (नारी) शक्ति यानि मां दुर्गा का सृजन किया गया. मां दुर्गा ने नौ दिनों तक महिषासुर से युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध कर दिया. इस वर्ष शुरुआती नौ महीने कोरोना संक्रमण से संघर्ष में बीते और साल का दसवां महीना दुर्गापूजा का है. यह आस्था का महापर्व है. उम्मीद है जल्द कोरोना पर विजय प्राप्त होगी. और उम्मीद का आधार है – नारीशक्ति, जो शुरुआत से ही कोरोना संक्रमण के खिलाफ संघर्षरत है. जिन्होंने अपने कर्म से उम्मीद की राह दिखाई.

जिम्मेदारी और ममता के बीच संतुलन

गोरखपुर की सिपाही असिया बेगम लॉकडाउन के दौरान ड्यूटी के लिए निकलती थीं तो पीछे मुड़कर नहीं देखती थीं. पर उनके अपनों की आंखें जरूर नम हो जाती थीं. दरअसल उनके दो बच्चे हैं. छह साल का रिशु और एक साल की बेटी फ्रूटी. बड़ा बेटा तो फिर भी समझदारी दिखाने लगा था, पर छोटी बेटी मां के लिए मचल जाती थी. वह मां के दूध के लिए रोती थी, पर मां असिया उस वक्त उसे गोद तक में नहीं ले पाती थी. ड्यूटी के कारण कई जगहों पर जाना होता था, लिहाजा एहतियातन बच्चों से दूरी बनाकर रखती थीं. बच्ची मां के लिए बिलख-बिलख कर रोती, मगर मां ने खाकी वर्दी की जिम्मेदारी को प्राथमिकता में रखा. कहा – बच्ची को परिवार के दूसरे लोग भी संभाल लेंगे, पर अभी मेरी जरूरत देहरी के बाहर है.

कुछ यही हाल सिपाही रीना उपाध्याय का भी था. तीन साल की बेटी और एक साल का बेटा. बच्चे जब भी मां को देखते तो गोद में आने के लिए मचल जाते. रीना बताती हैं कि उनके लिए इस उम्र के बच्चों को खुद से दूर रखना बहुत मुश्किल रहा, पर लॉकडाउन के दौरान बिलखते बच्चों से मुंह मोड़ना पड़ता था.

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले की कपकोट की सीओ ने अप्रैल में होने वाली अपनी शादी यह कहकर टाल दी कि अभी उनकी जिम्मेदारी समाज के प्रति है. शादी तो बाद में भी हो जाएगी.

खुद उठाई जिम्मेदारी

लंबे समय से चले आ रहे लॉकडाउन और लगातार सामने आ रही नकारात्मक खबरों ने अपनों की सलामती को लेकर मन में उलझनें बढ़ाईं तो महिलाएं चैन से कैसे बैठती! कुछ ऐसा ही चेन्नई के कन्नई नगर में रहने वाली महालक्ष्मी, हेमलता, ओसाना और वलार के साथ हुआ. घर से बाहर निकलने की इजाजत नहीं, तब करें तो क्या करें? ऐसे में उन्होंने पुलिस से इजाजत लेकर अपनी गली को कोरोनामुक्त करने का प्रयास किया. महालक्ष्मी बताती हैं, ‘जब हमें पता चला कि हमारे इलाके में एक व्यक्ति को कोरोना संक्रमण हो गया है तो वाकई हमारी नींद उड़ गई थी. घर में तो नीम, हल्दी व संक्रमणरोधी उत्पादों की मदद से सफाई चल रही थी, पर जरूरी सामान लाने के लिए गली में निकले बिना कैसे काम चले. तब हमने पुलिस से इजाजत ली और पानी में नीम के पीसे पत्ते, हल्दी पाउडर और संक्रमणरोधी उत्पाद डालकर मिश्रण तैयार किया और खुद झाड़ू लेकर गली की सफाई कर डाली.’

भूखा न सोए कोई

लॉकडाउन की वजह से जब पटना की झुग्गी-झोपड़ियों में भोजन के संकट की खबरें सामने आने लगीं तो पटना की अमृता सिंह और पल्लवी सिन्हा ने स्लम एरिया में खाना और राशन सामग्री पहुंचानी शुरू की, ताकि एक भी पेट भूखा न रहे. आयुष विभाग (रांची) में मेडिकल ऑफिसर डॉ. वर्तिका की दो बेटियां हैं. दूसरी बच्ची का जन्म तो इसी वर्ष 23 अप्रैल को हुआ. गर्भावस्था के आखिरी महीने तक उन्होंने सेवा दी. डॉ. वर्तिका का कहना था कि परिस्थिति ही ऐसी थी कि अपने दर्द से बड़ा अपना फर्ज नजर आता था. इसी तरह आइएएस श्रीजना गुममाला की तस्वीर सुर्खियों में आई, जब वे 22 दिन के बेटे के साथ ऑफिस में तैनात दिखीं. राज्य के मुख्यमंत्री से बात करने के बाद श्रीजना छह महीने के मातृत्व अवकाश पर गईं और विशाखापट्टनम के नगर निगम आयुक्त की जिम्मेदारी संभाल ली.

फर्ज के आगे सब फीका

दिल्ली में जब कोरोना संक्रमण का कहर बढ़ा तो सड़कों पर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे के पास बुर्के में ढंकी एक महिला ने सभी का ध्यान आकर्षित किया. इमराना सैफी नाम की यह महिला अपने साथ सेनेटाइजेशन टैंक लेकर घूमती थीं. उन्होंने अपने साथ तीन अन्य महिलाओं की टीम बनाई. यह टीम आस-पास के इलाकों के साथ सभी धर्मो के इबादत स्थल में भी सेनेटाइजेशन का काम बिना हिचक कर रही थी. वहीं दिल्ली की 27 वर्षीय पैरामेडिकल स्टाफ रीतिका (बदला नाम) की सास ने दो टूक कह दिया था कि जॉब करो या परिवार चुनो. तुम्हारी जॉब की वजह से परिवार के स्वास्थ्य को खतरे में नहीं डाला जा सकता. उस वक्त पारिवारिक जीवन को दांव पर रखकर वे ड्यूटी पर तैनात रहीं.

देवी के साक्षात स्वरूप को नमन

कोरोना संक्रमण का यह दौर बेशक कष्टकारी है, पर यह भी सच है कि यह हमें जिंदगी के कई पाठ पढ़ा रहा है. हमने स्वच्छता, आत्मनिर्भरता, अनुशासन और किफायत की अहमियत समझी.

रांची के हटिया रेलवे स्टेशन पर जब महिला एएसआई ने लॉकडाउन में घर लौटते एक प्रवासी श्रमिक के बच्चे को दूध के लिए बिलखते देखा तो तुरंत स्कूटी उठाई और अपने बच्चे के लिए घर में रखा दूध बोतल में भरकर ले आईं. क्या देवी के नौ रूपों की तरह यह मां का दसवां रूप नहीं है! जीती-जागती मां, जो किसी को रोता नहीं देख सकती, कहीं कष्ट बर्दाश्त नहीं कर पाती, जो हमेशा अपना आंचल आंसू पोछने के लिए बढ़ाती है, जो सुख देने के लिए तत्पर रहती है. मां दुर्गा का यह साक्षात रूप लॉकडाउन के दौरान वास्तविक जीवन में दिखा और खूब दिखा. दरकार है इस रूप की पहचानने की, उनका सम्मान करने की और कोशिश करने की कि यह सिलसिला थमे नहीं.

तो क्यों न इस बार हम माता के दसवें रूप यानि आस-पास की नारी शक्ति को नमन करें. ओशो ने कहा है, मूर्ति तो महज एक सेतु है. उसके गुणों को हम जितना अपने भीतर समाते चले जाएंगे, उतना ईश्वर के साथ हमारी दूरी खत्म होती जाएगी. तो आइए! इस साल मां के दसवें रूप की आराधना करें. उनके काम को सम्मान दें. यह आराधना यकीनन फलदायक होगी. बच्चों में संस्कार का निर्माण करेगी. आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल होगी.

साभार – दैनिक जागरण

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October 18th 2020, 3:17 pm

आईएमए घोटाला – सीबीआई ने मंसूर खान, वरिष्ठ अधिकारियों सहित 28 के खिलाफ पूरक आरोप पत्र दायर किया

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नई दिल्ली. सीबीआई (केन्द्रीय जांच ब्यूरो) ने चार हजार करोड़ रुपये के आईएमए (आई-मॉनिटरी एडवाइजरी) घोटाला मामले में कंपनी के प्रबंध निदेशक, वरिष्ठ अधिकारियों सहित कुल 28 आरोपियों के खिलाफ न्यायालय में पूरक आरोप पत्र दायर किया है.

सीबीआई ने बेंगलुरु की एक विशेष अदालत में दायर अपने पूरक आरोप पत्र में मामले में आईएमए के प्रबंध निदेशक मंसूर खान, वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी महानिरीक्षक हेमंत निंबालकर और उपायुक्त रैंक के अजय हिलोरी, बेंगलुरु नॉर्थ सब डिवीजन के तत्कालीन सहायक आयुक्त एलसी नागराज सहित अन्य को भी आरोपी बनाया है. इसके साथ ही, तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक (सीआईडी) ईबी श्रीधर, कमर्शियल स्ट्रीट पुलिस थाने के निरीक्षक और एसएचओ एम. रमेश और थाने के उप-निरीक्षक पी. गौरीशंकर को भी आरोपी के रूप में सूचीबद्ध किया गया है.

सीबीआई ने पूरक आरोप पत्र में कहा कि कर्नाटक सरकार के राजस्व अधिकारियों के साथ बेंगलुरु के पुलिस अधिकारियों ने आईएमए के संबंध में प्राप्त शिकायतों और सूचनाओं में पूछताछ और जांच पड़ताल को बंद कर दिया था.

सीबीआई के प्रवक्ता आर.के. गौड़ ने बताया कि, ‘‘आरोपियों ने केपीआईडीएफई अधिनियम 2004 सहित कानून के तहत आवश्यक कार्रवाई नहीं की, बल्कि इसके बजाय क्लीन चिट दे दी और कहा कि उक्त निजी कंपनी किसी भी गैरकानूनी गतिविधि में शामिल नहीं थी. कंपनी की अवैध गतिविधियां बेरोकटोक जारी थीं और कई हजारों निवेशकों के करोड़ों रुपये डूब गए थे.’’

क्या है आईएमए पोंजी घोटाला?

पोंजी घोटाले के मुख्य आरोपी मोहम्मद मंसूर खान ने 2006 में आईएमए के नाम से एक कंपनी खोली थी. यह कंपनी कर्नाटक की राजधानी बंगलूरू सहित कुछ जिलों में अपना संचालन कर रही थी. कंपनी ने लोगों के साथ निवेश के नाम पर धोखाधड़ी शुरू कर दी. कंपनी पर आरोप था कि उसने लोगों को 17-25 फीसदी का लालच देकर पैसे निवेश करवाए, लेकिन जब रिटर्न देने का समय आया तो कंपनी का मालिक मंसूर खान दुबई फरार हो गया. हालांकि, बाद में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने उसे गिरफ्तार कर लिया था.

 

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October 18th 2020, 3:07 pm

सुरक्षा बलों ने बीजापुर में मुठभेड़ में एक लाख का ईनामी माओवादी मार गिराया

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नई दिल्ली. माओवादी भले ही गरीबों, पिछड़ों की लड़ाई लड़ने के दावे करते हों, लेकिन ये सच्चाई से कोसों दूर है. माओवादियों ने बीजापुर में नृशंसता को अंजाम दिया है. जिससे ग्रामीणों में भय का माहौल है. जानकारी के अनुसार माओवादियों ने एक माह में ही क्षेत्र में 25 लोगों की हत्या की है.

माओवादियों के खिलाफ कार्रवाई कर उनके कृत्यों पर अंकुश लगाने के लिए सुरक्षा बलों ने भी सर्च ऑपरेशन प्रारंभ किया है. जिसमें सुरक्षा बलों को सफलता भी मिल रही है. ऑपरेशन के दौरान शुक्रवार को सुरक्षा बलों को बड़ी सफलता मिली.

बीजापुर में शुक्रवार को मुठभेड़ में एक माओवादी को सुरक्षाबलों ने मार गिराया है. जानकारी के अनुसार मारा गया माओवादी एक लाख का इनामी है. इसके अलावा कुछ और माओवादियों के घायल होने की भी सूचना है.

एंटी-नक्सल ऑपेरशन के तहत बासागुड़ा थाना क्षेत्र से जिला पुलिस बल और सीआरपीएफ 168 बटालियन क्षेत्र में सर्चिंग के लिए निकले थे. सर्चिंग के दौरान कोरसागुड़ा के जंगलों के पास जवानों को देखते ही माओवादियों ने गोलीबारी शुरू कर दी.

सुरक्षाबलों ने जवाबी फायरिंग की, जिसके बाद जवानों को हावी पड़ता देख माओवादी भाग खड़े हुए. इसी बीच एक माओवादी मारा गया और कुछ माओवादी घायल हुए.

मृतक माओवादी की पहचान एरिया जनताना सरकार अध्यक्ष विकेश हेमला (35 वर्ष) के रूप में हुई है. क्षेत्र से मृतक माओवादी का शव और हथियार भी बरामद किए गए हैं. मुठभेड़ के बाद सर्चिंग के दौरान जवानों को एक एसबीएमएल, बंदूक, डेटोनेटर, आईईडी, बिजली का तार, माओवादी साहित्य, पिटठू और दैनिक उपयोग की सामग्री बरामद हुई है.

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October 18th 2020, 3:07 pm

दीनदयाल शोध संस्थान के कार्यकर्ता गांव-गांव बच्चों को पाठ्य सामग्री वितरण कर रहे

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चित्रकूट. कोविड-19 महामारी के कारण जहां शहरी क्षेत्रों के शिक्षकों और छात्रों ने ऑनलाइन माध्यम से दूरस्थ शिक्षा का सहारा लिया है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे शिक्षा से चूक रहे हैं क्योंकि उनके पास ऑनलाइन कक्षाओं में भाग लेने का साधन उपलब्ध नहीं है.

स्कूल बंद हैं, ऑनलाइन शिक्षा की व्यवस्था की गई है. लेकिन कई जगहों पर बच्चों के पास स्मार्टफोन और इंटरनेट की सुविधा के अभाव के कारण वे इसका लाभ नहीं उठा पा रहे हैं. ऑनलाइन शिक्षा की सुविधा शहरी क्षेत्रों के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों तक तो पहुंच रही है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों से यह अभी भी कोसों दूर है.

दीनदयाल शोध संस्थान के चित्रकूट प्रकल्प के अन्तर्गत आवासीय ट्राइबल विद्यालय, मझगवां में स्थित कृष्णादेवी वनवासी बालिका आवासीय विद्यालय में सतना जिले के लगभग 66 ग्रामों से 120 बालिकाएं आठवीं कक्षा तक अध्ययन करती हैं और चित्रकूट जनपद के गनीवां में संचालित परमानंद आश्रम पद्धति विद्यालय में 100 छात्र-छात्राएं आवासीय रूप में अध्ययन करते आए हैं.

दोनों विद्यालयों के 220 ट्राइबल छात्र-छात्राएं ऑनलाइन कक्षाओं की पहुंच से काफी दूर हैं. इनमें से अधिकांश छात्रों के लिए एंड्राइड फोन और इंटरनेट व बिजली की दिनभर उपलब्धता अभी भी कोसों दूर है.

बच्चों की पढ़ाई में किसी भी प्रकार का अवरोध उत्पन्न ना हो, इसके लिए विद्यालयों का शैक्षणिक स्टाफ गांव-गांव पहुंचकर प्रत्येक बच्चे को पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराकर उनके अध्यापन कार्य में लगा है.

दीनदयाल शोध संस्थान के संगठन सचिव अभय महाजन ने विद्यालयों के अध्यापकों के साथ बैठक की. जिसमें अध्यापकों ने बताया था कि ग्रामीण क्षेत्रों के कई ऐसे बच्चे हैं जो स्कूल जाना चाहते हैं. लेकिन उन्हें नहीं पता है कि उनके स्कूल कब खुलेंगे.

तय किया गया कि हम लोग ही स्मार्ट फोन बनकर उनके गांव-घर तक पहुंचेंगे. फिर विद्यालयों के अध्यापकों की टोली बनी, बच्चों की कक्षा बार पाठ्य सामग्री- किताबें, कॉपी, पेंसिल के बंडल बनाए गए और गांव-गांव पहुंचकर बच्चों में वितरित की.

जिन गांवों में बड़ी कक्षाओं के बच्चे और बच्चियां हैं, उनको छोटी कक्षाओं के बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित किया गया, उनके ग्रुप तैयार कर पढ़ाई का स्थान सुनिश्चित किया गया. विद्यालय के शिक्षक बच्चों के अभिभावकों के माध्यम से निरंतर संपर्क में बने हुए हैं और बीच-बीच में गांव में प्रवास कर गाइडेंस प्रदान करते हुए देखरेख कर रहे हैं.

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October 18th 2020, 3:07 pm

पश्चिम बंगाल – किसानों को नहीं मिल रहा किसान सम्मान निधि योजना का लाभ

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कोलकात्ता. किसानों की आय दोगुनी करने तथा आर्थिक सहयोग प्रदान करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की शुरूआत की है. किसान सम्मान निधि योजना के तहत सरकार किसानों के बैंक खाते में सालभर में तीन किश्तों में 6000 रुपये की राशि जमा करवाती है. किसान सम्मान निधि योजना के तहत दिसंबर माह में अगली किश्त आने वाली है. लेकिन स्वार्थ की राजनीति कहें या दंभ, पश्चिम बंगाल के किसानों को योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है. पश्चिम बंगाल सरकार ने अभी तक योजना को राज्य में लागू नहीं किया है.

हर 4 महीने पर उनके अकाउंट में सरकार 2000 रुपये ट्रांसफर करती है. अब तक किसानों को 6 किश्तों में पैसे भेजे जा चुके हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पश्चिम बंगाल सरकार ने अभी तक योजना को अपने राज्य में लागू नहीं किया है. जिससे राज्य के करीब 70 लाख किसानों को योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है.

पीएम किसान सम्मान निधि की अगली यानि सातवीं किश्त दिसंबर में आएगी. संभावना यह है कि दिसंबर की किश्त का लाभ भी पश्चिम बंगाल के किसानों को नहीं मिल पाएगा. क्योंकि ममता सरकार ने अभी इस योजना को लागू करने के बारे में कोई निर्णय नहीं लिया है.

पीएम किसान सम्मान निधि योजना के लिए घर बैठे रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं. इसके लिए किसान के पास अपने खेत की खतौनी, आधार कार्ड, मोबाइल नंबर और बैंक अकाउंट नंबर होना जरूरी है. पीएम किसान योजना की आधिकारिक वेबसाइट pmkisan.nic.in पर जाकर अपना रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं.

अगर कोई व्यक्ति खेती की जमीन का मालिक भी है, लेकिन वह सेवारत या सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी हो, मौजूदा या पूर्व सांसद/ विधायक/मंत्री हो, पेशेवर निकायों के पास रजिस्टर्ड डॉक्टर हो, इंजिनियर हो, वकील हो, चार्टर्ड अकाउंटेंट हो या इनके परिवार के लोग हों, ये सभी इस योजना के लाभार्थी नहीं बन सकते हैं. इसके अलावा जिन्हें 10,000 रुपये या इससे अधिक पेंशन मिलती है, वे सभी पेंशनर भी योजना के लाभार्थी नहीं बन सकते हैं.

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October 18th 2020, 3:07 pm

समाज सेवा के लिए हमेशा तत्पर सेवा भारती – विजय कुमार

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रोहतक (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हरियाणा प्रांत प्रचारक विजय कुमार ने कहा कि समाज में समानता तभी आती है, जब हम एक-दूसरे के प्रति मदद का हाथ बढ़ाते हैं. कोरोना संकट के दौर में भारत के लोगों ने एक-दूसरे की मदद के लिए दिल खोल कर मदद की, जो लोग व्यक्तिगत जीवन जीने में विश्वास रखते थे उन्होंने भी जरुरतमंदों की मदद के लिए अपने दरवाजे खोल दिए. यही भारत की संस्कृति है. पहले भारत में यही व्यवस्था थी, इसलिए भारत विश्व गुरु था. नियति भारत को फिर से इसी दिशा में ले जाने का प्रयास कर रही है. इसलिए भारत फिर से विश्व गुरु बनने की राह पर अग्रसर है.

विजय कुमार जींद में सेवा भारती द्वारा बनाए जा रहे स्व. पवन कुमार बंसल शिक्षा एवं फिजियोथेरेपी केंद्र के शिलान्यास समारोह को सम्बोधित कर रहे थे. प्रांत प्रचारक विजय कुमार ने कहा कि कोरोना महामारी के दौरान हर व्यक्ति एक-दूसरे की सेवा करने को अग्रसर था. आपदा के दौर ने मानव को देवता बना दिया. कोरोना काल में भारत 150 देशों का प्रतिनिधित्व कर विश्वपटल पर अपना परिचय दे रहा है. जबकि चीन ने आपदा के अवसर पर भी दूसरे देशों की सेवा करने की बजाय उनसे लाभ कमाने का प्रयास किया. हमारी संस्कृति व पाश्चात्य संस्कृति में यही अंतर है.

उन्होंने कहा कि अपने पूर्वजों के पदचिन्हों पर चलना और उनके संस्कारों को प्रतिरुप देना ही भारतीय संस्कृति की पहचान है. इसी कार्य को पूर्णरुप दिया जा रहा है. बंसल परिवार इस भूमि पर एकता व संस्कारों का परिचय करवाते हुए यहां शिक्षा व फिजियोथेरेपी की शुरुआत कर रहा है. सेवा भारती का कार्य हमेशा नर से नारायण की पद्धति का रहा है. मानवता भलाई के कार्य में सेवा भारती हमेशा आगे रहता है.

स्वामी अमृतानन्द महाराज ने कहा कि निरोगी काया, गांठ में माया हमेशा भविष्य में कामयाबी की ओर लेकर जाते हैं. श्रवण कुमार गोयल ने कहा कि मेरा गांव मेरा तीर्थ के अंतर्गत प्राचीन परम्पराओं से लोगों को जोड़ा जा रहा है. जिससे हमारे सामाजिक संस्कार जुड़े रहें. हर्षवर्धन बंसल ने कहा कि उनके पिता स्व. पवन कुमार बंसल शिक्षा देते हुए कहा करते थे – मेहनत, ईमानदारी और इच्छाशक्ति हमेशा नए अवसर और आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं. कार्यक्रम में सेवा भारती के प्रांत उपाध्यक्ष स्वामी अमृतानन्द महाराज, सेवा भारती के राष्ट्रीय महामंत्री श्रवण कुमार गोयल, वेदप्रकाश बंसल, यूनिटी ग्रुप के चेयरमैन रोशन लाल अग्रवाल, सह संस्थापक हर्षवर्धन बंसल भी मौजूद रहे.

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October 18th 2020, 3:07 pm

किसान रेल – नागपुर से संतरे लेकर दिल्ली के लिए चली किसान ट्रेन

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नई दिल्ली. किसान रेल का उद्देश्य किसानों-बागवानों के उत्पादों को सर्वसुलभ बाजार उपलब्ध करवाकर उनकी आय को दोगुना करना है. ट्रेन की मदद से किसान देश के कोने-कोने से फल, फूल, सब्जी जैसे उत्पादों को कम समय में लाकर ज्यादा मुनाफा कमा पाएंगे. अगर ये सामान ट्रक से जाता है तो बाजार (मंडी) तक पहुंचने में कई दिन का समय लग जाता है और ज्यादा सामान खराब हो जाता है. ट्रेन में कंटेनर फ्रीज की तरह होंगे. मतलब यह एक चलता-फिरता कोल्ड स्टोरेज होगा. इसमें किसान खराब होने वाले सब्जी, फल, फिश, मीट, मिल्क रख सकेंगे. इससे उनका नुकसान कम होगा, और उन्हें उत्पाद के अच्छे दाम मिल सकेंगे.

इसी क्रम में एक किसान रेल नागपुर से संतरों को लेकर रवाना की गई. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने बुधवार शाम को नागपुर से 205 टन संतरे से लदी ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर दिल्ली के लिए रवाना किया. नागपुर संतरों के लिए जाना जाता है और यह विशेष ट्रेन कटोल, नारखेड़, पांढुर्ना, बैतूल और इटारसी के संतरा उत्पादन वाले क्षेत्रों में रुकेगी. संतरा उत्पादन करने वाले किसानों और व्यापारियों के लिए रैक (डिब्बे) की बुकिंग के लिए एक वेबसाइट भी प्रारभ की गई है. जिसके माध्यम से किसान बुकिंग कर सकते हैं.

इस विशेष किसान ट्रेन में 12 वीपीयू डिब्बे होंगे. गडकरी ने कहा कि किसान ट्रेन क्षेत्र में संतरे और सब्जी उत्पादन करने वाले किसानों के लिए वरदान साबित होगी. इससे पहले भी देश के कई हिस्सों में किसान ट्रेन शुरू की गई हैं. इसके अलावा आंध्र प्रदेश से दिल्ली तक प्रतिदिन दूध दूरंतो (दूध ट्रेन) भी चलाई जा रही है.

 

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October 16th 2020, 1:28 pm

तिब्बत की निर्वासित सरकार ने चीन को मानवाधिकार परिषद में शामिल करने पर आपत्ति जताई

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नई दिल्ली. चीन को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) में शामिल करने पर निर्वासित तिब्बत सरकार ने आपत्ति जताई है. तिब्बत की निर्वासित सरकार का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र का यह निर्णय मानवाधिकारों का उल्लंघन है, क्योंकि चीन ने कभी मानवाधिकारों की पालना नहीं की है. तिब्बत में चीन का रवैया सबसे बड़ा उदाहरण है. इस फैसले से यह भी साबित हुआ है कि परिषद उन देशों को यूएनएचआरसी में शामिल होने की अनुमति दे रही है जिनका मानवाधिकारों को को लेकर रिकार्ड पहले से ही खराब है. निर्वासित सरकार ने सवाल उठाया कि कैसे उन देशों को इसमें शामिल किया जा सकता है जो पहले से ही मानवाधिकारों की उल्ल्लंघना करते आ रहे हैं और चीन इन सबमें सबसे आगे है.

निर्वासित सरकार ने अमेरिकी सरकार की ओर से की गई आपत्ति को लेकर प्रसन्नता व्यक्त की, क्योंकि तिब्बत की समस्या के समाधान को लेकर ट्रंप सरकार कहीं आगे है. निर्वासित सरकार ने अमेरिका द्वारा तिब्बत के मसले को लेकर अतिरिक्त सचिव को नियुक्त किए जाने के फैसले का भी स्वागत किया है. इस नियुक्ति से तिब्बत के मसले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी मजबूती के साथ उठाया जाएगा.

निर्वासित तिब्बत संसद के उपाध्यक्ष

निर्वासित तिब्बत संसद के उपसभापति आयार्च यशी ने कहा कि चीन सरकार को मानवाधिकार परिषद में चुना जाना दुभार्ग्यपूर्ण है. चीन सरकार ने अपने कई अल्पसंख्यक समूहों को दबाकर रखा है. चीन सरकार को मानवाधिकार परिषद में चुना जाना एक दुःखद घटना है. यह भी हो सकता है अन्य देशों को चीन सरकार द्वारा पैसा भी दिया गया हो. नहीं तो यह संभव नहीं है कि चीन को परिषद में शामिल किया जा सकता था. जानबूझ कर चीन को परिषद में शामिल किया जाना मानवाधिकारों का उल्लंघन भी है. यह निंदनीय व अफसोस की बात है. हम इस बात के लिए अमेरिका सरकार का धन्यवाद भी करते हैं. वह तिब्बत के मामले को लेकर अपनी आवाज को उठाता रहा है. हमारे लिए खुशी की बात यह भी है कि अमेरिका द्वारा अतिरिक्त सचिव को तिब्बत के मसले को हल करने के लिए नियुक्त किया गया है.

मीडिया रिपोर्ट्स

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October 16th 2020, 1:28 pm

Exposed – अर्बन नक्सल और जिहाद का गठजोड़, NIA की चार्जशीट में खुलासा

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नई दिल्ली. एनआईए ने अर्बन नक्सल और जिहाद के गठजोड़ व साजिश का खुलासा किया है. राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने चार्जशीट में बताया है कि अर्बन नक्सल गैंग हिंसा फैलाने में लगा है और हिन्दुओं में फूट डालने की बड़ी साजिश रची जा रही है. यह भी खुलासा किया है कि यह गैंग दलितों के नाम पर एक्टिव हो जाता है. भीमा-कोरेगांव से लेकर हाथरस तक गैंग ने बड़ी साजिश रची थी.

राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने भीमा-कोरेगांव मामले में दायर पूरक चार्जशीट में गठजोड़ का खुलासा किया है. एजेंसी की जांच में हिंसा के तार ISI से भी जुड़ रहे हैं. चार्जशीट में बताया है कि आरोपी गौतम नवलखा के तार पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के एजेंट से जुड़े हुए थे. अमेरिका की अदालत में गुलाम नबी के खिलाफ दस्तावेजों में इस बात का साफ जिक्र है कि वह ISI एजेंट था. अमेरिका में रह रहा फई ISI के लिए काम कर रहा था. उसके पास अमेरिकी नागरिकता थी.

फई केएसी संगठन के एजेंडे को बढ़ावा दे रहा था. केएसी संगठन को ISI फंडिंग कर रहा था. ईमेल-फोन के जरिए नवलखा-फई के तार जुड़े थे. फई के इशारे पर नवलखा देश विरोधी हरकतों में जुटा हुआ था. ISI एजेंट फई की 2011 में गिरफ्तारी हुई थी. गौतम नवलखा शहरी इलाकों में एक्टिव था. वो संगठन से बुद्धिजीवियों को जोड़ने में लगा हुआ था. गोरिल्ला एक्टिविस्ट को संगठन में शामिल कर रहा था.

पूरक चार्जशीट में स्टेन स्वामी की कुंडली भी सामने आई है. चार्जशीट के अनुसार, स्टेन स्वामी सीपीआई माओवादी नेताओं के संपर्क में था. वह नक्सली हरकतों के प्रसार में जुटा था. स्टेन स्वामी के घर से एनआईए को गोपनीय दस्तावेज मिले हैं. भीमा-कोरेगांव मामले की जांच में जुटी NIA ने हनी बाबू की साजिश का भी खुलासा किया है. जांच में NIA को कई खुफिया ईमेल मिले. जिससे पता चला है कि हनी बाबू नक्सलियों के लिए फंड जमा करने में जुटा था.

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October 16th 2020, 1:28 pm

नए अंदाज को समझिए…!!!

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जयराम शुक्ल

गहना बेचने वाली एक नामी कंपनी के एक चर्चित विज्ञापन पर कुछ बात करें, उससे पहले मेरी स्मृति में टंकी जीवन की एक सच्ची कहानी –

बात 67-68 की है. मेरे गांव में बिजली की लाइन खिंच रही थी. तब दस-दस मजदूर एक खंभे को लादकर चलते थे. मेंड़, खाईं, खोह में गढ्ढे खोदकर खड़ा करते. जब ताकत की जरूरत पड़ती तब एक बोलता.. या अलीईईईई.. जवाब में बाकी मजदूर जोर से एक साथ जवाब देते…मदद करें बजरंगबली..और खंभा खड़ा हो जाता.

सभी मजदूर एक कैंप में रहते, साझे चूल्हे में एक ही बर्तन पर खाना बनाते. थालियां कम थीं तो एक ही थाली में खाते भी थे. जहां तक याद आता है…एक का मजहर नाम था और एक का मंगल.

ये हम लोग इसलिए जानते थे कि दोनों में जय-बीरू जैसी जुगुलबंदी थी. जब काम पर निकलते तो एक बोलता – चल भई मजहर..दूसरा कहता हां, भाई मंगल.

अपनी उमर कोई पाँच-छह साल की रही होगी, बिजली तब गांव के लिए तिलस्म थी जो साकार होने जा रही थी. यही कौतूहल हम बच्चों को वहां तक खींच ले जाता था. वो लोग अच्छे थे एल्मुनियम के तार के बचे हुए टुकड़े देकर हम लोगों को खुश रखते थे.

उनकी एक ही जाति थी..मजदूर और एक ही पूजा पद्धति मजदूरी करना. तालाब की मेंड़ के नीचे लगभग महीना भर उनका कैंप था. न किसी को हनुमान चालीसा पढ़ते देखा न ही नमाज.

सब एक जैसी चिथड़ी हुई बनियान पहनते थे, पसीना भी एक सा तलतलाके बहता था. खंभे में हाथ दब जाए तो कराह की आवाज़ भी एक सी ही थी. और हां मजहर के लहू का रंग भी पीला नहीं लाल ही था.

मजहर और मंगल की एकता देश और समाज के निर्माण के सापेक्ष थी. यही वह समरसता है जो भारतमाता अपने सपूतों से चाहती है. ऐसी समरसता जहां जाति, धर्म, नस्ल, अस्मिता सब एकाकार हो जाए. कुछ ऐसी ताकतें हैं जो नहीं चाहतीं कि ऐसा कुछ हो. उनके साजिशों की बुनावट इतनी महीन होती है कि बात जबतक समझ में आए, तब तक काफी देर हो चुकी होती है.

गहना बेचने वाली कंपनी के विज्ञापन में यदि मजहर-मंगल जैसी भावनाओं की अभिव्यक्ति होती तो वह स्वागतेय थी…लेकिन कंपनी के क्रिएटिव हेड और कॉपी राइटर का मकसद तो एक नए तरीके के जिहाद को संपुष्ट करता है. इसकी तह तक जाएं और पता लगाएं कि यह विज्ञापन, जिसमें एक मुसलमान परिवार में हिन्दू लड़की को बहू के रूप में चित्रित किया गया है, किसने गढ़ा है तो सारी असलियत सामने आ जाएगी.

देश में जबसे इस्लामिक आतंकवाद की काली छाया पड़ी है, तब से कई मोर्चे खुले हैं. एक मोर्चा लव जिहाद का है. गांव और छोटे कस्बे से लेकर महानगरों तक यह सिलसिला चल रहा है. भोली-भाली हिन्दू लड़कियों को अपने जाल में फंसाकर धर्मपरिवर्तन के साथ शादी, फिर बच्चे पैदाकर सड़क पर मरने के लिए छोड़ देना ऐसी घटनाएं आम हैं.

इस हकीकत को समझते हुए हिन्दू संगठनों द्वारा ‘लव जिहाद’ के खिलाफ एक वातावरण बनाया जा रहा था. कई बच्चियां इन कसाइयों के चंगुल से मुक्त कराई गईं. लेकिन यह विज्ञापन एक तरह से ‘लव-जिहाद’ का बचाव ही है. विज्ञापन में सीधा संदेश है कि मुस्लिम परिवारों में हिन्दू लड़कियों का इतना  सम्मान होता है, जितना की उनके परिवारों में नहीं.

यह विज्ञापन न तो कोई चूक है और न ही धार्मिक समरसता का कोई प्रयोजन. यह एक तरह से ‘क्रिएटिव जिहाद’ है, जिसका प्रयोग बालीवुड के फिल्मकार वर्षों से करते आ रहे हैं. बॉलीवुड की प्रायः हर दूसरी फिल्मों में..हिन्दू व मुसलमान के धर्म तत्व घुसेड़े जाते रहे हैं और हिन्दू प्रतीकों का कैसे मजाक उड़ाया जाता है, यह बताने नहीं बल्कि नजरिया बदलकर देखने का विषय है.

देश में जब भी कभी स्वाभिमान का दौर आता है तो कतिपय बौद्धिक तत्व अपना नेरेटिव सेट करने में लग जाते हैं. टाटा की तनिष्क कंपनी के इस विज्ञापन को लेकर भी यही शुरू हो गया है. कमाल की बात यह कि इसे समझाने के लिए जलालुद्दीन उर्फ अकबर को सामने ले आए.

अकबर का जोधा प्रसंग सदियों से भारतीयों के ह्दय में टीसता रहा है. साम्यवादी इतिहासकारों ने अकबर की महानता के कसीदे पढ़े. बॉलीवुड के मुसलमान फिल्मकारों ने मुगल-ए-आजम जैसी फिल्मों के जरिए अकबर की ऐसी छवि गढ़ी जैसे वह कितना बड़ा महाबली देवदूत हो. जबकि वास्तव में अकबर से बड़ा क्रूर, कामुक स्वेच्छाचारी इतिहास में कोई नहीं मिलता. उसने सारी उम्र हिंदुओं का धन और धरम लूटते हुए जिया. राजाओं को अपने आधीन स्वीकार करने की शर्त सिर्फ समर्पण ही नहीं, बल्कि बहन व बेटी को उसके हरम में भेजने की थी. अकबर के हरम में नब्बे प्रतिशत गैर मुस्लिम महिलाएं थी.

यह तथ्य मालूम होना चाहिए कि अकबर ने अपने सूबेदार को गोडवाना जीतने के लिए नहीं, अपितु रानी दुर्गावती को हरम के लिए पकड़वाने हेतु भेजा था. वह रानी दुर्गावती के रूप की चर्चा सुनकर लगभग वैसे ही मोहित था जैसे कि खिलजी पद्मावती को लेकर. लेकिन अकबर महान है अभी भी. एक विज्ञापन प्रसंग में अकबर की सहिष्णुता का दृष्टांत दिया है. ऐसे लोगों की मति पर तरस आती है.

देश को समरसता की जरूरत है और धार्मिक सद्भावना की भी. लेकिन एक दूसरे के बरक्स किसी को हेय या विनीत दिखाने की नहीं. यह समरसता मजहर और मंगल जैसों के दृष्टांत से निकलकर आनी चाहिए. एपीजे अब्दुल कलाम, अमर बलिदानी अब्दुल हमीद, उस्ताद बिस्मिल्ला खान के प्रसंगों से धार्मिक सद्भाव की बातें निकलनी चाहिए… गहना कंपनी का वह विज्ञापन (जो वापस लिया जा चुका है) अकबर के हरम के विस्तार को ही व्याख्यायित करता है..मुगल-ए-आजम की जोधाबाई प्रसंग की तरह.

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October 16th 2020, 1:28 pm

गाय के गोबर व गौमूत्र से तैयार किये जा रहे पर्यावरण अनुकूल दीपक व मूर्तियां

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लखनऊ. अवध प्रान्त में स्वदेशी, स्वालंबन, पर्यावरण, सामाजिक समरसता, व गौ संवर्धन को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समवैचारिक संगठनों ने दीपावली के अवसर पर विशेष कार्य शुरू किया है.

सहकार भारती द्वारा प्रशिक्षित समूह दीपावली के अवसर पर पर्यावरण के अनुकूल गाय के गोबर व गौमूत्र मिश्रित उत्पाद जैसे  दीपक, गणेश लक्ष्मी की मूर्ति, बंदनवार, ॐ, स्वास्तिक आदि तैयार कर रहे हैं.

गोपेश्वर गौशाला मलिहाबाद के प्रबंधक उमाकांत के अनुसार गौशाला में लगभग 150 महिलाओं के द्वारा पर्यावरण के अनुकूल गोबर मिश्रित उत्पाद जैसे दीपक, हवन के लिये लकड़ी आदि प्रमुख रूप से तैयार किये जा रहे हैं. वहीं, राजाजीपुरम में चल रहे केंद्र पर प्रमुख तुषार श्रीवास्तव ने बताया कि उनके यहां दीपक, गणेश लक्ष्मी की मूर्ति, बंदनवार, स्वास्तिक, श्री आदि उत्पाद तैयार किये जा रहे हैं.

सहकार भारती के संयुक्त क्षेत्र संगठन मंत्री लक्ष्मण पात्रा के अनुसार पूरे प्रदेश में 4000 समूहों द्वारा 3 करोड़ से ज्यादा दीपक बनाये जा रहे हैं. जबकि एक अवध प्रान्त के 8 जिलों में 200 समूहों में 2000 महिलाएं काम कर रहीं है.

मोमबत्ती व चाइनीज झालरों के स्थान पर समाज के लोग गौ आधारित उत्पादों का प्रयोग करें, इसका आह्वान भी कार्यकर्ताओं द्वारा समाज से किया जा रहा है. ये सभी उत्पाद पर्यावरण की दृष्टि से बहुत ही लाभकारी होंगे. कुछ स्थानों पर सेवाभारती के कार्यकर्ताओं के द्वारा भी प्रशिक्षण का कार्य चल रहा है.

गोपेश्वर गौशाला प्रबंधक उमाकांत ने बताया कि नगर और ग्राम के प्रत्येक परिवार तक पांच दीपक पहुंचेंगे. एक प्रयास किया जा रहा है कि प्रत्येक परिवार में गाय के गोबर से बने 5 दीपक अवश्य जलें और गाय के गोबर, कपूर, कचरी व अन्य औषधियों द्वारा तैयार की गई हवन की लकड़ी से हवन करने पर वातावरण शुद्ध होगा.

उत्तर प्रदेश गौ सेवा आयोग द्वारा एक लाख गाय के गोबर से बने दीपक से मां गोमती के तट पर देव दीपावली मनाई जाएगी. लखनऊ महानगर के 100 स्थानों पर नगर निगम के माध्यम से बात कर स्टाल लगाने की चर्चा हुई है.

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October 16th 2020, 1:28 pm

लव जिहाद अब और बर्दाश्त नहीं, सख्त कानून बनाए सरकार – विहिप

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नई दिल्ली. विश्व हिन्दू परिषद ने लव जिहाद से पीड़ित कन्याओं द्वारा आत्महत्या, उनकी जिहादियों द्वारा निर्मम हत्या एवं दुर्दशा की बढ़ती हुई घटनाओं पर चिंता व आक्रोश व्यक्त करते हुए अविलंब कानून बनाने की मांग की.  विहिप के केन्द्रीय संयुक्त महामंत्री डॉ. सुरेन्द्र जैन ने कहा कि पिछले दिनों में तो इन घटनाओं की झड़ी सी लग गई है. लखनऊ में एक पीड़ित महिला द्वारा आत्मदाह कर अपने प्राणों की बलि देना हो या सोनभद्र में पीड़िता का सिर कटा शव मिलना हो, पिछले 8-10 दिन से बड़ी संख्या में ये घटनाएं सामने आ रही हैं जो किसी  पत्थर दिल व्यक्ति का दिल दहलाने के लिए भी पर्याप्त हैं. केरल से लेकर जम्मू कश्मीर और लद्दाख तक इन षड्यंत्रकारियों का एक जाल बिछा हुआ है. गैर मुस्लिम लड़कियों को योजनाबद्ध तरीके से जबरन या धोखे से अपने जाल में फंसा लेना किसी सभ्य समाज का चिंतन नहीं हो सकता. यह केवल जनसंख्या बढ़ाने का भोंडा तरीका ही नहीं, अपितु आतंकवाद का एक प्रकार भी है.

केरल उच्च न्यायालय ने इसे धर्मांतरण का सबसे घिनौना तरीका बता कर ही इसे लव जिहाद नाम दिया था. विश्व हिंदू परिषद ने संज्ञान में आए इस प्रकार के 170 मामलों की सूची बनाई है जो पिछले 8-10 सालों से संबंधित है.

एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष 20,000 से अधिक गैर मुस्लिम लड़कियां इस षड्यंत्र का शिकार बन जाती हैं. जिहादियों के जाल में फंसने के बाद इन लड़कियों का न केवल जबरन धर्मांतरण होता है, अपितु नारकीय जिंदगी जीने पर मजबूर किया जाता है. वेश्यावृत्ति करवाने और उन्हें बेच देने की घटनाओं के अलावा पूरे परिवार के पुरुषों व मित्रों द्वारा जबरन यौन शोषण की घटनाएं भी समाचार पत्रों में आती ही रहती हैं. जब इन अमानवीय यातनाओं की अति हो जाती है तो ये लड़कियां आत्महत्या के लिए विवश हो जाती हैं. परंतु पुलिस में शिकायत करने का अवसर बहुत कम लड़कियों को मिल पाता है. एक न्यायालय ने तो अपनी टिप्पणी में पूछा भी था कि लव जेहाद की शिकार लड़कियां गायब क्यों हो जाती है?

लव जिहाद से संपूर्ण मानवता त्रस्त है. कहीं इसे रोमियो जिहाद तो कहीं इसे पाकिस्तानी सेक्स गैंग के नाम से संबोधित किया जाता है. मुस्लिम देशों में तो गैर मुस्लिम महिलाओं को यौन दासी माना ही जाता है, बाकी देशों में भी इन्हें माले-गनीमत समझ कर अपनी कामुकता का शिकार बनाने की कोशिश की जाती है. अब विश्व के कई देश इससे त्रस्त होकर आवाज उठाने लगे हैं. म्यांमार की घटनाओं के मूल में भी लव जिहाद ही है. श्रीलंका में 10 दिन की आंतरिक एमरजेंसी लगाकर वहां के समाज के आक्रोश को शांत करना पड़ा था. जब स्वभाव से शांत बौद्ध समाज का आक्रोश यह रूप धारण कर सकता है तो बाकी समाज का आक्रोश कैसा होगा? इस को ध्यान रखकर अब लव जिहादियों को अपने इरादे बदल लेने चाहिए.

लव जिहाद की फंडिंग के समाचार सामने आ रहे हैं. PFI, SIMI, ISI जैसी संस्थाएं इनके पीछे हैं. इसीलिए कहीं भी मामला बढ़ने पर बड़े वकील तुरंत इनकी पैरवी के लिए खड़े हो जाते हैं, जिन्हें लाखों – करोड़ों रुपये फीस के रूप में  दिए जाते हैं. केरल की हादिया का उच्चतम न्यायालय में एक बड़े वकील द्वारा बड़ी फीस लेने का उदाहरण सबके सामने है. कई मामलों में तो पकड़े गए जिहादियों ने स्पष्ट कहा है कि उन्हें इस काम के लिए मौलवी ने पैसे भी दिए हैं. वोट बैंक या अन्य निहित स्वार्थों के कारण आज भारत में सेकुलर बिरादरी हिंदुओं और देश के भविष्य की चिंता किए बिना इन जिहादियों का खुला समर्थन करती है. लखनऊ में आत्मदाह करने वाली पीड़िता को एक कांग्रेसी नेता ने ही राजनीतिक लाभ लेने के लिए उकसाया था. आज भारत में भी गैर मुस्लिम समाज आक्रोशित है. विहिप इस अपवित्र गठबंधन को चेतावनी देती है कि इनको समाज के आक्रोश से डरना चाहिए और इस घृणित कृत्य को तुरंत बंद कर देना चाहिए. इन षड्यंत्रों के लिए सभी राज्य सरकारें समय समय पर चिंता व्यक्त करती रही हैं.

विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री भी समय समय पर इस संबंध में अपनी चिंता व्यक्त करते रहे हैं. विहिप मांग करती है कि मामले की गंभीरता को समझते हुए केंद्र व राज्य सरकारें लव जिहाद रोकने हेतु सशक्त कानून बनाएं. साथ ही हम समाज से भी अपील करते हैं कि वह ऐसी घटनाओं के प्रति चौकन्ने रह कर उन्हें रोकने हेतु संविधान सम्मत कदम उठाएं.

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October 16th 2020, 11:28 am

Freedom of expression का अर्थ यह नहीं कि जंगली बनकर अपनी सीमा ही लांघ दें

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रोहतक (विसंकें). एक मामले की सुनवाई के दौरान अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय की टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है. जो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अनर्गल शोर करने वालों के लिए नसीहत है.

न्यायालय ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि Freedom of expression यानि अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ यह नहीं कि आप दूसरों के अधिकारों व मान सम्मान को ठेस पहुंचाएं. प्रत्येक नागरिक को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन विचारों की अभिव्यक्ति का मतलब यह नहीं कि कोई जंगली बनकर दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाने की सीमा ही लांघ दे.

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी फेसबुक, यू-ट्यूब, ट्विटर अकाउंट पर सेना की एक यूनिट के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री अपलोड करने के आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए की.

सेना के एक कमांडिंग ऑफिसर की पत्नी व सेना की पूर्व महिला अधिकारी ने अंबाला कैंट पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई कि साबका सैनिक संघर्ष कमेटी नामक यू-ट्यूब चैनल का एडमिन अपने चैनल पर सेना के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री अपलोड कर रहा है. चैनल ने सेना की एक यूनिट के खिलाफ कुछ वीडियो अपलोड किए, जिसमें कहा गया कि कुछ जवानों को यूनिट के कमांडिंग अधिकारी की पत्नी को सलाम न करने पर सजा दी गई. इस बाबत उसने सेना व अधिकारियों के खिलाफ हेट स्पीच (गलत टिप्पणियां करना) भी दी.

पूर्व महिला सेना अधिकारी ने उच्च न्यायालय में आरोपी की अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए कहा कि उसने सेना में मेजर के पद पर काम किया और उसके पति अभी कमांडिंग आफिसर हैं, लेकिन आरोपी ने उनके खिलाफ दुष्प्रचार किया और सेना के कई महत्वपूर्ण व गोपनीय दस्तावेज अपलोड किए. इससे उनके सम्मान, प्रतिष्ठा और सामाजिक स्थिति को गहरी ठेस लगी है.

जस्टिस एचएस मदान ने कहा कि इस मामले में शिकायतकर्ता सेना की सम्मानित अधिकारी रही हैं और उनके पति अभी देश की सेवा कर रहे हैं. इनको छोड़कर भी किसी आम आदमी की प्रतिष्ठा और सम्मान को ठेस पहुंचाने का किसी को कोई हक नहीं है. ऐसे आरोपों को हलके में नहीं लिया जा सकता. विचारों की अभिव्यक्ति का मतलब यह कतई नहीं कि आप किसी के मान सम्मान को चोट पहुंचाएं.

इस मामले में आरोपी को हिरासत में लेकर पूछताछ जरूरी है. इस बात की जांच जरूरी है कि आरोपी सेना की यूनिट व अधिकारियों के खिलाफ यू-ट्यूब चैनल पर वीडियो अपलोड क्यों कर रहा है? इसके पीछे उसका वास्तविक मकसद और उसके साथी कौन हैं? केवल इस आधार पर कि वह जांच में शामिल हो गया है और पुलिस ने उसका मोबाइल अपने कब्जे में ले लिया है, अग्रिम जमानत का अधिकारी नहीं बनता.

याची ने नफरत भरे भाषणों के माध्यम से सेना के खिलाफ असंतोष और दरार पैदा करने का प्रयास किया. इसके अलावा, उसने आधिकारिक दस्तावेजों और सेना प्रतिष्ठानों की गतिविधियों के प्रतिबंधित वीडियो अपलोड कर देश की सुरक्षा व राष्ट्रीय हितों को नुकसान करने का गंभीर कृत्य किया है. इससे पहले मई में अंबाला जिला अदालत ने भी उसको अंतरिम राहत देने से इन्कार कर दिया था.

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October 15th 2020, 4:04 pm

आईआईटी दिल्ली – नैनो तकनीक से तैयार बोतल में पानी होगा तुरंत शुद्ध

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नई दिल्ली. आईआईटी (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान) दिल्ली ने नैनो तकनीक से एक ऐसी बोतल तैयार की है, जिसमें पानी भरते ही जीवाणु-कीटाणु खत्म हो जाएगा. IIT में प्रारंभ हुए स्टार्टअप नैनोसेफ सॉल्यूशंस (NanoSafe Solutions) ने नैनो-टेक्नॉलॉजी और पारंपरिक विज्ञान के माध्यम से यह बोतल तैयार की है. बोतल तांबे के एंटीमाइक्रोबियल गुणों पर आधारित है, जिसे एक्यूक्योर (Aqcure) नाम दिया गया है.

स्टार्टअप नैनोसेफ सॉल्यूशंस की संस्थापक डॉ. अनसूया राय (Anasuya Roy) ने बताया कि पानी की बोतल एंटीवायरल, एंटीबैक्टीरियल और एंटिफंगल है. इसमें पॉलीमर मैट्रिक्स से सक्रिय नैनो-तांबा निकलता है. यह तांबा कंटेनर के बाहरी और आंतरिक सतह को एंटीवायरल बनाता है. इसकी सतह के सीधे संपर्क पर जीवाणु और कीटाणु खत्म हो जाते हैं. साथ ही संग्रहण किए गए पानी को यह बोतल सुरक्षित बनाती है.

परीक्षण के दौरान एक्यूक्योर बोतल 99 फीसद एंटीबैक्टीरियल, एंटीफंगल, एंटीवायरल साबित हुई है. उन्होंने बताया कि ग्रामीण और शहरी गरीब इलाकों में स्वच्छ पेयजल की हर समय उपलब्धता आज भी चुनौती है. दूषित पेयजल कई जानलेवा वायरस और बैक्टीरिया का प्रमुख स्रोत होता है. आशा व्यक्त की कि एक्यूक्योर लोगों तक स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता में मददगार साबित होगी.

Aqcure की बोतलें अलग-अलग साइज में उपलब्ध हैं. इसकी फ्रीज में रखने वाली बोतलों की क्षमता 700 मिलीलीटर से एक लीटर तक है. इसके अलावा इसके 10-20 लीटर बबल टॉप्स और कैन्स भी पानी के स्टोरेज के लिए उपलब्ध हैं.

आईआईटी दिल्ली के टेक्सटाइल्स एंड फाइबर इंजीनियरिंग विभाग की डॉ. मंगला जोशी ने कहा कि ग्रामीण और शहरी गरीब क्षेत्रों में हर समय सुरक्षित पेयजल पहुंचाना एक बड़ी आवश्यकता और चुनौती है.

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October 15th 2020, 4:04 pm

सेवा कथा – राही ‘तू’ नहीं है अकेला !

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न कभी सुना, न देखा. मगर वर्ष 2020 में ऐसा ही कुछ हुआ. एक महामारी आई और दुनिया जहां थी, वहीं रूक गई. सब बंद. काम बंद, दफतर बंद, दुकान बंद, व्यापार बंद, उद्योग बंद, सुयोग बंद, वियोग बंद, व्यवहार बंद, यात्रा बंद – सब घर में बंद – सब लॉकडाउन. मगर इस कल्पनातीत लॉकडाउन में भारत में लाखों बेबस ऐसे भी थे, जिनके नसीब में घर की सुरक्षा नहीं, बल्कि सड़क का एक ऐसा लंबा सफर था, जिसके हर कदम पर भूख, प्यास, बिमारी और कोरोना का खतरा था. – यह अभागे थे, हमारे देश के गरीब कामगार.

मार्च 2020 में लॉकडाउन के कुछ समय बाद अचानक लाखों की संख्या में गरीब श्रमिक सड़कों पर आ गए. आवागमन के सभी साधन बंद थे. रोज़ी-रोटी के संकट से जूझते इन वंचितों के लिए सुरक्षित घर-वापसी किसी चुनौती से कम न थी. भूखे-प्यासे, पैरों में छालों के बावजूद चलने का मजबूर इन बेबस मज़दूरों की तस्वीरें जब देश ने नेशनल टेलीविज़न पर देखीं, तो हर दिल ने इनका दर्द महसूस किया. आनन-फानन में श्रमिक स्पेशल ट्रेनें शुरू की गईं.

इस अभूतपूर्व संकट की स्थिति में सदैव की तरह सेवा का संकल्प लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक मैदान में कूद पड़े. इसी कड़ी में मुरादाबाद में सेवा भारती के निर्देशन में व्यापक सेवा कार्य चलाये गए. मुरादाबाद रेलवे स्टेशन पर श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से यात्रा कर रहे मज़दूरों के लिये स्वयंसेवकों ने स्टेशन पर ही एक विशाल किचन शुरू किया. संघ के मुरादाबाद विभाग प्रचार प्रमुख पवन जैन बताते हैं कि 400 स्वयंसेवकों ने दिन-रात काम किया. ऐसी व्यवस्था बनाई गई कि मुरादाबाद रेलवे स्टेशन से गुज़रने वाला कोई भी मज़दूर भूखा न जाए. प्रतिदिन लगभग 10-12 हज़ार लोंगों को भोजन के पैकेट और पानी की बोतलें बांटी गईं. 31 मई, 2020 तक यह व्यवस्था जारी रही.

संघ के स्वयंसेवकों ने पूरी लगन के साथ श्रमिक भाइयों की हर संभव सेवा की. इस दौरान अनेक भावनात्मक दृश्य भी लोगों ने देखे. मुरादाबाद रेलवे स्टेशन से गुज़रनें वाली ट्रेनों में सफर कर रहे श्रमिक बिना किसी भेदभाव के सेवा कार्य कर रहे स्वयंसेवकों को देख अभिभूत थे. मुस्लिम समुदाय के श्रमिकों के एक जत्थे ने तो भोजन सामग्री वितरित कर रहे स्वयंसेवकों पर पुष्पवर्षा तक की. कोरोना महामारी के दौरान घर लौट रहे श्रमिक भाइयों की दुर्गम राह को स्वयंसेवकों ने अपने सेवाव्रत से सींच उन्हें शीतलता का जो अनुभव कराया, वह वास्तव में एक मिसाल है.

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October 15th 2020, 4:04 pm

स्वदेशी दीपावली – महिलाएं गाय के गोबर से बना रहीं दीये व गणेश-लक्ष्मी की मूर्ति

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प्रतीकात्मक फोटो

लखनऊ. दीपावली में रिद्धि सिद्धि के स्वामी गणेश जी व लक्ष्मी जी की पूजा होती है. प्राकृतिक व स्वदेशी दीपावली के लक्ष्य को ध्यान में रखकर बाराबंकी में ग्रामीण महिलाएं गाय के गोबर से गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां और सुंदर दीये तैयार कर रही है. इन दीयों और मूर्तियों की मांग अयोध्या, इलाहाबाद और वाराणसी से लगातार आ रही है.

उत्तरप्रदेश के बाराबंकी में बनीकोडर ग्राम पंचायत के गजपतिपुर में प्रेरणा ग्राम संगठन की महिलाओं द्वारा एक महीने से गाय के गोबर से दीपक, लक्ष्मी-गणेश, शुभ-लाभ, गोवर्धन पूजा की थाली आदि बनाए जा रहे हैं. संस्था में कार्यरत पूनम, कांति, नीतू, फूलमती, राजरानी सहित दो दर्जन महिलाएं गोबर से सामग्री बना रही हैं.

गाय के गोबर में कपूर मिलाकर मूर्ति, दीया, थाली के साचे में गोबर डालकर धूप में सुखा दिया जाता है. सूखने के बाद उसे एल्यूमीनियम पेंट से कलर किया जाता है. इसके बाद रंग चढ़ाया जाता है. जिससे जलाते वक्त दीपक न जले. दरअसल, एल्यूमीनियम पेंट से गोबर सुरक्षित हो जाता है और दीपक जलने के बाद कपूर की खुशबू महकने लगती है, जिससे वातावरण शुद्ध होता है.

राष्ट्रीय आजीविका मिशन के डिप्टी कमिश्नर सुनील तिवारी ने बताया कि छह इंच की मूर्ति 75 से 85 रुपये में बिकती है. नौ इंच की मूर्ति व थाली दो सौ से ढाई रुपये की और दीया एक रुपये में बिकता है. इसमें लगभग 40 फीसद ही लागत आती है. प्रतिदिन डेढ़ सौ से दो सौ साचों में मूर्ति और दीया बनाए जा रहे हैं. दीपावली में लगभग 30 से 40 हजार मूर्तियां और दीये बनाने का लक्ष्य है. साथ ही 20 हजार मूर्तियां और दीपक अन्य जिलों के लिए बनाए जा रहे हैं.

इसके साथ ही देवरिया में भी लक्ष्मी-गणेश और दीये बनाने का प्रशिक्षण दिया गया है. देसही देवरिया के बरवां मीरछापर गांव में सेवा भारती द्वारा स्थानीय महिलाओं को गाय के गोबर को उपयोग के बारे में जानकारी दी गई और दीये व लक्ष्मी- गणेश की मूर्ति बनाने का प्रशिक्षण दिया गया.

गौ माता को मानव जीवन के लिए अमूल्य माना गया है. गाय के गोबर का हमारे जीवन में बहुत महत्व है. इसके प्रयोग से अपने घरों सहित पर्यावरण को स्वच्छ और स्वस्थ बनाया जा सकता है.

 

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October 15th 2020, 4:04 pm

भीमा कोरेगांव – स्टेन स्वामी को मिले थे आठ लाख, नवलखा ने आईएसआई जनरल से की थी मुलाकात

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नई दिल्ली. भीमा कोरेगांव मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने गत सप्ताह पूरक आरोप पत्र न्यायालय में दायर किया था. आरोप पत्र के अनुसार गौतम नवलखा ने वर्ष 2010 से 2011 के बीच तीन बार अमेरिका की यात्रा की थी. वह पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के सक्रिय सदस्य गुलाम नबी फई के संपर्क में भी था. फई ने ही उसे आईएसआई के जनरल से मिलवाया था. और 2011 में फई को जब अमेरिका में फेडरल ब्यूरो ऑफ इंवेस्टिगेशन (एफबीआइ) ने गिरफ्तार कर लिया था तो नवलखा ने एक अमेरिकी न्यायाधीश को पत्र लिखकर फई की दया याचिका पर सुनवाई करने का अनुरोध किया था.

एनआईए आरोप के अनुसार भीमा कोरेगांव मामले में पिछले हफ्ते रांची से गिरफ्तार किए गए स्टेन स्वामी को प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) – माओवादी की गतिविधियां चलाने के लिए आठ लाख रुपये मिले थे.

राष्ट्रीय जांच एजेंसी के अनुसार स्टेन स्वामी के आवास से बरामद किए गए दस्तावेजों में गाइड ऑफ इंक्रिप्टेड डाटा कम्युनिकेशन ऑन जीएसएम नेटवर्क, एन असेंशियल अंडरग्राउंड हैंडबुक, लेटर्स बिट्वींस कॉमरेड्स फॉर यूजिंग इंक्रिप्शन, मिनी-मैनुअल ऑन अर्बन गुरिल्ला शामिल हैं. स्वामी के आवास से एक खत भी बरामद हुआ था, जिसमें अनुसूचित जाति के सभी नेताओं को भाजपा-आरएसएस कॉरपोरेट मित्र परिवार के स्टार प्रचारकों के फर्जी विकास के प्रचार को बाधित करने के लिए बिना विश्राम, बिना लापरवाही और बिना दया के सिद्धांत पर हर संभव काम करने का निर्देश दिया था.

आवास से बरामद एक पत्र में स्वामी ने श्रीनिवास नामक व्यक्ति के योगदान का भी जिक्र किया है, जिसने भाकपा-माओवादी के खिलाफ गृह मंत्रालय की आंतरिक रणनीति की जानकारी उपलब्ध कराई थी. श्रीनिवास को वरवरा राव के लिए राजनीतिक संरक्षण सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी दी गई थी.

 

इनपुट – दैनिक जागरण

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October 15th 2020, 2:29 pm

सेवाभारती के सहयोग से दीवाली के लिए महिलाएं तैयार कर रही स्वदेशी झालर

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इंदौर. स्वदेशी त्यौहार, आत्मनिर्भरता तथा चीन को सबक सिखाने के संकल्प को पूरा करने के लिए विभिन्न स्थानों पर महिलाएं आगे आई हैं. गाय के गोबर से दीये, गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां बनाने का कार्य जोरों पर चल रहा है. अनेक स्थानों पर झालर (लाइट) बनाने का कार्य भी शुरू किया है. स्वरोजगार के साथ महिलाएं स्वावलंबन-आत्मनिर्भरता के मार्ग पर आगे बढ़ रही हैं.

दीवाली पर बड़े पैमाने पर लगने वाली रोशनी की झालरों का स्वदेशी विकल्प तैयार किया जा रहा है. बल्ब की झालरों का निर्माण की किसी फैक्ट्री में नहीं, बल्कि छोटी बस्तियों के घरों में किया जा रहा है. सेवा भारती ने दीवाली की रोशनी में स्वदेशी का विकल्प तैयार करने के साथ गरीब महिलाओं के रोजगार का रास्ता भी दिखाया है.

महिलाओं के 53 स्व सहायता समूह दीवाली पर लगाई जाने वाली बल्बों की झालर (सीरिज) तैयार कर रहे हैं. निर्माण तो स्वदेशी हाथों से हो रहा है, इन झालरों में मेटीरियल भी पूरी तरह स्वदेशी है. सेवा भारती ने अलग-अलग बस्तियों में महिलाओं के समूह तैयार किए हैं. हर समूह में पांच से 10 महिलाएं काम कर रही हैं. सेवा भारती इन्हें मेटीरियल उपलब्ध करवाता है. जिससे महिलाएं झालर बनाकर संस्था को उपलब्ध करवाती हैं. पैकिंग के बाद सेवा भारती के माध्यम से शहर के बाजार और घरों में स्वदेशी झालरों को उपलब्ध करवाया जा रहा है. सेवा भारती के सचिव रवि भाटिया के अनुसार पैकिंग और गुणवत्ता के साथ ही दाम में भी स्थानीय स्तर पर तैयार बल्ब की झालर चीन के मुकाबले बेहतर है. 130 रुपये में 50 बल्बों की झालर उपलब्ध कराई जा रही है. इस वर्ष करीब 20 हजार झालर तैयार करवाई जा रही हैं. सबकी खपत स्थानीय स्तर पर ही हो जाएगी. स्वयं सहायता समूह में ज्यादातर वे महिलाएं हैं, जिन्हें लॉकडाउन में रोजगार की समस्या से परेशान होना पड़ा था. इस गतिविधि से उन्हें भी आय का सम्मानजनक साधन मिल गया है.

मेटीरियल भी चीन का नहीं

स्वदेशी झालरों के निर्माण के मेटीरियल में भी चीन के उत्पाद का पूरी तरह बहिष्कार किया गया है. सेवा भारती के अनुसार एलईडी का निर्माण देश में नहीं होता है. ऐसे में इन्हें चीन या ताइवान या कोरिया से आयात किया जाए. हमने कोरिया और ताइवान के एलईडी बल्ब मंगवाए हैं जो झालरों में लगाए जा रहे हैं. इनका जीवन भी चीन वाले एलईडी से बेहतर है. वायर व अन्य सामान पूरी तरह स्वदेशी है. चीन से बेहतर गुणवत्ता का होने के कारण झालर का जीवन भी चार से पांच साल तक है. चीन की झालरों के उलट स्वदेशी झालरों की रिपेयरिंग भी संभव है.

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October 15th 2020, 2:29 pm

परीक्षणों का मुख्य उद्देश्य मिसाइल निर्माण में पूर्ण आत्मनिर्भरता हासिल करना – जी. सतीश रेड्डी

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नई दिल्ली. भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए स्वदेशी सामग्री के आधार पर मिसाइल निर्माण के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है. और इसमें डीआरडीओ का महत्वपूर्ण यगदान है. भारत ने हाल ही में 400 किमी से अधिक मारक क्षमता वाली ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल (Brahmos Supersonic cruise missile) का सफल परीक्षण किया था. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने मिसाइल का प्रक्षेपण बालासोर के चांदीपुर स्थित एकीकृत परीक्षण केंद्र (आईटीआर) से किया था. डीआरडीओ प्रमुख जी. सतीश रेड्डी ने ब्रह्मोस के अलावा अन्य मिसाइलों के परीक्षण के संबंध में मीडिया को जानकारी दी.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार डीआरडीओ प्रमुख जी. सतीश रेड्डी ने बताया कि “ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है. परीक्षण मुख्य रूप से मिसाइल में स्वदेशी सामग्री को बढ़ाने के लिए किया गया है. ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली में शामिल कई स्वदेशी प्रणालियों का विस्तारित रेंज के साथ परीक्षण किया गया है.” “यह एक सफल मिशन था. अब सम्मिलित की गई अधिकांश स्वदेशी प्रणालियों ने पूर्ण संतुष्टि के साथ काम करना शुरू कर दिया है और स्वदेशी सामग्री अब ब्रह्मोस में बढ़ गई है.”

बीते 40 दिनों में एक के बाद एक 10 मिसाइलों का सफल परीक्षण किया गया. परीक्षण का मुख्य उद्देश्य मिसाइल निर्माण में आत्मनिर्भरता हासिल करना है. भारत पिछले पांच-छह सालों में मिसाइल सिस्टम के क्षेत्र में जितना आगे बढ़ा है, उससे हमें पूर्ण आत्मनिर्भरता हासिल हो चुकी है. मिसाइल निर्माण क्षेत्र की निजी कंपनियां भी उन्नत हो चुकी हैं. वो अब हमारे साथ साझेदारी करने में सक्षम हैं और जरूरतों के मुताबिक मिसाइल बना सकती हैं.

5 अक्तूबर को टॉरपीडो (SMART) के सुपरसोनिक मिसाइल असिस्टेड रिलीज के सफल परीक्षण पर जी. सतीश रेड्डी ने कहा, “यह प्रणाली की पूरी तरह से सिद्ध होने और सशस्त्र बलों में शामिल होने के बाद नौसेना की क्षमता को बढ़ाएगी.”

07 सितंबर को हाईपरसोनिक टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेशन व्हीकल के उड़ान परीक्षण पर उन्होंने कहा, “यह पहली बार है, जब डीआरडीओ ने अच्छी मात्रा में इस तरह का प्रयोग किया है और इसने सफलतापूर्वक काम किया है. इसने हमारे लिए इन तकनीकों पर लंबे समय तक काम करने का एक मार्ग प्रशस्त किया.” “इन सभी चीजों पर काम करने और एक संपूर्ण मिसाइल प्रणाली तैयार करने में हमें लगभग 4-5 साल लगेंगे.”

09 अक्तूबर को रुद्रम एंटी-रेडिएशन मिसाइल के सफल परीक्षण पर उन्होंने कहा, “यह एक विमान से प्रक्षेपित होने वाला विकिरण-रोधी मिसाइल (Anti-Radiation Missile) है. यह किसी भी उत्सर्जक तत्व का पता लगाने में सक्षम होगा. आप उन उत्सर्जक तत्वों को लॉक कर सकेंगे और उन पर हमला कर सकेंगे.” उन्होंने कहा, “हमें विभिन्न परिस्थितियों में पूर्ण प्रणाली प्रौद्योगिकियों को साबित करने के लिए कुछ और परीक्षण करने की आवश्यकता है. एक बार हो जाने के बाद यह वायु सेना में जाएगा और दुश्मनों के उत्सर्जक तत्वों पर हमला करने में वायु सेना को मजबूत करेगा.”

12 अक्तूबर को निर्भय सब-सोनिक क्रूज मिसाइल के उड़ान परीक्षण पर कहा, “निर्भय का पहले भी परीक्षण किया जा चुका है और उसने अपने सभी परीक्षणों को सफलतापूर्वक पूरा किया है. हम केवल इसमें स्वदेशी सामग्री बढ़ाना चाहते थे. उसके बाद इसमें कुछ खामियां आ गई, हम इसे देख रहे हैं.”

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October 15th 2020, 2:18 pm

हिन्दू संगठन का अर्थ है असमानता का उन्मूलन – डॉ. मोहन भागवत

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पुणे. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि “दत्तोपंत ठेंगडी, अपनी आखिरी सांस तक, असमानता को समाप्त करने के बारे में सोचते थे. सद्भाव उनका विश्वास था. वे दृष्टा थे और उसी से, उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में संगठन बनाए और उन्हें देश-काल-स्थिति के अनुसार मार्गदर्शन किया. यह सब करते हुए, उन्होंने हिन्दू समाज के संगठन के सिद्धांत को बनाए रखा यानि असमानता को समाप्त किया.

वे श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगडी जन्म शताब्दी समारोह समिति द्वारा आयोजित ‘सामाजिक सद्भाव के परिप्रेक्ष्य में दत्तोपंत ठेंगड़ी’ विषय पर व्याख्यान में संबोधित कर रहे थे. तिलक रोड स्थित गोलवलकर स्कूल के गणेश हॉल में वरिष्ठ प्रचारक, विचारक और भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगडी जी के जन्मशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में, व्याख्यान का आयोजन किया गया था. समारोह की अध्यक्षता केंद्रीय समिति के सदस्य गोविंददेव गिरि महाराज ने की. समिति के संयोजक रविंद्र देशपांडे व्यासपीठ पर मौजूद थे.

सरसंघचालक ने कहा कि “दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने सद्भाव, समरसता के संदर्भ में उन सभी विचारों-आदर्शों को आत्मसात किया जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार, गोलवलकर गुरुजी और बालासाहेब देवरस के विचारों में मिलते थे. इतना ही नहीं, डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के साथ भी निकटता से जुड़े थे. इन महान हस्तियों के सहचर्य और समर्पण के माध्यम से दत्तोपंत ठेंगडी द्वारा बनाई गई व्यापक दृष्टि “हमारी प्राचीन परंपराओं“ के अनुरूप थी और वही दृष्टि संघ की है. उनका स्पष्ट मत था कि यदि समाज में असमानता है तो देश जीवित नहीं रह सकता. असमानता को समाप्त करने पर उनका आग्रह था. उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था और इसके पीछे कोई राजनीतिक निहितार्थ नहीं था. समरसता के बिना समानता संभव नहीं है, इसके लिए भाईचारे की आवश्यकता है. समाज में सद्भाव तभी बनता है, जब हमें समाज में पीछे रह गए लोगों को उठाने के लिए थोड़ा झुकना पड़ता है. सद्भाव भाषण का विषय नहीं है, यह करने का विषय है.

हमारी प्राचीन विचार परंपरा में “एकरसता का भाव“ निहित है. देश को उसके आधार पर विकसित करने के लिए सामाजिक समरसता हासिल करनी है. इसे कभी भी हिंसा के जरिए हासिल नहीं किया जा सकता है. क्रांति का रास्ता समानता पैदा नहीं करता है, यह एक नया शोषणकारी वर्ग बनाता है, यह सकारात्मक परिवर्तन नहीं लाता. भाईचारा, सकारात्मक चर्चा और आत्मज्ञान असमानता को समाप्त करने के तरीके हैं. सद्भाव देश का राष्ट्रीय लक्ष्य होना चाहिए, इसके लिए धैर्य और संयम की आवश्यकता होती है. क्रांति से परिवर्तन नहीं आता, परिवर्तन लाने के लिए संक्रांति चाहिए.

यह सब करते हुए, एक व्यक्ति को लगातार सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि जो लोग देश को विभाजित करने की कोशिश कर रहे हैं उनके मन में एकता की भावना नहीं है. इसलिए हमारे देश में विविधता को “असमानता का आधार“ न बनने दें. हमको अपने देश से विषमता को उखाड़ फेंकना है.

कार्यक्रम की शुरुआत में, गोविंददेव गिरि महाराज ने कहा कि दत्तोपंत ठेंगड़ी जी द्वारा प्रस्तुत सद्भाव का विचार हमारी संस्कृति का आविष्कार है. उसके भीतर की एकरसता को पहचानना और उसका पालन करना आवश्यक है.

कोरोना महामारी के दौरान आवश्यक सभी प्रतिबंधों का अनुपालन करते हुए, इस कार्यक्रम में केवल पचास आमंत्रित लोगों ने भाग लिया. कार्यक्रम की शुरुआत और सूत्र संचालन रवींद्र देशपांडे ने किया.

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October 15th 2020, 1:26 am

स्वावलंबन – लॉकडाउन में स्टीविया का बाजार घटा तो शुरू की गिलोय व तुलसी की खेती

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भोपाल. कोरोना संकट काल में लॉकडाउन के कारण सब बाजार, कारखाने बंद हो गए. लोग घरों में बंद होने को मजबूर हो गए. ऐसे में देवांशी ने औषधीय खेती की ओर कदम बढ़ाया. कटनी जिले के ढीमरखेड़ा विकासखंड के मंगेली गांव में 55 एकड़ क्षेत्र में देवांशी ने गिलोय और तुलसी की खेती शुरू की. उनके हौसले और कड़े परिश्रम से तुलसी व गिलोय की खेती जल्द फलने-फूलने लगी. देवांशी के अनुसार स्वास्थ्य और खेती दोनों की उन्नति का क्षेत्र है, इसमें कैरियर भी है और इंकम भी, अगर दोनों सेक्टर को मिलाकर खेती में काम किया जाए तो समाज को सहजता से जरूरत की औषधि उपलब्ध होगी.

देवांशी ने बताया कि मल्टीनेशनल कंपनी का काम छोड़कर खेती करना ज्यादा अच्छा लगा. कोरोना और लॉकडाउन के बाद लगा कि इम्यूनिटी बढ़ाने वाली औषधी खेती ज्यादा बेहतर है. गिलोय और तुलसी की खेती शुरू की. दोनों जल्दी खराब नहीं होती और ये ऐसी खेती है कि ज्यादा देखभाल भी नहीं करना पड़ता. साथ ही अब वो अरोमा और दूसरे हर्बल्स की खेती भी कर रही है.

बैंगलोर में मीडिया साइकोलॉजी और लिटरेचर से ट्रिपल मेजर की पढ़ाई करने के बाद ब्रिटिश काउंसिल के साथ काम करने वाली देवांशी ने दो साल पहले खेती की राह अपनाई थी. पहले स्टीविया और दूसरी औषधि की खेती शुरू की. परंतु एक साल बाद ही कोरोना और लॉकडाउन की वजह से समस्याएं बढ़ गई. स्टीविया का बाजार कम होने लगा. लेकिन देवांशी ने चुनौती में हार नहीं मानी और गिलोय, तुलसी व अन्य औषधीय पौधों की खेती शुरू की.

देवांशी अब परंपरागत किसानों के लिए मिसाल बनकर उभरी हैं. वे किसानों को बताती हैं कि कैसे धान और गेहूं की खेती के साथ कुछ औषधीय खेती से किसान अपनी आय बढ़ा सकते हैं.

दो साल से औषधि की खेती करने वाली देवांशी नए- नए प्रयोग भी करती रहती हैं. वो औषधि खेती के लिए सीजनली प्रयोग अधिक करती है. उनका मानना है कि खेती के लिए कुछ भी नया प्रयोग करते हुए समय कैसे निकल जाता है, पता ही नहीं चलता. शुरूआती दौर में खेती को आय से जोड़कर नहीं देखना चाहिए. हो सकता है नुकसान हो, लेकिन आगे बढ़ते रहने से लाभ भी होगा. उनका कहना है कि छोटे किसान औषधि खेती से ज्यादा लाभ अर्जित कर सकते हैं. जैसे गेहूं व धान के साथ औषधि लगाएं तो गिलोय फेंसिंग में ही चढ़ जाएगा.

देवांशी जैविक खेती को भी बढ़ावा देती है. उन्होंने तुलसी हार्वेस्टिंग शुरू किया है, लगा कि लेमन ग्रास खराब होने वाली है तो तेल निकाल कर रख लिया.

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October 14th 2020, 2:35 pm

शाहजहांपुर की महिलाओं ने गाय के गोबर से तैयार की कलाकृतियां, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर होगी बिक्री

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नई दिल्ली. हमारे यहां गाय को माता मानकर पूजा करने की पद्धति चली आ रही है. प्राचीन काल से गाय के दूध, गोबर और मूत्र का औषधीय उपयोग करते आ रहे हैं. वहीं, आजीविका का साधन भी रहा है. वर्तमान में कोविड-19 से सबक लेते हुए हम अपनी पुरानी परंपरा और स्वदेशी की ओर लौट रहे है. ऐसे ही उत्तरप्रदेश के शाहजहांपुर में गाय के गोबर से कलाकृतियां बनाई जा रही हैं. जो बहुत जल्द ऑनलाइन प्लेटफार्म पर उपलब्ध होंगीं.

शाहजहांपुर में सखी संस्था द्वारा गाय के गोबर से 50 से अधिक प्रकार की कलाकृतियां तैयार की जा रही हैं. कुछ ही दिनों में सखी संस्था द्वारा गाय के गोबर से तैयार कलाकृतियां अमेजॉन पर ऑनलाइन भी दिखनी और बिकनी शुरू हो जाएंगी. घर की सजावट की कलाकृतियां, धार्मिक प्रतीक चिन्ह, दीपक, मूर्तियां, धूपबत्ती और उपलों का निर्माण शामिल है. सखी की अध्यक्ष पूजा गंगवार बेसिक शिक्षा विभाग के तहत तिलहर ब्लॉक के राजनपुर के उच्च प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापिका हैं. उनके द्वारा तिलहर तहसील के बतलैया फार्म पर महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए प्रयास किए जा रहे है. लॉकडाउन के कारण प्रवासी महिला मजदूर अपने गांव लौटी थीं, उनके लिए भी स्वरोजगार का मार्ग खुला है.

सर्वोदय किसान प्रोडूसर कंपनी लिमिटेड (एफपीओ) के डायरेक्टर प्रेमशंकर ने बताया कि सखी के सदस्यों द्वारा गाय के गोबर से बनाई कलाकृतियों को ऑनलाइन मार्केटिंग प्लेटफार्म पर बिक्री के लिए जल्द लांच किया जाएगा. एफपीओ बनाने के बाद करीब डेढ़ माह पूर्व ही उन्होंने कृलाकृतियों की बिक्री के लिए अप्लाई किया था, जिसका रिस्पांस मिला. ऑनलाइन प्लेटफार्म पर हस्तशिल्प को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसके लिए उनके ब्रांड गौशिल्प को सलेक्ट किया गया है. गौशिल्प ब्रांड की कलाकृतियों को अब विश्व स्तर पर भी पहचान मिल सकेगी.

प्रेमशंकर बताते हैं कि पहले गाय के गोबर को सुखाया जाता है. इसके बाद उसे कूटा जाता है. मिक्सर में डाला जाता है. फिर गोबर काफी महीन हो जाता है. इसके बाद उसमें गोमूत्र मिला कर आटे की तरह उसे माड़ लिया जाता है. उसमें खेती में इस्तेमाल होने वाले जिप्सम को भी मिलाया जाता है. इसके बाद मिट्टी की तरह गोबर तैयार सांचे में ढालने लायक बन जाता है. उसे अलग-अलग सांचों में ढाला जाता है. उससे मूर्ति, दीपक, कीरिंग व अन्य सजावटी सामान तैयार हो जाता है. इसके बाद उसे सूखने के लिए रख दिया जाता है. सूखने के बाद मूर्ति व अन्य सामान को कलर कर दिया जाता है. आयुर्वेद के अनुसार, गौमूत्र विष नाशक, जीवाणु नाशक होता है. इससे वातावरण को कोई नुकसान नहीं होता है.

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October 14th 2020, 2:35 pm

दीपावली पर कामधेनु आयोग के प्रयासों से चीन को लगेगा झटका

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नई दिल्ली. सीमा विवाद के बीच दीपावली पर चीन को झटका लगने वाला है. सरकार ने खिलौनों के आयात से संबंधित नियमों में सख्ती की है. तो वहीं व्यापारियों ने चन निर्मित झालर न मंगवाने का संकल्प लिया है.

वहीं, दीपावली पर चीन को सबक सिखाने के लिए राष्ट्रीय कामधेनु आयोग गाय के गोबर से 33 करोड़ दीयों को बनाकर बाजार में उतारेगा. आयोग के अध्यक्ष वल्लभ भाई कथीरिया ने कहा कि हमारा उद्देश्य चीन निर्मित दीयों को खारिज कर मेक इन इंडिया को बढ़ावा देना है.

अभियान में शामिल होने के लिए 15 से अधिक राज्यों ने अपनी सहमति दी है. लगभग तीन लाख दीये पवित्र शहर अयोध्या में जलाए जाएंगे, जबकि वाराणसी में एक लाख दीये जलाए जाएंगे. स्वैच्छिक संगठनों की मदद से इसे बनाने का कार्य शुरू हो चुका है. दीपावली तक 33 करोड़ दीये बनाने के लक्ष्य को पूरा कर लिया जाएगा.

भारतीय मवेशियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए 2019 में स्थापित किए गए आयोग ने आगामी त्योहार के दौरान गोबर आधारित उत्पादों के उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया है. इस कार्य में स्वयंसेवी संगठनों और गोशालाओं से भी मदद ली जा रही है. आयोग गाय के गोबर से बने उत्पादों को स्वयं नहीं बना रहा, बल्कि लोगों को ट्रेनिंग देकर इस काम के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. आयोग को सफलता भी मिल रही है.

इस दिशा में गांवों में छोटे-छोटे प्रयास हो रहे हैं. गांव की मिट्टी से जुड़ी शिक्षित महिलाओं ने देश की संस्कृति को विस्तार देने के साथ ही कई परिवारों के जीवकोपार्जन का साधन भी खोज निकाला. ग्राम चुटिया निवासी प्रीति ने गाय के गोबर से दीपक और रंगोली बनाने का गुर सिखाकर अनेक महिलाओं के लिए संपन्नता के द्वार खोले हैं. गोंदिया तहसील अंतर्गत ग्राम चुटिया निवासी प्रीति टेंभरे रंगोली और दीयों को दीपोत्सव में देश के कोने-कोने तक पहुंचाने का प्रयास कर रही हैं. राष्ट्रीय कामधेनु आयोग के मार्गदर्शन में यह पहल की है. प्रीति ने अपने पति की गौशाला में काम करते हुए क्षेत्र की महिलाओं को गोबर से दीपक, रंगोली और मूर्तियां बनाने का प्रशिक्षण दिया. अब यही प्रशिक्षित महिलाएं गाय के गोबर से आकर्षक दीपक और रंगोली बना रही हैं. गोबर में गोंद, विशेष वृक्ष की छाल, एलोविरा, मेथी के बीज, इमली के बीज आदि को मिलाकर इसे सांचे में ढालकर आकर्षक दीपक का रूप दिया जाता है. पहले चरण में सामग्री को दिल्ली, गुजरात के जामनगर, राजकोट, अहमदाबाद, मध्यप्रदेश के रतलाम तथा महाराष्ट्र के मुंबई, औरंगाबाद, जलगांव, नागपुर एवं अन्य प्रमुख शहरों में भिजवाया जा रहा है. इन शहरों से 14 हजार दीपों के आर्डर आ चुके हैं.

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October 14th 2020, 2:18 pm

चीन को झटका – बिना बीआइस मार्क के खिलौनों के आयात पर प्रतिबंध, चीन की 60 प्रतिशत हिस्सेदारी

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नई दिल्ली. सीमा पर चल रहे विवाद के बीच चीन को एक और झटका लगने वाला है. केंद्र सरकार के नए निर्देशों का खिलौना बाजार पर व्यापक प्रभाव पड़ने वाला है तथा इसका सीधा नुकसान चीन को होगा. केंद्र सरकार ने देशभर के आयातकों और थोक व्यापारियों को निर्देश दिए हैं कि बीआइएस मार्क (भारतीय मानक ब्यूरो) वाले खिलौनों का ही व्यापार करें. सरकार ने घरेलू उत्पादकों को भी बीआइएस द्वारा तय मानक के अनुरूप खिलौने बनाने तथा खुदरा दुकानदारों को यही खिलौने बेचने के निर्देश दिए हैं. जानकारी के अनुसार आयातित खिलौनों में 60 प्रतिशत हिस्सेदारी चीन की होती है. थाईलैंड और फिलीपींस से भी खिलौने आयात किए जाते हैं. माना जा रहा है कि बीआइएस मार्क सुनिश्चित किए जाने से चीन से खिलौनों के आयात पर अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिबंध लग जाएगा.

बीआइएस मार्क के बिना विदेशी खिलौनों के आयात की अनुमति नहीं

आयातित खिलौनों को आकर्षक बनाने में खतरनाक रसायन थाइलेट, आर्सेनिक, शीशा और पारा का प्रयोग किया जाता है. इससे बच्चों के लीवर व किडनी पर बुरा असर पड़ता है. इन खिलौनों के कारण बच्चों की हड्डियों के विकास में अवरोध आता है. उत्पादक व व्यापारी सस्ते के चक्कर में कारोबारी गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखते. केंद्र सरकार के दिशानिर्देश से स्वमेव गड़बडियां रुक जाएंगी. थोक व्यापारियों के लिए भी बीआइएस मार्क के बिना विदेशी खिलौने के आयात की अनुमति नहीं होगी.

छत्तीसगढ़ के प्रमुख स्टाकिस्ट विवेक देवांगन ने कहा कि बीआइएस मार्क वाले खिलौनों की खरीदी बिक्री के निर्देश केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए हैं. बिना मार्क वाले खिलौनों की खरीदारी व आपूर्ति प्रतिबंधित है. दुकानदारों को इस संबंध में जानकारी दी जा रही है.

 दीवाली पर इलेक्ट्रानिक व्यापारी देंगे चीन को झटका, नहीं बुक किए चाइनीज झालरों के आर्डर

चीन के साथ तनातनी के बाद इस बार दीपावली के लिए चाइनीज झालरों के आर्डर देश के व्यापारियों ने बुक नहीं किए हैं. अगस्त अंत और सितंबर महीने में ही करोड़ों के आर्डर दिए जाते थे. व्यापारी अब खुद ही देसी झालर और फैंसी लाइटें बना रहे हैं. हर साल 10 करोड़ से अधिक रुपये का आर्डर झालरों के लिए चीन को दिया जाता था.

 

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October 14th 2020, 2:18 pm

रोशनी – विहिप ने जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत किया

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जम्मू. विश्व हिन्दू परिषद जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय द्वारा जम्मू क्षेत्र में जनसांख्यिकीय परिवर्तन के उद्देश्य से रोशनी योजना को अवैध घोषित करने और राज्य संरक्षण में चले इस भूमि अतिक्रमण अभियान के सभी पहलुओं की सीबीआई जांच की घोषणा का स्वागत करती है. स्वतंत्रता के बाद, जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्य में,  जो अब जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश हैं, अब तक की सभी सरकारें कश्मीर केंद्रित  रही हैं और इन सभी द्वारा स्वयं भ्रष्टाचार, हिन्दू उत्पीड़न, आतंकवाद का पोषण और प्रोत्साहन किया गया था. इनके द्वारा भूमाफिया को अतिक्रमणों पर स्वामित्व के साथ पुरस्कृत किया गया था. क्योंकि सत्तारूढ़ लाभार्थी जांच अधिकारियों को नियंत्रित कर रहे थे और यह 5 अगस्त 2019 तक सभी लाभार्थियों के लिए सदा जीत की स्थिति थी. जम्मू कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेशों के निर्माण के साथ ही भाई भतीजावाद को  रोकने के लिए आवश्यक कानूनों की शुरूआत के साथ ही तथ्यों को प्रस्तुत करते हुए जांच एजेंसियों और सार्वजनिक अभियोजकों के जिम्मेदार व्यवहार से नतीजे सामने आने लगे हैं. जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने कुख्यात रोशनी योजना (लोकप्रिय रूप से रोशनी घोटाला) को अमान्य और अवैध घोषित करते हुए इसकी जाँच सीबीआई को सौंप दी है. इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर की आम जनता षड्यंत्रकारियों और लाभार्थियों के लिए कानून सम्मत सजा के साथ-साथ राज्य की सारी अतिक्रमण की गई भूमि की वापसी की उम्मीद कर रही है.

2001 में, जम्मू-कश्मीर की तत्कालीन सरकार ने बहुत प्रचार के साथ राजस्व उत्पन्न करने के लिए एक स्व-घोषित, क्रांतिकारी, अब तक की सभी योजनाओं से बड़ी योजना की घोषणा की. अतिक्रमणकारियों के अवैध कब्जे के तहत राज्य की भूमि का स्वामित्व देकर जम्मू-कश्मीर में पनबिजली परियोजनाओं को स्थापित करने के लिए 25,000 करोड़ रुपये का राजस्व उत्पन्न करने के प्रचारित उद्देश्य के साथ, भारत के इतिहास में पहली बार भू-माफिया के लिए यह एक प्रोत्साहन योजना थी, जिसके द्वारा परोक्ष रूप में ईमानदार नागरिकों को यह भी समझाया गया कि आप मूर्ख हैं. योजना और अधिनियम के नियम नाजायज रूप से कई बार सभी प्रमुख कश्मीर केंद्रित राजनीतिक दलों द्वारा 2007 तक अपने समर्थकों और रिश्तेदारों को लाभार्थियों के रूप में शामिल करने के लिए इच्छा अनुसार संशोधित किए गए,  जो वर्ष 2013 में भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक द्वारा अपनी रिपोर्ट में बताया गया. सत्ताधारियों ने जम्मू और कश्मीर में गहरी विपरीत स्थिति में, लगभग 33,000 कनाल राज्य भूमि कश्मीर प्रांत के 10 जिलों में और लगभग 6 लाख कनाल सरकारी भूमि जम्मू संभाग के 10 जिलों में अतिक्रमणकारियों के नाम कर दी. कश्मीर में 100% लाभार्थी मुस्लिम थे क्योंकि हिन्दू इस क्षेत्र से निष्कासित किए जा चुके हैं, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से जम्मू प्रांत में जहां हिन्दू 75% आबादी में हैं, उनमें 10% से भी कम लाभार्थी हिन्दू हैं. CBI द्वारा इस घोटाले के सभी पहलुओं की निर्णायक जांच के लिए माननीय उच्च न्यायालय का आदेश, साथ ही जम्मू-कश्मीर की पूर्ववर्ती राज्य की जांच एजेंसियों के तौर-तरीकों पर सख्ती के साथ जांच, यू.टी. सरकार से अपनी जांच प्रक्रियाओं के लिए सीबीआई को सभी सहयोग बढ़ाने के लिए उच्च न्यायालय के आदेश के साथ आम नागरिकों में कानून के राज की उम्मीद जगी है.

जम्मू-कश्मीर का कश्मीर केंद्रित नेतृत्व जिसमें सभी राजनीतिक दल शामिल हैं, जिन्होंने बाद में अपने स्वयं के घोषित ‘गुपकार घोषणा’ के साथ हाथ मिलाया, न केवल जम्मू-कश्मीर के जनसांख्यिकीय परिवर्तन के लिए भूमि जिहाद के लिए, बल्कि राष्ट्र विरोधी अंतरराष्ट्रीय एजेंडों को शरण देने और पाकिस्तान और चीन जैसे दुश्मन देशों की दुर्भावना का पोषण करने के लिए भी एकजुट हैं. इस गुपकार घोषणा के मुख्य नेता फारूक अब्दुल्ला ने हाल ही में जम्मू-कश्मीर में चीन के हस्तक्षेप की मांग की, जिसके साथ हमारे बहादुर सैनिक लद्दाख में लड़ रहे हैं. गांधी / आजाद की कांग्रेस और मुफ्ती की पीडीपी से संबंधित उनके अन्य सहयोगियों ने शायद उनके इस बयान को मौन स्वीकृति दे दी है. ये नेता न केवल धर्मनिरपेक्षता और देश के दुश्मन हैं, बल्कि बहुप्रचारित कश्मीरियत पर भी धब्बा हैं. एक प्रख्यात स्तंभकार मधु किश्वर ने हाल ही में खुलासा किया कि अब्दुल्ला की ये पसंद कैसे कश्मीरी लड़कियों को राज्य प्रशासन में गलत उद्देश्यों के लिए नियुक्त कर रही थी. वे सभी, चाहे वह अब्दुल्ला के हों या मुफ्ती के या गांधी के या आजाद के या लोन के या हुर्रियत प्रतिनिधियों के, बेनकाब होने पर एक आपराधिक चुप्पी अपनाए हुए हैं. कानून का पालन करने वाले नागरिक राज्य की भूमि की पुनर्प्राप्ति और पुनर्स्थापन, भूमि जिहाद की समाप्ति, जनसांख्यिकीय परिवर्तन की समाप्ति, आतंकवाद का अंत और अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद सभी नागरिकों के गौरव की बहाली की ओर देख रहे हैं, जिसके लिए माननीय उच्च न्यायालय ने प्रक्रिया शुरू की है.

राजेश गुप्ता

कार्यकारी अध्यक्ष,

जम्मू कश्मीर एवं लद्दाख

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October 14th 2020, 12:35 pm

बोरी में मिली शैलेन्द्र की लाश, मोहन को जिन्दा जलाया : 15 घटनाएं जब मुस्लिम लड़की से दोस्ती के बदले ह

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सौरभ कुमार

नई दिल्ली. तनिष्क के ऐड का विरोध क्या हुआ तमाम सेक्युलर एक साथ उठ खड़े हुए. शोर मचा-मचा कर पूरी दुनिया को बता रहे हैं कि देखो! भारत का हिन्दू कितना असहिष्णु हो गया है, रेडिकल हो गया है. अरे भाई, प्रेम तो प्रेम होता है उसमें क्या हिन्दू-मुसलमान. प्रेम तो दो आत्माओं का मिलन है वो जाती धर्म देखकर थोड़े ही होता है. लेफ्ट लिबरल की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वो आपको जानकारी आधी अधूरी देते हैं, मगर इस तरह चासनी में लपेटकर की एक बार दिल हो जाता है कि इनकी बात मान ली जाए.

 

लेकिन एक बार जरा पूरी तस्वीर देखिये. ये जो आज प्यार को दो आत्माओं का मिलन बता रहे वो उन दर्जनों मौतों पर मुंह में दही जमाए बैठे रहे, जब हिन्दू लड़कों को सिर्फ इसलिए मार दिया गया क्योंकि वो किसी मुस्लिम लड़की से प्यार (दोस्ती) कर बैठे थे. किसी को जिन्दा जला दिया गया, तो किसी की लाश इतने टुकड़ों में मिली की घरवाले पहचान नहीं पाए. फैसला कीजिये कि आज जो लोकतांत्रिक विरोध के अपने अधिकार का प्रयोग करने वाले हिन्दुओं को मिलिटेंट बता रहे हैं, वो इन हत्याओं को क्या कहेंगे? जो आज ये बांग लगा रहे हैं कि प्यार में धर्म नहीं होता, क्या वो बताएंगे इन लड़कों को क्यों मार दिया गया? क्यों इन लड़कों की मौत पर किसी ने प्राइम टाइम नहीं किया? क्यों इन लड़कों की मौत पर सोशल मीडिया में कोई ट्रेंड नहीं लिया गया?

  1. पहला मामला18 साल के राहुल का है, जिसे सिर्फ इस लिए पीट-पीट कर मार डाला गया क्योंकि उसने एक मुस्लिम लड़की से दोस्ती करने की गलती की थी. राहुल के एक दोस्त के अनुसार उसकी हत्या योजनापूर्वक की गयी. 7 अक्टूबर को लड़की के रिश्तेदारों द्वारा राहुल को बेरहमी से पीटा गया.
  2. सोनू और धनिष्टा दोनों पड़ोसी थे. दोनों परिवार ईद और दीवाली की मिठाईयों को मिल बांट कर खाते और खिलाते थे. लेकिन उस समय सब कुछ बदल गया जब सोनू और धनिष्टा एक दूसरे से प्यार कर बैठे. इस बात पर धनिष्टा के भाई ने अपनी ही बहन का गला रेत दिया और सोनू की गर्दन काट डाली. सारी गंगा – जमुनी तहजीब रखी की रखी रह गई और एक दलित युवक प्यार करने के कारण अपनी जान गँवा बैठा.
  3. तीसरी घटना दिसम्बर2017 की है. नवीं क्लास में पढ़ने वाले मुकेश कुमार और नूर खातून की गलती सिर्फ इतनी थी कि दोनों एक दूसरे से प्यार कर बैठे. नूर जहां के परिवार ने दोनों को मारकर उनकी लाश को गन्ने के खेत में लावारिसों की तरह फेंक दिया.
  4. चौथी घटना अप्रैल2017 की है. के. नागराज और रेशमा बानो एक दूसरे से प्यार कर बैठे. कर्नाटक के बेल्लारी के इन दो युवाओं को प्यार की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. लड़की के पिता और चार भाइयों ने मिलकर नागराज को पीट-पीट कर उसकी जान ले ली और रेशमा का गला तकिये से घोंट दिया.
  5. शंकर यादव और सूफिया अबरार अपना शादीशुदा जीवन ख़ुशी से बिता रहे थे. सूफिया नौ महीने की गर्भवती थी. सूफिया का पूरा परिवार उसके हिन्दू लड़के से शादी करने से नाराज़ था. उन दोनों का प्यार सूफिया के भाई शफीक को बर्दाश्त नहीं हुआ. उसने उन दोनों और आजन्मे मासूम की हत्या कर दी.
  6. यह घटना मई2018 की है. केरल के कासरगोड में बालकृष्ण को एक मुस्लिम महिला से शादी रचाने के जुर्म में मार डाला गया. शादी के तीन महीने बाद उसकी हत्या कर दी गई, और बालकृष्ण कोई हिंदूवादी या भाजपा का व्यक्ति नहीं था. वो तो लिबरल, सेक्युलर राजनीतिक दल कांग्रेस का नेता था.
  7. तिरुवनंतपुरम के जीतू मोहन मुस्लिम लड़की से प्यार करने के जुर्म में जिन्दा जला दिया गया. मात्र23 वर्ष की उम्र में जीतू ने प्यार करने के जुर्म में ऐसी सजा भुगती. लड़की के भाई ने एक कांस्टेबल और कुछ साथियों के साथ मिलकर जीतू को उसके घर में जिन्दा जला दिया.
  8. यह घटना सितम्बर2018 की है. एक मुस्लिम महिला को उसके अपने ही परिवार वालों ने सिर्फ इसलिए मार दिया क्योंकि उसके हिन्दू लड़के से संबंध थे. जब युवती की लाश मिली तो उसके चेहरे को इतनी बुरी तरह से बिगाड़ा जा चुका था कि उसकी पहचान संभव नहीं हो रही थी. पश्चिम बंगाल पुलिस ने लड़की के पिता और भाई को हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया. इस मामले में एनडीटीवी ने अपनी हेडलाइन में महिला और उसके परिवार का धर्म भी उल्लेखित किया था जो चौंकाने वाला था.
  9. जम्मू के रजनीश शर्मा ने मुस्लिम महिला से शादी की मगर लड़की के परिवार वाले इससे खुश नहीं थे. उन्होंने पुलिस के साथ मिलकर साजिश रची और रजनीश को पुलिस कस्टडी में इतना प्रताड़ित किया गया कि उसकी कस्टडी में ही मौत हो गई.
  10. शैलेन्द्र प्रसाद और मुनीर बीबी ने एक दूसरे से शादी की और उनका एक दस महीने का बच्चा भी था. सब ठीक चल रहा था और फिर मुनीर अपने गांव गई. गांव में सभा बैठी, लड़के का धर्म पता किया गया और उसके हिन्दू होने के कारण उसका सर धड़ से अलग कर दिया गया. शैलेन्द्र की लाश एक बोरे में बंद, खेत में पड़ी मिली.
  11. घटना अक्तूब, 2018 की है. बिहार के नवादा में एक18 वर्ष की मुस्लिम युवती को पंचायत ने पूरे गांव के सामने पेड़ से बाँध कर अधमरा होने तक मारा. लड़की एक हिन्दू लड़के से प्यार करती थी, उसका परिवार उसे पंचायत के पास लेकर आया और उसे ये सजा मिली. इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था.
  12. मंजूनाथ ने मुस्लिम लड़की से शादी की मगर लड़की के घर वाले इसके खिलाफ थे. शादी के एक साल बाद मंजूनाथ को लड़की के घरवालों ने न केवल पीटा, बल्कि उसकी जाति को लेकर भी अपशब्द कहे. मुस्लिम-दलित एकता की बात करने वाले इस मामले में दूर-दूर तक कहीं नहीं दिखे, दलित युवक मंजुनाथ ने अपने बयान में साफ़ साफ़ बताया कि उस पर जातिगत टिप्पणी की और डंडों से उसे बेरहमी से मारा.
  13. उत्तर प्रदेश में20 वर्ष की एक मुस्लिम युवती पर उसके भाई ने गोली चला दी. प्रयास तो उसकी हत्या का था, लेकिन युवती किसी तरह बच गयी. हत्या के इस प्रयास में युवती का पिता भी शामिल था. और यहाँ तो मामला प्यार का भी नहीं था, ये गोली बस इसलिए चली क्योंकि लड़की के परिवार वालों ने उसे एक हिन्दू लड़के से बात करते हुए सुन लिया था.
  14. घटना फरवरी2018 की है. अंकित और शहज़ादी तीन साल से एक दूसरे से प्यार करते थे. जब ये बात शहजादी के घर वालों को पता चली तो अंकित को पीट-पीट कर मार डाला. पुलिस ने जब परिवार वालों को पूछताछ के लिए बुलाया तो शहजादी के पिता और चाचा ने अपना गुनाह कबूल किया, लेकिन उन्हें इसका बिलकुल भी पछतावा नहीं था.
  15. खेतराम भीम के एक मुस्लिम लड़की से सम्बन्ध थे, लेकिन लड़की के परिवार वालों को यह रिश्ता रास नहीं आया. उन्होंने कई बार युवक को धमकाया भी और एक दिन सद्दाम और हयात ने खेतराम को मैदान में बुलाया. जहां उन्होंने उसे बांध कर इतना मारा कि उसकी मौत हो गई.

तो अगली बार जब कोई लिबरल ये लिखता हुआ दिख जाए कि प्यार में धर्म नहीं होता तो ये घटनाएं उसके सामने रख कर पूछें कि इन लड़कों की क्या गलती थी? इन लड़कों की मौत पर उनका खून क्यों नहीं खौला? वो इन मामलों में प्यार करने वालों की वकालत क्यों नहीं करते?

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October 14th 2020, 12:17 pm

‘अजेय भारत’ में गौरवशाली इतिहास का सटीक लेखन – डॉ. मोहन भागवत

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पुणे (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि हजारों वर्षों के हमारे गौरवशाली इतिहास की परंपरा में, कई रूपांतर हुए हैं. उन सभी विविधता का एकीकृत, संवाद और सामंजस्यपूर्ण संग्रह हिन्दू समाज है जो आज का भारत है. पांचवीं शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी की अवधि में हिन्दू समाज के गठन की प्रक्रिया पूरी हुई. यह हमारा गौरवशाली इतिहास है जो दुनिया को बताया जाना चाहिए. हमारी प्रगति के लिए इसे जानना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

सुधा रिसबुड द्वारा लिखित और कॉन्टिनेंटल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘अजेय भारत’ (5वीं से 12वीं शताब्दी – भारतीय इतिहास का गौरवशाली काल) पुस्तक का विमोचन सरसंघचालक मोहन भागवत के करकमलों से संपन्न हुआ. समारोह की अध्यक्षता नेशनल मेरीटाइम हेरिटेज बोर्ड के महानिदेशक और वरिष्ठ पुरातत्वविद् डॉ. वसंत शिंदे ने की तथा लेखिका सुधा रिसबुड और कॉन्टिनेंटल प्रकाशन की देवयानी अभ्यंकर मंच पर उपस्थित थे. कार्यक्रम न्यू इंग्लिश स्कूल के गणेश हॉल में चयनित मेहमानों की उपस्थिति में आयोजित किया गया था.

डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि जब अंग्रेजों को इस बात का अहसास हुआ, कि भारत में स्वतंत्र सरकार की व्यवस्था को तोड़े बिना इस देश पर शासन करना आसान नहीं है तो उन्होंने हमारे गौरवशाली इतिहास को तोड़- मरोड़कर लिखना और सिखाना शुरू किया. हमारी गौरवशाली परंपरा, तथ्यात्मक साक्ष्य को दबा दिया गया. उपलब्ध सबूतों का विकृत विश्लेषण किया गया था. विद्वानों द्वारा विदेशियों की मदद से जानबूझकर विकृत किया गया. इस इतिहास को सुधारने का अवसर स्वतंत्रता के बाद मिला था, लेकिन नियोजन पूर्वक यह सुनिश्चित किया गया कि यह सुधार ना हो पाए.

हमारे यहां इतिहास प्रस्तुत करते समय पहले निष्कर्ष प्रस्तुत किया जाता है और बाद में सुविधा के साक्ष्य, संदर्भ सामने रखे जाते हैं. लेकिन जो सच है, उसे अनदेखा किया जाता है. सरसंघचालक ने कहा, कि राखीगढ़ी में हड़प्पा सभ्यता पर किए गए शोध को इसके अच्छे उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है.

अध्यक्षीय भाषण में डॉ. वसंत शिंदे ने नई पीढ़ी को इतिहास बताने के महत्व के बारे में कहा, कि सुधा रिसबुड जी ने सभी उपलब्ध संसाधनों पर शोध किया है और ‘अजेय भारत’ पुस्तक के माध्यम से एक व्यापक इतिहास प्रस्तुत किया है. भारत पर कई आक्रमणों के बावजूद, इसकी सभ्यता आज भी जीवित है. आज हमारी सभ्यता में पाई जाने वाली कई चीजें इस हड़प्पा संस्कृति की खुदाई के दौरान भी मिली थीं. कई वर्षों के शोध के बाद, यह सभी सबूतों के साथ साबित हुआ है कि अफगानिस्तान से बांग्लादेश तक हम सभी का पिछले दस हजार वर्षों से एक ही वंश है.

लेखिका सुधा रिसबुड ने कहा कि 5वीं शताब्दी से 12वीं शताब्दी तक भारत का गौरवशाली इतिहास सामने लाने की आवश्यकता थी. लेकिन किसी ने यह कहने की हिम्मत नहीं की. इस आवश्यकता को देखते हुए इस इतिहास को लिखने की कोशिश की. देवयानी अभ्यंकर ने प्रकाशक की भूमिका रखी. कार्यक्रम का संचालन सुधीर गाडे ने किया.

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October 14th 2020, 12:05 pm

धर्म बदलकर किया था निकाह, ससुराल वालों की प्रताड़ना से परेशान होकर खुद को लगाई आग

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लखनऊ. महाराजगंज की रहने वाली महिला ने ससुराल वालों की प्रताड़ना से परेशान होकर उत्तरप्रदेश विधानसभा के बाहर स्वयं को आग लगा ली. महिला ने धर्म परिवर्तन कर आसिफ से निकाह किया था. ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मी ने अन्य लोगों के सहयोग से किसी तरह आग बुझाई तथा महिला को अस्पताल भेजा. महिला का शरीर बुरी तरह से झुलस गया है तथा उसकी हालत गंभीर बताई जा रही है.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार महिला का पहले विवाह के पश्चात तलाक हो गया था. उसके कुछ समय बाद महिला ने धर्म बदलकर आसिफ नाम के व्यक्ति से निकाह कर लिया. धर्म बदलने के बाद महिला का नाम आइसा रखा गया था. आइसा से शादी करने के बाद आसिफ नौकरी के लिए सऊदी अरब चला गया और यहां उसके परिजन महिला को लगातार प्रताड़ित कर रहे थे, जिससे तंग आकर महिला ने यह खौफनाक कदम उठाया. आज सुबह महिला हजरतगंज के कैपिटल तिराहे के पास ऑटो से उतरी और उसने अपने ऊपर कोई ज्वलनशील पदार्थ डालकर आग लगा ली.

डीसीपी सेंट्रल सोमेन वर्मा के अनुसार अभी शुरुआती जांच की जा रही है और पूरे मामले की छानबीन की जा रही है. महिला महाराजगंज की रहने वाली है, जिसके बारे में बाकी जानकारी भी जुटाई जा रही है.

तनिष्क के एक विज्ञापन को लेकर अभी विवाद जारी है तथा सोशल मीडिया के माध्यम से लोग रोष व्यक्त कर रहे हैं. आज की घटना सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने तनिष्क विवाद के साथ इसे जोड़ा.

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October 13th 2020, 3:38 pm

धार्मिक स्कूल के तीन शिक्षकों पर पीएसए के तहत केस दर्ज, संस्थान के 13 छात्र आतंकी संगठनों में भर्ती

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जम्मू-कश्मीर. जम्मू-कश्मीर पुलिस ने शोपियां जिले में एक मदरसे (धार्मिक स्कूल) के तीन शिक्षकों पर पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) के तहत मामला दर्ज किया है. जांच में इसी मदरसे के 13 छात्र अलग-अलग आतंकी संगठनों में शामिल पाये गए हैं. जिसमें सज्जाद भट भी शामिल है, जो फरवरी 2019 में पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों के काफिले पर आत्मघाती हमला करने का आरोपी है. जानकारी मिलने के बाद से स्कूल सुरक्षा एजेंसियों की रडार पर है. कश्मीर संभाग के आईजी विजय कुमार ने मीडिया को बताया कि संस्थान जमात-ए-इस्लामी से संबंधित है. स्कूल का नाम सिराज उलूम इमाम साहिब है.

आईजी विजय कुमार ने कहा कि ऐसा नहीं है कि इस संस्थान पर नजर नहीं थी, सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से गतिविधियों पर नजर रख रही थीं. हमने संस्थान के तीन शिक्षकों अब्दुल अहद भट, रउफ भट और मोहम्मद युनूस वानी पर पीएसए के तहत मामला दर्ज किया है. करीब 6 शिक्षकों पर सीआरपीसी की धारा 107 के तहत कार्रवाई की गई है. आईजी ने कहा कि जांच के बाद जरूरत पड़ने पर हम संस्थान प्रशासन के खिलाफ भी कार्रवाई करेंगे.

स्कूल में पढ़ने वाले छात्र मुख्य रूप से दक्षिण कश्मीर के कुलगाम, पुलवामा और अनंतनाग जिलों से हैं. खुफिया एजेंसियां इन क्षेत्रों को आतंकवाद के लिहाज से संवेदनशील तथा अनेक आतंकी समूहों में स्थानीय लोगों की भर्ती के केंद्र मानती हैं. स्कूल में उत्तर प्रदेश, केरल और तेलंगाना के बच्चे भी पढ़ते रहे हैं, लेकिन उनकी संख्या पिछले साल अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद से लगभग नहीं के बराबर हो गयी है.

स्कूल के अधिकतर छात्र और शिक्षक आतंक प्रभावित शोपियां और पुलवामा जिलों से आते हैं, इसलिए वहां आतंकवाद की विचारधारा पनप रही हो सकती है और इससे दूसरी जगहों से आए बच्चों पर भी असर होने की आशंका है. यह भी लगता है कि बाहर का माहौल, स्थानीय आबादी, आतंकवाद से संबंधित गतिविधियां तथा नियमित मुठभेड़ों में आतंकवादियों के मारे जाने से भी आतंकवाद की विचारधारा को बल मिलता है.

पुलवामा हमले के पश्चात जांच के दौरान खुफिया एजेंसियों को पता चला था कि हमले में उपयोग किए वाहन के मालिक भट ने शोपियां जिले के इसी धार्मिक शिक्षण संस्थान से पढ़ाई की थी. आतंकवाद में लिप्त रहे छात्रों की सूची में ताजा नाम जुबैर नेंगरू का जुड़ा था. प्रतिबंधित अल-बद्र आतंकी संगठन का तथाकथित कमांडर नेंगरू इस साल अगस्त में मारा गया था और वह भी यहीं का छात्र था. एक आंतरिक रिपोर्ट के अनुसार ऐसे कम से कम 13 सूचीबद्ध आतंकी और सैकड़ों ओवर ग्राउंड वर्कर्स (ओजीडब्ल्यू) हैं जो या तो इस संस्थान के छात्र हैं या पहले इसमें पढ़ चुके हैं. हाल ही में बारामूला का एक युवक लापता हो गया था जो छुट्टियां खत्म होने के बाद घर से स्कूल आ रहा था. बाद में पता चला कि वह आतंकी समूह का हिस्सा बन गया है.

अधिकारियों का मानना है कि इस तरह के संस्थान हिज्बुल मुजाहिदीन, जैश-ए-मोहम्मद, अल-बद्र और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों में भर्ती के केंद्र हैं, जहां मारे गए आतंकियों को नायक की तरह बताया जाता है.

”ये कारक छात्रों के दिमाग में गहरी छाप छोड़ते हैं और समाज तथा दोस्तों से प्रभावित होकर वे आतंकवाद की तरफ आते हैं. कई मामलों में पता चला है कि इस तरह के धार्मिक संस्थानों की शिक्षा छात्रों को आतंकी समूहों में शामिल होने के लिए उकसा रही है.’

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October 13th 2020, 3:38 pm

प्रवासी कामगारों को सस्ती दरों पर मिलेगा आवास, तेल कंपनियां करेंगी 50 हजार आवासों का निर्माण

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नई दिल्ली. संवेदनशील सरकार कमियों से सीखती है और जनता के हित में कदम उठाती है. कोरोना संकट के दौरान लॉकडाउन के बीच प्रवासी कामगारों ने अपने गांवों की ओर पलायन शुरू कर दिया था. अब सरकार ने इस ओर कदम उठाना शुरू कर दिया है. प्रवासी कामगारों को सस्ती दरों पर किराये पर आवास उपलब्ध करवाने की योजना पर कार्य शुरू किया है. तेल कंपनियों से कहा गया है कि 50 हजार घरों का निर्माण करवाएं.

अपनी जमीन पर घरों का निर्माण करें कंपनियां

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार योजना पर कार्य शुरू से पूर्व बैठक आयोजित की गई थी. बैठक में शामिल तीन अधिकारियों के हवाले से मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि तेल मंत्रालय ने अपने अधीन सरकारी तेल कंपनियों से अपनी जमीन पर घरों का निर्माण करने को कहा है. इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल), हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल), गेल इंडिया लिमिटेड और ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) तेल मंत्रालय के अधीन आती हैं. तेल मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सभी कंपनियों से घरों के निर्माण का प्लान तैयार करने को कहा है.

मंत्रालय ने 5 अक्तूबर को एक ट्वीट कर कहा था कि तेल मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पेट्रोलियम एंड नेचुरल गैस मंत्रालय और हाउसिंग एंड अर्बन अफेयर्स मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बैठक की है. बैठक में ऑयल एंड गैस प्रोजेक्ट में काम कर रहे प्रवासी और शहरी गरीब कामगारों को किफायती किराये पर मकान देने की योजना पर चर्चा की. अफोर्डेबल रेंटल हाउसिंग कॉम्प्लैक्स पीएम आवास योजना की सब-स्कीम है. इसका लक्ष्य शहरी गरीबों और प्रवासी कामगारों को वर्क साइट पर किफायती किराये पर आवास उपलब्ध कराना है. कोविड-19 जैसी महामारी के दौरान रिवर्स माइग्रेशन को रोकने के लिए यह योजना लाई गई है.

सरकार ने जुलाई में दी थी योजना को मंजूरी

मार्च में देशव्यापी लॉकडाउन के कारण प्रवासी कामगार शहरों को छोड़कर अपने गांवों को लौट गए थे. इसके बाद सरकार ने जुलाई में प्रवासी कामगारों को किफायती किराये के आवासों के निर्माण की योजना को मंजूरी दी थी. वर्ष 2022 तक सभी को घर देने की योजना के तहत इस योजना को शामिल किया गया है. स्कीम के तहत खाली पड़े सरकारी घरों को अफोर्डेबल रेंटल हाउसिंग कॉम्प्लैक्स में शामिल किया जा सकता है. प्राइवेट डेवलपर भी इस स्कीम में भाग ले सकते हैं.

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October 13th 2020, 2:22 pm

हरियाणा – पराली से ईंधन ब्लॉक बनाकर कमाई, जीरो बर्निंग पर पंचायत को 10 लाख का पुरस्कार देने की घोषणा

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रोहतक (विसंकें). पराली जलाने की समस्या से निजात पाने के लिए हरियाणा सरकार ग्राम पंचायतों के लिए पुरस्कार योजना लेकर आई है. इसी क्रम में प्रोत्साहन व जागरूकता के बाद किसानों ने पराली से कमाई का रास्ता ढूंढ लिया है. धान कटाई के सीजन में हरियाणा सरकार पूरी तरह सजग है कि किसान पराली खेतों में न जलाएं. किसानों ने समूहों का गठन किया है तथा पराली को ईंधन ब्लॉक का रूप देकर एक निजी एजेंसी के माध्यम से चीनी और पेपर मिलों में आपूर्ति कर रहे हैं.

कुरुक्षेत्र, कैथल, अंबाला सहित अन्य क्षेत्रों के किसान पराली जलाने की जगह उसे बेचकर कमाई कर रहे हैं. किसान प्राइवेट एजेंसी के उपकरणों के माध्यम से अपने खेतों में ही पराली के ईंधन ब्लाक तैयार कर रहे हैं. यही एजेंसी विभिन्न चीनी व पेपर मिलों में ईंधन ब्लॉक की सप्लाई करेगी और अपना कमीशन काटकर किसानों को पराली का भुगतान करेगी.

हरियाणा कृषि विभाग इस काम में उनकी सहायता कर रहा है और किसान समूह बनाकर ये काम कर रहे हैं. कृषि उप निदेशक डॉ. गिरीश नागपाल के अनुसार इसके अलावा सरकार ने किसानों के लिए कस्टम हायरिंग सेंटरों की भी व्यवस्था की है. जहां इन सी टू उपकरण मौजूद हैं. जिसकी मदद से किसान चाहें तो अपने खेत की पराली को खेत में ही मिट्टी के साथ मिलाकर नष्ट कर सकते हैं.

डॉ. गिरीश नागपाल ने ‘एन्वायरमेंट फ्रेंडली एंड इकोनॉमिक वे टू डिस्पोज पैडी स्ट्रा’ नाम से एक खास रिपोर्ट तैयार कर राज्य सरकार को सौंपी है. यह रिपोर्ट हरियाणा के 499 गांवों की करीब 2.10 लाख एकड़ जमीन पर होने वाली धान की खेती के बाद बचने वाली पराली पर आधारित है. रिपोर्ट में बताया गया है कि किस तरह से किसान पराली को ईंधन बनाकर उसे बेचकर अपनी आय बढ़ा सकते हैं. धान की कटाई के बाद एक एकड़ से करीब 2 टन पराली निकलती है. जिसके एक्स-सी टू उपकरणों की मदद से ईंधन नुमा ब्लॉक तैयार होते हैं. ये ईंधन नुमा ब्लॉक बाजार में 1800 रुपये प्रति टन बिकते हैं.

खुली पराली बिक रही 12 सौ रुपये टन

जबकि यदि किसान खुली पराली बेचना चाहें तो वह 1200 रुपये प्रति टन में बिकती है. पराली की खरीद पेपर मिलें, चीनी मिलें व अन्य प्राइवेट कंपनियां करती हैं. किसान के पास यदि पराली से ईंधन बनाने वाले अपने उपकरण न हों, तो प्राइवेट एजेंसियां उनके खेतों में ही अपने एक्स-सी टू उपकरणों से पराली ईंधन ब्लाक बनाकर उसे वाहनों में भर कर मिलों तक पहुंचा रही हैं. किसान उनकी मदद से भी कमाई कर सकता है. रिपोर्ट में सरकार से आग्रह किया गया है कि यह मॉडल गांवों में लागू किया जाए.

सरकार ने रेड जोन में जीरो बर्निंग का टारगेट पूरा करने वाली पंचायत को प्रथम पुरस्कार के रूप में 10 लाख रुपए, इसी तरह से द्वितीय पंचायत को 5 लाख और तृतीय आने वाली ग्राम पंचायत को 3 लाख रुपए देने की घोषणा की है.

 

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October 13th 2020, 1:51 pm

पीएफआई के कारनामे – केरल में जींस पहनने पर छात्राओं को ईशनिंदा का दोषी ठहराया, पैगम्बर पर सवाल पूछने

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नई दिल्ली. एक बार फिर से पीएफआई (पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया) का नाम हिंसा की साजिश रचने में सामने आ रहा है. केरल के इस संगठन पर उत्तरप्रदेश में जातीय संघर्ष खड़ा की साजिश में शामिल होने के आरोप लग रहे हैं. हाथरस मामले की जांच के दौरान पुलिस ने सबूतों का हवाला देते हुए दावा किया है कि पीएफआई जातीय हिंसा भड़काना चाहता था और इसके लिए उसे विदेशों से पैसा भी मिला.

पीएफआई का नाम पहले भी अनेक घटनाओं में सामने आ चुका है. इसी साल दिल्ली दंगों में भी पीएफआई की संलिप्तता की बात सामने आई थी. नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के नाम पर हिंसक प्रदर्शनों के पीछे भी पीएफआई की साजिश थी. कई राज्य सरकारें संगठन को प्रतिबंधित करने की मांग केंद्र सरकार से कर चुकी हैं. इन मामलों में पुलिस ने पीएफआई के अनेक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार भी किया है. बेंगलुरु हिंसा में भी पीएफआई का नाम सामने आया है.

90 के दशक की शुरुआत में केरल में एक संस्था का गठन हुआ, जिसका नाम था नेशनल डेवलेपमेंट फ्रंट (एनडीएफ). स्थापना का उद्देश्य था मुस्लिम समुदाय पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ लड़ना और समुदाय के सामाजिक व आर्थिक कल्याण के लिए काम करना था. लेकिन जल्द ही संस्था के जबरन धर्मांतरण करवाने में संलिप्तता की घटनाएं सामने आने लगीं. कट्टर और सांप्रदायिक संस्था बनने लगी और हिंसक घटनाओं में भी भूमिका का जिक्र होने लगा.

एक अंग्रेजी समाचार पत्र की रिपोर्ट के अनुसार, एनडीएफ ने केरल में मुस्लिम समुदाय के लोगों को सीपीएम और आरएसएस के खिलाफ हिंसक लड़ाई का भी प्रशिक्षण दिया और इन संगठनों से लड़ने को जिहाद बताया गया. रिपोर्ट में आतंकी संगठन ‘इस्लामिक स्टेट’ की केरल इकाई के प्रमुख राशिद अब्दुल्लाह के हवाले से यह भी लिखा गया था कि एनडीएफ की स्थापना करने वालों का मुख्य उद्देश्य ‘अल्लाह की राह पर चलते हुए जिहाद करना’ था.

21वीं सदी के पहले दशक की शुरुआत में ही एनडीएफ गंभीर आरोपों से घिरने लगा. एक बड़ा मामला वर्ष 2002 का था, जब केरल में आठ हिन्दू लड़कों की हत्या कर दी गई थी. घटना की जांच हुई तो एनडीएफ की संलिप्तता की बात सामने आई. एनडीएफ पर पाकिस्तान की खुफिया एजेन्सी आईएसआई से मिलीभगत और उनके इशारे पर काम करने की भी बात सामने आई.

साल 2006 में एनडीएफ का दो अन्य संगठनों के साथ विलय हो गया. ये संगठन थे ‘कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी’ और ‘मनिथ नीति पासरई’. इसी विलय ने पीएफआई यानि पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया को जन्म दिया. कई अन्य इस्लामिक संगठन भी इससे जुड़े, और पीएफआई की पहुंच देश के कई राज्यों तक हो गई. पीएफआई पर हत्या, लूट, अपहरण, धर्मांतरण, सांप्रदायिक नफरत फैलाना, दंगे भड़काना, धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देना और लव जिहाद को अंजाम देने की बातें सामने आईं.

साल 2011 में प्रकाशित वॉशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार पीएफआई से जुड़े लोगों ने केरल में छात्राओं को जींस पहनने या हिजाब न रखने पर ईशनिंदा का दोषी ठहराया और उन्हें लगातार धमकी दी गई. ईशनिंदा के ऐसे ही एक और मामले में भी पीएफआई का नाम आया, जिसमें पैगम्बर मुहम्मद पर सवाल पूछने के कारण एक प्रोफेसर का हाथ काट दिया गया था.

पीएफआई पर लगने वाले आरोपों का सिलसिला यहीं नहीं थमता. यह भी कहा जाता है कि पीएफआई सिमी का ही नया संस्करण है. सिमी यानि ‘स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया’ का गठन 1970 के दशक में अलीगढ़ में हुआ था. लेकिन, आगे चलकर भारत सरकार ने इसे आतंकी संगठन घोषित करते हुए प्रतिबंध लगा दिया था. सिमी पर प्रतिबंध लगने के बाद इसके कई सदस्य पीएफआई में शामिल हो गए. कई घटनाओं में जांच के दौरान पुलिस ने पीएफआई के कार्यालयों या इससे जुड़े लोगों के पास से कई तरह के हथियार बरामद किए हैं. पीएफआई से जुड़े अनेक लोग समय-समय पर हत्याओं और दंगों में शामिल होने के आरोप में गिरफ़्तार हो चुके हैं. गठन से आज तक पीएफआई पर दर्जनों बार हिंसा भड़काने और सांप्रदायिक तनाव पैदा करने के आरोप लग चुके हैं. इनमें से कई मामले तो बेहद चर्चित भी रहे हैं. एक ही एक मामला 2017 का भी है, जब केरल की अखिला अशोकन नाम की एक लड़की के धर्मांतरण का मुद्दा राष्ट्रीय सुर्खियों में शामिल हुआ था.

नागरिकता कानून (सीएए) के विरोध में हुए प्रदर्शनों से लेकर दिल्ली में हुए दंगों और श्रीलंका में हुए बम धमाकों तक में पीएफआई का नाम सामने आया था.

एनआईए ने अपनी जांच में पाया कि हादिया की ही तरह दर्जनों लड़कियों का धर्मांतरण करके उनकी शादी किसी मुस्लिम से करवाई है और ऐसे कई मामलों में पीएफआई ने सक्रिय भूमिका निभाई है. पीएफआई पर केरल में कई हत्याओं के आरोप भी हैं.

हाल की घटनाओं का जिक्र करें तो नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध में हुए प्रदर्शनों से लेकर दिल्ली में हुए दंगों और श्रीलंका में हुए बम धमाकों तक में पीएफआई का नाम सामने आता रहा है. प्रवर्तन निदेशालय यानि ईडी ने केंद्र सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में बताया है कि सीएए के खिलाफ हुए प्रदर्शनों को बढ़ाने के लिए पीएफआई ने विदेशों से पैसा लिया है और देश के कई हिस्सों में यह पैसा पहुंचाया है.

इनपुट – दैनिक भास्कर

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October 13th 2020, 1:36 pm

जम्मू कश्मीर – रोशनी अधिनियम असंवैधानिक, उच्च न्यायालय ने सीबीआई को सौंपी जांच

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नई दिल्ली. अपने ऐतिहासिक निर्णय में जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय ने विवादास्पद रोशनी अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया. साथ ही घोटाले की जांच सीबीआई को देने की अनुमति दी. उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि 25,000 करोड़ रुपये की भूमि आवंटन योजना की जांच सीबीआई को हस्तांतरित कर दी जाए. मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और न्यायमूर्ति राजेश बिंदल की खंडपीठ ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) से रोशनी अधिनियम के तहत भूमि आवंटन घोटाले की जांच सीबीआई से कराने की मांग वाली याचिका को अनुमति प्रदान की. न्यायालय ने 64 पृष्ठ के आदेश में स्पष्ट कहा कि रोशनी एक्ट की बुनियाद स्वार्थ पूर्ति के लिए ही रखी थी. नेताओं और नौकरशाहों की नीयत में खोट था, जिन्होंने स्वार्थ के लिए गरीबों जरूरतमंदों के नाम पर सरकारी और वन विभाग की जमीनों को हथिया लिया.

रोशनी अधिनियम

नवंबर 2001 में राज्य विधानमंडल द्वारा इसे अधिनियमित किया गया और मार्च 2002 में लागू किया गया था. इसके तहत राज्य में जल विद्युत उत्पादन के लिए धन जुटाने की परिकल्पना की गई थी, जिसमें राज्य की भूमि को निजी स्वामित्व में स्थानांतरित करके 25,000 करोड़ रुपये एकत्र करने की योजना थी. सीएजी की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया कि 25,000 करोड़ रुपये के लक्ष्य के मुकाबले, केवल 76 करोड़ रुपये ही निजी स्वामित्व में भूमि के हस्तांतरण से प्राप्त हुए. जम्मू-कश्मीर के कई रसूखदार नेता, पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी और भू-माफिया शामिल रहे हैं.

आठ हफ्ते में रिपोर्ट देगी सीबीआई
मामले में राज्य को कई हजार करोड़ रुपये की भूमि से वंचित होना पड़ा और इससे अधिनियम के उद्देश्य पर भी करारा प्रहार हुआ. अपने फैसले में उच्च न्यायालय ने कानून को असंवैधानिक घोषित किया और अधिनियम के तहत किए गए सभी आवंटनों को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है. भूमि घोटाले की जांच सीबीआई को हस्तांतरित की जाए, जो आठ सप्ताह के भीतर स्थिति रिपोर्ट दाखिल करेगी. न्यायालय ने यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव निर्बाध जांच सुनिश्चित करेंगे, जो उन अधिकारियों के खिलाफ भी होगी, जिनके कार्यकाल में यह अतिक्रमण हुआ. सभी उपायुक्त और संभागीय आयुक्तों पर अदालत की अवमानना के लिए कार्रवाई की जाएगी, अगर वे जांच में सहयोग नहीं करते हैं.

न्यायालय ने कहा कि सरकार के सामान्य प्रशासनिक विभाग में हिम्मत नहीं थी कि वह उनके खिलाफ कार्रवाई करते, जिन्होंने रोशनी एक्ट की आड़ में लूट-खसोट की. रसूखदारों ने सरकारी जमीनों की लूटखसोट लालचवश की है, जिससे राष्ट्र और जनहित को नुकसान पहुंचा. बेईमानी से हथियाई जमीन में अपराधिक प्रवृत्ति झलकती है, जिसने सरकार के प्रति विश्वास को झकझोर दिया है.

डिवीजन बेंच ने अफसोस जताया कि यह हम सबके लिए हैरान कर देने वाली बात है. नौ साल पहले इस मुद्दे को जनहित याचिका के जरिए उठाया गया, जब हम पूर्व जम्मू कश्मीर और लद्दाख के नागरिक थे और यहां चुनी हुई सरकार थी. वर्ष 2011 में जनहित याचिका दायर हुई उसके बाद 2014 में अन्य याचिका दायर हुई. याचिकाकर्ताओं की न्याय की दलीलों का इन नेताओं के कानों पर कोई असर नहीं हुआ. उन्होंने लूटखसोट करने वालों को प्रोत्साहित किया.

मालिकाना हक एक्ट 2001 में समय-समय पर संशोधन हुआ, जो असंवैधानिक था. यह कानून शुरू से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 में लोगों के हित में नही था. जिन लोगों ने रोशनी एक्ट के तहत जमीन हथियाई वे गैर कानूनी है और आपराधिक श्रेणी में आता है. डिवीजन बेंच ने तर्क दिया कि पहले विजिलेंस ने दिखावटी कसरत की. संगठन ने उन लोगों को बचाया जो इस गोरखधंधे में शामिल रहे हैं. घोटाले का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2019 में एंटी करप्शन ब्यूरो ने क्लोजर रिपोर्ट फाइल कर दी. फिर सामान्य प्रशासनिक विभाग ने 9 सितंबर 2020 में कहा कि न एंटी करप्शन ब्यूरो और न अधिकारियों के पास योग्यता या क्षमता है जो कानूनी कार्रवाई करते हुए उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर जमीन वापस लें जो अवैध रूप से हड़पी गई है.

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने राज्य विधानमंडल में 2012-13 में रिपोर्ट में मुख्यधारा वाले राजनीतिक पार्टियों को रोशनी घोटाले में संस्थागत लाभार्थियों के रूप में उजागर किया था. श्रीनगर के पॉश एरिया में खिदमत ट्रस्ट की जमीन पार्टी मुख्यालय के नाम करवा ली गई. इसके अलावा चार कनाल दूसरी जमीन पर एक पार्टी ने कार्यालय की इमारत खड़ी कर दी. जांच में सामने आया कि वर्ष 2007 में दोनों राजनीतिक दलों ने जमीन को ट्रस्ट के नाम ट्रांसफर करवाया और रोशनी एक्ट के तहत अधिकार जमा लिया. मौजूदा समय में इन जमीनों की कीमत लगभग एक अरब के पास है. हालांकि दोनों पार्टियों के नेता कहते हैं कि रोशनी एक्ट एक सही कानून था, लेकिन जमीनों के आवंटन में राजस्व विभाग के अधिकारियों ने रोशनी एक्ट की आड़ में सरकारी जमीनों को अपने स्वार्थ के लिए बेच दिया.

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October 13th 2020, 1:36 pm

पर्यावरण संरक्षण – प्लास्टिक-डिस्पोज़ेबल थाली गिलास के उपयोग को कम करने के लिए बनाया बर्तन बैंक

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भोपाल (विसंकें). छोट-छोटे प्रयास मिलकर बड़ा परिवर्तन लाते हैं. इसी कड़ी में भोपाल की महिलाओं ने पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से छोटा ही सही पर महत्वपूर्ण प्रयास किया है. पर्यावरण संरक्षण के लिए प्लास्टिक व डिस्पोज़ेबल थाली-गिलास के उपयोग को कम करने के उद्देश्य से प्रयास प्रारंभ किया है.

भोपाल के शक्ति नगर निवासी महिलाओं इला मिड्ढा, श्वेता शर्मा, स्मिता पटेल और डॉ. मधुलिका दीक्षित ने मिलकर बर्तन बैंक बनाया है. बर्तन बैंक से धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक आयोजनों के लिए बर्तन नि:शुल्क उपलब्ध करवाए जाते हैं. बर्तन बैंक में पांच सौ थालियां, गिलास एवं चम्मच हैं, जिसका पूरा हिसाब-किताब रजिस्टर में मेंटेन किया जाता है.

महिलाओं की दोस्ती लगभग 21 साल पुरानी है. सबसे पहले उन्होंने बाजार से पन्नी (प्लास्टिक) में सामान लेना बंद किया. अपने साथ घर से ही बैग लेकर जाती थीं. जानवर पन्नियां खाने की वजह से मर जाते हैं. इसलिए उन्होंने बर्तन बैंक शुरू किया.

उन्होंने बताया कि हम जब भी किसी कार्यक्रम में जाते थे तो वहां डिस्पोजल थालियों में खाना सर्व किया जाता था. तब हमें महसूस हुआ कि इससे हमारे पर्यावरण को नुकसान हो रहा है. साथ ही जानवरों को भी नुकसान हो रहा है, क्योंकि जानवर इन्हीं डिस्पोज़ेबल थालियों को खा जाते हैं.

इतना प्लास्टिक वेस्ट इकट्ठा हो रहा है जो आने वाली पीढ़ी के लिए बहुत हानिकारक है. इस बात को ध्यान में रखते हुए आपस में पैसे एकत्र कर बर्तन बैंक की शुरुआत की.

उनके कार्य में मीना दीक्षित और हरिप्रिया पंत ने भी सहयोग किया. विशेष बात यह है कि बर्तन बैंक में प्लास्टिक का कोई भी सामान उपयोग नहीं किया जाता, नके इस काम में अशोक पटेल, रमनदीप अहलूवालिया, कल्पना सिंह और योगेश गुड्डू सक्सेना का सहयोग रहा है.

इला मिड्ढा, श्वेता शर्मा, डॉ. मधुलिका दीक्षित और स्मिता पटेल ने बताया कि बर्तन बैंक खुलने के बाद से डिस्पोजल, थर्माकोल की प्लेट और प्लास्टिक से बनी वस्तुओं का उपयोग काफी कम हुआ है. अपने घर से ही बर्तन बैंक संचालित कर रही हैं.

कोरोना वायरस के चलते सुरक्षा व सावधानियों का पूरा ख्याल रखा जाता है. बर्तन देने से पहले वे सामने वालों को इतना जरूर कहते हैं कि बर्तन अच्छी तरह साफ करके वापिस करें, ताकि किसी को परेशानी न हो.

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October 13th 2020, 1:36 pm

सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण 7 राज्यों में सीमा पर बने 43 पुलों का एक साथ उद्घाटन

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अरुणाचल में नेचिपु सुरंग की आधारशिला रखी, बीआरओ ने किया है पुलों का निर्माण

नई दिल्ली. रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से 43 पुलों का उद्घाटन किया. पहली बार है कि जब एकसाथ इतने पुलों का एक साथ लोकार्पण किया गया हो. रक्षामंत्री ने कहा कि पाकिस्तान के बाद अब चीन भी सीमा विवाद जारी रखने पर आमादा है. दोनों देश यह सब मिशन के तहत कर रहे हैं. अरुणाचल प्रदेश में एक सुरंग का शिलान्यास भी किया.

भारत-चीन सीमा पर विगत 5-6 महीनों से निरंतर तनाव की स्थिति बनी हुई है, वार्ता के नाम पर कोर कमांडर स्तर की सातवीं बैठक संपन्न हुई. चीन के चरित्र से भलीभांति परिचित हो चुके भारत ने सीमा क्षेत्र को सड़क से जोड़ने, पुल निर्माण और संचार तकनीक बढ़ाने के साथ आधारभूत ढांचे के निर्माण में रिकॉर्ड उपलब्धि अर्जित की है. दुर्गम उच्च हिमालयी क्षेत्र में हाड कंपा देने वाली बर्फानी ठंड और प्रतिकूल मौसम में कोरोना के समस्त प्रोटोकॉल को निभाते हुए सेना और देश की सुरक्षा की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण सड़कों और पुलों का निर्माण कार्य सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) द्वारा निर्धारित समय में पूरा करना ऐतिहासिक उपलब्धि से कम नहीं है.

सात राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में सीमा से सटे संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों पर बने 43 महत्वपूर्ण सड़कों एवं पुलों का वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उद्घाटन कर इन्हें राष्ट्र को समर्पित किया. 30 मीटर से लेकर 484 मीटर तक के विभिन्न आकार के 44 पुल जम्मू-कश्मीर (10), लद्दाख (07), हिमाचल प्रदेश (02), पंजाब (04), उत्तराखंड (08), अरुणाचल प्रदेश (08) और सिक्किम (04) में स्थित हैं. इसके साथ ही हिमाचल प्रदेश के लाहौल स्पीति से लद्दाख के लेह को जोड़ने वाली अटल टनल रोहतांग की तर्ज पर अरुणाचल प्रदेश के तवांग की रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सड़क पर बनने वाली नेचिपु सुरंग की आधारशिला भी रखी. नेचिपू सुरंग 450 मीटर लंबी, दो लेनों वाली सुरंग नेचिपु पास में सभी मौसम में आवागमन सुनिश्चित करेगी और दुर्घटना संभावित क्षेत्रों में एक सुरक्षित मार्ग प्रदान करेगी. यह सुरंग अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर से 448 किमी उत्तर-पश्चिम में और चीन की सीमा से लगे तवांग तक की यात्रा के समय को कम कर देगी. इस सुरंग की मदद से सेना के लिए सीमा तक जाना आसान होगा. हिमाचल के दारचा को लद्दाख से जोड़ने के लिए भी सड़क बनाई जा रही है. यह सड़क कई ऊंची बर्फीली चोटियों से होकर गुजरेगी. यह करीब 290 किमी. लंबी होगी. इसके तैयार होने के बाद करगिल तक सेना की पहुंच आसान होगी.

रक्षामंत्री ने बीआरओ की सराहना करते हुए कहा कि इन पुलों ने पश्चिमी, उत्तरी और उत्तर-पूर्व क्षेत्रों के दूर-दराज के क्षेत्रों में कनेक्टिविटी में सुधार किया और स्थानीय लोगों की आकांक्षाओं को पूरा किया. इनसे पूरे वर्ष सशस्त्र बलों के परिवहन और रसद संबंधी आवश्यकताएं भी पूरी होंगी. पुलों के निर्माण से 217 गांवों के लगभग 4 लाख लोगों को प्रत्यक्ष लाभ होगा. फिर चाहे खाद्य आपूर्ति, सशस्त्र बलों की आवश्यकता हो या अन्य विकास के कार्य, ये सभी कनेक्टिविटी के द्वारा ही संभव हैं.

रक्षामंत्री ने पुलों के उद्घाटन पर कहा, ‘सभी जानते हैं कि हमारी उत्तरी और पूर्वी सीमाओं पर क्या हो रहा है. 7 हजार किमी लंबी सीमाओं पर पाकिस्तान और चीन लगातार तनाव बनाए हुए हैं. चीन-पाक की तरफ से तनाव के बावजूद भारत हर क्षेत्र में ऐतिहासिक बदलाव लाया है.’ 2008-16 के बीच बीआरओ का बजट 3300 करोड़ से 4600 करोड़ रुपए के बीच रहता था. 2020-21 में यह बढ़कर 11 हजार करोड़ रुपए हो गया है.

बीआरओ के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह ने कहा कि वे पुल सामरिक महत्व के हैं और सीमा क्षेत्रों में नागरिक और सैन्य यातायात की भारी आवाजाही को सुविधाजनक बनाने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं. प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण के अनुरूप, ये पुल सुदूर सीमा क्षेत्रों के समग्र आर्थिक विकास में योगदान करेंगे और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सशस्त्र बलों की शीघ्र तैनाती में भी सहायता करेंगे.

डोकलाम प्रकरण के बाद से ही सड़क निर्माण में तेजी लाने के अलावा, बीआरओ ने आधारभूत संरचना विकास के क्रम में पिछले साल 28 प्रमुख पुलों को पूरा करके पुलों के निर्माण पर विशेष जोर दिया है, जबकि इस वर्ष 102 प्रमुख पुलों का निर्माण पूरा किया जा रहा है. इनमें से 54 पुल पहले ही पूरे हो चुके हैं.

भारत ने सामरिक दृष्टि से बेहद अहम दौलत बेग ओल्डी तक करीब 235 किलोमीटर सड़क निर्माण का कार्य लगभग पूरा कर लिया है. दौलत बेग ओल्डी देपसांग पठार के अक्साई चीन के इलाके के पास है. यहां भारत पहले ही एयर बेस बना चुका है. इस एयरबेस पर मालवाहक सी130 और सी17 जहाज को लैंड करवा चुका है. बीते करीब ढाई साल में बीआरओ ने इस योजना के तहत 2304 किलोमीटर सड़क का निर्माण किया.

21वीं सदी के समर्थ और स्वावलम्बी भारत की शक्ति बखूबी दिखाई पड़ रही है. 2016 से हिमालयी राज्यों की सीमाओं में सभी प्रकार के कनेक्टिविटी के सुखद परिणाम दिखने लगे थे. विगत वर्ष ही बीआरओ ने लगभग 60,000 किमी सड़कों का निर्माण और विकास किया है, जिसमें एक महत्वपूर्ण 19.72 किलोमीटर सड़क डोकलाम के पास भी बनी जो 2017 में भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच हुए लगभग डेढ़ महीने के स्टैंड-ऑफ के बाद बनाई गयी थी. इस सड़क की वजह से अब भारत की सेना 40 मिनट में ही डोकलाम पहुंच सकती है. पहले यह सफर 7 घंटे का होता था.

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October 12th 2020, 11:04 pm

आत्मनिर्भरता – एक माह में 10 मिसाइलों का सफल परीक्षण, अगले सप्ताह निर्भय सब-सोनिक मिसाइल का परीक्षण

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नई दिल्ली. कोरोना संकट और सीमा पर विवाद की स्थिति के बीच भारत सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर निरंतर आगे कदम बढ़ा रहा है. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने आत्मनिर्भर भारत और ‘मेड इन इंडिया’ अभियान के तहत परमाणु और पारंपरिक मिसाइलों के विकास को तेजी से उत्पादन करने का प्रयास किया है. डीआरडीओ ने करीब एक महीने में हर चौथे दिन में एक मिसाइल दागी है, जो वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) से पीछे हटने के लिए चीन के इनकार की पृष्ठभूमि के खिलाफ डीआरडीओ की तैयारी को दर्शाता है. पिछले 35 दिनों में रक्षा अनुसंधान संगठन द्वारा दसवीं मिसाइल परीक्षण किया जाने वाला है.

रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) अगले सप्ताह के प्रारंभ में 800 किलोमीटर रेंज की निर्भय सब-सोनिक क्रूज मिसाइल का परीक्षण करेगा. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सेना और नौसेना में शामिल करने की औपचारिक शुरुआत से पहले रॉकेट बूस्टर मिसाइल को अंतिम रूप दिया जा रहा है.

भारत ने स्वदेशी हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डिमांस्ट्रेटर व्हीकल (एचएसटीडीवी) का सफलतापूर्वक परीक्षण सात सितंबर को किया. अमेरिका, रूस और चीन के बाद ऐसी उपलब्धि हासिल करने वाला भारत चौथा देश बन गया है. देश में हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल प्रणाली के विकास को आगे बढ़ाने के लिए यह परीक्षण एक बड़ी सफलता है.

हालांकि भारत के पास ब्रह्मोस जैसी उन्नत सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल पहले से ही है, जिसके दूसरे संस्करण का भी बीते दिनों परीक्षण हो चुका है. क्रूज मिसाइल की विशेषता है कि यह कम ऊंचाई पर तेजी से उड़ान भर सकती है और राडार से बच सकती है. ब्रह्मोस को जमीन से, हवा से, पनडुब्बी से, युद्धपोत से यानि कहीं से भी दागा जा सकता है. यही नहीं इस मिसाइल को पारंपरिक प्रक्षेपक के अलावा ऊर्ध्वगामी वर्टकिल प्रक्षेपक से भी दागा जा सकता है. क्रूज मिसाइलों का टारगेट या तो पहले से तय रहता है या फिर वे खुद लोकेट करती हैं. ये मिसाइलें सबसोनिक, सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक स्पीड से चल सकती हैं.

‘निर्भय’ मिसाइल

‘निर्भय’ – एक हजार किलोमीटर दूरी तक मार करने में सक्षम है. यह बिना भटके अपने निशाने पर अचूक वार करती है. यह दो चरणों वाली मिसाइल है. पहली बार में लंबवत और दूसरे चरण में क्षैतिज. यह पहले पारंपरिक रॉकेट की तरह सीधा आकाश में जाती है और फिर दूसरे चरण में क्षैतिज उड़ान भरने के लिए 90 डिग्री का मोड़ लेती है. इस तरह यह अपने लक्ष्य को निशाना बनाती है.

निर्भय मिसाइल को डीआरडीओ ने पूर्णतया अपने दम पर बनाया है. इस मिसाइल में धीमी गति से आगे बढ़ने, बेहतरीन नियंत्रण एवं दिशा-निर्देशन, सटीक परिणाम देने तथा राडारों से बच निकलने की क्षमता है. यह सुपर सोनिक क्रूज मिसाइल एडवांस्ड सिस्टम लैबोरेटरी (एएसएल) द्वारा विकसित की गई है.

सुपरसोनिक मिसाइल प्रणाली ‘स्मार्ट’ का सफल परीक्षण किया

भारत ने इसी महीने पांच अक्तूबर को ओडिशा अपतटीय क्षेत्र स्थित एक परीक्षण केंद्र से देश में विकसित ‘सुपरसोनिक मिसाइल असिस्टेड रिलीज ऑफ टॉरपीडो’ (स्मार्ट) प्रणाली का सफल प्रायोगिक परीक्षण किया. ‘स्मार्ट’ प्रणाली पनडुब्बी विध्वंसक अभियानों के लिए हल्के वजन की टॉरपीडो प्रणाली है. परीक्षण और प्रदर्शन पनडुब्बी रोधी क्षमता स्थापित करने में काफी महत्वपूर्ण है.

विकिरण रोधी मिसाइल रुद्रम-1 का सफल परीक्षण किया

भारत ने शुक्रवार (नौ अक्तूबर) को भारतीय वायु सेना के एसयू-30 एमकेआई लड़ाकू विमान से नई पीढ़ी की एक विकिरण रोधी मिसाइल का सफल परीक्षण किया जो लंबी दूरी से विविध प्रकार के शत्रु राडारों, वायु रक्षा प्रणालियों और संचार नेटवर्कों को ध्वस्त कर सकती है. अधिकारियों ने कहा कि मिसाइल रुद्रम-1, भारत की पहली स्वदेश निर्मित विकिरण रोधी शस्त्र प्रणाली है.

मैक टू या ध्वनि की गति से दोगुनी रफ्तार वाली मिसाइल में 250 किलोमीटर तक के दायरे में विविध प्रकार की शत्रु राडार प्रणालियों, संचार नेटवर्कों और वायु रक्षा प्रणालियों को मार गिराने की क्षमता है.

 

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October 12th 2020, 1:44 pm

हाथरस मामला – पुलिस व खुफिया एजेंसियां सतर्क, पीएफआई के स्थान पर ISO को खड़ा करने का प्रयास

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नई दिल्ली. हाथरस मामले की जांच कर रही एजेंसियों के हाथ नई जानकारी लगी है. एजेंसियों को इनपुट मिला है कि पीएफआई की संलिप्तता सामने आने के पश्चात उसके स्थान पर आईएसओ (इस्लामिक स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन) का नेटवर्क खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है. यह पीएफआई का ही एक विंग बनकर काम करेगा.

पूर्व में भी सिमी पर प्रतिबंध लगने के पश्चात उसके कई सदस्य पीएफआई से जुड़ गए थे. हाथरस जाते समय मथुरा से गिरफ्तार पीएफआई के 4 सदस्यों से पूछताछ में नए संगठन के बारे में जानकारी मिली है. आईएसओ के सदस्य किसी से घुलते-मिलते नहीं और लो प्रोफाईल रहकर गुपचुप रूप से काम करते हैं. आईएसओ का नाम सामने आने के बाद खुफिया एजेंसियां सतर्क हो गई हैं. इस एंगल से भी जांच को आगे बढ़ाया जा रहा है. संगठन से जुड़े कुछ पुराने लोगों की तलाश की जा रही है. सर्विलांस को बढ़ा दिया गया है.

देश में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों के पीछे पीएफआई की संलिप्तता के सबूत जांच एजेंसियों को मिले थे. वहीं, अब हाथरस घटना में एक बार फिर से पीएफआई का नाम सामने आ रहा है. खुफिया एजेंसियों के अनुसार हाथरस कांड के बहाने पीएफआई यूपी में जातीय संघर्ष खड़ा करने की साजिश रच रहा था. इसके लिए बकायदा ”जस्टिस फॉर हाथरस” नाम से वेबसाइट बनाई गई थी, जिसके माध्यम से लोगों को भड़काया जा रहा था. वेबसाइट को चंद दिनों में इस्लामिक देशों से करीब 100 करोड़ से ज्यादा की फंडिंग प्राप्त हुई थी. एजेंसियों की सतर्कता की वजह से पीएफआई का यह मकसद में सफल नहीं हो सका. मामले में पीएफआई और उससे संबंधित संगठन सीएफआई से जुड़े 4 सदस्यों को गिरफ्तार भी किया गया है. उनके खिलाफ मथुरा के मांट थाने में मुकदमा दर्ज हुआ है. सीजेएम कोर्ट ने हाथरस घटना के बहाने दंगों की साजिश रचने के आरोप में चारों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा है.

पीएफआई यानि पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया चरमपंथी इस्लामिक संगठन है. संगठन का गठन वर्ष 2006 में हुआ था, इसकी शुरुआत केरल में हुई थी.

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October 12th 2020, 12:44 pm

दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज में भी वैदिक गणित कोर्स

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नई दिल्ली. दिल्ली विश्वविद्यालय का लक्ष्मीबाई कॉलेज शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के साथ वैदिक गणित का प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम संचालित करने जा रहा है. न्यास के संजय स्वामी की उपस्थिति में कॉलेज प्राचार्य डॉ. प्रत्युष वत्सला ने न्यास के साथ अनुबंध कर यह सर्टिफ़िकेट कोर्स आरम्भ कर दिया है. संजय स्वामी ने कहा कि हमारे देश में वर्तमान समय में गणित को एक कठिन विषय समझा जाता है, सामान्य रूप से गणित का भय हमारे विद्यार्थियों में देखा जा सकता है. जबकि भारत की सम्पदा कही जाने वाली पद्धति वैदिक गणित से विद्यार्थी कठिन प्रश्न का हल पलक झपकते ही कर सकते हैं.

इस अवसर पर उपस्थित वैदिक गणित के राष्ट्रीय सह संयोजक  राकेश भाटिया एवं दिल्ली प्रांत के वैदिक गणित के सह संयोजक अनिल ठाकुर ने बताया कि जो भी विद्यार्थी  6 माह के सर्टिफ़िकेट कोर्स में प्रवेश लेना चाहते हैं, उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज से सम्पर्क कर प्रवेश मिल सकता है, इस कोर्स में लक्ष्मीबाई कॉलेज में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के अतिरिक्त अन्य कोई भी प्रवेश ले सकता है. उन्होंने बताया कि कोरोना की आपदा को अवसर में परिवर्तित करते हुए शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा इस अवधि में कक्षा 3 से लेकर 12वीं तक के 1.5 लाख से अधिक विद्यार्थियों को वैदिक गणित का ऑनलाइन नि:शुल्क प्रशिक्षण दिया गया, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है. वर्तमान में यह कक्षाएं नियमित रूप से हर रविवार सायं 5 बजे से शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास (@ShikshaSanskriti) के अधिकारिक फ़ेसबुक पेज से संचालित की जा रही हैं.

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास कई वर्षों से इस विषय पर कार्य कर रहा है, न्यास द्वारा वैदिक गणित का कक्षा पहली से बारहवीं तक का पाठ्यक्रम तथा सर्टिफ़िकेट व डिप्लोमा कोर्स का पाठ्यक्रम भी तैयार किया गया है, जो सैकड़ों विद्यालयों व 10 विश्वविद्यालयों में संचालित किया जा रहा है.

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October 12th 2020, 12:30 pm

रामचन्द्र खराडी अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के नये अध्यक्ष निर्वाचित

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नई दिल्ली. राजस्थान के प्रतापगढ़ निवासी रामचन्द्र खराडी जी को केन्द्रीय कार्यकारी मण्डल ने कल्याण आश्रम के तीसरे अध्यक्ष के रूप में चुना है. श्रद्धेय बाला साहब देशपाण्डे जी के निधन के बाद १९९५ से लेकर जगदेवराम उरांव जी ने सुदीर्घ २५ वर्ष कल्याण आश्रम का नेतृत्व किया. १५ जुलाई २०२० को जशपुर में जगदेवराम जी के निधन के पश्चात् यह पद रिक्त हुआ था.

रामचन्द्र खराडी जी का जन्म १५ जनवरी, १९५५ में राजस्थान के उदयपुर जिला के खरबर गाँव के भील जननाति परिवार में हुआ. उन्होंने स्नातक तक की पढ़ाई पूर्ण करके सरकारी सेवा में प्रवेश किया. तहसीलदार, सब डिविजनल मजिस्ट्रेट, अतिरिक्त जिला अधिकारी आदि सरकारी पदों में रहकर राजस्थान के विभिन्न जिलों में कार्य किया. भूमि संबंधी मामलों का निपटारा करने हेतु उन्होंने सरकारी पद पर रहकर काफी सराहनीय कार्य किया. इसके कारण सरकारी कामकाज के क्षेत्र में खराडी जी का नाम काफी चर्चित रहा.

२०१४ में सरकारी सेवा से स्वैच्छिक निवृत्ति लेकर धार्मिक एवं सामाजिक कार्य में सक्रिय भूमिका निभाते रहे. जनजाति समाज के परंपरागत धर्म संस्कृति की रक्षा के साथ साथ गायत्री परिवार के कार्य से भी १९९५ में उनका संपर्क आया. उनके नेतृत्व में १७ स्थानों पर गायत्री माता मंदिर निर्माण हुआ. १०८ कुण्डीय गायत्री महायज्ञ में यजमान की भी भूमिका उन्होंने निभाई थी. कई स्थानों पर सामूहिक विवाह कराने में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

उनका कल्याण आश्रम से संपर्क २००३ में डुंगरपुर कल्याण आश्रम के भवन निर्माण के समय में आया. २०१६ में राजस्थान के अध्यक्ष बने. २०१९ में दोबारा इस दायित्व के लिये चुने गये. गत दो वर्षों से वे कल्याण आश्रम के  राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में भी कार्यरत थे.

गत पांच वर्षों में कल्याण आश्रम के सभी अखिल भारतीय कार्यक्रम में उनका सान्निध्य देश भर के कार्यकर्ताओं को प्राप्त हुआ. देश भर के सभी प्रमुख कार्यकर्ताओं के साथ उनका अच्छा संपर्क भी स्थापित हो चुका है. विचारों में स्पष्टता के साथ प्रभावी वक्ता के रूप में भी उनका परिचय कार्यकर्ताओं के बीच में है.

२०१७ का संत ईश्वर सेवा पुरस्कार खराडी जी को प्राप्त हुआ था. पूजनीय बालासाहब देशपाण्डे जी और श्रद्धेय जगदेवराम जी के पदचिन्हों पर चलकर कल्याण आश्रम कार्य को उत्तरोत्तर बढ़ाने का गुरुत्तर दायित्व रामचन्द्र खराडी पर आया है.

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October 12th 2020, 12:30 pm

विहिप ने पूछा, हिंदुओं की मॉब लिन्चिंग पर चुप्पी क्यों?

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नई दिल्ली. दिल्ली में पिछड़े वर्ग के एक गरीब ड्राइवर के लड़के राहुल कंडेला की कुछ कट्टरपंथियों द्वारा की गई बर्बर हत्या पर विश्व हिन्दू परिषद ने चिंता व्यक्त करते हुए पूछा कि क्या इस 19 वर्षीय गरीब युवक की एक मुस्लिम युवती से दोस्ती होना ही उसका अपराध बन गया था, जिसकी सजा जिहादी तत्वों ने उसकी मॉब लिंचिंग करके दी. विहिप के केन्द्रीय संयुक्त महामंत्री डॉ सुरेन्द्र जैन ने कहा कि संपूर्ण देश के लिए यह बहुत चिंता का विषय है कि जब भी किसी हिन्दू लड़के की किसी मुस्लिम लड़की से दोस्ती होती है तो वह लड़का मृत्युदंड प्राप्त करने का अपराधी बन जाता है. परंतु जब कोई मुस्लिम लड़का किसी हिन्दू लड़की से जबरन या धोखा देकर भी संबंध स्थापित करता है तो वह इनके लिए किसी अपराध की श्रेणी में नहीं आता है. हिन्दू युवक को अपराधी मानकर उसकी मॉब लिंचिंग कर देना किसी सभ्य समाज का लक्षण नहीं हो सकता.

उन्होंने कहा कि भारत में मुस्लिम समाज सबसे अधिक सुखी है. यह बहुसंख्यक हिन्दू समाज की सदाशयता और सहिष्णुता के कारण ही संभव हो सकता है. इसके बावजूद यह समझना पड़ेगा कि मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग हिन्दुओं के प्रति इतनी घृणा क्यों रखता है. छोटी मोटी बातों पर भी वह उसी हिन्दू की मॉब लिंचिंग कर देता है. पिछले चार-पांच सालों में ही जिहादियों द्वारा हिंदुओं की मॉब लिंचिंग की 73 से अधिक घटनाएं हो चुकी हैं. देश की राजधानी दिल्ली में ही पिछले 5 सालों में हिंदुओं की 9 से अधिक मॉब लिंचिंग की घटनाएं हो चुकी हैं.

उन्होंने कहा कि विहिप मुस्लिम समाज के नेताओं से आग्रह करती है कि वे अपने समाज के एक वर्ग की इस जिहादी मानसिकता को ठीक करें. अपने युवकों को जिहाद की जगह सह-अस्तित्व के मार्ग पर लाएं.

विश्व हिन्दू परिषद का मानना है कि इस कट्टरता व हिंसक घृणा को बढ़ावा देने के लिए कथित सेकुलर बिरादरी भी कम दोषी नहीं है. मुस्लिम समाज के किसी व्यक्ति के साथ हुई कुछ घटनाओं के लिए वे न केवल केंद्र सरकार को अपितु हिन्दू समाज व संपूर्ण देश को कटघरे में खड़ा कर देते हैं, परंतु राहुल जैसे पचासों युवकों की मॉब लिंचिंग पर उनके मुंह से संवेदना का एक शब्द भी नहीं निकलता. जब आईबी अधिकारी अंकित शर्मा को चाकू से गोद-गोद कर हत्या कर दी थी, तब भी इनके मुंह क्यों सिल गए थे? बलात्कार जैसा घृणित अपराध अक्षम्य है. परंतु इसमें भी हिन्दू मुस्लिम देखने का अपराध यह सेकुलर बिरादरी ही कर सकती है. हाथरस कांड में उनकी प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट हो गया है कि ये घटनाएं सेकुलर बिरादरी के लिए केवल अपने निहित स्वार्थ पूरे करने का साधन मात्र है और वे अपने आपराधिक कृत्य के लिए भारत विरोधी विदेशी शक्तियों की कठपुतली भी बन जाते हैं. भीम आर्मी जैसे दलित संगठनों की भूमिका से यह स्पष्ट हो चुका है कि वे भी अपने स्वार्थों के लिए दलित विरोधी व राष्ट्र विरोधी भूमिका का निर्वाह करने में कोई संकोच नहीं करते. राष्ट्रीय विचारधारा वाली चुनी गई सरकारों को अस्थिर करने के लिए वे हिन्दू समाज व देश को बदनाम करने का राष्ट्र विरोधी कृत्य कर रहे हैं. इसके लिए समाज उन्हें कभी क्षमा नहीं करेगा.

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October 12th 2020, 12:30 pm

असम – कृषि उत्पादों की बिक्री के लिए किसान रथ मोबाइल ऐप लॉन्च

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गुवाहाटी (विसंकें). किसानों की आय दोगुना करने को लेकर केंद्र सरकार के साथ ही राज्य सरकारों ने भी कदम उठाना शुरू कर दिया है. किसानों सम्मान निधि, किसान रेल, हाल ही में पारित कृषि विधेयक किसानों के हित में उठाए गए कदम हैं.

असम में क्रेता-विक्रेता नेटवर्क को बढ़ावा देकर कृषि उत्पादों की समय पर बिक्री की सुविधा के लिए किसान रथ (फल और सब्जियां) मोबाइल ऐप लॉन्च किया गया है. असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने एक कार्यक्रम में मोबाइल ऐप लॉन्च किया.

राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र द्वारा विकसित, डिज़ाइन और तकनीकी रूप से बनाए ऐप को असम एग्रीबिजनेस एंड रूरल ट्रांसफॉर्मेशन (APART) परियोजना द्वारा लागू किया जाएगा,  ऐप का उपयोग करने के संबंध में किसानों और अन्य हितधारकों को प्रशिक्षण प्रदान करेगा. आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, ऐप को असमिया, हिंदी और अंग्रेजी में चलाया जा सकता है.

मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा कि ऐप असम के किसानों के लिए देश भर में बाजार खोलकर उनकी उपज का अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए कृषि-व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए एक नया माध्यम होगा. ऐप किसानों को आज के प्रतिस्पर्धी बाजार में दृढ़ता से उभरने में मदद करेगा और नाशपाती फल और सब्जी के उत्पादकों के लिए एक वरदान के रूप में साबित होगा क्योंकि यह उनकी उपज के अपव्यय में मौलिक कमी लाएगा.

किसानों की आय को दोगुना करने के लिए केंद्र सरकार की योजनाओं जैसे पीएम किसान सम्मान निधि, कृषि सिंचाई योजना, फसल बीमा योजना, केसीसी ने देश में कृषि पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत किया है और कृषि को एक गरिमामयी कॉलिंग बनाया है. कृषि, बागवानी और खाद्य प्रसंस्करण मंत्री अतुल बोरा ने कहा कि कोरोना वायरस प्रेरित देशव्यापी तालाबंदी के दौरान किसानों को भारी कठिनाई का सामना करना पड़ा और भारी नुकसान उठाना पड़ा. हालांकि, पहले 70 दिनों के बंद के दौरान, असम के किसानों ने असम के भीतर और 357 करोड़ रुपये के बाहर की सब्जियां बेचीं और 5000 से अधिक किसानों ने सीधे विक्रेताओं के रूप में काम किया, जिससे राज्य में नए किसानों के बाजारों को उभरने में मदद मिली.

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October 11th 2020, 4:10 pm

हाथरस घटना – भ्रम फैलाने को पाकिस्तान, मध्य एशिया से भी फर्जी ट्वीट हुए

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फोटो – उत्तरप्रदेश पुलिस

लखनऊ (विसंकें). हाथरस घटना की आड़ में समाज में संघर्ष पैदा करने के लिए न केवल भारत में, बल्कि भारत से बाहर भी षड्यंत्र रचे जा रहे थे. सोशळ मीडिया पर फर्जी ट्वीट्स की जांच कर रही पुलिस के हाथ अहम सुराग लगे हैं. जांच में पता चला है कि हाथरस घटना को लेकर भ्रम फैलाने के लिए पाकिस्तान और मध्य एशिया के ट्विटर हैंडल से भी ट्वीट किए गए. यह जानकारी सामने आने के पश्चात एजेंसियां गहनता से जांच में जुट गई हैं. सोशल मीडिया पर हाथरस कांड को लेकर भ्रम फैलाने के मामले में पीएफआई की संलिप्तता का पहले ही खुलासा हो चुका है.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार जांच एजेंसियों का दावा है कि सरकार को बदनाम करने के लिए सोशल मीडिया पर बड़ी साजिश रची गई थी. घटना को जातीय हिंसा का रंग देने के लिए सोशल मीडिया के माध्यम से कई झूठे तथ्य प्रचारित किए गए. सरकार को निशाना बनाते हुए बड़ी संख्या में पाकिस्तान और मध्य एशिया के देशों से ट्वीट कराए गए. पुलिस और जांच एजेंसियां अब पता लगाने में जुटी हैं कि क्या इसके पीछे भारत में सक्रिय किसी संगठन की साजिश तो नहीं थी.

एजेंसियां सक्रिय हुईं तो फर्जी अकाउंट व ट्वीट डिलीट हुए

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सुरक्षा एजेंसियों की जांच में सामने आया है कि सरकार को बदनाम करने तथा समाज में संघर्ष पैदा करने के उद्देश्य से रची गई साजिश के लिए बाकायदा फंडिंग की गई है. हाथरस के चंदपा थाने में गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज होने के बाद सुरक्षा एजेंसियां सक्रिय हुईं तो बड़ी संख्या में फर्जी अकाउंट्स (सोशल मीडिया) बंद हो गए और नफरत फैलाने वाले झूठे ट्वीट हटा दिए गए. ये ट्वीट देश के अन्य राज्यों के साथ-साथ बाहरी देशों से भी किए गए थे. सोशल मीडिया पर यह प्रचारित किया गया था कि लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ है, उसकी जीभ काट ली गई है और हाथ-पैर तोड़ दिए गए हैं. इसमें से कई तथ्य अभी तक की जांच में गलत पाए जा चुके हैं. हालांकि मामले की जांच अब सीबीआई ने अपने हाथ में ले ली है.

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October 11th 2020, 4:10 pm

पहली छमाही में 43.4 प्रतिशत बढ़कर 53,626 करोड़ रुपये पर पहुंचा कृषु कमॉडिटी निर्यात

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नई दिल्ली. कोरोना संकट के बावजूद देश में उद्योग व कृषि जगत से उत्साहवर्धक आंकड़े सामने आ रहे हैं. जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि कोरोना संकट से उबरने का क्रम शुरू हो गया है. दो अक्तूबर को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 3.618 अरब डॉलर बढ़कर 545.638 अरब डॉलर की सर्वकालिक रिकॉर्ड ऊंचाई को छू गया. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के शुक्रवार को इस संबंध में आंकड़े जारी किए थे.

इसी क्रम में कोरोना संकट के बावजूद कृषि कमॉडिटी का निर्यात कारोबारी साल की पहली छमाही (अप्रैल-सितंबर) में साल-दर-साल आधार पर 43.4 फीसदी बढ़कर 53,626.6 करोड़ रुपये पर पहुंच गया. केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने शनिवार को इसकी जानकारी दी. गत कारोबारी साल की समान अवधि में भारत से 37,397.3 करोड़ रुपए के कृषि कमॉडिटी का निर्यात हुआ था.

सितंबर 2020 में एग्री एक्सपोर्ट्स 81.7 फीसदी बढ़कर 9,296 करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो सितंबर 2019 में 5,114 करोड़ रुपये पर था. मंत्रालय ने जानकारी दी कि अप्रैल-सितंबर 2020 छमाही में 9,002 करोड़ रुपये का व्यापार आधिक्य (ट्रेड सरप्लस) दर्ज किया गया, जबकि एक साल पहले की समान छमाही में 2,133 करोड़ रुपये का व्यापार घाटा (ट्रेड डेफिसिट) हुआ था.

पहली छमाही में साल-दर-साल आधार पर ज्यादा निर्यात दर्ज करने वाले कमॉडिटीज –

मूंगफली : 35%, रिफाइंड शुगर : 104%, गेहूं : 206%, बासमती चावल : 13%, गैर-बासमती चावल : 105%

एग्री एक्सपोर्ट्स बढ़ाने के लिए सरकार ने एग्रीकल्चर एक्सपोर्ट पॉलिसी बनाई

एग्री एक्सपोर्ट्स बढ़ाने के लिए सरकार ने एग्रीकल्चर एक्सपोर्ट पॉलिसी-2018 घोषित की है. अन्य बातों के अलावा इसमें फल, सब्जियों, मसालों, आदि जैसे निर्यातोन्मुख कैश क्रॉप्स के लिए क्लस्टर आधारित तरीके का प्रावधान किया गया है. इसके तहत देशभर में विशेष फसलों के लिए क्लस्टर की पहचान की जाती है और इनमें विशेष फोकस के साथ काम किया जाता है.

सरकार ने एग्रीकल्चर व हॉर्टीकल्चर प्रॉडक्ट्स का निर्यात बढ़ाने के लिए एग्री एक्सपोर्ट प्रमोशन संगठन एपेडा (एपीईडीए) के तहत 8 एक्सपोर्ट प्रमोशन फोरम (ईपीएफ) भी बनाए है. ये ईपीएफ केला, अंगूर, आम, अनार, प्याज, डेयरी, बासमती चावल और गैर-बासमती चावल के लिए बनाए गए.

मंत्रालय ने कहा कि सरकार ने 1 लाख करोड़ रुपये के एग्री-इंफ्रा फंड की भी घोषणा की है. मंत्रालय ने एग्री एक्सपोर्ट बढ़ाने के लिए एक व्यापक कार्ययोजना भी तैयार की है. इसमें वैल्यू एडीशन पर जोर दिया गया है. साथ ही इंपोर्ट सब्स्टीट्यूशन के लिए भी एक विस्तृत कार्ययोजना बनाई गई है.

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October 11th 2020, 4:10 pm

पूर्वांचल के किसान भी ‘किसान रेल’ सुविधा से जुड़ेंगे

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कृषकों के उत्पादों को जल्द बाजार तक पहुंचाने के उद्देश्य से तथा इसके माध्यम से किसानों की आमदनी को दोगुना करने के लक्ष्य के साथ रेलवे ने किसान रेल शरू की है. देश के कुछ हिस्सों में विशेष ट्रेनों का संचालन कर दूध और सब्जियों को लोकल मंडियों से देश के स्थापित बाजारों तक भेजने के लिए किया जा रहा है. इसके विस्तार के क्रम में रेलवे पूर्वांचल के जिलों से किसान रेल संचालित करने की योजना पर काम कर रही है.

किसान रेल योजना को पूर्वांचल के जिलों में क्रियान्वित करने का शुभारंभ बलिया और आसपास के क्षेत्र से करने की तैयारी है. बलिया और आसपास के जिलों में सब्जियों की पैदावार बहुतायत में होती है. सब्जियों के उत्पादक औने-पौने दाम पर लोकल बाजारों में फल सब्जियों को बेच देते हैं. क्षेत्र में होने वाले कृषि उत्पादन को ध्यान में रख कर, रेलवे कृषि उत्पादों को सुरक्षित, भरोसेमंद तरीके से यातायात सुविधा उपलब्ध करवाने के लिए किसान रेल संचालित करने जा रही है. सुविधा से किसान अपनी उपज को देश की बड़ी मंडियों तक भेजकर मुनाफा कमा सकते हैं.

रेलवे ने साल 2024 तक माल ढुलाई को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है. पूर्वोत्तर रेलवे ने सितंबर माह में रिकॉर्ड लोडिंग कर वर्ष 2019 सितंबर माह की तुलना में 80 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है. इसके लिए बिज़नेस डेवलपमेंट यूनिट गठित की गई है. इस यूनिट से मिले सुझावों के आधार पर वाराणसी मंडल ने भी बलिया रेलवे स्टेशन से ‘किसान रेल’ चलाने की योजना बनाई है. इसके लिए यूनिट लगातार किसानों और व्यापारियों के संपर्क में है.

रेल माल ढुलाई में 30 फ़ीसदी तक रियायत भी दे रही है, जिससे ज्यादा से ज्यादा किसानों को योजना से जोड़ा जा सके. किसान स्पेशल ट्रेन चलाने की मांग और महत्वपूर्ण सुझाव देने के लिए किसान और कृषि व्यवसाय से जुड़े लोगों से वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक संजीव शर्मा ने सुझाव मांगा है.

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October 11th 2020, 4:10 pm

दूध स्पेशल – किसान रेल के पश्चात दूध स्पेशल दुग्ध उत्पादकों के लिए वरदान, प्रतिदिन आंध्रप्रदेश से दि

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नई दिल्ली. किसानों की आर्थिकी को मजबूत करने की दृष्टि से भारतीय रेलवे द्वारा प्रारंभ की गई किसान रेल अहम भूमिका निभा रही है. किसान स्पेशल ट्रेन देशभर में विक्रेता और ग्राहक को नजदीक लाने में मददगार बन रही है. कोरोना संकट के चलते लॉकडाउन के दौरान सुदूर क्षेत्रों में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के साथ-साथ विभिन्न राज्यों से फलों व सब्जियों की ढुलाई कर रही रेलवे ने दिल्ली को अब तक तीन करोड़ लीटर दूध भी उपलब्ध करवाया है.

दूध दूरंतो ट्रेन (दूध स्पेशल) दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों के लिए कामधेनु बनकर उभर रही है, ट्रेन के माध्यम से दिल्ली में प्रतिदिन ढाई लाख लीटर दूध पहुंच रहा है.

लॉकडाउन के दौरान राष्ट्रीय राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में दूध की आपूर्ति बनाए रखने का दायित्व भारतीय रेलवे ने बखूबी निभाया. उत्तरी क्षेत्र में दूध की मांग को पूरा करने में दक्षिणी राज्यों की भूमिका अहम रही, जिसमें सेतु का काम नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड ने (एनडीडीबी) किया. यह सिलसिला अब भी जारी है, जिससे रोजाना ढाई लाख लाख लीटर से अधिक की आपूर्ति दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर पहुंच रही है. एनडीडीबी के आंकड़ों के अनुसार दूध दूरंतो ट्रेन से अब तक तीन करोड़ लीटर से अधिक दूध दिल्ली पहुंचाया जा चुका है.

दूध दूरंतो स्पेशल ट्रेन आंध्रप्रदेश के रेनिगुंटा रेलवे जंक्शन से हजरत निजामुद्दीन के बीच 2,300 किमी की दूरी 36 घंटे में पूरी करती है. इसकी शुरुआत 26 मार्च से सप्ताह में एक या दो दिन के लिए हुई थी. लेकिन डेयरी से जुड़े लोगों में इसकी लोकप्रियता का आलम यह है कि अब यह ट्रेन 15 जुलाई से प्रतिदिन चलाई जा रही है. रेलवे के अनुसार दूध दूरंतो स्पेशल में सामान्य रूप से दूध से भरे छह टैंकर लगाए जाते हैं. प्रत्येक टैंकर में 40 हजार लीटर से अधिक दूध होता है. दूध दूरंतो स्पेशल के अब तक कुल 126 फेरे लग चुके है.

भारतीय रेलवे के अनुसार दूध दूरंतो ट्रेन के साथ अन्य पार्सल वैन के माध्यम से कुछ और कच्ची जिंसों की आपूर्ति भी की जा रही है. इन दूरंतो ट्रेनों में अतिरिक्त पार्सल वैन भी लगाए जा रहे हैं. रेलवे अब पूरी तरह व्यावयायिक संस्था के रूप में काम कर रहा है. मांग आने पर देश के दूसरे हिस्से से अन्य जिंसों की आपूर्ति भी शुरू की जाएगी. किसान ट्रेनों का प्रयोग बहुत सफल साबित हुआ है, जिसका लगातार विस्तार किया जाएगा. इस ट्रेन के संचालन से रेलवे को भाड़े के रूप में तकरीबन 15 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ है.

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October 11th 2020, 4:10 pm

नानाजी जयंती – ‘तम्बाकू मुक्त समाज की शपथ’ और ‘सामूहिक श्रम साधना’ के साथ “ग्रामोदय पखवाड़ा” का समाप

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चित्रकूट. भारत में समय-समय पर अनेक महापुरूषों ने जन्म लेकर समाज को दिशा देने के साथ ‘जागरूकता‘ का वातावरण निर्मित किया है. एकात्म मानवदर्शन के चिन्तक पं. दीनदयाल उपाध्याय एवं राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख का नाम भी इसी श्रृंखला में आता है. दोनों महापुरुषों के जन्मदिवस पर दीनदयाल शोध संस्थान में 25 सितंबर से 11 अक्तूबर तक “ग्रामोदय पखवाड़ा” का आयोजन किया गया.

दीनदयाल शोध संस्थान के जन शिक्षण संस्थान चित्रकूट ने खादी ग्रामोद्योग आयोग एवं EFFICOR और ग्राम सहयोगी कार्यकर्ताओं के सामूहिक प्रयासों से ग्राम पंचायत किहुनिया, चुरू केशरुआ, सेमरिया, बनाडी, नारायणपुर, केकरामार, हाटा, उमरी और भभई में स्वयं सहायता समूह की बहनों के लिए क्षमता संवर्धन, स्वच्छता, सामूहिक श्रमसाधना, कोरोना वायरस से बचाव और पहचान तथा समूह को स्वावलंबी बनाने के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा बैंक के सहयोग पर चर्चा की.

साथ ही तम्बाकू मुक्त समाज तथा कोरोना वायरस से बचाव के लिए सामूहिक शपथ भी ली गई. इफीकोर के अतुल डेनियल ने बहनों को शपथ दिलायी और जन शिक्षण संस्थान के अनिल सिंह ने उमरी में कोरोना वायरस से बचाव और जनजागरण अभियान की शपथ दिलाई. उद्यमिता विद्यापीठ के संयोजक मनोज सैनी ने स्वयं सहायता समूह को स्वावलंबी कैसे बनाएं, बैंक के सहयोग के बारे में जानकारी दी. जिसमें ३५ स्वयं सहायता समूहों की ३८५ बहनों ने भाग लिया.

जन शिक्षण संस्थान के कार्यकारी निदेशक राजेंद्र सिंह ने व्यावसायिक प्रशिक्षण और संस्थान की गतिविधियों के बारे में जानकारी दी. दीनदयाल शोध संस्थान के सचिव डॉ. अशोक पाण्डेय ने स्वच्छता और सामूहिक श्रम साधना के महत्त्व के बारे में जानकारी दी. समाजशिल्पी दंपत्ति कार्यकर्ताओं ने सामूहिक प्रयासों से गांव-गांव में पेयजल स्रोत, श्रद्धास्थल और सामुदायिक भवनों को स्वच्छ किया.

स्वावलम्बन केन्द्रों पर आरोग्यधाम के वैद्य राजेन्द्र पटेल ने औषधीय पौधों की उपयोगिता एवं महत्व के बारे में विस्तृत जानकारी दी. दीनदयाल शोध संस्थान के उप महाप्रबंधक डॉ. अनिल जायसवाल ने बताया कि पिछले 17 दिनों से पखवाड़े के अंतर्गत डीआरआई के सभी प्रकल्पों के माध्यम से ग्रामों तक स्वच्छता, नशामुक्ति, जल संरक्षण, पर्यावरण आदि विभिन्न विषयों पर जन जागरुकता के लिए प्रतियोगिताओं सहित स्वास्थ्य गोष्ठियों और कृषक गोष्ठियों का आयोजन किया गया.

“सेवा और समर्पण” की प्रतिमूर्ति राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख

नानाजी का जन्म महाराष्ट्र के परभणी जिले में 11 अक्तूबर, 1916 को हुआ था. ‘मैं अपने लिए नहीं, अपनों के लिए हूं‘, इस ध्येय वाक्य पर चलते हुए उन्होंने देश के कई ऐसे गांवों की तस्वीर बदल दी, जो विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर थे. नानाजी ने अपनी कर्मभूमि भगवान राम की तपोभूमि चित्रकूट को बनाया. बातचीत में वे अक्सर कहा करते थे कि जब अपने वनगमन के दौरान भगवान राम चित्रकूट में आदिवासियों तथा दलितों के उत्थान का कार्य कर सकते हैं तो हम प्रयास क्यों नहीं करते. इसलिए नानाजी जब पहली बार चित्रकूट आए तो फिर यहीं बस गए. उन्होंने चित्रकूट में सबसे पहले कृषि और शिक्षा के माध्यम से बदलाव की पहल की, ग्रामोदय विश्वविद्यालय उनकी अनुपम कृति में से एक है.

नानाजी ने चित्रकूट के उत्थान में कई कार्य किए. उन्होंने कृषि, शिक्षा, अनुसंधान, रोजगार, स्वास्थ और स्वावलम्बी बनाने के लिए ग्रामीण क्षेत्र में बहुत बड़ा कार्य किया है. दीनदयाल शोध संस्थान की अवधारणा उनमें से एक है. यह लोगों के समग्र विकास के उद्देश्य के साथ स्थापित किया गया है ताकि उन्हें आत्मनिर्भर और आश्वस्त किया जा सके, जिससे वे अपने अर्जित कौशल के माध्यम से अपनी आजीविका उत्पन्न कर सकें.

साथ ही नानाजी ने ग्रामोदय के सपने को साकार करने के लिए कृषि विज्ञान केन्द्रों की स्थापना की. जिससे यहां कृषि के क्षेत्र में किसानों की आजीविका को सुदृढ़ किया जा सके. चित्रकूट में आजीवन स्वास्थ्य संवर्धन प्रकल्प आरोग्यधाम, उद्यमिता विद्यापीठ, गुरुकुल संकुल, गौशाला, रसशाला, जन शिक्षण संस्थान एवं शैक्षणिक प्रकल्प शामिल हैं.

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October 11th 2020, 10:53 am

सूरज की किरण बनकर पहुंचे संघ के स्वयंसेवक

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विजयलक्ष्मी सिंह

नई दिल्ली.

चमचमाती रेत के टीले कितने खूबसूरत दिखाई देते हैं, पर यही विशालकाय टीले पानी के बहाव से बहकर यदि घरों में घुस जाएं तो पलभर में सब कुछ तहस-नहस हो जाता है. 14 अगस्त, 2020 की सुबह 10 बजे जयपुर की कच्ची बस्ती गणेशपुरी में बारिश ने तबाही की ऐसी कहानी लिखी कि तिनका-तिनका कर बनाए घरौंदे चंद ही मिनटों में टनों मिट्टी के नीचे दब गए.

स्थिति ऐसी बनी कि क्या कपड़े, क्या बर्तन, क्या चूल्हा, स्कूल के बस्ते यहां तक कि घर के दरवाजे पर खड़े ई-रिक्शा व ऑटो सभी मिट्टी के नीचे दब गए. चारों ओर चीख-पुकार मची थी. तलहटी में बसी तीन मलीन बस्तियों के एक सौ पचास परिवारों की दुनिया चंद मिनटों में ही उजड़ गई थी. घुप अंधेरे में बेबस बैठे घर में घुस आई छह फीट मिट्टी के कारण भूखे प्यासे रोते बिलखते लोगों के पास सूरज की किरण के समान पहुंचे संघ के स्वयंसेवक. पहली जरूरत भोजन की थी, क्योंकि सभी के घरों का राशन व खाना बनाने के बर्तन सब कुछ मिट्टी में दबा हुआ था. सबसे पहले इन लोगों को समझा बुझाकर सुरक्षित बाहर निकालने के बाद इनके खाने की व्यवस्था की गई. जयपुर नगर की प्रौढ़ शाखा के कार्यवाह व इस राहत कार्य की संचालन व्यवस्था संभालने वाले राजकुमार गुप्ता बताते हैं – सायं 3.30 बजे स्वयंसेवकों को इस विनाश की सूचना मिली व रात्रि 8 बजे तक नगर के संघ परिवारों से 2800 भोजन पैकेट वहां पहुंच चुके थे. टार्च की रोशनी में भोजन बांटते हुए इन बेबस परिवारों की रो- रोकर थक चुकी आंखों को देखकर सभी का मन खिन्न हो गया था. बस्ती से दो किलोमीटर दूर बसे सामुदायिक भवन में बस्ती वासियों के सोने की व्यवस्था कर देर रात्रि भारी मन से घरों को लौट रहे स्वयंसेवकों ने इन्हें हर मुश्किल से निकालने का संकल्प लिया.

इस विनाश लीला की शुरूआत 14 अगस्त, 2020 की सुबह हुई. गुलाबी नगरी जयपुर में इंद्र देवता इतना बरसे कि समूचा शहर तालाब बन गया. गाड़ियां खिलौनों की तरह पानी में तैरने लगीं. सबसे अधिक प्रभाव निचले स्थानों पर बसी बस्तियों पर पड़ा. तलहटी में बसी गणेशपुरी के पीछे की ओर बने एनीकट (छोटे बांध) की दीवार पानी के इस दबाव को झेल नहीं पाई व बांध का पानी पास बने बालू के दो विशालकाय टीलों को बहाते हुए इन तीन कच्ची बस्तियों में प्रवेश कर गया. प्रशासन ने तो जेसीबी से मिट्टी निकाल कर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली. किंतु संघ के स्वयंसेवक आठ दिन हालात सामान्य होने तक वहीं डटे रहे. नजदीक के लाल डूंगरी गणेश मंदिर में अस्थाई रसोईघर बनाकर, पहले बस्ती वालों के खाने पीने की व्यवस्था की गई. संघ दृष्टि से ऋषिगालव नगर के सामाजिक समरसता सह प्रमुख मनोज जैन ने कहा – “स्वयंसेवक यहीं नहीं रुके, कुछ ने कुदाली व फावड़े लेकर बस्ती वालों के साथ घरों से मिट्टी निकालने व उनके कपड़े एवं बर्तन सुखाने का कार्य भी शुरू कर दिया. कपड़े इतने ज्यादा खराब हो चुके थे कि नगर से संग्रहित कर कई जोड़ी कपड़े व जरूरत के कुछ बर्तन भी गणेशपुरी वासियों को दिए गए. “इतना ही नहीं अगले दस दिन का भोजन जुट सके, ऐसे 150 सूखे राशन किट भी इन्हें बांटे गए.

आठ दिन तक चली इस कवायद में मिट्टी घर से निकल चुकी थी. सामान सूख चुके थे व लोगों का जीवन धीरे-धीरे पटरी पर लौट आया था. तब जाकर उनकी सुध लेने पहुंचे कुछ राजनैतिक लोगों से मिल रहे भोजन के पैकेट अस्वीकार कर बस्ती के लोगों ने उन्हें साफ शब्दों में कहा – “आप ये दिखावा न करें. हमें जब सबसे अधिक जरूरत थी, तब इन खाकी निकर वाले लोगों ने हमारी हर तकलीफ को दूर किया.”

नियति व मानव के बीच जंग आज भी जारी है. जहां कहीं प्रकृति कहर ढहाती है, वहां मानवता विनाश के इन खंडहरों में आस्था के फूल ऊगाती है. और यही काम देशभर में कर रहे हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक.

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October 11th 2020, 10:21 am

राहुल हत्याकांड – लिबरल सेकुलर गैंग ने राहुल की हत्या पर भी पूर्ववत चुप्पी साधी

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नई दिल्ली. राजधानी के आदर्श नगर क्षेत्र में बुधवार रात को 18 साल के राहुल राजपूत की पीट-पीटकर हत्‍या कर दी गई. और आशा के अनुसार सेकुलर-लिबरल ब्रिगेड पूर्ववत चुप्पी साधे है, ये गैंग सड़कों पर नहीं उतरा. दिल्ली में ही अंकित सक्सेना की हत्या के दौरान भी यही चुप्पी देखने को मिली थी. ऐसे ही जून माह में एकतरफा प्यार में टिकटॉक स्टार शाहरुख ने सरेबाजार नैना की हत्या कर दी थी, उस समय भी मौन व्याप्त रहा. लेकिन, चोर की पिटाई पर लिबरल ब्रिगेड ने खूब हो हल्ला किया था.

दिल्ली पुलिस के अनुसार, तिल्ली (Spleen) फटने से राहुल की मौत हुई. बुधवार शाम को लड़की के कुछ रिश्‍तेदार राहुल से मिले थे. फिर उसके ऊपर लाठी-डंडों से हमला कर दिया. राहुल को बेहोशी की हालत में अस्‍पताल ले जाया गया, जहां उसने दम तोड़ दिया. आरोपी दूसरे धर्म के थे, इसलिए क्षेत्र में में अतिरिक्‍त पुलिस बल लगाया गया है.

राहुल की पास में रहने वाली एक लड़की से दोस्‍ती थी. धर्म अलग होने के कारण लड़की के घरवालों को यह बिल्‍कुल पसंद नहीं था. पुलिस के अनुसार, जिन लोगों ने राहुल पर हमला किया, उनमें लड़की का भाई मोहम्‍मद राज (20), एक रिश्‍तेदार मानवर हुसैन (20) और उसके तीन नाबालिग दोस्‍त शामिल हैं. तीनों फिलहाल पुलिस की हिरासत में हैं.

नौजवान बेटा गंवाने वाले संजय कहते हैं, “अगर उस लड़की के परिवार को कोई दिक्‍कत थी तो मेरा बेटा नौजवान था. उसे थप्‍पड़ मार लेते या हमें बताते. लेकिन उसे मारने से क्‍या होगा. मैं बस ये चाहता हूं कि जिन लोगों ने मेरे बेटे को मारा, वो जेल से कभी रिहा न हों.’ लड़की का परिवार कुछ गली दूर रहता है. सूत्रों के अनुसार, लड़की ने ही आरोपियों की पहचान में पुलिस की सहायता की.

पुलिस के अनुसार, राहुल राजपूत परिवार सहित मूलचंद कॉलोनी में रहता था. परिवार में पिता संजय, मां रेणुका और छोटी बहन है. पिता संजय रोहिणी सेक्टर-18 में टैक्सी स्टैंड चलाते हैं. राहुल सेकंड ईयर की पढ़ाई कर रहा था. साथ ही अंग्रेजी की ट्यूशन दिया करता था. बुधवार की रात को राहुल के चाचा के लड़के गोलू के पास अनजान नंबर से फोन आया था. राहुल को कहा था कि उसे अपने बच्चे को ट्यूशन पढ़ाना है. वह बाहर आ जाए. राहुल बिना किसी को बताए गली के बाहर आ गया. आरोप है कि एक दर्जन से अधिक आरोपियों ने राहुल की पीट-पीटकर हत्या कर दी. उसके कपड़े भी फाड़ दिए.

गोलू ने फोन किया तो घटना का पता चला. राहुल ने अपनी मां को बताया कि उनको पीटा गया है. घर वाले हालात बिगड़ने पर बाबू जगजीवन राम अस्पताल में ले गए. डॉक्टरों ने राहुल को उपचार के दौरान मृत घोषित कर दिया. इसके बाद राहुल के चाचा धर्मपाल के बयान पर पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज किया. गोलू का मोबाइल फोन कब्जे में लेकर अनजान फोन नंबर से आई कॉल को ट्रेस किया गया. इसके आधार पर जहांगीरपुरी में रहने वाले सभी आरोपियों को पकड़ लिया.

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October 11th 2020, 10:21 am

जेपी और नानाजी – लोकनीति को राजनीति से ऊपर रखा

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जयराम शुक्ल

अक्तूबर का महीना बड़े महत्व का है. पावन, मनभावन और आराधन का. भगवान मुहूर्त देखकर ही विभूतियों को धरती पर भेजता है. 02 अक्तूबर को गांधी जी, शास्त्री जी की जयंती थी. 11 अक्तूबर को जयप्रकाश नारायण और नानाजी देशमुख की जयंती है, अगले दिन ही डॉ. राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि.

इन सबके बीच ही परस्पर साम्य है. गांधी मानवता के वांगमय हैं तो शास्त्री उसके लघु संस्करण. जेपी ल़ोकनायक हैं तो नानाजी राष्ट्रऋषि और डॉ. लोहिया समाजवाद के जीवंत स्वरूप, अनुयायियों के लिए देशप्राण. पांचों का जीवन खुली किताब, लोक के लिए समर्पित.

शास्त्रीजी को छोड़कर बाकी सभी सत्ता से वीतरागी रहे. शास्त्री जी ने तो विदेहराज जनक की तरह सत्ता का संचालन किया. कमल के पत्ते में पानी की बूंद की तरह निर्मल, निश्छल, निस्पृह. भगवान इन विभूतियों को न भेजता तो भारतवर्ष में लोक आदर्श के प्रतिमान कौन गढ़ता. समाज के उच्च आदर्शों का पैमाना पीढ़ियों को पथ से विचलन से बचाता है. इस एक महीने में देवी-देवताओं के आराधन के साथ इन लौकिक विभूतियों का स्मरण भी उतना ही आवश्यक है.

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा – जो पीढ़ी अपने पुरखों के आदर्श को भुला देती है, वह रुग्ण होकर अपना अंधकारमय भविष्य गढ़ती है. पर्व संस्कृति इसीलिये रची गई है, जिससे हर क्षण न सही ऐसी विभूतियों के जीवन व मरण के दिन उनके कर्तृत्व व व्यक्तित्व का स्मरण कर लिया जाए.

08 अक्तूबर जेपी के महाप्रयाण का भी दिन रहता है. जेपी ने आजादी की लड़ाई तो योद्घा की भाँति लड़ी. पर देसी गुलामी के खिलाफ लड़ते हुए खुद को होम दिया. वैचारिक पृष्ठभूमि अलग-अलग होते हुए भी जेपी और नाना जी के बीच दुर्लभ साम्य था.

जेपी विज़नरी थे, नानाजी मिशनरी. दोनों ने ही लोकनीति को राजनीति से ऊपर रखा. जेपी संपूर्ण क्रांति के उद्घोषक थे तो नानाजी इसके प्रचारक. दोनों एक दूसरे के लिए अपरिहार्य थे. सन् 74 के पटना आंदोलन में जब पुलिस की लाठी जेपी पर उठी तो उसे नानाजी झेल गए. वही लाठी फिर इंदिरा गांधी के निरंकुश शासन से मुक्ति की वजह बनी.

नानाजी भारतीय राजनीति के पहले सोशल इंजीनियर थे. भारतीय जनसंघ को विपक्ष की राजनीति में जो सर्वस्वीकार्यता मिली उसके पीछे नानाजी के भीतर चौबीस घंटे जाग्रत रहने वाले कुशल संगठक की ही भूमिका थी.

1960 के बाद के घटनाक्रम देखें तो लगता है कि नानाजी और जेपी का मिलन ईश्वरीय आदेश ही था. अब इन दोनों को अलग-अलग व्यक्तित्व के रूप में परखें तो भी इनका ओर-छोर एक दूसरे से उलझा हुआ मिलेगा. ये दोनों रेल की समानांतर पटरियां जैसे नहीं, अपितु पटरी और रेलगाड़ी के बीच जो रिश्ता होता है वे थे. जेपी और नानाजी में पटरी और गाड़ी की भूमिका की अदला बदली जेपी के जीवन पर्यंत चलती रही.

स्वतंत्रता संग्राम में गांधी, नेहरू, पटेल के बाद जेपी सबसे ओजस्वी, तेजस्वी योद्धाओं के हरावल दस्ते थे. उनके इस दस्ते में डॉ. राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेन्द्र देव, जेबी कृपलानी जैसे प्रखर और उद्भट लोग थे. ये तब भी आजादी की लड़ाई को अंग्रेजों से मुक्ति भर का मिशन नहीं मानते थे, बल्कि लोकजागरण भी उतना ही अभीष्ट मानते थे.

जब इन्हें ऐसा लगा कि कांग्रेस की मुख्यधारा का आंदोलन अंग्रेजों से येनकेन प्रकारेण सत्ता हस्तांतरण का है तो जेल में मीनू मसानी, अच्युत पटवर्द्धन, अशोक मेहता जैसे तत्कालीन युवा तुर्कों को लेकर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन कर लिया. यह दल कांग्रेस की स्वेच्छाचरिता पर लगाम कसने का काम करता रहा.

जेपी, सुभाष बाबू और गांधी जी के बीच सुलह का सेतु बनकर उभरे. क्योंकि वे मानते थे कि गांधी जी का विचार दर्शन और नेता जी सुभाष का नेतृत्व ही देश को सही दिशा दे सकता है. नेहरू के प्रति गांधी जी के अतिरिक्त स्नेह व नेहरू की महत्वाकांक्षा ने जेपी, लोहिया, आचार्य नरेन्द्र देव, कृपलानी इन सबको कांग्रेस से हटकर उसके विकल्प के बारे में सोचने को मजबूर किया. जबकि महात्मा गांधी जेपी को नेहरू के उत्तराधिकारी के तौर पर देखते थे.

और वह क्षण आया भी जब प्रधानमंत्री रहते हुए नेहरू की मृत्यु हुई. कुलदीप नैय्यर ने बिटवीन्स द लाइन में लिखा कि जब नेहरू के उत्तराधिकारी की बात शुरू हुई, तब लालबहादुर शास्त्री जी ने स्वयं यह कहा कि इस पद के स्वाभाविक उत्तराधिकारी जयप्रकाश नारायण जी हैं.

जेपी आजादी के बाद से ही सत्ता के रंगढंग से आहत थे. सन् 1957 में ही उन्होंने राजनीति छोड़कर लोकनीति को चुन लिया था. इसके तत्काल बाद वे आचार्य विनोवा भावे के भूदान और सर्वोदय आंदोलन से जुड़ गए.

वे राजनीति में शायद लौटते भी नहीं यदि इंदिरा गांधी के निरंकुश और स्वेच्छाचरिता भरे शासन से जनता त्रस्त नहीं होती. सन् 1970 में उन्होंने राजनीति में पुनः वापसी की. इस बार उनके पास सप्तक्रांति का एजेंडा था. वे राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक और नैतिक क्रांति चाहते थे. बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से त्रस्त युवा उनकी एक हुंकार से जुड़ गया. छात्रों व युवाओं में ऐसा जोश उमड़ा कि सिंहासन हिलने लगा.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जब इंदिरा गांधी के रायबरेली चुनाव को निरस्त कर दिया और उन्होंने पद त्यागने से मनाकर दिया, तभी जेपी ने दिल्ली के रामलीला मैदान से वह ऐतिहासिक हुंकार भरी..सिंहासन खाली करो कि जनता आती है… सत्ता मदांध हो गई. आपातकाल के रूप में देश ने दूसरी गुलामी देखी, फिर उसके बाद क्या हुआ.. ज्यादा बताने की जरूरत नहीं.

दूसरी गुलामी से मुक्ति का आंदोलन परवान पर नहीं चढ़ता यदि जेपी को नानाजी जैसे सारथी नहीं मिले होते. नानाजी सप्तक्रांति के संगठक तो थे ही, आपातकाल के बाद जनता पार्टी के प्रमुख योजनाकार भी रहे. संघ का मनोबल और जनसंघ का नेटवर्क नहीं होता तो जनतापार्टी कांग्रेस से निकले हुए लोगों का कुनबा बनके रह जाती.

यह शायद कम लोगों को ही पता है कि आपातकाल हटाने के बाद सभी नेता रिहा कर दिए गए एक नानाजी को छोड़कर. इंदिरा जी ने इस पर तर्क दिया कि चुनाव लड़ने वाले तो सभी रिहा कर दिए गए क्या नानाजी देशमुख भी चुनाव लड़ेंगे? नानाजी ने कहा, वे जेल में ही दिन काट लेंगे, चुनाव लड़ना अपना काम नहीं.. उनका कहना था..अब संघर्ष नहीं समन्वय, सत्ता नहीं अंतिम छोर पर खड़े मनुष्य की सेवा.. बस यही ध्येय है.

रामनाथ गोयनका ने जेपी को इसके लिए मनाया कि नानाजी चुनाव लड़ें. जेपी के आग्रह पर नानाजी ने चुनाव लड़ने की सहमति दी. जेल से बाहर आए, बलरामपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ा, पौने दो लाख मतों से जीते.

जनता पार्टी की सरकार गठन होने के बाद सत्ता में भागीदारी की होड़ मच गई. मोरारजी ने नानाजी से बात किए बगैर उन्हें उद्योग मंत्री बनाने की घोषणा कर दी. नानाजी ने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करते हुए कहा कि 60 वर्ष की उम्र पार करने के बाद वे सत्ता का हिस्सा नहीं बनना चाहते. उन्होंने समाज सेवा का अपना रास्ता चुना. पं. दीनदयाल शोध संस्थान के माध्यम से समूचे देश में उनके सेवा प्रकल्प आज विश्व भर में आदर्श उदाहरण हैं. नानाजी प्रयोगधर्मी थे. वे अपने जीते जी एकात्ममानव दर्शन और सप्तक्रांति के आदर्शों को जमीन पर उतारने के लिए स्वयं समर्पित रहे.

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October 11th 2020, 10:21 am

‘The Sangh and Swaraj’ – पंजाबी में अनुवादित पुस्तक का विमोचन

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चंडीगढ़. विभाजन के समय अपने हिन्दू और सिक्ख भाइयों को बचाने के लिये अपने घर, परिवार और जान गंवाने वाले हजारों गुमनाम स्वयंसेवकों को समर्पित रतन शारदा जी द्वारा लिखित ‘The Sangh and Swaraj’ के पंजाबी अनुवाद का विमोचन शिनवार को संपन्न हुआ. पुस्तक का विमोचन पंजाब की प्रसिद्ध लोकगायिका सुखी बराड़ द्वारा किया गया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंजाब प्रांत के सह बौद्धिक प्रमुख एडवोकेट बरजिंदर सिंह जी भी मंच पर उपस्थित थे.

पुस्तक में आजादी से पहले संघ की आजादी के संग्राम में भूमिका पर प्रकाश डाला गया है. पुस्तक का अनुवाद विद्या भारती पंजाब के प्रचार विभाग द्वारा किया गया है. अनुवाद की योजना पर विद्या भारती पंजाब के प्रचार प्रमुख सुखदेव ने बताया कि अनुवाद की योजना उत्तर क्षेत्र प्रचारक बनवीर सिंह जी और रतन शारदा जी की बैठक में हुई! उसके बाद प्रांत प्रचारक प्रमोद जी और विद्या भारती के उत्तर क्षेत्र के संगठन मन्त्री विजय नड्डा जी के निरंतर मार्गदर्शन और उत्साह वर्धन से पुस्तक का अनुवाद संपन्न हुआ.

उद्योग एवं वाणिज्य राज्य मन्त्री सोम प्रकाश जी ने कहा कि संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी बचपन से ही आजादी के आंदोलन के साथ जुड़े हुए थे. वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर जी ने लिखा है – वर्तमान समय में भारत को आत्मनिर्भर बनाने की चुनौती को पार पाना सांस्कृतिक, चरित्रवान और देश भक्त समाज द्वारा ही संभव है और इन गुणों की उत्पत्ति का साधन अपना संघ और संघ की शाखा ही है.

सुखी बराड़ जी कहा कि आजादी के संग्राम में संघ और उसकी गतिविधियों के बारे में जानने के लिये यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिये. शुभ विचार और सहनशीलता के साथ राष्ट्रहित में आगे बढ़ना ही संघ का उद्देश्य है. उन्हें ऐसा लगता है कि गुरू नानक देव जी कि उदासियों और महात्मा बुद्ध जी से भी संघ को प्रेरणा प्राप्त हुई है.

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October 11th 2020, 10:21 am

उत्तरप्रदेश को जातीय संघर्ष की आग में झोंकने के लिए मॉरिशस से करोड़ों की फंडिंग, प्रारंभिक जांच में

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लखनऊ. हाथरस मामले में पुलिस और प्रवर्तन निदेशालय ने पीएफआई के उत्तरप्रदेश में सक्रिय रहे सदस्यों और कुछ अन्य संगठनों से जुड़े लोगों की जानकारी जुटाई है. अब उनकी गतिविधियों के साथ ही बैंक खातों की छानबीन भी शुरू की है. प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि पीएफआई से संबंधित बैंक खातों में मॉरिशस से 50 करोड़ रुपये आए थे, जबकि पूरी फंडिंग 100 करोड़ रुपये से अधिक रुपये की थी. जांच में संदिग्धों से जुड़ी अन्य जानकारियां भी जुटाई जा रही है.

हाथरस घटना की आड़ लेकर उत्तरप्रदेश को जातीय संघर्ष की आग में झोंकने के लिए विदेश से फंडिंग हुई थी. मामले की जांच में जुटी एजेंसियों के निशाने पर पीएफआई सहित कुछ अन्य संगठनों के पदाधिकारी हैं. ईडी ने मथुरा में गिरफ्तार कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया संगठन के चार सदस्यों के विरुद्ध दर्ज एफआइआर का ब्योरा भी जुटाया है. साथ ही माहौल बिगाड़ने की साजिश के केंद्र में रही वेबसाइट के बारे में तकनीकी ब्योरा जुटाने के लिए कंपनियों से संपर्क साधा है. ईडी दिल्ली मुख्यालय की टीम पहले ही सीएए के विरोध में हुए हिंसक प्रदर्शनों के पीछे फंडिंग को लेकर पीएफआई की भूमिका की जांच कर रही है. जानकारी के अनुसार वेबसाइट के माध्यम से माहौल बिगाड़ने की साजिश व इसके लिए विदेश से फंडिंग के मामले में ईडी जल्द ही मनी लांड्रिंग के तहत केस दर्ज करने वाली है.

हाथरस में देशद्रोह, कोविड-19 की गाइडलाइन व धारा-144 का उल्लंघन सहित विभिन्न धाराओं में दर्ज मुकदमों में आरोपियों को चिह्नित करने की कसरत भी चल रही है. मथुरा में सोमवार को यमुना एक्सप्रेस-वे मांट टोल पर पकड़े गए कैम्पस आफ फ्रंट इंडिया के चारों संदिग्ध के खिलाफ राजद्रोह और समाज में वैमनस्यता फैलाने की धारा बढ़ाई गई है.

सूत्रों का कहना है कि पुलिस ने संदेह के दायरे में आए कई लोगों से लंबी पूछताछ की है. हाथरस में तेजी से बदलते घटनाक्रमों के बीच पुलिस ने अपनी कार्रवाई का दायरा बढ़ाया है. माहौल बिगाड़ने की साजिश को लेकर 19 मुकदमे भी दर्ज कराए गए हैं. वीडियो व फोटो के माध्यम से आरोपियों का पहचान कर कानूनी शिकंजा कसने की तैयारी है.

उत्तर प्रदेश पुलिस के अनुसार हाथरस घटना को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर गलत जानकारी फैलाई गई, जिसे आधार बनाकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश की गई और जातीय हिंसा भड़काने का प्रयास किया गया.

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October 9th 2020, 2:31 pm

हाथरस में हिंसा भड़काने की साजिश रचने वाली पीएफआई का चेयरमैन केरल में सरकारी कर्मचारी

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लखनऊ. हाथरस घटना की आड़ लेकर उत्तरप्रदेश में बड़े पैमाने पर जातीय हिंसा भड़काने की साजिश और सरकार की छवि बिगाड़ने के प्रयासों का खुलासा हुआ है. और जातीय हिंसा भड़काने की साजिश में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) का नाम सामने आया है. सरकार की ओर से भी कहा गया था कि हाथरस में जातीय हिंसा फैलाने के लिए बाहर से पैसा आया. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो मॉरिशस से 50 करोड़ रुपये पीएफआई से संबंधित खातों में आए.

दंगों की साजिश रचने वाले PFI को लेकर एक अन्य जानकारी सामने आई है. खुलासा हुआ है कि PFI का चेयरमैन केरल में सरकारी कर्मचारी है. PFI का चेयरमैन ओ. एम. अब्दुल सलाम केरल में बिजली विभाग में काम करता है. अब्दुल सलाम केरल विद्युत बोर्ड में वरिष्ठ सहायक कम कैशियर के पद पर नियुक्त है. वर्ष 2000 में सलाम की सरकारी नौकरी लगी थी और ये केरल के मल्लापुरम जिले का रहने वाला है. सलाम पर बिना अनुमति विदेश जाने के भी आरोप लगे हैं. सरकारी नौकरी में आने से पहले सलाम लोगों को पढ़ाया करता था.

केरल के बिजली विभाग में काम करने वाला अब्दुल सलाम उस पीएफआई संगठन का मुखिया है, जिस पर यूपी के हाथरस में दंगा भड़काने की साजिश का आरोप है. यूपी सरकार की तरफ से कहा गया है कि हाथरस कांड में पीड़ित लड़की की मौत को मुद्दा बनाकर जातीय हिंसा भड़काने की साजिश पीएफआई द्वारा रची जा रही थी. हाथरस की साजिश का केरल कनेक्शन सामने आया है, सबसे बड़ी बात की केरल सरकार पहले ही पीएफआई को बैन करने की मांग कर चुकी है.

इससे पहले सीएए के खिलाफ लोगों को भड़काने तथा हिंसक प्रदर्शनों में भी पीएफआई का नाम सामने आ चुका है. हिंसक प्रदर्शनों में जांच के पश्चात पीएफआई के अनेक सदस्यों को पकड़ा गया था.

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October 9th 2020, 2:31 pm

भीमा कोरेगांव एल्गार परिषद केस – एनआईए ने गौतम नवलखा सहित 8 लोगों के खिलाफ दायर की चार्जशीट

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पुणे (विसंकें). महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव एल्गार परिषद के में आज राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने स्पेशल कोर्ट में गौतम नवलखा, दिल्ली विश्वविद्यालय के सहयोगी प्रोफेसर हनी बाबू और फादर स्टेन स्वामी सहित 8 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया.

शुक्रवार को अदालत में दायर चार्जशीट में एनआईए ने गौतम नवलखा, प्रोफेसर हनी बाबू और स्टेन स्वामी के अलावा आनंद तेलतुंबडे, सागर गोरखे, रमेश, ज्योति जगताप और मिलिंद तेलतुम्बडे को आरोपी बनाया है. इससे एक दिन पहले एनआईए ने गुरुवार को इस मामले में फादर स्टेन स्वामी को गिरफ्तार किया था. जबकि एनआईए द्वारा इससे पहले की गई पूछताछ में स्वामी ने भीमा-कोरेगांव में किसी तरह की अपनी संलिप्तता से इनकार किया था.

एनआईए प्रवक्ता व पुलिस उप महानिरीक्षक सोनिया नारंगने बताया कि यह मामला 1 जनवरी, 2018 को हुई हिंसा से संबंधित है, जिसमें पुणे के पास कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं वर्षगांठ समारोह में झड़पों के बाद एक व्यक्ति की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हो गए थे. अदालत में पेश चार्जशीट में आठों आरोपियों के खिलाफ हिंसा भड़काने का आरोप लगाया गया है और तमाम सबूत भी एकत्रित किए गए हैं.

एनआईए के अनुसार इसी साल 24 जनवरी को यह मामला जांच के लिए उसे मिला था. उसी के आधार पर जांच के पश्चात आदिवासियों के साथ काम करने वाले कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी को भी झारखंड में उनके घर से गिरफ्तार कर लिया गया है. उनके अलावा चार्जशीट में गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के प्रोफेसर आनंद तेलतुंबडे, ज्योति जगताप, सागर गोरखे और भीमा कोरेगांव शौर्य दिवस प्रेरणा अभियान समूह के कार्यकर्ता रमेश और मिलिंद तेलतुंबडे भी शामिल हैं. तेलतुंबडे अभी फरार है. एनआईए उसकी तलाश में लगी है.

 

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October 9th 2020, 1:29 pm

राजस्थान – मंदिर के पुजारी को दिनदहाड़े जिंदा जलाया, मौत

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जयपुर (विसंकें). सपोटरा (करौली) में बुधवार को मानवता को शर्मसार करने वाली घटना हुई. सपोटरा की ग्राम पंचायत बुकना के राधा गोपाल मंदिर के पुजारी को दिनदहाड़े जिंदा जला दिया. घटना के बाद से सपोटरा क्षेत्र में दहशत का माहौल है. ग्राम पंचायत बुकना गांव के राधा गोपाल मंदिर के पुजारी बाबूलाल वैष्णव पुत्र पुण्या वैष्णव को दिनदहाड़े पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया. गंभीर रूप से घायल पुजारी की अस्पताल में मौत हो गई. ग्रामीणों ने बताया कि गांव का बाबूलाल वैष्णव राधा गोपाल मंदिर के पुजारी है.

पहाड़ के पास स्थित मंदिर की जमीन के सामने वाली भूमि पर पिछले 20-25 दिन पहले पुजारी बाबूलाल वैष्णव ने भूमि को समतल करने के लिए जेसीबी चलावाई थी और वह अपना घर बनाना चाहता था. वह पूर्व में पहाड़ की तलहटी में कच्चे छप्परपोश घर में रह रहा था, उसकी हालत बहुत ही दयनीय थी. कुछ दिन पहले गांव के कुछ दबंगों ने उससे भूमि पर घर नहीं बनाने के लिए धमकाया, और कहा कि इस भूमि पर घर नहीं बनाएगा, यह हमारी जमीन है. इस बात पर पुजारी ने गांव के पंच पटेलों को एकत्रित कर पंचायत बुलाई और अपनी पीड़ा सुनाई. पटेलों ने पुजारी बाबूलाल वैष्णव को परेशान नहीं करने के लिए कहा, लेकिन उन लोगों ने पटेलों की बात भी नहीं मानी.

सपोटरा थानाधिकारी हरजीलाल यादव ने बताया कि पुलिस को सूचना मिली कि सपोटरा अस्पताल में गांव का व्यक्ति भर्ती हुआ है जो पूरी तरह से झुलस गया है. सूचना पर थानाधिकारी पुलिस टीम के साथ सपोटरा अस्पताल पहुंचे. टीम प्रभारी टीम के साथ घटनास्थल बुकना गांव पहुंचे और साक्ष्य जुटाए.

पुलिस ने अलग-अलग टीम बनाकर आरोपियों की तलाश शुरू की. पुलिस टीम ने मुख्य आरोपी कैलाश मीणा निवासी बुकना को गिरफ्तार कर लिया है, शेष आरोपियों की तलाश अभी भी जारी है.

पुलिस उपाधीक्षक महावीर सिंह ने भी घटनास्थल पहुंचकर घटना का जायजा लिया और ग्रामीणों से घटनाक्रम की जानकारी जुटाई.

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October 9th 2020, 1:29 pm

साक्षात्कार – राम मंदिर से रामराज्य की ओर

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“विवेक” हिन्दी मासिक पत्रिका के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का साक्षात्कार

अमोल – अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण के प्रारंभ के साथ ही राम जन्मभूमि आंदोलन समाप्त हो गया, लेकिन क्या अब भगवान श्रीरामजी का विषय भी समाप्त हो गया?

श्रीराम मंदिर का शिलान्यास 1989 में पहले ही हो गया था. 5 अगस्त 2020 को केवल मंदिर निर्माण कार्य का शुभारंभ हुआ. मंदिर निर्माण के लिए भूमि प्राप्त हो इसलिए श्रीराम जन्मभूमि का आंदोलन चल रहा था. सर्वोच्च न्यायालय का इस पर निर्णय आ गया. उनके आदेश के अनुसार एक न्यास बनाया गया. उस न्यास को मंदिर निर्माण के लिए भूमि प्राप्त हो गई. इसके साथ ही राम मंदिर आंदोलन भी समाप्त हो गया.लेकिन भगवान श्रीराम का विषय कभी समाप्त नहीं होगा. श्रीराम भारत के बहुसंख्यक समाज के लिए भगवान हैं और जिनके लिए भगवान नहीं भी हैं,  उनके लिए आचरण के मापदंड तो हैं ही. भगवान राम भारत के उस गौरवशाली भूतकाल का अभिन्न अंग हैं, जो भूतकाल भारत के वर्तमान और भविष्य पर गहरा प्रभाव डालता है. राम थे, हैं, और रहेंगे. जबसे श्रीराम प्रकट हुए हैं तब से यह विषय है और आगे भी चलेगा. श्रीराम जन्मभूमि का आंदोलन जिस दिन ट्रस्ट बन गया उस दिन समाप्त हो गया.

अमोल- काशी विश्वनाथ और मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति का आंदोलन भी क्या भविष्य में चलाया जायेगा?

हमको नहीं पता, क्योंकि हम आंदोलन करने वाले नहीं हैं. राम जन्मभूमि का आंदोलन भी हमने शुरू नहीं किया, वह समाज द्वारा बहुत पहले से चल रहा था. अशोक सिंहल जी के विश्व हिंदू परिषद में जाने से भी बहुत पहले से चल रहा था. बाद में यह विषय विश्व हिंदू परिषद के पास आया. हमने आंदोलन प्रारंभ नहीं किया, कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में हम इस आंदोलन से जुड़े. कोई आंदोलन शुरू करना यह हमारे एजेंडे में नहीं रहता है. हम तो शांतिपूर्वक संस्कार करते हुए प्रत्येक व्यक्ति का हृदय परिवर्तन करने वाले लोग हैं. हिंदू समाज क्या करेगा, यह मुझे पता नहीं, यह भविष्य की बात है. इस पर मैं अभी कुछ नहीं कह सकता हूँ. मैं इतना बताना चाहता हूँ कि हम लोग कोई आंदोलन शुरू नहीं करते.

 रवि – अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर बनने के बाद क्या यह मंदिर केवल पूजा पाठ करने तक ही सीमित रहेगा या उससे कुछ और भी अपेक्षाएँ  हैं?

पूजा पाठ करने के लिए हमारे पास बहुत मंदिर हैं. इस के लिए इतना लंबा प्रयास करने की हिंदू समाज को कोई जरूरत नहीं थी. वास्तविकता यह है कि ये प्रमुख मंदिर इस देश के लोगों के नीति एवं धैर्य को समाप्त करने के लिए तोड़े गए थे. इसलिए हिंदू समाज की तब से ही यह इच्छा थी कि ये मंदिर फिर से खड़े हो जाएँ. स्वतंत्र होने के बाद वे खड़े हो रहे हैं, लेकिन केवल प्रतीक खड़े होने से काम नहीं चलता. जिन मूल्यों एवं आचरण के वे प्रतीक हैं,  वैसा बनना पड़ता है. मंदिर तो बनेगा, लेकिन हमें क्या करना है, उसका उल्लेख 5 अगस्त के दिन मैंने किया था. “परमवैभव संपन्न विश्वगुरु भारत” बनाने के लिए भारत के प्रत्येक व्यक्ति को वैसा भारत निर्माण करने के योग्य बनना पड़ेगा. अत: मन की अयोध्या बनाना तुरंत शुरू कर देना चाहिए. राम मंदिर बनते-बनते तक ही प्रत्येक भारतवासी के मन की अयोध्या भी खड़ी होनी चाहिए. मन की अयोध्या क्या है, इस बारे में भी मैंने रामचरितमानस के 2 दोहे बताए थे.

काम कोह मद मान न मोहा ! लोभ न छोभ न राग न द्रोहा !!

जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया ! तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया !!

राम में रमे हुए लोगों की अयोध्या ऐसी होती है. प्रत्येक भारतीय को अपने हृदय को ऐसा बनाना चाहिए.

दूसरा दोहा है –

जाति पांति धनु धरमु बड़ाई, प्रिय परिवार सदन सुखदाई !

सब तजि तुम्हहि रहई उर लाई, तेहि के ह्रदयँ रहहु रघुराई !!

यह बातें होती है और ये हम सभी के अभिमान के विषय हैं. उसका अभिमान होने में कुछ गलत नहीं है.लेकिन इसको लेकर भेद हो जाये, इसको लेकर स्वार्थ साधा जाए तो यह अनुचित है. ‘सब तजि’ का अर्थ यह नहीं है कि सन्यास धारण कर हिमालय में चले जाएँ. इसका अर्थ यह है कि जिसके साथ हमारा मन जुड़ जाता है, जिससे मोह हो जाता है, उसे छोड़ दें. अपने हृदय में केवल राम को ही समाहित कर लें, रामसे ही जोड़ लें, यानि रामजी के उस आदर्श को, उस आचरण को, उन मूल्यों को अपने हृदय में धारण कर लें. ‘तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई’ ऐसा जीवन बनाना, यह मुख्य काम है. उसके लिए मंदिर बनाने का आग्रह है. देश में इस संदर्भ में जागरूकता आनी चाहिए. इस भावना को सम्मान दिया जाना चाहिए. हमारे आदर्श श्री राम के मंदिर को तोड़कर, हमें अपमानित करके हमारे जीवन को भ्रष्ट किया गया. हमें उसे फिर से खड़ा करना है, बड़ा करना है, इसलिए भव्य-दिव्य रूप से राम मंदिर बन रहा है. पूजा पाठ के लिए मंदिर बहुत हैं.

 रवि – प्रभु श्री राम हमारे आदर्श हैं इसके बावजूद  देश में कुरीतियाँ  और कुप्रथाएं हैं. उन्हें खत्म करने के लिए हमें क्या करना चाहिए? क्या हमारे धर्माचार्यों को भी इसमें योगदान देना चाहिए ?

धर्माचार्यों को कैसा काम करना चाहिए? किस तरह से योगदान देना चाहिए? यह उपदेश मैं नहीं दे सकता. परंतु समाज का आचरण शुद्ध होना चाहिए. इसके लिए जो व्यवस्था है उसमें ही धर्म की भी व्यवस्था  है. धर्म की व्यवस्था तय करती है ‘आचार धर्म’. जैसे सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, स्वाध्याय, संतोष, तप, यह शाश्वत धर्म है. सदा सर्वदा, कहीं भी- कभी भी. परंतु इसका आचरण करना देश काल परिस्थिति पर निर्भर करता है. व्यक्ति विशेष पर भी यह निर्भर करता है.

एक बहुत ही पुरानी राजा शिवि की एक कथा है. बाज से अपनी जान बचाने के लिए एक कबूतर राजा शिवि की शरण में आता है और उनके पीछे छुप जाता है. शिबि राजा सोचते हैं कि यह कबूतर मेरी शरण मेंआया है इसलिए उसे बचाना मेरा धर्म है. फिर उसके पीछे-पीछे बाज भी आता है और कहता है कि वह कबूतर कहाँ है? उसे मुझे खाना है. राजा कहते हैं, उसकी रक्षा करना मेरा धर्म है. तब बाज कहता है कि प्रकृति के अनुसार मेरा धर्म यह है कि उसे खाकर मैं अपना पेट भरूँ. तुम मुझे भूखा रखकर अधर्म कर रहे हो, उसके प्राणों की रक्षा करके तुम अपने धर्म का पालन नहीं कर सकते. अब राजा का भी एक धर्म  है, कबूतर का भी एक धर्म है और बाज का भी एक धर्म है. इन तीनों का संतुलन साध कर उस परिस्थिति मेंराजा ने कहा कि ठीक है तुम्हारा भी पेट भर जाए इसलिए मैं अपने धर्म के पालन के लिए तुम्हें अपना मांस देता हूँ.

धर्म का आचरण देश, काल, परिस्थिति और व्यक्ति के स्वभाव को ध्यान में रखकर कर्तव्य के रूप मेंनिर्धारित जो करते हैं, उसको कहते हैं ‘आचार धर्म’. हमारे यहां पुरातन स्मृतियाँ हैं और वह भी एक नहीं है, वह भी बदलती रही हैं. कहते हैं आखिरी स्मृति देवल स्मृति होगी. जिसमें महिलाओं को शिक्षा एवं अन्य प्रावधान हैं. जो जबरदस्ती भगाए गए हैं उनको वापस लाने का भी प्रावधान है. जिन बातों की आज हमआवश्यकता महसूस करते है, उस समय वैसे ही उन लोगों ने की होगी. वही बातें इसमें लिखी होगी. परंतुउसके बाद दसवीं सदी के आसपास देवल स्मृति समाप्त हो गई. इसके बाद 1000 साल तक कोई स्मृति हीनहीं आई. इसलिए चाहे जैसे लोग चल रहे हैं. सारे समाज का अवलोकन करके भारतीय धर्म के सभीधर्माचार्यों को मिलकर आज के समय में सभी भारतीयों के अनुकूल होगी, आचरण में सरल होगी, उनकाजो परंपरागत आदर्श है, जिसको दुनिया चाहती है, ऐसा जीवन जीने में उसको समर्थ बनाएगी, ऐसी एकनई आचार व्यवस्था धर्माचार्यों को देनी चाहिए. उसकी आवश्यकता बहुत तीव्रता से प्रतीत होती है.

 अमोल – अभी आपने स्मृतियों के विषय को स्पर्श किया, कई धर्मग्रंथ व स्मृतियाँ ऐसी हैं, जिनको समयके साथ परिवर्तित करना अति आवश्यक है. इस विषय पर आप की क्या राय है?

हम यानी भारतीय समाज ग्रंथों पर नहीं चलता. यदि ग्रंथों पर चलता होता तो एकनाथ महाराज रामेश्वरम जाते समय गधे को गंगा का पानी नहीं पिलाते. ग्रंथों में कई ऐसी बातें हैं जो कालबाह्य (out of date) हैं. भारतीय समाज जो धर्म पर पूरी श्रद्धा रखता है, ग्रंथों की उन बातों को छोड़कर चल रहा है. और कोई उसे धर्म बाह्य नहीं करता या कोई उसे श्राप नहीं देता है. क्योंकिलोग जानते हैं कि पुस्तकीय शब्द देश-काल-परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं. उसका नया अर्थ बतानापड़ता है या शब्दों को बदलना पड़ता है. अपने जो ग्रंथ हैं उनमें से ‘भगवद्गीता’ में बिल्कुल मिलावट नहींहै, ऐसा कह सकते हैं. वेदों में मिलावट नहीं हैं क्योंकि वे मौखिक रूप से सुरक्षित हैंऔर उपनिषदोंमें भी मिलावट नहीं है. बाकी ग्रंथों में से महाभारत की तो प्रस्तावना में ही कहा है, जब पहली बार कथा बताई गई है वह8800 श्लोकों की थी और अभी जो पूर्ण ग्रंथ उपलब्ध है वह लगभग एक लाख श्लोकों का है. शेष सारे श्लोक बाद में जुड़े हैं. उनमें से जो वर्तमान समय में काल बाह्य है उन्हें निकालना चाहिए और जो काल-सुसंगत हैं व हमारे मूल्यों से सुसंगत हैं, इन दोनों बातों को रखना चाहिए. ऐसा किसी ने सोचा तो कुछ गलतविचार है, ऐसा नहीं कह सकते हैं. लेकिन यह करने के सारे अधिकार हमारे धर्माचार्यों के हैं, वह यह कर सकते हैं.अन्य लोगों को इसमें हाथ नहीं डालना चाहिए किंतु अन्य लोग धर्माचार्यों को हाथ जोड़कर आग्रह करसकते हैं कि कृपया ऐसा कीजिए. कई लोग ऐसा चाहते भी है, अनेक लोग मुझसे भी मिलते रहते हैं. समाज के बड़े-बड़े, अच्छे लोग जो राजनीति में नहीं है, जिनका कोई स्वार्थ नहीं है, अगर उनको यह लगता है कि ऐसा नहीं होना चाहिए तो फिर ऐसा नहीं होना चाहिए.

 रवि – हमारे समाज में अनेक उपासना पंथ हैं, यदि ये सभी एकत्रित आ जाये तो समाज भी बलशालीहोगा. क्या उसके लिए राम मंदिर सभी के लिए आदर्श के रूप में विद्यमान हो सकता है?

क्यों नहीं? पूरे रामायण में और रामचरितमानस में किसकी पूजा करें, यह नहीं बताया गया.यही बताया गया है कि सत्य पर चलो, अन्याय-अत्याचार मत करो, अहंकार मत करो. पूजा पद्धितयाँ अनेक हो सकती हैं और हम सभी अपनी- अपनी पूजा पद्धति को लेकर सुख-पूर्वक चल सकते हैं. दूसरों की पूजा पध्दति कोअपनी पूजा पद्धति जैसा ही सत्य मानकर व स्वीकार कर चल सकते हैं . आपस में मेल मिलाप रखने वालीबातों को मानकर चलें तो समाज, धर्म और देश का कल्याण हो जायेगा. हमारे संविधान में जो आधारभूत तत्वहैं उनमें भी यही सारी बातें हैं. उसकी प्रस्तावना (preamble)  में भी यही सब लिखा है.  संविधान में उल्लिखित  प्रस्तावना, नागरिक  कर्तव्य, नागरिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व, यह चारों प्रमुख बिंदु भी हमें यही बताते हैं. हमारे देश मेंविविधता पहले से है. राम के समय का विचार करें तो उस समय कौन से संप्रदाय रहे होंगे? प्रमुख रुप से दो ही दिखते हैं – ‘शैव और वैष्णव’. शिवजी तो परंपरा से ही राम जी का ध्यान करते हैं और राम हर जगह शिवजी की पूजा करते हैं. सब के अलग-अलग तरीके हैं. लेकिन आपस में जो एकात्मता व आत्मीयता है, मिलजुल कर चलने का जो निश्चय है, वही रामायण का संदेश है. वही हमारी सारी परंपराओं का संदेश है. प्रत्येक व्यक्ति का रूप अलग-अलग हो सकता है, उसका बाह्य रूप अलग है .लेकिन  सब में  एक ही सत्य होने के कारण सब एक हैं. यही हमारा संदेश है. रामायण में भी वही है. हमारे यहां जितनी भी पूजा पद्धतियहाँ है, अगर वह इस आदर्श को लेकर चलेंगी तो सबका विकास होगा और देश का भी विकास होगा और समाज में भी शांति व भाईचारा बना रहेगा.

 रवि – राम मंदिर का आदर्श देखकर हिंदू धर्म के अंतर्गत आने वाले सभी संप्रदाय व पंथ एकजुट हो सकतेहैं और समाज भी बलशाली हो सकता है लेकिन हमारे देश में मुस्लिम और ईसाई मत को मानने वाले भी हैं, उनको हमारी विचारधारा में लाने के लिए क्या प्रयास करना चाहिए

उनको लाना क्या है? उन्हें केवल इतना ही करना है कि उससे अलग जाना नहीं है. रसखान का नाम तो आपने सुना है ना, वो मुसलमान थे, उन्होंने इस्लाम छोड़ा नहीं था, परंतु उनका कृष्ण पर कितना सुंदर काव्य है. वह कृष्ण भक्त थे. शेख मोहम्मद थे, वह विट्ठल के भक्त थे. ये कोई बहुत पुरानी बात नहीं है. हमारे यहां श्री रामकृष्ण परमहंस ने इस्लाम-ईसाईत सहित सभी उपासना पद्धतियों की प्रत्यक्ष उपासना करके कहा कि सभी धर्म-संप्रदाय एक ही जगह पहुँचते  हैं. रमण महर्षि से जब पाल  बरन्टन (Paul Brunton)  ने कहा कि मुझे लगता है कि मैं हिंदू बन जाऊँ तो रमण महर्षि ने कहा ‘नहीं तुम ईसाई धर्म में जन्में हो तो अच्छे ईसाई बनो. तुमको भी वही फल मिलेगा जो एक हिंदू को अच्छा हिंदू बनने पर मिलता है, यह हमारे यहाँ सदा हुआ है. समय-समय पर कट्टरपंथी लोग इनको अलग दिशा में ले जाने का प्रयास करते हैं. उस प्रयास को शिवाजी महाराज ने रोका. उनकीनौसेना में मुसलमान भी थे, सिद्दी भी थे.

महाराणा प्रताप की सेना में कई मुसलमान थे जिन्होंने अकबर को हल्दीघाटी में रोका. इतिहास के हर मोड़ पर सब लोग साथ खड़े थे. जब भारत एवं भारत की संस्कृति के प्रति भक्ति जागती है व भारत के पूर्वजों की परंपरा के प्रति गौरव जागता है, तब सभी भेद तिरोहितहो जाते हैं. जिनके स्वार्थों पर आघात होता  है, वे लोग बार-बार अलगाव व कट्टरता फैलाने का प्रयास करते हैं. वास्तव में हमारा ही एकमात्र देश है जहाँ पर सब के सब लोग बहुत समय से एक साथ रहते आएहैं. सबसे अधिक सुखी मुसलमान भारत देश के ही हैं. दुनिया में ऐसा कोई देश है जहाँ पर उस देश के वासियों की सत्ता में दूसरा संप्रदाय रहा हो जो उस देश के वासियों का नहीं और वह अभी तक चल रहा है? ऐसाकोई नहीं. वह केवल हमारा देश ही है. इस्लाम के आक्रमण से कुछ समय पहले मुसलमान भारत में आये.आक्रमण के साथ बहुत अधिक संख्या में आए. बहुत सारा खून-खराबा, संघर्ष, युद्ध, बैर का इतिहास रहा है. फिर भी हमारे यहाँ मुसलमान हैं. हमारे यहाँ इसाई हैं. उनके साथ किसी ने कोई बुरा नहीं किया. उन्हें तो यहाँ सारे अधिकार मिले हुए है, पर पाकिस्तान ने तो अन्य मतावलंबियों को वे अधिकार नहीं दिए. हिंदुस्थान का बँटवारा कर मुसलमानों के रहने के लिए पाकिस्तान बना. उस समय की स्थिति के अनुसार भारत में हिंदुओं की ही चलेगी और किसी की नहीं चलेगी, जाना है तो अभी चले जाओ और अगर रहना है तो हिंदू के नीचे ही रहना पड़ेगा ऐसा हमारे संविधान ने नहीं कहा. हमारी संविधान सभा में सब प्रकार के लोग थे. बाबासाहेब आंबेडकर भी यह मानते थे कि जनसंख्या की अदला-बदली होनी चाहिए. परंतु उन्होंने भी यहाँ जो लोग रह गए उन्हें स्थानांतरित (Transfer ) करना पड़े, ऐसा संविधान नहीं बनाया.उनके लिए भी एक जगह बनाई गई. यह हमारे देश का स्वभाव है और इस स्वभाव को हिंदू कहते हैं. हम किसकी पूजा करते हैं,  उससे हिंदू का कोई संबंध नहीं है.धर्म जोड़ने वाला, ऊपर उठाने वाला, समाज को एक सूत्र में पिरोने वाला होना चाहिए. भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के सुख जिसके आचरण करने से मिल सकते हों ऐसा धर्म हो. अर्थ और काम का नियमन करते हुए पूरे समाज को ठीक से चलाने वाला धर्म है. पूजा-पद्धति आपकी कोई भी हो. राष्ट्रीयता का पूजा-पद्धति से कोई संबंध नहीं है. पहले-पहले जब पाकिस्तान की बात चली थी तब जमाते इस्लामी के चीफ थे मदनी साहब. उन्होंने अपनी पुस्तक में लिखा है कि कौम और रिलिजन का कोई संबंध नहीं है. जो लोग यह कह रहे थे कि जो मुसलमान हैं वे हिंदुस्तान के नहीं हैं यह गलत है.

अत: बीच-बीच में अगर कट्टरता फैलती है तो उस वातावरण में भटकना नहीं, इतना करना पड़ेगा. और उसके लिए हम एक राष्ट्र हैं, सनातन काल से चलते आए हुए पुरातन राष्ट्र हैं,  हम हिंदू राष्ट्र हैं. कुछ बदलना नहीं पड़ता केवल कुछ बुराइयाँ छोड़नी पड़ती हैं, संकुचितता छोड़नी पड़ती है. यह सब संभव है और इन बातों को  मानने वाले हमको मिलते भी हैं. ईसाई और मुसलमान दोनों मिलते हैं, अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे उच्च पदस्थ मुसलमान भी मिलते हैं.

 अमोल – भारत में 130 करोड़ हिंदू रहते हैं. भारत में मुसलमान और ईसाई दोनों समुदायों के लोग भी  रहते हैं, क्या वह इस बात को मानेंगे और मानेंगे तो कैसे?

देखो यह सत्य है, मानना या नहीं मानना यह मर्जी की बात है, लेकिन यह सत्य है. सत्य को जो मानता है उसका सब ठीक चलता है. सत्य को कब तक नहीं मानेंगे? सत्य की अपनी ताकत है और हम कुछ नहीं करेंगे तो भी लोगों को जीवन में अवश्य ऐसे अनुभव आएंगे कि, हाँ- हम हिंदू हैं और  हम भारतीय हैं. हम मुसलमान हैं लेकिन हम अरबी अथवा तुर्की नहीं है. हम भारतीय हैं और हम भारतीय अर्थात क्या हैं, इसका विचार करना पड़ता है. हम जब-जब इसका विचार करते हैं तब यह ध्यान में आता है कि भारत का अर्थ  हिंदू है. लेकिन इसको कैसे मनाना है. तो वहाँ से प्रबोधन होना चाहिए. यह उनके मानने की बात है.मनवाने की बात नहीं है. क्या हम हाथ में लाठी लेकर मनवाएंगे ? हम ऐसा नहीं करेंगे. हृदय परिवर्तन होना चाहिए. इस का एक तरीका है कि हम सोचें कि हमारे पूर्वज कौन थे? हम किस भूमि से जुड़े हैं? मुसलमान होने के बाद भी हमारे पास कव्वाली क्यों है  जो अन्य इस्लामिक देशों में नहीं चलती? अखंड भारत की सीमा के बाहर क़व्वाली आज भी नहीं चलती है. कब्र- मजारों की पूजा अन्य जगह नहीं चलती है. पैगंबर साहब का जन्मदिन ईद-ए-मिलाद-उन-नबी वह सेलिब्रेशन के रूप मेंअखंड भारत की सीमा में ही चलता है. अल्लाह एकमेव और सर्वश्रेष्ठ होने के नाते अन्य किसी का भी, पैगम्बर साहब का भी उत्सव नहीं मनना चाहिए. ऐसा बाहर के लोग मानते हैं. इसलिए अन्यत्र कहीं भी व्यक्ति विशेष के रुप में इसकी मान्यता नहीं है.अल्लाह के अतिरिक्त कौन है, ऐसा वे लोग कहते हैं. लेकिन हमारे यहाँ चलता है क्योंकि हमारा एक स्वभाव है. परंपरा से आया है, उसके प्रभाव में हम चल रहे हैं, यह सत्य है. हमारे पूर्वज वही थे, यह सत्य है. भारत के बाहर हमारी कोई प्रतिष्ठा नहीं है. हम भारतीय हैं इसीलिए हमारी प्रतिष्ठा है. भारत की प्रतिष्ठा से हमारी प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है. बैंगलोर से यात्रा करते समय मुझे रेलवे के टीसी मिले थे. उन्होंने मुझे बतायाथा कि देखो हमारे यहाँ  ऐसा है कि मरने पर जब तक कफन में वतन की मिट्टी नहीं डाली जाती तब तक जन्नत नसीब नहीं होती. जब ओसामा बिन लादेन को समुद्र में दफन कर दिया गया था तो इस पर काफी हो-हल्ला मचा था, उसका एक कारण यह था. वतन की मिट्टी नहीं डाली. हम अगर बिना भारत की मिट्टी के मर गए तो हमें जन्नत भी नसीब नहीं होगी. इस मिट्टी से हम जुड़े हुए हैं. यह सब सत्य है पर अगर हिंदू यह बताएंगे तो वह पूछेंगे कि इसमें आपका क्या फायदा है. इसलिए हिंदू को इस स्थिति में रहना पड़ेगा कि आप यह मानते हो या नहींमानते हो, इससे हमारा कुछ नहीं बिगड़ता और हमको इसकी जरूरत भी नहीं है. यह कोई हमारी ज़रूरत या मजबूरी नहीं है कि हमबता रहे हैं. लेकिन यह सत्य है कि रिश्ते से आप हमारे भाई हैं. वो भाईचारा हमें कहलवाता है कि हम भाईहैं, मान लो. हिंदू को इस स्थिति में आना पड़ेगा कि कुछ कहने करने की जरूरत नहीं है. वह अपनी सुरक्षा खुद कर सकता है, फिर भी वह कह रहा है कि आप हमारे हो क्योंकि उसके मन में स्नेह है. यह स्थिति आने के बाद ही हिंदू कहें, तब तक ना कहे. वर्ना वे उसे मजबूरी मानेंगे या वे सौदा करना चाहेंगे. उस से काम नहीं होगा, दोनों तरफ से जब प्रक्रिया चलेगी तभी ठीक होगा. हिंदू समाज को इस स्थिति में आना होगा.वहसामर्थ्य संपन्न हो कि आँख टेढ़ी करके कोई देख नहीं सके और वह इसलिए नहीं कि किसी को कोई सबक सिखाना है बल्कि इसलिए कि उसकी बात पर विश्वास हो सके.

 अमोल – कोरोना के संकटकाल में हमें आत्मनिर्भर भारत बनाने का मंत्र मिला है. तो आत्मनिर्भर भारतको साकार करने हेतु ऐसे कौन से विषय हैं जिन्हें हमें आत्मसात करना चाहिए?

पहले तो हमें स्वयं के अंदर झांकना चाहिए. हमारी आत्मा क्या है? हम कौन हैं? चाणक्य नीति मेंकहा गया है –

क: काल: कानि मित्राणि को देश: कौ व्ययागमौ |

कश्चाहं का च मे शक्ति- रिति चिन्त्यं मुहुर्मुहु ||

जिस व्यक्ति को या समाज को प्रगति करनी है, विजय पानी है, उसको इन 6 बातों का प्रतिदिन विचार करना चाहिए. ऐसासमाज का नियम है. काल यानि समय कैसा चल रहा है? मेरे मित्र कौन है? मेरे आय और व्ययकी व्यवस्था यानि आर्थिक परिस्थिति कैसी है? देशों की स्थिति कैसी है? लेकिन मुख्य बातें दो हैं जो इन सब का मूल है. मैं कौन हूँ और मैं क्या हूँ?इसके अलावा मेरी शक्ति किन बातों में है? इसको जाननेके लिए अपना वर्तमान और भूतकाल भी पता होना चाहिए. हम जो हैं, वह अभी हैं कि नहीं? या कोई स्वाँग ओढ़े बैठे हैं. जिन बातों में हमारी शक्ति है हम उनका संवर्धन कर रहे हैं  या नहीं? यह देखना पड़ता है, इसपर हमें ध्यान देना पड़ता है. अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाले एक सुशिक्षित परिवार के 12वीं कक्षा की एक विद्यार्थी ने मुझसे कहा कि आजकलतो हमें हमारा सही इतिहास सिखाते ही नहीं. हमें हमारे भारतीय इतिहास के बारे में कुछ पता नहीं. हमारेइतिहास की पुस्तकों में भी कुछ मिलता नहीं है. ‘1857 के भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ पर उसे एक निबंध लिखनाथा परंतु उसे इसके बारे में कुछ पता ही नहीं था. इससे संबंधित पुस्तकों के बारे में भी उसे कुछ पता नहीं था.पुस्तकालयों में भी उसे संबंधित पुस्तकें नहीं मिली.  फिर मैंने उसे दो-तीन पुस्तकें बताईं. इस स्थिति से हमें बाहर आना पड़ेगा. सबसे पहले हम कौन हैं, वह पहचानना पड़ेगा. दूसरी बात हम जो हैं उसमें गौरव रखना पड़ेगा. पहला जो है उसे मैं कहता हूं “आत्म भान”,दूसरा जो है उसे “गौरव भाव”. प्रत्येक में कुछ कमियाँ होती हैं , हमारे में भी कुछ कमियां होंगी, वह कमियां दूर करना हमारा काम है. वैसे कमियाँ किसमें नहीं होती? हमें हमारी विशेषताएँ (प्लस पॉइंट) क्या हैं  उसका गौरव होना चाहिए. जिसमें आत्मगौरव या स्वाभिमान नहीं है, वह उन्नति नहीं कर सकता. वहसोचेगा भी तो छोटा ही सोचेगा. वह ज्यादा से ज्यादा कहेगा कि मैं राजा की नौकरी करूँगा अर्थात बड़ी नौकरी, सरकारी नौकरी. मैं नौकरी ही करूँगा. मैंराजा बनूंगा, वह ऐसा क्यों नहीं सोचता? क्योंकि उसमेंआत्मगौरव नहीं है और मैं यह कर सकता हूँ , यह आत्मविश्वास होना चाहिए. इनसारी गौरवान्वित करने वाली बातों को देने वाले संस्कार शिक्षा से, सामाजिक वातावरण से एवं पारिवारिक प्रबोधन से मिलनाचाहिए. यह नित्य चलते रहने की बात है. कुछ बातें व्यवस्था करती है और कुछ बातें हमको समझकर करनी पड़ती हैं . समाज में जब दोनों प्रकार से प्रयास होते हैं तो समाज में आने वाली पीढ़ी विजय प्राप्त करती है. इसलिएइंग्लैंड के बारे में कहा था कि the battle of waterloo was won on the playground’s of Harrow and Eton , क्योंकि इंग्लैण्ड में घरों में, सामाजिक वातावरण में, शिक्षा में, सारे संस्कार व्यवस्था मेंअनौपचारिक रूप से मिलते हैं. वह स्वभाव बन गया है. इसलिए नेपोलियन को इंग्लैंड ने रोका. हिटलरको इंग्लैंड ने रोका. वैसे ही हमें भी करना है.

 अमोल – आपके वक्तव्य में निरंतर तीसरे विकल्प की बात आती है. यह तीसरा विकल्प क्या है? इसकाक्रियान्वयन किस प्रकार से हो सकता है?

भारत का एक बुनियादी स्वभाव है, उसके आधार पर अर्थात भारत की आत्मा के आधार पर जो होगा वह आत्मनिर्भर होगा.

आत्मनिर्भर यानी केवल केवल स्वावलंबी या विजयी ऐसा नहीं है. स्वाबलंबी में “स्व” महत्व की बात है. इतनी सारी चीनी मिले हैं, जिनसे हम बहुत सारी शराब बनाकर निर्यात (Export) बढ़ा सकते हैं. लेकिन वह आत्मनिर्भरता नहीं होगी क्योंकि भारत की प्रकृति में शराब बनाना नहीं है. भारत की प्रकृति मूलतः क्या है कि “वो एकात्म है और समग्र है”. यानी संपूर्ण विश्व में अस्तित्व की एकता को मानताहै. अगर मेरा कुछ होना है तो पूरे विश्व का भी कुछ होना है. और अगर विश्व का ठीक होगा तो मेरा भी ठीक होगा. मेरा अकेले का ठीक होगा और विश्व ऐसे ही पड़ा रहेगा, ऐसा कभी नहीं हो सकता. क्योंकि हम सबएक दूसरे से जुड़े हुए हैं. बाहर से अलग-अलग दिखते हैं परंतु हैं एक ही के अविष्कार. इसलिए हम टुकड़ोंमें विचार नहीं करते, हम सभी का एक साथ विचार करते हैं.

दूसरी बात है हम किसी भी चीज का विचारकरते हैं तो उसका आगा, पीछा और सर्वत्र होने वाले उसके परिणाम को ध्यान में रखकर ही विचार करते हैं.इसलिए हम कभी भी अतिवादी (Extremist) नहीं हो सकते हैं. हम हमेशा संतुलन (balance) साध कर एक मध्यम मार्ग पर चलतेहैं. मध्यम मार्ग को ही धर्म कहा गया है. यह धर्म की सोच है और यह सत्य पर आधारित है कि अस्तित्वएक है, दिखता भले ही विविध है. अभी जो प्रचलित व्यवस्था है वह बुनियादी रुप से पश्चिम की है. पश्चिमी  दिशा से जोचिंतन आया उनके चिंतन के आधार है कि प्रत्येक व्यक्ति अलग है, उसका शरीर, मन और बुद्धि भी अलग है. समाज का हित अलग है, व्यक्ति का हित अलग है और सृष्टि का हित अलग है.सुख सबको चाहिए. सुख के सुख की संकल्पना भारत में भी है और वहाँ भी है. लेकिन शरीर का सुख चाहिए या मन का? वहां प्रधान्य शरीर के सुख का है. शरीर के सुख के लिए जितना आवश्यक है उतना मन और बुद्धि का सुख चाहिए. हमारे यहां का नियम है कि सब का सुख चाहिए इसलिए सब के सुख को कुछना कुछ संयम रखना पड़ेगा. वो कहते हैं ऐसा कुछ जरूरी नहीं. एक्स्ट्रीम की तरफ जाओ. व्यक्ति का सुखचाहिए तो अस्तित्व के लिए संघर्ष (struggle for existence )  ही होगा. उससे झगड़ा होता है तो दुख उत्पन्न होता है, व्यक्ति पर दबाव तो फिर समाज का सुख देखते हैं तो फिर व्यक्ति समाज में मात्र मशीन का पुर्जा है, इससे स्वतंत्रता नहींआती. डॉक्टर आंबेडकर साहब ने संसद में कहा स्वतंत्रता और समता एक साथ लाना है तो बंधुभावचाहिए. बंधुभाव का कारण क्या है – कि हम सब एक हैं. हमें एक होना नहीं है, हम हैं ही. हम भूल गए हैं, हमको याददिलाना है. यह बुनियादी बात होने के कारण हमने हमारे यहाँ विकास किया. अध्ययन करने वालों का शोध (research) है कि विश्व की अर्थव्यवस्था में 1000 वर्ष तक हम नंबर वन पर रहे. उस समय विश्व के बहुत बड़े भूभाग पर हमारा प्रभाव तो था ही हमारा साम्राज्य भी  बहुत बड़ा था. लेकिन ऐसा सब होने के बावजूद भी हमने दुनिया मेंजाकर किसी भी देश को समाप्त कर दिया ऐसा नहीं हुआ है. हमारे यहाँ के ढ़ाका की मलमल अभी भीकंप्यूटर युक्त मशीनों से बनना कठिन है, इतनी अच्छी तकनीक (technology) हमारे पास थी. लेकिन हमारे यहांपर्यावरण की हानि नहीं हुई, क्योंकि हमने सबका हित एक साथ साधा. उसके लिए सबके स्वार्थ की दौड़ को संयमित किया. सबको स्वतंत्रता मिली लेकिन सबको यह नहीं मिला कि अपनी स्वतंत्रता का उपयोग दूसरों को परतंत्र  करने में कर सकें. हमारे यहां किसान अपने बीज खुद बनाता था. हमारा किसान बीज केलिए कहीं नहीं जाता था. खाद अपना बनाता था. अभी देखिए, जितने भी टूथपेस्ट हैं कोई टूथपेस्ट आपकोबताती है कि वह सारे जंतुओं को मार देगी. उनमें ऐसे रसायन (chemicals )  है जो उन्हें मार देते हैं. लेकिन दातुन क्या कामकरती है. दातुन मारती नहीं है उसे रेगुलरेट करती है. यह जो देसी कीटनाशक बनते हैं वह कीडों को मारतेनहीं बल्कि उन्हें नियंत्रित करते हैं. उनका भी जीवन है ना. यह दृष्टिकोण हमारे यहां रग-रग में है.” विश्व मेंसारे संघर्ष समाप्त करने हैं, विश्व में सबकी उन्नति एक साथ करनी है, पर यह हो नहीं सकता इस कगार पर विश्व पहुँचा है. अभी तक सबने दो प्रयोग करके देखे हैं. पर सफल नहीं हुए . व्यक्ति को महत्व दिया, नहीं हुआ, समाज को दिया, नहींहुआ. ईश्वर को मानकर चले,ईश्वर छोड़कर भी चले लेकिन नहीं हुआ. लोकमत के आधार पर चले, वैज्ञानिकआधार पर चले लेकिन नहीं हुआ. तीसरा पर्याय कहाँ है? ये तीसरा पर्याय हमारे यहाँ है. ये दोनों काम पश्चिम ने करते समय तीसरे को जोड़ने वाला चौथा क्या है, यह नहीं देखा. हमारे यहाँ पहले देखा गया. “इसलिए अर्थ और काम को अनुशासनमें रखकर मोक्ष की ओर चलाने वाला धर्म हमारे पास है. शरीर-मन-बुद्धि को अनुशासन में रख कर आत्मा परमात्मा की ओर उसको ले जाती है और इसलिए व्यक्ति समष्टी और सृष्टि, तीनों की उन्नति और इन सब का भाव परमात्मा की ओर. यह बेसिक दृष्टि है और इसके आधार पर हमको सारे जीवन की पुनर्रचनाकरनी होगी. सोचना भी पड़ेगा, रिसर्च भी करना पड़ेगा. यह एक मूलभूत (basic ) दृष्टि है जो सनातन काल से चली आरही है. यह शाश्वत है. इसका कैसा प्रस्तुतीकरण (expression )  होगा,आज का खाका या स्वरूप (blueprint ) क्या  होगा,उसको आज के संदर्भ और परिस्थिति में बैठा कर सोचना होगा.  आज ऐसे प्रयोग अनेकों स्थान पर हो रहे है, अभी तो  सरकार ने भी ऐसे कुछ प्रयोग किए हैं हम भी कर रहे हैं तो उन को आगे बढ़ाना पड़ेगा.

 

रवि –  आपने बताया कि बदलाव के लिए नए-नए प्रयोग चल रहे हैं, इसमें शिक्षा का भी एकमहत्वपूर्ण स्थान रहेगा. शिक्षा में धर्म का स्थान क्या होना चाहिए. आपकी इसके बारे में राय क्या है?

धर्म का स्थान सर्वत्र है. अधर्म तो कहीं नहीं होना चाहिए. अगर मैं कहूं कि शिक्षा में धर्म होना चाहिए तो लोग खूब चिल्लायेंगे. लेकिन अगर मैं कहूँगा कि अधर्म नहीं होना चाहिए तो कोई भी नहींचिल्लाएगा. धर्म यानी संप्रदाय – पूजा नही नागरिक अनुशासन (civic discipline), नागरिक कर्तव्य (civic responsibility) यह धर्म है. भारत के प्रत्येक बच्चे को अपने संविधान के 4 चैप्टर सबको बताने चाहिए. विस्तार में यह क़ानून (law) के विद्यार्थी पढ़ेंगे.  लेकिन भारत के बच्चों को जब वे जीवन के प्रारंभिक चरण (formative stage) में होते हैं तब उनको संविधान की प्रस्तावना, संविधान में नागरिक कर्तव्य, संविधान में नागरिकअधिकार और अपने संविधान के मार्गदर्शक अर्थात नीति निर्देशक तत्व, ये सब ठीक से पढ़ाने चाहिए. क्योंकि यही धर्म है. हम सब लोग साथ चलें और विविध लोग एकत्र रहें, भारत की उन्नति हो और उसी समय भारत कीउन्नति से विश्व को कष्ट ना हो यह मन में रखकर अपने संविधान की रचना की गई है और रचना करने वाले सबहमारे लोग थे. उनके सामने जो आदर्श थे वे संविधान की मूल प्रति के चित्रों में व्यक्त होता है, संविधान निर्माण के समय एक-एक शब्द पर जो चर्चा हुई है, वह अगर हम पढ़ते हैं, तो उन का मन हमारे ध्यान में आता है कि आज के प्रारूप (format ) में ही हमारा यह सनातन धर्म ही व्यक्त हो रहा है. हमें उसे यह सिखाना है.हमें पढ़ना है लेकिन पैसे के लिए नहीं.लेकिन पढ़ाई आपको भूखा रखनेके लिए भी नहीं है. अगर आप पढ़ोगे तो अपना जीवन ठीक से चला सकोगे इतना आत्मविश्वास होनाचाहिए. लेकिन केवल आपका जीवन ठीक चले इसके लिए शिक्षा नहीं है. सबका जीवन आप ठीक चला सकें इसलिए आपको शिक्षित होना है. यह दृष्टि  वह प्राप्त  कर ले, इसके लिए घर के संस्कार भी उपयुक्त हों, विद्यालय का पाठ्यक्रम, शिक्षकों का आचरण और समाज का वातावरण यह चारों बातें ऐसी होनी चाहिए. आप जो प्रश्न कर रहे हैंवह सिर्फ शिक्षा नीति के बारे में है लेकिन शिक्षा तो इन चारों से होती है. इन चारों का भी विचार करनाहोगा. हमारी शिक्षा दुनिया के संघर्ष में खड़ा होकर अपना और अपने परिवार का जीवन चला सके इतनीकला और इतना विश्वास देने वाली होनी चाहिए. दूसरा इस दुनिया से मैंने लिया है तो इस दुनिया को मैंवापस करूँगा,इसके लिए मुझे जीना है. तीसरी बात यह जीवन जीते समय जो शिक्षा मुझे मिली है, उसकेआधार पर सब अनुभवों में से मैं जीवन के लिए कुछ सीख लूँगा, जीवन के उतार-चढ़ावों में से जाते समय मैंजीवन के आनंद को ग्रहण करूंगा. सकारात्मक दृष्टिकोण निर्माण होगा. शिक्षा इस प्रकार की होनी चाहिए. अभीजो शिक्षा नीति बनी है उसमें कुछ कदम इस तरफ  बढ़े हैं, यह अच्छी बात है. लेकिन इसे पूर्णता नहीं माननीचाहिए. पूर्ण नीति सरकार जब भी बनाएगी तब बनाएगी, पर तब भी इसका क्रियान्वयन केवल शिक्षा व्यवस्था नहीं करती है, धर्म और समाज भी करता है. सब मिलाकर इस वातावरण को बनाकर हमें चलना है.

 

अमोल – भारत में जब हम जनसंख्या को देखते हैं तो करीब 50% जनसंख्या वह महिलाओं की है. वहएक शक्ति है. उस शक्ति का विश्व गुरु भारत में किस प्रकार से योगदान चाहते हैं और यह किस प्रकार संभव हो सकता है?

हम स्त्रियों का बराबरी में योगदान चाहते हैं. उनको बराबरी में लाना पड़ेगा. उनको सक्षम करना पड़ेगा, उनको प्रबोधन देना पड़ेगा, उनको सशक्त बनाना पड़ेगा. कर्तृत्व उनमें है. उनको बाकी मदद करने कीजरूरत नहीं है. हमने जो दरवाजा बंद किया है केवल वह खोलना पड़ेगा. आज के समय में भारतीय महिला की यह प्रतिमा है कि घर परिवार की जिम्मेदारी के अतिरिक्त वह कुछ नहीं करेगी. घर परिवार की जिम्मेदारी के साथ वह सब कुछ करेगी. लेकिन इसके लिए घर-परिवार की जिम्मेदारी में उसको कुछ राहत और जितनी वह चाहे, उतनी स्वतंत्रता उसे देनी चाहिए. तो आज की परिस्थिति में, अपना यह जो स्थाई मूल्य है परिवार का,  उस परिवार में महिला का स्थान माता का है. उसकी सृजनशीलता भी है और वह शक्ति भी है. वह प्रतिभा भी देती है और साथ में पूरी ताकत भी देती है. उसके इस स्थान को पहचान कर उसको ना तो देवी बनाकर पूजा घर में बंद रखो और ना ही दासी बना कर उसे किसी कमरे में बंद करो.उसको भीबराबरी से काम करने दो, जिम्मेदारी लेने दो इसके लिए उसे सशक्त बनाओ. उसे आगे बढ़ाओ. अगर उसकी इच्छा है तो  आर्थिकदृष्टि से वह संपूर्ण हो सके,ऐसी उसको सलाह दो और अवसर दो. इस दिशा में हम थोड़े-थोड़े आगे बढ़ रहे हैं. यह हम करेंगे तो वह बराबरी से अपना सहभाग और सहयोग करेगी. वह बराबरी से करेगी, तो पुरुषों के भार को भी वह सहज रूप से बहुत हल्का बनाएगी. क्योंकि उनके ऐसा करने से भी हमारे यहाँ शक्ति का नया संचार होगा तथा हमारे काम ओर आसान हो जाएँगे. “इसलिए यह बराबरी का सहभाग और बराबरी की तैयारी”,  महिलाओं के बारे में यह स्थायी विचार होना चाहिए.

 

अमोल – भारत का वर्णन युवा भारत के रूप में किया जाता है, युवाओं से आप किस प्रकार की अपेक्षा करते हैं.

युवा शब्द से जो निर्देशित होता है हम वही अपेक्षा रखते हैं. युवा यानी वह किसी बेड़ी में नहीं अटकता ना किसी किताब में अपने आपको बाँधता है. युवा नित्य नया विचार करने में सक्षम होता है. वह सपने देखसकता है,वह बिना विचार के पूछ सकता है. उसमें साहस होता है. किसी भी तरह का रिस्क ले सकता है, उसमें उत्साह है, उसमें उदारता है. बच्चों में और युवकों में संवेदनशीलता अधिक होती है. बच्चों में सबसेअधिक होती है लेकिन बच्चों में ताकत नहीं होती है, वे परावलंबी होते हैं. युवा में ताकत भी रहती है इसलिए संवेदनशीलता के आधार पर वह सत्य और न्याय के साथ खड़ा रहता है और अगर वह मन से चाहे तो इधर का हिमालय उधर ले जाने की उसके पास ताकत है. अब यह इतनी बड़ी प्रचंड शक्ति हैक्षमतावाली कि उसे सिर्फ दिशा देनी है बाकी सब वह जानता है. लेकिन अगर युवा केवल अपने करियरऔर स्वार्थ का विचार करके चले, युवा किसी भी प्रकार के रिस्क से डरे, तो वह उद्योग नहीं करेगा. उसेहमेशा नौकरी ही करनी होगी क्योंकि नौकरी सुरक्षित है. अगर सरकारी मिल गई तो ज्यादा अच्छा है. ऐसा विचार करे तो वह काले बाल वाले बूढ़े हो गए और अब्दुल कलाम जैसे लोग सफेद बाल वाले जवान. वि.द. घाटे जी की एक किताब थी ‘पांढ़रे केस हिरवी मने.’ ‘हिरवी मने’ मुख्य बात है. हमारे तरुणों का हरा-भरा मन बनाए रखना चाहिए, इसलिए उनको प्रोत्साहन मिलना चाहिए. उनको दिशा देने के लिए, उनको सहायता करनी चाहिए और उनके सामने नए-नए भव्य क्षितिज उद्घाटित करने चाहिए. ताकि वे ऐसा कर सकें.

डॉक्टर जोशी प्रवास के लिए चीन गए थे. उनका प्रवास समाप्त होने के बाद उनको वापिस आना था.लेकिन चीन के राष्ट्रपति ने फोन करके उनको रोक लिया. कहा कि एक हमारे विश्वविद्यालय (युनिवर्सिटी) का सम्मेलन है.सारे देश के लगभग 2 लाख युवा आने वाले हैं. उसका उद्घाटन समारोह देखकर आप वापिस जाइये. यहबात सन1980 की होगी. उसका शुभारंभ ऐसा था की ये सब  युवा जहाँ बैठे थे, वहाँ  अंधेरा था. धीरे-धीरे प्रकाश होने लगा. सामने वाला पर्दा एकदम से जगमगा उठा और पूरे विश्व के नक्शे में चीन लाल- पीले रंग में, ऐसा थोड़ा उभरा हुआ दिखने लगा. चीन से ड्रैगन निकलकर सारी दुनिया के आकाश को पदाक्रांत  कर रहा है, ऐसा दिखाया गया. फिर निवेदक पृष्ठभूमि से कहता है कि एक जमाना ऐसा था जब चीन का ड्रैगन अपने पंखों की हवा से सारी दुनिया को साफ करता था. चीन के ड्रेगन की छाया सदा सर्वदा दुनियापर थी. हमको अपने चीन को ऐसा फिर से बनाना है. यह कम्युनिस्ट चाइना की बात है. लेकिन उसने अपनी युवा पीढ़ी के सामने एक लक्ष्य रखा है. जयप्रकाश जी ने इस्रायल में पूछा कि इतना सारा कष्ट झेलकर आपके युवा यहाँ आए हैं, उनको आप प्रेरित कैसे करते हैं? तब जयप्रकाश जी से यह पूछा गया कि यह बताइए आपके देश के युवकोंके मुख में गीत कौन से रहते हैं. तो युवाओं के सामने ऐसे सपने रखना, युवाओं के सामने आदर्श रखना क्योंकि युवा किसी भी प्रकार के दंभ को सहन नहीं करता और तुरंत पहचान जाता है. उनके सामने आचरण के भी उदाहरण रखने पड़ते हैं . हम ऐसा करेंगे तो युवा में सब कुछ है .

 

रवि – अभी जो कोरोना की आपत्ति का कालखंड आया है, उसके बाद हम आगे कैसे बढ़ेंगे इस बात की बहुत चर्चा हो रही है. भविष्य का भारत हमेशा चर्चा में रहा है. संघ प्रमुख के नाते आप इस विषय अर्थात “भविष्य के भारत पर” को किस रुप में देखते हैं .

मन की अयोध्या की बात मैने पहले ही कही है. भारत की व्यवस्थाओं के बारे में दुनिया की दृष्टि की बात आपने पूछी, वह मैंने बताई.

यह दोनों बातें ठीक हो जायेंगी तो भविष्य का भारत अपने आप गढ़ा जाने वाला है, क्योंकि आज अपने देश में विशेषकर युवा पीढ़़ी में अपने देश को बड़ा बनाने की चाह है. सौभाग्य से घटनाएँ ऐसी घट रहीहै कि हमारा विश्वास अधिक से अधिक बढ़ रहा है. कोरोना की आपत्ति में स्वतंत्रता के बाद पहली बार यह दृष्य हमने देखा कि बिना किसी के बताए पूरा-पूरा समाज एक साथ खड़ा हो गया. किसी ने भी सरकार की राह नहीं देखी. स्वयं से होकर किया. आजकल मीडिया में बहुत बातें नकारात्मक (negative ) ही आती हैं. यहाँ सिर्फ कोरोना पॉजिटिव की संख्या ही आती है निगेटिव की नहीं आती. हमने देखा कि कोरोना के समय अनेक मालिकों ने अपने मजदूरों को बिना काम के भी रखा, छोड़ा नहीं, उन्हें पूरा वेतन दिया. अब मालिक अपना उद्योग शुरु करने जा रहे हैं तो बहुत अधिक स्थानों पर यह अनुभव आ रहा है कि मज़दूर  कह रहे हैं कि उस समय आपने हमको पाला, अब आप कठिनाई में हैं तो आप वेतन बाद में दे देना. हम कार्य प्रारंभ करते हैं. सब मिलाकर समाज एक साथ खड़ा हुआ है.दूसरी बात, शासन व्यवस्था, प्रशासन व्यवस्था जो कुछ कहती है उसका अपने समाज के अनुशासन के स्त्तर का देखेंगे तो उसकी तुलना में उसने उसका बहुत अच्छा पालन किया है. और सिर्फ पालन ही नहीं किया, एक विश्वासका नाता भी दिखा. जैसे प्रधानमंत्री जी ने कहा कि “दीप जलाओ या थाली बजाओ”. कुछ लोग ऐसा कहने वाले भी थे कि इन बातों से क्या होगा. लेकिन सामान्य समाज ने ऐसा नहीं कहा. उसने कहा कि प्रधानमंत्री कह रहे हैं तो जरूर इससे कुछ होगा, इसलिए करना है. शास्त्रीजी के समय में भी ऐसा दिखा था, 1971 के युद्ध में इंदिरा जी के समय में भी ऐसा दिखाई दिया था. मैं यह व्यक्तियों की प्रशंसा करने के लिए नहीं कह रहा हूँ. मैं यह कह रहा हूँ कि समाज जब खड़ा होता है तो वह अपने अंदर की उर्जा के कारण खड़ा होता है. उसको लगता है कि ये चुनौतियाँ हमारे देश को नहीं झुका सकती. आज चीन की चुनौती है. 8 साल का बच्चा भी, जो खिलौना उसने हठ करके लिया है, जब वह यह देखता है कि यह चीन निर्मित (made in China) है तो उसको फेंक देता है. मेरे पैसे वापस करो,  मुझे यह नहीं चाहिए,वह ऐसा कहता है. आज ऐसा वातावरण है ,  इसलिए यह भावना जागी है. इस भावना के लिए आवश्यक जो गुण संपदा वह मन की अयोध्या में मैंने कहा है और इसके लिए भविष्य का मार्ग (roadmap) जो होगा वह “भारतीय मानस के आधार पर कॉलोनाइजिंग के प्रभाव से पूर्णतया मुक्त होगा”. अन्य देशों से जो देश-काल-परिस्थिति सुसंगत है, अच्छा है, देश के लिए उपयुक्त है, वह हम ले सकते हैं. ये दो बातें हम करेंगे तो तीसरी बात करने की आवश्यकता नहीं है.

 रवि – जब भी भविष्य के भारत का विषय होता है तब “विश्वगुरु भारत” यह विषय भी चर्चा में आता है. स्वामी विवेकानंद जी से लेकर श्रीगुरुजी तक अनेक महापुरुषों ने विश्वगुरु भारत की संकल्पना व्यक्त की है. आज की स्थिति में विश्वगुरु भारत कैसा होगा. अनेक देशों की तरह अर्थ सत्ता के बल पर दूसरों को झुकाने वाला या विश्व गुरु भारत. हमारी संकल्पना क्या है.

हम सत्ता पर तो विश्वास ही नहीं करते. हम जब बड़े होते हैं तो भूभाग नहीं शत- शत मानवों के हृदय जीतने का हमारा हैं.

एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:.

स्वं स्वं चरित्रं शिक्षरेन्पृथिव्यां  सर्वमानवा: .

अपने-अपने चरित्र, एक-एक के चरित्र द्वारा दुनिया को यह शिक्षा हमें देनी है. हम किसी को हड़पना नहीं चाहते और किसी का वैशिष्ट्य नष्ट नहीं करना चाहते. हम किसी देश को गुलाम नहीं बनाना चाहते और  किसी की संपत्ति हथियाना भी नहीं चाहते. इस अर्थ में हम महाशक्ति बनना नहीं चाहते. हमारी शक्ति होगी, हमारा ज्ञान होगा, हमारे पास धन-संपत्ति भरपूर होगी, दुनिया में अर्थ की दृष्टि में  क्रमांक एक  हम होंगे, लेकिन हम इसका उपयोग क्या करेंगे – “ज्ञानाय  दानाय  च रक्षणाय”  हमारे यहाँ कहा जाता है-

विद्या विवादाय धनं मदाय, शक्तिः परेषां पिरपीडनाय.

खलस्य साधोर्विपरीतमेतत्, ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ॥

जो महाशक्ति बनते है वो डंडा चलाते हैं. हम ऐसा नहीं करेंगे. हम दुनिया का ज्ञान बढ़ाने के लिए अपनेज्ञान का उपयोग करेंगे. दुनिया में दुर्बल की रक्षा हो हम इस तरह अपनी शक्ति का उपयोग करेंगे. दुनिया में जिनके पास नहीं है उनको देंगे. हमारी संपत्ति बढ़ेगी तो हम दूसरों को देंगे. बाकी लोगों को अपने अस्तित्व (survival) की चिंता है. उनके बुनियादी विचार ही ऐसे हैं. अच्छा बुरा छोड़ दीजिए. उनके अनुभव से उनकानिष्कर्ष यह है. यह दौड़ (race ) है, उसमें जीतना है. जो आगे रहेगा वह जीतेगा. किसी भी प्रकार से आगे चलो.वह कितनी भी चिकनी चुपड़ी बातें कर दें गंतव्य तो वही रहता है. अंत में सब वापस आ जाते हैं. “संपूर्ण  विश्व” वैश्विक बाजार, (global market )  आदि की बात बार-बार करते थे, पर आज कह रहे हैं स्वदेशी-स्वदेशी (National-National). क्योंकि कोई विचार तब तक है जब तक अपने को वह हानि नहीं पहुँचाता. लेकिन भारत का ऐसा नहीं है. भारत कहता है कि “सब जिएँगे तो हम जिएँगे, और अगर हम जिएँगे तो सब जीने चाहिए”. जब भारत ऐसा देश बनेगा तो लोग इसे विश्व गुरु मानेंगे. वैसे आज भी विश्व हमें मानता है. कारगिल के युद्ध के बाद उसका अध्ययन करने के लिए चार-पांच प्रगत देशों की टीमें भारत में आईं थी. हमारे जवानों का शौर्य और पराक्रम है ही, पर सर्वाधिक महत्व की बात है कि दूसरे देश के द्वारा लादा गया युद्ध उनकी सीमा का उल्लंघन ना करते हुए हमने कैसे जीता? यह विचार कौन कर सकता है? यह विचार केवल भारतीय कर सकते हैं. यह सही है या गलत, यह चर्चा छोड़ दीजिए,  लेकिन यह विचार मन में आना यह सिर्फ भारत में ही हो सकता है. इसलिए भारत जब विश्व गुरु बनेगा, तब भारत “एक देश के नाते एक राष्ट्र का आचरण” से और भारत के एक-एक व्यक्ति के जीवन के अनुसरण से, सारी दुनिया अपना जीवन बनाएगी. अमेरिका में 65 % लोग शाकाहार का उपयोग क्यों कर रहे हैं, सारा विश्व योग क्यों कर रहा है? धीरे-धीरे पूरी दुनिया हमारी ओर देख रही है और विचार कर रही है. हम दुनिया की आवश्यकता पूर्ण करने वाले बनेंगे, ऐसी शक्ति हमारे पास होनी चाहिए.

 अमोल – भारतीय जनमानस में रामराज्य के प्रति  सदियों से गहरी आस्था है .  रामराज्य की संकल्पना क्या है और उसे हम वर्तमान में किस प्रकार से पूरी कर सकते हैं?

जनता नीतिमान और राजा शक्तिमान और नीतिमान इस प्रकार की वो व्यवस्था थी. जनता के सामने राजा नम्र था और राजा की आज्ञा में जनता थी. यानी लोगों की चलेगी या राज्य की चलेगी ऐसा सवाल नहीं था. राजा कहता था जैसा लोग कहेंगे वैसा होगा और समाज कहता था कि राजा को सब पता है वह जो कहेगा वैसा होगा.मुख्यत: चोरी-चपाटी की बातें नहीं थी. नीतिमानता थी, उद्योग-परिश्रम की कीमत थी. श्रम को आदर और सम्मान दिया जाता था और अपने परिश्रम से जीने की युक्ति थी अत: समृद्धि थी. अपने यहां श्रीसूक्त में एक  मंत्र है – कि अगर लक्ष्मी नहीं है तो उसके क्या लक्षण होते हैं –  क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहं. अर्थात रोग, भूख और प्यास यह एक लक्षण है. दूसरा है क्रोध, मात्सर्य यानि एक दूसरे से ईर्ष्या, लोभ, गुस्सा अर्थात आपस में लड़ाई,  अस्वच्छता यह सब अलक्ष्मी के लक्षण हैं. यह सब नहीं थे, इसलिए भरपूर लक्ष्मी थी और धन का व्यय धर्म के लिए होता था भोग के लिए नहीं. जितने भोग आवश्यक थे वह सब दिए जाते थे. जहां-जहां आवश्यकता है वहां थोड़ा बहुत जीवन रंगबिरंगा हो इसलिए साज-सज्जा भी रहती थी. कनवीनियंस थे, आवश्यकताएँ  पूरी की, पर भोग-विलास (लक्सरीज ) को टाला. इस प्रकार का जनजीवन  अपने को समझने वाला,  अनुशासित, संयमित,जागरूक, संगठित और राजा धर्म की रक्षा करने वाला और स्वयं धर्म से चलने वाला, नियमों का पूर्ण पालन करने वाला, सत्ता को प्रतिष्ठा मानकर उसका उपयोग जनहित के लिए करने वाला था. यानी राजा बोल रहा था कि राज्य आपका है आप करो. पिताजी के मन में भी यही था पर माताजी के कारण राम को जंगल में भेज दिया. वे चले भी गए. भरत ने कहा मुझे राज्य मिला. माताजी का भी आग्रह छूट गया. अब मैं आपको कह रहा हूं वापस चलो. पर राम जी कहते हैं नहीं, मैंने वचन दिया है. यह दोनों सत्ताधारी हैं लेकिन राज्य का लालच किसी को भी नहीं है. आखिर भरत को वापस जाना पड़ा तो राम की पादुका को सिंहासन पर बिठाया. तो राजा ऐसे और प्रजा ऐसी – यह रामराज्य था. व्यवस्थाएं आज बदल गई हैं. लेकिन लोगों की नियत-नीति, भौतिक अवस्था, राजा की नियत-नीति और भौतिक अवस्था यानि राज्य शासन में जितने भी लोग हैं और इस बीच जो प्रशासन है यह तीनों की जो गुणवत्ता (क्वालिटी) है. वह गुणवत्ता  हमको फिर से लानी पड़ेगी. उस क्वालिटी को रामराज्य कहते हैं. उसके परिणाम यह है कि रोग नहीं रहते, असमय मृत्यु नहीं होती, कोई भूखा नहीं, कोई प्यासा नहीं, कोई भिखारी नहीं, कोई चोर नहीं, कोई दंड देने के लिए नहीं तो फिर दंड क्या करें. यह सारी बातें परिणाम स्वरूप है क्योंकि उसके मूल में राज्य व्यवस्था-प्रशासन व्यवस्था और सामाजिक संगठन इन तीनों की एक वृत्ति है. राम के अवतार लेने से यह नहीं होगा. राम का अवतार तो बाधा हटाने के लिए था. समाज की ऐसी स्थिति थी इसलिए बाधाएँ हटने के बाद यह सब हो गया. तो आज समाज की स्थिति रामराज्य जैसी बनानी पड़ेगी.क्योंकि आज राजा भी और प्रशासन भी समाज से ही जा रहा है. हम वहां से शुरू करेंगे तो राम राज्य आएगा.

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October 9th 2020, 1:10 am

आत्मनिर्भरता – हुनरमंद कलाकारी से रंग जमाने लगा सरगुजिहा कालीन, तिब्बती पैटर्न का कालीन उद्योग पुनर्

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सरगुजा के सुदूर वनांचल क्षेत्र में रहने वाली वनवासी महिलाओं के हुनरमंद हाथों से बना कालीन दिल्ली और मुंबई सहित देश के महानगरों में पहुंचने लगा है. प्रख्यात सूफी गायक कैलाश खेर ने भी ट्विटर पर इसकी प्रशंसा की है. महिलाओं ने मैनपाट में रह रहे तिब्बतियों से कालीन बनाने की कला सीखी और उसमें अपनी संस्कृति का रंग घोल दिया. नई दिल्ली, अहमदाबाद, रायपुर और अंबिकापुर में स्थित बोर्ड के शोरूम से मांग आनी शुरू हो चुकी है. अमेजन से अनुबंध तथा डिजिटल कैटलाग के माध्यम से बोर्ड को लगातार आर्डर मिल रहे हैं. इससे परंपरागत कालीन को नई पहचान मिल रही है.

क्षेत्र में उद्योग नहीं होने के कारण महिलाएं उत्तरप्रदेश के भदोही और मिर्जापुर में जाकर प्रतिदिन 250 से 300 रपये की मजदूरी पर कालीन बनाती थीं. लॉकडाउन के कारण घर वापसी के बाद अब महिलाओं को रोजगार की नई दिशा मिली. सरगुजा के लुंड्रा, मैनपाट व सीतापुर विकासखंड के एक सौ से अधिक कालीन बुनकर उत्तरप्रदेश के भदोही व मिर्जापुर से लौटे थे, इनमें से महिला बुनकरों को कालीन बुनाई से जोड़ने का काम शुरू किया गया है. रघुनाथपुर में कालीन बुनाई का काम शुरू हो चुका है. बतौली और सीतापुर विकास खंड में भी केंद्र शुरू किए जा रहे हैं.

तिब्बती पैटर्न का कालीन उद्योग पुनर्जीवित

मैनपाट में तिब्बतियों ने वर्ष 1959 में कालीन उद्योग की शुरुआत की थी. यहां बनने वाले तिब्बती पैटर्न के कालीन आकर्षक और प्राकृतिक धागों के कारण बहुत लोकप्रिय रहे. सरगुजा जिले के कालीन बुनकरों को नियमित रोजगार देने के लिए दो दशक से बंद पड़े इस उद्योग को पुनर्जीवित करने का काम शुरू किया गया. बड़े शोरूम और अमेजन से मार्केटिंग की व्यवस्था सरगुजा के परंपरागत कालीन के मार्केटिंग की व्यवस्था भी हस्तशिल्प विकास बोर्ड के माध्यम से की गई.

हस्तशिल्प विकास बोर्ड के प्रबंधक राजू राजवाड़े ने बताया कि भदोही और मिर्जापुर में भी अब परंपरागत कालीन बुनाई लगभग समाप्त हो चुकी है. आधुनिकता की दौड़ और प्रतिस्पर्धा से सिंथेटिक आइटमों का उपयोग शुरू किया जा चुका है. हम परंपरागत कालीन पर ही काम कर रहे है. भेड़ के उन और परंपरागत रंगों से निर्मित कालीन की मांग आज भी है. हमें सरगुजा में डाइंग यूनिट स्थापित करनी है, इसके लिए हम पानीपत और बीकानेर की निर्माता कंपनियों के संपर्क में है. वर्तमान में कच्चे माल की आपूर्ति भदोही से ही की जा रही है. डांगबड़ा, देवगढ़, बटवाही ऐसे गांव है, जहां के परिवार भदोही व उत्तरप्रदेश जाते थे. इन परिवारों की महिलाओं को कालीन बुनाई से जोड़ दिया गया है. दूसरी महिलाओं को प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है. पुरुषों को मैनपाट के कालीन बुनाई केंद्र से जोड़ा जा रहा है. कालीन बुनाई के केंद्र बतौली व सीतापुर ब्लाक में भी आरंभ करने की तैयारी हो चुकी है.

सूफी गायक कैलाश खेर तिब्बती पैटर्न के ड्रैगन कालीन की लोकप्रियता के मुरीद हो गए. उन्होंने ट्वीट कर मैनपाटवासियों द्वारा तैयार किए जा रहे आकर्षक कालीनों की सराहना की है. कैलाश खेर ने अपने ट्वीट में कहा – छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में 1959 से बसे तिब्बती लोगों ने आदिवासियों को कालीन बुनाई का काम सिखाया. इन कालीनों में सूत और उन का इस्तेमाल किया जा रहा है.

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October 8th 2020, 2:20 pm

खिलाफत आंदोलन – मोपला जिहाद

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डॉ. श्रीरंग गोडबोले

खिलाफत आंदोलन के बीच हिंसा की कई घटनायें हुईं. खिलाफत आंदोलन के दौरान 1919-1922  के बीच मुस्लिम दंगों की अनुमानित सूची इस प्रकार है (गांधी एंड अनार्की, सर सी शंकरन नायर, टैगोर एंड कंपनी मद्रास, 1922, पृ. 250, 251): नेल्लोर (22  सितंबर 1919), मुथुपेट, तंजावुर (मई 1920), मद्रास (1920 मई), सुक्कुर, सिंध (29 मई 1920), काचागढ़ी, उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत (8 जुलाई 1920), कसूर, पंजाब (25 अगस्त 1920), पीलीभीत, यूपी (23 सितंबर 1920), कोलाबा जिला बॉम्बे (9 जनवरी 1921), नैहाटी, बंगाल (4, 5 फरवरी 1921), कराची (1 अगस्त 1921), मद्रास (5 अक्टूबर 1921), कलकत्ता (24 अक्टूबर 1921), हावड़ा (4 नवंबर 1921), कूर्ग (17 नवंबर) 1921), कन्नूर (4 दिसंबर 1921), जमुनामुख, असम (15 फरवरी 1922), सिलहट (16 फरवरी 1922).

लेकिन क्रूरता की सभी सीमाएं लांघ दी उत्तरी केरल के मालाबार में सन् 1921-1922 में हुए मोपला जिहाद ने! मोपला जिहाद को ब्रिटिश अधिकारियों और उनके हिंदू सहयोगियों के खिलाफ एक राष्ट्रवादी विद्रोह या हिंदू जमींदारों के खिलाफ एक मुस्लिम किसान विद्रोह के रूप में वर्णित किया गया है. कम्युनिस्ट नेता ई.एम.एस. नंबूदरीपाद के अनुसार “एरनाड और वल्लुवनाड तालुकों के अनपढ़ पिछड़े मोपलाओं को जन्मियों (भूमि के वंशानुगत धारक) के उत्पीड़न के खिलाफ विरोध की पहली आवाज उठाने का श्रेय जाता है” ( शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ़ पीजेंट मूवमेंट इन केरला, .एम.एस नंबूदरीपाद, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, बॉम्बे, 1943, पृ.1). आश्चर्य की बात है कि भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन स्वतंत्रता सेनानी एवं पुनर्वास विभाग, स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन योजना के अंतर्गत खिलाफत आंदोलन और मोपला विद्रोह, दोनों में भाग लेने वालों को स्वतंत्रता सेनानियों के रूप में मान्यता देता है.

पूर्वाग्रह से दूर रहने के लिए, हम कालीकट के पूर्व डिप्टी कलेक्टर रहे दीवान बहादुर सी. गोपालन नायर की पुस्तक मोपला रेबेलियन 1921’ (नॉर्मन प्रिंटिंग ब्यूरो, 1923 द्वारा प्रकाशित) का आधार लेंगे, जो कि ‘मद्रास मेल’ और ‘वेस्ट कोस्ट स्पेक्टेटर’ समाचार-पत्रों में छपे समकालीन समाचारों और लेखों का मात्र कोरा घटनाक्रम प्रस्तुत करता है.

कौन हैं मोपला?

मपिल्ला नाम  (अनु. दामाद; अंगरेजी रूप; मोपला) मलयाली भाषी मुस्लिमों को दिया जाता है, जो उत्तरी केरल के मालाबार तट पर बसे हुए हैं. 1921 तक, मोपला मालाबार में सबसे बड़ा और सबसे तेजी से बढ़ता  समुदाय बन गया. इनकी आबादी तक़रीबन 10 लाख थी जो पूरे मालाबार की जनसँख्या का 32 प्रतिशत थी| अधिकांश मोपला दक्षिण मालाबार में केंद्रित थे. जिहाद के केंद्र एरनाड तालुके में, इनकी संख्या कुल आबादी का 60 प्रतिशत थी ( मपिल्ला रेबेलियन, 1921: पीजेंट रिवोल्ट इन मालाबार, रॉबर्ट एल हार्डग्रेव जूनियर, मॉडर्न एशियन स्टडीज, खंड 11, क्रमांक– 1, 1977, पृ. 58).

हालांकि तत्कालीन मालाबार जिले में दस तालुके शामिल थे, परन्तु मार्शल लॉ को एरनाड, वल्लुवनाड, पोनानी, दक्षिण मालाबार के कालीकट और उत्तरी मालाबार के कुरुम्ब्रनाड और वायनाड में घोषित किया गया था. पहले चार तालुकों, जो हिंसा की चपेट में आएं, का क्षेत्रफल और धार्मिक जनसांख्यिकी इस प्रकार थे (नायर, उक्त, पृ.1,2):

 

तालुका क्षेत्रफल  (वर्ग मील) प्रभावित /कुल गाँव हिन्दू मुस्लिम ईसाई
एरनाड 966 94/94 163,328 237,402   371
कालीकट 379 23/65 196,435   88,393 5763
वल्लुवनाड 880 68/118 259,979 133,919    619
पोन्नानी 426 35/121 281,155 229,016  23,081

मुस्लिमों ने वाणिज्यिक उद्देश्यों की पूर्ती की आड़ में  मालाबार में अपने पैर जमाये. बताया जाता है कि कालीकट के स्थानीय राजा चेरामन पेरुमल को इस्लाम कुबूल करने को इन मुस्लिमों ने प्रोत्साहित किया. राजा ने अरब मिशनरियों को मालाबार में आगे बढ़ने और इस्लाम का प्रचार करने के लिए कहा. एक 15 सदस्यीय दल जिसका मुखिया मलिक-इब्न-दीनार था त्रिशूर जिले के कोडंगलूर में उतरा. स्थानीय शासकों से अनुमति प्राप्त करने के बाद, उन्होंने मालाबार और दक्षिण कनारा में दस मस्जिदों का निर्माण किया और इस्लाम के प्रचार की शुरुआत की. मोपला समुदाय का उद्गम इस प्रकार से बताया जाता है.

कालीकट के ज़मोरिन शासक ने अरब जहाजों के लिए नाविक तैयार करने के लिए धर्मान्तरण को प्रोत्साहित किया. उसने आदेश दिया कि मछुआरों के प्रत्येक परिवार में कम से कम एक पुरुष सदस्य को मुहम्मडन के रूप में पाला जाए (डिस्ट्रिक्ट गजेटियर). अगस्त 1789 में टीपू सुल्तान के अभियान के दौरान बड़े पैमाने पर जबरन धर्मांतरण कराया गया(नायर, उक्त, पृ.3, 4).

उत्तरी मालाबार के मोपलाओं को उच्च जातियों के संपन्न वर्गों में से धर्मान्तरित किया गया था, जबकि दक्षिण मालाबार में  मुख्य रूप से निम्न माने जाने वाले तीय्या, चेरुमन और मुक्कुवन जाति से संबंधित आबादी धर्मान्तरित हुई(हार्डग्रेव, उक्त,, पृ.59).

पिछले मोपला उपद्रव

जैन अल-दीन अल-मआबारी द्वारा 1580 के दशक में लिखे ‘तुहफात अल-मुजाहिदीन फी बआद अहवाल अल-पुर्तुकालिय्यीन’ (पुर्तगालियों द्वारा किये गए कर्मों के सम्बन्ध में पवित्र योद्धाओं को उपहार) पुस्तक में सोलहवीं शताब्दी के मालाबार का अरबी इतिहास है. मोपलाओं को पुर्तगालियों के विरुद्ध जिहाद लड़ने की प्रेरणा देने का इस पुस्तक का उद्देश्य था. उल्लेखनीय है कि मोपलाओं के बीच अखिल-इस्लामी भावना सबसे पहले सोलहवीं शताब्दी में ही देखी गई है, जब उन्होंने इंडोनेशिया के एचेनी मुस्लिमों के साथ पुर्तगालियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी. मोपलाओं  के बीच अशांति का दस्तावेजी विवरण 1742 से प्राप्त होने लगता है. मार्च 1764 में तालसेरी  के पास धर्मादम किले में एक पुर्तगाली चर्च पर दो मोपलाओं द्वारा बड़ा हमला किया गया था. यह ( इस्लामिक फ्रंटियर इन साउथ वेस्ट इंडिया  शहीद एज अ कल्चरल आइडियल्स अमंग द मपिल्लास ऑफ़ मलाबार, स्टीफन एफ डेल, मॉडर्न एशियन स्टडीज, खंड 11, क्रमांक 1, 1977, पृ. 42-43, 48, 52) . इन उपद्रवों ​​का विश्लेषण स्टीफन डेल द्वारा किया गया है ( मपिल्ला आउटब्रेक्स: आइडियोलॉजी एंड सोशल कनफ्लिक्ट इन नाइनटीन्थ सेंचुरी केरला, जर्नल ऑफ एशियन स्टडीज वॉल्यूम 35, नंबर 1, नवंबर, 1975, पृ. 85-97).

1836 से लेकर 1921 के बीच मोपलाओं की लगभग तैंतीस हिंसक गतिविधियाँ दर्ज की गई थीं, जिनमे एक दर्ज़न से अधिक 1836 के बाद के सोलह वर्षों में ही घटित हुईं| लगभग सभी हिंसक गतिविधियाँ  ग्रामीण क्षेत्रों में हुईं , इनमे से एक को छोड़कर सारी गतिविधियाँ  कालीकट और पोन्नानी के बीच के क्षेत्र में सीमित थीं|  इनमे तीन को छोड़कर, बाकि सारी हिंसक घटनाओं में हिंदुओं पर मोपलाओं द्वारा हमले किए गए थे. हालाँकि ये उपद्रव बहुत मामूली थे और कुछ दिनों के भीतर दबा दिए गए| इनमें हमलावरों की संख्या सीमित थी और केवल तीन बार ही तीस से अधिक मोपलाओं ने एक हमले में भाग लिया.

कुछ मामलों में शहीद बनने की कोशिश के चलते  इसमें शामिल सभी मोपलाओं की आत्महत्या के उदाहरण भी देखने में आये. इन हमलों में सीधे तौर पर शामिल 350 मोपलाओं में से 322 की मौत हो गई और केवल 28 ही बच पाए. अंतिम आत्मघाती हमले के लिए अनुष्ठान वास्तविक हमले से कई सप्ताह पहले शुरू हुए थे.

33 घटनाओं में से, नौ का कारण, स्पष्ट रूप से ग्रामीण वर्ग के संघर्ष में निहित था; तीन अन्य घटनाओं को आंशिक रूप से कृषि संबंधी शिकायतों के कारण मौक़ा मिला था. लेकिन तेरह अन्य अपेक्षाकृत बड़े हिंसक उपद्रव थे जिनमें कृषि संबंधी विवादों के साथ कोई स्पष्ट संबंध नहीं था. इनमें से चार व्यक्तिगत झगड़े के परिणामस्वरूप हुए. दो ब्रिटिश कलेक्टरों पर हमले थे – एक पर इसलिए क्योंकि उन्होंने एक मुस्लिम नेता को निर्वासित किया था और दूसरे पर इसलिए क्योंकि उन्होंने एक हिंदू लड़के को जिसे जबरन इस्लाम में परिवर्तित किया गया था, को बचाया था. तीन मामलों में हिंदुओं और उनके परिवारों को मार दिया गया था क्योंकि उन्होंने इस्लाम में धर्मान्तरित होने के बाद फिर अपने मूल धर्म को दोबारा अपना लिया. अंत में, आठ मामलों में, हमलावरों के इरादों का अनुमान लगाना असंभव है. सैय्यद फ़ज़ल (1820-1901) जैसे मजहबी नेता, जिन्होंने जिहाद का प्रचार किया, मोपला हिंसक उपद्रव के कर्ता धर्ता थे. ये नेता दो प्रकार के थे – थंगल जो आमतौर पर अरब थे और क़ाज़ी और अधिक महत्वपूर्ण मस्जिदों में इमाम के रूप में काम करते थे| और दूसरे मुसलियर थे जो आमतौर पर कम शिक्षित थे और मुल्लाओं के रूप में काम करते थे.

केवल आर्थिक कारण पिछले मोपला हिंसक उपद्रवों ​​को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं कर सकते हैं. कृषि भूमि से निष्कासन एक प्रमुख कृषि संबंधी शिकायत थी. उल्लेखनीय है कि विभिन्न हिन्दू कृषक जातियाँ 1862-1880 के दौरान भूमि निष्कासन के दो-तिहाई मामलों में मुख्य पीड़ित रही. लेकिन उनके द्वारा किसी हिंसक गतिविधि का कोई उल्लेख नहीं.

दूसरे, निष्कासन के बढ़ने के साथ मोपला उपद्रव नहीं बढ़ा. 1862-1880 के अठारह वर्ष की अवधि में केवल तीन हिंसक घटनाएं हुईं जब निष्कासन के आदेशों की संख्या 1,891 से नाटकीय रूप से  बढ़कर 8,335 तक हो गई. अंत में मोपला मालाबार जिले के हर तालुके में थे.  लेकिन एक अपवाद को छोड़कर साड़ी हिंसा दक्षिणी तालुकों के छोटे हिस्से तक सीमित थी.

इन उपद्रवों और 1921-22 के जिहाद के बीच मुख्य अंतर यह है कि 1921 में, खिलाफत आंदोलन ने मजहबी उग्रवाद और सामाजिक संघर्ष की पूर्व परंपराओं के साथ विचारधारा और संगठन के महत्वपूर्ण तत्वों को जोड़ा.

जिहाद के बीज

मालाबार जिले में खिलाफत आंदोलन की शुरुआत 28 अप्रैल 1920 को मालाबार डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में एक प्रस्ताव द्वारा हुई जिसका आयोजन  एरनाड तालुके के मंजेरी में किया गया था. इस सम्मेलन में लगभग 1000 प्रतिनिधियों ने भाग लिया. मोपलाओं ने सरकार से तुर्की समस्या का निपटारा करने का आग्रह किया, जिसके असफल होने पर उन्होंने लोगों से सरकार के साथ लगातार बढ़ते असहयोग की नीति को अपनाने का आह्वान किया. मौलाना शौकत अली की अध्यक्षता में मद्रास में आयोजित खिलाफत कांफ्रेंस की बैठक में यह नीति निर्धारित की गई थी (नायर, उक्त, पृ. 8).

गांधी और शौकत अली ने 18 अगस्त, 1920 को कालीकट का दौरा किया. खिलाफत और असहयोग पर उनके भाषणों के कारण मालाबार में खिलाफत समितियों की स्थापना हुई. जिहाद से कुछ महीने पहले प्रमुख मोपला केंद्रों पर अतिविशाल रैलियों का आयोजन किया गया (नायर, उक्त, पृ. 8-10) .

जब मद्रास के एक खिलाफत नेता याकूब हसन, 15 फरवरी 1921 को खिलाफत और असहयोग बैठकों को संबोधित करने के उद्देश्य से कालीकट गए थे, तो उनके विरुद्ध प्रतिबंधात्मक आदेश दिए गए. इससे मोपलाओं  के बीच गंभीर नाराजगी पैदा हुई(नायर, उक्त, पृ. 12, 15-16).

खिलाफत के प्रचारक देश भर में घूमते रहे और उन्होंने खिलाफत का प्रचार प्रसार किया. साथ ही बड़े पैमाने पर अफवाहें फैलाई गईं कि अफगान भारत पर आक्रमण करने वाले हैं. स्वराज की प्रत्याशा में, खिलाफत नेताओं ने कथित तौर पर गरीब मोपलाओं को जमीन वापस दे दी थी और केवल वास्तविक कब्जे के लिए आंदोलन का इंतजार कर रहे थे. मद्रास में मौलाना मुहम्मद अली द्वारा दिए गए एक भाषण को मालाबार में पैम्फलेट के रूप में प्रसारित किया गया जिसे  जिला अधिकारियों ने प्रतिबंधित कर दिया (हार्डग्रेव, उक्त, पृ. 71).

जिहाद के लिए अनुकूल कारक

हर मोपला केंद्र में एक ख़िलाफ़त एसोसिएशन मौजूद थी, जिसमें मोपला अध्यक्ष, मोपला सचिव और बहुसंख्यक मोपला सदस्य थे. ऐसी खिलाफत कमेटियों की संख्या ज्ञात नहीं है, लेकिन यह अनुमान है कि एरनाड और पोन्नानी के दो तालुकों में ही लगभग 100 ‘खिलाफत कमेटियां’ गठित हो चुकी थीं (नायर, उक्त, पृ. 16, 18). प्रत्येक गाँव का अपना खिलाफत एसोसिएशन था, और गाँवों के बीच सूचनाओं के आदान प्रदान की एक नियमित प्रणाली थी, जिसके द्वारा एक बड़े क्षेत्र के मोपला पुरुषों को तेजी से किसी निश्चित स्थान पर बुलाया जा सकता था. मस्जिद में केन्द्रित इबादत की प्रणाली ने मुस्लिम बस्ती के अधिक सकेंद्रित पैटर्न को आकार दिया जो मालाबार की अधिक छितरी हुई हिंदू आबादी से पूर्णत: अलग था (हार्डग्रेव, उक्त, पृ. 72).

जिला पुलिस अधीक्षक आर.एच. हिचकॉक, ने लिखा है, “खिलाफत आंदोलन के नेटवर्क से कहीं अधिक महत्वपूर्ण, मपिल्लाओं के बीच संचार की पारंपरिक प्रणाली थी. यह ऐसा बिंदु था जो हिंदू और मपिल्ला के बीच एक बड़ा अंतर निर्मित करता था. कुछ बाज़ारों में पूर्ण रूप से मपिल्ला ही मौजूद हैं, और अधिकांश मपिल्ला सप्ताह में कम से कम एक बार शुक्रवार की नमाज के लिए और अक्सर मस्जिदों में अन्य समय पर भी एकत्र होते हैं. इसलिए वे अपनी खुद की किसी तरह की सार्वजनिक राय बना सकते हैं और जोड़ सकते हैं लेकिन यह सारा काम धर्म की आड़ में किया जाता है, इस कारण  हिंदू या यूरोपीय लोगों को भी इसके बारे में कुछ भी जानकारी होना मुश्किल हो जाता है. कभी कभी पड़ने वाले त्योहारों को छोड़कर हिंदुओं के पास ऐसा कोई अवसर नहीं है ( हिस्ट्री ऑफ मालाबार रेबेलियन, आर.एच. हिचकॉक, गवर्नमेंट प्रेस, मद्रास, 1921, पृ.3). मोपलाओं ने अपने आप को विभिन्न प्रकार के हथियारों से लैस कर लिया था. इनमें सींग वाले हैंडल के साथ लगभग दो फीट लंबी तलवारें शामिल थीं, एक ओर अथवा दोनों ओर धार वाले तथा शीर्ष पर नुकीले किए गए लगभग डेढ़ फीट लंबे शिकार के चाकू; साधारण मोपला चाकू, लाठियां, मम्मुथी और कुल्हाड़ी इत्यादि शामिल थीं ( मैपिला रेबेलियन 1921-1922, जी.आर.एफ टोटेनहैम, गवर्नमेंट प्रेस, मद्रास, 1922, पृ. 36).

मालाबार क्षेत्र की अलग थलग भौगोलिक स्थिति, विशेषकर अंदरूनी पहाड़ी इलाकों ने जिहादियों को घेरने का काम मुश्किल कर दिया. जिहादी अलग-अलग गिरोहों में बंट गये और युद्ध के गुरिल्ला तरीके अपनाकर उन्होंने बड़ी ही कठिन सैन्य समस्या प्रस्तुत कर दी (टोटेनहम, उक्त, पृ. 38). स्थानीय पुलिस, जिनमे से कई मोपला भी थे,  स्थितियों का मुकाबला करने में  लिए पूरी तरह से असमर्थ साबित हुए. पुलिस थानों पर छापा मारा गया; जिसमे व्यावहारिक रूप से पुलिस द्वारा कोई प्रतिरोध भी नहीं किया गया और सभी हथियार विद्रोहियों द्वारा छीन लिए गए थे (नायर, उक्त, पृ. 71; टोटेनहैम, उक्त, पृ. 7).

अंत में, लेकिन महत्वपूर्ण रूप से, हिंदुओं को हिंदू-मुस्लिम एकता के नासमझ नारों तले दबा दिया गया. जैसा कि टोटेनहैम लिखते हैं, “महात्मा के अहिंसा के हिंदू म्यान को  इस्लाम की हिंसक तलवार ने बुरी तरह से काट दिया. मपिल्ला… घर गया और अपना हल पिघला कर तलवार ढालने  के बारे में सोचने लगा. अहिंसा केवल आवरण था, जब कार्रवाई का क्षण आया, तो युवा हिन्दू वक्ता, मोपला मानसिकता से अनजान बने हुए उनके अभियान के साथ आगे बढ़े…”(टोटेनहम, उक्त, पृ. 3).

जिहादी नंगा नाच

सबसे पहले हम आंकड़ों पर नज़र डालते हैं. 20 अगस्त 1921 को जिहाद शुरू हुआ. 26 अगस्त 1921 को मार्शल लॉ लगा दिया गया और 25 फरवरी 1922 को इसे वापस ले लिया गया. जिहाद की समाप्ति 30 जून 1922 को मानी जा सकती है जब अंतिम बचा हुआ मोपला नेता अबू बकर मुसालियार को पकड़ लिया गया था. सितंबर से दिसंबर 1921 तक जिहाद अपने चरम पर था. केंद्रीय विधानमंडल में एक प्रश्न के उत्तर में (डिबेट्स; 16 जनवरी 1922), गृह सचिव सर विलियम विंसेंट ने जवाब दिया “मद्रास सरकार की रिपोर्ट है कि जबरन धर्मांतरण की संख्या संभवतः हजारों तक पहुँच गई है. लेकिन स्पष्ट कारणों से यह सटीक अनुमान जैसा कुछ भी प्राप्त करना संभव नहीं होगा ” (पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ़ इंडिया, बी आर अंबेडकर, थाकर एंड कंपनी लिमिटेड, 1945, पृ. 148).

तलवार के जोर पर 20,800 हिंदू मारे गए और 4000 से अधिक हिंदू मुस्लिम बना लिए गए. ब्रिटिश कार्यवाही के  कारण लगभग 2,339 मोपला मारे गए और 1,652 घायल हुए. 39,338 जिहादियों पर मामले दर्ज किए गए और 24,167 जिहादियों पर मुकदमा चलाया गया. लगभग 2,500 हिंदुओं को जबरन धर्मांतरित किया गया था और लाखों हिंदुओं को बेघर कर दिया गया था (महाराष्ट्र हिंदु सभाच्या  कार्याचा इतिहास, मराठी, एस आर दाते, पुणे, 1975, पृ. 21, 22). नष्ट या भ्रष्ट किये गए मंदिरों की संख्या 1000 से अधिक थी (नायर, उक्त, पृ. 8). इस जिहाद की शुरुआत में कालीकट और मलप्पुरम के सशस्त्र रिजर्व में 210 जवान थे. जिहाद के दौरान, मालाबार स्पेशल पुलिस के रूप में जाना जाने वाला बल, जिले में गठित किया गया जिसमे अंततः 600 जवान तक हो गए (नायर, उक्त, पृ. 39) . मिलिट्री और मालाबार स्पेशल पुलिस के लगभग 43 जवान मारे गए और 126 घायल हुए; जिला पुलिस और रिजर्व पुलिस के 24 जवानों और अधिकारियों की मौत हुई  और 29 घायल हो गए (टोटेनहम, उक्त, पृ. 48, 53, 414, 425).

मोपला जिहाद की विशेषताओं ने निम्नलिखित परिचित पैटर्न का अनुसरण किया: (ज़मोरिन  महाराजा की अध्यक्षता में कालीकट में हुए सम्मेलन की कार्यवाही से उद्धृत ; सर सी शंकरन नायर, उक्त, पृ. 138)

  1. महिलाओं को बेरहमी से पीटना
  2. जीवित व्यक्तियों की खाल उतारना
  3. पुरुषों, महिलाओं और बच्चों का सामूहिक नरसंहार
  4. पूरे परिवारों को जिंदा जलाना
  5. लोगों का जबरन हजारों की संख्या में धर्मान्तरण, और उन लोगों की हत्या करना, जिन्होंने धर्मांतरण से इनकार कर दिया
  6. अधमरे लोगों को कुओं में फेंकना और पीड़ितों को मरने के लिए और अपने कष्टों से मुक्त होने के लिए संघर्ष करने के लिए छोड़ देना
  7. बड़ी मात्रा में आगज़नी और अशांत क्षेत्र के सभी हिंदू और ईसाई घरों को लूटना जिसमें मोपला महिलाओं और बच्चों ने भी भाग लिया| इस लूटमार में महिलाओं के शरीरों पर से वस्त्र भी लूट लिए गए और पूरी गैर मुस्लिम आबादी को अत्यंत भयंकर अभावग्रस्त बनाने के प्रयास किये गए|
  8. हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए अशांत क्षेत्रों में स्थित कई मंदिरों को अपवित्र और निर्ममता पूर्वक नष्ट कर दिया गया और मंदिर के भीतर गायों को मारा गया और उनके अवशेष प्रवेश द्वार और मूर्तियों पर डाले गये और दीवारों और छतों पर खोपड़ियाँ लटका दी गईं.

कई मुस्लिम नेताओं ने खुद को खिलाफत के राजाओं और  राज्यपालों के रूप में स्थापित किया और हिंदुओं के नरसंहार की अगुआई की. अली मुसैलियर , वरियनकुन्नथ कुन्हम्मद हाजी राजा और सी.आई. कोया थंगल ऐसे ही उदाहरण हैं.  थंगल ने एक सपाट पहाड़ी के ढलान पर अपना दरबार बना रखा था, जिसके आसपास के गांवों में उसके लगभग 4,000 अनुयायी थे. एक बार 40 से अधिक हिंदुओं को उनकी पीठ के पीछे बंधे हाथों के साथ थंगल के पास ले जाया गया, उन पर सैन्य मदद करने के अपराध का आरोप लगाया गया और इनमें से 38 हिंदुओं को मौत की सजा दी गई. उसने व्यक्तिगत रूप से इस हत्याकांड की  निगरानी की और एक चट्टान पर बैठे हुए अपने अनुयायियों को पीड़ितों की गर्दन काटते हुए और शवों को कुएं में फेंकते हुए देखता रहा(नायर, उक्त, पृ. 76-80). दिलचस्प बात यह है कि यह सन 627 में पैगंबर के अधीन इस्लामिक बलों द्वारा खाई की लड़ाई में बानू कुरैज़ा नाम की यहूदी जनजाति के विरुद्ध किये गए हत्याकांड की नकल थी.

धर्मनिरपेक्षतावादी धोखा

मोपला जिहाद पर धर्मनिरपेक्षतावादी मत इस सम्पूर्ण घटनाक्रम के पीछे  धर्मनिरपेक्ष प्रेरणाओं की प्रधानता बताकर मोपला बलात्कार और हत्या को सही ठहराता है. इस मत की जांच की आवश्यकता है| 1852 की शुरुआत में, टी.एल. स्ट्रेंज को मालाबार में स्पेशल कमिश्नर नियुक्त किया गया ताकि वह मोपलाओं के द्वारा किये जा रहे उपद्रवों की जांच कर सके|  स्ट्रेंज ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, “मैं … आश्वस्त हूं और हालांकि ऐसे उदाहरण हैं कि एक पट्टेदार के लिए इस व्यवस्था में व्यक्तिगत कठिनाई पैदा हो सकती है, परन्तु इस समस्त कार्य व्यवहार में हिन्दू जमींदार अपने काश्तकार की ओर, चाहे मोपला या हिंदू, सामान्यत: सौम्य, भेदभाव से रहित और न्यायसंगत रहता है … वहीँ मोपला पट्टेदार, विशेष रूप से दक्षिण मालाबार के तालुकों में, जहाँ उपद्रव का प्रकोप सर्वाधिक है , अपने दायित्वों से बचने के लिए बहुत कुशल हैं. झूठे और अपमानजनक मुकदमेबाजी का सहारा लेते हैं… हिंदू, उन हिस्सों में जहां सर्वाधिक उपद्रव हुए हैं, मोपलाओं  से ऐसे भयभीत हैं कि इनमे से ज्यादातर उनके खिलाफ अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की हिम्मत भी नहीं नहीं जुटा पाते| कई मोपला पट्टेदार ऐसे हैं जो किराए का भुगतान भी नहीं करते हैं'(नायर, उक्त, पृ. 6). मोपलाओं ने तिया नाम की निचली समझी जानेवाली जाति पर हमला करने की कई घटनाएं जिहाद के दौरान घटी. तिया जाति के ताड़ी-दुकानों की पिकेटिंग का विषय, जो असहयोग आन्दोलन का एक हिस्सा था, सीधे तौर पर मुस्लिम भावनाओं से जुड़ा हुआ था (हार्डग्रेव, उक्त, पृ. 70,71).

यदि वास्तव में जिहाद एक उपनिवेशवाद-विरोधी या सर्वहारा-विरोधी उद्यम था, तो हिंदुओं को धर्मांतरित और मंदिरों को नष्ट क्यों किया गया, जबकि मस्जिदें बची हुई थीं? स्वयं मोपला जिहादियों ने अपनी हिंसा का कोई सेक्युलर स्पष्टीकरण नहीं दिया. दो नेताओं ने अपने तरीके से मोपलाओं के कार्यों के लिए,  धर्मनिरपेक्ष नहीं बल्कि इस्लामी प्रेरणाएं बतायी हैं. गांधी ने मोपलाओं के बारे में कहा कि, “बहादुर और ईश्वर से डरने वाले मोपला जिसे वे मजहब समझ रहे हैं उसके लिए लड़ रहे हैं और उस तरीके से जिसे वे मजहबी समझते हैं.” डॉ अम्बेडकर ने कहा कि इसका “उद्देश्य ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंककर इस्लाम के राज्य की स्थापना करना था” (अम्बेडकर, उक्त, पृ. 148, 153). सत्य वैचारिक अत्याचार का प्रथम हताहत होता है. विद्रोह नहीं, विप्लव नहीं, क्रान्ति नहीं; यह नग्न मोपला जिहाद था!

क्रमश:

(लेखक ने इस्लाम, ईसाई धर्म, समकालीन बौद्ध-मुस्लिम संबंध, शुद्धी आंदोलन और धार्मिक जनसांख्यिकी पर पुस्तकें लिखी हैं)

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October 8th 2020, 1:50 pm

एनआईए ने बेंगलुरू स्थित इस्लामिक स्टेट मॉड्यूल के दो आरोपियों को गिरफ्तार किया

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नई दिल्ली. एनआईए ने बेंगलुरू स्थित आईएस मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया और इसके दो आतंकियों अहमद अब्दुल कैडर (40) और इरफान नासिर (33) को बुधवार को बंगलूरू से गिरफ्तार किया है. एनआईए की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार 2013-14 में कम से कम 13-14 लोग बंगलूरू से इराक और सीरिया गए थे. माना जाता है कि उनमें से दो आईएस के लिए लड़ते हुए सीरिया में मारे गए थे, जबकि कुछ 2014 में चुपचाप लौट आए.

एनआईए ने मॉड्यूल के सभी सदस्यों की पहचान कर ली है और उन लोगों के बारे में जांच की जा रही है, जो उनकी गतिविधियों के संपर्क में थे. उन्होंने कहा कि आईएस मॉड्यूल से बेंगलुरू लौटने वालों का जीवन से मोहभंग हो गया था, आईएस ने वादा किया था कि उसकी गतिविधियों में कुछ भी इस्लामिक नहीं है.

गिरफ्तार अब्दुल कैडर एक बैंक में काम करता है, वह एक व्यापार विश्लेषक है और नासिर अपने परिवार के व्यवसाय को चलाता है. दोनों पर आरोप है कि कथित तौर पर मॉड्यूल के अधिकांश सदस्यों को कट्टरपंथी बनाया और कम से कम उसके पांच सदस्यों की यात्रा के लिए धन की व्यवस्था की.

एक बड़ा 22 सदस्यीय मॉड्यूल 2016 में केरल के कासरगोड और पलक्कड़ जिले से इराक और सीरिया की यात्रा पर गया था.

अधिकारियों ने कहा कि कई आतंकियों ने 2014 में छोटे समूहों या व्यक्तिगत रूप से इराक, सीरिया और अफगानिस्तान में आईएस के कब्जे वाले इलाकों की यात्रा की है.  ‘केरल का कासरगोड मॉड्यूल सबसे बड़ा मॉड्यूल था और उसके बाद अब यह बेंगलुरू मॉड्यूल है, जिसमें 13-14 लोग शामिल हैं.

एजेंसी को बेंगलुरू मॉड्यूल के बारे में तब पता चला जब अगस्त में एक चिकित्सक अब्दुल रहमान को बेंगलूरू में गिरफ्तार किया गया था. अब्दुल रहमान को जहांजानीब सामी और हिना बशीर बेग से जुड़े होने के मामले गिरफ्तार किया गया था. इस जोड़े को आईएस के कथित संबंधों के लिए गिरफ्तार किया गया था.

उन्होंने जांच के दौरान बताया कि अब्दुल कैडर, नासिर और उनके कुछ सहयोगी हिज्ब उत-तहरीर के सदस्य थे और बाद में कुरान सर्कल नाम का एक समूह बनाया और बेंगलुरू में आमलोगों को कट्टरपंथी बनाया. उन्होंने कथित तौर पर धन एकत्र किया और आईएस की सहायता करने और अपनी विचारधारा और गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए सीरिया की अपनी यात्राओं को वित्त पोषित किया.

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October 8th 2020, 1:50 pm

होइहि सोइ जो राम रचि राखा…..

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तुष्टीकरण की राजनीति ने क़ानून को बाधित करने और भटकाने का काम किया

सूर्यप्रकाश सेमवाल

06 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में जो हुआ, उस पर सीबीआई की विशेष अदालत ने 30 सितम्बर को अपना निर्णय सुनाया तो सब ओर से एक ही आवाज आयी कि विलम्ब से ही सही किन्तु सत्य की विजय हुई. विशेष अदालत ने पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी, यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार सहित कुल 32 आरोपियों को बरी कर दिया.

छह दिसंबर, 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाए जाने के आपराधिक मामले में 28 साल बाद न्यायाधीश सुरेंद्र कुमार यादव की विशेष अदालत ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि यह विध्वंस पूर्व नियोजित नहीं था, बल्कि आकस्मिक घटना थी. विशेष अदालत ने सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया.

इस मामले में 49 लोगों को अभियुक्त बनाया गया था. इसमें से 17 की मौत हो चुकी है, शेष 32 आरोपियों में लालकुष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार, साध्वी ऋतंभरा, महंत नृत्य गोपाल दास, डॉ. राम विलास वेदांती, चंपत राय, महंत धर्मदास, सतीश प्रधान, पवन कुमार पांडेय, लल्लू सिंह, प्रकाश शर्मा, विजय बहादुर सिंह, संतोष दूबे, गांधी यादव, रामजी गुप्ता, ब्रज भूषण शरण सिंह, कमलेश त्रिपाठी, रामचंद्र खत्री, जय भगवान गोयल, ओम प्रकाश पांडेय, अमर नाथ गोयल, जयभान सिंह पवैया, महाराज स्वामी साक्षी, विनय कुमार राय, नवीन भाई शुक्ला, आरएन श्रीवास्तव, आचार्य धमेंद्र देव, सुधीर कुमार कक्कड़ व धर्मेंद्र सिंह गुर्जर प्रमुख थे.

सीबीआई व अभियुक्तों के वकीलों ने करीब आठ सौ पन्ने की लिखित बहस दाखिल की थी. सीबीआई ने 351 गवाह व करीब 600 से अधिक दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए थे. मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश सुरेंद्र कुमार यादव, जिला जज, लखनऊ के पद से 30 सितंबर, 2019 को  सेवानिवृत्त हुए थे, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इन्हें निर्णय सुनाने तक सेवा विस्तार दिया था.

न्यायालय ने निर्णय में कहा कि विश्व हिन्दू परिषद और कारसेवकों का ढांचा गिराने का कोई इरादा नहीं था, वहां पहुंचे असंख्य कारसेवकों के मध्य उपस्थित कुछ अराजक तत्वों ने अवसर का लाभ उठाकर इसको गिराया था. कुल मिलाकर साक्ष्य के अभाव में सभी आरोपियों को सीबीआई की विशेष अदालत ने बरी कर दिया. जो फोटो और वीडियो बतौर साक्ष्य सीबीआई ने कोर्ट में पेश किये, उन्हें प्रामाणिक नहीं माना गया. अदालत ने माना कि भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी, डॉ.मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और विनय कटियार आदि  नेताओं ने उग्र भीड़ को समझाने का प्रयास किया था, न कि भीड़ को भड़काने का.

मामले की पृष्ठभूमि में जाएं तो नब्बे के दशक में विहिप नेता अशोक सिंहल ने जब साधु-संतों के सहयोग से श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन का शुभारम्भ किया था तो साथ ही भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवानी ने सितंबर 1990 में श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए सोमनाथ से अयोध्या तक 10 हजार किलोमीटर लंबी रथयात्रा शुरू की थी. केंद्र में भाजपा के सहयोग से वीपी सिंह की सरकार सत्तासीन थी. मंडल कमीशन के गुना भाग में रामो-वामो सरकार रथयात्रा से बढ़ते भाजपा के जनाधार से चिंतित थी तो यात्रा को बिहार में लालू यादव सरकार ने रोकते हुए आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया. भाजपा के समर्थन वापसी के बाद वीपी सरकार गिरी राम मन्दिर आन्दोलन बढ़ता गया. देश भर से विहिप के आह्वान पर बड़ी संख्या में कारसेवक अयोध्या पहुँचते रहे. इसके बाद हुए यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा की विजय हुई कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने. इसी प्रकार 1991 में केंद्र में पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में सरकार भले कांग्रेस की बनी हो, किन्तु भाजपा की भी लोकसभा में हिस्सेदारी बढ़ती गई. श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन आडवाणी और जोशी जी सहित भाजपा नेताओं का एक बड़ा संकल्प और हिन्दू ह्रदय सम्राट अशोक सिंहल जी का एक बड़ा स्वप्न था.

06 दिसम्बर, 1992 को प्रस्तावित कारसेवकों को रोकने के लिए जब बड़ी संख्या में केन्द्रीय सुरक्षाबल भेजे गए तो भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने आगाह कर दिया था कि कारसेवकों के दमन की पुनरावृत्ति हुई अथवा उन पर पहले की तरह गोलियां चलाई गईं तो ठीक नहीं होगा. उस दिन भाजपा के शीर्ष नेता आडवानी, डॉ. जोशी, उमा भारती, अशोक सिंहल, साध्वी ऋतंभरा और चम्पत राय सहित कई नेता मौजूद थे, लेकिन जैसे कि सभी समय-समय पर बताते रहे कि उन्होंने कारसेवकों को रोकने का प्रयास किया था, उकसाने का नहीं और जो मुक़दमे उनको आरोपित करने के लिए रायबरेली और लखनऊ में दर्ज किये गए थे वो तुष्टीकरण की राजनीति करने वालों की गलत मंशा का परिणाम थे. अदालत के निर्णय से इसकी पुष्टि होती है. लेकिन देर से मिले इस न्याय में श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन से जुड़े अशोक सिंहल जी, महंत अवैद्यनाथ, स्वामी परमहंस दास और कुल मिलाकर उन 16 दिवंगत दिव्य पावन आत्माओं को क्या जवाब दिया जाए जो श्रीराम के कार्य के निमित्त अपना सर्वस्व समर्पित करके इहलोक से विदा हो गए हैं. तुष्टीकरण की राजनीति ने क़ानून को बाधित करने और भटकाने का काम किया, जिससे इसमें इतना विलम्ब हुआ .

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October 8th 2020, 1:50 pm

आत्मनिर्भऱता – राधिका ने मास्क बनाकर स्वावलंबन की ओर बढ़ाए कदम

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काशी (विसंकें). वैश्विक महामारी कोरोना के दौरान आम जनता हो या सरकार सभी पर जबरदस्त आर्थिक प्रभाव पड़ा है. इस आर्थिक संकट से उबरने के लिए आत्मनिर्भर भारत अभियान का शंखनाद किया गया. अभियान को लोगों ने समझा और स्वीकार किया.

आत्मनिर्भरता को अपना हथियार बनाकर जनता ने इस आपदा को अवसर में बदल दिया. अब देश के विभिन्न स्थानों से आत्मनिर्भरता के उदाहरण प्रतिदिन सामने आ रहे हैं. इनमें से एक हैं काशी की राधिका. काशी के पिंडरा क्षेत्र की राधिका के परिवार पर जब आर्थिक संकट हावी होने लगा तो उन्होंने मास्क बनाने का काम शुरू किया और अब राधिका 600-800 रुपये तक प्रतिदिन कमा लेती है. राधिका ने अपने साथ अन्य महिलाओं को भी इस कार्य में जोड़ रखा है. महिला संगठन से जुड़कर कार्य कर रही राधिका के अनुसार कोविड-19 के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए मास्क एवं सुरक्षा कवच का कार्य करेंगे. स्वयं सहायता समूह की महिलाओं द्वारा जिले में लगभग 10 लाख मास्क बनाये जा चुके हैं. संगठन की महिलाओं ने कपड़े के मास्क बनाने की जिम्मेदारी को आसानी से निभाया है. ये महिलाएं आमजन के लिए संगठन और केन्द्रों के माध्यम से कपड़े के मास्क उचित मूल्य पर दे रही हैं.

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October 8th 2020, 1:50 pm

सुपरसोनिक मिसाइल स्मार्ट का सफलतापूर्वक परीक्षण

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नई दिल्ली. भारत ने चीन और पाकिस्तान के साथ तनाव के बीच सोमवार को सुपरसोनिक मिसाइल असिस्टेड रिलीज ऑफ टॉरपीडो (स्मार्ट) का सफलतापूर्वक परीक्षण किया. यह परीक्षण ओडिशा के समुद्री तट पर किया गया. यह एक ऐसी प्रणाली है – जिसमें टॉरपीडो के साथ मिसाइल भी होती है. पनडुब्बी रोधी जंग में यह तकनीक नौसेना की ताकत को कई गुना बढ़ा सकती है.

परीक्षण के दौरान रेंज और अल्टीट्यूड (ऊंचाई) तक मिसाइल की उड़ान, नोज कोन को अलग करने, टारॅपीडो के रिलीज और विलोसिटी रिडक्शन मैकेनिज्म के फैलाव (वीआरएम) सहित मिशन के सभी लक्ष्य हासिल किए गए. स्मार्ट के बारे में, डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. जी सतीश रेड्डी ने कहा कि पनडुब्बी रोधी जंग (एएसडब्ल्यू) में स्मार्ट एक गेंमचेंजर तकनीक डेमोस्ट्रेशन है. परीक्षण के दौरान की घटनाओं की निगरानी ट्रैकिंग स्टेशनों (रडार, इलेक्ट्रो ऑप्टिकल सिस्टम्स) द्वारा तट के जरिए और डाउन रेंज शिप के साथ टेलीमेट्री स्टेशनों द्वारा की गई. स्मार्ट के लिए आवश्यक तकनीक को तैयार करने में डीआरडीओ की विभिन्न लैब जैसे डीआरडीएल, आरसीआई हैदराबाद, एडीआरडीई आगरा, एनएसटीएल विशाखापट्टनम ने अहम भूमिका निभाई.

क्या है स्मार्ट

यह एक तरह की सुपरसोनिक एंटी-शिप मिसाइल है. इसके साथ एक कम वजन का टॉरपीडो लगा है जो पेलोड की तरह इस्तेमाल होता है. दोनों मिलकर इसे एक सुपरसोनिक एंटी-सबमरीन मिसाइल बना देते हैं यानि इसमें मिसाइल के फीचर्स भी मिलेंगे और पनडुब्बी नष्ट करने की क्षमता भी. पूरी तरह तैयार होने पर इस हथियार प्रणाली की रेंज 650 किलोमीटर होगी. इतनी ज्यादा रेंज वाली प्रणाली की मौजूदगी नौसेना को दुनिया की सबसे खतरनाक नौसेनाओं की सूची में और ऊपर पहुंचा देगी.

देश के पास वरुणास्त्र नामक एक पनडुब्बी रोधी टॉरपीडो पहले से है जो जीपीएस की मदद से अपने लक्ष्य को भेद सकता है. स्मार्ट इसकी तुलना में काफी हल्का है. एक टन से अधिक वजनी वरुणास्त्र अपने साथ 250 किलो तक का वॉरहेड ले जा सकता है. उसका गाइडेंस सिस्टम भी उन्नत है. भारत के पास ब्रह्मोस सुपरसोनिक एंटी-शिप और लैंड-अटैक क्रूज मिसाइल भी है.

चीन के साथ पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव को देखते हुए डीआरडीओ अति सक्रिय हो गया है. पिछले कुछ हफ्तों से वह लगातार परीक्षण कर रहा है. शौर्य मिसाइल के नए वर्जन का भी शनिवार को सफल परीक्षण किया गया. यह मिसाइल 800 किलोमीटर दूर तक लक्ष्य को निशाना बनाने में सक्षम है. इसके लिए पिछले महीने एमबीटी अर्जुन टैंक से लेज़र गाइडेड एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल का परीक्षण किया गया था. एजीटीएम हर तरह के टैंक को नष्ट करने में सक्षम होगा. इसके अलावा ‘अभ्यास’ हाई स्पीड एक्सपेंडेबल एरियल टारगेट (हीट) का भी सफलतापूर्वक परीक्षण हुआ.

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने सफलता के लिए रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) को बधाई दी. उन्होंने ट्वीट किया कि डीआरडीओ ने सफलतापूर्वक सुपरसोनिक मिसाइल असिस्टेड रिलीज ऑफ टारपीडो, स्मार्ट का परीक्षण किया है. यह पनडुब्बी रोधी युद्ध में स्टैंड ऑफ क्षमता के लिए एक प्रमुख तकनीकी सफलता होगी. वह इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए डीआरडीओ और अन्य स्टेकहोल्डरों को बधाई देते हैं.

 

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October 7th 2020, 2:23 pm

घर बैठे ऑनलाइन मंगवा सकेंगे मनपसंद स्ट्रीट फूड, पांच शहरों में शुरू होगा पायलट प्रोजेक्ट

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सरकार ने स्विगी के साथ किया समझौता, स्ट्रीट वेंडर्स के व्यवसाय में होगी बढ़ोतरी

नई दिल्ली. चटपटे खाने के शौकीन हैं. पर, वर्तमान में कोरोना संकट के कारण गली के नुक्कड़ (स्ट्रीट वेंडर) पर मिलने वाले मनपसंद चटपटे व्यंजन के लिए बाहर निकलने से डर रहे हैं तो अधिक इंतजार नहीं करना पड़ेगा. घर बैठे मनपसंद चटपटे व्यंजन का आनंद ले सकेंगे. साथ ही सरकार की नई योजना से स्ट्रीट वेंडर्स के व्यवसाय में भी बढ़ोतरी होगी.

स्ट्रीट वेंडर्स को ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर लाने के लिए शहरी विकास मंत्रालय ने फूड डिलिवरी प्लेटफॉर्म स्विगी के साथ एक समझौता किया है. यह समझौता प्रधानमंत्री स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि (पीएम स्वनिधि) योजना के तहत किया गया है.

कोविड महामारी के कारण सोशल डिस्टेंसिंग न्यू नॉर्मल बन गया है. इस समझौते के चलते स्ट्रीट वेंडर्स को अपना कारोबार ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से सीधे घर बैठे ग्राहकों तक पहुंचा सकेंगे. इससे स्ट्रीट वेंडर को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए कारोबार बढ़ाने में भी मदद मिलेगी.

मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, पहले चरण में पांच शहरों में पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जाएगा. स्विगी अहमदाबाद, चेन्नई, दिल्ली, इंदौर और वाराणसी में पायलट प्रोजेक्ट शुरू करेगा. इन शहरों के 250 वेंडर्स को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर रजिस्टर किया जाएगा. पायलट प्रोजेक्ट में सफलता मिलने के पश्चात अलग-अलग चरणों में योजना को पूरे देश में शुरू किया जाएगा. समझौते के अनुसार, स्विगी की ओर से स्ट्रीट वेंडर्स को रजिस्ट्रेशन, ट्रेनिंग की तकनीक, ऐप का इस्तेमाल, मैन्यू डिजिटाइजेशन और प्राइसिंग, हाइजीन और पैकिंग में सहायता की जाएगी.

केंद्र सरकार ने जून में पीएम स्वनिधि योजना लॉन्च की थी. इस योजना का उद्देश्य कोरोना संकट के कारण प्रभावित स्ट्रीट वेंडर्स को फिर से आजीविका शुरू करने के लिए किफायती वर्किंग कैपिटल ऋण देना था. योजना के तहत देश के 50 लाख स्ट्रीट वेंडर्स को लाभ पहुंचाना है. योजना के तहत स्ट्रीट वेंडर 10 हजार रुपए तक का वर्किंग कैपिटल ऋण ले सकते हैं.

4 अक्तूबर तक लोन के लिए 20 लाख आवेदन मिले

मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 4 अक्तूबर तक पीएम स्वनिधि योजना के तहत ऋण के लिए 20 लाख से अधिक आवेदन मिल चुके हैं. इसमें से 7.5 लाख ऋण को मंजूरी दी जा चुकी है. वहीं, 2.4 लाख मामलों में ऋण की राशि का आवंटन किया जा चुका है. इस स्कीम के तहत ऋण की वापसी 1 साल में करनी है. इस राशि पर 7 फीसदी सालाना की दर से ब्याज वसूला जाएगा. समय पर भुगतान करने वाले वेंडर्स को 1 फीसदी की छूट दी जाएगी.

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October 7th 2020, 2:09 pm

सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्चितकाल के लिए कब्जा गलत – सर्वोच्च न्यायालय

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नई दिल्ली. सीएए (नागरिकता संशोधन कानून) के खिलाफ दिल्ली के शाहीन बाग में हुए विरोध-प्रदर्शन को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाया है. सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विरोध-प्रदर्शनों के लिए शाहीन बाग जैसे सार्वजनिक स्थलों पर कब्जा करना स्वीकार्य नहीं है. सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं किया जा सकता, जैसा कि शाहीन बाग में विरोध प्रदर्शन के दौरान हुआ. प्रदर्शन निर्धारित जगह या क्षेत्र में ही होना चाहिए.

नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हुए शाहीन बाग आंदोलन पर न्यायालय ने कहा कि शाहीन बाग इलाके से लोगों को हटाने के लिए दिल्ली पुलिस को कार्रवाई करनी चाहिए थी. प्राधिकारियों को खुद कार्रवाई करनी होगी और वे अदालतों के पीछे छिप नहीं सकते. सार्वजनिक स्थानों पर विरोध करने का अधिकार पूर्ण नहीं है और सार्वजनिक स्थानों पर इस तरह के विरोध प्रदर्शनों के लिए अनिश्चित काल तक कब्जा नहीं किया जा सकता है.

इस मामले पर न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यीय न्यायिक पीठ ने फैसला सुनाया और कहा कि लोकतंत्र और असहमति साथ-साथ चलते हैं, मगर प्रदर्शन डेजिगनेटेड स्थानों (जहां प्रदर्शन के लिए जगह तय या निर्धारित हों) में ही होना चाहिए. पीठ में जस्टिस अनिरुद्ध बोस और कृष्ण मुरारी शामिल थे.

सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला उस याचिका पर आया है, जब अधिवक्ता अमित साहनी ने फरवरी में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शनकारियों द्वार बंद कालिंदी कुंज-शाहीन बाग मार्ग को खोलने की मांग की थी. बता दें कि प्रदर्शनकारियों ने करीब सौ दिनों तक कालिंदी कुंज-शाहीन बाग मार्ग को बंद रखा था, जिससे आम लोगों को काफी परेशानी हुई थी.

नागरिकता कानून के विरोध में शाहीन बाग में 100 दिनों से ज्यादा दिन तक लोग धरने पर बैठे थे. लेकिन कोरोना वायरस के कारण दिल्ली में धारा 144 लागू होने के बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को वहां से हटा दिया था. शाहीन बाग प्रदर्शनकारियों को वहां से हटाने के लिए शीर्ष अदालत में भी अपील की गई थी.

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October 7th 2020, 2:09 pm

भारत में एनजीओ का काला सच

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बलबीर पुंज

कुछ दिन पहले विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक संसद से पारित हो गया. इस कदम का जहां एक बड़ा वर्ग स्वागत कर रहा है, वहीं दूसरा वर्ग, जिसका अपना निहित स्वार्थ भी है, इसे घातक और लोकतंत्र-विरोधी बता रहा है. देश में ऐसी स्वयंसेवी संस्थाओं (एनजीओ) की बड़ी संख्या है, जिन्हें विदेशी चंदा ईसाई धर्मार्थ संगठनों से प्राप्त होता है. एक आंकड़े के अनुसार, वर्ष 2016-2019 के बीच एफसीआरए पंजीकृत एनजीओ को 58,000 करोड़ का विदेशी अनुदान प्राप्त हुआ था. यक्ष प्रश्न यह है कि जो स्वयंसेवी संगठन विदेशों से ‘चंदा’ लेते है, उनका उद्देश्य सेवा करना होता है या कुछ और.

निर्विवाद रूप से देश में कई ऐसे एनजीओ हैं, जो सीमित संसाधनों के बावजूद देश के विकास में महती भूमिका निभा रहे हैं. किंतु कई ऐसे भी हैं, जो स्वयंसेवी संगठन के भेष में और सामाजिक न्याय, गरीबी, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, मजहबी सहिष्णुता, पर्यावरण, मानवाधिकार और पशु-अधिकारों की रक्षा के नाम पर न केवल भारत-विरोधी, अपितु यहां की संस्कृति और बहुलतावादी परंपराओं को आघात पहुंचा रहे हैं. भारतीय खुफिया विभाग अपनी एक रिपोर्ट में कह चुका है कि विदेशी वित्तपोषित एनजीओ की विकास-विरोधी गतिविधियों से देश की अर्थव्यवस्था नकारात्मक रूप से दो-तीन फीसदी तक प्रभावित होती है.

एफसीआरए संशोधन क्यों आवश्यक था? इसका उत्तर लीगल राइट ऑब्सर्वेटरी (एलआरओ) संगठन के एक खुलासे में मिल जाता है. उसके अनुसार, नागरिक संशोधन अधिनियम (सीएए) विरोधी दंगों और हिंसा में शामिल लोगों का, जिनके खिलाफ अदालत में मामले चल रहे हैं, बचाव करने हेतु चार यूरोपीय चर्चों ने अधिवक्ता कॉलिन गोंजालविस द्वारा स्थापित एनजीओ ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क (एचआरएलएन) को चंदे के रूप में 50 करोड़ रुपये स्थानांतरित किए थे.

जो स्वयंसेवी संगठन इन संशोधनों की आलोचना कर रहे हैं, उनमें ऑक्सफैम सबसे मुखर है. यह संगठन अक्सर भारत-विरोधी रिपोर्टें तैयार करता रहा है. वर्ष 1942 से ब्रितानी चर्च का संरक्षण प्राप्त और ब्रिटिश सरकार द्वारा वित्तपोषित ऑक्सफैम के पदाधिकारियों और कर्मचारियों पर आरोप था कि उन्होंने 2010 में भीषण भूकंप का शिकार हुए कैरेबियाई देश हैती में चंदे के पैसे अपनी वासना शांत करने हेतु वेश्याओं पर खर्च किए थे. यही नहीं, उन पर सहायता के बदले नाबालिग लड़कियों सहित कई पीड़ित महिलाओं के यौन-उत्पीड़न का भी आरोप लगा. अमानवीयता और संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को पार करने वाले इस घटनाक्रम की ब्रिटिश संसद भी निंदा कर चुकी है. विडंबना देखिए कि महिला सुरक्षा पर ‘प्रवचन’ देने वाले अधिकांश तथाकथित स्त्री-अधिकारवादी स्वयंसेवी संगठन या स्वघोषित कार्यकर्ता इस घटना पर सुविधाजनक चुप्पी साधे हैं.

भारतीय एनजीओ को जिन विदेशी संगठनों से ‘सेवा’ के नाम पर ‘चंदा’ मिलता है, वे अधिकतर अमेरिका या फिर यूरोप से संबंध रखते है. यदि वाकई उनका उद्देश्य सेवा करना होता, तो इसकी शुरुआत वे अपने देशों से करते. टाइम पत्रिका के अनुसार, अमेरिका में प्रत्येक पांच में से एक बच्चा अत्यंत गरीब है. प्रति एक लाख की आबादी में बलात्कार के मामले में अमेरिका सहित कई यूरोपीय देश शीर्ष 20 राष्ट्रों की सूची में हैं. वास्तव में, कुछ संगठनों में ‘सेवा’ का एकमात्र अर्थ मतांतरण से है. चूंकि अमेरिका और यूरोपीय देशों का मूल चरित्र सदियों पहले ईसाई बहुल हो चुका है, इसलिए उनके लिए वहां न ‘सेवा’ का कोई अर्थ है और न ही किसी सामाजिक कलंक का.

कैथोलिक चर्च और वेटिकन सिटी का घोषित एजेंडा यह है कि जिस प्रकार पहली सहस्राब्दी में यूरोप और दूसरी में अमेरिका-अफ्रीका को ईसाई बनाया, उसी तरह तीसरी सहस्राब्दी में एशिया का ईसाइकरण किया जाएगा. बहुलतावादी सनातन संस्कृति का उद्गम स्थान भारत सदियों से भय, लालच और धोखे से होने वाले मतांतरण का शिकार रहा है. विश्व के इस भूखंड में ईसाई मतांतरण की शरुआत जहां 16वीं शताब्दी में सेंट फ्रांसिस जेवियर के गोवा आगमन के साथ हुई, वहीं 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ‘आत्मा के व्यापार’ को गति तब मिली, जब 1813 में चर्च के कहने पर अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के चार्टर में एक विवादित धारा जोड़कर पादरियों और ईसाई मिशनरियों के भारत में ईसाइयत के प्रचार-प्रसार का रास्ता प्रशस्त कर दिया.

विश्व के अधिकतर इस्लामी देश वेटिकन सिटी के प्रभाव से पूरी तरह बाहर हैं और उन्हीं देशों में ईसाई सहित अन्य सभी अल्पसंख्यक दोयम दर्जे के नागरिक हैं. साम्यवादी चीन में प्रचार तो दूर, ईसाई, मुस्लिम सहित अन्य सभी अल्पसंख्यकों पर सरकार की ओर से मजहबी प्रतिबंध है. इसके विपरीत, भारत में कुछ राजनीतिक दलों और एनजीओ की मदद से एजेंडा आधारित कार्य जारी है. गुलाम औपनिवेशिक मानसिकता अब भी जीवित है, जो अलग-अलग चोला ओढ़ अपने एजेंडे की पूर्ति हेतु सक्रिय है, जिसमें विदेशी वित्तपोषित स्वयंसेवी संगठनों का एक वर्ग भी शामिल हो जाता है. देश के विकास में अवरोध पैदा करना, राष्ट्रीय एकता-अखंडता को चुनौती देना या ऐसा करने वालों की ढाल बनना और यहां की  बहुलतावादी सनातन संस्कृति व परंपराओं को कलंकित करना यदि विदेशी अनुदानों पर आश्रित एनजीओ की  वास्तविकता है, तो विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक निश्चित ही रोक का उचित कदम है.

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October 7th 2020, 1:53 pm

हिन्दी पत्रकारिता के ‘माणिक’ मामाजी

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प्रखर संपादक माणिकचंद्र वाजपेयी उपाख्य ‘मामाजी’ की 101वीं जयंती पर विशेष

लोकेन्द्र सिंह

‘मन समर्पित, तन समर्पित और यह जीवन समर्पित. चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ’. कवि रामावतार त्यागी की यह पंक्तियां यशस्वी संपादक माणिकचंद्र वाजपेयी उपाख्य ‘मामाजी’ के जीवन/व्यक्तित्व पर सटीक बैठती हैं. मामाजी ने अपने ध्येय की साधना में सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था. उनका जीवन आज की पीढ़ी के लिए संदेश बन गया है. सादगी, सरलता और निश्छलता के पर्याय मामाजी ने अपने मौलिक चिंतन और धारदार लेखनी से पत्रकारिता में भारतीय मूल्यों एवं राष्ट्रीय विचार को प्रतिष्ठित किया. मामाजी उन विरले पत्रकारों में शामिल हैं, जिन्होंने पत्रकारिता के मिशनरी स्वरूप को जीवित रखा. उन्होंने कभी भी पत्रकारिता को एक प्रोफेशन के तौर पर नहीं लिया, बल्कि उन्होंने पत्रकारिता को देश, समाज और राष्ट्रीय विचार की सेवा का माध्यम बनाया. सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर उन्होंने सदैव समाज को जागरूक किया.

आपातकाल, हिन्दुत्व, जम्मू-कश्मीर, स्वदेशी, श्रीराम जन्मभूमि, जातिवाद, छद्म धर्मनिरपेक्षता, कन्वर्जन, शिक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और देश के स्वाभिमान से जुड़े विषयों पर लेखन कर उन्होंने समाज को मतिभ्रम की स्थिति से बाहर निकाला. सामाजिक, राजनीतिक और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर उन्होंने विपुल लेखन किया है, जो आज भी प्रासंगिक है. स्वदेश में प्रकाशित उनकी लेखमालाएं ‘केरल में मार्क्स नहीं महेश’, ‘आरएसएस अपने संविधान के आईने में’, ‘समय की शिला पर’ इत्यादि बहुत चर्चित हुईं. ये लेखमालाएं आज भी पठनीय हैं.

मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी का पत्रकारीय जीवन लगभग 40 वर्ष का रहा. वैसे तो पत्रकारिता में उनका प्रवेश भिंड में ही हो चुका था, जहाँ वे ‘देश-मित्र’ समाचारपत्र का संचालन कर रहे थे. लेकिन, एक सजग एवं प्रखर पत्रकार के रूप में उनकी पहचान स्वदेश से जुड़ने के बाद ही बनी. 1966 में विजयदशमी के शुभ अवसर पर इंदौर में दैनिक समाचारपत्र ‘स्वदेश’ की स्थापना हुई. स्थापना वर्ष से ही मामाजी ‘स्वदेश’ से जुड़ गए, लेकिन संपादक का दायित्व उन्होंने 1968 से संभाला. 17 वर्ष तक वे स्वदेश, इंदौर के संपादक रहे. अपने संपादकीय कौशल से उन्होंने मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में भारतीयता की एक सशक्त धारा प्रवाहित कर दी. मामाजी की लेखनी का ही प्रताप था कि स्वदेश शीघ्र ही मध्यप्रदेश का प्रमुख समाचारपत्र बन गया. प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी स्वदेश की माँग होने लगी. ग्वालियर में राजमाता विजयाराजे सिंधिया की प्रेरणा से दैनिक समाचारपत्र ‘हमारी आवाज’ प्रकाशित हो रहा था. 1970 में राजमाता ने इंदौर प्रवास के दौरान स्वदेश का प्रभाव देखा, तब उन्होंने सुदर्शन जी के सामने प्रस्ताव रखा कि ग्वालियर से भी स्वदेश का प्रकाशन होना चाहिए और राजमाता का समाचारपत्र ‘हमारी आवाज’ अब ‘स्वदेश’ के रूप में प्रकाशित होने लगा. इंदौर से सेवानिवृत्त होने के बाद मामाजी स्वदेश (ग्वालियर) के संपादक एवं प्रधान संपादक रहे और स्वदेश (भोपाल) के साथ भी सलाहकार संपादक के रूप में जुड़े. मामाजी अपने जीवन के अंतिम समय तक स्वदेश से जुड़े रहे. पत्रकारिता जगत में मामाजी और स्वदेश, एक-दूसरे के पर्याय हो गए थे.

मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी ने ध्येय के प्रति अपना जीवन समर्पित करके न केवल स्वदेश की स्थापना की, बल्कि इस समाचारपत्र के माध्यम से उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता का वातावरण ही बदल दिया. मामाजी ने किस तरह के वातावरण में राष्ट्रीय विचार को केंद्र में रखते हुए स्वदेश को प्रतिष्ठा दिलाई और उनके लिए पत्रकारिता का क्या अर्थ था, यह समझने के लिए हमें उनके ही विचार प्रवाह से होकर गुजरना चाहिए. स्वदेश (ग्वालियर) के 25 वर्ष पूर्ण होने पर प्रकाशित स्मारिका में अपने आलेख में मामाजी लिखते हैं – “आजादी के बाद भी ‘स्व’ उपेक्षित और प्रताड़ित था. तुष्टीकरण की जिस आत्मघाती नीति के कारण देश का विभाजन हुआ, उसे ही कल्याणकारी साबित करने की होड़ लगी थी. छद्म धर्मनिरपेक्षिता का सर्वत्र बोलबाला था. राष्ट्रवाद को साम्प्रदायिक घोषित कर दिया गया था. प्रगतिशीलता के नाम पर हिन्दुत्व यानि भारतीयत्व की खिल्ली उड़ाई जा रही थी. समाज को तोड़ने वाली नीतियों एवं कार्यक्रमों को संरक्षण मिल रहा था. पत्रकारिता भी इन्हीं तुष्टीकरण तथा छद्म धर्मनिरपेक्षता वादियों की चेरी बनी हुई थी. वह गांधी, तिलक, अरविंद, दीनदयाल उपाध्याय और दादा माखनलाल चतुर्वेदी के मार्ग से हट गई थी, भटक गई थी. भारतीय राष्ट्रीयता के पर्यायवाची हिन्दुत्व के विचार से वह ऐसे बिचकती थी, जैसे लाल कपड़े को देखकर साड़. सड़ी लाश मानकर वह उससे घृणा करती थी. जनता भ्रमित थी तथा सत्ता निरंकुश. ऐसी विषम स्थिति में स्वदेश ने अपने जन्मकाल से ही राष्ट्रवाद के पक्ष में खड़े होने का संकल्प लिया. उसी कण्टकाकीर्ण मार्ग को उसने अपने लिए चुना. उसके जन्म का उद्देश्य ही वही था”.

मामाजी ने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया. प्रत्येक परिस्थिति में सच के साथ खड़े रहे. जब समूची पत्रकारिता भ्रमित होकर भारतीय मूल्यों के विरुद्ध ही प्रचार करने लगती, तब भी मामाजी की लेखनी भटकती नहीं. वे धारा के साथ बहने वाले लोगों में नहीं थे. गो-हत्या बंद करने की माँग को लेकर जब दिल्ली में हजारों साधु-संतों पर गोलियां चलाई गईं, तब पत्रकारिता में एक बड़ा वर्ग गो-भक्तों के विरोध में खड़ा था. जब पत्रकारिता के माध्यम से इन साधु-संन्यासियों एवं गो-भक्तों को सांप्रदायिक और दंगाई सिद्ध करने के प्रयत्न हो रहे थे, तब मामाजी ने मध्यप्रदेश में गो-भक्तों के पक्ष में आवाज उठाई. परिणाम यह हुआ कि मध्यप्रदेश में गोवंश हत्या को रोकने के लिए प्रभावी कानून बन गया. इसी तरह इंदौर में हिन्द केसरी मास्टर चंदगीराम के सम्मान में निकाली गई शोभायात्रा पर जब लीगी गुण्डों ने हमला किया, तब केवल मामाजी की कलम ने लीगी मानसिकता का पर्दाफाश किया. श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन और तथाकथित बाबरी ढांचा गिरने पर भी मामाजी की लेखनी ने हिन्दू समाज को जागरूक किया तथा उन्हें कम्युनिस्टों के प्रोपोगंडा से भ्रमित होने से बचाया.

वर्ष 1975 में मौलिक अधिकारों एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हत्या कर देश पर थोपे गए आपातकाल के दौरान सरकार के भय से प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और संपादकों की कलम झुक गई थी. लेकिन प्रखर राष्ट्रभक्त मामाजी भूमिगत रहकर भी लेखन कार्य करते रहे. इंदिरा गांधी की तानाशाही के विरोध में स्वदेश मुखर ही रहा. परिणाम यह हुआ कि स्वदेश के कार्यालय पर ताला लगा दिया गया और संपादक यानि मामाजी के नाम मीसा का वारंट जारी हो गया था. पुलिस ने मामाजी को पकड़ कर जेल में डाल दिया. परंतु, धुन के पक्के मामाजी कहां मानते, उन्होंने जेल में बंदियों को पढ़ाना शुरू कर दिया. मामाजी ने जेल में रहकर हस्तलिखित ‘मीसा समाचार पत्र’ निकालना प्रारंभ कर दिया. इमरजेंसी के दौरान लोकतंत्र के सिपाहियों को स्वतंत्र भारत की सरकार ने किस प्रकार की नारकीय यातनाएं दी, इस पर तो उन्होंने एक अमर कृति ही तैयार कर दी. उनकी पुस्तक ‘आपातकाल की संघर्षगाथा’ लोकतंत्र की बहाली के लिए किए गए आंदोलन का प्रमाणित दस्तावेज है.

मामाजी 1978 से 80 तक इंदौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष भी रहे. उनके कार्यकाल में इंदौर प्रेस क्लब अपनी गतिविधियों के लिए काफी चर्चित हुआ. उन्होंने पुराने हो चुके बेकार कानूनों को खत्म करने की माँग इसी प्रेस क्लब के माध्यम से उठाई. पत्रकारों को प्रशिक्षण दिलाने के लिए वे प्रतिवर्ष कोई न कोई आयोजन कराते थे. पत्रकारिता को अपना करियर बनाने वाले युवकों को वे बहुत प्रोत्साहित करते. मामाजी पत्रकारिता की चलती-फिरती पाठशाला थे. मामाजी के संपर्क में रहकर अनेक युवाओं ने पत्रकारिता का ककहरा सीखा और इस क्षेत्र में खूब नाम कमाया. लेकिन उन्होंने कभी किसी पर अपनी विचारधारा नहीं थोपी. सबका सहयोग ही किया.

मामाजी का जन्म 7 अक्तूबर, 1919 को आगरा जिले के बटेश्वर गाँव में हुआ. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी इसी गाँव से थे. बटेश्वर में मामाजी और अटलजी का घर आमने-सामने है. दोनों ही महापुरुषों का बचपन यमुना की गोद में अटखेलियां करते बीता है. 2002 में जब अटलजी प्रधानमंत्री थे, तब स्वदेश (इंदौर) की योजना से दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास पर मामाजी का अभिनंदन समारोह ‘अमृत महोत्सव’ का आयोजन किया गया. उस दिन भार-विभोर होकर छल-छलाती आँखों से भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भरी सभा में मामाजी के चरणस्पर्श करने की अनुमति माँगी, तब वहाँ स्पंदित कर देने वाला वातावरण बन गया. भारत की राजसत्ता त्याग, समर्पण और निष्ठा के पर्याय साधु स्वभाव के मामाजी के सामने नतमस्तक थी. यह मामाजी संबोधन से प्रसिद्ध व्यक्ति का नहीं वरन् उस लेखनी का सम्मान था, जिसने हिन्दी पत्रकारिता में भारतीय मूल्यों को स्वीकार्यता दिलाई. वर्ष 2005 में पत्रकारिता एवं लेखकीय सेवाओं के लिए उन्हें कोलकाता में डॉक्टर हेडगेवार प्रज्ञा पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया. हालाँकि, यह सब सम्मान/पुरस्कार, उनके लिए कोई मोल नहीं रखते थे. मामाजी ने कभी अपने लिए सम्मान और पुरस्कार की आकांक्षा नहीं की. वे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उस मंत्र को जीते थे, जिसमें कहा गया है – कार्यकर्ता को ‘प्रसिद्धि परांगमुख’ होना चाहिए.

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्राध्यापक हैं.)

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October 7th 2020, 11:19 am

मामाजी – जस की तस धर दीनी चदरिया

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जयराम शुक्ल

मामा माणिकचंद्र वाजपेयी स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्वतंत्रता संग्राम के समय की पत्रकारिता के ध्येय को लेकर चलने वाले अंतिम ध्वजवाहक थे. जलियांवाला बाग नरसंहार के वर्ष ही वे पैदा हुए थे. वे पत्रकारिता में देर से आए. या यूँ कहें कि उनकी संपादक के रूप में पहचान सन् 47 से बीस साल बाद बनी, जब स्वदेश समूह का संपादकीय नेतृत्व सँभाला. लेकिन उनकी पत्रकारिता में नैतिकता, सामाजिक आदर्श, राष्ट्रगौरव, और अन्याय के खिलाफ प्रतिकार का वही उत्स रहा जो स्वतंत्रता संग्राम काल की पत्रकारिता में गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, विष्णुराव पराडकर आदि संपादकों में था. संभवतः इसीलिए मामाजी को ध्येयनिष्ठ और राष्ट्रवादी पत्रकारिता का व्रती कहा जाता है.

करोड़ों में कुछ मुट्ठीभर लोग ही समाज और मायावी दुनियादारी से निकल पाते हैं, जिनकी जन्मजयंती मनाकर नई पीढ़ी धन्य होती है. लेकिन इस धन्यता के बरक्स भी कुछ भीषण दुराग्रह होते हैं. जैसे जब हम लोग मामाजी के जन्मशताब्दी वर्ष की रूपरेखा पर चर्चा कर रहे थे, उसी बीच मध्यप्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस ने सत्ता सँभाली. पता नहीं दून जैसे बोर्डिंग स्कूल और यूरोप के बिजनेस कॉलेजों में पढ़कर निकले कमलनाथ के कान में किसी ने मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी का नाम फूँक दिया. जिस किसी ने फूँका होगा तो अच्छे से ही फूँका होगा कि मामाजी उस राजनीतिक धारा के विचारपुंज हैं, जिसने कई दलों को दलदल में और वामदलों को बंगाल की खाड़ी में विसर्जित कर दिया है. तभी शायद कमालनाथ जी के प्रज्ञाचक्षु खुले और अपनी सरकार की ओर से पहला पुण्यकर्म यह किया कि….ध्येयनिष्ठ और राष्ट्रवादी पत्रकारिता के लिए दिया जाने वाला राष्ट्रीय माणिकचंद्र वाजपेयी पुरस्कार समाप्त कर दिया गया. किसी सरकार के मुखिया का ऐसा मानसिक दीवालियापन देखकर कोई नौसिखिया टिप्पणीकार भी यह भविष्यवाणी कर सकता था कि ऐसा हल्का और ओछा नेतृत्व अपनी पार्टी और सरकार को ज्यादा दिन नहीं सँभाल सकता.

कमलनाथ ‘मुखिया मुख सो चाहिए’ नहीं रहे. सरकार तो सर्वग्राही व सर्वस्पर्शी होती है. पर कमलनाथ को वैचारिक गुस्सा निकालने के लिए मामाजी जैसे आज के विदेहराज मिले. अब मामाजी के नाम से पुरस्कार दो या न दो उनकी महानता पर क्या फर्क पड़ता है. वो तो यश, प्रतिष्ठा की कामना किए बिना ‘जस की तस धर दीनी चदरिया’ और चले गए. मैं कभी न मामाजी का शिष्य रहा और न ही भक्त. लेकिन तत्कालीन सरकार के इस निर्णय की पीड़ा अंतस तक हुई. तब के मुख्यमंत्री कमलनाथ को कड़ा प्रतिरोध पत्र लिखा और हर उससे फरियाद की जिसे सरकार का यह निर्णय अनैतिक लगा.

आदरणीय राजेन्द्र शर्मा जी (स्वदेश) के नेतृत्व में राजधानी के वरिष्ठ संपादकों ने प्रतिरोध दर्ज कराते हुए कमलनाथ जी से मामाजी के नाम से राष्ट्रीय पुरस्कार यथावत रखने का आग्रह किया गया. लेकिन जब सिंहासन पर साक्षात् अहंकार ही विराजमान हो तो कौन किसकी सुने.

बहरहाल मामाजी के गौरवमयी जन्मशताब्दी वर्ष के आयोजन की भूमिका तैयार हुई. मध्यप्रदेश के इतिहास में संभवतः किसी पत्रकार/संपादक की स्मृति को गौरवपूर्ण ढंग से कालजयी बनाने का यह पहला आयोजन है. वर्ष भर व्याख्यानमालाएं आयोजित हुईं और राष्ट्रीय सरोकार की पत्रकारिता पर गंभीर विमर्श हुए. आज 7 अक्तूबर, 2020 को मोहन भागवत जी इस एक वर्षीय वैचारिक समिधा में पूर्णाहुति देंगे, यह भी कम महत्व की बात नहीं है.

मामाजी के सान्निध्य का मुझे सौभाग्य नहीं मिला. उनके जीवन के बारे में सुना और उनका लिखा पढ़ने को मिला. मामाजी की पत्रकारिता का सक्रिय कार्यक्षेत्र चंबल और मालवा रहा. विंध्य-महाकौशल में स्वदेश की ही तरह दूसरा वैचारिक समाचारपत्र था ‘युगधर्म’. 82-83 में जब मैं जबलपुर विश्वविद्यालय में पत्रकारिता का विद्यार्थी था, तब जबलपुर का युगधर्म मेरे लिए प्रयोगशाला जैसा था. युगधर्म के प्रधान संपादक थे आदरणीय भगवतीधर वाजपेयी. वहीं स्वदेश के विभिन्न संस्करणों की डाक प्रतियां आती थीं, जिसमें मामाजी का साप्ताहिक स्तंभ ‘समय की शिला पर’ छपा करता था. यह स्तंभ तत्कालीन समय की देश-दुनिया व समाज की घटनाओं का दर्पण था. पत्रकारिता के विद्यार्थी काल में मामाजी का यह स्तंभ पाठ्यपुस्तक की तरह था. उन दिनों देशबन्धु में पूज्य मायाराम सुरजन का भी एक साप्ताहिक स्तंभ छपा करता था..दरअसल… सुरजनजी और मामाजी वैचारिक रूप से उत्तर व दक्षिण थे. प्रायः एक ही विषय पर दो विचार एक सप्ताह के भीतर ही पढ़ने को मिलते थे. युगधर्म भी स्वदेश की भांति आरएसएस से संस्कारित समाचारपत्र था.

उन दिनों हमें ‘तीन वाजपेयी’ एक साथ मथते थे. दो संपादक यानि कि मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी और भगवतीधर वाजपेयी तथा तीसरे थे अटल बिहारी बाजपेयी. लंबे समय तक इन तीनों को एक ही खानदान/परिवार का मानता रहा. विपक्ष के प्रकाशपुंज अटल जी सभाओं में स्वेच्छाचारी सत्ता के खिलाफ विप्लवनाद करते तो स्वदेश और युगधर्म के संपादकीय प्रतिपक्ष के विचार स्तंभ बनकर समाज को प्रकाशित करते. पत्रकारिता के लंबे अंतराल बाद एक फिर से मामाजी से जुड़ी किस्सागोई से वास्ता पड़ा. पं. दीनदयाल उपाध्याय विचार प्रकाशन की पत्रिका में मेरे साथी संपादक जयकृष्ण गौड़ जी (अब स्वर्गीय) थे. वे स्वदेश इंदौर से सेवानिवृत्त होकर ‘चरैवेति’ पत्रिका से जुड़े थे. स्वदेश के संपादक के तौर पर गौड़ जी मामाजी के उत्तराधिकारी थे. गौड़ जी ने मामाजी की सादगी, सरलता, मेधा और कुशल सांगठनिक क्षमता के किस्से सुनाते थे. उन्हीं के माध्यम से मामाजी की पुस्तक ‘आपातकाल की संघर्ष गाथा’ पढ़ी. कई और पुस्तिकाएं भी पढ़ीं, जिससे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार और उसकी यात्राकथा से परिचित हुआ.

मामाजी को पढ़ने और उनके जीवन के बारे में सुनने के बाद अब मेरे लिए यह सुनिश्चित कर पाना कठिन कार्य है कि उनका कृतित्व उत्कृष्ट है या जीवन महान है. मैं मामाजी के व्यक्तित्व को उनके कृतित्व से एक बित्ता ऊपर ही पाता हूँ. वे सांसारिक और सरोकारी होते हुए भी वीतरागी थे, विदेहराज जनक की तरह. जनक राजा होते हुए भी योगी और संन्यासी थे. मामाजी ध्येयनिष्ठ थे. अपने उत्तरदायित्वों को लेकर उनका खुद का अपना कुछ नहीं था. जो भी भूमिकाएं मिलती गईं आगे-पीछे की सोचे बिना वे निभाते गए. संघ के प्रचारक के रूप में युवाओं को संस्कारित किया तो अध्यापक के तौर पर देश के भावी निर्माताओं को पढ़ाया. उनसे कहा गया कि चुनाव लड़िए तो वे जनसंघ का दीया लेकर मैदान पर उतर गए. ग्वालियर संसदीय सीट पर उनका मुकाबला राजमाता से…राजा बनाम रंक..का था. फिर विधानसभा में कांग्रेस के दिग्गज नरसिंह राव दीक्षित के मुकाबले उतरे. चुनाव की गणित में यह रंक हारने के बाद भी प्रकारांतर में जीत गया. पहले प्रतिद्वंद्वियों के दिल को जीता और फिर उनकी दलगतनिष्ठा को जीतते हुए इन्हें अपना बना लिया. राजमाता जनसंघ/भाजपा की अमरस्तंभ बनी और नरसिंह राव दीक्षित भाजपा से सांसद.

मामाजी को राजनीति/सत्ता सुख चहिए था भी नहीं. वे गृहस्थ संन्यासी थे. विवेकानंद उनके आराध्य. समूचे वसुधैव कुटुम्बकम को ही अपना घर माना. आपातकाल में वे जेल की कालकोठरी में थे, तभी अर्धांगिनी की मृत्यु की खबर पहुंची. काशी में जब वे शिक्षावर्ग में प्रबोधन दे रहे थे, तभी एकमात्र पुत्र के निधन की खबर पहुँची. पीड़ा की पराकाष्ठा को सहते हुए भी उन्होंने स्वयं को सँभाले रखा..क्योंकि जिनका ध्येय ही राष्ट्र आराधन होता है वे पहले ही अपना सबकुछ समय की धूनी में होम कर चुके होते हैं… मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी ऐसे ही थे..अतुल्य, अविस्मरणीय, अपरिहार्य.

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October 7th 2020, 11:19 am

बीज की ताकत है समर्पण – डॉ. मोहन भागवत

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प्रख्यात पत्रकार एवं चिंतक मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी के जन्मशताब्दी वर्ष का समापन समारोह दिल्ली में आयोजित

केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, पूर्व राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी और वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय भी रहे उपस्थित

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि बीज की ताकत उसका समर्पण है. बीज से वृक्ष बनता है. बीज को मिट्टी में मिल जाना पड़ता है. डॉक्टर हेडग़ेवार ने ऐसे ही प्रतिभाशाली तरुणों की पहचान की और उन्हें यह समर्पण सिखाया. मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी ऐसे ही बीज थे. उन्होंने ध्येय के प्रति समर्पित होकर अपना जीवन जिया.

डॉ. मोहन भागवत प्रख्यात पत्रकार एवं विचारक मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी के जन्मशताब्दी वर्ष के समापन समारोह में संबोधित कर रहे थे. समारोह का आयोजन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली में हुआ. कार्यक्रम की अध्यक्षता केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने की. मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी जन्मशताब्दी समारोह समिति के अध्यक्ष प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी और वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया.

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि विश्व को अपना बनाना है तो पहले भारत को अपना बनाना होगा. अपने जीवन में भारत झलकना चाहिए. विश्वगुरु भारत या महाशक्ति भारत यानि डंडा चलाने वाला भारत नहीं, बल्कि मानवों के हृदय जीतने वाला भारत. ऐसा भारत बनाना है तो ऐसे भारतीयों को खड़ा होना होगा, जो आत्मीय भाव से समर्पित होकर कार्य करें. मामाजी ने इसी आत्मीय भाव से अपना सारा कार्य किया.

भारत विभाजन के समय देशभर में दंगे चल रहे थे. तब मामाजी भिंड के जिला प्रचारक थे और वे यह चिंता कर रहे थे कि भिंड जिले के एक भी गाँव में दंगा नहीं होना चाहिए. दंगे के डर से जब मुस्लिम परिवारों ने भिंड छोड़ा तो वे अपने घरों की चाबियां मामाजी को सौंप कर गए. अपने व्यवहार और कार्य से मामाजी ने यह विश्वास अर्जित किया. जब संघ पर प्रतिबंध लगा और पुलिस मामाजी को ढूंढ रही थी, तब वे मुस्लिम परिवारों में ठहरे थे. यह आत्मीयता मामाजी ने अपने संघकार्य से बनाई थी.
सरसंघचालक ने कहा कि आदमी ने क्या किया और क्या बना, दुनिया इसको गिनती है. लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि आदमी क्या है? यश और सार्थकता दोनों अलग-अलग बाते हैं. जीवन सार्थक होना चाहिए. मामाजी का जीवन सार्थक था. मामाजी जैसे लोगों के कारण ही संघ चल रहा है.

मामाजी के संपर्क में जो भी आया, उसे उनसे प्रेम और प्रकाश ही मिला, चाहे उसकी कोई भी विचारधारा रही हो. राजमाता विजयाराजे सिंधिया और नरसिंह राव दीक्षित उनके विरुद्ध चुनाव लड़े, लेकिन बाद में उनके साथ ही आ गए. पत्रकारिता के क्षेत्र में भी मामाजी ने उच्च आदर्श स्थापित किए. उन आदर्शों को आज सबको अपने पत्रकारीय जीवन में उतारना चाहिए. मामाजी के विचारों के अनुसरण से पत्रकारिता के समूचे वातावरण में परिवर्तन आ सकता है.

समारोह की अध्यक्षता कर रहे सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि मामाजी राष्ट्रीय पत्रकारिता के ब्रांड थे. उन्होंने एक विरासत छोड़ी है, हमें उसका सम्मान करना चाहिए. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्यकर्ता निर्माण की जो पद्धति है, वह अद्भुत है. मामाजी संघ की उसी पद्धति से तैयार हुए स्वयंसेवक थे. उन्हें जो कार्य दिया गया, उसे पूरी प्रामाणिकता से पूरा किया. एक प्रखर पत्रकार, संपादक एवं चिंतक के नाते उनकी पहचान है. भारत विभाजन के दौरान संघ ने कितना महत्वपूर्ण कार्य किया, इस संबंध में उन्होंने बहुत परिश्रम से पुस्तक की रचना की है.

हरियाणा व त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी ने कहा कि संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी के आदर्श को मामाजी ने अपने जीवन में उतारा था. वह सादगी से जीते थे. अपने जीवन का सर्वस्व उन्होंने देश की सेवा के लिए समर्पित कर दिया. मामाजी ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता के अद्वितीय उदाहरण थे. उन्होंने जो आलेख और पुस्तकें लिखीं, वे आज भी प्रासंगिक हैं. वे स्वदेशी के आग्रही थे. जम्मू-कश्मीर और राम जन्मभूमि आंदोलन पर मामाजी ने जो लिखा, उसे हमने आज सच होते देखा है. मामाजी ने अपने चिंतन से राष्ट्र का पुनर्जागरण किया था.

इस अवसर पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने कहा कि भाषायी पत्रकारिता में मामाजी का महत्वपूर्ण स्थान है. उन्होंने पत्रकारिता में एक बड़ी लकीर खींची थी. मामाजी की पत्रकारिता जीवन के प्रति दृष्टिकोण सिखाती है. हम सबको उनकी पुस्तक ‘आपातकाल की संघर्षगाथा’ अवश्य पढ़नी चाहिए. आज की पत्रकारिता को मामाजी की पत्रकारिता से प्रेरणा लेनी चाहिए.

इस अवसर पर मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी, उनके विचार एवं पत्रकारिता पर केंद्रित ‘पाञ्चजन्य’ के विशेषांक और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की पुस्तक ‘शब्द पुरुष : माणिकचंद्र वाजपेयी’ का विमोचन किया गया. कार्यक्रम का संचालन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने और आभार प्रदर्शन भारत प्रकाशन लिमिटेड के प्रबंधक निदेशक अरुण गोयल ने किया.

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October 7th 2020, 11:06 am

स्वदेशी के प्रयोग से देश बनेगा आत्मनिर्भर – सीता राम व्यास

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सेवा भारती ने रोहतक में भी शुरु किया स्वदेशी लड़ी निर्माण का कार्य

रोहतक (विसंकें). सेवा भारती रोहतक ने स्वदेशी की ओर कदम बढ़ाते हुए स्वदेशी लड़ी बनाने के कार्य का शुभारंभ किया. स्वदेशी लड़ी बनाने का कार्य वंचित समाज की महिलाओं द्वारा किया जाएगा. इन महिलाओं को सेवा भारती द्वारा करनाल में प्रशिक्षण देकर प्रशिक्षित किया गया है. इन लड़ियों की खास बात यह है कि यह पूर्णत स्वदेशी हैं और इनमें कहीं भी चाइनीज़ सामान का प्रयोग नहीं किया गया है. कार्य को प्रारम्भ करने से पहले यज्ञ का आयोजन किया गया. स्वामी डॉक्टर परमानंद महाराज, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र कार्यवाह सीता राम व्यास, प्रांत कार्यवाह सुभाष आहूजा भी विशेष रूप से उपस्थित रहे.

क्षेत्र कार्यवाह सीता राम व्यास ने सेवा भारती की पहल की प्रशंसा करते हुए कहा कि स्वदेशी लड़ियों के प्रयोग से देश आत्मनिर्भरता की तरफ तो बढ़ेगा ही, साथ में भारत की उत्पादकता और अर्थव्यवस्था बढ़ेगी व जरुरतमंदों को रोजगार के अवसर भी प्राप्त होंगे. देश के आत्मनिर्भर बनने से हम देश विरोधी ताकतों को मुंह तोड़ जवाब दे सकेंगे. इससे भारत फिर से विश्व गुरु बनने की तरफ अग्रसर होगा. प्रांत कार्यवाह सुभाष आहूजा ने बताया कि ऐसे 15 और प्रकल्प हरियाणा प्रांत में चल रहे हैं. सेवा भारती, सेवा के क्षेत्र में एक और सराहनीय कार्य की शुरुआत कर रहा है. उन्होंने लोगों से आह्वान करते हुए कहा कि जो लोग बॉर्डर पर जाकर देश सेवा नहीं कर सकते, अब वह स्वदेशी को बढ़ावा देकर देश सेवा करने के साथ-साथ अपने देश के वीर सैनिकों के हाथ मजबूत करने का काम करेंगे. स्वदेशी को बढ़ावा देकर हम देश विरोधी ताकतों की अर्थव्यवस्था पर चोट कर उनकी कमर तोड़ने का काम करेंगे. डॉक्टर स्वामी परमानंद ने कहा कि सेवाभाव से किया गया प्रकल्प हमेशा कामयाब होता है. उनका जन सेवा आश्रम भी इस कार्य को आश्रम में शुरू करेगा.

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October 5th 2020, 1:54 pm

हाथरस मामला – सीएए की तर्ज पर हाथरस घटना की आड़ में बड़े स्तर पर जातीय हिंसा फैलाने की साजिश

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लखनऊ (विसंकें). सीएए की तर्ज पर हाथरस घटना की आड़ में भी उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश को हिंसा की आग में झोंकने का प्रयास चल रहा था. इसके लिए अमेरिका की तर्ज पर बड़े स्तर पर योजना की गई थी. न सिर्फ ‘जस्टिस फॉर हाथरस’ नाम से एक वेबसाइट बनाई गई थी, बल्कि उसमें भड़काऊ कंटेंट डालकर लोगों को भड़काने का प्रयास किया जा रहा था. यही नहीं, हाथरस के नाम पूरे देश को जातीय हिंसा में धकेलने की साजिश को अमलीजामा पहनाने के लिए विदेशों से पैसा भी आया था. सरकार के अनुसार वेबसाइट को इस्‍लामिक देशों से फंडिंग मिल रही थी. एमनेस्टी इंटरनेशनल संस्‍था से भी इसके कनेक्‍शन पर जांच की जा रही है.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सुरक्षा एजेंसियों ने http://justiceforhathrasvictim.carrd.co/ नाम से एक वेबसाइट का पता लगाया है. इस पर पुलिस से बच निकलने और विरोध करने के तरीकों की जानकारी दी जा रही थी. साथ ही अपील की जा रही थी कि लोग ज्‍यादा से ज्‍यादा संख्‍या में विरोध प्रदर्शन में शामिल हों. ये भी निर्देश थे कि दंगा भड़कने पर आंसू गैस के गोलों से और गिरफ्तारी से कैसे बचें.

बताया जा रहा है कि यह साइट दिल्‍ली, कोलकाता, अहमदाबाद सहित देश के दूसरे हिस्‍सों में विरोध प्रदर्शन और मार्च आयोजित करने के लिए उकसा रही थी. महज कुछ ही घंटों में हजारों की संख्‍या में लोग फर्जी आईडी के जरिए इससे जुड़ गए. इसके बाद सोशल मीडिया पर हाथरस से जुड़ी अफवाहें और झूठी खबरें पोस्‍ट करने लगे. जैसे ही सुरक्षा एजेंसियां सक्रिय हुईं यह वेबसाइट बंद हो गई. पर, वेबसाइट पर मौजूद कंटेंट एजेसियों ने सुरक्षित कर लिया है. इनमें फोटोशॉप की हुई कई फोटो, फेक न्‍यूज और एडिट किए विजुअल हैं.

सरकार के सूत्रों का कहना है कि वेबसाइट को इस्‍लामिक देशों से भारी मात्रा में आर्थिक मदद मिल रही थी. यह भी शक है कि सीएए विरोध में शामिल पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) का वेबसाइट को तैयार करने और संचालित करने में हाथ रहा है.

वेबसाइट पर कैसी जानकारी?

सरकार का दावा है कि इस तरह की वेबसाइट का मुख्य लक्ष्य सीएम, पीएम और सरकार की छवि को खराब करना है. वेबसाइट पर फर्जी आईडी से कई लोगों को जोड़ा गया. साथ ही इसमें दंगे कैसे करें और फिर दंगों के बाद कैसे बचें, इसके कानूनी उपाय की जानकारी वेबसाइट पर दी गई है. वेबसाइट में बताया गया है कि प्रदर्शन के वक्त क्या पहनें, कब किधर भागें, सोशल मीडिया पर कोई रिकॉर्डिंग ना डालें. अगर पुलिस लाठीचार्ज करती है तो क्या हो, प्रदर्शन वाली जगह माहौल भड़के तो कैसे निपटें.

यूपी सरकार का कहना है कि इसके जरिए फंडिंग की जा रही थी, सोशल मीडिया पर गलत तरीके से पोस्ट, गलत तस्वीरें डालकर माहौल बिगाड़ा जा रहा था. साथ ही बताया गया कि वेबसाइट पर जानकारी दी गई थी मास्क पहनकर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ प्रदर्शन करें, ताकि पहचान ना हो.

अभी ये वेबसाइट डिलीट कर दी गई है, लेकिन इसके लैंडिंग पेज से बता चला है कि वह फ्री में वेबसाइट बनाने के काम आता है. Carrd.co नाम के प्लेटफॉर्म से दुनियाभर के कई प्रोटेस्ट के लिए वेबसाइट बनाई जाती रही हैं, फिर चाहे अमेरिका में चल रहा ब्लैक लाइव मैटर से जुड़ा कोई प्रोटेस्ट हो या फिर कुछ और. इसके अलावा भारत में भी मजदूर, कश्मीर से जुड़े कुछ प्रोटेस्ट पेज इसी प्लेटफॉर्म से बने हैं.

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October 5th 2020, 1:50 pm

विज्ञान के प्रति रुचि बढ़ाने के ललिए गीत गाकर विज्ञान पढ़ा रहीं शिक्षिका

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भोपाल (विसंकें). इंटरनेट, मोबाइल के अभाव में छात्रों में विज्ञान के प्रति रुचि जागरूक करने के लिए शिक्षिका ने रोचक तरीका निकाला है. मध्यप्रदेश के नर्मदापुरम संभाग के सुदूर वनवासी अंचल में शिक्षि‍का सारिका घारू गीत गाकर विज्ञान की अलख जगा रही हैं. आधुनिक संसाधनों से वंचित विद्यार्थियों को विज्ञान के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सांडिया पिपरिया की शिक्षक सारिका ने यह नवाचार किया है. इंटरनेट की पहुंच से दूर इन गांवों में कोरोना संक्रमण के चलते विद्यार्थियों को शिक्षा विशेषकर विज्ञान जैसे जटिल विषय की शिक्षा देना मुश्किल काम था, लेकिन सारिका ने विज्ञान के गीत गाकर इसे आसान बना दिया. ये गीत विद्यार्थियों को पसंद भी आ रहे हैं.

गीतों का पाठ्यक्रम आधारित वीडियो एल्बम बनाया

सारिका ने स्वयं की आवाज में ‘गुनगुनाए विज्ञान, बढ़ाए ज्ञान’ नाम से 25 विज्ञान गीतों का पाठयक्रम आधारित वीडियो एल्बम बनाया है. केंद्रीय विज्ञान सचिव आशुतोष शर्मा ने हाल ही में इन गीतों का ऑनलाइन विमोचन किया. एक गीत के बोल कुछ इस प्रकार हैं –

धातु में होती है चमक, अधातु में नहीं.

धातु ऊष्मा की सुचालक, अधातु तो नहीं.

धातु को ठोको तो बनती है चादर, अधातु से नहीं.

सोना, चांदी, तांबा, जस्ता धातु है. कागज, रस्सी, कपड़ा हैं अधातु.

सारिका ने स्वयं के खर्च से वाहन, चटाई, स्टूल, होर्डिग्स, माइक आदि की व्यवस्था भी की है. वे प्रतिदिन अंचल के किसी गांव में दो से तीन घंटे गीतों, पोस्टर व व्याख्यान के माध्यम से विद्यार्थियों को पढ़ाती हैं. इसमें विज्ञान के नए-नए आविष्कार, उपयोगिता और रोजगार की संभावना से अवगत करवाती हैं. सारिका ने इसे टोला (बहुत कम आबादी वाले गांव ) टीचिंग नाम दिया है. लगभग दो सप्ताह पहले इसकी शुरुआत की थी. हर दिन एक या दो टोले में जाकर पांच से 25 विद्यार्थियों को सुरक्षित शारीरिक दूरी का पालन करवाते हुए पढ़ा रही हैं.

सारिका घारू ने जीव विज्ञान में स्नातक, अंग्रेजी में स्नातकोत्तर, सीएसआइआर नई दिल्ली से विज्ञान संचार में नेशनल डिप्लोमा, पर्यावरण, खगोल व जंतु विज्ञान में डिप्लोमा प्राप्त किया है. हापर रेस सेमिनार बैंकाक व इंडियन साइंस कांग्रेस कोलकाता में शोध पत्र वाचन किए हैं.

उन्हें 28 फरवरी 2018 (विज्ञान दिवस) को साइंस एवं टेक्नोलॉजी विभाग राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. मप्र सरकार ने 2019 में सीवी रमन पुरस्कार दिया. इंडियन साइंस राइटर्स एसोसिएशन नई दिल्ली का मिस इसवा अवार्ड 2012, अगस्त 2018 में नई दिल्ली में हिंदुस्तान की बेटी अवार्ड से सम्मानित हो चुकी हैं.

होशंगाबाद के जिला शिक्षा अधिकारी रवि सिंह बघेल का कहना है कि दूरदराज के क्षेत्रों में विज्ञान के प्रति विद्यार्थियों को जागरूक करने का सारिका का यह सराहनीय कार्य है. हमने सभी शिक्षकों से कहा है कि कोरोना संक्रमण काल में विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करने में नवाचार करें.

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October 5th 2020, 1:50 pm

माई ग्रीन सोसायटी ने संकलित किया लगभग दो टन ई-कचरा

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मुंबई (विसंकें). माई ग्रीन सोसायटी द्वारा ‘स्वच्छ भारत’ अभियान के अंतर्गत दो अक्तूबर को ई-कचरा संकलन का अभियान लिया गया था. इस उपक्रम में मुंबई से लगभग दो टन ई-कचरा संकलित किया गया. सोसायटी सहित दी रिसाइकलिंग कंपनी, राष्ट्रीय सेवा योजना और सेवा सहयोग का अभियान में महत्वपूर्ण सहयोग रहा. मुंबई में अलग-अलग जगहों पर टेम्पो द्वारा यह संकलन किया गया.

अभियान के लिए माई ग्रीन सोसायटी द्वारा हेल्पलाइन नंबर जारी किया गया था. ऑनलाइन फॉर्म का भी प्रावधान किया गया. इस माध्यम से अनेक सोसायटी, संस्था एवं व्यक्तिगत रूप में पंजीकरण किया गया. ऑनलाइन फॉर्म द्वारा लोकेशन एवं सुविधा का समय बताने का अनुरोध किया गया था.

माई ग्रीन सोसायटी एवं एनएसएस द्वारा मुंबई के सभी २४ वार्ड में टेम्पो भेजकर पंजीकृत व्यक्ति एवं संस्थाओं द्वारा ई-कचरा का संकलन किया गया. यह संकलन करने वाले टीमों को 0१ अक्तूबर को वीडियो कॉंफ्रेंस प्रशिक्षित किया गया. 0२ अक्तूबर को सुबह नौ से शाम सात बजे तक संकलन किया गया. जिस जगह टेम्पो पहुंचना असंभव था, वहां पर एनएसएस के स्वयंसेवियों द्वारा व्यक्तिगत रूप में जाकर संकलन किया गया. संकलन के पश्चात यह ई कचरा रिसाइकलिंग कंपनी के पास भेजा गया.

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October 5th 2020, 1:39 pm

कहानियों का द्वीप है बस्तर – प्रो. संजय द्विवेदी

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नई दिल्ली. भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि ”बस्तर हमेशा कहानियों का द्वीप रहा है. यहां के लोक जीवन के किस्से पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं.” वे लेखक एवं आईटीबीपी के डिप्टी कमान्डेंट कमलेश कमल की बेस्टसेलर पुस्तक ‘ऑपरेशन बस्तर’ के दूसरे संस्करण के ऑनलाइन लोकार्पण समारोह में संबोधित कर रहे थे. कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे तथा पत्रकार पंकज झा ने मुख्य वक्ता के रूप में विचार व्यक्त किये.

प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि भारत कथाओं का देश है और कहानियां हमारे लोकजीवन का आईना हैं. जिसका मन लोक में रमता है, वही लोकजीवन की कहानियां सुना सकता है. ‘ऑपरेशन बस्तर’ के लेखक कमलेश कमल ने बस्तर के दर्द को अपनी लेखनी के माध्यम से पुस्तक में उकेरा है. साहित्य हमारे समाज का दर्पण है. साहित्य सुविचारित और संवेदनाओं के साथ लिखा जाता है और संवेदनशील मनुष्य ही अच्छा साहित्यकार हो सकता है. साहित्य ही किसी आदमी को मनुष्य बनाता है.

छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने कहा कि लेखक कमलेश कमल ने बस्तर में अपने सेवाकाल के दौरान अपने अनुभवों को पुस्तक का रूप दिया है, जिसके लिए वे बधाई के पात्र हैं. विषम परिस्थतियों में रह कर लेखन को जीवन का हिस्सा बनाना एक कठिन कार्य है, लेकिन ये कार्य उन्होंने किया है.

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता पंकज झा ने कहा कि मौन और मुखरता के बीच रचनाधर्मिता के लिये जुटना एक साहसिक कार्य है. जिस तरह लेखक कमलेश कमल ने बस्तर की सजीव कहानी को ‘ऑपरेशन बस्तर’ के माध्यम से प्रस्तुत किया है, वह विस्मित करता है. कार्यक्रम का संचालन युवा आलोचक पीयूष द्विवेदी ने किया. लेखक कमलेश कमल ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए पाठकों के प्रति विशेष आभार प्रकट किया, जिन्होंने इस किताब को बेस्टसेलर बनाया. कार्यक्रम के अंत में पुस्तक के प्रकाशक यश पब्लिकेशंस के निदेशक जतिन भारद्वाज ने आयोजन की सफलता पर सभी के प्रति आभार प्रकट किया.

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October 5th 2020, 1:39 pm

संकट काल में चरखा बना सहारा, 500 परिवारों के रोजगार का आधार

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प्रयागराज. कोरोना संकट के दौर में अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई है. संकट काल में चरखा मददगार बना हुआ है. उत्तर प्रदेश के प्रयागराज की हंडिया तहसील में 500 से ज्यादा परिवारों को चरखे से रोजगार मिला हुआ है. परिवार छह से दस हजार रुपये प्रतिमाह कमा रहे हैं. तहसील के डिघौटा गांव में योगेंद्र पटेल का पूरा परिवार चरखा चला रहा है. पांच भाइयों के परिवार में आठ चरखे हैं. उनके परिवार की महिलाएं और बेटियां वंदना, सुशीला, रामदुलारी, रेखा, सोमवारी चरखा चलाकर परिवार का खर्च उठा रही हैं. परिवार में कोई भी सरकारी या प्राइवेट नौकरी नहीं करता है. खेती और चरखा ही रोजगार का साधन है. इसी से बच्चों की पढ़ाई से लेकर परिवार का पूरा खर्च चलता है. गांव में ऐसे 25 परिवार चरखे पर निर्भर हैं. इनके अलावा रेहठो, कोरीपुर, मोहिउद्दीनपुर, आलानगरी, अनुआ, भेलखा, गोरिगो, चनेथू, लीलापुर, मियांपुर, राचनपुर, बछेड़ी, कटहरा आदि गांवों में 300 से अधिक चरखे चल रहे हैं. इनके माध्यम से 500 परिवारों की रोजी-रोटी चल रही है.

लाल बहादुर शास्त्री स्मारक ग्रामोद्योग संस्थान कच्चा माल मुहैया करवाता है. धागा तैयार होने पर 220 रुपये किलो में खरीद लेता है. अब आठ और 12 तकले वाले एनएमसी यानि न्यू मॉडल चरखे पर काम होता है. आठ तकले वाला हाथ से, जबकि 12 तकले वाला सौर सिस्टम से चलता है. जिला खादी ग्रामोद्योग अधिकारी राम औतार यादव ने बताया कि आठ और 12 तकले के चरखे आने से डिमांड बढ़ गई. कोरोना काल में तो इनकी मांग तेजी से बढ़ी है. खादी की भी डिमांड बढ़ी है. आने वाले दिनों में इससे कई और लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है.

मध्यप्रदेश के मुरैना जिले में जौरा नामक स्थान है, जहां महात्मा गांधी की तस्वीर के सामने 654 दस्युओं ने बंदूकें छोड़ आत्म समर्पण किया था. उसी जगह बना गांधी सेवा आश्रम अब स्वावलंबन की मिसाल बन चुका है. इसमें कई पूर्व दस्यु बागवानी, खाद बनाने से लेकर अन्य काम कर रहे हैं. इतना ही नहीं, यह आश्रम 1160 से ज्यादा परिवारों को तीन दशक से रोजगार मुहैया करवा रहा है.

गांधीवादी विचारक डॉ. एसएन सुब्बाराव ने पहले चंबल के खूंखार दस्युओं को आत्मसमर्पण के लिए मनाया, फिर सरकार को राजी किया. इसके बाद 14 अप्रैल 1972 को महात्मा गांधी की तस्वीर के समक्ष समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण की उपस्थिति में 654 दस्युओं ने आत्मसमर्पण किया. दस्युओं को सुरक्षा का विश्वास दिलाने के लिए प्रभावती देवी ने उस समय के सबसे खूंखार दस्यु मोहर सिंह व माधौसिंह को राखी बांध भाई बनाया था. पहले दस्युओं के स्वजनों को यहां लाया गया. सजा पूरी कर आत्मसर्मिपत दस्यु भी यहां आ गए. अब 1160 परिवारों की आजीविका की धुरी यह आश्रम है. अपने जमाने के खूंखार दस्यु माधौसिंह, हरिविलास गिरोह के सबसे भरोसेमंद सदस्य बहादुर सिंह कुशवाह, ऐसे पूर्व दस्यु अब यहां सेवा कर सादगी से जीवन जी रहे हैं.

 

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October 5th 2020, 1:39 pm

वीरांगना रानी दुर्गावती के पराक्रम को याद कर दीनदयाल शोध संस्थान ने ग्रामीण क्षेत्रों में मनाई जयंती

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चित्रकूट. वीरांगना रानी दुर्गावती की जयंती पर दीनदयाल शोध संस्थान चित्रकूट ने सभी प्रकल्पों सहित ग्रामीण क्षेत्रों में भी व्याख्यान कार्यक्रम आयोजित कर उनके शौर्य पराक्रम की गाथा को सबके समक्ष रखा.

ग्राम हिरौदीं, भरगवां (बड़े देव बाबा स्थान), बीरपुर सिद्धा, वुन्देला पुरवा, सोनबर्षा, रानीपुर आदि केंद्रों पर बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया गया. कार्यक्रम के बाद सामूहिक सहभोज, संस्कार केंद्र का प्रदर्शन, स्वच्छता कार्यक्रम भी सामूहिक किया गया. कृषि विज्ञान केंद्र पर भी जयंती कार्यक्रम मनाया गया. उपरोक्त कार्यक्रम में दीनदयाल शोध संस्थान के सचिव डॉ. अशोक पांडेय सहित अन्य संबोधित किया.

दीनदयाल शोध संस्थान के सचिव डॉ. अशोक पांडेय ने कहा कि उनके शौर्य, पराक्रम की गाथाएं बेटियों को असंभव को संभव कर दिखाने का साहस देंगी, ‘दुर्गा का रूप लिए साहस, शौर्य की वह मूरत थी. मुगलों को पराभूत कराती देवी की वह सूरत थी. दुर्गावती के वीरतापूर्ण चरित्र को भारतीय इतिहास से इसलिए काटकर रखा गया, क्योंकि उन्होंने मुस्लिम शासकों के विरुद्ध कड़ा संघर्ष किया था और उनको अनेक बार पराजित किया था. अकबर के मानिकपुर के सूबेदार ख्वाजा अब्दुल मजीद खां ने रानी दुर्गावती के विरुद्ध अकबर को उकसाया था. अकबर अन्य राजपूत घरानों की विधवाओं की तरह दुर्गावती को भी रनवासे की शोभा बनाना चाहता था. अकबर ने एक विधवा पर जुल्म किया. लेकिन धन्य है – रानी दुर्गावती का पराक्रम कि उसने अकबर के जुल्म के आगे झुकने से इंकार कर स्वतंत्रता और अस्मिता के लिए युद्ध भूमि को चुना और अनेक बार शत्रुओं को पराजित करते हुए 1564 में बलिदान दे दिया. वीरांगना महारानी दुर्गावती साक्षात दुर्गा थी. महारानी ने 16 वर्ष तक राज संभाला. इस दौरान उन्होंने अनेक मंदिर, मठ, कुएं, बावड़ी तथा धर्मशालाएं बनवाईं.

रानी दुर्गावती का जन्म आज ही के दिन 5 अक्तूबर 1524 को हुआ था. रानी दुर्गावती सुन्दर, सुशील, विनम्र, योग्य एवं साहसी लडक़ी थी. महारानी दुर्गावती कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल की एकमात्र संतान थीं. बांदा जिले के कालिंजर किले में 1524 ईसवी की दुर्गाष्टमी पर जन्म के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया. नाम के अनुरूप ही तेज, साहस, शौर्य और सुन्दरता के कारण इनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गई. दुर्गावती के मायके और ससुराल पक्ष की जाति भिन्न थी, लेकिन फिर भी दुर्गावती की प्रसिद्धि से प्रभावित होकर गोंडवाना साम्राज्य के राजा संग्राम शाह मडावी ने अपने पुत्र दलपत शाह मडावी से विवाह करके अपनी पुत्रवधु बनाया था. दुर्भाग्यवश विवाह के चार वर्ष बाद ही राजा दलपतशाह का निधन हो गया. उस समय दुर्गावती की गोद में तीन वर्षीय नारायण ही था. अत: रानी ने स्वयं ही गढ़मंडला का शासन संभाल लिया.

वर्तमान जबलपुर उनके राज्य का केंद्र था. उन्होंने अपनी दासी के नाम पर चेरीताल, अपने नाम पर रानीताल तथा अपने विश्वस्त दीवान आधारसिंह के नाम पर आधारताल बनवाया. रानी दुर्गावती के सुखी और सम्पन्न राज्य पर मालवा के शासक बाजबहादुर ने कई बार हमला किया, पर हर बार वह पराजित हुआ. मुगल शासक अकबर भी राज्य को जीतकर रानी को अपने हरम में डालना चाहता था. उसने विवाद प्रारम्भ करने हेतु रानी के प्रिय सफेद हाथी (सरमन) और उनके विश्वस्त वजीर आधार सिंह को भेंट के रूप में अपने पास भेजने को कहा था. रानी ने यह मांग ठुकरा दी थी.

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October 5th 2020, 1:39 pm

जम्मू-कश्मीर – हाथों में पत्थर थमाने वालों ने किया किनारा, सेना ने दिया सहारा

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जम्मू-कश्मीर (विसंकें). जन सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत 11 माह जेल में बिता चुके इश्फाक ने बताया कि मैं जब भी पकड़ा गया, परिवार के अलावा कोई मदद को नहीं आया. जिन लोगों के कहने पर मैंने पत्थर उठाए, आजादी और जिहाद के नारे लगाए, वह कन्नी काट गए. सबसे बुरी हालत तो उस समय हुई जब मैं ऊधमपुर जेल में बंद था और घर में मां बीमार थी. मुझे जमानत दिलाने के लिए पिता को जमीन बेचनी पड़ी. आजादी का पाठ पढ़ाने वालों के पास मैं मदद के लिए गया, उन्होंने मुझे दुत्कार दिया. मैने देखा कि मेरी तरह कई लड़के परेशानी के आलम में घूम रहे थे, सभी बेरोजगारी की मार झेल रहे थे. थानों के चक्कर काट रहे थे. मेरी हालत भी पतली थी, पिता भी काम पर जाने में असमर्थ थे. जहां नौकरी के लिए जाता, वहां से खाली लौटना पड़ता. मुझे कौन नौकरी देता?

इश्फाक अहमद की कहानी बयां करती है कि घाटी मं आजादी और जिहाद के नारे लगवाने वालों के लिए निजी एजेंडा अधिक महत्वपूर्ण है. अपने स्वार्थ साधने के लिए युवाओं को बरगलाया तथा स्वार्थ सिद्धि हुई, अपना एजेंडा पूरा हुआ तो किनारा कर लिया.

कैसी आजादी और कैसा जिहाद. कुछ लोगों ने निजी एजेंडे को पूरा करने के लिए हमारे जैसे युवाओं के हाथों में पत्थर थमा दिए. जब एजेंडा पूरा हुआ तो किनारा कर लिया. अब प्रसन्न हूं कि मैं सच को जान पाया और उनके फरेबी एजेंडे से आजादी मिली – इश्फाक. यह केवल एक इश्फाक अहमद का दर्द नहीं, हर कश्मीरी युवा की कहानी है. हर तरफ से संकट से घिरे 26 वर्षीय इश्फाक अहमद और उस जैसे कई युवाओं के लिए सेना मददगार बनी और सम्मान से जीने की राह दिखाई. आज यह युवा रोजगार पाकर परिवार का सहारा बन रहे हैं.

उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले का लालोब निवासी इश्फाक बताता है कि मैं कभी इन फरेबी नारों में फंसकर मरने को निकलता था. यही कारण है कि उस पर पत्थरबाजी, आगजनी, हिंसक प्रदर्शन और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोपों में 11 एफआइआर दर्ज हैं. वह सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस के लिए सिरदर्द था.

एक दिन अचानक सेना के एक अधिकारी मिले. उनसे अपना दर्द बताया. कहा, देखते हैं. अगस्त में यहां कुपवाड़ा में सेना की 28 आरआर ने रोजगार मेला आयोजित किया. इलाके के कई पढ़े-लिखे और हुनरमंद नौजवान शामिल हुए. पिता के कहने पर मैं भी मेले में पहुंचा. पहले डर रहा था कि यहां फौजी अफसर मुझे देखेंगे तो क्या कहेंगे. मैं तो उन पर पथराव करता था. एक कंपनी के अधिकारियों के साथ बातचीत हुई. आज मैं बेकार नहीं हूं. मेरे साथ नौ और लड़कों को रोजगार मेले में नौकरी मिली है.

स्वार्थ की सियासत ने मेरे बेटे को तबाही की ओर धकेला

इश्फाक के पिता अब्दुल रशीद बट ने कहा कि कश्मीर में कुछ लोगों की स्वार्थपूर्ण सियासत ने मेरे बेटे को तबाही की तरफ धकेल दिया था. पूरा परिवार मुश्किल में था. इश्फाक को हीरो बताने वाले मुसीबत में हमारा साथ छोड़ गए. भला हो फौज का, जो मेरे बेटे की जिंदगी संवार दी. हमारे इलाके में एक फौजी अफसर ने एक दिन यूं ही मुझे पूछ लिया कि इश्फाक कश्मीर की दुश्मन ताकतों के लिए नारे लगाएगा या कुछ सही करेगा. इश्फाक भी फौज के पास जाने से हिचक रहा था. हमने कर्नल साहब से बात की और आज मेरा बेटा इज्जत की रोटी कमा रहा है.

कर्नल महाजन ने कहा कि हमने यहां युवकों की छानबीन की. यह पता लगाया कि सबसे ज्यादा जरूरतमंद कौन है और वह कौन सा काम कर सकता है. इसके आधार पर हमने रोजगार मेले का आयोजन किया. मैंने खुद इश्फाक से कई बार बातचीत की तो मुझे महसूस हुआ कि वह सही मायनों में एक गुमराह युवक था.

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October 5th 2020, 1:39 pm

गांववासी गांधी कुटीर में करते हैं समस्याओं का समाधान

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रायपुर (विसंकें). छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के छोटे से गांव तेंदूटिकरा में गांववासी हर समस्या का समाधान गांधी कुटीर में करते हैं. कहा जाए तो ग्रामीण महात्मा गांधी के बताए मार्ग पर आत्मीयता के साथ चल रहे हैं. चाहे बुनियादी सुविधाओं का मामला हो या फिर आपसी विवाद का, यहां के ग्रामीण किसी का मुंह नहीं ताकते. आत्मनिर्भरता व स्वावलंबन के दम पर यह गांव बापू के सपनों का गांव बन गया है.

कोरबा जिला मुख्यालय से लगभग 90 किलोमीटर दूर वनांचल क्षेत्र के तेंदूटिकरा में 70 पंडो परिवार रहते हैं. गांधीवाद से प्रेरित ग्रामीणों ने गांव के मध्य गांधी कुटीर का निर्माण किया है. जब कभी कोई समस्या आती है तो ग्रामीण इसी कुटीर में बैठकर उसका निराकरण करते हैं. निस्तारी की समस्या से जूझ रहे ग्रामीणों ने पिछले साल तालाब का निर्माण किया.

गर्मी में पेयजल की समस्या दूर करने के लिये सभी ग्रामीणों ने मिलकर कुआं खोदा. इसमें किसी तरह की सरकारी सहायता नहीं ली. गांव में आज तक किसी मामले को लेकर पुलिस नहीं पहुंची है. सभी विवाद गांधी कुटीर में बैठकर बड़े-बुजुर्गों के हस्तक्षेप से निपटाए जाते हैं. विशेष यह है कि स्वावलंबी ग्रामीणों ने प्रधानमंत्री आवास योजना का भी लाभ नहीं लिया. किसी एक का मकान बनाने के लिए पूरे गांव के लोग निर्माण सामग्री ईंट, लकड़ी व खपरैल का इंतजाम करने के साथ श्रमदान करते हैं.

हर बार निर्विरोध चुनाव

समाज का नेतृत्व कर रहे समुदाय के मुखिया मोहन पंडो ने बताया कि इसी वर्ष ग्राम पंचायत चुनाव में हमारे गांव में आने वाले दो वार्ड में पंच सीताराम पंडो व धरमू यादव निर्विरोध चुने गए. यहां हर बार चुनाव में एकमात्र प्रत्याशी ही खड़ा किया जाता है.

ग्रामीण तालाब- कुएं, बंजर भूमि सुधार, मेढ़बंदी आदि कार्यों में एक-दूसरे की सहायता करते हैं. इस दौरान वे छत्तीसगढ़ी ददरिया और करमा गीत गाकर एक-दूसरे का हौसला बढ़ाते हैं.

कोरबा के उप निर्वाचन अधिकारी कमलेश नंदिनी साहू ने कहा कि ग्राम पंचायत जलके के आश्रित ग्राम तेंदूटिकरा में आने वाले वार्ड क्रमांक 19 व 20 में पंचों का चुनाव गांव के लोग आपसी सहमति से करते हैं, इसलिए वार्ड से एक प्रत्याशी ही नामांकन दाखिल करता है.

कोरबा के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक कीर्तन राठौर ने कहा कि तेंदूटिकरा गांव से अब तक आपसी विवाद या अन्य किसी भी प्रकार की शिकायत कोरबी पुलिस चौकी में नहीं पहुंची है. छोटे-मोटे मामले आपस में ही सुलझा लिए जाते हैं.

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October 4th 2020, 2:03 pm

गोमय दीपावली अभियान – एक करोड़ परिवारों तक पहुंचाई जाएगी गाय के गोबर से बनी मूर्तियां व दीये

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गाय के गोबर से बने दीयों से जगमग होगी दीपावली – विद्या सागर बाघला

सिरसा (विसंकें). हरियाणा गौ सेवा आयोग के उपाध्यक्ष विद्या सागर बाघला ने कहा कि इस बार दीवाली के पावन पर्व पर गाय के गोबर से बनी मूर्तियां व दीयों से घर रोशन हों, इसके लिए राष्ट्रीय कामधेनु आयोग ने गोमय दीपावली अभियान की शुरुआत की है. अभियान के तहत दीवाली पर देश के 11 करोड़ परिवारों में कामधेनु गौमय दीये व मूर्तियां पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है. इसी कड़ी में हरियाणा में विभिन्न गौशालाओं में एक करोड़ परिवारों तक मूर्तियां व दीये पहुंचाए जाएंगे.

विद्या सागर बाघला रविवार को स्थानीय लोक निर्माण विभाग में जिला की विभिन्न गौशालाओं के प्रतिनिधियों की बैठक को संबोधित कर रहे थे.

उपाध्यक्ष विद्या सागर बाघला ने कहा कि अभियान का वाक्य गोमय वसते लक्ष्मी है अर्थात् गाय में लक्ष्मी का वास होता है और हम दीपावली पर मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं. इसलिए कामधेनु आयोग द्वारा गाय के गोबर से मां लक्ष्मी की मूर्तियां व दीपक बनाने के मिशन की शुरुआत की गई है. हरियाणा में लगभग 650 गौशालाएं हैं, जिसमें से 50 से अधिक गौशालाएं गोबर के दीये व मूर्तियां बनाने के लिए स्वेच्छा से आगे आई हैं. इनमें सिरसा जिला की 12 गौशालाएं शामिल हैं, जहां गाय के गोबर से दीपक व मूर्तियां बनाई जाएंगी. प्रदेश की शेष गौशालाएं दीयों व मूर्तियों की बिक्री में सहयोग करेंगी, इससे न केवल गाय के गोबर का सदुपयोग होगा, बल्कि गौशालाओं की आमदनी भी बढ़ेगी.

उन्होंने कहा कि 9 अक्तूबर, 2020 को केंद्रीय मंत्री गिरीराज किशोर, राष्ट्रीय कामधेनु आयोग के चेयरमैन वल्लभ भाई कथीरिया दिल्ली से गौमय मूर्तियों व दीपकों को लांच करेंगे. हरियाणा में शीघ्र ही प्रदेश के मुख्यमंत्री मनोहर लाल गाय के गोबर से बने दीयों व मूर्तियों को लांच करेंगे. हरियाणा गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष श्रवण कुमार गर्ग के मार्गदर्शन में प्रत्येक जिले में प्रचारित किया जाएगा. प्रदेश में अभियान के प्रचार-प्रसार में राष्ट्रीय व प्रांतीय स्तर के संत, महात्मा, राजनीतिक व अन्य प्रबुद्ध व्यक्तियों का सहयोग लिया जाएगा.

उन्होंने कहा कि ये दीये प्रदूषण कारक नहीं होंगे और वातावरण को शुद्ध करेंगे, इससे गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने में सहयोग मिलेगा. दीपावली पर मिट्टी के अलावा गाय के गोबर से बने दीपकों से भी जगमगाहट होगी और वातावरण सुंगधित होगा. पर्यावरण संरक्षण और गौशालाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए हरियाणा गौ सेवा आयोग ने विस्तृत कार्ययोजना तैयार की है.

सिरसा की गौशालाओं में बनाए जाएंगे गोबर के दीपक व मूर्तियां

श्री बनवाला गौशाला अनुसंधान केंद्र बनवाला, श्री कृष्ण गौसेवा पन्नीवाला मोटा, राम गोपाल गौशाला कालुआना, श्री दुर्गा गौशाला मम्मडख़ेड़ा, श्री गौशाला सादेवाला, श्री कृष्ण प्रणामी गौशाला गोदिकां, श्री कृष्ण गौशाला जंडवाला बिश्रोइयां, भगवान श्री कृष्ण गौशाला चौटाला, शिव शक्ति कृष्ण मुनी गौशाला चाहरवाला, श्री नंदीशाला डबवाली, श्री गौशाला डबवाली, श्री राधा कृष्ण गौशाला फरवाई में गोबर के दीपक व मूर्तियां बनाई जाएंगी.

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October 4th 2020, 1:32 pm

भारतीय मजदूर संघ को असंगठित क्षेत्र में अपेक्षित परिवर्तन के लिये कार्य करना चाहिए – डॉ. मोहन भागवत

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नई दिल्ली. भारतीय मजदूर संघ के राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि भारतीय मजदूर संघ को जिलों, ब्लाक व गांवों के असंगठित क्षेत्रों में अपने कार्य का विस्तार करना चाहिए. और क्षेत्र में अपेक्षित परिवर्तन लाना चाहिए. भारतीय मजदूर संघ को शोषण मुक्त भारत के लिए काम करना है. देश में सभी को न्याय मिलना चाहिए. भारतीय मजदूर संघ के कार्यों का उल्लेख करते हुए सरसंघचालक जी ने कहा बीएमएस ने राष्ट्र, उद्योग और श्रमिक के हितों के साथ सामंजस्य बैठाकर बेहतर ढंग से काम किया है. इससे समाज के हर वर्ग के श्रमिक को उसका अधिकार मिला है. उनके विकास को ध्यान में रख कर काम कर रहा है, इतना ही नहीं अन्य संगठनों के साथ मित्रतापूर्ण समन्वय बनाकर कर रहा है.

सरसंघचालक जी ने कहा हमें अपनी मूल राष्ट्रीय विचारधारा से जुड़े रहना चाहिए. अपने मूल सिद्धांतों को आगे रख कर काम करना चाहिए. भारतीय विचारों व मूल्यों पर विश्वास रखना चाहिए. श्रमिकों की प्रतिबद्धता और मेहनत से संगठन मजबूत होता है. श्रम के क्षेत्र में एक नई संस्कृति बनाएं और इसके विकास के लिए काम करें. उन्होंने प्रौद्योगिकी क्षेत्रों के साथ जुड़ कर कार्य करने का संदेश दिया.

भारतीय मजदूर संघ के सम्मेलन में पूरे भारत में लगभग 6000 यूनियन और 40 महासंघों का प्रतिनिधित्व करने वाले 3000 प्रतिनिधियों ने भाग लिया.

सम्मेलन में उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता सीके साजी नारायणन ने की. उन्होंने कहा कि भारत ने कोविड-19 के दौरान सामाजिक भाईचारे का उदाहरण प्रस्तुत कर एक-दूसरे की सहायता की. भारतीय मजदूर संघ श्रमिकों के अधिकार की रक्षा और उनके विकास के लिए काम कर रहा है. सत्र का संचालन बीएमएस के महासचिव व्रिजेश उपाध्याय ने किया. सरसंघचालक ने वयोवृद्ध कार्यकर्ताओं कृष्णलाल पाथेला और अमरनाथ डोगरा को सम्मानित किया.

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October 4th 2020, 1:18 pm

प्रत्येक राज्य धर्मांतरण के खिलाफ सख्त कानून बनाए

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सुखदेव

प्रत्येक राष्ट्र का एक इतिहास और संस्कृति होती है. सभी निवासियों की अपनी संस्कृति के प्रति श्रद्धा होती है. प्रत्येक सभ्यता, संस्कृति अपने आप में पूर्ण होती है. पुण्य भूमि भारत को तो सभी ने माता के रूप में पूजा है. स्वामी विवेकानंद कहते थे – ‘इस देश का एक भी हिन्दू अगर धर्मांतरण करता है तो वह एक प्रकार से राष्ट्रांतरण करता है.’ यह राष्ट्रांतरण आगे जाकर राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए बड़ा खतरा बन जाता है. देश के उन्हीं भागों में से अलग राष्ट्र बनाने की बात होती है, जिस हिस्से में हिन्दू कम होते हैं. संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहेब देवरस जी कहते थे, ‘हिन्दू घटा तो देश बंटा.’ महाराष्ट्र के पालघर जिले के एक गांव में संतों की लीचिंग द्वारा दुर्भाग्यपूर्ण हत्या धर्मांतरण से अपनी संस्कृति के प्रति उपजी अश्रद्धा का ही नतीजा है.

भारत में मिशनरी संगठन विदेशी आर्थिक सहायता द्वारा धर्मांतरण के काम में संलग्न हैं. भारत लंबे समय से ईसाई धर्मांतरण का निशाना है. पुर्तगाली कब्जे के बाद गोवा में पादरी जेवियर द्वारा उत्पीड़न किया गया और 1561 में ईसाई कानून लागू हुए. हिन्दू प्रतीक धारण करना अपराध था. तिलक लगाना और घर में तुलसी का पौधा लगाना मृत्युदंड का कारण बना. एआर पिरोलकर द्वारा लिखित ‘द गोवा इंक्वज़िशन’ के अनुसार – “अरोपी के हाथ-पैर काटना, मोमबत्ती से शरीर जलाना, रीढ़ तोड़ना, जैसे तमाम अमानवीय अत्याचार किये गये.”

भय, प्रलोभन और तथाकथित झूठी सेवा के माध्यम से वह वंचितों और आदिवासियों का धर्मांतरण करवाते हैं. धर्मांतरित बंधु अपनी भारत माता और संस्कृति से कट जाता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने हाल में विदेशी अनुदान विनियमन अधिनियम में संशोधन किया है. अब सभी एनजीओ विदेशी सहायता का 20% हिस्सा ही प्रशासनिक व्यय में दिखा पाएंगे, जब की पहले वह 50% तक खर्चा प्रशासनिक व्यय में दिखाते थे. विदेशी अनुदान को किसी अन्य संगठन को भी स्थानांतरित करने पर रोक लगाई गयी है. अधिनियम में राष्ट्रीय सुरक्षा को क्षति पहुंचाने वाली किसी भी गतिविधि पर रोक की व्यवस्था की गयी है. लाइसेंस नवीनीकरण के लिये आधार संख्या देना अनिवार्य करने के साथ-साथ लोकसेवक, सरकार या सरकारी नियंत्रण वाले निगमों को विदेशी अनुदान प्राप्त करने के अयोग्य घोषित किया गया है. इस से विदेशी अनुदान से भारत को कमजोर करने की साजिश में जुटे लोग और संस्थान परेशान हो गए हैं.

ईसाई धर्मांतरण अंग्रेजी राज के समय से ही चिंतित करता रहा है. मिशनरी संगठन उपचार, शिक्षा आदि सेवाओं के बदले गरीबों का धर्मांतरण कराते रहे हैं. 18 जुलाई, 1936 के हरिजन में महात्मा गांधी ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए लिखा था – “आप पुरस्कार के रूप में चाहते हैं कि आपके मरीज ईसाई बन जाएं.” अफ्रीकी आर्चबिशप डेसमंड टुटु ने कहा था – “जब मिशनरी अफ्रिका आए तो उनके पास बाइबल थी और हमारे पास धरती. मिशनरी ने कहा हम सब प्रार्थना करें. हमने प्रार्थना की. आंखें खोलीं तो हमारे हाथ में बाइबल थी और भूमि उनके कब्जे में.”

भारत में ईसाई धर्मांतरण का मुख्य निशाना वनवासी, जनजाति समाज है. आंध्र प्रदेश के चार जिले ईसाई बाहुल्य हो चुके हैं. ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तर पूर्व के राज्यों के अंदर धर्मांतरण बहुत तेजी से फलफूल रहा है. ध्यान रहे तुर्क मुग़लों ने जो ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन किया, उसके कारण ही पाकिस्तान बना. धर्मांतरण के पक्ष में तर्क दिया जाता है कि हिन्दू समाज की जातिगत व्यवस्था ने हमें मजबूर कर दिया है, जबकि सच्चाई यह है कि 73 फिरकों वाला इस्लाम जहां देवबंदी बरेलवी की मस्जिद में नहीं जा सकता और 146 हिस्सों में बंटे हुए ईसाई हमें समानता का पाठ पढ़ाते हैं. वस्तुत: यह संघर्ष ऊंच-नीच, जाति व्यवस्था के विरुद्ध नहीं है. यह हिन्दू समाज को तोड़ने की साजिश है.

मिशनरियों ने आजकल नए हथकंडों का प्रयोग शुरू किया है, जैसे मदर मैरी की गोद में ईसा मसीह की जगह गणेश या कृष्ण को चित्रांकित कर ईसाइयत का प्रचार किया जा रहा है. जिससे जनजाति क्षेत्र के लोगो को लगे कि वे तो हिन्दू धर्म के ही किसी संप्रदाय की सभा में जा रहे हैं. अब धर्मांतरण के बाद भी हिन्दू लिखते हैं ताकि पिछड़ी जाति का लाभ मिलता रहे. मिशनरियों को आप भगवा वस्त्र पहनकर हरिद्वार, ऋषिकेश से लेकर तिरुपति बालाजी तक धर्म प्रचार करते देख सकते हैं. यही हाल पंजाब में है, जहां बड़े पैमाने पर सिक्खों को ईसाई बनाया जा रहा है. पंजाब में चर्च का दावा है कि प्रदेश में ईसाइयों की संख्या सात से दस प्रतिशत हो चुकी है.

मध्यप्रदेश में कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमन्त्री रवि शंकर शुक्ल ने न्यायमूर्ति भवानी शंकर नियोगी की अध्यक्षता में मिशनरियों द्वारा धर्मांतरण की जांच हेतू आयोग बिठाया. आयोग ने 14 जिलों के 11,360 लोगों के बयान लिये. ईसाई संस्थाओं ने भी अपनी बात रखी. आयोग ने धर्मांतरण के लक्ष्य से भारत आए विदेशियों को बाहर निकालने हेतु सिफारिश की. उच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायधीश एम.एल. रेगे की जांच समिति (1982) ने ईसाई धर्मांतरण को दंगों का कारण बताया. न्यायमूर्ति वेणुगोपाल आयोग ने धर्मांतरण रोकने हेतु कानून बनाने की सिफारिश की. आस्ट्रेलियाई पादरी ग्राहम स्टेन्स की हत्या की जांच वाले वाधवा आयोग ने भी ईसाई धर्मांतरण को चिन्हित किया था.

संविधान सभा में भी धर्म प्रचार के अधिकार (अनुच्छेद 25) पर बहस हुई. सभा के अधिकांश सदस्य इसके विरुद्ध थे. लोकनाथ मिश्र ने धर्म प्रचार को गुलामी का प्रस्ताव बताया था. उन्होंने भारत विभाजन को धर्मांतरण का ही परिणाम बताया था.

प्रकाशवीर शास्त्री ने 1960 में निजी विधेयक प्रस्तुत किया, जनसंघ नेता अटल बिहारी वाजपेयी और कांग्रेस सांसद राम सुभग सिंह, सेठ गोविंद दास ने भी इसका समर्थन किया था. लेकिन विधेयक पारित नहीं हो सका. मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों ने धर्मांतरण को रोकने के लिए अधिनियम बनाए हैं, लेकिन लालच और धोखाधड़ी द्वारा धर्मांतरण का क्रम अभी भी जारी है. आवश्यकता है कि समस्त राज्यों में सख्त कानून बनाए जाएं.

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October 4th 2020, 1:18 pm

आत्मनिर्भरता – नई रक्षा खरीद प्रक्रिया-2020 को सरकार ने स्वीकृति प्रदान की

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2290 करोड़ रुपये के सैन्य उपकरण खरीदने को स्वीकृति, 73 हजार असॉल्ट रायफल की खरीद होगी

नई दिल्ली. सैन्य उपकरण और हथियारों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने के उद्देश्य से सरकार ने नई रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीएपी 2020) की घोषणा कर दी. नई प्रक्रिया में अहम बदलाव करते हुए सैन्य उपकरणों को को लीज़ पर लेने के विकल्प भी खोल दिए गए हैं. इसके पश्चात अब लड़ाकू हेलिकॉप्टर, मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, नौसैनिक जहाज से लेकर युद्धक समान देश-विदेश कहीं से भी अनुबंध पर लेने का रास्ता खुल गया है.

रक्षामंत्री (फाइल फोटो)

सोमवार (29 सितंबर) को रक्षामंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में आयोजित रक्षा खरीद परिषद (डीएसी) की बैठक में डीएपी-2020 को स्वीकृति प्रदान की गई. रक्षामंत्री ने कहा कि नई रक्षा खरीद प्रक्रिया में मेक इन इंडिया के तहत घरेलू रक्षा कंपनियों को ताकत देने की पूरी व्यवस्था की गई है जो प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत के विजन के अनुरूप है. इसका लक्ष्य भारत को रक्षा क्षेत्र में एक वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना है.

रक्षा क्षेत्र की हाल में ही घोषित प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की नई नीति के दृष्टिगत डीएपी-2020 में घरेलू कंपनियों को प्रोत्साहित करने का प्रावधान रखा गया है. मेक-1 और मेक-2 के अंर्तगत डिजाइन और विकास से जुड़ी कंपनियों को भारतीय नियंत्रित कंपनियों के लिए ही आरक्षित रखा गया है. रक्षा खरीद की नई प्रक्रिया एक अक्तूबर से लागू हो गई है. सीमित संसाधनों की चुनौती के बीच देश की रक्षा और सैन्य समान की जरूरतों को देखते हुए अनुबंध के विकल्प को खरीद प्रक्रिया के अहम हिस्से के रूप में शामिल किया गया है. राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों से समझौता किए बिना पूंजीगत खर्च में कमी लाने के मकसद से हथियारों और सैन्य समान को लीज पर लिया जा सकेगा. अभी केवल रूस से नौसैनिक पनडुब्बी लीज पर लिए जाने के अपवाद के अलावा यह विकल्प नहीं था.

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, नये डीएपी के बाद युद्धक हेलिकॉप्टर और सैन्य उपकरण-हथियार, मिलट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, नौसैनिक जहाज आदि किराए पर लिए जा सकेंगे. तात्कालिक या आपात जरूरतों के हिसाब से इनके लिए लीज सौदे का विकल्प होगा, जबकि घरेलू छोटी कंपनियों के हित का ख्याल रखते हुए 100 करोड़ तक की रक्षा जरूरतों की आपूर्ति एमएसएमइ सेक्टर के लिए आरक्षित रखा गया है.

रक्षा मंत्रालय में महानिदेशक रक्षा खरीद अपूर्व चंद्रा ने कहा कि पहली बार डीएपी में लीज का विकल्प इसलिए रखा गया है कि दूरगामी लिहाज से यह कम खर्चीला होगा. इससे कॉन्ट्रैक्ट प्रबंधन का एक नया रास्ता खुलेगा. साथ ही मेंटेनेंस की चुनौती और खर्च में भी कमी आएगी, क्योंकि किराए पर देने वाली कंपनी या देश ही अपने साजो-सामान, उपकरणों व हथियारों के रखरखाव का जिम्मा उठाएगा.

रक्षा खरीद परिषद ने 2290 करोड़ रुपये के सैन्य साजो-सामान की खरीद को भी मंजूरी दी है. रक्षामंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में संपन्न डीएसी की बैठक में सीमा के अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिकों के लिए सिग सौर असाल्ट रायफल भी शामिल हैं. करीब 73000 असाल्ट रायफलों की खरीद पर 780 करोड़ रुपये खर्च होंगे. अर्जुन टैंक के लिए यूनिट रिपेयर व्हीकल की खरीद को भी मंजूदी दी गई है. जबकि 970 करोड़ से खरीद जाने वाले स्मार्ट एंटी एयरफील्ड वेपन सिस्टम से नौसेना और वायुसेना की मारक क्षमता में बढ़ोतरी होगी. स्मार्ट एंटी एयरफील्ड वेपन की खरीद पर करीब 540 करोड़ रुपये खर्च होंगे. इन रक्षा उपकरणों और हथियारों की आपूर्ति देशी और विदेशी दोनों कंपनियों से की जाएगी.

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October 4th 2020, 1:18 pm

स्वयंसेवकों के साथ समाज की सज्जन शक्ति को भी गतिविधियों में जोड़ें – डॉ. मोहन भागवत

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जयपुर (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने रविवार को गतिविधि श्रेणी के प्रांत स्तर के कार्यकर्ताओं से अनौपचारिक संवाद करते हुए परिवार प्रबोधन, गौ सेवा, सामाजिक समरसता, घुमन्तू कार्य, ग्राम विकास तथा पर्यावरण संरक्षण पर बल दिया. उन्होंने कहा कि परिवार प्रबोधन गतिविधि द्वारा परस्पर संवाद बढ़े और परिवार में साप्ताहिक बैठक शुरु हों. प्रत्येक परिवार में सामाजिक समरसता के अन्तर्गत सहज एक दूसरे के यहां आना जाना होना चाहिए. बैठक में ऐसे ही छोटे- छोटे कई विषयों को लेकर प्रत्येक परिवार को जोड़ने पर विचार हुआ.

दो दिवसीय जयपुर प्रवास पर आए सरसंघचालक ने रविवार को दो सत्रों में गतिविधि प्रमुखों से संवाद किया. उन्होंने कोरोना महामारी की कठिन परिस्थितियों में गतिविधियों का काम कैसे चला, इसके अनुभव सुने तथा समाज के वंचित व अभावग्रस्त लोगों के लिए चलाए गए कार्यों की जानकारी ली. उन्होंने कहा कि किसी भी गतिविधि का काम समाज में नया नहीं है, अपनी रुचि-प्रकृति के अनुसार पहले से कुछ लोग कर रहे हैं. ऐसे लोगों, संस्थाओं को साथ लेकर इसमें तीव्रता लाने का व्यवस्थित प्रयत्न हम कर रहे हैं. इस सम्बन्ध में समाज में वातावरण बनाने की आवश्यकता पर उन्होंने बल दिया. गतिविधियों का काम समाजव्यापी है और उसका आचरण बदलने का काम है. इसकी पहल 15 लाख स्वयंसेवकों के परिवारों से होनी चाहिए, जिससे समाज का भाव शीघ्र बदलने लगेगा.

सरसंघचालक ने हर स्वयंसेवक के घर में साप्ताहिक परिवार बैठक प्रारम्भ करने की आवश्यकता जताते हुए कहा कि पिछले 6 माह में संघ से जुड़ने वालों की संख्या हर वर्ग में सर्वत्र बढ़ी है. ऐसे में नए लोगों को गतिविधियों के कार्य में जोड़कर स्वयंसेवक बनाएं. स्वयंसेवक गतिविधियों के माध्यम से भारत का सही व सत्य समाचार पहुंचाकर राष्ट्र विरोधियों का खेल बंद करने में सक्रिय भूमिका निभाएं.

उल्लेखनीय है कि संघ में शाखा कार्य के अलावा सीधे गतिविधियों के रूप में परिवार प्रबोधन, गौ सेवा, सामाजिक समरसता, घुमन्तू, ग्राम विकास तथा पर्यावरण के क्षेत्र में काम होता है. इन गतिविधियों के माध्यम से स्वयंसेवकों द्वारा समाज की सज्जन शक्ति को जोड़कर कार्य किया जा रहा है.

घुमंतू समाज के उत्थान व कोरोना काल में इनके लिए किए गए कार्यों जानकारी दी गई. पदाधिकारियों ने इसे और गति कैसे दी जा सकती, इस सम्बंध में अपनी बात रखी. घुमन्तू जातियों के मध्य भी जयपुर प्रांत सहित राजस्थान में नियमित काम शुरू हुआ है. अपनी-अपनी गतिविधि के माध्यम से रोजगार, शिक्षा, परिवार परामर्श से सम्बन्धित कार्य वर्ष पर्यन्त करने की योजना पर भी विचार हुआ. बैठक में पर्यावरण के सम्बन्ध में जल संरक्षण, पौधारोपण तथा पॉलीथीन मुक्ति हेतु प्रत्येक परिवार संकल्प करे. क्षेत्रीय घुमंतू कार्य प्रमुख ने सरसंघचालक को सेवा पथ स्मारिका भेंट की.

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October 4th 2020, 10:45 am

किस रज से बनते कर्मवीर…. भाग – चार

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धार जिले की नगर धरमपुरी, जो एक बड़ी ही आलौकिक और पौराणिक नगरी है. यह एक ऐसा स्थान है जो महर्षि दधिची की तपोभूमि रही है एवं श्रीराम के वंशज राजारन्तिदेव जी ने इसी स्थान पर यज्ञ किया था. रानी रूपमती का जन्मस्थान भी यह नगर रहा है. यहां अनेक ऐतेहासिक ओर पौराणिक मन्दिर हैं जो शासन-प्रशासन की अनदेखी के चलते क्षरित हो रहे हैं. लेकिन समाजसेवी, स्वयंसेवक डटे ही रहते हैं. प्रतिदिन शाखा विकिर के बाद किसी मंदिर की साफ-सफाई, नर्मदा घाट को स्वच्छ करने का कार्य इत्यादि नित्य रूप से करते थे. धरमपुरी नगर में शीतला माता मंदिर के पास खुदाई में भगवान भोलेनाथ पाए गए, जिनकी पूजा नगरवासी नित्य करते रहे. यह लिंग ऐसे स्थान पर हैं, जहां बारिश के पानी के चलते गाद (मिट्टी) जमा हो जाती थी.

संघ के स्वयंसेवक उसे हर 2-3 माह में साफ करते रहते थे. एक दिन अचानक संघ की शाखा के मुख्य शिक्षक के मन में एक इच्छा जागृत हुई कि क्यों न संघ के स्वयंसेवक की एक टोली प्रतिमाह मंदिरों के संरक्षण के लिए कम से कम 100 रुपये एकत्रित करे और धनराशि का हम धार्मिक मठ-मंदिरों में सदुपयोग करें. मुख्य शिक्षक ओर उनकी टीम द्वारा एक जागीरदार सेवा समिति धरमपुरी के नाम से टीम तैयार की गई. समाज से भी धन सहयोग प्राप्त हुआ. समिति के माध्यम से इतनी धनराशि एकत्रित तो कर ही ली थी कि जहां लिंग खुले में बारिश और कीचड़ में रहते थे, उनके लिए एक मंदिर का निर्माण हो सके.

स्वयंसेवकों ने इंजीनियर को बुलाकर पूरा नक्शा तैयार करवाया, लेकिन जो लागत आ रही थी उतनी धनराशि उनके पास नहीं थी. फिर चिंता हुई अब कैसे काम हो? विचार करने लगे, उन्होंने पुनः इंजीनियर से पूछा – इसमें अगर मजदूरी को छोड़ दें तो ये कार्य हो सकता है या नहीं, तो इंजीनियर ने सहमति दे दी.

फिर क्या था, कहते हैं न “न जाने किस रज से बनते स्वयंसेवक”. जुट गए कार्य में. किसी ने रेत उठाई, किसी ने गिट्टी, किसी ने ईंट, किसी ने मशीन चलाई और अपने मन में प्रबल इच्छा शक्ति को साथ लेकर एक सुंदर मन्दिर का निर्माण कर दिया.

वास्तव में संघ व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला है जहां समाज सोचता है……”न जाने किस रज से बनते कर्मवीर !

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October 3rd 2020, 9:11 pm

संघ कार्य पर समाज का विश्वास निरंतर बढ़ रहा है – डॉ. मोहन भागवत

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जयपुर (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शनिवार को सेवा सदन में जयपुर प्रांत की टोली की बैठक में कोरोना काल में किए गए सेवा कार्यों, शिक्षा, स्वरोजगार व स्वावलम्बन के कार्यों पर चर्चा की. उन्होंने कहा कि जितना बड़ा सेवा कार्य कोरोना की परिस्थिति में हुआ है, उसका अनुवर्तन करते हुए लोगों की समस्याएं सुनकर उनके निराकरण के उपाय की योजना का विचार प्रत्येक जिला स्तर पर और क्रियान्वयन खण्ड स्तर पर हो. जिससे संघ व समाज का एक दिशा में चलने वाला व्यूह बने. उन्होंने कहा कि संघ कार्य पर समाज का विश्वास निरंतर बढ़ रहा है. शिक्षा के क्षेत्र में विशेष कार्य करने की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि विद्यालय संचालकों, शिक्षकों, अभिभावकों एवं दानदाताओं से संवाद करके समाधान निकालना चाहिए.

उन्होंने कहा कि सामाजिक सद्भाव बैठक हों, जिससे समाज में व्याप्त रूढ़ियों और कुरीतियों से मुक्ति मिल सके और देश के सामने जो समस्या है, उनका समाधान सामाजिक स्तर पर निकाला जा सके. युवा कार्यकर्ताओं के विकास, शाखा क्षेत्र के सामाजिक अध्ययन, व्यवसायिक स्वयंसेवकों के नियोजन, क्षेत्र संरचना, श्रमिकों एवं कृषकों की शाखा, मिलन व व्यवसाय के अनुसार उनके एकत्रीकरण एवं मुख्य मार्गों के कार्य के महत्व पर चर्चा की.

जयपुर प्रांत संघचालक डॉ. महेन्द्र सिंह मग्गो ने पत्रकारों को बताया कि कोरोना संकट में लॉकडाउन के दौरान बनी विषम परिस्थितियों में स्वयंसेवकों द्वारा समाज जीवन के विभिन्न संगठनों के साथ मिलकर समाज में किए सेवा कार्यों पर विशेष रूप से चर्चा हुई है. इसके साथ ही स्वरोजगार के लिए दिए जा रहे प्रशिक्षण व स्वावलम्बन के लिए लोगों की मदद के लिए चलाए जा रहे प्रकल्पों के बारे में भी बातचीत हुई है.

उन्होंने बताया कि सेवा कार्यों को लेकर हुई चर्चा में समाज के वंचित व अभावग्रस्त वर्ग के स्वावलम्बन के लिए और क्या प्रयास किए जा सकते हैं, इसके लिए समाज सभी वर्गों को साथ लेकर कार्य करने की योजना पर सभी ने सुझाव दिए हैं. कोरोना के कारण शैक्षिक संस्थान बंद होने से निजी विद्यालयों के शिक्षकों को आर्थिक परिस्थितियों से जूझना पड़ रहा है. ऐसे में उनकी समस्याओं के निदान के लिए जिला स्तर पर समिति बनाकर कार्य करने पर बातचीत हुई है. इस दौरान तीन सत्रों में बैठकें हुई. बैठक में जयपुर प्रांत के शासकीय 12 जिलों में संघ रचना के 24 जिलों से आए संगठन श्रेणी के शारीरिक, बौद्धिक, व्यवस्था प्रमुख तथा जागरण श्रेणी के सेवा, सम्पर्क व प्रचार कार्य विभाग के प्रांत स्तर के कार्यकर्ताओं से संगठनात्मक विषयों पर चर्चा की. निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सरसंघचालक ने वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से अनौपचारिक संवाद किया. इसके साथ ही उत्तर- पश्चिम (राजस्थान) क्षेत्र कार्यकारिणी के पदाधिकारी भी उपस्थित रहे.

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October 3rd 2020, 6:41 pm

छत्तीसगढ़ के बस्तर से झारखंड तक धर्मांतरण के खिलाफ मुखर हो रहा जनजाति समाज

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नई दिल्ली. छत्तीसगढ़ के बस्तर से झारखंड तक जनजाति समाज मिशनरी व धर्मांतरण के खिलाफ मुख हो रहा है. जनजाति समाज द्वारा विरोध प्रदर्शन किये जा रहे हैं. समाज के प्रतिनिधि प्रशासन से मिशनरियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं.

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में कोंडागांव जिले में पिछले एक सप्ताह से स्थानीय जनजाति समाज क्षेत्र में चल रहे धर्मांतरण के खिलाफ प्रदर्शन कर रहा है. जगह-जगह चल रही धर्मांतरण गतिविधियों के कारण जनजातीय संस्कृति को नुकसान हो रहा है.

बस्तर संभाग में अलग-अलग जिलों में अब जनजातीय समाज की बैठकों का क्रम शुरू हो गया है. समाज के प्रमुख लोगों का कहना है कि आने वाले समय में जनजाति संस्कृति से खिलवाड़ कर रहे लोगों के विरुद्ध प्रदेश स्तर पर आंदोलन किया जाएगा. छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज ने भी एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि बस्तर संभाग में जनजाति समुदाय की बहुलता है, कुछ वर्षों से जनजाति संस्कृति, रूढ़ि प्रथा, परंपराओं तथा धार्मिक मान्यताओं को बाहरी शक्तियों द्वारा नष्ट करने का षड्यंत्र किया जा रहा. छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज द्वारा समाज को सचेत रहने का संदेश दिया गया है. छत्तीसगढ़ के ही सरगुजा जिले में भी जनजाति समाज ने ईसाई मिशनरियों और चर्च पर जनजाति संस्कृति को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया है. सरगुजा में भी चर्च से जुड़े पादरियों पर एफआईआर दर्ज करने की मांग जनजाति समाज के प्रमुखों द्वारा की जा रही है.

छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्य झारखंड में भी धर्मांतरण का मुद्दा काफी गर्म हो चुका है. झारखंड के ओरमांझी क्षेत्र में हाल ही में 10 परिवारों द्वारा धर्मांतरण किए जाने के बाद पूरे क्षेत्र में जनजाति समाज आक्रोशित है.

जनजाति संगठनों के नेता व अन्य लोग गांव का दौरा कर रहे हैं. प्रशासन द्वारा भी गांव में कड़ी निगरानी रखी जा रही है, साथ ही धर्मांतरण के मामले की जांच भी की जा रही है. इसके अलावा यह भी देखा जा रहा है कि क्षेत्र में अब और कोई धर्मांतरण का मामला सामने ना आए.

पूर्व सांसद रामटहल चौधरी ने कहा कि प्रलोभन देकर धर्मांतरण करवाकर समाज का माहौल बिगाड़ने का प्रयास किया जा रहा है. दोषियों पर कानूनी कार्रवाई करने की मांग की.

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October 3rd 2020, 11:54 am

स्वयंसेवकों के प्रयास से मिली को हजारों बच्चों शिक्षा, 1974 स्थानों पर चल रहे बाल गोकुलम केंद्र

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भोपाल (विसंकें). कोरोना के संकट काल में बच्चों की शिक्षा प्रभावित न हो, साधनों के अभाव में कोई भी बालक शिक्षा सं वंचित रहे, इसे ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने प्रदेश में प्रयास शुरू किये. स्वयंसेवक मध्यभारत प्रांत के लगभग सभी जिलों में बाल गोकुलम केंद्रों का संचालन कर रहे हैं, इन केंद्रों के माध्यम से बच्चों को उनके घर, गली-मोहल्ले में शिक्षा देने का कार्य किया जा रहा है. 22 अगस्त तक प्रांत के 31 जिलों के 516 स्थानों पर बाल गोकुलम शुरू किए गए थे तो वहीं सितंबर माह के अंत तक प्रान्त के 31 जिलों में 1974 स्थानों पर लगभग 20 हजार विद्यार्थियों के लिये स्वयंसेवक सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर बाल गोकुलम केंद्र चला रहे हैं.

जिस प्रकार से कोरोना ने देश दुनिया सहित देश में गंभीर रूप धारण किया, उसके चलते सभी स्कूलों को पूरी तरीके से बंद कर दिया गया. इस वजह से स्कूल विद्यार्थियों को शिक्षकों द्वारा प्रत्यक्ष शिक्षा देना संभव नहीं हो पा रहा. जिसे देखते हुए भोपाल प्रवास के दौरान एक बैठक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के  सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने स्वयंसेवकों, अनुषांगिक और समाज के सामाजिक संगठनों से आग्रह किया था कि सभी अपने-अपने स्तर पर विद्यार्थियों को उनके घरों पर जाकर शिक्षा देने का कार्य करें. जिससे संकट के समय बच्चों की शिक्षा सुचारू रूप जारी रहे.

मध्यभारत प्रांत में सरसंघचालक के प्रवास के पश्चात योजना कर अगस्त माह में ही सभी अनुषांगिक संगठनों और समाज के सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर बाल गोकुलम केंद्र का संचालन शुरू कर दिया. प्राप्त आंकड़ों के अनुसार अब तक लगभग 10227 बालकों और 9884 बालिकाओं सहित कुल 19 हजार 709 बच्चों को केंद्रों के माध्यम से शिक्षा का लाभ मिल पा रहा है.

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October 3rd 2020, 9:25 am

किस रज से बनते कर्मवीर… भाग – तीन

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लॉकडाउन में दिन भर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं से मिलकर बस्ती के अभावग्रस्त लोगों की सूची बनाना, सेवा भारती कार्यकर्ताओं की कठिनाइयों का निराकरण करना तथा अभावग्रस्त समाज बंधुओं से मिलकर उनको राशन बांटना लगभग यही दिनचर्या 15-20 दिनों से चल रही थी.

चूंकि उज्जैन में कोरोना के मरीज लगातार बढ़ रहे थे, इसलिए परिवार के सभी लोगों तथा मित्र मंडली का मुझ पर लगातार घर से ज्यादा बाहर नहीं निकलने के लिए तथा स्वयं को कोरोना से सुरक्षित रहने की लिए दबाव बनाना भी स्वाभाविक ही था. पर, सत्य तो यह है कि मुझे समाज के बन्धु बांधवों की सेवा करते अपार सुख की अनुभूति हो रही थी, बस यही कारण था कोरोना का भय मेरे को सेवा कार्य से रोक न सका…

एक दिन किसी अज्ञात व्यक्ति का फोन आया. उसने कहा मैं विनोद बोल रहा हूँ , “आप सेवा भारती के कार्यकर्ता हैं?” मैने सहजता से उत्तर दिया, “हाँ जी, मैं सेवा भारती का कार्यकर्ता हूँ बोलिये”.

वो बड़े नम्र स्वर में बोला, मैं मध्यप्रदेश पुलिस में पदस्थ और आप की तरह ही दिन रात समाज हित में ड्यूटी कर रहा हूँ. तीन दिन हो गए घर नहीं जा पाया. पुलिस लाइन में क्वार्टर पर पत्नी और बच्चे हैं. कल पत्नी का कई बार फोन आ चुका है कि राशन का सामान नहीं है.. कुछ करो, आ जाओ, तुम्हीं को देश की पड़ी है… तुम्हारे साथ के सभी लोग तो ऐसे ड्यूटी नहीं कर रहे जैसे तुम…. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या करूं ? मैंने फेसबुक पर वायरल सेवा भारती की हेल्पलाइन सेवा से आपका नंबर निकाल कर आपको फोन लगाया है, मुझे भरोसा है कि आप मेरी मदद जरूर करोगे …”

मुझ पर तो मानो समाज सेवा का भूत सवार ही था. मैंने कहा, आप पुलिस लाइन के क्वार्टर का नंबर भेज दो. उसने बड़े आशा भरे स्वर में कहा – जी, मैं भेजता हूँ. मैने राशन के पैकेट गाड़ी में रखे और चल पड़ा पुलिस लाइन की ओर…. मुझे और भी घरों में राशन देने जाना था तो उस रास्ते में जहां-जहां राशन देना था, उनका क्रम जमाने में लगा था. इतने में साथी बोला – भाई साहब, पुलिस लाइन आ गयी.

मैंने उसके फ्लैट के बाहर पहुँचकर दरवाजा खटखटाया. विनोद जी की पत्नी के दरवाजा खोलते ही मैंने कहा – मैं सेवा भारती का कार्यकर्ता हूँ. आपके घर पर राशन देने आया हूँ”. ऐसा कहकर मैने पैकेट दरवाजे के पास रख दिया. बहन जी ने बड़े आश्चर्य से कहा, “वो कह तो रहे थे, सेवा भारती के कार्यकर्ता हैं. राशन देने जरूर आएंगे. पर, आप इतनी जल्दी आ जाएंगे इस पर विश्वास ही नहीं हो रहा”.

मैने कहा ” विनोद जी देश और समाज हित में दिन – रात ड्यूटी कर रहे हैं तो क्या मैं उनके परिवार के लिए इतना भी नहीं कर सकता. कुछ और राशन की आवश्यकता हो तो बता देना, ऐसा कहकर मैं अपने घर की ओर निकल पड़ा….

रास्ते में विनोद जी का फोन आया कि वो पत्नी समान के रुपये देना भूल गयी. आप मुझे बता दीजिए कितने हुए मैं भिजवा दूंगा. मैने कहा कि ये सेवा भारती की योजना है, हम पैसे नहीं लेते. ये समाज भी तो मेरा परिवार है. हाथ मेहनत करके पेट भरते हैं तो पेट पर कोई अहसान थोड़े ही करते हैं. ये हाथ का कर्तव्य है और पेट भरने से ही तो हाथ में ताकत आती है, सारा शरीर मजबूत बनता है, ऐसे ही सभी के प्रयास से ये देश कोरोना को हराएगा.

“भाई साहब, आप अपनी ड्यूटी कीजिये और जब तक मुझमें सामर्थ्य है, मैं अपनी ड्यूटी करता रहूँगा.” ऐसा कहकर फोन काटते हुए सेवा भारती के कार्यकर्ता पुनः समाज सेवा की धुन में रमते निकल चले. फिर किसी परिवार की चिंता हरने…..फिर किसी परिवार के चहरे पर मुस्कान बिखेरने….उज्जैन की यह घटना आपको बताते समय मन में यही भाव पल्लवित हो रहे कि…..किस रज से बनते हैं ऐसे कर्मवीर….!

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October 3rd 2020, 8:25 am

कनेक्टिविटी का देश की सुरक्षा में अहम योगदान – नरेंद्र मोदी

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केस स्टडी के लिए देश सहित विदेशों के शिक्षण संस्थानों को आमंत्रित किया जाए

निर्माण कार्य के दौरान आए अनुभवों को एक डाक्युमेंट में लिया जाए

रक्षा मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय और बीआरओ को दिया सुझाव

रोहतांग (विसंकें). प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि देश की सीमाओं पर कनेक्टिविटी का होना बेहद आवश्यक होता है. यह अटल टनल बॉर्डर पर कनेक्टिविटी का विश्वस्तरीय उदाहरण है जो भारतीय सीमा के आधारभूत ढांचे को मजबूत करेगी. इस टनल का काम अपने आप में इंजीनियरिंग की दृष्टि से, वर्क कल्चर की दृष्टि से अद्वितीय है. अटल टनल भारत के बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर को भी नई ताकत देने वाली है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामरिक व नागरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण 10 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर बनी अटल टनल रोहतांग के उद्घाटन अवसर पर संबोधित कर रहे थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को अटल टनल को देश को समर्पित किया. इस अवसर पर प्रधानमंत्री साउथ पोर्टल से नॉर्थ पोर्टल के लिए रवाना हुए. नरेंद्र मोदी ने आपातकालीन टनल का जायजा लिया. लाहुल-स्पिति में लाहुल के 14 बुजुर्गों को लेकर टनल से गुजरने वाली बस को हरी झंडी दिखाई.

उन्होंने रक्षा मंत्रालय, बीआरओ और शिक्षा मंत्रालय को सुझाव दिया कि अटल टनल की निर्माण प्रक्रिया को शिक्षा का हिस्सा बनाएं. पिछले इतने वर्षों में जबसे काम शुरू हुआ, डिजाइनिंग का काम शुरू हुआ, कागज पर लिखना शुरू हुआ, तब से लेकर 1500 लोग छांटें, मजदूर भी हो सकता है,टॉप व्यक्ति भी हो सकता है. उसने जो काम किया है, उसका अपना अनुभव, अपनी भाषा में लिखे. एक 1500 लोग पूरे प्रोसेस को अगर लिखेंगे, कब क्या हुआ, कैसे हुआ. तो एक ऐसा डाक्युमेंटेशन होगा, जिसमें ह्यूमन टच होगा. कभी कठिनाईयां आई होंगी, तो क्या लगा, कैसे काम किया. इजीनियरिंग चैलेंज का कैसे सामना किया. इसमें ऐसे अनुभव हों, जिसमें यहां की दुर्गम परिस्थितियों में काम को किस प्रकार किया गया, ऐसे मानवीय अनुभवों का समावेश हो.

शिक्षा मंत्रालय से आग्रह किया कि हमारे देश की तकनीक और इंजीनियरिंग से जुड़े विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को अटल टनल की केस स्टडी का काम दिया जाए. ताकि विश्व की सबसे लंबी और उंचाई पर स्थित टनल की बेहतरीन इंजीनियरिंग का ज्ञान प्रत्येक छात्र को हो. इसके साथ ही एम.ई.ए. के लोग विश्वस्तर पर भी विश्वविद्यालयों को आमंत्रित करें. ताकि यहां आकर विदेशी छात्र भी इस पर केस स्टडी करें. दुनिया के अंदर हमारी इस ताकत का परिचय होना चाहिए, कि सीमित संसाधनों के बाद भी कैसे अद्भुत काम वर्तमान पीढ़ी के हमारे जवान कर सकते हैं, इसका ज्ञान विश्व को होना चाहिए. इससे भारतीय सामर्थ्य को विश्व के लोग जान पाएंगे. बीआरओ, एमईए और शिक्षा मंत्रालय, सब मिलकर ये टनल का काम शिक्षा का हिस्सा बन जाए. इससे नयी पीढ़ी को तैयार करने में सहायता होगी. ये टनल एक इंफ्रास्ट्रक्चर बनेगी, लेकिन येटनल उत्तम इंजीनियर तेयार करने का भी काम करे, इस दिशा में भी हम प्रयास करें.

उद्घाटन अवसर पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि हिमालय क्षेत्र में चाहे वह हिमाचल हो, जम्मू-कश्मीर हो, कारगिल लेह-लद्दाख हो, उत्तराखंड हो, सिक्किम हो, अरूणाचल प्रदेश हो, दर्जनों प्रोजेक्ट पूरे किये जा चुके हैं. अनेकों प्रोजेक्टों पर तेजी से काम चल रहा है. सड़क बनाने का काम हो, पुल बनाने का काम हो, सुरंग बनाने का काम हो इतने बड़े स्तर पर देश में इन क्षेत्रों में पहले कभी नहीं हुआ. इसका बहुत बड़ा लाभ सामान्य लोगों के साथ ही हमारे सैनिकों को भी होगा. सर्दी के मौसम में उन तक रसद पहुंचाना हो, उनकी रक्षा से जुड़े साजो-सामान हो और वे आसानी से पैट्रोलिंग कर सकें, इसके लिए सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है. देश की रक्षा जरूरतों का ध्यान रखना, उनके हितों का ध्यान रखना हमारी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है. भारत की वैश्विक बदलती भूमिका के कारण तेजी के साथ आर्थिक और सामरिक आधारभूत ढांचे को बढ़ाना है. भारत में रक्षा के क्षेत्र में विदेशी निवेश और विदेशी तकनीक आ सके, इसके लिए अब भारतीय संस्थानों को अनेक प्रकार के प्रोत्साहन दिये जा रहे हैं. सीमा पर आधारभूत ढांचे को मजबूत किये जाने की मांग बहुत पहले से की जा रही थी. परन्तु इच्छाशक्ति के अभाव के कारण यह संभव नहीं हो पाया. लद्दाख के दोलत बेग ओल्डी एयर स्ट्रिप को 40 साल बंद रखा गया. असम में पुल का काम अटल जी के समय शुरू हुआ. कोसी महासेतू के काम पर भी ध्यान नहीं दिया गया. बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए पूरी ताकत लगा दी गई है.

लंबे समय तक बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े प्रोजेक्ट या तो प्लानिंग के स्टेज से बाहर नहीं निकल पाए, या जो निकले वे लटक गए, अटक गए, भटक गए, अटल टनल के साथ भी ऐसा होता अनुभव हुआ.

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October 3rd 2020, 8:25 am

अविस्मरणीय अतिथि सत्कार

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इंदौर (विसंकें). कोरोना महामारी गरीब-मजदूर वर्ग पर कहर बनकर टूटी. लॉकडाउन के दौरान जब देश में आवागमन के साधन बंद हो गए और मजदूर वर्ग की बचत और संसाधन खत्म हो चले, तब विवशता में उन्हें अपने-अपने प्रदेशों की ओर प्रवास करना पड़ा. इस प्रवास में जिसके हाथ जो साधन लगा उसके सहारे लाखों लोग सड़कों पर चल पड़े. कोई लोडिंग वाहन से, कोई ऑटो से, कोई दो पहिया से, कोई साइकिल से और अधिकांश पैदल ही बच्चों और सामान सहित सड़कों पर थे. इस त्रासदी का सबसे दुःखद पहलू यह था कि जिन व्यावसायिक प्रदेशों में यह मजदूर वर्ग अपनी सेवाएं दे रहा था, वहां के निवासियों ने महामारी के प्रकोप से डरकर इन गरीबों से एकदम ही मुंह मोड़ लिया था. इतना रूखापन धारण कर लिया कि मजदूर परिवारों को भोजन-दवा मिलना तो दूर कहीं पेयजल तक भी नहीं मिल पा रहा था. शिशुओं को दूध मिलना तो असंभव जैसा प्रतीत होता था. रुपया खर्च करने पर भी राहत नहीं मिल रही थी तो गरीब-लाचार की तो कौन कहे?

उस भयावह दौर में जब महाराष्ट्र सहित विभिन्न स्थानों से मजदूरों का रेला मध्यप्रदेश से होकर गुजरा तो उन गरीब परिवारों ने अंतर महसूस किया, उसे बताने में उनका गला रुंध जाता है. यूपी-बिहार की तरफ यात्रा कर रहे परिवारों को मध्यप्रदेश में और विशेषकर इंदौर में राहत मिली. इंदौर नगर के बायपास से गुजर रहे लाखों लोगों के लिए इंदौर में मिला अतिथि सत्कार सारी उम्र नहीं भूलने वाला एक विशेष अनुभव बन गया.

इंदौर के नागरिकों ने अपने मजदूर भाई-बहनों और उनके परिवारों पर प्यार-दुलार लुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. भूखों को भोजन, प्यासों को पेयजल व शरबत, बीमारों को दवा और इलाज, नंगे पैरों के लिए जूते चप्पल, सुस्ताने के लिए टेंट, शिशुओं के लिए दूध – सब कुछ अपनेपन के भाव के साथ उपलब्ध कराया गया. यह मजदूर महाराष्ट्र आदि राज्यों में कार्यरत थे और यूपी-बिहार को लौट रहे थे, ऐसे में कोई सीधा संबंध नहीं होते हुए भी मध्यप्रदेश की भूमि पर मिले प्यार और सेवा से ऐसा बंधन अनुभव किया जो इन्हें सारी उम्र इस राज्य की मिट्टी से जोड़े रखेगा. उस प्रवास के दौरान सहे हुए कष्ट और मध्यप्रदेश वासियों द्वारा पहुंचाई राहत दोनों ही भूलने के विषय नहीं हैं.

अब अनलॉक के दौर में जब कामकाज धीरे-धीरे पटरी पर आने लगा है और मजदूर भाई अपने गृह प्रदेशों से व्यावसायिक राज्यों की ओर पुनः निकल पड़े हैं, तो मध्यप्रदेश और विशेषकर इंदौर से गुजरते हुए उनकी भावनाएं कृतज्ञता ज्ञापित करने को उमड़ पड़ती हैं. इंदौर बायपास पर लोग अपने वाहनों से उतरकर इस प्रदेश की मिट्टी को प्रणाम कर रहे हैं और अपनी स्मृतियों को ताजा कर रहे हैं.

ऐसी ही एक घटना – यूपी के गोरखपुर जिले के पिपराइच निवासी सुभाषचंद्र पांडे परिवार सहित अपने निजी ऑटो रिक्शा से जब मुंबई लौट रहे थे तो इंदौर बायपास पर रुके, सड़क किनारे बैठकर भोजन के पूर्व उनकी धर्मपत्नी ने भोजन का पहला कौर इंदौर की भूमि को अर्पित कर प्रणाम किया और ईश्वर से प्रार्थना की कि इस नगर के नागरिकों को कभी भूख-प्यास नहीं सहनी पड़े क्योंकि जब हम भूखे-प्यासे थे तो इन्होंने ही हमें राहत पहुंचाई थी.

ऐसे ही प्रयागराज जिले के एक ग्राम के निवासी अंजनी कुमार तिवारी ने याद किया कि मुंबई से निकलने पर महाराष्ट्र पार करते-करते ही खाद्य सामग्री खत्म हो गई थी. मध्यप्रदेश में हमने भूखे प्रवेश किया. पर, यहां से भूखे नहीं आगे बढ़े. भरपेट भोजन तो मिला ही रास्ते के लिए भी भोजन बांध कर दिया गया. उन्हें सोनू सूद से कोई मदद नहीं मिल पाई थी. पर, इंदौर नगर में मिली सहायता को उन्होंने कहीं बढ़कर पाया.

ऐसे अनेक मजदूर भाई-बहन हैं, जिनका यह स्पष्ट मानना है कि मदद नहीं मिल पाने की स्थिति में वे लोग जीवित भी रह पाते या नहीं – यह कहा नहीं जा सकता. अपनी कृतज्ञता को अपने-अपने तरीकों से व्यक्त करते हुए लोग अपने कार्यस्थलों की तरफ जा रहे हैं और जीवन का चक्र फिर से गति पकड़ने लगा है.

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October 3rd 2020, 8:25 am

आत्मनिर्भरता – 800 किमी की दूरी तक मारक क्षमता वाली शौर्य मिसाइल का सफल परीक्षण

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नई दिल्ली. पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ जारी गतिरोध के बीच भारत अपनी रक्षा ताकत को मजबूत करने में लगा है. शनिवार को शौर्य मिसाइल के नए संस्करण का सफल परीक्षण किया गया. परमाणु शक्ति संपन्न मिसाइल 800 किमी दूर तक दुश्मन को ढेर करेगी. सीमा पर तनाव के बीच भारत अपनी रक्षा ताकत को मजबूत कर रहा है. इसी के तहत विगत कई दिनों से विभिन्न प्रकार के तथा नए नए किस्म के मिसाइलों का सफलतापूर्वक परीक्षण चल रहा है.

शनिवार की सुबह करीबन 12:10 पर अब्दुल कलाम द्वीप से एलसी4 से भारत ने शौर्य नामक मिसाइल का सफलतापूर्वक परीक्षण किया. यह नई मिसाइल हल्की है और आसानी से ऑपरेट की जा सकती है.

यह मिसाइल 800 किलोमीटर दूर तक किसी भी लक्ष्य को मार गिराने में पूरी तरह सक्षम है. जमीन से जमीन पर मार करने वाली यह मिसाइल काफी ताकतवर मानी जा रही है. यह मिसाइल पनडुब्बी से लांच किए जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइल का जमीनी रूप है. टू स्टेज राकेट वाली यह मिसाइल 40 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचने से पहले आवाज की 6 गुना रफ्तार से चलती है. उसके बाद यह टारगेट की ओर लगातार बढ़ती चली जाती है. यह मिसाइल सॉलि़ड फ्यूल से चलती है, लेकिन क्रूज मिसाइल की तरह खुद को टारगेट तक गाइड कर सकती है. मिसाइल की रफ्तार इतनी तेज है कि सीमा पर बैठे दुश्मन के रडार को इसे डिटेक्ट, ट्रैक करने और इंटरसेप्ट करने के लिए 400 सेकेंड से भी कम का वक्त मिलेगा. मिसाइल को कंपोजिट कैनस्टर में स्टोर किया जा सकता है यानि आसानी से छिपाकर ले जाया जा सकता है.

इसके परीक्षण के अवसर पर रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) तथा अंतरिम परीक्षण परिषद आइटीआर से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों और वैज्ञानिकों का दल उपस्थित था. रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन रणनीतिक मिसाइलों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को पूरा करने की दिशा में काम कर रहा है और इस वर्ष के शुरू में रक्षा क्षेत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आत्मानिर्भर भारत के आह्वान के बाद अपने प्रयासों को बढ़ाया है.

पिछले कुछ समय में भारत ने रक्षा क्षेत्र में कई अहम फैसले किए हैं. एमबीटी अर्जुन टैंक से लेजर गाइडेड एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल एजीटीएम का टेस्ट किया गया था. यह टेस्ट पूरी तरह सफल रहा था. इससे पहले अभ्यास हाईस्पीड एक्सपेंडेबल एरियल टारगेट का बालासोर से सफलतापूर्वक टेस्ट किया जा चुका है.

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October 3rd 2020, 7:19 am
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