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सेवा परमो धर्मः – दिव्यांग राज़ू ने 100 से अधिक परिवारों को एक माह का राशन बांटा

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जालंधर. रविवार को प्रसारित मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के विभिन्न हिस्सों के कुछ उदाहरणों का जिक्र कर भारत में समाज के सेवा भाव को बताया. उन्होंने कहा कि सेवा और त्याग भारत की जीवन पद्धति है.

सेवा में सब कुछ समर्पित कर देने वाले लोगों की संख्या अनगिनत है. पंजाब के पठानकोट निवासी दिव्यांग राजू (45 वर्षीय) भी सेवा और त्याग का भी उनमें से एक अनुकरणीय उदाहरण है. संकट काल में राजू के सेवा भाव ने सभी का दिल जीता है. दिव्यांग राजू लॉकडाउन की अवधि में अभी तक 100 से अधिक परिवारों को एक माह का राशन बांट चुका है, साथ ही कोरोना संक्रमण से बचाव के लिये 2500 मास्क वितरित कर चुका है.

राजू बचपन से ही चलने-फिरने में असमर्थ है और मांगकर अपना निर्वाह करता है. रोजाना 500 से 700 रुपए एकत्रित होते हैं. खाने और खर्च के बाद कमाई का बाकी हिस्सा लोगों की सेवा पर खर्च करता है. रोजाना एकत्रित राशि में से कुछ राशि बचाकर एकत्रित करता है तथा उससे जरूरमंदों की सहायता करता है. लोगों को भी पता है कि उनका पैसा भलाई के काम में लगना है तो लोग राजू को खुले दिल से पैसे भी देते हैं. राजू दिव्यांग ही नहीं स्वस्थ व्यक्ति के लिए भी प्रेरणा स्रोत है. राजू सेवा कार्य में अभी तक 80 हजार रुपये से अधिक की राशि खर्च कर चुके हैं. कोरोना संकट काल के दौरान राजू गरीब परिवारों की मदद में जुट गया. शहर के गरीब परिवारों के बारे में जानकारी हासिल की और उन्हें एक माह राशन उपलब्ध करवाया.

राजू का कहना है कि लोग उसे बहुत पैसा देते हैं, वह पैसे जोड़ता है और मौका मिलते ही जरूरतमंदों पर खर्च कर देता हूं. जीते जी उसके अपनों ने उसे दूर रखा, कुछ नेकी कर लूंगा तो शायद आखिरी समय में लोगों के कंधे मिल सकें.

यह पहली बार नहीं…..

राजू पिछले 20 साल में 22 गरीब कन्याओं की शादी करवा चुका है. गर्मियों में छबील, भंडारा करवाता है. शहर में ढांगू रोड पर एक गली की पुली पर रोजाना हो रहे हादसों से तंग आकर राजू ने अपने पैसों से पुली का निर्माण करवाया.

हर साल 15 अगस्त को महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सिलाई मशीनें उपलब्ध कराता है. सर्दियों में कंबल बांटना, कुछ बच्चों की फीस का खर्च उठाता है. कॉपी-किताब के लिए मदद करता है. राजू का कहना है कि यह सब मेरे अपने हैं. इनकी मदद कर मन को शांति मिलती है. यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में दिव्यांग राजू के कार्य की सराहना की.

June 1st 2020, 2:07 pm

सेवा परमो धर्मः – ठेला चलाकर जीवन यापन करने वाले गौतम दास ने 160 परिवारों को बांटा राशन

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प्रधानमंत्री ने मन की बात कार्यक्रम में गौतम दास के कार्य की सराहना की

नई दिल्ली. सेवा और त्याग का हमारा विचार केवल हमारा आदर्श नहीं है, बल्कि भारत की जीवन पद्धति है. सेवा स्वयं में सुख है, सेवा में ही संतोष है. यही कारण है कि वर्तमान संकटकाल में देश का हर व्यक्ति अपनी तरह से जरूरतमंदों की सेवा में जुटा है. दिहाड़ीदार गौतम दास जैसे लोग हमारी इसी जीवन पद्धति का उदाहरण हैं.

अगरतला के गौतम दास ठेला चलाकर अपना जीवन यापन करते हैं. लॉकडाउन से पूर्व तक प्रतिदिन 200 रुपये कमाते थे. अपने समाजजनों की चिंता ने उन्हें देशवासियों का चहेता बना दिया. गौतम दास ने वर्तमान संकट के दौरान अपनी जमा पूंजी में से जरूरतमंदों की सहायता की. प्रधानमंत्री ने अपने मन की बात कार्यक्रम में गौतम दास के कार्य की सराहना की. वहीं त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देव ने गौतम दास से मिलकर उन्हें सम्मानित किया.

अगरतला के रहने वाले  51 वर्षीय गौतम ठेले से सामान ढोने का कार्य करते हैं. उन्होंने प्रतिदिन 200 रुपये की अपनी कमाई में बचत कर 10,000 रुपये की राशि जमा की थी. देश में लॉकडाउन घोषित होने के पश्चात गौतम दास भी अन्य दिहाड़ीदारों के समान ही अपने भविष्य के लिए और आजीविका को लेकर चिंतित थे. लेकिन उससे भी अधिक उन्हें चिंता थी, अपने से गरीब अन्य लोगों की. गौतम दास ने आराम से घर बैठने या स्थिति पर चिंतित होने के स्थान पर शहर में अन्य जरूरतमंदों की अपने स्तर सहायता करने का निर्णय लिया. और अपनी जमा पूंजी से जरूरतमंदों की सेवा के लिये निकल पड़े.

उन्होंने अपनी जमा की गई राशि से दालें व चावल खरीदे. और उनके पैकेट (राशन किट) बनाकर अपने ठेले पर लेकर शहर में गरीबों की सहायता के लिए निकल पड़े, गरीब परिवारों को निःशुक राशन उपलब्ध करवाया. गौतम दास अभी तक 160 परिवारों को राशन के पैकेट बांट चुके हैं, उन्होंने अभी तक आठ हजार रुपये से अधिक की राशि खर्च कर दी है तथा 160 परिवारों को भूख व परेशानी से बचाया.

समाज के वंचित वर्ग से संबंधित होने के बावजूद गौतम दास लॉकडाउन में अपनी आजीविका को लेकर चिंता में नहीं बैठे रहे, बल्कि उन्होंने अपनी तरह अन्य दिहाड़ीदारों, व गरीब परिवारों की चिंता की.

June 1st 2020, 1:22 pm

दलितों का कब्रिस्तान बनता जा रहा मेवात – जस्टिस पवन कुमार

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गुरुग्राम. हरियाणा के मेवात में दलितों पर हो रहे अत्याचारों की जांच करने के बाद जांच दल के अध्यक्ष पवन कुमार ने गुरुग्राम में पत्रकार वार्ता में कहा कि मेवात दलितों का कब्रिस्तान बनता जा रहा है. पाकिस्तान और मेवात में कोई अंतर नहीं रह गया है. महिलाओं को जबरन अगवा करके बलात्कार किया जा रहा है, ऐसी कई खबरें सब तरफ से आ रही थी.

लंबे समय से इन शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं होने के कारण दलितों को यह लग रहा है कि अब उन्हें अपनी इज्जत, अपना धर्म और अपनी धरती बचाने के लिए खुद संघर्ष करना पड़ेगा. इसीलिए श्री वाल्मीकि महासभा हरियाणा ने यह निर्णय लिया कि 4 सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन करके वहां की हकीकत को तथ्यों के साथ सरकार व समाज के सामने लाया जाए.

पवन कुमार (पूर्व न्यायाधीश) को इस जांच समिति का अध्यक्ष बनाया गया तथा सुल्तान बाल्मीकि (अध्यक्ष वाल्मीकि महापंचायत हरियाणा), कन्हैया लाल आर्य (उपाध्यक्ष आर्य प्रतिनिधि सभा हरियाणा) एवं देवदत्त शर्मा अध्यक्ष बार एसोसिएशन सोहना को इस जांच दल का सदस्य नियुक्त किया गया.

दलित समाज के 48 पीड़ितों को बुलाया गया था, परंतु इन जिहादियों की दहशत इतनी थी कि केवल 19 लोग ही अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों की जानकारी देने के लिए नूह में आए. उनकी शिकायतें रोंगटे खड़े कर देने वाली और दिल दहला देने वाली थीं.

विद्यालय जाने वाली बच्चियों और महिलाओं के साथ छेड़खानी करने वाली घटनाएं पूरे मेवात में होती हैं, जिनके कारण उनका विद्यालय में पढ़ने जाना भी दूभर हो गया है. एक 12 साल की लड़की का तो 4 मुसलमानों ने बलात्कार किया और जिस मकान में बलात्कार हुआ वह मुस्लिम पुलिस वाले का ही था. एक साल के बाद भी आज तक उस पुलिस वाले पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है. फिरोजपुर नमक में तो एक महिला को बंदी बनाकर 9 मुसलमानों ने कई दिन तक बलात्कार किया. उसकी शिकायत पर कोई कार्यवाही ना होने के कारण आरोपियों ने चार दिन बाद उसकी जघन्य हत्या कर दी.

न्यायाधीश पवन कुमार ने कहा कि जबरन धर्मांतरण के पचासियों उदाहरण सामने आए, परंतु किसी भी मामले में कोई कार्रवाई ना होने के कारण धर्मान्तरित व्यक्तियों के परिवारों पर भी धर्मांतरण का दबाव बनाया जा रहा है.

कई जगह उनके शमशान घाटों पर भी कब्जा किया जा रहा है. दलितों को पकड़कर उनके साथ मारपीट करना, उधारी का पैसा मांगने पर उन पर हमला करना आम घटना हो गई हैं. बिछोर गांव में तो रामजीलाल को पहले पेट से काटा गया और फिर उसे जिंदा जला दिया गया. नामजद रिपोर्ट होने पर भी उसकी आसमानी बिजली गिरने से मृत्यु हुई है, यह कहकर मामले को रफा-दफा कर दिया गया. उसका परिवार इतनी दहशत में है कि उन्होंने गाँव से पलायन कर लिया है.

दलितों के परिवारों में शादी होने पर कई बार उन पर हमला करके सामान लूट लिया जाता है और वधु को जबरन अगवा करने का प्रयास किया जाता है. जांच समिति का यह निष्कर्ष है कि दलितों पर अत्याचार प्रशासन और पुलिस की शह पर ही हो सकते हैं.

पहले तो दलितों की शिकायतें ही दर्ज नहीं होती थीं. दर्ज हो भी जाएं, तो कार्यवाही नहीं होती और पुलिस वाले समझौता करने के लिए धमकाते हैं और पीड़ित पर ही झूठा केस दर्ज कराने की धमकी देते हैं.

दुर्भाग्य है कि देश में कहीं भी दलितों का नाखून उखड़ने पर भी आसमान उठा लेने वाले छद्म सेक्युलरवादी मुसलमानों द्वारा दलितों पर इतने अमानवीय अत्याचारों पर चुप क्यों रहते हैं? राजनीतिक स्वार्थों के कारण दलित मुस्लिम एकता का छलावा रचने वाले दलित संगठन अभी तक इन दलितों के आंसू पौछने क्यों नहीं आ सके? इन अत्याचारों की बार-बार शिकायतें करने पर भी क्यों किसी भी दल के राजनीतिज्ञ इनकी सहायता के लिए नहीं पहुंचते हैं? इन प्रश्नों के साथ जीने वाले दलित समाज को इस जांच समिति के जाने के बाद अब अपने ऊपर विश्वास हो चला है, अब वह शिकायतें दर्ज कराने के लिए सामने भी आ रहा है और अत्याचारों से संघर्ष करने का निर्णय भी ले रहा है.

समिति के अध्यक्ष पवन कुमार ने कहा कि यह रिपोर्ट हरियाणा सरकार, अनुसूचित जाति आयोग एवं केंद्र सरकार के गृह मंत्री को दी जाएगी. जिससे वे दलित समाज को न्याय दिलाएं और मेवात में कानून का राज्य स्थापित करें.

June 1st 2020, 11:50 am

हमारी चुनौतियां और भारत की संभावनाएं

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रवि प्रकाश

बगैर किसी भूमिका के सीधी बात की जाए तो फरवरी के आरम्भ होते-होते दुनिया को अहसास हो गया था कि एक भारी संकट विश्व समुदाय को अपनी चपेट में ले रहा है और इससे बाहर निकलना तत्काल संभव नहीं है. यह संकट मानव-निर्मित है या बेलगाम और बेहिसाब दोहन से क्षुब्ध प्रकृति का प्रकोप है, इस पर अभी दुनिया भर में माथापच्ची चल रही है. इस बीच संकट सुरसा के मुँह के समान विशाल और विकराल होता जा रहा है. कोरोना वायरस की बिलकुल नयी और रहस्यमयी प्रजाति से उत्पन्न कोविड19 रोग ने एक ऐसा संकट दुनिया के सामने खड़ा कर दिया है, जिसकी भयावहता के बारे में चिकित्सा और अर्थ जगत के विद्वानों-विशेषज्ञों ने इस साल जनवरी के उत्तरार्ध में चेतावनी देनी आरम्भ कर दी थी. हर गुजरते दिन के साथ लगभग चार महीनों में इस विश्वव्यापी महामारी ने दुनिया को अस्त-व्यस्त कर दिया है. कहीं कम तो कहीं ज्यादा, कहीं धीमा तो कहीं तीव्र कोरोना के संक्रमण से आज धरती का कोई देश अछूता नहीं है.

इसके मानव-निर्मित और प्राकृतिक होने की बहस के बीच यह निर्विवाद सत्य है कि इसका उद्गम स्थल चीनी लोक गणराज्य का विकसित शहर वुहान था. चीन में वुहान, शंघाई और बीजिंग, इन तीन महानगरों में दो से तीन महीने तक के लॉकडाउन के बाद स्थितियाँ लगभग सामान्य हो चुकी हैं. तो उधर, लगभग पूरा यूरोप और अमेरिका अभी भी इस विनाशकारी प्रकोप से त्राहि-त्राहि कर रहे हैं. दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश, हमारा भारत दो महीने से अधिक समय से लॉकडाउन का पालन कर रहा है और हम चिंताजनक अवस्था से अभी बाहर नहीं निकल पाए हैं. इस विपदा ने जहां दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को झकझोर दिया है, अनेक अर्थव्यवस्थाओं की जडें हिलने लगीं हैं. भारत की सकल घरेलू उत्पाद दर काफी नीचे आ गयी है. संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति इस वैश्विक आपदा के लिए सीधे तौर पर चीन को उत्तरदायी ठहरा रहे हैं. ऐसी परिस्थिति में विश्व का मार्गदर्शन करने वाला विश्व स्वास्थ्य संगठन संदेह के घेरे में है और संयुक्त राज्य अमेरिका ने उस पर गंभीर आर्थिक आक्रमण कर दिया है. इसी कड़ी में उसके निशाने पर चीन भी है और कूटनीतिक बयानों के बीच सं.रा.अमेरिका और चीन के बीच कूटनीतिक वक्तव्यों के आक्रामक आदान-प्रदान के पार्श्व में सामरिक तैयारियाँ भी चल रही हैं.

कुल मिलाकर कोरोना के कहर ने दुनिया के सामने आर्थिक हितों की टकराहट को तेज कर दिया है. ऐसे माहौल में एक उभरती हुए वैश्विक शक्ति और विकासशील अर्थव्यवस्था के नाते भारत के सामने कोरोना के संकट से लड़ने के साथ-साथ अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने और परम्परागत रूप से पश्चिम और उत्तर में दो-दो विद्वेषपूर्ण पड़ोसियों के षड्यंत्रों से निपटने की चुनौती है. इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हमारे सामने कोरोना की महामारी से निपटने के अलावा अभी दो तरह की चुनौतियाँ हैं – एक लॉकडाउन के मद्देनज़र आर्थिक मोर्चे पर और दूसरी उत्तर और पश्चिम में गैर भरोसेमंद पड़ोसियों के मद्देनज़र सामरिक मोर्चे पर. कोरोना वायरस और कोविड19 के कारण आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियाँ अधिक गंभीर हो गयी हैं और हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री, के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए ठोस एवं साहसिक कदमों के प्रतिफल मिल रहे थे, उनपर अचानक-से लगाम लग गई है. इस अवरोध को हटाने और आर्थिक गतिविधियों को वापस पटरी पर लाने, उसकी रफ़्तार पहले की अपेक्षा अधिक तेज करने तथा कोविड19 के कारण करोड़ों की संख्या में गरीबों और श्रमिकों के सामने उत्पन्न संकट को दूर करना आवश्यक होगा.

भारत के आर्थिक दृष्टिकोणों को अगर हम मोटे तौर पर तीन कालखंडों – 1950 से 1990, 1991 से 2013 और 2014 एवं उससे आगे – में विभाजित करें तो हम पाते हैं कि 2014 से पहले लगभग 35 वर्षों तक और विशेषकर 1991 से 2013 तक केंद्र में स्पष्ट बहुमत की सरकार नहीं होने के कारण अनेक दूरगामी परिणाम वाले क्षेत्रों में नीति-निर्धारण की कमजोरी हावी रही थी. इसके फलस्वरूप स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद के लगभग तीन दशकों में विकास और प्रगति के जो भी कार्य हुए थे, उनका प्रभाव देश और समाज के सर्वांगीण हित में गायब होता गया और अदृश्य रूप से जो परिस्थितियाँ विकसित होने लगीं उनका प्रत्यक्ष रूप आज हमारे सामने दिखाई दे रहा है कि एक ओर चीन की शह पर नेपाल भी सीमा विवाद खड़ा कर रहा है, तो दूसरी ओर करोड़ों गरीबों और श्रमिकों की दुर्दशा सामने आ रही है, जो अन्यथा ठीक-ठाक लग रहे थे. सामरिक स्थिति यह थी कि विगत तीन-चार दशकों में चीन भारत से सटे अपनी दक्षिणी सीमा पर सारी अवसंरचनाओं का विकास करता रहा, लेकिन हमारी ओर से शान्ति के नाम पर उसकी गंभीरता की उपेक्षा की जाती रही. इस परिप्रेक्ष्य में हमारे सामने सुकून और भरोसे की स्थिति इसलिए बनती है क्योंकि आज केंद्र में पिछले छह वर्षों से सहयोगी दलों के गठबंधन के बावजूद एक पूर्ण बहुमत की सरकार है और देश हित में साहस-भरे कठोर फैसले करने वाला सरकार का मुखिया है. यह इन साहस-भरे कदमों का ही परिणाम है कि भारत ने अपनी सार्वभौमिक शक्ति का परिचय देते हुए अपनी उत्तरी सीमाओं पर सुदृढ़ अवसंरचनाओं का विकास आरम्भ किया है, जिसको लेकर चीन अपनी नाराजगी कभी सीमा पर नोक-झोंक के माध्यम से तो कभी परोक्ष रूप से नेपाल के माध्यम से जाहिर कर रहा है. इस सामरिक चुनौती का सामना करने के लिए भी हमारे लिए अपनी आर्थिक चुनौतियों को दूर करना एक अनिवार्य शर्त है.

इस सन्दर्भ में केंद्र सरकार ने लॉकडाउन के पाँचवे चरण में आर्थिक-व्यावसायिक-औद्योगिक गतिविधियों को क्रमिक रूप से खोलते हुए कोविड-19 के मुकाबले लॉकडाउन की शर्तों का पालन करने की सही नीति अपनाई है. प्रधानमन्त्री ने कुछ दिनों पहले “आत्मनिर्भरता” और “लोकल के लिए वोकल” होने का सन्देश दिया था. इन दोनों संदेशों के निहितार्थ बड़े गहरे हैं. हमें आम जनता के बीच इन निहितार्थों को न केवल पहुंचाने, बल्कि देशवासियों के मन में इन्हें बिठाने की भी ज़रुरत है. प्रधानमंत्री द्वारा संकल्पित कौशल विकास योजना का बड़ा लाभ देश को मिलने लगा है. इस बीच प्रवासी श्रमिकों की घरवापसी के कारण रोजगार के नए अवसर और संसाधन जुटाने की ज़रुरत हमारे सामने है. ऐसे में आर्थिक चुनौतियों के समाधान के लिए इस विषम परिस्थिति में भी बहुत सारी सकारात्मक परिस्थितियाँ हैं जो हमारा संबल बन सकतीं हैं. बड़ी संख्या में लोग गाँवों में वापस लौट रहे हैं. तो ग्रामीण कुटीर उद्योगों और कारोबारों के साथ-साथ कृषि उत्पादन को नया आयाम देते हुए हम इन करोड़ों श्रमिकों को लाभकारी कृषिक रोजगार और ग्रामीण उत्पादन से जोड़ सकते हैं. कहा जाता है कि आर्थिक ढाँचा ही मूल ढांचा होता है जो अन्य सामाजिक-सांस्‍कृतिक-राजनीतिक-आर्थिक ढांचे को आकार प्रदान करता है. इसलिए जाहिर है, जब देश के गाँव विकसित होंगे, ग्राम्य जीवन उन्नत होगा, कृषिक रोजगार और आय में वृद्धि होगी तथा ग्रामीण कुटीर उद्योगों का जाल बिछेगा तो स्वभावतः लोगों की आय के साथ-साथ देश की समग्र आर्थिक शक्ति में भी इजाफा होगा.

साथ ही किसी भी देश के लिये विकास का इंजन उसके उद्योग-धंधे अर्थात् विनिर्माण क्षेत्र होता है. आज भारत विनिर्माण के क्षेत्र में मेक इन इंडिया जैसे इनिशिएटिव के माध्यम से बूमिंग की स्थिति प्राप्त कर रहा है, भले ही कोविड-19 के कारण लॉकडाउन की स्थिति में अभी हालत थोड़े डरावने क्यों न लग रहे हों. इस परिप्रेक्ष्य में हमें चीन के प्रति यूरोप और अमेरिका में पैदा हो रहे आक्रोश का लाभ उठाने की कोशिश करनी चाहिए. चीन से बाहर निकलने वाले उद्योगों को भारत में आमंत्रित करने के लिए अपने श्रमिकों के हितों को सुरक्षित करते हुए, आने वाली कंपनियों के लिए अनुकूल वातावरण और भरोसे का माहौल बनाना होगा. इससे विनिर्माण के क्षेत्र में भी रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और इस क्षेत्र में कुशल श्रमिकों की मांग हम देश में पहले से चल रहे कौशल विकास योजनाओं से करने की स्थिति में हैं. इस तरह उत्पादन में जो उछाल आएगा, उसके लिए हमें नए बाज़ार की ज़रुरत होगी, निर्यात में और आगे बढ़ना होगा. अधिकांश देशों की समस्या बाज़ार की अनुपलब्धता है, जबकि भारत में एक बहुत बड़ा मध्य वर्ग इन वस्तुओं के बाज़ार के रूप में भारत के आर्थिक विकास हेतु आधार प्रदान कर रहा है. गाँवों में आय के स्रोत बढ़ने से यह आधार और भी विशाल हो जाएगा. भारत और चीन के बीच व्यापार पर ही गौर करें तो हम कह सकते हैं कि अभी हम चीन से जितना आयात कर रहे हैं, अगर उसकी पूर्ति के लिए हम अपने देश में उत्पादन करने लगें तो अपेक्षित बाज़ार हमें अपने ही देश में उपलब्ध हो जाएगा. इस तरह प्रधानमंत्री की “मेक इन इंडिया” के बाद “वोकल फॉर लोकल” के रास्ते ‘कंज्यूम इन इंडिया’ को अपना कर “आत्मनिर्भर भारत” की योजना साकार कर सकते हैं. दूसरी ओर निर्यात के नए बाज़ार का दोहन करके हम अपनी वैश्विक पहचान को और मजबूत कर सकते है, विदेशी मुद्रा का भण्डार भी बढ़ा सकते हैं.

भारत ने कोविड-19 के सन्दर्भ में सं.रा.अमेरिका जैसे धनी और शक्तिशाली देश समेत दुनिया के अनेक देशों को जो चिकित्सीय और औषधीय मदद की है, उससे भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है. चीन की शैतानियों के प्रत्युत्तर में भारत ने जिस अभूतपूर्व संयमपूर्ण दृढ़ता और संकल्प-शक्ति का परिचय दिया है, वह पड़ोसियों के लिए एक साफ़ सन्देश है और इसका असर होना अवश्यम्भावी है. विश्व के बदलते कूटनीतिक समीकरणों के बीच भारत को अपनी कूटनीतिक परीक्षा देनी है, इस परीक्षा में पास होना है. नए विश्व के उभरते नए समीकरणों और रिश्तों में अपने हितों की हिफाजत के लिए हस्तक्षेप करना है. अभी तक की स्थितियां हमें भरोसा दिलातीं हैं कि भारत सरकार के कदम सही दिशा में बढ़ रहे हैं. आर्थिक शक्ति ही सामरिक शक्ति की भी बुनियाद होती है. इस प्रकार अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करते हुए देशवासियों की रक्षा और अपनी सीमाओं की अस्मिता अक्षुण रखने के लिए उपयुक्त और पर्याप्त आयुधों पर हमें आगे बढ़ने की ज़रुरत है.

बेशक चुनौतियां गंभीर हैं, कोरोना के सन्दर्भ में मौजूदा हालात अप्रत्याशित हैं. तो यह भी सच है कि भारत का गौरव वापस पाने और आत्मनिर्भर भारत बनाने की योजना महज कल्पना नहीं, बल्कि तार्किक व संगत परिस्थितियों पर आधारित सुविचारित संकल्पना है. जिस पर विभिन्न योजनाओं, परियोजनाओं, पर पहले से चल रहे कार्यों को धैर्य के साथ आगे बढ़ाकर हम इन चुनौतियों को दूर कर सकते हैं. देश में एक मजबूत सरकार, साहसिक कुशल नेतृत्व से हम भरोसा कर सकते है कि ऐसा ही होगा.

(लेखक भारत विकास परिषद, मुंबई प्रांत की कार्यकारिणी के सदस्‍य हैं)

 

June 1st 2020, 11:50 am

सहस्त्रों साल की विरासत पर गर्व करने का क्षण

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डॉ. नीलम महेंद्र

क्षिण पूर्व एशिया के देश वियतनाम में खुदाई के दौरान बलुआ पत्थर का एक शिवलिंग मिलना ना सिर्फ पुरातात्विक शोध की दृष्टि से एक अद्भुत घटना है. अपितु भारत के सनातन धर्म की सनातनता और उसकी व्यापकता का  एक अहम प्रमाण भी है. यह शिवलिंग 9वीं शताब्दी का बताया जा रहा है. जिस परिसर में यह शिवलिंग मिला है, इससे पहले भी यहाँ पर भगवान राम और सीता की अनेक मूर्तियाँ और शिवलिंग मिल चुके हैं. आधुनिक इतिहासकार भारत की सनातन संस्कृति को लेकर जो भी दावे करें, किंतु इसकी सनातनता और लगभग सम्पूर्ण विश्व में इसके फैले होने के प्रमाण अनेक अवसरों पर ऐसे ही सामने आते रहते हैं. और जब इस प्रकार के प्रमाण प्रत्यक्ष होते हैं तो स्वतः ही यह प्रश्न उठता है कि “प्रत्यक्षम किम् प्रमाणम्?” अर्थात् प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता? आज हम ऐसे ही प्रमाणों की बात करेंगे जो हमें जितने आश्चर्यचकित करते हैं, उतने ही गौरवान्वित भी करते हैं.

दरअसल सनातन संस्कृति समूचे विश्व में फैला हुआ था, इस पर अनेक खोजपूर्ण अध्ययन भी हुए हैं और इनसे अनेक प्रमाण भी मिलते हैं.

यह सर्वविदित है कि इंडोनेशिया विश्व का ऐसा देश है, जहाँ आज विश्व की सर्वाधिक मुस्लिम आबादी है. लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस मुस्लिम बहुल देश के लोगों का कहना है कि उनका धर्म इस्लाम है और संस्कृति में रामायण है. जी हाँ, रामकथा इंडोनेशिया की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है. इतना ही नहीं, यहाँ के एक द्वीप बाली में खुदाई के दौरान प्राचीन मंदिरों के कुछ अंश भी मिले. जानकारी के अनुसार इंडोनेशिया का यह स्थान कभी हिन्दू धर्म का केंद्र था और आज यही मंदिर बाली द्वीप की पहचान है. इंडोनेशिया के इस द्वीप पर हिंदुओं के कई प्राचीन मंदिरों के साथ एक गुफा मंदिर भी स्थित है, जिसमें तीन शिवलिंग बने हैं और यह भगवान शिव को समर्पित है. 19 अक्तूबर 1995 को इसे विश्व धरोहरों में शामिल कर लिया गया था. यह तो हुई एशिया या फिर भारतीय उपमहाद्वीप की बात.

इसी प्रकार  विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक अंकोरवाट, एक हिन्दू मंदिर है जो कंबोडिया में स्थित है. यह भगवान विष्णु का मंदिर है जो आज भी संसार का सबसे बड़ा मंदिर है और सैकड़ों वर्ग मील में फैला है. यह मंदिर आज कंबोडिया राष्ट्र के सम्मान का प्रतीक है और इसे 1983 से कंबोडिया के राष्ट्रध्वज में स्थान दिया गया. विश्व का सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थल होने के साथ साथ यह मंदिर यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों में से भी एक है.

इन्हीं जानकारियों के बीच आपको अगर यह बताया जाए कि दक्षिण अफ्रीका में भी पुरातत्वविदों को लगभग 6 हज़ार वर्ष पुराना शिवलिंग मिला है तो आप क्या कहेंगे. साउथ अफ्रीका के सुद्वारा नामक गुफा में मिले इस शिवलिंग को खोजने वाले पुरातत्वेत्ता भी हैरान हैं कि इतने वर्षों से यह शिवलिंग अभी तक सुरक्षित कैसे है? लेकिन यहाँ गुफा में स्थापित हज़ारों वर्ष पुराना शिवलिंग इतना तो प्रमाणित करता ही है कि हिन्दू धर्म अफ्रीका तक प्रचलित था.

लेकिन इन देशों से इतर अगर आपको पता चले कि वो देश जो आज अपनी हरकतों के चलते लगभग विश्व के हर देश की आँख की किरकिरी बना हुआ है, कभी वहाँ भी हिन्दू मंदिर और संस्कृति हुआ करती थी! जी हाँ चीन के एक शहर में हज़ार वर्ष पुराने हिन्दू मंदिरों के खंडहर आज भी मौजूद हैं. यहाँ से निकली नरसिंह अवतार की मूर्तियाँ और मंदिर के स्तंभों पर अंकित शिवलिंग च्वानजो के समुद्री म्यूजियम में रखी हुई हैं. रूस को लेकर भी कहा जाता है कि लगभग एक हज़ार वर्ष पूर्व वहाँ भी वैदिक पद्धति से प्रकृति जैसे सूर्य, पर्वत, वायु और पेड़ों की पूजा की जाती थी. विद्वानों का कहना है कि रूसियों द्वारा की जाने वाली प्रकृति की पूजा बहुत कुछ हिन्दू रीति रिवाजों से मेल खाती थीं.

पुरातत्ववेताओं को रूस में भी खुदाई के दौरान कभी कभी रूसी देवी देवताओं की मूर्तियां मिल जाती हैं, जिनकी समानता हिन्दू देवी देवताओं से की जा सकती है. रूस के विद्वान भी मानते हैं कि आज भले ही वहाँ ईसाई धर्म प्रचलन में है, किंतु रूस के प्राचीन धर्म के बहुत से निशान अभी भी रूसी संस्कृति में बाकी रह गए हैं जो इस ओर इशारा करते हैं कि रूस के प्राचीन धर्म और हिन्दू धर्म में काफी समानताएं हैं.

आप कह सकते हैं कि यह बीते समय के प्रमाण हैं तो आपको वर्तमान समय के कुछ प्रमाण भी रोचक लग सकते हैं. जापान के विषय में आपका क्या विचार है? क्या जापान की वर्तमान संस्कृति और सनातन संस्कृति में कोई संबंध है? दरअसल जापान में सैकड़ों धार्मिक स्थल हैं, जहाँ की मूर्तियाँ देवी सरस्वती, लक्ष्मी, इंद्र देव, ब्रह्मा, गणेश, गरुड़, कुबेर, वायुदेव और वरुणदेव का प्रतीक हैं. यहाँ जिन देवी देवताओं की पूजा की जाती है.

जैसे वहाँ कांजीतेन भगवान की पूजा की जाती है, जिनकी मूर्ति गणेश जी के समान है, उन्हें बिनायकतेन (विनायक) कहा जाता है और ऐसी मान्यता है कि ये विघ्न हरकर समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. इसी प्रकार वहाँ बॉनतेन भगवान (ब्रह्मा) की पूजा होती है, जिनकी मूर्ति के चार सिर और चार हाथ हैं और ऐसा माना जाता है कि ये ब्रह्मलोक में निवास करते हैं. जापानी ताईशाकूतेन (इंद्रदेव) की पूजा करते हैं जो हाथी की सवारी करते हैं और मान्यता है कि वे स्वर्गलोक के राजा हैं. इसी प्रकार जापान में किच्चिजोतेन देवी (लक्ष्मी) की पूजा की जाती है जो कमल के फूल पर विराजमान हैं और इन्हें भाग्य और ऐश्वर्य की देवी माना जाता है. यह तो हुई सनातन धर्म से समानता की बात. अगर आध्यात्मिक ज्ञान और भारतीय दर्शन की बात करें तो भारतीय वांग्मय में मानव शरीर की आत्मिक ऊर्जा का केंद्र चक्रों को माना गया है और सात प्रमुख चक्र उल्लेख हैं. जापान की रेकी विद्या और इन चक्रों में भी काफी समानता है.

इस तरह जब हमें यह प्रमाण मिलते हैं कि रूस से लेकर रोम तक और इंडोनेशिया से लेकर अफ्रीका तक के देशों के इतिहास में कभी सनातन हिन्दू धर्म वहाँ की संस्कृति का हिस्सा था. और इसमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भारत ने कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया, अपने उपनिवेश स्थापित नहीं किये. अन्य संस्कृतियों को नष्ट करने का प्रयास नहीं किया, जबरन धर्मांतरण के प्रयास नहीं किये. भारत के शासक जहां भी गए उन्होंने वहां की संस्कृति का संवर्धन ही किया, और भारत के वसुधैव कुटुंबकम, सर्वे भवन्तु सुखिनः के विचार को ही पल्लवित किया.

 

June 1st 2020, 11:50 am

Mewat of Haryana becoming graveyard of Dalits – Justice Pawan Kumar

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Gurugram. After investigating the atrocities on Dalits in Mewat (Haryana), Justice Pawan Kumar (Chairman of the Investigation Team), while addressing the journalists in Gurugram said that Mewat of Haryana is becoming a graveyard of Dalits. There is no difference between Pakistan and Mewat. There are many such reports of women being forcibly abducted and raped in Mewat.

Due to no action on these complaints for a long time, Dalits have started feeling that now they have to fight for their honour, their religion and to save their land, that’s why Shri Balmiki Mahasabha Haryana has decided that a 4 member high level inquiry committee should be constituted to bring the reality of Mewat before the government.

Pawan Kumar, Former Judge was announced as the chairman of the Enquiry Committee and Sultan Valmiki, (chairman Valmiki Mahapanchayat Haryana), Kanhaiya Lal Arya, (Vice President Arya Pratinidhi Sabha Haryana) and  Devdutt Sharma, (President Bar Association Sohna) were appointed as members of this investigation team.

The 48 victims of the Dalit society were called, but the terror of the jihadis was such that only 19 people came to give information about the atrocities, their complaints were shocking and surprising.

The incidents of molesting school going girls and women take place all over Mewat, due to which it has become difficult for them to go to school. A 12-year-old girl was raped by 4 Muslims and the house where the rape took place was one of the Muslim policeman. Even after a year, there has been no action on that policeman till date. In Ferozpur Namak, 9 muslims gangraped a woman after forcibly abducting for several days. Due to no action of her complaint, the accused killed that woman four days later.

Pawan Kumar said that more than two hundred instances of forced conversion have come to light, but due to no action in any case, pressure is being built-up on the families of the converted persons to get converted.

Their cremation grounds are being encroached in many places. The dalits were abducted and assaulted by the Muslims, attack on dalits asking for refund of borrowings by the muslims have become a common occurrence.

In Bichhor village, Ramjilal was first tortured, stabbed to death and then his body was also partially burnt. Even after the FIR lodged with name, the police declared that the victim died due to thunder lightning to close the case. His family was in such a panic that they have left the village permanently due to fear of Jihadis.

Many a times when Dalits are engaged in their family marriages, they are attacked and looted. Many attempts have been made to forcibly abduct the bride on the day of marriage.

The conclusion of this inquiry committee is that atrocities on Dalits can only be done by the help/support of administration and police. At first, even the complaints of Dalits are not registered, if FIR is registered after many efforts then police pressurize the victims, forced them to compromise and they are also threatened to be framed in false cases.

Unfortunately, the pseudo-secular supporters who raise the voice for Dalits anywhere in the country, keep silent on such inhuman atrocities on Dalits by Muslims. Why the Dalit organizations, which have been encouraging Dalit Muslim unity to gain political mileage, have not yet come to wipe out the tears of these Dalits. Why do any politician of any political party have not come to help the dalits despite repeated complaints of these atrocities?

After the visit of inquiry committee in Mewat, the dalit people got encouraged to speak the truth. Now dalit people also seems to have decided to raise their voice against the atrocities and to fight against the Jihadis.

Chairman of the committee, Justice (Retd.) Pawan Kumar also said that this report will be sent to the Honourable chief minister Haryana, to the chairman scheduled castes commission of India and the Honourable Home minister of India so that justice is delivered at the earliest and rule of law can be established in Mewat.

June 1st 2020, 10:19 am

भारत भारती – आदर्श क्वारेंटाइन सेंटर बना विद्या भारती का धाबा छात्रावास

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ईश प्रार्थना के साथ शुरू होता है दिन, भोजन के लिए दोने पत्तल भी स्वयं बनाते हैं

भोपाल (विसंकें). कोरोना माहमारी से बचाव के लिये लागू लॉकडाउन के कारण देश भर में मजदूर जहां-तहां अटके थे. अब सरकार द्वारा उन्हें वापस अपने घर पहुंचाने का क्रम शुरू गया है. लेकिन महामारी की आशंका के कारण उन्हें अपने ग्रामों के आसपास ही 14 दिनों के लिए क्वारेंटाइन में रखा गया है. इसी प्रकार विद्या भारती के प्रद्युम्न धोटे स्मृति जनजाति छात्रावास धाबा में भी क्वारेंटाइन केंद्र बनाया गया है, यह केंद्र बैतूल जिले के भैंसदेही विकास खंड के जनजाति ग्राम में स्थित है. भारत भारती शिक्षण संस्था द्वारा यहां 40 जनजाति विद्यार्थियों को निःशुल्क पढ़ाया जाता है. वर्तमान में छात्रावास रिक्त होने के कारण विद्या भारती ने भवन को प्रशासन को उपयोग (निःशुल्क) के लिये दिया है, जिसके तहत क्वारेंटाइन केंद्र बनाया गया है. छात्रावास के कर्मचारी श्रमिक यात्रियों की सेवा में दिनरात जुटे हैं.

केंद्र में श्रमिकों की दिनचर्या देखकर एकबार किसी को लगेगा कि यह कोई योग केन्द्र है. यहाँ प्रतिदिन दिनचर्या ईश प्रार्थना के साथ प्रारम्भ होती है. फिर छात्रावास के अधीक्षक रामनरेश दोहरे व विजय खातरकर द्वारा श्रमिकों को प्रतिदिन एक घण्टे योगासन और प्राणायाम का अभ्यास कराया जाता है. भोजन के समय सभी भोजन मन्त्र बोलते हैं.

इतना सब होते देख श्रमिकों के मन में आया कि संस्था हमारे लिए इतना कुछ कर रही है तो क्यों न वे भी संस्था की भलाई के कुछ काम करें और जुट गए, जिसको जो काम आता था उसको करने के लिए.

दो श्रमिकों ने आसपास से खजूर के पत्ते लाकर झाड़ू बनाना शुरू किया तो कुछ छात्रावास की पुताई में जुट गए. स्वयं के भोजन करने के लिए श्रमिक प्रतिदिन दोने पत्तल बनाते हैं, ताकि बर्तनों का कम से कम उपयोग हो और पानी भी कम खर्च हो. कुछ महिला श्रमिक छात्रावास परिसर में लगी हरी सब्जियों की निंदाई गुड़ाई में लग गईं.

मजदूरों से चर्चा करने पर उन्होंने बताया कि उन्हें दिन भर खाली बैठना अच्छा नहीं लगता और ये संस्था हमारी सेवा कर रही है तो बदले में हमें भी कुछ करना चाहिए. इसलिए दिन के खाली समय में छात्रावास परिसर के स्वच्छता और जो काम उन्हें आते हैं, उसे सेवा मानकर कर रहे हैं.

छात्रावास में भी श्रमिकों के भोजन व ठहरने की उत्तम व्यवस्था की गई है. जहाँ उन्हें पलंग और बिस्तर उपलब्ध कराए गए हैं. छात्रावास में आए उन्हें एक सप्ताह से अधिक का समय हो जाने पर सभी एक परिवार के अंग के रुप में हो गए हैं. सभी श्रमिक महाराष्ट्र प्रान्त से आए हैं व धाबा के आसपास के ग्रामों के निवासी हैं.

May 31st 2020, 1:00 pm

हलाल प्रमाणीकृत उत्पादों के पीछे की मजहबी मानसिकता को समझना होगा

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डॉ. शुचि चौहान आज देश में हलाल प्रमाणपत्र जारी करने वाली अनेक संस्थाएं सक्रिय हैं. जिनमें हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, हलाल सर्टिफिकेशन सर्विस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, जमीअत उलमा –ए-महाराष्ट्र और जमीअत उलमा-ए –हिन्द हलाल ट्रस्ट प्रमुख हैं. ये संस्थाएं उन्हीं उत्पादों को यह प्रमाणपत्र जारी करती हैं जो इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार हलाल हैं. इस्लाम में चीजों को हलाल और हराम के माध्यम से समझा जाता है. जो चीज शरिया नियमों के अनुसार हो उसे हलाल कहते हैं वरना वह हराम है. उत्पादों की बात करें तो हलाल केवल मांस ही नहीं होता; आटा, दाल, चावल, बिस्किट, नमकीन, पिज्जा, बर्गर, कॉस्मेटिक्स कुछ भी हो सकता है. यहां तक की संस्थानों जैसे अस्पताल, रेस्टोरेंट, होटल, फैक्ट्रियों और वेबसाइट्स तक को हलाल प्रमाणपत्र दिया जा रहा है. हलाल प्रमाणपत्र देने वाली ये संस्थाएं दावा यह करती हैं कि हलाल प्रमाणपत्र शुद्धता के मानदण्डों पर दिया जाता है. हलाल इंडिया का कहना है - हलाल प्रमाणीकरण का अर्थ है, उत्पाद बनाने में क्लीन सप्लाई चेन और कम्प्लायंस का पूरा ध्यान रखा गया है, जिसमें सोर्सिंग से लेकर ट्रेड तक शामिल है, यानि कि कंपनियां हैंडलिंग, पैकेजिंग, लेबलिंग, वितरण और भंडारण में ‘कुछ’ स्टैंडर्ड्स का सख्ती से पालन करती हैं ताकि इन उत्पादों को हलाल प्रमाणित किया जा सके. यहां इस ‘कुछ’ में ही बहुत कुछ छिपा है. यदि हलाल इंडिया द्वारा पशुओं के स्लॉटरिंग की गाइडलाइन पढ़ें तो उसमें साफ लिखा है पशु या पोल्ट्री कटने लायक है या नहीं, इसकी जांच करने से लेकर उसकी गर्दन काटने, ठीक से कटी या नहीं इसकी मॉनीटरिंग करने और लेबलिंग तक का काम कोई मुसलमान ही करेगा. इसके बाद वितरण और भंडारण का काम भी कोई मुस्लिम ही करेगा. अन्य उत्पादों में भी पूरी तरह शरिया नियमों का पालन किया जाता है और उन्हें ही हलाल प्रमाणित किया जाता है. जिनमें सुअर, कुत्ता, सांप, बंदर आदि के मांस, चर्बी या खाल आदि का प्रयोग न किया गया हो या शराब, बीवैक्स, गोमूत्र आदि का उपयोग न किया गया हो क्योंकि इस्लाम में ये हराम हैं. इनके उत्पादन में भी कच्चा माल तैयार करने से लेकर विपणन तक की पूरी चेन में मुसलमानों की बहुलता और कहीं कहीं तो बाध्यता है. साफ साफ शब्दों में कहें तो हलाल प्रमाणीकरण सिर्फ मुस्लिमों को रोजगार देने का एक संगठित षड्यंत्र है, इस चैनल में गैर मुस्लिमों के लिए कोई जगह नहीं. मीडिया रिपोर्ट्स से पता चलता है कि आज दुनिया भर में हलाल उत्पादों का बाजार लगभग ढाई ट्रिलियन डॉलर का है. इस समानांतर अर्थव्यवस्था ने बाजार को प्रभावित किया है. मुस्लिम देश इस प्रमाणीकरण को मान्यता देते हैं. यदि भारत से कोई अपने उत्पाद को किसी इस्लामिक देश में निर्यात करना चाहता है तो उसे अपने उत्पाद को हलाल प्रमाणित करवाना होगा. हलाल उत्पादों के प्रमाणीकरण की संकल्पना 2011 में मलेशिया में रखी गई थी. ये मुस्लिमों को रोजगार देने और समानांतर इस्लामिक अर्थव्यवस्था खड़ी करने के प्रयास थे. दुनिया भर के इस्लामिक बैंक भी इसी अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं. हलाल उत्पादों से पैसा कमाना और इस्लामिक बैंकों में जमा कराना फिर इस्लामिक बैंकों द्वारा मुस्लिम व्यापारी को पैसा उपलब्ध कराने का पूरा चक्र है. भारत में भी मुस्लिम संगठन मुसलमानों को हलाल उत्पाद खरीदने के लिए प्रेरित करते हैं, नहीं खरीदने पर अल्लाह और ईमान का डर दिखाते हैं. मजहबी विचार हावी होने के कारण मुसलमान सहज ही हलाल प्रमाणीकृत उत्पादों की ओर उन्मुख हो जाता है. लेकिन अधिकांश गैर मुस्लिम केवल उत्पाद से मतलब रखते हैं, वे न तो यह जानने में रुचि रखते हैं कि हलाल प्रमाणीकरण क्या है और न ही उन्हें इससे कोई फर्क पड़ता है. इससे इस्लामिक अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है. उसे संगठित मुस्लिम उपभोक्ता के साथ ही गैर मुस्लिम उपभोक्ता भी सहज ही मिल जाते हैं. यही कारण है - आज 15 प्रतिशत जनसंख्या के पीछे 85 प्रतिशत जनसंख्या पर हलाल उत्पाद थोपे जाने लगे हैं. इन उत्पादों की सप्लाई चेन के नियमों पर गौर करें तो इन संस्थाओं के उन दावों की भी पोल खुलती नजर आती है, जिनमें ये कहती हैं कि हलाल प्रमाणपत्र उत्पाद की गुणवत्ता के आधार पर दिया जाता है. इनके नियमों के अनुसार यदि ट्रांसपोर्टेशन के दौरान हलाल उत्पाद गैर हलाल उत्पाद से छू भर जाए तो भी वह हराम हो जाता है. मजहबी संकीर्णता व दोहरे मापदण्डों की अनेक घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं. पिछले दिनों मुस्लिम महिलाओं को हिंदुओं की दुकान से खरीददारी करने पर मुस्लिम कट्टरपंथियों ने बहुत बवाल काटा. लेकिन दूसरी ओर चैन्नई में जैन का विरोध किया, जब उन्होंने अपने ढाबे में सिर्फ जैन कर्मचारियों द्वारा ही भोजन बनाए जाने की बात कही. आज आवश्यकता है, इस मानसिकता को समझने की व आसपास हो रही गैर सनातनी गतिविधियों पर मुखर होने की. इस्लामिक देशों में निर्यात के लिए हलाल प्रमाणीकरण आवश्यक हो सकता है लेकिन देश में इन उत्पादों का विरोध होना चाहिए. ये संस्थाएं प्रमाणीकरण के नाम पर कम्पनियों से मोटा पैसा वसूलती हैं और जकात के नाम पर इसका एक निश्चित प्रतिशत दूसरे इस्लामिक संगठनों को देती हैं, जो इस्लाम के प्रचार प्रसार की आड़ में मतांतरण व अन्य जिहादी गतिविधियों पर खर्च होता है. यानि गैर मुसलमान पर दोहरी मार पड़ती है. पहला तो संगठित हलाल अर्थव्यवस्था से बाहर होने के कारण छोटे असंगठित कामगारों का रोजगार छिनता है, दूसरा गैर मुस्लिम व्यापारी भी मुस्लिमों को एक बाजार के रूप में देखते हुए हलाल प्रमाणपत्र लेने के लिए आकर्षित होते हैं. जिसके लिए मुस्लिम संस्थाओं को मोटी रकम चुकाते हैं. जिससे प्रत्यक्ष रूप से इस्लामिक अर्थव्यवस्था तो अप्रत्यक्ष रूप से इनकी जिहादी गतिविधियों को मजबूत बनाने में सहायक होते हैं. यह वैसा ही है, जैसे मुगलकाल में यदि कोई हिंदू मुसलमान बनना अस्वीकार कर देता था तो उसे जजिया कर देना पड़ता था. आज यदि आपको अपने उत्पाद मुसलमानों को बेचने हैं तो हलाल प्रमाणपत्र पाने के लिए आपको मुस्लिम संस्थाओं को मोटी रकम चुकानी होगी. हलाल प्रमाणीकृत संस्थाएं गैर मुस्लिम ग्राहकों का मोह भी छोड़ नहीं पातीं. ऐसे में वे अपने हलाल स्टेटस को प्रचारित नहीं करतीं. लेकिन उनकी वेबसाइट पर जाने या पूछताछ करने पर सारी असलियत सामने आ जाती है. आज गैर मुस्लिमों को अपना भला बुरा स्वयं समझ कर मुखर बनना होगा. क्योंकि भारत के गैर मुसलमान मात्र उपभोक्ता नहीं हैं, उनके अपने विश्वास व आस्थाएं हैं. उन्हें भ्रम में रखकर उनकी भावनाओं से खिलवाड़ बंद होना चाहिए. दूसरी ओर जब शुद्धता के मानदंडों को परखने व प्रमाणित करने के लिए देश में अन्‍न सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) और अन्‍न एवं औषधि प्रशासन (FDA) जैसी सरकारी संस्थाएं हैं तो सरकार को हलाल प्रमाणपत्र देने वाली निजी धार्मिक संस्‍थाओं को अवैध घोषित कर देना चाहिए. देश में हलाल प्रमाणीकरण को प्रतिबंधित कर, इस्लामिक देशों में निर्यात के लिए आवश्यक प्रमाणपत्र स्वयं जारी करने चाहिए और या फिर हिंदू संगठनों की मांग पर उन्हें भी अपने उत्पादों के लिए धार्मिक या सनातन प्रमाणपत्र देने की अनुमति दे देनी चाहिए.

May 31st 2020, 12:00 pm

वह अविस्मरणीय दिन…..

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निशिगंधा कल्लेद यह अनुभव मुझे अपने पूरे जीवन में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर लगता है. हमें यह जानना ही होगा, कि हमें उस समाज को कुछ देना होगा, जिसमें हम रहते हैं. दूसरे हमारे लिए क्या करते हैं, इसकी बजाय मैं दूसरों के लिए क्या करता हूं, इसका विचार करना आवश्यक है. हम प्रतिदिन टीवी पर देखते हैं कि डॉक्टर, नर्स, पुलिस अथक काम करते हैं, लेकिन बहुत कम लोग खुद आगे आकर इसे करना चाहते हैं. हमारा यह रवैया होता है कि यह उनका काम है, उन्हें इसके पैसे मिलते हैं. लेकिन क्या इन लोगों का सहभाग वास्तव में केवल पैसे तक सीमित है? हमारा अपना जीवन और पैसा क्या समान हो सकता है? इस आपदा के दौरान कई लोगों ने जान गंवाई है. कुछ ने आपदा के कारण और कुछ ने इस स्थिति से लड़ते हुए. जीव सारे समान, यातना भी समान है, लेकिन जीवन का उद्देश्य अलग है...और इस उद्देश्य को जानना सच्चे अर्थों में जीना है. यद्यपि मैं यह बचपन से कहती आया हूं, कि भारत मेरा देश है और सभी भारतीय मेरे भाई-बहन हैं. यह बहुत देर से महसूस किया कि यह एक केवल पाठशाला में आने के बाद कहने की चीज है. हालांकि, 26 जनवरी और 15 अगस्त को पहले मेरे और मेरी बेटी की पाठशाला में बिना चूके जाती रही. आज भी राष्ट्रगीत सुनने के बाद आंखों से पानी आता ही है और उस "क्यों?" का न मिलने वाला उत्तर मुझे अब मिला. हमारे एक वाट्सएप ग्रुप पर एक संदेश आया कि कोरोना से शीत युद्ध में लड़ने के लिए स्वयंसेवकों की आवश्यकता है. हो सकता है कि अन्य किसी क होता मैंने सोचा नहीं होता, लेकिन यह संदेश RSS की ओर से था. इसलिए मैंने अपनी आँखें बंद करके फॉर्म भर दिया और भूल भी गई. कभी कभार याद आता, लेकिन फिर भूल भी जाती. मैं यह सोचकर चुप रह जाती कि शायद हमें यह मौका नहीं मिलेगा. ऐसे में एक दिन मुग्धा मैडम का फोन आया और उन्होंने कहा, "क्या कर रही हो? कुछ नहीं ना, फिर उठो, अपना बैग भरो और कल सुबह 8 बजे गरवारे हॉस्टल पहुंचो." बस इतना ही!! मैंने केवल अपने माता-पिता, बेटी और अपनी सहेली प्राजक्ता को बताया और तैयारी की. मैं ठीक सुबह 8 बजे पहुंची. पहुंचते ही बिना कोई सवाल किए हम सभी से कहा गया कि 'पहले नाश्ता करें, फिर बातें करेंगे'. हमने नाश्ता किया, बैग रूम में गई और फिर हम सब एक साथ मिले. सभी युवा वर्ग के थे और हम में से बहुत कम अधिक उम्र के थे. उनमें से ज्यादातर मेडिकल बैकग्राउंड से थे और बाकी विभिन्न क्षेत्रों से आए थे. आयु अलग, पृष्ठभूमि भी अलग, अनुभव अलग, स्थान भी अलग. लेकिन सब कुछ समायोजित किया गया...क्योंकि उद्देश्य समान था! हमें पूरी जानकारी देने के लिए 2 डॉक्टर खड़े थे. क्या-क्या करना है, अपना ख्याल कैसे रखें? खतरे कहां हैं? और गलतियाँ कहां हो सकती हैं...बल्कि वे कैसे होती हैं? और उनसे कैसे बचें? यह बताया गया. हमारे 2-2 लोगों के गट बनाए गए. हर कोई एक दूसरे के लिए नया था, इसलिए समन्वय कैसे होगा? यह एक सवाल था, लेकिन सभी ने इसे चुटकी में हल किया. चूंकि चेहरे पर मास्क था, इसलिए पहचान परेड की कोई जरूरत नहीं थी, केवल नामों को याद रखना था. प्रशिक्षण के बाद हम काम के लिये निकल पड़े. निकलते समय PPE किट, लिखने का सामान, दवाईयां, शरबत की बोतलें. हमारा काफिला निकला, जाते समय किसी ने भी रास्ते में कहीं नहीं रोका, कोई पूछताछ नहीं, कोई पास नहीं मांगा. क्या बताएं कितना अच्छा लग रहा था...क्योंकि अब तक एंबुलेंस केवल मरीजों को ले जाते हुए दिखती थी, दुःख से भरी होती थी. लेकिन आज वे 'अच्छे' काम के लिए निकल पड़ी थी. जिस क्षेत्र में हमें ले जाया गया, वह पूरी तरह से 'रेड जोन' था. कहीं भी हाथ नहीं लगाना, थूकना नहीं है, पानी नहीं पीना है, किसी के भी घर में नहीं जाना है, कहीं भी बैठना नहीं है, किसी को छूना नहीं है, प्राकृतिक विधि भी नहीं, आप केवल बात कर सकते हैं...सुनते ही रोंगटे खड़े हो गए. ..... फिर हम अपनी जगह पर पहुँच गए. अब आरंभ असली काम और कसौटी का. PPE किट निकालकर पहनना. इसे कैसे पहनना है, यह सिखाया गया था. लेकिन सीखना, देखना और वास्तव में करना बहुत अलग है. औरों ने इसे पहनना शुरू कर दिया, तो मैं केवल देखती रह गई. मेरे माथे पर पसीने की बूंदें, बहुत ही बेतरतीब. फिर कानों के पीछे से नीचे धारा. दिमाग में विचारों का रेला, मन में डर, डॉक्टरों और नर्सों के न्यूज और एफबी पर देखे हुए वीडियो, समाचार सारे एक ही बार में याद आने लगे और एक पल में सारा धीरज समाप्त हुआ. पीछे दीवार से सटकर मैं खड़ी रही, एक पल के लिए ही. लेकिन उस पल में मैंने सारी आशा खो दी थी, वह पल मेरे लिए अनंत जैसा लग रहा था...उस पल में मैंने प्राजक्ता को याद किया, मुझे उसका वाक्य याद आया, "मैं बहुत जेलस हूं हां, तुम जा रही हो और और मैं नहीं जा सकती." और मैं यह सोचकर फिर से आगे आई कि मेरे बजाय वही यहां खड़ी है. किट निकाली और पहनना शुरू किया. पहले ग्लव्स और उस पर सेनेटाइजर लगाना, फिर एन 95 मास्क, पुनः सेनेटाइजर, दूसरा ग्लव्स, पुनः सेनेटाइजर. अब पूरा किट जंप सूट जैसे पहनना. पुनः सेनेटाइजर, अब ओटी कैप, सेनेटाइजर, किट की टोपी, पुनः सेनेटाइजर, उस पर और एक मास्क, गॉगल, और एक ग्लव्स और सबसे आखिर में फेस शील्ड और  पुनः सेनेटाइजर. बीच बीच में सेनेटाइजर का उपयोग आवश्यक है...मैं खुद को इससे अधिक नहीं ढंक सकती थी. मैं कैसी दिख रही थी, यह बात मामूली बात थी, क्योंकि सब एक समान ही दिख रहे थे - पुरुष और महिलाएं भी. शरीर पर किट पहनना तो हो चुका, लेकिन मन में भय से छुटकारा कैसे पाएं? बंद स्थान के फोबिया लेकर जीने वाली मैं स्वयं ही हर तरफ से बंद हो चुकी थी. बाकी सब कुछ खुला, लेकिन मैं बंद थी. पहले से ही पसीने से तर बतर थी, विचार तो इतनी तेजी से चल रहे थे, कि पूछिए मत. लेकिन फिर से ढांढस बांधकर स्वयं को शांत कर लिया और इस दृढ़ सोच के साथ 12वीं मंजिल के लिए निकल पड़ी, कि यहां आकर पीछे नहीं हटूंगी. पहला चरण पूर्ण! अब दूसरा कदम है डोर टू डोर जाकर स्क्रीनिंग करना. एक डॉक्टर और दो स्वयंसेवक ऐसे हम निकले. एक नाम लिखे, दूसरा गोलियां दे, उन्हें समझाए. इस तरह एक दिन में पूरे 70 घर जांचे. प्रत्येक घर में कम से कम 6 लोग और अधिकतम 15 लोग, किस प्रकार सोशल distancing का पालन हो? हर मंजिल पर औरतों का कुंडली मारकर बातें करना, बच्चों का खेलना और बीच की उम्र के बच्चों के हाथों में मोबाइल. क्या और कैसे समझाएं? स्वच्छता रखें, अंतर रखें, कैसे कहें? फिर भी उन्हें जानकारी देना, अपनी और अपने परिवार की देखभाल करने का तरीका हम लगातार बताते थे. लोगों के अनगिनत प्रश्न और उन प्रश्नों के उन्हें भाने वाले उत्तर, इस तरह यह यात्रा 4 घंटे से अधिक समय तक चली. अब अपने बेस पर वापस आकर किट निकालना...किट पहनना जितना आसान, उतना ही उसे निकालना मुश्किल था. इसे बाहर की तरफ छूए बिना निकालना था और बांधकर इसे एक डस्टबिन बैग में रखना था. सभी दस्ताने, मास्क और सेनेटाइज़र अलग से उतारना और पुनः सेनेटाइजर...अब गला सूख चुका था, पानी जरूरी था. लेकिन कंपल्सरी पहले शरबत और फिर पानी. लेकिन जब यह पेट में चला गया, तो मुझे एहसास हुआ कि वास्तव में सूखे इलाकों में लोग कैसे प्यासे और बिना पानी के रहते होंगे और मुझे एहसास हुआ कि हम कितने भाग्यशाली हैं. बाकी बचे किट और पूरी जानकारी के साथ हम पुनः अपने स्थान पर वापस आ गए. जब ​​हम पहुंचे, तो अन्य सभी स्वयंसेवकों ने तालियाँ बजाकर हमारा स्वागत किया. वास्तव में, हम रोमांचित थे और हमारी आँखों में आँसू थे. क्या हमने बहुत कुछ किया था? नहीं, लेकिन जो कुछ हमने किया उसके प्रति यह एक वंदन था. दो हाथों से बजने वाली मामूली सी तालियां और उनका महत्त्व आज महसूस हुआ. हमारे अपने ही लोगों को जीवन में उनका महत्त्व जताने के लिए यह एक रसीद थी. यहां एक अलग वातावरण, एक अलग ऊर्जा का अनुभव किया. मुझे यह शायद दुनिया में कहीं भी नहीं मिली होती. इसी तरह हम अगले 2 दिन स्क्रीनिंग के लिए गए और और अगले 4 दिन क्वारेंटाइन, इस तरह की यह यात्रा थी. इन आठ दिनों के दौरान हमारा अपने घर के लोगों की तुलना में अधिक ध्यान रखा गया. सब कुछ समय पर, अच्छा भोजन, दवा और पूर्ण विश्राम. अपने पूरे जीवन में इतना आराम मैंने कभी महसूस नहीं किया. यह अनुभव मुझे अपने पूरे जीवन में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर लगता है. हमें यह जानना ही होगा, कि हमें उस समाज को कुछ देना होगा, जिसमें हम रहते हैं. दूसरे हमारे लिए क्या करते हैं, इसकी बजाय मैं दूसरों के लिए क्या करता हूं, इसका विचार करना आवश्यक है. हम प्रतिदिन टीवी पर देखते हैं कि डॉक्टर, नर्स, पुलिस अथक काम करते हैं, लेकिन बहुत कम लोग खुद आगे आकर इसे करना चाहते हैं. हमारा यह रवैया होता है कि यह उनका काम है, उन्हें इसके पैसे मिलते हैं. लेकिन क्या इन लोगों का सहभाग वास्तव में केवल पैसे तक सीमित है? हमारा अपना जीवन और पैसा क्या समान हो सकता है? इस आपदा के दौरान कई लोगों ने जान गंवाई है. कुछ ने आपदा के कारण और कुछ ने इस स्थिति से लड़ते हुए. जीव सारे समान, यातना भी समान है, लेकिन जीवन का उद्देश्य अलग है...और इस उद्देश्य को जानना सच्चे अर्थों में जीना है. इन 3 दिनों में बहुत अच्छे, बुरे अनुभव मैंने लिए. जब हम द्वार पर खड़े होते थे, तो हम उन छोटी सी आँखों के लिए कभी डोरेमॉन होते, युवाओं के लिए एलियंस थे, मध्यम आयु वर्ग के लोगों के लिए कर्तव्य और पुराने लोगों के लिए सराहना का विषय थे. भले ही हमने किसी को भी नहीं छुआ, लेकिन वे झुर्रियों वाले बूढ़े चेहरे प्रशंसा से हम पर न्यौछावर करते थे. वैसे तो हम किसी के कोई नहीं थे, लेकिन इस स्थिति में व्यक्ति से व्यक्ति को जोड़ रहे थे. ये अविस्मरणीय, ये दिन मैं केवल संघ के कारण अनुभव कर सकी. हमसे पहले और साथ में काम करने वाले संघ के तथा अब संघ से नए जुड़ने वाले सभी स्वयंसेवकों को मेरा सलाम.... !!! (पुणे में स्क्रीनिंग अभियान में शामिल स्वयंसेवी)

May 31st 2020, 11:00 am

सुनियोजित षड्यंत्र था दिल्ली दंगा, जांच कमेटी ने गृहमंत्री को सौंपी रिपोर्ट

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कॉल फॉर जस्टिस द्वारा गठित कमेटी ने कहा, टुकड़े गैंग, पिंजरा तोड़ शामिल

नई दिल्ली. दिल्ली स्थित गैर सरकारी संगठन कॉल फॉर जस्टिस दिल्ली दंगों को लेकर अपनी जांच रिपोर्ट गृहमंत्री को सौंप दी. 76 पृष्ठों की अपनी रिपोर्ट में कमेटी ने मीडिया रिपोर्ट्स, सोशल मीडिया में उपलब्ध जानकारी व प्रभावित लोगों से बात कर एकत्रित जानकारी के आधार पर तैयार की है.

संस्था द्वारा गठित जांच कमेटी में बॉम्बे हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश अम्बादास जोशी (अध्यक्ष), सेवानिवृत्त आईएएस एमएल मीणा (सदस्य), सेवानिवृत्त आईपीएस विवेक दुबे (सदस्य), एम्स के पूर्व निदेशक डॉ. टीडी डोगरा (सदस्य), नीरा मिश्रा (सदस्य), एडवोकेट नीरज अरोड़ा (सदस्य सचिव) शामिल थे.

जांच कमेटी ने 29 फरवरी और 01 मार्च को दंगा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया था. तथा दंगे में प्रभावितों, प्रत्यक्षदर्शियों से मुलाकात कर उनसे जानकारी प्राप्त की थी. जांच कमेटी ने धरातल पर वास्तविक स्थितियों का गहनता से विश्लेषण करने के पश्चात अपनी रिपोर्ट तैयार की. कमेटी ने पाया कि दिसंबर में नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 पारित होने के पश्चात देशभर में सुनियोजित विरोध प्रदर्शनों का क्रम शुरू किया गया, और इसी क्रम में पूर्व नियोजित हिंसा को अंजाम दिया गया, सीएए के नाम पर विरोध प्रदर्शनों की आड़ में उत्तर पूर्व दिल्ली में हमले किये गए.

कमेटी ने रिपोर्ट में कहा है कि दिल्ली का दंगा पूरी तरह से सुनियोजित था. पूरी योजना बनाकर पहले सीएए को लेकर लोगों को भ्रमित किया गया और उसके साथ ही दिल्ली में दंगा कराने की योजना की गई.

रिपोर्ट में यह कहा गया है कि दिल्ली में दंगा कराने के लिए 5  हजार से ज्यादा लोग दिल्ली के बाहर से बुलाए गए थे. वहीं, दंगे के लिए पीएफआई की तरफ से फंडिंग की गई. साथ ही रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि दो महीने की प्लांनिग के बाद दिल्ली में दंगा कराया गया.

फरवरी के अंतिम सप्ताह में उत्तर पूर्व दिल्ली में 23, 24 और 25 फरवरी को हुए दंगे में 50 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी. दंगाईयों के हमले में डीसीपी घायल हो गए थे, जबकि कॉन्स्टेबल रतनलाल की भी मौत हो गई थी.

www.calljustice.in

‘Call for Justice’ – Fact-finding report names ISI, ‘tukde tukde gang’ in Delhi Riots

NGO ‘Call for Justice’ submits Delhi riots fact finding report to Home Minister Amit Shah

https://bit.ly/36KoK7g

May 30th 2020, 12:58 pm

डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति ने रक्तदान शिविर का आयोजन किया

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कोरोना योद्धा स्वच्छता सेवक यूनियन को उद्घाटन के लिए किया आमंत्रित

शिमला (विसंकें). आई.जी.एम.सी. शिमला अस्पताल में आने वाले मरीजों की आवश्यकता को देखते हुए शनिवार, 30 मई को डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति, शिमला द्वारा रक्तदान शिविर आयोजित किया गया, जिसमें 51 यूनिट रक्त एकत्र हुआ. शिमला के ऐतिहासिक रिज मैदान पर आयोजित रक्तदान शिविर का शुभारंभ कोरोना योद्धा एमसी शिमला सफाई सेवक यूनियन के अध्यक्ष नागेश कुमार ने किया. इस अवसर पर उनके साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिमला जिला संघचालक अजय कुमार सूद और समिति के संरक्षक देशराज चड्ढा उपस्थित रहे.

डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति के सचिव मनोज कपूर ने बताया कि समिति प्रतिवर्ष रक्तदान शिविर का आयोजन करती है. इस बार यह शिविर कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन की स्थिति में आई.जी.एम.सी. में रक्त की आवश्यकता को देखते किया है. आईजीएमसी ब्लड बैंक के इंचार्ज डॉ. एम.एल. कौशल की टीम ने रक्त एकत्र करने में सहयोग दिया. शिविर में जहां एक ओर सफाई व्यवस्था और फिजिकल डिस्टेंसिंग का पूरा ध्यान रखा गया, वहीं रक्तदाता की ट्रैवल हिस्ट्री पता करने के बाद ही रक्तदान करवाया गया. उन्होंने बताया कि आगामी अक्तूबर माह में समिति एक बार फिर रक्तदान शिविर का आयोजन करेगी.

डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए शिमला के आईजीएमसी, डी.डी.यू. और के.एन.एच. अस्पताल को चार सेनेटाईजेशन मशीनें भेंट कर चुकी है. साथ ही आई.जी.एम.सी. को एक ऑटो थर्मल स्क्रीनिंग मशीन भी भेंट कर चुकी है. इसके अलावा समिति ने कोरोना योद्धाओं की भूमिका निभाने वाले शिमला के 233 एस.टी.पी. वकर्ज को भी विशेष रूप से सम्मानित किया है. वहीं रक्तदान शिविर में विशेष रूप से शिमला शहर के कोरोना योद्धा एमसी शिमला सफाई सेवक यूनियन के प्रतिनिधि मंडल को आमंत्रित किया था.

May 30th 2020, 12:13 pm

भारत के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में हिन्दुओं के विरुद्ध असहिष्णुता एवं हिंसा बढ़ी – आलोक कुमार

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सेकुलर गिरोह में हिन्दू लिंचिंग की घटनाओं पर चुप्पी क्यों? नई दिल्ली. विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि भारत संविधान और कानून से चलता है. यहाँ के समाज जीवन में हिंसा का कोई स्थान नहीं होना चाहिए. हर प्रकार की हिंसा, चाहे वह कोई भी करे और वह किसी के भी खिलाफ हो, निंदनीय और अक्षम्य है. आलोक कुमार डिजिटल माध्यम से प्रेस वार्ता को संबोधित किया. लेकिन हाल के दिनों में देश के अनेक भागों में कतिपय मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं की मॉब लिंचिंग और अन्य प्रकार की हिंसा की अनेक घटनाएँ सामने आई हैं. जिससे स्पष्ट होता है कि मुस्लिम समाज, विशेषतौर पर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में हिन्दुओं के प्रति असहिष्णु और हिंसक होता जा रहा है. हिन्दुओं की लिंचिंग में हत्या, दुराचार, लूट-पाट, धर्म-स्थानों का अपमान जैसी असंख्य घटनाएँ हो रही है. ऐसी कुछ घटनाओं को केवल उदाहरण के लिए आपके सामने रख रहा हूं, देशभर में अनेक घटनाएं हुई हैं.
  1. असम
असम के कामरूप जिले में अभी 24 मई को सब्जी बेचने वाले सनातन डेका की कार में सवार 5 लोगों ने हत्या कर दी. बताया जाता है कि इसका कारण सब्जी बेचने वाले की साइकिल का कार से टकरा जाना था. इनमें से दो फैजुर हक और युसूफुद्दीन अहमद अभी गिरफ्तार हुए हैं.
  1. बिहार
बिहार के बेगूसराय जिले के नूरपुर में गत 10 जून को रात्रि 1:00 बजे तीन मुस्लिम गुंडे एक दलित के घर में घुसे, पिस्तौल के दम पर एक दलित महिला के साथ दुष्कर्म किया और उसकी बेटी के साथ दुष्कर्म का असफल प्रयास किया. इस परिवार द्वारा इन जिहादियों में से एक अपराधी लड्डू आलम पुत्र फिरोज आलम का नाम बताने पर भी वे अपराधी अभी भी पीड़ितों को धमकाते घूम रहे हैं. वहां का थाना अधिकारी, सुमित कुमार, उल्टे पीड़ित दलितों को धमका रहा है तथा इस बर्बर कांड को सोशल मीडिया के माध्यम से समाज के सामने लाने वालों को कार्यवाही की धमकी दे रहा है. इस परिवार को अपनी जमीन बेचकर गांव खाली करने की धमकी इन जिहादियों द्वारा मिलती रही है. इस दलित परिवार द्वारा लगभग 1 माह पहले इन जिहादियों के विरूद्ध शिकायत करने पर भी  पुलिस तथा प्रशासनिक संरक्षण के कारण कोई कार्यवाही नहीं की गई. इसके परिणाम स्वरूप सामूहिक दुष्कर्म का यह कांड घटित हुआ है. ऐसी ही घटनाएँ एक नहीं अनगिनत हैं. किशनगंज में 15 वर्षीया हिन्दू दलित लड़की के साथ मुसलमानों द्वारा सामूहिक बलात्कार कर हत्या का मामला हो या बेगूसराय अनुमंडल में सरैया गांव में रामायण पढ़ने वाले युवकों को रमजान के महीने में रामायण नहीं पढ़ने देने हेतु राहुल पोद्दार परिवार से मारपीट, नालंदा में हिन्दू व्यवसाइयों द्वारा ओउम् ध्वज लगाने पर मुकदमा हो या सीतामढ़ी, बेगूसराय, पूर्णिया, अररिया, कटिहार तथा पूर्वी चम्पारण इत्यादि अनेक स्थानों पर चल रहे सुनियोजित षड्यंत्र, सभी में इस्लामिक जिहादियों के अत्याचारों और प्रशासन का उनको कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष सहयोग स्पष्ट दिखता है.
  1. पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल में हाल ही में, लॉकडाउन के दौरान मेडिकल इमरजेन्सी होने के बाद भी हुगली जिला, भद्रेसर तहसील के तेलनीपाड़ा गाँव में तीन दिन तक लगातार हिन्दुओं पर हमला किया गया, उनके घर जलाए गए, महिलाओं को निशाना बनाया गया तथा उनके साथ मार पीट भी की गई. लेकिन, पुलिस निष्क्रिय रही. मालदा के हरिशचंद्र ब्लॉक में हिन्दू बस्ती में लूट-पाट की गई तथा मंदिर तोड़ने का भी प्रयास हुआ. बशीरहाट के पास गांव में तो पुलिस द्वारा ही महिलाओं के साथ मार-पीट की गई. हावड़ा में  पुलिस और सशस्त्र दल पर भी मुस्लिम भीड़ द्वारा आक्रमण किया गया. मुर्शिदाबाद जिले में तो हिन्दू बस्तियों को बार बार निशाना बनाया जाता रहा है.
  1. झारखण्ड
सीएए के समर्थन में 23 जनवरी को आयोजित रैली में शामिल होने पर लोहरदगा के नीरज प्रजापति को मुस्लिमों की हिंसा का शिकार होना पड़ा था. इस हिंसा में न केवल नीरज ने अपनी जान गवाई थी. बल्कि उनके परिजनों के जीने का सहारा भी खत्म हो गया था.
  1. कर्नाटक
कर्नाटक में जिहादी तत्वों द्वारा हिन्दुओं की हत्या के अनेक मामले हुए हैं. इनमें से वर्ष 2017-18 में हुए कुछ मामलों में यह हत्याएं शामिल हैं - (1) माडिकेरी में कुट्टप्पा (..2) मुडाबीडेरे में प्रशांत पुजारी (3...) मैसूरू में राजू (4.) कुशलनगर में प्रवीण पुजारी (5) बन्त्वाल में शरद माडिवल (6) सूरतकल में दीपक राव (.7) बेंगलुरु में रुद्रेश और (..8) कुमाटा में परेश मेश्ठा
  1. हरियाणा
हरियाणा के मेवात क्षेत्र में जिहादियों द्वारा हिन्दू उत्पीड़न की अनेकों घटनाएँ सामने आई है. जनरल जी.डी. बक्शी के नेतृत्व में तीन सदस्यों के जांच दल ने अपनी रिपोर्ट दी है. मेवात में हिन्दू उत्पीड़न के कारण हिन्दुओं को अपना घर छोड़ कर जाने के लिए विवश होना पड़ रहा है. अनेकों गाँव पूर्णरूप से हिन्दू विहीन हो चुके हैं और अन्य बहुत से गाँव ऐसे है, जहाँ हिन्दू परिवारों की संख्या 5 से भी कम रह गयी है. एक मामले में चिरौली पुन्हाना में एक वाल्मीकि परिवार के विवाह उत्सव में मुस्लिम युवकों ने ना केवल मारपीट की, बल्कि उनके सोने के गहने भी छीन कर ले गये. जिसकी पुलिस रिपोर्ट पुन्हाना थाने में कराई. इसी प्रकार फेसबुक पर आपत्तिजनक पोस्ट डाली गयी, किन्तु पुलिस रिपोर्ट के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं हुई. उसके विपरीत हिन्दू व्यक्ति के खिलाफ ही उपरोक्त सम्बन्ध में झूठा मुकदमा दर्ज किया गया. गौकशी के मामलों में भी जब पुलिस को सूचना दी जाती है तो पुलिस कोई कार्यवाही नहीं करती है. 28 अप्रैल को पुन्हाना में गौ तस्करों की गोली से रघुवीर नामक एक मजदूर मारा गया. इस मामले में लीपापोती की जा रही है. मजदूर का परिवार भुखमरी के कगार पर है, परन्तु मुआवजे की बात तो दूर, उसकी कोई परवाह नहीं की जा रही है. 500 मकानों वाले गाँव कुलैटा (नगीना) में केवल 10 मकान हिन्दुओं के हैं, हिन्दुओं का घर से निकलना दूभर हो रहा है. बहू-बेटियाँ भी सुरक्षित नहीं हैं. 12 मई को एक हिन्दू बालक की शिखा पर अभद्र टिपण्णी की गयी. विरोध करने पर उसके परिवार की लगभग 200 लोगों ने बुरी तरह पिटाई की.
  1. दिल्ली
हौज़ काजी में पार्किंग के विषय पर हुए व्यक्तिगत झगड़े की प्रतिक्रिया में मुस्लिम गुटों द्वारा हमला करके वहां के मंदिर की मूर्तियाँ तोड़ी गईं और उसकी पवित्रता को नुकसान पहुंचाया गया. मुस्लिम प्रेमिका के परिवार वालों ने दिल्ली के टैगोर गार्डन की एक गली में सबके सामने मौत के घाट उतारा, उस अंकित शर्मा को भुला पाना नामुमकिन हैं. साल 2018 की 01 फरवरी की वो घटना जिसमें दिल्ली सरकार ने खूब राजनीति की रोटियाँ सेकीं थी. उसमें मुस्लिम लड़की ने खुद बताया था कि उसके परिवारवालों ने उसके प्रेमी अंकित को मारा. साल 2017 में दिल्ली में रहकर एयर होस्टेस की ट्रेनिंग ले रही रिया गौतम नाम की लड़की की हत्या की गई. इस वारदात को अंजाम देने वाले का नाम आदिल था. रिया का जुर्म सिर्फ़ ये था कि वे आदिल की पड़ोसी थी और उसकी उससे कई साल से दोस्ती थी. लेकिन एक दिन उसने आदिल से मिलने से मना कर दिया, जिसके बाद आदिल ने उसे एक दिन चाकू से गोद डाला. इस मामले में पुलिस ने आदिल के साथ उसके 2 दोस्तों को भी गिरफ्तार किया था. जिनका नाम जुने सलीम अंसारी और फाजिल राजू अंसारी था. बेटी के साथ छेड़खानी का विरोध करने पर 51 वर्षीय ध्रुव त्यागी को सरेआम सबके सामने मोहम्मद आलम और जहाँगीर खान ने धारदार हथियारों से राष्ट्रीय राजधानी के मोती नगर में मौत के घाट उतारा था. इसके बाद इन हत्यारों ने ध्रुव त्यागी के बेटे पर भी हमला किया. पुलिस  को पड़ताल से पता चला कि उस दिन उन्हें 11 लोगों ने घेर कर मारा. साल 2016 में दिल्ली के विकासपुरी में पंकज नारंग की हत्या की गई. इसमें 9 लोगों को गिरफ्तार किया गया. इनमें 4 नाबालिग थे. उनकी मौत का कारण सिर्फ ये था कि उन्होंने अपने भांजे के साथ क्रिकेट खेलने के दौरान कुछ लोगों को मना किया था कि वे गाड़ी तेज न चलाएँ. जिसके बाद उन लोगों ने पंकज नारंग पर हमला कर दिया. 24 वर्षीय प्रीति माथुर उस लड़की का नाम है, जिसे उसके सिरफिरे आशिक ने निजामुद्दीन इलाके में सरेआम चाकुओं से घोंपकर मार डाला.
  1. उत्तर प्रदेश
16 मई, 2019 को यूपी के गोंडा जिले में इमरान, तुफैल, रमज़ान और निज़ामुद्दीन ने विष्णु गोस्वामी को पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया. विष्णु की गलती बस ये थी कि वे अपने पिता के साथ लौटते हुए सड़क के किनारे लगे नल पर पानी पीने लगा था. बस इसी दौरान इन्होंने विष्णु व उसके पिता से विवाद बढ़ाया और बात खींचने पर उसे पेट्रोल डालकर आग के हवाले कर दिया. हिंदू नेता कमलेश तिवारी की मौत ने साल 2019 में सबको झकझोर दिया. जब जाँच हुई तो इसके पीछे न एक लंबी साजिश का खुलासा हुआ, बल्कि कट्टरपंथियों की उस हकीकत का भी जो अहमदाबाद से लेकर यूपी तक फैली थी. कासगंज जनपद में चंदन गुप्ता की महज इसलिए हत्या कर दी गई थी कि क्योंकि वह 26 जनवरी को तिरंगा फहराने के लिए निकाले जा रहे जुलूस में शामिल थे. वह विहिप और एबीवीपी की तिरंगा यात्रा में भारत माता की जय के नारे लगा रहा था. मुस्लिम बहुल इलाके से निकली तिरंगा यात्रा के दौरान कुछ मुसलमानों ने पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए. तिरंगा यात्रा निकाल रहे लोगों पर पथराव किया गया. मुस्लिम बहुल इलाके में उन पर छत से गोली चला दी गई. घटना में चंदन की मौत हो गई और बाद में पुलिस ने मुख्य आरोपित सलीम को गिरफ्तार किया. साल 2017 में 5 जुलाई को हिना तलरेजा का शव बरामद हुआ. जिसके बाद उनकी हत्या की खबरे सुर्खियों में आई. पड़ताल के बाद मालूम हुआ कि हिना के पति अदनान ने पहले अपनी आँखों के सामने अपने दोस्तों से उसका गैंगरेप करवाया और फिर उसे गोली मारकर हत्या कर दी. बाद में शव को कौशांबी जिले के एक हाइवे पर फेंककर फरार हो गया. अलीगढ़ के टप्पल में हुआ ये हत्याकांड वो घटना है, जिसने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया कि अब इंसानियत समाज में बाकी बची भी है या नहीं. इस घटना के आरोपितों का नाम मोहम्मद जाहिद और मोहम्मद असलम था. जिन्होंने केवल 10 हजार के लिए बच्ची के साथ बेरहमी की हर हद पार की. उन्होंने बच्ची को मारने से पहले 8 घंटे उसे इतना मारा था कि उसकी आँख तक डैमेज हो गई. बाद में उसका शव भी ऐसी जगह फेंका जहाँ उसे कुत्तों ने बुरी तरह नोचा था. आगरा में एक हिंदू दलित नेता अरुण कुमार की लिंचिंग शाहरुख, राजा, इम्तियाज, अबीद और दिलशाद नाम के मुसलमानों ने की.
  1. पंजाब
03 दिसंबर, 2018 को स्याना के चिंगरावठी में हुई हिंसा में सुबोध सिंह की हत्या हुई. उनके अलावा इस घटना में 2 और लोगों को मारा गया. आलोक कुमार ने कहा कि उदाहरणों से स्पष्ट है कि बहुसंख्य हिन्दू समाज हिंसा और मॉब लिंचिंग का बड़ा शिकार होता है और अन्य समुदायों से ज्यादा ही होता है. पर, ये घटनाएँ बड़े अख़बारों और दृश्य मीडिया में बहस का हिस्सा नहीं बन पाती हैं. हिन्दुओं पर हुए अत्याचार समाचार का विषय ही नहीं बनते. तथाकथित धर्मनिरपेक्षों (सेकुलर) का गिरोह आतंकवादी, जिहादी या अन्य किसी अल्पसंख्यक के आहत होने पर जैसे बोलता है, वैसा आक्रोश हिन्दुओं का उत्पीड़न पर वैसा कष्ट नहीं होता. दुर्भाग्य की बात है कि इस गिरोह में वकील, सिविल सोसाइटी कहलाने वाली संस्थाएं, मानवाधिकारों के नाम पर चल रहे टोले शामिल हैं जो आतंकवादी के मारे जाने पर आसमान सिर पर उठा लेते हैं. मीडिया, सड़क और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में भारत को बदनाम करने के लिए तुल जाते हैं. यदि अन्याय से पीड़ित व्यक्ति हिन्दू हो तो कोई कार्यक्रम, बहस या मोमबत्ती यात्रा नहीं होती. विहिप कार्याध्यक्ष ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों से देश में अल्पसंख्यकों को गुमराह करने का सोचा समझा षड्यंत्र चल रहा है. जैसे नागरिकता संशोधन कानून के बारे में यह झूठ फैलाया गया कि इसके लागू होने पर मुसलमानों से तीन पीढ़ीयों के जमीन के कागज मांगे जाएंगे और न होने पर डिटेंशन कैंप में भेज दिया जाएगा. जबकि ये सरासर झूठ था. सुप्रीम कोर्ट द्वारा रामजन्मभूमि के निर्णय के बाद, जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद भी मुसलमानों में दुष्प्रचार किया गया. इसी वातावरण में से हिंसा की यह घटनाएँ जन्म लेती हैं. देश में अलगाव और तनाव का यह वातावरण बनाने वालो की पहचान होनी चाहिए. वह सब लोग इसके लिए जिम्मेवार है जो देशहित के मुद्दों पर भारत के विरुद्ध बोलते हैं और बहुसंख्य हिन्दू समाज के प्रति विद्वेष का निर्माण करते है. विश्व हिन्दू परिषद समाज का आह्वान करती है कि इस तरह की सब घटनाओं के खिलाफ खड़े होकर एक समरस समाज के निर्माण के लिए काम करें. भारत सरकार और राज्यों की सरकारों से यह आह्वान करते है कि वह देश विरोधी इन तत्वों का पता लगाए, उनके खिलाफ कानूनानुसार सख्त कार्रवाई हो.  

May 29th 2020, 2:13 pm

जागृत समाज – सतलुज की दरारों को भरा, रेलवे पुल के नीचे से हटाई 8 फीट तक मिट्टी

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किसानों ने स्वयं वहन किया अभी तक एक करोड़ से अधिक का खर्च

गत वर्ष सतलुज में बाढ़ के कारण आई दरारों को भी भरा

लगभग चार दर्जन से अधिक गांवों को बाढ़ से मिलेगी राहत

संत बलबीर सिंह सींचेवाल के नेतृत्व में जुटे लोग कारसेवा को

सुलतानपुर लोधी (जालंधर)/दीपक शर्मा

संत शक्ति न केवल इस देश का आध्यात्मिक जागरण कर रही, बल्कि नए भारत का मार्ग भी प्रशस्त करने का महाकार्य कर रही है. विश्व के जाने माने पर्यावरणविद् पद्मश्री संत बलबीर सिंह सींचेवाल के नेतृत्व में चल रही कारसेवा के दौरान समाज के लोगों ने एकजुट हो कर सतलुज नदी की 21 में से 12 दरारों को साफ कर दिया है. आशा है कि नदी की जलग्रहण क्षमता बढ़ने व बाधाएं दूर होने से पंजाब के दोआबा इलाके में बाढ़ का प्रकोप कम होगा. बाढ़ आने के बाद लोगों ने जानियां चाहल गांव के पास टूटे बांध को मजबूत किया है.

संत बलबीर सिंह सींचेवाल ने बताया कि सतलुज दरिया की चल रही कारसेवा के दौरान किसानों ने 1 करोड़ 26 लाख से अधिक का डीजल अपनी, किरत कमाईं में से डाल कर सतलुज दरिया में गिद्दड़पिंडी पुल के नीचे से मिट्टी निकाल कर धुस्सी बाँध ऊँचा और मज़बूत कर लिया है. सतलुज दरिया पर बने इस रेलवे पुल के 21 दरारें हैं. जिस में से पानी गुजऱता है. इनमें से अब तक 12 दरारें साफ हो चुकी हैं. इसी तरह बाकी के दरारों में से भी मिट्टी निकाली जानी है, परन्तु पीछे से दरिया में पानी छोड़े जाने कारण कारसेवा का काम काफी प्रभावित हुआ है. लॉकडाउन के दौरान इलाके के लोगों ने सतलुज दरिया के टेढ़ेपन को सीधा कर लिया.

जानियाँ चाहल बाँध पर मास्क बाँध

किसानों ने इस इलाके को बाढ़ की मार से बचाने के लिए संत बलबीर सिंह सींचेवाल की तरफ से किये जा रहे आगामी प्रबंधों की प्रशंसा करते कहा कि अगर इलाकों ने अपना भविष्य बचाना है तो सतलुज दरिया में गिद्दड़पिंडी रेलवे पुल के नीचे से 18 फुट तक मिट्टी निकालने की चल रही कार सेवा में सहयोग करें. इस मौके विधायक हरदेव सिंह लाडी ने किसानों को आश्वासन दिया कि सतलुज दरिया में से मिट्टी निकालने के लिए जो भी पंजाब सरकार से मदद चाहिए होगी तो वह खुद इस संबंध में सीधे तौर पर पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ बातचीत करेंगे.

गत वर्ष आई बाढ़ ने लोहियाँ और सुलतानपुर क्षेत्र के विभिन्न गांवों में भारी तबाही मचाई थी और बड़े स्तर पर किसानों की हाजारों एकड़ धान की फसल बर्बाद हो गई थी.

संत सींचेवाल ने कहा कि बरसात का मौसम शुरू होने से पहले-पहले रेलवे पुल के बाकी रहते दरारें भी साफ किये जाएंगे. जो सवा करोड़ से अधिक का डीजल लगा है, उसके सभी पैसे पंजाब के अनिवासी भारतीयों और दरिया किनारे बसते गाँवों वालों ने एकत्रित किये. दरिया किनारे वाले गाँव दोबारा तबाही न देखें इसलिए पिछले 9 महीनों से लगातार काम जारी है. इस मौके दलजीत सिंह पूर्व सरपंच, कुलवंत सिंह, बाढ़ नियंत्रण समिति के प्रधान कुलविन्दर सिंह, सरबजीत सिंह, जसविन्दर सिंह काला, फुम्मण सिंह, अजीत सिंह, सरूप सिंह, बलबीर सिंह, नेक सिंह, हरमेल सिंह, मेजर सिंह, मंगल सिंह, सुरजीत सिंह शंटी और इलाके के लोग अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

प्रशासन हरसंभव सहयोग करेगा – उपायुक्त शर्मा

पंजाब के दोआबा इलाके में बाढ़ नियंत्रण व पर्यावरण संरक्षण की दिशा में संत बलबीर सिंह सींचेवाल के कामों की सराहना करते हुए जालंधर के उपायुक्त विरेंद्र शर्मा ने कहा कि प्रशासन इस कारसेवा में हरसंभव सहायता करेगा. नदी की दरारें साफ करने से सुल्तानपुर लोधी व कपूरथला के बहुत से गांवों को बाढ़ जैसी समस्या से काफी सीमा तक राहत मिलेगी. बरसात के दिनों में नदी की सफाई न होने के कारण जलभराव की स्थिति पैदा हो जाती है, जिससे बाढ़ के हालात बन जाते हैं. आशा की जानी चाहिए कि अबकी बार यह दृश्य दोहराया नहीं जाएगा.

May 29th 2020, 1:01 pm

दलितों पर मुस्लिम अत्याचारों की जांच करेगा वाल्मीकि समाज, जांच समिति गठित

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नई दिल्ली. श्री बाल्मीकि महासभा हरियाणा ने मेवात में दलित समाज पर लगातार हो रहे हमले, बलात्कार, अपमानजनक घटनाओं व जबरन धर्मपरिवर्तन पर गहरी  चिंता व्यक्त की है. सभा का कहना है कि मेवात को लेकर अखबारों में आ रहे समाचारों की समीक्षा स्वयं सभा के प्रतिनिधि करेंगे. श्री बाल्मीकि महासभा के महासचिव प्राण रत्नाकर ने बताया कि इसके लिए सभा के अध्यक्ष सेवानिवृत न्यायाधीश पवन कुमार से आग्रह किया है कि वे स्वयं मेवात में हो रहे अनुसूचित जाति पर हमलों की पड़ताल करें. क्योंकि अध्यक्ष स्वयं न्यायाधीश हैं. वर्षों तक उन्होंने न्याय के आसन पर बैठकर  न्याय किया है. इसलिये वे कानून की बारीकियों से भलीभांति अवगत हैं. पूर्व न्यायाधीश पवन कुमार स्थानीय अनुसूचित जाति के प्रताड़ित लोग, सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि व अन्य प्रमुख लोगों से बातचीत करके दूध का दूध और पानी का पानी कर सकते है. उनके अनुसार मेवात की इन घटनाओं की पड़ताल करने के लिए हरियाणा आर्य प्रतिनिधि सभा के उपाध्यक्ष कनहैया लाल आर्य व अखिल भारतीय बाल्मीकि महापंचायत के प्रदेश अध्यक्ष सुल्तान बाल्मीकि को शामिल किया गया है. मेवात के बिछोर, उलेटा, घागस पुन्हाना, नागिनां, लखनाना आदि में हुई उत्पीड़न की घटनाओं के साथ जबरन धर्मपरिवर्तन, पलायन की घटनाएं विचलित करने वाली हैं. ये घटनाएं अनुसूचित समाज को आंदोलन करने को मजबूर कर रहे हैं. इसलिये कोई भी ठोस निर्णय लेने से पहले पूर्ण पड़ताल कर लेनी चाहिए. इसलिए ही सेवानिवृत न्यायाधीश से मेवात में जाकर रिपोर्ट तैयार करने का आग्रह किया गया है. ताकि सही तथ्यों के साथ होने वाली रिपोर्ट को भारत सरकार के अनुसूचित आयोग व हरियाणा सरकार को सौंपकर पीड़ितों को न्याय दिलाया जा सके व भविष्य में अनुसूचित जाति के लोगों के स्वाभिमान के साथ खिलवाड़ न हो सके.

गुरुग्राम निवासी व अखिल भारतीय बाल्मीकि पंचायत के हरियाणा के अध्यक्ष सुल्तान बाल्मीकि ने भी कहा कि मेवात की घटनाएं दुखद हैं. इनकी जांच रिपोर्ट तैयार होनी ही चाहिए. इसके लिए वे न्यायधीश पवन कुमार जी का हर तरह से सहयोग करने के लिये तैयार हैं. वे स्वयं भी शीघ्र ही मेवात जाकर वहां के प्रताड़ित बंधुओं से मिलेंगे.

May 29th 2020, 1:01 pm

तिरुपति बालाजी मन्दिर की अचल संपत्तियों की नहीं होगी नीलामी

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आंध्र प्रदेश की जगनमोहन रेड्डी सरकार ने दबाव में वापस लिया निर्णय

नई दिल्ली. तिरुपति बालाजी का दिव्य व भव्य मंदिर आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के तिरुपति में तिरुमाला पर्वत श्रृंखला पर स्थित है. भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर भारत के प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में से एक है. श्रद्धालु तिरुपति बालाजी को विभिन्न नामों से पुकारते हैं. कोई उन्हें वेंकटेश्वर कहता है तो कोई श्रीनिवास. महिला श्रद्धालु उन्हें गोविंद अथवा गोविंदा नाम से पुकारती हैं. तिरुपति बालाजी मंदिर के आसपास बनी पहाड़ियां शेषनाग के सात फनों के आधार पर बनी होने से सप्तगिरि कही जाती है. भगवान वेंकटेश्वर का यह मंदिर सप्तगिरि की सातवीं पहाड़ी पर है. यह वेंकटाद्रि के नाम से प्रसिद्ध है. यहां वर्ष भर सभी महीनों और हर दिन देश –विदेश से लाखों की संख्या में भक्तजन का आशीर्वाद ग्रहण करने आते हैं. भगवान् वेंकटेश्वर के मंदिर तिरुपति बालाजी से जुड़ी कई मान्यताएं और विश्वास हैं जो इसकी प्रसिद्धि और सम्पन्नता का प्रमाण हैं….

सभी मंदिरों की तुलना में तिरुपति बालाजी के मंदिर को सबसे समृद्ध व संपन्न मंदिर माना जाता है. वैश्विक कोरोना महामारी के लॉकडाउन काल में यहाँ जहाँ सेवादारों के कार्यकाल को न बढ़ाने का मामला चर्चा में था, उससे ज्यादा चिंताजनक मुद्दा यह था कि फरवरी के अंत में जगन्मोहन रेड्डी सरकार ने करोड़ों हिन्दुओं की आस्था से जुड़े इस मन्दिर की 23 अचल संपत्तियों को नीलाम करने का तुगलकी फरमान जारी कर दिया था, जिसके कारण न केवल आंध्र प्रदेश व दक्षिण के राज्यों में ही बल्कि पूरे भारत में तीव्र रोष व्याप्त था..

ईसाई विचार के पोषक राज्य के मुख्यमंत्री जगनमोहन  रेड्डी और तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) बोर्ड के चेयरमैन पद पर बैठे उनके ससुर वाईवी सुब्बा रेड्डी पर हिन्दू हितों को आघात पहुंचाने के आरोप लगाते हुए हिन्दू समाज आक्रोशित था..

असल में तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) ने अपनी 50 अचल संपत्तियों की नीलामी का पूरा खाका तैयार कर लिया था. उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में स्थित इन संपत्तियों को अलाभकारी बताते हुए इनकी नीलामी का फैसला किया गया था. वेंकटेश्वर  मंदिर का संचालन करने वाले इस बोर्ड की तिरुमला में वीडियो कांफ्रेंसिंग से पांच घंटे चली बैठक में यह निर्णय लिया गया था. लेकिन विवाद के राष्ट्रीय स्तर पर पहुँच जाने से हिन्दू समाज के संभावित आक्रोश और दबाव के चलते आंध्र प्रदेश की जगनमोहन रेड्डी सरकार को यह तुगलकी आदेश वापस लेना पड़ा है. राज्य सरकार ने इन संपत्तियों की नीलामी पर रोक संबंधी एक आदेश भी जारी किया है..

टीटीडी बोर्ड के चेयरमैन वाईवी सुब्बा रेड्डी ने कहा, ‘मीडिया के एक वर्ग और कुछ निहित स्वार्थी लोगों की तरफ से 50 अचल संपत्तियों की नीलामी के संबंध में पैदा किए गए विवाद को खत्म कर दिया गया है.’ आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस जगनमोहन रेड्डी की सलाह पर बोर्ड ने तिरुपति में करोड़ों की लागत से बच्चों के लिए मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल खोलने का फैसला किया है.

तिरुपति बालाजी मन्दिर की तरह ही न केवल दक्षिण भारत बल्कि उत्तर भारत में भी मन्दिरों के अधिग्रहण और उनमें सरकारी हस्तक्षेप के प्रयास नए नहीं हैं, लेकिन संकटकाल और सुख दुःख में सबके काम आने वाले इन मन्दिरों को हिन्दू समाज न किसी की निजी संपत्ति रूप में स्वीकारेगा और न ही सरकारी नियंत्रण में ही इनको करने की स्वीकृति देगा ..

मंदिर में सीमित श्रद्धालुओं को मिलेगी दर्शन की अनुमति

टीटीडी अधिकारियों ने कहा कि लॉकडाउन के बाद दर्शन के लिए सीमित संख्या में श्रद्धालुओं को अनुमति दी जाएगी. अधिकारी ने कहा कि हम सीमित संख्या में श्रद्धालुओं को दर्शन के लिए अनुमति देंगे. आंध्र प्रदेश राज्य पथ परिवहन निगम के अधिकारी तिरुपति से तिरुमला तक बसें चलाने की व्यवस्था करेंगे, सोशल डिस्टेंसिंग के साथ हर यात्री को मास्क पहनना जरूरी होगा..

May 29th 2020, 1:01 pm

विनायक सावरकर : स्वर्णिम अध्याय का नाम

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डॉ. पवन सिंह मलिक

“मैं तुम्हारे दर्शन करने आया हूँ मदन, मुझे तुम पर गर्व है. सावरकर तुम्हें मेरी आँखों में डर की परछाई तो नहीं दिखाई दे रही, बिल्कुल नहीं मुझे तुम्हारे चेहरे पर योगेश्वर कृष्ण का तेज दिखाई दे रहा है, तुमने गीता के स्थितप्रज्ञ को साकार कर दिया है मदन”. न जाने ऐसे कितने ही जीवन हैं जो सावरकर से प्रेरणा प्राप्त कर मातृभूमि के लिए हंसते हंसते बलिदान हो गए. महापुरुषों का स्मरण व सदैव उनके गुणों को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ते रहना, यही भारत की श्रेष्ठ परंपरा है. ऐसे ही अकल्पनीय व अनुकरणीय जीवन को याद करने का दिन है सावरकर जयंती.

यहां दीप नहीं जीवन जलते है 

विनायक दामोदर सावरकर केवल नाम नहीं, एक प्रेरणा पुंज है जो आज भी देशभक्ति के पथ पर चलने वाले मतवालों के लिए जितने प्रासंगिक हैं, उतने ही  प्रेरणादायी भी. वीर सावरकर अदम्य साहस, इस मातृभूमि के प्रति निश्छल प्रेम करने वाले व स्वाधीनता के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर करने वाला अविस्मरणीय नाम है. इंग्लैंड में भारतीय स्वाधीनता हेतु अथक प्रवास, बंदी होने पर भी अथाह समुद्र में छलांग लगाने का अनोखा साहस, कोल्हू में बैल की भांति जोते जाने पर भी प्रसन्नता, देश के लिए परिवार की भी बाजी लगा देना, पल -प्रतिपल देश की स्वाधीनता का चिंतन व  मनन, अपनी लेखनी के माध्यम से आमजन में देशभक्ति के प्राण का संचार करना, ऐसा अदभुत व्यक्तित्व था विनायक सावरकर का. सावरकर ने अपने नजरबंदी समय में अंग्रेजी व मराठी में अनेक मौलिक ग्रंथों की रचना की, जिसमें मैजिनी, 1857  स्वातंत्र्य समर, मेरी कारावास कहानी, हिंदुत्व आदि प्रमुख हैं.

सर्वत्र प्रथम कीर्तिमान रचने वाले सावरकर

सावरकर दुनिया के अकेले स्वातंत्र्य योद्धा थे, जिन्हें दो-दो आजीवन कारावास की सजा मिली. सजा को पूरा किया और फिर से राष्ट्र जीवन में सक्रिय हो गए. वे विश्व के ऐसे पहले लेखक थे, जिनकी कृति 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को दो-दो देशों ने प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया. सावरकर पहले ऐसे भारतीय राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने सर्वप्रथम विदेशी वस्त्रों की होली जलाई. वे पहले स्नातक थे, जिनकी स्नातक की उपाधि को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण अंग्रेज सरकार ने वापस ले लिया. वीर सावरकर पहले ऐसे भारतीय विद्यार्थी थे, जिन्होंने इंग्लैंड के राजा के प्रति वफादारी की शपथ लेने से मना कर दिया. फलस्वरूप उन्हें वकालत करने से रोक दिया गया. वीर सावरकर ने राष्ट्र ध्वज तिरंगे के बीच में धर्म चक्र लगाने का सुझाव सर्वप्रथम दिया था, जिसे तात्कालिक  राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने माना. उन्होंने ही सबसे पहले पूर्ण स्वतंत्रता को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का लक्ष्य घोषित किया. वे ऐसे प्रथम राजनैतिक बंदी थे, जिन्हें विदेशी (फ्रांस) भूमि पर बंदी बनाने के कारण हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मामला पहुँचा. वे पहले क्रांतिकारी थे, जिन्होंने राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का चिंतन किया तथा बंदी जीवन समाप्त होते ही जिन्होंने अस्पृश्यता आदि कुरीतियों के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया. दुनिया के वे ऐसे पहले कवि थे, जिन्होंने अंदमान के एकांत कारावास में जेल की दीवारों पर कील और कोयले से कविताएँ लिखीं और फिर उन्हें याद किया. इस प्रकार याद की हुई दस हजार पंक्तियों को उन्होंने जेल से छूटने के बाद पुन: लिखा.

काल कोठरी के ग्यारह साल व सावरकर

क्या मैं अब अपनी प्यारी मातृभूमि के पुनः दर्शन कर सकूंगा ? 04 जुलाई 1911 को अंदमान की सेलुलर जेल में पहुँचने से पहले सावरकर के मन की व्यथा शायद कुछ ऐसी ही रही होगी. अंदमान की उस काल कोठरी में सावरकर को न जाने कितनी ही शारीरिक यातनाएं सहनी पड़ी होंगी, इसको  शब्दों में बता पाना असंभव है. अनेक वर्षो तक रस्सी कूटने, कोल्हू में बैल की तरह जुत कर तेल निकालना, हाथों में हथकड़ियां पहने हुए घंटों टंगे रहना, महीनों एकांत काल-कोठरी में रहना और भी न जाने किस -किस प्रकार के असहनीय कष्ट झेलने पड़े होंगे सावरकर को. लेकिन ये शारीरिक कष्ट भी कभी उस अदम्य साहस के पर्याय बन चुके विनायक सावरकर को प्रभावित न कर सके. कारावास में रहते हुए भी सावरकर सदा सक्रिय बने रहे. कभी वो राजबंदियों के विषय में निरंतर आंदोलन करते, कभी पत्र द्वारा अपने भाई को आंदोलन की प्रेरणा देते, कभी अपनी सजाएँ समाप्त कर स्वदेश लौटने वाले क्रांतिवीरों को अपनी कविताएं व संदेश कंठस्थ करवाते. इस प्रकार सावरकर सदैव अपने कर्तव्यपथ पर अग्रसर दिखाई दिए. उनकी अनेक कविताएं व लेख अंदमान की उन दीवारों को लांघ कर 600 मील की दूरी पार करके भारत पहुँचते रहे और समाचार पत्रों द्वारा जनता में देशभक्ति की अलख जगाते  रहे.

समरसता व हिंदुत्व के पुरोधा

सन् 1921 में सावरकर को अंदमान से कलकत्ता लाना पड़ा. वहां उन्हें रत्नागिरी जेल भेज दिया गया. 1924 में सावरकर को जेल से मुक्त कर रत्नागिरी में ही स्थानबद्ध कर दिया गया. उन्हें केवल रत्नागिरी में ही घूमने -फिरने की स्वतंत्रता थी. इसी समय  में सावरकर ने हिंदू संगठन व समरसता का कार्य प्रारम्भ कर दिया. महाराष्ट्र के इस प्रदेश में छुआछूत को लेकर घूम – घूमकर विभिन्न स्थानों पर व्याख्यान देकर धार्मिक, सामाजिक तथा राजनैतिक दृष्टि से छुआछूत को हटाने की आवश्यकता बतलाई. सावरकर के प्रेरणादायी व्याख्यान व तर्कपूर्ण दलीलों से लोग इस आंदोलन में उनके साथ हो लिए.  दलितों में अपने को हीन समझने की भावना धीरे-धीरे जाती रही और वो भी इस समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा है, ऐसा गर्व का भाव जागृत होना शुरू हो गया. सावरकर की प्रेरणा से भागोजी नामक एक व्यक्ति ने ढाई लाख रूपए व्यय करके रत्नागिरी में ‘श्री पतित पावन मंदिर’ का निर्माण करवाया. दूसरी और सावरकर ने ईसाई पादरियों और मुसलमानों द्वारा भोले भाले हिंदुओं को बहकाकर किये जा रहे धर्मांतरण के विरोध में शुद्धि आंदोलन प्रारम्भ कर दिया. रत्नागिरी में उन्होंने लगभग 350 धर्म – भ्रष्ट  हिंदुओं को पुनः हिंदू धर्म में दीक्षित किया.

युवाओं के सावरकर

सावरकर का जीवन आज भी युवाओं में प्रेरणा भर देता है. जिसे सुनकर प्रत्येक देशभक्त युवा के रोंगटे खड़े हो जाते है. विनायक की वाणी में प्रेरक ऊर्जा थी. उसमें दूसरों का जीवन बदलने की शक्ति थी. सावरकर से शिक्षा- दीक्षा पाकर अनेकों युवा व्यायामशाला जाने लगे,  पुस्तकें पढ़ने लगे. विनायक के विचारों से प्रभावित असंख्य युवाओं के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आया. जो भोग – विलासी थे, वे त्यागी बन गए. जो उदास तथा आलसी थे, वे उद्यमी हो  गए. जो संकुचित और स्वार्थी थे, वो परोपकारी हो गए. जो केवल अपने परिवार में डूबे हुए थे, वे देश-धर्म के संबंध में विचार करने लगे. इस प्रकार हम कह सकते है कि युवाओं के लिए सावरकर वो पारस पत्थर थे, जो भी उनके संपर्क में आया वो ही इस मातृभूमि की सेवा में लग गया.

सावरकर स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए व उसके बाद भी उसकी रक्षा हेतु प्रयास करते रहे. इसलिए उनका नाम ‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ अमर हुआ. जयंती पर उस हुतात्मा को शत शत नमन ….

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्राध्यापक है)

May 29th 2020, 1:01 pm

अलग झंडे की मांग और टीपू जयंती मनाने वालों को वीर सावरकर के नाम से चिढ़ क्यों?

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नई दिल्ली. जब देशभर में भारतीय स्वातंत्र्य समर के महायोद्धा अमर बलिदानी वीर विनायक दामोदर सावरकर की जयंती मनाई जा रही है. इसी शुभ अवसर पर कर्नाटक की येदियुरप्पा सरकार ने राजधानी बेंगलूरू के येलाहांका में स्थित एक नवनिर्मित फ्लाईओवर का नामकरण स्वतंत्रता सेनानी एवं हिंदुत्व विचारक वीर सावरकर के नाम पर करने का निश्चय किया था. बेशक कर्नाटक राज्य के लिए अलग झंडे की वकालत और टीपू की जयंती मनाने के लिए आकुल व्याकुल रही कांग्रेस पार्टी व कुछ महीने पहले ही राज्य की सत्ता से वंचित उसकी गठबन्धन सहयोगी जेडीएस को यह नागवार गुजर रहा है. दोनों विपक्षी दलों ने राज्य सरकार के इस कदम का विरोध किया है और इसे राज्य के स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान बताया है.

लगभग 34 करोड़ रुपये की लागत से तैयार चार सौ मीटर लंबे इस फ्लाईओवर का उद्घाटन 28 मई को मुख्यमंत्री बीएस येदुयरप्पा ने करना था, किन्तु बढ़ते कोरोना मामलों और सोशल डिस्टेंसिंग के पालन की सख्ती के चलते राज्य सरकार को लोकार्पण कार्यक्रम आगे बढ़ाना पड़ा है. कर्नाटक सरकार ने स्पष्ट किया कि फ्लाईओवर का लोकार्पण समारोह कोरोना के कारण आगे बढ़ाया गया है, विपक्ष की घटिया सोच सरकार के इरादे को नहीं बदल सकती. पूर्व सीएम व कांग्रेस नेता सीद्धारमैया ने मुख्यमंत्री येदिुयरप्पा से फ्लाईओवर का नामकरण राज्य के किसी स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर करने का आग्रह किया..जेडीएस नेता व पूर्व सीएम एच.डी. कुमारस्वामी ने कहा कि यह निर्णय उन लोगों का अपमान है, जिन्होंने राज्य की समृद्धि के लिए संघर्ष किया और ऐसा करना सरकार का अधिकार नहीं है.

असल में येलाहांका में फ्लाईओवर का नामकरण वीर सावरकर के नाम पर करने का निर्णय 29 फरवरी को वृहद बेंगलुरु महानगर पालिका परिषद की बैठक में किया गया था.

येलाहांका के विधायक एवं मुख्यमंत्री के राजनीतिक सचिव एस.आर. विश्वनाथ ने कहा कि वीर सावरकर जैसे स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर फ्लाईओवर का नामकरण करने में कुछ भी गलत नहीं है. जिन्हें न केवल कालेपानी की सजा हुई थी, बल्कि देश के लिए अंडमान में कालापानी की सजा झेलने के साथ अंग्रेजों की यातनाएं भी झेलीं. विधायक विश्वनाथ ने कहा कि बीबीएमपी परिषद ने नियमों के अनुसार कानूनी रूप से इसे मंजूरी दी है और सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं और उसके बाद ही नामकरण की योजना बनाई गई है. यह देश का दुर्भाग्य रहा कि कांग्रेस ने वास्तविक इतिहास को विकृत कर देश की छवि और इतिहास पुरुषों को विकृत करने का योजनाबद्ध प्रयास किया. लगातार सत्ता को कब्जाए रखकर अपने दल और विशेषकर संचालक नेताओं और परिवारों की गाथा लिखने की शर्त पर इतिहास लेखन और शिक्षा नीति का सारा ठेका वामपंथियों को दे दिया. आज सत्ता से बाहर होने पर कांग्रेस व सारा विपक्ष केवल राज्यों में ही नहीं देशभर में एकजुट होकर नकारात्मक विमर्श व दुष्प्रचार को हवा दे रहे हैं. इसी प्रकार घृणा व द्वेष की आग लगाई जा रही है.

May 29th 2020, 1:01 pm

पड़ोसी पर कीचड़ उछालने से पहले अपने  गिरेवां में झांके पाकिस्तान – विहिप

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नई दिल्ली. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए विहिप के केन्द्रीय महामंत्री मिलिंद परांडे ने कहा कि पड़ोसियों पर कीचड़ उछालने से पूर्व ना-पाक-पाकिस्तान को वहां के धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति मुस्लिम कट्टरपंथियों व सरकार द्वारा प्रायोजित निर्मम अत्याचारों को रोकना चाहिए. पाकिस्तान के हिन्दू, सिख, बौद्ध, ईसाई इत्यादि धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति 70 वर्षों से अनवरत रूप से किए जाने वाले धर्मांतरण, अमानवीय अत्याचार व हत्याएं जग जाहिर हैं. ऐसे लोगों को भारत के अल्पसंख्यकों के बारे में बोलने का कोई भी नैतिक अधिकार नहीं है.

उन्होंने कहा कि जो देश इस्लामिक आतंकवादियों को प्रशिक्षित कर अन्य देशों में निर्यात करता है, विश्व भर के लाखों निहत्थे व निर्दोष लोगों की हत्या का पाप जिसके माथे पर है, उसके द्वारा भारत पर क्षेत्रीय अस्थिरता फैलाने का आरोप बेहद हास्यास्पद है.

श्री राम जन्मभूमि सम्पूर्ण विश्व के हिन्दुओं के लिए श्रद्धा का केंद्र है. इसे विदेशी आक्रमणकारी बाबर के सेनापति द्वारा तोड़ा गया. हिन्दू समाज ने 1992 की गीता जयंती के दिन भारत पर एक अपमान व कलंक के प्रतीक उस ढाँचे को तोड़कर एक छोटे से मंदिर का निर्माण किया. यहाँ के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने वह पवित्र भूमि भगवान श्रीराम के मन्दिर निर्माण हेतु हिन्दू समाज को सौंप दी है. उसके बारे में कुछ भी कहने का अधिकार पापी-पाकिस्तान को नहीं है.

हमारे यहाँ नागरिकता संशोधन अधिनियम पर पाकिस्तान की चिंता समझ आती है. क्योंकि यह कानून भारत के मुसमानों से सम्बन्धित नहीं होकर पाकिस्तान बांग्लादेश व अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों को भारत में शरण देने से सम्बन्धित है तथा उनके निर्मम अत्याचारों की कलई खोलता है. किन्तु यदि उसे इस पर शर्म आती है तो क्यों नहीं अपने अल्पसंख्यकों की रक्षा करता? कोरोना संकट के इस काल में भी उनके घरों को तोड़ा जा रहा है, भूखे मरने को मजबूर किया जा रहा है, धर्मांतरण की शर्त पर ब्लैकमेल करते हुए ही भोजन बांटने का अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है, बहू-बेटियों को उठाया जा रहा है तथा धर्म-स्थलों को ध्वस्त किया जा रहा है?

विहिप महामंत्री ने कहा कि हमें इस बात का गर्व है कि भारत ने अपने हिंदुत्व यानि लोक कल्याणकारी मार्ग पर चलते हुए ही वैश्विक संकट के इस काल में भी विश्व भर के अनेक देशों की मदद की है. यहाँ से भेजे गए धन, अनाज, दवाइयों, चिकित्सकों व चिकित्सकीय उपकरणों इत्यादि की मदद की सम्पूर्ण विश्व ने जहां भूरि-भूरि प्रशंसा की है. वहीँ, पाकिस्तान मदद के वैश्विक प्रयासों में अडंगे डालने में ही व्यस्त रहा.

May 28th 2020, 1:15 pm

विहिप ने वेब जगत के लिए राष्ट्रीय नियामक बोर्ड बनाने की मांग की

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केन्द्रीय सूचना व प्रसारण मंत्री को भेजा पत्र

नई दिल्ली. वेब-जगत(www) के बढ़ते दुष्प्रभाव से बचने हेतु विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने उसे समाज व देश हित में नियंत्रित करने के लिए एक वेब-जगत नियामक बोर्ड के गठन की मांग की. विहिप के केन्द्रीय महामंत्री ने इस सम्बन्ध में एक पत्र आज केन्द्रीय सूचना व प्रसारण मंत्री श्री प्रकाश जावडेकर को भेजा है.

पत्र में कहा गया है कि आज का युग इंटरनेट का युग है तथा विश्व की सभी अच्छी-बुरी जानकारी व हर प्रकार का मनोरंजन आज वेब जगत में सरलता से उपलब्ध है. जिसे कोई भी व्यक्ति जगत के किसी भी कोने में बैठ कर आसानी से उपयोग कर सकता है. यह वेब जगत जहां ज्ञान, सूचनाओं, जानकारियों, उपलब्धियों तथा समाचारों का सुगम व त्वरित उपलब्ध माध्यम है, वहीं इसमें अनेक विकृतियाँ भी हैं.

वेब-जगत के दुष्प्रभावों का जिक्र करते हुए पत्र में कहा गया है कि इस के माध्यम से संसार के अनेक अधर्मों, पापों, अपराधों, दुष्कर्मो, व्यसनों, दुराचारों के साथ आतंकवाद, साम्प्रदायिकता, विद्वेष तथा देश-द्रोह तक को प्रोत्साहन मिलता है तथा धार्मिक सामाजिक व राष्ट्रीय मानबिन्दुओं का उपहास उड़ाया जाता है. नन्हे-मुन्ने बच्चे, किशोर व युवा इसके आसानी से बुरी तरह शिकार बनते देखे गए हैं. इसके कारण ही अनेक लोग अपने धर्म पथ से विमुख हो कर देश, धर्म, समाज व न्याय व्यवस्था के ही नहीं बल्कि स्वयं के भी जानी दुश्मन बनते देखे गए हैं.

वेब जगत में असंख्य वेब साइट्स, वीडियो, वेब सिरीजें, एप्लीकेशन, टिक-टॉक इत्यादि 24X7 चलते रहते हैं. इन सभी के गुण-दोष दोनों ही हैं. किन्तु इनकी समालोचना या सार-सम्भाल करने वाला कोई नहीं हैं. ये पूरी तरह से अनियंत्रित निरंकुश अव्यवस्था का हिस्सा है. जिस प्रकार फिल्मों को प्रमाणित करने के लिए फिल्म सर्टिफिकेशन बोर्ड है तथा टीवी सीरियलों को भी उनके प्रसारण पूर्व बारीकी से जांचा-परखा जाता है. इस प्रकार की कोई व्यवस्था इस सम्पूर्ण वेब जगत पर लागू नहीं होती.

विश्व हिन्दू परिषद ने मांग की है कि वेब जगत के दोषों के निवारण तथा उसे समस्त भारत-वासियों के लिए सर्वथा उपयोगी बनाने हेतु भारत से अपलोड होने वाले या भारत में दिखाए जाने वाली समस्त वेब जगत की सामग्री की जांच व प्रमाणन की उचित व्यवस्था हो. इसके लिए एक वेब जगत नियामक बोर्ड बनाया जाए, जिससे इसके दोषों को दूर कर सभी के लिए उपयोगी बनाया जा सके.

May 28th 2020, 1:15 pm

संवेदनशील समाज – युवा अपनी पॉकेटमनी खर्च कर वितरित कर रहे राशन

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झारखंड. चीनी वायरस के खिलाफ जंग में समाज का हर वर्ग सहायता के लिए खड़ा है. कोई राशन सामग्री वितरण कर रहा है, कोई खिचड़ी बांट रहा है तो कोई मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री राहत कोष में अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर रहा है. शहर से लेकर गांव तक भूखों का पेट भरने का काम हो रहा है. जिसका जैसा सामर्थ्य वैसा काम. फिर चाहे गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी हो, सर्वधर्म सामूहिक विवाह समिति, हयूमैनिटी ग्रुप धनबाद, नमन इंडिया, संसार परिवार, रोटी बैंक यूथ क्लब या फिर गोविंदपुर यूथ ग्रुप. ऐसे न जाने कितने हैं जो सेवा की मिसाल पेश कर रहे हैं. सभी हर दिन अपने सामर्थ्य के अनुसार 200 से 1500 जरूरतमंदों को भोजन करा रहे हैं.

गुरु का सांझा चूल्हा रोजाना 1500 लोगों का भर रहा पेट

बैंक मोड़ स्थित बड़ा गुरुद्वारा में सांझा चूल्हा के माध्यम से प्रबंधक कमेटी की ओर से प्रतिदिन 1500 जरूरतमंदों, बेसहारा और मलीन बस्तियों में रहने वालों के लिए लंगर (भोजन) तैयार कर बांटा जा रहा है. ऐसा करते हुए 55 दिन हो गए हैं. प्रबंधक कमेटी के वरीय सदस्य राजिंदर सिंह चहल, प्रधान तेजपाल सिंह और सतपाल सिंह ब्रोका की अगुवाई में सिक्ख समाज, महिला संगत प्रतिदिन भोजन तैयार कर रहे हैं. यह भोजन जरूरतमंदों तक पहुंचाने का जिम्मा कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं को सौंपा गया है. इसमें रोटी बैंक यूथ क्लब, साथी फाउंडेशन और फाल्कन वेलफेयर सोसायटी प्रमुख रूप से शामिल है. लॉकडाउन के बाद से ही गुरुद्वारा साहिब के सांझा चूल्हा से लंगर बनाकर बांटा जा रहा है.

गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान तेजपाल सिंह ने बताया कि फुटपाथ पर रैन बसेरा करने वाले, दिहाड़ी मजदूर, गरीब तथा असहाय लोगों लिए दोपहर एवं रात का भोजन तैयार किया जा रहा है. किसी की जाति या धर्म पूछे बिना निस्वार्थ भाव से भोजन पहुंचाया जा रहा है. लंगर का सारा खर्च बड़ा गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी उठा रही है. जब तक लॉकडाउन की स्थिति रहेगी, तब तक यहां से भोजन जरूरतमंदों तक पहुंचाया जाता रहेगा. गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने हाल ही में चार-पांच ऐसे परिवारों के लगभग 400 लोगों को भोजन कराया, जो यहां अंतिम संस्कार में पहुंचे थे और लॉकडाउन की वजह से अपने घर नहीं जा सके. इसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों परिवार शामिल थे.

पॉकेटमनी से 50 युवा दस गांव में दे रहे हर दिन राशन

शहर से थोड़ा हटकर बरवाअड्डा इलाके के 50 युवाओं का समूह दस गांवों के दो हजार लोगों को लॉकडाउन की तिथि से प्रतिदिन राशन दे रहा है. अपने जेब खर्च की रकम से ये राशन मुहैया करा रहे हैं. इन युवाओं ने किसी से चंदा नहीं मांगा है. इंसानियत की राह पर चलकर लोगों की मदद इनका मकसद है. ये रोजाना 100 से लेकर एक हजार रुपये तक प्रति व्यक्ति आपस में एकत्रित कर राशन खरीदते हैं. सुबह से शाम तक जरूरतमंदों को पहुंचाते हैं. इसके अलावा कुछ पंचायतों में 200 गरीबों को भोजन भी कराते हैं. कभी खिचड़ी तो कभी पूड़ी सब्जी. अपने समूह को युवाओं ने नाम दिया है ‘ह्यूमैनिटी ग्रुप धनबाद. ऐसा करते हुए 52 दिन हो गए हैं. समूह के संस्थापक आकर्ष गुप्ता और राजकुमार मंडल ने बताया कि कोरोना वायरस से हो रही जंग में हमने भी अपनी भूमिका तय की है. प्रतिदिन ढूढ़वाडीह, जियलगढ़ा, कोरियाटांड़ बिराजपुर, संभारी मुस्लिम टोला, नवाडीह, पंडुकी, कुलबेड़ा, कोरियाटांड़ एवं शिमलाटांड़ गांव में राशन बांट रहे हैं.

सर्वधर्म सामूहिक विवाह समिति दिहाड़ी मजदूरों का भर रही पेट

सर्वधर्म सामूहिक विवाह समिति लगातार जरूरतमंदों को भोजन करवा रही है. समिति बेलगड़िय़ा बस्ती, चांदमारी, नई दिल्ली, धनसार आदि बस्ती में लगभग 250 दिहाड़ी मजदूरों का पेट भर रही है. समिति के अध्यक्ष प्रदीप कुमार सिंह ने बताया कि कुछ जगहों पर दिहाड़ी मजदूर काम करते समय लॉकडाउन में यहीं रुक गए. इनके भोजन की व्यवस्था हमारी जिम्मेवारी है.

संसार परिवार की कैंटीन में हर दिन पक रहा भोजन

संसार परिवार की कैंटीन लॉकडाउन के समय से ही हर दिन लगभग 500 जरूरतमंदों को भोजन करा रही है. सिर्फ शहर ही नहीं बल्कि दूर-दराज के इलाकों में भी भोजन पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही है. टुंडी, गोविंदपुर, बरवाअड्डा आदि इलाकों में संसार परिवार लगातार भोजन के साथ सूखा राशन दे रहा है.

May 28th 2020, 12:15 pm

भविष्यद्रष्टा सावरकर

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-  प्रशांत पोळ निर्भयता, निडरता, निर्भीकता. इन सब का पर्यायवाची शब्द हैं – वीर सावरकर. इस सामान्य कद – काठी के व्यक्ति में असामान्य और अद्भुत धैर्य था. अपने 83 वर्ष के जीवन में वे किसी से नहीं डरे. २२ जून, १८९७ को, जब चाफेकर बंधुओं ने अत्याचारी अंग्रेज़ अफसर रॅंड को गोली से उड़ाया, तब विनायक दामोदर सावरकर की आयु थी मात्र १४ वर्ष. किन्तु इस घटना ने उनको इतना ज्यादा प्रेरित किया, कि उन्होने माँ भवानी के सामने देश को, सशस्त्र क्रांति के द्वारा स्वतंत्र करने की शपथ ली. १९०५ में, जब पूरे देश में अंग्रेजों के विरोध में वातावरण बन रहा था, जब ‘बंग – भंग आंदोलन’ जोश के साथ प्रारंभ हुआ था, जब अंग्रेजों की दमनकारी क्रियाएं भी उसी ताकत के साथ राष्ट्रवाद को कुचलने में लगी थी, तब, दशहरे के दिन, अर्थात शनिवार, ७ अक्तूबर १९०५ को, वीर सावरकर ने पुणे में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई. विदेशी वस्तुओं के विरोध में भारत में यह पहला, बड़ा आंदोलन था. लेकिन निडर सावरकर जी ने, अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए एक बड़ा कदम उठाया. सीधे शेर की मांद में घुसकर उसे ललकारने का..! राष्ट्रभक्त श्यामजी कृष्ण वर्मा से छात्रवृत्ति लेकर, सावरकर १९०६ में लंदन पहुंचे. उनकी बुद्धिमत्ता के कारण उन्हें इंग्लैंड के प्रतिष्ठित ‘सिटी लॉं स्कूल’ में प्रवेश मिल गया, जहां वे बैरिस्टरी की पढ़ाई करने लगे. किन्तु शेर की गुफा में घुसकर, मात्र बैरिस्टर की उपाधि लेना, इतना संकुचित विचार सावरकर जी का नहीं था. उन्हें तो अंग्रेजों के सिंहासन को हिलाना था. उनके लंदन आगमन के कुछ महीनों बाद ही, १८५७ के स्वातंत्र्य समर का स्वर्ण-जयंती वर्ष प्रारंभ हो रहा था – १९०७. सावरकर जी ने बड़ी हिम्मत के साथ, लंदन यूनिवर्सिटी के छात्र, उनके कॉलेज के छात्र और अन्य भारतीय तरुणों को लेकर एक मोर्चा निकाला. लंदन की सड़कों पर, ये युवा अपनी छाती पर, ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम चिरायु हो’ ऐसे बिल्ले लगाकर जा रहे थे. बड़ा ही अभूतपूर्व दृश्य था. वीर सावरकर के निडर स्वभाव की यह झलक मात्र थी. सारे अंग्रेजी और भारतीय साहित्य में उन दिनों, सन १८५७ के संग्राम को ‘भारतीय सैनिकों का असफल विद्रोह’ कहा जाता था. सावरकर जी ने इसके तह तक जाने का निश्चय किया. लंदन के ‘इंडिया हाउस’ से जुड़े एक क्रांतिकारी की पत्नी अंग्रेज़ थी. उनके सहायक के रूप में, सावरकर जी ने ‘ब्रिटिश म्यूजियम’ के पुस्तकालय में अपना प्रवेश करा लिया. अगले एक वर्ष में उन्होने १८५७ के संग्राम पर उपलब्ध डेढ़ हजार से ज्यादा पुस्तकें पढ़ीं और उनके सामने आया एक दहकता सच – १८५७ यह सिपाहियों का विद्रोह नहीं था. वह था, एक सुनियोजित स्वतंत्रता संग्राम. फिर इन सभी ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित पुस्तक उन्होंने लिखी – ‘१८५७ का स्वातंत्र्य समर’. पुस्तक मराठी में थी. उनके एक क्रांतिकारी सहयोगी अय्यर ने, जो मराठी भी अच्छे से जानते थे, उसका अंग्रेजी में अनुवाद किया. और फिर शुरू हुई, पुस्तक छपवाने की प्रक्रिया. जैसे ही अंग्रेजों को इस पुस्तक के बारे में जानकारी मिली, उन्होंने ने तुरंत इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया. प्रकाशित होने से पहले ही प्रतिबंध का सामना करने वाली विश्व की यह पहली पुस्तक है..! आखिरकार यह पुस्तक होलेंड में छपी. गुप्त रूप से इसका वितरण हुआ और जल्दी ही, यह क्रांतिकारियों की ‘गीता’ बन गई. इसका दूसरा संस्करण, अमेरिका में स्वतंत्रता की अलख जगाने वाले, ‘गदर’ पार्टी के संस्थापक, लाला हरदयाल ने छपवाया. इन दोनों संस्करणों में, लेखक के स्थान पर ‘नेशनलिस्ट’ लिखा था. लेकिन सरदार भगत सिंह ने जब १९२९ में इस पुस्तक का तीसरा संस्करण, प्रतिबंध के बावजूद गुप्त रूप से, भारत में छपवाया, तब लेखक के नाम के आगे उन्होंने वी. डी. सावरकर लिखा. भगत सिंह ने इसका पंजाबी में अनुवाद भी कराया. इस पुस्तक का चौथा संस्करण, नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने छपवाया.... सावरकर जी ने जब ‘सिटी लॉं स्कूल’ से बैरिस्टरी की शिक्षा अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण की, तब उन्हें इंग्लैंड के राजा के प्रति वफादार रहने का शपथपत्र भरकर देने को कहा गया. निर्भीक सावरकर ने बड़ी स्पष्टता के साथ, उस शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारी से कहा, मैं ऐसी शपथ कदापि नहीं लूंगा. उस अधिकारी ने कहा, तो फिर बैरिस्टरी की डिग्री नहीं मिलेगी. सावरकर तपाक से जवाब देते हैं, “तुम्हारी इस कागज की डिग्री की परवाह किसे है...? मैं ज्ञान लेने यहां आया था, जो मुझे मिल गया. सावरकर की प्रेरणा से मदनलाल धींगरा ने लंदन के इंपीरियल थिएटर में, एक कार्यक्रम के दौरान भारत सचिव के राजनीतिक सलाहकार विल्यम कर्ज़न वायली को, १ जुलाई १९०९ को गोली मारकर खत्म किया. शक की सुईयां सावरकर की ओर मुड़ी. उन्हीं दिनों, ब्रिटिशों के प्रति, कुछ वफादार भारतीयों ने मदनलाल धींगरा के विरोध में एक सभा आयोजित की थी. किन्तु सावरकर जी ने ऐसा होने नहीं दिया. उन्होंने सभा ही समाप्त करवाई. अस्थिरता के इस समय में, कुछ दिनों तक श्यामजी कृष्ण वर्मा के साथ पेरिस में रहने के बाद, जब दोस्तों और सहयोगियों के मना करने पर भी, फ्रांस से सावरकर वापस लंदन लौटे, तो उनका गिरफ्तार होना तय था. वैसा हुआ भी. किन्तु सावरकर किसी अलग मिट्टी के बने थे. उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ योजना बनाई. और यहां दिखता है, निर्भीक और निडर सावरकर जी का अद्भुत रूप. उनको भारत ले जाने वाला जहाज, एसएस मारिया (S. S. Morea), जब फ्रांस के मार्सेलिस बन्दरगाह के पास था, तब रविवार दिनांक ८ जुलाई, १९१० को प्रातः उन्होंने शौचालय जाने की बात कही. इसलिए उनके हाथ और पांव की बेड़ियां उतारी गई. शौचालय के अंदर जा कर सावरकर जी ने अदम्य साहस का परिचय दिया. शौचालय के पॉट होल से, उन्होंने ने खुले समंदर में छलांग लगा दी...! पॉट होल से निकलते समय छलनी हुआ वह शरीर, उस जख्मी हिस्से पर चूभता समंदर का खारा पानी. समंदर की बड़ी बड़ी लहरें. समंदर के अंदर के भयंकर जीव-जन्तु... किन्तु इन सबकी फिकर न करते हुए, वीर सावरकर अपनी कृश काया से, समंदर के पानी को चीरते हुए आगे बढ़ रहे थे. तब तक जहाज पर यह पता लग चुका था, कि सावरकर निकल चुके हैं. इसलिए जहाज से गोलियों की बौछारें हो रही थीं. जहाज की छोटी नावों को पानी में उतारकर सावरकर जी के पास जाने का प्रयास हो रहा था. दुर्दम्य साहसी सावरकर जी ने, फ्रांस के किनारे पर जाकर, भीगे हुए कपड़ों के साथ, फ्रांस में शरण लेने का प्रयास किया. दुर्भाग्य से फ्रेंच पुलिस उनकी बात समझ नहीं सकी, और अंग्रेज़ उन्हें फिर अपने जहाज पर ले गए. साहस और निडरता का यह एकमात्र प्रसंग थोड़े ही था..! २५ दिसंबर १९१० को आजन्म कारावास की सजा, और फिर दूसरे आरोपों में ३० जनवरी १९११ को दूसरे आजन्म कारावास की सजा. दोनों सजा, एक के बाद दूसरी. अर्थात पूरे ५० वर्ष की सजा, और वो भी काले पानी की. लेकिन तब भी बड़े धैर्य और हिम्मत के साथ, सावरकर जी ने न्यायालय में अपनी बात रखी. अंदमान – निकोबार द्वीप समूह (जिसे ‘काला पानी’ कहा जाता था) के उस सेल्यूलर जेल में पहुंचने पर जब वहां के क्रूर जेलर ने जब उनका मखौल उड़ाया, की “दो जन्म, अर्थात अगले पचास वर्ष तक तुम जीवित भी रहोगे..?” आत्मविश्वास से भरपूर सावरकर जी तुरंत प्रतिवाद करते हैं, “अगले पचास वर्षों तक तुम्हारी अंग्रेजी हुकूमत भी कायम रहेगी...?” बिलकुल छोटी सी कोठडी में, एकांत में रहना. ऊपर के एक छोटे से झरोखे से दिखने वाला आकाश, यही बाहर की दुनिया से जुड़ने वाली एक कड़ी. रोज बैलों के स्थान पर खुद को जोतकर कोल्हू पीसना, उसमें से दिये गए लक्ष्य के अनुसार तेल निकालना, और तेल कम निकला, तो पशुओं की तरह कोड़े खाना. खाने के लिए कीड़ों से बिलबिलाते रोटी – चावल. रात को चूहों और छिपकलियों के बीच सोना. मल-मूत्र त्याग की भी स्वतंत्रता नहीं.... ऐसा एक नहीं, दो नहीं तो ग्यारह वर्ष सावरकर जी ने सहन किया. लेकिन इन सारे अमानवीय अत्याचारों के बीच भी, उनकी राष्ट्रभक्ति की ज्वाला सतत प्रज्वलित रही, धधकती रही. वे पूरे आत्मसम्मान के साथ जेल में रहे. जेलर बारी जैसे क्रूरकर्मा को भी उन्होंने उसी की भाषा में उत्तर दिया. सावरकर क्रांतिकारियों के मुकुटमणि थे, कारण वे निर्भीक थे, निडर थे, दुर्दम्य आशावाद के प्रतीक थे...! __    __    __ सावरकर द्रष्टा थे. दूर का देखने की गज़ब की क्षमता उन में थी. सन् १९११ में, जब जहाज से वे कैदी के रूप में अंदमान पहुचे, तो उस द्वीप को देखकर उन्होंने कहा, “कितना महत्वपूर्ण स्थान है यह. स्वतंत्र हिंदुस्तान का नौसैनिक अड्डा बनाकर, इसके माध्यम से समूचे पूर्व दिशा की सुरक्षा हो सकेगी.” आज वैसा ही हो रहा है. १९३८ में मुंबई में हो रहे अखिल भारतीय मराठी साहित्य संम्मेलन के वे अध्यक्ष चुने गए. अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा, “लेखनी तोड़ो, बंदुकें पकड़ो”. वे साहित्यकारों को भी सेना में भर्ती होने की प्रेरणा दे रहे थे. उनके इस वक्तव्य की आलोचना हुई. अध्यक्ष के रूप में चयनित, साहित्य का सर्वोच्च सम्मान प्राप्त व्यक्ति ही, लेखनी को तोड़ने की बात कर रहा है. यह बात किसी के गले नहीं उतर रही थी. किन्तु सावरकर जी के विचार अत्यंत स्पष्ट थे. तात्कालिक परिस्थिति में वे सभी को सैनिक बनने की अपील कर रहे थे. वे कह रहे थे, “राष्ट्र बचाना सबसे महत्वपूर्ण है. अगर सार्वभौम, स्वतंत्र राष्ट्र रहेगा, तो ही तो साहित्य, कला जैसी विधाएँ बचेंगी. इसलिए पहले राष्ट्र का विचार !” आगे द्वितीय विश्वयुध्द में भी उन्होंने युवकों से सेना में भर्ती होने का आग्रह किया. वैसा अभियान चलाया. लेकिन तत्कालीन अधिकतर राजनेताओं को उनकी बात समझ में नहीं आई. उनकी अवहेलना की गई. उपहास उड़ाया गया. उन्हे ‘रिक्रूटवीर’ कहा गया. इस अभियान के बारे में सावरकर जी के विचार सुस्पष्ट थे. उनको दिख रहा था कि जल्दी ही भारत स्वतंत्र होने जा रहा है. ऐसे समय में किसी भी सार्वभौम देश को प्रबल सैनिकी शक्ति की आवश्यकता होती है. हमारे युवक अंग्रेजों से युद्ध शास्त्र के कुछ गुर तो सीख लेंगे. और समय आने पर बंदूकों की नोक किस दिशा में मोड़ना है, ये तो हमें ही तय करना है. उनकी इस मुहिम का अर्थ समझ में आया, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को. दिनांक २५ जून १९४४ को, ‘आजाद हिन्द रेडियो’ से किए गए भाषण में सुभाष बाबू ने बड़े ही कृतज्ञता पूर्वक, वीर विनायक दामोदर सावरकर का उल्लेख किया, और कहा कि सावरकर जी की प्रेरणा से ही आजाद हिन्द सेना को सैनिक मिल रहे हैं. जॉर्ज ओसावा (George Ohsawa) नाम के एक बड़े जापानी लेखक हुए (१८९३ – १९६६). उन्होंने एक पुस्तक लिखी है : ‘The Two Great Indians in Japan – Sri Rash Behari Bose and Netaji Subhash Chandra Bose. सन् १९५४ में प्रकाशित इस पुस्तक में उन्होंने सावरकर जी का बड़ा गौरवपूर्ण उल्लेख किया है. उनके सैनिकीकरण अभियान के बारे में वे लिखते हैं, “Miracle was accomplished. The shooting was stopped. Savarkar’s militarization policy in World War 2 began to shape.” सेना को शक्तिशाली बनाने का वीर सावरकर का स्वप्न, बहुत कम लोगों के समझ में आया था. १९७१ के भारत – पाक युद्ध के नायक, जनरल सैम मानेकशॉ ने २६ फरवरी १९७७ को कहा था कि “वीर सावरकर, इंदिरा गांधी के स्थान पर होते, तो फिर भारत की सेना वर्ष १९६६ में ही लाहौर पर जीत दर्ज कर लेती. (https://www.newstracklive.com/news/field-marshal-sam-maneksha-birthday-1064856-1.html) द्वितीय विश्व युद्ध के समय ही सावरकर जी को समझ में आया था कि अगले दो – चार वर्षों में, अंग्रेजों को भारत छोड़ कर जाना ही होगा. फिर स्वतंत्र भारत की भाषा क्या होनी चाहिए ? लिपि क्या होनी चाहिए ? इन विषयों को लेकर उन्होंने भाषा शुद्धि आंदोलन चलाया. तब भी उनका खूब उपहास उड़ाया गया. लेकिन स्वतंत्र भारत के ‘सी पी एंड बेरार’ प्रांत के पहले मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल ने, प्रा. रघुवीर की अध्यक्षता में ‘राज्य व्यवहार कोश’ बनाने के लिए एक समिति गठित की. इस समिति ने वीर सावरकर द्वारा सुझाए अधिकतम शब्द स्वीकार किए. आज प्रचलन में हैं, ऐसे – लोकसभा, संसद, महापौर, दिनांक, क्रमांक, दिग्दर्शक, चित्रपट, मध्यांतर, नगरपालिका, उपस्थित, स्तंभ, मूल्य, शुल्क, प्राचार्य, प्राध्यापक, दूरदर्शन जैसे अनेक शब्द वीर सावरकर जी की ही देन हैं. सावरकर जी दस - बीस वर्ष आगे की सोचते थे, देखते थे. १९५८ से १९६० तक, लगातार सावरकर जी ने नेहरू सरकार को तिब्बत के बारे में चेताया था. वे कहते थे, तिब्बत यह भारत के सुरक्षा की गारंटी है. इसलिए तिब्बत को हथियाने के चीनी षड्यंत्र को विफल करना चाहिए. किन्तु, तब हम पंचशील की बाते कर रहे थे...! __    __    __ ऐसे प्रखर देशभक्त, राष्ट्रभक्त वीर विनायक दामोदर सावरकर को हमने, इस देश की सरकार ने क्या दिया..? अपमान, अवहेलना, उपेक्षा, कारागृह में बंदीवास…! भारत की स्वतंत्रता के तुरंत बाद, १९४८ में, महात्मा गांधी जी की हत्या के झूठे आरोप में नेहरू सरकार ने उन्हें १४ महीने, दिल्ली के लाल किले में बनाए गए कारागृह में बंदीवान बनाया. इस झूठे आरोप से, निष्कलंक, निर्दोष छूटने के, कुछ ही महीनों बाद, १९५० में, उन्हें बेलगाव में बंदी बनाया गया. कारण क्या था ? पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान का भारत दौरा था. वे दिल्ली आने वाले थे, और दिल्ली की नेहरू सरकार को लग रहा था कि बेलगाव में बैठे सावरकर जी के कारण उन लियाकत अली खान साहब को खतरा है...! पिछले पचास – साठ वर्ष इस देश में सावरकर जी की खूब उपेक्षा हुई. किन्तु अब नहीं. अब सावरकर जी के विचारों की स्वीकार्यता बढ़ रही हैं. युवा पीढ़ी में वीर सावरकर के बारे में प्रचंड आकर्षण हैं. सावरकर साहित्य की बिक्री अपने उच्चांक पर है... ये देश, सावरकर जी पर हुए अन्याय का परिमार्जन करने का पूरा प्रयास कर रहा है...!

May 28th 2020, 12:15 pm

हिन्दुत्व के आधार पर ही विश्व को पुनः जागृत करना होगा – जे. नंदकुमार

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रांची. प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे. नंदकुमार ने कहा कि कोरोना वायरस ने हमारे सामने बहुत सारे सवाल तथा मुद्दों को एक साथ खड़ा कर दिया है. जिसका उत्तर हमें एकजुट होकर विश्वास से देना होगा.कोरोना या तो हमें आर्थिक रूप से पीछे छोड़ेगा या फिर बीमार करके प्रभावित करेगा. वे प्रज्ञा प्रवाह झारखण्ड के फेसबुक लाइव में युग परिवर्तन और हिंदुत्व विषय पर संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि इटली, अमेरिका, फ्रांस तथा जर्मनी जैसे सम्पन्न देशों को कोरोना ने घुटनों के बल बैठा दिया है. इन देशों के पास ज्ञान और तकनीकी की व्यवस्था होने के बावजूद भी ये और देशों को इससे जोड़ नहीं पाए. चीन जहाँ से ये बीमारी शुरू हुई, उसने भी दुनिया के सामने अबोध बालक जैसे अनिभिज्ञता जाहिर की. जिसके कारण पूरा विश्व इस संक्रमण की चपेट में है. हिन्दू फिलॉसफी के अनुसार ज्ञान को सम्पत्ति के रूप में छिपाकर नहीं रखा जा सकता है. ये एक दूसरे से बांटने के लिए ही हमें मिला है. सही समय पर ज्ञान का आदान प्रदान हमें आने वाले संकट के प्रति सचेत करता है तथा उससे उबरने के उपायों को ढूंढने में मदद करता है.

इस महामारी के समय जी-20 का रोल पूरे विश्व के लिए शून्य था. उसने सिर्फ अपने हित के लिए सोचकर अपने आप को सेफ रखा. अपने देश में लॉकडाउन होने बाद सार्क देशों के साथ माननीय प्रधानमंत्री महोदय ने बैठक कर उन्हें हर सम्भव मदद करने की बात कही जो हिंदुत्व की एक परिभाषा है. भारत ने इस महामारी में बहुत से देशों की मदद करके उनका नेतृत्व किया, जिसकी सराहना विश्व पटल पर अब तक हो रही है.

कोरोना आने के बाद अलग अलग फिलॉसफर ने अपने अपने तथ्य दिए, जिसमें डगलस मरे ने कहा कि शक्तिशाली नेशन और शक्तिशाली बनते जाएंगे तथा छोटे नेशन का शोषण होगा. उनके विकास का ग्राफ गिरता जाएगा. विश्व पटल पर उन्हें उभरने का मौका नहीं मिलेगा. लेकिन भारत इस बात का समर्थन नहीं करता है. भारत ने पूरे विश्व को आध्यात्मिक तरीके से जोड़े रखा है, हमारा उद्देश्य पूरे विश्व का कल्याण करके सर्वश्रेष्ठ बनाने का है. किसी भी व्यक्ति को दुःख नहीं होना चाहिए, सबका मंगल होना चाहिए.

एकात्म मानवदर्शन तथा महात्मा गाँधी जी का स्वदेशी कथन पूरे विश्व को रास्ता दिखलाने वाला है. ग्राम स्वराज की कृषि व्यवस्था लोगों को इस संकट काल से बाहर निकलने का रास्ता दिखाएगी.

महात्मा गाँधी जी ने आजादी के समय ही जवाहर लाल नेहरू जी को पत्र के माध्यम आर्थिक स्थिति के आधार से जुड़े विषयों के बारे में सोचने के लिए कहा था. जिसमें ग्राम, ग्राम आधारित कृषि तथा कृषि आधारित उद्योग को वरीयता देने के लिए कहा.

लेकिन नेहरू जी का मानना था कि ग्राम स्वराज अंधविश्वास का केंद्र है. इसका शहरीकरण होना देश के भविष्य के लिए जरूरी है. गाँव को खेती से ज्यादा महत्व देने लायक नहीं है. गाँधी जी के आदर्श ग्राम की परिभाषा नेहरू जी ने बदल दी. गाँव को खत्म करके शहरीकरण किया जाने लगा. हिन्दू अर्थव्यवस्था को खत्म करने के लिए हिंदुत्व पर लोगों ने समय समय पर चोट की, जिसका खमियाजा हम आज तक भुगत रहे हैं.

आज हम घर में बन्द हैं और पक्षी पशु सब बाहर हैं. हवा हमें शुद्व रूप से मिलने लगी है. वातावरण पूर्ण रूप से साफ हो चुका है. उसका कारण है हम प्रकृति, खेत आदि का दोहन करने से खुद को मजबूरी के कारण रोके हुए हैं. अगर हमें विश्व को पुनः जागृत करना होगा तो उसका तरीका सिर्फ हिंदुत्व है. जो हमें दान करने की बात करता है. हमें दया और प्रेम के साथ अपने इच्छानुसार जरूरतमंद लोगों को दान देना होगा.

May 28th 2020, 12:15 pm

स्वदेशी की शक्ति से आत्मनिर्भर होकर भारत बन सकता है विश्व मार्गदर्शक – अक्षय जोग

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नई दिल्ली. सावरकर के जीवन पर अध्ययन कर चुके अक्षय जोग ने कहा कि स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर का मानना था कि हमें यानि भारत को विश्व सुपर पावर नहीं बनना है, विश्व के लिए मार्गदर्शक बनना है. और यह स्वदेशी की शक्ति से ही किया जा सकता है. विकसित, आत्मनिर्भर भारत ही विश्व का मार्गदर्शन कर सकेगा. भारत ही है जो विश्व को दिशा दिखा सकता है.

स्वातंत्र्य वीर सावरकर की जयंती की पूर्व संध्या (27 मई) पर विश्व संवाद केंद्र भारत द्वारा स्वातंत्र्य योद्धा वीर सावरकर – आक्षेप एवं वास्तविकता विषय पर आयोजित फेसबुक लाइव में संबोधित कर रहे थे. वीर सावरकर का पूरा परिवार क्रांतिकारी व देशभक्त था. एक समय ऐसा भी था, जब वीर सावरकर और उनके दोनों भाई एक साथ देश की अलग-अलग जेलों में बंद थे.

अक्षय जोग ने कहा कि स्वदेशी के विचार को वीर सावरकर ने आगे बढ़ाया था. सावरकर पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने स्वदेशी के समर्थन में विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी. 07 अक्तूबर 1905 को वीर सावरकर ने पुणे में विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी. इस कार्यक्रम के प्रभाव का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विदेशी कपड़ों की होली जालने की घटना का समाचार इंग्लैंड में भी प्रकाशित हुआ था. इतना ही नहीं उनके बड़े भाई बाबा राव सावरकर ने भी इसी दौरान नासिक में विदेशी कपड़ों को जलाकर स्वदेशी के विचार को पुष्ट किया था. स्वदेशी विचार व आंदोलन के कारण उन दिनों सावरकर को उनके कॉलेज होस्टल से निकाल दिया गया था और उन पर 10 रुपए का आर्थिक दंड भी लगाया था. इस पर लोकमान्य तिलक ने मराठी पत्र केसरी में ये हमारे गुरु नहीं शीर्षक से कड़े लेख लिखे थे.

वीर सावरकर के स्वदेशी को लेकर विचार बहुत प्रासंगिक, गहन और सशक्त रहे हैं. सावरकर का मानना था कि भारत को रक्षा क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर होना चाहिए ताकि हम बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित हो पाएं. सावरकर ने विदेशी कपड़ों को जलाकर जो स्वदेशी की लौ जलाई थी, उसकी प्रसांगिकता आज भी है. प्रधानमंत्री मोदी ने भी कोरोना काल के संकट में उनके आत्मनिर्भर भारत के स्वदेशी विचार का मंत्र सबको दिया है. प्रधानमंत्री ने भी लोकल के लिए वोकल होने का आह्वान किया.

अक्षय जोग ने सावरकर पर लगे माफी मांगने के आरोपों को महज अज्ञानता और सतही जानकारी का आडम्बर करार दिया. उन्होंने कहा कि जिस प्रकार श्रीकृष्ण रणनीति के तहत भागकर रणछोड़ कहलाए थे, उसी प्रकार त्वरित परिस्थितियों को भांप कर सावरकर ने स्वयं सहित अनेकों स्वतंत्रता सेनानियों को छोड़ने का सरकार से आग्रह किया था.

सावरकर जी ने हिन्दुत्व की जो परिभाषा की, उसके अनुसार – आसिन्धु सिन्धु पर्यंतः……..यानि सिन्धु सागर से सिन्धु नदी तक यह जो भारत भूमि है, इस भूमि को जो पुण्यभूमि, पितृभूमि, मातृभूमि मानता है, वह हिन्दू है.

अक्षय जोग, लेखक व ब्लॉगर हैं. उन्होंने वीर सावरकर – आक्षेप और वास्तविकता विषय पर मराठी में पुस्तक लिखी है, जिसका हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती में अनुवाद हो चुका है. अक्षय सावरकर पर विभिन्न व्याख्यानों में व्याख्यान भी दे चुके हैं.

https://www.facebook.com/VishwaSamvadKendraBharat/videos/949782868786753/

 

May 27th 2020, 1:02 pm

जब जिम्मेदारी की बात आयी तो गायब हो गए अधिकार मांगने वाले

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सौरभ कुमार किसी भी देश की सफलता और असफलता उस देश के नागरिकों के साथ जुड़ी होती है. कोरोना महामारी ने नागरिकों की भूमिका को और ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया है क्योंकि यह बीमारी लोगों से लोगों में फैल रही है और जागरूकता इसके फैलाव को रोकने का एकमात्र उपाय है. जिस देश के नागरिक सरकार के नियमों को मान रहे हैं और स्थानीय प्रशासन के साथ सहयोग कर रहे हैं, वहां कोरोना से सबसे कम नुकसान हुआ है. भारत में भी नागरिक प्रधानमंत्री के आवाहन के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे आए. लॉकडाउन की शुरुआत में नागरिकों ने दीपक जलाकर एवं तालियां और थाली बजाकर कोरोना वॉरियर्स का सम्मान किया, लेकिन अफसोस की महामारी के समय में भी कुछ लोग राष्ट्र के विरोध में खड़े नजर आए. वह जो बड़े शान के साथ शायरी करते थे कि “किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है” उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत की इस भूमि को वो अपने पूर्वजों का तो बिलकुल नहीं मानते. एक तरफ भारत की जनता ने कोरोना वॉरियर्स के सम्मान में दिवाली मनाई, दूसरी तरफ कुछ लोग कोरोना वॉरियर्स पर पत्थर फेंकते हुए दिखे. जब भारत का एक तबका तालियों से कोरोना वॉरियर्स का सम्मान कर रहा था, उसी वक्त समाज का एक तबका कोरोना वॉरियर्स के ऊपर थूक रहा था. देश के संसाधनों के ऊपर अधिकार के दावे करना और देश के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन करना, यह वो दो धुरियाँ हैं जो किसी समाज के तौर पर आपकी पहचान बनता है. बीते साल हमने देश भर में धरने और प्रदर्शन देखे, ट्विटर के हैशटैग और सड़कों पर लगे स्पीकर्स से चीख-चीख कर देश में अपने हिस्से की बात कर रहे थे, अधिकारों की बात कर रहे थे. लेकिन जब वक़्त जिम्मेदारी का आया तो इन्होंने क्या किया? इसी सवाल का जवाब हम तलाशने की कोशिश करेंगे – देश या धर्म कोरोना महामारी को ध्यान में रखते हुए सऊदी अरब जैसे मुस्लिम देश ने भी सामूहिक नमाज पर प्रतिबन्ध लगा दिया. मिस्र, तुर्की, ओमान, कतर, सऊदी अरब, संयुक्‍त अरब अमीरात जैसे देशों ने ईद के दिन भी कड़े प्रतिबन्ध जारी रखे. तुर्की  के राष्ट्रपति रेसेप तैयप ने देश में ईद की छुट्टियों के दौरान 23 से 26 मई तक चार दिन का राष्ट्रव्यापी कर्फ्यू लगाया. सऊदी अरब के सरकारी टीवी चैनल पर देश के इस्लामी मामलों के मंत्री अब्दुल लतीफ़ अल-शेख़ ने मस्जिदों में नमाज़ नहीं पढ़े जाने के निर्देश दिए. सऊदी अरब के मक्का और मदीना में लोगों को केवल भोजन और दवा खरीदने के लिए अपने घरों को छोड़ने की अनुमति मिली और नागरिकों ने सरकार के इन निर्देशों का पालन भी किया. मुस्लिम देशों में सरकार और समाज ने धर्म से ऊपर देश को रखा. सरकार ने बीमारी से लड़ने के लिए लॉकडाउन को लागू किया और लोगों ने भी निर्देशों का पालन किया. धर्म का नाम लेकर जिद नहीं की. लेकिन इसके विपरीत भारत में क्या हुआ? जहां मुस्लिम समाज के चंद लोगों ने खूब उत्पात मचाया, देश के प्रयासों को विफल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और यह सब किया धर्म का नाम लेकर. महत्वपूर्ण यह कि इस स्थिति में मुस्लिम धर्मगुरुओं का रवैया कैसा रहा? अपने पर मुस्लिम समाज के नेता या अगुआ का तमगा लगाकर घूमने वालों का रवैया क्या रहा? सेकुलर जमात का रवैया क्या रहा? किसी ने इन उत्पातों को रोकने के लिए गंभीरता के साथ प्रयास किया. कोई धर्मगुरु मैदान में उतरकर  बड़ा नाम एडवोकेट शाहिद अली सिद्दीकी जैसे लोग सामूहिक नमाज की अनुमति के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट चले गए. देश के कई हिस्सों में ईद से पहले खरीदारी के लिए बड़ी भीड़ रास्तों पर निकली. शारीरिक दूरी के नियमों की धज्जियाँ उड़ाई गयीं और रोकने का प्रयास करने पर पुलिस वालों पर पत्थर बरसाए गए. यहां तक कि संक्रमितों के उपचार करने वाली टीमों, स्वास्थ्य विभाग की टीमों पर जानलेवा हमले हुए. कोरोना वारियर्स पर हमले बिहार के मोतिहारी में लॉकडाउन के दौरान पुलिसवालों की टीम सिसहनी गांव का दौरा करने पहुंची. तो कुछ युवक सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाते मिले. पुलिस ने इन्हें समझाना चाहा, तो गलती मानने की बजाय ये लोग हमले पर उतारू हो गए. हाथों में डंडा लिए भीड़ इकट्ठी हो गई और पुलिसवालों को ही खदेड़ने लगी. मध्यप्रदेश के मंडला में कुछ ऐसे ही हालात का सामना ममता रजक और उनकी टीम को भी करना पड़ा. मोहद गांव में ममता अपनी टीम के साथ गांववालों की स्क्रीनिंग के लिए पुहंची, तो एक शख्स ने विवाद शुरू कर दिया. पहले तो उसने टीम को गांव में घुसने से रोका और फिर मारपीट शुरू कर दी. इंदौर में भी पुलिसकर्मियों और डॉक्टर्स पर जानलेवा हमला किया गया. उत्तर प्रदेश के कानपुर में स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिसवालों पर कुछ लोगों ने हमला कर दिया. मेडिकल और पुलिस टीम कानपुर के जुगियाना मोहल्ले में कोरोना पॉजिटिव लोगों को लेने गई थी. तभी करीब 50-60 लोगों ने इस टीम पर हमला कर दिया. यह चंद उदाहरण हैं. ऐसी ही घटनाएं पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, झारखण्ड, राजस्थान, गुजरात, पंजाब सहित देश के लगभग हर राज्य से आई और हर घटना में एक चीज समान थी. वो थे हमला करने वाले और उनके मस्तिष्क में भरा गया जहर. स्थितियां इस कदर नियंत्रण से बाहर थीं कि राज्यों को कोरोना वारियर्स की रक्षा के लिए रासुका का सहारा लेना पड़ा. देश भर में कोरोना फैलने की वजह बने देश में कोरोना वायरस का सबसे पहला विस्तार तबलीगी जमात के कारण हुआ. मरकज में शामिल हुए लोगों ने कोरोना को देश के कोने कोने तक पहुँचाया. तबलीगी जमात में भाग लेने वाले लोग स्वयं सामने के बजाय देशभर की विभिन्न मस्जिदों में जाकर छिपकर बैठ गए. इनमें सैकड़ों विदेशी भी शामिल थे. पुलिस द्वारा ढूंढ निकालने के पश्चात और कोरोना संक्रमित पाए जाने पर स्वास्थ्य कर्मियों ने उपचार शुरू किया तो कोई नर्स के सामने कपड़े उतार कर खड़ा हो गया, तो कुछ लोगों ने हंगामा किया क्योंकि खाने में चिकन नहीं मिल रहा था. तो कहीं डॉक्टरों पर थूकने की घटनाएं हुईं. इंदौर के कुछ हिस्सों से ऐसी भी खबरें आईं कि कोरोना संक्रमितों का इलाज घरों में किया जा रहा है. न जाने इस दौरान कितने लोगों में संक्रमण फैला और कितनों ने अपने प्राण त्याग दिए. ऐसे व्यवहार के बाद मैं यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हूँ कि उन लोगों को अधिकार मांगने का हक है जो देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते. सिर्फ बोल देने भर से देशभक्त हो जाएं ये संभव नहीं है, देशभक्ति की परीक्षा मुश्किल समय में होती है, जब देश को जरूरत हो तो आपकी भूमिका क्या रहती है, यह सिद्ध करता है कि आप देश के साथ हैं या खिलाफ. स्पष्ट है कि कोरोना संकट की इस मुश्किल घड़ी में एक वर्ग अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहा है.  

May 27th 2020, 12:18 pm

छत्तीसगढ़ – क्वारेंटाइन सेंटरों में भोजन बनाने के साथ लोगों का हौसला बढ़ा रहीं महिला कमांडो…

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बालोद, छत्तीसगढ़. सब बने-बने रहू, कोई बात रही त बताहू, कोरोना ल भगाना है. निःस्वार्थ, सेवाभाव क्वारेंटाइन सेंटरों व गांवों में दिख रहा है, जहां कोरोना को हराने में महिलाएं लोगों को जागरुक कर रही हैं. चाहे प्रवासी मजदूर हो या गांव के लोग, सभी का हौसला बढ़ा रही हैं.

महिला कमांडो निःशुल्क व निःस्वार्थ सेवाएं देते हुए रोजाना 4 घंटे समय निकालकर क्वारेंटाइन सेंटर में पहुंचकर लोगों की स्वास्थ्य संबंधित जानकारी ले रही हैं. जिन गांवों में क्वारेंटाइन सेंटर नहीं बना है, वहां सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर महिलाएं घर-घर लोगों को कोरोना से बचने के उपाय बता रही हैं. ऐसा जिले के सिर्फ एक-दो गांव नहीं, बल्कि 125 से ज्यादा गांवों में हो रहा है. जहां महिला कमांडो स्वेच्छा से पहल कर रही हैं. लॉकडाउन के नियमों का पालन करते हुए अपना कार्य कर रही हैं. लोग अपने-अपने घरों में रहें तथा अति आवश्यक होने पर ही घर से बाहर निकलें.

डरें नहीं, बल्कि सतर्क रहें

जिले के 5 ब्लॉक बालोद, गुंडरदेही, गुरूर, डौंडी व डौंडीलोहारा ब्लॉक के गांवों में महिला कमांडो कोरोना से बचाव के लिए लोगों को जागरूक कर रही हैं. कोरोना से डरने की नहीं, बल्कि सतर्क रहने की जरूरत है. एक-दूसरे से दूरी बनाकर रखें. क्वारेंटाइन सेंटरों के समीप जाकर महिला कमांडो बाहर से आए हुए प्रवासी मजदूरों, बच्चों का हालचाल पूछ कर उनका हौसला बढ़ा रही हैं.

सभी सेंटरों में सेवा देने को तैयार

पद्मश्री शमशाद बेगम का कहना है कि अभी मेरी जानकारी में 125 गांवों में महिला कमांडो सेवा कार्य कर रही हैं. जिलेभर में 12 हजार 500 महिला कमांडो हैं, 700 से ज्यादा गांव हैं. इसलिए सेवाकार्य के उद्देश्य से जरूरत के हिसाब से जिला प्रशासन से मांग की गई है कि क्वारेंटाइन सेंटरों में महिला कमांडो की ड्यूटी लगाई जाए. जिससे सभी सुरक्षित रहें, कोई नियम का उल्लंघन न कर सके व अनहोनी घटना न हो.

कमांडो कह रहीं कि सभी के चेहरे में मुस्कान बनी रहे

सिरपुर: यहां महिला कमांडो टीम खाना बनाकर क्वारेंटाइन सेंटर में सेवा कार्य कर रही हैं. निगरानी भी कर रही हैं. निर्मला साहू कहती हैं – हमारे गांव के क्वारेंटाइन सेंटर में जो लोग रुके हैं, हमारी ही भाई-बहन हैं, हम लोग उनको निःशुल्क भोजन पका कर दे रहे हैं.

जेवरतला: महिला कमांडो टीम सेवा कार्य कर रही है. जागरुकता अभियान के अलावा सेंटर की मॉनिटरिंग की जा रही है. यहां की महिला कमांडो अध्यक्ष ढलेश्वरी व टीम के सदस्य कहते हैं कि अभी सभी का मनोबल बढ़ाना जरुरी है, ताकि इसका मुकाबला कर सकें.

भिलाई गांव: महिला कमांडो अध्यक्ष सूरजा यादव ने बताया, छोटी सी मदद कर रहे है. ताकि सभी के चेहरे पर इस संकट के दौर में मुस्कान बनी रहे. राशन बांटा है, कोई भूखा न रहे. लोगों का मनोबल भी बढ़ाते रहते हैं. जिससे हम भी शांति महसूस करते हैं.

May 27th 2020, 11:02 am

लॉकडाउन मोबाइल मूवी मेकिंग प्रतियोगिता के परिणाम घोषित

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भारतीय चित्र साधना ने आयोजित की थी अखिल भारतीय प्रतियोगिता

नई दिल्ली. भारतीय चित्र साधना ने लॉकडाउन मोबाइल मूवी मेकिंग प्रतियोगिता के परिणामों की घोषणा कर दी. प्रतियोगिता का आयोजन भारतीय चित्र साधना ने किया था. प्रतियोगिता के विजेताओं की घोषणा भारतीय चित्र साधना के फेसबुक पेज पर प्रख्यात फिल्मी हस्तियों ने की. छह श्रेणियों में फिल्में आमंत्रित की गई थीं. प्रतियोगिता के निर्णायकों ने प्रविष्टियों का मूल्यांकन कर श्रेणी अनुसार विजेताओं की घोषणा की. भारतीय चित्र साधना के चेयरमैन प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने वीडियो संदेश के माध्यम से प्रतिभागियों और निर्णायकों का आभार व्यक्त किया.

मीडिया शिक्षक एवं लेखक लोकेंद्र सिंह की फिल्म ‘समिधा : सेवा परमो धर्म’ को ‘सकारात्मक एवं प्रेरक कहानी’ श्रेणी में विजेता चुना गया. मीडिया शिक्षक एवं निर्देशक डॉ. गजेन्द्र सिंह अवास्या की फिल्म ‘कोरोना : जानकारी ही बचाव’ को ‘कोरोना से बचाव के उपाय’ श्रेणी में विजेता घोषित किया गया. कोरोना योद्धाओं को प्रणाम श्रेणी में जीस जॉर्ज की फिल्म सेल्यूट टू कोरोना वॉरियर्स को विजेता घोषित किया है. लॉकडाउन के सकारात्मक पहलू विषय पर आधारित श्रेणी में विनायक सिन्हा की इमोशनल डिस्टेंसिंग फिल्म को विजेता घोषित किया गया है. इसी प्रकार हेल्प द पूअर विषय पर प्राप्त फिल्मों में से देबोमिता की फिल्म पहल को विजेता घोषित किया गया है. भारत जीतेगा, कोरोना हारेगा थीम पर आधारित श्रेणी में प्राप्त प्रविष्टियों में से रित्विक दास की वी आर विद यू फिल्म को विजेता घोषित किया गया है.

उल्लेखनीय है कि कोरोना संकट में गरीब और बेसहारा लोगों के लिए संघ के स्वयंसेवक वृहद स्तर पर सेवाकार्यों का संचालन कर रहे हैं. आरएसएस और सेवाभारती सहित अन्य सामाजिक संगठन जरूरतमंदों को भोजन, राशन, दवा एवं आवश्यक सहायता उपलब्ध करा रहे हैं. इस लघु फिल्म को प्रख्यात अभिनेता राहुल सिंह ने ऑनलाइन रिलीज किया है.

जरूरतमंदों की उम्मीद बन गया आरएसएस

इस कठिन समय में आरएसएस के स्वयंसेवकों ने जिस तरह कोरोना के खतरे की चिंता न करते हुए गरीबों एवं जरूरतमंदों की सहायता की है, उससे यह फिल्म बनाने का विचार आया. ताकि समाज में सक्रिय अन्य संगठन भी प्रेरणा लेकर अपने नागरिक दायित्व का निर्वहन करें. यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि मौजूदा समय में आरएसएस आमजनों की उम्मीद बन गया है. संघ के कार्यकर्ताओं ने समाज के बड़े हिस्से को राहत पहुँचाई है. – लोकेन्द्र सिंह, फिल्म निर्माता

https://www.facebook.com/chitrabharatifilmfestivalcbff/videos/739174403555334/

 

May 27th 2020, 10:29 am

महात्मा गांधी की दृष्टि में स्वातंत्र्यवीर सावरकर – भारत माता के निष्ठावान पुत्र क्रांतिवीर सावरकर

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लोकेन्द्र सिंह “सावरकर बंधुओं की प्रतिभा का उपयोग जन-कल्याण के लिए होना चाहिए. अगर भारत इसी तरह सोया पड़ा रहा तो मुझे डर है कि उसके ये दो निष्ठावान पुत्र सदा के लिए हाथ से चले जाएंगे. एक सावरकर भाई को मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूँ. मुझे लंदन में उनसे भेंट का सौभाग्य मिला था. वे बहादुर हैं, चतुर हैं, देशभक्त हैं. वे क्रांतिकारी हैं और इसे छिपाते नहीं. मौजूदा शासन प्रणाली की बुराई का सबसे भीषण रूप उन्होंने बहुत पहले, मुझसे भी काफी पहले, देख लिया था. आज भारत को, अपने देश को, दिलोजान से प्यार करने के अपराध में वे कालापानी भोग रहे हैं.” आपको किसी प्रकार का भ्रम न हो इसलिए बता देते हैं कि स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर और उनके बड़े भाई गणेश सावरकर के लिए ये विचार किसी हिंदू महासभा के नेता के नहीं हैं, बल्कि उनके लिए यह सब अपने समाचार-पत्र ‘यंग इंडिया’ में महात्मा गांधी ने 18 मई, 1921 को लिखा था. महात्मा गांधी जी ने यह सब उस समय लिखा था, जब स्वातंत्र्यवीर सावरकर अपने बड़े भाई गणेश सावरकर के साथ अंडमान में कालापानी की कठोरतम सजा काट रहे थे. (हार्निमैन और सावरकर बंधु, पृष्ठ-102, सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय) भारत माता के वीर सपूत सावरकर के बारे में आज अनाप-शनाप बोलने वाले कम्युनिस्टों और महात्मा गांधी के ‘नकली उत्तराधिकारियों’ को शायद यह पता ही नहीं होगा कि सावरकर बंधुओं के प्रति महात्मा कितना पवित्र और सम्मान का भाव रखते थे. गांधीजी की उपरोक्त टिप्पणी में इस बात पर गौर कीजिए, जिसमें वे कह रहे हैं कि - “मौजूदा शासन प्रणाली (ब्रिटिश सरकार) की बुराई का सबसे भीषण रूप उन्होंने (वीर सावरकर) ने बहुत पहले, मुझसे भी काफी पहले (गांधी जी से भी काफी पहले), देख लिया था.” इस पंक्ति में महात्मा वीर सावरकर की दृष्टि और उनकी निष्ठा को स्पष्ट रेखांकित कर रहे हैं. लेकिन, वीर सावरकर के विरुद्ध विषवमन करने वालों ने न तो महात्मा गांधी को ही पढ़ा है और न ही उन्हें सावरकर परिवार के बलिदान का सामान्य ज्ञान है. नकली लोग बात तो गांधी जी की करते हैं, उनकी विचारधारा के अनुयायी होने का दावा करते हैं, लेकिन उनके विचार का पालन नहीं करते हैं. जुबान पर गांधी जी का नाम है, लेकिन मन में घृणा-नफरत और हिंसा भरी हुई है. इसी घृणा और हिंसा के प्रभाव में ये लोग उस युगद्रष्ट महापुरुष की छवि को बिगाड़ने के लिए षड्यंत्र रचते हैं, जिसकी प्रशंसा स्वयं महात्मा गांधी ने की है. महात्मा गांधी और विनायक दामोदर सावरकर की मुलाकात लंदन में 1909 में विजयादशमी के एक आयोजन में हुई थी. लगभग 12 वर्ष बाद भी महात्मा गांधी की स्मृति में यह मुलाकात रहती है और जब वे अपने समाचार-पत्र यंग इंडिया में सावरकर के कारावास और उनकी रिहाई के संबंध में लिखते हैं, तो पहली मुलाकात का उल्लेख करना नहीं भूलते. इसका एक ही अर्थ है कि क्रांतिवीर सावरकर और भारत की स्वतंत्रता के लिए उनके प्रयासों ने महात्मा गांधी के मन पर गहरी छाप छोड़ी थी. इससे पूर्व भी महात्मा गांधी ने 26 मई, 1920 को यंग इंडिया में ‘सावरकर बंधु’ शीर्षक से एक विस्तृत टिप्पणी लिखी है. यह टिप्पणी उन सब लोगों को पढ़नी चाहिए, जो क्रांतिवीर सावरकर पर तथाकथित ‘क्षमादान याचना’ का आरोप लगाते हैं. इस टिप्पणी में हम तथाकथित ‘माफीनामे’ प्रसंग को विस्तार से समझ पाएंगे और यह भी जान पाएंगे कि स्वयं महात्मा गांधी जी सावरकर बंधुओं की मुक्ति के लिए कितने आग्रही थे? सावरकर बंधुओं के साथ हो रहे अन्याय पर भी महात्मा जी ने प्रश्न उठाया है. इस टिप्पणी में महात्मा गांधी ने उस ‘शाही घोषणा’ को भी उद्धृत किया है, जिसके अंतर्गत उस समय अनेक राजनीतिक बंदियों को रिहा किया जा रहा था. वे लिखते हैं कि – “भारत सरकार और प्रांतीय सरकारों ने इस संबंध में जो कार्रवाई की उसके परिणामस्वरूप उस समय कारावास भोग रहे बहुत लोगों को राजानुकम्पा का लाभ प्राप्त हुआ है. लेकिन कुछ प्रमुख ‘राजनीतिक अपराधी’ अब भी नहीं छोड़े गए हैं. इन्हीं लोगों में मैं सावरकर बंधुओं की गणना करता हूँ. वे उसी माने में राजनीतिक अपराधी हैं, जिस माने में वे लोग हैं, जिन्हें पंजाब सरकार ने मुक्त कर दिया है. किंतु इस घोषणा (शाही घोषणा) के प्रकाशन के आज पाँच महीने बाद भी इन दोनों भाइयों को छोड़ा नहीं गया है.” इस टिप्पणी से स्पष्ट है कि महात्मा गांधी यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि अंग्रेज सरकार जल्द से जल्द सावरकर बंधुओं को स्वतंत्र करे. सावरकर बंधुओं के प्रकरण में अपनायी जा रही दोहरी नीति को उन्होंने अपने पत्र के माध्यम से जनता के बीच उजागर कर दिया. महात्मा गांधी अपने इस आलेख में अनेक तर्कों से यह इस सिद्ध कर रहे थे कि ब्रिटिश सरकार के पास ऐसा कोई कारण नहीं कि वह अब सावरकर बंधुओं को कैद में रखे, उन्हें तुरंत मुक्त करना चाहिए. हम जानते हैं कि महात्मा गांधी अधिवक्ता (बैरिस्टर) थे. सावरकर बंधुओं पर लगाई गईं सभी कानूनी धाराओं का उल्लेख और अन्य मामलों के साथ तुलना करते हुए गांधी जी ने इस लेख में स्वातंत्र्यवीर सावरकर बंधुओं का पक्ष मजबूती के साथ रखा है. उस समय वाइसराय की काउंसिल में भी सावरकर बंधुओं की मुक्ति का प्रश्न उठाया गया था, जिसका जिक्र भी गांधी जी ने किया है. काउंसिल में जवाब में कहा गया था कि ब्रिटिश सरकार के विचार से दोनों भाइयों को छोड़ा नहीं जा सकता. इसका उल्लेख करते हुए गांधी जी ने अपने इसी आलेख के आखिर में लिखा है - “इस मामले को इतनी आसानी से ताक पर नहीं रख दिया जा सकता. जनता को यह जानने का अधिकार है कि ठीक-ठीक वे कौन-से कारण हैं, जिनके आधार पर राज-घोषणा के बावजूद इन दोनों भाइयों की स्वतंत्रता पर रोक लगाई जा रही है, क्योंकि यह घोषणा तो जनता के लिए राजा की ओर से दिए गए ऐसे अधिकार पत्र के समान है जो कानून का जोर रखता है.” आज जो दुष्ट बुद्धि के लोग वीर सावरकर की अप्रतिम छवि को मलिन करने का दुष्प्रयास करते हैं, उन्हें महात्मा गांधी की यह टिप्पणी इसलिए भी पढ़नी चाहिए क्योंकि इसमें गांधी जी ने भारत की स्वतंत्रता के लिए दोनों भाइयों के योगदान को भी रेखांकित किया है. यह पढ़ने के बाद शायद उन्हें लज्जा आ जाए और वे हुतात्मा का अपमान करने से बाज आएं. हालाँकि, संकीर्ण मानसिकता के इन लोगों की बुद्धि न भी सुधरे तो भी कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि जो भी सूरज की ओर गंदगी उछालता है, उससे उनका ही मुंह मैला होता है. क्रांतिवीर सावरकर तो भारतीय इतिहास के चमकते सूरज हैं, उनका व्यक्तित्व मलिन करना किसी के बस की बात नहीं. स्वातंत्र्यवीर सावरकर तो लोगों के दिलों में बसते हैं. युगद्रष्टा सावरकर भारत के ऐसे नायकों में शामिल हैं, जो यशस्वी क्रांतिकारी हैं, समाज उद्धारक हैं, उच्च कोटि के साहित्यकार हैं, राजनीतिक विचारक एवं प्रख्यात चिंतक भी हैं. भारत के निर्माण में उनका योगदान कृतज्ञता का भाव पैदा करता है. उनका नाम कानों में पड़ते ही मन में एक रोमांच जाग जाता है. गर्व से सीना चौड़ा हो जाता है. श्रद्धा से शीश झुक जाता है. (लेखक विश्व संवाद केंद्र, मध्यप्रदेश के कार्यकारी निदेशक हैं.)

May 27th 2020, 9:12 am

झीरम घाटी हत्याकांड – सात साल बाद भी अनसुलझी है झीरम माओवादी हमले की कहानी

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रायपुर. 25 मई का दिन हर साल अपने साथ एक भीषण खूनी संघर्ष की याद वापिस लेकर आता है. देश के सबसे बड़े आंतरिक हमलों में से एक झीरम हत्याकांड. छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में सात साल पहले हुई इस नक्सली घटना ने सबको झकझोर कर रख दिया था. 25 मई, 2013 की शाम को हुए इस हमले में 32 लोग अपनी जान गंवा बैठे थे. हमले में जान गंवाने वाले ज्यादातर छत्तीसगढ़ कांग्रेस के शीर्ष नेता थे, जिनकी स्मृतियां ही आज हम सब के बीच बाकी रह गई हैं. यह देश का दूसरा सबसे बड़ा माओवादी हमला था. यह हमला बस्तर जिले के दरभा के झीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुआ था. इस घटना की सातवीं बरसी मना रहे हैं, लेकिन आज भी इस जघन्य हत्याकांड की कई सच्चाईयों से पर्दा नहीं उठ पाया है. इस घटना को अंजाम देने के पीछे आखिर क्या वजह थी, यह आज तक पूरी तरह साफ नहीं हो पाया है.

भयावह हमले की पूरी कहानी –

25 मई 2013, करीब 5 बजे का समय था. भीषण गर्मी के बीच लोग अपने घरों और कार्यालयों में पंखे-कूलर की हवा के नीचे बैठे थे. इसी बीच अचानक टीवी पर एक खबर आई. छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के झीरम घाटी में करीब डेढ़ घंटे पहले एक माओवादी हमला हुआ था. यूं तो यहां आज भी रोजाना माओवादी हिंसा होती है, लेकिन यह घटना उन घटनाओं से कहीं अधिक खौफनाक और भीषण थी. प्रारंभिक खबर आने के करीब 15 मिनट बाद अपडेट खबर आई. इस खबर में बताया गया कि माओवादी हमले में बस्तर टाइगर के नाम से मशहूर कांग्रेसी नेता महेन्द्र कर्मा और नंद कुमार पटेल सहित कई लोग मारे गए हैं. विद्याचरण शुक्ल की हालत गंभीर है.

इसके बाद धीरे-धीरे खबर का दायरा बढ़ने लगा. रात करीब 10 बजे जब यह जानकारी आई कि हमले में कुल 32 लोग मारे गए हैं, तो लोगों को इस खबर पर भरोसा कर पाना मुश्किल हो रहा था. एक-एक कर घटना में मारे गए लोगों के नाम सामने आने लगे. इनमें वे नाम थे जो उस वक्त छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के पहली कतार के नेता थे. यह देश के इतिहास का दूसरा सबसे बड़ा नक्सल हमला था.

घटना को भले ही 7 साल हो गए, लेकिन इसके जख्म आज भी पूरी तरह ताजा हैं. घटना की जांच लंबे समय तक अटकी रही और फिर राज्य में कांग्रेस की सरकार के सत्ता में आने के बाद इसकी जांच फाइल दोबारा खोली गई है. इस घटना में कुछ नक्सली लीडर के नाम सामने आए, जिन पर एनआईए ने भी नगद इनाम की घोषणा की है, लेकिन इनमें से कुछ को छोड़कर अधिकांश नक्सली पकड़ में नहीं आए हैं.

नवंबर 2013 में राज्य में विधानसभा चुनाव होने थे. आपसी अंतरकलह से उबर कर एकजुटता दिखाते हुए कांग्रेस राज्य में परिवर्तन यात्रा निकाल रही थी. इस यात्रा में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस के सभी वरिष्ठ नेता शामिल थे. अलग-अलग इलाकों से होते हुए कांग्रेस की यह यात्रा नक्सलियों के गढ़ से गुजर रही थी. 25 मई को प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, दिग्गज कांग्रेसी विद्याचरण, शुक्ल, बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा और बहुत सारे नेताओं के साथ यात्रा पर थे.

सुकमा जिले में एक सभा के बाद सभी नेता सुरक्षा दस्ते के साथ काफिला लेकर अगले पड़ाव के लिए निकले थे. काफिले में सबसे आगे नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल और कवासी लखमा (वर्तमान में राज्य में आबकारी मंत्री) सुरक्षा गार्ड्स के साथ आगे बढ़ रहे थे. पीछे की गाड़ी में मलकीत सिंह गैदू और बस्तर टाइगर महेन्द्र कर्मा सहित कुछ अन्य नेता सवार थे. इस गाड़ी के पीछे बस्तर के तत्कालीन कांग्रेस प्रभारी उदय मुदलियार कुछ अन्य नेताओं के साथ चल रहे थे.

इस काफिले में सबसे पीछे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विद्याचरण शुक्ल एनएसयूआई के दो नेताओं देवेन्द्र यादव (अब भिलाई से विधायक) व निखिल कुमार के साथ थे. इस पूरे काफिले में करीब 50 लोग शामिल थे. दोपहर 3 बजकर 50 मिनट पर यह काफिला घने जंगलों से घिरी झीरम घाटी पर पहुंचा. अचानक दोनों से ओर से बंदूक से चली गोलियों की आवाज गूंजने लगी. काफिले में सबसे आगे चल रही गाड़ी को नक्सलियों ने पहला निशाना बनाया.

इस घटना में पीसीसी के अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश की मौके पर ही मौत हो गई. इसके बाद लगातार गोलियों की आवाज झीरम घाटी में गूंजने लगी. करीब एक घंटे तक गोलियां बरसती रहीं. मौत का तांडव जारी था. एक के बाद एक काफिले की गाड़ियां गोलीबारी की जद में आती रहीं. घाटी के दोनों ओर ऊंची पहाड़ियों में चढ़कर सैकड़ों नक्सली अंधाधुंध गोलियां बरसा रहे थे. करीब एक घंटे बाद गोलीबारी बंद हो गई. अब तक मीडिया के जरिये यह खबर पूरे देश में फैल चुकी थी. सुरक्षा बल मौके पर पहुंचे तो दूर-दूर तक सिर्फ लाशें बिखरी पड़ी थीं.

एक ओर वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विद्याचरण घायल अवस्था में पड़े थे. महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल, दिनेश पटेल, उदय मुदलियार सहित कई बड़े नेता हमले में मारे जा चुके थे. टीवी और न्यूज पोर्टल पर उस भयावह मंजर की तस्वीरें अब नजर आने लगी थीं. रात तक पूरे राज्य में शोक की लहर दौड़ पड़ी. घटना की पूरी कहानी अब स्पष्ट हो चुकी थी. किसी ने अंदाजा भी नहीं लगाया था कि छत्तीसगढ़ में माओवादी इतनी बड़ी घटना को अंजाम दे सकते हैं, लेकिन यह एक कड़वी सच्चाई थी.

घायल विद्याचरण कोमा में रहने के बाद करीब 2 माह बाद इस दुनिया से चले गए. घटना में कई नेताओं के साथ ही कुल 32 लोग मारे गए थे. इस रक्त रंजिश घटना को आज 7 साल पूरे हो चुके हैं. मामले की जांच आज भी चल रही है, लेकिन अब तक पूरे षड्यंत्र का खुलासा नहीं हो पाया है. इस घटनाक्रम के अंदर की कहानी आज भी अनसुलझी ही है.

साभार – जागरण

May 26th 2020, 11:28 am

रांची – ट्रेन से झारखंड पहुंचे दिव्यांग छात्रों को स्वयंसेवकों ने घर पहुंचाया

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रांची (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की ओर से जरूरतमंदों को भोजन कराने के साथ-साथ एनएच पर कैंप लगाकर प्रवासी मजदूरों को मदद करने का काम लगातार जारी है. इस काम में सहयोग करने के लिए झारखंड के प्रांत प्रचारक रविशंकर भी लगातार पहुंच रहे हैं और पूरे अभियान की निगरानी कर रहे हैं. विश्वास इतना बढ़ा है कि बाहर से आने वाले लोग स्वयंसेवकों से संपर्क कर रहे हैं. रविवार को दिल्ली से पहुंचे दो दृष्टिहीन विद्यार्थियों को उनके घरों तक पहुंचाने का काम स्वयंसेवकों ने किया. इस काम से उनके परिवार वाले बड़े खुश हुए. उन्‍होंने कहा कि आज तक संघ के बारे में सुनता था, देख भी लिया.

झारखंड के दो मेधावी दृष्टिहीन छात्र दिल्ली के दृष्टिहीन महाविद्यालय में एमए की पढ़ाई कर रहे हैं. ये हैं, खूंटी जिले के लोधमा कला निवासी गुन्नू कुजूर एवं रांची जिला के अंतर्गत राहे निवासी मृत्युंजय महतो. लॉकडाउन को लेकर कॉलेज एवं छात्रावास बंद कर देने के कारण सभी दृष्टिहीन छात्रों को अपने घर जाने का निर्देश दिया गया. ट्रेन चलने के बाद रांची के दोनों छात्र रविवार को राजधानी स्पेशल ट्रेन से रांची पहुंचे. यहां से घर जाने के लिए राष्ट्रीय दृष्टिहीन संघ के झारखंड के महासचिव जयराम प्रधान, जो चक्रधरपुर के हैं, उनसे मदद मांगी. जयराम ने जिला प्रशासन के पदाधिकारियों से संपर्क साधा, पर लोगों ने हाथ खड़े कर दिए. फिर रांची में संघ के स्वयंसेवक अक्षय सिंह से संपर्क किया. उन्होंने रांची विभाग सेवा प्रमुख कन्हैया कुमार को सारी बात बताई. फिर वीरेंद्र त्रिपाठी के एंबुलेस से दोनों छात्रों को उनके घरों तक सुरक्षित पहुंचा दिया गया.

सेवा भारती के कार्यकर्ता फिजिकल डिस्टेंसिंग के लिए लगा रहे निशान

सेवा भारती के कार्यकर्ता पिछले 58 दिनों से जरूरतमंदों को भोजन कराने के साथ-साथ अब बैंकों, सब्जी बाजार, होटल, मंदिर, दवा दुकान, एटीएम आदि के बाहर फिजिकल डिस्टेंसिंग के लिये निशान लगाना भी शुरू किया है. दो गज दूरी पर गोल घेरे बनाए जा रहे हैं. रविवार को बिरसा चौक और हिनू चौक के पास 45 स्थानों पर घेरे बनाए गए.

May 26th 2020, 11:28 am

भाग चार, नवसृजन की प्रसव पीड़ा है – ‘कोरोना महामारी’

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नरेंद्र सहगल

छोड़ने होंगे संस्थागत स्वार्थ

सर्वस्वीकृत मंच की आवश्यकता

कोरोना महामारी व्यापक एवं भयंकर रूप धारण कर रही है. बड़े-बड़े पूंजीवादी, साम्यवादी, समाजवादी और तथाकथित सुधारवादी देश इसकी चपेट में आकर कराह रहे हैं. इस जानलेवा त्रासदी में भी कुछ बड़े देश हथियारों के परीक्षण की योजना बना रहे हैं. साम्यवादी चीन पर कोरोना वायरस को बनाने और इसे पूरे विश्व में फैलाने का आरोप लग रहा है. एक प्रकार से यह विश्वयुद्ध छेड़ने जैसा आरोप है.

इस भयंकर महामारी ने संसार के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है. अमरीका सहित लगभग 150 देशों ने चीन को कटघरे में खड़ा कर दिया है. उधर, चीन भी अपने शस्त्र भण्डार के बल पर अमरीका और उसके मित्र अथवा समर्थक देशों की किसी भी प्रकार की चुनौती का सामना करने की पुरजोर तैयारियों में जुट गया है. चीन ने पुन:  भारतीय क्षेत्रों में अपनी नजरें गड़ाकर लेह-लद्दाख की सीमा पर सैनिक हस्तक्षेप प्रारंभ करके भारत को भी चुनौती दे दी है.

जरा कल्पना करें कि यदि अनियंत्रित कोरोना महामारी के साथ अनियंत्रित परमाणु युद्ध भी प्रारंभ हो गया तो मानव जाति का क्या बनेगा. अपने राष्ट्रगत अहंकार में डूबे अमरीका, रूस और चीन जैसे देश तो इस सम्भावित विनाश काल मे जलती आग पर तेल छिड़कने का ही काम करेंगे. ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ की कहावत व्यवहार में परिणत होती हुई स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है. किसी भी समय चीन द्वारा छोड़ा गया वर्तमान ‘कोरोना विश्वयुद्ध’ अब परमाणु विश्वयुद्ध में बदल सकता है.

समस्त संसार के अस्तित्व पर खतरा बन चुके इस कथित विनाश काल के समय भारतवर्ष को अपने दैवीय उद्देश्य की पूर्ति के लिए कमर कसनी होगी. अगर विश्वयुद्ध की शुरूआत हुयी तो वह भारत के उत्तरी द्वार पर चीन की सैन्य दस्तक से ही होगी. इन परिस्थितियों में भारत को कोरोना और परमाणु दोनों युद्धों से लड़ते हुए अपने उस वैश्विक कर्तव्य को करना होगा जो सृष्टि निर्माता ने उसे अनादि काल से ही सौंपा हुआ है. अगर मध्य काल की कुछ शताब्दियों को छोड़ दिया जाए तो भारत ने सनातन काल में अपना वैश्विक कर्तव्य निभाया है. पुन: उसी बुनियाद पर खड़ा होकर भारत अब भी अपना दैवीय कर्तव्य निभाएगा.

अब जरा इस पर विचार करें कि क्या भारत और भारतवासी विधाता द्वारा सौंपे गए इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए तैयार हैं. असंख्य जातियों, असंख्य मजहबों, असंख्य पूजा पद्धतियों और असंख्य भाषाओं वाला देश ‘विविधता में एकता’ की अपनी राष्ट्रीय पहचान के आधार पर एकरस हो जाएगा. क्या सनातन भारतीय संस्कृति वह धरातल प्रदान कर सकती है, जिस पर एकजुट खड़े होकर 135 करोड़ भारतवासी पुन: ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ समस्त मानवता का भला और आत्मवत् सर्वभूतेषु ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ सभी प्राणियों में एक ही आत्मा का वास का उद्घोष करें.

आज तो अपने देश में धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक सभी क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न डफलियां बजाई जा रही हैं. संस्थागत अहंकार सातवें आकाश को छू रहा है. दलहित स्वार्थ राष्ट्रहित पर भारी पड़ रहा है. हमारे ही दल एवं संस्थान की शरण में आने से कल्याण होगा. हमारे ही गुरु द्वारा प्रशस्त मार्ग और हमारे ही गुरूमंत्र की साधना से मानवता का कल्याण हो सकता है. एक ओर हम विविधता में एकत्व की बात करते हैं और दूसरी ओर ‘हमारा मार्ग ही अंतिम मार्ग है’ की तोता रटंत से बाज नहीं आते. समन्वय शून्य यह भाव वर्तमान में हमारे राजनैतिक, सामाजिक एवं धार्मिक सभी क्षेत्रों में व्याप्त है.

भारत को यदि अपना और विश्व का कल्याण करना है तो सर्व समन्वय का धरातल तैयार करना होगा. जब तक हमारी विविधता में एकरसता और सामंजस्य की भावना व्याप्त रही हमारी भारत माता विश्वगुरू के सिंहासन पर शोभायमान रही. जब तक हमारी विविधता आध्यात्म पर आधारित रही, हम संसार के मार्गदर्शक बने रहे. परंतु जब हमारी ही त्रुटियों की वजह से हमारी विविधता भौतिकवाद पर आधारित हो गई, तो हम आपस में लड़ कर अपना सर्वस्व गवां बैठे. परिणाम स्वरूप हम निरंतर 1200 वर्षों तक परतंत्र रहे.

अत: वर्तमान वैश्विक चुनौती को स्वीकार करते हुए हमें अपनी अमर अजर सनातन संस्कृति की ओर लौटना होगा. अन्यथा ना तो भारत का ही कल्याण होगा और ना ही विश्व का. उल्लेखनीय है कि संसार की प्रायः सभी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रचनाएं विफल हो चुकी हैं. भारत की धरती पर प्रदत्त ‘धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष’ की जीवन शैली ही विश्व को बचा सकती है. धर्म अर्थात नैतिक कर्तव्यों का पालन करते हुए आवश्यकता के अनुसार (आवश्यकता व्यक्तिगत एवं सामाजिक) अर्थ का संग्रह करते हुए सुखी जीवन व्यतीत करें. यही मोक्ष का एकमात्र मार्ग है. यही मार्ग विश्व में स्थाई अमन चैन दे सकता है.

एक और महत्वपूर्ण सच्चाई को समझना भी अत्यंत आवश्यक है. आज भले ही राजनीति का बोलबाल हो परंतु भारत की जनता राजनीतिक दलों एवं नेताओं पर तनिक भी भरोसा नहीं करती. भारतवासी आज भी अपने धर्म गुरूओं, धार्मिक, सांस्कृतिक संस्थानों और संत महात्माओं पर आस्था एवं विश्वास रखते हैं. अधिकांश भारतवासी किसी ना किसी धार्मिक व्यवस्था के साथ जुड़े हैं.

अत: यदि हमारी धार्मिक संस्थाएं एवं धर्मगुरू किसी एक मंच पर एकत्रित हो जाएं और अपनी-अपनी पूजा-पद्धतियों पर चलते हुए राष्ट्र साधना में लग जाएं तो भारत समेत संपूर्ण विश्व का कल्याण हो सकता है. कोरोना से निपटने एवं तत्पचात समाज को सनातन संस्कृति के आधार पर संगठित करने की जिम्मेदारी इन्हीं धार्मिक संगठनों की होगी.

 

May 26th 2020, 10:41 am

मॉब लिंचिंग – सब्जी वाले को पीट-पीटकर मार डाला, पुलिस ने दो को गिरफ्तार किया

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असम. कामरूप पुलिस ने सब्जी विक्रेता की हत्या के मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है. तीन आरोपी अभी भी फरार बताए जा रहे हैं. पांचों ने मिलकर रविवार को सनातन डेका की निर्ममता से पीट-पीटकर हत्या कर दी थी. गिरफ्तार आरोपियों की पहचान फैजुर हक तथा युसुफुद्दीन अहमद के रूप में हुई है.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सब्जी विक्रेता सनातन डेका साइकिल से जा रहा था, इसी दौरान होजो कस्बे के पास मोनाकुची गांव में साइकिल की टक्कर एक कार से हो गई थी. कार जलील अली चला रहा था. इसके पश्चात सनातन डेका की जलील अली और खाबिर अली से झड़प हो गई. बाद में जलील अली व उसके साथियों फैजुर हक, युसुफुददीन अहमद, फिरोज खान, खाबिर अली, पांचों ने मिलकर सनातन को निर्ममता के साथ पीटा. घटना के बाद आस पास के लोग पहुंचे तो पांचो आरोपी मौके से फरार हो गए. मारपीट में गंभीर रूप से घायल सनातन डेका को स्थानीय लोगों नजदीकी अस्पताल में ले गए, लेकिन वहां सनातन की मृत्यु हो गई.

घटना के पश्चात पुलिस ने पांचों के खिलाफ मामला दर्ज लिया है, जिनमें से दो आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार भी कर लिया है. शेष आरोपी अभी फरार हैं. कामरूप पुलिस ने ट्वीट कर बताया कि सनातन डेका हत्या मामले में पुलिस ने दो मुख्य आरोपियों फैजुर हक और युसूफुद्दीन अहमद को आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत गिरफ्तार किया है.

डेका टेटेलिया गांव का रहने वाला था और परिवार के पालन पोषण के लिए सब्जी बेचने का कार्य करता था. गरीब सब्जी विक्रेता के निर्मम हत्या के बाद से प्रदेश में आक्रोश पनप रहा है. अनेक सामाजिक संगठनों व स्थानीय लोगों ने आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की. वहीं, हिन्दू जागरण मंच तथा बजरंग दल ने आरोपियों को मौत की सजा देने की मांग की है.

 

May 26th 2020, 8:12 am

श्रमिक स्पेशल ट्रेन में स्वयंसेवकों द्वारा भोजन और मिनरल वाटर का निःशुल्क वितरण

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मुरादाबाद. कोरोना वायरस की वजह से देशभर में लागू लॉकडाउन के दौरान प्रावसी श्रमिकों की मदद के लिए स्वयंसेवक दिनरात जुटे हैं. इसी क्रम में सेवा भारती, मुरादाबाद ने आगामी एक सप्ताह तक प्रतिदिन लगभग 12000 से 15000 श्रमिकों को भोजन वितरण की योजना बनाई है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लगभग 400 स्वयंसेवक इस पुनीत कार्य में अपनी जान की परवाह किये बिना लगे हुए हैं. मुरादाबाद के स्वयंसेवक मार्च से ही सेवा कार्यों में जुटे हुए हैं. कार्यकर्ताओं ने दैनिक कार्य करने वाले व्यक्तियों जैसे रेड़ी-पटरी वाले, ठेला खोमचा लगाने वाले, रिक्शा आदि चलाने वाले, दैनिक मजदूरों को चिन्हित करके उनके घरों में आटा, चावल, दाल, आलू मसाला, नमक, तेल, साबुन आदि की किट बनाकर वितरित कीं, श्रमिकों को ले जाने वाली बसों पर समय-समय पर आवश्यकतानुसार भोजन वितरण किया, शेल्टर होम में भोजन वितरण किया, भारत सरकार के आयुष विभाग द्वारा निर्देशित काढ़े का पैकेट बनाकर स्वयंसेवकों ने घर-घर जाकर वितरित किये, 12 मई से प्रतिदिन पाकबड़ा जीरो पॉइन्ट पर श्रमिकों को ले जाने वाली बसों को रोककर लगभग 1000 व्यक्तिओं को प्रतिदिन भोजन करवा रहे हैं और आगे भी यह क्रम चलता रहेगा. रेलगाड़ी की योजना सरकार द्वारा अभी 31 मई तक की गई है.

विभाग प्रचार प्रमुख ने बताया कि सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने देश के सभी स्वयंसेवकों का आह्वान किया था कि संकट की इस घड़ी में सभी स्वयंसेवक अपनी योग्यता, क्षमताओं के अनुसार सेवा कार्यों में जुटें. हमारी जानकारी में कोई व्यक्ति भूखा न सोए. संघ के स्वयंसेवक इस कार्य में लग गए. मुरादाबाद के स्वयंसेवक भी वर्तमान संकट से लड़ने में असहाय एवं गरीबों की हर सम्भव सहायता में लगे हैं.

May 26th 2020, 8:12 am

स्वदेशी स्वावलंबन अभियान – डिजिटल हस्ताक्षर अभियान

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नई दिल्ली. स्वदेशी स्वावलंबन अभियान के अन्तर्गत 25 मई को सुबह 9.00 बजे राष्ट्रव्यापी डिजिटल हस्ताक्षर अभियान का शुभारम्भ स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय संयोजक आर. सुन्दरम जी ने मदुरई, तमिलनाडु से किया. साथ ही दिल्ली में आरके पुरम, शिव शक्ति मंदिर स्थित मंच के केंद्रीय कार्यालय में राष्ट्रीय संगठक कश्मीरी लाल जी, इस अभियान के राष्ट्रीय समन्वयक सतीश कुमार जी, कमलजीत जी ने अभियान की सफलता हेतु एक हवन किया. लगभग इसी समय देश के विभिन्न हिस्सों में भी अनेक प्रमुख लोगों द्वारा अभियान में डिजिटल फॉर्म भेज कर इस अभियान की शानदार शरुआत की. अभियान के तहत भारत के अधिकतम जिलों व स्थानों पर अधिकाधिक लोगों को डिजिटल हस्ताक्षर के माध्यम से इस अभियान से जोड़ा जाएगा.

अभियान का उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा लोगों में स्वदेशी के भाव का जागरण करना ताकि स्वदेशी नीतियों के प्रति देश में सकरात्मक वातावरण बने, अन्तोगत्वा विकास का स्वदेशी मॉडल विकसित हो, जिससे देश को आत्मनिर्भर बनाने में हम सब अग्रसर हो सकें.

विकास का स्वदेशी मॉडल मुख्य रूप से इन पांच बिदुओं पर आधारित है – (i) इच्छा से स्थानीय व स्वदेशी उत्पाद खरीदें, केवल मजबूरी में ही विदेशी वस्तु खरीदें अर्थात् स्वदेशी स्वीकार एवं विदेशी बहिष्कार, विशेष रूप से चाइनीज़ बहिष्कार. (ii) हमारे युवा उद्यमी व स्वरोजगारी बनें, दूसरों को भी रोजगार देने वाले हों. हर हाथ को काम मिले व प्रत्येक गाँव – जिला आत्मनिर्भर बने. (iii) प्राकृतिक खेती, किसान की आय वृद्धि, लघु कुटीर उद्योग व स्टार्टअप्स को पूर्ण प्रोत्साहन हो, उच्च प्रौद्योगिकी का विकास व प्रयोग हो. (iv) वैश्विक व्यापार, पूंजी व तकनीक का लेन देन भारत के समान हित की निति अनुसार हो, भारत एक वैश्विक ताकत बने. (v) पर्यावरण अर्थात वायु, जल, जमीन, जंगल, जानवर का संरक्षण हो. योग, पञ्चगव्य, स्वास्थ्य व स्वच्छता को प्राथमिकता हो.

डिजिटल हस्ताक्षर अभियान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे व्हाटसप्प, फेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम आदि के माध्यम से स्वदेशी जागरण मंच व संगठन पारिवार की अन्य संस्थाओं के सभी कार्यकर्ताओं, उनके परिवार के सदस्यों व मित्रों द्वारा चलाया जा रहा है. इसके लिए स्वदेशी स्वावलंबन अभियान में भाग लेने के आह्वान को एक सरल मैसेज द्वारा लोगों के पास भेजा जा रहा है. इसमें दिए गए लिंक को क्लिक करने से एक साधारण गूगल फॉर्म खुलता है, जिसमें सामान्य जानकारी जैसे नाम, फ़ोन नंबर आदि देने के बाद उपयोगकर्ता स्वदेशी अभियान में अपनी सहमति देते हुए इस फॉर्म को सबमिट करता है.

अभियान स्वदेशी जागरण मंच के डिजिटल प्लेटफार्म JoinSwadeshi.com से चलाया जा रहा है. मंच व बाहर के सब संगठनों के कार्यकर्ता इसके संचालन में लगेंगे. अभियान को लोकप्रिय बनाने के लिए इस अभियान में भाग लेते हुए समाज के महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों जैसे विश्वविद्यालय के वाईस चांसलर, शिक्षाविद, विभिन्न संस्थानों, सामाजिक-धार्मिक संगठनों के प्रमुखों, विधायक, सांसद आदि के फोटोग्राफ्स व वीडियो को समाचार पत्रों व सोशल मीडिया में प्रकाशित-प्रसारित कर लोगों को इसमें उत्साहपूर्वक भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाएगा.

अभियान के प्रति लोगों के उत्साह को देखते हुए ऐसी आशा की जा रही है कि देश भर से करोड़ों लोग आने वाले दिनों में अभियान से जुड़ने वाले हैं. आइए हम सब मिलकर, भारत को आत्मनिर्भर एवं स्वावलंबी बनाने की दिशा में कदम बढ़ाएं.

लिंक पर क्लिक करके डिजिटल हस्ताक्षर अभियान का हिस्सा बनें –

https://joinswadeshi.com/digital-signature-for-self-reliant-bharat/

 

May 26th 2020, 8:12 am

गोरखपुर – संज्ञा समझाने के लिए शिक्षिका शादाब ने दिया पाकिस्तान का उदाहरण

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उदाहरण – पाकिस्तान हमारी प्रिय मातृभूमि है, मैं पाकिस्तान की सेना में शामिल होउंगा

नई दिल्ली. उत्तर प्रदेश में एक शिक्षिका ने संज्ञा,  समझाने के लिए पाकिस्तान का सहारा लिया. शिक्षिका ने पढ़ाया – पाकिस्तान हमारी प्रिय मातृभूमि है. रशीद मिनहद एक बहादुर सैनिक था….ऐसे अन्य उदाहरण दिए, जब अभिभावकों ने रोष जताया और विवाद बढ़ने लगा तो शिक्षक की ओर से अजीब तर्क दिया गया कि गूगल ने सबसे छोटे उदाहरण ढूंढ कर बच्चों को बताए, उन्होंने ध्यान नहीं दिया कि नाम क्या लिखा है. सवाल यह कि गूगल से ही पढ़ाना है तो अभिभावक भी पढ़ा लेंगे, फिर शिक्षक की आवश्यकता क्या है और दूसरा भारत में बच्चों को समझाने के लिए पाकिस्तान हमारी प्रिय मातृभूमि है, का उदाहरण लापरवाही या अनजाने में नहीं, बल्कि जानबूझकर ही दिया गया. जितना आसान शिक्षिका द्वारा दिया गया उदाहरण है, उतनी ही आसानी से भारत हमारी प्रिय मातृभूमि है, के उदाहरण से भी बच्चों को संज्ञा को समझाया जा सकता था. इसके पीछे की मंशा कहीं बच्चों में देश के प्रति नफरत भरने की तो नहीं.

मामला गोरखपुर के जीएन पब्लिक स्कूल से संबंधित है. कक्षा चार सेक्शन-ए की क्लास टीचर ने ऑनलाइन शिक्षण के लिए बने वाट्सएप ग्रुप पर नाउन (संज्ञा) की परिभाषा को समझाने के लिए पाकिस्तान के उदाहरण दिये. जब अभिभावकों ने ऑनलाइन क्लास ग्रुप पर पाकिस्तान के उदाहरण देखे तो लोग काफी नाराज हुए. कुछ अभिभावकों ने तुरंत वाट्सएप ग्रुप का स्क्रीन शॉट लेकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया. जब मामला ज्यादा गंभीर होने लगा तब शिक्षिका शादाब ने तुरंत पाकिस्तान शब्द को हटा दिया.

उदाहरण – पाकिस्तान हमारी प्रिय मातृभूमि है, मैं पाकिस्तानी सेना में शामिल होऊंगा, रशीद मिनहद एक बहादुर सैनिक था. ये तीन उदाहरण देकर बच्चों को समझाने का प्रयास किया गया कि तुम्हारा रिश्ता भारत से नहीं पाकिस्तान से है.

शादाब खानम द्वारा ऑनलाइन शिक्षण कार्य के दौरान पाकिस्तान को लेकर दिए आपत्तिजनक उदाहरण की विद्यालय प्रबंधन ने कड़े शब्दों में निंदा की है. मामला संज्ञान में आने के बाद शिक्षिका से पूछा है, उन्होंने स्वीकार किया है कि उनसे गलती हो गई है. विद्यालय प्रबंधन ने मामले की जांच के लिए कमेटी गठित कर दी. नोटिस भेजा गया है. स्पष्टीकरण के बाद कार्रवाई होगी. विद्यालय प्रबंधन ने कहा कि शिक्षिका का यह अपराध अक्षम्य है. विद्यालय की तरफ से एनसीईआरटी द्वारा प्रमाणित पुस्तकों का अवलोकन करते हुए ही अध्यापन कार्य करने की अनुमति है. हमें अपनी राष्ट्रीयता का हर स्तर पर सम्मान करना होगा. जो भी इसके विरुद्ध आचरण करेगा, उस पर कार्रवाई की जाएगी.

सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद शिक्षिका शादाब खानम ने सफाई देते हुए कहा मेरा मकसद बच्चों को आसान तरीके से संज्ञा समझाना था. इसके लिए मैंने गूगल से सर्च कर सबसे छोटा उदाहरण ढूंढ़ा था. मैंने यह नहीं देखा कि पाकिस्तान है, चाइना है या फिर अमेरिका. जब बाद में मेरे संज्ञान में आया कि इससे लोगों को तकलीफ पहुंची है, तब मैंने पाकिस्तान शब्द हटा दिया है.

May 25th 2020, 1:47 pm

क्या प्रवासी श्रमिक भोजन के लिए तरसने वाले लोग हैं या देश की एकता के सेतु

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श्याम प्रसाद

प्रतीकात्मक चित्र

कोरोना से पूरा देश लॉकडाउन हो गया. प्रवासी श्रमिकों की अपने-अपने घर की ओर बाल-बच्चों के साथ पैदल चलने वाली हृदय विदारक तस्वीर ने देश की जनता के हृदयों को झकझोर दिया. सबसे पहले हमारी नजर में यह बात आई थी कि हर राज्य में हमारी कल्पना से परे प्रवासी श्रमिक जीवन बिता रहे हैं. ये प्रवासी श्रमिक कौन हैं? उनकी समस्याएँ क्या-क्या हैं?

निकट रास्ते से अधिकार पाने की चाह रखने वाले हमारे राजनैतिक नेता कई बार प्रादेशिक भावोद्वेगों को भड़काते रहते हैं. शिवसेना के नेताओं की चेतावनी – “मुंबई सिर्फ मराठी लोगों की है. दूसरे राज्यों के लोगों को यहाँ रोजगार के लिए आना नहीं चाहिए.” तेलंगाना आंदोलन के संदर्भ में के.सी.आर की चेतावनी; “तेलंगाना से आंध्रा वाले चले जाएँ”, तमिळनाडु के डीएमके के नेताओं की चेतावनी; “हम द्रविड़ हैं, उत्तर भारत के आर्यों का आधिपत्य हमें नहीं चाहिए.” असम के आंदोलन के संदर्भ में ‘आसू’ नेताओं की चेतावनी; “असम में दूसरे राज्यों के लोगों को नहीं रहना चाहिए”, इन सबको हमने देखा था. इन सभी चेतावनियों को दरकिनार करते हुए अपने पेट की भूख मिटाने के लिए, हर राज्य से लाखों गरीब जनता, दूसरे राज्यों में जाकर तरह-तरह के काम करते हुए, लोगों की जरूरतों को पूरा करती आ रही है. इस तरह के प्रवासी श्रमिकों में ज्यादातर गावों के भूमिहीन गरीब श्रमिक ही दिखाई देते हैं. कुछ लोगों के पास जमीन होती है लेकिन बहुत कम. पानी की सुविधा न होने के कारण वे कृषि पर आधारित जीवन बिता नहीं सकते. इसलिये कुछ लोग प्रवासी श्रमिक बन जाते हैं. इनमें ज्यादातर लोग अनुसूचित जातियों के ही  होते हैं. फिर भी सभी जातियों के लोग प्रवासी श्रमिकों में दिखाई देते हैं.

हर राज्य में दूसरे राज्यों से आने वाले ये लोग भवन-निर्माण, बढ़ई, बिजली, मिट्टी खोदना जैसे श्रम पर आधारित काम करते हैं. ऐसे काम स्त्री और पुरुष सब लोग करते हैं. उनके शिशु पेड़ों के नीचे साड़ी के झूले में सो जाते हैं और मिट्टी में खेलते रहते हैं. प्रवासी श्रमिकों के बच्चों की पढ़ाई होती नहीं. उनके बूढ़े माँ-बाप अपने गावों में घर के पहरेदार बनकर रह जाते हैं. इस तरह के श्रमिक दिल्ली, मुंबई, कोलकत्ता, बेंगलूर, हैदराबाद जैसे बड़े -बडे महानगरों में लाखों संख्या में काम कर रहे हैं. बड़े-बड़े बहु मंजिला इमारतें, सुंदर फ्लाईओवर ब्रिज, विलासी गाड़ियों से भरे चौड़ी सड़क, इन सुंदर तस्वीरों के पीछे, किसी की नजर में नहीं आने वाले अदृश्य रूप से लाखों संख्या में श्रमिक अपना जीवन किसी न किसी तरह से बिताते आ रहे हैं. इनकी कोई भी परवाह नहीं करता. ये लोग भारत भर के सभी राज्यों से आते हैं,  भारत के सभी राज्यों में रहते हैं. आर्थिक दृष्टि से देखें तो सभी राज्यों में रहने वाले ये प्रवासी श्रमिक भोजन के लिए तड़पने वाले लोग हैं. सामाजिक दृष्टि से देखें तो इनमें सभी जातियों और सभी धर्मावलंबी शामिल हैं. देश की एकता की दृष्टि से देखें तो ये लोग ‘देश की एकता के सेतु’ कहलाने योग्य हैं. इनमें अपने राज्य के प्रति, अपनी भाषा के प्रति प्रेम दिखाई देता है, लेकिन दूसरे राज्यों के प्रति और दूसरी भाषाओं के प्रति इनमें कहीं घृणा नहीं दिखाई देती है. दूसरों को ये नीचा करके नहीं देखते.

तेलुगु राज्यों की तस्वीर

आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम, विजयनगरम, और विशाखपट्टनम में रहने वाले तटवर्ती प्रदेशों के मछुआरे समुंदर में शिकार नहीं मिलने के कारण कई सालों से उत्तर भारत के समुंदर के तटवर्ती प्रदेशों और गुजरात की ओर जा रहे हैं. प्रकाशम और नेल्लूरु के रहने वाले तटवर्ती प्रदेशों के मछुआरे कर्नाटक के समुंदर के तटवर्ती प्रदेशों के प्रवासी बनकर जा रहे हैं. नेल्लूरु जिले के उदयगिरि, प्रकाशम जिले के कनिगिरि की ओर रहने वाली जनता, पीने के पानी के अभाव में और कृषि के लिए पानी उपलब्ध नहीं होने से ईंट बनाने का काम ढूँढते हुए कई सालों से अलग-अलग राज्यों की ओर प्रवास कर रहे हैं.

रायलसीमा जिलों के लोगों को सरकार नजरअंदाज करती है. इनमें से मुख्य रूप से अनंतपुरम जिले के कृषि आधारित श्रमिक और छोटे-मोटे कृषक हजारों संख्या में गाँव खाली करके बेंगलूर शहर की ओर जा रहे हैं. रायलसीमा प्रदेश से राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री चुने गये. फिर भी आज अनंतपुरम जिले के कई गावों में पीने के पानी की बड़ी समस्या है. यह शासकों की विफलता का कारण ही नहीं प्रवासी श्रमिकों के अस्तित्व की भी समस्या है. तेलंगाना का पालमूरु जिला प्रवासी श्रमिकों के जिले के रूप में प्रसिद्ध है. कई साल से इस जिले से प्रवासी श्रमिक मुंबई जाते हैं. ये सिर्फ आंध्र प्रदेश और तेलंगाना  की कुछ खबरें मात्र हैं. यहाँ के हर शहर में भवन निर्माण का काम करने वाले श्रमिकों में से ज्यादातर लोग बिहार राज्य के ही हैं.

चिकित्सा की आपातकालीन स्थिति से आर्थिक आपातकालीन स्थिति की ओर

कोरोना वायरस से लोगों को बचाने के लिए केद्र प्रशासन ने लॉकडाउन की घोषणा की. यह एक तरह से चिकित्सा परक आपतकालीन स्थिति है. देश के गावों की जनता सरकार की ओर से बताए गए सभी नियमों का यथावत अनुसरण कर रही है. शहरों में रहने वाले पढ़े-लिखे लोगों में इन नियमों के आचरण के प्रति श्रद्धा नहीं दिखाई देती. ताजा खबर यह है कि हैदराबाद के मादन्नपेटा बस्ती में एक शिशु के नामकरण उत्सव के अवसर पर 50 लोग एकत्रित हुए. इसके फलस्वरूप माँ और शिशु के साथ 30 लोगों को कोरोना लग गया.

केंद्र सरकार की ओर से लॉकडाउन की घोषणा करते हुए लिखित रूप में स्पष्ट सूचनाएँ भेजी गयी थीं कि प्रवासी श्रमिकों को एक जगह से दूसरी जगह भेजना नहीं चाहिए और जो जहाँ है, उनको वहीं आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराना चाहिए. फिर भी दिल्ली के मुख्यमंत्री ने इन सूचनाओं को ठुकरा दिया था और दिल्ली में रहने वाले उत्तर प्रदेश के प्रवासी श्रमिकों को बसों में भेजने की कोशिश की. गरीब जनता-विरोधी कार्रवाई में भाग लेने वाले कुछ IAS अधिकारी अपनी गलती के लिए निलंबित हुए थे. देशभर में ‘सेवाभारती’ और अन्य कई सेवा संस्थाओं की ओर से गरीब जनता के साथ, इन प्रवासी श्रमिकों को भी भोजन के पैकेट, पीने का पानी, सेनेटाइजर आदि उपलब्ध कराए गए. हो सकता है कि ज्यादातर लोगों को इनकी सेवाएँ नहीं मिली हों.

एक ओर प्रवासी श्रमिकों के सामने करने के लिए कोई काम नहीं था. लोग ऐसी जगह रह गये जो उनका अपना गाँव भी नहीं था. इसके ऊपर कोरोना का डर भी था. फिर काम कब से शुरु होंगे – इसकी भी कोई जनकारी नहीं थी. एक ऐसी स्थिति आ गयी थी कि किस ओर जाएं? क्या करें? स्पष्ट नहीं था. बाकी जनता की तरह रहने के लिए इन प्रवासी श्रमिकों के पास कोई घर नहीं था. पच्चीस (25) दिन बीतने के बाद देश के सभी प्रवासी श्रमिकों के मन में यह बात आ गयी थी कि हम अपने-अपने गाँव चले जाएँगे. वे इन निर्णय पर पहुँच गए कि ‘अपने गाँव में सुरक्षित रहेंगे’; ‘जो कुछ मिलता है वही खाएँगे’. इन प्रवासी श्रमिकों के मन की स्थिति के प्रति ध्यान देते हुए केंद्र सरकार ने लॉकडाउन के तीसरे चरण में प्रवासी श्रमिकों को अपने-अपने राज्य भेजने की स्वीकृति देते हुए विषेश रेल गाड़ियों की व्यवस्था की. इस अवसर पर केंद्र और राज्य प्रशासन के नेता यह विश्वास प्रवासी श्रमिकों में नहीं भर सके कि आप अपने-अपने गाँव मत जाएं. फिर से काम शुरु होंगे. जैसा काम कर रहे थे, आप लोग आगे भी अपना-अपना काम वैसे ही कर सकते हैं.

केंद्र सरकार ने स्वीकार किया था कि इन विषेश रेल गाड़ियों में 85 प्रतिशत रेल का किराया केंद्र प्रशासन वहन करेगा और 15 प्रतिशत उन -उन राज्यों को देना होगा, जहाँ से प्रवासी श्रमिक निकलते हैं. देश के पाँच राज्यों से यथा महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बंगाल और तमिळनाडु से केंद्र सरकार को उचित सहायता नहीं मिली. केंद्र सरकार ने विदेशों में फंसे भारतीयों को देश में वापिस लाने के लिए विशेष हवाई जहाज और जहाजों की व्यवस्था की. लेकिन कुछ राज्यों के प्रवासी श्रमिकों अपने राज्यों की ओर जाने के प्रति ध्यान नहीं दिया. एक ओर भारी संख्या में अपने घर की ओर मुख्य सड़कों से परिवार और बच्चों के साथ पैदल चलने वाले प्रवासी श्रमिकों के दृश्य, राज्यों की सरहदों पर भीड़ में एकत्रित प्रवासी श्रमिक, भावोद्वेग में विद्रोह करने वाले कुछ लोग, 25 दिन से दिन-रात काम करने वाली पुलिस संतुलन खोकर प्रवासी श्रमिकों पर लाठीचार्ज करने के दृश्य और मौका देखकर मोदी सरकार की आलोचना करने के लिए राह देखने वाला कांग्रेस और वामपंथी बुद्धिजीवी कार्यकर्ता प्रवासी श्रमिकों की स्थिति पर अपनी आँसू बहा रहे थे. इन प्रवासी श्रमिकों की समस्या को लेकर देश में अराजक माहौल तैयार करने की कुछ बुरी ताकतों की योजनाएँ – यह वर्तमान की स्थिति है.

हैदराबाद से प्रवासी श्रमिकों की रेलगाड़ी बिहार के पटना शहर पहुंची. रेलगाड़ी से उतरने वाले कुछ प्रवासी श्रमिकों ने अपनी मातृभूमि पहुँचते ही प्लेटफॉर्म से उतर कर अपनी मातृभूमि बिहार की वंदना की थी. उन तस्वीरों में यह व्याकुलता दिखाई देती है कि किसी न किसी तरह से अपने गाँव चला जाए. शासकों और उन गाँव में रहने वाले लोगों में यह डर था कि ये प्रवासी श्रमिक अपने-अपने गाँव आ जाएं तो अब तक सुरक्षित उन गाँवों में कोरोना वायरस फैल जाएगा. उनके डर में भी सच्चाई दिखाई देती है. इन सभी लोगों को क्वारेंटाइन में रखना कोई ममूली बात नहीं है, लेकिन अवश्य रखना ही चाहिए.

अभी भी विभिन्न राज्यों के सड़कों पर पैदल चलने वाले प्रवासी श्रमिकों के दृश्य दिखाई देते हैं. इनको कई स्थानों पर आर.एस.एस, सेवा भारती, समरसता फॉउन्डेशन तेलंगाना और आंध्र में भेजन के पैकेट, पीने के लिए पानी और कुछ जगहों पर जूते भी दे रहे हैं.

कोरोना के फैलाव को रोकने के लिए अब तक लॉकडाउन के नाम पर चिकित्सा-आपातकालीन- स्थिति अप्रकटित रूप में लागू हो गई. अब इस स्थिति से बाहर आना शुरु हो गया है. लॉकडाउन से देश के अर्थिक-चक्र की गति रुक गई थी. पूरा देश अप्रकटित- आपातकालीन -स्थिति में प्रवेश कर गया था. इसका प्रभाव सभी वर्गों की जनता पर दिखाई देता है. केंद्र सरकार ने बड़े अर्थिक पैकेज की घोषणा की. इसका कार्यान्वयन करने वाली राज्य सरकारों को मन लगाकर काम करना चाहिए. इस तरह से नहीं सोचना चाहिए कि प्रवासी श्रमिकों पर किये जाना वाला खर्च अनुत्पादक है.

स्वयं समृद्ध गाँवों के निर्माण की दिशा में

अपने-अपने गाँव पहुँचने वाले प्रवासी श्रमिकों में से कुछ लोगों ने निर्णय लिया था कि काम की तलाश में अब बाहर नहीं जाना चाहिए. ऐसी स्थिति में गाँवों को आर्थिक दृष्टि से स्वयं समृद्ध (Economic self-sufficiency) बनाने के लिए इन्हीं गाँवों में उन प्रवासी श्रमिकों की सेवाओं को लेने की जरूरत है. इसके लिए विशेष योजनाओं को बनाना चाहिए. इन योजनाओं का उचित रूप में कार्यान्वयन करना चाहिए. इस काम में केंद्र और राज्य सरकारों को ऐसी कुछ प्रमाणिक स्वच्छंद संगठनों की मदद लेनी चाहिए.

प्रवासी श्रमिकों के लिए रोजगार देने की योजनाएँ बनाना चाहिए

केंद्र और राज्य सरकारों की यह जिम्मेदारी होगी कि अपने राज्य के हों या दूसरे राज्यों के प्रवासी- श्रमिक, सबको समान मानते हुए रोजगार के काम देने चाहिए. कोई भी प्रवासी-श्रमिक भूख से नहीं तड़पे; भूख के कारण आत्महत्या न करे. इसके लिए विशेषज्ञों को अपनी अमूल्य सलाह देनी चाहिए, जिससे कि केंद्र और राज्य सरकार और स्वच्छंद सेवा संगठन, एक सुनिश्चित नीति अपनाएं और कार्यक्रम करें. केंद्र और राज्य सरकार भी अधिकार के मायाजाल की चौखट से बाहर आकर विशेषज्ञों की सलाह स्वीकार करे और उनके कार्यान्वयन की कोशिश करनी चाहिए. इस संकट- समय में समस्याओं के आधार पर आंदोलन की ओर नहीं; समस्याओं को सुलझाने की दिशा में बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ताओं को प्रयास करना चाहिए. देशभर के प्रवासी श्रमिकों के लिए रोजगार के अवसर मिलें – इस दिशा में उचित योजना बनाने और उनके कार्यान्वयन की दिशा में केंद्र और राज्य सरकारों को एक व्यवस्था का गठन करना चाहिए.

(लेखक अखिल भारतीय समरसता प्रमुख हैं.)

 

May 25th 2020, 1:47 pm

लॉकडाउन – चुनौतियों से निपटते हुए आत्मनिर्भरता की ओर

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लॉकडाउन के दौरान ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मी

नई दिल्ली. चीनी वायरस से बचाव के लिए भारत में घोषित लॉकडाउन को दो माह का समय पूरा हो गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च को संबोधन के दौरान देश में पूर्ण लॉकडाउन की घोषणा की थी. उस समय देश में कोरोना से संक्रमितों की संख्या 500 के लगभग थी. लॉकडाउन को तीन बार आगे बढ़ाया गया. तथा लॉकडाउन के हर चरण में पहले अधिक छूट प्रदान की गई. वर्तमान में चल रहे लॉकडाउन 4.0 में पाबंदियों का स्वरूप बदल चुका है. जीवन पटरी पर वापिस लौट रहा है. लेकिन संक्रमितों की संख्या निरंतर बढ़ रही है. अब संख्या सवा लाख के आंकड़े को पार कर चुकी है. भारत के समक्ष दो माह की अवधि के दौरान चुनौतियां भी आई हैं, लेकिन भारत ने आत्मनिर्भरता की ओर भी कदम बढ़ा दिए हैं. दो माह के दौरान अनेक उदाहरण हमारे समक्ष हैं.

अगर कोरोना महामारी को लेकर विश्व के अन्य देशों के आंकड़ों के आधार पर तुलना करें तो भारत की स्थिति काफी अच्छी है. जहां विश्व में कोरोना संक्रमितों की मृत्यु दर 6.5 प्रतिशत है, वहीं भारत में मृत्यु दर 3 प्रतिशत के लगभग है. यानि, दुनिया में प्रत्येक 1000 कोरोना संक्रमितों में से 65 की मौत हो रही है, तो भारत में 30 लोगों की ही जान जा रही है. लॉकडाउन के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को भी धक्का पहुंचा है. इसे फिर से गति देने के लिए केंद्र सरकार ने लगभग 21 लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज घोषित किया है. भारत इस संकट का अवसर के रूप में इस्तेमाल कर आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ रहा है. लॉकडाउन के कारण पूरे देश में प्रवासियों के पलायन का सैलाब आ गया और रेल मंत्रालय ने स्थिति से निपटने के लिए बड़ा अभियान चलाया. रेलवे एक मई से 22 मई तक 2800 श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के माध्यम से करीब 36 लाख प्रवासियों को उनके गंतव्य तक पहुंचा चुका है. वंदे भारत मिशन के तहत 20 हजार से ज्यादा भारतीय विमानों के जरिये विदेशों से स्वदेश लाए जा चुका हैं.

दो माह में बना दुनिया का दूसरा पीपीइ उत्पादक देश

कोरोना महामारी से पहले भारत में एक भी पीपीइ किट (व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण) का उत्पादन नहीं होता था, लेकिन दो महीने की छोटी-सी अवधि में ही हम दुनिया में पीपीइ के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक बन गये हैं. डॉक्टरों, नर्सों और अन्य कोरोना योद्धाओं को संक्रमण से बचाव के लिए इसकी जरूरत होती है. आज भारत में रोजाना लगभग 4.5 लाख पीपीइ किट का उत्पादन हो रहा है और इसमें तकरीबन 600 कंपनियां लगी हैं. पीपीइ उत्पादन में भारत अब केवल चीन से पीछे है.

इसी प्रकार भारत में एन95 मास्क का भी उत्पादन नहीं होता था. कुछ दिन पहले तक सवा दो लाख मास्क प्रतिदिन बनाए जा रहे थे. कुछ अन्य कंपनियों को लाइसेंस प्रदान करने की प्रक्रिया चल रही थी, जिसके पश्चात उत्पादन क्षमता सवा चार लाख मास्क प्रतिदिन हो जाएगी.

अकेले उत्तर प्रदेश में बना 61 लाख लीटर सेनेटाइजर

भारत में आज हर दिन लाखों लीटर सेनेटाइजर का निर्माण हो रहा है. इसमें चीनी उत्पादक राज्यों की बड़ी भूमिका है. शूगर मिल से निकलने वाले शीरे से अब शराब की जगह सेनेटाइजर का उत्पादन हो रहा है. अकेले उत्तर प्रदेश में दो महीने में 61 लाख लीटर सेनेटाइजर बन चुका है. राज्य में पहले केवल एक चीनी मिल सेनेटाइजर बनाती थी, अब 27 मिलें बना रही हैं.

वेंटीलेटर की कमी दूर होगी

अस्पताल वेंटीलेटर की कमी की समस्या से जूझ रहे थे. पर्याप्त आपूर्ति नहीं थी. कोरोना महामारी के संकट को देखते हुए 15 हजार के करीब वेंटीलेटर को कोविड19 के मरीजों के लिए रखा गया था. हर माह औसतन पांच हजार वेंटीलेटर का निर्माण हो रहा था. समस्या को ध्यान में रखकर सरकार ने प्रयास शुरू किए और आर्थिक सहयोग देने के साथ ही कंपनियों ने वेंटीलेटर के निर्माण में कदम बढ़ाया. संभावना है कि जून अंत तक (दो माह की अवधि में) 40 हजार वेंटीलेटर का उत्पादन होगा.

तीन बार बढ़ा लॉकडाउन

कोरोना संक्रमण : 24 मार्च की स्थिति

वर्तमान स्थिति

(स्रोत – केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय.)

May 25th 2020, 12:28 pm

संवेदनशील समाज – दिव्यांग एक साल तक वेतन का 30 प्रतिशत PM-CARES में देंगे

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सीडीएस जनरल रावत भी एक साल तक हर माह 50 हजार रुपये PM-CARES में देंगे

दक्षिणी दिल्ली के गांव सैदुलाजाब के ग्रामीणों ने PM-CARES में दिए 11 लाख

नई दिल्ली. भारत में कोरोना वायरस (Coronavirus) से अब तक सवा लाख से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं. जबकि इस वायरस ने अब 3867 लोगों की जान ली है. संकट की घड़ी में समाज के लोग लगातार सहायता के लिए सामने आ रहे हैं. अपनी इच्छा और सामर्थ्य के अनुसार PM-CARES में राशि दे रहे हैं. मंदिर, उद्योगपति, फिल्म जगत, सामाजिक-धार्मिक संस्थाएं, सहयोग दे रहे है. कोरोना के खिलाफ जंग में सहयोग के लिए एम्स का दिव्यांग फेडरेशन भी सामने आया है. पिछले दिनों फेडरेशन  ओर से निःशुल्क मास्क बांटे गए. इसके साथ ही दिव्यांग फेडरेशन के अध्यक्ष संतदेव चौहान ने अपने वेतन से 30 प्रतिशत राशि पीएम केयर्स में देंगे.

संतदेव चौहान अगले साल फरवरी तक अपने वेतन से 30 फीसदी राशि दान में देंगे. संतदेव पहले ही मार्च और अप्रैल में 11-11 हजार रुपये दे चुके हैं. उन्होंने स्वयं अपने विभाग में आवेदन दिया है. उन्होंने अपने वेतन से मई 2020 से फरवरी 2021 तक हर महीने 30 प्रतिशत पीएम केयर्स फंड में देने को कहा है.

सीडीएस वेतन का 20 प्रतिशत एक साल तक पीएम केयर्स में देंगे

सीडीएस जनरल बिपिन रावत अगले एक साल तक हर माह अपने मासिक वेतन का 20 प्रतिशत पीएम केयर्स में दान देंगे. उन्होंने पहले माह में 50 हजार रुपये की राशि दान कर दी है. सेना अधिकारियों ने रविवार को यह जानकारी प्रदान की. जनरल रावत अगले साल मार्च तक ऐसा करते रहेंगे. वह कुल मिलाकर कुल छह लाख दान में देंगे.

दक्षिणी दिल्ली के ग्रामीणों ने PM-CARES में दिए 11 लाख रुपये

दक्षिणी दिल्ली के एक गांव सैदुलाजाब ने कोरोना के खिलाफ लड़ाई में लोगों के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया. गांव के लोगों ने स्थानीय एडीएम को अपने गांव में बुलाकर उन्हें कोरोना वॉरियर्स के रूप में सम्मानित किया, साथ ही गांव के प्रधान ने गांव के लोगों की ओर से उन्हें PM-CARES के लिए 11 लाख रुपये का चेक सौंपा.

गांव वालों ने 18 सफाई कर्मी, 12 पुलिसकर्मी और छह मीडिया कर्मियों को भी कोरोना वॉरियर्स के रूप में सम्मानित किया. गांव निवासी गोकुल चंद्र यादव ने बताया कि देश महामारी के दौर से गुजर रहा है. लोगों की सेवा में लगे पुलिस कर्मी, सफाई कर्मी और स्वास्थ्य कर्मी अपनी जान दांव पर लगा रहे हैं. ऐसे में हमारे गांव ने अपना सहयोग देने का निर्णय लिया. इसके बाद गांव में एक समिति बनाई गई. इस समिति ने लोगों के घरों तक जाकर PM-CARES में पैसा जमा करने के लिए लोगों से चंदा एकत्र किया. यह सारा पैसा गांव के लोगों ने दिया है.

लोग आ रहे हैं मदद के लिए

लॉकडाउन की वजह से सरकार की आमदनी भी लगभग ठप है. ऐसे में सरकार ने देश की जनता से मदद की अपील की है. पीएम नरेंद्र मोदी ने पीएम केयर्स फंड में लोगों को दान करने के लिए कहा जिसके बाद लगातार लोग फंड में दान कर रहे हैं.

 

May 25th 2020, 12:28 pm

भाग तीन, नवसृजन की प्रसव पीड़ा है – ‘कोरोना महामारी’

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नरेंद्र सहगल

भारत का वैश्विक लक्ष्य विश्व कल्याण

सर्व सक्षम भारत की आध्यात्मिक परंपरा

एकात्म मानववाद ही भारतीयता है

प्रत्येक व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र किसी दैवी उद्देश्य के साथ धरती पर जन्म लेते हैं. कर्म करने में स्वतंत्र सृष्टि के यह सभी घटक जब अपने-अपने कर्तव्यों को स्वार्थ रहित होकर निभाते हैं तो सृष्टि शांत रहती है. परंतु यही घटक जब अपने वास्तविक उद्देश्य को दरकिनार करके अपने अहं का शिकार होकर भटक जाते हैं, तब सृष्टि अशांत हो जाती है और युद्ध, आपदाएं, भयंकर महामारियां जन्म लेती हैं. प्रकृति सामन्जस्य समाप्त होकर अप्राकृतिक साम्राज्य अस्तित्व में आता है.

उपरोक्त संदर्भ में हम केवल भारत वर्ष के वैश्विक लक्ष्य पर ही चर्चा करेंगे. अपने इस देश की धरती पर जितने भी अवतारी महापुरूषों, संतों, महात्माओं एवं ऋषि-मुनियों ने जन्म लिया, सभी का उद्देश्य ‘विश्व कल्याण’ ही था. सभी का एक ही सिद्धांत था, एक ही मान्यता थी वसुधैव कुटुंबकम् अर्थात सारी सृष्टि एक ही परिवार है. एक ही ध्येय वाक्य सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया:, सारी सृष्टि का कल्याण.

भारत की धरती पर अवतरित महापुरूषों ने कभी भी अपने को किसी क्षेत्र की सीमा में बांध कर नहीं रखा. पूरे विश्व को ही एक ईश्वरीय इकाई मानकर अपने दैवी उद्देश्य के लिए सदैव तत्पर रहे. इन ऋषियों ने समस्त प्राणियों, पशु-पक्षियों, औषधियों अर्थात् चराचर जगत के कल्याण को ही समक्ष रखते हुए अपने स्वधर्म का पालन किया. संपूर्ण ब्रह्मांड की शक्ति के लिए प्रार्थना करने की रीति हमारे देश में प्रचलित है, हम शांति पाठ करते हैं – “ ऊं द्यौ: शांतिअंतरिक्षम् —”

भारत की धरती पर ही महावीर स्वामी, महात्मा बौद्ध, श्रीगुरू नानक देव, स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ, महर्षि अरविंद जैसी दैव विभूतियों ने अवतार धारण करके मानव जाति की भलाई के लिए तप किए, संघर्ष किए एवं संगठन खड़े किए. कहीं कोई क्षेत्र, जाति अथवा मजहब की संकीर्णता दृष्टिगोचर नहीं होती. यही वजह है कि भारत ने सदैव अन्य देशों से प्रताड़ित, अपमानित और खदेड़ दिए गए समाजों को शरण दी. हमारे आध्यात्मिक शूरवीरों ने किसी का बलात् धर्मांतरण नहीं किया, किसी के पूजा स्थलों को नहीं तोड़ा, अपने निरंकुश साम्राज्य स्थापित नहीं किए और  ना ही किसी को तलवार के बल पर समाप्त करने का अमानवीय कुकृत्य ही किया.

बहुत पीछे न जाएं तो सर्वज्ञात मानवीय इतिहास में ही बहुत कुछ मिल जाएगा जो आज के दुखित विश्व के लिए सहारा बन सकता है. महावीर स्वामी एवं जैन समाज के वैचारिक आधार में शांति, अहिंसा, अपरिग्रह इत्यादि उपदेशों से मानव कल्याण संभव है. महात्मा बुद्ध द्वारा प्रदत्त शांति के सिद्धांतों की आज संसार को आवश्यकता है. श्रीगुरू नानक देव जी की वाणी में अमन चैन की वर्षा होती है. ‘किरत करो-वंड छको- नाम जपो’ अर्थात् परिश्रम करो- बांट कर खाओ और परम पिता परमात्मा का नाम जपो.

अगर आधुनिक काल में हुए प्रयासों के मद्देनजर बात करें तो स्पष्ट होगा कि खालसा पंथ, आर्यसमाज, रामकृष्ण मिशन, गायत्री परिवार, आर्ट आफ लिविंग, पतंजलि योग पीठ एवं दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान इत्यादि संस्थाएं एवं समुदाय समस्त विश्व के ही कल्याण का उद्देश्य लेकर अपने-अपने ढंग से कार्यरत हैं.

खालसा पंथ का उद्देश्य है ‘सकल जगत् में खालसा पंथ गाजे – जगे धर्म हिन्दू सकल भंड भाजे’- अर्थात् समस्त विश्व में खालसा (पवित्र) जनों की गर्जना हो और पाखण्ड का नाश हो. हिन्दू धर्म अर्थात् भारत की सनातन मानवीय संस्कृति का उदय हो. स्वामी दयानंद ने भी “कृणवन्तो विश्वं आर्यंम्” का उद्घोष करके समस्त संसार को आर्य (श्रेष्ठ) बनाने के लिए साधना की थी. स्वामी विवेकानंद ने भी रामकृष्ण मिशन की स्थापना समस्त जगत् के दरिद्र नारायण के उत्थान और मानव जाति के मोक्ष के लिए की थी.

आर्ट आफ लिविंग के संस्थापक श्रीश्री रविशंकर भी अपने प्रायः सभी प्रवचनों में मानवजाति के सुख की बात करते हैं. बाबा रामदेव स्वामी ने भी अष्टांग योग के माध्यम से पूरे विश्व में मानवता की भलाई का बीड़ा उठाया है. स्वामी रामदेव ने तो और भी आगे बढ़ कर भारत को आध्यात्मिक राष्ट्र बनाने की घोषणा कर दी है.

एक सशक्त ‘विश्वव्यापी आध्यात्मिक क्रांति’ को अपना लक्ष्य निर्धारित करके अपने धार्मिक अभियान में जुटी संस्था दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान भी विश्व कल्याण के लिए सक्रिय है. इस आध्यात्मिक अभियान के ध्वजवाहक श्रद्धेय आशुतोष महाराज के शब्दों में इस लेख का विषय स्पष्ट हो जाता है – “भारत विश्व की देह का हृदय है. इसके अध्यात्म परायण रक्त ने समय-समय पर विश्व के निस्तेज अंगों को सींचा है. उनकी मध्यम पड़ती धमनियों में विशुद्ध जीवन का संचार किया है. स्वयं ध्यानस्थ रहकर सदा परमार्थ किया है.”
सनातन भारतीय संस्कृति में मानव समाज को टुकड़ों में बांट कर व्यवहार करने का कहीं कोई उदाहरण नहीं मिलता. प्रकाण्ड विद्वान पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रदत्त एवं प्रचारित ‘एकात्म मानववाद’ का वैचारिक आधार भारत के वैश्विक लक्ष्य का सशक्त हस्ताक्षर ही है. आरएसएस के द्वितीय संरसंघचालक श्रद्धेय श्री गोलवलकर (श्रीगुरू जी) ने भी संघ के उद्देश्य पर भाषण देते हुए कहा था “हमारा लक्ष्य ‘परम वैभवशाली भारत’ है.  यही समस्त विश्व के कल्याण का धरातल है. सर्वांग उन्नत भारत ही विश्वगुरू के सिंहासन पर शोभायमान था और भविष्य में होगा.”

वर्तमान कोरोना संकट सारे संसार को भौतिकवाद को तिलांजलि देकर अध्यात्म के मार्ग पर चलने का संदेश दे रहा है…..क्रमशः

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.)

May 25th 2020, 12:17 pm

क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस

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25 मई / जन्मदिवस

बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में प्रत्येक देशवासी के मन में भारत माता की दासता की बेड़ियाँ काटने की उत्कृष्ट अभिलाषा जोर मार रही थी. कुछ लोग शान्ति के मार्ग से इन्हें तोड़ना चाहते थे, तो कुछ जैसे को तैसा वाले मार्ग को अपना कर बम-गोली से अंग्रेजों को सदा के लिये सात समुन्दर पार भगाना चाहते थे. ऐसे समय में बंगभूमि ने अनेक सपूतों को जन्म दिया, जिनकी एक ही चाह और एक ही राह थी – भारत माता की पराधीनता से मुक्ति.

25 मई, 1885 को बंगाल के चन्द्रनगर में रासबिहारी बोस का जन्म हुआ. वे बचपन से ही क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आ गये थे. हाईस्कूल उत्तीर्ण करते ही वन विभाग में उनकी नौकरी लग गयी. यहां रहकर उन्हें अपने विचारों को क्रियान्वित करने का अच्छा अवसर मिला, चूँकि सघन वनों में बम, गोली का परीक्षण करने पर किसी को शक नहीं होता था.

रासबिहारी बोस का सम्पर्क दिल्ली, लाहौर और पटना से लेकर विदेश में स्वाधीनता की अलख जगा रहे क्रान्तिवीरों तक से था. 23 दिसम्बर, 1912 को दिल्ली में वायसराय लार्ड हार्डिंग की शोभा यात्रा निकलने वाली थी. रासबिहारी बोस ने योजना बनाई की वायसराय की सवारी पर बम फेंककर उसे सदा के लिये समाप्त कर दिया जाए. इससे अंग्रेजी शासन में जहां भय पैदा होगा, वहां भारतीयों के मन में उत्साह का संचार होगा.

योजनानुसार रासबिहारी बोस तथा बलराज ने चाँदनी चौक से यात्रा गुजरते समय एक मकान की दूसरी मंजिल से बम फेंका; पर दुर्भाग्यवश वायसराय को कुछ चोट ही आयी, वह मरा नहीं. रासबिहारी बोस फरार हो गये. पूरे देश में उनकी तलाश जारी हो गयी. ऐसे में उन्होंने अपने साथियों की सलाह पर विदेश जाकर देशभक्तों को संगठित करने की योजना बनाई. उसी समय विश्वकवि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर जापान जा रहे थे. वे भी उनके साथ उनके सचिव पी.एन.टैगोर के नाम से जापान चले गये.

पर, जापान में वे विदेशी नागरिक थे. जापान और अंग्रेजों के समझौते के अनुसार पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर भारत भेज सकती थी. अतः कुछ मित्रों के आग्रह पर उन्होंने अपने शरणदाता सोमा दम्पति की 20 वर्षीय बेटी तोसिको से उसके आग्रह पर विवाह कर लिया. इससे उन्हें जापान की नागरिकता मिल गयी. यहाँ तोसिको का त्याग भी अतुलनीय है. उसने रासबिहारी के मानव कवच की भूमिका निभाई. जापान निवास के सात साल पूरे होने पर उन्हें स्वतन्त्र नागरिकता मिल गयी. अब वे कहीं भी जा सकते थे.

उन्होंने इसका लाभ उठाकर दक्षिण एशिया के कई देशों में प्रवास कर वहाँ रह रहे भारतीयों को संगठित कर अस्त्र-शस्त्र भारत के क्रान्तिकारियों के पास भेजे. उस समय द्वितीय विश्व युद्ध की आग भड़क रही थी. रासबिहारी बोस ने भारत की स्वतन्त्रता हेतु इस युद्ध का लाभ उठाने के लिये जापान के साथ आजाद हिन्द की सरकार के सहयोग की घोषणा कर दी. उन्होंने जर्मनी से सुभाषचन्द्र बोस को बुलाकर ‘सिंगापुर मार्च’ किया तथा 1941 में उन्हें आजाद हिन्द की सरकार का प्रमुख तथा फौज का प्रधान सेनापति घोषित किया.

देश की स्वतन्त्रता के लिये विदेशों में अलख जगाते और संघर्ष करते हुए रासबिहारी बोस का शरीर थक गया. उन्हें अनेक रोगों ने घेर लिया था. 21 जनवरी, 1945 को वे भारत माता को स्वतन्त्र देखने की अपूर्ण अभिलाषा लिये हुए ही चिरनिद्रा में सो गए.

May 25th 2020, 1:53 am

नकारात्मक समय में सकारात्मक सोच बनाए रखने की आवश्यकता

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हेमेन्द्र क्षीरसागर

सकारात्मक और नकारात्मक दो पहलू जीवन के अहम हिस्से हैं. सकारात्मकता से बड़े से बड़े दुख हर लिए जाते हैं, वहीं नकारात्मकता से छोटे से छोटे सुख भी बैर बन जाते हैं. यह सब अपनी-अपनी सोच पर निर्भर करता है कि हम किसका, कैसा सामना करते हैं. सभी चाहते हैं उनके साथ हरदम सकारात्मक परि‍स्थ‍िति ही बनी रहे. नकारत्मकता तो आसपास भी कदापि ना भटके. लेकिन सकारात्मक और नकारात्मकता का प्रभाव कभी-कभी मनवांछित भी लगता है. यह सब हमें कोरोना नामक चीनी विषाणु ने भलीभांति समझा दिया.

सम्यक ही दे‍खि‍ए कोरोना संदिग्धों की जांच रिर्पोट नकारात्मक आने का बेसब्री से इंतजार रहता है, नाकि सकारात्मक होने का. इतर सकारात्मक रिपोर्ट आने पर पीड़ि‍त से सुरक्षात्मक दृष्ट‍िकोण से शारीरिक दूरी बरतना, मुखपट्टी बांधकर वार्तालाप, खानपान व दवाई इत्यादि देना समेत अन्य जिम्मेदारियों को निभा रहे हैं. इस आशा में कि कब सकारात्मक रिपोर्ट नकारात्मक आए. किंतु सकारात्मक विषाणु संक्रमण के प्रति नकारात्मक का भाव रखते हैं. इससे बचने के अनेकों जुगत करते हैं ताकि यह हमसे और हम इससे कोसों दूर ही रहें क्योंकि इसमें हम सबकी भलाई निहित है. इसीलिए नकारात्मक समय में सकारात्मक सोच बनाए रखने की निहायत जरूरत है. मसलन नकारात्मक सोच समस्या को जन्म देती है, और सकारात्मक सोच समाधान को. हमने सुनना सीख लिया तो सहना सीख जाएंगे और सहना सीख लिया तो रहना सीख जाएंगे.

गौरतलब रहे कि हर समस्या, समाधान लेकर आती है. ऐसा ही कुछ हमें कोरोना महामारी में देखने को मिला. जहां ऐसी बड़ी अर्थव्यवस्था और चिकित्सकीय सुविधाओं वाले देश कोरोना के संक्रमण के आगे धराशाई हो गए. वहां हमारा भारत देशी चिकित्सक, नमस्कार, 2 गज की दूरी, जड़ी बूटियों के चूर्ण, काढ़े और योग-प्राणायाम के सहारे चीनी वायरस को अभी तक कुचलने में कामयाब रहा है. ये हमारे संयम, संकल्प और सकारात्मक पहलू का परिचायक ही तो है कि हमने अल्प संसाधनों में मर्ज का मर्म ढूंढ लिया. लागू तालाबंदी में रचनात्मक सोच के साथ घरों में सह परिवार रहना सीख लिया. मुखपट्टी बांधना और स्वच्छता के सबक को जीवनशैली बनाया. कम और घरेलू सामग्री में गुजर-बसर करने की आदत बनी. विदेशी के बजाय स्वदेशी पर भरोसा होने लगा क्योंकि विपत्ति काल में घर और गांव की चीजों ने कमी पूरी की. अपने और अपनों की कीमत समझ में आ गई. घर में रहकर, शारीरिक दूरियां बरतकर काम करने का जरिया मुक्मल सामने आया. घरेलु कामों में मन, बागवानी और घर का खाना लजिज लगा. महिलाओं की कदर व उनके घर गृहस्थी के काम महत्वपूर्ण लगे.

बीमारी से नफरत और बीमार से प्यार हुआ. जितनी चादर उतना पैर पसारने की बात तालाबंदी में सफलता बनी. पुराने खेल और खिलौने से बच्चों का मन बहलने लगे. दादी-नानी की कहानी किस्से घर-घर में गूंजे. दूरदर्शन पर रामायण, महाभारत, श्रीकृष्णा, विष्णु पुराण, शक्त‍िमान और बुनियाद के सजीव चित्रण रमने लगे. हवन, अनुष्ठान की शुद्धता कोरोना का मारक अस्त्र कहलाई. चिकित्सकों का ईश्वरी रूप दिखाई दिया. तालाबंदी का पालन करवाने वाले योद्धाओं के प्रति दिल में सम्मान बड़ा. स्वयंसेवियों, दानदाताओं, स्वच्छताग्रहियों और श्रमवीरों ने दिल खोलकर मदद के हाथ बढ़ाए.

सरकारी मोहकमों ने बखूबी जिम्मेदारी निभाई. खासतौर पर पुलिस के समर्पण को देखते हुए नजरिया ही बदल गया कि यह भी हमारे सजग मानवीय प्रहरी हैं. तालाबंदी की पाबंदी बेपरवाह जीवन की बंदिश बन गई. स्वावलंबन, जन, जल, जंगल, जमीन और पशुधन मन को भाए. गुरुकुल का अनुशासन और मेरा गांव, मेरा देश याद आने लगा. तभी नगर, महानगर, प्रदेश, देश क्या परदेश से भी वापसी में देर नहीं लगी. मेरे गांव, मेरे देश पर विश्वास जता, माटी की महक ने सारे दुख हर लिए. जितना है उतने में कोरोना संक्रमण पर आक्रमण की तैयारी कर ली. चाहे कुछ हो जाए अब मेरा घर, मेरा गांव, मेरा देश मेरे लिए बहुत कुछ है. दृढ़निश्चय रहा तो निसंदेह एक दिन अपनी काबिलयत से प्रवासियों को स्थायी रहवासी बनते देर नहीं लगेगी. आखि‍र! मेरे देश की धरती उपजे अन्न, उगले सोना, हीरा, मोती इस बात का द्योतक बनेंगे परिश्रमी.

May 24th 2020, 12:50 pm

रेलवे ने चलाई कुल 2818 श्रमिक ट्रेन, 2253 ट्रेन अपने गंतव्य पर पहुंचीं

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रेलवे द्वारा श्रमिक ट्रेन के माध्यम से करीब 36 लाख लोगों को घर पहुंचाया जा रहा

अगले कुछ दिनों में रेलवे चलाएगा 2600 श्रमिक स्पेशल ट्रेन

नई दिल्ली. वैश्विक महामारी कोरोना से निपटने के लिए संपूर्ण देश में लॉकडाउन किया गया. इसकी वजह से सारे काम-काज ठप हो गए. फैक्ट्री, कारखाना, कारोबार, दुकान, वाहन, जहाज, ट्रेन सब बंद हो गए. कभी न थमने वाली मुंबई, कोलकाता, दिल्ली की सड़कों में सन्नाटा छा गया. रोज खाने-कमाने वाले श्रमिकों से लेकर प्राइवेट जॉब करने वाले लोग बेरोजगार हो गए. लाखों श्रमिक अपने-अपने घर जाने की इच्छा लिये थे. लेकिन गांव पहुंचने के लिए साधन नहीं. सड़क पर श्रमिकों की भीड़ दिखाई देने लगी. इसका फायदा उठाने के लिए समाज विघातक शक्तियां सक्रिय हो गईं, और केंद्र सरकार व रेलवे को लेकर तमाम आरोप लगाने शुरू कर दिए.

जबकि सरकार ने संवेदनशीलता के साथ लाखों श्रमिकों को उनके गंतव्य घर तक पहुंचाने के लिए श्रमिक दिवस पर एक मई से श्रमिक स्पेशल ट्रेनों का संचालन शुरू कर दिया था और 20 मई तक श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की मदद से साढ़े 23 लाख श्रमिकों को उनके गंतव्य स्थल तक पहुंचाया जा चुका है.

रेलवे द्वारा प्रदत्त 24 मई, प्रातः 10.00 बजे तक की अद्यतन जानकारी के अनुसार 2818 श्रमिक ट्रेन चलाई हैं, जिनमें से 2253 ट्रेन अपने स्टेशन तक पहुंच चुकी हैं, तथा 565 ट्रेन अपने की गंतव्य की ओर बढ़ रही हैं. रेलवे के अनुसार 60 अन्य श्रमिक ट्रेन पाइपलाइन में हैं. इनमें से अकेले उत्तर प्रदेश के लिए ही विभिन्न राज्यों से 1120 श्रमिक ट्रेन चलाई गई हैं. श्रमिक ट्रेन के माध्यम से करीब 36 लाख लोगों को घर पहुंचाया जा रहा है. इसके अलावा आगामी कुछ दिनों में 2600 अन्य श्रमिक ट्रेन चलाने का प्रस्ताव है.

लेकिन कुछ राज्यों की उदासीनता, प्रशासनिक कारणों की वजहों से ट्रेन की गति धीमी रही. श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में लिस्ट बनाने से लेकर उनके चयन का काम राज्यों के पास ही है. कांग्रेस शासित प्रदेश और पश्चिम बंगाल श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेन बढ़ाने की इजाजत नहीं दे रहे हैं. ममता बनर्जी ने अजमेर की दरगाह में फंसे लोगों को निकालने के लिए ट्रेन को मंजूरी दी, लेकिन मजदूरों पर कोई ध्यान नहीं दिया.

रेलवे की ओर से तीन सौ ट्रेन रोज चलाने की तैयारी थी, लेकिन शुरू के दस दिनों में केवल 366 ट्रेन ही चली. उत्तर प्रदेश के लिए सबसे ज्यादा 12 सौ ट्रेनें चली, जबकि पश्चिम बंगाल, राजस्थान,  छत्तीसगढ़ और झारखंड राज्यों ने सबसे पीछे रहा. इन राज्यों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप भी लगे. देश में सबसे अधिक श्रमिक उत्तर प्रदेश में आये हैं. अब तक श्रमिक ट्रेनों के माध्यम से 12 लाख से अधिक श्रमिक अपने घर पहुंच चुके हैं. वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार 18 लाख लोगों को वापिस अपने घर पहुंचा चुकी है. योगी सरकार की उदारता से सभी राज्यों को सीख लेना चाहिए. खास कर कांग्रेस शासित प्रदेश व ममता बनर्जी को. जो अपने ही श्रमिकों को वापस घर आने के लिए पाबंदी लगा रही है.

पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के करीब 10 लाख प्रवासी मजदूर फंसे थे. झारखंड के करीब नौ लाख लोग दूसरे राज्यों में फंसे थे, जिसमें से छह लाख से अधिक प्रवासी मजदूर थे. केरल में फंसे प्रवासी मजदूरों की संख्या साढ़े तीन लाख थी. राजस्थान सरकार ने प्रवासी श्रमिकों की वापसी के लिए जो ऑनलाइन पोर्टल बनाया, उस पर करीब छह लाख 35 हजार श्रमिकों और प्रवासियों ने पंजीकरण कराया. बिहार सरकार ने पहले आनाकानी की, फिर लोगों का आकलन किया. हालांकि रेलवे ने पहले ही साफ कहा था कि केवल राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित यात्रियों को ही स्वीकार किया जाएगा. क्योंकि ट्रेन उन्ही के अनुरोध पर ही चलाई गई है.

May 24th 2020, 12:32 pm

समाज व देश विरोधियों का अड्डा बना टिकटॉक

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टिकटॉक – एंटरटेनमेंट के नाम पर परोसी जा रही अश्लीलता प्रखरादित्य द्विवेदी मेरी मजबूरी पर जरा गौर करिए, ऑनलाइन माध्यमों के अधिक प्रयोग से पड़ने वाले दुष्प्रभावों को मुझे मोबाइल पर ही लिखकर बताना पड़ रहा है. इससे एक कदम और आगे बढ़ेंगे तो पाएंगे कि इसे पढ़ने-देखने वाला भी ऑनलाइन होकर ही इसे देख-समझ सकता है. खैर, पिछले कुछ समय से कोरोना महामारी के कारण विश्व के अधिकांश देशों में कार्यस्थलों पर ताला लग चुका है. अधिकांश लोगों को घरों में कैद होना पड़ा. इसके साथ ही देखा गया कि सामान्य तौर पर मोबाइल डाटा की खपत कई गुना बढ़ गई है. लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि मोबाइल पर बिताया जाने वाला यह समय आखिर युवा कैसी गतिविधियों में बीता रहे हैं? एक तरफ स्कूल और विश्वविद्यालय की सारी पढ़ाई मोबाइल फ़ोन के माध्यम से ही हो रही है, वहीं दूसरी तरफ इसी मोबाइल के माध्यम से घृणा और अश्लीलता भी परोसी जा रही है. ऑनलाइन दुनिया में चीनी मीडिया एप्लीकेशन टिकटॉक और यूट्यूब कंटेंट क्रिएटर्स के बीच विवाद खड़ा हुआ और इसी विवाद के बहाने कई ऐसे वीडियो निकलकर सामने आये जो अभिभावक के तौर पर हमारे कान खड़े करने के लिए काफी हैं. इस प्लेटफार्म पर कंटेंट के वेरिफिकेशन और नियंत्रण का कोई तंत्र नहीं है, इस कारण यह विक्षिप्त मानसिकता वाले कुछ लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है. वैसे तो टिकटॉक के दर्ज़नों आपत्तिजनक वीडियो सामने आए हैं, लेकिन उनमें से कुछ विशेष तौर पर उल्लेखनीय हैं. इस प्लेटफार्म के एक क्रिएटर फैजल सिद्दीकी का यह वीडियो विशेष तौर पर लोगों के गुस्से की वजह बना. इस वीडियो में फैजल एक लड़की के चेहरे पर तेजाब फेंकने की एक्टिंग करता दिखता है. ऑनलाइन मंचों पर इस तरह के व्यवहार को बढ़ावा देने वाले फैजल के लाखों प्रशंसक हैं, जो इस तरह के वीडियो के बाद एसिड अटैक को सामान्य समझने लगते हैं, यह उनके लिए मर्दानगी दिखाने का जरिया बन जाता है. इस वीडियो के सामने आने के बाद देश के तमाम महिला अधिकार संगठन और ऑनलाइन यूजर्स ने टिकटॉक के पास आपत्ति दर्ज करवाई और फैजल का अकाउंट हटा दिया गया. लेकिन क्या एक अकाउंट का हटा दिया जाना भर काफी है? टिकटॉक पर इस तरह के तमाम वीडियो भरे पड़े हैं, जिसमें कहीं बलात्कार जैसे कुकृत्य को मर्दाना शान से जोड़ कर प्रस्तुत किया जा रहा है तो कोई यहाँ हिन्दुओं के खिलाफ जहर उगलते हुए, आतंकवादी बनने की बात कहता है. एक तरफ लवजेहाद जैसी घटनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ कोई बिना चाबी के कार खोलना सिखा रहा है. टिकटॉक एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है, जहां छोटे वीडियो बनाकर शेयर किए जाते हैं. भारत में इसे प्रयोग करने वाले युवाओं की संख्या पिछले कुछ समय में बड़ी तेजी से बढ़ी है. एक बार पहले भी इस माध्यम से फेक वीडियो के जरिए अफवाह फैलाने व अश्लीलता फैलाने वाले वीडियो आए थे. जिसके बाद टिकटॉक पर रोक(बैन) लगा दिया गया था, लेकिन टिक टॉक ने माफी मांगी और सरकार ने रोक हटा ली. आश्चर्य की बात यह है कि अभी इस चीनी मीडिया प्लेटफार्म पर ऐसे वीडियो आ ही रहे हैं. सवाल यह है कि ऐसे कंटेंट पर रोक कौन लगाएगा, जब स्वयं युवा कंटेंट क्रिएटर और एप्लीकेशन उसे बढ़ावा दे रहे हैं. इसकी अधिकता ने युवाओं के लिए मीठे जहर का काम किया है. बच्चों को समय से पहले बड़ा होना सामान्य नहीं कहा जा सकता. हमें साधारण लगने वाला टिकटॉक हमारे घर के संस्कारों को नष्ट कर रहा है. इसका ही परिणाम है कि युवाओं में चिड़चिड़ापन, मानसिक तनाव और अनिद्रा का शिकार होने जैसी गंभीर समस्याएं होना आम हो गई हैं. इस तरह के कंटेंट के माध्यम से युवाओं में अपने ही समाज को लेकर जहर के बीज बोये जा रहे हैं, सामाजिक ताने बाने को नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है. देश के कई माने जाने विद्वानों ने ऐसे एप्लीकेशन को चीन की एक सोची समझी साजिश बताया है, जिसका उद्देश्य भारतीय युवाओं की रचनात्मकता को समाप्त करके उन्हें भुलावे में रखना है और इसके लिए अपनी वस्तुओं से चीन ने हमारे बाजार को पाट रखा है. अब जरूरत है कि पड़ोसी देश की इस साजिश को समझा जाए तथा अपने युवा पूंजी व संस्कारों को बचाकर वास्तव में भारत को विश्व गुरु का स्थान वापस दिलाया जाए. (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में अध्यनरत हैं.) https://www.youtube.com/watch?v=qEIM-7aQehI  

May 24th 2020, 12:21 pm

कोरोना से लड़ाई में भारत के अहम हथियार – प्रभावी नेतृत्व और सहयोगी समाज

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सौरभ कुमार मुश्किल समय किसी की भी क्षमताओं की परीक्षा लेता है, कोरोना महामारी के इस दौर ने विश्व के सभी देशों की परीक्षा ली है. अमेरिका और यूरोप जैसे शक्तिसंपन्न, समृद्ध देश भी घुटने टेकते नजर आए. अस्पतालों में इतनी जगह नहीं बची कि मरीजों का इलाज किया जा सके, सालों के परिश्रम से खड़ा किया गया तानाबाना बिखरने लगा. अमेरिका में 96,000, यूके में 36000, इटली में 32000 और फ्रांस में लगभग 28000 लोग काल के गाल में समा गए, जबकि इन देशों में जनसँख्या घनत्व भारत से कहीं कम और स्वास्थ्य सेवाएं कहीं बेहतर हैं. भारत में तमाम चुनौतियों के बावजूद अब तक 3720 मौतें हुई हैं. एक भी नागरिक की मृत्यु हम सब के लिए दुःख का विषय है, लेकिन यह गर्व भी है कि जहाँ तमाम विकसित देश कोरोना पर नियंत्रण पाने में असमर्थ रहे. वहीं भारत ने न सिर्फ कोरोना को नियंत्रित किया, बल्कि अपनी सामाजिक व्यवस्था को भी संभाले रखा. आज भारत में कोरोना के 1,25,121 मरीजों में से 51,836 ठीक होकर अपने घरों को जा चुके हैं और कोरोना संक्रमितों का रिकवरी रेट 23 मई के आंकड़ों के अनुसार 41.39 प्रतिशत है. इस संकट ने यह सिद्ध कर दिया कि मजबूत और समर्पित नेतृत्व ही किसी राष्ट्र को सुरक्षित रखने में समर्थ है. सरकार ने कोरोना त्रासदी को नियंत्रित करने के लिए अपने सारे संसाधन झोंक दिए और इसी का परिणाम है कि आज भारत बाकी विश्व के लिए एक उदहारण के तौर पर उभर कर आया है. जनता का हित पहले चाणक्य अपनी अर्थ नीति में लिखते हैं - प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां तु हिते हितम . नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ॥ अर्थात प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है, प्रजा के हित में ही उसे अपना हित दिखना चाहिए. जो स्वयं को प्रिय लगे उसमें राजा का हित नहीं है, उसका हित तो प्रजा को जो प्रिय लगे उसमें है. जब कोरोना के इस संकट की शुरुआत हुई तो विश्व भर के देशों का रवैया इसको लेकर अलग अलग था, सभी देश अर्तव्यवस्था की चिंता में जकड़े हुए थे. यूके के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने पहले हर्ड इम्युनिटी विकसित करने की रणनीति पर काम करना शुरू किया, अमेरिका जैसा देश भी अर्थव्यवस्था को आगे लेकर चल रहा था. मगर भारत की सरकार ने जनता को अर्थ से आगे रखा. प्रधानमंत्री मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि हमारी पहली प्राथमिकता हमारे देशवासियों के प्राणों की रक्षा है. हमारी सरकार ने अर्थव्यवस्था से ज्यादा महत्व जनता के जीवन को दिया और 25 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों से हाथ जोड़कर अपील की कि वे अपने घरों से बाहर न निकलें, जहाँ हैं वही रहें. जब भारत में 21 दिनों के पहले लॉकडाउन की शुरुआत की तब यहाँ कोरोना के मात्र 519 मामले थे, जबकि 11 लोगों की मृत्यु हुई थी. इन मामलों में से ज्यादातर विदेशों से आये लोगों के थे, इस फैसले ने कोरोना संक्रमण के फैलाव में बड़ी रुकावट के रूप में काम किया. कई मेडिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि समय रहते लिए गए इस फैसले के कारण ही भारत में अमेरिका और यूरोप जैसी स्थिति नहीं बनी, भारत के राजनितिक नेतृत्व की दूरदर्शिता ने एक बड़े खतरे को टाल दिया. हालाँकि लॉकडाउन के असर की सही विवेचना एक विस्तृत अध्ययन के बाद ही की जा सकती है, लेकिन अधिकतर चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि लॉकडाउन न होने कि स्थिति में हालात और ज्यादा बिगड़ जाते. सर गंगाराम अस्पताल के जाने माने लंग सर्जन डॉ. अरविन्द कुमार ने पीटीआई से बातचीत में कहा था कि सही समय पर लॉकडाउन का फैसला भारत के लिए बहुत ही लाभकारी सिद्ध हुआ और इसके कारण ही यहाँ यूरोप और अमेरिका जैसी स्थिति नहीं बनी और सबसे महत्वपूर्ण इसने स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोगों और स्थानीय प्रशासन को इस चुनौती से निपटने की तैयारी के लिए समय दे दिया. आंकड़ों में साफ़ दिखा असर सही समय पर लिए गए लॉकडाउन के फैसले का असर आंकड़ों को देखने से और बेहतर तरीके से समझ में आता है. भारत में कोरोना के पहले संक्रमण से लेकर संख्या के 60,000 तक पहुँचने में 101 दिन का समय लगा, जबकि ब्रिटेन ने यह छलांग मात्र 40 दिनों में लगा ली थी. इटली में 52 दिन, स्पेन में 56 दिन, जर्मनी में 62 दिन, अमेरिका में 65 दिन, फ्रांस में 70 दिन और रूस में 83 दिनों में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा 60,000 के पार चला गया था. इन 101 दिनों में भारत ने पीपीई किट, मास्क, दस्ताने जैसे आवश्यक वस्तुओं का निर्माण बड़े स्तर पर शुरू कर लिया था, सभी जिलों में क्वारेंटाइन सेंटर विकसित करने और स्थानीय अस्पतालों को इस चुनौती के लिए तैयार करने का भी समय हमें मिला. इस समय का सीधा लाभ भारत को मिला और यही कारण है कि 60,000 कोरोना संक्रमितों की संख्या होने पर भारत में रिकवरी रेट 30.75 प्रतिशत पर था. जबकि ऐसी स्थिति में अमेरिका जैसे समृद्ध राष्ट्र की रिकवरी मात्र 1.39 प्रतिशत थी. दुनिया भर के विशेषज्ञ भारत की बड़ी आबादी और ज्यादा घनत्व के कारण संदेह की दृष्टि से देख रहे थे, लेकिन भारत की रणनीति ने सब संदेहों के बावजूद अच्छा प्रदर्शन किया. विश्व स्वस्थ्य संगठन द्वारा उपलब्ध करवाए गए आंकड़ों के अनुसार भारत ने 3 मई तक दस लाख टेस्ट किये थे, जिसमें 39,980 संक्रमित पाए गए थे. जबकि अमेरिका में इतनी ही टेस्टिंग में 1,64,620 संक्रमित पाए गए थे. स्पेन में यह आंकड़ा 2,00,194, इटली में 1,52,271 और टर्की में 1,17,589 था. आज की स्थिति में जनसंख्या के अनुपात में देखें तो भारत में संक्रमितों की संख्या बहुत कम है. यह आंकड़े स्पष्ट कर देते हैं कि कोरोना से इस जंग में भारत मजबूती के साथ खड़ा है. पूरा देश एक परिवार किसी पद पर बैठ जाने से कोई नेतृत्वकर्ता नहीं बन जाता, यह एक नैसर्गिक गुण है. सक्षम नेतृत्वकर्ता वह है जो लोगों को अपने साथ लेकर चले. प्रधानमंत्री मोदी ने इस पूरे संकट के दौरान राष्ट्र से एक साथ आगे आने का आह्वान किया और यह पूरा देश एक परिवार की तरह साथ खड़ा हो गया. देश भर से ऐसी तस्वीरें आईं, जिसमें लोग मदद के लिए हाथ बढ़ाते दिखे, सामाजिक संगठनों के साथ साथ व्यक्तिगत स्तर पर लोग वंचितों की सहायता के लिए अग्रसर हुए. यह हमारे भारतीय समाज का मूल चरित्र है, जिसे दिशा देने का काम प्रधानमंत्री मोदी ने किया. इतने बड़े फैसले के बाद भी कुछ अपवादों को छोड़ दें तो कहीं अराजकता की स्थिति नहीं बनी, ‘हम अपने समाज, अपने राष्ट्र के लिए तकलीफ सह लेंगे’ लोग इस मानस के साथ सक्रिय हुए. यह मानस बनाना भी सरकार की एक उपलब्धि है, प्रधानमंत्री मोदी ने पहले जनता कर्फ्यू के माध्यम से लोगों को आने वाले फैसले की झलक दी और लोगों की स्वीकार्यता को देखते हुए पूर्ण लॉकडाउन किया. इस लॉकडाउन में लोग अपने घरों में बंद थे, कुछ घबराये हुए भी थे, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री ने देश की उत्सवधर्मिता को जागृत किया. कभी थाली बजाने तो कभी दीप जलाने का आह्वान करके समाज को सक्रिय किया और इसका परिणाम है कि हर व्यक्ति अपने स्तर पर जागरूक है. हर व्यक्ति इस संक्रमण से लड़ाई में अपना सहयोग दे रहा है. अब जब लॉकडाउन में ढील दी जाने लगी है, तब भी हमें अपने इस मानस को बनाये रखना है. समाज में अवसाद न आये, हमें अपनी उत्सवधर्मिता को बनाये रखना है. लेकिन उसके साथ सरकार द्वारा  जारी किये गए गाइडलाइन्स का पालन भी सुनिश्चित करना है. कोरोना से यह जंग हम जरुर जीतेंगे.

May 24th 2020, 12:21 pm

महाराष्ट्र में एक और साधु हत्या; नांदेड़ जिले के स्वामी शिवाचार्य की हत्या

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नांदेड़. महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले में एक साधु की हत्या की घटना सामने आई है. पालघर साधु हत्याकांड को एक माह ही बीता है कि और एक हत्या की वारदात सामने आ रही है. चोरी करके भागने की फिराक में लुटेरे का शिवाचार्य स्वामी ने विरोध किया, तभी उन्हें चार्जर की तार से गला घोटकर मार डाला गया. इस दर्दनाक वारदात से उमरी तालुका में डर और दुख का माहौल है.

नांदेड़ जिले के उमरी तहसील में नागठान गांव में सद्गुरु निर्वाणरुद्र पशुपति शिवाचार्य स्वामी जी का मठ है. इसी जगह 23-24 मई की मध्य रात्रि को यह घटना हुई. हत्यारे का स्वामी जी के मठ में आना जाना था. स्वामी के मठ में लूट करते वक्त उनकी हत्या की गई. इसी जगह एक और व्यक्ति का शव भी मिला है. आशंका है कि यह हत्या भी इसी व्यक्ति ने किया हो. हत्यारा स्वामी जी के मृत शरीर को उन्हीं की कार की डिक्की में डाल कर भागना चाहता था, लेकिन स्वामी जी के शिष्य नींद से जाग गए तो हत्यारा वहां से भाग गया.

स्वामी शिवाचार्य सद्गुरु निर्वाणरुद्र युवा थे और काफी समय से यहां रह रहे थे. इस गांव के लिए भी उन्होंने बड़ा योगदान दिया था. गांव वाले भी उनके प्रति बड़ा आदर सम्मान रखते थे. घटना से गांव वालों और समस्त नांदेड़ जिले में शोक की लहर है. गांव में डर का माहौल भी बना हुआ है. पुलिस इस घटना की पड़ताल कर रही है.

May 24th 2020, 9:01 am

150 झुग्गियों में लगी आग, स्वयंसेवकों ने दमकल व पुलिस कर्मियों के साथ संभाला मोर्चा

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नई दिल्ली. बुधवार रात्रि, (21 मई) रात्रि 11.20 पर रमेशनगर (मोतीनगर जिला) स्थित चूनाभट्ठी सेवाबस्ती में रेलवे लाइन से लगती लगभग 150 झुग्गियों में भीषण आग लग गई. अधिकांश झुग्गियों से श्रमिक वर्ग के लोग जा चुके थे, इस कारण जानी नुकसान नहीं हुआ. क्षेत्र में रहने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता पारस जी के निवास की ऊपरी तल पर सिलेंडर रखा था, जिसके फटने से एक तल ध्वस्त हो गया.

दुर्घटना की सूचना प्राप्त होते ही 8-10 स्वयंसेवकों ने सह प्रांत कार्यवाह अनिल जी के मार्गदर्शन में 11.45 तक वहां पहुंच कर दमकल एवं पुलिस कर्मियों के साथ मोर्चा संभाल लिया. दमकल कर्मियों के पहुंचने से पूर्व अपनी ही छत पर सिलिंडर फट जाने के उपरांत भी पारस जी ने जीवटता व साहस का परिचय देते हुए स्वयंसेवकों के साथ मिलकर अपने परिवार व गली वालों को सकुशल वहां से बाहर निकाला.

प्रातःकाल के राहत कार्यों में भी स्वयंसेवक अग्रणी भूमिका में रहे. सबसे पहले स्वयंसेवकों ने स्थानीय भाजपा पार्षद के सहयोग से स्थानीय निवासियों हेतु भोजन की व्यवस्था करवाई, तदुपरांत स्थानीय सी ब्लॉक, सनातन धर्म मन्दिर, मानसरोवर गार्डन से कपड़ों व सनातन धर्म मन्दिर सरस्वती गार्डन से बर्तनों आदि की व्यवस्था करवाई.

कोरोना संकट के बावजूद दमकल एवं पुलिसकर्मी व स्वयंसेवक घटनास्थल पर, पूरे समय अपने कर्तव्य के निर्वहन में अंगद से डटे रहे. स्वयंसेवकों ने दमकल कर्मियों को मार्ग की जानकारी देने में उल्लेखनीय योगदान दिया.

May 23rd 2020, 12:35 pm

डीडीए कमिश्नर ने किया इंद्रप्रस्थ पार्क का दौरा, कोविड कब्रिस्तान नहीं बनाने का दिया आश्वासन

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नई दिल्ली. विश्व हिन्दू परिषद व नंगली रजापुर गांव के आरडब्लूए के लगातार दबाव के चलते दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) ने प्रतिष्ठित पार्क की सुधि ले ही ली. आज दिल्ली विकास प्राधिकरण के कमिश्नर (भू एवं राजस्व) आर.एन. शर्मा के नेतृत्व में कुछ अधिकारियों ने इंद्रप्रस्थ मिलेनियम पार्क का सर्वेक्षण कर स्थानीय नागरिकों व आरडब्लूए के साथ विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल से भी इस विषय में चर्चा की तथा पार्क को किसी भी कीमत पर कब्रिस्तान नहीं बनने देने का आश्वासन दिया.

उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण पार्क में किसी की कब्र होने का कोई संकेत भी नहीं है और पार्क के जिस गेट पर कब्रिस्तान का बोर्ड लगा है, वहां भी कब्रिस्तान जैसा दूर दूर तक कुछ नहीं है. तथा पार्क का मुख्य वॉकिंग ट्रेक भी उस गेट के सामने से गुजरता है. विहिप प्रवक्ता विनोद बंसल ने बताया कि हमने इन्द्रप्रस्थ विहिप अध्यक्ष कपिल खन्ना द्वारा भेजे 20 मई के पत्र में दिल्ली के उपराज्यपाल को भी निवेदन किया था कि पार्क में किसी भी प्रकार का अनाधिकृत प्रवेश, कब्ज़ा या कब्रिस्तान बनाने का सपना साकार ना होने दें तथा कब्रिस्तान का जो बोर्ड पार्क के गेट पर बैल्ड किया हुआ है, उसे भी उतारें. यही बात आज डीडीए कमिश्नर को भी कही. हमने यह भी कहा कि जिन लोगों ने भी पिछले दिनों पार्क में अवैध रूप से घुसपैठ कर उसे उजाड़ने की कोशिश की या इस बारे में जिन्होंने षड्यंत्र रचा उनके विरुद्ध भी कार्यवाही हो.

डीडीए को स्पष्ट तौर पर यह भी कह दिया गया है कि दिल्ली वक्फ बोर्ड की कोविड-19 संक्रमित शवों को इस पार्क में या इसके आस पास भी दफनाने की मंशा को किसी भी तरह पूरा नहीं होने दिया जाएगा, जिससे पार्क के साथ-साथ उसमें आने वाले विजिटर्स व पर्यटकों के साथ स्थानीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके.

May 23rd 2020, 11:52 am

विहिप का उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री खट्टर से मिला

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मेवात में धर्मांतरण व हिन्दूद्रोही राष्ट्रद्रोही षड्यंत्रों को कुचलने की रखी मांग

नई दिल्ली. विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय संयुक्त महामंत्री, डॉ. सुरेंद्र जैन की अध्यक्षता में हरियाणा के सामाजिक व धार्मिक संगठनों का एक शिष्टमंडल मेवात में चल रही राष्ट्र विरोधी व हिन्दू विरोधी गतिविधियों के संबंध में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से मिला और उनको उच्च स्तरीय जांच समिति की रिपोर्ट व सिफारिशों के संबंध में अवगत कराया गया.

उस रिपोर्ट के अलावा कुछ नए तथ्य भी सामने आए, जिसकी जानकारी भी उनको दी गई. मेवात किस प्रकार हिन्दुओं, विशेष तौर पर दलितों और महिलाओं का कब्रिस्तान बनता जा रहा है, इसकी कई घटनाएं उनको ध्यान में दिलाई गई. जिन  मंदिरों पर कब्जा करके मस्जिदें बनाई गईं, उनके तथ्यों से भी उनको अवगत कराया गया.

डॉ. जैन ने कहा कि रिपोर्ट में केवल 50 गांव का वर्णन था जो हिन्दू शून्य किए गए. लेकिन जब विस्तृत सर्वे कराया गया तो ध्यान में आया कि 103 गांव पूर्ण रूप से हिन्दू विहीन हो चुके हैं व 82 से अधिक गांव ऐसे हैं, जहां हिन्दुओं के 5 से कम परिवार ही बचे हैं.

प्रतिनिधि मंडल ने हरियाणा में बढ़ रही लव जेहाद और धर्मान्तरण की गतिविधियों पर भी चिंता व्यक्त की और धर्मांतरण विरोधी कानून बनाने की मांग की.

विहिप के संयुक्त महामंत्री ने बताया कि मुख्यमंत्री जी ने सारे तथ्यों को ध्यानपूर्वक सुना और अविलंब कार्यवाही करने का आश्वासन दिया. खट्टर जी ने कहा कि अब किसी को भी पलायन करने की जरूरत नहीं है.

शिष्टमंडल ने उनको इस कार्य में हर प्रकार का सहयोग दिलाने का आश्वासन देते हुए आशा व्यक्त की कि मुख्यमंत्री जी ने जो वायदा किया है, उसे वे अवश्य पूरा कर मेवात में कानून का राज्य पुनः स्थापित करेंगे.

May 23rd 2020, 11:52 am

प्रवासी मजदूरों को पुष्प वर्षा कर किया विदा, यात्रा के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग के पालन को किया जागरुक

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अपने गंतव्य पर पहुंच कर अपने साथ-साथ अपने परिवारों का रखें ध्यान

बच्चों से कहा, अपने गांव जाकर पढ़ाई मत छोड़ देना

पानीपत. श्रमिक ट्रेन से पानीपत से बिहार जा रहे प्रवासियों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हरियाणा के प्रचार विभाग की टीम ने पुष्प वर्षा कर विदा किया. टीम ने श्रमिकों को यात्रा के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने को लेकर जागरुक किया तथा खाली समय में पढ़ने के लिए राष्ट्रीय विचारों का साहित्य भी भेंट किया. प्रचार विभाग के कार्यकर्ताओं ने ट्रेन में मौजूद श्रमिकों व उनके परिवार के सदस्यों के साथ बातचीत की तथा उनका हालचाल भी जाना.

स्टेशन से रवाना होते हुए श्रमिकों ने यह महसूस किया कि मानो वह अपने परिवार से बिछुड़ रहे हों. स्टेशन पर श्रमिकों को विदा करने आए लोगों ने भारत माता के जयघोष के साथ श्रमिकों को विदा किया.
हरियाणा के प्रचार प्रमुख राजेश कुमार ने श्रमिकों व उनके परिवार के सदस्यों से बातचीत करते हुए उनका कुशल-क्षेम जाना तथा उन्हें सझाते हुए कहा कि वह ट्रेन में सफर के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का विशेष ध्यान रखें तथा सतर्कता के साथ अपना सफर करें. सफर के दौरान किसी भी प्रकार की लापरवाही न करें. इससे उनकी व उनके परिवार की जिंदगी खतरे में पड़ सकती है. अपने गंतव्य पर पहुंच कर सभी लोग अपने साथ-साथ अपने परिवार के सदस्यों का भी विशेष ध्यान रखें तथा उन्हें भी कोरोना संक्रमण के बारे में जागरूक करें. श्रमिकों के साथ मौजूद उनके बच्चों से बातचीत करते हुए उनकी पढ़ाई के बारे में जानकारी ली तथा उन्हें समझाते हुए कहा कि अपने गांव जाकर वह अपनी पढ़ाई को बीच में न छोड़ें. जैसे ही स्थिति सामान्य होती है तो वह नजदीक के स्कूल में दाखिला लेकर अपनी पढ़ाई को जारी रखें.

विशेष श्रमिक ट्रेन में 1400 श्रमिक मुजफ्फरपुर, गोपालगंज, दरभंगा, प. चम्पारन, पूर्वी चम्पारन, मधुबनी, शिवहर और सीतागढ़ के लिए रवाना किए गए. ट्रेन में 631 श्रमिक समालखा से और 769 श्रमिक पानीपत से भेजे गए हैं. इन सभी को विभिन्न शेल्टर होम से बसों के माध्यम से रेलवे स्टेशन लाया गया. ट्रेन को रवाना करने से पूर्व सारी ट्रेन को सेनेटाइज किया गया और सभी श्रमिकों का हैल्थ चैकअप किया गया. यही नहीं, सभी श्रमिकों को खाने के पैकेट व पानी की बोतलें भी दी गई.

गोपालगंज जाने वाले निरंजन, राजेश पासवान ने बताया कि वे पानीपत में पेंटिंग का काम करते थे. लॉकडाउन समाप्त होने के बाद वे वापिस आएंगे. इसी तरह दरभंगा जाने वाले पप्पू पासवान ने कहा कि कोरोना वायरस के चलते वे अपने घर जा रहे हैं. वे यहां टैंट की दुकान पर काम करते थे. दोबारा काम शुरू होने पर वापिस आएंगे. उन्होंने केन्द्र व प्रदेश सरकार, जिला प्रशासन और समाजसेवी संस्थाओं द्वारा दिए गए सहयोग की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनके सहयोग को वे हमेशा याद रखेंगे. वे सरकार का धन्यवाद करते हैं.

May 22nd 2020, 12:28 pm

बाढ़ पीड़ितों के लिए संकट मोचक बनकर आए स्वयंसेवक

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हरियाणा. करनाल जिले के गांव रावर के समीप नहर टूटने (रविवार सुबह, 17 मई) के कारण आई बाढ़ ने पूरे गांव को अपनी चपेट में ले रखा था. जहां तक नजर जा रही थी, चारों तरफ पानी ही पानी दिखाई दे रहा था. गांव के मकानों में पानी भरा हुआ था. ग्रामीण अपने मकानों की छतों पर बैठकर मदद का इंतजार कर रहे थे. ऐसे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बाढ़ में फंसे गांव रावर के ग्रामीणों के लिए संकट मोचक बनकर आए. संघ के स्वयंसेवकों ने बाढ़ में फंसे इन ग्रामीणों को भोजन व अन्य जरुरत की सामग्री उपलब्ध करवाने का काम किया. 35 स्वयंसेवक इस बचाव कार्य में लगे हुए थे. स्वयंसेवकों द्वारा ग्रामीणों को दोनों समय का भोजन मुहैया करवाया गया. इतना ही नहीं जिन-जिन मकानों में पानी ज्यादा भरा हुआ था, उन मकानों का सामान दूसरी जगह शिफ्ट करवाने में भी स्वयंसेवकों ने ग्रामीणों की मदद की.

May 22nd 2020, 12:12 pm

बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा निर्देशित गतिविधियों का संग्रह है अधिगम एप्प

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हरियाणा. अधिगम एप्प में कक्षा-कक्ष में प्रयोग की जाने वाली शैक्षिक गतिविधियों का लेखन तथा प्रस्तुतीकरण है. भारतीय शिक्षा प्रणाली में अधिगम की दृष्टि से learning by doing अर्थात् करके सीखना या स्वानुभव से सीखना, दृष्टान्त विधि से सीखना, क्रिया आधारित शिक्षण, तथा प्रश्नोत्तर विधि आदि सक्रिय शिक्षण विधियों का प्रयोग किया जाता रहा है. इस एप्प में विभिन्न विषयों के शिक्षकों द्वारा विद्यालयी स्तर पर कक्षा-कक्ष में प्रयोग की गई वास्तविक विधियों को प्रस्तुत किया जा रहा है.

विद्या भारती हरियाणा द्वारा इस अधिगम एप्प का निर्माण किया गया है. एप्प पर विद्यालय में करवाई गई छात्र केन्द्रित अनेक प्रकार की गतिविधियों को आचार्यो द्वारा अपलोड किया गया है. गतिविधियों को कक्षा के अनुसार तथा विषय के अनुसार अपलोड किया गया है! कोई भी आचार्य इस एप्प को इंस्टाल करके अपनी गतिविधि अपलोड कर सकता है तथा दूसरों द्वारा अपलोड की गई गतिविधि को देख भी सकता है! इसमें कक्षा 1 से 10 तक हिन्दी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान तथा संस्कृत विषय की गतिविधियाँ अपलोड की गई है! अब तक कुल 266 गतिविधियों का संचय इसमें किया जा चुका है.

इस अधिगम एप्प पर अनेक प्रकार की गतिविधियाँ अपलोड की गई है, जिसके द्वारा आप कक्षा शिक्षण को रोचक, आनन्ददायक तथा बाल केद्रित बना सकते है. प्रान्त के अनेक विद्यालयों के आचार्य इस कार्य में अपनी सहभागिता कर रहे है तथा उनके द्वारा अपनी कक्षा में करवाई गई अनेक गतिविधियाँ एप्प पर अपलोड कर रहे हैं.

हरियाणा प्रांत संगठन मंत्री रवि कुमार जी ने एप्प के बारे में विस्तार से बताया कि यह एप्प अध्यापक एवं छात्र दोनों के लिए है. इसमें विद्यालयों में होने वाली बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा निर्देशित एप्प यह गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध है. लिंक shorturl.at/rCJP3 से भी इसे Download कर सकते हैं.

May 22nd 2020, 10:57 am

भाग दो – नवसृजन की प्रसव पीड़ा है – ‘कोरोना महामारी’

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नरेंद्र सहगल

भौतिकवादी विचारधाराओं का अंत

सनातन भारतीय संस्कृति का उदय

संपूर्ण विश्व को एक साथ अपनी लपेट में लेने वाले कोरोना वायरस में सभी धर्मों, विचार धाराओं और चिंतन प्रहारों को अपने गिरेबान में झांकने के लिए बाध्य कर दिया है. जो काम बड़ी-बड़ी क्रांतियां,  दो विश्वयुद्ध, जन संघर्ष, राजनीतिक परिवर्तन, सामाजिक बगावतें और कथित धर्मगुरू नहीं कर सके, वह काम कोरोना वायरस ने कर दिया है. किसी दिव्य शक्ति के उदय होने की रणभेरी है यह, प्राकृतिक परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है यह.

सारा संसार एकजुट होकर, एक ही शत्रु से, एक ही हथियार से, एक ही समय पर पूरी ताकत के साथ लड़ रहा है. कुछ छिटपुट प्रसंगों को छोड़ दिया जाए तो ऐसा लगता है मानो सभी देशों का इस समय एक ही उद्देश्य है – अपनी प्रजा के जीवन को सुरक्षित करना.

संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी समस्त विश्व को एक साथ चलने की प्रेरणा नहीं दे सकीं. विश्व शांति के सभी प्रयास इसलिए विफल हुए क्योंकि इनका आधार, कार्य पद्धति और मार्ग दिशाहीन भौतिकवाद था.

भारत की सनातन संस्कृति में वह क्षमता है, जिसके आधार पर विश्व शांति का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है. परंतु भारत की इस आध्यात्मिक क्षमता और सामर्थ्य पर विचार करने से पूर्व हमें उन विचारधाराओं की समीक्षा करने की जरूरत है जो अनेक शताब्दियों के प्रयासों के बावजूद भी संसार को सुख-शांति प्रदान नहीं कर सके. यहां हम संक्षेप में इस्लाम, ईसाइयत और साम्यवाद के तौर तरीकों पर ही विचार करेंगे.

आज विश्व के लगभग साठ देशों पर इस्लाम के अनुयायियों का वर्चस्व है. इतिहास साक्षी है कि इस मजहब के झंडाबरदारों ने खूनी जिहाद, कत्लोगारत, काफिरों (मूर्ति पूजकों) के सर्वनाश, मंदिरों के विध्वंस के सिवाए मानवता को कुछ नहीं दिया. जिस मजहब के धार्मिक ग्रंथ में निर्देश दिए हों कि इस्लाम कबूल ना करने वालों को किसी भी तरह समाप्त कर दो, उस मजहब के प्रचारकों और अनुयायियों से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे अमन चैन से युक्त विश्व की रचना करेंगे.

एक ही प्रवर्तक, एक ही पुस्तक, एक ही पूजा पद्धति और एक ही अनुयाई परंपरा पर अडिग रहने वाले धर्मगुरू समस्त विश्व की विविधताओं को साथ लेकर नहीं चल सकते. तलवार और आतंक के बल पर विश्व को ‘दारुल इस्लाम’ में बदलने की चाहत रखने वाला मजहब एक दिन अवश्य ही विश्व द्वारा अस्वीकृत हो जाएगा.

इसी तरह ‘ईसाइयत’ की कार्य-संस्कृति भी विश्व को शांत करने में पूरी तरह विफल हो गई है. आर्थिक साम्राज्यवाद की स्थापना करके संसार को अपने राजनीतिक चंगुल में लेने के एकमात्र उदेश्य से प्रेरित समाज विश्व को शांति प्रदान नहीं कर सका. जन सेवा के माध्यम से धर्मांतरण और तत्पश्चात राष्ट्रांतरण की प्रक्रिया से साम्राज्य तो स्थापित हो सकते हैं, परंतु शांति की दुल्हन का घूंघट नहीं हटाया जा सकता है.

यदि चर्च आधारित सिद्धांतों की समीक्षा की जाए तो पता चलेगा कि इस मत ने भी विश्व समाज को एक ही लाठी से हांक कर अपनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा को पूरा किया है. अन्यथा यह लोग यह ना कहते – “ईसा ही सत्य है – ईसा ही मार्ग है और ईसा ही लक्ष्य है”. इस मार्ग के अनुयायिओं ने भी आधे से भी ज्यादा विश्व में धर्मान्ध उन्माद मचाया है.

अगर हम साम्यवादियों की बात करें तो यह लोग जितनी ताकत और गति के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़े थे, उसी रफ्तार से धराशाही होते चले गए. दिव्य शक्ति ब्रह्म, धर्म, संस्कृति, राष्ट्रवाद और योग को धत्ता बता कर इन लोगों ने साम्यवाद के नाम पर जो वाद पैदा कर दिए, उन्हीं की आग में झुलस गए साम्यवादी. साम्यवाद के विरोधियों को किस तरह से भयानक एवं जानलेवा यातना शिविरों में मारा गया, यह सारी दुनिया जानती है.

केवल मात्र ’अर्थ’ को ही मानव के समग्र विकास की गारंटी मानने वाले साम्यवादियों ने केवल मनुष्य के शरीर एवं पेट को ही पूर्ण मानव मान लिया. मन, बुद्धि और आत्मा को तिलांजलि देकर मजदूर-किसानों का पेट भरने के इनके स्वप्निल इरादे मानव समाज के चातुर्दिक विकास की चट्टान पर सर पटक कर चूर-चूर हो गए.

सत्य तो यही है कि मानव के समग्र विकास अथवा एकात्म मानववाद की कल्पना तक भी उपरोक्त तीनों विचारधाराओं के पास नहीं है. इन तीनों के प्रयासों में ‘मनुष्यता’ कहीं दृष्टिगोचर नहीं होती. प्रचण्ड भौतिकवाद और संस्थागत स्वार्थ से प्रेरित उद्देश्य हैं इनके. इनके पास मानव को भेड़ बकरी समझने वाली विचारधारा है और गैर इनसानी, अहंकारी, हिंसक मार्ग है. आज विश्व में जो आतंकवाद, आप्रकृतिक जीवन रचना, हथियारों के भण्डार और विश्व युद्ध की विभीषिका जैसा वातावरण बना है, वह इन्हीं तीनों विचारधाराओं का परिणाम है.

विश्व मानव त्रस्त है, मानवता कराह रही है. कोरोना जैसी व्याधियां चुनौति दे रही हैं. चारों ओर अधर्म का साम्राज्य व्याप्त है. विश्व को प्रतीक्षा है, किसी ऐसे अवतार की जो धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए पुन: धरती पर अवतरित हो. निश्चित रूप से भारत की सनातन संस्कृति की कोख से वह अवतरण हो चुका है.

बहुत शीघ्र सारे संसार के कर्णपुटों पर गगनभेदी उद्घोष होगा – ‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ – ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ सभी प्राणियों में एक ही आत्मा का वास है, जो एक समान, सार्वभौम और सर्वस्पर्शी है. सारा विश्व इस वेद वाक्य का अनुसरण करेगा और इसे सार्थक रूप भी देगा – ‘संगच्छध्वं संवदध्वं’ अर्थात् सभी एक साथ चलें और स्नेहपूर्वक संवाद करें. ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ सारा संसार एक परिवार है.

हमारा भारत पुन: बनेगा विश्वगुरू. इस प्रकार के ‘विश्वगुरू-तत्व’ का जन्म भारत की धरती पर होने वाला है. रणभेरी बज रही है. विश्वव्यापी आध्यात्मिक क्रांति की मशाल हाथों में लेकर हम भारतीय कदम से कदम मिला कर आगे बढ़ने वाले हैं……क्रमशः

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)

 

May 22nd 2020, 10:57 am

22 मई / बलिदान दिवस – अमर बलिदानी मुरारबाजी

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नई दिल्ली. पांच जनवरी, 1665 को सूर्यग्रहण के अवसर पर शिवाजी महाराज ने माता जीजाबाई के साथ महाबलेश्वर मन्दिर में पूजा की. फिर वे दक्षिण के विजय अभियान पर निकल गये. तभी उन्हें सूचना मिली कि मिर्जा राजा जयसिंह और दिलेर खाँ पूना में पुरन्दर किले की ओर बढ़ रहे हैं. शिवाजी दक्षिण अभियान को स्थगित करना नहीं चाहते थे, पर इन्हें रोकना भी आवश्यक था. कुछ ही समय में मुगल सेना ने पुरन्दर किले को घेर लिया. वह निकटवर्ती गांवों में लूटपाट कर आतंक फैलाने लगी. इससे शिवाजी ने मुगलों की चाकरी कर रहे मिर्जा राजा जयसिंह को एक लम्बा पत्र लिखा, जो अब एक ऐतिहासिक विरासत है, पर जयसिंह पर कोई प्रभाव नहीं हुआ. उल्टे पुरन्दर किले पर हमले और तेज हो गये.

पुरन्दर किला दो चोटियों पर बना था. मुख्य किला 2,500 फीट ऊँची चोटी पर था, जबकि 2,100 फीट वाली चोटी पर वज्रगढ़ बना था. जब कई दिन के बाद भी मुगलों को किले को हथियाने में सफलता नहीं मिली, तो उन्होंने वज्रगढ़ की ओर से तोपें चढ़ानी प्रारम्भ कर दीं. मराठा वीरों ने कई बार उन्हें पीछे धकेला, पर अन्ततः मुगल वहां तोप चढ़ाने में सफल हो गये. इस युद्ध में हजारों मराठा सैनिक मारे गये. पुरन्दर किले में मराठा सेना का नेतृत्व मुरारबाजी देशपाण्डे कर रहे थे. उनके पास 6,000 सैनिक थे, जबकि मुगल सेना 10,000 की संख्या में थी और फिर उनके पास तोपें भी थीं. किले पर सामने से दिलेर खाँ ने, तो पीछे से राजा जयसिंह के बेटे कीरत सिंह ने हमला बोल दिया. इससे मुरारबाजी दो पाटों के बीच संकट में फँस गये.

उनके अधिकांश सैनिक मारे जा चुके थे. शिवाजी ने समाचार पाते ही नेताजी पालकर को किले में गोला-बारूद पहुंचाने को कहा. उन्होंने पिछले भाग में हल्ला बोलकर इस काम में सफलता पाई, पर वे स्वयं किले में नहीं पहुंच सके. इससे किले पर दबाव तो कुछ कम हुआ, पर किला अब भी पूरी तरह असुरक्षित था. किले के मराठा सैनिकों को अब आशा की कोई किरण नजर नहीं आ रही थी. मुरारबाजी को भी कुछ सूझ नहीं रहा था. अन्ततः उन्होंने आत्माहुति का मार्ग अपनाते हुए निर्णायक युद्ध लड़ने का निर्णय लिया. किले का मुख्य द्वार खोल दिया गया. बचे हुए 700 सैनिक हाथ में तलवार लेकर मुगलों पर टूट पड़े. इस आत्मबलिदानी दल का नेतृत्व स्वयं मुरारबाजी कर रहे थे. उनके पीछे 200 घुड़सवार सैनिक भी थे. भयानक मारकाट प्रारम्भ हो गयी.

मुरारबाजी मुगलों को काटते हुए सेना के बीच तक पहुंच गये. उनकी आँखें दिलेर खाँ को तलाश रही थीं. वे उसे जहन्नुम में पहुंचाना चाहते थे, पर वह सेना के पिछले भाग में हाथी पर एक हौदे में बैठा था. मुरारबाजी ने एक मुगल घुड़सवार को काटकर उसका घोड़ा छीना और उस पर सवार होकर दिलेर खाँ की ओर बढ़ गये. दिलेर खाँ ने यह देखकर एक तीर चलाया, जो मुरारबाजी के सीने में लगा. इसके बाद भी उन्होंने आगे बढ़कर दिलेर खाँ की ओर अपना भाला फेंककर मारा. तब तक एक और तीर ने उनकी गर्दन को बींध दिया. वे घोड़े से निर्जीव होकर गिर पड़े.

यह ऐतिहासिक युद्ध 22 मई, 1665 को हुआ था. मुरारबाजी ने जीवित रहते मुगलों को किले में घुसने नहीं दिया. ऐसे वीरों के बल पर ही छत्रपति शिवाजी क्रूर विदेशी और विधर्मी मुगल शासन की जड़ें हिलाकर ‘हिन्दू पद पादशाही’ की स्थापना कर सके.

May 22nd 2020, 2:21 am

सेवाभावी समाज – अपनी जरूरतों को कम करके दूसरों की मदद कर रहे लोग

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कोविड-19 महामारी में सेवा कार्यों को मिल रहा अकल्पनीय सहयोग

नई दिल्ली. भारतीय समाज में सेवा का भाव रचा बसा हुआ है. संकट में फंसे लोगों की सहायता के लिए लोग स्वतः आगे आते हैं. वर्तमान संकट में भी हर व्यक्ति अपने सामर्थ्य के अनुसार सहायता कर रहा है. देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसे अनेक उदाहरण सामने आ रहे हैं. लोग अपनी जरूरतों को कम करके सामर्थ्य से अधिक बढ़कर दूसरों की सहायता कर रहे हैं. सहयोग का मकसद श्रेय लेना नहीं, बल्कि संकट के समय में कोई अभाव में न रहे, भूखा न रहे.

कोरोना महामारी से लड़ाई में जरूरतमंदों की सहायता में मुंबई निवासी चार्टर्ड अकाउंटेंट संजय लोढ़ा (चैम्बूर) भी अन्य कार्यकर्ताओं के साथ डटे हैं. उन्होंने अनुभव साझा करते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं हमें अधिक प्रोत्साहित करती हैं.

संजय संघ के स्वयंसेवक हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जनकल्याण समिति, विश्व हिन्दू परिषद द्वारा विभिन्न स्थानों पर सेवा केंद्र चल रहे हैं. उन्होंने बताया कि अनेक अनुभव ऐसे आ रहे हैं जो सेवा में लगे कार्यकर्ताओं का उत्साहवर्धन करते हैं.

चैम्बूर की एक साधारण सी झोपड़ पट्टी में रहने वाली एक महिला को जब संस्था के सेवा कार्यों की जानकारी मिली तो इससे प्रभावित होकर उन्होंने तीन साल के दौरान थोड़ा-थोड़ा कर जमा की गई 30 हजार रुपये की राशि सेवा कार्य के लिए दान कर दी. साथ ही यह भी आग्रह किया कि उनके सहयोग को गुप्तदान में लिखा जाए, मेरा नाम कहीं न लिखा जाए. जरूरतमंदों की सहायता की जाए.

उसी तरह घाटकोपर की सब्जी मंडी है, सब्जी मंडी वालों को पता चला कि हम गरीबों की सेवा कर रहे हैं, तो सभी सब्जी वालों ने निर्णय लिया कि जो सब्जी हम रोज बेचते हैं, सुबह उसमें से कुछ सब्जी इस प्रकल्प के लिए निकालेंगे, गरीबों के भोजन के लिए देंगे. ऐसे लगभग दो सौ किलो सब्जी रोज इकट्ठी हुई, जो उन्होंने हमें दी.

इतना ही नहीं घाटकोपर के दूध वाले हैं, जो डेयरी चलाते हैं. सब दूध वालों ने निश्चित किया कि हम रोज थोड़ा-थोड़ा दूध देंगे, आप यह दूध लेकर पुलिस वालों को, स्वास्थ्य कर्मियों को सुबह 5-6 बजे की चाय दो, क्योंकि उस समय उनको कोई चाय नहीं देता है.

ऐसी एक या दो घटनाएं नहीं, कई घटनाएं हैं जो हमारे अनुभव में आ रही हैं. ऐसी घटनाएं स्वयंसेवकों का प्रोत्साहन करती हैं. हमारा उत्साह बढ़ाती हैं.

सभी प्रसंग कुछ वैसा ही उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जैसा रामायण में रामसेतू बांधते समय के हैं. जिस तरह रामसेतू के निर्माण में श्रीराम चंद्र जी को वहां मौजूद हर प्राणी मात्र का सहयोग मिला. संजय लोढ़ा बताते हैं कोविड-19 महामारी से लोगों के बचाव में लगे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं को भी हर आय वर्ग से संबंधित लोगों की मदद मिली है, जो अकल्पनीय है.

May 21st 2020, 12:59 pm

नव सृजन की प्रसव पीड़ा है – ‘कोरोना महामारी’

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नरेंद्र सहगल दिशाहीन भौतिकवाद के दुष्परिणाम विश्वगुरू भारत का पुनर्जन्म आध्यात्मिक क्रांति की शुभ बेला निष्ठुर भौतिकवाद की अंधी दौड़ में एक दूसरे को पीछे छोड़ने की प्रतिस्पर्धा में पागल हो चुके विश्व को कोरोना महामारी ने झकझोर कर रख दिया है. समस्त संसार की संचालक दिव्य शक्ति ‘प्रकृति’ के विनाश के कारण ही कोरोना जैसी भयंकर बीमारियां मानवता को पुन: प्रकृति माता की गोद में लौट आने का आह्वान कर रही है. वास्तव में कोरोना एक ऐसा विश्वयुद्ध है, जिसे प्रत्येक देश अपनी धरती पर स्वयं ही लड़ रहा है. पल भर में सारे संसार को समाप्त कर देने वाले हथियारों के जखीरे, अनियंत्रित आर्थिक संपन्नता, गगनचुंबी ऊंची अट्टालिकांए, अद्भुत सूचना तकनीक, बड़े-बड़े अस्पताल, विश्व विख्यात वैज्ञानिक, प्रतिष्ठित नेता और मार्शल योद्धा सभी ने ‘कोरोना राक्षस’ के आगे घुटने टेक दिए हैं. इस अंतर्राष्ट्रीय शत्रु ने मजहब, जाति, क्षेत्र, देश और भाषा की संकीर्ण दीवारों को तोड़कर समस्त मानवता को एक ही पंक्ति में खड़ा कर दिया है. संघ की भाषा में इसे ’एकश: संपत’ कहते हैं. ’कोरोना राक्षस’ मनुष्य को सिखा रहा है – ’मानव की जाति सबै एकबो पहचानबो’ सारा विश्व एक ही है ’वसुधैव कुटुंबकम’.  हम सभी एक ही धरती माता अथवा प्रकृति माता के पुत्र हैं. वास्तव में ’कोरोना’ सारी मानवता के लिए एक वरदान सिद्ध होता हुआ दिखाई दे रहा है. यह ठीक है कि इस रोग का शिकार होने वाले लोग अच्छे दिनों के लिए छटपटा रहे हैं. यह वायरस खतरनाक गति से बढ़ता जा रहा है. अनेक लोगों के कारोबार समाप्त होने के कगार पर आ चुके हैं. गरीब लोगों के लिए रोजी-रोटी कमाना कठिन हो गया है. श्रमिक समाज सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है. यही स्थिति भारत समेत पूरे विश्व की है. वर्तमान और भावी जीवन की रक्षा के लिए तड़प रही मानवता की स्थिति उस माता जैसी हो रही है जो प्रसव पीड़ा के दौरान अपनी और अपने होने वाले शिशु के जीवन की रक्षा के लिए तड़प रही होती है. किसी नवसृजन की प्रतीक्षा ही एकमात्र संजीवनी है जो इस अस्थाई कष्ट को सहन करने की प्रेरणा देती है. अर्थात् नवसृजन ही वर्तमान के कष्टों का एकमात्र समाधान है. अगर अपने देश के संदर्भ में देखें तो भविष्य में होने वाले नवसृजन अर्थात नूतन जीवन रचना की तैयारी भारतीयों ने ’लॉकडाउन’ के दिनों में कर ली है. वास्तव में यह भारत की सनातन परंपरा का पुनर्जन्म ही है. भौतिकवाद, अहं, स्वार्थ और स्पर्धा के पीछे भाग कर हम अपनी प्राकृतिक जीवन पद्धति को भूलते जा रहे थे. ‘लॉकडाउन’ ने हमें संयम, अनुशासन, सादा रहन-सहन, सादा खान-पान जैसी दिनचर्या को स्थाई रूप से अपना लेने की आवश्यकता समझा दी है. जिंदा रहना है तो इसे अपनाना होगा. कोरोना का कहर लम्बे समय तक रहने वाला है. धैर्य रखते हुए अपने रहन सहन को इसके अनुसार ढालना होगा. इस समय पूरे विश्व के पास कोरोना से बचने के दो ही उपाय हैं. ‘घरवास’ और शारीरिक दूरी. पिछले दिनों इन दोनों नियमों के पालन करने से बहुत बड़ा परिवर्तन देखने को मिला है. ऐसी किसी कानून या सजा के डर से नहीं हुआ. यह स्वयं प्रेरित अनुशासन ही भविष्य में हमारी जीवन रेखा होगी. इस परिवर्तन अर्थात नवसृजन का अवलोकन जरूर करें. - यातायात बंद अथवा नियंत्रित होने से वायुमंडल बहुत शुद्ध हुआ है. जीने के लिए अधिक वाहनों की आवश्यकता नहीं है. - बड़े-बड़े कारखानों, उद्योग-धंधों के गंदे कचरे और गंदे पानी के नदियों में ना गिरने से गंगा समेत कई नदियां निर्मल हुई हैं. अर्थात जल भी शुद्ध हुआ है. - होटल, रेस्टोरेंट एवं मॉल इत्यादि के ‘लॉकडाउन’ के दिनों में बंद रहने से लोगों को घर की दाल रोटी का महत्व समझ में आया है. पैसे की बर्बादी का आभास भी हुआ है. - हमें यह भी समझ में आया है कि भगवान केवल मंदिरों, गुरुद्वारों, चर्चों एवं मस्जिदों में ही नहीं होते, घर पर रहकर भी भगवान का नाम स्मरण किया जा सकता है. - एक समय था जब ‘वनवास’ को वृद्धावस्था अथवा सन्यस्त जीवन का आश्रय स्थल समझा जाता था, परंतु अब समझ में आया कि ‘घरवास’ ही वर्तमान समय में वृद्ध जनों का शांति स्थल है. - भारत की सनातन परंपराओं की आवश्यकता एवं महत्व विश्व को समझ में आने लगा है. हाथ जोड़कर नमस्ते करना, जूते घर के बाहर ही उतारना, शौचालय को घर के बाहर अथवा छत के ऊपर बनाना, दाह संस्कार के बाद हाथ मुंह धोकर घर में घुसना और अपने कपड़े धो डालना इत्यादि विज्ञान आधारित परंपराएं हैं. - किसी पारिवारिक जन की मृत्यु के बाद 13वें दिन तक कोई भी हर्षोल्लास नहीं करना अर्थात परिवार में भी शारीरिक दूरी बनाए रखना और मरने वाले की अस्थियों को चार दिन तक अच्छी तरह भस्म होने के पश्चात उन्हें सीधा किसी नदी में प्रवाह कर देना, यह आज की इस महामारी के समय भी अति प्रासंगिक है. - रोज एक बार घर में धूप अगरबत्ती एवं गूगल इत्यादि जलाना और तुलसी जैसे औषधीय पौधे गमलों में उगाना इत्यादि परंपराओं को विश्व स्तर पर मान्यता मिलना शुरू हुआ है. हवन की वैज्ञानिकता भी स्वीकृत हो रही है. बाहर से खरीद कर लाई गई प्रत्येक वस्तु को घर आकर पानी से शुद्ध करना हमारे रीति-रिवाजों में था. - हम तो आज भी पीपल, बेल, आंवला, नीम, नारियल, आम के पत्ते, केला पत्र एवं तुलसी इत्यादि को पूजा की पवित्र सामग्री मानते हैं. इसकी कटाई नहीं करते, इस तरह से पर्यावरण को शुद्ध रखने की परंपरा को जीवित रखने की आवश्यकता है. अर्थात आवश्कता अनुसार ही प्रकृति (पेड-पौधे) का दोहन करना चाहिए. वर्तमान कोरोना संकट ने भारत सहित समस्त विश्व को प्रकृति का सम्मान करने का आदेश दिया है. भविष्य में भारत विश्व का मार्गदर्शन करने में सक्षम है. वर्तमान प्रसव पीड़ा के पश्चात धरती माता की कोख से विश्व गुरु भारत का पुनर्जन्म होगा और योग आधारित आध्यात्मिक क्रांति का तेज समूचे विश्व पर उद्भासित होगा.                                                   क्रमशः (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)

May 21st 2020, 12:59 pm

राम मंदिर अयोध्या – भूमि समतलीकरण के दौरान मिला शिवलिंग, नक्काशीदार स्तंभ, देव प्रतिमाएं भी मिलीं

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अयोध्या. अयोध्या में रामजन्म भूमि के समतलीकरण के कार्य के दौरान मंदिर के अवशेष मिले हैं. जिससे तथ्य पुष्ट हो रहे हैं कि मंदिर को तोड़कर बाबर ने ढांचा बनाया था. अयोध्या में राम जन्मभूमि  मंदिर निर्माण के लिए किए जा रहे समतलीकरण के दौरान शिवलिंग, वताओं की मूर्तियां और नक्काशीदार स्तंभों सहित पत्थर की मूर्तियों के अवशेष मिल हैं. लॉकडाउन के दौरान श्री रामजन्मभूमि परिसर में भूमि को समतल करने का कार्य 11 मई से चल रहा है.

श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट महासचिव व विहिप उपाध्यक्ष चंपत राय ने बताया कि अवशेषों में फूलों की नक्काशी के साथ  पुरातात्विक कलाकृतियां और पत्थर के खंभे शामिल हैं. समतलीकरण के कार्य के दौरान 4.11 फीट का शिवलिंग, काले टचस्टोन के 7 नक्काशीदार स्तंभ, लाल बलुआ पत्थर के 6 नक्काशीदार स्तंभ और हिन्दू देवताओं की खंडित मूर्तियाँ भी मिलीं हैं. मूर्ति युक्त पाषाण के खंभे, प्राचीन कुआं एवं मंदिर के चौखट भी मिले हैं.

चंपत राय का कहना है कि प्रतिबंधों के कारण काम अभी भी धीमी गति से जारी है. भूमिगत संरचनाओं के नीचे हिन्दू मंदिरों की उपस्थिति की गवाही देंगे, जो दशकों से विवाद की वजह रही है. एएसआई के निष्कर्षों में भी स्पष्ट कहा गया था कि बाबरी मस्जिद के निर्माण स्थल के नीचे एक प्राचीन मंदिर के अवशेष थे.

उत्तर प्रदेश सरकार ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के स्थल को साफ़ करने के लिए निर्माण कार्य को फिर से शुरू करने की अनुमति दी थी, जिसे कोरोना वायरस लॉकडाउन के कारण रोक दिया गया था. निर्माण का पहला चरण पहले 25 मार्च को शुरू हुआ था, जब उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ अयोध्या गए थे और अयोध्या शहर में संतों और साधकों के साथ “प्राण-प्रतिष्ठा” अनुष्ठान में भाग लिया था. जिला मजिस्ट्रेट से अनुमति प्राप्त करने के बाद श्रीराम जन्मभूमि परिसर में भावी मंदिर निर्माण के लिए भूमि के समतलीकरण का कार्य प्रारंभ किया गया.

कार्य में तीन जेसीबी मशीन, एक क्रेन, दो ट्रैक्टर व 10 मजदूर लगे हुए हैं. कोरोना महामारी के संबंध में समय-समय पर जारी निर्देशों का पालन करते हुए मशीनों का उपयोग एवं सोशल डिस्टेंसिंग, सेनेटाइजेशन, मास्क आदि अन्य सभी सुरक्षा उपायों का प्रयोग किया गया है.

अवशेष सिद्घ कर रहे प्राचीन मंदिर की भव्यता

डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य मनोज दीक्षित का कहना है कि श्रीराम जन्मभूमि में समतलीकरण के दौरान मिले मंदिर के अवशेषों से स्पष्ट होता है कि यहां भव्य मंदिर रहा होगा. उन्होंने अन्य अवशेषों को सावधानीपूर्वक निकालने का आग्रह किया है ताकि वे नष्ट न हों.

 

May 21st 2020, 10:55 am

सजगता के कारण कब्रिस्तान बनने से बाल-बाल बचा इंद्रप्रस्थ मिलेनियम पार्क

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वख्फ बोर्ड के षड्यंत्रों का भंडाफोड़ कर विहिप ने भेजी उपराज्यपाल को चिट्ठी

नई दिल्ली. विश्व हिन्दू परिषद तथा स्थानीय गाँव नंगली रजापुर के नागरिकों की सजगता से इंद्रप्रस्थ मिलेनियम पार्क घुसपैठ व कोरोना संक्रमण की मार से बाल बाल बचा. विश्व हिन्दू परिषद ने ना सिर्फ डीडीए के सुंदर उपवन पर लॉकडाउन की आड़ में किए गए अनाधिकृत कब्जे को रोका, बल्कि कोविड-19 संक्रमित शवों को यहाँ लाकर दफनाने तथा उससे फैलने वाले संक्रमण से पार्क में सैर करने वाले व स्थानीय निवासियों की रक्षा भी की. इस सम्बंध में इंद्रप्रस्थ विहिप के अध्यक्ष कपिल खन्ना ने हस्ताक्षरित एक पत्र दिल्ली के उपराज्यपाल तथा क्षेत्रीय सांसद गौतम गम्भीर को भेजा है.

पत्र में कहा गया है कि दिल्ली वख्फ बोर्ड कोविड-19 लॉकडाउन की आड़ में बार-बार दिल्ली के इस प्रतिष्ठित इंद्रप्रस्थ मिलेनियम पार्क पर अवैध कब्जा करने के नए नए हथकंडे अपना रहा है. कोरोना संक्रमण से बचने के लिए शवों को जलाए जाने के स्थान पर उन्हें दफनाने हेतु इस पार्क को कब्रिस्तान बता कर पार्क में आने वाले हजारों स्थानीय नागरिकों व सैलानियों के लिए संकट पैदा करने की कोशिशें की जा रही हैं. गत एक महीने में अनेक बार पार्क में घुसने के प्रत्यक्ष व परोक्ष प्रयास किए गए, किन्तु स्थानीय निवासियों विहिप कार्यकर्ताओं व चौकीदारों की चौकसी ने उन सभी को निष्फल कर दिया.

रविवार 17 मई को पार्क का ताला तोड़कर घुसने के विरुद्ध पुलिस को 100 नम्बर पर कॉल कर घुसपैठ की सूचना भी चौकीदारों ने दी, किन्तु स्थानीय पुलिस की मिलीभगत से घुसपैठिए दो दिन तक पार्क को JCB की मदद व कर्मचारियों के साथ मिलकर उसे उजाड़ते रहे. जब विहिप कार्यकर्ताओं को मामले की भनक लगी, तब ही घुसपैठिए वहाँ से रफादफा हुए.

विश्व हिन्दू परिषद ने मांग की है कि पार्क में अनाधिकृत कब्जा करने वालों तथा उनका साथ देने वालों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही हो तथा पार्क के गेट पर जड़े कब्रिस्तान के बोर्ड को अविलम्ब हटाया जाए.
विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने कहा कि राजधानी के इस प्रतिष्ठित सुरम्य उद्यान को कब्रिस्तान बनाने की किसी भी कोशिश या उसके षड्यंत्र का मुँहतोड़ जबाब दिया जाएगा.
दिल्ली वख्फ बोर्ड ने 9 अप्रैल को एक पत्र दिल्ली सरकार को लिखकर इस पार्क को कब्रिस्तान बता, वहाँ पर दिल्ली के कोविड संक्रमित शवों को दफनाने की मांग की थी. इस पर राज्य सरकार ने अभी तक अधिकृत रूप से तो कोई निर्णय नहीं लिया है, किंतु पीछे के दरवाजे से लेंड जिहादियों को सहयोग स्पष्ट दिख रहा है. इसकी भी विहिप ने कड़ी निंदा की है. स्थानीय नंगली रजापुर गांव की आरडब्ल्यूए ने भी गत माह एक पत्र दिल्ली के उपराज्यपाल, मुख्यमंत्री, डीडीए, पुलिस आयुक्त तथा अन्य सम्बंधित अधिकारियों को मेल किया था, जिसका एक रिमाइंडर भी 18 मई को पुनः भेजा. किन्तु किसी का जवाब नहीं मिला. RWA पदाधिकारियों का कहना है कि हम किसी भी कीमत पर पार्क को कोविड कब्रिस्तान नहीं बनने देंगे.

May 20th 2020, 12:55 pm

कर्नाटक – मुस्लिम कट्टरपंथी हिन्दुओं की दुकान से खरीददारी करने पर मुस्लिम महिलाओं को धमका रहे

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बेंगलुरु. सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल हो रहा है. यह वीडियो कर्नाटक का है. इस वीडियो में मुस्लिम कट्टरपंथियों का एक गिरोह मुस्लिम महिलाओं को धमका रहा है, उनके साथ दुर्व्यवहार कर रहा है क्योंकि उन महिलाओं ने हिन्दुओं की दुकानों से सामान खरीदा. कर्नाटक के ही कुछ अन्य स्थानों पर भी ऐसी ही घटनाओं की जानकारी सामने आ रही है.

कर्नाटक के दावणगेरे से एक वीडियो वायरल हुआ है. वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कैसे मुस्लिम कट्टरपंथी हिन्दुओं की दुकान से सामान खरीदने पर मुस्लिम महिलाओं को रोककर सवाल-जवाब कर रहे हैं. वीडियो में देख सकते हैं कि बीएस चन्नबसप्पा एंड संस नाम की प्रसिद्ध कपड़े की दुकान में खरीददारी करके दो मुस्लिम महिलाएं बाहर निकलती हैं. तभी मुस्लिम भीड़ आकर उन महिलाओं पर आक्रामक हो जाती है. उनसे पूछताछ की जा रही है. उनके शॉपिंग बैग भी छीनते हुए दिखाई दे रहे हैं और उन्हें गाली भी दे रहे हैं. इतना ही नहीं महिलाओं के हाथ से पकड़े की थैली छीनकर वापस लौटाने के लिए दुकान पर जाते हैं और वहां दुकान मालिक सहित कर्मचारी से दुर्व्यवहार करते हैं.

ऐसी ही घटना का एक दूसरा वीडियो भी सोशल मीडिया में वायरल हुआ है. इसमें भी देखा जा सकता है कि कैसे कट्टरपंथी मुस्लिम महिलाओं को हिन्दू स्टोर से खरीदे गए सामान को वापस करने के लिए मजबूर कर रहे हैं. एक युवक मुस्लिम महिला के हाथ से सामान से भरा नारंगी रंग का थैला छीन लेता है, इसके बाद ऑटो में बैठने के लिए मजबूर करता है, ताकि वो हिंदू दुकान में जाकर सामान वापस करके आए.

तीसरा वीडियो क्लॉक टॉवर के पास का है. जहां कुछ मुस्लिम कट्टरपंथी दो महिलाओं और एक बच्चे को धमकी देते दिखाई दे रहे हैं. महिला और उसके बच्चे को कपड़े की दुकान में प्रवेश नहीं करने के लिए धमका रहा है क्योंकि उस दुकान का मालिक हिन्दू है.

दावणगेरे के एसपी हनुमनथरायप्पा ने मीडिया को बताया कि पुलिस ने चार वीडियो फुटेज के आधार पर केस दर्ज किया है. कथित तौर पर कुछ लोग बुर्का पहनी महिलाओं से पूछताछ कर रहे हैं और उन्हें ‘हिन्दू दुकान में जाने से रोक रहे हैं. महिलाओं को धमका रहे हैं, उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया. इसलिए पुलिस ने आईपीसी की विभिन्न धाराओं में आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है.

May 20th 2020, 12:44 pm

भारत के पास होगा विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक्ज़ीक्यूटिव बोर्ड चेयरमैन का पद

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कोविड-19 – डब्ल्यूएचओ की भूमिका की स्वतंत्र जांच को सभी देश तैयार

नई दिल्ली. भारत जल्द ही विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी बोर्ड (एक्ज़ीक्यूटिव बोर्ड) के चेयरमैन का पद संभालने वाला है. देश में कोरोना वायरस के खिलाफ मोर्चा संभालने वाले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन वैश्विक मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे. डॉ. हर्षवर्धन 22 मई को विश्व स्वास्थ्य संगठन में पद संभालेंगे.

डॉ. हर्षवर्धन जापान के डॉक्टर हिरोकी नाकातानी की जगह लेंगे, जो अभी 34 सदस्यीय बोर्ड के चेयरमैन हैं. वैश्विक मंच पर भारत के प्रतिनिधित्व के प्रस्ताव पर मंगलवार को विश्व स्वास्थ्य असेंबली के 194 देशों ने हस्ताक्षर किए.

पिछले साल दक्षिण पूर्व एशिया ग्रुप ने यह फैसला कर लिया था कि इस बार बोर्ड चेयरमैन का चयन भारत की ओर से होगा. अधिकारियों के अनुसार डॉ. हर्षवर्धन 22 मई को यह पद संभालेंगे. यह पद हर साल बदलता रहता है और पिछले साल यह निर्णय हुआ था कि पहले साल भारत इस बोर्ड का प्रतिनिधित्व करेगा. यह पूर्णकालिक जिम्मेदारी नहीं है और स्वास्थ्य मंत्री को सिर्फ बैठकों में शामिल होना होगा.

बोर्ड की बैठक साल में दो बार होती है और मुख्य बैठक आमतौर पर जनवरी में होती है. जबकि दूसरी बैठक मई में होती है. कार्यकारी बोर्ड का मुख्य काम स्वास्थ्य असेंबली के फैसलों व पॉलिसी तैयार करने के लिए उचित सलाह देने का होता है. यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब अमेरिका की ओर से कोरोना वायरस को लेकर डब्ल्यूएचओ पर चीन से मिलीभगत करने का आरोप लगाया गया है.

इन देशों को मिली जगह

तकनीकी रूप से स्वास्थ्य क्षेत्र में बेहतर 34 देशों को ही कार्यकारी बोर्ड का सदस्य बनाया जाता है. लेकिन पहली बार इसमें ऐसे देशों को भी शामिल किया गया है, जो इसमें काफी पिछड़े हैं. भारत के अलावा बोर्ड के सदस्यों के रूप में बोट्सवाना, कोलंबिया, घाना, गिनी-बिसाऊ, मेडागास्कर, ओमान, रिपब्लिक ऑफ कोरिया, रूस और ब्रिटेन को जगह मिली है.

कोविड-19 : डब्ल्यूएचओ की भूमिका की स्वतंत्र जांच को सभी देश तैयार

कोरोना वायरस के खिलाफ विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की भूमिका की स्वतंत्र जांच के लिए सभी सदस्य देशों ने मंगलवार को हामी भर दी. डब्ल्यूएचओ के 194 सदस्यों की वार्षिक बैठक में बिना किसी आपत्ति के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई. यूरोपीय संघ ने 100 देशों की ओर से यह प्रस्ताव सोमवार को पेश किया था.

प्रस्ताव में कोविड-19 के खिलाफ डब्ल्यूएचओ की प्रतिक्रिया की निष्पक्ष, स्वतंत्र और व्यापक जांच की मांग की गई है. डब्ल्यूएचओ को स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने में देरी के लिए आलोचना का सामना करना पड़ रहा है.

स्वतंत्र जांच के तहत यह देखा जाएगा कि आखिर डब्ल्यूएचओ इस महामारी के खिलाफ अपनी रणनीतियों में कहां विफल रहा. प्रस्ताव में महामारी के उपचार के लिए वैक्सीन की पारदर्शी और समय पर पहुंच सुनिश्चित करने को भी कहा गया है.

May 20th 2020, 4:25 am

स्वदेशी आन्दोलन के प्रवर्तक विपिन चन्द्र पाल

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20 मई/पुण्य-तिथि

स्वतन्त्रता आन्दोलन में देश भर में प्रसिद्ध हुई लाल, बाल, पाल नामक त्रयी के एक स्तम्भ विपिनचन्द्र पाल का जन्म सात नवम्बर, 1858 को ग्राम पैल (जिला श्रीहट्ट, वर्तमान बांग्लादेश) में श्री रामचन्द्र पाल एवं श्रीमती नारायणी के घर में हुआ था. बचपन में ही इन्हें अपने धर्मप्रेमी पिताजी के मुख से सुनकर संस्कृत श्लोक एवं कृत्तिवास रामायण की कथाएँ याद हो गयी थीं.

विपिनचन्द्र प्रारम्भ से ही खुले विचारों के व्यक्ति थे. 1877 में वे ब्रह्मसमाज की सभाओं में जाने लगे. इससे इनके पिताजी बहुत नाराज हुये; पर विपिनचन्द्र अपने काम में लगे रहे. शिक्षा पूरी कर वे एक विद्यालय में प्रधानाचार्य बन गये. लेखन और पत्रकारिता में रुचि होने के कारण उन्होंने श्रीहट्ट तथा कोलकाता से प्रकाशित होने वाले पत्रों में सम्पादक का कार्य किया. इसके बाद वे लाहौर जाकर ‘ट्रिब्यून’ पत्र में सह सम्पादक बने. लाहौर में उनका सम्पर्क पंजाब केसरी लाला लाजपतराय से हुआ. उनके तेजस्वी जीवन व विचारों का विपिनचन्द्र के जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा.

विपिनचन्द्र जी एक अच्छे लेखक भी थे. बांग्ला में उनका एक उपन्यास तथा दो निबन्ध संग्रह उपलब्ध हैं. 1890 में वे कलकत्ता लाइब्रेरी के सचिव बने. अब इसे ‘राष्ट्रीय ग्रन्थागार’ कहते हैं. 1898 में वे इंग्लैण्ड तथा अमरीका के प्रवास पर गये. वहाँ उन्होंने भारतीय धर्म, संस्कृति तथा सभ्यता की विशेषताओं पर कई भाषण दिये. इस प्रवास में उनकी भेंट भगिनी निवेदिता से भी हुई. भारत लौटकर वे पूरी तरह स्वतन्त्रता प्राप्ति के प्रयासों में जुट गये.

अब उन्होंने ‘न्यू इंडिया’ नामक साप्ताहिक अंग्रेजी पत्र का सम्पादन किया. इनका जोर आन्दोलन के साथ-साथ श्रेष्ठ व्यक्तियों के निर्माण पर भी रहता था. कांग्रेस की नीतियों से उनका भारी मतभेद था. वे स्वतन्त्रता के लिये अंग्रेजों के आगे हाथ फैलाना या गिड़गिड़ाना उचित नहीं मानते थे. वे उसे अपना अधिकार समझते थे तथा अंग्रेजों से छीनने में विश्वास करते थे. इस कारण शीघ्र ही वे बंगाल की क्रान्तिकारी गतिविधियों के केन्द्र बन गये.

1906 में अंग्रेजों ने षड्यन्त्र करते हुए बंगाल को हिन्दू तथा मुस्लिम जनसंख्या के आधार पर बाँट दिया. विपिनचन्द्र पाल के तन-मन में इससे आग लग गयी. वे समझ गये कि आगे चलकर इसी प्रकार अंग्रेज पूरे देश को दो भागों में बाँट देंगे. अतः उन्होंने इसके विरोध में उग्र आन्दोलन चलाया.

स्वदेशी आन्दोलन का जन्म बंग-भंग की कोख से ही हुआ. पंजाब में लाला लाजपतराय तथा महाराष्ट्र में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इस आग को पूरे देश में फैला दिया. विपिनचन्द्र ने जनता में जागरूकता लाने के लिये 1906 में ‘वन्देमातरम्’ नामक दैनिक अंग्रेजी अखबार भी निकाला.

धीरे-धीरे उनके तथा अन्य देशभक्तों के प्रयास रंग लाये और 1911 में अंग्रेजों को बंग-भंग वापस लेना पड़ा. इस दौरान उनका कांग्रेस से पूरी तरह मोहभंग हो गया. अतः उन्होंने नये राष्ट्रवादी राजनीतिक दल का गठनकर उसके प्रसार के लिये पूरे देश का भ्रमण किया.

वे अद्भुत वक्तृत्व कला के धनी थे. अतः उन्हें सुनने के लिये भारी भीड़ उमड़ती थी. एक बार अंग्रेजों ने श्री अरविन्द के विरुद्ध एक मुकदमे में गवाही के लिये विपिनचन्द्र को बुलाया; पर उन्होंने गवाही नहीं दी. अतः उन्हें भी छह माह के लिये जेल में ठूँस दिया गया.

आजीवन क्रान्ति की मशाल जलाये रखने वाले इस महान देशभक्त का निधन आकस्मिक रूप से 20 मई, 1932 को हो गया.

May 19th 2020, 10:44 pm

दिल्ली – रोहिंग्या कैंप में खजूर और रुहअफज़ा, प्रवासी श्रमिक पलायन को मजबूर

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नई दिल्ली. ऐसे समय में जब लाखों मज़दूरों को दो वक़्त का खाना न मिलने के कारण उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार, अपने गाँवों के लिए पलायन करना पड़ रहा है, रोहिंग्या शरणार्थियों को लॉकडाउन के दौरान पर्याप्त मात्रा में राशन मुहैया करवाया जा रहा है. दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान यह आश्वासन दिया. सरकार ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान इस बात का पूरा इंतजाम किया गया है कि रोहिंग्या घुसपैठियों के कैंप में खाने-पीने की कोई कमी न रहे. दिल्ली सरकार ने अदालत में इससे जुड़े दस्तावेज भी पेश किए और बताया कि रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए तीन कैंप चल रहे हैं, जो दक्षिणी और उत्तर-पूर्वी दिल्ली में बनाए गए हैं.

इस बीच, न्यूज़ पोर्टल द प्रिंट ने दिल्ली के रोहिंग्या कैंपों में रमजान की तस्वीरें प्रकाशित की हैं, जिनमें वहां रुहअफजा और अच्छे किस्म के खजूर की सप्लाई देखी जा सकती है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि रोहिंग्या कैंपों के लिए सरकार की अलग से मेहरबानी की क्या जरूरत है?

दिल्ली उच्च न्यायालय में केजरीवाल सरकार ने यह भरोसा ऐसे समय में दिलाया है कि जब वे दिल्ली में रह रहे लाखों भारतीय ग़रीबों को खाना नहीं खिला पा रहे हैं. इसी के चलते दिल्ली से उत्तर प्रदेश और बिहार के मज़दूरों का बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है. ऐसे में रोहिंग्या कैंप को प्राथमिकता देने की यह बात आम जनमानस को चुभ रही है. केजरीवाल सरकार ने यह जानकारी न्यायाधीश मनमोहन और संजीव नरुला की पीठ को दी जो खजूरी खास, श्रम विहार और मदनपुर खादर में बसाए गए रोहिंग्याओं को फौरन राहत देने की एक याचिका पर सुनवाई कर रहे थे. न्यायालय में दिल्ली सरकार के वकील संजय घोष ने बताया कि इन तीनों कैंप के आसपास चार जगह मुफ़्त खाने का इंतज़ाम किया गया है. याचिकाकर्ता फ़ज़ल अब्दाली नाम का एक शख़्स है, जो आम आदमी पार्टी का करीबी माना जाता है. उसने कोर्ट से रोहिंग्याओं के लिए स्पेशल पैकेज देने की भी माँग की थी, जिस पर कोर्ट ने उसे नोडल ऑफ़िसर के पास जाने को कहा.

कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन के बाद दिल्ली से 2 से 3 लाख लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा था. यह आरोप लगता रहा है कि केजरीवाल सरकार ने जानबूझकर ऐसे हालात पैदा किए कि लोगों को जाना पड़े. यहाँ तक कि दिल्ली सरकार ने यूपी बॉर्डर तक छोड़ने के लिए बसें भी चलाई थीं. अब जब दिल्ली से बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिकों को एक षड्यंत्र के तहत खदेड़ा जा चुका है, इस समय रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए आदर्श स्थितियाँ हैं. कहा जा रहा है कि इस मौक़े का फ़ायदा नई जगहों पर झुग्गियाँ बनाने और रोज़गार पाने के लिए कर सकते हैं.

वोट बैंक की राजनीति के तहत केजरीवाल सरकार अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को राशन कार्ड और दूसरे पहचान पत्र मुहैया करवा रही है. रोहिंग्याओं के लिए अलग पैकेज घोषित करवाने के लिए ये याचिका इसीलिए डलवाई गई थी ताकि उनके लिए किए गए खाने-पीने के ख़ास इंतज़ामों को क़ानूनी वैधता दिलाई जा सके.

न्यूज़ पोर्टल द प्रिंट ने दिल्ली के रोहिंग्या कैंपों की कुछ तस्वीरें पोस्ट की हैं, जिनसे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि ऐसे समय में जब देश की बड़ी आबादी मुसीबत के दौर से गुजर रही है, रोहिंग्या कैंपों में बेहतरीन इंतज़ाम हैं.

अनाज ही नहीं, दिल्ली के रोहिंग्या कैंपों में अच्छी क्वालिटी के सऊदी अरब वाले खजूर भी मुहैया करवाए जा रहे हैं. नीचे की तस्वीर भी द प्रिंट से साभार है.

 

 

 

खजूर ही नहीं, इन दिनों रमज़ान चल रहा है तो रोहिंग्या घुसपैठियों के लिए रूहअफजा का भी पूरा बंदोबस्त है. नीचे की ये तस्वीर भी द प्रिंट ने प्रकाशित की है.

दिल्ली के रोहिंग्या कैंप में पूरियाँ तलते ये तस्वीर भी हैरत में डालने वाली है. ऐसे समय में जब लाखों गरीब दो वक़्त की रोटी नहीं खा पा रहे, दिल्ली के रोहिंग्या कैंपों पर मेहरबानी का आलम कुछ ऐसा है.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

https://theprint.in/in-pictures/what-a-friday-iftar-looks-like-at-a-delhi-rohingya-refugee-camp-during-lockdown/417495/

May 19th 2020, 12:43 pm

पाकिस्तान में  हिन्दुओं का जबरन धर्मान्तरण करवा रही तबलीगी जमात

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नई दिल्ली. पाकिस्तान भले ही कोरोना वायरस की चपेट में है, लेकिन अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न पहले की तरह निरंतर जारी है. इसी क्रम में पाकिस्तान के सिंध प्रांत में हिन्दुओं ने धार्मिक प्रताड़ना से दुखी होकर प्रदर्शन किया. उन पर लगातार धर्म परिवर्तन करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है. उन्होंने कहा कि मर जाएंगे, लेकिन धर्म नहीं छोड़ेंगे. धार्मिक उत्पीड़न के लिये तबलीगी जमात के सदस्यों पर आरोप लग रहे हैं, जो लगातार हिन्दुओं पर धर्म के नाम पर अमानवीय अत्याचार कर रहे हैं. पाकिस्‍तान के दूसरे सबसे बड़े प्रांत सिंध में हिन्दुओं पर लगातार हमले किये जा रहे हैं और महिलाओं का यौन- उत्पीड़न भी किया जा रहा है.

स्थानीय हिन्दुओं को धर्म परिवर्तन न करने पर यहां से हटाने की साजिश के तहत उन पर हमले होते रहते हैं. पाकिस्तान में मानवाधिकार कार्यकर्ता राहत ऑस्टिन के अनुसार सिंध के मटियारी में हिन्दुओं के घरों पर हमला करके आग के हवाले कर दिया गया. इतना ही नहीं पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को पीटकर घर से बाहर निकलने को मजबूर कर दिया गया. राहत ऑस्टिन का कहना है कि दुनिया मे जिहाद के लिए पाकिस्‍तान में तबलीगी जमात के लोगों की भर्ती की जाती है. इसके बाद उन्‍हें जिहाद के नाम पर आतंकवाद की ओर मोड़ा जाता है. पाकिस्‍तान में अल्‍पसंख्‍यक हिन्दुओं और ईसाईयों का धर्म परिवर्तन कराना इनका मकसद है.

सिंध प्रांत में तबलीगी जमात के लोग किस कदर कहर ढा रहे हैं, इसका उदाहरण सोशल मीडिया में वायरल वीडियो में स्पष्ट देखा जा सकता है. इस वीडियो में तबलीगी जमात के खिलाफ हाथ से लिखे पोस्टर पकड़े महिलाएं और बच्चे प्रदर्शन कर रहे हैं. वे बता रहे हैं कि उनकी पिटाई की गई, घर तोड़कर सम्पत्ति हड़प ली गयी है. तबलीगी जमात के सदस्‍यों की ओर से कहा जा रहा है कि अगर घर वापस चाहिए तो इस्लाम अपनाना होगा.

देश में हिन्दू और ईसाई अल्पसंख्यक समुदाय को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और उन्हें जबरन धर्मपरिवर्तन और ईशनिंदा कानून के तहत मुकदमे झेलने पड़ रहे हैं.

May 19th 2020, 12:43 pm

मेरा भारत – शादी के लिए जमा की राशि से प्रवासी श्रमिकों को खाना खिलाने लगा ऑटो चालक

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पुणे (विसंकें). कोरोना संकट के दौरान जरूरतमंदों की सहायता के अनेक मानवीय उदाहरण सामने आ रहे हैं. जो समाज की संवेदनशीलता और सेवा भाव को दर्शातें हैं. वहीं, अब पुणे के तीस वर्षीय युवक अक्षय कोठावाले (ऑटो चालक) ने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है. जो अन्य लोगों के लिए भी नजीर है. ऑटो चालक अक्षय ने परिश्रम कर अपनी शादी के लिए 2 लाख रुपए की राशि जमा की थी, शादी 25 मई को होना तय थी. लेकिन कोरोना संकट के कारण देश में लॉकडाउन घोषित हो गया. लॉकडाउन के कारण प्रवासी श्रमिक स्थान-स्थान पर फंसे हुए थे, श्रमिकों की समस्याओं को देख अक्षय से रहा नहीं गया और अपनी जमा राशि के साथ मित्रों का सहयोग लेकर श्रमिकों के लिए किचन शुरू किया. किचन के माध्यम से प्रतिदिन 400 लोगों को भोजन करवाने लगे. इतना ही नहीं अक्षय बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं को क्लीनिक व अस्पताल तक निःशुल्क पहुंचाते हैं. साथ ही शहर में लोगों को कोरोना वायरस से बचने के लिए जागरूक भी करते हैं. विनम्र स्वभाव के अक्षय ने बताया कि उन्हें खुशी होती है कि वह संकट की इस घड़ी में दूसरों की मदद कर पा रहे हैं. ''ऑटो रिक्शा चलाते हुए मैंने 2 लाख रुपए जमा किए थे. मेरी शादी 25 मई को होनी थी. लेकिन लॉकडाउन कि वजह से मैंने और मेरी मंगतेर ने यह तय किया कि अभी शादी को टाल दिया जाए.'' पुणे के टिंबर मार्केट क्षेत्र में रहने वाले अक्षय लॉकडाउन में गरीबों और प्रवासी श्रमिकों की तकलीफों को देखकर काफी दुखी थे और इसलिए उन्होंने उनकी मदद की ठानी. अक्षय ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक किचन तैयार किया. यहां वे लोग मिलकर चपाती और सब्जी बनाते हैं और प्रवासी श्रमिकों  तथा जरूरतमंद लोगों में बांट देते हैं. अक्षय ने कहा, ''मैंने सड़कों पर कई ऐसे लोगों को देखा जो एक समय का खाना भी नहीं खा सकते हैं और जिंदा रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. मैंने और मेरे दोस्तों ने जरूरतमंद लोगों की मदद करने की ठानी. मैंने शादी के लिए बचाए रकम को लोगों को खाना खिलाने में खर्च करने का फैसला किया. दोस्तों ने भी मदद की.'' अक्षय ऑटो से प्रवासी श्रमिकों और गरीब लोगों को रोटी बांटते हैं. वह रेलवे स्टेशन के नजदीक मालधाक्का चौक, संगमवडी और यरवदा में लोगों को एक समय का खाना खिलाते हैं. अक्षय ने कहा कि उनके पास अब कैश की कमी होने लगी है, इसलिए रोटी सब्जी की बजाय पुलाव, मसाला राइस और सांभर राइस बांटने का विचार कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि जरूरतमंदों की मदद करते रहेंगे. यह समूह कम से कम 31 मई तक लोगों को खाना खिलाना चाहता है.

May 19th 2020, 11:13 am

अन्य राज्यों से लौटे प्रवासी श्रमिकों को रोजगार से जोड़ने में जुटी विकास भारती

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आत्मनिर्भर भारत

बाहर से आ रहे श्रमिकों को ग्राम्य आधारित कार्यों से जोड़ने  लिए सर्वे करवा रही संस्था

सचिव पद्मश्री अशोक भगत ने कहा, झारखंड के गांवों में हैं काफी संभावनाएं

रांची (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अनुषांगिक संस्था विकास भारती के कार्यकर्ता कोविड-19 महामारी की विपदा के समय जरूरतमंदों की मदद करने में दिन-रात लगे हुए हैं. अब दूसरे राज्यों से गांवों में आए प्रवासी श्रमिकों की जिंदगी को नई दिशा देने की कवायद में भी जुट गए हैं. स्मार्ट विलेज की बात करने के साथ-साथ परंपरागत एवं स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने वाली गुमला के बिशुनपुर स्थित विकास भारती संस्था ने प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को साकार करने की ओर कदम बढ़ा दिया है. संस्था के कार्यकर्ता गांवों में श्रमिकों से फॉर्म भरवाकर जानकारी एकत्र कर रहे हैं. उनकी कुशलता किस क्षेत्र में है, वे गांव में रहना चाहते हैं या बाहर जाना चाहते हैं.

संस्था के सचिव पद्मश्री अशोक भगत ने कहा कि झारखंड के गांवों में काफी संभावनाएं हैं. यहां पर लेमनग्रास, हर्बल मेडिसिन, जैविक खेती, मशरूम की खेती, लाह उत्पादन, बांस आधारित उत्पाद, मधुमक्खी पालन, केंचुआ खाद, नई तकनीक से उन्नत कृषि आदि के माध्यम से हजारों लोगों को रोजगार मिल सकता है. इस तरह के उत्पादन के माध्यम से संस्था हजारों पुरुष व महिलाओं को रोजगार दे भी रही है. जरूरत है, उसे कुटीर उद्योग का रूप देने की. इस दिशा में काम करने पर आशा है कि आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार हो कर रहेगा.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ने संस्था के कार्यों को देखने के बाद कहा था कि यहां के कामों को देश के अन्य भागों में भी शुरू किया जाना चाहिए. वहीं, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी संस्था के कामों को देखने के लिए विकास भारती पहुंचे थे. जब प्रधानमंत्री ने ‘लोकल के लिए वोकल होने की बात कही, तो विकास भारती को भी अपने कार्यों को और मजबूती से चलाने के लिए बल मिला है.

लोगों को बाहर जाने से रोकने में सक्षम होगी संस्था

विकास भारती के माध्यम से संचालित कृषि विज्ञान केंद्र के निदेशक डॉ. संजय पांडेय ने कहा कि हम लोग प्रयास कर रहे हैं कि यहां के लोगों को रोजगार के लिए अब बाहर नहीं जाना पड़े. संस्था की ओर से अब तक जो भी काम किए जा रहे हैं, उसे बड़े पैमाने पर शुरू किया जाएगा. यहां पर तुलसी व लेमनग्रास का तेल निकालने के साथ-साथ गिलोय व वनौषधि पौधे का उत्पादन किया जा रहा है. इसकी मांग अभी देश-विदेश में काफी है. लाह का उत्पादन कर कच्चा माल बेच रहे हैं. यदि कुटीर उद्योग यहीं पर स्थापित कर दिया जाए, तो हजारों लोगों को रोजगार मिल जाएगा. जैविक खेती के माध्यम से अच्छी कमाई कर सकते हैं. आलू एवं मक्का का अच्छा उत्पादन होता है. चिप्स एवं जानवरों के लिए दाना तैयार करने की मशीन स्थापित कर सकते हैं. इन सब पर विकास भारती ने विचार करना शुरू कर दिया है.

May 19th 2020, 11:13 am

चित्रकूट की सीमा पर प्रवासी श्रमिकों को उपलब्ध करवाया जा रहा भोजन

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सेविका समिति, दीनदयाल शोध संस्थान, संघ के स्वयंसेवक कर रहे कार्य

चित्रकूट. कोरोना महामारी के कारण लॉकडाउन के चलते आजीविका का संकट खड़ा होने के कारण प्रवासी श्रमिकों का अपने गांव वापिस लौटने का सिलसिला अभी भी जारी है. यही हालात उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जनपद एवं मध्य प्रदेश के मझगवां जनपद में भी हैं, इन क्षेत्रों के भी हजारों प्रवासी श्रमिकों के अपने घरों को लौटने की कवायद जारी है. पिछले कई दिनों से प्रवासी श्रमिक चित्रकूट से होकर अपने घर की ओर जा रहे हैं. इस दौरान स्वयंसेवी संस्थाएं भी बढ़-चढ़कर उनके भोजन-पानी की चिंता करने में लगी हैं.

दीनदयाल शोध संस्थान के विभिन्न प्रकल्पों, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ राष्ट्र सेविका समिति चित्रकूट नगर की बहनों द्वारा दो सप्ताह से श्रमिकों को भोजन के पैकेट उपलब्ध करवाए जा रहे हैं. दीनदयाल शोध संस्थान द्वारा अपनी समन्वय टीम के माध्यम से गांव-गांव में कोरोना वायरस से बचाव और सुरक्षा के उपायों के बारे में जानकारी प्रदान की जा रही है. जागरूकता के लिए दीवार लेखन किया जा रहा है.

चित्रकूट की सीमा से गुजरने वाले प्रवासी श्रमिकों को प्रतिदिन 300 भोजन पैकेट बांटे जा रहे हैं. दीनदयाल शोध संस्थान जन शिक्षण संस्थान के कार्यकारी निदेशक राजेंद्र सिंह ने बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, रामदर्शन एवं चित्रकूट नगर की राष्ट्र सेविका समिति इकाई की बहनों के सहयोग से प्रतिदिन भोजन के पैकेट तैयार कराए जा रहे हैं, उसके बाद दो टीमों के माध्यम से चित्रकूट के रजौला बाईपास और रामदर्शन के आगे काउंटर लगाकर भोजन प्रसाद उपलब्ध कराया जा रहा है.

इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में भी कोविड-19 से बचाव के लिए मास्क एवं साबुन का वितरण किया जा रहा है. साथ ही चित्रकूट एवं मझगवां नगर के सार्वजनिक स्थलों जैसे बैंक, राशन की दुकानों और शासकीय उपक्रमों आदि स्थानों पर बैनर लगाकर, पोस्टर चिपकाकर एवं पत्रक बांटकर लोगों को जागरूक किया जा रहा है. सावधानी और सतर्कता ही कोरोना से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है.

May 19th 2020, 11:13 am

पुरुलिया में मानवीय संवेदनाएं तार-तार, खुले आसमान के नीचे बितानी पड़ी रात

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अजमेर शरीफ से 1200 लोगों वापिस लाने में प्राथमिकता, अन्य राज्यों से श्रमिक ट्रेनों को अनुमित नहीं

कोलकत्ता. पश्चिमी बंगाल में सरकार और प्रशासन इस कदर संवेदनहीन हो गए हैं कि उनको अपने नागरिकों के न तो स्वास्थ्य की चिंता है और न ही महिलाओं, बच्चों व बीमार लोगों के प्रति उनमें कोई दया भाव शेष बचा है. हाल ही में तमिलनाडु के वेल्लोर से 63 लोग अपने परिजनों के साथ पुरुलिया पहुंचे. लेकिन उनको न तो रात बिताने के लिए आश्रय मिला और न ही किसी प्रकार की कोई चिकित्सीय सुविधा. उनको खुले आसमान के नीचे रात बिताने को मजबूर होना पड़ा. इन लोगों में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं. पुरुलिया की इस घटना ने सरकार और प्रशासन द्वारा किये जा रहे इंतजामों के बड़े-बड़े दावों की पोल खोल दी.

पश्चिम बंगाल में सरकार जरूरत के हिसाब से आइसोलेशन सेंटर भी नहीं बना पाई है, जिस कारण लोग पेड़ के नीचे या खुले आसमान के नीचे खुद को क्वारेंटाइन कर रहे हैं. पुरूलिया के ही बलरामपुर में लोग खुले स्थानों पर ही खुद को क्वारेंटाइन कर रहे हैं.

वेंटिलेटर पर स्वास्थ्य सुविधाएं, 300 नर्सों ने नौकरी छोड़ी

प. बंगाल में स्वास्थ्य सुविधाओं पर संकट गहरा गया है. अकेले कोलकाता में निजी अस्पतालों में काम करने वाली 300 नर्सों ने अपनी नौकरी छोड़ दी है. राज्य में स्वास्थ्यकर्मियों के लिए काम करने की खराब परिस्थितियों के चलते ये लोग बेहद तनाव में कार्य करने को मजबूर हैं. यही कारण है कि नर्सें नौकरी छोड़कर मणिपुर सहित देश के अन्य हिस्सों में स्थित अपने घरों के लिए निकल गई हैं. राज्य में इस प्रकार की अराजक स्थितियों के कारण कोरोना महामारी से निपटने के राष्ट्रव्यापी प्रयासों को झटका लगा है.

प. बंगाल सरकार पर लग रहे तुष्टीकरण के आरोप

पश्चिमी बंगाल में स्वास्थ्य सेवाओं के चरमरा जाने के पीछे सरकार की तुष्टिकरण की नीति भी एक बड़ा कारण रहा है. ऐसे आरोप लगातार लग रहे हैं. पश्चिमी बंगाल सरकार मुस्लिम समुदाय के 1200 लोगों को अजमेर शरीफ से श्रमिक ट्रेन से वापिस लाई थी, जबकि कोटा में हिन्दू छात्रों को छोड़ दिया था. अन्य राज्यों से पश्चिम बंगाल आने वाली श्रमिक स्पेशल को भी सरकार की अनुमित का इंतजार है. पश्चिम बंगाल सरकार ने अभी एक दर्जन से कम ट्रेनों को आने की अनुमति दी है, जिस कारण प. बंगाल से संबंधित अनेक प्रवासी श्रमिक वापिस नहीं पहुंच पा रहे हैं.

May 18th 2020, 12:56 pm

जम्मू – संघ कार्यकर्ता चंद्रकांत शर्मा के हत्य़ारे आतंकी को सुरक्षा बलों ने किया ढेर

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नई दिल्ली. सुरक्षा बलों को रविवार को एक एनकाउंटर में बड़ी सफलता हाथ लगी. सुरक्षा बलों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता चंद्रकांत शर्मा की हत्या में शामिल आतंकी ताहिर अहमद सहित एक अन्य आतंकी को मार गिराया. हालांकि इस एनकाउंटर में एक जवान भी बलिदान हो गया.

जानकारी के अनुसार हिज्बुल मुजाहिद्दीन संगठन का आतंकी ताहिर अहमद भी उन आतंकियों में शामित था, जिन्होंने पिछले साल 09 अप्रैल को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता चंद्रकांत शर्मा की गोली मारकर हत्या कर दी थी.

जम्मू के आईजीपी मुकेश सिंह ने मीडिया से बातचीत में बताया कि हिज्बुल मुजाहिद्दीन के के आतंकी ताहिर अहमद का मारा जाना सुरक्षाबलों के लिए बड़ी सफलता है. अब डोडा को आतंकवाद से मुक्त कहा जा सकता है. क्योंकि डोडा किश्तवाड़ में दोबारा आतंकी की शुरूआत और सभी आतंकी गतिविधियों को ताहिर अहमद ही संचालित करता था. आतंकी ताहिर के पास से एक एके-47 राइफल और 2 मैगज़ीन बरामद किए गए हैं.

पुलवामा का रहने वाला ताहिर अहमद भट पिछले साल 2019 की शुरूआत में हिज्बुल मुजाहिदीन आतंकी संगठन में शामिल हुआ था। जिसके बाद उसका नाम मार्च 2019 में बनिहाल में सीआरपीएफ की टीम पर आईडी विस्फोट के समय सामने आया था। हिज्बुल मुजाहिदीन ने उसे चिनाब घाटी में युवाओं को अपने आतंकी संगठन में भर्ती करने और आतंकी गतिविधियों को बढ़ाने का काम सौंपा था। अप्रैल 2019 में आतंकी ताहिर ने अपने साथियों के साथ आरएसएस नेता चंद्रकांत शर्मा और उनके बॉडीगार्ड की हत्या की थी। ताहिर अहमद के मारे जाने से डोडा में हिज्बुल मुजाहिदीन के सभी आतंकी गतिविधियों पर रोक लग गई हैं, सुरक्षाबलों के लिए यह बड़ी कामयाबी हैं। ताहिर अहमद हिज्बुल मुजाहिदीन के वर्तमान ऑपरेशन कमांडर सैफ का भी करीबी था।

चंद्रकांत शर्मा

किश्तवाड़ निवासी चंद्रकांत शर्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जम्मू-कश्मीर के प्रांत सह सेवा प्रमुख थे. साथ ही वह किश्तवाड़ जिला अस्पताल में चिकित्सा सहायक के पद पर कार्यरत थे. वह घाटी में आतंक के खात्मे के लिए हमेशा बढ़चढ़ कर कार्य करते थे. इसी कारण वह आतंकियों के निशाने पर थे. 9 अप्रैल 2019 के दिन जब वह अस्पताल के ओपीडी से बाहर निकले, उसी वक्त आतंकवादियों ने उन पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें सबसे पहले उनके अंगरक्षक राजेंद्र कुमार बलिदान हुए, और उसके बाद चंद्रकांत जी को पेट में गोली लगी, खून से लथपथ वे वहीं पर गिर गए और आतंकी वहां से भाग निकले थे. अस्पताल में चंद्रकांत जी की मृत्यु हो गई थी.

May 18th 2020, 12:26 pm

ममता सरकार जिहादी हिंसक तत्वों का कठोरता से दमन करे – मिलिंद परांडे

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नई दिल्ली. पश्चिमी बंगाल में हिन्दुओं पर लगातार बढ़ते आक्रमणों के विरुद्ध विश्व हिन्दू परिषद् ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चेताते हुए कहा कि वे राज्य के हिन्दुओं के धैर्य की परीक्षा अब और ना लें, अन्यथा उन्हें सड़कों पर उतरना पडेगा. विहिप के केन्द्रीय महामंत्री मिलिंद परांडे ने कहा कि बंगाल में मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं पर लगातार हमले किए जा रहे हैं, उनके जन-धन, जमीन-जायदाद, मंदिर व शमशान तक पर अवैध कब्जे हो रहे हैं. इन्हें रोक कर उनकी सुरक्षा बढ़ाई जाए तथा हमलावरों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही हो.

उन्होंने कहा कि हाल ही में, लॉकडाउन के दौरान मेडिकल इमरजेन्सी होने के बाद भी हुगली जिला, भद्रेसर तहसील के तेलनीपाड़ा गाँव में तीन दिन तक लगातार  हिन्दुओं पर हमला किया गया, उनके घर जलाए गए, महिलाओं को निशाना बनाया गया तथा उनके साथ मारपीट भी की गई. लेकिन, पुलिस निष्क्रिय रही. मालदा के हरिशचंद्र ब्लाक में हिन्दू बस्ती में लूट-पाट की गई तथा मंदिर तोड़ने का प्रयास हुआ. बशीरहाट के पास गांव में तो पुलिस द्वारा ही महिलाओं के साथ मारपीट की गई. यहां तक कि हावड़ा में  पुलिस और सशस्त्र दल पर भी मुस्लिम भीड़ ने द्वारा आक्रमण किया. मुर्शिदाबाद जिले में तो हिन्दू बस्तियों को बार बार निशाना बनाया जाता रहा है.

विहिप महामंत्री ने कहा कि बंगाल की दुर्वव्यवस्था का हाल ये है कि जन-प्रतिनिधियों को भी जनता के पास जाने के लिए प्रतिबंधित सा कर दिया गया है. कोरोना वायरस को फैलाने वाले जमातियों को पकड़ा तो गया, किन्तु, सब को छोड़ दिया गया. बंगाल की सरकार संविधान को दरकिनार कर कार्य कर रही है. यहां तक कि केंद्र की अनेकों जन-उपयोगी योजनाएं दलगत राजनीति के चलते भेंट चढ़ गयी हैं, जिसके कारण इनका लाभ समाज को नहीं मिल पा रहा.

शारीरिक दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग) का आग्रह केंद्र व सभी सरकारों ने किया है, लेकिन मुसलमान लगातार इसका भी उल्लंघन करके कोरोना जैसी महामारी को बढ़ाने में लगे हैं. जिन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी अधिक है, वहाँ तो हिंदुओं पर हमला करके उन्हें पलायन करने के लिए भी विवश किया जा रहा है. बंगाल की मुख्यमंत्री का रवैया हिन्दू समाज के साथ भेदभाव पूर्ण है. तभी बंगाल की पुलिस भी उनकी रक्षा नहीं कर रही है.

हुगली की घटनाओ में बम और पेट्रोल बम का प्रयोग भी किया गया. NIA ने कहा है कि अनेक जगहों पर, जहां बंगाल में मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, वहां बांग्लादेशी मुसलमानों के आतंकी संगठनों के स्लीपर सेल बने हैं जो हिन्दू समाज और देश की आंतरिक सुरक्षा के लिये बड़ा खतरा बन रहे हैं. ऐसी ही घटनाएँ CAA के विरोध के समय भी हुईं थीं, जिसमें रेलवे स्टेशन तथा गाँवों में घरों को भी चिन्हित करके जलाने का काम हुआ.

मिलिंद परांडे ने कहा कि हिंसा की इन सभी घटनाओं को देखने पर समझ आएगा कि विषय कोई भी हो, अकारण, हिंदुओ को ही टारगेट किया जा रहा है. ऐसे में सरकार और पुलिस अगर हिन्दुओं की रक्षा नहीं करेगी तो हिन्दुओं को स्वयं की रक्षा के लिये खड़ा होना पड़ेगा. अपने परिवार, बहन बेटियों की रक्षा के लिये लोग खड़े हो जाएंगे.

विश्व हिन्दू परिषद बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को आगाह करती है कि वे बंगाल की जनता को सड़क पर उतरने के लिए बाध्य न करें. अपितु, सरकार ही वहां नागरिकों पर हो रहे आक्रमणों को रोके, जान माल की रक्षा करे तथा आक्रमणकारियों को दंडित करे. यह उसका संवैधानिक कर्तव्य भी है. मुस्लिम समाज के समझदार लोग भी अपने अन्दर के क्रूर, दुष्ट व अत्याचारी तत्वों को संयमित रखें तथा राज्य सरकार ऐसे सभी हिंसक तत्वों का कठोरता से दमन करे.

May 18th 2020, 12:26 pm

‘देशप्रेम की साकार और व्यावहारिक अभिव्यक्ति है स्वदेशी’

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लोकेन्द्र सिंह मुझे आज तक एक बात समझ नहीं आई कि कुछ लोग स्वदेशी जैसे अनुकरणीय, उदात्त और वृहद विचार का विरोध क्यों करते हैं? स्वदेशी से उन्हें क्या दिक्कत है? मुझे लगता है कि स्वदेशी का विरोध वे ही लोग करते हैं जो मानसिक रूप से अभी भी गुलाम हैं या फिर उनको विदेशी उत्पाद से गहरा लगाव है. संभव है, इनमें से बहुत से लोग उन संस्थाओं और संगठनों से जुड़े हों या प्रभावित हों, जो विदेशी कंपनियों से चंदा पाते हैं. जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत को आत्मनिर्भर बनाने का आह्वान किया है और लोकल के लिए वोकल होने के लिए कहा है, तब से ही कुछ लोग सोशल मीडिया पर बढ़-चढ़ कर स्वदेशी का विरोध कर रहे हैं. आप इन्हें अच्छी तरह पहचान लीजिये, ये कौन लोग हैं जो भारत में बनी वस्तुओं और उनके उपयोग को हतोत्साहित कर रहे हैं. जबकि स्वदेशी भारत की अनेक समस्याओं का समाधान है. स्वदेशी का विचार लोगों के मन में बैठ गया तो लाखों लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलेगा. स्थानीय प्रतिभा को आगे बढ़ने का अवसर मिलगा. हमारे कुशल कारीगरों के हाथ मजबूत होंगे. उनके उत्पाद की मांग बढ़ेगी तो किसे लाभ होगा? भारत को, भारत के लोगों को ही उसका लाभ मिलेगा. इसलिए जो लोग स्वदेशी का विरोध कर रहे हैं, असल में वे भारत का विरोध कर रहे हैं. स्वदेशी केवल उत्पाद से जुड़ा हुआ विषय नहीं है, बल्कि यह एक विचार है. एक आन्दोलन है. भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन का एक प्रमुख विचार रहा है, स्वदेशी. महात्मा गाँधी कहते थे - “स्वदेशी केवल रोटी, कपड़ा और मकान का नहीं, अपितु सम्पूर्ण जीवन का दृष्टिकोण है. स्वदेशी देश की प्राणवायु है, स्वराज्य और स्वाधीनता की गारंटी है. गरीबी-भुखमरी और गुलामी से मुक्ति का उपाय है यह. स्वदेशी के अभाव में राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और मानसिक स्वातंत्र्य सर्वथा असंभव है.” अपने आप को महात्मा गाँधी का उत्तराधिकारी बताने वाले ‘नकली लोगों’ को महात्मा गाँधी जी को ठीक से पढ़ना चाहिए, वे स्वदेशी के बारे में क्या सोचते थे. उनका तो पूरा जीवन ही स्वदेशी को समर्पित था. चरखे से सूत कातना और खादी के कपड़े पहनना, क्या था? विदेशी कपड़ों की होली जलना और नमक क़ानून का उल्लंघन, ये सब स्वदेशी की भावना को मजबूत करने और सब प्रकार की स्वतंत्रता प्राप्त करने के महात्मा गाँधी जी के प्रयोग थे. हम गाँधी जी के स्वदेशी के विचार को कैसे भूल सकते हैं, जबकि इस वर्ष हम उनकी 150वीं जयंती माना रहे थे. गांधी-इरविन पैक्ट के समय चर्चा चल रही थी. दोपहर में चाय का समय था. वायसराय साहब के लिए चाय आई और महात्मा गाँधी के लिए नींबू पानी आया. वायसराय देख रहे थे कि गांधी जी क्या करते हैं? गांधी जी ने एक पुड़िया निकाली और उसे खोलकर उसमें से कुछ नींबू पानी में डाल दिया. वायसराय को समझ नहीं आया कि गाँधी जी ने क्या किया तो उन्होंने पूछा कि आपने यह क्या डाला पानी में? गांधी जी ने उत्तर दिया - “आपके नमक क़ानून का उल्लंघन कर मैंने जो नमक बनाया था, उस नमक की पुड़ी को मैंने इसमें डाला है.” इतना मजबूत और विस्तृत है स्वदेशी का विचार. स्वदेशी क्या है, उसे और विस्तार देते हुए प्रख्यात स्वदेशी चिन्तक दत्तोपंत ठेंगडी ने कहा है - “यह मानना भूल है कि ‘स्वदेशी’ का सम्बन्ध केवल माल या सेवाओं से है. यह फौरी किस्म की सोच होगी. इसका मतलब है, देश को आत्मनिर्भर बनाने की प्रबल भावना, राष्ट्र की सार्वभौमिकता और स्वतंत्रता की रक्षा तथा समानता के आधार पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग.” उनका स्पष्ट मानना था कि स्वदेशी, देशप्रेम की साकार और व्यावहारिक अभिव्यक्ति है. स्वदेशी के विरोध में दो बहुत उथले तर्क दिए जाते हैं - एक, आप अपना मोबाइल फेंक दीजिये, टीवी फोड़ दीजिये, क्योंकि वे विदेशी उत्पाद हैं. दूसर कुतर्क है, सरकार विदेशी सामान के आयात पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगा देती. पहले दूसरे कुतर्क का जवाब है कि अंतर्राष्ट्रीय नीतियों के कारण सरकार की कुछ मजबूरी हो सकती है, लेकिन हमारी क्या मजबूरी है विदेशी उत्पाद खरीदने की? हम खुद क्यों नहीं, विदेशी उत्पाद से दूरी बना लेते. जब हम खरीदेंगे ही नहीं तो भविष्य में कभी वह माल बिकने के लिए यहाँ आएगा ही नहीं. इसको एक ऐतिहासिक उदाहरण से समझिये. एक वर्ष अमेरिका में प्रचुर मात्रा में संतरे का उत्पादन हुआ. जापान की महिलाओं को संतरे बहुत पसंद थे. अमेरिका ने जापान को अपने संतरे बेचने के लिए उचित बाज़ार समझा और जापान पर दबाव बनाया कि वह अमेरिका के संतरे अपने बाज़ारों में बिकने दे. पहले तो जापान ने इनकार किया, लेकिन अमेरिका की धौंस-पट्टी के कारण उसे अपने बाज़ार खोलने पड़े. लेकिन, जैसे ही जापान की महिलाओं और अन्य नागरिकों को यह ज्ञात हुआ कि हमारे बाजारों में जो संतरे की भारी आवक दिख रही है, उसके पीछे अमेरिका की धौंस-पट्टी है तो उन्होंने बहुत पसंद होने के बाद भी संतरे नहीं खरीदे. यह है स्वदेशी के प्रति नागरिक बोध. कोई भी अंतर्राष्ट्रीय नीति या दबाव नागरिकों को मजबूर नहीं कर सकता. पहले कुतर्क का उत्तर, स्वदेशी के लिए लम्बे समय से आन्दोलन चला रहे संगठन स्वदेशी जागरण मंच का एक नारा है - ‘चाहत से देसी, जरूरत से स्वदेशी और मजबूरी में विदेशी’. इस नारे में ही उस कुतर्क का सटीक उत्तर छिपा है, साथ में स्पष्ट सन्देश है. इसके बाद भी स्वदेशी विरोधियों को कुछ समझ न आये तो उनको कहिये कि उनसे कुछ हो न पायेगा. वे बस विरोध करते रहें. उनका विरोध भारत के कारीगरों, कामगारों और उत्पादकों के विरोध में है. वे नहीं चाहते कि देश के उत्पाद आगे बढ़ें, यहाँ के कारीगर-उत्पादकों का लाभ हो. अब जरा सोचिये, देशभक्त नागरिक होने के नाते आपको क्या करना है? बहुत सरल मंत्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिया है - “लोकल के लिए वोकल हो जाईये.” अपने बंधुओं द्वारा निर्मित स्वदेशी उत्पादों पर गर्व कीजिये. जहाँ तक संभव हो सके स्वदेशी वस्तुएं खरीदिये. स्वदेशी विचार को जीवन में उतरिये.

May 18th 2020, 3:15 am

हरियाणा के मुख्यमंत्री ने लौटाई बिहार सरकार द्वारा भेजी राशि, कहा – प्रवासी श्रमिक जितने आपके, उतने

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नई दिल्ली. लॉकडाउन के कारण हरियाणा में फंसे बिहार के नागरिकों की देखभाल के बदले राशि भेजे जाने पर मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने पत्र लिखकर नीतीश कुमार का आभार जताते हुए यह राशि वापस लौटा दी. कहा, हरियाणा में काम करने वाले किसी हरियाणवी से कम नहीं. लॉकडाउन के कारण हरियाणा में फंसे बिहार के नागरिकों की देखभाल के बदले राशि भेजे जाने पर मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने पत्र लिखकर नीतीश कुमार का आभार जताते हुए यह राशि वापस लौटा दी. प्रवासी श्रमिकों को लेकर हरियाणा सरकार की पहल अन्य राज्यों के लिए अनुकरणीय है. यदि अन्य सरकारें भी यही रुख अपनाएं तो प्रवासी श्रमिकों की समस्याएं कम की जा सकेंगीं.

हरियाणा के मुख्यमंत्र मनोहर लाल खट्टर ने अपने पत्र में लिखा – नीतीश जी, आपके अधिकारियों का पत्र मिला, जिसमें आपने लॉकडाउन के चलते हरियाणा में फंसे बिहार के नागरिकों के बारे में चिंता व्यक्त की है और हरियाणा सरकार द्वारा दी जा रही सुविधाओं के एवज में खर्च हुई धनराशि देने का प्रस्ताव दिया है.

अपने राज्य के नागरिकों के बारे में आपकी चिंता उचित और सराहनीय है. मैं, इस पत्र के माध्यम से आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि हरियाणा में रह रहे प्रत्येक भारतीय नागरिक हमारे भी उतने ही हैं, जितने उन राज्यों के जहां से वे आते हैं. हम, इस बात को समझते हैं कि हरियाणा की आर्थिक, औद्योगिक और कृषि क्षेत्र की उन्नति में उनका भी बहुत योगदान है. हरियाणा आकर काम करने वाला हर नागरिक चाहे कहीं भी पैदा हुआ हो, पर आज वो हमारे लिए किसी हरियाणवी से बिल्कुल भी कम नहीं है.

हमने उन्हें अपनों की तरह रखा है और उनका ख्याल किया है, वे हमारी भी जिम्मेदारी हैं. हरियाणा सरकार के माध्यम से उन्हें हर संभव मदद की जा रही है और आगे भी की जाएगी. आज राष्ट्रीय एकता और अखंडता के संवैधानिक प्रण की रक्षा के दृष्टिगत हम उनकी सुरक्षा और सम्मान के लिए प्रतिबद्ध हैं. हमारे यहां हर रोज उद्योग वापस खुल रहे हैं और अर्थव्यवस्था भी सामान्य स्थिति में वापस लौट रही है, जब भी वो अपने परिवार वालों से मिल लें और वापस आना चाहें तो उनका स्वागत है.

इस प्रस्ताव के लिए हम आपके व आपकी सरकार के आभारी हैं, लेकिन आपकी ओर से दी गई यह राशि हम अनुग्रह पूर्वक अस्वीकार कर वापस करने के लिए विवश हैं.

May 18th 2020, 2:57 am

पीएम-केयर्स में दान देने के लिए 80 वर्षीय दर्शनी देवी 10 किमी पैदल चली

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संकल्प, साहस और दानवीरता की प्रतिमूर्ति दादी दर्शनी देवी

नई दिल्ली. कोरोना संकट के दौरान समाजजन जरूरतमंदों का हर प्रकार से सहयोग कर रहे हैं. प्रधानमंत्री की अपील सुन 80 वर्षीय दर्शनी देवी के मन में भी जरूरतमंदों की सहायता का विचार आया तो पीएम-केयर्स में दान देने के लिए 10 किमी पैदल चलीं. वे अपने गांव से विकास खंड मुख्यालय पैदल पहुंची और और सहायता राशि का ड्राफ्ट बनवाया.

देवभूमि उत्तराखंड देश की रक्षा के लिए समर्पित बलिदानी सैनिकों की भूमि है, पुरुषों के साथ–साथ यहाँ की महिला वीरांगनाएं भी साहस, शौर्य, दिलेरी और दानवीरता में पीछे नहीं हैं..देश में कोरोना संकट के समय भी देवभूमि की महिलाएं चर्चा में हैं…चमोली जिले के गोचर की बुजुर्ग महिला देवकी भंडारी ने जब प्रधानमन्त्री केयर्स फंड में अपने जीवन की गाढ़ी कमाई की  संचित पूंजी 10 लाख रुपये दान की तो राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी उनकी अद्वितीय दानवीरता की प्रशंसा की..

इसी कड़ी में मातृशक्ति का गौरव बढाने वाली एक और सम्मानित बुजुर्ग महिला दर्शनी देवी रौथान शामिल हुई हैं. उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले की वसुकेदार तहसील के अंतर्गत ग्राम पंचायत डोभा-डडोली की 80 वर्षीय दर्शनी देवी रौथान ने प्रधानमंत्री केयर्स फंड में 2 लाख रुपये दान किये हैं.. इनके पति बलिदानी कबोत्र सिंह भारतीय थलसेना में हवलदार थे जो 1965 के भारत–पाकिस्तान युद्ध में देश की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे. उन्होंने परमात्मा में अडिग विश्वास, देशभक्ति भाव और अपने बलिदानी पति की स्मृति का सम्बल लेकर एकाकी जीवन जिया, थोड़ी बहुत पेंशन के साथ संकट और संघर्ष में भी आत्मसम्मान और स्वाभिमान के साथ सबके लिए प्रेरणामूर्ति सिद्ध हुईं….

दानवीरता के साथ ही 80 वर्षीय दर्शनी देवी की शौर्य कथा में देशभक्ति, दृढनिश्चय, साहस और समर्पण भाव का मिश्रण है..पीएम केयर्स फंड में कुछ दान करने का संकल्प जागा तो दर्शनी देवी ने निश्चय किया कि वह गाँव से 10 किलोमीटर दूर अगस्त्यमुनि में स्थित स्टेट बैंक में पैदल चलकर यह पुण्य का कार्य करेंगी…

बैंक पहुंचकर 2 लाख की राशि का पीएम केयर्स फंड का ड्राफ्ट जब दर्शनी देवी ने अधिशासी अधिकारी नगर पंचायत अगस्त्यमुनि हरेंद्र चौहान को सौंपा तो गदगद अधिकारियों व स्टाफ ने फूलमाला पहनाकर वीरांगना का सम्मान व स्वागत किया.

स्थानीय लोगों के मन में दर्शनी देवी के लिए बहुत सम्मान व आदर का भाव है, केवल डोभा गाँव ही नहीं आसपास के अनेक गाँव तक वे दादी के रूप में चर्चित हैं.. धार्मिक व सामाजिक कार्यों में सदैव दादी दर्शनी देवी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं… दर्शनी देवी की पहल पर गाँव डोभा में माँ जगदेश्वरी मंदिर में  भागवत ज्ञान यज्ञ कथा का आयोजन भी हुआ था, जिसमें सुदूर गांवों के लोगों ने बड़ी संख्या में भाग लिया..बच्चों, युवाओं और महिलाओं से दादी दर्शनी देवी का विशेष लगाव है..अपनी कोई संतान नहीं, लेकिन सारा गाँव उनका अपना है..

दर्शनी देवी की देखभाल उनके देवर- देवरानियों द्वारा की जाती है…35 हजार तक पेंशन पाने वाली दादी सब परिवारजनों को ही सौंपती हैं..पारिवारिक जनों व ग्रामीणों के कोरोना संकट काल में प्रधानमंत्री केयर्स फंड में दान करने की चर्चा के बाद उन्होंने भी मन बनाया और ऐसा अनुकरणीय कृत्य किया जो सबकी आँख खोलने वाला और प्रेरणा देने वाला है.. दादी दर्शनी देवी स्वस्थ,शतायु व यशस्वी हों…

सूर्य प्रकाश सेमवाल

 

May 18th 2020, 2:15 am

ग्रासनगंज स्थित रामलीला मैदान में स्वयंसेवकों ने बनाया सहायता केंद्र

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कोटद्वार. देश के विभिन्न प्रांतों से उत्तराखंड वापिस आ रहे प्रवासियों की सहायता और सेवा के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्वयंसेवक तन्मयता के साथ जुटे हैं. कोटद्वार के ग्रासनगंज स्थित रामलीला मैदान में प्रवासियों के पंजीकरण, मेडिकल जांच और सहायता हेतु प्रशासन द्वारा स्थापित परिसर में स्वयंसेवकों द्वारा सहायता केन्द्र स्थापित कर प्रवासियों और परिसर में कार्यरत कोरोनावीरों को चाय, बिस्कुट के पैकेट, पानी की बोतलें इत्यादि वितरित की जा रही हैं.

उत्तराखंड के पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश के साथ ही नई दिल्ली, पंजाब, चंडीगढ़, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान आदि राज्यों से ट्रेन, बसों से प्रतिदिन सैकड़ों प्रवासी घर लौट रहे हैं. जिनको पंजीकरण, मेडिकल जांच और आगे की परिवहन व्यवस्था के लिए ग्रासनगंज स्थित रामलीला मैदान में स्थापित परिसर में लाया जा रहा है.

पश्चिम उत्तर प्रदेश के क्षेत्र प्रचार प्रमुख पदम कुमार ने कहा कि स्वयंसेवक देश के सभी भागों में वंचित वर्ग, आम जनों और जरूरतमंदों की जरूरतों के अनुसार सेवा के अनेक तरह के कार्य कर रहे हैं. कोटद्वार में ही संघ के स्वयंसेवकों द्वारा लॉकडाउन लागू होने के बाद से जरूरतमंदों को भोजन, राशन सामग्री आदि का बड़े पैमाने पर निःशुल्क वितरण, अस्पताल की आवश्यकता के अनुसार सामूहिक रक्तदान, 6 स्थानों पर 272 कोरोना योद्धाओं का सामूहिक अभिनन्दन, ग्रासनगंज स्थित रामलीला मैदान में 14 मई से जलपान और सहायता केन्द्र चल रहा है.

प्रवासियों के लिए संचालित जलपान और सहायता केन्द्र में स्वयंसेवक सरकारी निर्देशों के अनुरूप फिजिकल डिस्टेंसिंग अपनाते हुए प्रतिदिन विभिन्न राज्यों से आ रहे सैकड़ों प्रवासियों के लिए व्यवस्थाएं कर रहे हैं.

May 17th 2020, 12:49 pm

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में ऑनलाइन शिक्षा एवं कौशल शिक्षा का समावेश हो – शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास

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शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने शिक्षा नीति में परिवर्तन के लिए प्रधानमंत्री एवं मानव संसाधन मंत्री को भेजा ज्ञापन

नई दिल्ली. देश में शिक्षा नीति के प्रारूप को अंतिम रूप दे दिया गया है, किन्तु नए कोरोना संकट के परिप्रेक्ष्य में दो माह से देश के समस्त शिक्षण संस्थान बंद हैं. इस चुनौतीपूर्ण समय में प्रस्तावित नई शिक्षा नीति के प्रारूप में कुछ आवश्यक रूप से बदलाव किए जाने चाहिएं. नई शिक्षा नीति में ऑनलाइन शिक्षा की मात्रा और स्वरूप का समावेश होना चाहिए. विषय के अनुसार कौशल शिक्षा का विस्तार भी किया जाना आवश्यक है. सभी शिक्षण संस्थाओं में स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग को अनिवार्य किया जाए.

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने ऐसे कुछ सुझावों को लेकर प्रधानमंत्री और मानव संसाधन विकास मंत्री को एक ज्ञापन प्रेषित किया है. शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के सचिव अतुल कोठारी ने नई शिक्षा नीति में नई चुनौतियों को देखते हुए आवश्यक परिवर्तन का सुझाव दिया है. ज्ञापन में कहा कि स्वदेशी स्वावलंबन अर्थव्यवस्था को पाठ्यक्रम में जोड़ना चाहिए. छात्रों की व्यक्तिगत, पारिवारिक, शैक्षणिक समस्याओं तथा भविष्य के प्रति सचेत करने हेतु विर्श केंद्र प्रत्येक शिक्षण संस्था में स्थापित किए जाने चाहिएं.

उन्होंने प्रधानमंत्री, मानव संसाधन विकास मंत्री से चीनी कोरोना वायरस के उपरांत की परिस्थिति, भविष्य की चुनौतियां, एवं आवश्यकता को ध्यान में रखकर नई शिक्षा नीति के प्रारूप में परिवर्तन करके नई शिक्षा नीति घोषित करने का सुझाव दिया है.

May 17th 2020, 11:35 am

कोरोना के बाद भविष्य का मीडिया मोबाइल स्क्रीन पर – प्रो. बीके कुठियाला

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शिमला (विसंकें). माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं हरियाणा उच्च शिक्षा आयोग के अध्यक्ष प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि कोरोना महामारी ने विश्वभर में मीडिया में होने वाले परिवर्तनों को अत्याधिक गति दी है. परिणामस्वरूप पारंपरिक मीडिया के माध्यमों जैसे अखबारों, टेलीविजन का स्थान मोबाइल व टेब आधारित माध्यमों ने लिया है. जिस तरह इस माध्यम ने परम्परागत माध्यमों का स्थान लिया है, उसे ओवर दी टॉप (ओ.टी.टी.) कहा जाता है. ऐसे में अब पत्रकारों को चाहिए कि वे मीडिया के इस नए स्वरूप के लिए अपने को तैयार करे.

प्रो. कुठियाला विश्व संवाद केंद्र शिमला द्वारा देवर्षि नारद जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित वेबिनार में संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि नारद नारायण के 12 पार्षदों में दूसरे स्थान पर आते हैं. नारद जयंती आदि पत्रकार देवर्षि नारद को समझने का एक अच्छा अवसर है. नवीन रचना के तहत मीडिया में ओ.टी.टी. का प्रभाव बढ़ा है. कोरोना के बाद भविष्य में मीडिया मोबाइल की स्क्रीन व टैब पर होगा. नागरिक संवाद की स्थिति कोविड ने तेज कर दी है. वर्तमान में मीडिया का मुद्रित माध्यम कम हो रहा है, विदेशों मे तो यह शून्य से नीचे चला गया है. कोरोना के बाद इसका भविष्य क्या होगा, इस पर जागरूक रहने बारे आगाह किया व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ओर बढ़ने की सलाह दी. उन्होंने कहा कि कोविड19 से पहले मोबाइल-टेलीफोनी कम था, अब इसका प्रभाव बढ़ गया है.

इसके अलावा रविवार को विश्व संवाद केंद्र द्वारा कांगड़ा विभाग में नारद जयंती के उपलक्ष्य पर वेबिनार का आयोजन किया गया, जिसमें मदन मोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान वाराणसी के निदेशक प्रो. ओम प्रकाश सिंह बतौर मुख्य वक्ता उपस्थित रहे. उन्होंने पत्रकारों और पत्रकारिता विषय से जुडे़ छात्रों को कोरोना काल की आपदा में नारदीय मूल्यों पर आधारित पत्रकारिता अपनाने पर बल दिया. हि. प्र. केंद्रीय विश्वविद्यालय के डॉ. जय प्रकाश ने वेब आधारित संवाद में मुख्य अतिथि का स्वागत किया.

May 17th 2020, 11:05 am

दीपनिष्ठा को जगाओ अन्यथा मर जाओगे

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जयराम शुक्ल

यह घड़ी बिल्कुल नहीं है शांति और संतोष की,

‘सूर्यनिष्ठा’ सम्पदा होगी गगन के कोष की.

यह धरा का मामला है घोर काली रात है,

कौन जिम्मेदार है यह सभी को ज्ञात है..

रोशनी की खोज में किस सूर्य के घर जाओगे,

‘दीपनिष्ठा’ को जगाओ अन्यथा मर जाओगे..

प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संबोधन को गुन-धुन रहा था कि सयास बालकवि बैरागी के उपरोक्त काव्यांश का स्मरण हो आया. उस दिन बैरागी जी दूसरी पुण्यतिथि भी थी. कवि को यूँ ही त्रिकालदर्शी नहीं कहा जाता, वे वाल्मीकि की भाँति विज्ञान विशारद भी होते.  विचार कालजयी होते हैं आज नहीं तो कल किसी न किसी रूप में फलित होते हैं. श्री मोदी ने अड़तीस मिनट के संबोधन में देश की आत्मनिर्भरता को लेकर जो वक्तव्य दिया है इस काव्यांश में उसका निचोड़ है. उन्होंने देश की स्वाभिमानी अर्थव्यवस्था को नए सिरे से गढ़ने की बात की है. पखवाड़े भर पहले प.पू. संघ प्रमुख श्री मोहन भागवतजी ने देश के नाम प्रबोधन में यही बात की थी..कि स्वदेशी ही समर्थ भारत का आधार बन सकता है.

चक्रवृद्धि ब्याज की रफ्तार से बढ़ रहे करोना के संक्रमण और देशव्यापी तालाबंदी से उपजी हताशा के बीच प्रधानमंत्री का संबोधन आशाओं का संचार करता है. कोरोना का अंत कहाँ है, फिलहाल किसी को नहीं मालूम. वैज्ञानिक भी अब यह कहने लगे हैं कि फिलहाल कोरोना के साथ जीना ही विश्व की नियति है. ऐसे निराशा भरे वातावरण में जनमन में उत्साह और जिजीविषा भरने का प्रयत्न विश्व के प्रायः सभी देश कर रहे हैं. देश की जीडीपी के बराबर यानि लगभग 20 लाख करोड़ रूपये का आर्थिक पैकेज अर्थव्यवस्था में प्राण फूंकने की संजीवन कोशिश है. और इस कोशिश की दिशा..स्वदेश- स्वाभिमान-स्वनिर्भरता है. जन से जग की बात की है. राष्ट्र के नाम संबोधन व आत्मनिर्भरता की अर्थव्यवस्था के बारे में कुछ और बात करें, इससे पहले देश के हालात पर चर्चा करते हैं.

यह सही है कि देश के लगभग हर कोने से श्रमिक वर्ग की कारुणिक सत्यकथाएं सामने आ रही हैं. तालाबंदी की वजह से उत्पन्न परिस्थितियों में मोर्चे की पहली लड़ाई यही लोग लड़ रहे हैं और शहीद भी हो रहे हैं. औरंगाबाद में रेल की पटरियों पर खून से सनी बिखरी रोटियां बेबसी का बयान कर रही हैं. अबोध बच्चों, गर्भवती महिलाओं के साथ एक-एक हजार किलोमीटर तक पैदल सफर और उससे निकले वृत्तांत को सुनकर कलेजा हाथ में आ जाता है. कहने में कोई संकोच नहीं कि यह विपदाजनक पलायन बँटवारे से भी ज्यादा त्रासद है. कोरोना महामारी का प्रचारित भय इतना प्रचंड है कि जो कहीं दूर प्रदेश के शहर में है, वह अपने घर की दहलीज पर ही मरना चाहता है. घर वापसी के पीछे यही पीड़ा यही भावना उद्वेलित कर रही है.

मृत्यु का भी अपना लोकदर्शन होता है. कोई जवान या प्रौढ़ भी जब किसी बीमारी से मरता है तो उसके परिजन, मित्रजन  दो आँसू बहाकर संतोष कर लेते हैं कि भगवान की इच्छा से उसके भाग्य में यही बदा था… लेकिन जब किसी की मृत्यु अनायास, अकाल ही होती है तो वह दिल को दहला देती है. परिजनों को यह विश्वास करने और सँभलने में समय लगता है. ऐसी मौतें, बीमारियों-महामारियों से कई गुना ज्यादा लोमहर्षक, ह्रदय विदारक होती हैं.

12, मई को राष्ट्र के नाम संबोधन में प्रधानमंत्री ने ऐसे लोगों का भावपूर्ण स्मरण किया और पीड़ा व्यक्त की. लेकिन जो वो नहीं कह पाए वो यह कि इस संघीय व्यवस्था में उन्होंने प्रांतों से जो अपेक्षाएं की वो गलत साबित हुईं. प्रधानमंत्री की आशाओं को कदम-कदम पर विश्वासघात मिला. जब देश में लॉकडाउन की घोषणा हुई तब उन्होंने जोर देकर कहा था कि अन्य प्रांतों के जो प्रवासी हैं, खासतौर पर श्रमिक और छात्र, उनके जीवन की चिंता संबंधित राज्य सरकारें करेंगी. सरकारी/ गैर सरकारी प्रतिष्ठान अपने कर्मचारियों की संपूर्ण सुरक्षा करेंगे.

राज्य सरकारों ने प्रधानमंत्री की यह चिंता अपनी नौकरशाही पर लाद दी. नौकरशाही के लिए मौतें ह्रदयहीन आँकड़ों से ज्यादा कभी कुछ नहीं रहीं. श्रमिकों के खूनपसीने से अकूत मिल्कियत खड़ी करने वाले गैर सरकारी प्रतिष्ठानों ने बेशर्मी के साथ हाथ खड़े कर लिए और श्रमिकों को बेदखल कर दिया. नौकरी और आश्रय गँवाने के बाद पेट की रोटी की चिंता लिए जब ये सब सड़क पर आए तो ज्यादातर को पीठ पर पुलिस की लाठियां मिलीं. राज्यों की व्यवस्थाओं पर भरोसा नहीं रहा, इसलिए सब अपने-अपने घरों की ओर पैदल ही निकल पड़े. मुख्यमार्ग पर पुलिस के प्रतिबंध का सामना न हो इसलिए प्रायः ने अपने शहर जाने वाली रेल की पटरियां पकड़ी. जो गाँवों या जंगलों के दुर्गम रास्तों से निकले. उनके साथ कहीं लूट हुई तो कहीं आश्रय मिला. कई घटनाएं और हादसे अभी अनसुने हैं.

लेकिन इसके विपरीत कई मामले ऐसे भी आए, जब रास्ते पर लोगों ने मदद दी. घाव सहलाए, मलहम लगाए, सांत्वना और संबल दिया. ऐसे सैकड़ों वाकये हैं जहां जाति-पाँति, धर्म, पंथ से ऊपर उठकर मुसीबतजदों की मदद की गई. इन सबके बीच टीवी चैनल्स सनसनीखेज़ वाली सत्यमित्थ्या समाचारों को नमकमिर्च लगाकर दर्शकों/श्रोताओं के समक्ष परोसते रहे, उन्हें डराते रहे. कोरोना के सोशल डिस्टेंसिंग को पीड़ितों के प्रति वितृष्णा के अर्थ में फैलाते रहे. समाचार माध्यमों ने संकट में भी जोश भरी टीआरपी हासिल करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. इस संकट में मीडिया/सोशल मीडिया का निहायत गैर जिम्मेदाराना चेहरा भी सामने आया.

थ्योरी कभी भी जस की तस  प्रैक्टिकल में नहीं उतरती. प्रधानमंत्री की थ्योरी का राज्यों में यही हश्र हुआ.

इस बीच समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो प्रधानमंत्री के लॉकडाउन की तुलना मोहम्मद-बिन-तुगलक और हिटलर से करता रहा, इसने जनता कर्फ्यू का नमो कर्फ्यू नाम रखा. इस संकट में जिसने किसी गरीब को एक छदाम भी नहीं दिया, एक घूँट पानी तक के लिए नहीं पूछा, वही सबके सब पीएम केयर्स फंड का हिसाब माँगते रहे. कोरोना के पहले तक शाहीनबाग, सीएए जैसे मुद्दों पर विषवमन करने वालों को इस करोना संकट के पीछे भी मोदी ही नजर आते रहे.

वे यह आँकलन लगाते रहे कि मोदी की जगह यदि उस महानवंश का राजकुँवर होता तो इस संकट को किस कुशलता के साथ साधता. वह महान राजवंश और उसका राजकुँवर इस संकट में अबतक सिर्फ़ अर्थनीति की ही बात करता रहा. उसे और उसके बगलगीरों को बीस लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज पर खुश होना चाहिए. लेकिन मैं यकीन के साथ यह कह सकता हूँ कि ऐसा नहीं होगा. इस पर मीनमेख निकालने की शुरूआत हो चुकी है. कल यह बात भी सामने आएगी की प्रधानमंत्री मोदी रिजर्व बैंक के कोष से संघ के स्वदेशी आत्मनिर्भरता के एजेंडे को लागू कर रहे हैं. स्वदेशी आत्मनिर्भरता का यह मूल एजेंडा तो महात्मा गांधी, बिनोवा भावे, लोहिया जयप्रकाश का था. इसी को आगे बढ़ाते हुए पंडित दीनदयाल उपाध्याय देशी अर्थव्यवस्था को युगानुकूल और वैश्विक को देशानुकूल बनाने की बात करते थे. नानाजी देशमुख ने दीनदयाल जी के इन विचारों का एक प्रकल्प ही खड़ा कर दिया. इस तरह कायदे से इस बुद्धिविलासी वर्ग को संतोष होना चाहिए कि महात्मा गांधी ने जिस स्वदेशी की अपेक्षा पं.जवाहरलाल नेहरू से की थी, उसे अब नरेन्द्र मोदी पूरा करने जा रहे हैं.

बहरहाल 18 मई से लॉकडाउन का चौथा चरण शुरू होगा और उसके साथ ही जारी रहेगी इसके औचित्य की चर्चा. हम ह्रदयहीन आँकड़ों में उलझने की बजाय सीधे सीधे उसकी बात करते हैं जो दिखता और समझ में आता है. कोरोना का वायरस चीन के वुहान से पूरी दुनिया में फैला यह सत्य सभी जानते हैं. संक्रमण के मामले में भारत से ऊपर जो देश हैं, उनमें अमेरिका, रूस, स्पेन, इंग्लैंड, फ्रांस, इटली, जर्मनी, टर्की, ईरान, चीन हैं. चीन के बाद भारत दुनिया का सबसे बड़ी आबादी वाला देश है. टर्की, ईरान और चीन को छोड़ दें तो शेष देश नाटो की सामरिक शक्ति के भागीदार हैं ही. विश्व की अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े स्टेक होल्डर हैं. यहां की चिकित्सा व्यवस्थाएं विश्व की सर्वश्रेष्ठ हैं. भारत इनके सामने कहीं नहीं ठहरता. दुनिया को अपनी जेब में रखने का दावा करने वाले अमेरिका में 14 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हैं और 85 हजार के आसपास मर चुके हैं. भारत में अभी करोना संक्रमित लोगों की संख्या अमेरिका के कोरोना मृत लोगों से भी कम है, मृत्युदर विश्वभर में सबसे कम 3% और संक्रमितों के स्वस्थ होने की दर लगभग 33% है, जो सबसे अधिक है. वजह खुलेपन, लोकतंत्र की उदात्तता और हर मर्जों की दवा का दंभ रखने वाला अमेरिका व अन्य यूरोपीय देशों ने इस महामारी को हल्के से लिया. जिन देशों ने इस संक्रमण को लेकर अपनी हेठी बघारी, वे मरे. नरेन्द्र मोदी ने समय पर निर्णय लिया..परिणाम वैश्वक स्तर पर देखें तो सवा अरब की आबादी वाले देश में कोरोना अभी नियंत्रण से बाहर नहीं है. यदि पचहत्तर हजार संक्रमित हैं तो इनमें पच्चीस हजार ठीक होकर घर भी जा चुके हैं. संक्रमित लोगों के ठीक होने की दर विश्व में सर्वोपरि है. इसका श्रेय देश के कोरोना वारियर्स को जाता है जो अपनी जान पर खेलकर जिंदगी बचाने के प्रयत्न में लगे हैं. लॉकडाउन के बाद यदि राज्यों ने अप्रवासी श्रमिकों के कुशलक्षेम को लेकर जिम्मेदारी बरती होती तो रेल की पटरियों से ऐसी कारुणिक सत्यकथाएं नहीं उठतीं.

शोक से सब ठप नहीं हो जाता. जिंदगी की जीजीविषा प्रबल होती है. सूरज चाँद अपनी ही दिशा से उगते हैं. प्रकृति का चक्र यूँ ही चलता रहता है निर्बाध. कोरोना महामारी जैसी न जाने कितनी बाधाएं झेल चुकी है यह मानव सभ्यता. सभ्यताएं अपनी राख से फिर फीनिक्स पक्षी की भाँति उठ खड़ी होती हैं. कोरोना ने अर्थव्यवस्था के ढांचे को ध्वस्त किया है जमींदोज नहीं. नई अर्थव्यवस्था स्वदेशी स्वाभिमान के साथ उठ खड़ी होगी, जहां सब कुछ अपना होगा. हर एक नागरिक उसका स्टेक होल्डर-भागीदार होगा.. इस विश्वास को लेकर चलना होगा.

May 16th 2020, 10:32 am

झंडेवाला देवी मंदिर ने 17 लाख से अधिक लोगों को भोजन उपलब्ध करवाया

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नई दिल्ली. कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन की घोषणा होते ही राजधानी में फंसे हजारों लोगों के सामने भोजन का संकट खड़ा हो गया था. ऐसे में अपने सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति तत्पर झंडेवाला देवी मंदिर ने अपने सहयोगियों और सेवादारों के साथ मिलकर 25 मार्च से 10 हजार भोजन के पैकेट तैयार कर सेवा भारती के माध्यम से वितरण प्रारंभ किया जो बाद में बढ़कर 40 हजार पैकेट प्रतिदिन हो गया. औसतन 35 हजार पैकेट प्रतिदिन के हिसाब से अब तक 17 लाख 25 हजार भोजन पैकेट का वितरण किया जा चुका है. भोजन वितरण के इस कार्य में दिल्ली पुलिस का भी सक्रिय सहयोग रहा है. इतने विशाल कार्य के लिए मंदिर के लगभग 250 सेवादार और कर्मचारी दिन-रात अथक परिश्रम कर जरूरतमंद लोगों को समय पर भोजन पहुँचाने का कार्य निरंतर कर रहे हैं.

यह कार्य बिना सरकारी सहायता के माँ झंडेवाली के सेवाभावी भक्तों, सेवादारों और कर्मचारियों के द्वारा संपन्न किया जा रहा है. समाज के जरूरतमंद लोगों की सहायता के इस पुनीत कार्य से प्रभावित होकर दिल्ली पुलिस की ओर से आज सायं 4.00 बजे मध्य जिला के डी.सी.पी. के नेतृत्व में पुलिस के बाइक सवार जवानों और जीपों में सवार अधिकारियों ने झंडेवाला मंदिर की परिक्रमा कर इस कार्य से जुड़े सभी कार्यकर्ताओं का पुष्पवर्षा कर स्वागत किया और अपना आभार व्यक्त किया.

बद्री भगत झंडेवाला देवी मंदिर समिति के सचिव कुलभूषण आहूजा ने कहा कि मंदिर समिति व सेवा में लगे सभी कार्यकर्ताओं की ओर से दिल्ली पुलिस द्वारा किये गये सम्मान के लिए धन्यवाद करते हैं और समाज के प्रति अपने कर्तव्य पालन का पुनः संकल्प लेते हैं, माँ झंडेवाली सबकी रक्षा करे.

May 16th 2020, 10:13 am

विहिप ने मेवात में हिन्दू दमनकारी व राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों की रिपोर्ट मुख्यमंत्री को भेजी

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नई दिल्ली. हरियाणा का मेवात हिन्दुओं का कब्रिस्तान बनता जा रहा है. हिन्दू विरोधी और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के कारण इसके कुछ क्षेत्रों को मिनी पाकिस्तान भी बोला जाने लगा है. विश्व हिन्दू परिषद ने तथ्यों की पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए एक उच्चस्तरीय जांच दल की स्थापना की थी. इस जांच दल में मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) जीडी बक्शी, महामंडलेश्वर धर्मदेव जी महाराज, एडवोकेट चंद्रकांत शर्मा सदस्य थे. जांच दल ने यह रिपोर्ट कल (15 मई) को गुरूग्राम में सौंप दी थी.

रिपोर्ट पर प्रतिक्रया व्यक्त करते हुए विहिप के केन्द्रीय संयुक्त महामंत्री डॉ. सुरेन्द्र जैन ने कहा कि इस रिपोर्ट में वर्णित घटनाओं को पढ़कर ह्रदय द्रवित हो जाता है. हिन्दुओं के साथ हो रहे अमानवीय, बर्बर अत्याचारों के बावजूद प्रशासन कैसे अत्याचारियों के साथ खड़ा दिखाई देता है, यह किसी को भी समझ में नहीं आता. वहां का दलित समाज, महिलाएं और पत्रकार भी अपने को सुरक्षित महसूस नहीं करते. हिन्दू-दलितों की महिलाओं का अपहरण व बलात्कार सामान्य घटनाएं होने लगी हैं. निर्भीकता के साथ इन सब विषयों पर रिपोर्ट करने वाले पत्रकारों पर भी झूठे मुकदमे बनाकर उन्हें अपने कर्तव्य पालन से रोका जा रहा है.

उन्होंने बताया कि आज यह रिपोर्ट हरियाणा के मुख्यमंत्री माननीय मनोहर लाल खट्टर को भेज दी गई है. विश्व हिन्दू परिषद विश्वास करती है कि मुख्यमंत्री महोदय इस रिपोर्ट की अनुशंसाओं को अति शीघ्र लागू करके मेवात को राष्ट्र विरोधी व हिन्दू विरोधी गतिविधियों से मुक्त कराएंगे.

May 16th 2020, 10:02 am

इलाहाबाद उच्च न्यायालय – लाउडस्पीकर से अजान इस्लाम का धार्मिक हिस्सा नहीं, रोक सही

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प्रयगराज. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अहम निर्णय सुनाया. उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को लाउडस्पीकर से अजान पर निर्णय सुनाया. कहा कि लाउडस्पीकर से अजान देना इस्लाम का धार्मिक भाग नहीं है. यह जरूर है कि अजान देना इस्लाम का धार्मिक भाग है, परन्तु लाउडस्पीकर से अजान इस्लाम का धार्मिक हिस्सा नहीं है. न्यायालय ने कहा कि मस्जिदों से मोइज्जिन बिना लाउडस्पीकर अजान दे सकते हैं. ध्वनि प्रदूषण मुक्त नींद का अधिकार व्यक्ति के जीवन के मूल अधिकारों का हिस्सा है. किसी को भी अपने मूल अधिकारों के लिए दूसरे के मूल अधिकारों का उल्लंघन करने का अधिकार नहीं है. न्यायालय ने मुख्य सचिव को आदेश दिया है कि जिलाधिकारियों से इसका अनुपालन कराएं. यह आदेश न्यायमूर्ति शशिकांत गुप्ता व न्यायमूर्ति अजित कुमार की खंडपीठ ने गाजीपुर के सांसद अफजाल अंसारी व फर्रुखाबाद के सैयद मोहम्मद फैजल की याचिकाओं को निस्तारित करते हुए दिया है. गाजीपुर जिला के डीएम ने मस्जिदों से लाउडस्पीकर से अजान पर रोक लगाने का निर्देश दिया था. गाजीपुर से बहुजन समाज पार्टी के सांसद अफजाल अंसारी ने इसका विरोध किया तथा उन्होंने रमजान माह में लाउडस्पीकर से मस्जिद से अजान की अनुमति न देने को धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर हस्तक्षेप करने की मांग की थी. मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर ने इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार करके सरकार का पक्ष पूछा था. और न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था. जब लाउडस्पीकर नहीं था तब भी होती थी अजान  इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निर्णय में स्पष्ट कर दिया कि लाउडस्पीकर से अजान पर रोक सही है. जब लाउडस्पीकर नहीं था, तब भी अजान होती थी. उस समय भी लोग मस्जिदों में नमाज पढ़ने के लिए एकत्र होते थे. ऐसे में यह नहीं कह सकते कि लाउडस्पीकर से अजान रोकना अनुच्छेद 25 के धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकारों का उल्लंघन है. दूसरे को जबरन सुनाने का अधिकार किसी को नहीं उच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 21 स्वस्थ जीवन का अधिकार देता है. वाक व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी को भी दूसरे को जबरन सुनाने का अधिकार नहीं देती. निश्चित ध्वनि से अधिक तेज आवाज बिना अनुमति बजाने की छूट नहीं है. रात 10 बजे से सुबह छह बजे तक स्पीकर की आवाज पर रोक का कानून है. न्यायालय के फैसले पर नियंत्रण का सरकार को अधिकार है.

May 15th 2020, 1:59 pm

संघ के स्वयंसेवक बने प्रवासी श्रमिकों का संबल

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आगरा हाइवे पर भोजन सेवा में जुटे स्वयंसेवक

जयपुर (विसंकें). लॉकडाउन के बीच अपने घरों को लौट रहे प्रवासी श्रमिकों की मदद करने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक तन-मन-धन के साथ जगह-जगह सेवा कार्यों में जुटे हुए हैं. स्वयंसेवक प्रवासी श्रमिकों समेत पशु-पक्षियों को दाना-पानी की व्यवस्था भी कर रहे हैं. अजमेर, जयपुर, कोटा, भीलवाड़ा सहित प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से पैदल व साइकिल आदि से आगरा व ग्वालियर की ओर जा रहे श्रमिकों की जयपुर-आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग पर संघ के स्वयंसेवकों द्वारा भोजन आदि की व्यवस्था की जा रही है. दौसा के महुवा कस्बे के पास राजमार्ग पर संघ के स्वयंसेवकों द्वारा पिछले कई सप्ताह से भोजन व पेयजल पैकेट का वितरण प्रवासी श्रमिकों को किया जा रहा है. सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने के बाद भूख से थके हारे श्रमिक स्वयंसेवकों के हाथों से भोजन पाकर अपनी भूख मिटा रहे हैं तो वहीं स्वयंसेवक भी निःस्वार्थ भाव से अनथक सेवा में जुटे हुए हैं.

स्वयंसेवक खेमचंद ने बताया कि लॉकडाउन लागू के बाद पहले तो महुवा कस्बे में स्थित अभावग्रस्त परिवारों को भोजन पैकेट व राशन सामग्री का वितरण किया गया, इसके बाद राजमार्ग से गुजरने वाले श्रमिकों को कई सप्ताह से भोजन पैकेट का वितरण लगातार किया जा रहा है. प्रतिदिन तीन सौ से अधिक पैकेट बांटे जा रहे हैं. इसी प्रकार निकटपुरी व सिकंदरा के पास समाज के लोगों द्वारा प्रवासी श्रमिकों को भोजन वितरण किया जा रहा है. स्वयंसेवक गौरव बताते हैं कि सभी स्वयंसेवक मिलकर वाहनों के अभाव में पैदल जा रहे श्रमिकों की भोजन सेवा कर रहे हैं. यह कार्य अब स्वयंसेवकों की दिनचर्या का अंग बन चुका है.

पैदल व साइकिल पर जा रहे श्रमिकों को करवाया भोजन

तीसरे लॉकडाउन में जैसे ही श्रमिकों को आने जाने की छूट मिली वैसे ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने सेवा कार्य का एक मोर्चा हाइवे पर खोल  दिया. हाइवे या रेलवे ट्रेक से जाने वाले श्रमसाधकों के लिए राहत कार्य पीने का पानी, बैठने विश्राम के लिये बिछायत, भोजन आदि की व्यवस्था की जाए.

बड़ी संख्या में बालक, बड़े, गोद में बालक को लेकर चलने वाली माताएं, पैदल व साइकिल से जा रहे हैं. उनको सहायता करना. इनके मार्ग पर जहाँ-जहाँ भी अपनी शाखाएं या कार्यकर्ता हैं, उनको बताया जा रहा है कि श्रमिकों को कोई परेशानी नहीं आनी चाहिये.

इसी क्रम में भरतपुर से आगरा, मथुरा की तरफ रोजाना 2-3 हजार श्रमिकों को भोजन व अल्पाहार की व्यवस्था दी गई. अहमदाबाद से जयपुर अजमेर रोड होते हुए झाँसी, गोरखपुर आदि जाने वाले लगभग 400 श्रमिकों को प्रतिदिन दो समय का भोजन कराने का प्रबंध  रहा. सांगानेर में जयपुर से कोटा राष्ट्रीय राजमार्ग पर प्रतिदिन 500 श्रमिकों को भोजन पैकेट, ठंडे पानी की बोतल की व्यवस्था की गई, ऐसे ही सवाई माधोपुर होते हुए मध्यप्रदेश के श्योपुर सतना शिवपुरी आदि स्थानों पर जा रहे श्रमिकों को अभी तक 14000  भोजन पैकेट दे चुके हैं.

जयपुर से मध्यप्रदेश जा रहे करीब 40 श्रमिकों के जत्थे को भोजन करवाया. उनसे बातचीत पर पता चला कि जयपुर में लोहे की दुकान पर काम करते हैं. पावटा में श्रमिक रुके हुए हैं और उनका भोजन नहीं हुआ, यह समाचार मिलते ही 6-7 स्वयंसेवकों ने उन सभी को भोजन पहुँचाया. परागपुरा के स्वयंसेवकों ने NH 8 पर घूमकर पैदल व साइकिल से जाने वाले श्रमिकों के भोजन की व्यवस्था की.

जो सड़क मार्ग गोपालपुरा बाईपास से अपने घरों पर लौट रहे हैं, उनके लिए अल्पाहार वितरण किया. जिसमें बिस्कुट, केला, मुरमुरे, भुने चने के पैकेट दिए.

May 15th 2020, 1:30 pm

अपने घरोंदों को लौट रहे प्रवासी श्रमिकों को स्नेह की छांव दे रहा समाज

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प्रवासी श्रमिकों की सहायता में सामाजिक संस्थाएं, दिख रही अपनेपन की भावना आपदा के इस दौर में मिट गई गरीब-अमीर, जात-पात की खाई नरेंद्र कुंडू हरियाणा. भारत की संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ में विश्वास रखने वाली संस्कृति है. भारत के लोग पूरे विश्व को अपना परिवार मानते हैं. देश में जब भी कोई आपदा आई है तो भारत के लोगों ने पीठ दिखाने की बजाय हमेशा डट कर उसका मुकाबला किया है. पूरा विश्व भारत की तरफ उम्मीद की नजरों से देख रहा है. चाहे कोरोना महामारी के चलते देश में हुए लॉकडाउन के दौरान फंसे हुए जरुरतमंद, गरीब व प्रवासी श्रमिकों की सहायता करने या अन्य देशों का सहयोग करने की बात हो, भारत के समाज ने अपनी दरियादिली दिखाई है. लॉकडाउन के दौरान मजबूरीवश कुछ स्थानों से प्रवासी श्रमिकों ने पैदल ही अपने गंतव्य का रुख किया तो वहां लोगों ने अपने इन असहाय भाइयों का साथ नहीं छोड़ा. सामाजिक संस्थाओं व एनजीओ, समाज ने पैदल ही अपने घरोंदों की ओर चल पड़े श्रमिकों को स्नेह की छांव प्रदान की. पैदल यात्रा के दौरान कोई भी प्रवासी श्रमिक भूखा न रहे इसके लिए लोग स्वतः आगे आए. जगह-जगह इनके खाने-पीने के लिए उचित व्यवस्था की. आपदा के इस दौर ने अमीर-गरीब, जात-पात व धर्म की खाई को पाट दिया. मदद के लिए आगे आए लोगों में मजबूरी में फंसे इन प्रवासी श्रमिकों के लिए अपनेपन की भावना साफ नजर आ रही थी. जिस-जिस शहर से इन लोगों के पैदल जत्थे निकल रहे थे, उस शहर के लोग इनकी मदद के लिए निरंतर अपने हाथ आगे बढ़ा रहे थे. हरियाणा के सबसे बड़े औद्योगिक शहर गुरुग्राम, रेवाड़ी, फरीदाबाद, पानीपत, अम्बाला जैसे शहरों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सेवा भारती, विश्व हिंदू परिषद्, श्री सिद्धेश्वर मंदिर समिति गुरुग्राम, श्री राम जानकी लीला समिति बादहशाहपुर, नमो रसोई गुरुग्राम, रोटी बैंक, स्माइल बीट्स, सनातन धर्म हनुमान मंदिर ट्रस्ट, गुरुद्वारा सिंह सभा, संत निरंकारी भवन, गोशाला सेवा समिति, बुधला संत मंदिर, जनता रसोई सहित अन्य अनेक संस्थाएं इन लोगों की मदद के लिए तत्पर हैं. पुरुष ही नहीं मातृ शक्ति भी जरुरतमंदों की मदद के लिए पीछे नहीं थी. म्हारा देश-म्हारी माटी पत्रिका ने बिहार में फंसे श्रमिकों को मुहैया करवाई मदद भारत सरकार द्वारा प्रवासी श्रमिकों को उनके राज्य में भेजने के लिए स्पेशल ट्रेनें चलाई गई हैं. गत 13 मई को रोहतक जंक्शन से भी एक श्रमिक ट्रेन कटिहार के लिए रवाना हुई थी. इस ट्रेन में लगभग 65 श्रमिकों का एक समूह बिहार के लिए रवाना हुआ था. ट्रेन में मौजूद श्रमिकों को सफर के दौरान पढ़ने के लिए हरियाणा की मासिक पत्रिका म्हारा देश-म्हारी माटी मुहैया करवाई गई थी. कटिहार पहुंचने के बाद जब वहां के स्थानीय प्रशासन द्वारा इन श्रमिकों को किसी तरह की मदद नहीं मिली तो इन श्रमिकों ने पत्रिका में प्रकाशित सम्पादक के नंबर पर फोन कर अपनी पीड़ा व्यक्त की. श्रमिकों की समस्या के निदान के लिए पत्रिका के सम्पादन मंडल के पदाधिकारियों ने तुरंत बिहार के स्वयंसेवकों को इसकी सूचना भेजी और वहां फंसे इन श्रमिकों के लिए खाने-पीने की व्यवस्था करवाई. पैदल ही मध्यप्रदेश के लिए निकले श्रमिकों के लिए साधन की व्यवस्था जींद जिले के बधाना गांव में ठेकेदार के पास मध्यप्रदेश से काम के लिए आए प्रवासी श्रमिकों को जब लॉकडाउन के कारण काम नहीं मिला तो यह लोग वापस पैदल ही मध्यप्रदेश के लिए रवाना हो गए. दोपहर को जब यह लोग अनूपगढ़ गांव के खेतों में आराम कर रहे थे तो वहां से गुजर रहे विकास पोडिया नामक व्यक्ति ने देखा. विकास ने इन लोगों से बातचीत कर पीड़ा सुनी. श्रमिकों में महिलाएं भी शामिल थी. विकास ने पहले इन लोगों के लिए जलपान की व्यवस्था की और फिर प्रशासन को सूचित कर इनको गंतव्य तक भेजने की व्यवस्था करवाई. दलबीर आर्य ने दिया मानवता का परिचय पानीपत शहर के सैक्टर 25 निवासी दलबीर आर्य ने पंजाब से पैदल ही भूखे-प्यासे चल रहे प्रवासी श्रमिकों को भोजन करवाकर मानवता का परिचय दिया है. दलबीर आर्य वीरवार दोपहर लगभग तीन बजे शहर से कुछ जरुरी कार्य निपटाकर अपने निवास की तरफ आ रहे थे. इस दौरान उन्होंने रास्ते में पैदल चल रहे लगभग 23 प्रवासी श्रमिक मिले. दलबीर आर्य ने मानवता का परिचय देते हुए प्रवासी श्रमिकों से कुशल-क्षेम जाना और उनके गंतव्य के बारे में पूछा. प्रवासी श्रमिकों ने बताया कि वह लुधियाना (पंजाब) से पैदल चलकर आए हैं और उन्होंने फतेहपुर (उत्तरप्रदेश) जाना है. लुधियाना से पैदल चलकर पानीपत पहुंचे प्रवासी श्रमिक बुरी तरह से थके हुए थे. उनके हालात देखकर दलबीर आर्य ने जब उनसे भोजन के बारे में पूछा तो प्रवासी श्रमिकों के मुंह से कोई शब्द नहीं निकला और वह एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे. प्रवासी श्रमिकों के हाव-भाव देखकर दलबीर आर्य सबकुछ समझ चुके थे. इसके बाद आर्य सभी प्रवासी श्रमिकों को अपने निवास पर ले गए और वहां सभी प्रवासी श्रमिकों को चाय-नाश्ता करवाया. इसके बाद सभी प्रवासी श्रमिक अपने गंतव्य की तरफ प्रस्थान कर गए. एक्सप्रेस-वे पर प्रवासी श्रमिकों के लिए संजीवनी बने स्वयंसेवक लॉकडाउन के कारण कामकाज बंद होने से प्रवासी श्रमिकों ने अपने प्रदेश की तरफ पलायन शुरू कर दिया है. हालांकि प्रदेश सरकार द्वारा प्रवासी श्रमिकों को उनके राज्य में भेजने के लिए रेल व बसों की व्यवस्था की जा रही है, लेकिन इसके बावजूद भी कई स्थानों पर प्रवासी श्रमिक पैदल ही अपने गंतव्य की तरफ रवाना हो रहे हैं. स्वयंसेवकों द्वारा पैदल चल रहे प्रवासी श्रमिकों के लिए भोजन व चाय-नाश्ते की व्यवस्था की जा रही है. कुंडली-मानेसर-पलवल (केएमपी) एक्सप्रेस-वे पर पिछले लगभग एक सप्ताह से सोनीपत जिले के स्वयंसेवक पैदल ही अपने गंतव्य की तरफ रवाना हो रहे श्रमिकों को भोजन व नाश्ता उपलब्ध करवा रहे हैं. खरखोदा खंड के स्वयंसेवक एक सप्ताह से पैदल चल रहे प्रवासी श्रमिकों के लिए खाना व जलपान की व्यवस्था कर रहे हैं. एक्सप्रेस-वे पर टीम सुबह व शाम को कुंडली बार्डर से लेकर बहादुरगढ़ तक जाकर रास्ते में मिलने वाले श्रमिकों को खाना देने के साथ-साथ उन्हें रास्ते के लिए भी जलपान देती है ताकि श्रमिकों को रास्ते में किसी प्रकार की कोई दिक्कत नहीं आए. गुरुग्राम में संघ व सामाजिक संगठनों ने संभाला मोर्चा औद्योगिक नगरी गुरुग्राम में काफी संख्या में प्रवासी श्रमिक रहते हैं. कोरोना संक्रमण के कारण औद्योगिक नगरी गुरुग्राम पूरी तरह से लॉकडाउन है. प्रवासी श्रमिकों को कार्य नहीं मिल पा रहा. इस कारण प्रवासी श्रमिकों ने अब अपने राज्य का रुख करना शुरू कर दिया है. कुछ मजदूर तो अपने परिवार सहित पैदल ही अपने गंतव्य की तरफ चल पड़े हैं. विभिन्न स्थानों पर इन श्रमिकों की सहायता के लिए सामाजिक संगठन, समाज जन आगे आ रहे हैं. गुरुग्राम में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सेवा भारती, श्री सिद्धेश्वर मंदिर समिति, श्री राम जानकी लीला समिति बादहशाहपुर, नमो रसोई गुरुग्राम पैदल चल रहे प्रवासी श्रमिकों को खाने-पीने की सामग्री उपलब्ध करवाने का काम कर रहे हैं. संस्थाओं द्वारा गुुरुग्राम के राजीव चौक, सोहना रोड, केएमपी एक्सप्रेस-वे तथा ताऊडू में जगह-जगह पर स्टाल लगाकर खाद्य सामग्री वितरित की जा रही है. चोरी-छीपे कैंटर में जा रहे श्रमिकों को प्रशासन ने ट्रेन से भेजा पानीपत में रह रहे प्रवासी श्रमिकों को जब लॉकडाउन के चलते काम नहीं मिल रहा था तो इन श्रमिकों ने एक निजी कैंटर में वापस बिहार जाने की तैयारी की. प्रवासी श्रमिकों ने लगभग एक लाख रुपए किराये पर एक कैंटर किया और बिना प्रशासन की मंजूरी के चोरी-छीपे यहां से निकल पड़े. रास्ते में पुलिस कर्मियों ने इन्हें रोक लिया और परमिशन नहीं होने के कारण वापस पानीपत भेज दिया. जब यह मामला पानीपत प्रशासन के संज्ञान में आया तो प्रशासन ने इन श्रमिकों को श्रमिक ट्रेन से इनके गंतव्य पर भेजने की व्यवस्था की. इतना ही नहीं पानीपत प्रशासन द्वारा श्रमिकों को ट्रेन में बैठाते समय रास्ते में खाने-पीने के लिए खाद्य सामग्री भी मुहैया करवाई. फरीदाबाद, पलवल व अम्बाला में भी सेवा फरीदाबाद, पलवल व अम्बाला भी औदयोगिक क्षेत्र हैं. यहां पर भी काफी संख्या में प्रवासी श्रमिक रहते हैं. इन क्षेत्रों में प्रवासी श्रमिकों की संख्या को देखते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सेवा भारती के अलावा काफी संख्या में सामाजिक संगठन व एनजीओ सेवा कार्यों में लगे हुए हैं. यहां से पलायन कर अपने घरों को लौटने वाले प्रवासी श्रमिकों को सामाजिक संस्थाओं द्वारा भोजन तथा रास्ते के लिए खाद्य सामग्री मुहैया करवाई जाती है ताकि सफर के दौरान श्रमिकों को किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़े.  

May 15th 2020, 12:45 pm

पालघर हत्याकांड – साधुओं के हत्यारों में सीपीएम और राष्ट्रवादी कांग्रेस के कार्यकर्ता भी शामिल

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आईडी जांच में सामने आया राजनीतिक संबंध

मुंबई (विसंकें). पालघर में साधुओं की हत्या के मामले में जांच कर रही सीआईडी ने 12 मई को सीपीएम के तीन सक्रिय कार्यकर्ताओं राजेश राव, विनोद राव और रामदास राव को गिरफ्तार किया है. इनके साथ ही 12 अन्य लोगों को भी सीआईडी ने गिरफ्तार किया है. अब तक इस मामले में कुल १४६ लोगों को हिरासत मे लिया जा चुका है. इनमें से १० आरोपी नाबालिग हैं, जिन्हें भिवंडी बाल सुधार गृह में भेजा गया है.

पालघर में साधुओं की हत्या गलतफहमी के कारण होने के दावों को सीआईडी की जांच में सामने आ रहे तथ्यों ने झुठला दिया है. इस हत्याकांड में राजनीतिक संबंध नहीं होने के दावे को भी सीआईडी की जांच के तथ्य खारिज कर रहे हैं. १६ अप्रैल को पालघर के गढ़चिंचले गांव में भीड़ द्वारा महंत कल्पवृक्ष गिरी जी तथा महंत सुशिल गिरी जी और उनके वाहन चालक निलेश तेलगडे की भीड़ ने बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी थी. १९ अप्रैल को वायरल हुए वीडियो में राष्ट्रवादी कांग्रेस का कार्यकर्ता जानक्या बोरसा सफेद शर्ट पहने नजर आ रहा है, जब कि हरी शर्ट में विष्णु सोमा भावर दिखाई दे रहा है जो माकपा कार्यकता और पूर्व ग्राम पंचायत सदस्य है.

पालघर साधु हत्याकांड का राजनैतिक लिंक अब धीरे-धीरे खुलकर दिखाई देने लगा है. इसी बीच मामले से जुड़े एक सहयोगी अधिवक्ता दिग्विजय त्रिवेदी की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई है. इसे लेकर भी चर्चाएं हो रही हैं और सीबीआई जांच की मांग तेज होने लगी है.

पालघर क्षेत्र में सेवा कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं पर पहले भी जानलेवा हमले हो चुके हैं. एक तरफ वामपंथियों का क्षेत्र में गहरा प्रभाव है तो वही इनकी संगत में धर्म परिवर्तन के लिए व्याकुल इसाई मिशनरियों का धर्मांतरण का कार्य भी फल-फूल रहा है. जनजातीय समुदाय के विकास और उत्थान में लगी राष्ट्रीय विचार की संस्थाओं के प्रकल्पों पर निरंतर आघात करते रहना भी इसी कुटिल गठजोड़ का एक कार्य है.

https://www.facebook.com/watch/?v=665598437597719

May 15th 2020, 10:25 am

नक्सल प्रभावित क्षेत्र से पैदल ही निकल रहे श्रमिकों के लिए सुरक्षा बलों ने की भोजन की व्यवस्था

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नई दिल्ली. कोरोना से जंग के दौरान सबसे अधिक प्रभाव श्रमिक वर्ग पर पड़ा है. प्रवासी श्रमिक पैदल ही अपने घरों की ओर निकल पड़े हैं. ऐसे ही 4 दिनों से पैदल चलकर 67 श्रमिक घोर नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के सुकमा (Sukma) जिले के जगरगुण्डा पहुंचे, जहां पुलिस (Police) ने उन श्रमिकों को रोक दिया. ग्रामीणों की मदद से पुलिस ने उन्हें गांव में ठहराया और खाने की व्यवस्था की. वहीं इसकी जानकारी उच्च अधिकारियों को दी. मंगलवार को घोर नक्सल प्रभावित जगरगुण्ड़ा गांव के समीप अचानक लोगों का झुंड दिखा, तो पुलिस भी चौकन्ना हो गई. दरअसल, इस क्षेत्र में इतने लोग एक साथ नहीं दिखाई देते हैं. करीब 67 श्रमिक अपने कंधों पर सामान लेकर पैदल ही चल रहे थे.

पूछताछ करने पर उन्होंने बताया कि वे एक पावर प्लांट में कार्य करते हैं, और पैदल चलते हुए चार दिन में यहां पहुंचे हैं. आगे झारखंड के गढ़वा जिला जाना है. थाना प्रभारी अशोक यादव ने उन सभी श्रमिकों को गांव के समीप आश्रम के सामने पेड़ के नीचे ठहराया और ग्रामीणों की सहायता से खाने की व्यवस्था की. जिला पंचायत सदस्य अदम्मा मरकाम, दुर्गा नायडू व सुरेश पोंदी ने उन सभी श्रमिकों के लिए खाने की व्यवस्था की. श्रमिकों को सोशल डिस्टेंस में बैठाया गया और इसकी सूचना उच्च अधिकारियों को दी गई.

अर्लट हो गए थे जवान

जगरगुण्ड़ा गांव जो पूरी तरह कंटीले तारों से घिरा हुआ है. यहां पर जवान दिन-रात तैनात रहते हैं. शाम ढलते ही ना तो कोई बाहर जा सकता है और ना तो कोई अंदर प्रवेश कर सकता है. गेट पर ताले लग जाते हैं और जवान डयूटी पर तैनात हो जाते हैं. क्योंकि नक्सल प्रभावित होने के कारण यहां इतनी संख्या में कोई नहीं आता. इसलिए इतने लोगों को देख जवान अर्लट हो गए थे, लेकिन जब नजदीक आए तो पूछताछ करने के बाद जवानों ने गेट खोल उन्हें गांव के भीतर आने दिया और रूकने की व्यवस्था की.

श्रमिकों ने इसलिए चुना जंगल का रास्ता

श्रमिकों ने बताया कि सड़क पर आने से तेलंगाना ने रोक दिया था, इसलिए उन्होंने जंगल का रास्ता चुना. इसलिए जंगल के रास्ते घर तक पहुंचने का निश्चय किया और निकल लिए. बासागुड़ा थाने होते हुए वो जगरगुण्ड़ा पहुंचे हैं. साथ ही दो दिन से भूखे थे, लेकिन यहां पहुंच कर थोड़ा उन्हें राहत मिली है.

उन्होंने बताया कि कान्ट्रेक्टर ने लॉकडाउन के कारण काम बंद करने के बाद घर जाने को कह दिया. ना तो पैसे थे और ना ही खाने का सामान. ऐसे हम लोग भूखे ही पैदल निकल पड़े. जब कल यानि 11 मई की सुबह बासागुड़ा पहुंचे तो वहां हमें भोजन मिला. जहां दोपहर के खाने के बाद जंगल के रास्ते हम लोग जगरगुण्ड़ा के लिए निकल पड़े. यहां आने के बाद पता चला कि ये इलाका नक्सल प्रभावित है.
जगरगुण्ड़ा निवासी सुरेश पोंदी ने बताया कि आज सुबह 67 श्रमिक पैदल जगरगुण्ड़ा पहुंचे हैं, इन्हे यहां पर रोका गया है. पुलिस ने पूछताछ की उसके बाद यहां पर ग्रामीणों के मदद से खाने की व्यवस्था की गई है.

May 14th 2020, 1:12 pm

पालघर हत्याकांड मामले में पीड़ितों के अधिवक्ता दिग्विजय त्रिवेदी की सड़क दुर्घटना में मृत्यु

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पालघर. महाराष्ट्र के पालघर जिले में १६ अप्रैल को दो साधुओं की निर्ममता से हत्या कर दी गई थी. हत्याकांड मामले में पीड़ितों के अधिवक्ता दिग्विजय त्रिवेदी की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई. वे विश्व हिन्दू परिषद की ओर से साधुओं का पक्ष न्यायालय में रखने वाले थे. आज सुबह १० बजे मेंधवन खिंड इलाके में यह सड़क दुर्घटना हुई. वे मुंबई से पालघर की ओर जा रहे थे. कार के अनियंत्रित होने के कारण यह दुर्घटना हुई है.

सड़क दुर्घटना को लेकर कुछ सवालों के जवाब मिलना शेष हैं. दुर्घटना को लेकर जांच की मांग होने लगी है.

गुरुवार, १६ अप्रैल को पालघर के गढ़चिंचले गाँव में एक भीड़ ने दश पञ्चनाम जूना अखाड़ा के महंत कल्पवृक्ष गिरी जी और महंत सुशिल गिरी जी तथा उनके वाहनचालक निलेश तेलगडे की बर्बरता से हत्या कर दी गई थी. मारपीट, तथा पथराव कर पुलिस के सामने ही उन्हें मार दिया गया. पुलिस ने इस मामले में तक़रीबन १३४ लोगों को गिरफ्तार किया है. इस में ११० लोगों को हमले के तुरंत बाद गिरफ्तार किया गया. जिस में ९ लोग नाबालिग है, उन्हें बालसुधार गृह में भेजा गया है. इस हत्याकांड में स्थानीय राजनैतिक पक्षों के कार्यकर्ता सहभागी हैं, ऐसा सामने आया है. सीआईडी  द्वारा गिरफ्तार किये गए लोगों में सीपीआई और राष्ट्रवादी कांग्रेस के कार्यकर्ता शामिल हैं. राजेश राव, विनोद राव और रामदास राव इन तीनों को सीआईडी ने गिरफ्तार किया है.

 

May 14th 2020, 10:57 am

मेवात में जिहादियों द्वारा हिन्दू उत्पीड़न पर अंकुश लगाए हरियाणा सरकार – विहिप

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जीडी बख्शी के नेतृत्व में तीन सदस्यीय जांच दल 2 दिन में देगा रिपोर्ट

नई दिल्ली. हरियाणा के मेवात में बढ़ते जिहादियों के साथ बांग्लादेशी व रोहिंग्या मुसलमानों के आतंक से पीड़ित हिन्दू समाज की रक्षार्थ अब विश्व हिन्दू परिषद(विहिप) ने कमर कसी है. विहिप के केन्द्रीय संयुक्त महामंत्री डॉ. सुरेन्द्र जैन ने कहा कि क्षेत्र में बढ़ती जिहादी गतिविधियों के आगे जिस प्रकार स्थानीय पुलिस व प्रशासन लाचार दिख रहा है, वह बेहद गम्भीर बात है. राज्य सरकार अविलम्ब पीड़ित हिन्दुओं को न्याय दिलाकर दोषी पुलिस कर्मियों व प्रशासनिक अधिकारियों को निलंबित करे.

उन्होंने कहा कि हरियाणा के मेवात में जिहादियों द्वारा हिन्दू समाज पर अमानवीय व बर्बर अत्याचारों का सिलसिला बहुत पुराना है. अभी तक इस पर कोई नियंत्रण नहीं लग सका है. संतों, हिन्दू कार्यकर्ताओं, हिन्दू समाज पर निरंतर अत्याचार होते रहते हैं. बांग्लादेशी व रोहिंग्या घुसपैठिए वहां शरण पाते हैं और जब कोरोना संक्रमित देशी-विदेशी जमातियों पर अंकुश लगाया गया तो उनको छिपने की जगह भी मेवात में ही मिली. आज इनके आतंक के सामने पुलिस प्रशासन भी स्वयं को असहाय पाता है. कई बार तो ऐसा भी होता है कि पुलिस व प्रशासन इन अत्याचारियों के साथ ही खड़ा हुआ दिखाई देता है.

पिछले दो महीनों में हिन्दुओं पर अत्याचार का नया सिलसिला प्रारंभ हुआ है. नूह जिले के पुन्हाना व नगीना प्रखंड मानो इन अत्याचारों के केंद्र बन गए हैं. आज हिन्दू व्यापारी किसी मुस्लिम से अपनी उधारी वसूल करने की हिम्मत नहीं कर सकता. उसकी पिटाई कर दी जाती है. 12 मई को एक हिन्दू बालक की शिखा पर अभद्र टिप्पणी की गई. विरोध करने पर उसके परिवार की 200 लोगों ने बुरी तरह पिटाई कर दी. ऐसी और भी अनेकों घटनाएं पिछले दिनों में हुई हैं. अपना कोई संरक्षक नहीं है, यह समझ कर अब हिन्दू समाज अपना धैर्य खो रहा है और पलायन को मजबूर हो रहा है.

विश्व हिन्दू परिषद राज्य सरकार से अपील करती है कि पीड़ित हिन्दू समाज को न्याय मिले, अपराधियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही हो तथा दोषी अधिकारियों को अविलंब निलंबित किया जाए. जिससे  हिन्दू समाज की सुरक्षा व प्रशासन के प्रति उसका विश्वास पुनः स्थापित हो सके.

विश्व हिन्दू परिषद ने एक तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच दल के गठन की घोषणा भी की. जिसमें मेजर जनरल (सेवानिवृत) जीडी बक्शी के अलावा महामंडलेश्वर पूज्य स्वामी धर्मदेव जी महाराज भी रहेंगे. विहिप की अपेक्षा है कि यह जांच दल दो दिन में ही अपनी रिपोर्ट हमें दे देगा, जिसे हम सार्वजनिक करने के साथ-साथ हरियाणा के मुख्यमंत्री को भी भेजेंगे. हम अपेक्षा करते हैं कि सारे तथ्य सामने आएंगे और सरकार शीघ्र ही अपराधी तत्वों पर कठोरतम कार्यवाही करेगी.

May 14th 2020, 9:26 am

‘राष्ट्र कल्याण’ के लिए ‘राष्ट्र साधना’

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नरेंद सहगल

‘कोरोना जंग’ में विजय प्राप्त कर रहे भारतवासियों की पीठ थपथपाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद मोदी ने आत्मनिर्भर होने और इस संकट काल को ‘अवसर’ में परिवर्तित करने का संकल्प किया है.  भयानक महामारी से जूझ रहे देशवासियों को भविष्य में अपने राष्ट्र के कल्याण के लिए किस प्रकार राष्ट्र-साधना करनी है, इसके स्पष्ट संकेत भी दे दिए हैं. प्रधानमंत्री ने विश्वासपूर्वक कहा कि भविष्य में भारत विश्व का नेतृत्व करेगा.

राष्ट्र-साधना अर्थात् अपने देश और समाज के हित के लिए किसी भी प्रकार के निरंतर संघर्ष (तपस्या) की नित्य सिद्ध तैयारी. अपने व्यक्तिगत सुखों को तिलांजलि देकर कई प्रकार के कष्टों को सहन करने की मानसिकता समय की आवश्यकता है. किसी भी प्रकार के राष्ट्रीय आपातकाल में सरकार के दिशा निर्देशों का पालन करना प्रत्येक नागरिक का राष्ट्रीय कर्तव्य होता है. सरकार द्वारा उठाए जा रहे सकारात्मक क़दमों की रचनात्मक आलोचना करते हुए ठोस सुझाव देना नागरिकों का अधिकार होता है. परन्तु अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए सरकार की बेबुनियाद निंदा ही करते रहना राष्ट्रीय अपराध की श्रेणी में आता है.

प्रधानमंत्री ने स्वामी विवेकानंद की तरह ही देशवासियों को इस समय केवल मात्र भारत माता की पूजा करने के लिए शक्ति संपन्न होने का सन्देश दिया है. स्वामी विवेकानंद ने देश के युवाओं का आह्वान इसी तरह किया था – “सभी देवी-देवताओं को भूल कर केवल भारत की पूजा करो. फुटबाल खेलो और शक्ति अर्जित करके परतंत्रता की बेड़ियों को तोड़ डालो”. राष्ट्रीय विपत्ति के समय सभी देशवासियों को इस तरह की राष्ट्र-साधना करने में जुट जाना चाहिए.

याद करें 1965 के भारत-पाक युद्ध में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने भी ‘जय जवान–जय किसान’ का सन्देश देकर देशवासियों को ‘आत्मनिर्भर’ होने का संकल्प करवाया था. जब अमेरिका ने भारत को गेहूं देने से इनकार कर दिया तो शास्त्री जी ने समस्त भारतीयों को सोमवार को व्रत रखने की प्रतिज्ञा करवाई थी. सारा देश शास्त्री जी के आह्वान पर चलते हुए एकजुट हो गया था. इसी को राष्ट्र-साधना कहते हैं.

जब प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने पोखरण (राजस्थान) में परमाणु बमों का परीक्षण किया था तो उस समय अनेक देशों ने भारत पर कई प्रकार के प्रतिबंध लगा दिए थे. वाजपेयी जी ने उस समय देशवासियों को सन्देश देते हुए कहा था – “हमने परमाणु बम अपने देश की सुरक्षा के लिए बनाए हैं. किसी अन्य देश को घबराने या चिंता करने की जरुरत नहीं है. हमारे ऊपर थोपे गए प्रतिबंध हमें आत्मनिर्भर होने का अवसर प्रदान करेंगे. इस समय अपने पावों पर खड़ा होना ही राष्ट्र की आराधना है.”

इतिहास साक्षी है कि विदेशी अंग्रेजों की सत्ता के समय जब सारा राष्ट्र एकजुट हो कर स्वतंत्रता संग्राम में जूझने लगा और लाखों क्रांतिकारियों ने अपने बलिदान दिए तो क्रूर अंग्रेज साम्राज्यवादियों को भागना पड़ा. सामूहिक राष्ट्र-साधना से प्रकट इस तेज के आगे शत्रु देश को घुटने टेकने पड़ गए. सभी भारतवासी अपनी व्यक्तिगत सुख सुविधाओं से ऊपर उठ कर राष्ट्र-साधना में जुट गए.

विदेशी सत्ताओं, प्राकृतिक आपदाओं और जानलेवा भयानक महामारियों को पराजित करने का यही एक मन्त्र होता है जो राष्ट्र-साधना से ही सिद्ध होता है.

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी अनेक ऐसे अवसर आए, जब अनेकविध राष्ट्रीय संकटों ने भारतवासियों का आह्वान करते हुए उन्हें राष्ट्रीय एकात्मता की आवश्यकता का आभास करवाया. विदेशी आक्रमण, भयानक अकाल, नृशंस भूकंप, भीषण बाढ़ और सुनामी जैसे संकटों से भारतवासियों ने निजात पाई.

वर्तमान समय में इस तरह का राष्ट्रीय संकट ‘कोरोना महामारी’ के रूप में हमारे देश पर छाया है. समस्त देशवासी अपने घरों में रहकर ‘राष्ट्र-साधना’ कर रहे हैं. सरकार प्रत्येक तरह से देशवासियों के बचाव के कार्य कर रही है. अब तो प्रधानमंत्री जी ने 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा की है. कुछ क्षेत्रों/वर्गों में लोगों को कष्ट उठाने पड़े है. विशेषतया हमारे मजदूर भाईयों को. बहुत शीघ्र यह समस्या भी हल हो जाएगी.

प्रधानमंत्री जी ने संकेत दिए है कि यह जंग लम्बी चलने वाली है. इस जंग को सभी भारतवासियों के सहयोग, तप, धैर्य, और अनुशासन से ही जीता जाएगा. यह भी समझना चाहिए कि ‘लॉकडाउन’ अधिक समय तक नहीं रखा जा सकता. ऐसी परिस्थिति में देशवासियों को स्वयं पर अपने-आप कई प्रकार के प्रतिबंध लगाने पड़ेंगे. इस प्रकार के अनुशासन का अभ्यास हमने ‘लॉकडाउन’ के दिनों में किया है. इसे जीवन का हिस्सा बनाने की जरुरत है.

May 14th 2020, 9:26 am

हिन्दुओं की सुरक्षा के साथ अपराधियों पर अंकुश लगाए बिहार सरकार – मिलिंद परांडे

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नई दिल्ली. बिहार में हिन्दुओं पर बढ़ते जिहादी हमलों से क्षुब्ध विश्व हिन्दू परिषद् (विहिप) ने राज्य सरकार से मांग की है कि हिन्दुओं की सुरक्षा, उनकी शिकायतों पर कार्यवाही तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में बांग्लादेशी व रोहिंग्या घुसपैठियों की देश विरोधी गतिविधियों पर अविलम्ब अंकुश लगाया जाए. विहिप के केन्द्रीय महामंत्री मिलिंद परांडे ने कहा कि गोपालगंज के कटैया थानान्तर्गत मुसलमानों द्वारा 15 वर्षीय रोहित जायसवाल की जघन्य हत्या की दर्दनाक घटना को ढेड़ माह बीतने पर भी स्थानीय पुलिस ने ना सिर्फ हत्यारों को अभी तक खला छोड़ रखा है, बल्कि पीड़ित परिवार को डरा-धमका कर अपना गाँव छोड़ने को भी मजबूर कर दिया है. इतना ही नहीं, ऐसा कहा जा रहा है कि रोहित की ह्त्या के बाद अब शेष परिजनों को भी आरोपी व पुलिस द्वारा जान से मारने की धमकियां दी जा रही हैं.

उन्होंने कहा कि ऐसी घटना एक नहीं अनगिनत हैं. किशनगंज में 15 वर्षीय हिन्दू दलित लड़की के साथ मुसलमानों द्वारा सामूहिक बलात्कार कर हत्या का मामला हो या बेगूसराय अनुमंडल में सरैया गांव में रामायण पढ़ने वाले युवकों को रमजान के महीने में रामायण नहीं पढ़ने देने हेतु राहुल पोद्दार परिवार से मारपीट, नालंदा मे हिन्दू व्यवसाइयों द्वारा ओउम् ध्वज लगाने पर मुकदमा हो या सीतामढ़ी, बेगूसराय, पूर्णिया, अररिया, कटिहार तथा पूर्वी चम्पारण इत्यादि अनेक स्थानों पर चल रहे सुनियोजित षड्यंत्र, सभी में इस्लामिक जिहादियों के अत्याचारों और प्रशासन का उनको कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष सहयोग स्पष्ट दिखता है. राज्य के अनेक हिन्दू परिवार पलायन को मजबूर हैं.

उन्होंने कहा कि राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रों में अनवरत रूप से बढ़ रही मस्जिदें व मदरसे बांग्लादेशी तथा रोहिंग्या घुसपैठिए मुसलमानों के आतंक का अड्डा बन रही हैं. इसके कारण एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत धर्मान्तरण की घटनाएं भी इन क्षेत्रों में अपने चरम पर हैं. अत: इनकी गहन जांच की जाए.

उन्होंने मांग की कि सभी अपराधियों व उनके षड्यंत्रकारियों (खासकर रोहित के हत्यारों) को अविलम्ब गिरफ्तार कर कठोरतम दण्ड मिले, दोषी पुलिसकर्मियों व अधिकारियों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही हो, पीड़ितों को सुरक्षा व न्याय मिले तथा विदेशी घुसपैठियों की देश विरोधी हिन्दू विरोधी गतिविधियों पर अंकुश लगाया जाए. उन्होंने कहा कि इस सम्बन्ध में राज्य के गृह सचिव आमिर सुहानी को बर्खास्त करने का मांगपत्र कल राज्यपाल को दिया जा चुका है. हर नागरिक की सुरक्षा प्रशासन की नैतिक जिम्मेदारी है. हिन्दुओं के साथ पक्षपात पूर्ण व्यवहार के विरुद्ध सामाजिक प्रतिक्रया को नजरंदाज ना करे सरकार.

May 13th 2020, 1:39 pm

कौवों के कोसने से ढोर नहीं मरा करते

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शिवा पंचकरण

धर्मशाला

कोरोना के काल में जहाँ पूरी दुनिया थम सी गयी है, वहीं सोशल मीडिया में एक वर्ग अफवाहें फैलाने के मामले में ज्यादा सक्रिय हो गया है. अभी हाल ही में कुछ लोगों द्वारा भारत के गृहमंत्री अमित शाह की बीमारी की एक झूठी खबर चलाई गयी. वायरल होने में भले ही इसने समय लिया हो, परन्तु कई वर्षों से इस प्रकार की खबर के इंतज़ार में बैठे हुए कुछ विशेष लोगों को तो मानो संजीवनी मिल गयी हो, वह इस झूठी खबर से इतने उत्साहित थे जैसे पाकिस्तान ने अभी कोरोना की दवाई ढूंढ निकाली हो और पहला टीका उन्हीं को लगना है. खैर सोचने का दाम नहीं लगता तो जिसे जो सोचना है वह सोचे. परन्तु तकनीकी के दौर में आज सोच कब एक विचार और विचार से हकीकत बन जाए इसका भी अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. एक अफवाह कैसे एक खबर बन गयी, जिसका स्पष्टीकरण खुद गृहमंत्री अमित शाह को ट्वीटर पर आकर देना पड़ा तो इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि मामला कितना गंभीर था.

लेकिन एक प्रश्न उठता है, आखिर इतने दिन अमित शाह थे कहाँ? 2019 में गृहमंत्री बने अमित शाह अपने अनोखे अंदाज़ के लिए जाने जाते हैं. चाहे 370 को हटाने की बात हो या नागरिकता कानून, सब फैसलों में अमित शाह की एक महत्वपूर्ण भूमिका थी. किन्तु कोरोना के काल में अमित शाह का मीडिया से दूर होना सबके मन में एक संशय लेकर आया कि आखिर अमित शाह हैं कहाँ? लेकिन इसकी सच्चाई यह थी कि गृहमंत्री परदे के पीछे रह कर अपना काम कर रहे थे. चाहे मंत्रिमंडल की बैठक हो, वुहान वायरस काल में कोरोना वारियर्स के विरुद्ध हो रहे हमलों को लेकर कानून बनाना हो, गृहमंत्री बिना किसी बात की चिंता किये अपना काम कर रहे थे. परन्तु काम करते हुए बाकी चीज़ों से दूर रहने का फायदा उठाया कुछ तथाकथित पत्रकारों ने. सोशल मीडिया के माध्यम से गृहमंत्री के फेक अकाउंट द्वारा यह अफवाह फैलाई गयी कि भारत के गृह मंत्री का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, इसीलिए अमित शाह गायब हैं. फेक ट्वीट को पढ़ कर आग में घी डालने का काम किया कुछ तथाकथित पत्रकारों ने. इसमें सबसे पहला नाम आया पत्रकार कम आप प्रवक्ता ज्यादा विजया लक्ष्मी नागर का. इन्होंने भारत के गृहमंत्री को कैंसर होने की कामना कर डाली. टाइम्स ऑफ़ इंडिया की पूर्व पत्रकार लेखा कामना कर रही थी कि भारत के गृहमंत्री को कोरोना और कैंसर दोनों हो जाए. एक और तथाकथित पत्रकार शाहीद सिद्दीकी तो इस अफवाह से इतने उत्साहित हो गये थे कि उन्होंने भारत सरकार से मंच पर आ कर अमित शाह के बारे में बताने को कहा. राणा आयूब, शमिया लतीफ़ आदि पत्रकारों ने भी इस झूठी अफवाह को अपने-अपने अनुसार लोगों को परोसा. आप से कांग्रेस में आई अलका लाम्बा भी इसमें पीछे नहीं रही और उन्होंने भी तंज़ कसते हुए गृहमंत्री के जल्द स्वस्थ होने की कामना की.

पर, कहते हैं ना,’कौवों के कोसने से ढोर नहीं मरते, सांप के काटने से मोर नहीं मरते’. अभी हाल ही में गृहमंत्री ने इस सारे मामले पर अपनी चुप्पी तोड़ी. उनके शुभचिंतकों के बार-बार आ रहे संदेशों से व्यथित हो कर अपने स्वस्थ होने की जानकारी ट्विटर के माध्यम से दी.

ऐसा पहली बार नहीं है, जब इस प्रकार कुछ लोगों ने अपनी कुंठा का प्रदर्शन किया हो, इससे पहले भी कई तथाकथित बुद्धिजीवी प्रधानमंत्री को भी कोरोना होने तक की कामना कर चुके है. पूर्व चुनाव आयुक्त एस.वाई.कुरैशी प्रधानमंत्री को अप्रत्यक्ष रूप से कोरोना होने की कामना कर चुके हैं. मौत का सौदागर आदि नामों की संज्ञा तो पहले से ही दी जाती थी, परन्तु अब कुछ लोग भारत के प्रधानमन्त्री और गृहमंत्री की मौत की कामना भी करने लगे हैं. कुछ लोग ऋषि कपूर की मृत्यु पर कहते हैं कि इनकी जगह भगबान मोदी या शाह को ले जाता तो अच्छा होता.

नफरत और प्रेम दोनों राजनीति में साथ-साथ चलते हैं. भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी कहते थे कि राजनीति में मतभेद तो हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए. लेकिन आज की राजनीति इन सब बातों को पीछे छोड़ चुकी है. सत्तारूढ़ पार्टी पर यूँ तो कई तरह के झूठे आरोप लगाये जाते हैं, पर इस तरह के मसलों पर सब खामोश हो जाते हैं.

इस बीच एक महत्वपूर्ण खबर यह भी है कि जिन लोगों द्वारा ये अफवाह सबसे पहले फैलाई गयी थी, उन लोगों को गुजरात पुलिस द्वारा अरेस्ट कर लिया गया है. सूत्रों के अनुसार इसके पीछे चार लोग फ़िरोज़ खान, सरफ़राज़, साजिद अली, और सिराज हुसैन थे जो गृहमंत्री के बीमार होने से सम्बंधित झूठी अफवाह फैला रहे थे.

 

 

May 13th 2020, 1:39 pm

पालघर हत्याकांड – ९

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हमला फिर से हो सकता है

पालघर के तलासरी तालुका में सीपीएम का प्रभाव है. यहां पर विकास के कार्य करने वालों पर सीपीएम के कार्यकर्ताओं द्वारा हमले की कई घटनाएं हो चुकी हैं. लोगों के घर लूटना, बकरियां चुराना, घर जला देना, यह कुछ लोगों की आदत सी है. शिक्षा या नौकरी के लिए गाँव के बाहर जाने वाली जनजाति लड़कियों को परेशान करने का, उनका शोषण का काम भी ये लोग करते आए हैं. आज भी क्षेत्र में माओवादी गतिविधियाँ जारी हैं. पिछले माह साधुओं पर हमला और उनकी हत्या भी इनके ही षड्यंत्र का परिणाम है. यहाँ के जनजातीय युवा इनके बहकावे आसानी से आ जाते हैं, और घटना के पश्चात उनका ही नाम आगे आता है. वास्तव में जनजाति समाज भगवान, साधु संतों को मानता है, उन पर आस्था रखता है. जनजाति समाज ऐसे कृत्यों में सम्मिलित नहीं हो सकता. लेकिन, गढ़चिंचले की घटना माओवादियों के षड्यंत्र का परिणाम है. वामपंथियों को हिन्दुत्व व समाज हित का कोई कार्य आसानी से हजम नहीं होता. वे क्षेत्र में भोले भाले जनजाति समाज को बहकाने, भड़काने का काम कर रहे हैं.

तलासरी के करज गाँव के सरपंच, जो २२ अप्रैल को कोरोना के बारे में जनजागरण कर रहे थे, उनके खिलाफ भी माओवादियों ने भ्रामक प्रचार किया था. षड्यंत्रकारियों ने अफवाह फैलाई थी कि सरपंच पुलिस की गाड़ी से गांव में चोर लेकर आए हैं. इस अफवाह के कारण जनजाति समाज के कुछ भ्रमित लोग डंडे, लाठी, पत्थर आदि लेकर सरपंच को ढूंढ रहे थे. आखिरकार, अपनी सुरक्षा के लिए सरपंच को पुलिस का सहारा लेना पड़ा था. स्पष्ट है कि गढ़चिंचले की घटना केवल एक घटना मात्र नहीं है, ये एक सोची समझी साजिश है. क्षेत्र में अफवाहें फैलाना, जनजाति समाज में भ्रम का निर्माण करना, माओवादी यह कार्य करते आए हैं. अब, यदि इन लोगों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो आगे भी ऐसी घटनाएं देखने को मिल सकती हैं.

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पालघर – मीडिया की इस मानसिकता को क्या नाम दें..!

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संतों की लिंचिंग पर लेफ्टिस्ट – सेक्युलर खामोशी

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हिन्दुओं की मॉब लिंचिंग पर प्रश्न पूछो तो छद्म सेकुलरों को मिर्ची क्यों लगती है?

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पालघर हत्याकांड – १

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पालघर हत्याकांड – २

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पालघर हत्याकांड – ३

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पालघर हत्याकांड –  ५

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पालघर हत्याकांड – ६

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पालघर हत्याकांड – ७

https://bit.ly/2Lnjs7X

पालघर हत्याकांड – ८

https://bit.ly/3brgV7u

 

May 13th 2020, 11:50 am

राजापुर के बेहना पुरवा में आग से हुई क्षति, परिवारों को मोरारी बापू के संदेश पर पहुंची मदद

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चित्रकूट. रामचरित मानस को सरल, सहज और सरस तरीके से प्रस्तुत करने वाले प्रख्यात मानस मर्मज्ञ संत मोरारी बापू की सादगी एवं आध्यात्मिक निष्ठा का कोई सानी नहीं है. उन्हें हम वर्तमान का तुलसीदास भी कह सकते हैं. धार्मिक जगत के इतिहास में संत श्री मोरारी बापू एक दुर्लभ व्यक्तित्व हैं.

राजापुर से खासा लगाव रखने वाले संत मोरारी बापू को जब पता चला कि राजापुर थाना क्षेत्र में सुरवल गांव के मजरा बेहना पुरवा में विगत 10 मई की शाम को तेज आंधी के चलते आग लगने से पूरे गांव को आग ने अपनी चपेट में ले लिया था.

मुस्लिम समुदाय बहुल इस गांव में काफी हानि को देखते हुए संत मोरारी बापू ने अपने सेवक बनारस के कारोबारी जालान ग्रुप के मालिक एवं समाजसेवी किशन जालान को संदेश भेजा कि आपदा काल में अपना समाज धर्म निभाते हुए बेहना पुरवा के लोगों को तात्कालिक मदद पहुंचाना सुनिश्चित करें.

फिर क्या था राम भक्त हनुमान की तरह अपने प्रभु के संदेश को आज्ञा मानकर जालान ने अपने सामाजिक कार्यों में सहयोगी दीनदयाल शोध संस्थान को इस काम के लिए माध्यम बनाया.

दीनदयाल शोध संस्थान के प्रकल्प तुलसी कृषि विज्ञान केंद्र गनीवां के कार्यकर्ता राजापुर क्षेत्र के मुस्लिम बाहुल्य गांव बेहना पुरवा पहुंचे. जहां आग से हुई हानि की जानकारी ली, और 38 परिवारों की सूची तैयार की. जिनका आग ने सब कुछ तबाह कर दिया था.

उसके बाद समाजसेवी किशन जालान ने दीनदयाल शोध संस्थान के माध्यम से सभी परिवारों को पांच-पांच हजार रुपए की तात्कालिक सहायता नकद राशि के रूप में उपलब्ध कराई. उपरोक्त राशि को राजापुर तहसीलदार पुष्पेंद्र सिंह एवं दीनदयाल शोध संस्थान के कार्यकर्ताओं द्वारा सभी 38 परिवारों के मुखियाओं को प्रदान किया गया.

May 13th 2020, 10:38 am

इंदौर सेवा भारती का बंधु भोजनम….

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इंदौर (विसंकें). इंदौर से गुजरने वाला कोई भी प्रवासी श्रमिक भूखा-प्यासा न रहे, किसी वस्तु का अभाव न रहे. इस हेतु इंदौर की सीमा पर राहगीरों के लिए राउ बायपास से प्रवेश करने से देवास की सीमा पर क्षिप्रा से बाहर जाने तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं सेवा भारती, समाज एवं समाजसेवी संस्थाएं क्रेडाई, अग्रवाल महासभा के सहयोग से अपने गांवों की ओर जाने वाले पैदल/साईकिल व अन्य यात्रियों हेतु भोजन, जल, रास्ते के लिए सूखा अल्पाहार, आयुर्वेदिक काढ़ा, दूध, चाय, स्वास्थ्य परीक्षण, आवश्यक औषधी, विश्राम हेतु छायादार स्थान, मास्क, सेनेटाइजर, पदवेश आदि की  24 घंटे निरंतर सेवाएं दे कर व्यवस्था की जा रही है.

क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर 8 वितरण केंद्रों के माध्यम से प्रतिदिन 6000-8000 राहगीरों की  सहायता की जा रही है.

समस्त वितरण केंद्रों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इन्दौर ग्रामीण एवं रामेश्वरम (इंदौर दक्षिण) जिले के स्वयंसेवक, क्रेडाई, अग्रवाल महासभा संस्था के स्वयंसेवक एवं स्थानीय ग्रामीणों द्वारा केंद्रों पर 24 घंटे निरंतर सेवाएं दी जा रही हैं.

इसी प्रकार मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा से प्रवेश करते ही खरगोन विभाग के सेंधवा में भी जुलवानिया धामनोद आदि स्थानों पर तथा देवास विभाग के देवास मक्सी शाजापुर आदि स्थानों पर भी इसी तरह की व्यवस्थाएं कर सब बंधुओं की सेवा की जा रही है.

आईये हम सब मिलकर वर्तमान चुनौतियों का सामना सेवा करते हुए प्रसन्न रहकर करें.

 

May 13th 2020, 9:49 am

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक उत्पीड़न – सिंध में हिन्दुओं के 21 घरों को आग के हवाले किया

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मलिक असगर हाशमी

पाकिस्तान के सिंध प्रांत में बसे सिधी हिन्दुओं को उजाड़ने के लिए किए जा रहे षड्यंत्र के तहत उन पर हमले तेज हो गए हैं. हाल के दिनों में मजहबी कट्टरपंथियों द्वारा उन्हें निशाना बनाने का क्रम इस कदर बढ़ गया है कि वे एक सदमे से उबरते हैं, दूसरा सामने खड़ा मिलता है.

सिंध के थारपारकर जिले के ताड़दो के हल और मटियारी गांव में 21 हिन्दुओं के घरों में आगजनी, हत्या और मार-पीट की घटना के सदमे से वे उभर भी नहीं पाए थे कि घोटकी जिले के बरझुंडी गांव से एक हिन्दू लड़की कविता कुमारी का कन्वर्जन की नियत से अपहरण कर लिया गया. चूंकि कविता कुमारी के अपहरण में प्राइवेट आर्मी रखने वाले मिट्ठू मियां का हाथ है, इसलिए उससे टकराने की हिम्मत किसी की नहीं. इस बाबत जानकारी देने वाले पेहनजी अकबर ने बताया कि मिट्ठू मियां के प्रधानमंत्री इमरान खान और सेना प्रमुख कमर वहीद बाजवा से सीधे ताल्लुकात हैं. उसका इतना रसूख है कि वह फायरिंग की ट्रेनिंग अपने घर के पास के सैनिक छावनी में लेता है.

नाबालिग हिन्दू लड़कियों के अपहरण और जबरन इस्लाम कबूलवाने के मामले में शामिल रहा है. बताते हैं कि इसने अपने घर में ‘हरम’ बना रखा है, जहां अपहरण कर लाई गई लड़कियों से जोर-जबरदस्ती करता है. बाद में इन लड़कियों को निकाह के बहाने पैसे लेकर किसी प्रौढ़ को बेच देता है. कविता कुमारी के अपहरण के बाद से उसके माता-पिता उसकी बरामदगी के लिए एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी के दफ्तर के चक्कर काट रहे हैं, पर कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है.

इसी तरह वे लोग भी मदद की गुहार के लिए दर दर की ठोकरें खा रहे हैं, जिनके घरों को आग के हवाले कर दिया गया. हल और मटियारी में हिन्दुओं में दहशत फैलाकर उन्हें उनकी जमीन से बेदखल करने के लिए गत दिनों 21 घरों में आग लगा दी गई थी. इस घटना को लेकर वायरल वीडियो में धूं-धूं करते घरों और चीख-पुकार करते हिन्दू परिवारों को साफ देखा जा सकता है. आगजनी के समय कई लोग अपने घरों के अंदर सो रहे थे, जिनकी जलने से मौत हो गई. मृतकों में बच्चे भी शामिल हैं. इससे पहले भी सिंध प्रांत के दो स्थानों पर हिन्दुओं के बारह से अधिक घर जला दिए गए थे, जिसमें तीन मासूम बच्चों की जान चली गई थी. इसी तरह सिंध के उमर कोट में टेकम दास नामक एक हिन्दू ने स्थानीय मुसलमानों के अत्याचार से तंग आकर खुद को समाप्त कर लिया.

 लगातार बढ़ रहे हिन्दुओं पर हमले

दो दिन पहले सिंध प्रांत के मटियारी जिले के हाला कस्बे में मजहबी गुंडों ने हिन्दू भील जनजाति के लोगों पर घातक हथियारों से हमला किया था. इस दौरान भी महिला, पुरूषों, बच्चियों और बच्चों के साथ न केवल अत्याचार किया गया, बल्कि कइयों को गोली मार दी गई, जिनमें से कई लोगों का इलाज अभी भी स्थानीय अस्पताल में चल रहा है. एक सिंधी न्यूज चैनल के पत्रकार अब्दुल गफूर कहते हैं कि पुलिस की मौजूदगी में मुसलमानों ने भील हिन्दुओं के साथ अत्याचार किए. पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए सक्रिय अधिवक्ता राहत औस्टीन कहते हैं कि इस घटना के तुरंत बाद पंजाब के रहीम यार खान शहर के चक 121 में गरीब किसान गुलाब के घर पर धावा बोलकर मजहबी कट्टरपंथियों ने तोड़फोड़ की. विरोध करने पर न केवल गुलाब, बल्कि उसकी पत्नी को भी लहूलुहान कर दिया. घटना के समय मौजूद लोगों का कहना है कि भीड़ की मौजूदगी में गुलाब की पत्नी से बलात्कार किया गया. इस मामले में पंजाब सरकार और मुकामी पुलिस से गुहार लगाने के बावजूद पीड़ित परिवार की शिकायत पर अब तक कार्रवाई नहीं की गई है.

ईसाइयों को भी बना रहे शिकार

पिछले दिनों एक चर्च पर कब्जा करने की नियत से शेखपुरा के कालाशाह काकू के पास फरोजा वाला में हमला किया गया. मुसलमानों ने चर्च में तोड़ फोड़ भी की. विरोध करने पर चर्च के पादरी और उसकी पत्नी को पीटकर बुरी तरह घायल कर दिया. कोरोना संक्रमण को लेकर विश्वभर में मची अफरा-तफरी के बीच पाकिस्तान के हिन्दुओं पर एकाएक हमले तेज हो गए हैं. इस महारोग के पाकिस्तान में कदम रखने से लेकर अब तक हिन्दुओं और ईसाइयों पर हमले की पचास से अधिक घटनाएं हो चुकी हैं. राहत औस्टीन कहते हैं कि इस दौरान हमलावर इस प्रयास में दिखे कि वर्षों से वहां रह रहे अल्पसंख्यकों से उनकी जमीन छीन ली जाए.

साभार – पाञ्चजन्य

May 12th 2020, 1:56 pm

अपनी अंतर्निहित शक्ति के बल पर हर बार उठ खड़ा हुआ है भारत

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रवि प्रकाश

भारत, कल का आर्यावर्त, कल का भारतवर्ष, आज का हमारा भारत. ऋषि-मुनियों, देवी-देवताओं से लेकर सैलानियों-व्यापारियों और राजाओं-महाराजाओं-सम्राटों तक को इस भारत भूमि ने सहस्राब्दियों और युगों से आकर्षित, सम्मोहित और अचंभित किया है. धन-दौलत और हीरे-जवाहरात की कौन कहे, मसालों और औषधियों तक के लिए, ज्ञान-विज्ञान-चिकित्सा की शिक्षा और अध्ययन के लिए, आध्यात्मिक शान्ति और दिव्य दृष्टि के लिए धरती के कोने-कोने से लोग कभी दोस्त बन कर, कभी व्यापारी बन कर तो कभी आक्रान्ता और लुटेरे बन कर भारत का रुख करते रहे हैं. भारत दमित हुआ, भारत दलित हुआ, भारत आहत हुआ, लेकिन भारत कभी निहत नहीं हुआ. भारत की अन्तर्निहित शक्ति ने अपनी भूमि में फिर-फिर प्राण का संचार किया और यह देश फिर-फिर उठ खड़ा हुआ. विश्व को फिर-फिर आकर्षित, सम्मोहित और अचंभित करने के लिए. ऐसे अवसर कितनी बार आये, इसकी गिनती नहीं, किन्तु हम उस पीढ़ी के सौभाग्यशाली लोग हैं जिसे एक बार वैसे अवसर को देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ है.

जिनके राज्य में सूरज अस्त नहीं होता था, उन्हें इसी देश की मिट्टी ने उनके मिट्टी होने का अहसास कराया और इस अहसास की चोट इतनी गहरी रही कि उसके तुरंत बाद से उनके उपनिवेशों की लगाम एक-एक करके उनके हाथ से छूटती गयी और उनके भाग्य का सूरज उनसे रूठता गया. बीसवीं सदी के ठीक मध्य के करीब भारत ने अपने आँगन में अपने हिस्से का सूरज उगाया और देश एक नए युग में, एक नए प्रारम्भ के साथ एक नयी दिशा में चल पडा. भारत के जन-जीवन में बलात हस्तक्षेप के लगभग 150 वर्षों के बाद 1855 में ब्रिटेन की सरकार द्वारा भारत सरकार अधिनियम के अधिनियमन के साथ भारत का सम्पूर्ण राजनैतिक और शासकीय संचालन अंग्रेजों ने अपने हाथ में ले लिया. ऐसे में स्वाभाविक था भारत की समस्त समृद्ध सांस्कृतिक-सामाजिक मूलों, आस्थाओं, परम्पराओं और प्रचलनों के विषय में देश के जन-मानस में अपमान और अवमानना की भावना भरने का सिलसिला आरम्भ हुआ. अंग्रेजों से प्रभावित साधन-संपन्न लोगों के घर के कुमार शिक्षा के लिए ब्रिटेन जाने लगे और इधर समाज में हैसियत और ओहदे की बराबरी से जो सहमेल हुआ उसके फलस्वरूप एक ऐसा वर्ग उत्पन्न हुआ जो पाश्चात्य परम्पराओं के अन्धानुकरण की राह चल पड़ा. धीरे-धीरे देश के चिंतन में भारत की मौलिक एवं समृद्ध विरासतों से विमुखता एक नयी संस्कृति-सी बन गयी और देश का नव-शिक्षित समाज यह मान बैठा कि अंग्रेज हमसे उन्नत है और हम अभी तक अन्धकार में ही जी रहे थे.

इसका प्रभाव स्वतन्त्रता के तुरंत बाद परिलक्षित होने लगा, जब देश की आत्मनिर्भरता और प्रगति के लिए सहायता और सहयोग की आवश्यकता आयी. तब भारत पर शर्तें थोपी जाने लगीं और ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रथम पदार्पण से लेकर स्वतन्त्रता प्राप्ति तक के लगभग साढ़े तीन सौ वर्षों में उत्पन्न गुलामी की मानसिकता ने यह मान लिया कि दुनिया भारत से बहुत आगे है और देश की तत्कालीन एवं अनेक परवर्ती सरकारें शर्तों पर शर्तें मानती गयीं. सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान, अनुसंधान… यानि राष्ट्रीय जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं था. जहाँ दुनिया भारत को तुच्छ नज़रों से नहीं देख रही थी. यही कारण था कि 1981 में इंदिरा गाँधी ने शर्तें मानने की परम्परा में ऐसी-ऐसी शर्तों पर हामी भरी जो देश के गले की फांस बन गयी. ऐसे पृष्ठभूमि में अटल बिहारी बाजपेयी का प्रधानमंत्रित्व इस देश को प्राप्त हुआ और पहली बार देश की सबसे बुनियादी ज़रूरतों पर ध्यान देते हुए स्वर्णिम चतुर्भुज के रूप में अटल जी का मौलिक चिंतन और परिकल्पना देश के सामने आयी. अनेक नयी चीजें एन नया भारत बनाने के लिए सामने आने लगीं. किन्तु स्वर्णिम चतुर्भुज की एक संकल्पना ने देश की तस्वीर में रंग भरना आरम्भ कर दिया. दुनिया ने भारत की इच्छा शक्ति का एक नया प्रतिमान देखा और भारत के प्रति विदेशों में लोगों का दृष्टिकोण बदलने लगा.

स्वातंत्र्योत्तर भारत में लगातार तीस वर्षों तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (इंदिरा) का शासन रहा और आज़ादी के सारे सपने धीरे-धीरे धूमिल होने लगे, और 1977 में पहली गैर-कांग्रेस सरकार केंद्र में बनी. वह जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में सम्पूर्ण क्रांति की अवधारणा को लेकर चले. लगभग दो वर्षों के राष्ट्रव्यापी आन्दोलन के बाद अनेक गैर-कांग्रेस और गैर-कम्युनिस्ट राजनैतिक दलों के विलय से बने जनता दल की सरकार थी. पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ के लोगों को लेकर भीतर में विवाद था और अंततः उन लोगों को जनता दल से निकल कर भारतीय जनसंघ का नया संस्करण भारतीय जनता पार्टी के नाम से सामने आया और गिरते-उठते-बढ़ते हुए 1996 में 13 दिनों के लिए पहली बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार केंद्र में बनी. 1998 में दोबारा सत्ता में आने के बाद फिर चुनाव हुए और 1999 से 2004 तक भाजपा की सरकार चली. इन तीनों सरकारों का नेतृत्व अटल बिहार बाजपेयी ने किया और अपने दूरदर्शी एवं कुशल नेतृत्व में देश के राजनैतिक जीवन को एक नयी दिशा दी, देश की घरेलू, विदेश एवं रक्षा नीति में गुणात्मक बदलाव आये तथा विकास, जो कांग्रेस की सरकारों के दौर में महज कारखानों के निर्माण तक सीमित था, वह विकास जमीन पर विभिन्न रूपों में गाँव-गाँव तक पहुँचने लगा. भाजपा सरकार ने अटल जी के नेतृत्व में भारत के बारे में विदेशों में जो प्रचलित मान्यताएं थीं, उन्हें भी नयी दिशा देने का सिलसिला आरम्भ कर दिया.

2014 का साल स्वातंत्र्योत्तर भारत के सबसे महत्वपूर्ण साल के रूप में इतिहास में लिखा जाएगा. इसके अनेक कारण हैं, जिनमें से एक बहुत बड़ा कारण है विदेशों में भारत की छवि और क्षमता के प्रति दृष्टिकोण में सम्पूर्ण परिवर्तन. प्रधानमंत्री, नरेन्द्र मोदी ने शुरुआत की अपने प्रथम शपथ ग्रहण समारोह से, जब उन्होंने भारत से समस्त पड़ोसी देशों को मित्रता और सद्भाव का सन्देश देते हुए समारोह में सम्मानित अतिथियों के रूप में आमंत्रित किया. पूरे विश्व ने पड़ोसियों से गले मिलने के लिए भारत के इस फैले हुए हाथों को बड़ी उत्सुकता के साथ देखा. वह समारोह अपने-आप में अनोखा और अभूतपूर्व था. उसका तत्काल प्रभाव यह हुआ कि बंगलादेश, श्रीलंका, भूटान, नेपाल और पाकिस्तान जैसे भारत के निकटतम पड़ोसी देशों की आम जनता के बीच सकारात्मक सन्देश गया और भारत की छवि में काफी निखार आया. पाकिस्तान के प्रति प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अप्रत्याशित दोस्ताना पहल ने भारत का हाथ और सिर दोनों ऊपर किया. भारत द्वारा पड़ोसी देशों की आकस्मिक परिस्थितियों में उनके काम आने के नए उदाहरण आने लगे. चाहे नेपाल में भूकंप राहत की बात हो, मालदीव्स में पानी का संकट हो, ऐसे अनेक अवसरों पर भारत ने एक अच्छे पड़ोसी के कुछ अभूतपूर्व उदाहरण प्रस्तुत किये, जिससे इसकी स्वीकृति बढ़ी.

चीन, जो परम्परागत रूप से लगभग 55-60 वर्षों से भारत के प्रति अविश्वास का प्रतीक बना रहा है, उसके सर्वशक्तिमान नेता, शी जिनपिंग के साथ जिस बराबरी का धरातल 2014 के बाद भारत ने निर्मित किया है, उसके फलस्वरूप चीन के साथ न केवल व्यापार में वृद्धि हुई, वरन चीन के एक भूखंड-एक मार्ग की परियोजना में शामिल नहीं होने के भारत के फैसले पर चीन ने प्रतिक्रिया नहीं करना बेहतर समझा. आर्थिक-सामरिक रूप से शक्तिशाली देशों में यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस, जापान, इजराइल आदि देशों के साथ रिश्तों ने न केवल कूटनीतिक स्तर पर बल्कि सामाजिक और दिली स्तर पर भी एक नया आयाम ग्रहण किया. इतना ही नहीं, नये भारत ने दुनिया के छोटे, गरीब और कमजोर देशों को भी अभूतपूर्व सम्मान दिया और विशेषकर अफ्रीका और खाड़ी में भारत की पहचान को आसमान में पहुंचाया. सब कुछ अचानक-से पिछले पाँच-छः वर्षों में नहीं हुआ है, लेकिन उभरते नए वैश्विक संगठनों और संघों में भारत की उपस्थिति इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि पिछले पाँच-छः वर्षों में भारत ने अपनी प्रतिष्ठा को स्थापित करने और इसे सर्वस्वीकार्य बनाने के लिए जो प्रयास किया, वह अभूतपूर्व है. म्यांमार में सीमापार आतंकी संगठनों को निःशस्त्र और अशक्त करने के लिए सैन्य कारवाई हो, या पश्चिम में पाकिस्तान-प्रायोजित सीमा पार से आतंक का भारत में निर्यात पर चोट करने के लिए सफल और सटीक सैन्य कार्रवाई हो, उत्तर में चीन के साथ सीमा-विवाद के मसले पर अड़ने और लड़ने और परिस्थितियों को सफलतापूर्वक भारत के पक्ष में मोड़ने की घटना हो, ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो आज भारत का एक नया चेहरा प्रदर्शित करतीं हैं. भारत ने विश्व को साफ़ सन्देश दे दिया है कि अपनी ज़रूरतों और अपनी शर्तों पर ही चलेगा.

द्वितीय विश्व युद्ध में अधिकाँश भौतिक क्षति एशिया और यूरोप के देशों में हुई और मित्र-राष्ट्र का एक महत्वपूर्ण सदस्य संयुक्त राज्य अमेरिका ऐसी क्षति से अधिकांशतः बचा रहा. युद्धोत्तर काल में जीर्णोद्धार, पुनर्निर्माण और नवनिर्माण की आवश्यकता आयी, तब युद्ध से थके-हारे अधिकाँश एशियाई और यूरोपीय देशों के सामने आर्थिक संकट की बाधा खड़ी थी. दुनिया स्पष्टतः तत्कालीन सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में दो खेमों में बँट चुकी थी. युद्ध में चीन का नेतृत्व करने वाली सत्ता का रूपांतरण कम्युनिस्ट शासन में हो चुका था, ब्रिटेन के उपनिवेश धीरे-धीरे हाथ से निकलते जा रहे थे. ऐसे में संयुक्त राज्य अमेरिका का आर्थिक वर्चस्व स्थापित हुआ और डॉलर विश्व की मुद्राओं का बादशाह बन गया. 1980-85 के आस-पास दुनिया ने नयी करवट लेनी आरम्भ की और एक ओर सोवियत संघ तथा उसके गुट के देशों में आर्थिक-राजनैतिक उथल-पुथल हुए तो दूसरी ओर चीन ने भविष्य की अपनी संभावनाओं को दर्शाना आरम्भ कर दिया था. इस बीच भारत के सामने जो असीम संभावनाएं थीं, उसका आंकलन करने में परवर्ती कांग्रेसी सरकारों ने अदूरदर्शिता के कारण हो, या अनजाने में हो, या जान-बूझ कर हो, भारी चूक की और यह देश अपने पैरों पर खड़ा होने के बजाय अमेरिका और सोवियत संघ के खेमे के बीच झूलता रहा. ऐसे में 2014 में देश की जनता ने नया राजनैतिक निर्णय किया और उस परिप्रेक्ष्य में हम भारत की मौजूदा हैसियत के आलोक में इसके भविष्य को समझ सकते हैं.

आज दुनिया एक अप्रत्याशित और अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रही है. कोरोनावायरस के प्रकोप ने विश्व में एक नया शक्ति-संतुलन का सूत्रपात कर दिया है. डोनाल्ड ट्रम्प की गलतियों के कारण विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे बड़ी ताकत, संयुक्त राज्य अमेरिका हिलता हुआ नजर आ रहा है तो कुछ ख़ास दक्षिण एशियाई देश बीजिंग और वाशिंगटन के बीच की दुविधा से निकल कर अपनी रणनीतिक सहयोगों में विविधता की तलाश कर रहे हैं. इस विविधता की तलाश का एक प्रमुख अवयव है भारत के साथ काम करने की इच्छा, क्योंकि भारत उन्हें चीन के दबाव और लड़खड़ाते संयुक्त राज्य के सामने संतुलन के एक शक्तिशाली दोस्त के रूप में दिखाई दे रहा है. दक्षिण-पूर्ण के एक-दो देशों में चीनी निधियन के कारण चीन से विरोध नहीं है, लेकिन वियतनाम सहित कुछ दूसरे देश इस क्षेत्र में चीन के आचरण के खिलाफ खुल कर सामने आये हैं. पहले वे देश नेतृत्व के लिए वाशिंगटन का मुँह जोहते थे, पर जैसा कि रणनीतिकारों का मत है, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा विदेशी एल्युमीनियम और इस्पात के आयातों पर शुल्क से लेकर गृह सचिव रेक्स टिलर्सन की बर्खास्तगी जैसे विवादास्पद कदमों ने संयुक्त राज्य के एशियाई मित्रों का भरोसा हिला कर रख दिया है. इधर, भारत दक्षिण एशिया में प्रभुत्वकारी प्रमुख शक्ति की हैसियत पाने के उद्देश्य से चीन के मुकाबले अपनी आर्थिक शक्ति बढ़ाने का प्रयास कर रहा है. कोई देश जब आर्थिक और सामरिक विकास करता है, तब उसकी शक्ति भी बढ़ जाती है.

भारत ने विगत वर्षों में अपने आर्थिक और सामरिक विकास का प्रमाण प्रस्तुत किया है. अभी कोरोना के खिलाफ लड़ाई में भी विदेशों में फँसे लोगों को लाने और विभिन्न देशों को आर्थिक, औषधीय एवं चिकित्सीय सहायता के जो उदाहरण आये हैं, वे विश्व पटल पर भारत की साख, पहचान, प्रतिष्ठा और शक्ति को बढ़ाने वाले हैं. कोरोना वायरस जनित कोविड-19 के विश्वव्यापी महामारी ने भारी उथल-पुथल मचाया है और वैश्विक शक्ति-संतुलन में गुणात्मक परिवर्तन के संकेत मिल रहे हैं. इस परिस्थिति में एशिया का महत्व बढ़ गया है. चीन के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका तथा कतिपय यूरोपीय देशों की बढ़ती कटुता और कूटनीतिक संबंधों में बढ़ती दरार से ऐसा लगता है कि आने वाले दिनों में एक तरफ चीन तो दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप के देशों की टकराहट बढ़ेगी और विदेश नीति में भरोसेमंद संतुलन बनाते हुए भारत अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है. मुझे भरोसा है कि एक सशक्त नेतृत्व और सरकार के अधीन भारत अपना यह लक्ष्य अवश्य प्राप्त करेगा.

(लेखक भारत विकास परिषद के मुंबई प्रांत की कार्यकारिणी के सदस्‍य हैं)

 

May 12th 2020, 1:56 pm

प्रधानमंत्री का मिशन स्वदेशी पर जोर, 20 लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा

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नई दिल्ली. देश में कोरोना संकट से निपटने के लिए जारी लॉकडाउन के तीसरे चरण के समाप्त होने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को संबोधित किया. अपने संबोधन के दौरान आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने का आह्वान देशवासियों से किया. कहा, लोकल के लिए वोकल होना होगा. इसके साथ ही 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा की. उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के चौथे चरण के संबंध में निर्देशों की घोषणा भी जल्द ही की जाएगी. प्रधानमंत्री के संबोधन के प्रमुख बिन्दु - एक वायरस ने दुनिया को तहस-नहस कर दिया है. विश्व भर में करोड़ों जिंदगियां संकट का सामना कर रही हैं. सारी दुनिया, जिंदगी बचाने की जंग में जुटी है. लेकिन थकना, हारना, टूटना-बिखरना, मानव को मंजूर नहीं है. सतर्क रहते हुए, ऐसी जंग के सभी नियमों का पालन करते हुए, अब हमें बचना भी है और आगे भी बढ़ना है. जब हम इन दोनों कालखंडों को भारत के नजरिए से देखते हैं तो लगता है कि 21वीं सदी भारत की हो, ये हमारा सपना नहीं, ये हम सभी की जिम्मेदारी है. विश्व की आज की स्थिति हमें सिखाती है कि इसका मार्ग एक ही है - "आत्मनिर्भर भारत" एक राष्ट्र के रूप में आज हम एक बहुत ही अहम मोड़ पर खड़े हैं. इतनी बड़ी आपदा, भारत के लिए एक संकेत लेकर आई है, एक संदेश लेकर आई है, एक अवसर लेकर आई है. जब कोरोना संकट शुरु हुआ, तब भारत में एक भी पीपीई (PPE) किट नहीं बनती थी. एन-95 मास्क का भारत में नाममात्र उत्पादन होता था. आज स्थिति ये है कि भारत में ही हर रोज 2 लाख PPE और 2 लाख एन-95 मास्क बनाए जा रहे हैं. विश्व के सामने भारत का मूलभूत चिंतन, आशा की किरण नजर आता है. भारत की संस्कृति, भारत के संस्कार, उस आत्मनिर्भरता की बात करते हैं, जिसकी आत्मा वसुधैव कुटुंबकम है. भारत जब आत्मनिर्भरता की बात करता है, तो आत्मकेंद्रित व्यवस्था की वकालत नहीं करता. भारत की आत्मनिर्भरता में संसार के सुख, सहयोग और शांति की चिंता होती है. जो पृथ्वी को मां मानती हो, वो संस्कृति, वो भारत भूमि, जब आत्मनिर्भर बनती है, तब उससे एक सुखी-समृद्ध विश्व की संभावना भी सुनिश्चित होती है. भारत की प्रगति में तो हमेशा विश्व की प्रगति समाहित रही है. भारत के लक्ष्यों का प्रभाव, भारत के कार्यों का प्रभाव, विश्व कल्याण पर पड़ता है. जब भारत खुले में शौच से मुक्त होता है तो दुनिया की तस्वीर बदल जाती है. टीबी हो, कुपोषण हो, पोलियो हो, भारत के अभियानों का असर दुनिया पर पड़ता ही पड़ता है. जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रही दुनिया में आज भारत की दवाइयां एक नई आशा लेकर पहुंचती है. इन कदमों से दुनिया भर में भारत की भूरि-भूरि प्रशंसा होती है, तो हर भारतीय गर्व करता है. दुनिया को विश्वास होने लगा है कि भारत बहुत अच्छा कर सकता है, मानव जाति के कल्याण के लिए बहुत कुछ अच्छा दे सकता है. सवाल यह है - कि आखिर कैसे? इस सवाल का भी उत्तर है - 130 करोड़ देशवासियों का आत्मनिर्भर भारत का संकल्प. आज हमारे पास साधन हैं, हमारे पास सामर्थ्य है, हमारे पास दुनिया का सबसे बेहतरीन टैलेंट है, हम Best Products बनाएंगे, अपनी Quality और बेहतर करेंगे, सप्लाई चेन को और आधुनिक बनाएंगे, ये हम कर सकते हैं और हम जरूर करेंगे. यही हम भारतीयों की संकल्पशक्ति है. हम ठान लें तो कोई लक्ष्य असंभव नहीं, कोई राह मुश्किल नहीं. और आज तो चाह भी है, राह भी है. ये है भारत को आत्मनिर्भर बनाना. कोरोना संकट का सामना करते हुए, नए संकल्प के साथ मैं आज एक विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा कर रहा हूं. ये आर्थिक पैकेज, 'आत्मनिर्भर भारत अभियान' की अहम कड़ी के तौर पर काम करेगा. हाल में सरकार ने कोरोना संकट से जुड़ी जो आर्थिक घोषणाएं की थीं, जो रिजर्व बैंक के फैसले थे, और आज जिस आर्थिक पैकेज का ऐलान हो रहा है, उसे जोड़ दें तो ये करीब-करीब 20 लाख करोड़ रुपए का है. ये पैकेज भारत की GDP का करीब-करीब 10 प्रतिशत है. इन सबके जरिए देश के विभिन्न वर्गों को, आर्थिक व्यवस्था की कड़ियों को, 20 लाख करोड़ रुपए का संबल मिलेगा, सपोर्ट मिलेगा. 20 लाख करोड़ रुपए का ये पैकेज, 2020 में देश की विकास यात्रा को, आत्मनिर्भर भारत अभियान को एक नई गति देगा. आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को सिद्ध करने के लिए, इस पैकेज में Land, Labour, Liquidity और Laws, सभी पर बल दिया गया है. ये आर्थिक पैकेज हमारे कुटीर उद्योग, गृह उद्योग, हमारे लघु-मंझोले उद्योग, हमारे MSME के लिए है, जो करोड़ों लोगों की आजीविका का साधन है, जो आत्मनिर्भर भारत के हमारे संकल्प का मजबूत आधार है. ये आर्थिक पैकेज देश के उस श्रमिक के लिए है, देश के उस किसान के लिए है जो हर स्थिति, हर मौसम में देशवासियों के लिए दिन रात परिश्रम कर रहा है. ये आर्थिक पैकेज हमारे देश के मध्यम वर्ग के लिए है, जो ईमानदारी से टैक्स देता है, देश के विकास में अपना योगदान देता है. ये संकट इतना बड़ा है, कि बड़ी से बड़ी व्यवस्थाएं हिल गई हैं. लेकिन इन्हीं परिस्थितियों में हमने, देश ने हमारे गरीब भाई-बहनों की संघर्ष-शक्ति, उनकी संयम-शक्ति का भी दर्शन किया है. आज से हर भारतवासी को अपने लोकल के लिए ‘वोकल’ बनना है, न सिर्फ लोकल Products खरीदने हैं, बल्कि उनका गर्व से प्रचार भी करना है. मुझे पूरा विश्वास है कि हमारा देश ऐसा कर सकता है. लॉकडाउन का चौथा चरण, लॉकडाउन 4, पूरी तरह नए रंग रूप वाला होगा, नए नियमों वाला होगा. राज्यों से हमें जो सुझाव मिल रहे हैं, उनके आधार पर लॉकडाउन 4 से जुड़ी जानकारी भी आपको 18 मई से पहले दी जाएगी. आत्मनिर्भरता हमें सुख और संतोष देने के साथ-साथ सशक्त भी करती है. 21वीं सदी, भारत की सदी बनाने का हमारा दायित्व, आत्मनिर्भर भारत के प्रण से ही पूरा होगा. इस दायित्व को 130 करोड़ देशवासियों की प्राणशक्ति से ही ऊर्जा मिलेगी. आत्मनिर्भर भारत का ये युग, हर भारतवासी के लिए नूतन प्रण भी होगा, नूतन पर्व भी होगा. अब एक नई प्राणशक्ति, नई संकल्पशक्ति के साथ हमें आगे बढ़ना है.

May 12th 2020, 1:56 pm

पालघर हत्याकांड – ८

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वामपंथियों की हिंसा की कहानी

सामाजिक कार्यकर्ता गोदूताई परुलेकर ने साहूकारों के अन्याय से त्रस्त जनजातियों को साहूकारों के परेशानी से बाहर निकालकर अपनी जमीन का हक़ प्राप्त करने के उद्देश से तलासरी में सीपीएम पार्टी को प्रवेश दिया. परन्तु, उनका वह उद्देश्य पीछे रह गया. और सीपीएम के नेताओं ने इन जनजातियों के भोलेपन का फायदा उठाना शुरू कर दिया. उनका अज्ञान दूर करना दूर ही रह गया, अपितु उनको समाज से तोड़ने का ही काम किया. जो सीपीएम पार्टी को नहीं मानता, उसे यहाँ पर नहीं रहने दिया जाएगा, खेती नहीं करनी दी जाएगी, ऐसा प्रचार किया गया. वनवासी कल्याण केंद्र से शिक्षा प्राप्त विद्यार्थी जब अपने गाँव में जाकर शिक्षा का प्रसार करता है, शिक्षा का महत्व अपने जनजाति बन्धुओं को समझाता है तो सीपीएम के कार्यकर्ताओं द्वारा उस युवा के साथ मारपीट की जाती है, ऐसी घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं. उसे धमकाना, कभी उनके घरों में तोड़ फोड़ की घटनाएं भी होती हैं.

1990 में सीपीएम के हाथों से दो गांवों को महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री स्व. चिंतामन वनगा जी ने बचाया. तब सीपीएम के कार्यकर्ताओं ने उन गावों पर हमला किया और लोगों के घर तोड़ दिए. ३००-३५० लोग बेघर हो गए. तक़रीबन ३५०० बकरियां, गाय, भैस आदि जानवर मार डाले गए. खेती करने वाले २०० बैलों को वार करके उन्हें जख्मी कर दिया. इसके बाद वे कार्यकर्ता स्वयं पुलिस थाने गए और गांव वालों के खिलाफ शिकायत कर दी. वनवासी कल्याण केंद्र से सम्बंधित ५०-६० लोगों के घर पूरी तरह से ध्वस्त किये गए. सीपीएम द्वारा फैलीयी इस दहशत के कारण जनजातियों के विकास में बाधा आती रही है.

जो सीपीएम की नहीं सुनेगा, उसे और उसके घर को समूल नष्ट करना, यही इस पार्टी की नीति रही है. स्थानीय सीपीएम कैडर को अन्य स्थानों पर प्रशिक्षित किया जाता है. गाँव में विकास की किसी नई योजना पर कार्य हो रहा हो तो उसमें बाधा उत्पन्न करना, शिक्षक, डॉक्टर या कोई सरकारी अधिकारी गाँव में आए तो उसके बारे में गलतफहमी फैलाना, यह सब इनका कार्य रहता है. स्थानीय नेता विनोद निकोले भी ऐसे ही कार्यकर्ताओं में से है. समाज में पैदा किये भ्रम के कारण ही जनजाति समाज के लोग बाहर से आने वाले लोगों पर हमला करते हैं, उनका विरोध करते हैं. पालघर में संतों की हत्या भी इसी षड्यंत्र का भाग है.

वामपंथी ऐसी घिनौनी मानसिकता एवं कृति के लिए कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करते हैं. सीपीएम के माध्यम से हर छह महीने में प्रशिक्षण वर्ग का आयोजन किया जाता है. 1992 में भी इसी मानसिकता के कारण सीपीएम के गुंडों ने विहिप द्वारा संचालित वनवासी विकास केंद्र पर हमला किया था. इन प्रकल्पों से जुड़े अनेक कार्यकर्ताओं पर भी हमला हुआ. क्षेत्र के विकास के लिए संचालित सेवा प्रकल्पों में कार्य करने वाले, भगवा वस्त्र धारण किये, भगवा ध्वज उठाने वाले का विरोध व उन पर हिंसा वामपंथियों की वृत्ति रही है. इसी माओवादी वृत्ति के कारण 16 अप्रैल, 2020 को हिन्दू साधुओं की घिनौने तरीके से हत्या की गयी.

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May 12th 2020, 11:08 am

पश्चिम बंगाल – तेलीनीपाड़ा, मालदा में हिन्दुओं के घरों पर तीन दिन में तीन हमले

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कोलकत्ता. पश्चिम बंगाल की ममता सरकार हिन्दुओं के संरक्षण में विफल साबित हो रही है. ममता सरकार की तुष्टीकरण की नीति के कारण हिन्दुओं के प्रति हिंसा की घटनाएं निरंतर होती रहती हैं. अब, हुगली जिला के तेलीनीपाड़ा में मुसलमानों ने तांतीपाड़ा और महात्मा गांधी स्कूल के पास शगुनबाग, फैज अहमद फैज स्कूल के पास हिन्दुओं के घरों व दुकानों में आग लगा दी. तेलीनीपाड़ी में दो बार हमला हो चुका है, मालदा में भी जिहादी भीड़ ने हमला किया.

प्राप्त जानकारी के अनुसार पश्चिम बंगाल के हुगली जिला के तेलीनीपाड़ा में रविवार शाम को जिहादियों की भीड़ ने हिंदुओं के घरों व दुकानों पर हमला कर दिया. जिहादी भीड़ पूरी तैयारी के साथ आई थी. उन्होंने दुकानों व घरों में आग भी लगा दी. इससे पहले दुकानों में लूटपाट भी की. घटना में अनेक लोग घायल हुए हैं. हमलावरों ने पैट्रोल बम भी बस्ती पर फैंके. घटना की जानकारी मिलने पर पुलिस पहुंची. भीड़ को खदेड़ने के लिए पुलिस ने लाठी चार्ज व आंसू गैस का इस्तेमाल किया. लेकिन, तेलीनीपाड़ा के लोग पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर संतुष्ट नहीं हैं. लोगों ने एक पक्ष के प्रति नरमी दिखाने का आरोप लगाया. तेलीनीपाड़ा की घटना को लेकर भाजपा के महासचिव और पश्चिम बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने ट्वीट किया. हुगली से भाजपा सांसद लॉकेट चटर्जी ने भी एक वीडियो ट्वीट किया. सोमवार को हुगली की सांसद लॉकेट चटर्जी तेलीनीपाड़ा जा रही थीं. लेकिन पुलिस ने कानून व्यवस्था का हवाला देकर उन्हें नहीं जाने दिया और बाहर ही रोक दिया.

उन्मादियों की भीड़ ने मंगलवार को दिन के समय एक बार फिर हिन्दुओं के घरों व दुकानों पर हमला कर दिया. पैट्रोल बम फैंके तथा आग लगा दी. घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं तथा ममता सरकार से सवाल पूछ रहे हैं.

सांसद लॉकेट चटर्जी ने आरोप लगाया कि घटना को लेकर पुलिस कमिश्नर को बार-बार फोन किया, लेकिन कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला.

श्रीचंद्रपुर में घरों व दुकानों पर हमला

मालदा जिला के हरीशचंद्रपुर-1 के श्रीचंद्रपुर गांव में जिहादी तत्वों की भीड़ ने हिन्दुओं के घरों व मंदिर पर हमला कर तोड़फोड़ की. मंदिर में स्थित प्रतिमा को भी जिहादियों ने नुकसान पहुंचाया. नजदीक ही मन की बाड़ी मुस्लिम बहुल बस्ती है. बताया जा रहा है कि रविवार सुबह भवेश दास से एक व्यक्ति की किसी बात को लेकर बहस हो गई थी. जिसके पश्चात रविवार शाम करीब सात बजे मुस्लिम बहुल बस्ती से आई जिहादी भीड़ ने लाइट की आपूर्ति बाधित की, उसके पश्चात भवेश दास के घर पर हमला कर दिया, उसके बाद बाजार में हिन्दुओं की दुकानों पर हमला कर तोड़फोड़ की. इतने से भी मन नहीं भरा तो बस्सी के मंदिर में घुसकर तोड़फोड़ की, मूर्तियों को तोड़ दिया. भीड़ के हाथों में डंडे व रॉड आदि थे.

 

 

http://ritambangla.com/national/communal-violence-in-hooghly-and-malda-on-the-day-of-imams-letter-to-wb-cm-a-mere-coincidence/

 

 

May 12th 2020, 10:39 am

कोरोना संकट से निपटने को हरियाणा दिखा रहा राह

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मुकेश वशिष्ठ

पांच हजार वर्ष पूर्व भगवान श्रीकृष्ण ने जिस धरती पर गीता के सैद्धांतिक और व्यावहारिक उपदेश दिया था. आज ‘हरियाणा’ की वह धरती, कोरोना वायरस से उपजे संकट में अन्य प्रदेशों के लिए मार्ग दिखा रही है. कोरोना संकट में हरियाणा एक मॉडल के रूप में उभर रहा है, जहां कर्तव्यवान समाज और संवेदनशील सरकार का अटूट समन्वय है. वास्तव में, यहां कोरोना संक्रमण को थामना एक यज्ञ बन चुका है, जिसमें हर नागरिक अपने दायित्वों की आहुति डाल रहा है. लिहाजा हरियाणा के दो तिहाई जिले इस महामारी से मुक्त हो चुके हैं. विश्लेषण करने पर ध्यान आता है कि हरियाणा अन्य प्रदेशों से काफी अच्छी स्थिति में है. हरियाणा में कोरोना से मृत्यु दर .79 प्रतिशत है, तो मरीजों के ठीक होने की दर 72.72 प्रतिशत है. प्रदेश में कोरोना की डबलिंग रेट 23 दिन का है.

वास्तव में कोरोना वायरस से उपजी कोविड-19 नामक बीमारी एक ऐसी महामारी है, जिससे लड़ाई में हर किसी का सहयोग आवश्यक है. यह न तो आसान लड़ाई है और न ही इसे केवल सरकार के भरोसे रहकर जीता जा सकता है. यह संकट कितना गंभीर है, इसका पता उससे लड़ने के लिए नित-नए उपायों की घोषणा के साथ-साथ प्रधानमंत्री की ओर से देश के नाम बार-बार संदेश से होता है. यह भूल भी नहीं की जानी चाहिए कि केवल बड़े शहरों के लोगों को ही सावधान रहने की जरूरत है. इस संकट से बचने में तो देश के हर एक नागरिक का योगदान चाहिए – चाहे वह शहरी हो या ग्रामीण. चूंकि अब यह किसी से छिपा नहीं कि किसी एक व्यक्ति की लापरवाही पूरे समुदाय पर भारी पड़ सकती है, इसलिए हर किसी को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह खुद तो सतर्क रहे ही, दूसरे लोग भी पर्याप्त सतर्कता बरतें.

यह ठीक भी नहीं है कि खतरा सामने दिखने और उसके लगातार गंभीर होते जाने के बाद भी संकट की गंभीरता को समझने से इन्कार किया जाए. मार्च-अप्रैल महीने में ऐसी हद दर्जे की मूर्खता पूरे देश ने देखी थी कि कोरोना वायरस से संक्रमित कुछ मरीज अस्पताल से भाग रहे हैं या फिर खुद को अलग-थलग करने में आनाकानी कर रहे हैं. ऐसे लोग खुद को मुसीबत में डालने के साथ ही पूर समाज के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं. दिल्ली के नजदीक होने के कारण उत्तर प्रदेश के बाद हरियाणा ने इसे ज्यादा सहन किया. फलस्वरूप प्रदेश में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हुई. सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में मकरज से 1641 तबलीगी जमाती आए.

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सीमाओं से घिरे हरियाणा के सामने खुद को कोरोना से बचाए रखने की बड़ी चुनौती थी. इसके बावजूद सरकार ने कोरोना वायरस को प्रदेश में फैलने नहीं दिया. इस भीषण स्थिति में हरियाणा सरकार ने सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों दृष्टियों से अपनी योजनाओं को क्रियान्वित किया.

उल्लेखनीय है कि हरियाणा देश का ऐसा पहला राज्य था, जिसने 12 मार्च को सबसे पहले अपने प्रदेश को महामारी प्रभावित इलाका घोषित कर दिया था और समय रहते व्यापक स्तर पर तैयारी कर ली थी. विशेष तौर पर 15 विभागों का मजबूत समन्वय बनाकर युद्ध स्तर पर काम शुरू किया गया था. दुर्भाग्यवश ठीक पांच दिन बाद 17 मार्च को प्रदेश में कोरोना ने दस्तक दी और गुरुग्राम में पहला कोरोना पॉजिटिव केस पाया गया. इस दौरान 14 इटेलियन पर्यटकों को भी गुरुग्राम के अस्पताल में ही इलाज के लिए भर्ती कराया गया. इनमें से अब 13 मरीज ठीक हो चुके हैं और एक मरीज की मृत्यु हो गई है. कोरोना संक्रमण को लेकर सरकार कितनी गंभीर है, इसका आंकलन खुद मुख्यमंत्री की सक्रियता से लगाया जा सकता है. हर रोज प्रेस कॉन्फ़्रेंस सीएम मनोहर लाल के नेतृत्व में की जाती है. लोगों तक सही जानकारी पहुंचती है. इसी तरह सरकार द्वारा इंटरनेट कनेक्टिविटी में ऑफिस कर्मचारियों और लोगों की ज़रूरतों को देखते हुए 30 से 40 प्रतिशत तक की वृद्धि की गई. ये फैसला लेने में बिल्कुल भी सरकार ने देरी नहीं की और इंटरनेट का इस्तेमाल आज ज्यादा से ज्यादा लोग कर रहे है. जबकि आम लोगों को रोजमर्रा की चीजें मुहैया कराने व पारदर्शी व्यवस्था बनाने के लिए ई-सेवाओं का सहारा लिया. प्रदेश स्तर पर जन सहयोग हेल्प-मी एप के माध्यम से 12 अलग-अलग सुविधा दी गई. केंद्र सरकार द्वारा संचालित आरोग्य सेतु एप का प्रचार-प्रसार किया गया. अब तक 32.57 लाख लोग एप को डाउनलोड कर चुके हैं. हरियाणा के लिए खुद को कोरोना से बचाए रखने की बड़ी चुनौती थी. इसलिए सरकार ने तमाम आशंकाओं पर विराम लगाते हुए प्रदेश की सीमाओं से लगी अंतरराज्यीय सीमाओं को सील कर 40 हजार पुलिसकर्मी फील्ड में उतारे. इसी सख्ती ने किसी तबलीगी जमाती और विदेशों से आए 65 हजार एनआरआई को प्रदेश में छिपने नहीं दिया. लॉकडाउन से पहले ही सरकार ने अपनी स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत कर लिया था. हर जिले में एक कोविड स्पेशल अस्पताल बनाना भी एक सफल प्रयोग रहा, जहां कोरोना पॉजिटिव मरीजों को रखा गया. इस समय प्रदेश में कोरोना मरीजों के लिए 11 अस्पतालों में 1400 बेड और 1101 वेंटिलेटर हैं. इसी तरह 19 हजार मरीजों के लिए क्वारेंटाइन और 9444 मरीजों के लिए आईसोलेशन बैड बनाए गए हैं. सरकारी या निजी अस्पतालों में कोरोना संक्रमित पॉजिटिव मरीज के इलाज पर होने वाला खर्च सरकार वहन करती है.

हरियाणा में हर नागरिक का स्वास्थ्य सर्वे डाटा सरकार के पास है. अप्रैल माह में सरकार ने 487 मोबाइल हेल्थ टीम और 20792 टीमों के माध्यम से 46 लाख 8 हजार 84 घरों का सर्वे कर लोगों की स्वास्थ्य जांच की थी. इस सर्वे में 9977 लोगों की पहचान हुई, जिन्हें निमोनिया या सांस लेने की दिक्कत थी. सरकार इन लोगों के टेस्ट करवा रही है. स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के साथ सरकार ने लॉकडाउन के दौरान आम आदमी के संकट पर भी ध्यान केंद्रित रखा. मुख्यमंत्री परिवार समृद्ध योजना, निर्माण क्षेत्र के मजदूर तथा असंगठित क्षेत्र के करीब 24 लाख गरीब परिवारों को सरकार आर्थिक सहायता और मुफ्त राशन मुहैया करा रही है. जिसके अंतर्गत सरकार हर महीने 1200 करोड़ रुपये खर्च कर रही है. जिसमें मुख्यमंत्री परिवार समृद्धि योजना में रजिस्टर्ड 12.56 लाख लोगों को 4 हजार रुपये का आर्थिक सहयोग, रजिस्टर्ड 3 लाख 50 हजार 621 कंस्ट्रक्शन श्रमिकों को हर महीने 4500 रुपये, मजदूर और रेहड़ी पटरी वाले डीसी पोर्टल पर रजिस्टर्ड हैं, उन्हें प्रति सप्ताह 1000 रुपये की मदद दी गई है, इनकी संख्या 6 लाख 23 हजार 108 है. इसी तरह प्रदेश के बीपीएल, एओवाई व ओपीएच परिवारों को 30 जून तक मुफ्त राशन दिया जा रहा है. इसके अलावा सरकार लगभग 2 लाख परिवारों को राशन के पैकेट वितरित कर चुकी है, जिन लोगों के राशन कार्ड किसी कारण से बन नहीं पाए थे. नेशनल सोशल असिस्टेंस प्रोग्राम के तहत, प्रदेश के लगभग 22 लाख वृद्धाओं, विधवाओं और विकलांग लोगों को तीन महीने की पेंशन एक साथ दी गई है. मनरेगा के तहत मजदूरों की दिहाड़ी को भी बढ़ाया गया है. दिहाड़ी को 284 रुपये प्रति दिन से बढ़ाकर 309 रुपये प्रति दिन कर दिया है.

किसी भी विपदा में धैर्य और उत्साह की जरूरत होती है. इसलिए हरियाणा सरकार लगातार अपने डॉक्टर, नर्स और अन्य स्वास्थ्य कर्मचारियों को उत्साहित करने से चूक नहीं रही है. सरकार ने कोरोना वायरस से संक्रमित होकर मृत्यु हो जाने की स्थिति में उनके परिजनों को आर्थिक मदद देने का वादा किया. इसके तहत डॉक्टर को 50 लाख, नर्स को 30 लाख, पैरामेडिकल स्टाफ को 20 लाख और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को 10 लाख देने का प्रावधान है. इसी तरह पुलिसकर्मी भी जनसेवा करते वक्त कोरोना वायरस की चपेट में आते हैं तो उनके परिजनों को 30 लाख रुपए की आर्थिक मदद दी जाएगी. जबकि कोविड-19 के विरूद्ध सरकार की सहायता करने वाले सभी मीडिया कर्मियों, कंटेनमेंट जोन में कार्यरत सभी सरकारी कर्मचारी (आशा वर्कर्स, आंगनवाडी वर्कर्स, पुलिस कर्मी और सफाई कर्मचारी), मंडियों में खरीद प्रक्रिया में लगे सभी पंजीकृत किसान-आढ़ती एवं मजदूर और खरीद एजेंसियों के कर्मचारी चाहे वे नियमित, अंशकालिक या अनुबंधित हों, सभी को 10 लाख रुपये के जीवन बीमा कवर का लाभ देने का फैसला लिया है.

हरियाणा कृषि प्रधान प्रदेश है, जहां करीब 16 लाख किसान परिवार हैं. फिलहाल, प्रदेश में सरसों और गेंहू की खरीद प्रक्रिया जारी है. अब तक 1 लाख 9 हजार 775 किसानों से 2.98 लाख मीट्रिक टन सरसों और 3 लाख 54 हजार 097 किसानों से 30.67 लाख मीट्रिक टन गेंहू की खरीद की गई. इस दौरान लॉकडाउन के लिए तय निर्देशों और शारीरिक दूरी का विशेष ध्‍यान दिया जा रहा है. प्रत्येक खरीद केंद्र पर किसानों के लिए सेनेटाइजर समेत तमाम सुविधाओं की व्यवस्था की गई है. हरियाणा दुग्ध उत्पादन में भी अव्वल प्रदेश है. लेकिन, लॉकडाउन के चलते प्रदेश में 40 प्रतिशत दूध की बिक्री में गिरावट आई है. इस समस्या को देखते हुए प्रदेश सरकार ने किसानों, डेयरी फार्म संचालकों तथा दुग्ध उत्पादकों से यह सरप्लस दूध सहकारी समितियों के माध्यम से खरीदने का निर्णय लिया. वर्तमान में प्रदेश में 107 लाख टन दूध का उत्पादन होता है. प्रदेश में भी प्रवासी श्रमिक किराएदार के तौर पर बड़ी संख्या में रहते हैं. इसलिए जब दूसरे प्रदेशों से प्रवासी श्रमिक पलायन करने को मजबूर हो गए थे, तब हरियाणा सरकार ने मजदूरों के पलायन को रोकने में सफलता प्राप्त की. समय रहते सरकार ने 550 राहत शिविरों का निर्माण कर 60 हजार से ज्यादा मजदूरों के ठहरने की व्यवस्था की. फलस्वरूप 210 शिविरों में 15500 मजदूरों ने शिविरों का लाभ उठाया. यद्यपि यह सच है कि कोरोना संक्रमण की लड़ाई जन-सहभागिता के बिना नहीं जीती जा सकती. इसलिए सरकार ने आम लोगों को कोविड19 संघर्ष सेनानी बनने का मौका दिया, इसमें भी सरकार को सफलता मिली. आज 78795 संघर्ष सेनानियों के जरिए गरीब लोगों तक आम चीजें पहुंचना आसान हुआ. हरियाणा कोरोना रिलीफ फंड में किसानों से लेकर छोटे व्यापारी, पंचायत, विद्यार्थी, कर्मचारी और उद्योगपतियों ने आर्थिक सहयोग दिया. विशेषकर 170 कर्मचारियों द्वारा एक महीने के पूरी सैलरी देना. भीषण स्थिति से निपटने के लिए जनप्रतिनिधियों का रवैया भी सराहनीय है. जब उन्होंने एकमत होकर अपने वेतन का 30 फीसदी हिस्सा एक साल तक सरकार को देने का फैसला लिया.

यह जरूरी है, कि जब सरकारी तंत्र और खासकर स्वास्थ्य तंत्र के लोग संकट के खिलाफ दिन-रात एक किए हुए हैं, तब सबका सहयोग नैतिक धर्म बन जाता है. इस मॉडल में देश-प्रदेश के सर्वांगीण विकास के साथ इस संकट को परास्त करने की शक्ति है.

May 12th 2020, 8:50 am

देवर्षि नारद जी के सिद्धांत पत्रकार जगत में ग्रहण करने योग्य – प्रो. बी.के. कुठियाला

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आगरा (विसंकें). आदि पत्रकार देवर्षि नारद की जयंती पर विश्व संवाद केंद्र ब्रज प्रांत द्वारा वेबिनार का आयोजन किया गया. जिसमें माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल के पूर्व कुलपति एवं हरियाणा उच्च शिक्षा आयोग के अध्यक्ष प्रोफेसर बी.के. कुठियाला मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे.

उन्होंने कहा कि वर्तमान में नारद जी के सिद्धांत पत्रकार जगत में ग्रहण करने योग्य हैं. पत्रकारिता में राष्ट्रीय सोच और ईमानदारी का अत्यंत महत्व है. वर्तमान समय में महत्व और भी अधिक है. समाचार भेजना भी आवश्यक है, लेकिन यदि समाचार के प्रकाशन से वैमनस्यता उत्पन्न हो तो समाचार को प्रकाशित करना आवश्यक नहीं. सोशल मीडिया पर असत्य भ्रामक समाचारों पर रोक लगनी चाहिए. उन्होंने कहा कि नारद जी का आवागमन स्वतंत्र था, वह आसानी से तीनों लोकों में से किसी भी लोक में आ जा सकते थे. साथ ही साथ उनके प्रवेश पर भी किसी प्रकार का निषेध नहीं था. रामचरितमानस में उदाहरण मिलता है कि वह रावण के शयनकक्ष में कई बार रावण से मिलने के लिए जाते रहे और उसे प्रभु राम के विरुद्ध गलत कृत्य करने से रोकने का प्रयास करते रहे. नारद जी ही एकमात्र ऐसे देवता हैं जो अपने मन की गति से भी तेज गति से कहीं पर भी आने जाने के लिए जाने जाते हैं. नारद कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक चलती फिरती संस्था थे. जिसमें कई लोग उस नारद संस्था का प्रतिनिधित्व करते थे.

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बारे में कुठियाला जी ने कहा कि समाचार की पुनरावृति बार-बार नहीं होनी चाहिए. समाचार बार-बार कहने से उसका महत्व खत्म हो जाता है. यदि समाचार के महत्व को बनाए रखना है तो समाचार को पुनरावृति से बचाना चाहिए.

सोशल मीडिया के बारे में कहा कि सोशल मीडिया पर भ्रामक समाचारों से बचना चाहिए. अधिकांश लोग बिना पढ़े और बिना जांचे ही समाचारों को आगे बढ़ा देते हैं. अध्ययन कर ही सामग्री को आगे प्रेषित करना चाहिए. अन्यथा समाज में एक अलग ही विचार उत्पन्न हो जाता है. सोशल मीडिया पर कई प्रकार के झूठे समाचार आते हैं, इन्हें आगे नहीं बढ़ाना चाहिए.

समाज में नकारात्मक समाचारों को प्रेषित करने वाले पत्रकारों के संबंध में कहा कि इस प्रकार के पत्रकार अपने कर्तव्य का निर्वहन ठीक प्रकार से नहीं कर रहे हैं. उन्हें सत्य समाचार ही सभी के समक्ष रखना चाहिए. पत्रकारों को यह स्वविवेक के आधार पर निर्णय लेना चाहिए.

आज समाचार पत्र और विविध चैनल आदि पूंजीवादी लोगों के हाथ में हैं. ऐसे लोगों के हाथ में होने के कारण पत्रकारिता स्वतंत्र नहीं रह गई है. पत्रकारिता को स्वतंत्रता पूर्वक कार्य करने के लिए पत्रकारों को अपने दृढ़ निश्चय का परिचय देना होगा. उन्हें अपनी दृढ़ता और अपनी ईमानदारी व समाज को दिशा देने के लिए समाचार का प्रेषण करना चाहिए.

May 12th 2020, 8:50 am

देश को एकसूत्र में पिरोने का काम संत परंपरा ने किया – डॉ. कृष्ण गोपाल

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अवध. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल ने भारत की संत परम्परा पर व्याख्यान में कहा कि देश को एक सूत्र में पिरोने का कार्य संत परम्परा द्वारा किया जाता रहा है. भारत की आध्यात्मिक दृष्टि सभी विभेदों से ऊपर उठकर देखने की दृष्टि है. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्, अवध प्रान्त कोरोना महामारी के दौरान सेवा कार्य के साथ साथ व्याख्यानों की श्रृंखला आयोजित कर रहा है. इसी कड़ी में अभाविप अवध प्रान्त द्वारा आयोजित व्याख्यान श्रृंखला में "भारतीय संत परंपरा एवं राष्ट्रीयता के विविध आयाम" विषय पर सह सरकार्यवाह का उद्बोधन रहा. उन्होंने कहा कि भारत विश्व भर में अनेकता में एकता रखने वाला एक विशेष देश है, हमारी विशेषता हमको दुनिया के और देशों से भिन्न रखती है. हमारी विशेषताओं में हमारी आध्यात्मिक धारा प्रमुख है. हमारे देश की आत्मा अध्यात्म में संचित है, भारत की आध्यात्मिक भावनाओं ने देश को सदैव जीवंत रखा है. संकट के समय संतों ने ही आगे आकर समाज को दिशा दी है और उसी के कारण हमें समाज में बृहद परिवर्तन दिखाई देते हैं. और यही हमारे देश की अमरता का मूल कारण है. उन्होंने महात्मा बुद्ध, आद्य शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, रामानंदाचार्य, शंकरदेव, चैतन्य महाप्रभु, ज्ञानदेव, तुकाराम, कबीर, रैदास तथा गोस्वामी तुलसीदास के बाद तक के तमाम संतों की चर्चा करते हुए कहा कि इन महापुरुषों ने आध्यात्मिक चेतना को बल देते हुए पूरे देश को एकता के सूत्र में बांधा. मूक लोगों को वाणी दी और समाज के हर वर्ग को विश्वास दिलाया. भारत की संत परम्परा को उन्होंने बृहद रूप से संतों के जीवन के क्रांतिकारी परिवर्तन वाले दृष्टान्तों को भी सबके सामने रखा. जन आन्दोलन से किया संतों ने परिवर्तन डॉ. कृष्ण गोपाल ने कहा कि भारत में परिवर्तन संतों के जन आन्दोलन का नतीजा है. देश के अध्यात्म और दर्शन के प्रति उनका अगाध प्रेम था. इसके लिए संतों ने 700 वर्षों की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी इस आन्दोलन को थमने नहीं दिया. यह जनांदोलन भारत के कोने-कोने में पहुंचा, दक्षिण से उत्तर, पूर्व से पश्चिम, हिंदी से लेकर तमिल सभी भाषाओं में संतों ने अपने विचारों के माध्यम से देश की आध्यात्मिक परम्परा को जीवित रखा. इन जनांदोलनो में जाति, वर्ण, भाषा सभी तरह के बंधन टूट गए. उन्होंने कहा कि महात्मा बुद्ध के ज्ञान, करुणा भाव और अहिंसा के दर्शन को पूरी दुनिया में मान्यता मिली. आद्य शंकराचार्य ने उपनिषद की व्याख्या को नए रूप में प्रस्तुत कर पूरे देश में सनातन दर्शन की पुर्नस्थापना की. इसके बाद नाथ संप्रदाय के गुरु गोरखनाथ के शिष्यों ने मुगल आक्रमण के समय देश के गांवों-गांवों में भैरवी गाते हुए सांस्कृतिक एकता की अलख जगाई. डॉ. कृष्ण गोपाल ने बताया कि मध्यकाल में उत्तर की तरह ही दक्षिण में भी कई संतों ने इस जनांदोलन को आगे बढ़ाया. उनमें नयमार और अलवार संत परम्परा प्रमुख रही, दक्षिण से ही निकलकर संत रामानुजाचार्य ने प्रस्थानत्रयी लिख विशिष्टाद्वैत की स्थापना की और देश में भक्ति आंदोलन की शुरुआत की. उन्हीं की परंपरा को दक्षिण के ही एक संत रामानंद ने आगे बढ़ाया और लोक भाषा में धार्मिक ग्रंथों का लेखन प्रारम्भ किया. संत रामानंद भक्ति मार्ग के दोनों शाखाओं निर्गुण और सगुण का बराबर सम्मान करते थे. उनके ही शिष्य कबीर और रैदास थे, जिनके भजन आज भी भक्ति के नए आयामों को गढ़ रहे हैं. रामानंदाचार्य के शिष्यों में तमाम महिलाएं भी शामिल थीं. उत्तर भारत के एक अन्य संत गोस्वामी तुलसीदास ने लोक भाषा में ही रामचरित मानस की रचना कर सनातन परंपरा में एक नया आयाम जोड़ा. इस्लामी शासन के दौरान गोस्वामी जी ने गांव-गांव रामलीला का मंचन करवाया और देश का नारा दिया कि भारत के राजा राम हैं. उनके इस नारे ने उस समय जनआंदोलन का रूप ले लिया था. उन्होंने कहा कि संतों ने पूरे भारत को एकता के सूत्र में बांधा. उनकी गौरवशाली परंपरा में देश की हर भाषा और हर जाति-वर्ग को बराबर सहभागिता मिली. वे समूचे देश का भ्रमण करते थे. और सभी को एक सूत्र में बांधने की कोशिश करते थे. इन संतों ने कभी दरबारी बनने की चेष्टा नहीं की, बल्कि समाज में घूम घूम कर सभी को एकत्र किया और भारत की आध्यात्मिक चेतना को जिन्दा रखा. उन्होंने कहा कि डॉ. लोहिया कोई बड़े धार्मिक व्यक्ति नहीं थे, लेकिन अपनी पुस्तक में उन्होंने जो लिखा है, उससे प्रतीत होता है कि उन्होंने भी भारत की आध्यात्मिक मौलिकता को स्वीकार किया है. लल्लन प्रसाद राय और राम विलास शर्मा की पुस्तकों की भी चर्चा की और कहा कि इनमें भारतीय संत परंपरा के विविध आयाम बड़े ही अच्छे ढंग से दर्शाये गए हैं.

May 11th 2020, 2:19 pm

132 बुद्धिजीवियों ने लिखा खुला पत्र, झूठ पर आधारित पत्रकारिता को बढ़ावा देने का आरोप

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नई दिल्ली. भारत के 132 बुद्धिजीवियों ने जम्मू कश्मीर के विवादित फोटोग्राफरों को पुलित्जर पुरस्कार दिए जाने पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई. बुद्धिजीवियों ने पुलित्जर पुरस्कार 2020 के निदेशक मंडल तथा चयनकर्ताओं के नाम खुला पत्र जारी कर पुरस्कार की बदनामी करने और झूठ व भ्रामक तथ्यों पर आधारित पत्रकारिता को बढ़ावा देने का आरोप लगाया. खुले पत्र में अन्य समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों का जिक्र करते हुए साबित किया कि पुरस्कृत फोटो जर्नलिस्ट ने किस प्रकार तथ्यों को तोड़ मरोड़कर झूठ फैलाने और भारत को बदनाम करने का काम किया है.

बुद्धिजीवियों ने पुरस्कृत फोटो पत्रकार डार यासीन, मुख्तार खान पर पाकिस्तान के इशारे पर भारत विरोधी दुष्प्रचार को बढ़ावा देने का आरोप लगाया, उन्होंने लिखा कि ‘यह शर्मनाक है कि जो पुरस्कार पत्रकारिता की प्रगति और उत्थान का दावा करता हो, वह नफरत, विभाजन और झूठ को प्रोत्साहित कर रहा है.’ उनके अनुसार स्वयं अमेरिका के आतंकवाद से पीड़ित होने के बावजूद चयनकर्ताओं ने डार यासीन और मुख्तार खान जैसे फोटो पत्रकार का चयन कर इसकी मर्यादा को नुकसान पहुंचाया है.

पत्र में 132 बुद्धिजीवियों ने हस्ताक्षर किए

खुले पत्र में 132 बुद्धिजीवियों ने हस्ताक्षर किया है. इसमें पद्धश्री प्रोफेसर मीनाक्षी जैन, आइएमए के पूर्व अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल, मेजर जनरल जीडी बख्शी, विभिन्न विवि के कुलपति, गीता फोगाट, योगेश्वर दत्त सहित अन्य नाम शामिल हैं.

आतंकवाद का समर्थन करने का आरोप

उन्होंने जम्मू-कश्मीर के इतिहास पर विदेशी लेखकों व प्रकाशकों की पुस्तकों का उल्लेख करते पुलित्जर पुरस्कार के चयनकर्ताओं को बताया कि किस तरह जम्मू-कश्मीर ऐतिहासिक रूप से भारत का हिस्सा रहा है और आजादी के बाद कानूनी तरीके से उसका भारत में विलय हुआ है. लेकिन पुरस्कार की घोषणा के साथ चयनकर्ताओं ने जानबूझकर ‘भारत ने संचार माध्यम को बंद कर वहां (कश्मीर) की स्वतंत्रता समाप्त कर दी’ यह लिखकर भारत की छवि को खराब करने की कोशिश की है. चयनकर्ताओं पर परोक्ष रूप से आतंकवाद को समर्थन देने का आरोप लगाते हुए उन्होंने लिखा कि ‘जो भी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अलगाववाद और पाकिस्तान के विभाजनकारी एजेंडा को समर्थन देता है, वह आतंकवाद को भी समर्थन देता है.’

May 11th 2020, 1:33 pm

मीम-भीम की कच्ची डोर पर सवाल उठाता हैदराबाद दुष्कर्म

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शिवा पंचकरण

धर्मशाला.

6 मई तेलंगाना में असदुद्दीन ओवेसी की पार्टी AIMIM [आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुलमुस्लिमीन] के कार्यकर्ता शकील अहमद द्वारा एक 16 साल की नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म किया गया था. हैदराबाद मालकपेट विधानसभा के इसी इलाके से AIMIM के अहमद बिन अब्दुल्लाह विधायक हैं. शकील अहमद कमला नगर इलाके में पीड़िता का पड़ोसी भी है. दुष्कर्म के बाद शकील खान ने नाबालिग लड़की को डरा धमका कर ये बात किसी को भी ना बताने के लिए कहा था. लेकिन पीड़िता ने सारी बात अपने परिवार को बताई, जिनके द्वारा ये सारी सूचना नजदीकी पुलिस स्टेशन पर दी गयी. पीड़िता अपने माता-पिता को बचपन में ही खो चुकी है और वर्तमान में अपने दादा-दादी के साथ रहती है. उसका एक भाई भी है जो अलग शहर में रहता है. पीड़िता ने बताया AIMIM का कार्यकर्ता शकील खान उसे सामूहिक बलात्कार करने की धमकी भी देता था. सारे मामले का संज्ञान लेते हुए पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है. हैदराबाद ईस्ट जोन के डीसीपी M.Ramesh ने शकील का नाम बताये बिना ट्वीट किया है.

AIMIM के एक और विधायक अहमद बलाला ने तो शकील को अपनी पार्टी का कार्यकर्ता मानने से ही इनकार कर दिया. ट्विटर पर ऑल्ट न्यूज़ का लोगो लगाये एक फेक पोस्ट को रिट्वीट करते हुए उन्होंने कहा कि शकील का उनकी पार्टी से कोई सम्बन्ध नहीं है, जबकि ऑल्ट न्यूज़ ने ऐसे किसी भी तरह के फैक्ट चेक या खबर चलाने से इनकार कर दिया है.

इस काण्ड से मीडिया की भूमिका एक बार फिर कटघरे में आ गयी है. आतंकवादी या यूँ कहें शिक्षक रियाज़ नायकू की पसंद-नापसंद और उसकी कलाकारी की चर्चा करते हुए न थकने वाले सभी बड़े-बड़े मीडिया हाउस इस घटना पर खामोश हैं. दलित लोगों की चिंता करने वाले तथाकथित दलित आन्दोलनकारी भी इस घटना पर खामोश हैं. महिला हितों के लिए लड़ने वालों तक शायद इस बात की अभी जानकारी नहीं पहुंची है या शायद वह जामिया यूनिवर्सिटी की माहूर परवेज़, जिनके द्वारा भारतीय सेना का अपमान किया गया था, उसके अधिकारों के लिए इतना लड़ रही है कि पूरे देश में महिलाओं के साथ क्या हो रहा है, उसे उसकी जानकारी नहीं है. बात-बात पर इस्तीफे मांगने वाले बड़े-बड़े सेक्युलर नेता इस घटना पर पूरी तरह खामोश हैं और इस घटना को दबाने का प्रयत्न कर रहे हैं.

प्रतीत हो रहा है की भीम-मीम की एकता पर इस घटना ने एक बार फिर प्रश्न चिंह लगाया है. आखिर इस दुष्कर्म पर ख़ामोशी का कारण क्या है? संभव है कि इसके द्वारा न ही वोट बैंक में कोई बढ़ोतरी हो सकती है और ना ही कोई स्वार्थ पूरा हो सकता है. इसीलिए सभी सेक्युलर लोग इस घटना की लीपा-पोती में जुटे हुए हैं. मानवाधिकार और संविधान को बचाने वाले लोग क्या जल्द ही इसके लिए आन्दोलन करेंगे? ट्विटर, फेसबुक आदि इसी इंतज़ार में हैं कि कब 2-2 रूपए के हिसाब से दना-दन पोस्ट और ट्वीट किये जाएँगे. किन्तु हमारे आन्दोलनकारी इस मुद्दे पर खामोश हैं

इस पूरे मामले पर अभी तक ओवेसी बंधुओं से भी कोई ट्वीट या वार्तालाप देखने को नहीं मिला. सपा से कांग्रेस, कांग्रेस से बीजेपी और बीजेपी से निकाले जाने के बाद सीधा जेल में गये कुलदीप सेंगर के दोषों के कारण पूरी बीजेपी को आईना दिखाने वाला विपक्ष भी फिलहाल इस मुद्दे पर चुप है. पीड़िता की सहायता के लिए अभी कोई पार्टी या सामाजिक संगठन आगे नहीं आया है. हर तरफ से केवल ख़ामोशी ही ख़ामोशी पसरी है और न्याय भी अभी दूर है.

भारत में यह बार-बार देखने को मिलता है कि एक जमात निर्धारित एजेंडे के तहत सिर्फ कुछ ख़ास दोषों पर ही छाती कूटती है. बाकी सभी दोष उनकी नज़र में सेक्युलर हो जाते हैं. कठुआ के समय जिन लोगों ने एक दुष्कर्म को झूठी खबरों के आधार पर मंदिर से जोड़ दिया, वह सभी इस दुष्कर्म पर खामोश बैठे हैं. कैसे एक दुष्कर्म कम्युनल और सेक्युलर बन जाता है, ये पता भी नहीं लगता है. खैर पूरे मामले में आगे की राह क्या होगी, ये देखने वाली बात होगी. पुलिस ने आरोपी को पकड़ लिया है, अब आगे देखना होगा की क्या पीड़िता को इन्साफ मिल पाएगा? कौन उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेगा?

9 मई को इसी प्रकार की घटना राजस्थान में भी घटी है, जहाँ पर 4 मुस्लिम लोगों द्वारा एक नाबालिग हिन्दू लड़की के साथ दुष्कर्म किया गया. काफी दबाव पड़ने पर पुलिस द्वारा चारों आरोपियों पर मामला दर्ज किया गया है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मामला दर्ज होने के बाद प्रशासन और सगे सम्बन्धी पीड़िता के परिवार पर शिकायत वापिस लेने का दबाव बना रहे हैं. डॉक्टर द्वारा भी पीड़िता को इस मामले को कोर्ट के बाहर निपटाने को कहा गया है. पीड़िता के अनुसार चारों आरोपियों को सजा देने की बजाय उसे ही चरित्र प्रमाणपत्र दे रहे हैं. लेकिन ये खबर भी इतनी बड़ी नहीं बन पा रही है कि राष्ट्रीय पत्रिकाओं, अखबारों और बड़े-बड़े मीडिया हाउसे की स्क्रीन में एक कोना पा सके.

May 11th 2020, 1:14 pm

’झूठी भ्रामक सूचना’ के सहारे कांग्रेस की सियासत

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रविंद्र सिंह भड़वाल

धर्मशाला
आज दुनिया के 190 से ज्यादा देश कोरोना महामारी से जूझ रहे हैं. इनमें से कुछ देश गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. लगभग 137 करोड़ की आबादी वाले भारत में भी कोरोना लगातार अपने पैर पसारता जा रहा है. हालांकि शासन-प्रशासन के कड़े फैसलों और जनता द्वारा लॉकडाउन का जिम्मेदारी के साथ पालन करने से भारत में स्थिति अभी भी इतनी भयावह नहीं हुई है, जिसकी कुछ विशेषज्ञ कल्पना कर रहे थे. इस सबके बावजूद कई लोग चयनित घटनाओं या फर्जी सूचनाओं का इस्तेमाल करते हुए लोगों के मन में कोरोना के प्रति डर और अनिश्चितता का माहौल बनाने पर तुले हुए हैं. इस अभियान में कांग्रेस पार्टी भी लगातार सक्रिय है, जो संकट की इस घड़ी को भी वोट कमाने का एक अवसर मानते हुए सच-झूठ की राजनीति पर उतारू है. कोरोना से निपटने में देश को तैयार करने के बजाय इसकी ऊर्जा दिन-रात इसी रणनीति के क्रियान्वयन में खप रही है कि किस तरह से केंद्र सरकार के प्रयासों को कमतर करके दिखाया जाए. कांग्रेस की इस संकीर्ण राजनीति को कुछ उदाहरणों की सहायता से समझने की कोशिश करते हैं.

सबसे ज्यादा पीड़ित भारत, दुष्प्रचार की नाकाम कोशिश –

यह साबित करने के लिए कि भारत में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार किस तरह से कोरोना से निपटने में विफल हुई है, कांग्रेस पार्टी ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से एक ट्वीट किया. इसमें यह साबित करने का प्रयास किया गया कि किस तरह से भारत में कोविड-19 के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. यह ट्वीट जारी करते हुए कांग्रेस कहती है, ’प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिलकुल सही कहा था कि वह भारत को वर्ल्ड लीडर बनाएंगे. हालांकि उन्होंने यह कभी स्पष्ट नहीं किया कि वह भारत को वर्ल्ड लीडर किसमें बनाना चाहते थे.’ इस ट्वीट में एक चार्ट भी पोस्ट किया है कि, भारत कोरोना पॉजिटिव पीड़ितों की संख्या में किस तरह से आगे निकल गया है.

हालांकि कांग्रेस अपने फैलाए दुष्प्रचार में खुद ही फंस गई. अपनी बात को साबित करने के लिए इसने एक गलत चार्ट चुन लिया. इस चार्ट में यह दिखाने का प्रयास किया गया कि पाकिस्तान, इंडोनेशिया, सिंगापुर और जापान की तुलना में कोरोना संक्रमण का कहर भारत में ज्यादा है. यह एक निराधार तथ्य है कि दुनिया भर में कोरोना के मामले में भारत ’लीडर’ की भूमिका में है.

वर्ल्डमीटर्स वेबसाइट के अनुसार 13 लाख मामलों के साथ अमरीका इस मामले में ’वर्ल्ड लीडर’ बना हुआ है, जबकि भारत में केवल 60 हजार के करीब मामले सामने आए हैं. इसके अलावा 13 अन्य देशों में भारत से ज्यादा मामले सामने आए हैं, तो फिर भारत इस मामले में वर्ल्ड लीडर कैसे बन गया? दूसरी तरफ बड़ी आबादी वाले भारत में प्रति एक लाख लोगों में कोरोना संक्रमितों की संख्या बहुत कम है. प्रति लाख लोगों पर कोरोना संक्रमितों की संख्या भारत में 35.2, इंडोनेशिया में 45.21, जापान में 53.77, पाकिस्तान में 103.1 और सिंगापुर में 1292.58 है. इस लिहाज से कांग्रेस ने ट्वीट के साथ जिस चार्ट का उल्लेख किया था, वो भी झूठ साबित होता है. कांग्रेस ने केंद्र की मोदी सरकार को घेरने के लिए जो चक्रव्यूह रचा, अंततः वह खुद उसमें फंसती हुई नजर आ रही है. कोरोना संकट के समय सूचनाओं का इस कद्र दुष्प्रचार कोरोना से सरकार की लड़ाई को कमजोर करने के साथ-साथ जनता को भ्रमित करने वाला है.

आरोग्य सेतु ऐप पर अपुष्ट सवाल –

कोरोना वायरस का संक्रमण रोकने के लिए भारत सरकार ने आरोग्य सेतु ऐप को लॉन्च किया था. इस ऐप को अभी तक 9 करोड़ से अधिक लोग डाउनलोड कर चुके हैं. नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने दावा किया है कि कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव संबंधी जानकारी देने के लिए सरकार द्वारा जारी आरोग्य सेतु ऐप दुनिया में सबसे अधिक डाउनलोड होने वाली स्वास्थ्य सेवा ऐप बन गई है. इसकी लोकप्रियता और कार्यप्रणाली से प्रभावित होकर विश्व स्वास्थ्य संगठन भी जल्द ही आरोग्य सेतु जैसा ऐप लॉन्च करने जा रहा है, जिसमें वो सारी तकनीकी खासियतें होंगी, जो आरोग्य सेतु में हैं. भारत के अलावा फिलहाल ऑस्ट्रेलिया और यूनाइटेड किंगडम वायरस को ट्रेक करने वाला ऐप लॉन्च कर चुके हैं.

भारत सरकार ने कोरोना के खिलाफ अपनी अब तक की लड़ाई में जो सबसे कारगर कदम उठाए हैं, उनमें आरोग्य सेतु ऐप भी शामिल है. लेकिन राहुल गांधी ने बिना किसी प्रामाणिक साक्ष्य के इस ऐप पर सवाल उठाकर लोगों को भ्रमित करके लड़ाई को कमजोर करने का कार्य किया. राहुल गांधी ने कहा, ’आरोग्य सेतु ऐप एक जटिल निगरानी प्रणाली है, जो एक प्राइवेट ऑपरेटर के लिए आउटसोर्स है, जिसमें कोई संस्थागत निरीक्षण नहीं है. इससे गंभीर डेटा सुरक्षा और गोपनीयता संबंधी चिंताएं बढ़ती हैं. तकनीक हमें सुरक्षित रखने में मदद कर सकती है, लेकिन नागरिकों की सहमति के बिना उनको ट्रैक करने के लिए डर का फायदा नहीं उठाया जाना चाहिए.’

इस ऐप के प्रति लोगों में अविश्वास की भावना पैदा न हो, इसके लिए उनके इस निराधार आरोप का जवाब स्वयं केंद्रीय मंत्री को देना पड़ा. केंद्रीय संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आरोग्य सेतु ऐप को निजी ऑपरेटर को आउटसोर्स किए जाने को खारिज करते हुए कहा कि इसमें डाटा सुरक्षा की ठोस व्यवस्था है. केंद्रीय मंत्री ने अपने ट्वीट में कहा, श्रीमान गांधी, वक्त आ गया है कि आप अपना ट्वीट ऐसे लोगों को आउटसोर्स करना बंद कर दें, जिनको भारत की समझ ही नहीं है. उन्होंने कहा कि इस ऐप की दुनियाभर में सराहना की जा रही है, जिसे सरकार ने कोरोना वायरस से लड़ाई में एक महत्वपूर्ण हथियार बताया है.

मजदूरों से ट्रेन किराए का झूठ –

लॉकडाउन की वजह से दूसरे राज्यों में फंसे लोगों को घर वापस लाने के लिए विशेष ट्रेनें चलाई गईं. राज्यों की मांग पर केंद्र सरकार ने ट्रेन से मजदूरों और दूसरे लोगों को वापस लाने की अनुमति दी थी. इस प्रयास के तहत हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूर अपने राज्य वापस लौट रहे हैं. इस स्पेशल ट्रेन का किराया केंद्र और राज्य सरकार मिलकर वहन कर रही है. स्पेशल ट्रेन में घर जाने वाले मजदूरों को कोई किराया नहीं देना पड़ रहा है, साथ ही यात्रा की समयावधि के अनुसार श्रमिकों को भोजन पानी भी उपलब्ध करवाया जा रहा है. लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने यह कह कर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की कि पार्टी घर वापस जाने वाले मजदूरों का किराया वहन करेगी. कांग्रेस पार्टी ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से ट्वीट किया, ’कांग्रेस अध्यक्षा, श्रीमती सोनिया गांधी का बयान, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने यह निर्णय लिया है कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी की हर इकाई हर जरूरतमंद श्रमिक व कामगार के घर लौटने की रेल यात्रा का टिकट खर्च वहन करेगी व इस बारे जरूरी कदम उठाएगी.’
इसके बाद एंटोनियो माइनो गांधी के सुपुत्र राहुल गांधी ने मोर्चा संभाल लिया. उन्होंने ट्वीट करके पूछा, ’एक तरफ रेलवे दूसरे राज्यों में फंसे मजदूरों से टिकट का भाड़ा वसूल रही है, वहीं दूसरी तरफ रेल मंत्रालय पीएम केयर फंड में 151 करोड़ रुपए का चंदा दे रहा है. जरा ये गुत्थी सुलझाइए!’
सवाल उठता है कि जब इस ट्रेन में मजदूरों से कोई किराया नहीं लिया जा रहा है तो कांग्रेस ने इस तरह प्रोपगेंडा फैला कर लोगों को गुमराह करने का प्रयास क्यों किया? जबकि रेलवे ने भी साफ कहा था कि इस श्रमिक स्पेशल ट्रेन के लिए टिकट की बिक्री नहीं होगी, इसलिए टिकट खरीदने के लिए मजदूरों को स्टेशन आने की जरूरत नहीं है. इस ट्रेन से वही लोग यात्रा कर सकेंगे, जिनका राज्य सरकार के पास पंजीकरण होगा व वहां से रेलवे को नाम प्राप्त होंगे.

राजनीति करना नेताओं का धर्म है. उन्हें राजनीति करने की पूरी स्वतंत्रता है. लेकिन कोरोना महामारी को लेकर हमारे नेताओं, खासकर कांग्रेस द्वारा झूठ फैलाकर अपनी राजनीति चमकाना कहां तक जायज है. उन्हें इस बात का एहसास होना चाहिए कि टीआरपी को बेचैन मीडिया का एक हिस्सा उनके इस तरह के बयानों को तेजी से प्रसारित करेगा. इससे जनता में अराजकता पैदा होने का खतरा बना रहेगा. कोरोना के इस संकट में एक भी झूठी सूचना जनता में अतिरिक्त डर एवं चिंता का माहौल पैदा कर सकती है. अतः कांग्रेस को चाहिए कि वह इस समय किसी भी सूचना को शेयर करने से पहले उसकी प्रामाणिकता को भलीभांति परख ले. इससे जहां इसके विश्वसनीयता पर कोई आंच नहीं आएगी, वहीं गलत सूचना के प्रसार से लोगों में भय का माहौल पैदा होने से भी बचा जा सकता है.

May 11th 2020, 10:14 am
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