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25 मई / पुण्यतिथि – नव दधीचि : अनंत रामचंद्र गोखले जी

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नई दिल्ली. अनंत गोखले जी का जन्म 23.9.1918 को खंडवा (म.प्र.) में रामचंद्र गोखले जी के घर में हुआ. उस दिन अनंत चतुर्दशी (भाद्रपद शुक्ल 14) थी, इसी से उनका नाम अनंत रामचंद्र गोखले रखा गया. खंडवा में ‘गोखले बाड़ा’ के नाम से उनके पूर्वजों का विख्यात स्थान है. द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के पिताजी सदाशिव गोलवलकर जी जब खंडवा में अध्यापक थे, तब वे ‘गोखले बाड़ा’ में ही रहते थे. बालक माधव के जीवन की वह घटना प्रसिद्ध है, जब विद्यालय में निरीक्षण के समय वह बहुत बीमार था. फिर भी अध्यापकों के निर्देश पर उसके सहपाठी उसे चारपाई सहित उठाकर विद्यालय ले गये. क्योंकि सर्वाधिक मेधावी छात्र होने के कारण बाहर से आये निरीक्षकों को वही संतुष्ट कर सकते थे. यह घटना खंडवा की ही है.

गोखले जी जिन दिनों नागपुर में इंटर के छात्र थे, तब धंतोली सायं शाखा पर उन्होंने जाना प्रारम्भ किया. वहां साइंस कॉलेज, एग्रीकल्चर कॉलेज और मोरिस कॉलेज के छात्रावासों से बड़ी संख्या में छात्र आते थे. एक सितम्बर, 1938 को धंतोली शाखा पर ही गोखले जी ने प्रतिज्ञा ली. धंतोली शाखा पर उन दिनों औसत 130 तरुण, 100 बाल और 90 शिशु आते थे. अधिकतम उपस्थिति दिवस वाले दिन शाखा पर 370 तरुण आये थे. बिहार में क्षेत्र प्रचारक रहे मधुसूदन देव जी उस शाखा के मुख्य शिक्षक और मोरोपंत पिंगले के बड़े भाई गुणाकर मुले (दादा) कार्यवाह थे. शाखा में 24 गट (तरुणों के 12 और बालों के भी 12) थे.

पूज्य डॉ. हेडगेवार जी को स्मरण करते हुए गोखले जी ने बताया था कि फरवरी, 1939 में वे इंटर अंतिम वर्ष की प्रयोगात्मक परीक्षा की तैयारी कर रहे थे. तभी सूचना मिली कि डॉ. जी ने एक घंटे के अंदर सभी स्वयंसेवकों को रेशम बाग संघस्थान पर बुलाया है. आकस्मिक बुलावे का संदेश पाकर वे भी वहां पहुंच गये. डॉ. जी ने उन्हें देखकर कहा कि तुम्हें पूरी सूचना नहीं मिली. जिनकी परीक्षा है, उन्हें छोड़कर बाकी सब तरुणों को बुलाया था. इसलिये तुम वापस जाओ और परीक्षा दो. गोखले जी दौड़े और परीक्षा शुरू होने से दस मिनट पूर्व ही विद्यालय पहुंच गये. इस प्रकार डॉ. जी एक-एक स्वयंसेवक का ध्यान रखते थे.

प्रचारक जीवन के निश्चय की प्रेरणा देने वाला वह क्षण गोखले जी की आंखों में सदा जीवित रहता था. वे तरुणों के एक गट के गटनायक थे. डॉ. जी के देहांत के बाद वर्ष 1940 के दिसम्बर मास में नागपुर के अम्बाझरी तालाब के पास के मैदान में तरुण स्वयंसेवकों का तीन दिन का शिविर लगा था. अंतिम दिन के बौद्धिक में श्री गुरुजी ने आह्वान किया, ‘‘स्वर्गीय डॉ. साहब को आप सबने देखा है. उन्होंने कभी नहीं कहा, पर मैं कहता हूं. संघ कार्य के लिये अपने सम्पूर्ण जीवन को न्यौछावर करते हुए उनके जैसा परिश्रम करने की आवश्यकता है. अपनी पढ़ाई के बाद और कोई उद्योग, धन्धा, नौकरी न करते हुए घर से बाहर निकलो. सारे देश के कोने-कोने में संघ कार्य फैलाने के लिये चल पड़ो.’’

श्री गुरुजी के इस आह्वान ने तरुणों के अंतःकरण को छू लिया. उस समय धंतोली सायं शाखा में 12 गट और उनमें 24 गटनायक थे. वर्ष 1941-42 में इन 24 में से 18 कार्यकर्ता प्रचारक बने. गोखले जी भी उनमें से एक थे. उन्होंने एलएलबी प्रथम वर्ष की परीक्षा दे दी थी, पर गुरुजी ने कहा, ‘‘पढ़ाई बहुत हो गयी, अब प्रचारक बनो.’’ बस उस दिन के बाद गोखले जी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

गोखले जी को वर्ष 1942 में सर्वप्रथम उ.प्र. में कानपुर भेजा गया. वहां के संघचालक जी ने भाऊराव से एक प्रचारक की मांग की थी. यह भी कहा था कि उसका व्यय वे वहन करेंगे. कानपुर में पढ़ने वाले नागपुर के छात्र ही उस समय शाखा लगाते थे. आगे चलकर सुंदर सिंह भंडारी ने डीएवी कॉलेज का छात्रावास छोड़कर शहर में कमरा लिया और वहां शाखा लगायी. धीरे-धीरे कानपुर में तीन शाखाएं विधिवत चलने लगीं. प्रत्येक पर प्रायः 25-30 संख्या रहती थी. उस समय कार्यालय तो था नहीं, अतः नागपुर के कुछ छात्रों के साथ मिलकर छह रु. मासिक किराये पर एक कमरा लिया. शाखा खोलने के लिये वे उरई, उन्नाव, कन्नौज, फरुखाबाद, बांदा आदि भी जाते थे. पहले मास में प्रवास, भोजन आदि में उनके 6.75 रु. व्यय हुए. संघचालक जी ने स्पष्ट कह दिया कि वे प्रतिमास पांच रु. से अधिक नहीं दे सकते. इस पर गोखले जी ने अपने घर से 25 रु. मंगाये और उससे साल भर काम चलाया.

विभाजन से पूर्व काशी और भरतपुर में संघ शिक्षा वर्ग लगे थे. भरतपुर के वर्ग में गोखले जी मुख्यशिक्षक थे. वहां केन्द्रीय अधिकारी के नाते तत्कालीन सरकार्यवाह मा. अप्पा जी आये थे. उन्होंने ऐसे स्वयंसेवकों की बैठक ली, जो वर्ग के बाद प्रचारक बन सकते थे. वह बैठक इतनी प्रभावी थी कि अकेले कानपुर नगर से आये शिक्षार्थियों में से 42 शिक्षार्थी प्रचारक बने. इनमें अधिकांश स्नातक और स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके थे. वर्ष 1948-49 के प्रतिबंध काल में प्रत्यक्ष शाखा लगाना संभव नहीं था. अतः मई-जून के अवकाश में बहुत बड़ी संख्या में छात्रों को ग्रामीण क्षेत्र में ‘साक्षरता प्रसार’ के लिये भेजा गया. इसके लिये अनेक सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों ने भी शुभकामना दी. अतः इन विद्यार्थी विस्तारकों को काम करने में कोई कठिनाई नहीं हुई. कानपुर नगर से 150 छात्र इसके लिये गये.

तब तक ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ की स्थापना हो चुकी थी. ये सब छात्र विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता बन कर गांवों में गये थे. इन छात्रों ने साक्षरता प्रसार के लिये सभी तरह के लोगों से सम्पर्क किया. बच्चों को खेलकूद कराये. बुजुर्गों के लिये भजन मंडलियां चलायीं. इस प्रकार एक घंटे के यह ‘साक्षरता वर्ग’ चलते थे. प्रतिबंध हटने के बाद यही खेलकूद और भजन केन्द्र शाखा में बदल गये. इस प्रकार प्रतिबंध काल की विपरीत परिस्थिति का भी बुद्धिमत्तापूर्वक संघ कार्य के विस्तार में उपयोग कर लिया गया.

गोखले जी वर्ष 1942 से 1951 तक कानपुर, फिर 1954 तक लखनऊ, 1955 से 58 तक कटक (उड़ीसा), 1959-73 तक दिल्ली में रहे. वर्ष 1974-75 के प्रतिबंध काल में उनका केन्द्र नागपुर रहा. उस समय उन पर मध्यभारत, महाकौशल और विदर्भ का काम था. प्रतिबंध समाप्ति के बाद कुछ समय इंदौर केन्द्र बनाकर मध्य भारत प्रांत का काम संभाला. वर्ष 1978 में वे फिर उ.प्र. में आ गये और जयगोपाल जी (प्रांत प्रचारक) के साथ पूर्वी उ.प्र. में सहप्रांत प्रचारक के नाते कार्य किया.

वर्ष 1998 में प्रवास संबंधी कठिनाइयां होने पर उन्हें लोकहित प्रकाशन, लखनऊ के माध्यम से पुस्तक प्रकाशन का कार्य दिया गया. वर्ष 2002 तक उन्होंने यह काम संभाला. इस दौरान 125 नयी पुस्तकें तैयार करायीं. उनके लिए सामग्री जुटाना, लेखक ढूंढकर उससे लिखवाना, फिर उसे सुसज्जित कर छपवाना.., यह सब कार्य बहुत तन्मयता से उन्होंने किया. वर्ष 2002 में स्वास्थ्य संबंधी कारणों से सब दायित्वों से मुक्ति लेकर वे लखनऊ में ‘भारती भवन’ वाले कार्यालय में रहने लगे.

जब तक उनके शरीर ने साथ दिया, वे ‘भारती भवन’ की फुलवाड़ी की सिंचाई और गुड़ाई स्वयं करते थे. प्रातः शाखा में भी पूरे समय वे उपस्थित रहते थे. आग्रहपूर्वक वे अपने कमरे की सफाई से लेकर कपड़े आदि भी स्वयं धोते थे. जीवन के संध्याकाल में उन्हें इस बात पर गर्व था कि उन्होंने लगातार 60 साल तक सक्रिय प्रवासी जीवन बिताया. कुछ समय पूर्व तक वे प्रतिवर्ष साल में एक बार, विजयादशमी से पूर्व चार-पांच दिन के लिये अपने घर (खंडवा) जाते थे.

वर्ष 1991 में उनके परिवार की पुश्तैनी सम्पत्ति का बंटवारा हुआ. उनके हिस्से में स्टेशन के पास की डेढ़ एकड़ जमीन आयी. गोखले जी ने वह संघ को दे दी. तब उसका सरकारी मूल्य 47,20,500 रु. था. वहां संघ कार्यालय बने, यह सबकी इच्छा थी, पर पैसा नहीं था. कुछ साल बाद प्रशासन ने वहां पुल बनाने का निर्णय लिया. उसमें जमीन का 40 प्रतिशत भाग अधिग्रहीत कर उसका 19 लाख रु. मुआवजा दिया गया. उस पैसे से संघ कार्यालय बनाया गया. उसका नाम रखा गया है ‘शिवनेरी’. शिवनेरी पुणे के पास उस दुर्ग का नाम है, जहां शिवाजी का जन्म हुआ था. वहां एक इंटर कॉलेज भी चलता है, जिसमें दो पालियों में 2,500 छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं. डॉ. जी एवं श्री गुरुजी के सान्निध्य से पावन हुए, सैकड़ों प्रचारकों और हजारों स्थानीय कार्यकर्ताओं के निर्माता, श्री अनंत रामचंद्र गोखले का 25 मई, 2014 (ज्येष्ठ कृष्ण 12, रविवार) को प्रातः निधन हो गया. उनकी स्मृति को पावन प्रणाम..

May 24th 2019, 5:36 pm

24 मई / पुण्यतिथि – आतंकवाद में दृढ़ चट्टान विश्वनाथ जी

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नई दिल्ली. अस्सी के दशक में जब पंजाब में आतंकवाद अपने चरम पर था, उन दिनों बड़ी संख्या में लोग पंजाब छोड़कर अन्य प्रान्तों में जा बसे थे. ऐसे में पंजाब प्रान्त प्रचारक विश्वनाथ जी ने सबको हिम्मत से वहीं डटे रहने का आग्रह किया. वे स्वयं साहसपूर्वक गाँव-गाँव घूमे और स्वयंसेवकों तथा सामान्य नागरिकों का उत्साह बढ़ाया. विश्वनाथ जी का जन्म 1925 में अमृतसर के पास सिख पन्थ के तीसरे गुरु श्री अमरदास जी द्वारा स्थापित श्री गोइन्दवाल साहिब में हुआ था. विश्वनाथ जी ने अमृतसर के खालसा कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की. छात्र जीवन में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आ गये थे.

उन दिनों देश विभाजन की चर्चा सर्वत्र होती रहती थी. पंजाब के सिर पर संकट प्रत्यक्ष मंडरा रहा था. लोगों की आशा का केन्द्र केवल संघ शाखा पर आने वाले नवयुवक ही थे. विश्वनाथ जी अपनी पूरी शक्ति से संघ कार्य के विस्तार में लग गये. ऐसे में घर वालों का नाराज होना स्वाभाविक ही था. वे प्रायः रात को देर से लौटते थे. एक बार बहुत देर होने पर घर वालों ने दरवाजा नहीं खोला. बस, उसी दिन विश्वनाथ जी ने केवल और केवल संघ कार्य करने का निर्णय ले लिया और 1945 में बी.ए. की पढ़ाई पूरी कर प्रचारक बन गये. उन्होंने 1944, 45 और फिर 46 में प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय वर्ष का संघ प्रशिक्षण लिया.

सर्वप्रथम उन्हें मिण्टगुमरी जिले की बाँसपत्तन तहसील (वर्तमान पाकिस्तान) में काम करने भेजा गया. वहाँ का माहौल तो और भी खराब था. मुस्लिम गुंडे खुलेआम पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाकर हिन्दुओं को लूट रहे थे. ऐसे में विश्वनाथ जी ने हिन्दू युवकों की टोली बनाकर उन्हें मुँहतोड़ जवाब दिया. सन् 1947 में देश का विभाजन होने पर उधर से हिन्दुओं को सुरक्षित निकालने तथा उन्हें पुनस्र्थापित करने के काम में विश्वनाथ जी जुट गये.

सन् 1948 में संघ पर प्रतिबन्ध लगा. पूरे देश में इसके विरुद्ध सत्याग्रह हुआ, पर पंजाब में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति समर्थन इतना अधिक था कि शासन सत्याग्रहियों को गिरफ्तार ही नहीं करता था. अतः विश्वनाथ जी ने वहाँ के स्वयंसेवकों को दिल्ली भेजा और स्वयं भी दिल्ली में गिरफ्तारी दी. प्रतिबन्ध उठने पर वे लुधियाना, फिरोजपुर और हिसार में जिला प्रचारक तथा फिर अमृतसर में विभाग प्रचारक रहे. सन् 1971 में उन्हें दिल्ली तथा 1978 में पंजाब का प्रान्त प्रचारक बनाया गया.

पंजाब में उन्होंने स्वयंसेवकों तथा अन्य हिन्दू नागरिकों को विदेश प्रेरित आतंक के विरुद्ध बलिदान के लिए तैयार रहने को प्रेरित किया. उन दिनों शाखाओं पर भी हमले हुए, पर विश्वनाथ जी ने धैर्य रखा और कार्यकर्ताओं को उत्तेजित नहीं होने दिया. इस कारण पंजाब में गृहयुद्ध नहीं हो सका. इससे आतंकियों को संचालित करने वाले उनके विदेशी आका बहुत निराश हुए.

पंजाब में संघ को हिन्दी समर्थक माना जाता है, पर विश्वनाथ जी वार्तालाप, बैठक, बौद्धिक आदि में पंजाबी भाषा का ही प्रयोग करते थे. इससे बड़ी संख्या में सिक्ख भी संघ से जुड़े. सन् 1990 में उन्हें दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल तथा जम्मू-कश्मीर (उत्तर क्षेत्र) का काम दिया गया.

वर्ष 2001 से 2006 तक ‘धर्म जागरण विभाग’ के प्रमुख के नाते उन्होंने देश भर में प्रवास किया. अनेक रोगों के कारण जब उन्हें प्रवास में कठिनाई होने लगी, तो उन्होंने सब जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अमृतसर कार्यालय पर रहना पसन्द किया. जीवन भर दैनिक शाखा के प्रति आग्रही रहे विश्वनाथ जी का 24 मई, 2007 की प्रातः अमृतसर कार्यालय पर ही देहान्त हुआ.

May 24th 2019, 4:16 am

भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए आनंद का दिन है – डॉ. मनमोहन वैद्य

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यह चुनाव भारत की दो भिन्न अवधारणाओं (Idea of Bharat) के बीच था. एक तरफ भारत की प्राचीन अध्यात्म आधारित एकात्म (Integral), सर्वांगीण (Holistic) और सर्वसमावेशक (All inclusive) जीवनदृष्टि या चिंतन है. जिसे दुनिया में हिन्दू जीवन दृष्टि या हिन्दू चिंतन के नाम से जाना जाता रहा है.

दूसरी ओर वह अभारतीय दृष्टि थी जो भारत को अनेक अस्मिताओं में (identities) बाँट कर देखती रही है. और अपने निहित स्वार्थ के लिए समाज को जाति, भाषा, प्रदेश या उपासना पंथ (religion) के नाम पर बाँटने का काम करती रही है. इस exclusion और बाँटने की राजनीति करने वालों ने हमेशा समाज को जोड़ने वाली, एकात्म दृष्टि से देखने वाली शक्ति का विरोध ही किया है. और इस के बारे में तरह तरह के आधारहीन, झूठे आरोप लगाकर ग़लतफ़हमी निर्माण करने का प्रयास किया है.

स्वतंत्रता के साथ ही चल रही यह वैचारिक लड़ाई अभी एक निर्णायक मोड़ पर आ पहुँची है. यह चुनाव इस लड़ाई का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है. समाज एक होने लगा, तो बाँट कर राजनीति करने वालों का धरातल खिसकने लगा. इसलिए सब बाँटने वालों ने इकट्ठे आ कर, एक दूसरे का साथ देकर इस जोड़ने वाली शक्ति का सामना करने का प्रयास किया.

भारत की सुविज्ञ, बुद्धिमान जनता ने जोड़ने वाले, सर्वसमावेशक भारत का समर्थन कर सभी के विकास के सूत्र को विजयी बनाया है. भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए अत्यंत आश्वासक और आनंद का यह  दिन है. भारत की जनता इसके लिए बधाई की पात्र है. इस वैचारिक लड़ाई में भारत के पक्ष के मज़बूत नेतृत्व का और सभी कार्यकर्ताओं का हार्दिक अभिनंदन.

डॉ. मनमोहन वैद्य

सह सरकार्यवाह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

 

May 23rd 2019, 9:36 am

एक बार पुनः स्थिर सरकार देश को मिली है

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एक बार पुनः स्थिर सरकार देश को मिली है, यह करोड़ों भारतीयों का भाग्य है. यह राष्ट्रीय शक्तियों की विजय है.

लोकतंत्र की इस विजय की यात्रा में जिन जिनका योगदान रहा उन सभी का अभिनंदन. लोकतंत्र का आदर्श विश्व के सम्मुख एक बार पुनः प्रस्तुत हुआ है.

हम विश्वास व्यक्त करते हैं कि नूतन सरकार जन सामान्यों की भाव – भावनाओं के साथ ही इच्छा – आकांक्षाओं को भी पूर्ण करने में सफल सिद्ध होगी.

सम्पन्न निर्वाचन प्रक्रिया के साथ ही समस्त कटुताएं समाप्त हों और विनम्रता के साथ व्यक्त जन भावनाओं का स्वागत हो.

– भय्याजी जोशी

सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

 

May 23rd 2019, 7:36 am

अंतर्बाह्य शुचिता व ध्येय के प्रति प्रतिबद्धता, यही इस वर्ग का सार है – भय्याजी जोशी

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संघ शिक्षा वर्ग - तृतीय वर्ष का नागपुर में शुभारम्भ नागपुर (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, संघ शिक्षा वर्ग - तृतीय वर्ष का शुभारंभ ‌नागपुर रेशिमबाग स्थित डॉ. हेडगेवार स्मृति भवन परिसर के महर्षि व्यास सभागृह में हुआ. उद्घाटन समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह भय्याजी जोशी जी ने देशभर के सभी प्रान्तों से आए शिक्षार्थियों को उद्बोधित करते हुए कहा कि ‘संघ शिक्षा वर्ग - तृतीय वर्ष’, यह अपने जीवन का एक सुनहरा अवसर है. हम सब यहाँ चयनित कार्यकर्ता हैं. इस वर्ग में शारीरिक, बौद्धिक शिक्षा के साथ साथ स्वयं का आत्म मंथन भी जरूरी है. जितना आत्म मंथन हम करेंगे, उतने ही हम उन्नत होंगे. राष्ट्र के उन्नति के लिये “दृष्टि की व्यापकता” आवश्यक होती है. ‘अखिल भारतीय दृष्टि’ होना और ‘अखिल भारतीयता’ की अनुभूति होना, यह दो भिन्न बातें हैं. स्वयंसेवक होने से ‘अखिल भारतीय दृष्टि’ तो हमें प्राप्त होती ही है. पर, इस वर्ग में आपको ‘अखिल भारतीयता’ की अनुभूति होगी और इससे आपकी ‘अखिल भारतीय दृष्टि’ में व्यापकता भी आएगी. भय्याजी जी ने शिक्षण की प्रक्रिया को समझाते हुए कहा  कि जो सुना उसको समझना, उसका आंकलन होना आवश्यक है. जिसका आंकलन हुआ, उसको मन से स्वीकार करना और जिसको मन से स्वीकृत किया, उसको आचरण में लाना यह आवश्यक है. जीवन में अंतर्बाह्य शुचिता, ध्येय के प्रति प्रतिबद्धता एवं तृतीय वर्ष के बाद जीवन भर सक्रिय रहकर कार्य करना, यही इस शिक्षा वर्ग का सार है. सरकार्यवाह जी ने तृतीय वर्ष शिक्षा वर्ग के अधिकारियों का परिचय करवाया. समारोह के प्रारंभ में अखिल भारतीय सह सरकार्यवाह भागय्या जी ने उपस्थित अन्य अधिकारियों का परिचय करवाया. वर्ग में 828 प्रशिक्षार्थी सम्मिलित हुए हैं. वर्ग का समापन 16 जून 2019 को होगा. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघसंघ शिक्षा वर्ग - तृतीय वर्ष अधिकारी परिचय मा. सर्वाधिकारी - अनिरुद्ध जी देशपांडे (अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख) कार्यवाह - भारत भूषण जी (दिल्ली प्रान्त कार्यवाह) पालक अधिकारी - जगदीश प्रसाद जी (अखिल भारतीय सह शारीरिक प्रमुख) मुख्य शिक्षक - गंगाराजीव जी पांडेय  (प्रांत शारीरिक प्रमुख, महाकौशल प्रांत) सह मुख्य शिक्षक - के प्रशांत जी (कन्नूर विभाग प्रचारक, केरल प्रांत) बौद्धिक प्रमुख – कृष्णा जी जोशी (प्रांत बौद्धिक प्रमुख, उत्तर कर्नाटक प्रांत) सह बौद्धिक प्रमुख - सुरेश कपिल जी (प्रान्त बौद्धिक प्रमुख, हिमाचल प्रांत) सेवा प्रमुख - डॉ. उपेंद्र जी कुलकर्णी (पश्चिम क्षेत्र सेवा प्रमुख) व्यवस्था प्रमुख - रवींद्र जी मैत्रे (नंदनवन भाग कार्यवाह, नागपुर महानगर)

May 23rd 2019, 3:59 am

मेडिकल शोध, आयातित सिंथेटिक विटामिनों से फायदे की बजाय नुकसान होगा – स्वदेशी जागरण मंच

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मुंबई. “स्वदेशी जागरण मंच” के अखिल भारतीय संगठक कश्मीरी लाल जी ने मुम्बई में पत्रकारों से चर्चा में बताया कि 08, 09 जून 2019 को पूना में “अखिल भारतीय राष्ट्रीय परिषद” की बैठक आयोजित होने वाली है, जिसमें आगामी कार्यक्रमों की घोषणा की जाएगी. नई सरकार के गठन के बाद निम्न चुनौतियों के बारे में सरकार से भी चर्चा की जाएगी……

लगभग दो दशक से सबसे तेज अर्थव्यवस्था, ‘मैन्युफैक्चरिंग हब’ एवं जिस चीन के मॉडल को दुनिया के कई देश एक आदर्श के रूप में मान रहे थे, आज वह गिरावट पर है. उसकी जीडीपी ग्रोथ घट रही है. विदेशी व्यापार में धीमेपन के कारण विदेशी मुद्रा भंडार घटकर चार हजार अरब डॉलर से अब तीन हजार अरब डॉलर रह गया है. चीन की कई कंपनियां बंद हो चुकी हैं. पिछले साल चीन के निर्यात में भी 4.4 प्रतिशत की भारी कमी आई है. कई देशों में अब चीनी आयात पर आयात शुल्क बढ़ाकर उनको रोका जा रहा है.

अप्रैल 2018 से दिसंबर 2018 के बीच चीन द्वारा भारत को किये जाने वाले निर्यात में पिछले वर्ष की तुलना में 6.6 अरब डॉलर की कमी आई, और पूरे  एक वर्ष में 10 अरब डॉलर का हमारा व्यापार घाटा चीन से कम  हुआ है. इधर, अमरीका के साथ भी व्यापार युद्ध भी भारत के हित में और चीन के विरुद्ध जाता है.

“स्वदेशी जागरण मंच” का मानना है कि ऐसे में जनता, व्यापार जगत व आगामी सरकार चीनी आयातों के विरुद्ध एकजुट होकर डट जाती है, तो बड़े सुखद परिणाम नज़र आएंगे. मंच कई प्रकार के जनजागरण कार्यक्रम इस दृष्टि से पहले की भांति नियोजित करने वाला है.

गुजरात में बहुराष्ट्रीय कंपनी पेप्सिको ने कुछ आलू किसानों पर 1 करोड़ रुपये से ज्यादा के मुआवजे का मुकदमा ठोक दिया था. कंपनी का आरोप था कि किसानों ने उसके कॉपीराइट वाली खास किस्म के आलू, एफसी-5 टाइप, का उत्पादन किया है. स्वदेशी जागरण मंच, किसान संगठनों, सोशल मीडिया और राजनीतिक दबाव के बाद पेप्सिको ने किसानों  पर बिना शर्त मुकदमा वापिस ले लिया है. यद्यपि कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में बीज का पेटेंट हो ही नहीं सकता, यह घटना साबित करती है कि उदारीकरण के दौर में देश की खेती-किसानी को किस तरह की चुनौती मिलने वाली है. अतः आर्गेनिक खेती, मोनसैंटो के जीएम सीड्स से सुरक्षा व किसानों के अधिकारों की रक्षा की बहुत आवश्यकता दिखाई देती है. “स्वदेशी जागरण मंच” इस लड़ाई को आगे बढ़ाने वाला है.

गत वर्ष महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने 24 अगस्त को भोजन में फोर्टिफिकेशन को लेकर राष्ट्रीय परामर्श का आयोजन किया था. यानी फोर्टिफिकेशन से कुछ सूक्ष्म पोषक तत्वों के सस्ते विकल्प ढूंढे जाएंगे. उदाहरण के लिए विटामिन डी को जानवरों से प्राप्त किया जाता है. हमारा मानना है कि इस फैसले से लाखों गरीब भारतीयों की जिंदगी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. मंच का दावा है कि फूड फोर्टिफिकेशन के लिए इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक और कच्चे माल के आयात से अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.

प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में जागरण मंच का कहना है कि फूड फोर्टिफिकेशन को लेकर फूड इंडस्ट्री के अपने हित हैं और उनका आम आदमी के स्वास्थ्य का इन फैसलों से कोई लेना-देना नहीं है. हमारा मानना है कि इसमें टाटा ट्रस्ट, ग्लोबल अलायंस फॉर इंप्रूव्ड न्यूट्रिशियन (गेन), बिल एंड मिंलिडा गेट्स फाउंडेशन, क्लिंटन हेल्थ इनिशिएटिव, फूड फोर्टिफिकेशन इनिशिएटिव एंड न्यूट्रिशनल इंटरनेशनल और इंटरनेशनल लाइफ सांइसेज इंस्टीट्यूट जैसे संस्थानों और कंपनियों के अपने निजी हित शामिल हैं.

वैसे ही मंच का कहना है कि इस बात को जांचने का कोई तरीका नहीं है, जिसमें किसी व्यक्ति को फोर्टिफिकेशन से होने वाले नुकसानों का पता लगाया जा सके. मंच का कहना है कि अनीमिया मुक्त कार्यक्रम के तहत आयरन सप्लीमेंट और विटामिन ए के ओवरडोज़ से नुकसान होने की आशंका है.

मंच ने चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि वास्तविक खाने की बजाय फोर्टिफिकेशन फूड को जरूरी बनाने से छोटी कंपनियों को नुकसान पहुंचेगा. साथ ही फोर्टिफिकेशन को आवश्यक बनाने से किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकार प्रभावित होंगे और वह अपनी मनमर्जी से भोजन नहीं खा पाएगा.

मंच का कहना है कि मेडिकल शोध पत्रों के मुताबिक खाद्य पदार्थों में आयातित सिंथेटिक विटामिनों से जनता की सेहत को फायदा पहुंचने की बजाय नुकसान पहुंचेगा.

“स्वदेशी जागरण मंच” ने अपील की है कि प्रधानमंत्री कार्यालय इसमें दखल दे और जब तक सभी मुद्दों का हल नहीं निकल जाता, तब तक कोई फैसला नहीं लिया जाए. चाहे प्रधानमंत्री ने इस पत्र का संज्ञान लेते हुए कार्रवाई का भरोसा दिया है, परंतु इस विषय पर जनजागरण की महती आवश्यकता है.

स्वदेशी जागरण मंच पूरे देश में स्वरोजगार, विषमुक्त आहार व पर्यावरण रक्षण एवं पारिवारिक संस्कार पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर रहा है, और अपनी पूना बैठक में आगामी व्यूहरचना तैयार करेगा.

May 21st 2019, 1:21 pm

नारद जी लोककल्याण के लिए निष्पक्षता के साथ सूचनाओं को प्रसारित करते थे

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रांची. प्रेस क्लब सभागार में सोमवार को झारखंड स्टेट जर्नलिस्ट यूनियन द्वारा नारद जयंती समारोह का आयोजन किया गया. मुख्य अतिथि प्रतिष्ठित पत्रकार पद्मश्री बलबीर दत्त तथा आकाशवाणी के पूर्व उपनिदेशक नीरज नाथ पाठक थे.

पद्मश्री बलबीर दत्त ने कार्यक्रम में उपस्थित युवा पत्रकारों से कहा कि नारद जी से हम पत्रकारिता के कई गुण सीख सकते हैं. नारद जी सभी लोकों में विचरण करते हुए खबरों एवं घटनाओं को एकत्र कर सभी जगहों पर प्रसारित करते थे और वह निष्पक्षता से लोक कल्याण के लिए यह काम करते थे. आज के युवा पत्रकारों को भी अपनी वृत्ति में समर्पण और परिश्रम पर ध्यान देना चाहिये. एक अच्छा पत्रकार बनने के लिये नारद जी की तरह ही लगातार अपडेट होते रहना चाहिये. अपने सामान्य ज्ञान को दुरूस्त रखना चाहिये. उन्हें सभी विषयों पर कुछ जानकारी रखने के अलावा किसी एक विषय पर अच्छी पकड़ रखनी चाहिये.

नीरज नाथ पाठक ने कहा कि भाषा पर हमारी जितनी पकड़ बनती है, हमें उतने ही कम शब्‍दों की आवश्‍यकता होती है और छोटे वाक्‍यों में ही अपनी बात कह सकते हैं. उन्‍होंने नारद जी के शिष्‍य नचिकेता के प्रसंग की भी चर्चा की.

झारखंड जर्नलिस्‍ट यूनियन के अध्‍यक्ष बलदेव शर्मा ने कहा कि आज हम नारद जयंती मना रहे हैं. भविष्य में अधिक भव्‍य तरीके से जयंती मनाएंगे. नारद जी आदि पत्रकार थे और बिना किसी स्‍वार्थ के खबरों का सत्‍यता के साथ संचार करते थे. हम पत्रकारों का भी यही उद्देश्‍य होना चाहिये कि पत्रकारिता को सत्‍य व निष्‍पक्षता के साथ करें.

कार्यक्रम का संचालन यूनियन के महासचिव एनके मुरलीधर ने किया और धन्‍यवाद ज्ञापन यूनियन के उपाध्‍यक्ष मनोज शर्मा ने किया.

May 21st 2019, 12:04 pm

समाज व राष्ट्र हित की पत्रकारिता युगधर्म – रमेश शुक्ला

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उदयपुर (विसंकें). रमेश शुक्ला ने कहा कि समाज हित व राष्ट्र हित की पत्रकारिता युगधर्म है. पत्रकार समाज का दर्पण है. वह अपने समाचारों से समाज एवं राष्ट्र की संस्कृति के अनुरूप समाचार लिख समाज को दिशा देने का काम करता है.

वे विश्व संवाद केन्द्र, उदयपुर द्वारा नारद जयंती के उपलक्ष्य में “वर्तमान परिदृश्य में पत्रकारिता की चुनौतियां व समाधान” विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी – परिचर्चा में बोल रहे थे.

उन्होंने कहा कि पत्रकार के समक्ष कितनी भी चुनौतियां आएं, वह अपना धर्म न भूले. युगानुकूल पत्रकारिता एवं दवर्षि नारद का उद्धरण देते हुए देवासुर संग्राम में उनकी भूमिका का चित्रण कर कहा कि नारद जी ने कैसे देवताओं तथा असुरों दोनों से संवाद रखते हुए जितनी आवश्यकता थी, उतनी ही बात उस पक्ष को बताई. वर्तमान में पत्रकारिता एक पेशा है, व्यवसाय है,  ऐसे में पत्रकार के समक्ष अपने व्यवसाय तथा समाज के प्रति जिम्मेदारी पूर्वक पत्रकारिता करना एक चुनौति पूर्ण कार्य है.

गोष्ठी में विभिन्न समाचार समूहों के पत्रकार, स्वतंत्र पत्रकार व डिजिटल मीडिया के पत्रकारों ने वर्तमान परिदृश्य में पत्रकारिता की चुनौतियां व समाधान विषय पर विचार रखे, कहा कि परिवारों में युवाओं में समाचार पत्र पत्रिकाएं, एवं सद्साहित्य पढ़ने का रूझान कम होता जा रहा है. जिससे वे सम-सामयिक घटनाओं की जानकारी से अछूते रहते हैं.

सरोज कुमार ने कहा कि युवाओं का सोशल मीडिया की तरफ बहुत ज्यादा रूझान व समय देने से वे कई बार मिथ्या एवं अपूर्ण जानकारी को सच मानते है और यह उनके चरित्र पर नकारात्मक प्रभाव छोड़ता है. समाचार पत्रों का वाचन प्रतियोगी परीक्षाओं में सामान्य ज्ञान विषय के लिए बहुत ही उपयोगी है.

इससे वरिष्ठ पत्रकार हेमेन्द्र श्रीमाली, भरत मिश्रा, रमेश शुक्ला, कमल प्रकाश रोहिला ने गोष्ठी का शुभारम्भ देवर्षि नारद के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन कर किया. कमल प्रकाश रोहिल्ला ने बताया कि पत्रकार सम्मान समारोह का आयोजन भी जल्द किया जाएगा.

May 21st 2019, 12:44 am

मीडिया को अपने सामर्थ्य का समाजहित में उपयोग करना आवश्यक – विजय कुवलेकर

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मुंबई (विसंकें). झी24 तास व झी मराठी दिशा के प्रमुख संपादक विजय कुवलेकर ने कहा कि विश्वसनीयता, राष्ट्र निर्माण की नींव है. लेकिन, आज मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न निर्माण हो रहा है. तथापि, मीडिया को अपने सामर्थ्य का उपयोग समाजहित में, राष्ट्रहित में करना आवश्यक है. इसी से विश्वसनीयता का निर्माण होगा और यही हमारे अस्तित्व का आधार है. वे विश्व संवाद केंद्र मुंबई द्वारा आयोजित देवर्षि नारद पत्रकारिता सम्मान समारोह में संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि जीवन के सभी क्षेत्रो में विवेक समाप्त होते दिखाई दे रहा है. विश्वसनीयता हमारे जीवन का आधार है, इसे हमेशा ध्यान में रखना आवश्यक है. समाचार के अंतिम सत्य तक हम पहुंच रहे हैं या नहीं, यह अधिक महत्वपूर्ण है. समाज को क्या आवश्यक है, उसे क्या देना आवश्यक है, इसका विचार हर पत्रकार को करना चाहिए. अच्छाई और बुराई में से किसे चुनना है, यह पत्रकारों को ध्यान में रखना आवश्यक है. आज सार्वजनिक जीवन में विवेक छूटता जा रहा है. व्यक्तियों के मन में संदेह निर्माण होना निश्चित ही क्लेष कारक है. पत्रकार के रूप में हम अगर कोई भूमिका लेते हैं, तब उसमें शुद्धता होना अत्यावश्यक है.

थिंक महाराष्ट्र डॉट कॉम के संपादक दिकर गांगल, विश्व संवाद केंद्र के अध्यक्ष सुधीर जोगलेकर, विश्व संवाद केंद्र के कार्यवाह मोहन ढवलीकर, वेलिंगकर इन्स्टिट्यूट के समूह संचालक डॉ. उदय सालुंखे मंच पर उपस्थित थे.

समारोह में दै. कृषिवल के प्रमुख संपादक प्रसाद केरकर को देवर्षि नारद ज्येष्ठ पत्रकार सम्मान, दै. लोकसत्ता के वरिष्ठ उपसंपादक पंकज भोंसले और दै. मुंबई तरुण भारत के वरिष्ठ उपसंपादक निमेश वहालकर को पत्रकारिता में विशेष योगदान के लिये, टीवी9 मराठी वृत्त वाहिनी की संपादक निखिला म्हात्रे को महिला पत्रकार सम्मान, इलेक्ट्रॉनिक और ब्रॉडकास्टिंग मीडिया में योगदान के लिये झी २४ तास के अमित जोशी को, वृत्तपत्र छायाचित्रकार श्रेणी में दै. मुंबई मिरर के सचिन हरळकर को देवर्षि नारद सम्मान 2019 से सम्मानित किया गया. सोशल मीडिया और ब्लॉगिंग के लिये सोमेश कोलगे को सम्मानित किया गया.

थिंक महाराष्ट्र डॉट कॉम के संपादक दिनकर गांगल ने कहा कि सोशल मीडिया की वजह से आज विश्वसनीयता नष्ट हो रही है. योग्य क्या है और अयोग्य क्या है, ये समझना मुश्किल हो रहा है.

विश्व संवाद केंद्र, मुंबई द्वरा आयोजित पत्र लेखन स्पर्धा के विजेता अरूण पराडकर, सीमा अडकर, अशोक मुल्ये, श्रद्धा हलदनकर और प्रदीप मोरे को भी सम्मानित किया गया. इन पत्रों का संकलित रुप, पत्र सामर्थ्य 2019 विशेषांक प्रकाशित किया गया.

May 21st 2019, 12:31 am

लोक कल्याण के लिए संवाद आवश्यक – प्रशांत पॉल

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देहरादून (विसंकें). विश्व संवाद केन्द्र के तत्वाधान में नारद जयन्ती कार्यक्रम आई.आर.डी.टी. सभागार, देहरादून में आयोजित किया गया. मुख्य वक्ता के रूप में प्रशांत पॉल जी उपस्थित रहे. कार्यक्रम की अध्यक्षता ओएनजीसी महाप्रबंधक इन्द्र सिंह नेगी ने की.

प्रशांत पॉल ने कहा कि नारद पुराण, नारद संहिता, नारद ज्योतिष आदि साहित्य में लोक कल्याण के लिए नारद जी ने संवाद को प्रमुख माना है. वर्तमान में संवाद को विसंवाद करने का प्रयास भी किया जा रहा है, इससे बचना चाहिए क्योंकि आज का संवाद टीआरपी और कमाई करने के लिए व्यवसाय बनता जा रहा है.

नारद जयन्ती समारोह के मुख्य अतिथि अरविन्द सिंह बिष्ट (वरिष्ठ पत्रकार एव पूर्व सूचना आयुक्त उ.प्र.) ने समाचार के महत्व पर कहा कि आज का यह कार्यक्रम पूरे समाज में मनाना चाहिए. देश में सर्वप्रथम पत्रकारिता का उद्देश्य देश की आजादी से था, अब उसका स्वरुप बदल गया है और मीडिया ज्यादा सशक्त बन गया है. समाचार को देखकर, पढ़ कर हम अपनी धारण बनाते हैं क्योंकि सही सूचना समाज में सही दिशा प्रदान करती है.

समारोह के विशिष्ट अतिथि डॉ. प्रकाश थपलियाल (पूर्व संयुक्त निदेशक प्रसार मंत्रालय भारत सरकार) ने कहा कि सर्वप्रथम आदि पत्रकार नारद जी ही हैं क्योंकि वर्तमान युग का संवाद मीडिया का कार्य उस समय नारद जी ही करते थे.

इंद्र सिंह नेगी ने कहा कि पत्रकारिता का मुख्य कार्य लोक हिताय लोक सुखाय है. विषय, कथन और दर्शन जब मिलता है, तब सही पत्रकारिता होती है.

समारोह में किशोर अरोड़ा (ए.एन.आई.), गजेन्द्र सिंह नेगी (पायनियर), मीना नेगी (दैनिक जागरण), पवन नौटियाल, कपिल गर्ग न्यूज पोर्टल और दैनिक जागरण के छायाकार अनिल डोगरा को प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिह्न और शाल भेंट कर सम्मानित किया गया.

सामाजिक समरसता मंच द्वारा डॉ. भीमराव अम्बेडकर प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता परीक्षा में प्रथम रहे 19 विद्यालय के छात्रों को स्मृति चह्नि और प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया.

May 20th 2019, 12:10 pm

भारतीय पत्रकारिता के केंद्र में राष्ट्रीयता को रखना होगा – सुभाष सिंह

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मेरठ (विसंकें). उत्तर प्रदेश के सूचना आयुक्त सुभाष सिंह ने कहा कि पत्रकारिता में भारतीय संस्कृति के मूल्यों, परम्पराओं को यदि जीवित रखना है तो भारतीय पत्रकारिता के केन्द्र में राष्ट्रीयता को रखना होगा. पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण भारतीय पत्रकारिता भी उससे प्रभावित हुई है. अब समय है, उस प्रभाव से बाहर आने का. वे विश्व संवाद केन्द्र द्वारा आयोजित नारद सम्मान समारोह में संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता में निष्पक्षता तथा राजनीति में पंथनिरपेक्षता हो ही नहीं सकती. यह तथ्यहीन बात है क्योंकि भारतीय राजनीति एवं पत्रकारिता में कहीं न कहीं इनके प्रभाव से बचा नहीं जा सकता.

उन्होंने कहा कि 2014 में 30 वर्ष बाद पूर्ण बहुमत की सरकार बनी. विदेशी मीडिया ने इसको स्वत्रंत भारत की पहली स्वतंत्र सरकार की संज्ञा दी. ब्रिटेन से प्रकाशित गार्जियन अखबार का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सैद्धान्तिक रूप से अंग्रेजों की भारत से अंततः पूर्ण रूप से विदाई हो गई है.

मेरठ प्रान्त के सह प्रचार प्रमुख सुरेन्द्र सिंह ने कहा कि कुछ फिल्मों व टेलीविजन नाटकों ने नारद जी की छवि को समाज के बीच नकारात्मकता के साथ प्रस्तुत किया है. वास्तव में अपने धर्मग्रंथों व रामायण तथा महाभारत का अध्ययन करने के उपरान्त नारद जी के विषय में वास्तविकता का ज्ञान होता है. नारद जी तीनों लोकों के सर्वमान्य सम्वादवाहक थे. नारद जी द्वारा लोकहित को ध्यान में रखते हुए सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जाता था. असुर, देव, नागरिक सब में उनकी स्वीकार्यता थी. वे लोगों की जिज्ञासाओं का समाधान करने के साथ-साथ समाजहित की प्रेरणा भी देते थे. विज्ञान से लेकर भूगोल, राजनीति, ज्योतिष, अर्थशास्त्र जैसे विषयों के विद्वान थे.

कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार संतराम पाण्डेय को लाइफ टाइम अचीवमेंट सम्मान से सम्मानित किया गया. इसके अतिरिक्त संदीप शर्मा को पत्रकारिता के क्षेत्र में विशेष योगदान हेतु, सुनील कैथवास को फोटो पत्रकारिता के क्षेत्र में विशेष योगदान हेतु, सुनील कुमार सिंह को पत्र लेखन के क्षेत्र में, विशाल शर्मा को इलैक्ट्रोनिक मीडिया के क्षेत्र में तथा बीनम यादव को पत्रकारिता शिक्षण के क्षेत्र में विशेष योगदान हेतु सम्मानित किया गया.

May 20th 2019, 12:10 pm

लोक कल्याण के लिए आदर्शों पर आधारित हो पत्रकारिता – अरुण कुमार

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जम्मू (विसंकें). देवर्षि नारद जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार ने कहा कि समाज आत्म विस्मृति से जूझ रहा है और वर्तमान समय में आवश्यकता है कि आदर्शों पर आधारित पत्रकारिता की ओर बढ़ें, जिससे लोक कल्याण एवं सत्य का अनुसंधान किया जा सके. उन्होंने कहा कि आत्म विस्मृति होती है तो आत्म हीनता आ जाती है, आत्म निंदा की भावना आ जाती है और यह सबसे बड़ा पाप है. भारत का जो मूल विचार है, वह वसुधैव कुटुम्बकम पर आधारित है. भारत का विचार किसी पर जबरदस्ती अपनी संस्कृति थोपने का नहीं है, बल्कि सबका कल्याण ही इसका अंतिम उदेश्य है. आज अवधारणा बनाने का काम मीडिया का है और उसके पास बहुत बड़ी जिम्मेदारी है. भारत को दुनिया का मार्गदर्शन करने वाला बनाना है और इसके लिए आदर्श खड़े करने होंगे. नारद पत्रकारिता के आदर्श हैं, सत्य का अनुसंधान करने वाले हैं और आज भी ऐसे लोगों की आवश्कता है जो सत्य की अवधारणा के साथ काम करें.

कार्यक्रम के अध्यक्ष पूर्व आईएएस अधिकारी के.बी जंडियाल ने कहा कि देशहित के लिए मीडिया को अध्यन के साथ सत्य पर आधारित पत्रकारिता करनी चाहिए. आज देश को तोड़ने की बातें हो रही हैं, जबकि जोड़ने के प्रयास कम हैं. मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह सत्य के साथ देश कल्याण की पत्रकारिता करे.

त्रिकुटा संवाद केंद्र द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में वरिष्ठ पत्रकार अश्वनी कुमार, सुरेंदर शर्मा, राज बिलोरिआ, महिला पत्रकार निर्मल विक्रम, युवा पत्रकार निधि शर्मा एवं छायाकार, राकेश बक्शी को सम्मानित किया गया. कार्यक्रम में गणमान्य नागरिकों का स्वागत त्रिकुटा संवाद केंद्र जम्मू-कश्मीर के अध्यक्ष डॉ. सत्य देव ने किया, जबकि धन्यवाद पत्रकार उदय भास्कर ने किया.

May 20th 2019, 1:32 am

देवर्षि नारद का कार्य सकारात्मकता को बढ़ाना था – भाग्येश झा

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गुजरात. विश्व संवाद केंद्र गुजरात द्वारा नारद जयंती के उपलक्ष्य में पत्रकार सम्मान समारोह का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में मुख्य वक्ता भाग्येश झा (साहित्यकार तथा पूर्व सुचना आयुक्त, गुजरात) ने कहा कि नारद का कार्य सकारात्मक बातों (Positive Journalism)  को बाहर लाना था. यह काम बिना किसी भेदभाव के करने वाला ही नारद का अनुयायी हो सकता है. वि.सं.कें. द्वारा आज जिन 6 महानुभावों का सम्मान किया गया, उनका चयन बहुत ही बुद्धिमतापूर्वक किया गया है.

पत्रकारत्व की आज की जो आवश्यकता है, उनका समावेश इन 6 महानुभावों में हो जाता है. उन्होंने कहा कि मैं तो नारद के साथ साथ कालिदास की बात भी कहूँगा, जिन्होंने मेघदूत में बादलों के माध्यम से संदेश भेजने की बात कही है. आजकल कवि कालिदास का अध्ययन करके Cloud  Computing कर रहे हैं. आजकल custom news catering का जमाना है.

भविष्य का पत्रकारत्व विषय पर हॉवर्ड में एक संशोधन हुआ और Wordsmith नामक एक ऐप तैयार किया गया. उनका कहना है कि भूकंप जैसे समाचार की रिपोर्ट आप रोबोट को दें तो वह 3000 शब्दों की रिपोर्ट तैयार कर देगा. पत्रकारों को तीन बातों से सावधानी रखने की जरुरत है –

  1. I am the first 2. I am unique 3. I am reliable

पत्रकारों की प्रतिदिन परीक्षा होती है तथा रोज उसका परिणाम भी होता है. दूसरा अल्पजीवी समाचारो का युग है. इसीलिए Slow Journalism की भी आवश्यकता पड़ेगी. मुझे ऐसा लगता है कि पत्रकार समाज को दिशा देने वाले लोग हैं. पत्रकार कभी इतिहास नहीं लिखता, लेकिन पत्रकारों के बिना इतिहास लिखा भी नहीं जा सकता.

उन्होंने कहा कि Creative Writing एक बहुत बड़ा Challenge है और हेड लाइन बनाना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है. आज जब लोगों के पास समय की कमी है, तब क्या करना उसका ज्ञान देने वाला भी पत्रकार है. पत्रकार को हमेशा जागृत रहना आवश्यक है, पत्रकार जितना सतर्क होगा उतना ही समाज सतर्क रहेगा और समाज सतर्क रहेगा तो सरकार भी बराबर ही चलेगी.

कार्यक्रम के अध्यक्ष जयंतीभाई भाड़ेसिया (क्षेत्र संघचालक, पश्चिम क्षेत्र, रा.स्व.संघ) ने कहा कि आचार, नैतिकता तथा देश प्रेम पत्रकारत्व की नींव में होना चाहिये.

नारद जयंती के अवसर पर पत्रकार सम्मान समारोह में श्री जयवंतभाई पंड्या (Print Media), श्री विवेक कुमार भट्ट (Digital Media), श्री मनोजभाई मेहता (Web Media), श्री मौलिन मुंशी (Radio Journalism), श्री सुदर्शन उपाध्याय, गुजरात समाचार (विशेष सम्मान), श्री हर्षदभाई याज्ञिक, साधना साप्ताहिक – (विशेष सम्मान) को सम्मानित किया गया.

May 20th 2019, 12:59 am

ज्ञान का चरम हैं नारद – नारद जयंती (20 मई) पर विशेष

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ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया को नारद जयन्ती होती है, जो इस बार 20 मई को है. पिछले कई वर्षों से राष्ट्रवादी लोग इस दिन को पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाते हैं. नारद सृष्टि के पहले संवाददाता माने जाते हैं. हिन्दी फिल्मों और सेकुलर विमर्शकारों द्वारा उन्हें नकारात्मक चरित्र और लोगों के बीच में मनमुटाव और लड़ाई करने वाले के रूप में चित्रित किया जाता है. इसलिए कई बार ऐसे ही लोग नारद जयन्ती के आयोजनों पर अपनी भौहें तानते हैं. जबकि वास्तविक तथ्य यह है कि नारद एक दार्शनिक, कानून जानने वाले और एक कुशल सम्प्रेषक हैं. इसीलिए शायद सत्य और धर्म की विजय के प्रतीक नारद को भारत के पहले हिन्दी समाचार पत्र ‘_उदन्तमार्तण्ड’ ने अपने मुखपृष्ठ पर छापा और इसका लोकार्पण नारद जयन्ती के दिन ही किया. नारद आज भी प्रासांगिक हैं, न केवल अपने सार्थक सम्प्रेषण के लिए, बल्कि कुशल शासन और आम व्यक्ति के साथ बंधुत्व भाव के लिए. सीधा अर्थ यह है कि एक व्यक्ति, जो ज्ञान की पराकाष्ठा तक पहुंच जाए, वही नारद है. नारद की उपस्थिति दो इतिहास ग्रंथों के निर्माण में प्रत्यक्षत: दिखाई पड़ती है. रामायण तभी लिखी गई, जब नारद राम कथा लिखने के लिए एक परिपूर्ण व्यक्ति की खोज में निकले थे और वाल्मीकि को तमसा नदी के किनारे उन्होंने मर्यादापुरुषोत्तम का चरित्र चित्रित कर रामायण लिखने की प्रेरणा दी. नारद ने वाल्मीकि को कथा पर ध्यान केन्द्रित कर एकाग्र होने का वातावरण उपलब्ध कराया.

महाभारत में भी धर्म का सारा मर्म कहीं न कहीं नारद की पद्धति को उद्घाटित करता है. नारद महाराज युधिष्ठिर की राजसभा में उपस्थित हुए थे और उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर को पुरुषार्थ चतुष्टय-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का पूर्ण ज्ञान प्रदान किया था. भारतीय परम्परागत साहित्य में भी कहीं न कहीं किसी अध्याय में नारद द्वारा प्रतिपादित स्वधर्म, तंत्र, विधान, राजस्व प्राप्ति, शिक्षा, उद्योग इत्यादि पर उनके दर्शन का प्रभाव पाते हैं. नारद विशेष रूप से सुराज पर भी युधिष्ठिर से मंत्रणा करते हुए भी दिखाई पड़ते हैं. वे धर्मराज से पूछते हैं कि क्या तुम धर्म के साथ अर्थ-चिन्तन पर भी विचार करते हो? सामाजिक विकास और कृषि की स्थिति क्या है? क्या तुम्हारे साम्राज्य में सभी किसान समृद्ध और सन्तुष्ट हैं? क्या तुमने अभावग्रस्त किसानों के लिए ऋण सुविधा उपलब्ध कराई है? नारद प्रशासनिक ढांचे पर भी ध्यान आकर्षित करते हैं. वे मंत्रियों और अधिकारियों के चयन की प्रकृति, उनके चरित्र और सामाजिक प्रतिबद्धता के आवश्यक मानकों पर भी चर्चा करते हैं. नारद नागरिकों के रहन-सहन के जीवन स्तर, उनकी भावनाओं और पारिवारिक दायित्वों के विषय को भी उठाते हैं.

इस प्रकार हम देखते हैं कि नारद हमेशा धर्म के प्रचार और नागरिकों के कल्याण के लिए तत्पर दिखाई देते हैं. महाभारत के आदि पर्व में नारद के पूर्ण चरित्र को वेदव्यास ने इस श्लोक में व्यक्त किया है –

अर्थनिर्वाचने नित्यं, संशयचिदा समस्या:.

प्रकृत्याधर्मा कुशलो, नानाधर्मा विशारदा:.

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि नारद एक महान विचारक और ‘नारद स्मृति’, ‘नारद भक्ति स्तोत्र’ आदि की रचना करने वाले ग्रंथकार हैं. नारद तीनों लोकों में भ्रमण करने वाले, संवाद करने वाले और सारे विवादों को मिटाने वाले संन्यासी हैं. हम सबको नारद के इस विराट स्वरूप को ही स्वीकार करना चाहिए.

जे. नन्द कुमार

(लेखक प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक एवं केरल से प्रकाशित मलयाली पत्रिका केसरी के पूर्व संपादक हैं।)

May 19th 2019, 8:31 pm

19 मई / जन्मदिवस – संघर्षप्रिय एवं जुझारू मधुसूदन जी

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नई दिल्ली. मधुसूदन जी का जन्म 19 मई, 1956 को ग्राम सीसवाली (जिला बारां, राजस्थान) में प्रभुलाल मोरवाल जी के घर में हुआ था. घर में कुछ खेती भी थी, पर उनके परिवार में बाल काटने का पुश्तैनी काम होता था. यद्यपि नयी पीढ़ी के लोग शिक्षित होकर निजी और सरकारी सेवाओं में भी जा रहे थे. अपने गांव में रहते हुये उन्होंने ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ के माध्यम से छात्रों के हित में संघर्ष किया. इससे वे शीघ्र ही विद्यार्थियों के बीच लोकप्रिय हो गये. वर्ष 1973 से 75 तक वे राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, सीसवाली में छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे. इस दौरान उनके कार्य से छात्र और अध्यापकों के साथ ही क्षेत्र के अन्य बड़े लोग भी प्रभावित हुये. छात्र संघ का कार्य करते हुये उनका संपर्क संघ से हुआ. वे संघ के उद्देश्य तथा कार्यशैली से बहुत प्रभावित हुये. अब वे विद्यार्थी परिषद के साथ ही संघ में भी सक्रिय हो गये.

इसी समय 1975 में देश में आपातकाल लग गया. संघ पर प्रतिबंध के कारण इस समय प्रत्यक्ष शाखा का काम स्थगित था, पर तानाशाही के विरुद्ध हो रहे संघर्ष में रीढ़ की भूमिका संघ के कार्यकर्ता ही निभा रहे थे. भूमिगत पर्चे एवं समाचार पत्रों को छापकर उन्हें सामान्य जनता, पुलिस, प्रशासन और समाज के प्रमुख लोगों तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य स्वयंसेवक ही कर रहे थे. सत्याग्रह एवं जेल भरो आंदोलन के ऐसे भीषण दौर में मधुसूदन जी ने भी सत्याग्रह कर अपनी गिरफ्तारी दी. संघ से प्रतिबन्ध हटाओ, लोकतंत्र अमर रहे, जयप्रकाश जिन्दाबाद, तानाशाही मुर्दाबाद.. आदि नारों से उन्होंने आकाश गुंजा दिया. प्रशासन ने उन्हें कोटा की केन्द्रीय कारागर में बंद कर दिया.

जेल के नाम से मन में अनेक आशंकाएं जन्म लेती हैं, पर आपातकाल में संघ के स्वयंसेवकों के लिये जेल प्रशिक्षण केन्द्र जैसे बन गए थे. वहां वरिष्ठ कार्यकर्ता छोटे तथा नये कार्यकर्ताओं को शारीरिक तथा बौद्धिक का प्रशिक्षण देते थे. इसके साथ ही वे कार्यकर्ताओं की जिज्ञासाओं का समाधान कर उनका वैचारिक पक्ष भी मजबूत करते थे. एक परिवार की तरह रहने के कारण वहां सदा मौज-मस्ती का माहौल बना रहता था. कई कार्यकर्ताओं की आंतरिक प्रतिभाओं का वहां विकास हुआ. जेल में बंद अन्य विचारधारा के लोग भी संघ के संपर्क में आए, जिससे उनके मन के भ्रम दूर हुए. जेल में रह रहे अन्य संस्थाओं तथा राजनीतिक दलों के लोग प्रायः दुखी रहते थे, पर स्वयंसेवक दोनों समय की शाखा और अन्य गतिविधियों में व्यस्त रहते थे. छात्र वहां रहकर अपनी पढ़ाई भी करते थे.

इस वातावरण में मधुसूदन जी के विचार परिपक्व हुए और उन्होंने प्रचारक बनने का संकल्प लिया, पर इसमें उनका गृहस्थ-जीवन बाधक था. उन्होंने अपनी पत्नी तथा घर वालों को समझा कर अपने संकल्प में सहयोग देने के लिये तैयार कर लिया. मधुसूदन जी नये लोगों से शीघ्र ही मित्रता कर लेते थे. शारीरिक तथा व्यवस्था संबंधी कार्यों में भी उनकी रुचि थी. वे धौलपुर, बयाना, हिंडौन सिटी, जोधपुर, बाड़मेर आदि स्थानों पर जिला प्रचारक रहे. इसके बाद कुछ समय उन्होंने श्रीगंगानगर में विभाग प्रचारक के नाते काम किया. वर्ष 2000 में उन्हें ‘भारतीय किसान संघ’ में जयपुर प्रांत का संगठन मंत्री बनाया गया. भारतीय किसान संघ का काम करते हुये उनके जीवन में कुछ मानसिक कष्ट और अवसाद के क्षण आये, जिनके कारण 27 जून, 2002 को उनका दुखद देहांत हो गया.

May 18th 2019, 7:13 pm

मोहन भागवत के काफिले की गाड़ी का टायर फटा, सुरक्षा कर्मी घायल

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नागपुर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के काफिले में शामिल पुलिस जीप गुरुवार को हादसे का शिकार हो गई. इस दुर्घटना में सीआईएसएफ के एक जवान को मामूली चोट आई है. हादसा चंद्रपुर जिले के वरोरा तहसील में स्थित नंदोरी के निकट हुआ. दूसरी गाड़ी में सवार डॉ. भागवत सुरक्षित है तथा नागपुर के लिए रवाना हो गए.

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत किसी निजी कार्यक्रम के चलते गुरूवार को चंद्रपुर गए थे. नागपुर लौटते समय शाम 5.30 बजे वरोरा तहसील में स्थित नंदोरी गांव के निकट डॉ. भागवत के काफिले में शामिल पुलिस जीप का टायर फट गया. जिससे गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो कर सड़क के किनारे जा गिरी. हादसे में गाड़ी में सवार सीआईएसएफ के सुरक्षाकर्मी को मामूली चोटें आई हैं. हादसे के बाद घायल सुरक्षा कर्मी को इलाज के लिए चंद्रपुर भेज दिया गया. इसके बाद डॉ. भागवत नागपुर के लिए रवाना हो गए.

भीषण गर्मी के कारण हुआ हादसा

वरोरा थाना क्षेत्र के पुलिस अधिकारी से प्राप्त जानकारी के अनुसार गुरूवार को चंद्रपुर में 46 डिग्री तापमान दर्ज किया गया. भीषण गर्मी के चलते काफिले में शामिल पुलिस जीप का टायर फट गया. जिस कारण चालक गाड़ी पर नियंत्रण नहीं रख पाया और गाड़ी सड़क से नीचे गिर गई. लेकिन चालक की सूझबूझ से बड़ा हादसा नहीं हुआ.

May 16th 2019, 1:08 pm

घर बेचकर बनाया ‘बेजोड़’ तिरंगा

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‘बेजोड़’ यानि इस तिरंगे में कोई जोड़ नहीं है. हैदराबाद के रहने वाले व पेशे से बुनकर आर. सत्यनारायण ने यह कमाल करके दिखाया है. उनका एक सपना था, जिसे पूरा करने की ललक में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया. सत्यनारायण का सपना था कि भारत का ‘राष्ट्रीय ध्वज’ बिना सिलाई के इस तरह से तैयार करें कि उसमें कोई जोड़ ना हो. एक ऐसा तिरंगा जो दुनिया में उदाहरण बन सके, देशभक्ति का परिचय दे सके.

ऐसा तिरंगा बनाने का विचार उन्हें एक शॉर्ट फ़िल्म ‘लिटिल इंडियंस’ को देखकर आया. इस सपने को पूरा करने की चाहत में उन्हें घर से बेघर होना पड़ा.  सत्यनारायण ने जिस तिरंगे का सपना देखा था, वह 8*12 फीट के झंडे के रूप में सामने आया. इस तिरंगे को बनाने के लिए उन्हें 6 लाख रुपए की ज़रूरत थी जो कमजोर आर्थिक हालात के कारण लगभग नामुमकिन था. कोई उपाय न सूझता देख उन्होंने अपना घर ही बेच दिया. इसके 4 साल के लंबे इंतजार के बाद उन्हें अपने काम में सफलता मिली.

देश के हर नागरिक के मन में तिरंगे के लिए बहुत मान-सम्मान है, लेकिन अगर कोई उसे कपड़े के एक ही पीस पर तैयार करने की ठान ले और इसके लिए अपना घर-बार तक दांव पर लगा दे तो वह व्यक्ति आम नागरिक से खास बन जाता है.

May 16th 2019, 9:46 am

रामपुर में आजम खान से डरे हुए हैं प्रशासनिक अधिकारी

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उत्तर प्रदेश के रामपुर में प्रशासनिक अधिकारी आजम खान से अपनी जान को खतरा होने की शिकायत कर रहे हैं. मंगलवार (मई 14, 2019) को एडीएम प्रशासन जगदंबा प्रसाद गुप्ता, एसपी को पत्र लिखकर अचानक छुट्टी पर चले गए. आरोप लगाया कि आज़म खान के समर्थकों से उनकी जान को खतरा है. इसी तरह एसडीएम सदर प्रेम प्रकाश तिवारी ने भी एसपी को पत्र लिखकर अपनी जान को खतरा बताया है. हालाँकि डीएम ने एडीएम जगदंबा के निजी कारणों से अवकाश पर जाने की बात कही है. एसपी के आदेश पर एडीएम व सिटी मजिस्ट्रेट  की सुरक्षा बढ़ा दी गई है.

मंगलवार को एडीएम जगदंबा और सिटी मजिस्ट्रेट सर्वेश कुमार गुप्ता द्वारा लिखे पत्र के बाद आजम खान और जिला प्रशासन के बीच चल रही तनातनी और बढ़ गई. अधिकारियों की शिकायत है कि उनके घरों और दफ्तरों पर नजर रखी जा रही है. उनके साथ कभी भी कोई अनहोनी हो सकती है.

एसपी शिव हरि मीणा ने बताया कि एडीएम व सिटी मजिस्ट्रेट के आवास पर सुरक्षा मुहैया करवा दी गई है, एसडीएम का पत्र मिलने पर उन्हें भी सुरक्षा उपलब्ध कराई जाएगी.

चुनावों से पूर्व उर्दू गेट तोड़ने, जौहर विश्वविद्यालय कैंपस की दीवार तोड़कर बिजली घर कब्जा मुक्त कराने और मदरसे के कमरे खाली कराने से शुरू हुआ विवाद चुनाव के दौरान और तीखा हो गया. प्रशासन द्वारा दिखाई जा रही सख्ती से आजम खान के तेवर अफसरों के प्रति और भी उग्र हो गए हैं. इस बीच आजम खान के खिलाफ़ 16 मामले दर्ज किए गए, जिसमें 5 मुकदमों पर हाईकोर्ट से उन्हें स्टे और गिरफ्तारी पर भी स्टे मिला है. पहले भी सपा उम्मीदवार आजम खान पर कई बार चुनाव को प्रभावित करने का आरोप लग चुका है.

अपने उपर लगते आरोपों को देख आजम खान ने भी खुद को अधिकारियों से खतरा बताया है. आजम ने कहा है कि जिला प्रशासन खुद उनकी हत्या की साजिश रच रहा है. उनके अनुसार मतदान वाले दिन रामपुर में डर और दहशत का माहौल था और अल्पसंख्यक मतदाता दहशत में थे. आजम के अनुसार अधिकारी उन्हें चुनाव जीतते नहीं देखना चाहते हैं.

 

May 16th 2019, 7:50 am

गोडसे, हासन और हिन्दू

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स्वतंत्र भारत का पहला आतंकी हिन्दू था और उसका नाम था – नाथूराम गोडसे, यह आकाशवाणी कमल हासन की….

हासन एक चुनावी सभा में 1948 में हुई महात्मा गाँधी की हत्या का सन्दर्भ दे रहे थे…अर्थात् उनके शब्दों में सारी आफत की जड़ हिन्दू ही हैं….आतंकवाद के लिए हिन्दुओं को पहले स्थान पर रखकर उन्होंने एक झटके से उन सबको अलग कर दिया, जिन्होंने असंख्य निर्दोष लोगों की जान लेकर कत्लगाह खड़े किये हुए थे, इस शातिराना एकांगी वक्तव्य के क्या मायने हैं.

गोडसे को उसी दिन गिरफ्तार कर लिया था, जब गांधी की हत्या हुयी थी. 01 नवम्बर 1949 तक सारी जांच प्रक्रिया पूरी हुई और एक हफ्ते के अंदर ही उसे फांसी की सजा दे दी गई. इस प्रकरण की यदि अफजल गुरु वाले मामले से तुलना करें तो यह समझ में आ जाएगा कि एक आतंकी वास्तव में कानूनी प्रक्रिया का किस तरह उपयोग करता है.. अफजल गुरु बहुत देर बाद क़ानून के चंगुल में आता दिखाई पड़ता है, सर्वोच्च न्यायलय द्वारा दोष सिद्ध किये जाने के बावजूद 8 वर्ष बाद और संसद पर हमले के पूरे 15 वर्ष बाद उस पर कानूनी शिकंजा कसता है.. परिस्थितियों के अनुसार ही कई बार क़ानून काम करता है..

गोडसे को जिस तरह उनके कर्म के चलते आतंक का नायक बनाने का दुष्प्रचार चलाया गया, हत्या की एक बड़ी योजना की बात कही गयी, भारत में इस मामले को दुष्प्रचारित करने के समय-समय पर प्रयास हुए. लेकिन दूसरा पक्ष यह भी है कि महात्मा गांधी की मृत्यु के बाद देश में कहीं भी कोई हत्या नहीं हुई. इसलिए हिन्दू आतंकी की अवधारणा वहीं खत्म हो जाती है..यदि आतंक को नाम ही देना है तो उन पैमानों पर उसे उतारना होगा, जहां आतंक मानवता के लिए शर्मसार करने वाली अवधारणा है. आइएसआइएस की पहुँच आज 21 से अधिक देशों तक है, अल कायदा कई देशों से सैन्य संघर्ष कर रहा है और कई महाद्वीपों में उसके पदचिन्ह मिल जाएंगे.. लश्कर दोनों ही समूहों से जुड़ा है और समन्वय का काम करता है.. चाहे 4 दिनों तक मुंबई में जारी आतंकी हमला हो अथवा हाल-फिलहाल का पुलवामा हमला .. जैश को वैश्विक आतंकी मसूद अजहर चलाता है तो आतंकी मामलों में ईसाई समुदाय भी कई जगह सक्रिय दिखाई पड़ता है..

अब फिर उन हिन्दुओं पर नजर डालिये, जिन्हें आप पहला आतंकी कह रहे हैं. देश के पहले आतंकी होने के बावजूद (हासन के अनुसार), हिन्दुओं का कश्मीर से सफाया कर दिया गया है.. यह भी शर्मनाक ही कहा जाएगा कि देश में चल रहे 800 आतंकी सेल का हिस्सा हिन्दू नहीं हैं..और भारत का कोई भी ऐसा आतंक प्रभावित जिला नहीं है जो हिन्दू बाहुल्य हो..

वास्तव में यदि देश ने पहला आतंकी स्वयं को दिया तो क्यों नहीं इसका ज्यादा प्रभाव दिखा…देश ने स्वयं को एक लिखित संविधान दिया है जो विश्व के सामने घोषित करता है कि भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य होगा और अपने नागरिकों को न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व को सुदृढ़ करेगा. 26 नवम्बर 1949 को संविधान को स्वीकार कर लिया था और 11 दिन बाद ही 15 नवम्बर 1949 को गोडसे को फांसी दी गई थी.

यह एक प्रकार से कमल हासन द्वारा उठाया गया अतार्किक मामला है, जिसमें उन्होंने जानबूझकर हिन्दू आतंक पर ज्यादा जोर दिया.

हासन के वक्तव्य ने मेरे जैसे व्यक्ति को याद दिला दिया है कि किस तरह एक षड्यंत्र के तहत हिन्दू राष्ट्रवादियों को हमेशा निशाने पर लिया गया. गांधी जी की हत्या के समय उपस्थित स्थितियों-परिस्थितियों और अन्य प्रभावों पर विचार विश्लेषण किये बिना एक ऐसे समन्वयवादी और सर्वसमावेशी समुदाय का नाम लेना दुखद है जो सारे संकटों में भी शांति व समन्वय के साथ आगे बढ़ने में विश्वास करता है और प्रासंगिकता व प्रामाणिकता के साथ खड़ा दिखाई देता है.. सारी सच्चाई को जानने के बावजूद नैतिक शक्ति की कमी के चलते ये लोग ऐसा कहते हैं…

यह सच है कि हिन्दुओं को कई क्षेत्रों में पहले क्रम में होने का गौरव प्राप्त है, लेकिन उस सूची में आतंकवाद नहीं आता और न ही कभी आएगा…

अमन लेखी

May 16th 2019, 6:46 am

“सिक्ख दंगे – कांग्रेस का दोहरा चरित्र”

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इटली के चिंतक, विचारक व राजनीति विज्ञानी मकियावेली ने जो कहा है, कांग्रेस उसके बहुत ही समीप है – “ज्ञानियों ने कहा है कि जिसका भविष्य देखना हो उसका भूतकाल देख लो”. इसके बाद कांग्रेस के सिक्ख दंगों से जुड़ाव को लेकर अमेरिकी कवि, चित्रकार व विचारक इमर्सन की कही एक बात भी स्मरण आती है – “उचित रूप से देखें तो इतिहास कुछ भी नहीं है, सब कुछ मात्र आत्मकथा है”. सिक्ख दंगों के समूचे संदर्भों में ये दो बातें कांग्रेस पर शत प्रतिशत चरितार्थ होती हैं.

1984 के सिक्ख दंगों पर राजीव गांधी के अभिन्न मित्र, कृपा पात्र, सलाहकार व राहुल गांधी के “गुरु” सैम पित्रौदा ने हाल ही में कहा कि – “जो हुआ सो हुआ” ये कुछ और नहीं कांग्रेस का स्थायी और इतिहास सिद्ध चरित्र है. सिक्ख दंगों के संदर्भ में इस आलेख में बहुत सारे तथ्यों में से कुछ ही तथ्य आपके सामने रखने जा रहा हूँ, उससे कांग्रेस का यह यह चरित्र सिद्ध नहीं होता कि – “जो हुआ सो हुआ”, बल्कि कांग्रेस यह कहती हुई सिद्ध होती है कि – “जो हुआ सो अच्छा ही हुआ”. तथ्यात्मक विश्लेषण से तो यही बात सामने आती है. यद्दपि “पद्म विभूषण” सैम कह रहे हैं कि उनकी हिंदी अच्छी नहीं है तथापि उनके फ़ाइल वीडियो, आडियो और लेखन, व्याख्यानों को तनिक सा भी देख लें तो उनकी हिंदी अच्छी खासी होने की बात प्रमाणित हो जाती है. सेना द्वारा बालाकोट पर की गई एयर स्ट्राइक के सबूत मांगते समय भी इनकी हिंदी बड़ी ही शानदार थी! भाषा के कंधे पर रख कर अश्लील बन्दूक चलाने से अच्छा होता कि आप अपनी गलती स्वीकार कर लेते.

कांग्रेस का “जो हुआ सो अच्छा ही हुआ” का आचरण सिद्ध होता है, इससे कि, 1985 में प्रधानमंत्री के रूप में जब राजीव गांधी ने संसद में भोपाल गैस त्रासदी व इंदिरा जी को श्रद्धांजलि दी व जांच कमेटी भी बनाई, तब इतने बड़े सिक्ख नरसंहार को लेकर उनके और समूची कांग्रेस पार्टी के किसी नेता के मुंह से सहानुभूति का एक शब्द तक नहीं फूटा था. संसद में मृत सिक्खों को श्रद्धांजलि देने में भी कांग्रेसियों को बरसों लग गए थे. वो तो भला हो सिक्ख समाज की उद्यमशीलता, धनाढ्यता का व विश्व भर में फैले संपर्कों का जिसके कारण सिक्खों ने स्वयं को भारतीय समाज में पुनर्स्थापित कर लिया. अन्यथा यदि कोई अन्य कमजोर समाज होता तो कांग्रेस द्वारा उसे भारत से समूचा ही नेस्तनाबूद ही कर दिया जाता. इतिहास गवाह है कि कांग्रेस द्वारा इस प्रकार के बने सामाजिक दबाव, भय, परिवार के प्राणों के मोह के कारण ही लाखों सिक्खों ने मजबूरन अपने केश कटवा कर मोना (बाल कटा) सिक्ख बन गए थे. उस पीढ़ी के हजारों ऐसे उदाहरण आज भी हमारे आस पास सहजता से मिल जाएंगे, जिन्होंने कांग्रेस प्रेरित इन दंगों से बचने के लिए अपनी केशधारी की पहचान ख़त्म कर ली थी. किंतु उसके बाद वे और उनकी संतानें पुनः केशधारी हो गई हैं.

सिक्ख दंगों के संदर्भ में “जो हुआ सो अच्छा ही हुआ” के आचरण का साक्ष्य यह भी है कि 1987 में जब अंतरराष्ट्रीय व स्थानीय दबाव के कारण सिक्ख कत्लेआम की जांच रिपोर्ट संसद में रखने की बात आई, तब राजीव गांधी बोले थे कि वे अनावश्यक एक “मृत मामले” को हवा नहीं देना चाहते. अपने बड़े संसदीय बहुमत के दंभ में एक प्रधानमंत्री द्वारा सिक्ख दंगों को लेकर गठित एक संवैधानिक आयोग की रिपोर्ट को लेकर ऐसा अलोकतांत्रिक आचरण बड़ा ही विचित्र किंतु दुःखद था. हजारों के कत्ल, बलात्कार, घर जलाने, संपत्ति लूटने की पाशविक घटनाओं को मृत मामला बताने वाले आचरण की कुत्सित रक्तरंजित घटना को “मृत मामला” बताना कांग्रेस और राजीव गांधी की भयंकरतम व अक्षम्य भूल थी. संसद ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुई सिक्खों की हत्याओं की निंदा करते हुए कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं किया.

कांग्रेस के सिक्ख दंगों को लेकर जिस “जो हुआ सो अच्छा ही हुआ” के आचरण की बात का एक साक्ष्य यह भी है कि “सिक्ख दंगों के जांच आयोग के अगुआ जस्टिस रंगनाथ मिश्र बाद में भारत के मुख्य न्यायाधीश बने, फिर मानवाधिकार आयोग के पहले अध्यक्ष बने और फिर राज्यसभा में कांग्रेस के समर्थन से सांसद भी बने. कांग्रेस शासन में इन जांच रिपोर्टों की दुर्गति कर दी गई थी. बीच बीच में गैर कांग्रेसी सरकारों द्वारा इस संदर्भ में की गई कार्यवाही के कारण कुछ रिपोर्टों को कांग्रेस मज़बूरी में सामने लाई. यही कारण था कि अगस्त 2005 में मनमोहन सिंह सरकार ने इसी विषय पर एक दूसरे जांच आयोग की रिपोर्ट संसद में पेश की, तब जाकर 21 साल पुरानी घटना पर संसद में चर्चा हो पाई थी. इस संदर्भ में यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि सिक्ख दंगों को लेकर गठित जस्टिस नानावटी आयोग की रिपोर्ट को भी दबाने, प्रभावित करने और परिवर्तित करने के कितने प्रयास किये गए. इस रिपोर्ट में एफ़आईआर दर्ज होने के बावजूद सज्जन कुमार को बाद में दोषी न ठहराने की बात का ज़िक्र था. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जिन जस्टिस रंगनाथ मिश्र ने सिक्ख दंगों के जांच आयोग की अध्यक्षता की थी, उन्हीं रंगनाथ मिश्र को 2002 के गुजरात दंगों की भी जांच सौंपी गई थी.

सिक्ख दंगों के दो प्रमुख दोषियों सज्जन कुमार व जगदीश टाइटलर को बचाने में कांग्रेसी प्रयासों की अपनी एक विस्तृत काली कहानी है. किंतु इस संदर्भ में एक अंतर्कथा यह भी है कि सोनिया गांधी ने सदैव सज्जन कुमार और अन्य सिक्ख दंगों के अपराधियों पर जगदीश टाइटलर को सदैव वरीयता दी और इसका एक मात्र कारण यह था कि जगदीश टाइटलर तथाकथित इसाई शिक्षाविद जेम्स डगलस टाइटलर के पुत्र थे.

कांग्रेस 1984 से लेकर 2009 तक सिक्ख दंगों के आरोपी जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार व धर्मदास शास्त्री को अपनी संसदीय राजनीति से प्रेम पूर्वक व प्रतिष्ठापूर्वक चिपकाए रही थी. नानावटी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा है कि कांग्रेस के पूर्व सांसद धर्मदास शास्त्री के खिलाफ सबूत हैं कि उन्होंने अपने “दो व्यक्तियों” को उकसाकर सिक्खों पर हमले करवाए. सिक्ख दंगों के बाद कांग्रेस व सोनिया गांधी के कृपा पात्र रहे व कांग्रेस द्वारा केंद्रीय मंत्री के पद से नवाजे गए, जगदीश टाइटलर के सम्बन्ध में रिपोर्ट में कहा गया है कि “इस बात के पुख्ता साक्ष्य हैं कि संभवत: सिक्खों पर हमले कराने में उनका हाथ था”. इसी प्रकार कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार के बारे में आयोग की रिपोर्ट में सीधे कहा गया है कि जो मामले उनके खिलाफ़ दर्ज हैं, उनकी जांच की जानी चाहिए. कांग्रेस ने उस समय के उपराज्यपाल, दिल्ली पीजी गवई के विरुद्ध भी कभी कोई कार्यवाही नहीं की, जिनके विषय में न्यायमूर्ति जीटी नानावटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दिल्ली में क़ानून व्यवस्था की ज़िम्मेदारी उनकी थी, इसलिए उन्हें विफलता की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता. इसी तरह तत्कालीन पुलिस कमिश्नर एससी टंडन भी सिक्ख दंगों के बाद कांग्रेस के प्रिय और कृपापात्र बने रहे, जिनके बारे में रिपोर्ट में कहा गया है – कानून व्यवस्था की विफलता के लिए उन्हें भी दोषी ठहराया जाना चाहिए. इसके अतिरिक्त दंगों से प्रभावित क्षेत्रों में तैनात बहुत से पुलिस अधिकारियों और थाना प्रभारियों को भी दाषी ठहराया गया है जो बाद में कांग्रेस के स्नेहपात्र बने रहे. आयोग ने कहा कि पुलिस अधिकारियों और सिपाहियों ने दंगों को रोकने और दंगा पीड़ितों को बचाने के लिए त्वरित और पर्याप्त कार्रवाई नहीं की.

नानावटी कमीशन ने यह भी कहा है कि सेना को बुलाने में देर हुई. दंगा ग्रस्त क्षेत्रों में सेना को बुलाने की देरी करने के लिए उत्तरदायी अफसरों को चिन्हित व दंडित न किये जाने की अंतर्कथा भी बहुत से रहस्यों को व रसूखदारों की प्रतिष्ठा को अपने बगल में दबाए हुए है.

कांग्रेस सरकारों ने सिक्ख दंगों को लेकर गठित जांच रिपोर्टों का जो मनमाना अर्थ निकाला और दसियों टाइटलर जैसे दोषियों को अनदेखा किया तो किया, किंतु इससे भी आगे जाकर वह सिक्खों को दंगों का समुचित मुआवजा दिलवाने में भी बाधा बनी रही. मुआवज़े को लेकर सरकार का रवैया था कि केंद्र सरकार की ओर से पहले ही मुआवज़ा दिया जा चुका है.

कांग्रेस शासन में सदैव जैन-बनर्जी समिति की रिपोर्टों को दबा दिया गया, जिसका काम इस बात की जाँच करना था कि ऐसे कौन से मामले थे, जिनमें शिकायतकर्ता के सामने नहीं आने के कारण कार्रवाई नहीं हुई. 1984 के सिक्ख विरोधी दंगों में आहूजा समिति की रिपोर्ट के विषय में भी समाचार कुछ अच्छे नहीं हैं.

प्रवीण गुगनानी

May 15th 2019, 4:15 am

हम सब के प्रयासों से साकार होगा राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने का स्वप्न – डॉ. अशोक कुकडे

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मुंबई (विसंकें).  पद्मभूषण डॉ. अशोक कुकडे जी ने कहा कि समाज जीवन के हर क्षेत्र में स्वयंसेवक को संगठन का कार्य करना आवश्यक है, यह मंत्र आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार जी ने दिया था. डॉ. हेडगेवार के संगठन शास्त्र का, उनके संघ संस्कारों को अंगीकार करने से ही विवेकानंद रुग्णालय का यह कार्य संभव हुआ. मैंने भले ही वैद्यकीय शिक्षा प्राप्त की है, परंतु वास्तव में एक स्वयंसेवक के नाते संगठित होने का अनुभव बचपन से ही मिला है. संगठित रूप से श्रम किया जाए तो समाज भी हमारा साथ देता है और संकटों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति भी प्राप्त होती है. आज का यह दिन इस संगठन वृत्ति का परिणाम है.

महाराष्ट्र के लातूर स्थित विवेकानंद रुग्णालय के संस्थापक और पश्चिम क्षेत्र के पूर्व संघचालक डॉ. अशोक कुकडे को पद्मभूषण से सम्मानित किया गया है तथा डॉ. ज्योत्स्ना कुकडे को एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय ने डी.लिट. की उपाधि प्रदान की है. केशव सृष्टी संस्था ने दोनों के सम्मान में मुंबई के माहेश्वरी भवन में, शनिवार 11 मई को समारोह आयोजित किया था. वनबंधु परिषद के पूर्व अध्यक्ष रामेश्वर लाल काबरा तथा बापूजी कार्यक्रम में उपस्थित रहे. समारोह के अध्यक्ष राजेंद्र बारवाले जी, कार्यक्रम के संयोजक विष्णुदास जी मंच पर उपस्थित रहे.

डॉ. कुकडे ने कहा कि विवेकानंद रुग्णालय जिस कालखंड में स्थापित हुआ, वह संघ के लिये अत्यंत प्रतिकूल कालखंड था. हम सब डॉक्टर मूलतः स्वयंसेवक थे. लातूर में हम शाखा में जाते थे. हमारे प्रयत्न मिटाने के अनेक प्रयास किये गए. पहले 15 साल विवेकानंद रुग्णालय के लिये विशेष प्रतिकूल थे. आज का काल अनुकूल है. विवेकानंद रुग्णालय का काम और बढ़ाना आवश्यक है. संघ स्वयंसेवक जिस क्षेत्र में भी जाए, उस क्षेत्र में राजदूत का काम करना चाहिये, श्रीगुरू जी की यह सीख आज भी स्मरण है. राष्ट्र को परम वैभव तक ले जाने का संघ का स्वप्न हम सब के एकत्रित प्रयासों से पूर्ण होगा. आज इस गौरव समारोह की वजह से 80 साल की उम्र में भी ऊर्जा मिलती है तथा काम करने की प्रेरणा मिलती है.

साक्षात परमेश्वर दर्शन का अनुभव

डॉ. ज्योत्स्ना कुकडे ने कहा कि वास्तव में हम दोनों को प्राप्त हुआ सम्मान मुझे ही मिला है, ऐसी हर लातूरवासी की भावना है. यह देखकर मुझे उनमें परमेश्वर दर्शन की अनुभूति मिलती है. मेरी डी.लिट उपाधि का संबंध केवल वैद्यकीय शिक्षा से संबंधित नहीं, बल्कि लातूर निवासियों से जुड़ा है. विवेकानंद रुग्णालय का परिवार उन लोगों से ही समृद्ध हुआ है. हमारी डॉक्टरी की पढ़ाई पीछे चली गई और हम लातूर वासियों के चाचा-चाची बन गए. इसका मुझे अभिमान है.

May 14th 2019, 7:44 am

सेवाभारती द्वारा सीता नवमी पर सर्वजातीय सामूहिक विवाह का आयोजन

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जयपुर (विसंकें). समाज की भिन्न-भिन्न 11 बिरादरियों के 41 वर – वधु का सामूहिक विवाह संस्कार एक ही पण्डाल में पूज्य संत वृन्दों के आशीष व सामाजिक कार्यकर्ताओं की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ. वर-वधु को पूज्य संत श्री अकिंचन महाराज, संत श्री मुन्नादास जी, संत श्री हरिशंकरदास एवं संत श्री मनीषदास जी ने आशीर्वाद प्रदान किया. नव दम्पति में पर्यावरण के प्रति चेतना विकसित हो, इस हेतु प्रत्येक वर एवं वधु को तुलसी पौधे प्रदान किए गए.

सेवा भारती द्वारा सर्वजातीय विवाह की इस यात्रा का शुभारम्भ 10 वर्ष पूर्व समाज में सेवा, समरसता व अनावश्यक व्यय से बचने के उद्देश्य से राजस्थान के भवानी मण्डी से किया गया था. अब तक पूरे राजस्थान के 13 जिलों के 25 स्थानों के 1897 जोड़े विवाह के पवित्र बन्धन में बंध चुके हैं.

इस पहल से लोगों को खर्चीले वैवाहिक आयोजन से राहत मिली है. बहुत ही सामान्य पंजीयन शुल्क लेकर  विदाई के पश्चात गृहस्थी के लिए आवश्यक सभी सामग्री समाज के सहयोग से नवदम्पति को भेंट की जाती है. सामाजिक न्याय विभाग का प्रमाणीकरण भी दिलाया जाता है. समाज के सभी वर्गों की उपस्थिति में सम्मानपूर्वक वैवाहिक अनुष्ठान पूर्ण होकर उनके जीवन की मधुर स्मृति बनता है.इस वर्ष में अभी तक विभिन्न स्थानों पर आयोजित कार्यक्रमों में 100 से अधिक जोड़े वैवाहिक बंधन में बंध चुके हैं.

 

May 14th 2019, 5:54 am

बेटी से छेड़खानी का विरोध किया तो जहांगीर और आलम ने चाकू घोंप दिया

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नई दिल्ली. मोती नगर के बसई दारापुर में एक व्यक्ति ने बेटी से छेड़छाड़ का विरोध किया तो चाकू घोंप कर उसकी हत्या कर दी गई. मृतक की पहचान 51 वर्षीय धुव राज त्यागी के रूप में हुई है. इस दौरान पीड़िता का भाई भी घायल हो गया. पुलिस ने घटना में लिप्त 2 नाबालिगों सहित 4 लोगों को गिरफ़्तार किया है. गिरफ्तार आरोपियों में मोहम्मद आलम और जहांगीर खान शामिल हैं.

पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार ध्रुव राज त्यागी अपने परिवार सहित बसई दारापुर में रहते हैं. रविवार रात वह बेटी और बेटे के साथ अस्पताल से लौट रहे थे. घर पहुँचने से कुछ दूर पहले ही पांच-छह लोगों ने उनका रास्ता रोक लिया और उनकी बेटी से छेड़छाड़ शुरू कर दी. पिता व भाई ने विरोध किया तो जहांगीर और आलम सहित अन्य साथियों ने रास्ता देने से मना कर दिया. त्यागी ने किसी तरह पहले अपनी बेटी को घर पहुँचाया और फिर लौट कर छेड़खानी कर रहे लड़कों के पिता से शिकायत करने पहुंचे. इसी दौरान उन पर धारदार हथियारों से हमला कर दिया. हमले में गंभीर रूप से घायल ध्रुव त्यागी को अस्पताल ले जाया गया, जहां सोमवार को उनकी मृत्यु हो गई. अपने पिता को बचाने आया पीड़िता का भाई भी बुरी तरह घायल हुआ है. अस्पताल में उपचार चल रहा है.

घटना में मुस्लिमों के आरोपित होने के कारण क्षेत्र में तनाव का माहौल है. क्षेत्र में पुलिस बल तैनात किया गया है. वारदात के समय लोग बीच-बचाव करने की जगह वीडियो बना रहे थे. घटना के बाद परिजनों का रो-रो कर बुरा हाल है.

पुलिस ने आईपीसी 302 (हत्या), 506 (आपराधिक धमकी) और 509 (महिला का अपमान) के तहत केस दर्ज कर पड़ोसी मोहम्मद आलम (20 साल) और जहांगीर खान (45 साल) को गिरफ्तार कर लिया है. दो नाबालिगों को भी पुलिस ने पकड़ा है. घटना के बाद आरोपी भाग गए थे. सोमवार को उन्हें विभिन्न स्थानों से दबिश देकर गिरफ्तार किया गया. दोनों नाबालिगों को ‘Observation Home’ में भेजा गया है.

एक बड़ा सवाल यह कि सेकुलर मीडिया को यह घटनाक्रम दिखाई देगा.

May 14th 2019, 4:28 am

14 मई / पुण्यतिथि – उत्कृष्ट लेखक भैया जी सहस्रबुद्धे

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नई दिल्ली. प्रभावी वक्ता, उत्कृष्ट लेखक, कुशल संगठक, व्यवहार में विनम्रता व मिठास के धनी प्रभाकर गजानन सहस्रबुद्धे का जन्म खण्डवा (मध्य प्रदेश) में 18 सितम्बर, 1917 को हुआ था. उनके पिताजी वहां अधिवक्ता थे. वैसे यह परिवार मूलतः ग्राम टिटवी (जलगाँव, मध्य प्रदेश) का निवासी था. भैया जी जब नौ वर्ष के ही थे, तब उनकी माताजी का देहान्त हो गया. इस कारण तीनों भाई-बहिनों का पालन बदल-बदलकर किसी सम्बन्धी के यहां होता रहा. मैट्रिक तक की शिक्षा इन्दौर में पूर्णकर वे अपनी बुआ के पास नागपुर आ गए और वहीं वर्ष 1935 में संघ के स्वयंसेवक बने.

वर्ष 1940 में उन्होंने मराठी में एमए और फिर वकालत की परीक्षा उत्तीर्ण की. कुछ समय उन्होंने नागपुर के जोशी विद्यालय में अध्यापन भी किया. भैया जी का संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी के घर आना-जाना होता रहता था. वर्ष 1942 में बाबा साहब आप्टे की प्रेरणा से भैया जी प्रचारक बने. प्रारम्भ में वे उत्तर प्रदेश के देवरिया, आजमगढ़, जौनपुर, गाजीपुर आदि में जिला व विभाग प्रचारक और ग्वालियर विभाग प्रचारक रहे.

वर्ष 1948 में संघ पर प्रतिबन्ध लगा, तो उन्हें लखनऊ केन्द्र बनाकर सह प्रान्त प्रचारक के नाते कार्य करने को कहा गया. उस समय भूमिगत रहकर भैया जी ने सभी गतिविधियों का संचालन किया. इन्हीं दिनों कांग्रेसी उपद्रवियों ने उनके घर में आग लगा दी. कुछ भले लोगों के सहयोग से उनके पिताजी जीवित बच गए, अन्यथा षड्यन्त्र तो उन्हें भी जलाकर मारने का था.

प्रतिबन्ध हटने पर वर्ष 1950 में वे मध्यभारत प्रान्त प्रचारक बनाये गए. वर्ष 1952 में घरेलू स्थिति अत्यन्त बिगड़ने पर श्री गुरुजी की अनुमति से वे घर लौटे. उन्होंने अब गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर इन्दौर में वकालत प्रारम्भ की. वर्ष 1954 तक इन्दौर में रहकर वे खामगाँव (बुलढाणा, महाराष्ट्र) के एक विद्यालय में प्राध्यापक हो गए.

इस दौरान उन्होंने सदा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दायित्व लेकर काम किया. वर्ष 1975 में देश में आपातकाल लगने पर वे नागपुर जेल में बन्द रहे. वहाँ से आकर उन्होंने नौकरी से अवकाश ले लिया और पूरा समय अध्ययन और लेखन में लगा दिया.

भैया जी से जब कोई उनसे सहस्रबुद्धे गोत्र की चर्चा करता, तो वे कहते कि हमारे पूर्वजों में कोई अति बुद्धिमान व्यक्ति हुआ होगा; पर मैं तो सामान्य बुद्धि का व्यक्ति हूँ. वर्ष 1981 में वे संघ शिक्षा वर्ग (तृतीय वर्ष) के सर्वाधिकारी थे. वर्ग के पूरे 30 दिन वे दोनों समय संघस्थान पर सदा समय से पहले ही पहुँचते रहे. भैया जी अपने भाषण से श्रोताओं को मन्त्रमुग्ध कर देते थे. तथ्य, तर्क और सही जगह पर सही उदाहरण देना उनकी विशेषता थी.

भैया जी एक सिद्धहस्त लेखक भी थे. संघ कार्य के साथ-साथ उन्होंने पर्याप्त लेखन भी किया. उन्होंने बच्चों से लेकर वृद्धों तक के लिए मराठी में 125 पुस्तकों की रचना की. इनमें ‘जीवन मूल्य’ बहुत लोकप्रिय हुई. उनकी अनेक पुस्तकों का कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ. लखनऊ के लोकहित प्रकाशन ने उनकी 25 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित की हैं. उन्होंने प्रख्यात इतिहासकार हरिभाऊ वाकणकर के साथ वैदिक सरस्वती नदी के शोध पर कार्य किया और फिर एक पुस्तक भी लिखी. माँ सरस्वती के इस विनम्र साधक का देहान्त यवतमाल (वर्धा, महाराष्ट्र) में 14 मई, 2007 को 90 वर्ष की सुदीर्घ आयु में हुआ.

May 13th 2019, 6:49 pm

दुराचारी को बचाने के लिए मदरसे ने जारी किया झूठा बर्थ सर्टिफिकेट

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सर्टिफिकेट में ‘20 साल’ के आरोपी की उम्र बताई 9 साल

कश्मीर घाटी में एक 3 साल की मासूम बच्ची के साथ दुराचार का मामला सामने आया है, लेकिन दिल्ली के मीडिया को अभी ये दिखाई नहीं दिया है. और आश्चर्यजनक रूप से मामले को दबाने तथा दुराचारी को बचाने के लिए आरोपी को नाबालिग साबित करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं. इस्लामिक एजुकेशन ट्रस्ट के मदरसे ने झूठा बर्थ सर्टिफिकेट जारी किया है. जिसमें आरोपी की उम्र दस साल से भी कम दर्शाई गई है. जबकि पुलिस के अनुसार दुराचार के आरोपी की उम्र 20 साल के आसपास है. हैरानी की बात है कि मदरसे को जम्मू कश्मीर में इस्लामिक एजुकेशन ट्रस्ट चलाता है. बांदीपोरा के डिप्टी कमिश्नर शाहिद चौधरी ने खुद ट्वीट कर इस झूठे सर्टिफिकेट और मदरसे के प्रिंसिपल पर सवाल उठाया है.

बीते बुधवार उत्तरी कश्मीर में बांदीपोरा जिले के त्रेगाम गांव में इफ्तारी से ठीक पहले जब अजान गूंज रही थी, तब एक 20 साल के शख्स ने पड़ोस में रहने वाली 3 साल की बच्ची को टॉफी देने के बहाने बुलाया और टॉयलेट में ले जाकर रेप किया. दर्द से चीखती मासूम बच्ची ने अपने मां-बाप को घटना की जानकारी दी. जिसके बाद गांव वालों ने वहशी आरोपी रेपिस्ट ताहिर अहमद मीर उर्फ मुब्बा को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया और बच्ची को अस्पताल में भरती करवाया गया.

May 13th 2019, 4:52 am

13 मई / जन्मदिवस – ‘दिल्लीश्वर’ वसंतराव ओक

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नई दिल्ली. संघ के प्रारम्भिक प्रचारकों में एक श्री वसंतराव कृष्णराव ओक का जन्म 13 मई, 1914 को नाचणगांव (वर्धा, महाराष्ट्र) में हुआ था. जब वे पढ़ने के लिये अपने बड़े भाई मनोहरराव के साथ नागपुर आए, तो बाबासाहब आप्टे द्वारा संचालित टाइपिंग केन्द्र के माध्यम से दोनों का सम्पर्क संघ से हुआ.

डॉ. हेडगेवार के सुझाव पर वसंतराव 1936 में कक्षा 12 उत्तीर्ण कर शाखा खोलने के लिए दिल्ली आ गए. उनके रहने की व्यवस्था ‘हिन्दू महासभा भवन’ में थी. यहां रहकर वसंतराव ने एम.ए. तक की पढ़ाई की और दिल्ली प्रांत में शाखाओं का प्रचार किया. आज का दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, अलवर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश उस समय दिल्ली प्रांत में ही था. वसंतराव के परिश्रम से क्षेत्र में शाखाओं का अच्छा तंत्र खड़ा हो गया.

वसंतराव के संपर्क का दायरा बहुत बड़ा था. 1942 के आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका रही. गांधी जी, सरदार पटेल, लालबहादुर शास्त्री, पुरुषोत्तमदास टंडन से लेकर हिन्दू महासभा, सनातन धर्म और आर्य समाज के बड़े नेताओं से उनके मधुर संबंध थे. कांग्रेस वालों को भी उन पर इतना विश्वास था कि मंदिर मार्ग पर स्थित वाल्मीकि मंदिर में होने वाली गांधी जी की प्रार्थना सभा की सुरक्षा स्वयंसेवकों को ही दी गयी थी.

10 सितम्बर, 1947 को कांग्रेस के सब बड़े नेताओं की हत्या कर लालकिले पर पाकिस्तानी झंडा फहराने का षड्यन्त्र मुस्लिम लीग ने किया था; पर दिल्ली के स्वयंसेवकों ने इसकी सूचना शासन तक पहुंचा दी, जिससे यह षड्यन्त्र विफल हो गया.

आगे चलकर वसंतराव ने श्री गुरुजी और गांधी जी की भेंट कराई. उन दिनों वसंतराव का दिल्ली में इतना प्रभाव था कि उनके मित्र उन्हें ‘दिल्लीश्वर’ कहने लगे. संघ पर लगे पहले प्रतिबंध की समाप्ति के बाद उनके कुछ विषयों पर संघ के वरिष्ठ लोगों से मतभेद हो गए. अतः गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर वे दिल्ली में ही व्यापार करने लगे; पर संघ से उनका प्रेम सदा बना रहा और उन्हें जो भी कार्य दिया गया, उसे उन्होंने पूर्ण मनोयोग से किया.

गोवा आंदोलन में एक जत्थे का नेतृत्व करते हुए उनके पैर में एक गोली लगी, जो जीवन भर वहीं फंसी रही. 1857 के स्वाधीनता संग्राम की शताब्दी पर दिल्ली के विशाल कार्यक्रम में वीर सावरकर का प्रेरक उद्बोधन हुआ. उन्होंने वसंतराव के संगठन कौशल की प्रशंसा कर उन्हें ‘वसंतराय’ की उपाधि दी. 1946 में उन्होंने ‘भारत प्रकाशन’ की स्थापना कर उसके द्वारा ‘भारतवर्ष’ और ‘आर्गनाइजर’ समाचार पत्र प्रारम्भ किये. विभाजन के बाद पंजाब से आये विस्थापितों की सहायतार्थ ‘हिन्दू सहायता समिति’ का गठन किया था.

वसंतराव के भाषण काफी प्रभावी होते थे. मराठीभाषी होते हुये भी उन्हें हिन्दी से बहुत प्रेम था. 1955 में ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ उन्हीं की प्रेरणा से प्रारम्भ हुआ. इसके लिए शास्त्री जी और टंडन जी ने भी सहयोग दिया. इसकी ओर से प्रतिवर्ष लालकिले पर एक राष्ट्रीय कवि सम्मेलन कराया जाता था, जो अब शासकीय कार्यक्रम बन गया है.

1957 में उन्होंने दिल्ली में चांदनी चौक से लोकसभा का चुनाव जनसंघ के टिकट पर लड़ा; पर कुछ मतों के अंतर से वे हार गये. 1966 के गोरक्षा आंदोलन में भी उन्होंने काफी सक्रियता से भाग लिया. बाबरी ढांचे के विध्वंस के बाद कांग्रेस और साम्यवादियों ने संघ के विरुद्ध बहुत बवाल मचाया. ऐसे में वसंतराव ने दिल्ली के प्रतिष्ठित लोगों से मिलकर उनके सामने पूरा विषय ठीक से रखा. इससे वातावरण बदल गया.

अप्रतिम संगठन क्षमता के धनी और साहस की प्रतिमूर्ति वसंतराव का नौ अगस्त, 2000 को 86 वर्ष की आयु में देहांत हुआ.

 

May 13th 2019, 2:25 am

घुटनों के बल पाकिस्तान, एलओसी पर फायरिंग बंद करने और अपनी स्पेशल फोर्स हटाने को तैयार

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पाकिस्तान पर भारत के चौतरफा दबाव का असर दिखायी देने लगा है. पाकिस्तान ने पहली बार जम्मू कश्मीर में बॉर्डर और लाइन ऑफ कंट्रोल पर तनाव कम करने लिए गुहार लगाई है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार The Directors General of Military Operations यानि DGMOs की मीटिंग में पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर पहले अपनी तरफ से पीछे हटने की बात कही है. पाकिस्तान ने लाइन ऑफ कंट्रोल पर तैनात अपनी स्पेशल फोर्स, स्पेशल सर्विस ग्रुप को हटाने को राजी है, साथ ही पाकिस्तान ने एलओसी पर चल रही फायरिंग को भी पूरी तरह से बंद करने पर हामी भरी है. संस्थागत आर्मी चैनल के जरिये आई पाकिस्तान की गुहार की रिपोर्ट भारत के प्रधानमंत्री को भेज दी गयी है. जिस पर सरकार को फैसला लेना है.
अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान की तरफ से भारत में घुसपैठ का कोई मामला सामने नहीं आया. साथ ही एलओसी पार आतंकियों के लॉन्च पैड भी खाली कर दिये गए हैं. वहां भी किसी हलचल की कोई सूचना नहीं है.
स्पष्ट है कि पाकिस्तान लगातार शांति बहाली के संकेत दे रहा है. इस बार एलओसी पर भारत ने जब बंकर बनाए तब भी पहली बार पाकिस्तान ने कोई आपत्ति नहीं जताई.

May 12th 2019, 2:40 am

मीडिया के समक्ष अपनी विश्वसनीयता को बचाए रखने की चुनौती – मकरंद परांजपे

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जालंधर (विसंकें). विश्व संवाद समिति जालंधर ने नारद जयंती के उपलक्ष्य में स्थानीय विद्या धाम, श्री गुरु गोबिंद सिंह एवेन्यू में “फेक न्यूज़, फेक नैरेटिव के दौर में लोकतंत्र प्रहरी मीडिया की साख” विषय पर संगोष्ठी आयोजित की. कार्यक्रम में ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडी, शिमला के डायरेक्टर मकरंद परांजपे मुख्य वक्ता, सेवानिवृत्त असिस्टेंट स्टेशन डायरेक्टर, दूरदर्शन केंद्र, जालंधर सरदार मनोहर सिंह भारज अध्यक्ष के रूप में उपस्थित रहे.

मकरंद परांजपे जी ने कहा कि लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में मीडिया की विश्वसनीयता पर लोगों का भरोसा वर्तमान समय में भी स्थायी है. परंतु इस भरोसे को बनाए रखने की चुनौती मीडिया पर है. मीडिया को विश्वसनीयता को बचाए रखने का फर्ज स्वयं निभाना है. मीडिया जो उद्देश्य लेकर चला था, वह कहीं-कहीं अपने पथ को छोड़ अपनी भूमिका बदल रहा है. कई पत्रकार या मीडिया संस्थान आज स्वार्थ के आधार पर एक छिपा हुआ नैरेटिव प्रसारित करते हैं, जिसमें सत्य की मात्रा अपने हिसाब से तय की जाती है. परंतु, अन्ततोगत्वा जीत सत्य की होती है. इसीलिए फ़ेक न्यूज़ या धारणाएं कभी जीत नहीं सकतीं.

मीडिया की अभिव्यक्ति पर कहा कि मीडिया की अभिव्यक्ति पर हमला आज कोई नई बात नहीं है. स्वतंत्रता के तत्काल बाद ही कुछ मीडिया संस्थानों को बैन कर दिया गया था. मीडिया तब भी नहीं झुका था, आज भी नहीं झुकेगा. अलबत्ता वह अपने उद्देश्य व सिद्धान्तों से भटके नही।

सरदार मनोहर सिंह भारज ने कहा कि विश्व में सबसे बड़ा लोकतंत्र हमारे देश में है, मीडिया अपना कार्य निर्पेक्ष भाव से करे, इसके लिए मीडिया के साथ लोगों का संवाद जरुरी है. पिछले कुछ समय से मीडिया में काफी बदलाव हुआ है. मीडिया की व्याप्ति बढ़ी है. विकास होने पर कुछ अच्छा होना अपेक्षित था, लेकिन माहौल गंदा हुआ है. शब्दों पर भरोसा कम हुआ है. मीडिया और पत्रकारों की तटस्थ पत्रकारिता आज समय की आवश्यकता है.

संगोष्ठी में शहर के प्रतिष्ठित पत्रकारों, गणमान्य सज्जनों की उपस्थिति रही.

 

 

May 11th 2019, 10:13 am

मदरसे में मौलाना ने 6 साल की बच्ची को बेरहमी से पीटा

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नई दिल्ली. नोएडा के सोरखा गांव में एक 6 साल की बच्ची को बेल्ट से पीटने के आरोप में मदरसे के मौलाना पर पुलिस ने मामला दर्ज किया है. मौलाना के ख़िलाफ़ बच्ची के माता-पिता ने शिकायत दर्ज करवाई है. जानकारी के अनुसार अरबी शब्द न पढ़ पाने के कारण बच्ची को बेल्ट से इतनी बेरहमी से पीटा कि वह बेहोश हो गई.

बच्ची के पिता के अनुसार उनकी दो बेटियां मदरसे में पढ़ती हैं. अपनी दोनों बेटियों को मदरसे से हर 14वें दिन दो दिन के लिए घर लाते थे. 04 मई को जब उनकी पत्नी अपनी छोटी बच्ची को नहला रही थी, तब उसके शरीर पर उन्हें निशान दिखाई दिए. बेटियों से पूछने पर बड़ी बेटी ने पूरी घटना के बारे में बताया. परिवार का कहना है कि बेटी किसी अरबी के शब्द को नहीं पढ़ पा रही थी, जिस कारण मौलाना ने उसे बेल्ट से इतना पीटा कि वो 2 घंटों के लिए बेहोश हो गई.

बच्ची की बड़ी बहन ने बताया कि ऐसी घटना पहली बार नहीं हुई है. इससे पहले भी जब मौलाना के सवालों का जवाब नहीं दे पाते थे, तो मौलाना उनकी ऊंगलियों को मोड़ देता था और फिर गुस्से में बेल्ट से पीटता था. ऐसा सिर्फ़ इन दोनों बहनों के साथ नहीं होता था, बल्कि वह सब बच्चों के साथ ऐसा ही करता था.

बच्ची के साथ हुई घटना का विरोध करने के लिए जब माता-पिता मदरसा पहुंचे तो उन्हें वहाँ से भगा दिया गया. परिजनों ने 100 नंबर पर पुलिस को सूचना दी. पुलिस के पहुंचते ही मौलाना भाग निकला.

जी न्यूज़ के अनुसार सेक्टर-49 थाने के एसएचओ अजय कुमार अग्रवाल ने कहा कि मौलाना नवाब हुसैन के खिलाफ मारपीट का मामला दर्ज किया है. पुलिस ने आईपीसी की धारा 323, 504 के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है.

May 10th 2019, 3:56 am

1857 के बाद मुस्लिम तुष्टिकरण, साम्प्रदायिकता और विभाजन

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स्वतंत्रता संग्राम की व्यापकता, तीव्रता और असर

डलहौजी ने भारत से जाने के बाद, अगले दिन (29 फरवरी, 1956) ही विक्टोरिया को एक पत्र लिखा. उसने अपनी महारानी को बताया कि भारत में शांति कब तक बनी रहेगी, इसका कोई भी सही आंकलन नहीं कर सकता. उस पत्र में आगे लिखा कि इसमें कोई छिपाव नहीं है कि किसी भी समय संकट उठ खड़ा हो सकता है. भारत का अगला गवर्नर-जनरल कैनिंग बना और उसने भी डलहौजी के मत की पुष्टि की.[i] इस चिट्ठी के एक साल के अन्दर ही भारत का स्वतंत्रता संग्राम शुरू हो गया. इससे एक बात तो पक्की हो गयी कि संग्राम सुनियोजित था. हालाँकि इसकी भनक ब्रिटिश अधिकारियों लगने लगी थी, लेकिन वे कुछ कर पाते, इससे पहले संग्राम का स्वरुप देशव्यापी हो चुका था.

व्यापकता की पुष्टि हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में 13 जुलाई, 1857 को स्वतंत्रता संग्राम के सम्बन्ध में पूछे गए एक प्रश्न से हो जाती है. उस दिन ईस्ट इंडिया कंपनी के बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल का अध्यक्ष और गवर्नर-जनरल (1842-1844) रह चुके ऐलनबरो ने बताया कि यह खतरनाक और लगातार फैल रहा है. उसने संसद को बताया कि हमारा साम्राज्य खतरे में है और स्थिति बदतर से बदतर होती जा रही है.[ii] इस भाषण के अंशों से स्पष्ट और पर्याप्त है कि संग्राम से ईस्ट इंडिया कंपनी, ब्रिटिश संसद और ब्रिटिश क्राउन सभी की नींव हिल चुकी थी. इसका सीधा असर इतना तीव्र था कि विक्टोरिया को खुद हस्तक्षेप करके पूरी व्यवस्था में परिवर्तन करना पड़ गया था.

विक्टोरिया ने 19 जुलाई, 1857 को अपने प्रधानमंत्री पामर्स्टन को एक पत्र भेजा. उस चिट्ठी में ब्रिटेन की महारानी ने संग्राम को भयभीत करने वाला अनुभव बताया.[iii] उसी दौरान पामर्स्टन ने भी एक पत्र लिखा. जिसके अनुसार उसे खुद भी अंदाजा नहीं था कि संग्राम देशभर में फैल जाएगा. इस चिट्ठी के आखिरी में ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने संग्राम का कारण हिन्दू संतों को बताया.[iv] यहां दो तथ्य सामने आते हैं – एक उस महासमर में हिन्दुओं की भूमिका केंद्र बिंदु में थी. दूसरा 1858 के बाद हिन्दुओं के विरुद्ध मुसलमानों को भड़काना ब्रिटिश सरकार की नीतियों का आधार बनाया गया.

स्वतंत्रता संग्राम शुरू हुआ तो यूनाइटेड किंगडम में प्रधानमंत्री पामर्स्टन था. जब यह समाप्ति की ओर था तो वहां सरकार का नेतृत्व डर्बी के हाथों में था. दोनों का जिक्र इसलिए जरुरी है क्योंकि पामर्स्टन ने ही ईस्ट इंडिया कंपनी से सत्ता का हस्तांतरण क्राउन को दिए जाने का प्रस्ताव रखा. जिसे उसने हॉउस ऑफ कॉमन से पास करवा लिया था. जबकि डर्बी के कार्यकाल में यह प्रस्ताव अधिनियम बना. इस अधिनियम की एक महत्वपूर्ण उपज ‘सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फ़ॉर इंडिया’ नाम से नए विभाग का सृजन था. वैसे तो पूर्ववर्ती कंपनी के कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर के अध्यक्ष का ही यह नया नाम था. इसका पहला सेक्रेटरी एडवर्ड हेनरी स्टेनली को बनाया गया जो डर्बी का बेटा था. इसकी घोषणा विक्टोरिया ने 1 नवम्बर, 1858 को की. अब भारत के गवर्नर जनरल के नाम के आगे वायसराय शब्द जोड़ दिया गया था. ब्रिटेन की महारानी से सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के माध्यम से वायसराय को आदेश और अधिनियम मिलने का प्रावधान शामिल किया गया.[v] यह ब्रिटिश काल में भारत में मुस्लिम तुष्टिकरण, साम्प्रदायिकता और विभाजन के भयानक दौर की शुरुआत थी.

ब्रिटिश साम्राज्यवाद को बचाने के लिए भारतीय सामाजिक और राजनैतिक विभाजन

सेक्रेटरी ऑफ स्टेट की भूमिका एक कुख्यात साजिशकर्ता के रुप में थी. इसका एक उदाहरण 1883 में मिलता है. उस समय मुस्लिम राजनीति एक ब्रिटिश लेखक डब्लू. एस. ब्लंट से बहुत हद तक प्रभावित थी. ब्लंट भारत में कई मुस्लिम नेताओं से मिल चुका था. उसे बताया कि एंग्लो-इजिप्ट युद्ध में मुसलमानों को पाशा से उम्मीद थी कि वह उनका भाग्य बदल देगा.[vi] यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हिन्दुओं के स्थान पर भारतीय मुसलमानों ने भारत से बाहर अपने संबद्ध स्थापित करने शुरू कर दिए थे. इस एक विचार ने भारतीय राष्ट्रवाद को बहुत नुकसान पहुँचाया था.

इस पैन-इस्लामिक मूवमेंट की शुरुआत अफगानिस्तान के जमाल अफगानी ने की थी. वह 1881 के आसपास भारत आया और गुप्त रूप से मुस्लिम नेताओं से मुलाकात की. कलकत्ता में वह नवाब अब्दुल लतीफ़ और उसके साथ आए शिक्षित मुसलमानों के एक छोटे दल से मिला. इसमें अमीर अली भी शामिल था. राष्ट्रवादी नेता बिपिन चन्द्र पाल अपनी आत्मकथा में इसका जिक्र करते हुए लिखते हैं – “इन सभी में पैन-इस्लामिक वाइरस का टीकाकरण किया गया. इसके बाद उन्होंने हिन्दुओं की राजनैतिक गतिविधियों से दूरियां बनाना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे हमारे राष्ट्रीय प्रयासों में हिन्दुओं और प्रबुद्ध मुसलमानों के बीच गहरी खाई उत्पन्न होनी लगी.”[vii] मुसलमानों के बीच पनप रहे इस मूवमेंट की ब्रिटिश सरकार को जानकारी थी. सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट, हेमिल्टन ने वायसराय एल्गिन को 30 जुलाई, 1897 को एक पत्र लिखा, “पैन-इस्लामिक काउंसिल के माध्यम से हमें भारत में साजिश और उत्तेजनाओं को भड़काने का नया अवयव मिल गया है.”[viii] सेक्रेटरी ऑफ स्टेट का यही वास्तविक काम था, जिसे पूरा करने की जिम्मेदारी वायसराय पर थी.

ब्रिटिश नीतियों में मुसलमानों के प्रति लगाव और सम्पूर्ण ब्रिटिश विरोधी आंदोलन को धक्का

स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश क्राउन का एकतरफा नियम था कि मुसलमानों को हिन्दुओं के ब्रिटिश विरोधी आंदोलन में शामिल नहीं होने देना. इसके लिए उन्होंने मुस्लिम तुष्टिकरण का इस्तेमाल किया. ब्रिटिश इतिहास में इसके निशान अलीगढ़ में मिलते हैं. सैयद अहमद ने 1869 में इंग्लैंड का दौरा किया और 1870 में लौटने के बाद अपने समुदाय के बीच अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी संस्कृति के प्रसार के लिए जोरदार प्रचार शुरू कर दिया. उन्होंने 1877 में अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की. इतिहासकारों के अनुसार सैयद के प्रयास सामाजिक और धार्मिक सुधारों तक ही सीमित नहीं थे. उन्होंने मुस्लिम राजनीति को एक अलग नया मोड़ दिया जो हिन्दू विरोधी बन गई.[ix]

एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज हिन्दुओं के खिलाफ प्रचार का मुख्य केंद्र बन गया था. उसका निर्देशन एक ब्रिटिश व्यक्ति बेक के पास था जो सैयद अहमद का करीबी दोस्त और मार्गदर्शक था. कॉलेज के मुखपत्र अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजट का संपादन बेक के पास था. उसने हिन्दुओं के राजनैतिक और सामाजिक विचारों पर जहर उगलना शुरू किया. उसने लिखा कि भारत के लिए संसदीय व्यवस्था अनुपयुक्त है और इसके स्वीकृत होने की स्थिति में, बहुसंख्यक हिन्दुओं का वहां उस तरह राज होगा जो किसी मुस्लिम सम्राट का भी नहीं था.[x] मोहम्मद अली जिन्ना ने भी इसी आधार पर पाकिस्तान की मांग की थी.

मुस्लिम लीग का इतिहास भी ब्रिटिश षड्यंत्रों से भरा हुआ है. आगा खान के नेतृत्व में 1 अक्तूबर, 1906 को 36 मुसलमानों का एक दल वायसराय मिन्टो से मिला. इस मुलाकात का मकसद मुसलमानों द्वारा आरक्षण की मांग करना था. मिन्टो ने उनकी सभी मांगों पर सहमती जताते हुए कहा, “मैं पूरी तरह से आपसे सहमत हूँ. मैं आपको यह कह सकता हूँ कि किसी भी प्रशासनिक परिवर्तन में मुस्लिम समुदाय अपने राजनैतिक अधिकारों और हितों के लिए निश्चिंत रहें.”[xi] यह ब्रिटिश सरकार की आधिकारिक घोषणा थी. जिसमें हिन्दू और मुसलमानों को दो अलग राष्ट्रों के रूप में देखा गया. इसी एक मुलाकात ने भारत विभाजन की तारीख लिख दी थी.

इस प्रतिनिधि दल की रचना अथवा योजना खुद ब्रिटिश सरकार ने तय की थी. इसका मकसद मुसलमानों को उस राजनैतिक संघर्ष से दूर रखना था, जिसका संचालन हिन्दुओं द्वारा किया जा रहा था. लेडी मिन्टो लिखती हैं, “यह मुलाकात भारत और भारतीय इतिहास को कई सालों तक प्रभावित करेगी. इसका मकसद 60 मिलियन लोगों को विद्रोही विपक्ष के साथ जुड़ने से रोकने के अलावा कुछ नहीं है.”[xii] ब्रिटिश प्रधानमंत्री रहे रामसे मैक्डोनाल्ड ने इस मुलाकात को ‘डिवाइड एंड रूल’ पर आधारित जानबूझकर और पैशाचिक काम बताया. अपनी पुस्तक ‘अवाकिंग ऑफ़ इंडिया’ में वे यह मानते हैं कि मुसलमानों को हिन्दुओं से ज्यादा मताधिकार मिले हुए थे. संख्या के हिसाब से उनका प्रतिनिधित्व भी ज्यादा था. वे लिखते हैं, “इस योजना का पहला परिणाम दोनों समुदायों को अलग करना और समझदार एवं संविधानप्रिय राष्ट्रवादी लोगों के लिए अड़चनें पैदा करना था.”[xiii]

मैक्डोनाल्ड यह भी खुलासा करते हैं कि मुसलमान नेता कुछ एंग्लो-इंडियन अधिकारियों से प्रेरित थे. इन अधिकारियों ने शिमला और लन्दन कई तार भेजे. जिसमें हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच एक सोची-समझी कलह और द्वेष के आधार पर मुसलमानों के लिए विशेष समर्थन माँगा गया.[xiv] तुष्टिकरण के इसी आधार पर 30 दिसंबर, 1906 को आल इंडिया मुस्लिम लीग बनाई गई. कराची में 29 दिसंबर, 1907 लीग के अधिवेशन में इसके उद्देश्य और लक्ष्य निर्धारित किये गए. इसमें सबसे प्रमुख ब्रिटिश सरकार और भारत के मुसलमानों के बीच वफादारी को बढ़ावा देना था.[xv]

प्लासी के युद्ध (1757) के बाद ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जड़ों को उखाड़ फेंकने का सुनहरा अवसर 1857 का स्वतंत्रता संग्राम था. चूंकि यह हिन्दुओं द्वारा शुरू किया गया था तो मुस्लिम नेतृत्व ने इसमें दिलचस्पी नहीं ली. जैसे की एक मुस्लिम नवाब ने एक ब्रिटिश अधिकारी को बताया कि विद्रोहियों में अधिकतर हिन्दू थे और वह उन्हें पसंद नहीं करता था. इसलिए वह नवाब अपने शहर में ही रहा. इस तरह उसने ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रति अपनी स्वामी भक्ति का प्रदर्शन किया.[xvi] बाद में ऐसे मौकों को ब्रिटिश क्राउन ने बंटवारा, तुष्टिकरण और साम्प्रदायिकता में बदल दिया. मुसलमानों ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ राजनैतिक आंदोलन से खुद को अलग कर लिया. उन्हें लगने लगा कि मुस्लिम हित अंग्रेजों के हाथों में काफी सुरक्षित हैं. फलस्वरूप अगले 90 सालों तक मुसलमानों ने अंग्रेजों की सर्वोपरिता को स्वीकार कर लिया.

देवेश खंडेलवाल

 

[i] Theodore Martin, The Life of the Prince Consort, vol. 4, Smith: London, 1879, p. 19

[ii] House of Lords, The Mutiny in India – Question, 13 July, 1857

[iii] Ewing Harding, From Palmerstone to Disraeli, 1856-1876, G. Bell: London, p. 1913, pp. 5-9

[iv] Marquis of Lorne, Viscount Palmerstone, Harper & Brothers: New York, 1892, p. 185

[v] Proclamation by the Queen in Council, to the Princes, Chiefs, and People of India, 1 November, 1858

[vi] Wilfrid Scawen Blunt, Indian Under Ripon, T Fisher: London, 1909, p. 112

[vii] Bipin Chandra Pal, Memories of My Life and Times, Modern Book: Calcutta, 1932, p. 417

[viii] R.C. Majumdar, History of the Freedom Movement in India, volume 1, Frima K.L.: Calcutta, 1962, p. 475

[ix] Ibid., p. 479

[x] Aligarh Institute Gazette, 21 July, 1888, pp. 811-13

[xi] Mary – Countess of Minto, India Minto and Morley 1905-1910, Macmillan: London, 1934, p. 47

[xii] Ibid., pp. 47-8

[xiii] J. Ramsay Macdonald, the Awakening of India, Hodder and Stoughton: London, pp. 176-77

[xiv] Ibid., pp. 176

[xv] G.N. Singh, Landmarks in Indian Constitutional and National Development, 1963, p. 384

[xvi] Wilfrid Scawen Blunt, Indian Under Ripon, T Fisher: London, 1909, pp. 164-65

May 9th 2019, 8:41 am

प्रतिभाशाली बेटियों Aswathi Krishna और Vismaya को शुभकामनाएं

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God’s own country – भगवान का देश यानि केरल की दो बेटियां, इन दोनों बेटियों Aswathi Krishna और Vismaya पर हमें नाज है. दोनों ने सभी विषयों में A+ ग्रेड के साथ SSLC की परीक्षा उत्तीर्ण की है. आतंकी का बेटा उत्तीर्ण होता है तो मीडिया में सुर्खियां बनता है, लेकिन इन प्रतिभाशाली बेटियों की उपलब्धि की ओर किसी का ध्यान नहीं है.

Aswathi Krishna, बलिदानी राधाकृष्णन की बेटी हैं, जिन्हें वामपंथी गुंडों ने पलक्कड़ में जिंदा जला दिया था. उनका कसूर इतना था कि वे संघ परिवार के सदस्य थे. सभी विषयों में A+ ग्रेड हासिल किया है.

Vismaya को तो जानते होंगे, जिसके सवालों का उत्तर किसी के पास नहीं था. दो साल पहले Vismaya के पिता संतोष कुमार की वामपंथी गुंडों ने सरेआम हत्या कर दी थी. विस्मया ने भी सभी विषयों में A+ ग्रेड हासिल किया है.

वामपंथी गुंडों की हिंसा के शिकार अन्य कार्यकर्ताओं के परिवार के बच्चों ने भी परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन किया है.

Veer Balidani Radhakrishnan ji was burned alive by Communist cannibals in Chadayamkala, Palakkad. His daughter Aswathi Krishna won A+ in all subjects in SSLC examination.

Do you remember this girl who asked the emotional question to the murderers of his Father, “Why did you kill my Father?”. Vismaya daughter of Santosh who was butchered by CPM goons passed her SSLC exam in flying colours. She got A+ for all subjects. Congrats Vismaya.

May 8th 2019, 3:54 am

भय्या जी जोशी का निवेदन और उत्कल बिपन्न सहायता समिति द्वारा राहत कार्य

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उड़ीसा में चक्रवाती तूफान से तटीय क्षेत्रों में भारी नुकसान हुआ है. तूफान से शहरी क्षेत्रों में पुरी, भुवनेश्वर, कटक तथा ग्रामीण क्षेत्रों में खोरधा, पुरी, केंद्रपाड़ा, जगतसिंहपुर, जाजपुर जिले अधिक प्रभावित हुए हैं. इन क्षेत्रों में जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है. लोगों के सामने भोजन और पीने के पानी का भी संकट है. कुछ स्थानों पर खुले आसमान के नीचे समय बिताना पड़ रहा है.

ऐसे में प्रभावित क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक राहत कार्य में जुट गए हैं. लेकिन यह कार्य समाज के सहयोग बिना पूर्ण करना सम्भव नहीं है. उत्कल बिपन्न सहायता समिति के कार्यकर्ता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक प्रभावित क्षेत्रों में पहुंच रहे हैं और प्रभावितों तक राहत सामग्री पहुंचाने के लिए परिवहन के लिए सड़क मार्ग को साफ कर रहे हैं.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह तथा उड़ीसा पूर्व के प्रांत संघचालक ने राहत कार्य के लिए आर्थिक सहयोग का आग्रह किया है.

समिति द्वारा राहत कार्य

तूफान की चेतावनी के बाद 03 मई को नजदीकी मलिन बस्तियों से 400 से अधिक लोगों को एक स्थान पर रखा गया था, और उन्हें समय समय पर बना बनाया खाना उपलब्ध कराया गया. समिति ने बड़ी तेजी से राहत कार्य में भागीदारी की, इसके तहत सात क्षेत्रों में – घोडाबाज़ार शिशु मंदिर पुरी, सरस्वती शिशु मंदिर ब्रह्मगिरी, दंडमुलुकुंडापुर, चांदपुर, निमापाडा और यूनिट – 3 सरस्वती शिशु मंदिर भुवनेश्वर राहत सामग्री वितरण के लिए केंद्र बनाए हैं. इसके अतिरिक्त जगतसिंहपुर और कटक में कुछ अन्य राहत सामग्री वितरण केंद्र बनाए जाएंगे. पहले दिन में ही समिति ने 10 क्विंटल से अधिक चूडा, पांच क्विंटल गुड़, पोलीथीन, मोमबत्ती और माचिस के साथ, 10 लाख से भी अधिक पानी की बोतलों का विचरण किया है.

May 7th 2019, 5:51 am

जम्मू कश्मीर में सेना के गुडविल स्कूलों का शानदार प्रदर्शन

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जम्मू कश्मीर में भले ही कुछ लोग सेना पर पत्थरबाजी करते हों, आतंकियों के खिलाफ अभियान में रोड़ा अटकाते हों. लेकिन भारतीय सेना फिर भी आम नागरिकों के साथ खड़ी है, उनकी बेहतरी के प्रयास कर रही है. इसी क्रम में भारतीय सेना द्वारा राज्य में कुल 43 गुडविल स्कूल संचालित किए जाते हैं, जिनमें से 3 सीबीएसई से सम्बद्ध हैं. आर्मी गुडविल स्कूलों का पासिंग प्रतिशत 100% रहा है. जम्मू कश्मीर में संचालित इन गुडविल स्कूलों में 15,000 से भी अधिक छात्र शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, इनमें से अधिकतर जम्मू कश्मीर एजुकेशन बोर्ड से संबद्ध हैं.

सोमवार (मई 06, 2019) को सीबीएसई ने दसवीं के परीक्षा परिणाम जारी किए. राजौरी स्थिति गुडविल स्‍कूल के छात्र हित्‍ताम अयूब ने 94.2 प्रतिशत अंक प्राप्त कर प्रथम स्थान हासिल किया है. भारतीय सेना के अथक प्रयासों से ये स्कूल अशांति के दौर में भी खुले रहते हैं तथा पढ़ाई पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. इन गुडविल स्कूलों से प्रतिभावान छात्र भी सामने आए हैं. एक छात्र तजमुल इस्लाम ने किक-बॉक्सिंग चैंपियनशिप जीत कर राज्य और स्कूल का नाम रोशन किया था.

2017 में कश्मीरी अलगाववादियों ने इन स्कूलों में दी जा रही शिक्षा का विरोध किया था. अलगाववादी सैयद अली शाह गिलानी ने कहा था कि ये संस्थान कश्मीरी छात्रों को अपने धर्म एवं संस्कृति से विमुख कर रहे हैं. अभिभावकों को गुडविल स्कूलों को नज़रअंदाज़ करने की सलाह दी थी. थोड़े फायदे के लिए हम अपनी अगली पीढ़ी को गँवा रहे हैं. गिलानी ने कहा था – “एक देश जो आज़ादी के लिए लड़ रहा है, वो कब्जेदारों को अपने बच्चों की देखरेख करने की इज़ाज़त नहीं दे सकता.” यह अलग बात है कि खुद गिलानी के सभी बच्चे शिक्षा पाप्त कर जीवन की सुख-सुविधा का आनंद उठा रहे हैं.

कश्मीरी स्कूल और शिक्षा हमेशा से अलगाववादियों व आतंकियों के निशाने पर रहे हैं. 2016 में फैलाई गई अशांति के कारण कई सरकारी व प्राइवेट स्कूल 6 महीने तक बंद रहे थे, लेकिन गुडविल स्कूल चलते रहे थे. इधर, गुडविल स्कूलों के अच्छे परिणाम से खफा हिज़्बुल मुजाहिदीन ने छात्रों के विरोध में पोस्टर्स चिपकाए हैं और कहा है कि ऐसा नहीं चलेगा.

2016 में भारतीय सेना ने घाटी में स्कूल चलो अभियान चलाया था, जिसमें छात्रों को स्कूलों में दाखिला लेने के लिए कहा जाता था और उन्हें मुफ़्त में कोचिंग की सुविधा भी दी जाती थी. इतना ही नहीं, इन छात्रों को पढ़ाई के अलावा खेल-कूद सहित अन्य क्रियाकलापों में भी बढ़-चढ़ कर भाग लेना सिखाया जाता है. स्कूलों में प्रशिक्षित एवं योग्य शिक्षक होते हैं. डिजिटल क्लासरूम, आधुनिक लाइब्रेरी और ढांचागत सुविधाएं स्कूलों की विशेषता है.

May 7th 2019, 5:02 am

The Quint ने की खोज – नवरात्रि में व्रत हानिकारक, लेकिन रमजान में रोज़े के फायदे

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नई दिल्ली. द क्विन्ट एक पूंजीवादी मालिक की वामपंथी विचारधारा व हिन्दू विरोध में डूबा वेब पोर्टल है. जो अक्सर हिन्दू त्यौहारों का मजाक बनाने या टिप्पणी करने में कोई कसर नहीं छोड़ता.

वेब पोर्टल ने अप्रैल माह में नवरात्रि के दौरान एक वीडियो प्रकाशित किया था, जिसमें सभी तर्क – कुतर्कों का उपयोग करते हुए यह साबित करने का प्रयास किया गया था कि नवरात्र के दौरान व्रत (फास्ट) रखना स्वास्थ्य व शरीर के लिए किस प्रकार हानिकारक है. व्रत करने से अचानक भार कम होता है, व्रत के बाद जल्दी भार बढ़ जाता है आदि-आदि. वीडियो में अन्ना हजारे, महात्मा गांधी, धर्मों को दिखाते हुए बायोलॉजिकल प्रभावों को बताया गया था. द क्विन्ट की वामपंथी विचारधारा जानने वालों को इस पर कोई हैरानी नहीं हुई.

अब दूसरा पक्ष देखें, रमजान शुरू हो चुका है, रोजे (फास्ट) चल रहे हैं. तो द क्विन्ट ने इस बार भी एक लेख प्रकाशित किया है, फास्ट (रोजे) को लेकर. लेकिन इस बार द क्विन्ट बहुत बड़ी खोज साथ लेकर आया है. द क्विन्ट ने खोज की है कि फास्ट रखने से कैसे शरीर को लाभ होता है, इसके क्या-क्या वैज्ञानिक फायदे हैं, यह दिमाग के लिए बहुत फायदेमंद होता है और तो और हमें फास्ट को नियमित जीवन का हिस्सा बना लेना चाहिए. यानि रोजे रखना फिजिकल एक्सरसाइज की तरह हैं,…………

खुलेआम, हिन्दू विरोधी एजेंडे को चलाने का स्पष्ट उदाहरण है. देश या भारतीय समाज से जुड़ा कोई भी विषय हो, द क्विन्ट अपने वामपंथी एजेंडे के तहत ही पत्रकारिता करेगा.

May 6th 2019, 10:11 am

अमेठी में जबरदस्ती कांग्रेस को डलवाया वोट, पीठासीन अधिकारी बदला

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नई दिल्ली. लोकसभा चुनावों में पांचवें चरण की मतदान प्रक्रिया जारी है. ऐसे में एक बड़ी खबर अमेठी से आई है. अमेठी से भाजपा प्रत्याशी स्मृति जुबिन ईरानी ने कांग्रेस पर बूथ कैप्चरिंग का आरोप लगाया है. आरोप लगाया कि यहां पर पीठासीन अधिकारी कांग्रेस के इशारे पर काम कर रहे हैं और भाजपा का वोट कांग्रेस को डलवा रहे हैं. अमेठी लोस क्षेत्र से कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी उनके सामने हैं.

अमेठी में सुबह सात बजे से मतदान शुरू हुआ. गौरीगंज विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत बूथ संख्या 316 गूजर टोला पर तैनात पीठासीन अधिकारी पर एक महिला ने जबरदस्ती कांग्रेस पार्टी के पक्ष में वोट डालने का आरोप लगाया है. स्मृति ईरानी ने ट्विटर अकाउंट से वीडियो शेयर करते हुए राहुल गांधी पर बूथ कैपचरिंग करने का आरोप लगाया और आयोग से शिकायत की. मामले को संज्ञान में लेते हुए प्रशासन ने तत्काल पीठासीन अधिकारी को हटा दिया है.

हाथ पकड़कर जबरदस्ती पंजा पर धर दिहिन हम देहे जात रहिन कमल पर (महिला स्थानीय भाषा में कह रही है कि वह कमल पर वोट देना चाहती थीं,लेकिन जबरदस्ती उनका वोट हाथ पर यानी कांग्रेस को डलवा दिया गया) यह मामला गौरीगंज के गूजरटोला बूथ नंबर 316 का है, जहां पीठासीन अधिकारी ने जबरदस्ती कांग्रेस के पक्ष में मतदान कराया. जिला निर्वाचन विभाग ने तत्काल मामले का संज्ञान लेते हुए पीठासीन अधिकारी को वहां से हटा दिया है, उनके स्थान पर नए पीठासीन अधिकारी को तैनात कर दिया है. गौरीगंज के उप जिला निर्वाचन अधिकारी अमित कुमार सिंह ने बताया कि मामले की शिकायत मिलते ही पीठासीन अधिकारी को बदल दिया गया है, मामले की जांच की जाएगी.

May 6th 2019, 5:55 am

श्रीलंका ने 200 मौलवियों सहित 600 विदेशियों को देश से निष्कासित किया

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नई दिल्ली. श्रीलंका में ईस्टर संडे पर हुए बम धमाकों के पश्चात कट्टरपंथियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है. बम धमाकों के बाद सरकार ने बुर्के पर प्रतिबंध लगाया. अब श्रीलंका सरकार ने एक और बड़ा कदम उठाया है. सरकार ने 600 विदेशी नागरिकों को देश से निष्कासित कर दिया है. देश से बाहर निकाले गए इन लोगों में 200 मौलवी भी शामिल हैं.

श्रीलंका के गृहमंत्री वाजिरा अबेवारदेना ने बताया कि हालाँकि इन मौलवियों ने कानूनी रूप से देश में प्रवेश किया था, लेकिन हमलों के बाद पाया गया कि ये लोग वीजा अवधि के खत्म होने के बाद भी ठहरे हुए थे. इसके लिए इन पर जुर्माना भी लगाया गया था, लेकिन हमले के बाद सुरक्षा कारणों की वजह से इन्हें देश से निष्कासित कर दिया गया.

देश में मौजूदा स्थिति को देखते हुए वीजा प्रणाली की समीक्षा की गई, जिसमें धार्मिक उपदेशकों यानी मौलवियों आदि के लिए वीजा प्रतिबंधों को अधिक कड़ा करने का फैसला किया है. अबेवारदेना ने कहा कि पिछले एक दशक से देखा जा रहा है कि देश में धार्मिक संस्थान विदेशी उपदेशकों को तवज्जो दे रहे हैं. उन्हें इस बात से कोई समस्या नहीं है, लेकिन हाल के दिनों में कुछ धार्मिक संस्थान इस मामले में काफी अधिक संख्या में फैल गए हैं. जिस पर ध्यान देने की अधिक आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि सरकार इस आशंका में देश की वीजा नीति को खत्म कर रही है कि विदेशी मौलवी आत्मघाती बम विस्फोटों के लिए स्थानीय लोगों को कट्टरपंथी बना सकते हैं.

गृहमंत्री ने देश से निष्कासित किए गए लोगों की राष्ट्रीयता के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है, लेकिन श्री लंका की पुलिस का कहना है कि देश में हुए आत्मघाती हमलों के बाद पाया गया कि बांग्लादेश, भारत, मालदीव और पाकिस्तान से आए कई विदेशी वीजा की अवधि खत्म हो जाने के बाद भी यहाँ ठहरे हुए थे.

May 5th 2019, 11:58 am

लेकिन, कांग्रेस ने पाकिस्तान और शेख अब्दुल्ला की धमकियों के कारण विधेयक पास नहीं होने दिया

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भाग – 2

1964 में तमाम दल आर्टिकल 370 को हटाने के लिए एकजुट थे

भारतीय जनसंघ के सांसद यू.एम. त्रिवेदी 13 मई, 1964 को किसी प्रस्ताव पर लोकसभा में बोल रहे थे. हालाँकि यह प्रस्ताव जम्मू-कश्मीर पर नहीं था, फिर भी चर्चा में उन्होंने अनुच्छेद 370 को समाप्त करने का मुद्दा उठा दिया. त्रिवेदी ने जोर देते हुए कहा, “अनुच्छेद 370 को समाप्त करने में क्या अड़चन आ रही है?” यहाँ से उस दौर का सूत्रपात हुआ, जब अनुच्छेद 370 को हटाने के लिए विपक्ष एकमत था. इस सम्बन्ध में लोकसभा में शानदार भाषण दिए गए. इतिहास का सही ज्ञान और तथ्यों का भरपूर इस्तेमाल किया गया. यही नहीं जो तार्किक कमियां निकाली गईं, उनका भी स्पष्ट जवाब दिया गया.

बताया गया कि अनुच्छेद 370 के हटने से अस्थिरता और अनिश्चितता पैदा होगी. कम्युनिस्ट पार्टी के सरजू पाण्डेय ने इसका खूबसूरती से उत्तर दिया, “वहां की जनता में विश्वास पैदा करना चाहिए कि कश्मीर आपके साथ ही रहेगा और वहां अस्थिरता का सम्बन्ध है, वह बहुत दिनों तक कायम नहीं रहेगी. कांग्रेस (आई) के भगवत झा आज़ाद ने भी खुलकर कहा, “मेरे कुछ साथी कहते हैं कि कश्मीर से कि उनको धारा 370 से नुकसान हुआ, लेकिन मैं कहता हूँ कि कश्मीर हमारे भारत देश का अविभाज्य अंग है और इसलिए सारे देश को नुकसान हुआ है. इसलिए जितनी जल्दी आप (सरकार) धारा 370 को समाप्त कर देंगे, उतनी जल्दी ही यह अनिश्चितता समाप्त हो जाएगी.”

इसमें दो राय नहीं है कि शेख अब्दुल्ला ने अनुच्छेद 370 की आड़ में जम्मू-कश्मीर में अराजकता को बढ़ावा दिया. जवाहरलाल नेहरू ने शेख पर भरोसा किया, लेकिन उसकी मंशा को समझने में देरी की. साल 1953 में जब शेख को गिरफ्तार किया गया तो कुछ दिनों बाद ईद का त्यौहार आने वाला था. चूँकि, वे पहले ही गिरफ्तार कर लिए गए तो त्यौहार वाले दिन वे अपना भाषण नहीं दे सके. उन दिनों श्रीनगर से ‘महज’ नाम का एक अखबार निकलता था. शेख का वह भाषण उस अखबार में छापा गया. जिसका सार था कि राज्य की जनता भारत के साथ नहीं सकती.

संसद सदस्यों ने कहा कि अनुच्छेद 370 की बदौलत ही शेख की हिम्मत थी कि वे घाटी में बैठकर जनता को बरगलाता था. भ्रम में रखकर उन्हें डरता और धमकाता था. एक सांसद तो यहाँ तक कह गए कि शेख और फारुख सरीखे लोगों को नेता माना जाए, यह शर्म की बात है.” शेख को झूठे प्रचार में महारत हासिल थी, जबकि तथ्य दूसरी दिशा की ओर इशारा करते हैं. साल 1964 में जम्मू-कश्मीर की कुल आबादी 35.5 लाख थी. जिसमें जम्मू के 15.7 लाख और लद्दाख से 88 हज़ार लोग शामिल थे. बाकि 19 लाख की जनसँख्या कश्मीर घाटी में रहती थी. यह सभी शेख के समर्थक हों, इसकी संभावना न के बराबर है. पहले भारत सरकार ने शेख को गिरफ्तार किया, फिर रिहा कर दिया और आखिर में दिल्ली बातचीत के लिए बुलाया. लगभग इसी समय तक संसद में अनुच्छेद 370 को हटाने का एक प्रस्ताव 11 सितम्बर, 1964 को पेश किया जा चुका था. यह एक सुनहरा अवसर था, जब विपक्ष और सरकार आपसी तालमेल से इस दिन को ऐतिहासिक बना सकती थी.

प्रकाशवीर शास्त्री के इस विधेयक पर गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने 04 दिसंबर, 1964 को जवाब दिया. सरकार की तरफ से आधिकारिक बयान में उन्होंने एकतरफा रुख अपनाया. जब अन्य सदस्यों ने इसका विरोध किया तो नंदा ने कहा, “यह मेरा सोचना है, अन्यों को इस पर वाद-विवाद नहीं करना चाहिए.” इस तरह का एक अलोकतांत्रिक तरीका अपनाया गया. नंदा पूरी चर्चा में अनुच्छेद 370 के विषय को टालते रहे. वे बस इतना ही कह पाए कि विधेयक में कुछ क़ानूनी कमियां हैं. जबकि इसमें सरकार की कमजोरी साफ़ दिखाई देती है. अगर कुछ कमियां थीं तो सरकार स्वयं उसे सिलेक्ट कमेटी को भेज सकती थी. इसके बाद एक पूर्ण विधेयक सदन के समक्ष पेश किया जा सकता था.

कानून के जानकारों सहित पूरा विपक्ष इस बात से सहमत था कि जम्मू-कश्मीर के मामले में सरकार ने गलत तरीके से काम किया है. अनुच्छेद 370 पर पिछले 17 सालों में पहली बार प्रस्ताव सदन के समक्ष था. यह एक मौका इसलिए बेकार चला गया क्योंकि शेख और पाकिस्तान सामने दीवार बनकर खड़े हो गए थे. क्योंकि शेख ने नया राग अलापना शुरू कर दिया था. दिल्ली में हुई बातचीत में शेख भारत सरकार से एक और समझौता करना चाहते थे. उनके मुताबिक उनकी बात अगर सरकार मानती है तो भारत में धर्मनिरपेक्षता के साथ पाकिस्तान की बात और कश्मीर की बात भी कायम रहेगी. यह अजीब कदम इसलिए उठाया गया, जिससे अनुच्छेद 370 पर यथास्थिति बनी रहे. वहीं पकिस्तान के विदेश मंत्री ने कहा कि अनुच्छेद 370 को हटाने से खतरनाक स्थिति सामने आ जाएगी.

यह जानते हुए कि देश के संविधान में क्या होगा अथवा नहीं, इसका पाकिस्तान से कोई लेना देना नहीं है. बावजूद इसके तत्कालीन भारत सरकार ने दुर्बल रवैया अपनाया. दूसरी ओर शेख अब्दुल्ला पाकिस्तान के संपर्क में थे और विभाजन के रास्ते पर चल पड़े. संसद में चर्चा से एक-दो दिन पहले ही उन्होंने श्रीनगर में भारत सरकार के खिलाफ बयानबाज़ी की थी. उसी शेख की बातों में आकर सरकार ने व्हिप जारी कर दिया कि इस विधेयक पर मत न दिया जाए. इस प्रकार अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध किया गया.

सरकार ने अपनी कमजोरी अथवा शिथिलता को छिपाने के लिए व्हिप थोपा था. प्रकाशवीर ने इसका विरोध करते हुए सदन के समक्ष शानदार निवेदन किया, “मैं अपने उन भाइयों से कहना चाहता हूँ कि यदि वे मेरे विधेयक के विरोध में मत देंगे तो हो सकता है कि यह विधयेक गिर जाए, लेकिन वे याद रखें कि हिन्दुस्तान का इतिहास उन्हें कभी इस बात के लिए क्षमा नहीं कर सकेगा. वे आज अपनी आत्मा की आवाज़ के आधार पर मत दें, किसी व्हिप के आधार मत न दें. पार्टियाँ छोटी होती हैं, देश सबसे बड़ा होता है. इतिहास में जब यह लिखा जाएगा कि इस प्रकार सर्वसम्मत समर्थन मिलने के बाद भी केवल एक मंत्री के खड़े होकर विरोध के कारण सब लोगों की राय बदल गयी, तो लोकसभा के इतिहास में जनतंत्र की भी हत्या हो जाएगी और वे भी अपनी आत्मा की हत्या कर देंगे.”

समाप्त…

देवेश खंडेलवाल

May 3rd 2019, 7:27 pm

संघ और राजनीति

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्थापना के समय से ही स्वयं को सम्पूर्ण समाज का संगठन मानता, बताता रहा है. स्वतंत्रता के पश्चात भी संघ की इस भूमिका में कोई अंतर नहीं आया. इसलिए स्वतंत्रता के पश्चात 1949 में संघ का जो संविधान बना उस में भी यह स्पष्ट है कि यदि कोई स्वयंसेवक राजनीति में सक्रिय होना चाहता है तो वह किसी भी राजनैतिक दल का सदस्य बन सकता है. यह संविधान भारतीय जनसंघ की स्थापना के पहले बना है. जनसंघ की स्थापना के बाद भी, उसमें अनेक स्वयंसेवक और प्रचारकों को देने के बाद भी इस में कोई बदल नहीं हुआ है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में एकाधिक दल होना स्वाभाविक ही है. संघ के सम्पूर्ण समाज का संगठन होने के नाते यह भी स्वाभाविक ही है कि समाज का कोई भी क्षेत्र संघ से अस्पर्शित नहीं रहेगा और स्वयंसेवक समाज जीवन के हर क्षेत्र में अपनी राष्ट्रीय दृष्टि लेकर जाएँगे. ऐसे में चूँकि कुछ स्वयंसेवक राजनीति में सक्रिय हैं, इसलिए संघ राजनीति करता है, या वह राजनीतिक दल है, यह कहना अनुचित और ग़लत होगा. राजनीतिक दल समाज के केवल एक हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं और समाज का दूसरा हिस्सा भी होता है. संघ जब सम्पूर्ण समाज का संगठन है तो यह “सम्पूर्ण” किसी एक “हिस्से” का हिस्सा कैसे बन सकता है? Party stands for a ‘part’ and there is bound to be a ‘counter part’. Sangh stands for the entire society. Conceptually RSS and Hindu society are co-terminus and psychologically they are one. Then how can the “Whole” be a party to a “part”? संघ स्थापना (1925) के बाद 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेते समय डॉ. हेडगेवार, अन्य स्वयंसेवक के साथ सत्याग्रह के लिए जाने से पहले, सरसंघचालक का दायित्व अपने सहकारी डॉ. परांजपे को सौंपकर, व्यक्तिगत तौर पर सत्याग्रह में सहभागी हुए थे और उसके लिए उन्हें एक वर्ष सश्रम कारावास की सज़ा हुई. स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात गृहमंत्री सरदार पटेल द्वारा संघ को कांग्रेस में विलीन करने का प्रस्ताव आने पर श्री गुरुजी ने उसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि संघ एक दल बनना नहीं, अपितु सम्पूर्ण समाज का संगठन करना चाहता था. राजनीति में एक राष्ट्रीय विचार के दल की आवश्यकता को ध्यान में रख कर संघ ने यह रिक्तता पूरी करनी चाहिए, ऐसा डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी द्वारा प्रस्ताव आने पर श्री गुरुजी ने उन्हें स्पष्ट कहा कि यह काम आप कीजिए, संघ आपको सहायता करेगा, परंतु संघ सम्पूर्ण समाज के संगठन का अपना कार्य ही करता रहेगा. आपातकाल के बाद 1977 के लोकसभा के चुनाव के समय जनता पार्टी की सरकार बनने में संघ स्वयंसेवकों का महत्वपूर्ण योगदान था. अनेक दलों को लेकर बनी जनता पार्टी में, अर्थात् सत्ता में, सहभागी होने का आकर्षक प्रस्ताव आने पर भी तत्कालीन सरसंघचालक श्री बालासाहेब देवरस ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए यह कहा कि विशिष्ट परिस्थिति में संघ इस चुनाव में सहभागी हुआ था. अब संघ अपने नियत कार्य, सम्पूर्ण समाज के संगठन के कार्य में ही लगेगा. यह सब समझने के लिए समाज में संगठन नहीं, सम्पूर्ण समाज को ही संगठित करने के संघ के विचार के पीछे की भूमिका समझना आवश्यक है. संघ की 2018 की प्रतिनिधि सभा में संघ के ज्येष्ठ स्वयंसेवक श्री मा. गो. वैद्य, संघ के सरकार्यवाह के निमंत्रण पर प्रतिनिधि सभा में आए थे. उस दिन उनका 95वाँ जन्म दिन था. वे 8 वर्ष की आयु से (1931 में) संघ के स्वयंसेवक बने. तब से लगातार सक्रिय हैं. उस निमित्त पूजनीय सरसंघचालक द्वारा उनका सम्मान और अभिनंदन किया गया. उस समय अपना मनोगत व्यक्त करते समय श्री मा. गो. वैद्य जी ने कहा, “संघ को समझना आसान नहीं है. पश्चिम के द्वंद्वात्मक (Binary) सोच से संघ को समझना सम्भव नहीं. भारतीय सोच की एकात्म दृष्टि से ही आप संघ को समझ सकते हैं. “ईशावास्य उपनिषद” के पाँचवे मंत्र में आत्म तत्व का वर्णन करते समय उपनिषदकार कहते हैं - तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके. तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः.. “वह आत्म तत्व चलता है और नहीं भी चलता है. वह दूर है और समीप भी है. वह सब के अंतर्गत है और वही सब के बाहर भी है.” यह बात परस्पर विरोधी लगने वाली है, फिर भी सत्य है. कुछ ऐसी ही बात संघ पर लागू होती है. संघ सम्पूर्ण समाज का संगठन है. और समाज का स्वरूप व्यामिश्र होता है. समाज के सांस्कृतिक, मज़दूर, विद्यार्थी, शिक्षा, सेवा, राजनीति, धार्मिक ऐसे विभिन्न क्षेत्र रहेंगे. सम्पूर्ण समाज के संगठन में ये सभी पहलू आएँगे. पर संघ, किसी एक अंग का संगठन नहीं है वह सम्पूर्ण समाज का संगठन है. संघ स्वयंसेवक सामाजिक, सांस्कृतिक, शिक्षा, राजनीति, सेवा, धार्मिक आदि सभी क्षेत्रों  में सक्रिय होते हुए भी संघ इसमें से केवल कोई भी एक संगठन नहीं है. संघ इससे ऊपर भी कुछ है. वह सम्पूर्ण समाज का संगठन है. जैसे पुरुषसूक्त में उसका वर्णन है कि ‘वह पृथ्वी सहित सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त हो कर भी दस ऊँगली शेष बचता है.’ (स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशान्गुलं.) इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि अणु वैज्ञानिकों ने एक समय यह कहा था कि अणु अविभाज्य है. फिर उन्होंने कहा कि अणु विभाज्य है और उसमें मुख्यतः तीन कण(Particles) होते है. इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन. फिर कहने लगे कि तीन ही नहीं और भी अनेक सूक्ष्म कण होते है. फिर वे कहने लगे कि वे कण नहीं, वे तरंग(waves) के समान गुणधर्म दिखाते हैं. फिर आगे और खोज हुई तो कहने लगे कि वे दोनों हैं, कण भी और तरंग भी. फिर हेसनबर्ग ने कहा कि यह अनिश्चित ही है कि वह कण है या तरंग है. वास्तविक वह कभी भी कुछ भी हो सकता है. इसे “हेसनबर्ग का अनिश्चितता का तत्व” के नाम से जाना जाता है. Heisenberg’s uncertainty principle. यही बात “ईशावास्य उपनिषद” भी कहता है. इसको समझेंगे तो ही भारतीय चिंतन की एकात्म दृष्टि (Integral approach), (“ द्वंद्वात्मक” नहीं not  Binary approach) को आप समझ सकेंगे. तो ही संघ के असली स्वरूप को आप समझ सकेंगे ऐसा उन्होंने (श्री मा. गो. वैद्य) कहा. इसलिए संघ सम्पूर्ण समाज का संगठन होने के कारण, और राजनीतिक क्षेत्र समाज का एक अंग होने के नाते इस क्षेत्र में भी स्वयंसेवक सक्रिय होंगे. चुनाव यह लोकतंत्र का उत्सव होने के कारण अधिकाधिक मतदान हो और वह स्थानिक मुद्दे या छोटे विषयों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय दृष्टिकोण से समुचित विचार कर राष्ट्र के हित में लोग मतदान करें, ऐसा जनजागरण भी स्वयंसेवक एक जागृत नागरिक के नाते करेंगे. संघ का संविधान किसी भी स्वयंसेवक को (संघ के पदाधिकारी नहीं) किसी राजनीतिक दल या उम्मीदवार का प्रचार करने से रोकता नहीं है. परंतु 90% स्वयंसेवक किसी दल या उम्मीदवार के नाम का पर्चा न लेकर राष्ट्रीय मुद्दों के बारे में ही जागरण करते दिखेंगे. ऐसा होते हुए भी संघ एक राजनीतिक दल या राजनीतिक दल का हिस्सा नहीं बनता है. वह सम्पूर्ण समाज का संगठन ही है. इसे भारतीय चिंतन की एकात्म दृष्टि और “ईशावास्य उपनिषद” की दृष्टि से समझा जा सकता है. डॉ. मनमोहन वैद्य सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

May 3rd 2019, 8:18 am

‘भगवा आतंक’ की कहानी के पीछे थी राजनीतिक साजिश

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डॉ. प्रवीण तिवारी दो दशक से प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ टेलीविजन पत्रकार के तौर पर जुड़े हुए हैं. इस दौरान उन्होंने मीडिया, अध्यात्म और प्रेरणापरक 7 पुस्तकें लिखी हैं. 'सत्य की खोज' उनकी पहली पुस्तक थी, जिसे पाठकों ने बहुत पसंद किया था. इसी कड़ी में हाल ही में उनकी पुस्तक 'आतंक से समझौता' भी प्रकाशित हुई, जिसे उन्होंने दो वर्ष के गहन शोध के आधार पर लिखा है. यह पुस्तक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें तथ्यों के आधार पर संप्रग सरकार के दौरान चलाए गए 'भगवा आतंक' के जुमले की बखियां उधेड़ी गई हैं और स्पष्ट किया है कि कैसे कांग्रेस के कई नेता और तत्कालीन गृह मंत्री तक आतंकी हमलों की आड़ में 'हिन्दुत्व' को बदनाम करने की साजिश में लगे हुए थे. पाञ्चजन्य ने इस पुस्तक के विषय को केंद्र में रख उनसे विस्तृत बात की. बातचीत के संपादित अंश – 'आतंक से समझौता' जैसी पुस्तक लिखने का विचार आपके मन में कैसे आया? देखिए, आतंकवाद लंबे समय से वैश्विक समस्या का रूप ले चुका है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह स्पष्ट तौर से देखने को मिला कि भारत में इस समस्या का न केवल घेरा बढ़ा, बल्कि देश इसकी अत्यधिक चपेट में आया. एक के बाद एक हमलों, धमाकों की गूंज ने देश के लोगों को परेशान करके रखा हुआ था. लेकिन इसी बीच एक षड्यंत्र रचा जाता है. भारतीय राजनीति में वैसे तो बहुत-सी साजिशें हुई हैं, लेकिन यह बहुत ही गंभीर षड्यंत्र था. मैं इसे इसलिए गंभीर मानता हूं कि क्योंकि आतंकवाद सिर्फ भारत की ही नहीं बल्कि दुनिया की समस्या है. मैं किसी राजनीतिक पार्टी की बात नहीं करता, लेकिन उन्हीं लोगों द्वारा जब आतंक के खिलाफ लड़ाई को कमजोर किया जाता है तो इससे बड़ा षड्यंत्र मानव मात्र के लिए हो ही नहीं सकता. लेकिन फिर भी ऐसा षड्यंत्र हमारे देश में हो रहा हो तो इससे गंभीर बात और क्या हो सकती है? इस साजिश के तहत आतंकी घटनाओं को भगवा रंग से जोड़ने की कोशिश सतत की जा रही थी. एक ऐसा रंग जिसका संबंध दूर-दूर तक आतंक से नहीं जुड़ता. लेकिन फिर भी इसके तार एक धर्म विशेष, संस्था विशेष और पार्टी विशेष से जोड़ने के कुत्सित प्रयास किए जाते हैं तो निश्चित ही यह यकीन करना पड़ता है कि कुछ लोग राजनीतिक स्वार्थ के चलते आतंक से समझौता कर रहे हैं. ऐसे में यह मुझे बहुत ही गंभीर समस्या दिखी और एक पत्रकार होने के नाते मेरी जिम्मेदारी बनती है कि इस झूठ को उघाड़कर सच को सामने लाया जाए. अब यह सच किताब रूप में सामने है. 'भगवा आतंकवाद' के बारे में आपने विस्तार से लिखा है. यह आपस में पूरी कहानी दर्जनों लोगों के ईदगिर्द घूमती है. आपने तथ्यों को मजबूत आधार देने के लिए कौन सी पुस्तकें खंगाली, संदर्भ कहां से जुटाए, शोध का आधार क्या रहा, जिससे आप सच को सामने लाने में कामयाब रहे? मैं लगातार इस मसले पर बड़ी बारीकी से नजर रख रहा था. पुस्तक लिखने के शुरुआती दौर में मैंने ब्लॉग पर लिखना शुरू किया. इस दौरान मेरे सवालों का दायरा बड़ा होता गया और इससे जुड़ने वाले महत्वपूर्ण लोगों से मेरी एक के बाद एक मुलाकात होती गई. इसमें एफएसएल के पूर्व निदेशक बी.एम. मोहन भी थे, जिन्होंने मालेगांव धमाके में शामिल सिमी के सभी आतंकियों का नार्को टेस्ट किया था. इसके अलावा संयुक्त खुफिया कमेटी के पूर्व प्रमुख डॉ. बी.डी. प्रधान से भी बातचीत हुई. उन्होंने जो बताया, वह बहुत ही चौंकाने वाला था. उन्होंने कहा कि हम लादेन के बारे में अमेरिका को जानकारी दे रहे थे पर हमारे घर में किसने क्या किया, हमें इसकी जानकारी नहीं थी. लेकिन सच में ऐसा था नहीं. इसी तरह कई खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों, खुफिया पत्रकारों, अधिवक्ताओं, तमाम पत्र-पत्रिकाओं के संदर्भ के साथ कई लोगों के साक्षात्कार से यह प्रामाणिक पुस्तक पूर्ण हुई. इसमें मैंने यह बताने की कोशिश की है कि कथित 'भगवा आतंक' शब्द जो खोज निकाला गया, वह पूर्णत: राजनीति से प्रेरित और इतना खतरनाक है कि इसे वैश्विक आतंकवाद से समझौता करने जैसा कदम कहा जाए तो गलत नहीं होगा. समझौता धमाके को कथित भगवा आतंक से जोड़ा गया, लेकिन अब सच सामने आ रहा है और जिन्हें फंसाया गया था वे निर्दोष साबित हो गए हैं. क्या कहेंगे इस पर? जब ये लोग निर्दोष साबित नहीं हुए थे, तभी मैंने यह बात कही थी कि ऐसा होगा. दरअसल आपको यह देखना होगा कि इस पूरे मामले का आधार क्या है. आप किसी एक व्यक्ति को पकड़कर जज के सामने उसका बयान कराते हैं और उस के आधार पर पूरे षड्यंत्र की रचना करते हुए पूरी कहानी गढ़ते हैं. कथित 'भगवा आतंक' की कहानी क्या है? स्वामी असीमानंद ने जज के सामने जो एक बयान दिया था. यह बयान न्यायालय में जज के सामने दिया गया, लेकिन इसे जमकर प्रचारित किया गया. इसके पीछे की मंशा स्पष्ट थी कि इसे अपने लोगों के जरिए मीडिया में चलाया जाए और 'भगवा आतंक' की थ्योरी को पुष्ट किया जाए. इस साजिश का मैंने पुस्तक में विस्तार से खुलासा किया है. लेकिन वहीं दूसरी ओर आतंकवादियों के सारे सबूत मिलने के बाद भी उन्हें नजरअंदाज किया गया और मात्र एक बयान को आधार बनाकर पूरी कहानी गढ़ दी गई. मेरा मानना है कि यह बहुत बड़ा राजनीतिक षड्यंत्र था. तत्कालीन गृह मंत्री पी.चिदंबरम ने हिन्दू आतंकवाद का जुमला उछाला, फिर राहुल गांधी द्वारा यह कहा जाना कि इस्लामिक आतंकवाद से ज्यादा बड़ी चुनौती 'हिन्दू आतंकवाद' है. इसी तरह सुशील शिंदे, दिग्विजय सिंह द्वारा लगातार 'भगवा आतंक' की थ्योरी गढ़ने के पीछे क्या वजह रही? क्या अपने स्वार्थ के लिए समाजहित, धर्महित, देशहित सब पीछे हो जाते हैं इनके लिए? देखिए, आपने जितने लोगों के नाम लिए हैं, उनके जीवन, जीवन का उद्देश्य क्या है और वे कितनी समाज में अपनी भागीदारी दे पाए हैं, उस पर गौर करना होगा. कुर्सी के लालच में, यह उनकी मजबूरी बन जाती है कि वे साम, दाम, दंड, भेद करते हुए अपने आलाकमान की स्वार्थ सिद्धियों में लगे रहें. ये रात दिन इस उधेड़बुन में लगे रहते हैं कि भाजपा और उसकी समर्थित संस्थाओं को कमजोर करने के लिए क्या कर सकते हैं. क्योंकि सत्ताधारी दल नीति पर बात नहीं कर सकता क्योंकि नीति वह खुद ही बनाता है. इसलिए विपक्षी पार्टी की जड़ को कमजोर करने के लिए हमला करता है. देश में शुरुआत से ही भाजपा और सहयोगी संस्थाओं को सनातन व्यवस्था से जोड़कर देखा जाता रहा है. उस समय कांग्रेस के नेताओं के बीच गृह मंत्रालय को लेकर खींचतान जारी थी. इस कतार में जो बड़े चेहरे सामने आए उनमें शिवराज पाटिल, सुशील कुमार शिंदे, पी. चिदंबरम शामिल थे. उस समय दिग्विजय सिंह को कोई महत्वपूर्ण पद नहीं मिला. लेकिन बावजूद इसके वे लगातार हिन्दुओं पर प्रहार करते रहे और मुस्लिमों का समर्थन करते हुए इतने मदहोश हो गए कि कुख्यात आतंकी ओसामा बिन लादेन को 'जी' तक कहते सुने गए. दरअसल उस समय इनके बीच प्रतिस्पर्धा थी कि कौन हिन्दुत्व पर सबसे तीखा प्रहार करेगा, उसे महत्वपूर्ण पद दिया जाएगा. इसमें पी. चिदंम्बम ने सारी हदें पार कीं थीं. कथित हिंदू आतंकवाद के नाम पर साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित, स्वामी असीमानंद को गिरफ्तार किया गया, असहनीय प्रताड़ना दी गईं, जिन्हें अब न्याय मिल रहा है और निर्दोष साबित हो रहे हैं. क्या उस समय महाराष्ट्र पुलिस, एटीएस, एनआईए सहित अन्य खुफिया एजेंसी महज कांग्रेस सरकार की कठपुतली बन कर रह गई थीं और दवाब में काम कर रही थीं? यह बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है और आप विश्वास करें, जब इस पुस्तक के प्रकाशित होने की खबर साध्वी प्रज्ञा जी को मिली तो उन्होंने रुंधे गले से कहा कि किसी ने तो मेरी बात रखी. वे कैंसर से पीडि़त रही हैं. रीढ़ की हड्डी टूट गई. यह सब इस देश में एक निर्दोष महिला के साथ हुआ. इसमें यह निश्चित ही कहना होगा कि जिसके हाथ में शासन था, हम-सब की सुरक्षा का दायित्व था, अगर उन लोगों द्वारा इस तरह का अत्याचार-अनाचार किया जाता है तो मैं समझता हूं कि इससे गंभीर और कोई मसला नहीं हो सकता. दूसरी बात, आपने जिन-जिन एजेंसियों के नाम लिए हैं वे बहुत ही छोटी कड़ी हैं, इस मामले की, असल खेल तो कहीं और से चल रहा था. कथित 'भगवा आतंक' के जुमले को बहुत ही 'सुनियोजित तरीके' से एक षड्यंत्र का रूप दिया गया था. कांग्रेस के बड़े नेताओं में शुमार - पी. चिदंबरम, कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी कानून के बड़े जानकारों में जाने जाते हैं, लेकिन इसमें किसकी क्या भूमिका रही थी, यह कहना कठिन है. लेकिन कानूनी तौर पर इस मामले को मजबूत करके बहुत अच्छे तरीके से रखा जाए, इसके पूरे प्रयास किए गए. रही बात एजेंसियों के दवाब की तो इस पूरे मामले में एटीएस की जितनी भी कहानी थी उसमें पाएंगे कि यह मालेगांव हमला सिमी के आतंकियों ने किया. एजेंसी फिर कहती है कि 'हिन्दू आतंकियों' ने. उसके बाद एनआईए की जांच से साफ होता है कि एटीएस की जांच में कई खामियां हैं. इस मामले मैं इतना कहना चाहता हूं कि आजादी के बाद का सबसे बड़ा षड्यंत्र अगर कुछ था तो 'हिन्दू आतंकवाद' के जुमले को उछालना. आज जब दुनिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जा-जाकर यह कह रहे हैं कि आतंकवाद की जड़ें पाकिस्तान में हैं तो पिछले दिनों राहुल गांधी कहते थे कि देश में सबसे बड़ा खतरा 'हिन्दू आतंकवाद' है. ऐसे में सवाल उठता है कि यह आतंकवाद से समझौता नहीं तो क्या है? दरअसल इस साजिश को इतने अच्छे से अंजाम दिया गया था कि अगर 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार न आती तो 'भगवा आतंक' को स्थापित कर दिया जाता और सच झूठ बन जाता और झूठ सच हो जाता. सौ में से 99 आतंकी मुस्लिम ही होते हैं. लेकिन जो 'भगवा आतंक' के जुमले गढ़ते रहे वे कभी मुस्लिम आतंक कहते न तो दिखाई देते हैं और न ही सुनाई. उलटे यही सेकुलर तब यह कहते सुने जाते हैं कि आतंक का कोई 'मजहब' नहीं होता. क्या कहेंगे इस पर? यह बड़ा ही संवेदनशील सवाल है. देखिए जो सच है वह सबके सामने है. दूसरी बात, मैं एक आध्यात्मिक परिवार से आता हूं और सनातन परंपरा में मेरी निष्ठा-आस्था है. मुझे बचपन से स्वामी विवेकानंद जी के बारे में जो जानने को मिला है, उसके मुताबिक हर मत-पंथ का सम्मान करना है. मैं उन्हें अपना पुरखा मानता हूं, इसलिए उनकी बात भी मानता हूं. लेकिन गंभीर बात यह कि जन्म लेने के बाद बच्चे को क्या सिखाया जाता है? उसमें क्या संस्कार डाले जाते हैं? सनातन व्यवस्था ऐसी है कि यहां प्रत्येक के लिए संस्कृति, सांस्कृतिक विरासत और एक अनुशासन है. इसमें अनेक मत-मतांतर हैं, लेकिन जब बात राष्ट्रीयता की आती है तो सबकी भावना समान होती है. दूसरी ओर अन्य जगह हमें यह देखना होगा कि सनातन परंपरा का अनुपालन कहां हो रहा है और कहां अनदेखी? मेरा मानना है कि सर्वधर्म समभाव, सर्वे भवन्तु सुखिन: और वसुधैव कुटुंबकम् जैसी अवधारणा जो सबको प्रेम करना सिखाती है, सबके सुख की कामना करती है, की अनदेखी जहां पर भी होगी, वहां-वहां पर आतंक पनपेगा, आतंकी बनेंगे. एक दौर ऐसा भी रहा जब पत्र-पत्रिकाओं, टीवी मीडिया और चुनिंदा समाचार पत्रों में 'एक्सक्लूसिव' खबरों के नाम पर कथित भगवा आतंक को स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा था. आप मुख्य धारा मीडिया के अंग रहे हैं और उस समय की खबरों को आपने नजदीक से देखा है. इस साजिश को आप कैसे देखते हैं? मैंने पूरा का पूरा एक अध्याय तहलका, कारवां और कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं की उस समय की रिपोर्टिंग को केंद्रित करते लिखा है. चूंकि मैं पत्रकार हूं तो कोई भी बात बड़ी जिम्मेदारी के साथ रखूंगा. मैंने वही लिखा जिसके प्रमाण मेरे पास हैं. आज जो लोग सवाल कर रहे हैं कि मीडिया अपनी विश्वसनीयता खो रहा है, वही प्रश्न उन लोगों ने उस समय क्यों नहीं उठाए, जब कुछ लोगों द्वारा मीडिया में बड़ी ही प्रमुखता के आधार पर 'भगवा आतंकवाद' को कही-सुनी बातों के आधार पर प्रचारित किया जा रहा था. यकीनन उस समय मीडिया का इस्तेमाल सार्वजनिक रूप से किया गया. कौन था जो उस समय मीडिया के चुनिंदा लोगों को सूचनाएं दे रहा था? एनआईए और एटीएस के महत्वपूर्ण दस्तावेज, जो बिल्कुल गोपनीय थे, वे मीडिया को किसने उपलब्ध कराए? ये तमाम सवाल साफ कहते हैं कि कहीं न कहीं सरकारी एजेंसियां इसके लिए जिम्मेदार थीं, जो सीधे-सीधे एक राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाने का काम कर रही थीं. भगवा आतंक को लक्षित करते हुए उस समय की सरकार और एजेंसियों का असल निशाना क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ था? बिल्कुल, संघ ही लक्ष्य था. इसके ऊपर मेरी किताब में पूरा एक खंड है. छोटे-छोटे कार्यकर्ताओं के जरिए संघ के बड़े अधिकारियों तक पहुंचना इस साजिश का हिस्सा था. इसके जरिए वह संघ के बारे में यह स्थापित करना चाहते थे कि संघ अतिवादियों-आतंकियों को प्रशिक्षण देता है. कांग्रेस के बड़े नेता और तत्कालीन गृह मंत्री सुशील शिंदे ने तो खुद कहा था कि संघ आतंकियों को प्रशिक्षण देता है. ऐसा नहीं था कि यह बयान कोई ऐसे ही आया हो, यह एक साजिश का हिस्सा था. इसकी गंभीरता को समझने की आवश्यकता है. वह संघ को कठघरे में खड़ा कर संघ के बड़े अधिकारियों को इस साजिश का हिस्सा बनाना चाहते थे और इसकी भरसक कोशिश भी की. और इसी साजिश को देखते हुए संघ को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक जाना पड़ा और उन्होंने स्वतंत्र जांच की मांग करनी पड़ी. मुंबई एटीएस के प्रमुख हेमंत करकरे की आतंकी हमले में हुई मौत को 'भगवा आतंकियों' की एक साजिश से जोड़ने की कोशिश की गई थी. क्या यह साजिश प्रशासन, खुफिया एजेंसियों और पुलिस अधिकारियों के मन में हिन्दुओं के प्रति घृणा का भाव पैदा करने और फांक डालने का प्रयास थी? निश्चित तौर पर यह कह सकते हैं. कथित पत्रकार अजीज बर्नी ने '26/11 आरएसएस की साजिश' पुस्तक लिखी थी, जिसका विमोचन कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने किया था. जबकि उस समय अमेरिका तक बता रहा था कि मुंबई हमले में शामिल आतंकवादी कहां से आए और कौन थे. फिर भी ऐसी पुस्तकें लिखी जाती हैं और छप भी जाती हैं. इस पुस्तक के शीर्षक से ही समझिए कि यह देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की इंतिहां ही तो है कि कोई कुछ भी कहकर निकल लेता है. और यही लोग आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह उठाते हैं. उन्होंने ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की शुरुआत की थी. मुझे लगता हैं कि आतंक से समझौता जो पिछले समय किया गया, उसने सिर्फ एक साजिश को ही रूप नहीं दिया, सोच में भी अभद्रता को भर दिया है. यह सोच इतनी घटिया कर दी गई कि एक तबके द्वारा पुलवामा जैसे हमले के बाद राष्ट्रीय महत्व की चीजों पर भी ओछी टिप्पणी देखने को मिलती है. तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने एनआईए को सिमी के आतंकियों की जमानत का विरोध न करने को कहा था. यानी आतंकी संगठन सिमी पर नरमी और हिन्दू साधु-संन्यासियों पर सख्ती! इस मसले को आप कैसे देखते हैं? यह सच है कि चिदंबरम ने एनआईए को बिल्कुल मना किया था कि हम इन आतंकियों की जमानत का विरोध नहीं करें. लेकिन इसकी कोई ठोस वजह उन्होंने सामने नहीं रखी. यही वह तुष्टीकरण था, जिससे हिन्दू-मुस्लिम में भेद पैदा हुआ. यह कोशिश पिछली सरकार से शुरू हो गयी थी. लेकिन इन्हीं लोगों द्वारा आज कहा जा रहा है कि सांप्रदायिक सौहार्द खराब हो रहा है. निश्चित रूप से सांप्रदायिक सौहार्द खराब हो रहा है, लेकिन इसकी जड़ों को सींचने का काम किसने किया? इन्होंने ही मुस्लिम समाज को कमजोर बनाया. उनके अंदर भय पैदा किया. उनके सामने गलत तस्वीरें रखीं. उनमें डर भरा कि वह असुरिक्षत हैं. और फिर आतंक से समझौता करके हमदर्दी जतानी चाही और राजनीतिक तुष्टीकरण करके हित साधे गए. यह कितनी महत्वपूर्ण बात है कि जिस सिमी को आपने प्रतिबंधित कर रखा है, उसी सिमी के आतंकियों की रिहाई का विरोध नहीं कर रहे हैं? इससे बड़ा गंभीर मसला और क्या हो सकता है. जबकि उनके खिलाफ सारे सबूत सामने हैं. यकीनन इससे यही समझ में आता है कि यह बहुत बड़ी राजनीतिक साजिश थी, जिसे स्थापित करने का असफल प्रयास किया गया और सच अब देश के सामने आ गया है.

May 2nd 2019, 7:42 pm

साल 1964 में अनुच्छेद 370 हटाने को देश के दर्जनों सांसदों ने लोकसभा में एकमत से उठायी थी आवाज़

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भाग – 1

भारतीय राजनीति में साल 1964 को दो महत्वपूर्ण घटनाओं के लिए याद किया जा सकता है. पहला, इसी एक साल में देश ने तीन प्रधानमंत्री देखे. जवाहरलाल नेहरू के निधन (27 मई) के बाद गुलजारी लाल नंदा (कार्यकारी) और फिर लाल बहादुर शास्त्री ने देश का नेतृत्व संभाला. दूसरा, लोकसभा में अनुच्छेद 370 को संविधान से समाप्त करने के लिए एकसाथ कई प्रस्ताव आने शुरू हुए. इससे पहले अनुच्छेद 370 का प्रमुखता से जिक्र 07 अगस्त, 1952 को लोकसभा में आया था. इसके बाद सामान्यतः ऐसा कोई अवसर नहीं आया.

नेहरू के 17 साल के प्रधानमंत्री काल के अंतिम क्षणों में यह एक ऐतिहासिक साल था. इसकी शुरुआत लोकसभा में सवाल से हुई, जिसमें पूछा गया, “जम्मू और कश्मीर राज्य के भारतीय संघ के साथ घनिष्ठ एकीकरण (close integration) के लिए आगामी कदम किस प्रकार लिए गए है अथवा लिए जा रहे है?” (Lok Sabha Debates, 12 February, 1964, p. 252) इस सवाल को पूछने वालों में हरि विष्णु कामथ (प्रजा सोशलिस्ट पार्टी), बिशनचन्द्र सेठ (हिन्दू महासभा), भीष्म प्रसाद यादव (कांग्रेस), बी.के. धाओं (कांग्रेस), यशपाल सिंह (कांग्रेस आई.), दीवान चंद शर्मा (कांग्रेस), सिद्देश्वर प्रसाद (कांग्रेस), प्रफुल्ल चन्द्र बरुआ (कांग्रेस) और प्रकाशवीर शास्त्री (निर्दलीय) शामिल थे.

इसी क्रम में यशपाल सिंह ने अनुच्छेद 370 को इस दिशा में अड़चन बताया और सवाल किया कि इसे हटाने में अभी और कितना समय लगेगा? (Ibid., p. 256) अब कांग्रेस में अनुच्छेद 370 को हटाने की हलचल दिखाई देने लगी थी. जल्दी ही कामथ, यशपाल और बरुआ ने फिर से भारत सरकार (गृह मंत्री) से सदन में प्रश्न किया, “क्या उन्हें इसकी जानकारी है कि जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री ने स्वयं इस पक्ष में वक्तव्य दिया है कि संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त अथवा समाप्त करके भारतीय संघ के साथ राज्य का पूर्ण अधिमिलन होना चाहिए.” (Lok Sabha Debates, 25 March, 1964, p. 7341)

संसद में यह गतिविधियाँ संकेत दे रही थी कि अनुच्छेद 370 पर कोई ठोस निर्णय लिया जा सकेगा. यह सभी सदस्य बेहद मुखर थे और लगातार इस विषय के केंद्र में भी बने हुए थे. कांग्रेस के सदस्य एम.सी. छागला ने सुरक्षा परिषद से संबंधित लोकसभा की चर्चा में कहा, “मुझे उम्मीद है कि जल्दी ही अनुच्छेद 370 संविधान से विलुप्त हो जाएगा. (Lok Sabha Debates, Vol. XXVI, 24 February, 1964, p. 2155) छागला का भाषण भारत सरकार का आधिकारिक बयान था. क्योंकि वे भारत सरकार में शिक्षा मंत्री के साथ सुरक्षा परिषद में जम्मू-कश्मीर मामले पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे.

यह सिलसिला अब गति पकड़ चुका था. प्रकाशवीर शास्त्री पश्चिम उत्तर प्रदेश के बिजनौर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. उन्होंने 11 सितम्बर को अनुच्छेद 370 पर संविधान संशोधन बिल (omission of Article 370) पेश किया. उनके भाषण के पहले शब्द थे, “जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति से संबधित भारतीय संविधान की धारा 370 हटा दी जाए.” (Lok Sabha Debates, Vol. XXXIII, 11 September, 1964, p. 1278) प्रकाशवीर सहित कुल 12 सदस्यों ने बहस में हिस्सा लिया, जिसमें जम्मू-कश्मीर से भी 3 सदस्य शामिल थे.

इस तीसरी लोकसभा में जम्मू-कश्मीर के 6 सदस्य थे. इनमें श्याम लाल सर्राफ (कांग्रेस), अब्दुर रशीद बक्शी (कांग्रेस), इन्द्रजीत मल्होत्रा (कांग्रेस), गोपाल दत्त मैंगी (कांग्रेस), अब्दुल गनी गोनी (एन.सी. कांग्रेस) और सैयद नज़ीर हुसैन समनानी (कांग्रेस) से थे. यह सभी सदस्य अनुच्छेद 370 को संविधान से हटाने के पक्ष में थे. प्रकाशवीर के समर्थन में इन्द्रजीत मल्होत्रा ने कहा, “मैं श्रीमान शास्त्री से पूर्ण सहमत हूँ कि संविधान से अनुच्छेद 370 को हटा देना चाहिए.” (Ibid., pp. 1300-01)

श्यामलाल सर्राफ ने दोहराते हुए सरकार से आग्रह किया कि वह इस पर एक विधेयक लेकर आए. उनका मानना था कि इस प्रकार जम्मू-कश्मीर को पूरे देश में सम्मानजनक स्थान दिया जा सकता है. (Ibid., p. 1312) गोपाल दत्त मैंगी के अनुसार 370 दफा जम्मू-कश्मीर के लिए हमेशा से लानत रही है. उन्होंने सदन को बताया कि पिछले चौदह बरसों में इस दफा की वजह से जम्मू-कश्मीर बाकी राज्यों से बहुत पिछड़ गया है.” (Ibid., p. 1332-33) हालाँकि इस दिन की चर्चा समाप्त होने तक कोई निष्कर्ष नहीं निकला. फिर 25 सितम्बर को यह मुद्दा सदन के समक्ष उठाया गया. दुर्भाग्यवश इस प्रस्ताव को सदन में मतदान द्वारा स्थगित कर दिया गया.

प्रकाशवीर ने 28 सितम्बर को एकबार फिर संसदीय कार्य मंत्री से अनुरोध किया कि इस सप्ताह में जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर फिर से विचार किया जाना चाहिए. (Lok Sabha Debates, Vol. XXXIV, 28 September, 1964, p. 4031) सरकार की तरफ से कोई सकारात्मक जवाब न मिलने पर दो दिन बाद ही एक प्रस्ताव लाया गया. इस बार कामथ, प्रकाशवीर, यशपाल सहित जगदेव सिंह सिद्दांथी (हरियाणा लोक समिति), सुरेन्द्रनाथ द्विवेदी (प्रजा सोशलिस्ट पार्टी), मनीराम बागड़ी (जनता एस.), हुकम चंद कच्वाय (जनता पार्टी), दलजीत सिंह सरदार (कांग्रेस) और राजेन्द्रनाथ बरुआ (प्रजा सोशलिस्ट पार्टी) ने गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा से लोकसभा में सवाल किया, “05 जून, 1964 से अभी तक भारतीय संघ के साथ जम्मू-कश्मीर के सम्पूर्ण अभिमिलन (total integration) और संविधान से अनुच्छेद 370 के निराकरण के लिए क्या कदम उठाए गए है अथवा लिए जा रहे है. (Lok Sabha Debates, Vol. XXXIV, 30 September, 1964, p. 4492-93)

भारत सरकार ने जवाब में इसे राज्य सरकार पर टालते हुए कहा कि वहां से ऐसा कोई सुझाव नहीं आया है. (Ibid., p. 4493) प्रकाशवीर 20 नवम्बर को दोबारा प्रस्ताव ले आए, “संविधान में संशोधन करने वाले अर्थात् संविधान की धारा 370 को संविधान से हटाकर जम्मू-कश्मीर राज्य को भारत का अभिन्न अंग बनाने वाले विधेयक पर जो चर्चा 11 सितम्बर, 1964 को स्थगित की गयी, उसको फिर से आरम्भ किया जाए.” (Lok Sabha Debates, Vol. XXXV, 20 November, 1964, p. 771) सदन में सभापति के माध्यम से सरकार ने चर्चा के लिए स्वीकृति दे दी.

इस दिन सबसे पहले अब्दुल गनी गोनी ने भाषण देते हुए प्रकाशवीर को शुभकामनाएँ दी. गोनी पहले भी नेशनल कांफ्रेंस की कार्यसमिति में इस अनुच्छेद को हटाने का प्रस्ताव ला चुके थे. ऐसा उन्होंने गुलाम मोहम्मद सादिक के कहने पर किया था. हालाँकि तब सादिक वहां के मुख्यमंत्री नहीं थे. लोकसभा में गोनी ने लोकतंत्र का हलवा देते हुए केंद्र सरकार को कहा कि वह इस पर एक उचित विधेयक लेकर आए. उसे राज्य सरकार को भेजे और उन्हें सात दिन का समय दे. क्योंकि सादिक अब वहां मुख्यमंत्री है और वे अनुच्छेद हो हटाने के लिए पहले से ही प्रतिबद्ध हैं. (Ibid., p. 778)

सैयद नज़ीर हुसैन समनानी ने प्रकाशवीर के समर्थन में कहा, “जैसे महाराष्ट्र है, वैसे ही जम्मू है. हमारे इन फैसलों के बावजूद सवाल यह है कि आजतक क्यों है दफा 370? किसलिए है दफा 370?……हमने कभी नहीं चाहा कि हम दफा 370 को कायम रखना चाहते है. (Ibid., pp. 792-94)

दिन के खत्म होने तक बहस लम्बी चली. बिना किसी निर्णय के लोकसभा को अगले दिन के लिए स्थगित कर दिया गया. इसके बाद 04 दिसंबर को एक और कोशिश की गयी, लेकिन सरकार ने नामंजूर कर दी. इस बीच सरकार ने अनुच्छेद 356 और अनुच्छेद 357 को वहां लागू कर दिया. तर्क दिया गया कि इससे अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी हो जाएगा. प्रकाशवीर इससे संतुष्ट नहीं थे, वे इन उपायों के स्थान पर अनुच्छेद 370 को संविधान से पूर्ण रूप से समाप्त करवाना चाहते थे. उन्होंने सदन के समक्ष आखिरी बार यह मुद्दा उठाया, लेकिन सभापति ने इसकी मंजूरी नहीं दी. (Lok Sabha Debates, Vol. XXXVII, 23 December, 1964, p. 6346)

क्रमशः

देवेश खंडेलवाल

May 2nd 2019, 9:05 am

जिन्ना महान कैसे – जिन्ना ने कभी नहीं की दंगे रुकवाने की कोशिश

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कांग्रेस में हाल ही में शामिल हुए शत्रुघ्न सिन्हा ने जिस जिन्ना की तारीफ में कसीदे पढ़े. जिस मोहम्मद अली जिन्ना का भी देश की तरक्की और आजादी में योगदान बताया. वह जिन्ना लाखों हिन्दुओं और सिक्खों के गुनहगार हैं. रावलपिंडी में मुस्लिम लीग के गुंडों ने जमकर हिन्दुओं और सिक्खों को मारा, उनकी संपति लूटी गई. पर, जिन्ना ने कभी अपने लोगों से दंगा रुकवाने की अपील नहीं की.

अगस्त, 1947, भारत में लगभग 300 वर्ष रहने के बाद गोरे जा रहे थे. देश का विभाजन हो रहा था. पाकिस्तान 14 अगस्त, 1947 को विश्व मानचित्र में आ गया था. इससे पहले ही पंजाब, बंगाल और देश के अन्य हिस्सों में दंगे शुरू हो गए. दंगों की आग लगाने में मोहम्मद अली जिन्ना अपनी भूमिका अदा कर चुके थे. जिन्ना ने ही 16 अगस्त, 1946 के लिए डायरेक्ट एक्शन (सीधी कार्रवाई) का आह्वान किया था. उसके बाद कलकत्ता (अब कोलकाता) में जो खूनी खेल खेला गया था. कोलकाता में जो हुआ, वह दंगों की शुरुआत थी. इन दंगों में पांच हजार लोग मारे गए थे. मरने वालों में उड़िया मजदूर सर्वाधिक थे. इसके बाद चौतरफा दंगे फैल गए.

जब रावलपिंडी में हिन्दुओं और सिक्खों को मारा गया

मई, 1947 में रावलपिंडी में मुस्लिम लीग के गुंडों ने जमकर हिन्दुओं और सिक्खों को मारा, उनकी संपति लूटी गई. रावलपिंडी में सिक्ख और हिन्दू खासे धनी थे, सभी का व्यापार था. इनकी संपतियां लूट ली गईं. जिन्ना ने कभी अपने लोगों से दंगा रुकवाने की अपील नहीं की. वह एक बार भी किसी दंगा ग्रस्त क्षेत्र में नहीं गए ताकि दंगे थम जाएं. पाकिस्तान के ही इतिहासकार प्रो. इश्ताक अहमद ने अपनी किताब ‘पंजाब ब्लडिड पार्टिशन’ में लिखा है, “हालांकि गांधी जी और कांग्रेस के बाकी तमाम नेता दंगों को रुकवाने की हर माकूल कोशिश कर रहे थे, पर जिन्ना ने इस तरह का कोई कदम उठाने की कभी जरूरत नहीं समझी. बाकी मुस्लिम लीग के नेता भी दंगे भड़काने में लगे हुए थे न कि उन्हें रुकवाने में.” उधर, गांधी जी पूर्वी बंगाल के नोआखाली से लेकर पानीपात तक में जाकर दंगे रुकवाने में जुटे हुए थे. 07 अगस्त, 1947 को मोहम्मद अली जिन्ना ने सफदरजंग एयरपोर्ट पर विमान के भीतर जाने से पहले दिल्ली के आसमान को कुछ पलों के लिए देखा. शायद वे सोच रहे थे कि अब वे इस शहर में मौज-मस्ती फिर कभी नहीं कर पाएंगे. वे अपनी छोटी बहन फातिमा जिन्ना, एडीसी सैयद एहसान और बाकी करीबी स्टाफ के साथ कराची के लिए रवाना हो रहे थे. हालांकि तब तक दिल्ली में भी छिट-पुट दंगे शुरू हो चुके थे. कराची जाने से पहले जिन्ना अपने 10 औरंगजेब रोड (अब एपीजे अब्दुल कलाम रोड) स्थित बंगले में लजीज भोजन और महंगी शराब की पार्टियां देने में व्यस्त थे.

14 अगस्त, 1947 को कराची में जिन्ना को पाकिस्तान के गर्वनर जनरल पद की शपथ दिलाई गई. भारत के वायसराय लार्ड माउंटबेटन ने उन्हें शपथ दिलवाई. जिन्ना के शपथ लेते ही सांप्रदायिक दंगे और तेजी से भड़क उठे. पाकिस्तान में हिन्दू और सिक्खों को चुन-चुनकर मारा जा रहा था. लेकिन न जिन्ना और न ही मुस्लिम लीग के अन्य नेताओं को इस बात की परवाह थी कि दंगों के कारण हो रहे खून-खराबे को रोका जाए. पश्चिमी पंजाब के प्रमुख शहरों जैसे लाहौर, शेखुपुरा, कसूर, रावलपिंडी, चकवाल, मुल्तान में हिन्दू और सिक्ख मारे जा रहे थे. दंगाइयों का साथ दे रही थी मुस्लिम बहुल पुलिस. पर जिन्ना मौज में थे. वहीं अभी भी कुछ कथित इतिहासकार जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताते हैं. जिन्ना के धर्मनिरपेक्ष होने के पक्ष में अपने तर्क को आधार देने के लिए वे जिन्ना के 11 अगस्त, 1947 को दिए भाषण का हवाला देते हैं. उस भाषण में जिन्ना कहते हैं – “पाकिस्तान में सभी को अपने धर्म को मानने की स्वतंत्रता होगी.” इस भाषण का हवाला देने वाले जिन्ना के 24 मार्च, 1940 को लाहौर के बादशाही मस्जिद के ठीक आगे बने मिन्टो पार्क (अब इकबाल पार्क) में दिए भाषण को भी जरा याद कर लें. उस दिन अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने पृथक मुस्लिम राष्ट्र की मांग करते हुए प्रस्ताव पारित किया था. यह प्रस्ताव मशहूर हुआ पाकिस्तान प्रस्ताव के नाम से. इसमें कहा गया था कि मुस्लिम लीग मुसलमानों के लिए पृथक राष्ट्र का ख्वाब देखती है. वह इसे पूरा करके ही रहेगी. प्रस्ताव के पारित होने से पहले मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने दो घंटे लंबे भाषण में हिन्दुओं को जमकर कोसा था. “हिन्दू- मुसलमान दो अलग-अलग मजहब हैं. दो अलग विचार हैं. दोनों की परम्पराएं और इतिहास अलग है. दोनों के नायक अलग हैं. इसलिए दोनों कतई साथ नहीं रह सकते”. जिन्ना ने अपनी तकरीर के दौरान लाला लाजपत राय से लेकर चितरंजन दास तक को अपशब्द कहे. उनके भाषण के दौरान एक प्रतिनिधि मलिक बरकत अली ने लाला लाजपत राय को राष्ट्रवादी हिन्दू कहा. जवाब में जिन्ना ने कहा, कोई हिन्दू नेता राष्ट्रवादी नहीं हो सकता. वह पहले और अंत में हिन्दू ही है. जिन्ना का गुणगान करने वाले इस बात को याद रखें कि उन्होंने एक बार भी जेल यात्रा नहीं की. देश की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने कोई लड़ाई नहीं लड़ी, कभी अंग्रेजों की लाठियां नहीं खाई. इसके बावजूद वो महान बन गए कैसे?

विवेक शुक्ला

Panchjanya

May 2nd 2019, 6:59 am

जाकिर के पीस टीवी पर प्रतिबंध, मस्जिदों की निगरानी की भी तैयारी

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नई दिल्ली. श्रीलंका में सीरियल बम धमाकों के बाद वहां की सरकार ने इस्लामिक कट्टरपंथ को जड़ से उखाड़ने की तैयारी कर ली है. इसके लिए सरकार कोई रियायत देने वाली नहीं है, इसके संकेत आने भी शुरू हो गए हैं. श्रीलंका की सरकार ने देश में बुर्के पर प्रतिबंध लगा दिया था, अब देश में केबल ऑपरेटर्स ने जाकिर नाईक के इस्लामिक टीवी चैनल पीस-टीवी पर प्रतिबंध लगा दिया है. जानकारी के अनुसार देश के दो बड़े केबल ऑपरेटर्स “Dialogue” and “LT” ने तत्काल प्रभाव से प्रसारण बंद कर दिया है.

सीरियल बम धमाकों की जांच में सामने आया है कि नेशनल तौहीद जमात से जुड़े आतंकी जाकिर नाईक की तकरीरों से खासे प्रभावित थे. उसी को आधार बनाते हुए एनटीजे का लीडर जाहरान हाशिम यूट्यूब और बाकी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भड़काऊ वीडियो डालकर ब्रेनवॉश कर रहा था. सोमवार को ही भारत में एनआईए ने केरल में एक इस्लामिक स्टेट मॉड्यूल का भंडाफोड़ कर एक मास्टरमाइंड आतंकी रियास अबुबकर को गिरफ्तार किया था. उसने भी कबूला था, कि वो भी जाकिर नाईक के वीडियो देखने के बाद ही इस्लामिक स्टेट से जुड़ने के लिए प्रभावित हुआ था.

उधर, श्रीलंका सरकार ने देशभर में फैली मस्जिदों पर निगरानी और रेगुलेट करने की तैयारी शुरू कर दी है. धमाकों के बाद क्राइम इंवेस्टिगेशन डिपार्टमेंट ने देश की कई मस्जिदों पर छापेमारी की, तो भारी मात्रा में हथियार और बम बनाने का सामान बरामद हुआ था. जांच में पता चला कि देशभर में मस्जिदों के जरिये ही एनटीजे जैसे संगठन नौजवानों का ब्रेनवॉश कर आतंकी कार्रवाई में झोंक रहे थे. सूत्रों के अनुसार सरकार ने मस्जिदों पर स्थायी निगरानी का खाका तैयार कर लिया है. जल्द ही इसको लेकर घोषणा कर दी जाएगी.

May 2nd 2019, 6:48 am

भारत की ऐतिहासिक जीत, मसूद अजहर वैश्विक आतंकी घोषित

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नई दिल्ली. पुलवामा हमले के मास्टरमाइंड पाकिस्तानी आतंकी मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने के प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मुहर लग गई है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भारत की मांग पर पाकिस्तान पोषित आतंकी मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित कर दिया. सुरक्षा परिषद की 1267 अल-कायदा प्रतिबंध समिति ने एक विशेष सत्र में प्रस्ताव पारित किया. यूएस, यूके और फ्रांस द्वारा रखे प्रस्ताव में इस बार चीन ने भी कोई अड़चन पैदा नहीं की. इससे पहले चीन ने 4 बार मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने के खिलाफ वीटो का उपयोग करते हुए रुकावट उत्पन्न की थी.

यूएन सेंक्शन के बाद मसूद अजहर ओसामा बिन लादेन, अल-जवाहिरी, अल-बगदादी जैसे ग्लोबल टेररिस्ट की सूची में शामिल हो गया है. इससे पहले यूएनएसी की सूची में अल-कायदा, इस्लामिक स्टेट, तालिबान, अल-शबाब जैसे संगठन शामिल हैं.

प्रतिबंध के बाद क्या

बैन के बाद पाकिस्तान को मसूद अजहर के टेरर कैंप और उसके मदरसों को भी बंद करना पड़ेगा.

दुनियाभर के देशों में मसूद अजहर की एंट्री पर बैन.

मसूद अजहर किसी भी देश में आर्थिक गतिविधियां नहीं कर सकेगा.

संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों को मसूद अजहर और जैश-ए-मोहम्मद के बैंक अकाउंट्स और प्रॉपर्टी को फ्रीज करना पड़ेगा.

मसूद अजहर और जैश-ए-मोहम्मद से संबंधित व्यक्तियों या उसकी संस्थाओं को कोई मदद नहीं मिलेगी.

पाकिस्तान को भी मसूद अजहर के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगाने पड़ेंगे.

पूर्व में प्रयास

भारत ने 2009 में मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने संबंधी प्रस्ताव पेश किया था. इसके बाद 2016 में भारत ने इस संबंध में पी3 देशों यानी अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस के साथ मिल कर संयुक्त राष्ट्र की 1267 सदस्यीय प्रतिबंध समिति के समक्ष मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने संबंधी प्रस्ताव पेश किया था. इसके बाद 2017 में भारत ने पी3 देशों के साथ इसी प्रकार का प्रस्ताव फिर से पेश किया था लेकिन सभी मौकों पर वीटो का अधिकार रखने वाले सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य चीन ने अपने अधिकार का इस्तेमाल करके इसमें अड़ंगा डाला था. पुलवामा हमले के बाद भी जब भारत ने मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत किया तो चीन ने उसमें अड़ंगा डाला था. अब संयुक्त राष्ट्र ने पुलवामा आतंकी हमलों के जिम्मेदार जैश चीफ को वैश्विक आतंकी घोषित कर दिया है. मसूद अजहर मुंबई हमले का भी मुख्य आरोपी है.

 

 

May 2nd 2019, 3:15 am

रानी दुर्गावती शोध संस्थान में ‘निष्पक्ष चुनाव, स्वस्थ प्रजातंत्र’ विषय पर परिचर्चा

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परिचर्चा में रूस, जर्मनी, जापान, ब्राजील के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया

भारत विश्व का सबसे बड़ा स्वस्थ प्रजातंत्र है और इसकी मजबूती का कारण मताधिकार है. यहां के हर नागरिक को यह अधिकार है कि वह अपनी पसंद का जनप्रतिनिधि चयनित कर सके. जाति, धर्म, भाषा तथा वेशभूषा की समस्त विभिन्नताओं के बावजूद भारत निष्पक्ष और सफल लोकतंत्र के लिए जाना जाता है. पूरी दुनिया यहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था और चुनाव कराने की व्यवस्था का लोहा मानती है.

विश्व के कई देशों में आम जनता को लंबे संघर्ष के बाद मताधिकार मिला. लेकिन भारत के लोगों को स्वतंत्रता के साथ ही मताधिकार प्राप्त हो गया. अमेरिका में महिलाओं को 144 वर्ष के बाद मताधिकार मिला. स्विट्जरलैण्ड में 1974 में महिलाओं को मताधिकार मिला. लेकिन भारत में 18 वर्ष (नियमानुसार) से अधिक आयु के व्यक्ति को मताधिकार प्राप्त है.

रानी दुर्गावती शोध संस्थान द्वारा ‘निष्पक्ष चुनाव, स्वस्थ प्रजातंत्र’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में विदेशी प्रतिनिधि के रूप में ब्राज़ील से *Dr. Helcimara de Souza Telles* (Assistant Professor, Universidade Federal de Minas Gerais), जर्मनी से *Mr. Edmund Christian Wagner* (Senior Fellow, German Institute for International and Security Affairs), जापान से * Kazuya Nakamizo* (Professor, Graduate School of Asian and African Area Studies, Kyoto University), रूस से *Mr. Evgenii Mangul* (Member, Gagarin Municipal Council, Sevastopol; Assistant of the Deputy of the State Duma of the Russian Federation) उपस्थित रहे.

परिचर्चा में विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. पवन तिवारी (सह संगठन मंत्री विद्याभारती पूर्वोत्तर क्षेत्र), प्रो. हरिराम मिश्र (जे.एन.यू. नई दिल्ली), डॉ. पवन स्थापक (अध्यक्ष, रानी दुर्गावती शोध संस्थान), प्रो. ए.डी.एन. वाजपेयी (पूर्व कुलपति हिमाचल विश्वविद्यालय), डॉ. बिपिन बिहारी ब्यौहार (पूर्व अध्यक्ष मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग), डॉ. ए.बी. श्रीवास्तव (सचिव, रानी दुर्गावती शोध संस्थान), सहित अन्य गणमान्यजन व पदाधिकारी सम्मिलित रहे.

May 1st 2019, 4:14 am

01 मई / जन्मदिवस – निष्ठावान स्वयंसेवक बंसीलाल सोनी

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संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री बंसीलाल सोनी का जन्म एक मई, 1930 को वर्तमान झारखंड राज्य के सिंहभूम जिले में चाईबासा नामक स्थान पर अपने नाना जी के घर में हुआ था. इनके पिता श्री नारायण सोनी तथा माता श्रीमती मोहिनी देवी थीं. इनके पुरखे मूलतः राजस्थान के थे, जो व्यापार करने के लिये इधर आये और फिर यहीं बस गये. बाल्यावस्था में ही उन्होंने अपने बड़े भाई श्री अनंतलाल सोनी के साथ शाखा जाना प्रारम्भ किया. आगे चलकर दोनों भाई प्रचारक बने और आजीवन संघ कार्य करते रहे.

बंसीलाल जी बालपन से ही स्वयंसेवक थे; पर कोलकाता के विद्यासागर कॉलेज में पढ़ते समय उनका घनिष्ठ सम्पर्क पूर्वोत्तर के क्षेत्र प्रचारक श्री एकनाथ रानाडे से हुआ. धीरे-धीरे उनका अधिकांश समय संघ कार्यालय पर बीतने लगा. 1949 में बी.कॉम की परीक्षा उत्तीर्ण कर वे प्रचारक बन गये. सर्वप्रथम उन्हें हुगली जिले के श्रीरामपुर नगर में भेजा गया.

एकनाथ जी के साथ उन्होंने हर परिस्थिति में संघ कार्य सफलतापूर्वक करने के गुर सीखे. कोलकाता लम्बे समय तक भारत की राजधानी रहा है. अतः यहां अनेक भाषाओं के बोलने वाले लोग रहते हैं. बंसीलाल जी हिन्दी के साथ ही बंगला, अंग्रेजी, नेपाली, मारवाड़ी आदि अनेक भाषा-बोलियों के जानकार थे. अतः वे सब लोगों में शीघ्र ही घुल-मिल जाते थे. श्रीरामपुर नगर के बाद उन्हें क्रमशः माल्दा और फिर उत्तर बंग का विभाग प्रचारक बनाया गया.

पूर्वोत्तर भारत में नदियों की प्रचुरता है. ये नदियां जहां उस क्षेत्र के लिये जीवनदायिनी हैं, वहां वर्षा के दिनों में इनके कारण संकट भी बहुत आते हैं. 1968 में जलपाईगुड़ी में भीषण बाढ़ आई. इससे सारा जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया. जो जहां था, वहीं फंस कर रह गया. हजारों नर-नारी और पशु मारे गये. ऐसी स्थिति में स्वयंसेवकों ने ‘उत्तर बंग सेवा समिति’ बनाकर बंसीलाल जी की देखरेख में जनसेवा के अनेक कार्य किये.

1971 में बंगलादेश मुक्ति संग्राम  के समय लाखों शरणार्थी भारत में आ गये. उनमें से अधिकांश हिन्दू ही थे. स्वयंसेवकों ने उनके भोजन, आवास और वस्त्रों का समुचित प्रबन्ध किया. पूरे देश से उनके लिये सहायता राशि व सामग्री भेजी गयी, जिसका केन्द्र कोलकाता ही था. यह सब कार्य भी बंसीलाल जी की देखरेख में ही सम्पन्न हुआ. इतना ही नहीं, वे बड़ी संख्या में टैंट और अन्य सहायता सामग्री लेकर बंगलादेश की राजधानी ढाका तक गये.

1975 में आपातकाल के समय वे कोलकाता में ही प्रचारक थे. संघ के आह्वान पर स्वयंसेवकों के साथ उन्होंने भी सत्याग्रह कर कारावास स्वीकार किया. आपातकाल और संघ से प्रतिबन्ध की समाप्ति के बाद संघ ने अनेक सेवा कार्य प्रारम्भ किये. इनमें प्रौढ़ शिक्षा का कार्य भी था. बंसीलाल जी के नेतृत्व में 1978 में बंगाल में अनेक प्रौढ़ साक्षरता केन्द्र चलाये गये.

1980 में भारतीय जनता पार्टी बनने पर उसके केन्द्रीय कार्यालय के संचालन के लिए एक अनुभवी और निष्ठावान कार्यकर्ता की आवश्यकता थी. यह जिम्मेदारी लेकर बंसीलाल जी दिल्ली आ गये. इसके साथ ही उन्होंने असम, बंगाल और उड़ीसा में भाजपा का संगठन तंत्र भी खड़ा किया.
2003 में उन्हें फिर से वापस बंगाल बुलाकर पूर्वी क्षेत्र बौद्धिक प्रमुख और फिर सम्पर्क प्रमुख बनाया गया. शारीरिक शिथिलता के कारण जब प्रवास में उन्हें कठिनाई होने लगी, तो वे दक्षिण बंग की प्रान्त कार्यकारिणी के सदस्य के नाते अपने अनुभव से नयी पीढ़ी को लाभान्वित करते रहे.

20 अगस्त 2010 को 80 वर्ष की दीर्घायु में निष्ठावान स्वयंसेवक श्री बंसीलाल सोनी का कोलकाता के विशुद्धानंद अस्पताल में देहांत हुआ.

April 30th 2019, 7:20 pm

‘‘यह समय हिन्दू विरोधियों, देशद्रोहियों को परास्त करने का है’’

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स्वामी असीमानंद को 9 वर्ष की लंबी न्यायिक लड़ाई के बाद पंचकुला की विशेष एनआईए अदालत ने हाल ही में समझौता धमाके के आरोप से बरी कर दिया. अब वह सभी आरोपों से मुक्त हो चुके हैं. लेकिन 2010 के बाद उनका जो कठिन समय जेल में गुजरा, अमानवीय यातनाओं को सहना पड़ा, अब उस साजिश की परतें खुल रही हैं. साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य ने आरोप मुक्त होने के बाद स्वामी असीमानंद से विशेष बातचीत की और जाना कि कैसे संप्रग सरकार के दौरान ‘भगवा आतंक’ जैसे जुमले गढ़कर हिन्दू समाज को आहत और अपमानित करने की साजिशें रची गई थीं. उनसे बातचीत के प्रमुख अंश – मक्का मस्जिद सहित समझौता धमाके के आरोप में आप को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन अब सच सामने आ चुका है और न्यायालय ने आपको बरी कर दिया है. निर्दोष साबित होने के बाद क्या कहेंगे आप? आखिर में सत्य की जय हुई है. इसलिए ही तो भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ है. इस फैसले के बाद मैं खुशी महसूस कर रहा हूं, क्योंकि मुझे जिन आरोपों के तहत गिरफ्तार किया गया, प्रताड़ना से लेकर अमानवीय यातनाएं तक दी गर्इं, अब उससे मुक्त होने के बाद शांति महसूस कर रहा हूं. दूसरी बात, यह हिन्दू विरोधियों की हार है. यह उनकी हार है, जिन्होंने ‘भगवा आतंक’ जैसे शब्दों को गढ़कर समस्त हिन्दू समाज को देश-दुनिया में अपमानित करने की साजिश रची. यह उनकी हार है जिन्होंने ‘भगवा’ की पवित्रता पर लांछन लगाने का दुष्कृत्य किया. खैर, देर से ही सही, आज सच सबके सामने आ चुका है और जो इसके पीछे के साजिशकर्ता थे, उनके चेहरों से भी नकाब उतर रहा है. आपको गिरफ्तार क्यों किया गया था? इसके पीछे प्रमुख कारण क्या मानते हैं? मैं हिन्दुत्व और हिन्दू समाज के लिए काम कर रहा था, इसलिए मुझे प्रताड़ित किया गया और एक साजिश के तहत गिरफ्तार किया गया. लेकिन मुझे गिरफ्तार करने के पीछे असल निशाना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी थी. मेरे जरिए हिन्दू विरोधी तत्व इन संगठनों को लक्षित कर बदनाम करने की साजिश में लगे हुए थे, लेकिन वे अपने मंसूबे में सफल नहीं हुए. कथित ‘भगवा आतंक’ के जुमले को सिद्ध करने के लिए आपको असहनीय प्रताड़नाएं दी गईं.इसमें कितनी सचाई है? बिल्कुल, यह बात सच है. मैं इसे याद करके इस बारे में ज्यादा नहीं बोलना चाहता, लेकिन इतना जरूर कहना चाहता हूं कि मुझ पर असहनीय अत्याचार तो किए ही गए, अमानवीय यातनाएं तक दी गर्इं. लेकिन मैं टूटा नहीं, अडिग रहा. इस पूरे मामले में तत्कालीन केंद्र सरकार, स्थानीय पुलिस, एटीएस, एनआईए एवं अन्य जांच एजेंसियों की भूमिका पर क्या कहेंगे? देखिए, तत्कालीन सरकार के इशारे पर मुझे फंसाने की पूरी साजिश चल रही थी और इसमें सभी जांच एजेंसियां शामिल थीं. इसलिए सरकार जो साबित कराना चाहती थी, एजेंसियां मामले को उसी ओर मोड़ रही थीं. अगर यूं कहें कि एजेंसियां सरकार की कठपुलती बनकर कार्य कर रही थीं तो गलत नहीं होगा. इस दौरान मेरे ऊपर अनेक तरीके से अनैतिक दबाव डालकर एजेंसियां जो चाहती थीं, वह करा रही थीं. राहुल गांधी द्वारा यह कहा जाना कि इस्लामिक आतंकवाद से बड़ी चुनौती ‘हिन्दू आतंकवाद’ है. इसी तरह उस समय कांग्रेस के बड़े नेताओं में शामिल  पी. चिदंबरम, सुशील शिन्दे, कपिल सिब्बल और दिग्विजय सिंह के अधिकतर बयानों का केंद्र ‘भगवा आतंक’ ही होता था. इसके पीछे क्या वजह पाते हैं? देखिए, कांग्रेस लंबे समय से मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करती चली आ रही थी. कैसे एक वर्ग को और खुश करके उसे वोट में बदला जाए, इसके लिए साजिशें रची जा रही थीं. यह वही समय था, जब देश में आए दिन आतंकी हमले हो रहे थे और इनमें पकड़े जाने वाले आतंकी मुस्लिम ही होते थे. यहीं से एक साजिश रची जाती है कि कैसे एक वर्ग को ‘हिन्दू आतंकवाद’ की आड़ में खुश किया जाए. इसलिए कुछ धमाकों के बाद हिन्दुओं को पकड़ कर ‘भगवा आतंक’ की साजिश को हवा दी गई और एक वर्ग को खुश किया गया. यह तुष्टीकरण का ही एक वीभत्स रूप था और यही प्रमुख वजह रही कि मुझे भी गिरफ्तार किया गया, क्योंकि मैं हिन्दू समाज के बीच में काम कर रहा था, जिसके कारण मैं पहले से ही अराजक और हिन्दू विरोधी ताकतों के निशाने पर था. ‘भगवा आतंक’ की आड़ लेकर जिन-जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया था, वे लोग न्यायालय द्वारा निर्दोष साबित हो रहे हैं. ‘भगवा आतंक’ को लक्षित करते हुए उस समय की सरकार के असल निशाने पर कौन था? जिन लोगों को ‘भगवा आतंक’ के आरोप में गिरफ्तार किया, आज वे लोग निर्दोष साबित हो रहे हैं. और ऐसा तो होना ही है. क्योंकि झूठ एक न एक दिन जरूर खुलता है और सच सामने आता ही है. रही बात असल निशाने की तो हिन्दू विरोधियों को लग रहा था कि आने वाले दिनों में भाजपा सत्ता में आ सकती है. तो ऐसा क्या षड्यंत्र रचा जाए, जिससे भाजपा के कार्य में रुकावट उत्पन्न हो और देशभर में यह संगठन बदनाम हो जाए. ऐसी ही ताकतों ने दूसरी बड़ी साजिश रची थी - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाने की. इस सबके पीछे सिर्फ एक ही उद्देश्य था - संघ और भाजपा को मिटाने का. इसलिए हिन्दू विरोधियों द्वारा साजिश पर साजिश रची जा रही थी. मोहरा हम जैसे लोगों को बनाया गया था. हकीकत में देखें तो सच आज धीरे-धीरे सामने आ रहा है, अगर यह साजिश कामयाब हो जाती तो न केवल यह सदा के लिए गर्त में दबा रहता, बल्कि झूठ की बुनियाद पर हम जैसे लोगों को फांसी तक पर लटका दिया जाता. लेकिन प्रसन्नता की बात है ऐसी ताकतें अपने काम में असफल रहीं और सत्य की जीत हुई. क्या आपने जेल से ‘कारवां पत्रिका’ को साक्षात्कार दिया था? नहीं, मैंने किसी भी पत्रिका को कोई साक्षात्कार नहीं दिया था. यह पूरी तरह से झूठ है. यह पत्रिका यदि दावा करती है कि इस औपचारिक साक्षात्कार के टेप हैं तो उन्हें सामने लाना चाहिए. दूसरी बात पत्रिका की संवाददाता ने घंटों मिलने की बात कही. इसमें एक बात सही हो सकती है कि यह संवाददाता एक तय समय पर जेल में आई हो और तय समय पर जेल से बाहर गई हो, लेकिन मुझसे घंटों बात की हो, यह बिल्कुल सही नहीं है. एक बार यह ‘संवाददाता’ छद्म अधिवक्ता के तौर पर मेरे अधिवक्ता के नाम का सहारा लेकर मुझसे मिली, लेकिन उनसे ऐसी कोई बात नहीं हुई, जिसे साक्षात्कार में लिखा गया. मैं अपने अधिवक्ता से परामर्श भी कर रहा हूं कि इस दिशा में क्या कानूनी कार्रवाई की जा सकती है. जांच एजेंसियां जबरदस्ती क्या कहलवाना चाहती थीं, जो आप नहीं कह रहे थे? जांच एजेंसियां मुझे असहनीय प्रताड़ना देकर, अमानवीयता की हदें पार कर जबरदस्ती कहलवाना चाहती थीं कि आतंकी गतिविधियां ‘रा.स्व. संघ और भाजपा’ के इशारे पर हुईं. वे मुझसे कई और झूठ बोलने के लिए मजबूर करती थीं. इसलिए जांच एजेंसियां मेरे साथ अमानवीयता की पराकाष्ठा तक गई. इसी कड़ी में एक पत्रिका ने एक झूठ देश-दुनिया में प्रसारित किया. एक समाचार में मेरे हवाले से उन्होंने बहुत तोड़-मरोड़कर छापा, जबकि यह समाचार पूरी तरह से झूठ की बुनियाद पर था. न्यायालय में दिया गया आपका एक बयान मीडिया की सुर्खियां बना था, जबकि यह बयान पूरी तरह से गोपनीय होना चाहिए था. क्या यह भी कोई साजिश थी? देखिए, तब कांग्रेस की सरकार थी तो समझ सकते हैं कि जांच एजेंसियां किसके इशारों पर काम कर रही थीं. जो बयान लीक हुआ, वह एक साजिश थी और यह सब पुलिस हिरासत में ही हुआ. इससे सबकुछ समझा जा सकता है. लेकिन माननीय न्यायाधीश ने इसे स्वीकार नहीं किया. मेरे ऊपर विभिन्न तरह के दबाव डाले जा रहे थे. शारीरिक यातनाएं दी जा रही थीं. परिवार के लोगों को हानि पहुंचाने की धमकी दी जा रही थी, खासकर मां को. पर मैं सत्य पर अडिग रहा. कथित ‘भगवा आतंक’ पर तो खूब शोर सुनाई दिया पर ‘इस्लामी आतंक’ की बात आते ही यह शोर थम जाता है. उल्टे तब कहा जाता है कि आतंक का कोई मजहब नहीं होता. क्या कहेंगे आप इस पर? बिल्कुल, यह सब मुस्लिम तुष्टीकरण ही है. ये लोग जानबूझकर ऐसा करते हैं, क्योंकि अगर वे सच कह देंगे तो मुस्लिम समाज नाराज हो जाएगा और उनसे छिटक जाएगा. इसलिए हिन्दू समाज को बदनाम करते रहो, उसके खिलाफ बोलते रहो, उनके मान बिन्दुओं पर प्रहार करते रहो. ऐसा करने से एक वर्ग खुश होगा और वोट देगा. देखिए, वोट बैंक और तुष्टीकरण की राजनीति के लिए ही ‘भगवा आतंक’ जैसा शब्द गढ़ा गया था. हिन्दुओं का दमन करने के लिए हिन्दू विरोधियों ने इस ‘जुमले’ का सहारा लेकर इसे साजिश का रूप दिया. हकीकत में देखें तो हिन्दू समाज कभी भी आतंकवाद में संलिप्त नहीं रहा, उसके द्वारा आतंकवाद फैलाया गया हो, ऐसा कोई भी उदाहरण 5 हजार साल के इतिहास में देखने को नहीं मिलता. देश में लोकसभा चुनाव जोरों पर हैं. इस मौके पर लोगों से क्या कहना चाहेंगे? यह चुनाव हिन्दू विरोधियों, देशद्रोहियों, अराजक ताकतों को परास्त करने का सुनहरा अवसर है. इसलिए पूरी ताकत से हिन्दू समाज को हिन्दू शक्तियों को विजय दिलानी होगी. इसलिए मेरा भारतीय समाज से आग्रह है कि वे नरेंद्र मोदी सरकार को प्रबल मतों से विजयी बनाएं. गिरफ्तारी से पहले आप जनजाति समाज के उत्थान और जागरण का काम कर रहे थे. क्या इस दिशा में फिर से सक्रिय होंगे? जो काम मैं पहले से ही कर रहा हूं, उसमें कोई अंतर नहीं आया है. क्योंकि मेरे जीवन का लक्ष्य ही हिन्दू समाज की सेवा है और यह कार्य मैं अंतिम समय तक करता रहूंगा. वनवासी क्षेत्रों में हिन्दू विरोधियों द्वारा वनवासी समाज को बरगलाने, उनका कन्वर्जन करने का जो घृणित काम किया किया जा रहा है, उसे रोकने के लिए मैं पहले की तरह ही काम करूंगा. हां, यह सही है कि मेरे कार्य की वजह से ही मेरे खिलाफ साजिश रची गई थी. हिन्दू शक्तियों का दमन करने के लिए ही सभी हिन्दू विरोधी एक हुए थे. वे चाहे मुस्लिम, ईसाई, कांग्रेस एवं वामपंथी ही क्यों न रहे हों! क्योंकि मैं वनवासी क्षेत्रों में हिन्दू विरोधियों की साजिश को स्वजनों की ‘घर वापसी’ के जरिए नाकाम कर रहा था. इससे हिन्दू समाज के विरोध में जो साजिशें रची जा रही थीं, उन पर पानी फिर रहा था. इसलिए यह प्रतिशोध लिया गया. नि:संदेह, धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने पर बहुत बड़े-बड़े संकट आते हैं, लेकिन धर्म और सत्य के तेज से वह न केवल क्षीण होते हैं, बल्कि सत्य की जीत होती है. मेरे संन्यासी एवं आध्यात्मिक जीवन का लक्ष्य मानव जीवन का मंगल, उनकी सेवा करना है. और यह कार्य मैं लगातार करता रहूंगा. साभार - पाञ्चजन्य

April 30th 2019, 5:34 pm

ऋतम् (Ritam) व चौथा खम्भा न्यूज़ ने आयोजित किया सोशल मीडिया कॉन्क्लेव

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गुरुग्राम. चौथा खम्भा न्यूज़ व ऋतम् (Ritam) ने गुरुग्राम में 28 अप्रैल को सोशल मीडिया कॉन्क्लेव का आयोजन किया. इसमें प्रो. राकेश सिन्हा, कपिल मिश्रा, डॉ. नील, मनोज कुरील और अधिवक्ता प्रशांत उमराव पटेल ने वक्ता के रूप में भाग लिया. कॉन्क्लेव का उद्देश्य सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव, इसका सदुपयोग एवं मुख्य चेतावनियां रहा.

डॉ. नील ने पावर ऑफ सोशल मीडिया के बारे में कहा कि सोशल मीडिया से आम आदमी को अपनी भावना को रखने का माध्यम मिला है. कार्टूनिस्ट मनोज कुरील ने कला के माध्यम से सोशल मीडिया पर अपने विचार रखने के बारे में जानकारी दी और कहा कि सकारत्मकता को कला के माध्यम से दिखाना कला का प्रथम कर्तव्य है. अधिवक्ता प्रशांत पटेल ने फेक न्यूज़ पर कहा कि सोशल मीडिया पर लोगों की भावना से खेलने के लिए जानबूझकर झूठे कंटेंट को फैलाया जाता है और लोग इससे भ्रमित भी हो जाते हैं. कपिल मिश्रा ने मेन स्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया पर कहा कि कुछ लोगों के हाथ से चलने वाला मीडिया आज सोशल मीडिया के माध्यम से जन-जन की आवाज बन गया है.

प्रो. राकेश सिन्हा जी ने कहा कि इसका प्रयोग करते हुए हमें अपनी संस्कृति और अच्छे विचारों का प्रसार करना चाहिए. अगर सोशल मीडिया ने आज हमें अपना विचार रखने की ताकत दी है तो हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि विदेशी प्लेटफॉर्म्स पर हमारी निर्भरता भी एक चिंता का विषय है. हमें सभी प्लेटफॉर्म्स के भारतीय विकल्पों पर भी कार्य करना चाहिए.

कार्यक्रम का आयोजन दो सत्रों में रहा. चौथा खम्भा न्यूज़ डायरेक्टर दिनेश ने प्रथम सत्र की अध्यक्षता की. उन्होंने सोशल मीडिया की ताकत और इसके प्रभाव से सकारात्मक कार्य करने का आग्रह किया. विश्व संवाद केंद्र के सचिव राजेश कुमार ने दूसरे सत्र की अध्यक्षता की. उन्होंने कहा कि आज गुरुग्राम से एक शुरुआत हुई है और ऐसे कार्यक्रम हरियाणा के प्रत्येक जिले में आयोजित किये जाएंगे, जिनमें सोशल मीडिया के माध्यम से देश और समाज के कार्य मे लगे बंधु/भगिनी को वक्ता के रूप में बुलाया जाएगा और एक संवाद स्थापित हो, ऐसा एक प्रयास किया जाएगा. उन्होंने सभी वक्ताओं, कॉन्क्लेव में आए नागरिकों व आयोजन टोली का धन्यवाद किया. वंदेमातरम् के साथ गुरुग्राम में सोशल मीडिया पर अभी तक के सबसे बड़े कॉन्क्लेव का समापन हुआ.

April 30th 2019, 7:41 am

राष्ट्र भक्तों की सरकार ही राम मंदिर का निर्माण करेगी – भय्याजी जोशी

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हरिद्वार (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह सुरेश (भय्याजी) जोशी ने कहा कि राष्ट्रभक्तों की सरकार ही राम मंदिर का निर्माण कर सकती है. मौजूदा सरकार में शामिल दलों से ही ऐसी उम्मीद है. अन्य दलों की सोच तो हिन्दू विरोधी है. इस दौरान उन्होंने लोकसभा चुनाव में मतदान के प्रति दिखाई दे रही उदासीनता को चिंता का विषय बताया. साथ ही लोगों से अधिक से अधिक मतदान करने की अपील की. तीन दिन से कनखल स्थित जगद्गुरु आश्रम में रह रहे सरकार्यवाह जी ने जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वराश्रम से राष्ट्रहित के मुद्दों पर चर्चा करते हुए आशीर्वाद लिया.

सोमवार, 29 अप्रैल को आश्रम में पत्रकारों से वार्ता में उन्होंने कहा कि देश के सामने इस समय कई चुनौतियां हैं. चुनाव का दौर चल रहा है और ऐसे दलों की सरकार आनी चाहिए, जो राष्ट्रहित की सोचे, समस्याओं का निराकरण कराए और विकास कार्य बाधित न होने दे. उन्होंने कहा कि देश में सशक्त सरकार बननी चाहिए. अभी तक हुए मतदान के दौरान उम्मीद से कम मतदान को भी उन्होंने चिंता का विषय बताया. कहा कि नगरीय क्षेत्रों में मतदाता उदासीन दिखता है. पढ़े लिखे लोग, जब तक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होकर आगे नहीं आएंगे, राष्ट्र का भला नहीं हो सकता.

मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि इस सरकार ने कई अच्छे कार्य किए हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है. सुरक्षा की दृष्टि से काफी अहम निर्णय लिए गए. आर्थिक दृष्टि से भी भारत उम्मीद के अनुरूप तो नहीं, लेकिन समृद्धि की ओर बढ़ा है.

उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 को लेकर भी सरकार ने काफी माहौल बनाया है. इस दौरान क्षेत्र कार्यवाह शशिकांत उपस्थित रहे.

April 30th 2019, 4:24 am

जनता को तय करना है किसे वोट दे – इंद्रेश कुमार

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार जी ने कहा कि सामाजिक और धार्मिक सौहार्द के साथ-साथ देश की प्रगति के लिए इस सरकार की वापसी जरूरी है. एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि कांग्रेस हमेशा भारत की आजादी में अहम योगदान का दावा करती है, लेकिन यह असत्य है. कांग्रेस नहीं, बल्कि भगत सिंह जैसे महान नेताओं की बदौलत देश को आजादी मिली.

उन्होंने ‘वोट फॉर नेशन’ जागरूकता अभियान को संबोधित करते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी का 2019 में सत्ता में लौटना जरूरी है. उनकी वापसी सामाजिक और धार्मिक एकता के लिए जरूरी है. उन्होंने विपक्ष की आलोचना करते हुए कहा कि उनका गठबंधन देश को विभाजित करने वाला है. लोगों से वोट करने की अपील करते हुए कहा कि जनता को तय करना है कि वह किसे वोट देगी- विश्व को देश की ताकत बताने वाले को या जिसने सांप्रदायिक दंगे कराए और देश को विभाजित करने की राजनीति की.

April 30th 2019, 4:10 am

30 अप्रैल / जन्मदिवस – राष्ट्रसन्त तुकड़ो जी महाराज

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नई दिल्ली. 23 जुलाई, 1955 को जापान के विश्व धर्म सम्मेलन में एक सन्यासी जब बोलने खड़ा हुआ तो भाषा न समझते हुए भी उनके चेहरे के भाव और कीर्तन के मधुर स्वर ने ऐसा समां बांधा कि श्रोता मन्त्रमुग्ध हो उठे. लोगों को भावरस में डुबोने वाले वे महानुभाव राष्ट्रसंत तुकड़ो जी महाराज थे.

तुकड़ो जी का जन्म 30 अप्रैल, 1909 को अमरावती (महाराष्ट्र) के ‘यावली’ गांव में हुआ था. इनके पिता बंडो जी इंगले तथा माता मंजुला देवी थीं. माता-पिता ने बहुत मनौतियों से प्राप्त पुत्र का नाम ‘माणिक’ रखा था. इनके पिता चारण थे. सेठ, जमीदारों, राजाओं आदि के यहां जाकर उनकी परिवार परम्परा का झूठा-सच्चा गुणगान करना उनका काम था. माणिक के जन्म के बाद उन्होंने इसे छोड़कर दर्जी का काम किया. इसमें सफलता न मिलने पर गुड़ बेचा, पर हर बार निराशा और गरीबी ही हाथ लगी. मणि जब कुछ बड़ा हुआ, तो उसे चांदा की पाठशाला में भेजा गया, पर वह विद्यालय के बगल में स्थित मारुति मंदिर के डफली बजाकर भजन गाने वाले गायक ‘भारती’ के पास प्रायः बैठे मिलते थे. इधर पिता का कर्जा जब बहुत बढ़ गया, तो वे लौटकर फिर अपने गांव पहुंच गये. अब वहां का शिवालय ही मणि की ध्यान साधना का केन्द्र बन गया. मां ने यह देखकर उसे अपने मायके बरखेड़ भेज दिया. वहां पर ही कक्षा चार तक की शिक्षा मणि ने पायी.

बरखेड़ में मां के गुरु आड्कु जी महाराज का प्रेम मणि को मिला. भजन गाने पर उसे रोटी के टुकड़े मिलते थे. इससे उसका नाम ‘तुकड़या’ और फिर तुकड़ो जी हो गया. जब वे 12 वर्ष के थे, तब उनके गुरु समाधिस्थ हो गये. भगवान विट्ठल के दर्शन की प्रबल चाह तुकड़ो जी को पंढरपुर ले गयी, पर पुजारियों ने उन्हें भगा दिया. अब वे पुंडलीक मंदिर गये. इसके बाद मां की याद आने पर गांव आकर मजदूरी से पेट पालने लगे. 14 वर्ष की अवस्था में वे घर छोड़कर जंगल चले गए. वहां उनकी भेंट एक योगी से हुई, जिसने एक गुफा में उन्हें योग, प्राणायाम, ध्यान आदि सिखाया. वे रात को आते और प्रातः न जाने कहां गायब हो जाते थे. दो माह बाद एक दिन जब तुकड़ो जी की समाधि टूटी, तो वहां न कोई योगी थे और न कोई गुफा.

इसके बाद तुकड़ो जी स्वतंत्रता आंदोलन में भी लग पड़े. उनकी भेंट गांधी जी से भी हुई, पर उनका मार्ग गांधी जी से अलग था. वे गाते थे – झाड़ झड़ूले शस्त्र बनेंगे, पत्थर सारे बम्ब बनेंगे, भक्त बनेगी सेना. ऐसे शब्दों से अंग्रेज शासन को नाराज होना ही था. 28 अगस्त, 1942 को उन्हें बंदी बना लिया गया. जेल से आने पर वे सेवा कार्य के माध्यम से समाज जागरण में जुट गये. उन्होंने ‘गुरुदेव सेवा मंडल’ स्थापित कर गांव-गांव में उसकी शाखाएं स्थापित कीं. एक समय उनकी संख्या 75,000 तक पहुंच गयी.

इसी समय उनकी भेंट संघ के सरसंघचालक गुरुजी से हुई. दोनों ने एक दूसरे को समझा और फिर शाखाओं पर भी उनके प्रवचन होने लगे. गुरुदेव सेवा मंडल ने गोरक्षा, ग्रामोद्योग, समरसता, कुष्ठ सेवा, व्यसन मुक्ति आदि रचनात्मक काम हाथ में लिये. इनके व्यापक प्रभाव को देखकर राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने उन्हें ‘राष्ट्रसंत’ की उपाधि दी. 1953 में तुकड़ो जी ने ग्राम विकास के सूत्रों की व्याख्या करने वाली ‘ग्राम गीता’ लिखी. 1964 में जब ‘विश्व हिन्दू परिषद’ की स्थापना हुई, तो वे वहां उपस्थित थे.

सूर्य उगता है, तो ढलता भी है. अब चलने का समय हो रहा था. तुकड़ो जी ने क्रमशः सभी कार्य अपने सहयोगियों को सौंप दिये और 11 अक्तूबर, 1966 को अपनी देहलीला को भी समेट लिया.

April 29th 2019, 8:40 pm

विश्व में बढ़ा है भारत का मान – सम्मान – इंद्रेश कुमार

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य इंद्रेश कुमार ने कहा कि यह लोकसभा चुनाव एक मेरिटोरियस तथा कई अनुत्तीर्ण लोगों के बीच का चुनाव है. वे जयपुर जन जागृति मंच की ओर से अजमेरी गेट के निकट स्थित राजस्थान चेंबर ऑफ कॉमर्स के भवन में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे.

“मतदान-राष्ट्र निर्माण” कार्यक्रम को संबोधित करते हुए इंद्रेश कुमार ने कहा कि वर्तमान में एक नया भारत बन रहा है. यह भारत पहले के जैसे गंदा नहीं है, अब स्वच्छ भारत दिखने लगा है. इस भारत में बेटी बोझ नहीं है, बेटी अब वरदान समझी जाने लगी. अब प्रदूषित भारत नहीं है, पर्यावरण वाला भारत बन रहा है.

उन्होंने कहा कि पिछले 5 वर्ष में सब कुछ हो गया, यह कहना ठीक नहीं है. किंतु कुछ भी नहीं हुआ, यह कहना भी गलत है. कांग्रेस पार्टी ने हिन्दू एवं भगवा को आतंकवादी कहा है. वर्दी को अत्याचारी कहा. वे देशद्रोहियों को छोड़ने की बात कहते हैं, एक देश में दो प्रधानमंत्री की बात कहते हैं. इसे भारत सहन नहीं करेगा.

इंद्रेश कुमार ने कहा कि केंद्र की वर्तमान सरकार के कारण पूरा विश्व योग और गीता को आदर की दृष्टि से देखने लगा है. बालाकोट की घटना के बाद पूरे भारत में जश्न मनाया गया. पूरा विश्व भारत के साथ खड़ा रहा. यूरोप, अमेरिका और चीन भारत के साथ रहे. मुस्लिम देशों के संगठन से पाकिस्तान बाहर हुआ और वहां भी भारत का सम्मान बढ़ा.

उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने देश को आजादी दिलाई, यह बहुत बड़ा झूठ है. देश को आजादी महाराणा प्रताप, शिवाजी, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे, चंद्रशेखर आजाद, लोकमान्य तिलक, सावरकर, सुभाष चंद्र बोस, लाला लाजपत राय, महात्मा गांधी, भगत सिंह जैसे लाखों लोगों के बलिदान एवं त्याग के कारण मिली. कांग्रेस पार्टी ने जिन्ना के साथ मिलकर देश के टुकड़े करवा दिए. उन्होंने कहा कि जन्म आधारित जाति व्यवस्था मानना ठीक नहीं है. हमारे यहां कर्म आधारित व्यवस्था रही है. कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. रमेश चंद्र अग्रवाल ने की. आभार प्रदर्शन कर्नल धनेश गोयल ने किया. कार्यक्रम के प्रारंभ में सनातन संस्कृति की अवधारणा ‘सर्वे भवंतु सुखिनः” को साकार करते हुए पक्षियों की जल व्यवस्था हेतु परिंडे लगाए गए. समापन पर अपना संस्थान की ओर से इंद्रेश कुमार जी को पक्षी आवास घौंसले भी भेंट किए गए.

April 28th 2019, 3:41 am

28 अप्रैल / बलिदान दिवस – क्रान्ति पुरोधा जोधासिंह अटैया

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नई दिल्ली. वर्ष 1857 की महान क्रान्ति का प्रमुख कारण भारत की स्वतन्त्रता का पावन उद्देश्य और अदम्य उत्साह ही नहीं, आत्माहुति का प्रथम आह्नान भी था. देश के हर क्षेत्र से हर वर्ग और आयु के वीरों और वीरांगनाओं ने आह्वान को स्वीकार किया और अपने रक्त से भारत मां का तर्पण किया. उसी मालिका के एक तेजस्वी पुष्प थे, क्रान्ति पुरोधा जोधासिंह अटैया. वर्ष 1857 में जब बैरकपुर छावनी में वीर मंगल पांडे ने क्रान्ति का शंखनाद किया, तो उसकी गूंज पूरे भारत में सुनायी देने लगी. 10 जून, 1857 को फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) में क्रान्तिवीरों ने भी इस दिशा में कदम बढ़ा दिया, उनका नेतृत्व कर रहे थे जोधासिंह अटैया. फतेहपुर के डिप्टी कलेक्टर हिकमत उल्ला खां भी इनके सहयोगी थे. इन वीरों ने सबसे पहले फतेहपुर कचहरी एवं कोषागार को अपने कब्जे में ले लिया.

जोधासिंह अटैया के मन में स्वतन्त्रता की आग बहुत समय से लगी थी. बस वह अवसर की प्रतीक्षा में थे. उनका सम्बन्ध तात्या टोपे से बना हुआ था. मातृभूमि को मुक्त कराने के लिए दोनों ने मिलकर अंग्रेजों से पांडु नदी के तट पर टक्कर ली. आमने-सामने के संग्राम के बाद अंग्रेजी सेना मैदान छोड़कर भाग गयी. इन वीरों ने कानपुर में अपना झंडा गाड़ दिया. जोधासिंह के मन की ज्वाला इतने पर भी शान्त नहीं हुई. उन्होंने 27 अक्तूबर, 1857 को महमूदपुर गांव में एक अंग्रेज दरोगा और सिपाही को उस समय जलाकर मार दिया, जब वे एक घर में ठहरे हुए थे. सात दिसम्बर, 1857 को उन्होंने गंगापार रानीपुर पुलिस चौकी पर हमला कर अंग्रेजों के एक पिट्ठू का वध कर दिया. जोधासिंह ने अवध एवं बुन्देलखंड के क्रान्तिकारियों को संगठित कर फतेहपुर पर भी कब्जा कर लिया.

आवागमन की सुविधा को देखते हुए क्रान्तिकारियों ने खजुहा को अपना केन्द्र बनाया. किसी देशद्रोही मुखबिर की सूचना पर प्रयाग से कानपुर जा रहे कर्नल पावेल ने स्थान पर एकत्रित क्रान्ति सेना पर हमला कर दिया. कर्नल पावेल उनके गढ़ को तोड़ना चाहता था, पर जोधासिंह की योजना अचूक थी. उन्होंने गुरिल्ला युद्ध प्रणाली का सहारा लिया, जिससे कर्नल पावेल मारा गया. अब अंग्रेजों ने कर्नल नील के नेतृत्व में सेना की नयी खेप भेज दी. इससे क्रान्तिकारियों को भारी हानि उठानी पड़ी.

लेकिन इसके बाद भी जोधासिंह का मनोबल कम नहीं हुआ. उन्होंने नये सिरे से सेना के संगठन, शस्त्र संग्रह और धन एकत्रीकरण की योजना बनायी. इसके लिए छद्म वेष में प्रवास प्रारम्भ कर दिया, पर देश का यह दुर्भाग्य रहा कि वीरों के साथ-साथ देशद्रोही भी पनपते रहे हैं. जब जोधासिंह अटैया अरगल नरेश से संघर्ष हेतु विचार-विमर्श कर खजुहा लौट रहे थे, तो किसी मुखबिर की सूचना पर ग्राम घोरहा के पास अंग्रेजों की घुड़सवार सेना ने उन्हें घेर लिया. थोड़ी देर के संघर्ष के बाद ही जोधासिंह अपने 51 क्रान्तिकारी साथियों के साथ बन्दी बना लिये गये.
जोधासिंह और उनके देशभक्त साथियों को अपने किये का परिणाम पता ही था. 28 अप्रैल, 1858 को मुगल रोड पर स्थित इमली के पेड़ पर उन्हें अपने 51 साथियों के साथ फांसी दे दी गयी. बिन्दकी और खजुहा के बीच स्थित वह इमली का पेड़ (बावनी इमली) आज शहीद स्मारक के रूप में स्मरण किया जाता है.

April 27th 2019, 6:54 pm

देश व समाज में संघ की स्वीकार्यता बढ़ी है – नरेंद्र ठाकुर

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आगरा. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्य कार्य व्यक्ति निर्माण व समाज को संगठित करना है. इसीलिए संघ की समाज में और देश में स्वीकार्यता व सहयोग लगातार बढ़ रहा है.

वे ब्रज संवाद मासिक पत्रिका के ‘जयतु भारत विशेषांक’ के विमोचन अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे. ब्रज संवाद विश्व संवाद केंद्र आगरा द्वारा प्रकाशित मासिक पत्रिका है जो राष्ट्र जागरण का शंखनाद करती है. पत्रिका ने भारत को विश्व में प्रथम स्थान पर लाने हेतु शोधपरक सामग्री से परिपूर्ण ‘जयतु भारत’ नाम से विशेषांक प्रकाशित किया है.

इस अवसर पर उपस्थित नगर के प्रबुद्धजनों को संबोधित करते हुए नरेंद्र जी ने कहा कि देशभक्ति स्थायी होनी चाहिये, प्रतिक्रियावादी नहीं. आंदोलनों में प्रतिक्रिया स्वरूप राष्ट्रीय संपत्ति की क्षति नहीं करनी चाहिए. समाज को भी राष्ट्रीयता की भावना जागृत करने के लिए अपने दायित्व का निर्वहन करना चाहिए.

कार्यक्रम की अध्यक्षता तपन ग्रुप के प्रबंध निदेशक व लीडर्स आगरा के संरक्षक सुरेश चन्द्र गर्ग ने की. मुख्य अतिथि के रूप में सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस राजीव लोचन मेहरोत्रा, विशिष्ट अतिथि के रूप में नगर प्रमुख नवीन जैन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत संघचालक डॉ जगदीश वशिष्ठ उपस्थित थे.

नवीन जैन ने राष्ट्रीयता का शंखनाद करने वाली पत्रिकाओं के महत्व पर प्रकाश डाला. प्रांत संघचालक डॉ. जगदीश वशिष्ठ ने हिंदुओं के संगठित होने व व्यक्तिवादी चिंतन के बजाय राष्ट्रीय चिंतन पर बल दिया. मुख्य अतिथि जस्टिस मेहरोत्रा ने नैतिक शिक्षा के साथ साथ राष्ट्रप्रेम व राष्ट्रीयता की शिक्षा को अनिवार्य करने की आवश्यकता पर बल दिया.

अध्यक्षीय भाषण में सुरेश चंद गर्ग ने अपील की कि समाज के लिए सोचें और तन-मन-धन समाज को समर्पित कर दें.

कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख सुरेश चंद्र जी सहित अन्य गणमान्यजन उपस्थित थे.

April 27th 2019, 3:58 am

27 अप्रैल / इतिहास स्मृति – कांगला दुर्ग का पतन

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नई दिल्ली. वर्ष 1857 के स्वाधीनता संग्राम में सफलता के बाद अंग्रेजों ने ऐसे क्षेत्रों को भी अपने अधीन करने का प्रयास किया, जो उनके कब्जे में नहीं थे. पूर्वोत्तर भारत में मणिपुर एक ऐसा ही क्षेत्र था. स्वाधीनता प्रेमी वीर टिकेन्द्रजीत सिंह वहां के युवराज तथा सेनापति थे. उन्हें ‘मणिपुर का शेर’ भी कहते हैं. उनका जन्म 29 दिसम्बर, 1856 को हुआ था. वे राजा चन्द्रकीर्ति के चौथे पुत्र थे. राजा की मृत्यु के बाद उनके बड़े पुत्र सूरचन्द्र राजा बने. दूसरे और तीसरे पुत्रों को क्रमशः पुलिस प्रमुख तथा सेनापति बनाया गया. कुछ समय बाद सेनापति झलकीर्ति की मृत्यु हो जाने से टिकेन्द्रजीत सिंह सेनापति बनाये गये.

राजवंशों में आपसी द्वेष व अहंकार के कारण सदा से ही गुटबाजी होती रही है. मणिपुर में भी ऐसा ही हुआ. अंग्रेजों ने इस स्थिति का लाभ उठाना चाहा. टिकेन्द्रजीत सिंह ने राजा सूरचन्द्र को कई बार सावधान किया, पर वे उदासीन रहे. इससे नाराज होकर टिकेन्द्रजीत सिंह ने अंगसेन, जिलंगाम्बा आदि कई वीर व स्वदेशप्रेमी साथियों सहित 22 सितम्बर, 1890 को विद्रोह कर दिया. इस विद्रोह से डरकर राजा भाग गया. अब कुलचन्द्र को राजा तथा टिकेन्द्रजीत सिंह को युवराज व सेनापति बनाया गया. पूर्व राजा सूरचन्द्र ने टिकेन्द्रजीत सिंह को सूचना दी कि वे राज्य छोड़कर सदा के लिए वृन्दावन जाना चाहते हैं, पर वे वृन्दावन की बजाय कलकत्ता में ब्रिटिश वायसराय लैंसडाउन के पास पहुंच गये और अपना राज्य वापस दिलाने की प्रार्थना की.

इस पर वायसराय ने असम के कमिश्नर जे.डब्ल्यू. क्विंटन को मणिपुर पर हमला करने को कहा. उनकी इच्छा टिकेन्द्रजीत सिंह को पकड़ने की थी. चूंकि इस शासन के निर्माता तथा संरक्षक वही थे. क्विंटन 22 मार्च, 1891 को 400 सैनिकों के साथ मणिपुर जा पहुंचा. इस दल का नेतृत्व कर्नल स्कैन कर रहा था. उसने राजा कुलचंद्र को कहा कि हमें आपसे कोई परेशानी नहीं है. आप स्वतंत्रतापूर्वक राज्य करें, पर युवराज टिकेन्द्रजीत सिंह को हमें सौंप दें. पर, स्वाभिमानी राजा तैयार नहीं हुए. अंततः क्विंटन ने 24 मार्च को राजनिवास ‘कांगला दुर्ग’ पर हमला बोल दिया. उस समय दुर्ग में रासलीला का प्रदर्शन हो रहा था. लोग दत्तचित्त होकर उसे देख रहे थे. इस असावधान अवस्था में ही क्विंटन ने सैकड़ों पुरुषों, महिलाओं तथा बच्चों को मार डाला, पर थोड़ी देर में ही दुर्ग में स्थित सेना ने भी मोर्चा संभाल लिया. इससे अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा. क्रोधित नागरिकों ने पांच अंग्रेज अधिकारियों को पकड़कर फांसी दे दी. इनमें क्विंटन तथा उनका राजनीतिक एजेंट ग्रिमवुड भी था.

अंग्रेज सेना की इस पराजय की सूचना मिलते ही कोहिमा, सिलचर और तामू से तीन बड़ी सैनिक टुकडि़यां भेज दी गयीं. 31 मार्च, 1891 को अंग्रेजों ने मणिपुर शासन से युद्ध घोषित कर दिया. टिकेन्द्रजीत सिंह ने बड़ी वीरता से अंग्रेज सेना का मुकाबला किया, पर उनके साधन सीमित थे. अंततः 27 अप्रैल, 1891 को अंग्रेज सेना ने कांगला दुर्ग पर अधिकार कर लिया.

अंग्रेजों ने राजवंश के एक बालक चारुचंद्र सिंह को राजा तथा मेजर मैक्सवेल को उनका राजनीतिक सलाहकार बनाकर मणिपुर को अपने अधीन कर लिया. टिकेन्द्रजीत सिंह भूमिगत हो गये, पर अंततः 23 मई को वे भी पकड़ लिये गये. अंग्रेजों ने मुकदमा चलाकर उन्हें और उनके साथी जनरल थंगल को 13 अगस्त, 1891 को इम्फाल के पोलो मैदान (वर्तमान वीर टिकेन्द्रजीत सिंह मैदान) में फांसी दे दी.

April 26th 2019, 7:09 pm

बंगाल के इमामों ने 10,000 पत्र लिखे, कहा – मुसलमान एकजुट हो सेक्युलर पार्टी को वोट दें

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नई दिल्ली. पश्चिम बंगाल में प्रमुख मुस्लिम इमामों ने पत्र लिख मुस्लिम समुदाय से सेक्युलर दलों को वोट करने की अपील की है. बंगाल के ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के इमामों और मौलवियों ने कथित तौर पर पश्चिम बंगाल के मुस्लिम मतदाताओं को 10,000 पत्र लिखकर कहा है कि वे एक कौम के रूप में एकजुट हों और सांप्रदायिक ताकतों को दरकिनार कर सेक्युलर सरकार को चुनें.

ये पत्र ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल की राज्य इकाई द्वारा भेजा गया है. इस पत्र पर ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के अध्यक्ष करी फजलुर रहमान और उपाध्यक्ष मौलाना शफीक कासमी ने हस्ताक्षर किए हैं. करी फजलुर कोलकाता की रेड रोड पर ईद के मौके पर नमाज पढ़ाने वाले प्रमुख इमाम हैं, जबकि मौलाना शफीक कासमी कोलकाता की चर्चित नखोड़ा मस्जिद के इमाम हैं.

ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल की राज्य इकाई के प्रमुख कारी फजलुर रहमान ने डीएनए से बातचीत में कहा कि मुसलमानों को उनके मताधिकार की याद दिलाने के लिए यह पत्र लिखे गए हैं. उन्होंने मुस्लिम समुदाय के मतदाताओं से अपील की है कि 2019 में वो किसी तरह की गलती ना करें, वोट देने का अवसर बार-बार नहीं आता, इसलिए उन्हें अपना वोट किसे देना है, इस पर सोच-विचार करना जरूरी है. उन्हें इस बात का ध्यान रखना होगा कि उनका (मुस्लिम) वोट उसे ही मिले जो देश में सेक्युलर शासन लाए, न कि सांप्रदायिक तत्वों को सत्ता में जगह मिल जाए.

जब रहमान से पूछा गया कि राज्य में सेक्युलर पार्टी कौन सी है और मुस्लिम वोटरों को किसे वोट देना चाहिए तो इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि जो दल सबसे ज्यादा मजबूत हो और जिसके जीतने की संभावना सबसे अधिक है. उनका कहना है कि बंगाल में सत्ताधारी दल तृणमूल के जीतने की उम्मीद सबसे ज्यादा है. इसलिए मुस्लिमों को अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों को वोट देकर अपना वोट नहीं बंटने देना चाहिए, क्योंकि ऐसा होने पर फासीवादी ताकतों को मदद मिल जाएगी.

इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए इमाम ने कहा, “पिछली बार हमने देखा कि कैसे मुस्लिम वोटों के विभाजन ने फासीवादी ताकतों को सत्ता में आने में मदद की. हम मुसलमानों से अपना वोट बर्बाद न करने और इसे बहुमूल्य बनाने के लिए कह रहे हैं. फासीवादी ताकतें देश के धर्मनिरपेक्ष ढाँचे को नुकसान पहुँचा रही हैं, जहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई एक साथ रहते हैं.”

हालांकि पत्र में किसी भी कैंडिडेट या फिर राजनीतिक दल का ज़िक्र नहीं किया गया है. मगर डीएनए के साथ कारी फजलुर रहमान द्वारा की गई बातचीत से यह स्पष्ट हो रहा है कि पश्चिम बंगाल में ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल, भाजपा के खिलाफ और तृणमूल के लिए वोट देने की अपील कर रही है.

April 26th 2019, 6:58 am

26 अप्रैल / पुण्यतिथि – भारत दर्शन कार्यक्रम के प्रणेता विद्यानंद शेणाय

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नई दिल्ली. भारत माता की जय और वन्दे मातरम् तो प्रायः सब लोग बोलते हैं, पर भारतभूमि की गोद में जो हजारों तीर्थ, धाम, पर्यटन स्थल, महामानवों के जन्म और कर्मस्थल हैं, उनके बारे में प्रायः लोगों को मालूम नहीं होता. भारत दर्शन कार्यक्रम के माध्यम से इस बारे में लोगों को जागरूक करने वाले विद्यानंद शेणाय जी का जन्म कर्नाटक के प्रसिद्ध तीर्थस्थल शृंगेरी में हुआ था. श्रीमती जयम्मा एवं श्री वैकुंठ शेणाय दम्पति को पांच पुत्र और आठ पुत्रियां प्राप्त हुईं. इनमें विद्यानंद सातवें स्थान पर थे. उनके पिताजी केले बेचकर परिवार चलाते थे. सात वर्ष की अवस्था तक वे बहुत कम बोलते थे. किसी के सुझाव पर उनकी मां पुराना शहद और बच्च नामक जड़ी पीस कर प्रातःकाल उनके गले पर लगाने लगी. इस दवा और मां शारदा की कृपा से उनका स्वर खुल गया.‘भारत दर्शन कार्यक्रम’ की लोकप्रियता के बाद उनकी मां ने कहा कि मेरा बेटा इतना बोलेगा, यह तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था.

ज्योतिषियों ने विद्यानंद को पानी से खतरा बताया था, पर उन्हें तुंगभद्रा नदी के तट पर बैठना बहुत अच्छा लगता था. एक बार नहाते समय वे नदी में डूबने से बाल-बाल बचे. बीकॉम की परीक्षा उत्तीर्ण कर वे बैंक में नौकरी करने लगे, पर इसमें उनका मन नहीं लगा. अतः नौकरी छोड़कर वे एक चिकित्सक के पास सहायक के नाते काम करने लगे. इसी बीच उनके बड़े भाई डॉ. उपेन्द्र शेणाय संघ के प्रचारक बन गये. आपातकाल में भूमिगत कार्य करते समय वे पकड़े गये और 15 मास तक जेल में रहे. इसके बाद उन्होंने सीए की परीक्षा उत्तीर्ण की. उनके एक बड़े भाई अपने काम के सिलसिले में हैदराबाद रहने लगे थे. अतः पूरा परिवार वहीं चला गया, पर एक दिन विद्यानंद जी भी घर छोड़कर प्रचारक बन गये.

संघ शिक्षा वर्ग में मानचित्र परिचय का कार्यक्रम होता है. विद्यानंद जी प्रायः वर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से उसे अधिक रोचक बनाने को कहते थे. वे वरिष्ठ प्रचारक कृष्णप्पा जी की प्रेरणा से प्रचारक बने थे. उन्होंने विद्यानंद जी की रुचि देखकर उन्हें ही इसे विकसित करने को कहा. अब विद्यानंद जी ‘भारत दर्शन’ के नाम से शाखा तथा विद्यालयों में यह कार्यक्रम करने लगे. सांस्कृतिक भारत के मानचित्र में पवित्र नदियां, पर्वत, तीर्थ आदि देखते और उनका महत्व सुनते हुए श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे. कुछ समय बाद उन्हें बंगलुरु में ‘राष्ट्रोत्थान परिषद’ का काम सौंपा गया. शीघ्र ही यह कार्यक्रम पूरे कर्नाटक के गांव-गांव में लोकप्रिय हो गया. यहां तक कि पुलिस वाले भी अपने परिजनों के बीच अलग से यह कार्यक्रम कराने लगे.

जब इस कार्यक्रम की पूरे देश में मांग होने लगी, तो उन्होंने हिन्दी और अंग्रेजी में भी इसे तैयार किया. अपनी मातृभाषा कोंकणी में तो वे बोल ही लेते थे. भारत दर्शन के 50,000 कैसेट भी जल्दी ही बिक गये. इस प्रकार भारत दर्शन ने युवा पीढ़ी में देश-दर्शन के प्रति जागरण किया. परन्तु इसी बीच उनके सिर में दर्द रहने लगा. काम करते हुए अचानक आंखों के आगे अंधेरा छा जाता था. जांच से पता लगा कि मस्तिष्क में एक बड़ा फोड़ा बन गया है. यह एक असाध्य रोग था. चिकित्सकों के परामर्श पर दो बार शल्यक्रिया हुई, पर कुछ सुधार नहीं हुआ और कष्ट बढ़ता गया. इसी अवस्था में 26 अप्रैल, 2007 को 55 वर्ष की आयु में बंगलुरु के चिकित्सालय में अपने मित्र और परिजनों के बीच उनका प्राणांत हुआ.

 

April 25th 2019, 7:49 pm

कला देश सेवा का माध्यम है – डॉ. मोहन भागवत

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मुंबई (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि कला यह व्यक्तिगत नहीं होती, अपितु वह देश सेवा का एक माध्यम है. अपनी प्रगति के कारण कहीं देश की उन्नति का लक्ष्य धूमिल न हो जाए, इसके प्रति हमें सजग रहना चाहिये. उन्होंने कहा कि केवल गुणवान होना उपयोगी नहीं. बल्कि अपने गुणों के आधार पर, अपने कर्तृत्व से देश को और अच्छा कैसे बनाया जाए, इसके लिये हम सबको प्रयत्नशील रहना आवश्यक है. कला के माध्यम से जो अभिव्यक्त होता है, वह सीधा हृदय में उतर जाता है जो अधिक परिणामकारक होता है. सरसंघचालक जी 24 अप्रैल को मुंबई में मास्टर दीनानाथ स्मृति पुरस्कार वितरण समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे. पुलवामा आतंकी हमले के बलिदानी सैनिकों के बारे में डॉ. भागवत ने कहा कि सीमा पर हमारे वीर सैनिक हिम्मत के साथ डटकर खड़े रहते हैं. उन्हीं के कारण हम चैन की सांस ले रहे हैं. आपातकाल एवं संकट के समय सैनिक अपने प्राण अर्पण कर देते हैं. भगवान श्रीकृष्ण ने मुक्ति किसे मिलती है, इसका उत्तर देते हुए भगवद्गीता में कहा है - संन्यासी और सीमा पर अपने प्राण न्यौछावर करने वाले सैनिक को मुक्ति मिलती है. अपने सीने पर गोली झेलने वाले सैनिकों को ईश्वर प्राप्ति, स्वर्ग प्राप्ति होती है, इसमें कोई संदेह नहीं है. दीनानाथ मंगेशकर जी के कर्तृत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि मा. दीनानाथ को ईश्वर ने कलाक्षेत्र के लिये ही बनाया था. परंतु, ईश्वर ने जो दिया, उसका उपयोग उन्होंने देशहित के लिये किया. उनके नाट्यों में हमें देशभक्ति और देशसेवा का दर्शन होता है. परतंत्रता के दिनों में वह आवश्यक था. उनके नाट्य गीत, गाने की पद्धति समाज को कार्यप्रवृत्त करती थी, समाज में उपयुक्त वीर रस प्रवाहित करती थी. मा. दीनानाथ जी की परंपरा मंगेशकर परिवार ने कायम रखी है. संगीत, नाट्य, चित्रपट, साहित्य ऐसे विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाले व्यक्तियों को मंगेशकर परिवार के माध्यम से मास्टर दीनानाथ मंगेशकर स्मृति पुरस्कार प्रदान किया जाता है. सम्मान समारोह में बाबासाहेब पुरंदरे भी उपस्थित रहे. छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा देकर सरसंघचालक जी ने उन्हें सम्मानित किया. सीआरपीएफ के डीजी विजय कुमार सम्मान समारोह के अध्यक्ष थे. मा. दीनानाथ विशेष पुरस्कार से पटकथा लेखक सलीम खान, अभिनेत्री हेलन और निर्देशक मधूर भांडारकर को सम्मानित किया गया. मा. दीनानाथ पुरस्कार से भरतनाट्यम की प्रसिद्ध कलाकार डॉ. सुचेता भिड़े, मोहन वाघ पुरस्कार से भद्रकाली प्रोडक्शन के प्रसाद कांबली, आनंदमयी पुरस्कार से पं. सुरेश तलवलकर के तालयोगी आश्रम (संस्था को) एवं वाग्विलासिनी पुरस्कार से मराठी कवि वसंत आबाजी डहाके को सम्मानित किया गया. सीआरपीएफ को दी एक करोड़ रुपये की राशि लता मंगेशकर की ओर से पुलवामा हमले में बलिदान हुए सैनिकों के परिजनों की सहायता के लिये एक करोड़ रुपए की राशि सीआरपीएफ डीजी को दी गई. अस्वस्थता के कारण लता मंगेशकर जी समारोह में उपस्थित नहीं थीं. उनकी बहन उषा मंगेशकर ने राशि विजय कुमार जी को सौंपी. अन्य कलाकारों व सहयोगियों ने 18 लाख रुपये की राशि सीआरपीएफ को दी. डीजी विजय कुमार ने कहा कि पुलवामा हमले के पश्चात, भारत के वीर – एप व वेबसाइट के माध्यम से सहयोग निधि भेजी है. और 225 करोड़ रुपये की सहयोग राशि प्राप्त हो चुकी है.

April 25th 2019, 6:39 am

25 अप्रैल / जन्मदिवस – विद्यार्थी परिषद की कार्यप्रणाली को आधार देने वाले यशवंत केलकर

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नई दिल्ली. वे यशवंत वासुदेव केलकर ही थे, जिन्होंने ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ की कार्यप्रणाली को महत्वपूर्ण आधार दिया. उनका जन्म 25 अप्रैल, 1925 को पंढरपुर (महाराष्ट्र) में हुआ था. उनके पिता शिक्षा विभाग में नौकरी करते थे. वे रूढि़वादी थे, जबकि माता जानकीबाई जातिभेद से ऊपर उठकर सोचती थीं. यशवंत के मन पर मां के विचारों का अधिक प्रभाव पड़ा. यशवंत पढ़ाई में सदा प्रथम श्रेणी पाते थे. मराठी तथा अंग्रेजी साहित्य में उनकी बहुत रुचि थी. पुणे में महाविद्यालय में पढ़ते समय वे संघ के स्वयंसेवक बने. शाखा के सभी कार्यक्रमों में भी वे सदा आगे ही रहते थे.

1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की विफलता के बाद वे क्रांतिकारी आंदोलन से प्रभावित हुए. इस दौरान उन्होंने इटली के क्रांतिकारी जोजेफ मैजिनी की जीवनी का सामूहिक पठन-पाठन, डैम्ब्रिन की जीवनी का मराठी अनुवाद कर उसका प्रकाशन तथा फिर बम बनाने का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया.

1944 तथा 45 में संघ शिक्षा वर्ग कर वे प्रचारक बने तथा नासिक आये. 1952 में वे सोलापुर के जिला प्रचारक बने. फिर उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी करने का निर्णय लिया और पुणे आकर अंग्रेजी में प्रथम श्रेणी में भी प्रथम रहकर एमए किया. इस प्रकार वे शिक्षा तथा संगठन दोनों में कुशल थे. उन्हें तुरंत मुंबई के केसी महाविद्यालय में प्राध्यापक की नौकरी मिल गयी. अगले साल वे नैशनल कॉलेज में आ गये और फिर 1985 में अवकाश प्राप्ति तक वहीं रहे. 1958 में अंग्रेजी की प्राध्यापक शशिकला जी के साथ उन्होंने गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया. उन्हें तीन पुत्रों की प्राप्ति हुई.

विद्यार्थी परिषद का जन्म 1947-48 में संघ पर लगे प्रतिबंध के समय एक मंच के रूप में हुआ था, पर 1949 में यह पंजीकृत संस्था बन गयी. 1958 तक इसका काम देश के कुछ प्रमुख शिक्षा केन्द्रों तक ही सीमित था. पर यशवंत जी को जब इसमें भेजा गया, तो संगठन ने नये आयाम प्राप्त किये.

परिषद के विचार तथा कार्यप्रणाली को उन्होंने सुदृढ़ आधार प्रदान किया. प्रांतीय तथा राष्ट्रीय अधिवेशन प्रारम्भ हुए. परिषद का कार्यालय बहुत वर्षों तक उनके घर में रहा. विद्यालय के बाद का पूरा समय वे परिषद को देने लगे. 1967 में वे परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, पर एक वर्ष बाद ही उन्होंने यह दायित्व छोड़ दिया. वस्तुतः उनका मन तो पर्दे के पीछे रहकर ही काम करने में लगता था. परिषद की दूसरी और फिर तीसरी टोली भी उन्होंने निर्माण की. 1975 में आपातकाल लगने पर संघ तथा अन्य कई संगठनों पर प्रतिबंध लगा. यह प्रतिबंध परिषद पर नहीं था, पर लोकतंत्र की हत्या के विरोध में हुए सत्याग्रह में परिषद के कार्यकर्ताओं ने भी भाग लिया. यशवंत जी को भी ‘मीसा’ में बंद कर दिया गया.

उनके कारण नासिक रोड की वह जेल भी एक शिविर बन गयी. शारीरिक और बौद्धिक कार्यक्रम वहां विधिवत चलते थे. यहां तक कि खाली ड्रमों का उपयोग कर पथसंचलन भी निकाला गया. जेल में अन्य विचार वाले बंदी लोगों से भी यशवंत जी ने मधुर संबंध बनाये. आपातकाल के बाद यशवंत जी ने अपना पूरा ध्यान फिर से परिषद के काम में लगा दिया. 1984 में उनकी अनिच्छा के बावजूद देश भर में उनकी 60वीं वर्षगांठ मनाई गयी. इन कार्यक्रमों में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विद्यार्थी परिषद और हिन्दुत्व के बारे में ही बोलते थे.

इसी बीच वे पीलिया तथा जलोदर जैसी बीमारियों से पीडि़त हो गये. इलाज के बावजूद यह रोग घातक होता चला गया. यशवंत जी को भी इसका अनुभव हो गया था. इसी रोग से 6 दिसम्बर, 1988 को देर रात डेढ़ बजे उनका देहांत हो गया. उस समय उनका पूरा परिवार वहां उपस्थित था.

April 24th 2019, 8:35 pm

24 अप्रैल / पुण्यतिथि – गौरक्षा के लिये 166 दिन अनशन करने वाले महात्मा रामचंद्र वीर

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नई दिल्ली. वर्ष 1966 में दिल्ली में गौरक्षार्थ 166 दिन का अनशन करने वाले महात्मा रामचंद्र वीर का जन्म आश्विन शुक्ल प्रतिपदा, विक्रमी संवत 1966 (1909 ई) में महाभारतकालीन विराट नगर (राजस्थान) में हुआ था.

इनके पूर्वज स्वामी गोपालदास बाणगंगा के तट पर स्थित ग्राम मैड़ के निवासी थे. उन्होंने औरंगजेब द्वारा दिल्ली में हिन्दुओं पर थोपे गये शमशान कर के विरोध में उसके दरबार में ही आत्मघात किया था. उनके पास समर्थ स्वामी रामदास द्वारा प्रदत्त पादुकाएं थीं, जिनकी प्रतिदिन पूजा होती थी. इन्हीं की 11वीं पीढ़ी में रामचंद्र जी का जन्म हुआ. इनके पिता भूरामल्ल तथा माता वृद्धिदेवी थीं.

बालपन से ही उनके मन में मूक पशुओं के प्रति अतिशय करुणा विद्यमान थी. जब कोई पशुबलि को शास्त्र सम्मत बताता, तो वे रो उठते थे. आगे चलकर उन्होंने गोवंश की रक्षा और पशुबलि उन्मूलन के कार्य को ही अपना ध्येय बना लिया.

इस प्रयास में जिन महानुभावों का स्नेह उन्हें मिला, उनमें स्वामी श्रद्धानंद, मालवीय जी, वीर सावरकर, भाई परमानंद, गांधी जी, डॉ केशव बलिराम हेडगेवार, पं नेहरू, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (श्रीगुरूजी), प्रफुल्ल चंद्र राय, रामानंद चट्टोपाध्याय, बालकृष्ण शिवराम मुंजे, करपात्री जी, गाडगे बाबा, विनोबा भावे, प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, जयदयाल गोयनका, हनुमान प्रसाद पोद्दार आदि प्रमुख हैं. रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने तो उनकी प्रशस्ति में एक कविता भी लिखी थी.

रामचंद्र वीर जी ने कोलकाता व लाहौर के कांग्रेस अधिवेशनों में भी भाग लिया था. 1932 में अजमेर में दिये गये उग्र भाषण के लिए वे छह माह जेल में भी रहे.

प्रखर वक्ता, कवि व लेखक वीर जी ने गौहत्या के विरोध में 18 वर्ष की अवस्था में अन्न व नमक त्याग का संकल्प लिया और उसे आजीवन निभाया. उन्होंने अपने प्रयासों से 1100 मंदिरों को पशुबलि के कलंक से मुक्त कराया. इसके लिए उन्होंने 28 बार जेलयात्रा की तथा 100 से अधिक अनशन किये. इनमें तीन दिन से लेकर 166 दिन तक के अनशन शामिल हैं. वे एक शंख तथा मोटा डंडा साथ रखते थे और सभा में शंखध्वनि अवश्य करते थे.

महात्मा वीर जी ने हिन्दू समाज को पाखंडपूर्ण कुरीतियों और अंधविश्वासों से मुक्ति दिलाने के लिए पशुबलि निरोध समिति तथा आदर्श हिन्दू संघ की स्थापना की. उनका पूरा परिवार गौरक्षा को समर्पित था. 1966 के आंदोलन में उनके साथ उनके एकमात्र पुत्र आचार्य धर्मेन्द्र ने भी तिहाड़ जेल में अनशन किया. उनकी पुत्रवधू प्रतिभा देवी ने भी दो पुत्रियों तथा एक वर्षीय पुत्र प्रणवेन्द्र के साथ सत्याग्रह कर कारावास भोगा था.

वीर जी ने अपने जन्मस्थान के निकट भीमगिरि पर्वत के पंचखंड शिखर पर हनुमान जी की 100 मन वजनी प्रतिमा स्थापित की. यहां हनुमान जी के साथ ही महाबली भीम की भी पूजा होती है. समर्थ स्वामी रामदास की पादुकाएं भी यहां विराजित हैं. महात्मा वीर जी ने जीवन के अंतिम 28 वर्ष इसी स्थान पर व्यतीत किये.

उन्होंने देश व धर्म के लिए बलिदान देने वाले वीरों का विस्तृत इतिहास लिखा तथा अपनी जीवनी ‘विकट यात्रा’, हमारी गौमाता, श्री वीर रामायण (महाकाव्य), वज्रांग वंदना, हमारा स्वास्थ्य, विनाश का मार्ग आदि पुस्तकों की रचना की. इसके लिए उन्हें कई संस्थाओं ने सम्मानित किया.

हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्थान के लिए समर्पित वीर जी भारत को पुनः अखंड देखना चाहते थे. आचार्य विष्णुकांत शास्त्री द्वारा ‘जीवित हुतात्मा’ की उपाधि से विभूषित वीर जी का 24 अप्रैल, 2009 को जन्मशती वर्ष में देहांत हुआ. उनकी अंतिम यात्रा में दूर-दूर से आये 50,000 नर-नारियों ने भाग लेकर उन्हें श्रद्धांजलि दी. शवयात्रा में रामधुन तथा वीर जी की जय के साथ ही ‘हिन्दू प्रचंड हो, भारत अखंड हो’ तथा ‘गौमाता की जय’ जैसे नारे लग रहे थे.

April 23rd 2019, 6:46 pm

संघ और गांधीजी

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चुनाव का शंख बज चुका है. सभी दल अपनी-अपनी संस्कृति और परम्परा के अनुसार चुनावी भाषण भी दे रहे हैं. एक दल के नेता ने कहा कि इस चुनाव में आपको गांधी या गोडसे के बीच चुनाव करना है. एक बात मैंने देखी है. जो गांधी जी के असली अनुयायी हैं, वे अपने आचरण पर अधिक ध्यान देते हैं, वे कभी गोडसे का नाम तक नहीं लेते. संघ में भी गांधी जी की चर्चा तो अनेक बार होती देखी है, पर गोडसे के नाम की चर्चा मैंने कभी नहीं सुनी है. परंतु अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए गांधी जी के नाम को भुनाने के लिए, ऐसे-ऐसे लोग गोडसे का नाम बार बार लेते हैं,जिनका आचरण और उनकी नीतियों का गांधी जी के विचारों से दूर दूर तक कोई सरोकार नहीं दिखता. वे तो सरासर असत्य और हिंसा का आश्रय लेने वाले और अपने स्वार्थ के लिए गांधी जी का उपयोग करने वाले ही होते हैं. एक दैनिक के सम्पादक ने, जो संघ के स्वयंसेवक भी हैं, कहा कि एक गांधीवादी विचारक के लेख हमारे दैनिक में प्रकाशित हो रहे हैं. उस सम्पादक ने यह भी कहा कि उन गांधीवादी विचारक ने लेख लिखने की बात करते समय यह कहा कि संघ के और गांधीजी के संबंध कैसे थे, यह मैं जानता हूं फिर भी मैं आपको अनजान कुछ पहलुओं के बारे में लिखूंगा. यह सुन कर मैंने प्रश्न किया कि संघ और गांधीजी के संबंध कैसे थे, यह वे विचारक सही में जानते हैं? लोग बिना जाने, अध्ययन किए अपनी धारणाएं बना लेते हैं. संघ के बारे में तो अनेक विद्वान, स्कॉलर कहलाने वाले लोग भी पूरा अध्ययन करने का कष्ट किए बिना या, सिलेक्टिव अध्ययन के आधार पर या एक विशिष्ट दृष्टिकोण से लिखे साहित्य के आधार पर ही अपने 'विद्वत्तापूर्ण' (?) विचार व्यक्त करते हैं. किन्तु वास्तविकता यह है कि इन विचारों का ‘सत्य’ से कोई लेना-देना नहीं होता है. महात्मा गांधी जी के कुछ मतों से तीव्र असहमति होते हुए भी संघ से संबंध कैसे थे, इस पर उपलब्ध जानकारी पर नजर डालनी चाहिए. भारत की आजादी के लिए अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष में जनाधार को व्यापक बनाने के शुद्ध उद्देश्य से मुसलमानों के कट्टर और जिहादी मानसिकता वाले हिस्से के सामने उनकी शरणागति से सहमत न होते हुए भी, आजादी के आंदोलन में सर्व सामान्य लोगों को सहभागी होने के लिए उन्होंने चरख़ा जैसा सहज उपलब्ध अमोघ साधन और सत्याग्रह जैसा सहज स्वीकार्य तरीका दिया, वह उनकी महानता है. ग्राम स्वराज्य, स्वदेशी, गौरक्षा, अस्पृश्यता निर्मूलन आदि उनके आग्रह के विषयों से भारत के मूलभूत हिन्दू चिंतन से उनका लगाव और आग्रह के महत्व को कोई नकार नहीं सकता. उनका स्वयं का मूल्याधारित जीवन अनेक युवक-युवतियों को आजीवन व्रतधारी बनकर समाज की सेवा में लगने की प्रेरणा देने वाला था. सन् 1921 के असहयोग आंदोलन और 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन - इन दोनों सत्याग्रहों में डॉक्टर हेडगेवार सहभागी हुए थे. इस कारण उन्हें 19 अगस्त 1921 से 12 जुलाई 1922 तक और 21 जुलाई,1930 से 14 फ़रवरी, 1931 तक दो बार सश्रम कारावास की सजा भी हुई. महात्मा गांधी जी को 18 मार्च, 1922 को छह वर्ष की सजा हो गयी. तब से उनकी मुक्ति तक प्रत्येक महीने की 18 तारीख़ ‘गांधी दिन’ के रूप में मनाई जाती थी. सन् 1922 के अक्तूबर मास में ‘गांधी दिन’ के अवसर पर दिए गए भाषण में डॉक्टर हेडगेवार जी ने कहा “आज का दिन अत्यंत पवित्र है. महात्मा जी जैसे पुण्यश्लोक पुरुष के जीवन में व्याप्त सद्गुणों के श्रवण एवं चिंतन का यह दिन है. उनके अनुयायी कहलाने में गौरव अनुभव करने वालों के सिर पर तो उनके इन गुणों का अनुकरण करने की ज़िम्मेदारी विशेषकर है.” 1934 में वर्धा में श्री जमनालाल बजाज के यहां जब गांधी जी का निवास था, तब पास ही संघ का शीत शिविर चल रहा था. उत्सुकतावश गांधी जी वहां गए, अधिकारियों ने उनका स्वागत किया और स्वयंसेवकों के साथ उनका वार्तालाप भी हुआ. वार्तालाप के दौरान जब उन्हें पता चला कि शिविर में अनुसूचित जाति से भी स्वयंसेवक हैं, और उनसे किसी भी प्रकार का भेदभाव किए बिना सब भाईचारे के साथ स्नेहपूर्वक एक साथ रहते हैं, सारे कार्यक्रम साथ करते हैं, तब उन्होंने बहुत प्रसन्नता व्यक्त की. स्वतंत्रता के पश्चात् जब गांधी जी का निवास दिल्ली में भंगी कालोनी में था, तब सामने मैदान में संघ की प्रभात शाखा चलती थी. सितम्बर में गांधी जी ने प्रमुख स्वयंसेवकों से बात करने की इच्छा व्यक्त की. उन्हें गांधी जी ने सम्बोधित किया “बरसों पहले मैं वर्धा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक शिविर में गया था. उस समय इसके संस्थापक श्री हेडगेवार जीवित थे. स्वर्गीय श्री जमनालाल बजाज मुझे शिविर में ले गए थे और मैं उन लोगों का कड़ा अनुशासन, सादगी और छुआछूत की पूर्ण समाप्ति देखकर अत्यंत प्रभावित हुआ था. तब से संघ काफी बढ़ गया है. मैं तो हमेशा से यह मानता हूं कि जो भी संस्था सेवा और आत्म-त्याग के आदर्श से प्रेरित है, उसकी ताकत बढ़ती ही है. लेकिन सच्चे रूप में उपयोगी होने के लिए त्यागभाव के साथ ध्येय की पवित्रता और सच्चे ज्ञान का संयोजन आवश्यक है. ऐसा त्याग, जिसमें इन दो चीज़ों का अभाव हो, समाज के लिए अनर्थकारी सिद्ध हुआ है.” यह सम्बोधन ‘गांधी समग्र वांग्मय’ के खंड 89 में 215-217 पृष्ठ पर प्रकाशित है. 30 जनवरी 1948 को सरसंघचालक श्री गुरुजी मद्रास में एक कार्यक्रम में थे, जब उन्हें गांधी जी की मृत्यु का समाचार मिला. उन्होंने तुरंत ही प्रधानमंत्री पंडित नेहरु, गृहमंत्री सरदार पटेल और गांधी जी के सुपुत्र देवदास गांधी को टेलीग्राम द्वारा अपनी शोक संवेदना भेजी. उसमें श्री गुरुजी ने लिखा - “प्राण घातक क्रूर हमले के फलस्वरूप एक महान विभूति की दुःखद हत्या का समाचार सुनकर मुझे बड़ा आघात लगा. वर्तमान कठिन परिस्थिति में इससे देश की अपरिमित हानि हुई है. अतुलनीय संगठक के तिरोधान से जो रिक्तता पैदा हुई है, उसे पूर्ण करने और जो गुरुतर भार कंधों पर आ पड़ा है, उसे पूर्ण करने का सामर्थ्य भगवान हमें प्रदान करें.” गांधी जी के प्रति सम्मान रूप शोक व्यक्त करने के लिए 13 दिन तक संघ का दैनिक कार्य स्थगित करने की सूचना उन्होंने देशभर के स्वयंसेवकों को दी. दूसरे ही दिन 31 जनवरी 1948 को श्री गुरुजी ने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को एक विस्तृत पत्र लिखा, उसमें वे लिखते हैं - “ कल चेन्नई में वह भयंकर वार्ता सुनी कि किसी अविचारी भ्रष्ट-हृदय व्यक्ति ने पूज्य महात्मा जी पर गोली चलाकर उस महापुरुष के आकस्मिक असामयिक निधन का नीरघृण कृत्य किया. यह निंदा कृत्य संसार के सम्मुख अपने समाज पर कलंक लगाने वाला हुआ है.” ये सारी जानकारी Justice on Trial नामक पुस्तक में और श्री गुरुजी समग्र में उपलब्ध है. 06 अक्तूबर, 1969 में महात्मा गांधी जी की जन्मशताब्दी के समय महाराष्ट्र के सांगली में गांधी जी की प्रतिमा का श्री गुरुजी द्वारा अनावरण किया गया. उस समय श्री गुरुजी ने कहा - “आज एक महत्वपूर्ण व पवित्र अवसर पर हम एकत्र हुए हैं. सौ वर्ष पूर्व इसी दिन सौराष्ट्र में एक बालक का जन्म हुआ था. उस दिन अनेक बालकों का जन्म हुआ होगा, पर हम उनकी जन्म-शताब्दी नहीं मनाते. महात्मा गांधी जी का जन्म सामान्य व्यक्ति के समान हुआ, पर वे अपने कर्तव्य और अंतःकरण के प्रेम से परमश्रेष्ठ पुरुष की कोटि तक पहुंचे. उनका जीवन अपने सम्मुख रखकर, अपने जीवन को हम उसी प्रकार ढालें. उनके जीवन का जितना अधिकाधिक अनुकरण हम कर सकते हैं, उतना करें. …..लोकमान्य तिलक के पश्चात् महात्मा गांधी ने अपने हाथों में स्वतंत्रता आंदोलन के सूत्र संभाले और इस दिशा में बहुत प्रयास किए. शिक्षित-अशिक्षित स्त्री-पुरुषों में यह प्रेरणा निर्माण किया कि अंग्रेज़ों का राज्य हटाना चाहिए, देश को स्वतंत्र करना चाहिए और स्व के तंत्र से चलने के लिए जो कुछ मूल्य देना होगा, वह हम देंगे. महात्मा गांधी ने मिट्टी से सोना बनाया. साधारण लोगों में असाधारणत्व निर्माण किया. इस सारे वातावरण से ही अंग्रेज़ों को हटना पड़ा. …..वे कहा करते थे - “मैं कट्टर हिन्दू हूं, इसलिए केवल मानवों पर ही नहीं, सम्पूर्ण जीवमात्र पर प्रेम करता हूं. उनके जीवन व राजनीति में सत्य व अहिंसा को जो प्रधानता मिली, वह कट्टर हिंदुत्व के कारण ही मिली. ……जिस हिन्दू-धर्म के बारे में हम इतना बोलते हैं, उस धर्म के भावितव्य पर उन्होंने ‘फ़्यूचर ऑफ़ हिंदुइज्म’ शीर्षक के अंतर्गत अपने विचार व्यक्त किए है. उन्होंने लिखा है - “हिन्दू-धर्म यानि न रुकने वाला, आग्रह के साथ बढ़ने वाला, सत्य की खोज का मार्ग है. आज यह धर्म थका हुआ-सा, आगे जाने की प्रेरणा देने में सहायक प्रतीत होता अनुभव में नहीं आता. इसका कारण है कि हम थक गए हैं, पर धर्म नहीं थका. जिस क्षण हमारी यह थकावट दूर होगी, उस क्षण हिन्दू-धर्म का भारी विस्फोट होगा जो भूतकाल में कभी नहीं हुआ, इतने बड़े परिमाण में हिन्दू-धर्म अपने प्रभाव और प्रकाश से दुनिया में चमक उठेगा.” महात्मा जी की यह भविष्यवाणी पूरी करने की ज़िम्मेदारी हमारी है. …… देश को राजकीय स्वतंत्रता चाहिए, आर्थिक स्वतंत्रता चाहिए. उसी भांति इस तरह की धार्मिक स्वतंत्रता चाहिए कि कोई किसी का अपमान न कर सके, भिन्न-भिन्न पंथ के, धर्म के लोग साथ-साथ रह सकें. विदेशी विचारों की दासता से अपनी मुक्ति होनी चाहिए. गांधी जी की यही सीख थी. मैं गांधी जी से अनेक बार मिल चुका हूं. उनसे बहुत चर्चा भी की है. उन्होंने जो विचार व्यक्त किए, उन्हीं के अध्ययन से मैं यह कह रहा हूं. इसीलिए अंतःकरण की अनुभूति से मुझे महात्मा जी के प्रति नितांत आदर है.” गुरूजी कहते हैं, “महात्मा जी से मेरी अंतिम भेंट सन् 1947 में हुई थी. उस समय देश को स्वाधीनता मिलने से शासन-सूत्र संभालने के कारण नेतागण खुशी में थे. उसी समय दिल्ली में दंगा हो गया. मैं उस समय शांति प्रस्थापना करने का काम कर रहा था. गृहमंत्री सरदार पटेल भी प्रयत्न कर रहे थे और उस कार्य में उन्हें सफलता भी मिली. ऐसे वातावरण में मेरी महात्मा गांधी जी से भेंट हुई थी. महात्मा जी ने मुझसे कहा - “देखो यह क्या हो रहा है?” मैंने कहा - “यह अपना दुर्भाग्य है. अंग्रेज कहा करते थे कि हमारे जाने पर तुम लोग एक दूसरे का गला काटोगे. आज प्रत्यक्ष में वही हो रहा है. दुनिया में हमारी अप्रतिष्ठा हो रही है. इसे रोकना चाहिए.” गांधी जी ने उस दिन अपनी प्रार्थना सभा में मेरे नाम का उल्लेख गौरवपूर्ण शब्दों में कर, मेरे विचार लोगों को बताए और देश की हो रही अप्रतिष्ठा रोकने की प्रार्थना की. उस महात्मा के मुख से मेरा गौरवपूर्ण उल्लेख हुआ, यह मेरा सौभाग्य था. इन सारे सम्बन्धों से ही मैं कहता हूं कि हमें उनका अनुकरण करना चाहिए.” मैं जब वडोदरा में प्रचारक था, तब (1987-90) सह सरकार्यवह श्री यादवराव जोशी का वडोदरा में प्रकट व्याख्यान था. उसमें श्री यादवराव जी ने महात्मा गांधी जी का बहुत सम्मान के साथ उल्लेख किया. व्याख्यान के पश्चात् कार्यालय में एक कार्यकर्ता ने उनसे पूछा कि आज आपने महात्मा गांधी जी का सम्मान पूर्वक जो उल्लेख किया, वह क्या मन से किया था? इस पर यादव राव जी ने कहा कि मन में ना होते हुए भी केवल बोलने के लिए मैं कोई राजकीय नेता नहीं हूं. जो कहता हूं मन से ही कहता हूं. फिर उन्हों ने समझाया कि जब किसी व्यक्ति का हम आदर – सम्मान करते हैं, इसका मतलब यह नहीं कि उनके सभी विचारों से हम सहमत होते हैं. एक विशिष्ट प्रभावी गुण के लिए हम उन्हें याद करते हैं, आदर्श मानते हैं. जैसे पितामह भीष्म को हम उनकी कठोर प्रतिज्ञा की दृढ़ता के लिए अवश्य स्मरण करते हैं, परंतु राजसभा में द्रौपदी के वस्त्रहरण के समय वे सारा अन्याय मौन देखते रहे, इसका समर्थन हम नहीं कर सकते हैं. इसी तरह कट्टर और जिहादी मुस्लिम नेतृत्व के संबंध में गांधी जी के व्यवहार के बारे में घोर असहमति होने के बावजूद, स्वतंत्रता आंदोलन में जनसामान्य को सहभागी होने के लिए उनके द्वारा दिया गया अवसर, स्वतंत्रता के लिए सामान्य लोगों में उनके द्वारा प्रज्ज्वलित की गई ज्वाला, भारतीय चिंतन पर आधारित उनके अनेक आग्रह के विषय, सत्याग्रह के माध्यम से व्यक्त किया जन आक्रोश - यह उनका योगदान निश्चित ही सराहनीय और प्रेरणादायी है. इन सारे तथ्यों को ध्यान में लिए बिना संघ और गांधी जी के संबंध पर टिप्पणी करना असत्य और अनुचित ही कहा जा सकता है. ग्राम विकास, सेंद्रिय कृषि, गौसंवर्धन, सामाजिक समरसता, मातृभाषा में शिक्षा और स्वदेशी अर्थ व्यवस्था एवं जीवन शैली ऐसे महात्मा गांधी जी के प्रिय एवं आग्रह के क्षेत्र में संघ स्वयंसेवक पूर्ण मनोयोग से सक्रिय हैं. यह वर्ष महात्मा गांधी जी की 150 वी जयंती है. उनकी पावन स्मृति को विनम्र आदरांजलि. डॉ. मनमोहन वैद्य सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

April 23rd 2019, 3:50 am

जेएनयू में #TheTashkentFiles की स्क्रीनिंग

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नई दिल्ली. जेएनयू में लालबहादुर शास्त्री के जीवन के आधार पर बनी द ताशकंद फाइल्स की स्क्रीनिंग हुई. फिल्म भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय परिस्थितियों में हुई मृत्यु को उजागर करती है. विवेक अग्निहोत्री की यह कोशिश काफी हद तक सभी को अपने इतिहास के पन्ने पलटने के लिए मजबूर करती है. लाल बहादुर शास्त्री जी के इर्द-गिर्द बुनी गई इस फिल्म में सवाल उठाए गए हैं कि क्या पूर्व पीएम की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई स्वाभाविक मृत्यु थी या ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद उन्हें जहर दे दिया गया था?

लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु 11 जनवरी 1966 को हुई थी. उनकी मृत्यु के बाद उनका पोस्टमार्टम क्यों नहीं करवाया गया? उनके शरीर पर जगह-जगह कट्स के निशान क्यों थे? उनके पार्थिव शरीर को जब भारत लाया गया, तो वह सूजा और काला क्यों था?

फिल्म में नसीरुद्दीन शाह, मिथुन चक्रवर्ती, पल्लवी जोशी, पंकज त्रिपाठी, मंदिरा बेदी और राजेश शर्मा जैसे कलाकारों ने भूमिकाओं को निभाया है.

स्क्रीनिंग से पूर्व कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए द ताशकन्द फाइल्स के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि देश में पॉलिटिकल मर्डर का सच जानना जरूरी है. राइट टू ट्रूथ भी राष्ट्रवाद है, हमें अधिकार है कि देश सच का सामना करे. पत्रकार और युवा का जीवन सत्य और तथ्य पर हो, इसलिए यह मूवी सच्चे पत्रकारों को और भारत के युवाओं को समर्पित है.

कार्यक्रम में एबीवीपी के अखिल भारतीय संगठन मंत्री सुनील आम्बेकर ने कहा कि एबीवीपी देश में देशहित और समाज हित का पर्याय है. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु किन रहस्यमयी परिस्थितियों हुई उसका सच देश को जानने का अधिकार है. विवेक अग्निहोत्री जी की पूरी टीम ने इस सच को देश के सामने रखा है.

April 23rd 2019, 2:33 am

23 अप्रैल / इतिहास स्मृति – पेशावर कांड के नायक चन्द्रसिंह गढ़वाली

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नई दिल्ली. चन्द्रसिंह का जन्म ग्राम रौणसेरा, (जिला पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड) में 25 दिसम्बर, 1891 को हुआ था. वह बचपन से ही बहुत हृष्ट-पुष्ट था. ऐसे लोगों को वहां ‘भड़’ कहा जाता है. केवल 14 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह हो गया. उन दिनों प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ हो जाने के कारण सेना में भर्ती चल रही थी. चन्द्रसिंह गढ़वाली की इच्छा भी सेना में जाने की थी, पर घर वाले इसके लिए तैयार नहीं थे. अतः चन्द्रसिंह घर से भागकर लैंसडाउन छावनी पहुंचे और सेना में भर्ती हो गये. उस समय वे केवल 15 वर्ष के थे.

इसके बाद राइफलमैन चन्द्रसिंह ने फ्रान्स, मैसोपोटामिया, उत्तर पश्चिमी सीमाप्रान्त, खैबर तथा अन्य अनेक स्थानों पर युद्ध में भाग लिया. अब उन्हें पदोन्नत कर हवलदार बना दिया गया. छुट्टियों में घर आने पर उन्हें भारत में हो रहे स्वतन्त्रता आन्दोलन की जानकारी मिली. उनका सम्पर्क आर्य समाज से भी हुआ. वर्ष 1920 में कांग्रेस के जगाधरी (पंजाब) में हुए सम्मेलन में भी वे गये, पर फिर उन्हें युद्ध के मोर्चे पर भेज दिया गया.

युद्ध के बाद वे फिर घर आ गये. उन्हीं दिनों रानीखेत (उत्तराखंड) में हुए कांग्रेस के एक कार्यक्रम में गांधी जी भी आये थे. वहां चन्द्रसिंह अपनी फौजी टोपी पहनकर आगे जाकर बैठ गये. गांधी जी ने यह देखकर कहा कि मैं इस फौजी टोपी से नहीं डरता. चन्द्रसिंह ने कहा यदि आप अपने हाथ से मुझे टोपी दें, तो मैं इसे बदल भी सकता हूं. इस पर गांधी जी ने उसे खादी की टोपी दी. तब से चन्द्रसिंह का जीवन पूरी तरह से बदल गया.

वर्ष 1930 में गढ़वाल राइफल्स को पेशावर भेजा गया. वहां नमक कानून के विरोध में आन्दोलन चल रहा था. चन्द्रसिंह ने अपने साथियों के साथ यह निश्चय किया कि वे निहत्थे सत्याग्रहियों को हटाने में तो सहयोग करेंगे, पर गोली नहीं चलायेंगे. सबने उसके नेतृत्व में काम करने का निश्चय किया. 23 अप्रैल, 1930 को सत्याग्रह के समय पेशावर में बड़ी संख्या में लोग जमा थे. तिरंगा झंडा फहरा रहा था. बड़े-बड़े कड़ाहों में लोग नमक बना रहे थे. एक अंग्रेज अधिकारी ने अपनी मोटरसाइकिल उस भीड़ में घुसा दी. इससे अनेक सत्याग्रही और दर्शक घायल हो गये. सब ओर उत्तेजना फैल गयी. लोगों ने गुस्से में आकर मोटरसाइकिल में आग लगा दी.

गुस्से में पुलिस कप्तान ने आदेश दिया – गढ़वाली थ्री राउंड फायर. पर, उधर से हवलदार मेजर चन्द्रसिंह गढ़वाली की आवाज आयी – गढ़वाली सीज फायर. सिपाहियों ने अपनी राइफलें नीचे रख दीं. पुलिस कप्तान बौखला गया, पर अब कुछ नहीं हो सकता था. चन्द्रसिंह ने कप्तान को कहा कि आप चाहे हमें गोली मार दें, पर हम अपने निहत्थे देशवासियों पर गोली नहीं चलायेंगे. कुछ अंग्रेज पुलिसकर्मियों तथा अन्य पल्टनों ने गोली चलायी, जिससे अनेक सत्याग्रही तथा सामान्य नागरिक मारे गये.

तुरन्त ही गढ़वाली पल्टन को बैरक में भेजकर उनसे हथियार ले लिये गये. चन्द्रसिंह को गिरफ्तार कर 11 वर्ष के लिए जेल में ठूंस दिया गया. उनकी सारी सम्पत्ति भी जब्त कर ली गयी. जेल से छूटकर वे फिर स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय हो गये. स्वतन्त्रता के बाद उन्होंने राजनीति से दूर रहकर अपने क्षेत्र में ही समाजसेवा करना पसन्द किया. एक अक्तूबर, 1979 को पेशावर कांड के महान सेनानी की मृत्यु हुई. शासन ने वर्ष 1994 में उन पर डाक टिकट जारी किया.

April 22nd 2019, 9:01 pm

‘कच्चा घड़ा’ और ‘व्हाट शुड आई डू’ को प्रथम पुरस्कार

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मेरठ में ‘नवांकुर’ लघु फिल्म महोत्सव का आयोजन

मेरठ (विसंकें). भारतीय चित्र साधना से सम्बद्ध मेरठ चलचित्र सोसायटी एवं पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के सयुंक्त तत्वाधान में ‘नवांकुर’ लघु फिल्म महोत्सव का आयोजन किया गया.

लघु फिल्म महोत्सव में कुल 21 फिल्मों का प्रदर्शन किया गया. इसमें 15 मिनट की श्रेणी में 10 फिल्में तथा 05 मिनट की श्रेणी में 11 फिल्में प्रदर्शित की गई.

‘आदर्श’ (रिश्ता अहसास का) फिल्म में पति पत्नी में अकारण पनपते अविश्वास व मां की जिम्मेदारी को बखूबी प्रदर्शित किया गया. ‘अन्नदाता’ फिल्म में किसानों के सामने आने वाली समस्याओं का चित्रण किया गया. ‘धर्म’ लघु फिल्म में विभिन्न धर्म सम्प्रदायों के बीच आपसी सामंजस्य पर जोर दिया गया तो समाज में व्याप्त बालविवाह के दुष्परिणामों को ‘कच्चा घड़ा’ लघु फिल्म में बखूबी दिखाया गया. ‘मैं भगत सिंह हूं’ फिल्म में शहीद भगत सिंह के जीवन पर प्रकाश डाला गया. आज की ज्वलंत समस्या बुजुर्गों को बेसहारा बना देना तथा वर्तमान पीढ़ी का अपने कर्तव्यों से बचना, को ‘वृद्धाश्रम’ लघु फिल्म में दर्शाया गया. ‘पोलियो से मुक्ति’ एवं ‘मतदान जागरुकता’ ने दोनों विषयों पर गम्भीरता से जागरुक होने का संदेश दिया. ‘स्पेशल स्कूल फोर स्पेशल चिल्ड्रन’ विषय पर बनी फिल्म में मूक बधिर बच्चों की क्षमताओं को दिखया गया.

‘गंगा’ लघु फिल्म में गंगा में बढ़ते प्रदूषण तथा उससे होने वाली हानियों का बहुत सुंदर चित्रण किया गया. ‘आजादी के सत्तर साल’ नामक फिल्म में युवाओं में बढ़ते नशे की आदत को दिखाया गया तथा इसके विभिन्न दुष्परिणामों को भी फिल्म में सम्मिलित किया गया.

लघु फिल्म महोत्सव में फिल्म सेंसर बोर्ड की सदस्य नीता गुप्ता, अम्बरीश पाठक व डॉ. प्रदीप पवांर (निर्णायक मंडल) ने लघु फिल्मों का विभिन्न बिंदुओं पर मूल्यांकन किया. 15 मिनट की श्रेणी में प्रथम स्थान ‘कच्चा घड़ा’, द्वितीय स्थान ‘पोलियो से मुक्ति’ तथा तृतीय स्थान ‘स्टॉप एसिड अटैक’ को रखा गया. जिन्हें क्रमशः 11000 रुपये, 5100 रुपये, 3100 रुपये एवं प्रमाण पत्र, स्मृति चिन्ह पुरस्कार स्वरूप दिया गया. 05 मिनट की श्रेणी की लघु फिल्मों में ‘व्हाट शुड आई डू’, ‘गंगा’ एवं ’मतदान जागरूकता’ को प्रथम 5100 रुपये, द्वितीय 3100 रुपये, तृतीय 2100 रुपये, प्रमाण पत्र, स्मृति चिन्ह पुरस्कार स्वरूप दिया गया.

विश्वविद्यालय के कुलपति व कार्यक्रम अध्यक्ष प्रो. एनके तनेजा ने कहा कि हम सभी का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है कि विद्यार्थियों की क्षमता को और अधिक परिष्कृत कर उनके विकास में योगदान करें. यह लघु फिल्म समारोह भी उसी का एक प्रयास है. फिल्में केवल मनोरंजन का साधन ही नहीं, अपितु ज्ञान-विज्ञान के प्रचार और प्रसार का सशक्त माध्यम हैं. फिल्म समारोह में प्रदर्शित फिल्मों में समाज से जुड़े पहलुओं को उद्घाटित किया गया है.

प्रो. अरूण कुमार भगत ने कहा कि फिल्में समाज की झलक होती हैं. फिल्मों में हम उस समय की सामाजिक स्थितियों, परिस्थितियों को देख सकते हैं. दृश्य–श्रृव्य माध्यम होने के कारण इनका प्रभाव त्वरित और दीर्घकालिक होता है. कार्यक्रम के अंत में विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभागाध्यक्ष डॉ. प्रशान्त कुमार, मेरठ चलचित्र सोसायटी के अध्यक्ष अजय मित्तल ने सफल आयोजन एवं सहयोग के लिये सभी का धन्यवाद किया.

April 22nd 2019, 9:10 am

22 अप्रैल / पुण्यतिथि – क्रांतिकारी योगेश दा

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नई दिल्ली. देश को स्वतंत्र करवाने में अने क्रांतिकारियों ने योगदान दिया था. उन्हीं में से एक योगेश चंद्र चटर्जी भी थे. क्रान्तिवीर योगेश चन्द्र चटर्जी (योगेश दा) का जीवन देश को विदेशी दासता से मुक्त कराने की गौरवमय गाथा है. उनका जन्म अखंड भारत के ढाका जिले के ग्राम गोकाडिया, थाना लोहागंज में तथा लालन-पालन और शिक्षा कोमिल्ला में हुई. 1905 में बंग-भंग से जो आन्दोलन शुरू हुआ, योगेश दा उसमें जुड़ गये. पुलिन दा ने जब ‘अनुशीलन पार्टी’ बनायी, तो ये उसमें भी शामिल हो गये. उस समय उनकी आयु केवल दस वर्ष की थी.

अनुशीलन पार्टी की सदस्यता बहुत ठोक बजाकर दी जाती थी, और योगेश दा हर कसौटी पर खरे उतरे. 1916 में उन्हें पार्टी कार्यालय से गिरफ्तार कर कोलकाता के कुख्यात ‘नालन्दा हाउस’ में रखा गया. वहां बन्दियों पर अमानुषिक अत्याचार होते थे. योगेश दा ने भी यह सब सहन किया. 1919 में आम रिहाई के समय वे छूटे और बाहर आकर फिर पार्टी के काम में लग गये. अतः बंगाल शासन ने 1923 में इन्हें राज्य से निष्कासित कर दिया.

1925 में जब क्रान्तिकारी शचीन्द्र नाथ सान्याल ने अलग-अलग राज्यों में काम कर रहे क्रान्तिकारियों को एक साथ और एक संस्था के नीचे लाने का प्रयास किया, तो योगेश दा को संयुक्त प्रान्त का संगठक बनाया गया. काकोरी रेल डकैती कांड में कुछ को फांसी हुई, तो कुछ को आजीवन कारावास. यद्यपि योगेश दा इस कांड के समय हजारीबाग जेल में बन्द थे, पर उन्हें योजनाकार मानकर दस वर्ष के कारावास की सजा दी गयी.

जेल में रहते हुए उन्होंने राजनीतिक बन्दियों के अधिकारों के लिए कई बार भूख हड़ताल की. फतेहगढ़ जेल में तो उनका अनशन 111 दिन चला, तब प्रशासन को झुकना ही पड़ा. जेल से छूटने के बाद भी उन्हें छह माह के लिए दिल्ली से निर्वासित कर दिया गया. 1940 में संयुक्त प्रान्त की सरकार ने उन्हें फिर पकड़ कर आगरा जेल में बन्द कर दिया.

वहां से उन्हें देवली शिविर जेल में भेजा गया. संघर्ष प्रेमी योगेश दा ने देवली में भी भूख हड़ताल की. इससे उनकी हालत खराब हो गयी. उन्हें जबरन कोई तरल पदार्थ देना भी सम्भव नहीं था, क्योंकि उनकी नाक के अन्दर का माँस इतना बढ़ गया था कि पतली से पतली नली भी उसमें नहीं घुसती थी. अन्ततः शासन को उन्हें छोड़ना पड़ा.

पर शांत बैठना उनके स्वभाव में नहीं था. अतः 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में भी फरार अवस्था में व्यापक प्रवास कर वे नवयुवकों को संगठित करते रहे. इस बीच उन्हें कासगंज षड्यन्त्र में फिर जेल भेज दिया गया. 1946 में छूटते ही वे फिर काम में लग गये.

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद वे राजनीति में अधिक सक्रिय हो गये. उन पर मार्क्सवाद और लेनिनवाद का काफी प्रभाव था, पर भारत के कम्युनिस्ट दलों की अवसरवादिता और सिद्धान्तहीनता देखकर उन्हें बहुत निराशा हुई. उन्होंने कई खेमों में बंटे साथियों को एक रखने का बहुत प्रयास किया, पर जब उन्हें सफलता नहीं मिली, तो उनका उत्साह ठंडा हो गया. 1955 में वे चुपचाप कम्युनिस्ट पार्टी और राजनीति से अलग हो गये.

योगेश दा सादगी की प्रतिमूर्ति थे. वे सदा खद्दर ही पहनते थे. 1967 के लोकसभा चुनाव के बाद उनका मानसिक सन्तुलन बिगड़ गया. 22 अप्रैल, 1969 को 74 वर्ष की अवस्था में दिल्ली में उनका देहान्त हुआ. उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘इन सर्च ऑफ फ्रीडम’ नामक पुस्तक में लिखी है.

April 21st 2019, 8:02 pm

चंद्रकांत जी का बलिदान कार्यकर्ताओं व राष्ट्रभक्त समाज को प्रेरणा देता रहेगा – सुरेश सोनी जी

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जम्मू कश्मीर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जम्मू-कश्मीर प्रांत द्वारा बलिदानी चन्द्रकान्त जी को भावभीनी श्रद्धांजलि देने के लिए कार्यक्रम का आयोजन ईडन गार्डन, अखनूर रोड,जम्मू में किया गया. स्वर्गीय चन्द्रकान्त जी तथा उनके अंगरक्षक स्वर्गीय राजेन्द्र कुमार जी की आतंकवादियों द्वारा अंधाधुंध गोलियां चलाकर निर्मम हत्या कर दी गई थी. कार्यक्रम में जम्मू महानगर के असंख्य नागरिकों ने भाग लिया और पुष्पांजलि अर्पित की. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह सुरेश जी सोनी, अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार जी, अखिल भारतीय सह सम्पर्क प्रमुख रमेश जी पप्पा, प्रान्त संघचालक ब्रिगेडियर सुचेत सिंह जी एवं अन्य कार्यकर्ताओं ने भी श्रद्धा सुमन अर्पित किए. सुरेश सोनी जी ने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए कहा कि स्वर्गीय चन्द्रकान्त निरन्तर 33 वर्षों से संघकार्य में सक्रिय थे. हिन्दू समाज को जोड़ने, जागरूक करने तथा संघर्षों से जूझने की प्रेरणा वह देते रहे. यह उन्हीं का प्रयास था कि राष्ट्रभक्त हिन्दू समाज ने अलगाववादी शक्तियों का इस दुर्गम क्षेत्र में डटकर मुकाबला किया. उनका बलिदान हमेशा कार्यकर्ताओं एवं हिन्दू समाज को प्रेरणा देता रहेगा. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आतंकवादियों के इस अमानवीय कृत्य की घोर निन्दा करता है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सदैव राष्ट्रभक्त नागरिकों तथा सुरक्षा बलों के साथ है तथा सुरक्षाबल इन अलगाववादी शक्तियों का पुरजोर मुक़ाबला करें, ताकि प्रान्त के राष्ट्रभक्त नागरिक शांति के साथ जीवन यापन कर सकें. अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार जी, जो जम्मू कश्मीर प्रान्त में सात वर्षों तक प्रान्त प्रचारक भी रहे, उन्होंने अपने कार्यकाल में उनके द्वारा किए गए कार्य के विषय में कहा कि स्वर्गीय चन्द्रकान्त अनेक गुणों से सम्पन्न कार्यकर्ता थे. वह एक कुशल संगठनकर्ता, कार्यकर्ताओं की संभाल तथा नित्य चिन्ता करने वाले तथा संघ के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित कार्यकर्ता थे. उन्होंने समाज के अनेक बंधुओं को संघ के साथ जोड़ा तथा निरन्तर संघकार्य में लगे रहने की प्रेरणा दी. डोडा, किश्तवाड़ में आतंकवाद के दौर में भी सेना का सतत सहयोग करते हुए वहाँ आतंकवाद से जूझते हुए, अपनी व अपने परिवार की चिन्ता न करते हुए स्थानीय नागरिकों का मनोबल बढ़ाया. इस कारण आम समाज में भी उस दौर में अपने स्थान पर जमकर डटे रहने की हिम्मत बनी रही. श्रद्धांजलि कार्यक्रम में उपस्थित नागरिकों ने बलिदानी चन्द्रकान्त जी को पुष्पांजलि अर्पित की.

April 21st 2019, 8:56 am

शुद्धता और पूर्णता संस्कृत का वैशिष्ट्य है – सुरेश सोनी

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नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी जी ने कहा कि आज का प्रसंग शुभकामना का प्रसंग है, भाषण का प्रसंग नहीं है. कई अवरोध पार करने के पश्चात् चिर प्रतीक्षित इच्छा पूरी होने का आज का शुभ प्रसंग आया है. देवता का पूजन करके संकल्प किया है तो यह पूरा होगा ही होगा. सह सरकार्यवाह दिल्ली में संस्कृत भारती के अंतरराष्ट्रीय कार्यालय भवन के भूमि पूजन कार्यक्रम में उपस्थित कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि संस्कृत की अपनी एक अंतर्निहित शक्ति है. हमारे कारण से उसका पुनरुद्धार होगा ऐसा नहीं है. उसको छोड़ने के कारण हम जिन समस्याओं से जूझ रहे हैं, संस्कृत को अपनाएंगे तो समस्याओं से मुक्त हो सकेंगे. संस्कृत भाषा के लिए अगर हम कुछ कर रहे हैं तो हम भाषा पर कोई उपकार नहीं कर रहे हैं. बल्कि हमारा अपने ऊपर ही उपकार है. सह सरकार्यवाह ने कहा कि हमारे यहां जिन ऋषियों ने साक्षात्कार किया. तो उन्होंने कहा कि सबसे पहले अव्यक्त था, अव्यक्त को जब व्यक्त होने की इच्छा हुई तो सबसे पहले स्पंदन होता है. स्पंदन से नाद होता है, नाद यही शब्द ब्रह्म कहा गया है और ये नाद अनंत रूपों में होता है. इसलिए जो भिन्न-भिन्न अव्यक्त ऊर्जाएं हैं, वे भिन्न-भिन्न शब्दों में व्यक्त होती हैं. इसका बहुत गहराई से अध्ययन करके संस्कृत में शब्दों की रचना हुई. इसीलिए ऐसा कहते हैं कि संस्कृत भाषा का वैशिष्ट्य है कि सभी प्रकार के फोनेटिक्स की अभिव्यक्ति के लिए स्वर-व्यंजन चिन्ह बनाए. यही कारण है कि विश्व की कोई भी भाषा अगर संस्कृत में लिखकर बोलेगा तो उस देश के लोगों को लगेगा कि इसका उच्चारण बिल्कुल ठीक है. शुद्धता और पूर्णता संस्कृत का वैशिष्ट्य है. उन्होंने कहा कि अपने देश में महापुरुषों ने लोक भाषाओं में समय-समय पर धर्म संस्कृति का प्रचार प्रसार तो किया, लेकिन मूल तत्व सातत्य से ही रहे तो उसके लिए संस्कृत का ही सहारा लिया. बौद्ध दर्शन में महायान में वैपुल्य सूत्र संस्कृत में कथित हैं. जैन दर्शन में सर्वमान्य ग्रंथ उमा स्वामी कृत तत्वार्थ सूत्र संस्कृत में है. जैनियों का यह प्रमाणिक ग्रन्थ है और इस ग्रन्थ को संस्कृत में लिखा गया है. सभी भाषाएं रहेंगी, सभी भाषाओं का लोकजीवन में प्रभाव रहेगा. लेकिन यदि सभी भाषाओं का मूल लोप हो गया तो सभी भाषाओं का भी लोप हो जाएगा. और इस कारण संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन, लोक व्यवहार में प्रचलन उसका एक अपना महत्व है. दूसरा यह भी कि संस्कृत की रचना ही ऐसी है कि उसमें किसी की प्रशंसा करना तो बड़ा सरल काम है, लेकिन गालियां देना कठिन होता है. संस्कृत से ही सुसंस्कृत बना, तो इसीलिए विश्व का मूल्य बोध, तत्व ज्ञान है, सब इसके अंदर है. इसका समाज को परिचय हो. इसका भाषा के संदर्भ के अंदर सभी लोगों को विचार करने की आवश्यकता है. इसलिए संस्कृत का प्रचार प्रसार आवश्यक है. कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि नीति आयोग के उपाध्यक्ष अमिताभ कान्त सहित संस्कृत भारती के संगठन मंत्री दिनेश कामत, महामंत्री श्रीश देवपुजारी व अन्य कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे.

April 20th 2019, 10:29 am

20 अप्रैल / इतिहास स्मृति – विजयनगर साम्राज्य के प्रेरक देवलरानी और खुशरोखान

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नई दिल्ली. मध्यकालीन इतिहास में हिन्दू गौरव के अनेक पृष्ठों को वामपंथी इतिहासकारों ने छिपाने का राष्ट्रीय अपराध किया है. ऐसा ही एक प्रसंग गुजरात की राजकुमारी देवलरानी और खुशरोखान का है.

अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण भारत में नरसंहार कर अपार धनराशि लूटी तथा वहां हिन्दू कला व संस्कृति को भी नष्ट किया. उसने गुजरात को भी दो बार लूटा. गुजरात के शासक रायकर्ण की पत्नी कमलादेवी को जबरन अपनी तथा राजकुमारी देवलरानी को अपने बड़े बेटे खिजरखां की बीवी बना लिया. अलाउद्दीन की मृत्यु के कुछ दिन बाद उसके दूसरे पुत्र मुबारकशाह ने खिजरखां को मारकर देवलरानी को अपने हरम में डाल लिया. देवलरानी खून का घूंट पीकर सही समय की प्रतीक्षा करती रही.

इस अराजकता के काल में दिल्ली दरबार में खुशरो खान अत्यन्त प्रभावी व्यक्ति बन गया. वह भी मूलतः गुजराती हिन्दू था, जिसे दिल्ली लाकर जबरन मुसलमान बनाया गया था. वह हिन्दुत्व के दृढ़ भाव को मन में रखकर योजना बनाता रहा और मुबारक शाह का सबसे विश्वस्त तथा प्रभावी दरबारी बन गया. मुबारक शाह ने उसे खुशरो खान नाम देकर अपना वजीर बना लिया.

खुशरो के मन में हिन्दू राज्य का सपना पल रहा था. उसने गुजरात शासन में अपने सगे भाई हिमासुद्दीन को मुख्य अधिकारी बनाया, जो पहले हिन्दू ही था. इसी प्रकार उसने दिल्ली में जबरन मुस्लिम बनाए गए 20,000 सैनिक भरती किये. एक बार वह मुबारक शाह के साथ तथा एक बार अकेले दक्षिण की लूट पर गया. उसने वहां विध्वंस और नरसंहार तो खूब किया; पर गुप्त रूप से कुछ हिन्दू राजाओं से मित्रता व मंत्रणा भी की. कुछ लोगों ने मुबारक शाह से उसकी शिकायत की; पर मुबारक ने उन पर विश्वास नहीं किया.

परिस्थिति पूरी तरह अनुकूल होने पर खुशरो खान तथा देवलरानी ने एक योजना बनाई. 20 अप्रैल, 1320 की रात्रि में खुशरो खान ने 300 हिन्दुओं के साथ राजमहल में प्रवेश किया. उसने कहा कि इन्हें मुसलमान बनाना है, अतः सुल्तान से मिलाना आवश्यक है. सुल्तान से भेंट के समय खुशरो के मामा खडोल तथा भूरिया नामक एक व्यक्ति ने मुबारक शाह का वध कर दिया. बाकी सबने मिलकर राजपरिवार के सब सदस्यों को मार डाला.

इसके बाद खुशरो खान ने स्वयं को सुल्तान घोषित कर देवलरानी से विवाह कर लिया. उसने अपना नाम नहीं बदला; पर महल में मूर्तिपूजा प्रारम्भ हो गयी. इससे हिन्दुओं में उत्साह की लहर दौड़ गयी. खुशरो खान ने घोषणा की – अब तक मुझे जबरन मुसलमान जैसा जीवन जीना पड़ रहा था, जबकि मैं मूल रूप से हिन्दू की संतान हूं. कल तक सुल्ताना कहलाने वाली देवलरानी भी मूलतः हिन्दू राजकन्या है. इसलिए अब हम दोनों धर्म भ्रष्टता की बेड़ी तोड़कर हिन्दू की तरह जीवन बिताएंगे.

यद्यपि यह राज्य लगभग एक वर्ष ही रहा, चूंकि ग्यासुद्दीन तुगलक तथा अन्य अमीरों के विद्रोह से खुशरो खान मारा गया; पर इससे उस विचार का बीज पड़ गया, जिससे 1336 में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हुई. खुशरो खान की यह योजना दक्षिण में ही बनी थी तथा इसे दक्षिण के अनेक हिन्दू व जबरन धर्मान्तरित मुस्लिम शासकों तथा सेनानायकों का समर्थन प्राप्त था.

April 19th 2019, 6:46 pm

चंद्रकांत जी का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा – डॉ. मनमोहन वैद्य

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अत्याचारों के विरोध में देशभक्तों का संघर्ष रुकने वाला नहीं है – सरसंघचालक

श्रद्धांजलि सभा में चंद्रकांत जी को अर्पित किए श्रद्धासुमन

जम्मू कश्मीर. किश्तवाड़ में 9 अप्रैल को जिला अस्पताल में आतंकी हमले में प्राणोत्सर्ग करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह प्रांत सेवा प्रमुख चंद्रकांत शर्मा की स्मृति में सनातन धर्म सभा द्वारा बीवीएम माध्यमिक विद्यालय किश्तवाड़ में श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई. जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं, जम्मू कश्मीर के धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक व राजनीतिक संगठनों के कार्यकर्ताओं के साथ ही स्थानीय लोगों ने हुतात्मा चंद्रकांत शर्मा तथा उनके सुरक्षा अधिकारी राजेन्द्र कुमार को श्रद्धांजलि अर्पित की.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य ने कहा कि आतंकवादियों व देश विरोधी ताकतों के खिलाफ संघर्ष करने वाले चंद्रकांत जी का जीवन सभी के लिए प्रेरणास्पद है. उनका यह बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा, उनके जीवन से प्रेरणा लेकर असंख्य लोग आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए यहां खड़े रहेंगे. ऐसी मंशा यहां के लोगों ने हर प्रकार से व्यक्त की है और शीघ्र ही सारे भारत वर्ष से आतंक व देश विरोधी ताकतों का खात्मा होकर देशभक्त और धर्म परायण सरकार का निर्माण होगा, ऐसा मुझे विश्वास है. परिहार बंधुओं समेत बलिदानियों का उत्सर्ग व्यर्थ नहीं जाएगा, यह राज्य ही नहीं देश के सभी देशभक्त लोगों के लिए प्रेरणा बनेगा. आतंकियों की ऐसी अमानवीय और कायराना हरकतों से देश के प्रति राष्ट्रवादियों की जीवटता और समर्पण कम नहीं होगा..

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने अपने प्रेषित शोक सन्देश में कहा कि जम्मू कश्मीर के सह प्रांत सेवा प्रमुख अमर बलिदानी चंद्रकांत जी का प्राणांतिक आतंकी हमले में बलिदान एक ओर हम सभी को अतीव वेदनादायक शोक तथा अत्याचारों के प्रति तीव्र क्षोभ से भर देता है तथा दूसरी ओर इन अत्याचारी उन्मादी शक्तियों से संघर्ष करने की प्रेरणा हममें जगाता है. जिस धीरज, समर्पण व साहस के साथ सभी खतरों के सायों में दृढ़तापूर्वक सबको साथ लेकर निर्भय व संतुलित मन से सक्रिय रहकर स्वर्गीय चन्द्रकांत जी ने देशभक्तों के लिए एक जीवंत संबल खड़ा किया था. वह हम सबके लिए बहुत बड़ा कर्तव्यपालन का उदाहरण हो गया है. उसी के बलबूते हम विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि इन अत्याचारों के विरोध में देशभक्तों का संघर्ष रुकने वाला नहीं है. इस अतीव दुःख की बेला में भी हम संकल्प करते हैं कि स्वर्गीय चंद्रकांत जी के सभी आप्त व मित्र परिवारों की संवेदनाओं में अपनी पूर्ण सहभागिता जताते हुए, मैं स्वर्गीय चन्द्रकांत जी की पवित्र स्मृति में अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि व्यक्त करता हूँ…

भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष रवीन्द्र रैना ने कहा कि संघ के समर्पित कार्यकर्ता कभी डरे नहीं, घबराए नहीं, रुके नहीं और चरैवेति-चरैवेति मन्त्र का आलम्बन लेकर समाज और राष्ट्र के निमित्त आगे बढ़ने में विश्वास करते हैं. घाटी में हमारे समर्पित स्वयंसेवकों के बलिदान की एक लंबी परम्परा किश्तवाड़, डोडा, रामवन और पूरे जम्मू कश्मीर में दिखाई पड़ती है. चंद्रकांत जी, अजीत परिहार, राजेन्द्र जी से लेकर संतोष भंडारी तक यह गौरवमयी परंपरा हमारे लिए अनुकरणीय है. चंद्रकांत जी के जाने का दर्द किश्तवाड़ के एक छोटे बच्चे से लेकर देश के जनमानस तक व्याप्त है. प्रधानमंत्री जी स्वयं चंद्रकांत जी के बलिदान से आहत हैं, उनका बलिदान भारत माता का ध्वज ऊंचा करने वालों और भारत माता की जयकार करने वालों को प्रेरित करता रहेगा.

श्रद्धांजलि  सभा में महामंडलेश्वर स्वामी रामेश्वर दास, काशी से पधारे आचार्य वागीश शास्त्री, संघ के अखिल भारतीय सह संपर्क प्रमुख रमेश पप्पा, प्रांत संघचालक ब्रिगेडियर सुचेत सिंह, उत्तर क्षेत्र प्रचारक बनवीर सिंह, प्रान्त प्रचारक रूपेश कुमार, सहित अन्य विशिष्ट लोगों ने अमर बलिदानी चन्द्रकांत शर्मा का पुण्य स्मरण किया..

April 19th 2019, 2:11 pm

भारत ने आज ही किया था अंतरिक्ष युग में प्रवेश

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भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में आज का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है. भारत ने आज ही के दिन स्वदेश में निर्मित पहला उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ा था.

19 अप्रैल 1975 को भारत अपना पहला उपग्रह आर्यभट्ट लॉन्च कर अंतरिक्ष युग में दाखिल हुआ था. यह भारत का पहला वैज्ञानिक उपग्रह था. 360 किलोग्राम वजनी आर्यभट्ट को सोवियत संघ के इंटर कॉसमॉस रॉकेट की मदद से अंतरिक्ष में भेजा था. पिछले 4 दशकों में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान सगंठन, इसरो ने 70 से ज्यादा उपग्रह वैज्ञानिक और तकनीकी एप्लिकेशन के लिए अंतरिक्ष में भेजे हैं. भारत के पहले उपग्रह का नाम प्रसिद्ध खगोलशास्त्री और गणितज्ञ आर्यभट्ट के नाम पर रखा गया था. आर्यभट्ट उन पहले व्यक्तियों में से थे, जिन्होंने बीजगणित का प्रयोग किया था. इसके अलावा उन्होंने पाई का सही मान 3.1416 निकाला था.

इस उपग्रह का निर्माण इसरो ने कृत्रिम उपग्रहों के निर्माण और अंतरिक्ष में उनके संचालन में अनुभव पाने के मकसद से किया था. इसका उद्देश्य ये भी था कि भविष्य में भारत अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो सके. आर्यभट्ट उपग्रह का मुख्य उद्देश्य एक्स रे, खगोल विद्या, वायुविज्ञान और सौर भौतिकी से जुड़े प्रयोग करना था. अपने परिक्रमा पथ पर चार दिन बिताने के बाद आर्यभट्ट में बिजली आपूर्ति बंद होने के कारण सभी प्रयोग रोक दिए गए थे. आर्यभट्ट को अंतरिक्ष में भेजने के बाद इसरो ने कभी पीछे पलटकर नहीं देखा. पिछले साल ही मंगल ग्रह के लिए मिशन लॉन्च किया है. मंगलयान के इसी साल सितंबर में मंगल की कक्षा में प्रवेश करने की आशा है.

हिन्दी विवेक

April 19th 2019, 8:23 am

19 अप्रैल / बलिदान दिवस – युवा बलिदानी अनन्त कान्हेरे

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नई दिल्ली. भारत मां की कोख कभी सपूतों से खाली नहीं रही. ऐसे ही एक सपूत थे – अनन्त लक्ष्मण कान्हेरे. जिन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिए केवल 19 साल की युवावस्था में ही फाँसी के फन्दे को चूम लिया.

उन दिनों महाराष्ट्र के नासिक नगर में जैक्सन नामक अंग्रेज जिलाधीश कार्यरत था. उसने मराठी और संस्कृत सीखकर अनेक लोगों को प्रभावित कर लिया था; पर उसके मन में भारत के प्रति घृणा भरी थी. वह नासिक के पवित्र रामकुंड में घोड़े पर चढ़कर घूमता था; पर भयवश कोई बोलता नहीं था.

उन दिनों नासिक में वीर सावरकर की ‘अभिनव भारत’ नामक संस्था सक्रिय थी. लोकमान्य तिलक के प्रभाव के कारण गणेशोत्सव और शिवाजी जयन्ती आदि कार्यक्रम भी उत्साह से मनाए जाते थे. इन सबमें स्थानीय युवक बढ़-चढ़कर भाग लेते थे.

विजयादशमी पर नासिक के लोग नगर की सीमा से बाहर कालिका मन्दिर पर पूजा करने जाते थे. युवकों ने योजना बनाई कि सब लोग इस बार वन्देमातरम् का उद्घोष करते हुए मन्दिर चलेंगे. जब जैक्सन को यह पता लगा, तो उसने इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया.

नासिक के वकील वामन सखाराम खेर स्वतन्त्रता सेनानियों के मुकदमे निःशुल्क लड़ते थे. जैक्सन ने उनकी डिग्री जब्त कर उन्हें जेल में डाल दिया. उसने ताम्बे शास्त्री नामक विद्वान के प्रवचनों पर रोक लगा दी; क्योंकि वे कथा में अंग्रेजों की तुलना रावण और कंस जैसे अत्याचारी शासकों से करते थे.

बाबाराव सावरकर ने वीरतापूर्ण गीतों की एक पुस्तक प्रकाशित की थी. इस पर उन्हें कालेपानी की सजा देकर अन्दमान भेज दिया गया.

जैक्सन की इन करतूतों से युवकों का खून खौलने लगा. वे उसे ठिकाने लगाने की सोचने लगे. अनन्त कान्हेरे भी इन्हीं में से एक थे. कोंकण निवासी अनन्त अपने मामा के पास औरंगाबाद में रहकर पढ़ रहे थे. वह और उनका मित्र गंगाराम देश के लिए मरने की बात करते रहते थे. एक बार गंगाराम ने उनकी परीक्षा लेने के लिए लैम्प की गरम चिमनी पकड़ने को कहा. अनन्त की उँगलियाँ जल गयीं; पर उन्होंने चिमनी को नहीं छोड़ा.

यह देखकर गंगाराम ने अनन्त को विनायक देशपांडे, गणू वैद्य, दत्तू जोशी, अण्णा कर्वे आदि से मिलवाया. देशपांडे ने अनन्त को एक पिस्तौल दी. अनन्त ने कई दिन जंगल में जाकर निशानेबाजी का अभ्यास किया. अब उन्हें तलाश थी, तो सही अवसर की. वह जानते थे कि जैक्सन के वध के बाद उन्हें निश्चित ही फाँसी होगी. उन्होंने बलिपथ पर जाने की तैयारी कर ली और एक चित्र खिंचवाकर स्मृति स्वरूप अपने घर भेज दिया.

अन्ततः वह शुभ दिन आ गया. जैक्सन का स्थानान्तरण मुम्बई के लिए हो गया था. उसके समर्थकों ने विजयानन्द नाटकशाला में विदाई कार्यक्रम का आयोजन किया. अनन्त भी वहाँ पहुँचे. जैसे ही जैक्सन ने प्रवेश किया, अनन्त ने चार गोली उसके सीने में दाग दी. जैक्सन हाय कह कर वहीं ढेर हो गया. उस दिन देशपांडे और कर्वे भी पिस्तौल लेकर वहाँ आए थे,  ताकि अनन्त से बच जाने पर वे जैक्सन को ढेर कर सकें.

अनन्त को पकड़ लिया गया. उन्होंने किसी वकील की सहायता लेने से मना कर दिया. इसमें अनेक लोग पकड़े गए. अनन्त के साथ ही विनायक देशपांडे और अण्णा कर्वे को 19 अप्रैल, 1910 को प्रातः ठाणे के कारागार में फाँसी दे दी गयी.

April 18th 2019, 6:46 pm

राष्ट्र को सर्वोपरि मानने वाला व राष्ट्रहित में सोचने वाला समूह सत्ता में आए – भय्याजी जोशी

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“देश को सर्वोपरि मानने वाला, देश के हित में सोचने वाला राजनैतिक समूह केंद्र सरकार की बागडोर संभाले यही संघ की इच्छा है. संकुचित बातों से ऊपर उठकर देश हित में सोचने वाला राजनैतिक समूह सत्ता में आना चाहिए.” राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ने एक साक्षात्कार में कहा, “चुनाव में भाषा और आचरण का संयम होना चाहिए. संवाद के जरिए चर्चा हो और चुनाव खत्म होते ही कटुता भी खत्म हो.” साक्षात्कार के महत्वपूर्ण अंश –  पुलवामा की घटना के बाद देश में ‘राष्ट्रवाद’ पर चर्चा गर्म है. संघ की ‘राष्ट्रवाद’ पर क्या भूमिका है? वास्तव में पुलवामा जैसे हमलों से जो दुखी होते हैं, वे राष्ट्रीय प्रवृत्ति के ही लोग हैं. जो इस देश से, अपनी मातृभूमि से, उसकी सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों से स्वयं को सम्बंधित मानते हैं, वे सभी राष्ट्रीय हैं. पुलवामा हमले के बाद जिन्होंने भी इस सम्बंध में चिंता व्यक्त की, वे सभी राष्ट्रीय हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हमेशा यह भूमिका रही है कि देश के प्रति निष्ठा रखने वाला, इस देश के सुख-दुःख से जुड़ा हुआ जो समूह है, उसे संघ राष्ट्रीय मानता है. पुलवामा जैसी घटना के बाद ‘राष्ट्रवाद’ विषय पर जो क्रिया-प्रतिक्रिया हो रही है, वह दर्शाती है कि भारत में राष्ट्रीयता की जड़ें कितनी गहरी हैं. संघ की ‘राष्ट्रवाद’ की भूमिका पर उपस्थित प्रश्नों के प्रति संघ की भूमिका क्या है? असल में यह चर्चा ही अनावश्यक है. संघ की राष्ट्रीयता की कल्पना भिन्न है. लोग नेशन (राष्ट्र) और स्टेट (राज्य) दोनों को एक मान लेते हैं. जैसे शरीर होता है, वैसे आत्मा भी होती है. राज्य शरीर है. राष्ट्र आत्मा है. बिना आत्मा के शरीर का कोई महत्व नहीं है और बिना शरीर के आत्मा का प्रकटीकरण नहीं होता. इसलिए, भारत में राष्ट्रीय भाव होना एक दूसरे के पूरक हैं. संघ का मानना है कि राज्य तो बदलते रहते हैं परंतु राष्ट्र कभी नहीं बदलता, वह शाश्वत होता है. संघ को हमेशा राजनीति से जोड़ा जाता है. आपकी राय में यह कितना सही है? इस देश का दुर्भाग्य है कि इस देश की व्यवस्था की, समाज की जो प्रामाणिकता से चिंता करता है, उसको राजनैतिक मान लिया जाता है. वास्तव में वह देशभक्ति का, राष्ट्रीय भाव का प्रकटीकरण है. राजनीति गलत नहीं है, परंतु वर्तमान में ‘राजनीति’ शब्द का संकुचित अर्थ निकाला जाता है. हर देश अपनी नीति पर चलता है. राज्य को चलाने की भी एक नीति होती है. अगर हम उसका व्यापक दृष्टि से चिंतन करें तो इस देश की नीतियां कैसी हों, विदेशों से सम्बंध स्थापित करने की व्यवस्था कैसी हो, इस विषय पर देश का कोई भी संगठन अपने विचार रख सकता है. सामान्य व्यक्ति भी अपना भाव प्रकट कर सकता है. अत: ‘राजनीति’ शब्द के संकुचित अर्थ से संघ कार्य को जोड़ा जाना उचित नहीं है. इस बार के लोकसभा चुनावों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किस दृष्टि से देखता है? लोकसभा के चुनाव वास्तव में बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. चुनाव देश के भिन्न-भिन्न विषयों को मुख्य प्रवाह में लाने का एक माध्यम होता है. देश की सुरक्षा से जुड़े विषयों, देश कीविदेश नीति से जुड़े विषयों पर योग्य निर्णय लेने का दायित्व केंद्र सरकार का होता है. लोकसभा के चुनाव के आधार पर ही केंद्र सरकार बनती है. इस कारण देश को सर्वोपरि मानने वाला, देश के हित में सोचने वाला राजनैतिक समूह केंद्र सरकार की बागड़ोर सम्भाले यही हमारी (संघ की) इच्छा है. संकुचित बातों से ऊपर उठकर देश हित में सोचने वाला राजनैतिक समूह सत्ता में आना चाहिए. चुनाव के माहौल में जिस प्रकार की गलत चर्चाएं राजनैतिक नेताओं के द्वारा की जा रही हैं, उसे सुनकर बड़ा कष्ट होता है. सभी नेताओं द्वारा अत्यंत संयमित तरीके से राजनैतिक भिन्नता को शत्रुता न मानते हुए, एक-दूसरे के विचारों और दृष्टिकोण का आदर करते हुए अपने विचार रखना जरूरी है. यहां सभी को अपने विचार रखने की स्वतंत्रता है. आज चुनावी माहौल में जिस प्रकार भाषा स्तर गिरता जा रहा है, यह अत्यंत चिंता का विषय है. चुनाव के समय दुर्भाग्य से जो द्वेषपूर्ण माहौल बनता है वह कतई योग्य नहीं है. मेरा मानना है कि राजनीति में स्वार्थ साधने के लिए जिस निचले स्तर तक आज के नेता उतर आए हैं, वह स्वस्थ राजनीति का लक्षण नहीं है. देश को सर्वोपरि मानने वाला राजनैतिक समूह ही केंद्र की सत्ता में हो, इससे आपका क्या आशय है? लोकतंत्र में राष्ट्र का सबसे बडा शक्ति केंद्र ‘केंद्र सरकार’ होती है. जिस प्रकार यह शक्ति केंद्र है, उसी प्रकार देश का दिशादर्शक केंद्र भी है. इसलिए राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर विचार करने वाले लोगों का सत्ता में आना अत्यंत आवश्यक है, यह बात करते हुए मैं किसी भी एक राजनैतिक दल की बात नहीं कर रहा हूं. जो भी राजनैतिक दल सत्ता में आए, उसकी पृष्ठभूमि राष्ट्रहित को ध्यान में रख कर, देशहित को सर्वोपरि मानकर, देश का गौरव बढ़ाने में योगदान देने वाली होनी चाहिए. सिर्फ भारत में नहीं दुनिया के हर देश में इसी प्रकार की सोच होती है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश में जो परिवर्तन करना चाहता है, उसे प्रत्यक्ष रूप में लाने के लिए 2019 के चुनाव कितने महत्वपूर्ण हैं? जैसा कि मैंने पहले ही कहा है, लोकतंत्र में केंद्र सरकार एक शक्ति केंद्र होता है, जो देश की अर्थनीति तय करती है, विदेश नीति तय करती है, शिक्षा नीति तय करती है, सामाजिक दुर्बलता दूर करके सामाजिक विकास की योजनाएं बनाती है. स्वतंत्रता के बाद देश कुछ क्षेत्रों में आगे तो बढ़ा है, परंतु अभी भी देश के सामने बहुत सारी चुनौतियां हैं. राष्ट्र सुरक्षा, बेरोजगारी, गरीबी जैसी समस्याएं हैं. संघ की धारणा है कि इन समस्याओं का हल निकालने वाली प्रामाणिक सरकार या राजनैतिक समूह ही भारत देश में परिवर्तन ला सकता है. इस प्रकार की विचारधारा का राजनैतिक समूह सत्ता में आना चाहिए. इस बात का विवेक देश की जनता को मतदान के द्वारा चुनाव करते समय ध्यान में रखना चाहिए, ऐसा हमें लगता है. क्या आपको लगता है कि सिर्फ चुनाव के माध्यम से ही देश में सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं? वर्तमान परिस्थिति में तो यही कहना पड़ेगा. चुनाव के द्वारा सरकार निर्धारित होती है और सकारात्मक परिणाम सरकार ही ला सकती है. चुनाव के माध्यम से सरकार चुनी जाती है. इसलिए चुनाव का महत्व है. समर्थ भारत की संकल्पनाओं की पूर्ति के लिए गत पांच सालों में विद्यमान सरकार ने क्या कार्य किए हैं? मैं समझता हूं कि गरीबी और ग्राम विकास को ध्यान में रखकर, गांव-गांव में बिजली पहुंचाना, किसान को फसल के उचित दाम उपलब्ध कराने की दिशा में सरकार ने कार्य किया है. गत 5 वर्षों में देशभर में कई किलोमीटर महामार्गों का निर्माण हुआ है, यह अत्यंत अभिनंदनीय है. अब देश में आवागमन की गति बढ़ गई है. जिसके कारण देश आगे बढ रहा है. देश को समर्थ करने की प्रक्रिया तो कई वर्षों से चल रही है. वर्तमान सरकार ने अपने कार्य में जनविकास की योजनाओं को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया है. साथ ही विश्व के मंच पर भी भारत की गरिमा बढ़ाई है. भारत की गिनती दुनिया के शक्तिशाली देशों में हो रही है. योग को दुनिया के 90 प्रतिशत देशों द्वारा स्वीकार किया जाना अपने आप में बहुत बड़ी बात है. ‘समर्थ भारत’ के अंतर्गत भारत के विचारों को दुनिया की स्वीकार्यता तक ले जाना भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है. पाकिस्तान की आतंकवादी कार्रवाई पर भारत सरकार ने जिस प्रकार की भूमिका ली, उसके संदर्भ में आपके विचार? आतंकवाद से केवल भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व पीड़ित है. विश्व के भिन्न-भिन्न देशों को आतंकवाद के विरोध में एकत्रित खड़े रहने की पृष्ठभूमि बनाने में भारत का योगदान इस समय अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है.  आज आतंकवाद के कारण जनजीवन असुरक्षित हो रहा है. देश के अनेक विकास कार्यों में बाधाएं आ रही हैं. 21वीं सदी में शस्त्र के बल पर गलत धारणाएं मन में रखकर मानवता को झुकाना कितना योग्य है? ऐसे समय में भारत का नेतृत्व आतंकवाद के विरोध में दुनिया को संगठित करने की पहल कर रहा है. भविष्य में इससे ज्यादा प्रयास भारत का नेतृत्व करे, ऐसा हमें लगता है. क्या ‘एयर सर्जिकल स्ट्राइक’ ही पुलवामा हमले का योग्य उत्तर था? निश्चित रूप से. हमला होता है तो जवाब देना ही चाहिए. उनकी आतंकवादी गतिविधियों के खिलाफ भारत की उचित प्रतिक्रिया कोई गलत बात नहीं है. प्रतिक्रिया देना चेतना का लक्षण है. सजीवता का लक्षण है.

सहनशीलता कभी-कभी दुर्बलता मानी जाती है. इसलिए कभी-कभी ऐसे अवसरों पर अपने सामर्थ्य का परिचय देना अत्यंत आवश्यक होता है. आतंकवादी जिस भाषा को जानते हैं, उससे भी अधिक कठोर भाषा में भारत अपनी सुरक्षा की दृष्टि से जवाब दे सकता है, यह आतंकियों को याद दिलाना अत्यंत जरूरी था. पुलवामा की घटना एक कारण बन गया था. भारत ने पूरे विश्व में यह सिद्ध कर दिया कि आतंकवादियों को हम उन्हीं की भाषा में उत्तर दे सकते हैं.

इस सर्जिकल स्ट्राइक से भारत के सामान्य व्यक्ति भी उत्साहित हुए हैं. राष्ट्र में एक विश्वास निर्माण हुआ है कि हम भी कुछ कर सकते हैं. दुनिया की बुरी ताकतों को हम उनकी सही जगह दिखा सकते हैं यह विश्वास सर्जिकल स्ट्राइक के बाद सामान्य जनों में निर्माण हुआ है. समाज में एक प्रकार की धारणा बन गई है कि चुनाव में भाजपा की विजय से ही राष्ट्र विकास हो सकताहै. इसका कारण क्या हो सकता है? स्वतंत्रता प्राप्ति के 70 सालों के बाद के इतिहास को देखते हुए जनता को यह महसूस हो रहा है कि भारत को सशक्त बनाने के लिए जो कार्य किए जाने थे, वे 70 सालों में नहीं हो पाए हैं. विद्यमान सरकार ने सुरक्षा के क्षेत्र में, आर्थिक क्षेत्र में, शिक्षा के क्षेत्र में, कृषि क्षेत्र में जिस प्रकार की नीतियां बनाई हैं, वे नीतियां देश को उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जाने वाली हैं. इसलिए लोगों में एक धारणा बनी है कि इस सरकार को ही आने वाले 5 सालों के लिए देश के हित में चुनना चाहिए. भारतीय जनमानस में यह विचार है कि जो बातें इस सरकार ने तय की हैं, उन बातों को पूर्णत्व में लाने के लिए 2019 के चुनाव में चुनकर उचित समय देना चाहिए. भारतीय वैज्ञानिकों को जिस प्रकार से अवसर दिया गया, उसी कारण अंतरिक्ष में भी भारत का दबदबा बढ़ा है. यह सरकार के कारण ही हो सका है. मैं यह नहीं कहूंगा कि भ्रष्टाचार पूरी तरह से समाप्त हुआ है, पर एक अच्छी बात है कि भ्रष्टाचार के विरोध में कमर कसी जा रही है. ये बातें भारतीय जनमानस के ध्यान भी में आ रही हैं. सही दिशा में काम करने के लिए किसी भी राजनीतिक दल को केवल पांच साल का समय पर्याप्त नहीं होता. इस कारण राष्ट्रीय विचारों के विभिन्न दलों के समूह को फिर एक बार भारत की सत्ता में आना चाहिए और राष्ट्र विकास जो का कार्य उन्होंने स्वीकार किया है, उसे आगे बढ़ाना चाहिए. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ चाहता है या ‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’? संघ मुक्त की किसी तरह की कल्पना से सहमत नहीं है. हम राष्ट्र भावना से परिपूर्ण देश चाहते हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत को उस देश के रूप में देखना चाहता है जो वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठा प्राप्त करे. अत: इससे मुक्त, उससे मुक्त इस प्रकार का कोई भी विचार संघ नहीं करता है. संघ सामर्थ्यशाली भारत चाहता है. हिंदू आतंकवाद की व्याख्या गढ़ने से लेकर जनेऊ धारण करने तक के कांग्रेस के प्रवास को आप किस दृष्टि से देखते हैं?

मैं कांग्रेस के इस प्रवास की प्रामाणिकता पर ही प्रश्न उठा रहा हूं. जिस प्रकार से वर्तमान में वह प्रतिक्रिया दे रही है, मुझे नहीं लगता कि देशहित को लेकर कांग्रेस प्रामाणिक है. सर्जिकल स्ट्राइक जैसी घटनाओं पर प्रश्नचिह्न खड़ा किया जाता है, सेना की कार्रवाई पर प्रश्नचिह्न खड़ा किया जाता है, केवल भारत के सामान्य जनों को भ्रमित करने के लिए कांग्रेस धार्मिक बातों का आधार ले रही है.

कांग्रेस अपने राजनीतिक जीवन में फिर से सामाजिक भ्रष्टाचार कर रही है. बाह्य रूप से भ्रमित करने वाली ये बातें और प्रत्यक्ष व्यवहार में आतंकवाद के प्रति कांग्रेस की भूमिका, कांग्रेस का दोहरा चेहरा दर्शाती हैं. केवल और केवल मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए इस प्रकार के जनेऊधारी होने की बात की जा रही है. मंदिर में जाना अच्छी बात है. कोई भी जा सकता है, सभी को जाना भी चाहिए. लेकिन चुनाव को ध्यान में रखकर मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए यह दिखावा करना उचित नहीं है. किन परिवर्तनों के कारण अब भारत के साथ ही पूरे विश्व का हिंदू अपने आप को गौरवान्वित महसूस कर रहा है? वर्तमान केंद्र सरकार ने हिंदुत्व से जुड़े हुए विभिन्न विषयों पर कार्य किया है. तीर्थ यात्रा के लिए श्रद्धालुओं हेतु सुविधाएं प्रदान की हैं. नेपाल से लेकर भारत के रास्तों को जोड़ने के लिए मार्ग को प्रशस्त करने की बात की है. अनेक धार्मिक क्षेत्रों के विकास की बातें चल रही है. ऐसी विभिन्न बातें इस सरकार ने की हैं. इसे हम केवल धार्मिकता के दृष्टिकोण से नहीं देखते हैं. हिंदुओं का आत्मविश्वास ब़ढ़े ऐसा व्यवहार विश्व पटल पर हो रहा है. विश्व भर में अभिमान से वंदे मातरम का नारा लगाया जाता है. योग जैसे विषयों की स्वीकार्यता बढ़ती है. इन बातों को बढ़ावा मिले, इसलिए विद्यमान सरकार की ओर से प्रयास हो रहे हैं. इसी के कारण विश्व और भारत का हिंदू यह महसूस करता है कि हिंदू इस नाते हम गौरवान्वित हो रहे हैं. शक्ति के साथ हम पूरे विश्व के सामने आ रहे हैं. हम केवल इस बात को राजनीति से जोड़ कर नहीं देखते हैं. योग, संस्कृत, आयुर्वेद, पर्यावरण जैसे विषय में भारत का दृष्टिकोण दुनिया के द्वारा स्वीकार करना अब संभव हो रहा है. इसी कारण से हिंदू अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता है. क्या भारत विश्व गुरु होने की दिशा में अग्रसर हो रहा है? विश्व गुरू होने की यात्रा लंबी है. इतनी आसान नहीं है. हम उस दिशा में बढ़े जरूर हैं. हमें विश्वास है कि भारत का मूलभूत चिंतन विश्व कल्याण की कामना करने वाला चिंतन है. वह सब की सुख की कामना करता है. समन्वय का चिंतन लेकर चलता है. भारतीय विचारधाराओं में यह जो मूलभूत चिंतन है, वह विश्व को सही दिशा में मार्गदर्शन करने वाला चिंतन है. अब यह चिंतन पूरा विश्व स्वीकार रहा है.

यह बात स्पष्ट हो रही है कि विश्व गुरु बनने का बीज भारत के चिंतन में है. वह बीज धीरे-धीरे अंकुरित हो रहा है. निश्चित रूप से भारत अनेक क्षेत्रों में विश्व को मार्गदर्शन करने की क्षमता रखता है. यह बात कल भी थी, आज भी है, लेकिन दुनिया के सामने लाने की यात्रा अभी भी लंबी है. उसे समय देना पड़ेगा.

पूर्वोत्तर में दिखाई देने वाले परिवर्तन में विद्यमान सरकार का योगदान किस प्रकार है? पहली बार पूर्वोत्तर के छोटे-छोटे राज्यों से संवाद की प्रक्रिया प्रारंभ हुई है. उनको भी राष्ट्र की मुख्य धारा में जोड़ने का काम विद्यमान सरकार ने किया है. वहां के राज्य और लोग भारत की शक्ति के साथ अपने आप को जोड़ रहे हैं. काफी वर्षों से प्रयास चल रहा था कि वहां के नागरिकों हेतु रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) की प्रक्रिया प्रारंभ की जाए. वह अब तक किसी ने किया नहीं था. विद्यमान केंद्र सरकार ने प्रथम इस बात को वहां लागू किया है. इस प्रक्रिया के क्रियान्वयन में कई प्रकार की बाधाएं आ रही हैं. परंतु केंद्र सरकार ने देश हित को ध्यान में रखकर अपने कदम आगे बढ़ाए. इस कारण जो विदेशी नागरिक हैं वे चिह्नित हुए हैं. विदेशी नागरिक भारत में अवैध रूप से निवास कर रहे हैं, यह स्पष्ट होते ही उन विदेशी नागरिकों को देश से बाहर निकालना किसी भी सरकार का अधिकार है. अब नागरिकता का कानून लाने की दिशा में सरकार आगे बढ़ सकती है. पूर्वोत्तर के कई प्रश्नों का समाधान इस कानून को लागू करने से मिल सकता है. केवल पूर्वोत्तर नहीं पूर्वोत्तर के नजदीक जो पश्चिम बंगाल है, उसमें भी कई विदेशी नागरिकों की घुसपैठ के कारण वहां कठिन समस्या निर्माण हो रही है. इस प्रक्रिया का प्रारंभ पूर्वोत्तर से हुआ है. इसे लेकर केंद्र सरकार यदि जोरशोर से आगे बढ़ती है तो घुसपैठियों की समस्या का निराकरण करने में बहुत बड़ा योगदान मिल सकता है. विदेशी नागरिकों का भारत के अंदर का अवैध प्रवेश बहुत बड़ी समस्या है. इस प्रश्न पर विद्यमान केंद्र सरकार ने जो पहल की है वह सराहनीय है. नोटा के संदर्भ में आपकी राय क्या है? भारतीय संविधान में भारतीय नागरिकों को अपनी पसंद की सरकार चुनने का अधिकार दिया है. उस अधिकार की पूर्णता मतदान प्रक्रिया से ही होती है. आपके मतदान न करने से कोई गलत व्यक्ति भी सरकार में जाकर बैठ सकता है. इसलिए देश हित को और साथ में अपने हित को भी ध्यान में रखकर अपने मतदान का अधिकार सभी भारतीयों को उपयोग में लाना ही चाहिए. शत-प्रतिशत मतदान हो, धैर्य के साथ मतदान हो. लोग निर्भय होकर मतदान करें. अपनी बुद्धि और विवेक का उपयोग करते हुए मतदान करें. किसी राजनैतिक दल के लिए नहीं, देशहित के लिए, राष्ट्रहित से प्रेरित समूह देश की केंद्र सत्ता में आए, इसलिए हर एक मतदाता को मतदान का उपयोग जरूर करना चाहिए. इस साक्षात्कार के माध्यम से आप पाठकों को क्या संदेश देना चाहेंगे? मैं इस साक्षात्कार के माध्यम से एक निवेदन जरूर करना चाहूंगा कि जब चुनाव आते हैं तो द्वेष की भावना बढ़ती है. संघर्ष का वातावरण निर्माण होता है. जिसे चुनाव समाप्त होने के बाद ठीक करना बहुत कठिन होता है. इसलिए सभी राजनैतिक दल अपने विचार भारत की जनता के सामने रखें. लेकिन यह लोकतांत्रिक चर्चा संवाद के वातावरण में सम्पन्न होनी आवश्यक है. जन सामान्य को संघर्ष का हथियार बनाकर देश का वातावरण बिगाड़ने का अधिकार किसी को भी नहीं है. संवाद पूर्ण वातावरण में शांति के साथ चुनाव हो सकते हैं, ऐसा आदर्श हम दुनिया के सामने प्रस्तुत करें. इस दिशा में सभी राजनीतिक दलों को सोचना अत्यंत आवश्यक है. सभी राजनीतिक दलों से और मतदाताओं से हम यही अपेक्षा और प्रार्थना करते हैं. साभार – हिन्दी विवेक

April 18th 2019, 6:01 pm

भारत की सम्प्रभुता पर हमलावर अब्दुल्ला-मुफ़्ती के विरुद्ध हो कार्यवाही – विहिप

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नई दिल्ली. विश्व हिन्दू परिषद ने तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों, नेशनल कॉन्फ्रेंस तथा पीडीपी के प्रमुख नेताओं के खिलाफ चुनाव आयोग से शिकायत कर इनके खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की. इन नेताओं द्वारा बार-बार दिए जा रहे भारत विरोधी बयानों व धमकियों के साथ कश्मीर घाटी के बहुसंख्यक मुस्लिम समाज तथा अल्पसंख्यक गैर मुस्लिमों के बीच वैमनस्य पैदा करने के विरुद्ध शिकायत लेकर विश्व हिन्दू परिषद का उच्च स्तरीय प्रतिनिधि मंडल चुनाव आयोग से मिला.

विहिप के अंतर्राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष एडवोकेट आलोक कुमार के नेतृत्व में प्रतिनिधि मण्डल ने चुनाव आयोग से कहा है कि जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला तथा महबूबा मुफ़्ती ने पाकिस्तान की कठपुतली बन धारा 370 व 35A का विरोध कर लगातार कश्मीर की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी का हवाला देते हुए वहां के माहौल को जानबूझकर योजना पूर्वक साम्प्रदायिक बनाने की कुचेष्टा की है. अतः इन नेताओं द्वारा आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने के कारण इनके विरुद्ध आवश्यक कार्यवाही की जाए. आयोग को सम्बंधित दस्तावेज सौंपते हुए उन्होंने कहा कि जो नेता भारत की सम्प्रभुता पर हमला करते हुए यह कहते हों कि “ना समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दुस्तान वालो, तुम्हारी दास्तां तक भी ना रहेगी दास्तानों में” और जो वहां के बहुसंख्यक मसलमानों के नाम पर जनता को भारत को तोड़ने के लिए भड़काते हों तो उन पर कड़ी कार्यवाही तो बनती ही है. आयोग ने प्रतिनिधि मण्डल को आरोपों की जांच के बाद उचित कार्यवाही का भरोसा दिया है.

विहिप ने चुनाव आयोग को सौंपे अपने चार पृष्ठों के विस्तृत ज्ञापन में तथ्यों के साथ कहा है कि तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों ने कश्मीर को भारत से अलग करने की धमकी देते हुए जिस शब्दावली का प्रयोग किया है उससे स्पष्ट होता है कि ये नेता सीधे-सीधे पाकिस्तान की उँगलियों पर नाचते हुए भारत के दुश्मन को पूर्व नियोजित तरीके से समर्थन कर रहे हैं. ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि इन नेताओं द्वारा बार-बार “कश्मीर की बहु-संख्यक मुस्लिम आबादी” पर जोर देना, मामले को साम्प्रदायिक बना कर, वहां रह रहे गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों से वैमनस्य को बढ़ाने का भी सुनियोजित प्रयास है.

ज्ञापन में कहा गया है कि इन नेताओं द्वारा जनता को मुस्लिम सम्प्रदाय के आधार पर खुले आम देशद्रोह के लिए उकसा कर भारत के टुकड़े करने का प्रयास किया जा रहा है. यह इन नेताओं व उनके सम्बन्धित दलों द्वारा न सिर्फ भारत के संविधान, और इसके अंतर्गत बनाए गए सर्वोच्च न्यायालय, संसद व चुनाव आयोग की सर्वोच्चता पर बल्कि भारत की सम्प्रभुता पर भी सीधा हमला है. इस प्रकार के गैर जिम्मेदाराना बयानों को किसी भी लोकतांत्रिक देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता है.

विहिप ने ज्ञापन में मांग की है कि चुनाव आयोग इन नेताओं के वक्तव्यों की जांच करा कर उनके विरुद्ध प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर आपराधिक कार्यवाही करे तथा इनके चुनावों में भाग लेने पर रोक लगाए, जो पूर्व में भी आयोग ने समय-समय पर किया है.

April 18th 2019, 10:24 am

18 अप्रैल / बलिदान दिवस – अमर बलिदानी दामोदर हरि चाफेकर

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नई दिल्ली. दामोदर हरि चाफेकर उस बलिदानी परिवार के अग्रज थे, जिसके तीनों पुष्पों ने स्वयं को भारत माँ की अस्मिता की रक्षा के लिए बलिदान कर दिया. उनका जन्म 25 जून, 1869 को पुणे में प्रख्यात कथावाचक श्री हरि विनायक पन्त के घर हुआ था. दामोदर के बाद 1873 में बालकृष्ण और 1879 में वासुदेव का जन्म हुआ. तीनों भाई बचपन से ही अपने पिता के साथ भजन कीर्तन में भाग लेते थे.

दामोदर को गायन के साथ काव्यपाठ और व्यायाम का भी बहुत शौक था. उनके घर में लोकमान्य तिलक का ‘केसरी’ नामक समाचार पत्र आता था. उसे पूरे परिवार के साथ-साथ आस-पड़ोस के लोग भी पढ़ते थे. तिलक जी को जब गिरफ्तार किया गया, तो दामोदर बहुत रोये. उन्होंने खाना भी नहीं खाया. इस पर उसकी माँ ने कहा कि तिलक जी ने रोना नहीं, लड़ना सिखाया है. दामोदर ने माँ की वह सीख गाँठ बाँध ली.

अब उन्होंने ‘राष्ट्र हितेच्छु मंडल’ के नाम से अपने जैसे युवकों की टोली बना ली. वे सब व्यायाम से स्वयं को सबल बनाने में विश्वास रखते थे. जब उन्हें अदन जेल में वासुदेव बलवन्त फड़के की अमानवीय मृत्यु का समाचार मिला, तो सबने सिंहगढ़ दुर्ग पर जाकर उनके अधूरे काम को पूरा करने का संकल्प लिया. दामोदर ने शस्त्र संचालन सीखने के लिए सेना में भर्ती होने का प्रयास किया; पर उन्हें भर्ती नहीं किया गया. अब वह अपने पिता की तरह कीर्तन-प्रवचन करने लगे.

एक बार वे मुम्बई गए. वहाँ लोग रानी विक्टोरिया की मूर्ति के सामने हो रही सभा में रानी की प्रशंसा कर रहे थे. दामोदर ने रात में मूर्ति पर कालिख पोत दी और गले में जूतों की माला डाल दी. इससे हड़कम्प मच गया. उन्हीं दिनों पुणे में प्लेग फैल गया. शासन ने मिस्टर रैण्ड को प्लेग कमिश्नर बनाकर वहाँ भेजा. वह प्लेग की जाँच के नाम पर घरों में और जूते समेत पूजागृहों में घुस जाता. माँ-बहनों का अपमान करता. दामोदर एवं मित्रों ने इसका बदला लेने का निश्चय किया. तिलक जी ने उन्हें इसके लिए आशीर्वाद दिया.

22 जून, 1897 को रानी विक्टोरिया का 60वाँ राज्यारोहण दिवस था. शासन की ओर से इस दिन समारोह रखे गए. पुणे में भी रात के समय एक क्लब में पार्टी थी. रैण्ड जब वहाँ से लौट रहा था, तो दामोदर हरि चाफेकर तथा उसके मित्रों ने उस पर गोली चला दी. इससे आर्यस्ट नामक अधिकारी वहीं मारा गया. रैण्ड भी बुरी तरह घायल हो गया और तीन जुलाई को अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गई.

पूरे पुणे शहर में हाहाकार मच गया; पर वे पुलिस के हाथ न आए. कुछ समय बाद दो द्रविड़ भाइयों के विश्वासघात से दामोदर और फिर बालकृष्ण पकडे़ गए. जिन्होंने विश्वासघात कर उन्हें पकड़वाया था, वासुदेव और रानाडे ने उन्हें गोली से उड़ा दिया. रामा पांडू नामक पुलिसकर्मी ने अत्यधिक उत्साह दिखाया था, उस पर थाने में ही गोली चलाई; पर वह बच गया.

न्याय का नाटक हुआ और 18 अप्रैल, 1898 को दामोदर को फाँसी दे दी गई. अन्तिम समय में उनके हाथ में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा लिखित तथा हस्ताक्षरित ग्रन्थ ‘गीता रहस्य’ था. उन्होंने हँसते हुए स्वयं ही फाँसी का फन्दा गले में डाला. आगे चलकर बालकृष्ण, वासुदेव और रानाडे को भी फाँसी पर चढ़ा दिया गया.

 

April 18th 2019, 3:23 am

धारा 370 और 35A को हटाना जरूरी – जस्टिस संतोष हेगड़े

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नई दिल्ली. सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश संतोष हेगड़े ने कहा कि अनुच्छेद 35ए और 370 को खत्म करने की जरूरत है. ऐसा इसलिए क्योंकि ये दोनों अन्य राज्यों के अधिकारों के विपरीत हैं. दोनों अनुच्छेदों के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है.

जस्टिस हेगड़े ने कहा कि “1948 में जब कश्मीर के महाराजा राज्य का भारत में विलय करने पर सहमत हुए थे, तब संविधान के अनुच्छेद 35ए और 370 के तहत लोगों को कुछ आश्वासन दिया गया था.” “इसके शब्द ऐसे लगते हैं, जैसे जिस पृष्ठभूमि में आश्वासन दिए गए वे स्थायी हैं. इसके बाद देश में जो घटनाएं हुईं, वे दिखाती हैं कि इन अनुच्छेदों को जारी रखना संभव नहीं है क्योंकि अगर कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तो इसे अन्य राज्यों की तुलना में अलग दर्जा नहीं दिया जा सकता है.”

उन्होंने कहा कि आज की स्थिति में जरूरी है कि इन अनुच्छेदों को समाप्त कर दिया जाए क्योंकि उस कानून के तहत दी गई कुछ स्वायत्तता अन्य राज्यों के अधिकारों के विपरीत है. अगर कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तो इसका दर्जा अन्य राज्यों के बराबर ही होना चाहिए.

कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त ने कहा, ‘70 वर्ष बीत चुके हैं… मेरे मुताबिक उन अनुच्छेदों का जो उद्देश्य था वह पूरा हो गया है.’ ‘इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नहीं है. इसलिए दोनों अनुच्छेदों का संविधान में कोई स्थान नहीं रह गया है.’

अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान में जम्मू-कश्मीर से संबंधित है. जिसका हवाला देकर 1954 में प्रेज़िडेंशियल ऑर्डर द्वारा लागू 35ए उस राज्य में बाहरी लोगों को जमीन एवं संपत्ति खरीदने से रोकता है.

April 18th 2019, 2:17 am

जलियांवाला बाग – हुतात्माओं की स्मृति में तिरंगा यात्रा

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अमृतसर. जलियांवाला बाग में देश की आजादी के लिए प्राण न्योछावर करने वाले बलिदानियों को श्रद्धांजलि देने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अमृतसर महानगर द्वारा तिरंगा यात्रा का आयोजन किया गया. 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में क्रूर अंग्रेज जनरल डायर ने निर्ममतापूर्वक हजारों निर्दोष लोगों की हत्या की थी..जलियांवाला बाग़ नरसंहार की 100वीं वर्षगाँठ पर अमृतसर के हाल गेट से जलियांवाला बाग़ तक तिरंगा यात्रा में हुतात्माओं का पुण्य स्मरण किया गया. इस तिरंगा यात्रा में स्वयंसेवकों के साथ ही सैकड़ों की संख्या में शामिल स्थानीय लोगों ने अमर बलिदानियों को सादर पुष्पांजलि दी..

तिरंगा यात्रा में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक प्रमुख रामेश्वर जी ने कहा कि 13 अप्रैल 1919 को आज से ठीक 100 वर्ष पूर्व जलियांवाला बाग में आततायी अंग्रेज जनरल डायर व उसके क्रूर सिपाहियों ने निरपराध देशभक्तों का खून बहाया था. तिरंगा यात्रा के माध्यम से हम जहाँ उस नरसंहार के प्रति अपनी भावी पीढ़ी को जागरूक करेंगे, वहीं उन अमर बलिदानियों की आत्मा की शांति की भी कामना करते हैं जिन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ स्वाहा कर दिया. हम सबकी यह मांग है कि जलियांवाला बाग के बलिदानियों को शहीद का सम्मान दिया जाए और उनके परिजनों व आश्रितों को उचित मुआवजा दिया जाए.

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक ऐसा संगठन है जो आतंकवाद, आतंकियों और देश के दुश्मनों द्वारा मारे गए निर्दोष नागरिकों व जवानों के प्रति संवेदनशील रहकर उनकी चिंता करता है. संघ देश में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ लोगों को पहले से ही जागरूक करता आया है और आज भी कर रहा है. संगठन की विचार शक्ति से प्रभावित होकर लोग हमसे जुड़े हैं और जुड़ रहे हैं. कुछ राष्ट्रविरोधी ताकतें हमें धर्म और आतंकवाद का भय दिखाकर डराना चाहती हैं, लेकिन हम दुनिया को स्पष्ट करना चाहते हैं कि धर्म हमारे देश की आधारशिला है जो आज भी एकता व अखंडता का प्रतीक बन कर दुनिया के सामने खड़ा है.

तिरंगा यात्रा में शहर के गणमान्यजन व विशिष्ट जन उपस्थित रहे.

April 17th 2019, 8:35 am

17 अप्रैल / पुण्यतिथि – मित्रता प्रेमी गोविन्दराव जी

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गोविंदराव कुलकर्णी (अन्ना) 1945 में नागपुर से ही प्रचारक बने थे. प्रारम्भ में उन्हें महाराष्ट्र में ही भंडारा और फिर गोंदिया में जिला प्रचारक का काम दिया गया. 1948 में गांधी जी की हत्या के बाद लगे प्रतिबंध के समय वे उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में प्रचारक थे. प्रतिबंध समाप्ति के बाद उन्हें फिर महाराष्ट्र बुला लिया गया. वे विदर्भ में खामगांव, गोंदिया, भंडारा और नागपुर में नगर, जिला और विभाग प्रचारक जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों पर रहे.

गोविंदराव जी की कद-काठी बहुत प्रभावी थी. सोने में सुहागे की तरह वे खूब बड़ी-बड़ी मूंछें भी रखते थे. जब वे खाकी निकर पहन लेते थे, तो लोग उन्हें प्रायः पुलिस वाला समझते थे. इस विशेषता के कारण उनकी पुलिस वालों से दोस्ती भी बहुत जल्दी हो जाती थी. इसका उन्हें कई बार लाभ भी मिला. यात्रा करते समय कई बार बस और ट्रक वाले उनसे पैसे नहीं लेते थे. मार्ग में होटल वाले भी उन्हें बिना पैसे लिये ही खिला-पिला देते थे.

गोविंदराव जी चाय नहीं पीते थे. गोंदिया का एक युवा पुलिस कर्मी उनका मित्र बन गया था. एक बार वह रास्ते में मिल गया और बहुत आग्रह कर उन्हें एक होटल में ले गया. वस्तुतः उस दिन उसकी सगाई हुई थी. इससे वह बहुत प्रसन्न था और उन्हें चाय-नाश्ता करवाना चाहता था. गोविंदराव जी भी उसकी प्रसन्नता में सहभागी हुए और चाय के लिए मना नहीं किया.

संघ के काम में परिचय और मित्रता का बहुत महत्व है. गोविंदराव किसी से भी बहुत जल्दी मित्रता करने में माहिर थे. यात्रा में चलते-चलते वे लोगों से मित्रता कर लेते थे. कार्यालय पर उनसे मिलने सैकड़ों लोग आते थे. ऐसे लोग प्रायः संघ को बिल्कुल नहीं जानते थे. वे कार्यालय को उनका घर समझते थे, पर धीरे-धीरे गोविंदराव जी उन्हें भी स्वयंसेवक और कार्यकर्ता बनाकर उनका उपयोग संघ कार्य की वृद्धि में कर लेते थे. वे परिवारों की बजाय कमरा लेकर रहने वाले छात्रों के साथ भोजन करना पसंद करते थे. ऐसे अनेक छात्र आगे चलकर संघ के अच्छे कार्यकर्ता बने.

जब वे कार्यालय पर रहते थे, तो बालक मस्ती में वहां खेलते-कूदते और शोर करते रहते थे. गोविंदराव जी भी उनके बीच बच्चा बन जाते थे. एक बार उन्हें निर्धन छात्रों के एक छात्रावास के संचालन का काम दिया गया. उसके लिए उन्होंने घर-घर जाकर अनाज, धन तथा अन्य सामग्री एकत्र की, पर व्यवस्था पूरी होते ही वे फिर संघ शाखा के काम में ही वापस आ गये.

गोविंदराव पत्र-व्यवहार बहुत करते थे. उसमें पत्रांक, दिनांक आदि लाल स्याही से बहुत साफ-साफ अंकित रहता था. अतः कई लोग उनके पत्रों को संभाल कर रखते थे. इस माध्यम से भी उन्होंने अनेक लोगों को संघ कार्य की प्रेरणा दी. वे अपने पास आये हर पत्र का बहुत शीघ्र उत्तर देते थे.

उनका संपर्क का दायरा बहुत बड़ा था. सिन्धी समाज के लोग उन्हें ‘भैयाजी’ कहकर आदर देते थे. वे कहते थे कि हर कार्यकर्ता को प्रतिदिन एक नये व्यक्ति से परिचय करना चाहिए. वे स्वयं भी इसका प्रयास करते थे. अपने बड़े भाई और भाभी को वे माता-पिता के समान आदर देते थे. जीवन के संध्याकाल में उनके रहने की व्यवस्था लाखनी में की गयी, पर बीमार होते हुए भी वे आसपास सम्पर्क करने निकल जाते थे. ऐसे में लोगों को उन्हें ढूंढना पड़ता था. अत्यधिक बीमार होने पर उन्हें नागपुर लाया गया, जहां 17 अप्रैल, 2000 को उनका शरीरांत हुआ.

April 17th 2019, 3:16 am

सब सोनिक मिसाइल निर्भय का सफल परीक्षण

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भारत ने सोमवार को 1000 किलोमीटर तक मार करने वाली स्वदेशी सब सोनिक क्रूज मिसाइल ‘निर्भय’ का ओडिशा तट से सटे चांदीपुर स्थित टेस्ट रेंज में सफल परीक्षण किया. यह रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित मिसाइल का छठा परीक्षण था. निर्भय सब सोनिक क्रूज मिसाइल को देश में ही डिजाइन और तैयार किया गया है.

निर्भय मिसाइल की लंबाई 6 मीटर है. इसका व्यास 0.52 मीटर, पंख की लंबाई 2.7 मीटर और लॉन्च के समय का वजन लगभग 1,500 किलोग्राम. यह मिसाइल 300 किलोग्राम परमाणु आयुध ले जाने में सक्षम है और 1000 किलोमीटर के दायरे में स्थित ठिकानों को निशाना बना सकती है. निर्भय सभी मौसम में काम करने वाली क्रूज मिसाइल है. बताया जाता है कि निर्भय में अमेरिकी टॉमहाक के बराबर क्षमता है.

यह मिसाइल नीचे उड़ान भरने में भी सक्षम है, जिससे यह दुश्मन के रडार से छिपकर आतंकी अड्डों को आसानी से निशाना बना सकती है. यह मिसाइल ‘ब्रह्मोस’ की कमी को पूरा करती है, क्योंकि उसकी मारक सीमा 290 किलोमीटर है, जबकि निर्भय लंबी दूरी तक मार कर सकती है.

इससे पहले निर्भय सब सोनिक क्रूज मिसाइल का 5 बार परीक्षण किया जा चुका है, पहली बार मार्च 2013, दूसरी बार अक्तूबर 2014, तीसरी बार अक्तूबर 2016, चौथी बार दिसंबर 2016 और पांचवीं बार नवंबर 2017 में परीक्षण किया गया है.

मिसाइल के क्षेत्र में भारत का सफर काफी आगे बढ़ चुका है. भारत के पास सुपर सोनिक मिसाइल ब्रह्मोस के अलावा अंतर-महाद्वीपिय मिसाइल ‘अग्नि’ भी है, जो 5500 किमी से ज्यादा दूरी तक मार कर सकती है.

April 16th 2019, 10:49 pm

रामनवमी पर शोभायात्रा से लौट रहे भक्तों पर पत्थरबाजी, वाहन फूंके

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जयपुर (विसंकें). राजस्थान में जोधपुर के सूरसागर क्षेत्र में रामनवमी शोभायात्रा के बाद शनिवार शाम वापस अपने घरों  की तरफ लौट रहे भक्तों पर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अपनी छतों पर से पत्थर बरसाने शुरू कर दिए. अचानक पत्थरों की बौछार से शोभायात्रा में शामिल लोगों में अफरा-तफरी का माहौल बन गया. कुछ लोग गंभीर रूप से घायल भी हो गए. कुछ अराजक तत्मुवों ने शनिवार को एक हिंदू परिवार के घर पर भी हमला किया था. परिवार के सदस्यों का कहना है कि कंट्रोल रूम को बार बार कॉल करने के बावजूद पुलिस समय पर नहीं पहुंची. दंगाइयों ने दो बाइक और एक स्कूटर को भी आग के हवाले कर दिया. इनमें से अधिकांश ने अपने चेहरे रुमाल व कपड़े से ढंके हुए थे. जब मामले को शांत कराने पुलिस मौके पर पहुँची तो छतों से पथराव कर रहे पत्थरबाजों ने पुलिस पर भी पत्थर फैंकने शुरू कर दिए. इससे दो पुलिसकर्मियों को गंभीर चोटें आईं.

काफी देर तक पत्थरबाजी – पूर्व नियोजित साजिश की संभावना

सूरसागर इलाके में हुए उपद्रव का एक लाइव वीडियो सोशल मीडिया पर आया. करीब 13 मिनट के इस वीडियो में स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि सूरसागर मुख्य मार्ग पर स्थित दो घरों की छतों पर करीब एक दर्जन पत्थरबाज खड़े हैं. वे रह रहकर पुलिस पर पथराव करते दिख रहे हैं. इन्हीं पत्थरबाजों के वार से एक पुलिसकर्मी के सिर में चोट आई. इतना कुछ होने के बावजूद पुलिस उन दोनों मकानों की छत पर चढ़कर पत्थरबाजों को पकड़ने की बजाय मूकदर्शक बनी नजर आई. पुलिस न तो उन घरों में घुसी और न ही बाहर से आंसू गैस के गोले ही छोड़े.

2 दिन पहले तनाव के बावजूद नहीं खंगाली घरों की छतें

सूरसागर के इसी इलाके में गुरुवार को तनाव की स्थिति बनी थी. इसके बाद रामनवमी महोत्सव समिति ने पुलिस प्रशासन को विशेष सुरक्षा इंतजाम करने का आग्रह भी किया था. इसके बावजूद कई घरों की छतों से पुलिस पर पथराव होता रहा. समय रहते पुलिस ने यदि इस इलाके के घरों की छतों की तलाशी ली होती या ड्रोन कैमरों से इस इलाके का सर्वे किया होता तो संभवतया हालात इतने नहीं बिगड़ते.

रामनवमी महोत्सव समिति और पुलिस की कुछ दिन पहले आयोजन को लेकर बैठक हुई थी. समिति ने पुलिस से सूरसागर क्षेत्र में तनाव की स्थिति का जिक्र करते हुए शोभायात्रा के शुरू से लेकर समापन तक यहां पर्याप्त पुलिस बल तैनात रखने का आग्रह किया था. इसके बाद सूरसागर इलाके में पुलिस बल तैनाती भी की गई थी, लेकिन हालात बिगड़ने के बाद भी पुलिस को स्थिति नियंत्रित करने में खासी मशक्कत करनी पड़ी.

April 16th 2019, 10:49 pm

जलियांवाला बाग की घटना पर ब्रिटिश उच्चायुक्त ने जताया खेद, लिखा…..

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नई दिल्ली. जलियांवाला बाग नरसंहार की घटना को 100 साल पूरे हो गए हैं. इस मौके पर ब्रिटेन सरकार की ओर से एक बार फिर खेद जताया गया है. हालांकि ब्रिटेन ने इस घटना के लिए आधिकारिक तौर पर माफी नहीं मांगी है. ब्रिटेन ने एक बार फिर इसे शर्मनाक घटना बताया है.

भारत में ब्रिटिश उच्‍चायुक्‍त डोमिनिक एक्‍यूथ ने जलियांवाला बाग स्मारक में पहुंचकर नरसंहार में बलिदान हुतात्माओं को श्रद्धांजलि अर्पित की. उन्होंने जलियांवाला बाग स्मारक की विजिटर बुक में लिखा – 100 साल पहले हुई यह घटना भारत और ब्रिटेन के इतिहास की शर्मनाक घटना थी. इस त्रासदी व इससे हुई पीड़ा के लिए हमें बेहद खेद है………

प्रधानमंत्री ने भी जलियांवाला बाग घटना के बलिदानियों को याद किया. उन्होंने ट्विटर पर लिखा – ‘आज, जब हम जलियांवाला बाग में हुए भयावह नरसंहार के 100 वर्षों को देखते हैं, तो भारत उस घातक दिन बलिदान हुए सभी लोगों को श्रद्धांजलि देता है. उनकी वीरता और बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा. उनकी स्मृति हमें उस भारत के निर्माण के लिए और भी ज्यादा मेहनत करने के लिए प्रेरित करती है, जिस पर उन्हें गर्व होता.’

 

April 13th 2019, 7:53 am

जलियांवाला बाग नरसंहार – जब कांग्रेस ने केवल राजनीतिक लाभ उठाने का ही प्रयास किया

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अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 34वां अधिवेशन अमृतसर में बुलाया गया था. पहले दिन यानि 27 दिसंबर, 1919 को मोतीलाल नेहरू अपने अध्यक्षीय भाषण दिया, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश शासन की शान में खूब तारीफ की. उस दौरान जॉर्ज फ्रेडेरिक (V) यूनाइटेड किंगडम के राजा और भारत के सम्राट कहे जाते थे. उनके उत्तराधिकारी प्रिंस ऑफ़ वेल्स, एडवर्ड अल्बर्ट (VIII) का 1921 में भारत दौरा प्रस्तावित था. अधिवेशन में मोती लाल ने सर्वशक्तिमान भगवान से प्रार्थना करते हुए भारत की समृद्धि और संतोष के लिए एडवर्ड की बुद्धिमानी और नेतृत्व की सराहना की. हालाँकि वे राजनीतिक आज़ादी की मांग तो कर रहे थे, लेकिन उन्होंने ब्रिटिश शासन की उदारता और अपनी निष्ठा का भी जिक्र किया. इस किस्से को याद किया जाना इसलिए जरुरी है क्योंकि 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर में ही जलियांवाला बाग नरसंहार हुआ था.

एक तरफ मोतीलाल ब्रिटिश साम्राज्य की स्तुति कर रहे थे तो ब्रिटिश संसद में डायर को क्षमता वाला अधिकारी बताया जा रहा था. 19 जुलाई, 1920 के इस एक प्रस्ताव में कहा गया है कि डायर ने कुशलता और मानवता के गुणों से अत्यंत प्रभावित किया है. ब्रिटेन का यह नजरिया क्रूरता और फासीवाद का उदाहरण था. इससे भी खतरनाक और शर्मनाक था कि कांग्रेस ने इस प्रस्ताव पर कोई प्रतिक्रिया तक नहीं दी.

कांग्रेस अमृतसर अधिवेशन का मकसद नरसंहार से राजनीतिक फायदा उठाना था. दरअसल कांग्रेस के एक सदस्य ने अमृतसर के उप-आयुक्त को पत्र लिखकर सुझाव दिया कि अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन दोनों के हितों के लिए जरुरी है. उस कांग्रेस सदस्य ने लिखा है कि अगर ब्रिटिश सरकार कांग्रेस को अधिवेशन की अनुमति देती है तो इससे जनता के बीच सरकार की छवि में सुधार होगा. (भारत का राष्ट्रीय अभिलेखागार, गृह राजनैतिक, जनवरी 1920/77).

कांग्रेस उन खूनी धब्बों से ब्रिटिश सरकार को बचा रही थी, जिनके निशान आज तक अमृतसर में मौजूद हैं. ब्रिटिश सरकार ने 1920 में डिसऑर्डर इन्क्वायरी कमेटी की रिपोर्ट प्रकाशित की. जिसमें बताया गया है कि 13 अप्रैल, 1919 को 5000 से ज्यादा लोग वहां मौजूद थे. डायर के साथ 90 लोगों की फौज थी, इनमें 50 के पास राइफल्स और 40 के पास खुखरी (छोटी तलवार) थी. बिना चेतावनी के वे लोग लगातार 10 मिनट तक गोलियां चलाते रहे. इस घटना के बाद डायर ने लिखित में बताया कि जितनी भी गोलियां चलाई गईं वह कम थीं. अगर उसके पास पुलिस के जवान ज्यादा होते तो जनहानि भी अधिक होती.

इस नरसंहार में कितने लोग शहीद हुए इसकी आज तक कोई ठोस जानकारी नहीं है. राष्ट्रीय अभिलेखागार में गृह (राजनीतिक) की फाइल संख्या23-1919 में इस संबंध में जानकारी दी गयी है. इस फाइल के अनुसार एक ब्रिटिश अधिकारी जे.पी. थोमसन ने एच.डी. क्रैक को 10 अगस्त, 1919 को पत्र लिखा – “हम इस स्थिति में नहीं हैं, जिसमें हम बता सकें कि वास्तविकता में जलियांवाला बाग में कितने लोग मारे गए. जनरल डायर ने मुझे एक दिन बताया कि यह संख्या 200 से 300 के बीच हो सकती है. उसने यह भी बताया कि उसके फ्रांस के अनुभव के आधार पर 6 राउंड शॉट से एक व्यक्ति को मारा जा सकता है.” उस दिन कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गयी थीं. इस प्रकार उस अनुमान के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने 291 लोगों के मारे जाने की पुष्टि कर दी. हालाँकि, डिसऑर्डर इन्क्वायरी कमेटी ने तो 379 लोगों की जान और इसके तीन गुना लोग घायल होने की बात कही है. पंडित मदन मोहन मालवीय ने जलियांवाला बाग का दौरा किया था. उन्होंने कहा था मरने वालों की संख्या 1000 से अधिक है.

मोतीलाल नेहरू के बाद उनके बेटे जवाहरलाल नेहरू ने भी जलियांवाला बाग नरसंहार को कांग्रेस का एक उपक्रम बनाया. स्वतंत्रता के बाद जलियांवाला बाग ट्रस्ट को वैधानिक रूप दिया जाना प्रस्तावित था. प्रधानमंत्री नेहरू चाहते थे कि इसका विधेयक संसद के समक्ष प्रस्तुत न करके मंत्रिमंडल से ही पारित हो जाए. वे 11 मार्च, 1950 को लिखते हैं – “मैं चाहता हूं कि इस विधेयक के मसौदे को जलियांवाला बाग मैनेजिंग कमिटी की बैठक में रखा जाए. उसके बाद, मुझे उसकी प्रति भेज दें. तब विधेयक को मंत्रिमंडल के समक्ष मंजूरी के लिए पेश किया जाएगा. जाहिर है इसे संसद के वर्तमान सेशन में नहीं रखा जा सकता, लेकिन यह मंत्रिमंडल द्वारा पारित कराया जाएगा.” (भारत का राष्ट्रीय अभिलेखागार, गृह मंत्रालय, 16(11)-51 Judicial).

विधेयक के मसौदे पर एक भ्रम फैलाया जाता है कि इसे डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने तैयार किया था. दरअसल इसका मसौदा कांग्रेस के ही एक सदस्य टेकचंद ने बनाया था. आंबेडकर के पास तो यह समीक्षा के लिए 24 मार्च, 1950 को भेजा गया था. कुछ मामूली सुझावों के साथ उन्होंने इसे वापस भेज दिया. जलियांवाला बाग मेमोरियल ट्रस्ट बिल, 1950 में नेहरू के साथ सरदार पटेल भी न्यासी थे. एक्स-ऑफिसियो में पंजाब के राज्यपाल, पंजाब के मुख्यमंत्री और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष को रखा गया. इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार द्वारा पहले चार लोगों को नामांकित किया जा सकता था, लेकिन अंत में यह संख्या तीन कर दी गई. इसके न्यासी जीवनभर के लिए पदाधिकारी बनाए गए. आखिरकार, नेहरू ने संसद के समक्ष 07 दिसंबर, 1950 को यह विधेयक प्रस्तुत किया गया. तब तक सरदार पटेल बेहद अस्वस्थ हो गए थे. उनके स्थान पर पहले राजकुमारी अमृतकौर के नाम पर विचार किया गया. बाद में नेहरू के सुझाव पर डॉ. सैफुद्दीन किचलू को न्यासी बनाया गया.

कांग्रेस ने इस पूरे मामले में अलोकतांत्रिक रवैया अपनाया. किसी अन्य दल और सामाजिक एवं राजनीतिक व्यक्ति से इस सन्दर्भ में चर्चा तक नहीं की. शुरुआत में विधेयक को संसद में न लाकर मंत्रिमंडल से ही पारित किया जाना था. बाद में नेहरू ने इसे संसद के समक्ष रखा तो इसमें सभी सदस्य कांग्रेस के ही थे. कांग्रेस का जो भी अध्यक्ष होगा, वह ट्रस्ट का सदस्य होगा. यह नियम 1951 से लागू था, जिसे भारत सरकार ने 2018 में बदल दिया.

देवेश खंडेलवाल

April 12th 2019, 7:25 pm

13 अप्रैल / इतिहास स्मृति – अंग्रेजों के अत्याचारों की पराकाष्ठा “जलियांवाला बाग नरसंहार”

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नई दिल्ली. भारत की स्वतन्त्रता के लिये संघर्ष के गौरवशाली इतिहास में अमृतसर के जलियाँवाला बाग का अप्रतिम स्थान है. इस आधुनिक तीर्थ पर हर देशवासी का मस्तक उन वीरों की याद में स्वयं ही झुक जाता है, जिन्होंने अपने रक्त से भारत की स्वतन्त्रता के पेड़ को सींचा.

13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी का पर्व था. इसे पूरे देश में ही मनाया जाता है, पर खालसा पन्थ की स्थापना का दिन होने के कारण पंजाब में इसका उत्साह देखते ही बनता है. इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं, लोग पवित्र नदियों में स्नान कर पूजा करते हैं. सन् 1919 में इस पर्व पर वातावरण दूसरा ही था. इससे पूर्व अंग्रेज सरकार ने भारतीयों के दमन के लिए ‘रौलट एक्ट’ का उपहार दिया था. इसी के विरोध में एक विशाल सभा अमृतसर के जलियाँवाला बाग में आयोजित की गयी थी.

यह बाग तीन ओर से दीवार से घिरा था और केवल एक ओर से ही आने-जाने का बहुत छोटा सा मार्ग था. सभा की सूचना मिलते ही जनरल डायर अपने 90 सशस्त्र सैनिकों के साथ वहाँ आया और उसने उस एकमात्र मार्ग को घेर लिया. इसके बाद उसने बिना चेतावनी दिये निहत्थे स्त्री, पुरुष, बच्चों और वृद्धों पर गोली चला दी. गोलियों की वर्षा 10 मिनट तक होती रही. सरकारी रिपोर्ट के अनुसार इसमें 379 लोग मरे गए तथा 1,208 घायल हुए. पर, वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है. सैकड़ों लोग भगदड़ में दब कर कुचले गये और बड़ी संख्या में लोग बाग में स्थित कुएँ में गिर कर मारे गये.

इस नरसंहार के विरोध में पूरे देश का वातावरण गरम हो गया. इसके विरोध में पूरे देश में धरने और प्रदर्शन हुए. सरकारी जाँच समिति ‘हंटर कमेटी’ के सामने इस कांड के खलनायक जनरल डायर ने स्वयं स्वीकार किया कि ऐसी दुर्घटना इतिहास में दुर्लभ है. जब उससे पूछा गया कि उसने ऐसा क्यों किया? तो उसने कहा कि उसे शक्ति प्रदर्शन का यह समय उचित लगा.

उसने यह भी कहा कि यदि उसके पास गोलियाँ समाप्त न हो गयी होतीं, तो वह कुछ देर और गोली चलाता. वह चाहता था कि इतनी मजबूती से गोली चलाए, जिससे भारतीयों को फिर शासन का विरोध करने की हिम्मत न हो. उसने इसके लिए डिप्टी कमिश्नर की आज्ञा भी नहीं ली थी. जब उससे पूछा गया कि उसने गोली वर्षा के बाद घायलों को अस्पताल क्यों नहीं पहुँचाया, तो उसने लापरवाही से कहा कि यह उसका काम नहीं था. विश्व विख्यात कवि रवीन्द्र नाथ जी ने इस नरसंहार के विरोध में अंग्रेजों द्वारा प्रदत्त ‘सर’ की उपाधि लौटा दी.

भारी विरोध से घबराकर शासन ने 23 मार्च, 1920 को जनरल डायर को बर्खास्त कर इंग्लैंड भेज दिया, जहां अनेक शारीरिक व मानसिक व्याधियों से पीड़ित होकर 23 जुलाई, 1927 को उसने आत्महत्या कर ली. इस घटना के समय पंजाब में माइकेल ओडवायर गवर्नर था. जनरल डायर के सिर पर उसका वरदहस्त रहता था. 28 मई, 1919 को गवर्नर पद से मुक्त होकर वह भी इंग्लैंड चला गया. वहाँ उसके प्रशंसकों ने उसे सम्मानित कर एक अच्छी धनराशि भेंट की. उसने भारत के विरोध में एक पुस्तक भी लिखी.

पर, भारत माँ वीर प्रसूता है. क्रान्तिवीर ऊधमसिंह ने लन्दन के कैक्सटन हॉल में 13 मार्च, 1940 को माइकेल ओडवायर के सीने में गोलियां उतार कर इस राष्ट्रीय अपमान का बदला लिया. इस बाग में दीवारों पर लगे गोलियों के निशान आज भी उस क्रूर जनरल डायर की याद दिलाते हैं, जबकि वहाँ स्थित अमर शहीद ज्योति हमें देश के लिए मर मिटने को प्रेरित करती है.

April 12th 2019, 3:52 pm

स्वतंत्रता संग्राम में सामूहिक आत्मबलिदान का अनुपम प्रसंग

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इतिहास साक्षी है कि भारत की स्वतंत्रता के लिए भारतवासियों ने गत 1200 वर्षों में तुर्कों, मुगलों, पठानों और अंग्रेजों के विरुद्ध जमकर संघर्ष किया है. एक दिन भी परतंत्रता को स्वीकार न करने वाले भारतीयों ने आत्मबलिदान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. मात्र अंग्रेजों के 150 वर्षों के कालखंड में हुए देशव्यापी स्वतंत्रता संग्राम में लाखों बलिदान दिए गए. परन्तु अमृतसर के जलियांवाला बाग में हुए सामूहिक आत्मबलिदान ने अनगिनत क्रांतिकारियों को जन्म देकर अंग्रेजों के ताबूत का शिलान्यास कर दिया.

जलियांवाला बाग़ का वीभत्स हत्याकांड जहां अंग्रेजों द्वारा भारत में किये गये क्रूर अत्याचारों का जीता जागता प्रमाण है. वहीं भारतीयों द्वारा दी गयी असंख्य कुर्बानियों और आजादी के लिए तड़पते जज्बे का भी एक अनुपम उदाहरण है. कुछ एक क्षणों में सैकड़ों भारतीयों के प्राणोत्सर्ग का दृश्य तथाकथित सभ्यता और लोकतंत्र की दुहाई देने वाले अंग्रेजों के माथे पर लगाया गया ऐसा कलंक है जो कभी भी धोया नहीं जा सकता. यद्यपि इंग्लैण्ड की वर्तमान प्रधानमंत्री ने इस घटना के प्रति खेद तो जताया है, लेकिन क्षमायाचना किसी ने नहीं की.

अंग्रेजों को उखाड़ फैंकने के लिए अखिल भारत में फैल रही क्रांति को कुचलने के लिए ब्रिटिश हुकूमत द्वारा अनेक काले कानून बनाए जा रहे थे. स्वतंत्रता सेनानियों की आवाज़ को सदा के लिए खामोश करने के उद्देश्य से अंग्रेज सरकार ने रोलेट एक्ट बनाया. इस कानून का सहारा लेकर राजद्रोह के शक में किसी को भी गिरफ्तार करके जेल में डालना आसान हो गया था. भारत में बढ़ रही राजनीतिक और क्रान्तिकारी गतिविधियों को दबाने के लिए रोलेट एक्ट में कथित राजद्रोही को अदालत में जाकर अपना पक्ष रखने का कोई अधिकार नहीं था. बिना चेतावनी दिए लाठीचार्ज और गोलीबारी का अधिकार पुलिस और सेना को दे दिया गया था. ये रोलेट एक्ट 1919 में ब्रिटेन की सरकार ने वहां की इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में एक प्रस्ताव के माध्यम से पारित किया था.

इस कानून के खिलाफ सारे देश में आक्रोश फ़ैल गया. प्रदर्शनों और विरोध सभाओं की झड़ी लग गयी. अनेक नेता और स्वतंत्रता सेनानी कार्यकर्ता गिरफ्तार करके बिना मुकदमा चलाए जेलों में डाल दिए गए. अमृतसर के दो बड़े सामाजिक नेता डॉ. सत्यपाल और डॉ. सैफुद्दीन किचलू जब गिरफ्तार कर लिए गए तो अमृतसर समेत पूरे पंजाब में अंग्रेजों के विरुद्ध रोष फैल गया. उन दिनों 13 अप्रैल  1919 को वैशाखी वाले दिन पंजाब भर के किसान अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में वैशाखी स्नान करने के लिए एकत्र हुए थे. इसी दिन जलियांवाला बाग़ में एक विरोध सभा का आयोजन हुआ. जिसमें लगभग 20 हजार लोग उपस्थित थे. ये सभा काले कानून रोलेट एक्ट को तोड़कर हो रही थी. पंजाब के अंग्रेज गवर्नर जनरल माइकल ओ ड्वायर के आदेश से जनरल डायर के नेतृत्व वाली ब्रिटिश इंडियन आर्मी ने जलियांवाले बाग को घेर लिया और बिना चेतावनी के गोलीवर्षा शुरू कर दी.

आधुनिक इतिहासकार प्रो. सतीश चन्द्र मित्तल ने अपनी पुस्तक कांग्रेस – अंग्रेज भक्ति से राजसत्ता तक के पृष्ठ 56 पर ऐतिहासिक तथ्यों सहित लिखा है – “1857 ईस्वी के महासमर के पश्चात् भारतीय इतिहास में पहला क्रूर तथा वीभत्स नरसंहार 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग़ में हुआ. रोलेट एक्ट के विरोध की प्रतिक्रिया स्वरुप ब्रिटिश सरकार ने उसका बदला 11 अप्रैल को जनरल डायर को बुलाकर तथा वैशाखी के पर्व पर जलियांवाला बाग़ में सीधे पंजाब के कृषकों एवं सामान्य जनता पर 1650 राउंड गोलियों की बौछार करके किया. ये गोलियां सूर्य छिपने से पूर्व 6 मिनट तक चलती रहीं….. सभी नियमों का उल्लंघन करके गोलियां उस ओर चलाई गईं, जिस ओर भीड़ सर्वाधिक थी. हत्याकांड योजनापूर्वक था. जनरल डायर के अनुसार उसे गोली चलाते समय ऐसा लग रहा था, मानो फ्रांस के विरुद्ध किसी मोर्चे पर खड़ा हो. गोलियों के चलने के पूर्व एक हवाई जहाज उस स्थान का चक्कर लगा रहा था .”

इस सभा में लगभग 20 हजार लोग उपस्थित थे. गोलियां तब तक चलती रहीं, जब तक ख़त्म नहीं हुई. सरकारी संशोधित आंकड़ों के अनुसार 379 व्यक्ति मारे गए तथा लगभग 1200 घायल हुए. इम्पीरियल काउंसिल में महामना मदन मोहन मालवीय ने मरने वाले लोगों की संख्या 1000 से अधिक बताई. स्वामी श्रद्धानन्द ने गाँधी जी को लिखे पत्र में मरने वाले लोगों की संख्या 1500 से 2000 बताई.

जलियांवाले बाग़ में एक कुआं था जो आज भी है. इसी कुएं में कूदकर 250 से ज्यादा लोगों ने अपनी जान दे दी थी. इस हत्याकांड के बाद रात्रि आठ बजे अमृतसर में कर्फ्यू लगा दिया गया था. पूरे पंजाब में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया.

इतने भयंकर हत्याकांड के बाद भी अंग्रेज शसकों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी. अनेकों निरपराध सत्याग्रहियों को जेलों में ठूस दिया गया. अमृतसर में बिजली और पानी की सप्लाई बंद कर दी गयी. लोगों को मार्शल लॉ का निशाना बनाया गया. बाहर से आने वाले समाचार पत्र बंद कर दिए गए. पत्रों के संपादकों पर झूठे मुकदमे बनाकर उन्हें एक-एक, दो-दो वर्षों की सजा दी गई. अमृतसर, लाहौर इत्यादि स्थानों पर मार्शल लॉ के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए. अंग्रेज सरकार ने 852 व्यक्तियों पर झूठे आरोप लगाए. इनमें 581 लोगों को दोषी घोषित किया गया. दोषियों में 108 को मौत की सजा, 265 को जीवन भर के लिए देश निकाला तथा अन्य सजाएं दी गईं. लोगों को बंद रखने के लिए लोहे के पिंजरे भी बनवाए गए. सम्पूर्ण पंजाब कई महीनों तक शेष भारत से कटा रहा.

जलियांवाले बाग का नरसंहार भारत में चल रहे स्वतंत्रता संग्राम में एक परिवर्तनकारी घटना साबित हुई. पूरे देश में सशस्त्र क्रान्तिकारी सक्रिय हो गए. प्रतिक्रियास्वरूप रविन्द्र नाथ ठाकुर ने अपनी नाईटहुड की उपाधि वापस कर दी. बालक सरदार भगत सिंह ने जालियांवाले बाग़ की रक्तरंजित मिट्टी को उठाकर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ने का प्रण किया. इस नरसंहार के लिए जिम्मेदार गवर्नर ओ ड्वायर को 21 साल बाद 1940 में सरदार उधम सिंह ने इंग्लैण्ड में जाकर गोलियों से भून दिया.

प्रत्येक वर्ष जलियाँवाले बाग़ में बलिदानियों की स्मृति में श्रद्धांजलि कार्यक्रमों का आयोजन होता है.

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले

वतन पर मिटने वालों का यही बाक़ी निशां होगा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने इस ऐतिहासिक प्रेरणादायी बलिदान के शताब्दी वर्ष पर एक प्रस्ताव पारित करके देशवासियों का आह्वान किया है – “हम सबका यह कर्तव्य है कि बलिदान की यह अमरगाथा देश के हर कोने तक पहुंचे. हम सम्पूर्ण समाज से यह आह्वान करते हैं कि इस ऐतिहासिक अवसर पर अधिकाधिक कार्यक्रमों का आयोजन कर इन पंक्तियों को सार्थक करें.”

तुमने दिया देश को जीवन देश तुम्हें क्या देगा ?

अपनी आग तेज रखने को नाम तुम्हारा लेगा

नरेंद्र सहगल

April 12th 2019, 9:42 am

आर्टिकल 35A – सुप्रीम कोर्ट में याचिका, पीड़ित बाल्मीकि समाज ने विधानसभा चुनाव में वोटिंग अधिकार मां

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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट में जम्मू कश्मीर से जुड़े संविधान के आर्टिकल 35A को हटाने की मांग को लेकर पहले से केस लंबित है. जिसकी सुनवाई की तारीख अभी तक तय नहीं हो पाई है. लेकिन इस बीच जम्मू में बसे बाल्मीकि समाज ने एक और याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की है. जिसमें आर्टिकल 35A को हटाने की मांग की गयी है. जम्मू के गांधीनगर एरिया में बाल्मीकि कॉलोनी निवासी अजीत कुमार, कौशल्या, नीलम, इंद्रजीत सिंह, कुलविन्दर और सूरज इसमें याचिकाकर्ता हैं. हालांकि इस याचिका की लिस्टिंग अभी तक नहीं हो पाई है. उनका कहना है कि आर्टिकल की आड़ में वर्षों से उनके साथ भेदभाव हो रहा है. उनके अधिकार सीमित हैं.  लोकसभा चुनाव में तो मतदान कर सकते हैं, लेकिन विस चुनावों में मतदान का अधिकार नहीं है.

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से जम्मू कश्मीर विधानसभा में वोटिंग का अधिकार देने की मांग की है. गौरतलब है कि जम्मू कश्मीर के संविधान के अनुसार स्टेट सब्जेक्ट को ही राज्य विधानसभा में वोट देने का अधिकार है. क्योंकि आर्टिकल 35A के चलते बाल्मीकि समाज के लोगों को अभी तक परमानेंट रेज़िडेंट सर्टीफिकेट नहीं मिल सका है. जिसके चलते पिछले 60 साल से करीब 500 परिवारों को राज्य की विधायिका के लिए वोट के अधिकार से वंचित रखा गया है. देश के नागरिक होने के नाते इन लोगों को लोकसभा चुनाव में वोट देने अधिकार प्राप्त है. लेकिन राज्य में नहीं… जिसमें सबसे बड़ी बाधा आर्टिकल 35A है.

April 12th 2019, 6:27 am

जॉन दयाल को कोर्ट से सम्मन जारी, 22 अप्रैल को कोर्ट में पेश होना पड़ेगा

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समाचार चैनल के कार्यक्रम में संघ पर लगाए थे आधारहीन व गलत आरोप

मुंबई (विसंकें). ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन के अध्यक्ष जॉन दयाल के खिलाफ न्यायालय ने सम्मन जारी किया है. जॉन दयाल को 22 अप्रैल को न्यायालय में पेश होना पड़ेगा. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर आधारहीन आरोप लगाने तथा अनर्गल बयान देने पर मानहानि मामला दर्ज करवाया गया है. एक कार्यकर्ता विवेक चंपानेरकर की ओर से अधिवक्ता आदित्य मिश्रा ने न्यायालय में याचिका दायर की है.

12 जुलाई 2018 को एक समाचार चैनल पर डिबेट में ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन के अध्यक्ष जॉन दयाल भी प्रतिभागी थे. इस डिबेट के दौरान जॉन दयाल ने RSS Kills अर्थात् संघ ने लोगों को मारा, तथा RSS Killed Gandhi अर्थात् आरएसएस ने गांधी की हत्या की, जैसे गलत एवं आधारहीन आरोप संघ पर लगाए थे. जिस कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की समाज में प्रतिष्ठा को आघात पहुंचा है, साथ ही संघ का  स्वयंसेवक होने के नाते उनकी प्रतिष्ठा भी धूमिल हुई है. इन बयानों को आधार बनाते हुए विवेक चंपानेरकर ने अधिवक्ता के माध्यम से न्यायालय मानहानि का केस दायर किया है. न्यायालय में डिबेट का 42 मिनट का वीडियो लिंक सबूत के रूप में प्रस्तुत किया है.

यह पहला मामला नहीं है, जब संघ पर सार्वजनिक मंच से बिना सिर पैर और आधारहीन आरोप लगाया गया है. 2014 लोकसभा चुनावों के दौरान राहुल गांधी ने भिवंडी में संघ पर गांधी जी की हत्या करने का आरोप लगाया था, जिसमें वे केस का सामना कर रहे हैं. इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय तक जाने के बावजूद उन्हें राहत नहीं मिली. वर्ष 2017 में वामपंथी पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के पश्चात् सीताराम येचुरी और राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि – ‘संघ विचार और संघ कार्यकर्ताओं ने गौरी लंकेश की हत्या की है’, इस अनर्गल आरोप पर भी दोनों के खिलाफ अधिवक्ता धृतिमान जोशी ने मानहानि का केस न्यायालय में दायर किया है.

April 11th 2019, 9:57 am

हम सभी लोकतंत्र के महापर्व में बढ़ चढ़कर हिस्सा लें – श्रीनिवास जी

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शिमला. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद विवि इकाई द्वारा आयोजित वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रम अभिनंदन विवि सभागार में सम्पन्न हुआ. इस मौके पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री श्रीनिवास जी ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की. कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. लोकेंद्र शर्मा ने की.

डॉ. लोकेंद्र शर्मा ने कहा कि 09 जुलाई 1949 से लेकर आज तक निरन्तर प्रवाह के साथ गतिमान विद्यार्थी परिषद ने अपने रचनात्मक दृष्टिकोण से समाज व देश में अपने आप को अन्य छात्र संगठनों से अलग एक आंदोलन के तौर पर स्थापित किया  है. एक रचनात्मक दृष्टिकोण से अपनी सभ्यता संस्कृति को जोड़ते हुए देश की एकता-अखंडता के लिए कार्य किया है.

मुख्यातिथि श्रीनिवास जी ने कहा कि सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामयः तथा वसुधैव कुटुम्बकम के मंत्र पर चलते हुए परिषद ने अपनी संस्कृति को संजोने का कार्य किया है. भारत माता की रक्षा में अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले वीरों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि यह कार्यक्रम जिसका शीर्षक अभिनदंन तय किया है, यह सभी वीरों के लिए एक छोटी सी श्रद्धांजलि है. यह कार्यक्रम देश के बलिदानियों को समर्पित है.

उन्होंने कहा कि अभी देश में लोकतंत्र का महापर्व चल रहा है, तो इस देश के युवाओं का कर्तव्य बनता है कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को सर्वोपरि मानते हुए महापर्व में बढ़ चढ़कर हिस्सा लें. विद्यार्थी परिषद ने पूरे देश में Nation Frist, Voting Must की टैगलाइन के साथ शत प्रतिशत मतदान के लिए अभियान चलाया है, जिससे लोकतंत्र को सुदृढ़ किया जा सके. छात्रों को शपथ दिलाते हुए कहा कि हम सब अपने अपने मतदान केंद्र पर जाकर वोट करेंगे. हम स्वयं कहीं भी रहें, लेकिन हमारे दिलों में भारत रहना चाहिए, ये देश रहना चाहिए.

April 11th 2019, 8:42 am

‘जहां अशिक्षा, अंधकार है, वहां ज्ञान के दीप जलाएं’ लक्ष्य के साथ पुस्तक मेले का आयोजन

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जहां अशिक्षा, अंधकार है, वहां ज्ञान के दीप जलाएं

स्नेह भरी अनुपम शैली से, संस्कार की ज्योति जगाएं.

इस ध्येय वाक्य का अनुसरण करते हुए शेखावाटी अंचल के मुख्य नगर सीकर में पहली बार ज्ञान गंगा पुस्तक मेले का आयोजन किया गया. पुस्तक मेला 06 से 08 अप्रैल तक चला, जिसमें 18 प्रकाशकों ने अपनी पुस्तकें बिक्री के लिए रखीं.

मेले का उद्घाटन रेवासा पीठ के अग्र पीठाधीश्वर पूज्य राघवाचार्य जी महाराज ने किया. इस अवसर पर साहित्यकार तेजसिंह राठौड़ विशिष्ट अतिथि तथा बाबूलाल अध्यक्ष के रूप में उपस्थित थे. मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राजस्थान के सह क्षेत्र प्रचारक निम्बाराम ने मार्गदर्शऩ किया.

कार्यक्रम का उद्देश्य सद्साहित्य को समाज के हर आयु वर्ग तक पहुंचाना एवं उनमें पढ़ने की रुचि जागृत करना था, इस हेतु सभी विद्यालयों, उच्च शिक्षण संस्थानों एवं समाजसेवी संस्थाओं से भी सम्पर्क कर उनकी अधिक से अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने के प्रयास किया गया.

पुस्तक मेले के दौरान उद्घाटन एवं समापन सत्र के अलावा सात वैचारिक एवं चर्चात्मक सत्रों का आयोजन किया गया. जिनमें राष्ट्रीय सुरक्षा, भविष्य का भारत, वैचारिक असहिष्णुता, कौन हैं अर्बन नक्सल, राजस्थानी एवं बाल साहित्य, भारत में विज्ञान की परम्परा एवं स्वाभिमानी समाज निर्माण में साहित्य की भूमिका जैसे विषयों पर विशेषज्ञों से चर्चा हुई. इसके अतिरिक्त रविवार को लेखन कार्यशाला का भी आयोजन किया गया. जिसमें लेखन की बारीकियों का प्रशिक्षण दिया गया.

विभिन्न सत्रों में विद्वतजनों, लेखकों, साहित्यकारों, पत्रकारों व पैनलिस्टों की भागीदारी रही. समापन सत्र में वरिष्ठ पत्रकार अजय सेतिया ने मुख्य वक्ता के रूप में विचार रखे. सत्र की अध्यक्षता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राजस्थान क्षेत्र के क्षेत्र प्रचारक दुर्गादास जी ने की. उपस्थित जनसमूह को पूज्य श्री रमणनाथ जी महाराज का पावन सान्निध्य मिला. मेले में दो पुस्तकों व नूतन वर्ष के पंचाग का विमोचन भी किया गया.

April 11th 2019, 6:29 am

सरसंघचालक तथा सरकार्यवाह ने नागपुर में किया मतदान

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नागपुर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी तथा सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ने आज सुबह मताधिकार का उपयोग किया. दोनों ने सुबह सात बजे स्थानीय भाऊजी दफ्तरी पाठशाला स्थित मतदान केंद्र में जाकर मतदान किया.

लोकसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान आज सुबह सात बजे से शुरू हो गया है. इसके तहत देश में कुल 91 सीटों पर मतदान हो रहा है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) चुनाव को प्रजातंत्र का उत्सव मानता है. संघ के सभी वरिष्ठ पदाधिकारी मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं. सभी को मताधिकार के प्रयोग का दायित्व निभाना चाहिए, ऐसा संघ का मानना है.

मतदान 100 प्रतिशत हो – डॉ. मोहन भागवत

मतदान करने के बाद सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि मतदान करना हर नागरिक की जिम्मेदारी है. प्रजातंत्र को मजबूत बनाने के लिए देश में सभी को मतदान करना चाहिए, ऐसा चुनाव आयोग कहता है. चुनाव आयोग की इस बात से हम सहमत हैं. हम देशवासियों से आग्रह करते हैं कि ज्यादा से ज्यादा संख्या में मतदान करें. मतदान 100 प्रतिशत होता है तो यह प्रजातंत्र की जीत है. इस अवसर पर सरसंघचालक ने देश में विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और जनकल्याण को ध्यान में रख कर काम करने वाली बहुमत की सरकार बने, ऐसी इच्छा व्यक्त की.

‘नोटा’ कोई विकल्प नहीं’ – भय्याजी जोशी

सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ने देशवासियों सें 100 प्रतिशत मतदान की अपील की. अपना वोट देने के पश्चात् भय्याजी ने कहा कि प्रजातंत्र में चुनाव एक उत्सव की तरह होता है. देशवासियों को इस उत्सव में आगे बढ़कर हिस्सा लेना चाहिए. आप किसी भी पार्टी को वोट दें, लेकिन वोट देना हर एक व्यक्ति का कर्तव्य होता है. ‘नोटा’ के प्रयोग से आपका मत बेकार चला जाता है. इसलिए चुनाव में ‘नोटा’ का प्रयोग कोई बेहतर विकल्प नहीं है. मौजूदा उम्मीदवारों में श्रेष्ठ को चुनना चाहिए.

April 11th 2019, 5:29 am

चंद्रकांत शर्मा पंचतत्व में विलीन, हमले की जांच के लिए पुलिस ने बनाई एसआईटी

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नई दिल्ली. मंगलवार को आतंकियों के हमले में बलिदान हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता चंद्रकांत शर्मा का पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया. किश्तवाड़ में चंद्रकांत की अंतिम यात्रा में उनके पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेटा गया था. कड़ी सुरक्षा में काफी संख्या में स्थानीय लोगों ने अंतिम संस्कार में भाग लिया. इनमें रविन्दर रैना और कविन्द्र गुप्ता भी शामिल थे. डोगरा स्वाभिमान संगठन के नेता लाल सिंह भी अंतिम यात्रा में किश्तवाड़ पहुंचना चाहते थे. लेकिन पुलिस ने उनको डोडा के असार क्षेत्र में हिरासत में ले लिया था.

चंद्रकांत शर्मा की अंतिम यात्रा को देखते हुए जिला प्रशासन ने कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की थी. स्थानीय लोगों के मुताबिक पुलिस एक ड्रोन कैमरे से अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पर नजर रखे हुए थी.

इस बीच किश्तवाड़ शहर में कर्फ्यू लगातार जारी है. साथ ही पूरे क्षेत्र में इंटरनेट सेवा बंद रखी गई है. शहर के चप्पे-चप्पे पर पुलिस और सेना के जवान तैनात हैं.

लोगों में रोष भी बना हुआ है. क्योंकि पुलिस आतंकियों को पकड़ पाने में सफल नहीं हो पाई है. फिलहाल पुलिस ने 10 संदिग्धों को हिरासत में लिया है, जिसमें अस्पताल में काम करने वाले कईं कर्मचारी भी शामिल हैं. जो आतंकी हमले के वक्त अस्पताल में ही थे. दूसरी तरफ आतंकियों को ढूंढने के लिए क्षेत्र में सर्च अभियान भी जारी है. जम्मू कश्मीर पुलिस के मुताबिक इस केस की त्वरित जांच के लिए एक एसआईटी यानि स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम गठित की गयी है.

किश्तवाड़ के डिप्टी कमिश्नर ए.एस. राना के अनुसार शहर में अभी तक किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं है, लेकिन एहतियातन कर्फ्यू जारी रहेगा.

 

April 11th 2019, 5:29 am

चंद्रकांत जी की हत्या राजनीतिक नहीं, हिंदुओं में डर पैदा करने की योजना की कड़ी है

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09 अप्रैल, 2019 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जम्मू कश्मीर के प्रांत सह सेवा प्रमुख चंद्रकांत शर्मा की हत्या किश्तवाड़ में हिंदुओं के बीच दहशत पैदा करने की ताजा कड़ी भर है. यह उन क्षेत्रों में आता है, जहां से पाकिस्तान हिंदुओं को भगाना चाहता है. यह आतंकवाद की कोई अलग-थलग घटना नहीं है जैसी कि मारे गए व्यक्ति की राजनीतिक विचारधारा के कारण लग सकती है. यह क्षेत्र में पहले हुई हत्याओं और किश्तवाड़ में परिहार बंधुओं जैसे अल्पसंख्यक हिंदुओं को चुन-चुन कर मारे जाने से जुड़ी हुई है.

चंद्रकांत शर्मा और उनके निजी सुरक्षा अधिकारी की किश्तवाड़ में हुई हत्या स्थानीय आतंकियों को रणनीतिक सम्पत्तियों के रूप में इस्तेमाल करने की सुविचारित नीति और पाकिस्तान द्वारा संरक्षित आतंकवादी तंत्र के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने की योजना के अनुरूप है.

आतंकवादियों ने 2000-2001 में किश्तवाड़ में हिंदू डोगरों के जातीय और धार्मिक सफाये की योजना बनाई थी. एक महीने से भी कम समय में, उन्होंने तीन नरसंहारों को अंजाम दिया – एक तागुड में (05 लोगों की हत्या), दूसरा पटियामहल में (8 की हत्या) और तीसरा गुलाबगढ़ में- (13 मौतें).

इन नरसंहारों के परिणामस्वरूप हिंदुओं ने पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश की ओर सामूहिक पलायन करना शुरू कर दिया था. उसी समय चंद्रकांत ने ब्रिगेडियर जीडी बख्शी के नेतृत्व में वहां तैनात सेना के साथ मिलकर काम करना शुरू किया था. उन्होंने सेना को उन सामूहिक हत्याओं को अंजाम देने वाले लश्कर समूह की पहचान कर उसे मार गिराने में मदद की थी.

चंद्रकांत ने हिमाचल भाग गए हिंदुओं की वापसी कराने में भी सेना की मदद की थी. ऐसा न हुआ होता तो किश्तवाड़ के डोगरों का भी वही हाल होता जो कश्मीरी पंडितों का कश्मीर में हुआ था. ठोस प्रयासों और नागरिक-सैन्य समन्वय के कारण हिंदुओं की हत्याओं का दौर रुक गया और जो लोग भाग गए थे, वे वापस आ गए.

सेना ने उस दौर में स्थानीय ग्राम रक्षा समितियों के साथ मिल कर जो कुछ भी किया था, उसे बाद के वर्षों में उलटने के प्रयास होने लगे थे. ऐसी स्थिति के पीछे मूल कारण कुछ लोगों द्वारा आतंकवादियों के प्रति नरमी दिखाने का प्रयास करना था.

चंद्रकांत बहुत साहसी थे और उन्होंने आतंकवादियों तथा उन्हें फलने-फूलने का मौका देने वाले पारिस्थितिक तंत्र के खिलाफ अथक लड़ाई लड़ी थी. वह निःसंदेह नायक थे, उनका बलिदान बेकार नहीं जाना चाहिए. किश्तवाड़ क्षेत्र में तैनात बलों को उन लोगों को ढूंढ निकालने और मार गिराने की कोशिश करनी चाहिए, जिन्होंने ऐसा किया है. किश्तवाड़ में 09 अगस्त 2013 को ईद के दिन एक सांप्रदायिक संघर्ष हुआ था. आतंकवाद का मुकाबला करने में सेना के साथ काम करने वाले एक अन्य नेता सुनील शर्मा के निजी सुरक्षाकर्मी को उस दिन निशाना बनाया गया था. बार-बार हो रहे ऐसे प्रयास स्पष्टतः क्षेत्र के हिंदुओं को अपना घर-बार छोड़ने के लिए मजबूर करने के इरादे से किए जा रहे हैं.

संत राम शर्मा

साभार – पाञ्चजन्य

April 11th 2019, 3:40 am

आर्टिकल 370 – शेख अब्दुल्ला की ज़िद पर नेहरू ने संविधान सभा में पास कराया विघटनकारी अनुच्छेद

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न तो शेख अब्दुल्ला और न ही गोपालस्वामी स्थायी है. भारत सरकार की ताकत और हिम्मत पर भविष्य निर्भर करेगा और अगर हमें अपनी ताकत पर भरोसा नहीं होगा, तो हम एक राष्ट्र के रूप में मौजूद नहीं रह पाएंगे – सरदार पटेल

सरदार पटेल नहीं चाहते थे विघटनकारी अनुच्छेद 370

आईसीएस अधिकारी रहे वी. शंकर अपनी किताब ‘माय रेमिनिसेंस ऑफ सरदार पटेल’ में लिखते हैं कि संविधान सभा की सामान्य छवि को सबसे ज्यादा खतरा उस प्रस्ताव से हुआ जो जम्मू-कश्मीर से संबंधित था. इसके जिम्मेदार वे शेख अब्दुल्ला को बताते हैं. शंकर आगे लिखते हैं कि शेख जब जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करने लगे तो गोपालस्वामी आयंगर ने जवाहर लाल नेहरू से इस पर विस्तार से चर्चा की. इसके बाद एक मसौदा तैयार किया गया जिसे भारत की संविधान सभा के समक्ष कांग्रेस द्वारा रखा गया.

यह मसौदा अनुच्छेद 370 (पुराना नाम 306A) का था. अभी तक सरदार पटेल को इस सन्दर्भ में बताया नहीं गया था. उन्हें इसकी जानकारी कांग्रेस कार्यसमिति में लगी, जब आयंगर ने यह प्रस्ताव पेश किया. कांग्रेस में एक मजबूत तबका था, जिसने अन्य रियासतों और जम्मू-कश्मीर के बीच भेदभाव पर नकारात्मक प्रतिक्रिया जताई. भारतीय संघ में एक सीमा के बाद किसी भी प्रकार के प्रस्ताव पर अधिकतर सदस्यों की असहमति थी. सरदार पटेल का भी यही मत था. उन दिनों नेहरू एक महीने के लिए विदेश दौरे पर थे. उनकी अनुपस्थिति में अनुच्छेद 370 को शेख की मनमर्जी के मुताबिक कांग्रेस कार्यसमिति से पारित करवाने की जिम्मेदारी आयंगर के पास थी.

नेहरू के निजी सचिव रहे एम. ओ. मथाई ‘माय डेज विद नेहरु’ में लिखते हैं कि 1949 में ही नेहरू को शेख की अविश्वसनीयता की जानकारी थी. उन्होंने इस मामले को अपने तक ही सीमित रखा, लेकिन सरदार पटेल को शेख की असलियत का अंदाजा था. वे ही अकेले ऐसे शख्स थे, जिन्होंने शेख के आजाद कश्मीर के सपने को हमेशा असफल बनाया. सरदार के हस्तक्षेप के बाद अनुच्छेद 370 का पहला मसौदा 12 अक्तूबर, 1949 को तैयार किया गया था. जिसे शेख ने नामंजूर कर दिया और एक वैकल्पिक मसौदा बनाकर भेज दिया. आयंगर ने कुछ परिवर्तनों (शेख के मुताबिक) के साथ 15 अक्तूबर, 1949 को दूसरा मसौदा शेख को भेजा. उस समय वे दिल्ली में ही थे और इस बार भी उन्होंने उसे नकार दिया.

सरदार पटेल का रुख साफ था. जितना संभव हुआ, उन्होंने अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाने का प्रयास किया. शेख ने भी सरदार पटेल को दरकिनार करने के लिए अभियान छेड़ दिया था. आखिरकार सरदार पटेल इस मामले से पीछे हट गए और आयंगर को 16 अक्तूबर को पत्र लिखा, “इन परिस्थितियों में मेरी सहमति का कोई प्रश्न नहीं बनता. आपको लगता है कि ऐसा करना ही ठीक है तो आप वही कीजिए.” वी. शंकर खुलासा करते हैं कि सरदार ने एक नियम बना लिया था कि वे आयंगर और नेहरू के बीच कभी नहीं आएंगे. किसी भी समस्या के समाधान में दोनों का अपना नजरिया होता था, इसलिए सरदार अपना दृष्टिकोण नहीं रखते थे.

शेख की वास्तविक मांग थी कि भारतीय संसद को जम्मू कश्मीर राज्य के सम्बन्ध में कानून बनाने और अधिमिलन पत्र में उल्लिखित तीन विषयों – सुरक्षा, विदेश मामले और संचार के लिए सीमित कर दिया जाए. शेख ने यह खुलासा 17 अक्तूबर, 1949 को आयंगर को लिखे एक पत्र में किया है. जिसमें उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नेहरू ने इसके लिए उनसे वादा किया था. यह संवैधानिक रूप से संभव ही नहीं था. दरअसल रियासतों के अधिमिलन में एक समान प्रक्रिया अपनाई गई थी.

अधिमिलन पत्र से लेकर भारत की संविधान सभा में शामिल होने तक जम्मू-कश्मीर के साथ वैसा ही व्यवहार किया गया, जैसा अन्य रियासतों के साथ था. आखिरकार भारत की संविधान सभा में 17 अक्तूबर, 1949 को अनुच्छेद 370 प्रस्तुत किया गया. अब तक उसमें कई बदलाव हो चुके थे. आखिरी समय में भी एक परिवर्तन किया गया था. हालाँकि, इस विषय में अंतिम निर्णय से पहले शेख को बताया गया था. शेख इस दिन संविधान सभा में मौजूद थे और उन्हें वह बदलाव पसंद नहीं आया. उसी दिन आयंगर को उन्होंने एक पत्र लिखा और संविधान सभा से त्याग पत्र देने की धमकी दी. वास्तव में, शेख को इस बात की कल्पना नहीं थी कि अंतिम मसौदे में ऐसा कोई परिवर्तन होगा. वे संविधान सभा छोड़कर चले गए और यह मानते रहे कि वह उसी रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, जिस रूप में उनकी स्वीकृति प्राप्त हुई थी. ऐसा हुआ नहीं और अनुच्छेद 370 की धारा 1 की उपधारा ख के स्पष्टीकरण में बदलाव कर दिया गया.

नेहरू और आयंगर के बाद अनुच्छेद 370 के तीसरे और आखिरी समर्थक मौलाना आज़ाद थे. अपनी आत्मकथा ‘इंडिया विन्स फ्रीडम’ में उन्होंने इस अनुच्छेद पर कोई चर्चा तक नहीं की है. उनकी यह किताब साल 1959 में प्रकाशित हुई थी. उनकी यह जिम्मेदारी थी कि वे इस मामले पर विस्तृत चर्चा कर सकते थे. फिलहाल उनकी चुप्पी का मतलब यही लगाया जा सकता है कि वे प्रधानमंत्री नेहरू पर कोई विवाद खड़ा नहीं करना चाहते थे. खैर, इस पूरी प्रक्रिया में कांग्रेस सिर्फ एक ही बात पर एकमत थी, कि यह अनुच्छेद 370 अस्थाई होगा और इसे समाप्त किया जा सकता है.

आयंगर ने भी संविधान सभा में इस पर स्पष्टीकरण दिया है. सरदार तो इस अनुच्छेद के पक्ष में कभी नहीं थे. लेकिन शेख की निजी मांग को नेहरू और उनके सहयोगी ने लगभग पूरा कर दिया. सरदार से जितना हुआ, उन्होंने अनुच्छेद को विफल करने का हर संभव प्रयास किया. वी. शंकर ने सरदार पटेल से पूछा था कि उन्होंने इस बचे हुए अनुच्छेद को भी क्यों पारित होने दिया? इस पर उनका जवाब था कि न तो शेख अब्दुल्ला और न ही गोपालस्वामी स्थायी है. भारत सरकार की ताकत और हिम्मत पर भविष्य निर्भर करेगा और अगर हमें अपनी ताकत पर भरोसा नहीं होगा, तो हम एक राष्ट्र के रूप में मौजूद नहीं रह पाएंगे. यह उनका संदेश था कि अगर सच में हमें अपनी अखंडता को बनाए रखना है तो अनुच्छेद 370 को हटाना ही होगा.

देवेश खंडेलवाल

April 11th 2019, 3:10 am

भय्याजी जोशी ने परीसवेध पुस्तक का विमोचन किया

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 पुणे (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह सुरेश (भय्याजी) जोशी ने कहा कि जैसे गंगा उसमें आने वाली सभी धाराओं को पवित्र करती हैवैसे ही संघ में आने वाला हर व्यक्ति वैचारिक रूप से पवित्र हो जाता है. संघ का पास स्पर्श सभी को हुआ है. परीसवेध पुस्तक संघ से एकरूप होकर सामाजिक कार्य के लिए खड़े रहने वाले सभी के लिए प्रतिनिधिक होगारवींद्र तथा राजाभाऊ मूले द्वारा लिखित और साप्ताहिक विवेक व हिंदुस्तान प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक परीसवेध‘ का विमोचन रविवार (0मार्च) को भय्याजी जोशी ने किया. वे कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 93 वर्ष की यात्रा में सब कुछ न्यौछावर करते हुए व्यक्ति निर्माण के कार्य में खुद को समर्पित करने वाले व्यक्तियों का चित्रण मूले जी ने इस पुस्तक में किया है. इस अवसर पर भय्याजी ने समर्थ भारत वेबसाइट का लोकार्पण भी किया.

मूले जी ने कहा कि जो मैं लिख रहा थावह पाठकों को पसंद आ रहा था. यह ध्यान में आने के बाद प्रोत्साहन मिला. इसके द्वारा व्यक्ति निर्माण के कार्य को समर्पित संघ योद्धाओं के चरित्र शब्दांकित करने का सौभाग्य मुझे मिला.

महेश पोहनकर ने प्रस्तावना रखी. राजाभाऊ की कलम से इस पुस्तक को कैसे आकार दिया गयाइसकी जानकारी उन्होंने दी. चित्र एवं मूर्तिकार प्रमोद कांबले और राजेंद्र वहाडनेचंद्रशेखर कुलकर्णी और मंदार सहस्रबुद्धे का भी सम्मान किया गया. इस अवसर पर हिंदुस्तान प्रकाशन संस्था के अध्यक्ष रमेश पतंगेनानाजी जाधवरवींद्र वंजारवाडकर उपस्थित थे. प्रज्ञा बक्शी ने धन्यवाद ज्ञापन किया.

April 10th 2019, 2:17 pm

समाज की समस्याओं का समाधान समाज में ही मिलेगा – भय्याजी जोशी

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पुणे (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ने कहा कि “संघ को केवल अपने बूते काम नहीं करना है, बल्कि सारे समाज को साथ लेकर चलना है. इस समाज की समस्याओं का समाधान इसी समाज में मिल सकता है, यह संघ का विचार व भूमिका है.” रामकृष्ण पटवर्धन लिखित ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-एक विशाल संगठन’ मराठी पुस्तक का विमोचन 09 अप्रैल को भय्याजी जोशी ने किया. सरकार्यवाह पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे. महाराष्ट्र एजुकेशन सोसायटी (एमईएस) और स्नेहल प्रकाशन ने संयुक्त रूप से कार्यक्रम आयोजित किया था. इस अवसर पर विख्यात उद्यमी एवं काइनेटिक उद्योग के प्रमुख अरुण फिरोदिया तथा एयर मार्शल भूषण गोखले (सेनि.) प्रमुख अतिथि के रूप में उपस्थित थे. भय्याजी जोशी ने कहा कि “समाज में संस्कार स्थापना की सभी पद्धतियों को परे रखकर संघ का काम शुरु हुआ. संघ के काम में कोई औपचारिकता नहीं थी. डॉ. हेडगेवार जी ने हमें कार्य का खाका नहीं दिया, बल्कि केवल लक्ष्य दिया. कैसे करना है, यह नहीं बताया. केवल क्यों करना है, यह बताया.” संघ की विचारधारा को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि “हमसे अक्सर पूछा जाता है कि नाम में राष्ट्रीय होने के बावजूद आप केवल हिंदुओं के लिए क्यों काम करते हैं? इसका कारण यह है कि इस देश में हर चीज के लिए हिंदू जिम्मेदार है. अगर पतन होता है तो वह भी हिंदुओं के कारण और परम वैभव प्राप्त होगा तो वह भी हिंदुओं के कारण. धर्म का रक्षण करने से ही देश परम वैभव को प्राप्त होगा. धर्म और संस्कृति का रक्षण करके ही हमें आगे बढ़ना है. समाज में बदलाव लाना हो तो हर व्यक्ति को ‘मैं ही यह बदलाव लाऊंगा’ यह कहते हुए आगे बढ़ना होगा. हमारे मार्ग हमें ही प्रशस्त करने होंगे. इसलिए समस्याओं के लिए हम जिम्मेदार हैं और उनका निराकरण भी हम ही करेंगे. समाज के विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व देना ही संघ का काम है. संघ के स्वयंसेवक कोई भी कार्य प्रतिस्पर्धा की भावना से नहीं करते.” उन्होंने कहा कि आचार और विचार में विपरीतता का सबसे बड़ा उदाहरण भारत है. हमारा चिंतन श्रेष्ठ है, लेकिन समाज में क्षरण हुआ है. उन्होंने कहा, कि व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया में पूर्ण हिंदू होने का अर्थ है - दर्शन और आचरण एक समान होना. यह संघ की भूमिका है. जयंत रानडे ने कहा कि संघ के लिए सम्मान और उत्सुकता दिखाई देती है. इसलिए रामकृष्ण पटवर्धन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विस्तार कैसे हुआ, उसका कार्य कैसे चलता है. इसका विवेचन प्रबंधन शास्त्र की दृष्टि से किया है. हालांकि केवल प्रबंधन शास्त्र का चश्मा लगाकर यह पुस्तक नहीं लिखी गई, बल्कि लोगों को इसके द्वारा संघ समझाना है. प्रबंधन शास्त्र के अध्येता सारे जग में हैं, इसलिए यह पुस्तक महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. अरुण फिरोदिया ने कहा, “हमारे समाज में व्याप्त अलगाव को अंग्रेजों ने बढ़ावा दिया. इसके लिए हम भी काफी हद तक दोषी हैं. किसी समय में हम विश्व के नेता थे, लोग हमारा अनुकरण करते थे. लेकिन पश्चिमी जगत का अंधानुकरण करते हुए हमने अपना स्वत्व खो दिया है. गरीब लोगों की मदद करना हमारा कर्तव्य है. सहायता करेंगे, तभी हमारा देश संपन्न होगा अन्यथा नहीं.” एअर मार्शल भूषण गोखले ने कहा, “इस तरह की पुस्तकों से युवा पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी. भारतीय संस्कृति और मूल्यों की जानकारी इस पुस्तक से मिलेगी.”

April 10th 2019, 5:29 am

10 अप्रैल / जन्म दिवस – घोष स्वर, लिपि का भारतीयकरण करने वाले सुब्बू श्रीनिवास

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नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शाखा और शाखा में शारीरिक कार्यक्रमों का बड़ा महत्व है. शाखा पर खेल के साथ ही पथ संचलन का अभ्यास भी होता है. जब स्वयंसेवक घोष (बैंड) की धुन पर कदम मिलाकर चलते हैं, तो चलने वालों के साथ ही देखने वाले भी झूम उठते हैं.

घोष विभाग को नया रूप देकर विकास में अपना पूरा जीवन खपा देने वाले श्री सुब्बू श्रीनिवास का जन्म 10 अप्रैल, 1940 को मैसूर (कर्नाटक) में एक सामान्य दुकानदार बीजी सुब्रह्मण्यम तथा शुभम्म के घर में हुआ. सात भाई-बहनों में वे सबसे छोटे थे. अपने बड़े भाई अनंत के साथ 1952 में वे भी शाखा जाने लगे. पढ़ाई में उनका मन बहुत नहीं लगता था. अतः जैसे-तैसे मैट्रिक तक की शिक्षा पूर्ण की. उनकी शाखा में ही बड़ी कक्षा में पढ़ने वाले एक मेधावी छात्र श्रीपति शास्त्री जी भी आते थे, (जो आगे चलकर संघ के केन्द्रीय अधिकारी बने) उनके सहयोग से सुब्बू परीक्षा में उत्तीर्ण होते रहे.

1962 में कर्नाटक प्रांत प्रचारक यादवराव जोशी की प्रेरणा से सुब्बू प्रचारक बने. उनके बड़े भाई अनंत ने यह आश्वासन दिया कि घर का सब काम वे संभाल लेंगे. प्रचारक बनने के बाद उन्होंने क्रमशः तीनों संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण प्राप्त किया. पुणे में 1932 से एक घोष शाखा लगती थी. घोष में रुचि होने के कारण उन्होंने छह माह तक वहां रहकर घोष का सघन प्रशिक्षण लिया और फिर वे कर्नाटक प्रांत के ‘घोष प्रमुख’ बनाये गये.

संघ के घोष की रचनाएं सेना से ली गयी थीं, जो अंग्रेजी ढंग से बजाई जाती थीं. घोष प्रमुख बनने के बाद सुब्बू जी ने इनके शब्द, स्वर तथा लिपि का भारतीयकरण किया. वे देश भर में घूमकर विषय के विशेषज्ञों से मिले. इससे कुछ सालों में ही घोष पूरी तरह बदल गया. उन्होंने अनेक नई रचनाएं बनाकर उन्हें ‘नंदन’ नामक पुस्तक में छपवाया. टेप, सीडी तथा अतंरजाल के माध्यम से क्रमशः ये रचनाएं देश भर में लोकप्रिय हो गयीं.

पथ संचलन में घोष दल तथा उसके प्रमुख द्वारा घोष दंड का संचालन आकर्षण का एक प्रमुख केन्द्र होता है. सुब्बू जी जब तरह-तरह से घोष दंड घुमाते थे, तो दर्शक दंग रह जाते थे. 20-25 फुट की ऊंचाई तक घोष दंड फैंककर उसे फिर पकड़ना उनके लिए सहज था. मुख्यतः शंखवादक होने के बाद भी वे हर वाद्य को पूरी कुशलता से बजा लेते थे.

1962 में श्रीगुरुजी के आगमन पर हुए एक कार्यक्रम में ध्वजारोहण के समय उन्होंने शंख बजाया. उसे सुनकर अध्यक्षता कर रहे पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल करियप्पा ने कहा कि सेना में भी इतना अच्छा स्वर कभी नहीं सुना. सुब्बू जी ने उत्तर प्रदेश में मुरादाबाद, अलीगढ़, मेरठ आदि स्थानों पर कारीगरों के पास घंटों बैठकर घोष दंड तथा वाद्यों में आवश्यक सुधार भी करवाये.

जब घोष विभाग को एक स्वतन्त्र विभाग बनाया गया, तो उन्हें अखिल भारतीय घोष प्रमुख की जिम्मेदारी दी गयी. इससे उनकी भागदौड़ बहुत बढ़ गयी. उन्होंने देश के हर प्रांत में घोष वादकों के शिविर लगाये, इससे कुछ ही वर्षों में हजारों नये वादक और घोष प्रमुख तैयार हो गये.
पर प्रवास की अव्यवस्था, परिश्रम और भागदौड़ का दुष्प्रभाव उनके शरीर पर हुआ और वे मधुमेह तथा अन्य कई रोगों के शिकार हो गये. इसके बाद भी वे प्रवास करते रहे, पर अंततः उनके शरीर ने जवाब दे दिया और 18 जनवरी, 2005 को उनका स्वर सदा के लिए घोष-निनाद में विलीन हो गया.

April 9th 2019, 6:51 pm

माओवादी आतंकियों का कृत्य निंदनीय है

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छत्तीसगढ़ में आज भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान विधायक भीमा मंडावी एवं उनके साथ चार सुरक्षाकर्मियों की माओवादी आतंकियों द्वारा बस्तर में की गई निर्मम हत्या की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कठोर शब्दों में निंदा करता है।

जनजातीय समाज के सुख-दुख में समरस, सादगी और सरलतापूर्ण जीवन एवं आचरण के कारण वे संपूर्ण समाज में अत्यंत लोकप्रिय थे। वे अपने साहसी स्वभाव और देशभक्ति पूर्ण विचारों के कारण माओवादियों की निगाह में सदैव खटकते थे। उनका असमय बलिदान एक ऐसी शून्यता पैदा कर गया, जिसको भरने में राष्ट्रीय शक्तियों को बहुत समय लगेगा।

परिवार के सभी आत्मीय जनों को हार्दिक संवेदनाएं एवं दिवंगत आत्मा को अपने चरणों में स्थान देने के लिए प्रभु से प्रार्थना।

सुरेश (भय्याजी) जोशी

सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

 

April 9th 2019, 1:17 pm

चंद्रकांत जी का बलिदान राष्ट्रभक्तों के लिए अपूरणीय क्षति है – भय्याजी जोशी

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सरकार्यवाह भय्याजी जोशी का वक्तव्य

आज प्रातः जम्मू कश्मीर के किश्तवाड़ में आतंकवादी हमले में संघ के प्रांत सह सेवा प्रमुख चंद्रकांत जी एवं उनके सुरक्षाकर्मी की निर्ममतापूर्वक हत्या की घटना से हम सब बहुत क्षुब्ध और दुःखित हैं। इस कायरता पूर्ण कृत्य की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कठोर निंदा करता है।

वे आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष में डोडा किश्तवाड़ के राष्ट्रभक्त समाज के लिए आशा एवं विश्वास का केंद्र थे। उनका बलिदान संगठन सहित जम्मू कश्मीर के राष्ट्रभक्तों विशेषकर वहाँ के हिन्दू समाज के लिए अपूरणीय क्षति है। प्रभु चरणों में प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को श्री चरणों में स्थान दे एवं परिवार को इस कष्ट को सहने का सामर्थ्य प्रदान करे।

हमारा विश्वास है कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा एवं सभी स्वयंसेवक व समाज उनके जीवन एवं कार्य से प्रेरणा ले, अधिक मजबूती के साथ कार्य करते हुए आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष को निर्णायक परिणिति तक ले जाने में सफल होंगे। हम राज्य प्रशासन से अपेक्षा करते हैं कि वे दोषियों को ढूंढ कर उन्हें इस दुष्कृत्य हेतु शीघ्रातिशीघ्र कठोर दंड दे।

सुरेश (भय्या) जोशी

सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

April 9th 2019, 9:40 am

आतंकी हमले में घायल चंद्रकांत जी का निधन, बुधवार को होगा अंतिम संस्कार

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विनम्र श्रद्धांजलि

नई दिल्ली. किश्तवाड़ में आतंकी हमले में गंभीर रूप से घायल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जम्मू कश्मीर प्रांत के सह सेवा प्रमुख चंद्रकांत शर्मा का जम्मू अस्पताल में निधन हो गया. किश्तवाड़ जिला अस्पताल में चिकित्सा सहायक के पद पर कार्यरत चंद्रकांत शर्मा पर मंगलवार को अस्पताल परिसर में ही आतंकियों ने हमला कर दिया था. जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे. उन्हें जम्मू लाया गया था. उऩकी पार्थिव देह को जम्मू से किश्तवाड़ ले जाया जा रहा है, जहां बुधवार को उनका अंतिम संस्कार होगा.

चन्द्रकांत जी बाल्यकाल से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जुड़े थे. जिला, विभाग कार्यवाह सहित विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते हुए वर्तमान में प्रांत सह सेवा प्रमुख थे. उन्होंने संघ का प्रथम, द्वितीय, तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण पूरा किया था. उनका परिवार प्रारंभ से ही धार्मिक गतिविधियों व समाज सेवा के कार्यों में सक्रिय था. उनके परिवार में पत्नी व दो बेटे हैं, बड़ा बेटा दसवीं तथा छोटा बेटा सातवीं कक्षा में पढ़ता है.

चंद्रकांत जी ने आतंकवाद के दौर में भी वहां के स्थानीय समाज का मनोबल बनाए रखने का महत्वपूर्ण कार्य किया. उन्होंने हिन्दुओं को संगठित करने का काम, सेना के साथ सहायता का कार्य बड़ी तन्मयता से किया. सेना के सहयोग के लिए दिन रात तत्पर रहते थे. जिस कारण आतंकियों के निशाने पर थे, इसके चलते उन्हें सुरक्षा भी प्रदान की गई थी.

वे युवाओं के प्रेरणास्रोत थे, लेकिन अपने लिए कठोर थे. पद, प्रतिष्ठा से अलिप्त रहते हुए भी वंचितों, शोषितों, असहायों के लिए वे निरंतर कार्य करते रहे. उन्होंने समाज को साथ लेकर किश्तवाड़ में मंदिर का निर्माण करवाया था और हर साल बैसाखी पर मेले का आयोजन करते थे. उनका अधिकांश समय संघ व समाज के कार्यों में ही लगता था. वे आतंकवाद के समय हिन्दू रक्षा समिति में भी सक्रिय रहे. डोडा विभाग में निरंतर प्रवास होता था तथा क्षेत्र में धार्मिक, सामाजिक संगठनों से अच्छा संपर्क-संबंध था.

हिन्दू समाज के मनोबल को कम करने के आतंकवादियों के मन्सूबे कभी पूरे नहीं होंगे. संघ ने एक निर्भीक, जुझारू और कर्तव्यनिष्ठ स्वयंसेवक खो दिया है. उनके जाने से क्षेत्र व समाज को अपूरणीय क्षति हुई है.

April 9th 2019, 7:40 am

किश्तवाड़ में संघ कार्यकर्ता पर आतंकी हमला, गंभीर रूप से घायल

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नई दिल्ली. जम्मू कश्मीर के किश्तवाड़ में मंगलवार को आतंकी हमले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता चंद्रकांत व उनके निजी सुरक्षा अधिकारी (पीएसओ) घायल हो गए. आतंकियों ने सुरक्षा अधिकारी का हथियार भी छीन लिया. जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र की बहाली तथा आतंकियों के खात्मे से आतंकी संगठन हताशा में हैं. जिस कारण वे अब राष्ट्रीय विचारधारा के कार्यकर्ताओं को निशाना बना रहे हैं.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत सह सेवा प्रमुख चंद्रकात शर्मा (आयु 50 वर्ष) किश्तवाड़ अस्पताल में चिकित्सा सहायक के पद कार्य करते हैं. मंगलवार को किश्तवाड़ में आतंकियों ने अस्पताल परिसर में घुसकर चंद्रकांत शर्मा पर हमला कर दिया, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए. उनको फौरन अस्पताल में भर्ती करवाया गया. हमले में उनके दो सुरक्षा कर्मियों में से एक सुरक्षा कर्मी राजेन्द्र कुमार बलिदान हो गए, जबकि दूसरे को गंभीर स्थिति में अस्पताल में भर्ती करवाया गया है. चंद्रकांत शर्मा की गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें जम्मू अस्पताल लाया गया है.

घटना के तुरंत बाद आतंकियों को ढूंढने के लिए किश्तवाड़ में सर्च अभियान शुरू कर दिया गया है. प्रवेश और निकास बिंदुओं को सील कर दिया गया है. मौके पर काफी संख्या में आरएसएस और बीजेपी कार्यकर्ता एकत्रित हो गए हैं. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए किश्तवाड़ में मोबाइल इंटरनेट बंद कर दिया गया है.

किश्तवाड़ में ये पहला हमला नहीं है. नवंबर 2018 में बीजेपी नेता अनिल परिहार और उनके भाई की आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी. जिसके हत्यारे अब तक नहीं पकड़े गए हैं. बताया जाता है कि अनिल परिहार के साथ चंद्रकांत पर भी आतंकी हमले की आशंका थी. जिसके चलते उनको सुरक्षा मुहैया कराई गई थी. चंद्रकांत ने उग्रवाद के दौरान अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए बहुत काम किया है, यह उन पर तीसरा हमला है.

प्रशासन द्वारा हमलावरों को तुरंत पकड़ा जाना चाहिए – ब्रि. सुचेत सिंह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने चंद्रकांत शर्मा पर हुए हमले की निंदा की है तथा हमलावरों को जल्द पकड़ने की मांग की. जम्मू कश्मीर प्रांत संघचालक ब्रिगेडियर सुचेत सिंह ने कहा कि जम्मू कश्मीर के किश्तवाड़ में आतंकी हमले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत सह सेवा प्रमुख चंद्रकांत जी घायल हो गए और उनके सुरक्षा कर्मी का बलिदान हो गया है.

चंद्रकांत जी उस पूरे क्षेत्र में राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में जाने जाते हैं और आतंकवाद के विरोध में समाज का मनोबल बनाए रखने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है.

यह आतंकवादी घटना देशभक्त जनता की आवाज को दबाने का प्रयास है, जिसको किसी भी कीमत पर देशभक्त समाज सफल नहीं होने देगा. देशभक्त जनता आतंकवाद के विरोध में प्रशासन के साथ है. प्रशासन द्वारा हमलावरों को तुरंत पकड़ा जाना चाहिए, जिससे कि देशभक्त जनता का मनोबल मजबूत बना रहे.

April 9th 2019, 6:37 am

प्रशासन ने भगवा पताकाएं हटाईं, लोगों के विरोध पर दोबारा लगानी पड़ीं

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नववर्ष के उपलक्ष्य में शहर में लगाई गई थीं भगवा पताकाएं

बीकानेर. वर्ष प्रतिपदा (नववर्ष) के स्वागत के लिए स्थानीय समिति द्वारा शहर को भगवा पताकाओं से सजाया गया था. 06 अप्रैल को भव्य शोभा यात्रा भी निकाली गई थी. लेकिन शायद कांग्रेस राज में प्रशासन को रास नहीं आईं, और उन्होंने अगले ही दिन भगवा पताकाओं को उतारकर जेसीबी में एकत्रित करना शुरू कर दिया. लेकिन जैसे ही स्थानीय लोगों को इसकी जानकारी मिली तो वे मौके पर एकत्रित हो गए तथा उन्होंने विरोध शुरू कर दिया. जनता के विरोध के समक्ष प्रशासन को झुकना पड़ा और उन्होंने भगवा पताकाएं पुनः लगवाईं.

रविवार को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के दौरे के चलते यह कवायद हुई. कहा यह भी जा रहा है कि प्रशासन पर भगवा पताकाएं हटाने का दबाव था. दरअसल, मुख्यमंत्री को 07 मार्च को जस्सूसर गेट स्थित सीताराम भवन में कार्यकर्ता सम्मेलन संबोधित करना था. इसमें भाग लेने के लिए वहां से गुजरने वाले थे. ऐसे में प्रशासन ने भारतीय नववर्ष पर एक दिन पहले लगाए  झंडे-बैनर उनके रास्ते से हटवाने शुरू कर दिए. हिन्दू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं को इसकी सूचना मिली तो संयोजक जेठानंद व्यास के नेतृत्व में लोग एकत्रित हो गए और प्रशासन को विरोध का सामना करना पड़ा. गंदगी उठाने वाली जेसीबी में भगवा पताकाएं देख लोगों को आक्रोश बढ़ गया. और लोग जस्सूसर गेट क्षेत्र से झंडियां-बैनर हटा रहे दस्ते की जेसीबी के आगे बैठ गए व रास्ता जाम कर दिया.

लोगों को कहना था कि यह पताकाएं संस्कृति का प्रतीक हैं, किसी राजनीतिक पार्टी का नहीं. तो फिर प्रशासन व सरकार को भगवा रंग से चिढ़-घृणा क्यों है. तनाव बढ़ता देख मौके पर पुलिस फोर्स बुलानी पड़ी, लेकिन कार्यकर्ता नहीं हटे. एक बार तो पुलिस कर्मियों और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की की नौबत भी आ गई. आखिरकार प्रशासन ने झंडियां वापस लगानी शुरू कीं, तभी लोगों ने धरना खत्म किया.

वैसे कार्यक्रम 06 को हो गया था. बैनर झूल रहे थे, उन्हें हटाने की जरूरत थी. आचार संहिता में तो नहीं आते, लेकिन जिला प्रशासन ने हटाने को कहा था, इसलिए हटवाए. – प्रदीप गवांडे, आयुक्त नगर निगम

April 9th 2019, 5:56 am

मिशनरी स्कूल में बच्चे की पीट-पीट कर हत्या, फिर दफनाया

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देहरादून. शिक्षा के क्षेत्र में गौरवपूर्ण शहरों में गिने जाने वाले देहरादून में शिक्षण संस्थाओं के हालात बदतर होते जा रहे हैं. पिछले दिनों एक नामी बोर्डिंग स्कूल की एक छात्रा से सामूहिक बलात्कार की घटना को लोग भूल भी नहीं पाए थे कि बोर्डिंग के ही एक और स्कूल में बारहवीं कक्षा के 2 छात्रों ने उसी स्कूल के एक छात्र की क्रिकेट के बल्ले और विकेट से पीट-पीटकर हत्या कर दी. मृतक छात्र पर एक बिस्कुट का पैकेट उठाने का आरोप था.

यह दुःखद घटना देहरादून के रानीपोखरी क्षेत्र में स्थित ईसाई मिशनरी स्कूल चिल्ड्रन होम एकेडमी में 10 मार्च की है. एक छात्र 12 वर्षीय वासु यादव अपने सहपाठियों के साथ स्कूल के बाहर गया था. साथ के छात्रों का कहना है कि चर्च से लौटते समय वासु ने पड़ोस की एक दुकान से बिस्कुट का एक पैकेट उठा लिया. दुकानदार लेखपाल सिंह रावत ने इस बात की शिकायत स्कूल जाकर प्रबंधकों से कर दी. शिकायत पर स्कूल प्रबंधन ने बच्चों के बाहर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया. स्कूल के बड़े बच्चों को जब पता चला कि वासु यादव के कारण यह प्रतिबंध लगा है तो उन्हें गुस्सा आ गया. कक्षा 12वीं के 2 छात्रों शुभंकर और लक्ष्मण ने वासु को सबक सिखाने के लिए हॉस्टल के कमरे में घुसकर क्रिकेट के बल्ले और विकेट से बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया.

दोनों छात्र वासु को तब तक पीटते रहे जब तक वह मूर्छित नहीं हो गया. इतना ही नहीं, जैसे ही वासु को थोड़ा होश आया तो शुभंकर और लक्ष्मण उसे फिर छत पर ले गए और ठंडे पानी से नहलाया, उसे गंदा पानी भी पिलाया, लगातार प्रताड़ना देते रहे और उसकी पिटाई का क्रम तब तक जारी रखा, जब तक वह दोबारा बेहोश नहीं हो गया. इसके बाद यह दोनों वरिष्ठ छात्र उसे स्टडीरूम में छोड़ आए.

चार घंटे तक चली इस मारपीट के बारे में पीटीआई अशोक सोलोमन, मैनेजर प्रवीण मेसी और वार्डन अजय कुमार को जानकारी थी. वासु की हालत बिगड़ती देख दोनों अभियुक्त छात्रों ने मारपीट में प्रयुक्त विकेट को डर के मारे जला दिया और बल्ले को पीटीआई अशोक को बताकर उनकी अलमारी में छिपा दिया.

इसके बाद स्टडीरूम में जब शाम को गिनती चल रही थी, तो वासु बेहोशी की हालत में मिला. जब उसको बिठाने की कोशिश की गई तो वह उल्टियां करने लगा. प्रबंधन को दाल में कुछ काला लगा. वासु की तबीयत ज्यादा बिगड़ते देख स्कूल स्टाफ उसे स्कूल वाहन से ही पास के जौलीग्रांट स्थित हिमालयन अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

इस खबर से स्कूल प्रबंधन बुरी तरह घबरा गया और इस कृत्य में शामिल छात्रों के भी हाथ-पांव फूल गए. पर, स्कूल प्रबंधन का आपराधिक कृत्य यहीं पर समाप्त नहीं हुआ. आनन-फानन में मृतक वासु के परिवार को हापुड़ में स्कूल की ओर से फोन किया गया कि ‘फूड पॉइजनिंग’ की वजह से वासु की मृत्यु हो गई है. यह भी जानकारी मिली है कि मृतक वासु के पिता से दबाव में कागजों पर हस्ताक्षर करवा लिए गए कि वह कोई आगे कार्रवाई नहीं करना चाहते और वासु को स्कूल परिसर में ही दफना भी दिया गया.

स्कूल प्रबंधन की इस करतूत का खुलासा स्थानीय चैनल के एक रिपोर्टर ने किया, जिसका संज्ञान लेते हुए राज्य बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष उषा नेगी ने तत्काल स्कूल पहुंचकर वास्तविकता की जानकारी ली और अपने स्तर पर छानबीन की. जब स्कूल प्रबंधन की इस करतूत की पोल खुली तो सबके चेहरों पर हवाइयां उड़ गईं. पुलिस जिस मौत को अब तक, ‘फूड पॉइजनिंग’ का मामला बता रही थी, उसे भी तत्काल हत्या का मुकदमा दर्ज करना पड़ा. साथ ही दोनों अभियुक्त छात्रों सहित प्रबंधक 51 वर्षीय प्रवीण मेसी, पीटीआई अध्यापक 35 वर्षीय अशोक सोलोमन तथा 58 वर्षीय वार्डन अजय कुमार को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. मृतक के शव को कब्र से निकालकर पोस्टमार्टम कराया गया. मृत्यु का कारण अत्यधिक रक्त स्राव का होना बताया गया.

आश्चर्यजनक है कि स्कूल प्रबंधन ने हिमालयन अस्पताल के डॉक्टरों को भी फर्जीवाड़े में शामिल कर लिया? हिमालयन अस्पताल के डॉक्टरों ने भी वासु की मृत्यु का कारण ‘फूड पॉइजनिंग’ बताया था. वासु के पिता झप्पू यादव आर्थिक रूप से कमजोर हैं और खुद भी मेरठ में दिल्ली रोड स्थित विवेकानंद कुष्ठ आश्रम में रहते हैं.

यह भी सूचना है कि स्कूल में कन्वर्जन की गतिविधियों को भी अंजाम दिया जा रहा था. मृतक छात्र हिन्दू था, उसको ईसाई तरीके से दफनाया जाना इस बात की पुष्टि करता है कि गरीबी की जिन्दगी जी रहे वासु यादव के परिवार को पहले ईसाई बनाए जाने के बाद ही उसे यहां शिक्षा और छात्रावास का प्रलोभन दिया गया था. घटना से पूर्व बच्चों को चर्च ले जाना भी कन्वर्जन के आरोपों की पुष्टि करता है, जबकि उत्तराखंड में कन्वर्जन के खिलाफ सख्त कानून बना हुआ है.

साभार – पाञ्चजन्य

 

April 9th 2019, 3:54 am

सोशल मीडिया पर हीरो बना डूबते व्यक्ति की जान बचाने वाला लेफ्टिनेंट

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नई दिल्ली.  भारतीय नौसेना ने अपने आधिकारिक फेसबुक पेज पर युवा नौसैन्य कर्मी की की बहादुरी का किस्सा शेयर किया है. आपात स्थिति में समझदारी व साहस दिखाने वाले लेफ्टिनेंट राहुल दलाल की काफी प्रशंसा हो रही है. राहुल दलाल ने केरल के वाईपिन तट पर एक डूबते हुए व्यक्ति की जान बचाई. बचाए गए व्यक्त की पहचान औरंगाबाद निवासी दिलीप कुमार के रूप में हुई है.

लेफ्टिनेंट राहुल दलालअपनी पत्नी के साथ 05 अप्रैल को बीच पर साईट-सीइंग के लिए पहुंचे थे, इस दौरान उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति डूब रहा है और मदद की गुहार लगा रहा है. वहां अन्य लोग भी उपस्थित थे, लेकिन वे पानी में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. लेफ्टिनेंट दलाल तुरंत पानी में कूद गए और डूबते व्यक्ति की ओर बढ़ने लगे.

अपनी जान पर ही बन आई थी

लेफ्टिनेंट दिलीप तक पहुँचने में कुछ मिनट ही लगे, पर पानी के तेज बहाव के चलते उन्हें दिलीप को लेकर आने में लगभग 20 मिनट लग गए.

दिलीप इतने डरे और घबराए हुए थे कि वह लेफ्टिनेंट दलाल को ही जकड़कर नीचे खींचने लगे, जिससे दोनों पर ही डूबने का खतरा मंडराने लगा था. लेफ्टिनेंट दलाल ने दिलीप को शांत किया और उनसे कहा कि वे (दिलीप) दलाल के केवल कंधे ही पकड़े रहें. जब दिलीप ने ऐसा किया तो लेफ्टिनेंट दलाल ने वापस किनारे की ओर तैरना प्रारंभ कर दिया. स्थानीय व्यक्तियों की सहायता से तट पर पहुँचे, उन्होंने देखा कि दिलीप बेहोश हो गए हैं और उनकी साँसें भी नहीं चल रही हैं.

लेफ्टिनेंट दलाल ने उनका मुँह खोला तो देखा कि कुछ पौधे दिलीप के साँस के रास्ते में फँसे हुए हैं. उन्हें निकाल कर दलाल ने दिलीप को Cardio Pulmonary Resuscitation (कृत्रिम श्वास) दी, जिसके बाद दिलीप की चेतना लौटी. सूचना मिलने पर पुलिस ने दिलीप को सरकारी अस्पताल पहुँचाया, जहाँ स्वस्थ होने के बाद छुट्टी दे दी गई. राहुल के कार्य की सोशल मीडिया पर खूब प्रशंसा हो रही है.

April 9th 2019, 3:08 am
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