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मुस्लिम राममन्दिर निर्माण में देंगे सहयोग – मुस्लिम राष्ट्रीय मंच

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शिमला (विसंकें). मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की हिमाचल इकाई के प्रदेश संयोजक केडी हिमाचली ने राम मंदिर पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत किया. उन्होंने कहा कि जब अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कार्य शुरु होगा, तब हिमाचल से मुस्लिम कारसेवकों का जत्था अयोध्या जाएगा व राम मंदिर निर्माण में सहयोग करेगा.

केडी हिमाचली ने बिलासपुर में आयोजित प्रेसवार्ता में पुनर्विचार याचिका दायर करने वालों की आलोचना करते हुए कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भारतीय मुसलमानों का प्रतिनिधि नहीं है, बल्कि वह एक स्वयंसेवी संस्था है. कुछ लोग न्यायालय के निर्णय का विरोध कर रहे हैं, जबकि नब्बे प्रतिशत मुस्लिम इसका विरोध नहीं कर रहे हैं. विरोध करने वाले देश के शांतिपूर्ण माहौल को खराब करना चाहते हैं औक अपना स्वार्थ साधना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि औवेसी जैसे नेता भी भारतीय मुसलमानों के ठेकेदार नहीं हैं. देश भर में हिन्दू व मुस्लमान समाज शांति चाहता है, और देश की तरक्की के लिए बराबर हिस्सेदार बनकर भारत को विश्व गुरु बनाने के लिए आगे बढ़ रहा है.

केडी हिमाचली ने रामजन्म भूमि के निर्णय ऐतिहासिक बताया. उन्होंने कहा कि हम सब मुसलमान निर्णय का स्वागत करते हैं. उन्होंने पूरे देश के मुस्लमानों से आह्वान किया कि बांटने वालों से बचना है, और देश की एकता अखंडता आपसी भाईचारे को आंच न आए, ऐसा माहौल बनाना है. उन्होंने कहा कि मुसलमानों के लिए मक्का-मदीना और सिक्खों के लिए स्वर्ण मंदिर जितना पूजनीय है. वैसे ही हिन्दुओं के लिए रामजन्मभूमि अयोध्या का महत्व है.  सरकार या राममंदिर निर्माण ट्रस्ट जब भी निर्माण कार्य शुरू करेगा, तो मुसलमान जत्थों में जाकर राम मंदिर निर्माण में सेवा करेंगे. प्रेसवार्ता में वरिष्ठ नेता मुनीर अख्तर लाली और युसुफ भी उपस्थित रहे.

November 20th 2019, 6:39 am

दंतेवाड़ा – माओवादियों ने वृद्ध महिलाओं सहित ग्रामीणों को पीटा

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वामपंथ कितना हिंसक होता है, इसकी झलक तो पूरी दुनिया ने देखी है. ऐसे ही भारत के कई क्षेत्र उग्र वामपंथ की चपेट में हैं. वामपंथी/माओवादी/नक्सलियों के लिए कोई भी व्यक्ति यदि उनके विचार से भिन्न हो या मुख्यधारा से जुड़ रहा हो तो वे तुरंत उसे डराना धमका शुरू कर देते हैं, और न मानने पर हत्या तक करने से पीछे नहीं हटते.

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में माओवादियों ने स्थानीय गरीब ग्रामीणों की जमकर पिटाई की. माओवादियों ने महिला, पुरुष, युवा सभी के साथ मारपीट की. पुलिस के अनुसार माओवादियों ने बुजुर्ग महिलाओं को भी नहीं छोड़ा और उनके साथ भी मारपीट की.

माओवादियों के डर के कारण पीड़ित ग्रामीण ना किसी से शिकायत कर रहे हैं, ना ही अस्पताल में इलाज करवाने जा रहे हैं. पुलिस जवानों को घटना की जानकारी मिली तो प्रशासन ने उनके इलाज की व्यवस्था की. पुलिस जवानों ने ही प्राथमिक इलाज किया और पीड़ित ग्रामीणों को दवाइयां दीं.

दरअसल, दंतेवाड़ा के पोटाली क्षेत्र में पुलिस का कैंप बना है. इस कैंप के बनने के समय से लेकर स्थापित होने तक स्थानीय ग्रामीणों में से कुछ लोगों ने इसका विरोध किया था. पुलिस का स्पष्ट कहना था कि यह विरोध माओवादियों के इशारे पर हो रहा है. माओवादियों ने पास के ही निलवाया गांव के ग्रामीणों को कैंप खुलने में सहायता करने के आरोप में पीटा.

पोटाली क्षेत्र माओवादियों के लिए सबसे बड़ी पनाहगाह की तरह है. यह माओवादियों का गढ़ है. इस क्षेत्र में माओवादियों के स्मारक भी बने हुए थे, जिन्हें पुलिस कैंप बनने के बाद दंतेश्वरी फाइटर्स की महिला कमांडो की टीम ने तोड़ दिया है. इसी कैंप के विरोध में माओवादी क्षेत्र में लगातार गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं.

इसके अलावा पोटाली के ही पटेल पारा मार्ग पर आश्रम के पास 7 किलोग्राम का टिफिन बम दंतेवाड़ा की बीडीएस टीम ने बरामद किया है. जवानों ने इसे बरामद कर निष्क्रिय कर दिया है. पोटाली में कैंप खुलने के बाद से माओवादी पुलिस और प्रशासन को नुकसान पहुंचाने के प्रयास में हैं.

November 20th 2019, 5:54 am

सुनिये, सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने क्या कहा और मीडिया ने कैसे उसे राजनीति से जोड़ दिया

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बताइये न पिताजी, आप सब दान कर रहे हैं, मुझे किसको दान कर रहे हैं. ऐसा दो तीन बार होने के बाद पिताजी गुस्सा हो गए. जाओ तुमको हमने यमराज को दान दिया, ऐसा उन्होंने बोला. अब ये बालक है, ये सीखने वाला बालक और गुरु के घर उस समय जाने की पद्धति थी, उसके पहले माता पिता ही शिक्षक हैं. आज भी ऐसा ही है, जब तक विद्यालय में जाता नहीं. केजी में, नर्सरी में जाने नहीं लगता. उसके पहले, उसका जो एटीट्यूड कहते हैं वो एटीट्यूड तैयार हो जाता है, घर में माता पिता को देख कर.

उसका प्रथम गुरु माता है, द्वितीय गुरु पिता है. तो गुरु ने कह दिया कि तुमको यम को दिया है तो मुझे यम को दिया है और उसने प्रस्थान किया यमराज के यहां. यमराज के यहां गया तो यमराज घर पर नहीं थे, प्रवास पर थे. वो वहां तीन दिन बैठा रहा भूखा. यमराज वापस आए देखा कि एक ब्रह्मचारी बालक है और वो भूखा बैठा है. हाथ जोड़कर पहले क्षमा मांगी. ब्रह्मचारी बालक यानि पढ़ने वाला बालक, गुरूगृह में जाने के बाद, पढ़ाई शुरू होने के बाद, विवाह तक का जो काल है वो सीखने का काल है, सीखने के लिए संयम पालन करने का काल है, ब्रह्मचर्य है.

किसी सीखने वाले को तीन दिन अपने यहां प्रतीक्षा करनी पड़े, ये जिसको मिलने को वो गया है उसके लिए दोष है, अपराधी है. इसलिए यमराज नचिकेता की पहले क्षमा मांगते हैं और फिर पूछते हैं कि क्या चाहिए.

तो नचिकेता का प्रश्न, ये शिक्षा का प्रारंभ है. नचिकेता देखकर आया है कि बुद्धि से तो हमारे पिता जी भी सब जानते हैं. लेकिन जानी हुई बात भी, संपन्न होने के बाद भी, गाय दान दे सकने की स्थिति होने के बाद भी, वो आचरण वैसा नहीं करते, ये क्यों है. ये सनातन प्रश्न है, हम सब लोगों के सामने, पूरी मानवता के सामने ये प्रश्न है.

आज मानवता भी इतनी पुरानी हो गई है. हमारे यहां तो युगों की कल्पना है, हजारों वर्षों में गणना होती है. आज का आधुनिक ज्ञात इतिहास तो कम से कम पांच हजार वर्षों का विकास मानवों ने देखा है और आज तो वो प्रकृति ने उनको जो जानने के लिए साधन दिए हैं, उनकी शक्ति हजारों-करोड़ों गुना अधिक बढ़ाकर दूर-दूर के और बिल्कुल सूक्ष्म ऐसे सब अनुसंधान कर रहे हैं, इतना जान रहे, बुद्धि बहुत जानती है, तो सब मानव ये जानते हैं कि प्रकृति को नष्ट करने से हम नष्ट हो जाएंगे. लेकिन प्रकृति को नष्ट करने का काम थमा नहीं है.

सब जानते हैं कि आपस में झगड़ा करने से दोनों की हानि होती है. लेकिन आपस में झगड़ा करने की बात अभी तक बंद नहीं हुई. सब जानते हैं कि स्वार्थ, ये बहुत खराब बात है, लेकिन अपने स्वार्थों को बहुत कम लोग छोड़ पाए, देशों का उदाहरण लीजिए या व्यक्तियों का. तो जानने के बाद भी जो करना चाहिए वो आदमी नहीं करता और जो नहीं करना चाहिए, वो करते रहता है. ये क्यों होता है.

अब उसको लगता है कि ये मैं करूं तो लाभ होगा तो उसको ये बताया भी जाता है कि ये तुम करोगे तो अभी तुमको लाभ मिलेगा, लेकिन बाद में तुमको इसके कटु फल भोगने पड़ेंगे. बाद में याने कब, ऐसे भी व्यक्ति हैं जिन्होंने जो नहीं करना चाहिए वो जीवनभर किया और जीवन भर बड़े सुख से रहे. तो अपने यहां उसका उत्तर देते हैं, सब लोग देते हैं, अपने यहां जो आध्यात्मिक विचारधाराएं हैं, जो मौलिक विचारधाराएं हैं अपने देश की, वो जड़वादी भी हैं, निरीश्वरवादी भी हैं. ईश्वर को मानने वाली भी हैं, न मानने वाली भी हैं. चैतन्य से विश्व की उत्पत्ति मानने वाली हैं, जड़ से उत्पत्ति मानने वाली हैं. लेकिन सबकी एक समान बात है, सब लोग पुनर्जन्म मानते हैं. फिर से जन्म होने वाला है, यहां खत्म नहीं होगी. यहां तुम कुछ उल्टे सीधे काम करके छूट भी जाओगे तो अगले जन्म में तुमको भरना पड़ेगा.

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November 20th 2019, 12:20 am

20 नवम्बर / जन्मदिवस – वैकल्पिक सरसंघचालक डॉ. लक्ष्मण वासुदेव परांजपे

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नई दिल्ली. स्वाधीनता संग्राम के दौरान संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी ने 1930-31 में जंगल सत्याग्रह में भाग लिया था. उन दिनों संघ अपनी शिशु अवस्था में था. शाखाओं की संख्या बहुत कम थी. डॉ. जी नहीं चाहते थे कि उनके जेल जाने से संघ कार्य में कोई बाधा आये. अतः वे अपने मित्र तथा कर्मठ कार्यकर्ता डॉ. परांजपे को सरसंघचालक की जिम्मेदारी दे कर गये. डॉ. परांजपे ने इस दायित्व को पूर्ण निष्ठा से निभाया. उन्होंने इस दौरान शाखाओं को दुगना करने का लक्ष्य कार्यकर्ताओं के सम्मुख रखा. डॉ. हेडगेवार जब लौटे, तो उन्होंने यह दायित्व फिर से डॉ. जी को सौंप दिया. डॉ. हेडगेवार के ध्यान में यह बात भी आयी कि इस दौरान उन्होंने अनेक नयी शाखाएं खोली हैं. वे डॉ. जी से मिलने कई बार अकोला जेल में भी गये.

डॉ. परांजपे का परिवार मूलतः कोंकण क्षेत्र के आड़ा गांव का निवासी था. उनका जन्म 20 नवम्बर, 1877 को नागपुर में हुआ था. उनका बालपन वर्धा में बीता. वहां से कक्षा चार तक की अंग्रेजी शिक्षा पाकर वे नागपुर आ गये. नागपुर के प्रसिद्ध नीलसिटी हाइस्कूल में पढ़ने के बाद उन्होंने मुंबई के ग्रांट मैडिकल कॉलेज से एलएम एंड एस की उपाधि ली तथा 1904 ई. से नागपुर में चिकित्सा कार्य प्रारम्भ कर दिया.

डॉ. परांजपे बालपन से ही अपने मित्रों को साथ लेकर व्यायाम करने के लिए प्रतिदिन अखाड़े जाते थे. डॉ. मुंजे के साथ वे लोकमान्य तिलक के समर्थक थे. सन् 1920 में नागपुर में हुए कांग्रेस अधिवेशन में व्यवस्था करने वाली स्वयंसेवकों की टोली के प्रमुख डॉ. हेडगेवार तथा डॉ. परांजपे ही थे. इस नाते उनकी डॉ. हेडगेवार से अच्छी मित्रता हो गयी, जो आजीवन बनी रही.

नागपुर में बाजे-गाजे के साथ धार्मिक जुलूस निकालने की प्रथा थी, पर 1923 से मुसलमान मस्जिद के सामने से इनके निकलने पर आपत्ति करने लगे. अतः स्थानीय हिन्दू पांच-पांच की टोली में ढोल-मंजीरे के साथ वारकरी पद्धति से ‘दिण्डी’ भजन गाते हुए वहां से निकलने लगे. यह एक प्रकार का सत्याग्रह ही था. 11 नवम्बर, 1923 को श्रीमंत राजे लक्ष्मणराव भोंसले के इसमें शामिल होने से हिन्दुओं का उत्साह बढ़ गया. इस घटना से हिन्दुओं को लगा कि हमारा भी कोई संगठन होना चाहिए. अतः नागपुर में श्रीमंत राजे लक्ष्मणराव भोंसले के नेतृत्व में हिन्दू महासभा की स्थापना हुई.  डॉ. परांजपे के नेतृत्व में नागपुर कांग्रेस में लोकमान्य तिलक और हिन्दुत्व के समर्थक 16 युवकों का एक ‘राष्ट्रीय मंडल’ था. सन् 1925 में जब संघ की स्थापना हुई, तो उसके बाद डॉ. परांजपे संघ के साथ एकाकार होकर डॉ. हेडगेवार के परम सहयोगी बन गये.

नागपुर में संघ के सभी कार्यक्रमों में वे गणवेश पहन कर शामिल होते थे. मोहिते संघस्थान पर लगे पहले संघ शिक्षा वर्ग की चिकित्सा व्यवस्था उन्होंने ही संभाली. आगे भी वे कई वर्ष तक इन वर्गों में चिकित्सा विभाग के प्रमुख रहे. जब भाग्यनगर (हैदराबाद) की स्वाधीनता के लिए सत्याग्रह हुआ, तो उसमें भी उन्होंने सक्रियता से भाग लिया. संघ और सभी सामाजिक कामों में सक्रिय रहते हुए 22 फरवरी, 1958 को नागपुर में ही उनका देहांत हुआ.

November 19th 2019, 6:17 pm

राष्ट्रीय एकात्मता की प्रत्यक्ष अनुभूति का केंद्र है संघ शिक्षा वर्ग – वी. भागय्या जी

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नागपुर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह वी. भागय्या जी ने कहा कि संघ शिक्षा वर्ग, तृतीय वर्ष (विशेष) राष्ट्रीय एकात्मता की प्रत्यक्ष अनुभूति का केंद्र है. 'हम सब एक हैं' का अनुभव यहां होता है और यह अनुभव हम सबको लेना चाहिए. रेशिमबाग, नागपुर स्थित स्मृति मंदिर परिसर के महर्षि व्यास सभागृह में संघ शिक्षा वर्ग (विशेष) के उद्घाटन सत्र में शिक्षार्थियों को संबोधित कर रहे थे. संघ शिक्षा वर्ग में देश के विभिन्न प्रांतों से आए शिक्षार्थियों का स्वागत कर उन्होंने कहा कि इस वर्ग में सम्मिलित होने की हम सबकी कई वर्षों से प्रतीक्षा रहती है. इस विशेष वर्ग में आए हम सब अनुभवी कार्यकर्ता हैं. अपने शास्त्रों में बताए गए - धैर्य, क्षमा, संयम, अस्तेय, शौच, इंद्रिय निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य एवं क्रोध पर विजय जैसे सद्गुणों की उपासना न केवल इस वर्ग में करनी है, अपितु आजीवन यह सद्गुण अपने जीवन में हो, इसके लिए प्रयासरत रहना है. उन्होंने कहा कि अपने ध्येय के प्रति अटूट निष्ठा, विचारधारा की स्पष्टता, आत्मीयता, कठोर परिश्रम, एवं अनुशासन, यह संघ स्वयंसेवकों के विशेष गुण हैं. अपने आचरण द्वारा इन गुणों का प्रकटीकरण इस वर्ग में होना चाहिए. सभी शारीरिक कार्यक्रमों में हमको भाग लेना चाहिए. विशेष रुप से योग और आसन में हमें प्रवीण बनना चाहिए. संघ की विविध गतिविधियों के बारे में मन में स्पष्टता होनी चाहिए. यह वर्ग हमारी एक साधना है. इस 25 दिन की साधना में हम पूरे मन से सम्मिलित हों, ऐसा आह्वान किया तथा वर्ग को सफलतापूर्वक पूर्ण करने के लिए सभी को शुभकामनाएं दीं. इस विशेष वर्ग में सम्पूर्ण देश से 40 से 65 वर्ष की आयु के चयनित शिक्षार्थी सम्मिलित हुए हैं. इस वर्ष विभिन्न प्रांतों से कुल 852 शिक्षार्थी आए हैं. वर्ग के सर्वाधिकारी गोविन्द जी शर्मा (अध्यक्ष, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत) हैं. वर्ग के कार्यवाह सुभाष जी आहुजा (प्रान्त कार्यवाह, हरियाणा) हैं. वर्ग के पालक अधिकारी राजेंद्र कुमार जी (अ. भा. सह प्रमुख, धर्म जागरण समन्वय विभाग) हैं. कार्यक्रम में मुकुंद जी (सह सरकार्यवाह), सुनील जी कुलकर्णी (अ.भा. शारीरिक प्रमुख), स्वांत रंजन जी (अ.भा. बौद्धिक प्रमुख), सुनील भाई मेहता (अ. भा. सह बौद्धिक प्रमुख), मंगेश जी भेंडे (अ.भा. व्यवस्था प्रमुख) उपस्थित थे.

November 18th 2019, 6:04 am

सेवा करने में धन्यता का अनुभव करना, यह हिन्दू दर्शन है – डॉ. कृष्णगोपाल जी

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संत ईश्वर फाउंडेशन ने संस्थाओं व व्यक्तियों को संत ईश्वर सम्मान-2019 के सम्मानित किया नई दिल्ली. संत ईश्वर फाउंडेशन ने राष्ट्रीय सेवा भारती के सहयोग से “संत ईश्वर सम्मान 2019” का आयोजन रविवार को एन.डी.एम.सी. कन्वेंशन सेंटर, संसद मार्ग, नई दिल्ली में किया. संत ईश्वर सम्मान में विभिन्न क्षेत्रों में सेवारत संस्थाओं व महानुभावों को सम्मानित किया गया. चार व्यक्तियों व स्वयंसेवी संस्थाओं को संत ईश्वर विशिष्ट सेवा सम्मान व बारह व्यक्तियों एव संस्थाओं को संत ईश्वर सेवा सम्मान दिया गया. जिसमें विशेष सेवा सम्मान सियाचिन बिग्रेड, भारतीय सेना को दिया गया. समारोह के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल एवं विशिष्ट अतिथि केन्द्रीय संस्कृति एवं पर्यटन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रहलाद सिंह पटेल रहे. सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल जी ने कहा जिनका आज सम्मान हुआ है. उन्होंने समाज में दूसरों के कष्ट को पहचाना, वह समस्याओं को लेकर सरकार के पास नहीं गए, उन्होंने किसी को दोष नहीं दिया, उन्होंने उपलब्ध सीमित संसाधनों से ही समाज कार्य किया व दूसरों की सहायता की. संत ईश्वर फाउंडेशन ने मिजोरम से लेकर राजस्थान, आंध्र प्रदेश से महाराष्ट्र तक समस्त भारत में निःस्वार्थ कार्य कर रहे ऐसे समाज सेवकों को खोज कर इस मंच पर लाने का प्रशंसनीय व अद्भुत कार्य किया है. डॉ. कृष्णगोपाल जी ने कहा कि दुनिया का बड़े से बड़ा विद्वान और विश्वविद्यालय ऐसी कल्पना भी नहीं कर सकता जो भारत का व्यक्ति कल्पना कर सकता है. सामने खड़ा कोई व्यक्ति अगर संकट में है और तुम्हें यदि लगता है कि वह संकट में नहीं है तो तुम हिन्दू कहलाने के योग्य नहीं हो. हिन्दू कहलाना कि मैं हिन्दू हूं, यह कोई फैशन नहीं है. हिन्दू कहते ही हमारे मन के भाव आध्यात्मिक हो जाने चाहिएं, मन करुणा से, संवेदना से भर जाना चाहिए. जो कुछ भी है, वह परमात्मा का है, यह भाव आना चाहिए. जिसको आवश्यकता है, उस आवश्यकता को देखकर, उसको परमात्मा के स्वरूप में स्वीकार कर उसकी सेवा करने में धन्यता का अनुभव करना यह भारत का हिन्दू दर्शन है. उन्होंने स्वामी विवेकानंद का कथन बताया कि अपने पास जो कुछ है, वह समाज ने दिया है, समाज का है, सम्पत्ति, बुद्धि, ताकत सब कुछ समाज का है, इसलिए जितना आवश्यक है उतना ही अपने लिए रखना बाकी समाज को वापस दे देना, यही सेवा का मूल मंत्र है. इस भाव को अपने परिवार, पड़ोस, मित्रों में ले जाएं, जिससे सारा देश सेवा भाव में रत हो जाए. कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रहलाद सिंह पटेल ने कहा कि विभिन्न क्षेत्रों में सेवारत इन संस्थाओं व महानुभावों ने निःस्वार्थ अपने कार्यक्षेत्र में कार्य किया और कभी सोचा भी नहीं था कि उनके प्रकल्प के लिए उन्हें कभी कोई सम्मान देगा. ऐसे लोगों को समाज और सरकार दोनों का समर्थन मिलना चाहिए. संत ईश्वर फाउण्डेशन की स्थापना सन् 2013 में की गई थी, इसी तरह के प्रयासों की कड़ी में प्रति वर्ष चार व्यक्तियों और स्वयंसेवी संस्थाओं को संत ईश्वर विशिष्ट सेवा सम्मान (प्रत्येक को 5 लाख रू की राशि) एवं अन्य बारह व्यक्तियों या संस्थाओं को संत ईश्वर सेवा सम्मान (प्रत्येक को 1 लाख रू की राशि) दिये जाते हैं. संत ईश्वर फाउंडेशन के अध्यक्ष कपिल खन्ना ने बताया कि सम्मानित होने वाले व्यक्तियों/संस्थाओं का चयन भी अवकाश प्राप्त न्यायाधीश, समाजसेवक, वरिष्ठ पत्रकार एवं कला कर्मी जनों के सहयोग से किया गया. इस बार चयन समिति में न्यायमूर्ति प्रमोद कोहली जी (सेवानिवृत्त, मुख्य न्यायधीश, सिक्किम उच्च न्यायालय), पद्मश्री जवाहरलाल कौल जी (अध्यक्ष-जम्मू कश्मीर स्टडी सेंटर), पद्मश्री राम बहादुर राय जी (अध्यक्ष, इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र), पन्ना लाल भंसाली जी (अध्यक्ष-राष्ट्रीय सेवा भारती), गुणवन्त सिंह कोठारी जी (संत ईश्वर सम्मान समिति ) और एस गुरुमूर्ति जी शामिल थे. इस वर्ष संत ईश्वर सम्मान से सम्मानित होने वाली संस्थाएं व समाजसेवक - सियाचिन ब्रिगेड भारतीय सेना (लद्दाख ) भारतीय सेना ने पिछले 19 महीनों में सियाचिन ग्लेशियर की  परिस्थितियों में 130 टन से अधिक कचरा साफ़ किया. संत ईश्वर विशिष्ट सेवा सम्मान - सम्मानित चार व्यक्तियों स्वैच्छिक संगठनों अथवा लोगों के समूह के प्रत्येक विजेता को पांच लाख रूपए, शॉल, ट्रॉफी एवं प्रमाण पत्र द्वारा पुरस्कृत किया गया. 1). स्वामी प्राणरूपानंद जी(जिला खोर्धा, ओड़िसा) - इनके अथक प्रयास से ओड़िसा के कई वनवासी क्षेत्र धर्मातरण मुक्त रहे. 2). चेतराम पवार जी (धुले, महाराष्ट्र) - पानी की कमी को दूर करने के लिए 700 से अधिक चेक डैम बनवाकर गांवों को हरा भरा किया. 3). सुनंदा वासुदेव जी तोलबंदि (विजयापुर, कर्नाटक) - इनके प्रयासों से अब तक 2250 बाल मजदूरों का पुनर्वास किया गया और 1700 से अधिक बाल विवाह रोके गए. 4). आश्रय (ऊना, हिमाचल प्रदेश) - बेसहारा बच्चों को आवास और विद्यालय सुनिश्चित करवाए, लावारिस घायल लोगों को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध करवाई. संत ईश्वर सेवा सम्मान - 1 लाख राशि, शॉल, ट्रॉफी, प्रमाण पत्र व प्रतीक मुद्रा द्वारा सम्मानित किया गया. 1). दर्शन लाल जी (देहरादून, उत्तराखंड) – इन्होंने जनभागीदारी से बुक्सा जनजाति गांवों में 5  प्राथमिक, 02  जूनियर हाई स्कूल एवं इण्टर कॉलेज की स्थापना कराई और 3000 बच्चों को शिक्षित किया. 2). पी. लालहमीगलियानी जी (आइजोल, मिजोरम) - मिजोरम के ग्रामीण क्षेत्र में इनके प्रयास से 100 बच्चों ने अच्छी शिक्षा प्राप्त की. 3). रशिद मोहन गावीत जी (नंदूरबार, महाराष्ट्र ) - नई पद्धति से कृषि कार्य और पशुपालन को विकसित कर इन्होंने 50 किसानों को लेकर बलिराजा कृषक मंडल का गठन किया, और सामूहिक कृषि के नए प्रयोग किये. 4). भगीरथ ग्राम विकास प्रतिष्ठान (सिंधुदुर्ग, महाराष्ट्र ) - गांव के 50 व्यक्तियों की टीम ने 700 से अधिक बायोगैस का निर्माण किया, कृषि के लिए पंप, पाइप लाइन की व्यवस्था की. 5). हिम्मताराम भांभू जी (नागौर, राजस्थान ) - वन्य जीवों के संरक्षण के लिए अपनी 36  बीघे जमीन को जंगल में परिवर्तित कर दिया और 3.5 लाख पौधे लगाए जो आज वृक्ष बन चुके हैं. 6). जयवंत वाडेकर जी (ठाणे, महाराष्ट्र) - 80 वर्ष की उम्र को चुनौती देते हुए ऑर्गेनिक खेती, नए प्रकार के यंत्रों को कम कीमत पर उपलब्ध करवाया और 50 से अधिक विभिन्न प्रकार के यंत्रों का निर्माण किया. 7). सुमन अखौरी जी (पलामू, झारखण्ड) - जागृति महिला की स्थापना करके 5000 स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से 60000 महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया. 8). स्नेगा लथा जी (कोयंबतूर, तमिलनाडु) – इन्होंने कन्याकुमारी जिले में बालवाड़ी केंद्र की स्थापना की और महिलाओं को सुदृढ़ करने के लिए सहायता केंद्रों की स्थापना की. 9). डॉ. शांता वैद्य मेमोरियल फाउंडेशन (पुणे, महाराष्ट्र) - डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चों को शिक्षा के समुचित अवसर प्राप्त करवाए. 10). श्रेया स्कूल (पूर्वी गोदावरी, आंध्र प्रदेश) - 15 वर्षों से दिव्यांग बच्चों को शिक्षित और कौशल विकास योजनाओं से जागरूक करते हुए उन्हें स्वावलंबी बनाया. 11). डॉ. मनीषा योगेश खलदकर (पुणे, महाराष्ट्र) - भारत सरकार के नेनो उपग्रह 'स्वयं' के लिए अभियांत्रिक प्रशिक्षण 176 बच्चों के साथ काम करके सफलता प्राप्त की. 12). रेखा हेम्ब्रम जी (दुमका, झारखण्ड) - श्रद्धाजागरण की स्थापना करके 25000 लोगों को धर्मांतरित होने से रोका और 20 स्थानों पर मंदिर बनवाए.

November 18th 2019, 5:45 am

18 नवम्बर / जन्मदिवस – परोपकार की प्रतिमूर्ति स्वामी प्रेमानन्द

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नई दिल्ली. भारत में सन्यास की एक विशेष परम्परा है. हिन्दू धर्म में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और फिर सन्यास को आश्रम व्यवस्था कहा गया है, पर कई लोग पूर्व जन्म के संस्कार या वर्तमान जन्म में अध्यात्म और समाज सेवा के प्रति प्रेम होने के कारण ब्रह्मचर्य से सीधे सन्यास आश्रम में प्रविष्ट हो जाते हैं. आद्य शंकराचार्य ने समाज में हो रहे विघटन एवं देश-धर्म पर हो रहे आक्रमण से रक्षा हेतु दशनामी सन्यासियों की परम्परा प्रारम्भ की. पर, इन दशनाम सन्यासियों से अलग भी अनेक प्रकार के पन्थ और सम्प्रदाय हैं, जिनमें रहकर लोग सन्यास व्रत धारण करते हैं. ऐसे लोग प्रायः भगवा वस्त्र पहनते हैं, जो त्याग और बलिदान का प्रतीक है.

ऐसे ही एक सन्यासी थे स्वामी प्रेमानन्द जी, जिन्होंने सन्यास लेने के बाद समाज सेवा को ही अपने जीवन का ध्येय बनाया. वे पूजा पाठ एवं साधना तो करते थे, पर उनकी मुख्य पहचान परोपकार के कामों से हुई. स्वामी जी का जन्म 18 नवम्बर, 1930 को पंजाब के एक धनी एवं प्रतिष्ठित परिवार में हुआ. सम्पन्नता के कारण सुख-वैभव चारों ओर बिखरा था, पर प्रेमानन्द जी का मन इन भौतिक सुविधाओं की बजाय ध्यान, धारणा और निर्धन-निर्बल की सेवा में अधिक लगता था. इसी से इनके भावी जीवन की कल्पना अनेक लोग करने लगे थे.

प्रेमानन्द जी का बचपन कश्मीर की सुरम्य घाटियों में बीता. वहाँ रहकर उनका मन ईश्वर के प्रति अनुराग से भर गया. वे अपने जीवन लक्ष्य के बारे में विचार करने लगे. पर, उन्होंने शिक्षा की उपेक्षा नहीं की. उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से इतिहास में और पंजाब विश्वविद्यालय से उर्दू में एम.ए किया. इसके बाद वे अनेक विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक भी रहे, पर उनके लिए तो परमपिता परमात्मा ने कोई और काम निर्धारित कर रखा था. धीरे-धीरे उनका मन सांसारिक माया मोह से हट गया. वे समझ गये कि भौतिक वस्तुओं में सच्चा सुख नहीं है. वह तो ईश्वर की प्राप्ति और मानव की सेवा में है. उन्होंने विश्वविद्यालय की नौकरी छोड़ दी और अपने आध्यात्मिक गुरु से सन्यास की दीक्षा ले ली. लोग उनके इस निर्णय पर आश्चर्य करते थे, पर अब उनके जीवन का मार्ग दूसरा ही हो गया था.

स्वामी जी ने मानव कल्याण के लिए अनेक ग्रन्थों की रचना की. उन्होंने हिन्दी में मानव जाग, जीव श्रृंगार, अंग्रेजी में आर्ट ऑफ़ लिविंग, लाइफ ए टेण्डर स्माइल तथा उर्दू में ऐ इन्सान जाग नामक पुस्तकें लिखीं. ये पुस्तकें आज भी अत्यन्त प्रासंगिक हैं, क्योंकि इनसे पाठकों को अपना जीवन सन्तुलित करने का पाथेय मिलता है. इन पुस्तकों में उनके प्रवचन भी संकलित हैं, जो सरल भाषा में होने के कारण आसानी से समझ में आते हैं.

उनके लेखन और प्रवचन का मुख्य विषय विज्ञान और धर्म, विश्व शान्ति, विश्व प्रेम, नैतिक और मानवीय मूल्य, वेदान्त और जीवन की कला आदि रहते थे. उन्होंने साधना के बल पर स्वयं पर इतना नियन्त्रण कर लिया था कि वे कुल मिलाकर ढाई घण्टे ही सोते थे. शेष समय वे सामाजिक कामों में लीन रहते थे. 23 अप्रैल, 1996 को मुकेरियाँ (पंजाब) के पास हुई एक दुर्घटना में स्वामी जी का देहान्त हो गया. आज भी उनके नाम पर पंजाब में अनेक विद्यालय और धर्मार्थ चिकित्सालय चल रहे हैं.

November 17th 2019, 4:56 pm

17 नवम्बर / बलिदान दिवस – पंजाब केसरी लाला लाजपतराय

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‘‘यदि तुमने सचमुच वीरता का बाना पहन लिया है, तो तुम्हें सब प्रकार की कुर्बानी के लिए तैयार रहना चाहिए. कायर मत बनो. मरते दम तक पौरुष का प्रमाण दो. क्या यह शर्म की बात नहीं कि कांग्रेस अपने 21 साल के कार्यकाल में एक भी ऐसा राजनीतिक संन्यासी पैदा नहीं कर सकी, जो देश के उद्धार के लिए सिर और धड़ की बाजी लगा दे….’’

इन प्रेरणास्पद उद्गारों से 1905 में उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में लाला लाजपत राय ने लोगों की अन्तर्रात्मा को झकझोर दिया. इससे अब तक अंग्रेजों की जी हुजूरी करने वाली कांग्रेस में एक नये समूह का उदय हुआ, जो ‘गरम दल’ के नाम से प्रख्यात हुआ. आगे चलकर इसमें महाराष्ट्र के बाल गंगाधर तिलक और बंगाल से विपिनचन्द्र पाल भी शामिल हो गए. इस प्रकार लाल, बाल, पाल की त्रयी प्रसिद्ध हुई.

लाला जी का जन्म पंजाब के फिरोजपुर जिले के एक गांव में 28 जनवरी, 1865 को हुआ था. अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि के लाला लाजपतराय ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से फारसी की तथा पंजाब विश्वविद्यालय से अरबी, उर्दू एवं भौतिकशास्त्र विषय की परीक्षाएं एक साथ उत्तीर्ण कीं. सन् 1885 में कानून की डिग्री लेकर वे हिसार में वकालत करने लगे.

उन दिनों पंजाब में आर्यसमाज का बहुत प्रभाव था. लाला जी भी उससे जुड़कर देशसेवा में लग गए. उन्होंने हिन्दू समाज में फैली वशांनुगत पुरोहितवाद, छुआछूत, बाल विवाह जैसी कुरीतियों का प्रखर विरोध किया. वे विधवा विवाह, नारी शिक्षा, समुद्र यात्रा आदि के प्रबल समर्थक थे. लाला जी ने युवकों को प्रेरणा देने वाले जोसेफ मैजिनी, गैरीबाल्डी, शिवाजी, श्रीकृष्ण एवं महर्षि दयानन्द की जीवनियाँ भी लिखीं.

सन् 1905 में अंग्रेजों द्वारा किये गए बंग भंग के विरोध में लाला जी के भाषणों ने पंजाब के घर-घर में देशभक्ति की आग धधका दी. लोग उन्हें ‘पंजाब केसरी’ कहने लगे. इन्हीं दिनों शासन ने दमनचक्र चलाते हुए भूमिकर व जलकर में भारी वृद्धि कर दी. लाला जी ने इसके विरोध में आन्दोलन किया. इस पर शासन ने उन्हें 16 मई, 1907 को गिरफ्तार कर लिया.

लाला जी ने 1908 में इंग्लैण्ड, 1913 में जापान तथा अमरीका की यात्रा की. वहां उन्होंने बुद्धिजीवियों के सम्मुख भारत की आजादी का पक्ष रखा. इससे वहां कार्यरत स्वाधीनता सेनानियों को बहुत सहयोग मिला.

पंजाब उन दिनों क्रान्ति की ज्वालाओं से तप्त था. क्रान्तिकारियों को भाई परमानन्द तथा लाला लाजपतराय से हर प्रकार का सहयोग मिलता था. अंग्रेज शासन इससे चिढ़ा रहता था. उन्हीं दिनों लार्ड साइमन भारत के लिए कुछ नए प्रस्ताव लेकर आया. लाला जी भारत की पूर्ण स्वाधीनता के पक्षधर थे. उन्होंने उसका प्रबल विरोध करने का निश्चय कर लिया.

30 अक्तूबर, 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में एक बड़ा जुलूस निकला. पंजाब केसरी लाला जी शेर की तरह दहाड़ रहे थे. यह देखकर पुलिस कप्तान स्कॉट ने लाठीचार्ज करा दिया. उसने स्वयं लाला जी पर कई वार किये. लाठीचार्ज में बुरी तरह घायल होने के कुछ दिन बाद 17 नवम्बर, 1928 को लाला जी का देहान्त हो गया. उनकी चिता की पवित्र भस्म माथे से लगाकर क्रान्तिकारियों ने इसका बदला लेने की प्रतिज्ञा ली.

ठीक एक महीने बाद भगतसिंह और उनके मित्रों ने पुलिस कार्यालय के बाहर ही स्कॉट के धोखे में सांडर्स को गोलियों से भून दिया.

November 17th 2019, 7:20 am

श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर हेतु अभी कोई धन संग्रह नहीं – विहिप

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नई दिल्ली. विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) ने आज स्पष्ट किया कि श्रीराम जन्मभूमि पर मन्दिर निर्माण हेतु किसी प्रकार का धन संग्रह नहीं किया जा रहा है. विहिप के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री मिलिंद परांडे ने एक बयान में स्पष्ट किया कि विश्व हिन्दू परिषद या श्रीराम जन्मभूमि न्यास द्वारा 1989 के बाद से आज तक श्रीराम जन्मभूमि के लिए सार्वजनिक रूप से ना तो कोई धन संग्रह किया है और ना ही इस हेतु अभी तक कोई आह्वान किया है.

उन्होंने कहा कि विश्व हिन्दू परिषद व श्रीराम जन्मभूमि न्यास (दोनों) आज भी श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण हेतु कोई धन संग्रह नहीं कर रहे हैं.

November 17th 2019, 5:20 am

श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के उन्नायक श्री अशोक सिंहल जी की पुण्यतिथि पर नमन

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बीसवीं इक्कीसवीं सदी का संधि काल हिन्दू समाज के नवजागरण के काल खण्ड के रूप में इतिहास के पन्नों में अंकित होगा. यह वह कालखंड है, जब शताब्दियों से पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े जाने से उत्पन्न आत्मविस्मृति एवं आत्महीनता की भावना को तोड़कर हिन्दू समाज ने विश्वपटल पर हूंकार भरी थी.

सोए हुए हिन्दू पौरुष को जगाने का आधार बना श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन और इस आंदोलन के स्मरण के साथ ही इसके नायकों में जो नाम प्रमुखता से उभरकर सामने आता है वह है श्रद्धेय अशोक सिंहल का.

श्रद्धेय अशोक जी ने राष्ट्र की सुप्त पड़ी विराट चेतना को श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के माध्यम से झकझोर कर रख दिया. प्रांत भाषा, क्षेत्र के भेदभाव सुप्त पड़ गए. कश्मीर से कन्याकुमारी तक संपूर्ण भारत एक स्वर में जयश्रीराम के नारों से गूंज उठा. एक विदेशी आक्रांता द्वारा राष्ट्र के आदर्श एवं उपास्य के जन्मस्थान को ध्वस्त कर बनाया गया ढांचा देखते ही देखते ध्वस्त हो गया, लेकिन इस आंदोलन की पूर्णाहुति अभी बाकी है जो श्रीराम जन्मूभमि पर भव्य मंदिर निर्माण के साथ ही भारत के जन-जन में श्रीराम के चरित्र के आधान से पूर्ण होगी.

श्रद्धेय अशोक जी का मानना था कि यह आंदोलन भारत की सांस्कृतिक स्वतंत्रता का आंदोलन है. श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण द्वारा इस आंदोलन का द्वितीय चरण पूर्ण होगा. परंतु यह आंदोलन अपनी पूर्णता को तब प्राप्त करेगा, जब संपूर्ण भारत श्रीराम के आदर्शों पर चलते हुए एक आध्यात्मिक राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित होगा. जब इस राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक अपने राष्ट्र की अस्मिता आदर्श एक मानबिंदु के प्रति जागरूक रहते हुए अपना आचरण करेगा. जब इस देश में कोई अशिक्षित वंचित, भूखा एवं लाचार नहीं होगा. जब इस देश के शौर्य एवं संगठन की अदभुत शक्ति को देखकर कोई परकीय भारत की तरफ वक्र दृष्टि से देखने का साहस नहीं करेगा.

अब वह समय आ गया है जब श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के साथ ही राष्ट्र इस आंदोलन के तृतीय चरण में प्रवेश कर दुनिया के सामने एक समर्थ शक्तिशाली एवं समृद्ध भारत के रूप में खड़ा हो. तभी श्रद्धेय अशोक सिंहल जी का स्वप्न साकार होगा.

अशोक जी का जीवन कर्मज्ञान एवं भक्ति का अदभुत समन्वय था. उनके जीवन पर तीन महापुरुषों का बहुत गहरा प्रभाव था, जिसका वह यदा-कदा उल्लेख किया करते, अपितु उनके संपूर्ण जीवन पर गहराई से दृष्टि डालने पर इन महापुरुषों की स्पष्ट छाप दिखाई पड़ती है.

इनमें प्रथम महापुरुष हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक परमपूज्य श्रीगुरुजी. अपने संस्मरण में वे सुनाया करते थे कि एक बार वह अपने कानपुर के कार्यकाल में इटावा के सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में एक संत से मिलने गए. उन्होंने परिचय पूछा – तब अशोक जी को लगा कि शायद महात्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विषय में न जानते हों, इसलिए उन्होंने कहा कि एक महात्मा हैं गोलवलकर जी, मैं उनका अनुयायी हूं. उन महात्मा ने तुरंत प्रश्न पूछा तुम जानते हो गोलवलकर क्या कर रहे हैं ? अशोक जी ने कहा, महाराज जी आप ही मार्गदर्शन करने की कृपा करें.

उन महात्मा ने जो उत्तर दिया, वही अशोक जी के जीवन का केंद्र बिंदु बन गया. उन्होंने कहा, तुमने जमीन में पड़ी दो-चार इंच चौड़ी दरारें देखीं होंगी, किंतु हिन्दू समाज में इतनी चौड़ी दरारें पड़ गई हैं, जिनमें हाथी चला जाए. गोलवलकर उन्हीं दरारों को भरने का कार्य कर रहे हैं. तुम पुण्यात्मा हो जो उनके साथ लगे हो. अशोक जी ने इसको अपना ध्येय बनाया और विश्व हिन्दू परिषद में आने के बाद धर्म संसद एवं श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के माध्यम से संपूर्ण देश के साधु-संतों और हिन्दू समाज को संगठित करने का महती कार्य किया.

उनके जीवन को प्रभावित करने वाले दूसरे व्यक्ति थे, उनके गुरुदेव श्रीरामचंद्र तिवारी जी. जो वेदों के साधक थे और जिनकी प्रेरणा से अशोक जी के जीवन में संघ के समाज संगठन एवं राष्ट्रजागरण के प्रत्यक्ष कार्य के साथ अध्यात्म की एक आंतरिक धारा भी प्रवाहित हो चली, जिसका समन्वय उनके जीवन की अंतिम सांस तक बना रहा.

अशोक जी का जीवन जितना आंदोलनात्मक था, उतना ही संरचनात्मक भी था जो उनके बहुआयामी कार्यों से प्रकट होता है. गंगारक्षा, गोरक्षा, अस्पृश्यता निवारण, शिक्षा, स्वास्थ्य संबंधित सेवाकार्य की प्रेरणा, संघ कार्य के साथ ही उस काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से उन्हें प्राप्त हुई थी. जहां पर उन्होंने शिक्षा प्राप्त की. जिसके अधिष्ठाता महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी ने स्वयं इन सभी विषयों पर चिंतन एवं कार्य किया था.

सनातनी, आर्यसमाजी, सिख, बौद्ध और जैन सभी को अपनी-अपनी परंपराओं का पालन करते हुए परस्पर प्रेम और आदर से गूंथने का जो महान कार्य अशोक जी के द्वारा किया गया, वह अद्वितीय है. समाज में कोई भी अछूता नहीं है, सब ही भारत माता के सहोदर पुत्र हैं. अशोक जी ने इसे साकार कर दिखाया. उनके जीवन के व्यक्तित्व का यह अदभुत कौशल था कि देश के शीर्षस्थ, संत महात्मा काशी के डोम राजा के घर सहभोज में सम्मिलित हुए.

अशोक जी का जीवन समाज एवं भारत के स्वर्णिम भविष्य के लिए एक प्रकाश स्तंभ है. अंत समय तक उनका सतत सक्रिय जीवन प्रत्येक राष्ट्रभक्त के लिए प्रेरणा स्रोत है. वह श्रीगुरुजी का संस्मरण सुनाते हुए कहा करते थे कि कार्यकर्ता केवल चिता पर विश्राम करता है और उन्होंने अपने जीवन में इसे चरितार्थ कर दिखाया. 17 नवंबर 2015 को शरीर छोड़ने के तीन दिन पूर्व तक एक अनथक कर्मयोगी की तरह वह मां भारती की सेवा में सक्रिय रहे. ऐसे महापुरुष की पुण्य तिथि पर सादर नमन.

(लेखक अंरुधती वशिष्ठ अनुसंधान पीठ, प्रयाग के संयोजक एवं दो दशक तक श्री अशोक सिंहल जी के निजी सचिव रहे हैं)

November 16th 2019, 4:07 pm

ब्रि. गगनेजा हत्याकांड में एनआईए ने कोर्ट में दाखिल की चार्जशीट

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नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, पंजाब के सह प्रांत संघचालक ब्रिगेडियर जगदीश गगनेजा जी (सेवानिवृत्त) की हत्या के मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने 15 नवंबर, शुक्रवार को आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की.

एनआईए जांच के अनुसार ब्रिगेडियर गगनेजा की खालिस्तान लिबरेशन फोर्स (केएलएफ) के वरिष्ठ नेतृत्व द्वारा रची गई ट्रांस-नेशनल साजिश के तहत हत्या की गई. सभी आरोपी विशिष्ट समुदायों और संगठनों से संबंधित थे. इस साजिश का उद्देश्य पंजाब में कानून-व्यवस्था की स्थिति को अस्थिर करना और राज्य में आतंकवाद को पुनर्जीवित करना था.

एनआईए ने जिन लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की है, उनमें हरदीप सिंह शेरा, पहाड़ सिंह, मलूक सिंह, रमनदीप सिंह, जगतार सिंह, गुरशरणबीर सिंह और हरमीत सिंह का नाम शामिल है. इसमें हरदीप सिंह मुख्य आरोपी है. आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 302, 120-B, 34 और 379 के साथ ही गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के सेक्शन 16, 17, 18, 18-A, 18-B और 20 के तहत चार्जशीट दायर की है. इसके अलावा आर्म्स एक्ट के सेक्शन 25 और 27 के सहत भी चार्जशीट दाखिल की गई है.

एनआईए का दावा है कि ब्रि. गगनेजा की हत्या की साजिश पाकिस्तान, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, इटली व यूएई सहित कई देशों में रची गई. साजिश के तहत अपराधियों को इटली, ऑस्ट्रेलिया व यूके से फंडिंग की गई थी. फंड का उपयोग हत्याकांड को अंजाम देने के लिए हथियार खरीदने व अन्य सामान खरीदने के लिए किया गया.

पंजाब के सह प्रांत संघचालक ब्रिगेडियर जगदीश गगनेजा जी की अगस्त 2016 में जालंधर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.

November 16th 2019, 8:16 am

लेखक, इतिहासकार, दार्शनिक, समाज सुधारक थे वीर सावरकर – उपराष्ट्रपति

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नई दिल्ली. उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने कहा कि वीर सावरकर बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे. वह स्वतंत्रता सेनानी के साथ ही लेखक, इतिहासकार, राजनेता, दार्शनिक और समाज सुधारक भी थे. उपराष्ट्रपति नेहरू म्यूजियम एवं लाइब्रेरी में ‘Savarkar: Echoes from a Forgotten Past’ पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि वीर सावरकर तथा देश के विभिन्न हिस्सों में स्वतंत्रता संग्राम में बलिदान देने वाले अनेक वीरों के बारे में नहीं बताया गया, जिस कारण हमारी युवा पीढ़ी इनसे अनभिज्ञ है. कुछ इतिहासकारों ने सावरकर के बारे में नकारात्मक बातों को प्रचारित किया.

उन्होंने कहा कि सावरकर जैसे व्यक्तित्व की जीवनी लिखना आसान नहीं है. उन्होंने लेखक वीके संपत की सराहना की और कहा कि सावरकर के व्यक्तित्व के कई पहलू ऐसे हैं, जिन्हें लोग नहीं जानते. बहुत कम लोग जानते होंगे कि सावरकर ने देश में छुआछूत के खिलाफ एक सशक्त आंदोलन छेड़ा था. वीर सावरकर ने रत्नागिरी जिले में पतित पावन मंदिर का निर्माण कराया, जिसमें दलित सहित सभी हिन्दुओं को प्रवेश की अनुमति थी.

उपराष्ट्रपति ने कहा कि वीर सावरकर जाति रहित भारत की कल्पना करने वाले व्यक्ति थे. भारतीय मूल्यों के प्रति चिंतनशील इतिहास के सही ज्ञान का आह्वान करते हुए कहा कि वह वीर सावरकर ही थे, जिन्होंने 1857 के विद्रोह को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का नाम दिया. सावरकर ने समाज की 7 बेड़ियां बताई थीं, जिनमें पहली कठोर जाति व्यवस्था थी. सावरकर ने इसे इतिहास के कूड़ेदान में फैंके जाने योग्य बताया था.

वीर सावरकर किसी एक जाति नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति तक वैदिक साहित्य पहुंचाना चाहते थे. वह जाति आधारित व्यवसाय के खिलाफ थे और मानते थे कि इसे रुचि व दक्षता पर आधारित होना चाहिए. उन्होंने कहा कि सावरकर ग्लोबल मोबिलिटी में विश्वास रखते थे और भारतीय संस्कृति को विश्व के कोने-कोने तक पहुंचाना चाहते थे.

वीर सावरकर अंतरजातीय विवाह के समर्थक थे. वह कहते थे कि धर्म हृदय में, आत्मा में है, पेट में नहीं. उन्होंने कहा कि भारत के विकास में उनकी दूर दृष्टि वास्तव में उल्लेखनीय है. सावरकर ने कहा था कि हम यूरोप से 200 साल पीछे हैं. भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को जिन असंख्य कष्टों का सामना करना पड़ा, उन्हें याद करते हुए प्रत्येक व्यक्ति से अपने जीवन में कम से कम एक बार सेल्युलर जेल जाने की अपील की थी.

November 16th 2019, 7:46 am

देश की एकजुटता के लिए बिरसा मुंडा के जीवन से प्रेरणा ले जनजातीय समाज – रामेश्वर तेली

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नई दिल्ली. वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा अशोक विहार स्थित सनातन भवन में बिरसा मुंडा की जयंती पर जनजाति गौरव दिवस आयोजित किया गया. उत्तर पूर्व भारत में बड़ी संख्या में हुए धर्मान्तरण पर चिंता प्रकट करते हुए कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केन्द्रीय खाद्य प्रसंस्करण राज्य मंत्री रामेश्वर तेली ने कहा कि बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों से जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए संग्राम किया था. एक समय बिरसा मुंडा ने भी क्रिश्चैनिटी को अपना लिया था, लेकिन बाद में पुनः सनातन धर्म में आ गए और अपने समाज, धर्म, संस्कृति की रक्षा साम्राज्यवादी मिशनरी धर्मान्तरण से की. उन्होंने बिरसा मुंडा के जीवन को जानने की जनजाति समाज से अपील करते हुए देश की सनातन मुख्यधारा में बने रहने का आह्वान किया.

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता संथाली समाज और समग्र हिन्दू समाज में धार्मिक साम्यता कैसी है, इस पर शोघ निबंध लिख डॉक्टरेट की उपाधि लेने वाले जनजाति सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. राजकिशोर हांसदा ने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा ने कम आयु में देश, समाज, धर्म, संस्कृति की रक्षा के लिए के लिए अपना सर्वस्व बलिदान किया. बिरसा मुंडा की जन्म व कर्म भूमि झारखंड आज कई प्रकार की समस्याओं से ग्रस्त है. उनका जन्म स्थान खूंटी जिला जो बिरसा मुंडा के नाम से प्रसिद्ध था, आज वो देश और समाज को तोड़ने वाले षड्यंत्रकारियों का स्थान बना हुआ है. हमारे जनजाति समाज को सनातन धर्म, सनातन संस्कृति और देश की मुख्य धारा से अलग करने का बहुत बड़ा षड्यंत्र चल रहा है. एक तरफ विदेशी मिशनरियों द्वारा दूसरी तरफ से वामपंथी और तीसरा वामसेफ है जो समाज को तोड़ने का षड्यंत्र कर रहे हैं. यह लोग जनजातीय समाज को भ्रमित करते हैं कि तुम हिन्दू नहीं, सनातन धर्म से अलग हो, इसलिए तुम्हारा अलग धर्म कोड होना चाहिए. लेकिन भारत में अलग धर्म कोड होने की कोई जरूरत नहीं है. यह ईसाई मिशनरियों का जनजातीय समाज को हिन्दू समाज से अलग करने का बहुत बड़ा षड्यंत्र है. यही लोग झारखंड में बोलते हैं सरना धर्म अलग कोड होना चाहिए, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बोलते हैं कि गोंड धर्म अलग कोड होना चाहिए, गुजरात और राजस्थान में भीलों को अलग करने के लिए भीलों के लिए अलग कोड की बात करते हैं. देशभर में 11 करोड़ जनजाति समाज को देश की मुख्यधारा से अलग-थलग करके उनका ईसाईकरण करने का यह सुनियोजित षड्यंत्र है.

डॉ. हांसदा ने बताया कि यह सम्राज्यवादी विचारधारा है जो ब्रिटिशकाल से शुरु हुई. एक दूसरी षड्यंत्रकारी विचारधारा जो अरब देशों से यहां आई, उनका तरीका संख्या बढ़ाने का है. आज बड़ी संख्या में अवैध बांग्लादेशी मुस्लिम झारखंड और असम में बस गए हैं और जनजाति समाज की जमीन पर अवैध कब्जा करके वहां की बेटियों को लव जिहाद में फंसा कर धर्मान्तरण कर रहे हैं. मिशनरी षड्यंत्रकारी समाज में विभेद उत्पन्न कर जो खाई पैदा कर रहे हैं, वनवासी कल्याण आश्रम उस खाई को पाटकर समाज को एक करने का काम कर रहा है. उन्होंने बताया कि आज भी जनजातियों में व्यवहार की बहुत सी बातें वेदों से मिलती हैं.

अपना वतन अपना ही होता है, 370 एवं रामजन्मभूमि जैसे वर्तमान विषयों पर गजेन्द्र सोलंकी के काव्यपाठ ने सभी में जोश का संचार किया. वनवासी कल्याण आश्रम दिल्ली के अध्यक्ष शांति स्वरूप बंसल ने सभी अतिथियों का धन्यवाद देते हुए कहा कि हिन्दू जीवन का वास्तविक स्वरूप व्यवहार में देखना है तो वनवासी क्षेत्रों व गांवों की कुछ समय यात्रा करें, वहां भारत का मूल स्वरूप आज भी कायम है. कार्यक्रम में प्रज्ञा आर्ट थियेटर ग्रुप दिल्ली द्वारा बिरसा मुंडा के जीवन पर आधारित एक लघु नाटक ‘बिरसा मुंडा’ का मंचन किया गया, जिसमें वनवासी क्षेत्रों में ईसाई धर्मान्तरण के विरुद्ध बिरसा मुंडा के संघर्ष को सभी ने मंत्रमुग्ध होकर देखा व सराहना की.

लिथुआनिया देश के जनजातीय समाज से आए अतिथि विशेष रूप से सम्मिलित हुए जो आज भी वैदिक परंपराएं बचाए हुए हैं और क्रिश्चैनिटी से अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं. ज्ञान प्रकाशन द्वारा 16 खण्डों में प्रकाशित ‘एनसाइक्लोपिडीया मुण्डारिका’ उन्हें भेट दी गई. कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के नाते चिकित्सा अधिकारी एवं प्रभारी ई.एस.आई. डिस्पेंसरी वजीरपुर के डॉ. सनिका होरो उपस्थित थे.

November 16th 2019, 6:45 am

भारतीय इतिहास की गलत व्याख्या के साथ ही ऐतिहासक प्रमाणों को झुठलाते वामपंथी इतिहासकार

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इसमें कोई दो राय नहीं कि सत्य के उद्घाटन के अतिरिक्त इतिहास की कोई वैचारिक अथवा सांस्कृतिक प्रतिबद्धता नहीं होनी चाहिए. इतिहास में धर्मनिरपेक्ष सोच अथवा पंथनिरपेक्ष मूल्यों का भी समावेश नहीं होना चाहिए, क्योंकि तटस्थ दृष्टिकोण से लिखा इतिहास तो होता ही धर्म अथवा पंथ निरपेक्ष है. इतिहास आस्था का आधार अथवा विश्वास का प्रतीक भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि आस्था, विवेक और तर्क का शमन करती है. इतिहास बौद्धिक कट्टरता का निष्ठावान अनुयायी भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि इतिहास से संबद्ध सांस्कृतिक संकीर्णता, सांप्रदायिकता से कम खतरनाक नहीं है. इसलिए जब किसी प्रकरण से जुड़े नए साक्ष्य और प्रमाण उपलब्ध हुए हों तो उनकी प्रामाणिकता सत्यापित होने पर इतिहास-दृष्टि बदलना जरुरी हो जाता है. दरअसल कालांतर में इतिहास की वही लिपिबद्धता सार्थक और शाश्वत होगी, जो अतीत को वर्तमान साक्ष्यों और प्रमाणों के आधार पर यथावत प्रस्तुत करेगी. इस दृष्टि से हमारे तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवी अयोध्या विवाद से जुड़े मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की उस रिपोर्ट को सर्वथा नकारते रहे हैं, जो अब मंदिर मुद्दे को सुलझाने में प्रमुख आधार बनी है. वर्ष 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा विवादित स्थल पर कराए उत्खनन की रिपोर्ट को इन इतिहासकारों ने सर्वथा नकार दिया था.

नए साक्ष्य और प्रमाण प्रचलित मान्यता और पूर्वाग्रही दुराग्रहों के परिमार्जन में सहायक हो सकते हैं. विवेकशील प्रक्रिया की यही गतिशीलता विज्ञान अथवा वैज्ञानिक समझ की द्योतक है. यही जिज्ञासा मनुष्य की आंतरिक चेतना को गतिशील व जीवंत बनाए रखने का काम करती है. इसी चेतना से प्राप्त ऊर्जा आविष्कार के नए स्रोत तलाशती है, जो पुरानी मान्यताओं पर नई मान्यता स्थापित करती है. इससे मूल्य आधारित समाज व्यवस्था समय-समय पर परिवर्तित होती रहती है, तद्नुरूप समाज नए मूल्यों को धारण करता हुआ गतिशील व आधुनिक बना रहता है. लेकिन हमारे इतिहास का यह दुःखद एवं शर्मनाक पहलू है कि न तो आजादी के बाद हमने भारतीय इतिहास का नए तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर पुनर्लेखन कराया और न ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का समग्र लेखन करके उसे इतिहास का हिस्सा बनाया. छोटे-मोटे प्रयास दक्षिणपंथी सरकारों ने किए भी तो उन्हें धर्मनिरपेक्ष स्वरुप खंडित हो जाने का हौवा खड़ा कर नकार दिया. इससे देश के उन सामंतों, नवाबों और जमींदारों का राष्ट्रघाती चरित्र व चेहरा जनता के सामने नहीं आ पाया जो आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के साथ थे. बल्कि कालांतर में यही राष्ट्रघाती लोग राजनीति की अग्रिम पंक्ति में आ गए और उन्होंने लोकतंत्र में बड़ी साफगोई से सामंती मूल्यों को प्रच्छन्न रुप में पुनर्स्थापित कर दिया.

आजादी हासिल करने के बाद अनेक देशों ने राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाते हुए राष्ट्र के इतिहास का पुनर्लेखन कराया. इस प्रक्रिया में जापान, जर्मनी और चीन जैसे प्रमुख राष्ट्र शामिल हैं. लेकिन हमारे देश के नीति-नियंता और वामपंथी इतिहासकार स्वतंत्रता प्राप्ति के छह दशक बाद भी आंग्ल और वाम विचार तथा आंग्ल इतिहासकारों द्वारा लिखे हुए इतिहास को अनमोल थाती मानते हुए राम की खड़ाऊ की तरह सिर पर लादे घूम रहे हैं. यह सोच का ही नहीं वरन् अफसोस और अपमान का विषय है. आज सीमांत प्रदेशों में अलगाव की आवाज उठना, देश में अंतकर्लह का पैदा होना, जातीय संघर्ष का बढ़ना और सांप्रदायिक खाई और प्रशस्त होने के प्रमुख कारणों में से एक कारण अपने ही देश और जाति के इतिहास को ठीक-ठीक नहीं जानना भी है.

अयोध्या विवाद के सिलसिले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ के फैसले का जनता- जनार्दन ने सम्मान किया था. मुद्दे से जुड़े प्रमुख पक्षकारों ने भी मर्यादित बयान देकर संयम व विवेक की परिपक्वता दर्शाई थी. लेकिन संकट उन छद्म वामपंथी इतिहासकार और बुद्धिजीवियों की ज्ञान-दक्षता ने खड़ा किया, जो बाबरी विवाद में मुस्लिम पक्ष को हर तरह का गोला-बारुद मुहैया कराने में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे. चुनौती व दिक्कत उन राजनीतिज्ञों की भी रही, जो इस विवाद को भुनाते हुए अपनी राजनीति चमकाने में लगे रहे. इसलिए आहत बुद्धिजीवी कह रहे थे कि इस फैसले में इतिहास, साक्ष्य, तार्किकता और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को नजरअंदाज कर धार्मिक आस्था और दिव्यता को मान्यता दी गई है. तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री करूणानिधि ने तो इस विवाद को आर्य षड्यंत्र ही घोषित कर दिया था.

जबकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले का आधार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के 574 पृष्ठीय प्रतिवेदन को बनाया था. दरअसल तत्कालीन एएसआई के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक केके मोहम्मद ने सर्वेक्षण में पुरातात्विक और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर यह माना था कि अयोध्या में विवादित स्थल पर मस्जिद से पहले मंदिर था. मस्जिद का जो कथित ढांचा था, उसकी दीवारों में मंदिर के स्तंभ थे. स्तंभ के निचले भाग में 11वीं और 12वीं सदी में निर्मित मंदिरों में दिखने वाले पूर्ण कलश बने हुए थे. इसमें विष्णु हरिशिला पटल मिला था. इस पर नागरी लिपि संस्कृत भाषा में लिखा है कि यह मंदिर रावण को मारने वाले भगवान को समर्पित है. केके मोहम्मद कहते है कि इस खुदाई को निष्पक्ष रखने के लिए 137 श्रमिकों में से 52 मुस्लिम थे. खुदाई में जो 263 अवशेष मिले थे, उनसे यह प्रमाणित हुआ कि मस्जिद से पहले मंदिर था. इसकी पुष्टि अब सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने ऐतिहासिक फैसले में कर दी है. इसी आधार पर उच्च न्यायालय के तीनों जजों ने विवादित स्थल की केंद्रीय भूमि को निर्विवाद रूप से राम का जन्मस्थान माना था और अब इसी स्थिति को उच्चतम न्यायालय ने भी माना है.

जब-जब इतिहास को किसी भी शासन या व्यक्तियों के प्रति समर्पित किया गया है, उसकी सच्चाई संदेह के दायरों में रही है. कमोबेश भारत के इतिहास का भी यही हश्र हुआ है. अफ्रीका के प्रसिद्ध कवि बोल सोयंको ने 13 नवंबर 1988 को नेहरू व्याख्यान माला में कहा था, भारत के इतिहास ग्रंथों में जो कुछ लिखा है, उसमें हर जगह एक बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है. सोयंको का मानना था कि भारत का इतिहास यूरोप के हितों को ध्यान में रखकर लिखा गया है. दरअसल 10वीं शताब्दी में फारसी लेखक अलवेरूनी ने भारत को गलत तरीके से दुनिया में पेश करने की शुरूआत की थी. इसने लिखा था कि भारतीय लोगों में इतिहास की समझ नहीं है. इसे ही कालांतर में पाश्चात्य, अंग्रेज और मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़े भारतीय इतिहासकारों ने अपने-अपने ढंग से आगे बढ़ाया. यूरोपीयन इतिहासकारों ने लिखा कि भारतीय केवल धर्म और परंपराओं में डूबे रहते हैं, उन्हें बुनियादी चीजों से कोई लेना-देना नहीं है. अंग्रेज जब भारत की सांस्कृतिक, आर्थिक, सामाजिक और वैज्ञानिक विरासत को देखकर आश्चर्यचकित रह गए तो उन्होंने भारतीय इतिहास की गलत व्याख्या करना शुरू कर दी. जिसे ढोने की परंपरा आज भी चली आ रही है.

लाज की बात तो यह है कि आज भी हम अंग्रेज इतिहासकारों के लिखे उपनिवेशीय समर्थक इतिहास को तथ्यपरक और प्रामाणिक मानते चले आ रहे हैं. इस इतिहास ने ब्रिटिश साम्राज्यवादी ताकत के विरूद्ध हुए प्रत्येक आंदोलन व विद्रोह को देशद्रोह की संज्ञा दी. जबकि अधिकांश आंदोलनों व विद्रोह को जन समर्थन मिला हुआ था. अंग्रेजों की बांटों और राज करो की, इस नीतिगत दृष्टि का सटीक व सही जवाब आखिरकार क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर ने कथित विद्रोह की समग्रता की धरोहर 1857 के संग्राम को स्वतंत्रता संग्राम पुस्तक के रूप में जनता के सामने रखा. मार्क्स और एंजल्स, जो इस युद्ध के समकालीन थे, उन्होंने भी अनेक घटनाक्रमों का यथार्थ प्रस्तुतीकरण ‘न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून‘ में किया.

यदि 1857 की इस कौमी एकजुटता और सांस्कृतिक मूल्यों की इतिहास दृष्टि को आधुनिक इतिहासकारों ने आगे बढ़ाया होता तो आज हम अयोध्या फैसले को भी भारतीय राष्ट्र-राज्य के परिप्रेक्ष्य में एक निर्णायक फैसले के रूप में देख रहे होते ?

विवादित स्थल से पुरातत्वीय उत्खनन में मिले अवशेष और अभिलेख इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों की आंख खोलने वाले प्रमाण साबित होने चाहिए थे, लेकिन इन्होंने उत्खनित तथ्यों को झुठलाने का हठ किया. क्योंकि ये अवघारणाएं इनकी सोच और गढ़ी हुई विचारधारा के विपरीत जा रही थीं. जबकि एएसआई द्वारा उत्सर्जित नवीन स्रोतों को शोध का नया आधार बनाकर इतिहास दृष्टि में परिवर्तन लाने की जरूरत थी. इतिहास संबद्ध इन इतिहासकारों की तार्किक विशेषज्ञता कितनी उथली और थोथी थी, इसका उल्लेख उच्च न्यायालय के फैसले में न्यायाधीश सुधीर अग्रवाल ने करते हुए लिखा था कि तथ्यों के बारे में विशेषज्ञ शुतुरमुर्ग जैसा रुख अपना रहे थे. मुकदमे में ये बुद्धिजीवी सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से स्वतंत्र विषय विशेषज्ञ, इतिहासकार और पुरातत्वेत्ता के रूप में पेश हुए थे. इनके बयान कितने सतही व हास्यास्पद हैं, बतौर बानगी देखिए, सुविरा जायसवाल ने कहा था कि विवादित स्थल के बारे में उन्हें जो भी जानकारी मिली है, वे समाचार पत्रों में छपी रपटों और दूसरों की बताई गई जानकारी पर आधारित है. इन्होंने मध्यकाल के इतिहास विशेषज्ञों द्वारा दी राय के आधार पर इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर अपना बयान अदालत में दर्ज कराया था. प्रकरण में गवाही के रूप में न्यायालय में पेश हुई सुप्रिया वर्मा ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के उत्खनन को चुनौती दी थी. लेकिन शर्मनाक पहलू यह रहा था कि उन्होंने एएसआई द्वारा तैयार ‘ग्राउंड पेनीट्रेशन राडार‘ सर्वे की रिपोर्ट ही नहीं पढ़ी थी. खुदाई में इस आधुनिक तकनीक का उपयोग न्यायालय के आदेश से हुआ था. सुप्रिया वर्मा और जया मेनन ने एएसआई पर आरोप लगाया था कि आधार स्तंभ खुदाई स्थल पर प्रायोजित ढंग से रोपित किए गए हैं. लेकिन अदालत ने पाया उत्खनन के दौरान वे स्थल पर मौजूद ही नहीं थीं. इसी तरह एक अन्य पुरातत्वविद् शिरिन भटनागर ने जिरह के बीच स्वीकारा कि उन्हें मैदान में काम करने का कोई अनुभव नहीं है. कुछ इतिहास पुस्तकों की उन्होंने भूमिकाएं जरूर लिखी हैं. न्यायाधीश सुधीर अग्रवाल ने इन विशेषज्ञों के ज्ञान के संदर्भ में तल्ख टिप्पणी करते हुए लिखा, – मौलिक शोध अनुसंधान और जरूरी अध्ययन किए बगैर विशेषज्ञों ने अपनी राय दी. इस कारण सद्भाव स्थापित होने की बजाय ये ज्यादा जटिलताएं, वैमनस्य और विवाद पैदा करने में सहायक बने.

हमारे देश में जब-जब कोई विचारक, चिंतक, लेखक अथवा इतिहासकार, वेद, उपनिषद् पुराण या अन्य प्राचीन ग्रंथ और आध्यात्मिक ज्ञान की नई देनों के साथ आधुनिक संदर्भों में व्याख्या करता है तो वामपंथियों का उसका उपहास करना एक स्थायी स्वभाव बन गया है. किंतु अब सर्वोच्च न्यायालय ने वाल्मिकी रामायण, स्कंदपुराण और रामचरित मानस में उल्लेखित राम के साक्ष्यों को फैसले का आधार माना है. यह वक्त का तकाजा है कि अब नये पुरातत्वीय निष्कर्षों से ऐतिहासिक भूलों को ठीक किया जाए.

प्रमोद भार्गव

लेखक,साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

November 16th 2019, 5:30 am

राम और रामायण – भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की अभिव्यक्ति

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अरुण आनंद

राम और रामायण, भारत की सांस्कृतिक परंपरा का न केवल अभिन्न, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं. अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर के निर्माण का ओदांलन जब वर्ष 1983 में एक बार पुन: आरंभ हुआ तो बहुत से आलोचकों ने राम और रामायण को लेकर कई प्रश्न भी उठाए थे.

पर, वास्तविकता तो यह है कि राम और रामायण पूरे दक्षिण एशिया को एक सांस्कृतिक परंपरा में बांधते हैं. थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम, इंडोनेशिया, लाओस, म्यांमार व नेपाल में ही नहीं, बल्कि राम और रामायण का प्रभाव और उपस्थिति सिंगापुर, मलेशिया में भी है.

वाल्मीकि रामायण का अंग्रेजी में अनुवाद कर 1895 में उसे प्रकाशित करने वाले विद्वान रैल्फ टी.एच़ ग्रिफिथ के अनुसार, ”यह एक ऐसा महकाव्य है जो भारत की रग-रग में समाया हुआ है. यह भारत में हर व्यक्ति की स्मृति में स्थायी रूप से अंकित है. जहां जहां राम गए, वे सभी स्थान विख्यात हो गए. सदियों से श्रीराम को लोग लगातार याद करते आए हैं. भला ऐसे व्यक्तित्व के बारे में लिखे गए महाकाव्य को कोई कैसे काल्पनिक कह सकता है?”

यही मत इतालवी इंडोलोजिस्ट गैस्पर गोरेसियो (1808-1891) का भी है. गोरेसियो ने वाल्मीकि रामायण का अनुवाद इतालवी में किया था. उनका मानना है – यह रचना ऐसी घटनाओं पर आधारित है, जिसने हिन्दुओं के मानस पटल पर इतनी गहरी छाप छोड़ी कि इसे कभी भुलाया नहीं जा सकता.

एक अन्य विद्वान एफ. ई. पारगिटर ने अपनी पुस्तक ‘द ज्योग्रोफी ऑफ रामास एक्जाइल’ (1894) में भौगोलिक दृष्टि से उन स्थानों से संबंधित जानकारी की समीक्षा की है, जहां वाल्मीकि रामायण के अनुसार भगवान राम वनवास के दौरान गए थे. पारगिटर का निष्कर्ष है कि वाल्मीकि रामायण में दी गई जानकारी पूरी तरह से तथ्यात्मक है क्योंकि बिना इन स्थानों पर गए इतनी सटीक जानकारी देना संभव नहीं है.

स्वयं स्वामी विवेकानंद का कहना था कि रामायण व महाभारत प्राचीन आर्य जीवन व ज्ञान के एनसाइक्लोपीडिया हैं. मैकडोनाल के अनुसार, ”दुनिया भर में रामायण जैसी साहित्यिक रचना नहीं है, जिसने लोगों पर इतना गहरा प्रभाव छोड़ा हो.”

इतिहासकारों का यह भी मानना है कि जहां-जहां श्रीराम गए, वहां-वहां उनकी यात्राओं की स्मृति बनाए रखने के लिए मंदिर बनाए गए. इसलिए रामायण की तथ्यात्मकता पर प्रश्न उठाना तर्कसंगत नहीं है. इतिहासकार नंदिता कृष्णन इन स्थानों के सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहती हैं, ”जिन स्थानों पर भी श्री राम गए, वहां अभी भी उनकी स्मृति वैसी ही बनी हुई है, मानों वह कल ही आए हों. भारत में समय को सापेक्ष माना जाता है. इसलिए कुछ स्थानों पर तो उनकी स्मृति में मंदिर बन गए और बाकी स्थानों पर ये यात्राएं और श्रीराम की स्मृति लोकपरंपरा का अभिन्न अंग बन गईं. अगर साहित्य, पुरातत्व और स्थानीय पंरपराएं एक धागे में गुंथी हुई दिखती हैं तो भला इस पर किसी को आपत्ति क्यों हो?”

स्टीफन नैप जो भारतीय वैदिक परंपरा के गहन अध्ययेता हैं, कहते हैं – ”श्री राम की स्मृति आज भी उतनी मजबूती से कायम है क्योंकि उनका जीवन और शासनकाल दोनों ही असाधारण थे. उनके शासनकाल में शांति थी और प्रचुर समृद्धि भी, इसीलिए रामराज्य को आज सुशासन का संदर्भ बिंदु माना जाता है.”

आधुनिक संदर्भ ग्रंथों में देखें तो सूर्यवंशी श्रीराम का इतिहास फैजाबाद गजेटियर के तैंतालीसवें खंड के पांचवे अध्याय के आरंभ में दिया गया है. पर वाल्मीकि रामायाण के अनुसार श्री राम का जन्म आज से लगभग 9350 वर्ष पूर्व अयोध्या में उसी स्थान पर हुआ था, जिसे रामजन्म भूमि कहा जाता है. 06 दिसंबर, 1992 को बाबरी ढांचा ध्वस्त होने के बाद मंदिर संबंधित 265 अवशेषों के साथ एक महत्वपूर्ण शिलालेख भी निकला था. इसी शिलालेख से भी यही सिद्ध हुआ कि जिसे आज हिन्दू रामजन्मभूमि मानकर जहां मंदिर निर्माण का आग्रह कर रहे हैं, श्रीराम का जन्म वहीं हुआ था.

श्रीराम ने ‘मर्यादा पुरूषोत्तम’ के रूप में अपना जीवन जिया. उनके जीवन की सत्य घटनाओं पर आधारित कथा ऋषि वाल्मीकि ने ‘रामायण’ के माध्यम से संस्कृत में कही. बाद में तुलसीदास ने इसी कथा पर आधारित रामचरितमानस सहित कई अन्य ग्रंथों की रचना की तथा लोकस्मृति व भारतीय मानस में इसे और गहरे से अंकित किया. सामाजिक व व्यक्तिगत जीवन में आदर्श स्थापित करने तथा मूल्यों को स्थापित, संवर्धित व संरक्षित करने की भारतीय जीवन परंपरा के केंद्र में  निर्विववाद रूप से श्रीराम व रामायण हैं. कोई ऐसी भारतीय या प्रमुख विदेशी भाषा नहीं है, जिसमें रामायण का अनुवाद न हुआ हो. पिछले 300 वर्षों में श्रीराम व रामायाण पर भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में गहन शोध कार्य हुआ है. जिनका निष्कर्ष यही है कि श्रीराम भारत की सांस्कृतिक परंपरा की सबसे प्रखर अभिव्यक्ति हैं. वे केवल अवतार नहीं, बल्कि ऐसी प्रबुद्ध मूल्य परंपरा के प्रतिनिधि हैं. जिसकी ओर पूरा विश्व सम्मान व गर्व से देखता है. उन्हें किसी एक पूजा पद्धति या समाज विशेष से जोड़ कर देखना तथा रामायण जैसे ग्रंथ को संकुचित दृष्टि से कल्पना की उड़ान मानना भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के साथ गहरा अन्याय होगा.

(लेखक इंद्रप्रस्थ विश्व संवाद केंद्र के सीईओ हैं)

November 16th 2019, 2:58 am

16 नवम्बर / जन्म दिवस – ब्रह्मदेश में संघ के प्रचारक रामप्रकाश धीर जी

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नई दिल्ली. ब्रह्मदेश (बर्मा या म्यांमार) भारत का ही प्राचीन भाग है. अंग्रेजों ने जब 1905 में बंग-भंग किया, तो षड्यंत्रपूर्वक इसे भी भारत से अलग कर दिया था. इसी ब्रह्मदेश के मोनीवा नगर में 16 नवम्बर, 1926 को रामप्रकाश धीर जी का जन्म हुआ था. बर्मी भाषा में उनका नाम ‘सयाजी यू सेन टिन’ कहा जाएगा. उनके पिता नंदलाल जी वहां के प्रसिद्ध व्यापारी एवं ठेकेदार थे. सन् 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के समय जब अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां तेजी से बदलीं, तो पूरा परिवार बर्मा छोड़कर भारत में जालंधर आ गया. उस समय रामप्रकाश जी मोनीवा के वैस्ले मिशनरी स्कूल में कक्षा नौ के छात्र थे.

इसके बाद उनकी शेष पढ़ाई भारत में ही हुई. इस दौरान उनका सम्पर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हुआ. धीरे-धीरे संघ के विचार ने उनके मन में जड़ जमा ली. सन् 1947 में उन्होंने पंजाब विवि से बीए किया. बीए में उनका एक वैकल्पिक विषय बर्मी भाषा भी था. शिक्षा पूर्ण कर वे संघ के प्रचारक बन गये. उनका प्रारम्भिक जीवन बर्मा में बीता था. अतः उन्हें वहां पर ही संघ की स्थापना करने के लिए भेजा गया, पर 1947-48 में वहां काफी आंतरिक उथल-पुथल हो रही थी. अतः कुछ समय बाद ही उन्हें वापस बुला लिया गया.

इसके बाद वे पंजाब में ही प्रचारक रहे, पर संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता डॉ. मंगलसेन जी के आग्रह पर सन् 1956 में उन्हें फिर बर्मा भेजा गया. भारत से बाहर स्वयंसेवकों ने कई नामों से संघ जैसे संगठन बनाये हैं. इसी कड़ी में डॉ. मंगलसेन ने सन् 1950 में बर्मा में ‘भारतीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की थी, जो अब ‘सनातन धर्म स्वयंसेवक संघ’ कहलाता है. इसका विस्तार बहुत कठिन था. न साधन थे और न कार्यकर्ता. फिर बर्मा का अधिकांश भाग पहाड़ी है. वहां यातायात के साधन बहुत कम हैं. ऐसे में सैकड़ों मील पैदल चलकर रामप्रकाश जी ने बर्मा के प्रमुख नगरों में संघ की शाखाएं स्थापित कीं.

बर्मा मूलतः बौद्ध देश है, जो विशाल हिन्दू धर्म का ही एक भाग है. रामप्रकाश जी ने शाखा के माध्यम से युवाओं को जोड़ा, तो पुरानी पीढ़ी को प्रभावित करने के लिए महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं पर एक प्रदर्शिनी बनायी. इसे देखकर बर्मी शासन और प्रशासन के लोग भी बहुत प्रसन्न हुए. उन्होंने इसे बर्मा के सब नगरों में लगाने का आग्रह किया और इसके लिए सहयोग भी दिया. इस प्रकार प्रदर्शिनी के माध्यम से जहां एक ओर हिन्दू और बौद्ध धर्म के बीच समन्वय की स्थापना हुई, वहां रामप्रकाश जी का व्यापक प्रवास भी होने लगा. आगे चलकर यह प्रदर्शिनी थाइलैंड में भी लगायी गयी.

यह प्रदर्शिनी बर्मा में संघ के विस्तार में मील का पत्थर सिद्ध हुई. इसे देखने बड़ी संख्या में आम जनता के साथ-साथ बौद्ध भिक्षु और विद्वान भी आते थे. इसका पहला प्रदर्शन यंगून के पहाड़ों में स्थित ऐतिहासिक ‘काबा अये पगोडा’ में रेत की प्रतिमाओं और बिजली की आकर्षक चमक-दमक के बीच हुआ. आजकल तो तकनीक बहुत विकसित हो गयी है; पर उस समय यह बिल्कुल नयी बात थी. अतः पहले प्रदर्शन से ही इसकी धूम मच गयी.

इसके बाद रामप्रकाश जी का जीवन बर्मा और थाइलैंड में संघ शाखा तथा उसके विविध आयामों के विकास और विस्तार को समर्पित रहा. वृद्धावस्था में वे यंगून के पास सिरियम स्थित ‘मंगल आश्रम छात्रावास’ में रहकर बर्मा में संघ कार्य के विकास और विस्तार का इतिहास लिखने लगे. 20 जून, 2014 को यंगून के एक चिकित्सालय में फेफड़े और हृदय में संक्रमण के कारण उनका निधन हुआ. उनका अंतिम संस्कार उनकी कर्मभूमि में ही किया गया. रामप्रकाश जी का पूरा परिवार संघ से जुड़ा था. उनके बड़े भाई रामप्रसाद धीर सेवानिवृत्त होने के बाद विश्व हिन्दू परिषद में सक्रिय थे. 17 मार्च, 2014 को विहिप के दिल्ली स्थित केन्द्रीय कार्यालय पर ही उनका निधन हुआ था.

November 15th 2019, 6:21 pm

सेवा कार्य पर आधारित धारावाहिक ‘समर्पण’

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समाज में सेवाभाव से काम करने वाले हजारों हाथ हैं, जो अनेक सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हैं. ऐसे व्यक्ति/संस्थाओं पर रोशनी डालने का काम जल्द प्रसारित होने वाले ‘समर्पण’ नामक धारावाहिक से होने जा रहा है. आरुषा क्रिएशन द्वारा प्रस्तुत यह धारावाहिक 17 नवंबर से हर रविवार सुबह 10 बजे दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल पर (डी.डी-1 नेशनल) प्रसारित होगा.

कुछ लोगों का मकसद केवल पैसा कमाना, प्रसिद्धि या प्रतिष्ठा हासिल करना नहीं होता, बल्कि किसी के चेहरे की मुस्कान की वजह बनना, होता है. यह ऐसे लोग होते हैं, जो दूसरों की खुशियों में अपना समाधान ढूंढते हैं. अपने सामाजिक दायित्व को निभाते हैं. समाज में चेतना की अग्नि प्रज्ज्वलित करते हैं, यह समर्पण की परंपरा भारतीय दर्शन का एक हिस्सा है…और इसी पर आधारित हमारा धारावाहिक केवल एक माध्यम है, ऐसी कहानियों को आपके सामने प्रदर्शित करने का. इसी माध्यम से समर्पण के अर्थ का अनुभव करने के लिए, निःस्वार्थ भाव से देशभर में चलने वाले सेवा कार्यों पर आधारित है यह धारावाहिक – समर्पण.

‘आरुषा क्रिएशन्स’ के एकनाथ सातपुरकर द्वारा निर्मित धारावाहिक में समस्याओं से जूझने वाले लोगों का, संस्थाओं का परिचय दिया गया है, जो देशभर के विभिन्न राज्यों में चल रहे सेवा कार्य, जैसे शिक्षा, आरोग्य, दिव्यांग, महिला सबलीकरण, रोजगार, पर्यावरण आदि से जुड़े हैं.

इसका निर्देशन प्रसाद पत्की और चंद्रशेखर कुलकर्णी ने किया है. धारावाहिक के एपिसोड का लेखन अभिराम भडकमकर, डॉ. अनुऋचा सिंह, विजयलक्ष्मी सिंह, चिद्विलास क्षीरसागर, केकती कुलकर्णी, बालाजी सिंडिकेट (नासिक) आदि ने किया है. विशेष रूप से बनाया गया इस धारावाहिक का शीर्षक गीत संगीतकार अशोक पत्की ने तैयार किया है तथा वरिष्ठ गायक सुरेश वाडकर और गायिका देवकी पंडित ने इस गीत को अपनी आवाज दी है. परेश रावल, विवेक ओबेरॉय, मनोज जोशी, सचिन खेडेकर जैसे कई दिग्गज कलाकारों ने इस धारावाहिक के एपिसोड्स का सूत्र संचालन किया है. ‘समर्पण’ धारावाहिक के लिए संस्थाओं का चयन और संशोधन में ‘राष्ट्रीय सेवा भारती’ के ऋषिपाल डडवाल और उदय जोगलेकर ने अहम् भूमिका निभाई है.

अच्छे काम की शुरुआत अगर हम करते हैं तो समाज से हजारों हाथ सहायता करने आ जाते हैं, ऐसा ही अरुषा क्रिएशन की टीम अनुभव कर रही है. जरूर देखिये, आइए अनुभव करते हैं इस माध्यम से जो है समर्पण. जिनकी चाह है मुस्कान, कार्य ही है जिन की पहचान, कार्य में ही समाधान…समाज के प्रति जिन्होंने है किया जीवन अर्पण इनकी है यह हकीकत समर्पण….

November 15th 2019, 7:59 am

ईश्वरीय शक्ति का संकल्प सदैव पूरा होता है – भय्याजी जोशी

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वाशी, मुंबई (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह सुरेश उपाख्य भय्याजी जोशी ने कहा कि विश्व में केवल ईश्वरीय शक्ति का संकल्प पूरा होता है, आसुरी शक्ति का संकल्प कदापि पूरा नहीं होता. कई बार यह आसुरी शक्ति हमें प्रभावी होती दिखाई देती है, परंतु वह विजयी नहीं होती.

वाशी में सुरेश हावरे जी द्वारा लिखित ‘शिदोरी’ पुस्तक का भय्याजी जोशी तथा इतिहास संशोधक, लेखक बाबासाहब पुरंदरे ने लोकार्पण किया. मराठी के ज्येष्ठ लेखक मधु मंगेश कर्णिक भी कार्यक्रम में उपस्थित रहे.

सरकार्यवाह जी ने कहा कि भारत में हिन्दू, इस नाते से जन्म लेना यह हम सब का सौभाग्य है. ईश्वरीय शक्ति हमारी परीक्षा लेती है. ठीक उसी तरह भगवान श्रीराम ने सैकड़ों वर्षों तक हमारी परीक्षा ली है. हम राम मंदिर प्रत्यक्ष साकार होता हुआ देख पाएंगे, यह भी हमारा सौभाग्य ही है. लगभग साढ़े तीन सौ से चार वर्षों की परतंत्रता से स्वतंत्र होकर हम आज समृद्धि की ओर चल पड़े हैं. सत्य संकल्प का दाता प्रत्यक्ष ईश्वर ही है. मंदिर अवश्य बनेगा. सौभाग्य से इस परिवर्तन से, ईश्वरीय मालिका से हम जुड़ गए हैं. हावरे जी की रामभक्ति का प्रभाव है, कि उन्हें यह अवसर प्राप्त हुआ है. उन्होंने कहा कि हावरे जी यह एक बहुआयामी व्यक्तित्व हैं. वे वैज्ञानिक भी हैं और ईश्वर की भक्ति भी करते हैं. एक महत्त्वपूर्ण देवस्थान का दायित्व संभालने से उनकी भक्ति प्रकट होती है. जिस तरह यात्रा शुरू करते वक्त हम ‘शिदोरी’ (यातायात का खानपान) लेकर जाते हैं, वैसे ही सुरेश हावरे जी द्वारा लिखी यह पुस्तक ‘शिदोरी’ जीवन में हमें सहाय्यभूत रहेगी. हमारे जीवन को दिशा देगी.

बाबासाहब पुरंदरे जी ने कहा, सुरेश हावरे जी के कर्तृत्व और वक्तृत्व की सुगंध इस पुस्तक में छायी है. उन पर वाचन एवम् कर्तृत्व के संस्कार इसमें दिखाई देते हैं. यह पुस्तक केवल अपने साथ लेकर मत जाइये, उसे पढ़ना भी आवश्यक है.

लेखक सुरेश हावरे जी ने कहा कि रामजन्मभूमि पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का दिन और धारा 370 का समाप्त होना, यह दोनों दिन मेरे लिये प्रसन्नता के दिन थे. देश में विद्यमान हजारों-लाखों मंदिरों में रोजगार के अवसर पर उपलब्ध हैं. देश के विद्यापीठों को मंदिर व्यवस्थापन-प्रबंधन का पाठ्यक्रम शुरू करना चाहिए. मैं मंदिर व्यवस्थापन और कूड़े से संपत्ति की निर्मिति इन दोनों विषयों पर पुस्तकें लिख रहा हूं.

मधू मंगेश कर्णिक ने कहा कि यह साहित्यिक पुस्तक नहीं, अनुभव से सिद्ध हुआ साहित्य है. यह पुस्तक जीवन को स्पर्श करती है. सुरेश जी हावरे के व्यक्तित्व को उजागर करने वाली यह पुस्तक नई पीढ़ी को नई दृष्टि प्रदान करेगी.

November 15th 2019, 7:59 am

कुशीनगर मस्जिद विस्फोट का मास्टरमाइंड हाजी कुतुबुद्दीन गिरफ्तार

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नई दिल्ली. कुशीनगर के बैरागीपट्टी गांव में मस्जिद में बम विस्फोट के मास्टर माइंड हाजी कुतुबुद्दीन को पुलिस ने गुरुवार (नवंबर 15, 2019) को गोरखपुर से गिरफ्तार किया है. मस्जिद में विस्फोट के लगभग 66 घंटे बाद मास्टर माइंड हाजी कुतुबुद्दीन पुलिस के हत्थे चढ़ा.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कुतुबुद्दीन ने पुलिस के समक्ष विस्फोट से जुड़े कई राज खोले हैं. जिसके बाद सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ गई है. बताया जा रहा है कि घटना के तार आतंकियों से जुड़े हैं. जिसके कारण अब एजेंसियां मामले के आखिरी सिरे तक पहुंचने के लिए आगे की कड़ियों को जोड़ रही हैं.

इस मामले में पुलिस कुछ भी बोलने से बच रही है, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार आइजी रेंज गोरखपुर ने भी मस्जिद में हुए विस्फोट के तार राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में लिप्त संगठनों से जुड़े होने का अंदेशा जताया है. उनके अनुसार “विस्फोट मामले का जल्द ही पर्दाफाश हो जाएगा. आरोपी कुतुबुद्दीन से पूछताछ के लिए एटीएस लखनऊ की टीम डिप्टी एसपी दिनेश सिंह और आईबी वाराणसी की टीम पवन यादव के नेतृत्व में कुशीनगर पहुंच गई है.”

घटना में मुख्य आरोपी के अलावा उसके पोते अशफाक आलम की भूमिका भी सामने आई है. फिलहाल, अशफाक भी एटीएस की हिरासत में है, उसने घटना के बाद से हैदराबाद में शरण ले रखी थी.

मस्जिद में विस्फोट के बाद 4 मौलानाओं को गिरफ्तार किया गया था. जिसमें मस्जिद के मौलाना अजीमुद्दीन ने कुतुबुद्दीन को मास्टर माइंड बताया था. अजीमुद्दीन मस्जिद कमेटी का अध्यक्ष था और उसे बच्चों को नमाज पढ़ाने के लिए भी नियुक्त किया गया था. जहां वह उन्हें उर्दू की तालीम भी देता था.

11 नवंबर को कुशीनगर की मस्जिद में विस्फोट हुआ था. ये विस्फोट इतना जोरदार था कि वहां के ख़िड़की-दरवाजे सब चकनाचूर हो गए थे. दीवारों पर दरारें आ गई थीं और चीजें टूटकर बिखर गईं थी. पहले इसे एक इन्वर्टर बैट्री में धमाका बताया गया, जिस कारण मीडिया में अधिक सुर्खियों में नहीं रहा. लेकिन पुलिस ने धमाके की साइट से फोरेंसिक सैम्पलों को जांच के लिए भेजा तो स्पष्ट हो गया कि धमाका मस्जिद में रखे गए विस्फोटकों से हुआ है.

इसके पश्चात गोरखपुर एटीएस, स्थानीय इंटेलिजेंस यूनिट और अन्य इंटेलिजेंस एजेंसियों ने मामले की जांच शुरू की. जांच के आधार पर इमाम अजीमुद्दीन को साथियों इज़हार, आशिक और जावेद सहित हिरासत में लिया.

November 15th 2019, 7:59 am

शबरीमला – सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत करते हैं

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परंपराओं और रीति-रिवाजों से जुड़े मामले आस्था और विश्वास के मुद्दे हैं. शबरीमला मंदिर में एक विशेष आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध से लिंग असमानता या भेदभाव का कोई संबंध नहीं है, तथा यह प्रतिबंध केवल देवता की विशिष्टता के कारण है. हमारा दृढ़ मत है कि इस मामले में न्यायिक समीक्षा हमारे संविधान द्वारा प्रदत्त पूजा की स्वतंत्रता की भावना का उल्लंघन होगी. और संबंधित पक्ष की राय को ऐसे मामलों में सर्वोपरि माना जाना चाहिए.

हम सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पुनर्विचार याचिका को स्वीकार करने तथा मामले को बड़ी संवैधानिक पीठ के पास भेजने का स्वागत करते हैं.

अरुण कुमार

अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

November 15th 2019, 7:59 am

15 नवम्बर / जन्मदिवस – प्रयोगधर्मी शिक्षक गिजूभाई

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नई दिल्ली. शिक्षक वह दीपक है, जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाशमान करता है. इस प्रसिद्ध कहावत को गिजूभाई के नाम से प्रसिद्ध प्रयोगधर्मी शिक्षक गिरिजाशंकर वधेका जी ने पूरा कर दिखाया. 15 नवम्बर, 1885 को चित्तल (सौराष्ट्र, गुजरात) में जन्मे गिजूभाई के पिता अधिवक्ता थे. आनन्द की बात यह रही कि वे अध्यापन छोड़कर वकील बने, जबकि गिजूभाई उच्च न्यायालय की अच्छी खासी चलती हुई वकालत छोड़कर शिक्षक बने. गिजूभाई वकालत के सिलसिले में एक बार अफ्रीका गये. उन दिनों वहाँ बड़ी संख्या में भारतीय काम के लिये गये हुये थे. उनके मुकदमों के लिये भारत से वकील वहाँ जाते रहते थे. गांधी जी भी इसी प्रकार अफ्रीका गये थे. उस दौरान 1923 में गिजूभाई को पुत्र नरेन्द्र की प्राप्ति हुई. नरेन्द्र ने उनके जीवन में ऐसा परिवर्तन किया कि गिजूभाई अधिवक्ता से शिक्षक बन गये. अफ्रीका में उन दिनों भारतीय बच्चों के लिये कोई विद्यालय नहीं था. ऐसे में गिजूभाई ने नरेन्द्र को स्वयं जो पाठ पढ़ाये, उससे उन्हें लगा कि उनके भीतर एक शिक्षक छिपा है. ‘मोण्टेसरी मदर’ नामक एक छोटी पुस्तक में यह पढ़कर कि ‘बालक स्वतन्त्र और सम्मान योग्य है. वह स्वयं क्रियाशील और शिक्षणप्रिय है’ गिजूभाई का मन नये प्रकाश से जगमगा उठा. अब उन्होंने वकालत को त्याग दिया और पूरी तरह बाल शिक्षा को समर्पित हो गये. उन्होंने विश्व के प्रख्यात बालशिक्षकों की पुस्तकों का अध्ययन किया. अपने मित्रों, परिजनों, शिक्षकों तथा समाजशास्त्रियों से इस विषय में चर्चा की. फिर उनमें दिये गये विचार, प्रयोग तथा सूत्रों को भारतीय परिप्रेक्ष्य में लागू करने के लिये गिजूभाई ने एक बालमन्दिर की स्थापना की. इसमें उन्होंने गन्दे, शरारती और कामचोर बच्चों पर कई प्रयोगकर उन्हें स्वच्छ, अनुशासनप्रिय तथा स्वाध्यायी बना दिया. इससे उनके अभिभावक ही नहीं, तो तत्कालीन शिक्षा अधिकारी भी चकित रह गये. इन प्रयोगों की राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा होने लगी. गिजूभाई ने अपने प्रयोगों तथा अनुभवों का लाभ सब तक पहुँचाने के लिए ‘दक्षिणामूर्ति’ नामक पत्रिका भी निकाली. गिजूभाई शिक्षण को संसार का श्रेष्ठतम कार्य तथा सत्ता और धन के लोभ को शिक्षक की निष्ठा डिगाने वाले दो विषधर सर्प मानते थे. वे बच्चों की पिटाई को शिक्षक की मानसिक निर्बलता, कायरता तथा अत्याचार मानते थे. इसी प्रकार वे बच्चों को लालच देने को घूसखोरी से भी बड़ा अपराध मानते थे. गिजूभाई अपने जीवन में पर्यावरण संरक्षण को भी बहुत महत्व देते थे. वे अपने विद्यालय को शिक्षा का मन्दिर तथा अध्यापक व छात्रों की प्रयोग भूमि मानते थे. उन्होंने भावनगर स्थित ‘दक्षिणामूर्ति बाल भवन’ में नाटकशाला, खेल का मैदान, उद्यान, कलाकुंज, संग्रहालय आदि बनाये. गिजूभाई का मत था कि परीक्षा बाहर के बदले भीतर की, ज्ञान के बदले शक्ति की, यथार्थ के बदले विकास की, परार्थ के बदले आत्मार्थ की होनी चाहिये. वे चाहते थे कि परीक्षक भी बाहर के बदले भीतर का ही हो. उन्होंने बच्चों, अध्यापकों तथा अभिभावकों के लिये अनेक पुस्तकें लिखीं, जो आज भी बाल शिक्षा के क्षेत्र में आदर्श मानी जाती हैं. वे बच्चों से इतना अधिक प्यार करते थे कि बच्चे उनको मूँछाली माँ (मूँछों वाली माँ) कहते थे. बाल शिक्षा के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने वाले गिजूभाई का देहान्त 23 जून, 1939 को हुआ.

November 14th 2019, 6:04 pm

एक विशेष मंदिर की विशेष परम्परा लिंग-भेद नहीं – विहिप

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हिन्दू धर्म में लिंगभेद का कोई स्थान नहीं

नई दिल्ली. विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) ने शबरीमला मामले को बड़ी पीठ (7 जजों की) के पास भेजने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के सम्बन्ध में कहा कि एक विशेष (अद्वितीय) मंदिर की विशेष परम्परा लिंग-भेद नहीं है. विहिप महासचिव मिलिंद परांडे ने कहा कि हिन्दू धर्म किसी भी प्रकार के लिंग-भेद में विश्वास नहीं करता. शबरीमला की परम्परा किसी भी प्रकार के लिंग भेदभाव से संबंधित मामला नहीं है, बल्कि सही मायने में यह एक विशेष मंदिर की विशेष परंपरा है. मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने के माननीय सर्वोच्च न्यायालय के 3:2 के बहुमत के फैसले पर उन्होंने आशा व्यक्त की कि बड़ी पीठ यह भी सोचेगी कि क्या किसी न्यायालय को किसी धर्म के अन्तरंग मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए या नहीं.

विहिप महासचिव ने यह भी कहा कि भगवान अय्यप्पा के कई मंदिरों में से, केवल एक शबरीमला में ही, इसकी विशेष प्रकृति और परंपराओं के कारण, इस प्रकार का सीमित प्रतिबंध (10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं पर) है. असंख्य महिला श्रद्धालुओं को मंदिर की परंपरा में विश्वास है और इसके समर्थन में भारी संख्या में लाखों महिलाओं ने प्रदर्शन भी किया था. परांडे ने आशा व्यक्त की कि माननीय न्यायालय हिन्दुओं के धार्मिक अधिकारों और परंपराओं का सम्मान करते हुए ही अपना अंतिम निर्णय सुनाएगा.

November 14th 2019, 9:59 am

श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी सर्वसमावेशी विचारक थे

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दिल्ली में श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी जन्मशताब्दी समारोह का उद्घाटन नई दिल्ली. भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी के जन्मशताब्दी समारोह का दिल्ली में उद्घाटन करते हुए उपराष्ट्रपति एम. वैंकैया नायडू जी ने कहा कि देश के लिए संपदा निर्माण करने वाले किसानों और मजदूरों के यदि स्वास्थ्य की हम अधिक चिंता करें तो वे और भी अधिक संपदा का निर्माण करेंगे. ठेंगड़ी जी ने देश के श्रमिक आंदोलन को एक सकारात्मक दिशा दी और उसे आंदोलनों तथा हड़तालों से बाहर निकालकर देश के रचनात्मक विकास में सहभागी बनने के लिए प्रेरित किया. यह ठेंगड़ी जी के श्रम का ही परिणाम है कि आज उनके द्वारा स्थापित भारतीय मजदूर संघ देश का सबसे बड़ा श्रम संगठन है. मावलंकर सभागार में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले जी, जन्मशताब्दी समारोह समिति दिल्ली प्रदेश के अध्यक्ष एवं गुजरात के पूर्व राज्यपाल प्रो. ओमप्रकाश कोहली जी, भारतीय मजदूर संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष सी.के. सजी नारायणन जी, भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय महामंत्री बद्रीनारायण जी, स्वदेशी चिंतक, विचारक व गौतमबुद्ध विश्वविदयालय के उपकुलपति प्रो. भगवती प्रकाश शर्मा जी भी उपस्थित थे. उपराष्ट्रपति ने भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ सहित सभी संगठनों (जिनकी ठेंगड़ी जी ने स्थापना की थी) का आह्वान किया कि वे समाज के हर वर्ग को आर्थिक विकास की प्रक्रिया का हिस्सा बनाएं. तभी ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ तथा ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ का स्वप्न साकार होगा. उन्होंने समाज से भी आह्वान किया कि वह सरकार द्वारा संचालित योजनाओं में सक्रिय सहयोग कर देश में परिवर्तन का एक बड़ा चित्र खड़ा करें. उन्होंने कहा, 'हमेशा सरकार के भरोसे बैठे रहने से परिवर्तन नहीं होगा. जब तक समाज की सक्रिय भूमिका नहीं होगी, देश में वांछित परिवर्तन नहीं होगा.' उन्होंने कहा कि ठेंगड़ी जी दूरदृष्टा थे और उनकी नेतृत्व क्षमता अद्वितीय थी. उसी क्षमता के बल पर उन्होंने शून्य से कई हिमालय खड़े किये. 'वे सर्वसमावेशी विचारक थे. इसीलिए संसार के हर वर्ग में उनका सम्मान था. एक समर्पित राष्ट्रनेता के रूप में उन्होंने राष्ट्रसेवा की. उनका जीवन अनुकरणीय था. एक श्रमिक नेता होने के बावजूद उन्होंने कभी भी श्रमिक आंदोलन को हिंसक नहीं होने दिया. इतने बड़े नेता होने के बावजूद उनके पास न तो घर था और न ही कार अथवा मोबाइल फोन. यूनियन के एक छोटे से कमरे में ही उन्होंने अपना पूरा जीवन बिता दिया. ऐसे राष्ट्र नेता के श्रीचरणों में अपनी विनम्र श्रद्धांजलि समर्पित करता हूँ. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले जी ने कहा कि ठेंगड़ी जी कहा करते थे कि आधुनिकीकरण का अभिप्राय पश्चिमीकरण नहीं है. 'ठेंगड़ी जी एक विचारक और संगठक दोनों थे. इसके अलावा वे एक श्रेष्ठ मानव व अभिभावक भी थे. सामान्य बीड़ी मजदूर की भी वे उसी प्रकार चिंता करते थे, जिस प्रकार अन्य लोगों की. उनके जीवन काल में संगठन की ओर से उन्हें जो भी कार्य दिया गया, उसे उन्होंने सफलतापूर्वक संपन्न किया. आपातकाल में उन्होंने भूमिगत आंदोलन का सशक्त नेतृत्व किया. वे एक विचारक के साथ-साथ अध्येता भी थे. अपने अनुभव वे पुस्तकों में संकलित किया करते थे. स्वतंत्र भारत में वे स्वदेशी आंदोलन के जनक थे. इसके माध्यम से उन्होंने देश में आर्थिक आजादी के आंदोलन की शुरूआत की. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद की उन्होंने बहुत ही स्पष्ट व्याख्या की. प्रो. ओमप्रकाश कोहली ने कहा कि भारतीयता और राष्ट्रीयता ठेंगड़ी जी के चिंतन में दिखायी देती है. उन्होंने वर्ग संघर्ष के स्थान पर वर्ग सहयोग का मार्ग दिखाया. उनका स्पर्श जिन्हें मिला वह स्वयं को भाग्यशाली समझने लगता था. वे आत्मविलोपी थे, इसलिए सदैव स्वयं को पीछे रखते थे और साथ में काम करने वाले कार्यकर्ताओं को आगे रखते थे. उनका प्रेरणादायी व्यक्तित्व आज भी प्रेरणा देता है. वे विलक्षण संगठक और अद्भुत संगठन निर्माता थे. प्रो. भगवती प्रकाश शर्मा ने जी ठेंगड़ी जी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे संगठन शिल्पी, राष्ट्रऋषि और राष्ट्र की समस्याओं के प्रति विचारवान थे. अपने मौलिक चिंतन के आधार पर उन्होंने अनेक पुस्तकों की रचना की. ठेंगड़ी जी को संघ प्रचारक बनाने में उनकी मां का विशेष योगदान था. जब ठेंगड़ी जी संघ प्रचारक बने थे तो उनकी मां ने पूरे मोहल्ले में लोगों को भोज दिया था. कार्यक्रम के अंत में बद्रीनारायण ने धन्यवाद प्रस्ताव किया. इस अवसर पर ठेंगड़ी जी पर ‘आर्गनाइजर’ के विशेषांक का उपराष्ट्रपति एवं अन्य महानुभावों ने विमोचन किया. कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी जी एवं डा. कृष्ण गोपाल, अखिल भारतीय सह सम्पर्क प्रमुख रामलाल जी, केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर जी, पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री सत्यनारायण जटिया, भारतीय किसान संघ के संगठन मंत्री दिनेश कुलकर्णी जी, स्वदेशी जागरण मंच से सतीश कुमार जी, डॉ. अश्वनी महाजन जी, एवं अन्य उफस्थित थे.

November 14th 2019, 3:38 am

14 नवम्बर / जन्मदिवस – कथक की साधिका रोहिणी भाटे

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विश्व में नृत्य की अनेक विधाएं प्रचलित हैं; पर भारतीय नृत्य शैली की अपनी विशेषता है. उसमें गीत, संगीत, अंग संचालन, अभिनय, भाव प्रदर्शन आदि का सुंदर तालमेल होता है. इससे न केवल दर्शक बल्कि नर्तक भी अध्यात्म की ऊंचाइयों तक पहुंच जाता है; पर ऐसा केवल वही कलाकार कर पाते हैं, जो नृत्य को मनोरंजन या पैसा कमाने का साधन न समझकर साधना और उपासना समझते हैं. भारत की ऐसी ही एक विशिष्ट नृत्य शैली कथक की साधिका थीं डॉ. रोहिणी भाटे. रोहिणी भाटे का जन्म 14 नवम्बर 1924 को पटना, बिहार में हुआथा. पर इसके बाद का उनका जीवन पुणे में ही बीता. विद्यालयीन शिक्षा के बाद उन्होंने स्नातकोत्तर और फिर कथक में पीएचडी की. 1947 में उन्होंने पुणे में ‘नृत्य भारती’ की स्थापना कर सैकड़ों छात्र-छात्राओं को कथक की शिक्षा दी. उनकी योग्यता को देखकर खैरागढ़ विश्वविद्यालय और कथक केन्द्र, दिल्ली ने उन्हें अपनी परामर्श समिति में स्थान दिया. पुणे विश्वविद्यालय में कथक शिक्षण का पाठ्यक्रम भी उनकी सहायता से ही प्रारम्भ हुआ था. रोहिणी भाटे विख्यात कथक नर्तक लच्छू महाराज और पंडित मोहनराव कल्याणपुरकर की शिष्या थीं. इसके साथ ही उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में विधिवत प्रशिक्षण केशवराव भोले व डॉ. वसंतराव देशपांडे से पाया था. संस्कृत और मराठी साहित्य से उन्हें बहुत प्रेम था. उन्होंने अनेक प्राचीन व नवीन साहित्यिक कृतियों पर नृत्य प्रस्तुत किये. इसलिये उनके नृत्य गीत और संगीत प्रेमियों के साथ ही साहित्य प्रेमियों को भी आकृष्ट करते थे. उन्हें कथक नृत्य को प्रसिद्धि दिलाने के लिये अनेक मान-सम्मानों से अलंकृत किया गया. 1979 में उन्हें प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी सम्मान मिला. इसके बाद वर्ष 2007 में केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी ने उन्हें अपनी ‘रत्न सदस्यता’ प्रदान की. इससे पूर्व महाराष्ट्र राज्य पुरस्कार, महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार, कालिदास सम्मान जैसे अनेक पुरस्कार भी उन्हें मिले. इसके बाद भी उनकी विनम्रता और सीखने की वृत्ति बनी रही. यदि किसी विश्वविद्यालय से उन्हें प्रयोगात्मक परीक्षा लेने के लिये बुलावा आता, तो वे अवश्य जाती थीं. कथक की नयी प्रतिभाओं से मिलकर उन्हें प्रसन्नता होती थी. वे साल में एक-दो महीने लखनऊ रहकर लच्छू महाराज से लखनऊ घराने की तथा जयपुर में मोहनराव कल्याणपुरकर से जयपुर घराने की विशेषताएं सीखतीं थीं. वहां से उन्हें जो पाथेय मिलता, पुणे जाकर उसका अनुशीलन और विश्लेषण करती थीं. इस प्रकार प्राप्त निष्कर्ष को फिर अपने तथा अपनी शिष्य मंडली के नृत्य में समाहित करने में लग जातीं. इससे उनके नृत्यों में सदा नूतन और पुरातन का सुंदर समन्वय दिखायी देता था. नृत्य के साथ उनकी रुचि लेखन में भी थी. उनके शोधपूर्ण लेख कथक गोष्ठियों में बहुत आदर से पढ़े जाते थे. उन्होंने मराठी में अपनी आत्मकथा ‘माझी नृत्यसाधना’ लिखी और आधुनिक नृत्य की प्रणेता आइसाडोरा डंकन की आत्मकथा का मराठी अनुवाद ‘मी आइसाडोरा’ किया. नंदिकेश्वर के अभिनय दर्पण की संहिता का अन्वय, हिन्दी अनुवाद और टिप्पणियों सहित ‘कथक दर्पण दीपिका’ उनके गहरे अध्ययन और अनुभव का निचोड़ है. जीवन के अंतिम क्षण तक कथक को समर्पित डॉ. रोहिणी भाटे ने अपने घुंघरुओं की ताल व गति को अपनी कर्मस्थली पुणे में 10 अक्तूबर, 2008 को सदा के लिये विराम दे दिया.  

November 13th 2019, 6:44 pm

13 नवम्बर / जन्मदिवस – वनवासियों के सच्चे मित्र भोगीलाल पण्ड्या

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राजस्थान के वनवासी क्षेत्र में भोगीलाल पंड्या का नाम जन-जन के लिये एक सच्चे मित्र की भाँति सुपरिचित है. उनका जन्म 13 नवम्बर, 1904 को ग्राम सीमलवाड़ा में श्री पीताम्बर पंड्या के घर में माँ नाथीबाई की कोख से हुआ था. उनकी प्रारम्भिक शिक्षा अपने गाँव में ही हुई. इसके बाद डूँगरपुर और फिर अजमेर से उच्च-शिक्षा प्राप्त कर उन्होंने राजकीय हाईस्कूल, डूँगरपुर में अध्यापन को अपनी जीविका का आधार बनाया. 1920 में मणिबेन से विवाह कर उन्होंने गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया. भोगीलाल जी की रुचि छात्र जीवन से ही सामाजिक कार्यों में थी. गृहस्थ जीवन अपनाने के बाद भी उनकी सक्रियता इस दिशा में कम नहीं हुई. उनकी पत्नी ने भी हर कदम पर उनका साथ दिया. 1935 में जब गांधी जी ने देश में हरिजन उद्धार का आन्दोलन छेड़ा, तो उसकी आग राजस्थान में भी पहुँची. भोगीलाल जी इस आन्दोलन में कूद पड़े. उनका समर्पण देखकर जब डूँगरपुर में ‘हरिजन सेवक संघ’ की स्थापना की गयी, तो भोगीलाल जी को उसका संस्थापक महामन्त्री बनाया गया. समाज सेवा के लिये एक समुचित राष्ट्रीय मंच मिल जाने से भोगीलाल जी का अधिकांश समय अब इसी में लगने लगा. धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि सब ओर फैलने लगी. अतः उनका कार्यक्षेत्र भी क्रमशः बढ़ने लगा. हरिजन बन्धुओं के साथ ही जनजातीय समाज में भी उनकी व्यापक पहुँच हो गयी. वनवासी लोग उन्हें अपना सच्चा मित्र मानते थे. उनके सेवा और समर्पण भाव को देखकर लोग उन्हें देवता की तरह सम्मान देने लगे. भोगीलाल जी का विचार था कि किसी भी व्यक्ति और समाज की स्थायी उन्नति का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम शिक्षा है. इसलिये उन्होंने जनजातीय बहुल वागड़ अंचल में शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार किया. इससे सब ओर उनकी प्रसिद्धि ‘वागड़ के गांधी’ के रूप में हो गयी. गांधी जी द्वारा स्थापित भारतीय आदिम जाति सेवक संघ, राजस्थान हरिजन सेवक संघ आदि अनेक संस्थाओं में उन्होंने मेरुदण्ड बनकर काम किया. भोगीलाल जी की कार्यशैली की विशेषता यह थी कि काम करते हुए उन्होंने सेवाव्रतियों की विशाल टोली भी तैयार की. इससे सेवा के नये कामों के लिये कभी लोगों की कमी नहीं पड़ी. 1942 में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के समय राजकीय सेवा से त्यागपत्र देकर वे पूरी तरह इसमें कूद पड़े. वागड़ अंचल में उनका विस्तृत परिचय और अत्यधिक सम्मान था. उन्होंने उस क्षेत्र में सघन प्रवास कर स्वतन्त्रता की अग्नि को दूर-दूर तक फैलाया. 1942 से उनका कार्यक्षेत्र मुख्यतः राजनीतिक हो गया; फिर भी प्राथमिकता वे वनवासी कल्याण के काम को ही देते थे. 1944 में उन्होंने प्रजामंडल की स्थापना की. रियासतों के विलीनीकरण के दौर में जब पूर्व राजस्थान का गठन हुआ, तो भोगीलाल जी उसके पहले मन्त्री बनाये गये. स्वतन्त्रता के बाद भी राज्य शासन में वे अनेक बार मन्त्री रहे. 1969 में उन्हें राजस्थान खादी ग्रामोद्योग बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया. समाज सेवा के प्रति उनकी लगन के कारण 1976 में शासन ने उन्हें ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत किया. 31 मार्च, 1981 को वनवासियों का यह सच्चा मित्र अनन्त की यात्रा पर चला गया.

November 12th 2019, 5:54 pm

‘दिव्यांग’ राहुल देशमुख कर रहे ‘दिव्य कार्य’ – भय्याजी जोशी

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मुंबई (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ने कहा कि ‘काम करते समय बीच में ही रुकने वाले बहुत दिखाई देते हैं, परंतु हार के पश्चात भी अपना कार्य निरंतर आगे ले जाने वाले राहुल देशमुख दृष्टीहीन होने के पश्चात भी समाज के लिए दिव्य कार्य कर रहे हैं. सरकार्यवाह ने राहुल देशमुख के कार्य की प्रशंसा की. वे दृष्टीहीन हैं, लेकिन उनका कार्य दिव्य है.

केशवसृष्टी संस्था द्वारा समाज में उल्लेखनीय कार्य करने वाले व्यक्तियों व संस्थाओं को प्रत्येक वर्ष ‘केशवसृष्टी’ पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है. इस साल का पुरस्कार सोमवार, 11 नवंबर को आयोजित कार्यक्रम में ‘नेशनल एसोसिएशन फॉर वेल्फेअर ऑफ फिजिकल चैलेंज्ड’ संस्था के संस्थापक राहुल देशमुख को प्रदान किया गया. दादर, शिवाजी पार्क स्थित स्वातंत्र्यवीर सावरकर सभागृह में आयोजित कार्यक्रम में केशवसृष्टी के अध्यक्ष एस.एस. गुप्ता, केशवसृष्टी पुरस्कार चयन समिति की अध्यक्षा हेमाताई भाटवडेकर, चयन समिति सदस्य मंच पर उपस्थित थे.

भय्याजी जोशी ने कहा कि किसी कार्य को करते समय आने वाली समस्याओं का हल न निकलने के कारण कार्य पूर्णत: बंद करने वालों की संख्या बहुत है. कठिन परिस्थिति में भी अपने कार्य को निष्ठापूर्वक आगे ले जाने वालों की संख्या बहुत कम है. उनमें से एक राहुल देशमुख हैं. राहुल जी को भला कौन दिव्यांग कह सकता है? उन्हें दृष्टी है. जिन दिव्यांग को हम दिव्यांग के रूप में नहीं देखते, उनके प्रतिनिधि हैं राहुल देशमुख. दिव्यांग होकर भी राहुल जी दिव्य कार्य कर रहे हैं. वह नेत्रहीन हैं, परंतु उन्हें दृष्टि नहीं है, ऐसा कदापि नहीं है. आज हम ऐसे श्रेष्ठ कार्य करने वाले व्यक्ति का सत्कार कर रहे हैं. कोई साथ रहे या ना रहे, इसकी चिंता न करते हुए निर्भयता से अपनी मंजिल तक जाना इतना आसान नहीं.’

राहुल देशमुख ने कहा कि ‘हम ग्रामीण भाग के नेत्रहीन और दिव्यांग बच्चों के लिए काम करते हैं. उन्हें समाज के मुख्य प्रवाह में लाने के लिए हम प्रयत्नशील हैं. उन बच्चों का कार्य के प्रति लगाव देखकर, उन में आत्मविश्वास जागृत कर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने के लिये जो काम कर रहा हूं, उस काम के कारण मुझे यह पुरस्कार मिला है. उन्होंने कहा कि स्वयं के अंधत्व से लड़ते समय घोर निराशा के अनेक प्रसंग आए, लेकिन कभी निराश न हुआ. अडिग रहते हुए उन कठिन परिस्थितियों को पार किया. कार्य के प्रति हमारे मन में तीव्र इच्छा है, तो कितने भी संकट क्यों न आएं, आप का कार्य कभी रुकता नहीं.

राहुल देशमुख तीन वर्ष की आयु में ही दृष्टिहीन हो गए थे. लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई निरंतर जारी रखी. उन्होंने बीएड., एम.एस.डब्ल्यू. का अध्ययन पूर्ण कर अंध-दिव्यागों को संगणक का प्रशिक्षण देने का कार्य किया. उनका मानना था कि अगरबत्ती, मोमबत्ती तैयार करने का प्रशिक्षण लेकर अंध-व्यक्ति सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत नहीं कर सकता. इसलिए कुछ अलग करने का प्रयास किया. आज उनकी संस्था में 1250 दृष्टिहीन दिव्यांग छात्र शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं.

November 12th 2019, 6:16 am

भारतीय संस्कृति, समाज व अर्थव्यवस्था की पहचान मुझे दत्तोपंत जी के माध्यम से हुई – एस. गुरुमूर्ति

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मुंबई (विसंकें). रिजर्व बैंक के निदेशक एवं अर्थशास्त्री एस, गुरुमूर्ति जी ने कहा कि ‘भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी जी समय से आगे की सोच रखने वाले दृष्टा थे.’ ‘वामपंथी आर्थिक सोच से पुरस्कृत हुआ पूंजीवाद अधिक समय तक नहीं रह सकता. यह, दत्तोपंत जी ने 1992 से पूर्व ही कहा था. दोनों के पास संपत्ति का केंद्रीकरण होना, यह इसका मुख्य कारण है. 1990 से पूर्व ही उन्होंने कहा था कि विश्व के प्रत्येक देश और समाज के लिए कोई भी एक आदर्श आर्थिक प्रारूप हो ही नहीं सकता. इसलिए प्रत्येक समाज व देश को अपने स्वयं का आर्थिक प्रारूप बनाना चाहिए. उन्होंने कहा कि दत्तोपंत जी का अक्तूबर 2004 में निधन हुआ और 2005 में जी-२० समूह ने दत्तोपंत जी के विचार को विचार तत्त्व के रूप में अपनाया. 2008 में विश्व बैंक ने भी यह तत्त्व अपनाया.

गुरुमूर्ति जी दत्तोपंत ठेंगडी जन्मशताब्दी समारोह उद्घाटन कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे. सोमवार को दादर के योगी सभागृह में कार्यक्रम का आयोजन किया गया था. कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल राम नाईक, कोंकण प्रांत संघचालक डॉ. सतीश मोढ जी, भारतीय मजदूर संघ से उदयराव पटवर्धन और संयोजक अनिल ढुमणे, स्वदेशी जागरण मंच के पीयूष सुरैय्या मंच पर उपस्थित थे.

गुरुमूर्ति जी ने कहा कि ‘भारतीय संस्कृति, समाज और भारतीय अर्थव्यवस्था की असली पहचान मुझे दत्तोपंत ठेंगड़ी जी के माध्यम से हुई.’ इससे पूर्व देश की सभी नामी कंपनियों के साथ मैंने आर्थिक सलाहकार के रूप में काम किया था. परंतु, मेरा और देश की बड़ी कंपनियों के मालिकों, वरिष्ठ नौकरशाहों का आर्थिक आंकलन पाश्चात्य विचारधारा पर आधारित था. वैश्वीकरण हुआ, तो मैंने दत्तोपंत जी से पूछा, इस पर क्या कर सकते हैं? तब दत्तोपंत जी ने कहा कि ‘स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना कर के उस में काम करो. देशभर में भ्रमण करने के बाद भारतीय समाज से ही इसका उत्तर मिलेगा.’ दत्तोपंत जी के कहे अनुसार, मैंने देशभर का भ्रमण किया. देश के कोने-कोने में स्थानीय लोगों से बातचीत की. परस्पर सहयोग तथा स्वयं की बुद्धि व परिश्रम से स्थापित अनेक औद्योगिक इकाईयां मुझे देखने को मिलीं.’ यह सब देखने के बाद मेरा अर्थशास्त्र का आंकलन बदलने लगा.

भारतीय मजदूर संघ से उदयराव पटवर्धन जी ने भारतीय मजदूर संघ में विपरीत परिस्थितियों में किये का स्मरण किया. उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल राम नाईक जी ने दत्तोपंत ठेंगड़ी जी के संस्मरण सुनाए.

कोंकण प्रांत संघचालक सतीश मोढ ने बताया कि ‘भारतीय मजदूर संघ की स्थापना के समय संगठन का नाम क्या होना चाहिए, इस बात पर चर्चा हुई. ‘भारतीय श्रमजीवी संगठन’, ऐसा नाम दत्तोपंत जी ने सुझाया था. परंतु उपस्थित कार्यकर्ताओं के सुझाव पर ‘भारतीय मजदूर संघ’ नाम स्वीकृत किया.

अनिल ढुमणे ने प्रस्तावना प्रस्तुत की. पीयूष सूरैय्या ने आभार व्यक्त किया. प्रशांत देशपांडे ने कार्यक्रम का संचालन किया.

November 12th 2019, 5:44 am

12 नवम्बर / जन्मदिवस – समाजसेवी क्रांतिकारी सेनापति बापट

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सेनापति बापट के नाम से प्रसिद्ध पांडुरंग महादेव बापट का जन्म 12 नवम्बर, 1880 को पारनेर (महाराष्ट्र) में श्री महादेव एवं गंगाबाई बापट के घर में हुआ था. पारनेर तथा पुणे में शिक्षा पाकर उन्होंने कुछ समय मुंबई में पढ़ाया. इसके बाद वे मंगलदास नाथूभाई की छात्रवृत्ति पाकर यांत्रिक अभियन्ता की उच्च शिक्षा पाने स्कॉटलैंड चले गये. वहां उन्होंने पढ़ाई के साथ ही राइफल चलाना भी सीखा. इस बीच उनकी भेंट श्यामजी कृष्ण वर्मा और वीर सावरकर से हुई. इससे उनके मन में भी स्वाधीनता के बीज प्रस्फुटित हो उठे.

शेफर्ड सभागृह के एक कार्यक्रम में उन्होंने ब्रिटिश शासन में भारत की दशा पर निबन्ध पढ़ा. इसके प्रकाशित होते ही उन्हें भारत से मिल रही छात्रवृत्ति बंद हो गयी. वीर सावरकर ने इन्हें बम बनाने की तकनीक सीखने फ्रांस भेजा. उनकी इच्छा ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को गोली से उड़ाने तथा हाउस ऑफ कॉमन्स में बम फोड़ने की थी; पर उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी गयी.

इसके बाद सावरकर तथा वर्मा जी की सलाह पर वे कोलकाता आकर कुछ क्रांतिकारी घटनाओं में शामिल हुए. पुलिस ने उन्हें इंदौर में गिरफ्तार किया; पर तब तक उनका नाम बताने वाले मुखबिर को क्रांतिकारियों ने मार दिया. अतः उन पर अभियोग सिद्ध नहीं हुआ और वे जमानत पर छूट गये.

अब बापट जी ने अपना ध्यान समाजसेवा तथा प्रवचन द्वारा धर्म जागरण की ओर लगाया. वे महार बच्चों को पढ़ाने लगे. प्रायः वे सफाई कर्मियों के साथ सड़क साफ करने लगते थे. अपने पुत्र के नामकरण पर उन्होंने पंडितों के बदले हरिजनों को पहले भोजन कराया. उन्होंने तिलक, वासु काका, श्री पराड़कर तथा डा. श्रीधर वेंकटेश केलकर के साथ कई पत्रों में भी काम किया.

1920 में उन्होंने अपनी संस्था ‘झाड़ू-कामगार मित्र मंडल’ द्वारा मुंबई में हड़ताल कराई. वे जनजागृति के लिए गले में लिखित पट्टी लटकाकर भजन गाते हुए घूमते थे. इससे श्रमिकों को उनके अधिकार प्राप्त हुए. ‘राजबन्दी मुक्ति मंडल’ के माध्यम से उन्होंने अंदमान में बंद क्रांतिकारियों की मुक्ति के लिए अनेक लेख लिखे, सभाएं कीं तथा हस्ताक्षर अभियान चलाया.

टाटा कंपनी की योजना सह्याद्रि की पहाड़ियों पर एक बांध बनाने की थी. इससे सैकड़ों गांव डूब जाते. इसके विरोध में बापट जी तथा श्री विनायक राव भुस्कुटे ने आंदोलन किया. इस कारण उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया. छूटते ही वे फिर जन जागरण में लग जाते. उनके ‘रेल रोको अभियान’ से नाराज होकर शासन ने उन्हें सात वर्ष के लिए सिन्ध हैदराबाद की जेल में भेज दिया. इस आंदोलन से ही उन्हें ‘सेनापति’ की उपाधि मिली.

वहां से लौटकर वे महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष बने. इस दौरान किये गये आंदोलनों के कारण उन्हें दस वर्ष का कारावास हुआ. इसमें से सात साल वे अंदमान में रहे. इसके बाद वे सुभाष बाबू द्वारा स्थापित फारवर्ड ब्लॉक में सक्रिय हुए. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उग्र भाषणों के लिए वे कई बार गिरफ्तार हुए. नासिक जेल में तो वे अपने पुत्र वामनराव के साथ बंद रहे.

1946 के अकाल में उन्होंने श्रमिकों के लिए धन संग्रह किया. जवानी के अधिकांश वर्ष जेल में बिताने वाले बापट जी को 15 अगस्त, 1947 को पुणे में ध्वजारोहण करने का गौरव प्राप्त हुआ. इसके बाद भी गोवा मुक्ति तथा संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई. भक्ति, सेवा तथा देशप्रेम के संगम सेनापति बापट का निधन 28 नवम्बर, 1967 को हुआ. पुणे-मुंबई में उनके नाम पर एक सड़क का नामकरण किया गया है.

November 11th 2019, 7:24 pm

12 नवम्बर / प्रेरक प्रसंग – मस्जिद में खाकी निक्कर व भगवा पट्टी का सम्मान

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नई दिल्ली. विमान यात्रा सुखद तो है, पर उसकी दुर्घटनाएं बहुत दुखद होती हैं. ऐसा ही एक दुखद प्रसंग 12 नवम्बर, 1996 को घटित हुआ, जब हरियाणा में भिवानी के पास चरखी दादरी गांव के ऊपर दो विमान टकरा गये. इनमें से एक सऊदी अरब का तथा दूसरा कजाक एयरवेज का था. दोनों में आग लग गयी और वे ढाणी फोगाट, खेड़ी सनवाल तथा मालियावास गांवों के खेतों में आ गिरे. सऊदी विमान के कुल 312 लोगों में से 42 हिन्दू, 12 ईसाई तथा शेष सब मुसलमान थे. कजाक विमान में भी कुल 39 लोग थे. इस प्रकार देखते ही देखते 351 लोग काल के मुख में समा गये. दुर्घटना के कुछ समय बाद ही भिवानी के जिला संघचालक जीतराम जी के साथ सैकड़ों स्वयंसेवक घटनास्थल पर पहुंच गये. वहां के डॉ. हेडगेवार चिकित्सालय के चिकित्सक भी आ गये. अंधेरे के कारण पैट्रोमैक्स तथा एक जेनरेटर का प्रबंध कर सबसे पहले जीवित लोगों को ढूंढा गया, तो दो लोग ऐसे मिल गये, पर अस्पताल जाते समय मार्ग में ही वे भी चल बसे.

एक स्थानीय किसान चंद्रभान अपना ट्रैक्टर ले आये. स्वयंसेवकों ने उसमें बुरी तरह जले हुए शवों को रखा. रात में ही एक बर्फ के कारखाने को चालू कराया और 169 शवों को प्रातः पांच बजे तक भिवानी के चिकित्सालय में पहुंचाया गया. स्वयंसेवकों ने तत्काल ही ‘विमान दुर्घटना पीड़ित सहायता समिति’ का गठन कर लिया. इसमें संघ के साथ ही विश्व हिन्दू परिषद, सेवा भारती, भारत विकास परिषद, भारतीय जनता पार्टी, विद्यार्थी परिषद, आर्य समाज तथा अन्य सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि रखे गये. समिति ने तत्काल कफन तथा ताबूतों का प्रबंध किया. यह समाचार फैलते ही मृतकों के संबंधी, पत्रकार तथा पुलिस-प्रशासन वाले वहां आने लगे. अतः पूछताछ विभाग के साथ ही उनके लिए चाय, पानी, भोजन तथा वाहन आदि की व्यवस्था की गयी.

कुछ मृतकों के शव पुलिस की उपस्थिति में उनके परिजनों को सौंप दिये गये. जिनके बारे में ठीक जानकारी नहीं मिली, ऐसे 76 मुसलमान तथा तीन ईसाइयों को उनके धार्मिक विधान के अनुसार दफनाया गया. इसमें स्थानीय मौलवी, दिल्ली से आये मुमताज चावला तथा मुंबई से आये इस्लामिया समिति के प्रतिनिधियों ने भी सहयोग दिया. तीन दिन बाद 15 नवम्बर को दादरी की मस्जिद में एक धन्यवाद सभा का आयोजन कर जिला संघचालक जीतराम जी तथा भारत विकास परिषद के ईश्वर जी को सम्मानित किया गया. अधिकांश समाचार पत्रों ने शीर्षक लगाया – मस्जिद में खाकी निक्कर व भगवा पट्टी का सम्मान.

घटनास्थल पर आये केन्द्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री इब्राहिम जी तथा पूर्व केन्द्रीय मंत्री जी.कुरियन ने कहा – आपकी जितनी प्रशंसा की जाए, वह कम है. मैं आपको धन्यवाद देता हूं. सीकर के जाफर अली और हाकिम खान ने कहा – इन खुदा के फरिश्तों को न जाने क्या-क्या कहा जाता है, पर आज भ्रम मिट गया. पुलिस अधीक्षक मोहम्मद शकील का कथन था – संकट के समय में सर्वाधिक सहयोग संघ वालों का रहा. मुझे उनसे यही आशा थी. ऐसे ही उद्गार वहां आये सभी लोगों के थे.

November 11th 2019, 6:38 pm

मूल्यों का ध्यान रख, उन पर कायम रहते हुए परिवर्तन करना है – डॉ. मोहन भागवत

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श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी जन्मशताब्दी समारोह का शुभारंभ नागपुर (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि दत्तोपंत ठेगड़ी जी संघ परिवार के उन शख्सियतों में आते हैं, जिनमें तत्व चिंतक, उत्कृष्ट व्यक्तित्व और बेहतर संगठक के गुण थे. समाज के हर क्षेत्र में उनका समान नेतृत्व था. उनके सम्पर्क में जो भी रहा, उसे कुछ न कुछ सीखने को ही मिला है. उन्हें स्नेह, करुणा और नेतृत्व के गुण अपने परिवार से ही मिले. इन सब प्रतिभाओं के बावजूद, आयु व दायित्व में बड़ा होने पर भी वह अपनों के लिये आलौकिक न होकर लौकिक व समान रहकर लोगों के बीच उन जैसा ही बनकर पहुँचे. ऐसे व्यक्तित्व का जन्म शताब्दी वर्ष मनाने का आशय सिर्फ उनके प्रति कृतज्ञता जताना नहीं है. बल्कि इस आयोजन के माध्यम से उनके विचारों को लोगों के बीच लेकर जाना है. मूल्यों का ध्यान रख, उन पर कायम रहते हुए परिवर्तन करना है. सरसंघचालक महर्षि व्यास सभागृह, रेशिमबाग नागपुर में श्रद्धेय दत्तोपंत ठेगड़ी जन्मशताब्दी समारोह के शुभारंभ अवसर पर संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि एक महान व्यक्ति के विचारों को समाज तक लेकर जाना इतना आसान नहीं है. समाज इसे पूर्ण विश्वास के साथ ग्रहण करे, इसके लिए जरूरी है कि पहले हम ही उन विचारों को आत्मसात करें. उनकी बताई दिशा में चलकर ही उनके विचारों की सत्यता साबित कर सकते हैं. हिन्दुत्व के विचारों का श्रेष्ठ रसायन है समरसता श्रद्धेय दत्तोपंत ठेगड़ी जन्म शताब्दी समारोह आयोजन समिति की अध्यक्ष पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन जी ने कहा कि ठेंगड़ी जी अपने आप में एक संगठन थे. एक बड़ी शख्सियत होने के बावजूद वह आखिरी वक्त तक खुद को सिर्फ एक स्वयंसेवक ही मानते थे. वह हमेशा कार्यकर्ताओं को संदेश देते थे कि संगठन का काम करना है तो खुद को नियमों में बांधो, क्योंकि यह ईश्वरीय कार्य है. उन्हें समरसता का समर्थक बताते हुए कहा कि ठेंगड़ी जी के विचार में हिन्दुत्व के विचारों का श्रेष्ठ रसायन समरसता है. उनकी सोच दूरगामी थी, वे वास्तव में राष्ट्र ऋषि थे. ठेंगड़ी जी बहुआयामी व्यक्त्वि के धनी थे आयोजन समिति के सचिव ब्रिजेश उपाध्याय जी ने समिति द्वारा जन्म शताब्दी समारोह आयोजन के निमित्त बनी कार्ययोजना की जानकारी दी. उन्होंने कहा कि ठेंगड़ी जी बहुआयामी व्यक्त्वि के धनी थे. उन्हें एक संगठन में नहीं बांधा जा सकता है. इस दृष्टि से हम सभी संगठनों ने समग्र रूप से उनके बहुआयामी पक्ष को ध्यान में रखकर देशभर में समग्र आयोजन करने का निर्णय लिया है. दत्तोपंत ठेंगड़ी जी का संदेश है कि केवल विचार नहीं, विचार को क्रिया में बदलो. इस हेतु हम सभी को निरंतर कार्य करना होगा. मंचीय कार्यक्रम से पूर्व श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी जन्मशताब्दी समारोह आयोजन समिति की बैठक पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन जी की अध्यक्षता में संपन्न हुई. बैठक में देशभर से विभिन्न आयामों में कार्य करने वाले सामाजिक कार्यकताओं ने सुझाव देकर वर्षभर चलने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा बनाई. द्वितीय सत्र में सरसंघचालक भागवत जी के आतिथ्य में दत्तोपंत ठेंगड़ी जी के व्यक्त्वि पर बने वृत्तचित्र, वेबसाइट व प्रदर्शनी का शुभारंभ किया गया. कार्यक्रम का संचालन भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय संगठन मंत्री दिनेश कुलकर्णी जी ने किया. आभार प्रदर्शन स्वदेशी जागरण मंच के अजय जी द्वारा किया गया.  

November 11th 2019, 7:11 am

किसी के अधिकार मत छीनो, लेकिन अपने धर्म व अधिकारों की रक्षा जरूर करो – मिलिंद परांडे जी

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गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाशोत्सव के उपलक्ष्य में संगोष्ठी का आयोजन

जयपुर. विश्व हिन्दू परिषद द्वारा गुरू नानक देव जी के 550वें प्रकाशोत्सव के उपलक्ष्य में आदर्श विद्या मंदिर राजापार्क में प्रबुद्धजन संगोष्ठी (06 नवंबर) का आयोजन किया गया. संगोष्ठी के मुख्य वक्ता विहिप के राष्ट्रीय महामंत्री मिलिंद परांडे जी ने कहा कि गुरू नानक देव जी ने समाज को नई दिशा देकर संगठन का संदेश दिया था. देश में मुगलों के आक्रमण के दौरान नानक देव जी का जन्म हुआ था. विश्व के अनेकों देशों का पैदल भ्रमण करते हुए समाज की परिस्थितियों की जानकारी ली. उन्होंने धर्म का पालन करते हुए परिश्रम करके जीवन यापन करने का संदेश दिया. गुरु नानक देव जी ने कहा था कि स्वयं की आय में से परिवार का पोषण करने के बाद परोपकार व समाज के लिए भी व्यय करना चाहिए. उनकी शिक्षा में कहा गया है कि किसी का अधिकार मत छीनो, लेकिन अपने धर्म व अधिकारों की रक्षा जरूर करो. उन्होंने समाज व महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों का विरोध किया. नारी सम्मान का बीड़ा उठाया व इसके लिए समाज को जागरूक किया. उन्होंने ने समाज को राष्ट्र के साथ जोड़ने के लिए प्रयास किया. मिलिंद परांडे जी ने कहा कि राम मंदिर राष्ट्रीय महत्व का विषय है, मंदिर के लिए समाज ने 76 लड़ाइयां लड़ीं, हजारों लोगों ने बलिदान दिया, गुरु ग्रंथ साहिब में भी भगवान राम का उल्लेख आया है. अनेकों वर्षों से अयोध्या में भगवान राम मंदिर बनाना समाज की आकांक्षा रही है.

मुख्य अतिथि सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ढिल्लों व संत सियारामदास महाराज ने भी विचार व्यक्त किए. कार्यक्रम की अध्यक्षता यूनिक बिल्डर के चेयरमैन अजयपाल सिंह की. इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय बौद्धिक शिक्षण प्रमुख स्वांत रंजन, प्रांत प्रचारक डॉ. शैलेन्द्र, विहिप के केंद्रीय सह मंत्री नरपतसिंह शेखवात, महानगर संघचालक कर्नल धनेशचंद गोयल, सहित अन्य प्रबुद्धजन उपस्थित रहे.

November 11th 2019, 1:35 am

अयोध्या – काश! बाबरी ढांचे का सच मुसलमानों को बताया होता ……

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अयोध्या मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आ चुका है. पूरे देश को इस निर्णय का इंतजार था. सर्वोच्च न्यायालय ने रामलला के पक्ष में फैसला दिया है. अयोध्या का मामला अदालत के बाहर भी सुलझ सकता था, यदि देश के मुसलमानों को मुस्लिम नेतृत्व ने, खास तौर पर न्यायालय में मुस्लिम पक्षकारों ने, सत्य बताया होता. लेकिन वोट बैंक की राजनीति हावी होती चली गई. मुस्लिमों को बताया जाना चाहिए था कि राम जन्मभूमि पर वास्तविक प्रमाण क्या कह रहे हैं. शरियत में बाबरी ढांचे की क्या स्थिति है. प्रारंभ में मुस्लिम पक्षकारों ने एक अच्छी बात कही थी, जब 01 फरवरी 1986 को रामलला को मुक्त करने (जन्मभूमि का ताला खोलने) के न्यायालय के आदेश के विरुद्ध बाबरी मस्जिद समन्वय समिति गठित हुई. सैय्यद शहाबुद्दीन इसका नेतृत्व कर रहे थे. शहाबुद्दीन ने कहा कि यदि सिद्ध हो जाए कि मंदिर को गिराकार बाबरी ढांचा बनाया गया है तो वे खुद अपने हाथों से उसे ढहाकर जगह हिन्दुओं को सौंप देंगे. बाकायदा हस्ताक्षर करके जारी किए गए इस वक्तव्य में कहा गया था कि यदि यह सिद्ध हो जाता है कि वहां पहले मंदिर था तो शरीयत के अनुसार वह मस्जिद कहलाने की हकदार नहीं. उनकी इस बात को गंभीरता से लिया गया, और सबूत पेश करने की कवायद शुरू हुई.

वर्ष 1986 में जो साक्ष्य उपलब्ध थे, वे थे ब्रिटिश शासन काल के गजेटियर. जिनमें स्पष्ट रूप से ये कहा गया था कि अयोध्या में हिन्दुओं के अत्यंत पवित्र माने जाने वाले राम जन्मस्थान पर बने मंदिर को तोड़कर बाबर ने एक ढांचा खड़ा किया. ब्रिटिश दस्तावेजों में उक्त आशय की बात लिखने वालों में न्यायाधीश एफ ई ए चैमियर, पी कार्नेगी, ऑस्ट्रिया का एक जेसुआइट पादरी टीफेनथेलर, ब्रिटिश सर्वेक्षक मोंटगोमरी मार्टिन, गजेट लेखक एडवर्ड थार्नटन आदि. जब इन प्रमाणों को सामने रखा गया तो ‘अंग्रेजों की बात का क्या भरोसा करना’ और “अंग्रेज तो हिन्दुओं को मुसलमानों से लड़वाना चाहते थे, इसलिए इस तरह की बातें उन्होंने लिख दी हैं” आदि कहकर इन प्रमाणों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया और कहा गया कि किसी अन्य स्रोत में ये बात कही गई हो तो हम मानेंगे.

हिन्दू पक्ष ने इस चुनौती को स्वीकार किया. डॉ. हर्ष नारायण ने मुस्लिम लेखकों द्वारा लिखे गए दस्तावेजी सबूत पेश किए. इनमें औरंगजेब की पौत्री द्वारा लिखी गयी ‘सहीफ़ा-ए-चहल नसाइह बहादुरशाही’ का सबूत था, जिसमें मथुरा, वाराणसी और अयोध्या में मंदिर तोड़ने का उल्लेख था. ‘नवाब वाजिद अली शाह और उनका अहद’ नामक किताब में मिर्जा जान नामक लेखक ने राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने और ‘कुफ्र का अंत’ करने की बात लिखी. बाबरी मस्जिद के मुअज्जन और खातिब मुहम्मद असगर द्वारा वर्ष 1858 में उल्लेख किया गया कि मस्जिद के बाहर हिन्दू सैकड़ों वर्षों से पूजा करते आए हैं, और इस जगह अपना दावा करते हैं. इसी तरह शेख मोहम्मद अजमत अली काकोरवी द्वारा रचित तारीख ए अवध में अयोध्या में राम मंदिर तोड़ने और वहां पर बाबरी मस्जिद बनाने का विवरण दिया है. इस प्रकार मुस्लिम लेखकों द्वारा रचित दस से अधिक प्रमाण प्रस्तुत किए गए तो मुस्लिम पक्षकारों ने इन पर चुप्पी साध ली और उनकी तरफ से वामपंथी इतिहासकारों इरफ़ान हबीब आदि ने कहना शुरू कर दिया कि मज़हबी जूनून में अपनी शेखी बघारने के लिए मुसलमान लड़ाके ऐसी बातें लिख दिया करते थे, इसलिए इनसे सिद्ध नहीं होता कि राम मंदिर तोड़कर बाबरी ढांचा खड़ा किया गया.

अन्य प्रामाणिक किताबों में भी कुछ लोगों ने हेर-फेर के प्रयास किए, जैसे मौलाना हकीम सैयद अब्दुल हई ने आज से लगभग सौ साल पहले एक किताब लिखी ‘हिंदुस्तान इस्लामी अहद में’. उनके बेटे मौलाना अबुल हसन अली नदवी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष और लखनऊ की एक प्रसिद्ध मुस्लिम संस्था नदवतुल उलेमा के रेक्टर रह चुके हैं. इस किताब में एक अध्याय है, ‘हिंदुस्तान की मस्जिदें’. जिसमें लिखा गया है कि अयोध्या में मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद का निर्माण किया गया. जब इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया गया, तब उसमें से अयोध्या का जिक्र गायब कर दिया गया.

प्रोफ़ेसर बी आर ग्रोवर ने अयोध्या के पुराने राजस्व दस्तावेज प्रस्तुत किए और सवाल उठाया कि इन दस्तावेजों में बाबरी ढांचे को ‘मस्जिद ए जन्मस्थान’ के नाम से क्यों दर्ज किया गया है? इसका कोई जवाब नहीं आया. जून 1992 में वह गड्ढा खोजा गया, जहां बाबर की फौज ने मंदिर विध्वंस के बाद मंदिर के अवशेषों को फेंका था. परन्तु इन प्रमाणों को “ इन्हें कारसेवकों द्वारा खोजा गया है, इसलिए ये अमान्य हैं,” ऐसा कह नकार दिया गया. अगस्त 1992 में अयोध्या में एक सेमीनार में भाग लेने के लिए देश के प्रमुख पुरातत्वविद एकत्रित हुए. इसमें जलमग्न द्वारिका की खोज करने वाले विश्वप्रसिद्ध डॉ. एस आर राव भी थे. इन सभी ने बाबरी ढाँचे का भी बारीकी से अवलोकन किया.

इसी दौरान दल के सदस्य डॉ. रत्नचंद्र अग्रवाल की नज़र प्रवेश द्वार पर लगे काले पत्थर के स्तंभ पर गई, तो उन्होंने पाया कि वहां पर ‘श्री’ खुदा हुआ है जो देवी लक्ष्मी का नाम है. स्वाभाविक रूप से ये स्तंभ बाबर द्वारा तोड़े गए राम मंदिर का था, जिसे ढांचे में पुनः इस्तेमाल किया गया. इसके बाद बाबरी ढाँचे की दीवारों पर और भी कई हिन्दू चिन्ह मिले. इन सभी प्रमाणों को प्रकाशित किया गया. लेकिन इन्हें भी मानने से इनकार कर दिया गया. सैयद शहाबुद्दीन जिन्होंने प्रमाण मिलने पर अपने हाथों से ढांचा तोड़ने की बात कही थी वो भी अपनी बात से मुकर गए और कहने लगे कि एक बार जहां मस्जिद बन गई और नमाज़ पढ़ ली गई तो फर्श से अर्श (आसमान) तक मस्जिद बन जाती है. उसे नहीं हटाया जा सकता. इस पर पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरिफ मुहम्मद खान ने उन्हें आड़े हाथों लेते हुए चुनौती दी थी कि वो अपने इस बयान को शरीयत के हिसाब से सही सिद्ध करके दिखाएं कि मस्जिद हट नहीं सकती. उन्होंने सउदी अरब में रास्ता चौड़ा करने के लिए उन तीन मस्जिदों को ढहाए जाने का उदाहरण दिया, जिनमें स्वयं पैगम्बर मुहम्मद ने नमाज़ पढ़ी थी.

सवाल उठते रहे परन्तु उत्तर नहीं आए. बाबरी ढांचे के ढहने के बाद उसमें से निकले पुरातात्विक अवशेष, अदालत की निगरानी में किए गए जन्मस्थान के रडार सर्वेक्षण से मिले मंदिर के प्रमाण और विवादित स्थल की खुदाई से निकले सबूतों से आंखें फेरकर मुकदमे को खींचा जाता रहा. सुप्रीम कोर्ट के वकील और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की अपील सभी को याद है, जब उन्होंने न्यायालय से लोकसभा चुनाव होने तक मामले की सुनवाई रोकने का आग्रह किया था.

यह सब न होता तो इतिहास अलग होता. राम जन्मभूमि मामले में देश के अधिकाँश मुस्लिम नेतृत्व का रवैया वही रहा जैसा कि शाहबानो और तीन तलाक के मुद्दे पर रहा था. एक विदेशी हमलावर द्वारा किए गए अन्याय के परिमार्जन में बाधा डाली गई. मुक्त चर्चाओं के स्थान पर उत्तेजक बयानबाजी की गई. भारत के मुस्लिमों को बाबर से जोड़ने का प्रयास किया गया. जबकि समझदार लोग कहते रह गए कि देश के मुसलमानों का डीएनए राम से मिलता है, बाबर से नहीं. राम उनके आराध्य नहीं हैं, पर उनके पूर्वज अवश्य हैं. राम भारत के राष्ट्रीय महापुरुष हैं. इस नाते प्रत्येक भारतीय के हैं. काश ! देश के मुसलमानों को ये सब बताया गया होता…

प्रशांत बाजपई

November 11th 2019, 12:20 am

पूज्य संतों व विशेषज्ञों के प्रति कृतज्ञता के साथ विहिप ने सरकार से त्वरित कार्यवाही की मांग की

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नई दिल्ली. मा. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा श्रीराम जन्मभूमि मामले में दिए गए ऐतिहासिक निर्णय के बाद विश्व हिन्दू परिषद् के केन्द्रीय पदाधिकारियों की एक विशेष बैठक विहिप के मुख्यालय संकट मोचन आश्रम, राम कृष्ण पुरम, दिल्ली में संपन्न हुई. जिसमें मा. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर संतोष व्यक्त किया गया. विश्व हिन्दू परिषद् कार्याध्यक्ष अधिवक्ता आलोक कुमार जी की अध्यक्षता में सम्पन्न बैठक में उन सभी पूज्य संतों, महापुरुषों, इतिहासकारों, न्यायविदों, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के विशेषज्ञों के प्रति आभार प्रकट किया गया, जिनके अनथक परिश्रम ने न्यायालय को इस निर्णय तक पहुंचने में सहयोग किया.

बैठक में एक प्रस्ताव पारित कर कहा गया कि 1528 से चल रहे संघर्षों के सभी चरणों में पूज्य संत-महात्माओं की विशिष्ट भूमिका रही है. संघर्षों के वर्तमान चरण का तो प्रारंभ ही संतों ने किया. वर्ष 1984 में आयोजित धर्म संसद में रामजन्मभूमि मुक्ति का संकल्प लेकर उन्होंने ही इस अभियान के लिए शंखनाद किया था और विहिप को यह आंदोलन सौंपा था. तब से लेकर अब तक आंदोलन के हर चरण में उनके आशीर्वाद, मार्गदर्शन और सहयोग निरंतर मिलते रहे. अपने मठ, मंदिर, आश्रम छोड़ कर जिस प्रकार उन्होंने गली – गली व गांव – गांव में घूमकर जागरण किया, उसके लिए सम्पूर्ण हिन्दू समाज उनका कृतज्ञ रहेगा. पूज्य संतों की इस महत्वपूर्ण भूमिका के बिना आंदोलन की सफलता संभव नहीं थी.

बैठक में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का विश्लेषण भी किया गया. निर्णय के क्रियान्वयन में केंद्र सरकार व उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार की भूमिका भी निर्धारित की गई है. ये सरकारें अपने दायित्व के प्रति सजग व सक्रिय हैं ही, यह विश्वास व्यक्त करते हुए उनसे त्वरित कार्रवाई का आग्रह किया गया.

November 11th 2019, 12:20 am

अयोध्या – फैज़ाबाद के जिला जज (ब्रिटिश जज) ने राम जन्मस्थान पर बाबरी ढांचे को दुर्भाग्यपूर्ण कहा था…

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भारत में मुग़ल काल से ही यूरोपियन व्यापारियों और यात्रियों का आना प्रारंभ हो गया था. इनमें से बहुतों ने अपने यात्रा वृत्तांत संस्मरण आदि लिखे हैं. जब राम जन्मभूमि पर स्थित मंदिर को बाबर द्वारा तोड़े जाने के प्रमाण मांगे गए, तब अनेक विद्वानों ने जगह-जगह से ढूंढकर इन अभिलेखों को प्रस्तुत किया. ये वक्तव्य राम जन्मभूमि मामले के महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गए. इन वृत्तांतों में राम जन्मस्थान के अलावा अयोध्या के बारे में कई बातें, स्थानीय लोगों की सोच मान्यता आदि का पता चलता है. वर्णन विस्तृत हैं और उस काल का चित्र आंखों के सामने खींचते हैं.

ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारी विलियम फिंच

विलियम फिंच 1608 ई. से 1611 ई. तक भारत में रहा था. उसने अयोध्या की भी यात्रा की थी. जिसके बारे में उसने लिखा है कि अवध (अयोध्या) एक प्राचीन नगर है जो एक पठान राजा की राजधानी है और इस समय खंडहर हो गई है. यहां का क़िला चार सौ वर्ष पुराना है. यहां पर रामीचंद्र (रामचंद्र) का क़िला और महल भी खंडहर के रूप में विद्यमान है. इन्हें भारतीय लोग बड़ा देवता मानते हैं और यह कहते हैं कि उन्होंने यहां अवतार लिया था. यहां पर कुछ ब्राह्मण रहते हैं जो पास की नदी में स्नान करने वाले सभी यात्रियों के नाम लिखते हैं और उनके अनुसार यह प्रथा चार लाख साल से चली आ रही है.

बहुभाषी इतालवी जोसेफ़ टाइफ़ेनथेलर

टाइफ़ेनथेलर इतालवी, लैटिन, स्पेनिश, फ्रेंच, अरबी, हिन्दी, फारसी और संस्कृत का जानकार था. उसने 1766 ई. से 1771 ई. के बीच का समय अवध में बिताया था.

अपने वृत्तांत ‘देस्क्रिप्तियो इंडी’ में वो लिखते हैं कि “रामकोट क़िले को ध्वस्त करके उसी स्थान पर तीन गुम्बदों वाला एक मुसलमानी पूजा-स्थल बनवाया. बाबर ने राम-जन्मस्थान पर स्थित मंदिर को नष्ट करके उसके खंभों का उपयोग करते हुए एक मस्जिद बना दी, लेकिन हिन्दुओं ने उस स्थान पर अपना अधिकार छोड़ने से इंकार कर दिया, तथा मुग़लों द्वारा उनको रोकने के प्रयासों के बावजूद वे इस स्थान पर पूजा के लिए आते रहे. मस्जिद के प्रांगण में उन्होंने एक राम चबूतरा बना लिया था, जिसकी तीन बार प्रदक्षिणा करने के बाद वे भूमि को साष्टांग प्रणाम करते हैं. वे चबूतरा और मस्जिद में अपनी पूजा करते हैं. इससे भी अधिक प्रसिद्ध स्थल सीता की रसोई है जो राम की पत्नी थीं. यह शहर के पास एक ऊंचे टीले के बीच में है.

औरंगज़ेब ने रामकोट क़िले को ध्वस्त करके उसी स्थान पर तीन गुम्बदों वाला एक मुसलमानी पूजा-स्थल बनवाया; कुछ लोगों का कहना है कि बाबर ने बनवाया. पांच हाथ ऊंचे काले पत्थरों से बने उन चौदह स्तम्भों को कोई भी देख सकता है जो यहां लगे हैं. इनमें से 12 तो मस्जिद के अंदर महराबों को संभालने के लिए लगे हैं. यह कहा जाता है कि स्तम्भों के ये टुकड़े, जिन पर कलाकारों ने नक़्क़ाशी की हुई है, हनुमान द्वारा लंका, जिसे यूरोप के लोग सिलोन कहते हैं, से लाए गए थे.

इसके बाईं ओर पांच इंच ऊंचा एक चबूतरा है जो चूना-पत्थर से आच्छादित है. हिन्दू इसे वेदी कहते हैं. वेदी कहने का कारण यह है कि यहां पर विष्णु ने राम के रूप में जन्म लिया था और यहीं उनके तीन भाई भी पैदा हुए थे.

एंग्लो-इंग्लिश लेखक माण्टगोमरी मार्टिन

ब्रिटिश सिविल सर्वेंट के रूप में काम करते हुए माण्टगोमरी मार्टिन ने 1828 ई. में इस क्षेत्र का सर्वेक्षण करने के बाद लिखा है कि – धर्मांध ने (बाबर और औरंगजेब), जिसके द्वारा मंदिर गिराए गए हैं, कहा जाता है कि अत्यधिक महत्वपूर्ण मंदिरों के ऊपर मस्जिदों का निर्माण कराया, लेकिन अयोध्या की मस्जिद, जो अब तक पूरी खड़ी है, तथा जो आधुनिक दिखती है, की एक दीवार पर लगे हुए अभिलेख के द्वारा बाबर द्वारा बनाई हुई कही गई है, जो औरंगज़ेब से पांच पीढ़ियों पहले हुआ था… इसके नाम, रामकोट से मेरा यह अनुमान है कि यह वास्तव में राम द्वारा बनाए गए भवन का वास्तविक हिस्सा रहा होगा.

यह कहा जाता है कि ईंटों के लिए खुदाई करते समय कई मूर्तियां निकली थीं, लेकिन उनमें कुछ को, जिन्हें मैं ढूंढ सका, इतनी खण्डित हो गई थीं कि उनकी पहचान मुश्किल थी, केवल एक मूर्ति को छोड़कर जो गुप्तचर (घाट) के अखाड़े से प्राप्त हुई थी, जहां से यह कहा जाता है कि लक्ष्मण ने जल समाधि ली थी. इस मूर्ति में एक नारी और पुरुष एक साथ दिखाए गये हैं, नारी के सिर पर कोई ऐसी चीज़ है जैसा कि मैंने पहले कभी नहीं देखा था. इन दो आकृतियों के अतिरिक्त बाबर द्वारा निर्मित मस्जिद में लगाए गए खम्भे ही हैं जो इस नगर की प्राचीनता का संकेत देते हैं. ये काले पत्थर के हैं तथा इस प्रकार के खम्भे पहले हमने कभी नहीं देखे थे. जैसा कि संलग्न रेखाचित्र से समझा जा सकता है, ये किसी हिन्दू मंदिर से लिए गए होंगे, यह इन स्तम्भों के आधार पर बने आकारों से समझा जा सकता है. यद्यपि ये आकृतियां धर्मांध के मानस को संतुष्ट करने के लिए काट दी गयी हैं, यह संभव है कि ये खम्भे विक्रम द्वारा बनवाए गए मंदिर के हों.

सर एडवर्ड थार्नटन, ईस्ट इंडिया कंपनी

ब्रिटिश राजनयिक एडवर्ड थार्नटन ने 1854 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी की सरकार का गजेटियर लिखा था. वो कहता है कि बाबर की मस्जिद में 14 खम्भे बहुत सुंदर नक्काशी किए हुए हैं जो पुराने हिन्दू मंदिर से लिए गए थे. उसने यह भी लिखा कि हिन्दू यहां तीर्थ-यात्रा पर आते हैं तथा राम चबूतरा की पूजा करते हैं, क्योंकि यह उनका विश्वास है कि यह राम का जन्मस्थान था.

स्कॉटिश शल्यचिकित्सक और पर्यावरणविद एडवर्ड बालफोर

एडवर्ड बालफोर सर्जन जनरल था. उसने अपनी एन्साइक्लोपीडीया में लिखा है कि – “यहां पर कई जैन मंदिर और तीन मस्जिदें हैं जो तीन हिन्दू मंदिरों के स्थान पर बनी हैं. जन्मस्थान की मस्जिद, जहाँ राम पैदा हुए थे, स्वर्ग द्वार मंदिर, उनके अवशेष खड़े हैं तथा त्रेता का ठाकुर, जहां उन्होंने यज्ञ किया था.

पी कारनेगी द्वारा लिखित फ़ैज़ाबाद तहसील का इतिहास

पी कारनेगी ने फैज़ाबाद तहसील का इतिहास 1870 में लिखा. उसने अयोध्या में रामकोट के बुर्ज, मीनारों और महलों का विवरण देते हुए यह बताया है कि राम-जन्मस्थान मंदिर के स्तम्भ कसौटी पत्थर के नक्काशी करके बनाए गए हैं. जिनका उपयोग मुसलमानों ने बाबर की मस्जिद के निर्माण के लिए किया था. कारनेगी ने यह भी उल्लेख किया है कि अट्ठारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में समीप की ही भूमि में एक नए जन्मस्थान मंदिर का निर्माण कराया गया था. उसका यह कहना है कि 1855 ई. तक हिन्दू और मुसलमान दोनों ही इस मस्जिद में पूजा करते थे. कारनेगी आगे लिखता है कि –

हनुमानगढ़ी से कुछ 100 क़दम दूर जन्मस्थान है. 1855 ई. में जब बड़ा दंगा हुआ था तो हिन्दुओं ने हनुमानगढ़ी और मुसलमानों ने जन्मस्थान पर क़ब्ज़ा कर लिया. इस अवसर पर मुसलमानों ने हनुमानगढ़ी पर हमला किया, लेकिन उनको काफ़ी नुक़सान के साथ पीछे भागना पड़ा. हिन्दुओं ने उनका पीछा किया और तीसरे प्रयास में जन्मस्थान पर अधिकार कर लिया, जिसके दरवाज़े पर 75 मुसलमानों की मृत्यु हुई. जिनकी क़ब्रें वहां पर हैं, उसे गंज-ए-शाहिदां कहा जाता है. अवध के राजा (नवाब) की सैनिक टुकड़ियां वहां खड़ी थीं, किंतु उन्हें हस्तक्षेप करने का आदेश नहीं था. यह कहा जाता है कि इस समय तक हिन्दू और मुसलमान दोनों ही समान रूप से जन्मस्थान मंदिर-मस्जिद में पूजा करते थे. ब्रिटिश काल में झगड़े को दूर करने के लिए एक रेलिंग बना दी गयी, जिसके अंदर मुसलमान पूजा करते थे तथा उसके बाहर हिन्दुओं ने एक चबूतरा बना लिया और पूजा करने लगे.

फैजाबाद के जिला जज एफ ई ए चामियर का निर्णय

फैज़ाबाद के जिला जज कर्नल चामियर का वह निर्णय भी उल्लेखनीय है जो उन्होंने सिविल अपील संख्या 27/1885 के सिलसिले में इस स्थल का निरीक्षण करने के बाद दिया था. उसकी शब्दावली कुछ प्रकार है : मैंने कल भी सभी पक्षों की मौजूदगी में विवादित सभी स्थलों का निरीक्षण किया. मैंने पाया कि सम्राट बाबर द्वारा निर्मित मस्जिद अयोध्या में नदी के किनारे पर पश्चिम अथवा दक्षिण पर खड़ी है तथा यहां आबादी नहीं है. यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक मस्जिद, हिन्दुओं द्वारा विशेष रूप से पवित्र मानी जाने वाली भूमि पर खड़ी है. किंतु, यह घटना 356 वर्ष पहले की है और इस शिकायत को दूर करने के लिए काफ़ी विलम्ब हो गया है. अब जो किया जा सकता है, वह यह कि पक्षों को यथास्थिति में रखा जाए. प्रस्तुत मुक़दमे जैसे मामले में किसी भी प्रकार का परिवर्तन लाभ की अपेक्षा हानि तथा व्यवस्था को नुक़सान ही पहुंचाएगा.

फैज़ाबाद अथवा अवध के गजेटियर्स और प्रतिवेदन

फैज़ाबाद अथवा अवध के पुराने गज़ेटियर्स और प्रतिवेदन आदि भी इस मामले पर प्रकाश डालते हैं, जिनमें अयोध्या में राम-जन्मभूमि पर बाबरी ढांचा बनाए जाने की जानकारी मिलती है. उनकी सूची इस प्रकार है –

  1. गजेटियर ऑफ़ दी प्रॉविन्स ऑफ़ अवध, 1877 खण्ड एक, पृष्ठ 6-7
  2. फ़ैज़ाबाद सेटेलमेंट्स रिपोर्ट, 1880
  3. इम्पीरिअल गजेटियर ऑफ़ इंडिया, प्रोविंशीयल सीरीज़, यूनाइटेड प्रॉविन्सेज़ ऑफ़ आगरा एंड अवध, वॉल्यूम दो, सन 1881, पृष्ठ 338-39
  4. ए. फ़्यूरर, आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया रिपोर्ट 1891, दी मॉन्युमेंटल एंटिक्विटीज़ एंड इन्स्क्रिप्शन इन दी नॉर्थ वेस्ट प्रॉविन्सेज़ एंड अवध पृष्ठ 296-97
  5. एच. आर. नेविल, बाराबंकी डिस्ट्रिक्ट गजेटियर, लखनऊ 1902, पृष्ठ 172-77
  6. एन्साइकलोपीडिया ब्रिटेनिका, 15वां संस्करण, 1978 (एवं पूर्व के संस्करणों में), खंड एक पृष्ठ 693

 

प्रशांत बाजपई

November 11th 2019, 12:20 am

शिक्षा में जीवन मूल्यों, संस्कृति व संस्कारों का भी समावेश हो

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मेरठ में दो दिवसीय ज्ञानोत्सव का आयोजन

मेरठ. शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव अतुल कोठारी जी ने कहा कि ‘देश को बदलना है तो शिक्षा को बदलना होगा. बड़ी-बड़ी बात करने के बजाए, छोटी-छोटी बातों को जीवन में धारण करना होगा. देश के लिए मरने के बजाए, देश के लिये जीना सीखें. शिक्षा में जीवन की दृष्टि प्राप्त होनी चाहिए. हर व्यक्ति शिक्षा पाकर नौकर बनना चाहता है. जबकि शिक्षा ऐसी ग्रहण करो कि दूसरों को नौकरी दे सको. शिक्षा में ऐसे परिवर्तन करने के लिए ही ज्ञानोत्सव का आयोजन किया जा रहा है.’ वे शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास एवं शिक्षा विभाग चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित दो दिवसीय ज्ञानोत्सव के उद्घाटन अवसर पर संबोधित कर रहे थे.

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के नेताजी सुभाष चन्द्र बोस सभागृह में शिक्षाविदों, अध्यापकों एवं विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए अतुल कोठारी ने कहा कि वर्तमान शिक्षा बच्चों के लिए बोझ बन गई है. बच्चों पर किताबों का इतना बोझ डाल दिया जाता है कि वह स्कूल जाने से कतराते हैं. जबकि नई शिक्षा नीति ऐसी होनी चाहिए कि बच्चों को स्कूल जाने में आनंद आए. शिक्षा ऐसी हो कि बच्चों को समाज जीवन, देश आदि के प्रति कुछ दृष्टि प्राप्त हो. पैसा कमाने के साथ वह समाज व राष्ट्र के लिए भी समय दे. राष्ट्र को प्राथमिकता दे. हमारी शिक्षा विकास प्रवृत्ति व प्रकृति के अनुरूप होनी चाहिए.

मुख्य अतिथि सूर्य प्रकाश टाँक ने कहा कि पढ़ना-लिखना ही मात्र शिक्षा नहीं होती है. संस्कार व संस्कृति यदि शिक्षा में नहीं है तो जीवन मूल्य समाप्त हो जाते हैं. शिक्षा के साथ इनको भी जोड़ा जाना चाहिए. क्योंकि जीवन मूल्यों के बिना शिक्षा अर्थहीन है. वर्तमान शिक्षा बच्चों को केवल जीविका चलाना सिखा रही है. पैसा कमाना और पेट भरना ही केवल मुनष्य का कर्तव्य नहीं है. यदि शिक्षा में जीवन मूल्य, संस्कृति व संस्कार भी आ जाएं तो शिक्षा के साथ न्याय होगा.

कार्यक्रम के अध्यक्ष चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति नरेंद्र कुमार तनेजा ने कहा कि पाश्चात्य शिक्षा अपूर्णता का परिचायक है. पाश्चात्य शिक्षा का उद्देश्य धन से मनुष्य को प्रभावित करना है. मनुष्य साधन मात्र नहीं है. भारतीय संस्कृति का समाज व राष्ट्र के लिए चिंतन करना आर्थिक उपेक्षा नहीं है. परिवार, समाज, राष्ट्र मानवता के प्रति कर्तव्य का बोध कराने वाली शिक्षा विश्व कल्याण के लिए आवश्यक है.

ज्ञानोत्सव में राजनीतिक विज्ञान विभाग में आयोजित चर्चा सत्र में देश की शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने पर मंथन हुआ. सत्र में भारतीय शिक्षा पद्धति में सुधार पर संकल्प पत्र प्रस्तुत किया गया. जिसमें चरित्र निर्माण, पर्यावरण शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं शोध, मातृभाषा में शिक्षा, शिक्षा में भारतीय दृष्टि तथा ज्ञान का समावेश, शिक्षा को स्वायत्त तथा व्यावहारिक दृष्टि मुख्य बिन्दु रहे.

दो दिवसीय ज्ञानोत्सव कार्यक्रम में विभिन्न स्कूलों के शिक्षकों एवं बच्चों ने नवाचार प्रदर्शनी के स्टॉल लगाए, जिसे सभी ने बहुत सराहा.

November 10th 2019, 8:22 am

10 नवम्बर / जन्मदिवस – राष्ट्रयोगी दत्तोपंत ठेंगड़ी

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नई दिल्ली. दत्तोपन्त ठेंगड़ी जी का जन्म दीपावली वाले दिन (10 नवम्बर, 1920)  को ग्राम आर्वी, जिला वर्धा, महाराष्ट्र में हुआ था. वे बाल्यकाल से ही स्वतन्त्रता संग्राम में सक्रिय रहे. वर्ष 1935 में वे ‘वानरसेना’ के आर्वी तालुका के अध्यक्ष थे. जब उनका सम्पर्क डॉ. हेडगेवार जी से हुआ, तो संघ के विचार उनके मन में गहराई से बैठ गये. उनके पिता उन्हें वकील बनाना चाहते थे, पर दत्तोपन्त जी एमए तथा कानून की शिक्षा पूर्णकर वर्ष 1941 में प्रचारक बन गये. शुरू में उन्हें केरल भेजा गया. वहां उन्होंने ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ का काम भी किया. केरल के बाद उन्हें बंगाल और फिर असम भी भेजा गया.

ठेंगड़ी जी ने संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के कहने पर मजदूर क्षेत्र में कार्य प्रारम्भ किया. इसके लिए उन्होंने इण्टक, शेतकरी कामगार फेडरेशन जैसे संगठनों में जाकर काम सीखा. साम्यवादी विचार के खोखलेपन को वे जानते थे. अतः उन्होंने ‘भारतीय मजदूर संघ’ नामक अराजनीतिक संगठन शुरू किया, जो आज देश का सबसे बड़ा मजदूर संगठन है. ठेंगड़ी जी के प्रयास से श्रमिक और उद्योग जगत के नये रिश्ते शुरू हुए. कम्युनिस्टों के नारे थे ‘‘चाहे जो मजबूरी हो, माँग हमारी पूरी हो. दुनिया के मजदूरों एक हो, कमाने वाला खायेगा’’. मजदूर संघ ने कहा ‘‘देश के हित में करेंगे काम, काम के लेंगे पूरे दाम, मजदूरों दुनिया को एक करो, कमाने वाला खिलायेगा’’. इस सोच से मजदूर क्षेत्र का दृश्य बदल गया. अब 17 सितम्बर को श्रमिक दिवस के रूप में ‘विश्वकर्मा जयन्ती’ पूरे देश में मनाई जाती है. इससे पूर्व भारत में भी ‘मई दिवस’ ही मनाया जाता था. ठेंगड़ी जी वर्ष 1951 से 1953 तक मध्य प्रदेश में ‘भारतीय जनसंघ’ के संगठन मन्त्री रहे, पर मजदूर क्षेत्र में आने के बाद उन्होंने राजनीति छोड़ दी. वर्ष 1964 से 1976 तक दो बार वे राज्यसभा के सदस्य रहे. उन्होंने विश्व के अनेक देशों का प्रवास किया. वे हर स्थान पर मजदूर आन्दोलन के साथ-साथ वहां की सामाजिक स्थिति का अध्ययन भी करते थे. इसी कारण चीन और रूस जैसे कम्युनिस्ट देश भी उनसे श्रमिक समस्याओं पर परामर्श करते थे. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय किसान संघ, सामाजिक समरसता मंच आदि की स्थापना में भी उनकी प्रमुख भूमिका रही.

26 जून, 1975 को देश में आपातकाल लगने पर ठेंगड़ी जी ने भूमिगत रहकर ‘लोक संघर्ष समिति’ के सचिव के नाते तानाशाही विरोधी आन्दोलन को संचालित किया. जनता पार्टी की सरकार बनने पर जब अन्य नेता कुर्सियों के लिए लड़ रहे थे, तब ठेंगड़ी जी ने मजदूर क्षेत्र में काम करना ही पसन्द किया. वर्ष 2002 में राजग शासन द्वारा दिये जा रहे ‘पद्मभूषण’ अलंकरण को उन्होंने यह कहकर ठुकरा दिया कि जब तक संघ के संस्थापक पूज्य डॉ. हेडगेवार और श्री गुरुजी को ‘भारत रत्न’ नहीं मिलता, तब तक वे कोई अलंकरण स्वीकार नहीं करेंगे. मजदूर संघ का काम बढ़ने पर लोग प्रायः उनकी जय के नारे लगा देते थे. इस पर उन्होंने यह नियम बनवाया कि कार्यक्रमों में केवल भारत माता और भारतीय मजदूर संघ की ही जय बोली जाएगी.

14 अक्तूबर, 2004 को उनका देहान्त हुआ. ठेंगड़ी जी अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे. उन्होंने हिन्दी में 28, अंग्रेजी में 12 तथा मराठी में तीन पुस्तकें लिखीं. इनमें लक्ष्य और कार्य, एकात्म मानवदर्शन, ध्येयपथ, बाबासाहब भीमराव आम्बेडकर, सप्तक्रम, हमारा अधिष्ठान, राष्ट्रीय श्रम दिवस, कम्युनिज्म अपनी ही कसौटी पर, संकेत रेखा, राष्ट्र, थर्ड वे आदि प्रमुख हैं.

November 9th 2019, 5:22 pm

9, 10 नवम्बर / बलिदान दिवस – अमर हुतात्मा भाई मतिदास, सतिदास एवं दयाला

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नई दिल्ली. गुरु तेगबहादुर के पास जब कश्मीर से हिन्दू, औरंगजेब के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना करने आये, तो वे उससे मिलने दिल्ली चल दिये. मार्ग में आगरा में ही उनके साथ भाई मतिदास, भाई सतिदास तथा भाई दयाला को बन्दी बना लिया गया. इनमें से पहले दो सगे भाई थे. औरंगजेब चाहता था कि गुरुजी मुसलमान बन जायें. उन्हें डराने के लिए इन तीनों को तड़पा-तड़पा कर मारा गया, पर गुरुजी विचलित नहीं हुए. औरंगजेब ने सबसे पहले 9 नवम्बर, 1675 को भाई मतिदास को आरे से दो भागों में चीरने को कहा. लकड़ी के दो बड़े तख्तों में जकड़कर उनके सिर पर आरा चलाया जाने लगा. जब आरा दो तीन इंच तक सिर में धंस गया, तो काजी ने उनसे कहा – मतिदास, अब भी इस्लाम स्वीकार कर ले. शाही जर्राह तेरे घाव ठीक कर देगा. तुझे दरबार में ऊंचा पद दिया जाएगा और तेरी पांच शादियां कर दी जाएंगी.

भाई मतिदास ने व्यंग्यपूर्वक पूछा – काजी, यदि मैं इस्लाम मान लूं, तो क्या मेरी कभी मृत्यु नहीं होगी ? काजी ने कहा कि यह कैसे सम्भव है. जो धरती पर आया है, उसे मरना तो है ही. भाई जी ने हंसकर कहा – यदि तुम्हारा इस्लाम मजहब मुझे मौत से नहीं बचा सकता, तो फिर मैं अपने पवित्र हिन्दू धर्म में रहकर ही मृत्यु का वरण क्यों न करूँ ? उन्होंने जल्लाद से कहा कि अपना आरा तेज चलाओ, जिससे मैं शीघ्र अपने प्रभु के धाम पहुंच सकूँ. यह कहकर वे ठहाका मार कर हंसने लगे. काजी ने कहा कि वह मृत्यु के भय से पागल हो गया है. भाई जी ने कहा – मैं डरा नहीं हूँ. मुझे प्रसन्नता है कि मैं धर्म पर स्थिर हूँ. जो धर्म पर अडिग रहता है, उसके मुख पर लाली रहती है, पर जो धर्म से विमुख हो जाता है, उसका मुंह काला हो जाता है. कुछ ही देर में उनके शरीर के दो टुकड़े हो गये.

अगले दिन 10 नवम्बर को उनके छोटे भाई सतिदास को रुई में लपेटकर जला दिया गया. भाई दयाला को पानी में उबालकर मारा गया. 11 नवम्बर को चाँदनी चौक में गुरु तेगबहादुर का भी शीश काट दिया गया. ग्राम करयाला, जिला झेलम (वर्त्तमान पाकिस्तान) निवासी भाई मतिदास एवं सतिदास के पूर्वजों का सिख इतिहास में विशेष स्थान है. उनके परदादा भाई परागा जी छठे गुरु हरगोविन्द के सेनापति थे. उन्होंने मुगलों के विरुद्ध युद्ध में ही अपने प्राण त्यागे थे. उनके समर्पण को देखकर गुरुओं ने उनके परिवार को ‘भाई’ की उपाधि दी थी. भाई मतिदास के एकमात्र पुत्र मुकुन्द राय का भी चमकौर के युद्ध में बलिदान हुआ था.

भाई मतिदास के भतीजे साहबचन्द और धर्मचन्द गुरु गोविन्द सिंह के दीवान थे. साहबचन्द ने व्यास नदी पर हुए युद्ध में तथा उनके पुत्र गुरुबख्श सिंह ने अहमदशाह अब्दाली के अमृतसर में हरिमन्दिर पर हुए हमले के समय उसकी रक्षार्थ प्राण दिये थे. इसी वंश के क्रान्तिकारी भाई बालमुकुन्द ने 8 मई, 1915 को केवल 26 वर्ष की आयु में फांसी पायी थी. उनकी साध्वी पत्नी रामरखी ने पति की फांसी के समय घर पर ही देह त्याग दी. लाहौर में भगतसिंह आदि सैकड़ों क्रान्तिकारियों को प्रेरणा देने वाले भाई परमानन्द भी इसी वंश के तेजस्वी नक्षत्र थे. किसी ने ठीक ही कहा है –

सूरा सो पहचानिये, जो लड़े दीन के हेत

पुरजा-पुरजा कट मरे, कबहूं न छाड़े खेत..

November 9th 2019, 5:22 pm

‘करतारपुर कॉरिडोर’ के उद्घाटन पर संपूर्ण समाज को बधाई – भय्याजी जोशी

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करतारपुर में स्थित पवित्र गुरुद्वारा श्रीदरबारसाहब जहाँ श्री गुरुनानकदेव जी ने जीवन के अंतिम 18 वर्ष बिताए थे और जिसका हर कदम ना केवल सिख समाज, अपितु संपूर्ण भारतीय समाज के लिए पवित्र है, को पंजाब के डेरा बाबा नानकसाहब से जोड़ने वाले ‘करतारपुर कॉरिडोर’ का उद्घाटन एक ऐसी महत्वपूर्ण घटना है, जिसे भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों  में अंकित किया जायेगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उन सभी का अभिनंदन करता है, जिन्होंने इस दीर्घकाल से प्रतिक्षित स्वपन को साकार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। संघ इस पावन एवं अविस्मरणीय अवसर पर प्रसन्नतापूर्वक भागीदारी करते हुए समस्त समाज को बधाई देता है।

November 9th 2019, 7:55 am

सभी पक्षों को निर्णय का सम्मान करना चाहिये – राष्ट्र सेविका समिति

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राष्ट्र सेविका समिति श्री रामजन्मभूमि वाद पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत करती है.

भारत के आराध्य प्रभु श्रीरामचंद्र जी के जन्मस्थान पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का राष्ट्र सेविका समिति ह्रदय से स्वागत करती है और सभी माननीय न्यायाधीशों का अभिनंदन करती है. अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि वाद पर आज बहुत ही स्पष्ट और सटीक निर्णय आया है. इस निर्णय को किसी भी पक्ष की जय-पराजय की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए. सभी पक्षों को आपसी मतभेद मिटा कर, सौहार्द कायम रखते हुए इस फैसले का सम्मान करना चाहिए तथा शांति और धैर्य बनाए रखने में सरकार एवं समाज का सहयोग करना चाहिए.

सैकड़ों वर्षों से करोड़ों लोग अयोध्या में भगवान श्रीराम के जन्मस्थान पर राम लला के मंदिर की प्रतीक्षा करते आ रहे हैं. माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने इसका मार्ग प्रशस्त कर दिया है. हमें आशा एवं विश्वास है कि सरकार माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार शीघ्र अति शीघ्र राम लला के भव्य मंदिर के निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ करेगी.

 

शांता कुमारी                                         सीता गायत्री अन्नदानम्

अखिल भारतीय प्रमुख संचालिका          प्रमुख कार्यवाहिका

November 9th 2019, 6:08 am

अयोध्या निर्णय पर विश्व हिन्दू परिषद कार्याध्यक्ष एडवोकेट आलोक कुमार का प्रेस वक्तव्य

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नई दिल्ली. आज अत्यंत प्रसन्नता और समाधान का दिन है. शताब्दियों से चले आ रहे संघर्ष, अनेक युद्ध और असंख्य बलिदानों के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने न्याय और सत्य को आज उद्घोषित किया है. 40 दिन की तथा 200 घंटे से अधिक की मैराथन सुनवाई के बाद और सब प्रकार की बाधाओं से विचलित हुए बिना दिया गया यह निर्णय विश्व के महानतम निर्णयों में से एक है. हिन्दू समाज लगभग 70 वर्षों के न्यायिक संघर्ष के बाद इस निर्णय की अधीरता से प्रतीक्षा कर रहा था. अन्ततः वह प्रतीक्षा पूर्ण हुई और न्याय की विजय हुई. हम सुप्रीम कोर्ट के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं.

स्वाभाविक ही विश्व भर में हिन्दू समाज में अपार प्रसन्नता है. यह भी निश्चित है कि हिन्दू का मर्यादा में रहने का स्वभाव है, इसलिए यह प्रसन्नता आक्रामक नहीं होनी चाहिए. इसमें कोई पराजित नहीं हुआ है. किसी को अपमानित करने वाली बात नहीं होनी चाहिए. समाज का सौहार्द बना रहे, इसका सब लोग प्रयत्न करें.

आज कृतज्ञता का भी दिन है. सबसे पहली कृतज्ञता उन ज्ञात और अज्ञात राम भक्तों के लिए जिन्होंने इन संघर्षों में भाग लिया, कष्ट सहे और अनेकों ने बलिदान दिए. भारत का पुरातत्व विभाग, जिनके अनथक प्रयासों और अविवादित तकनीकी विशेषज्ञता के कारण माननीय न्यायाधीश इस महत्वपूर्ण निर्णय पर पहुँच सके, विशेषतौर पर अभिनन्दन के पात्र हैं. इतिहासज्ञ, अन्य विशेषज्ञ जिनके अकाट्य साक्ष्य इस निर्णय के आधार बने, उन सभी के प्रति हम आभार व्यक्त करते हैं. सभी वरिष्ठ न्यायविद एवं अधिवक्ता जिनके अनथक परिश्रम के कारण हिन्दू समाज को न्याय मिला है, का हम अभिनन्दन करते हैं.

हम भारत सरकार से यह अपेक्षा करेंगे कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार वह आगामी कदम यथाशीघ्र उठाए.

यह महत्वपूर्ण निर्णय भव्य राम मंदिर के निर्माण में एक महत्वपूर्ण एवं निर्णायक कदम है. हम विश्वास करते हैं कि भगवान राम के भव्य मंदिर का यथाशीघ्र निर्माण होगा. यह निश्चित है कि जैसे-जैसे यह मंदिर बनेगा, समाज में मर्यादाएं, समरसता, संगठन, हिन्दू जीवन जीने का प्रयत्न बढ़ेगा और एक सबल, संगठित, संस्कारित हिन्दू समाज विश्व में शांति और समन्वय स्थापित करने के अपने दायित्व को पूरा कर सकेगा.

November 9th 2019, 6:08 am

श्री रामजन्मभूमि मामले पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर सरसंघचालक मोहन भागवत जी की प्रेस वार्ता

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श्री रामजन्मभूमि के संबंध में मा. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस देश की जनभावना, आस्था एवं श्रद्धा को न्याय देने वाले निर्णय का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वागत करता है। दशकों तक चली लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद यह विधिसम्मत अंतिम निर्णय हुआ है। इस लंबी प्रक्रिया में श्री रामजन्मभूमि से संबंधित सभी पहलुओं का बारीकी से विचार हुआ है। सभी पक्षों के द्वारा अपने-अपने दृष्टिकोण से रखे हुए तर्कों का मूल्यांकन हुआ। धैर्यपूर्वक इस दीर्घ मंथन को चलाकर सत्य व न्याय को उजागर करने वाले सभी न्यायमूर्ति तथा सभी पक्षों के अधिवक्ताओं का हम शतशः धन्यवाद व अभिनंदन करते हैं। इस लम्बे प्रयास में अनेक प्रकार से योगदान देने वाले सभी सहयोगियों व बलिदानियों का हम कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करते हैं। निर्णय स्वीकार करने की मनःस्थिति, भाईचारा बनाये रखते हुए पूर्ण सुव्यवस्था बनाये रखने के लिये सरकारी व समाज के स्तर पर हुए सभी लोगों के प्रयास का भी स्वागत व अभिनंदन करते हैं। अत्यंत संयमपूर्वक न्याय की प्रतीक्षा करने वाली भारतीय जनता भी अभिनंदन की पात्र है। इस निर्णय को जय-पराजय की दृष्टि से नहीं देखना चाहिये। सत्य व न्याय के मंथन से प्राप्त निष्कर्ष को भारत वर्ष के संपूर्ण समाज की एकात्मता व बंधुता के परिपोषण करने वाले निर्णय के रूप में देखना व उपयोग में लाना चाहिये। सम्पूर्ण देशवासियों से अनुरोध है कि विधि और संविधान की मर्यादा में रहकर संयमित व सात्विक रीति से अपने आनंद को व्यक्त करें। इस विवाद के समापन की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुरूप परस्पर विवाद को समाप्त करने वाली पहल सरकार की ओर से शीघ्रतापूर्वक होगी, ऐसा हमें विश्वास है। अतीत की सभी बातों को भुलाकर हम सभी श्री रामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर के निर्माण में साथ मिल-जुल कर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करें। https://www.youtube.com/watch?v=nObcCXekvlM

November 9th 2019, 3:51 am

09 नवम्बर / जन्मदिवस – हिन्द केसरी मास्टर चंदगीराम जी

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नई दिल्ली. भारतीय कुश्ती को विश्व भर में सम्मान दिलाने वाले मास्टर चंदगीराम जी का जन्म 09 नवम्बर, 1937 को ग्राम सिसई, जिला हिसार, हरियाणा में हुआ था. मैट्रिक और फिर उसके बाद कला एवं शिल्प में डिप्लोमा लेने के बाद वे भारतीय थलसेना की जाट रेजिमेण्ट में एक सिपाही के रूप में भर्ती हो गये. कुछ समय वहां काम करने के बाद वे एक विद्यालय में कला अध्यापक बन गये. तब से ही उनके नाम के साथ मास्टर लिखा जाने लगा.

कुश्ती के प्रति चंदगीराम जी की रुचि बचपन से ही थी. हरियाणा के गांवों में सुबह और शाम को अखाड़ों में जाकर व्यायाम करने और कुश्ती लड़ने की परम्परा रही है. चंदगीराम जी को प्रसिद्धि तब मिली, जब वर्ष 1961 में अजमेर और वर्ष 1962 में जालंधर की कुश्ती प्रतियोगिता में राष्ट्रीय चैम्पियन बने. इसके बाद तो वे हर प्रतियोगिता को जीत कर ही वापस आये. कलाई पकड़ उनका प्रिय दांव था. इसमें प्रतिद्वन्दी की कलाई पकड़कर उसे चित किया जाता है. चंदगीराम ने हिन्द केसरी, भारत केसरी, भारत भीम, महाभारत केसरी, रुस्तम ए हिन्द जैसे कुश्ती के सभी पुरस्कार अपनी झोली में डाले. वर्ष 1970 में उनका नाम अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुआ, जब वे बैंकाक एशियाई खेल में भाग लेने गये. वहां 100 किलो वर्ग में उनका सामना तत्कालीन विश्व चैम्पियन ईरान के अमवानी अबुइफाजी से हुआ. अमवानी डीलडौल में चंदगीराम से सवाया था, पर चंदगीराम ने अपने प्रिय दांव का प्रयोग कर उसकी कलाई पकड़ ली. अमवानी ने बहुत प्रयास किया, पर चंदगीराम ने कलाई नहीं छोड़ी. इससे वह हतोत्साहित हो गया और चंदगीराम ने मौका पाकर उसे धरती सुंघा दी. इस प्रकार उन्होंने स्वर्ण पदक जीत कर भारत का मस्तक ऊंचा किया.

इसके बाद चंदगीराम वर्ष 1972 के म्यूनिख ओलम्पिक में भी गये, पर वहां उन्हें ऐसी सफलता नहीं मिली. भारत सरकार ने वर्ष 1969 में उन्हें ‘अर्जुन पुरस्कार’ और वर्ष 1971 में ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया. इसके बाद चंदगीराम ने कुश्ती लड़ना तो छोड़ दिया, पर दिल्ली में यमुना तट पर अखाड़ा स्थापित कर वे नयी पीढ़ी को कुश्ती के लिए तैयार करने लगे. कुछ ही समय में यह अखाड़ा प्रसिद्ध हो गया. उनके अनेक शिष्यों ने राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतकर अपने गुरू के सम्मान में वृद्धि की. अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लड़कियों की कुश्ती प्रतियोगिता भी होती थी. पर, भारत का प्रतिनिधित्व वहां नहीं होता था. चंदगीराम ने इस दिशा में भी कुछ करने की ठानी, उनके इस विचार को अधिक समर्थन नहीं मिला. इस पर उन्होंने अपनी पुत्री सोनिका कालीरमन को ही कुश्ती सिखाकर एक श्रेष्ठ पहलवान बना दिया. उसने भी दोहा के एशियाई खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया. धीरे-धीरे अन्य लड़कियां भी कुश्ती में आगे आने लगीं. उन्होंने अपने पुत्र जगदीश कालीरमन को भी कुश्ती का अच्छा खिलाड़ी बनाया.

हरियाणा शासन ने कुश्ती एवं अन्य भारतीय खेलों को प्रोत्साहन देने के लिए चंदगीराम को खेल विभाग का सहसचिव नियुक्त किया. आगे चलकर उन्होंने ‘वीर घटोत्कच’ और ‘टार्जन’ नामक फिल्मों में भी काम किया. उन्होंने ‘भारतीय कुश्ती के दांवपेंच’ नामक एक पुस्तक भी लिखी. सिर पर सदा हरियाणवी पगड़ी पहनने वाले चंदगीराम जीवन भर कुश्ती को समर्पित रहे. वर्ष 1970 से पूर्व तक भारतीय कुश्ती की विश्व में कोई पहचान नहीं थी. पर चंदगीराम ने इस कमी को पूरा किया. 29 जून, 2010 को अपने अखाड़े में ही हृदयगति रुकने से इस महान खिलाड़ी का देहांत हुआ.

November 8th 2019, 6:09 pm

मुख्य न्यायाधीश ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव व डीजीपी के साथ की बैठक

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अयोध्या रामजन्मभूमि मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय अगले कुछ दिनों में आ सकता है. आज की अप्रत्याशित घटना के पश्चात मामले में निर्णय के जल्द आने की चर्चाओं को बल मिला है. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अप्रत्याशित कदम उठाते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव राजेंद्र कुमार तिवारी और डीजीपी ओम प्रकाश सिंह व अन्य अधिकारियों के साथ बैठक की.

उत्तर प्रदेश के अधिकारियों के साथ मुख्य न्यायाधीश की यह लगभग डेढ़ घंटे तक चली. बैठक के दौरान जस्टिस एसए बोबड़े (भावी मुख्य न्यायाधीश),  जस्टिस ओशक भूषण भी उपस्थित थे.

कहा जा रहा है कि मुख्य न्यायाधीश ने अधिकारियों से अयोध्या की सुरक्षा व कानून व्यवस्था को लेकर उठाए गए कदमों के बारे में जानकारी ली. साथ ही समाज में सौहार्द बना रहे, इस संबंध में भी तैयारियों की जानकारी ली.

उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय ने रामजन्मभूमि मामले में 16 अक्तूबर को 40वें दिन की सुनवाई पूरी करने के पश्चात निर्णय सुरक्षित रख लिया था. मुख्य न्यायाधीश 17 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं, तो अगले सप्ताह मामले में फैसला सुना सकते हैं.

सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोबड़े, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल नजीर की पीठ ने मामले में मेराथन सुनवाई पूरी की थी. पीठ ने 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के खिलाफ अपीलों पर सुनवाई की. इलाहाबद उच्च न्यायालय ने विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांटने का निर्णय सुनाया था.

November 8th 2019, 8:14 am

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) विश्व का छठा सबसे खतरनाक आतंकी संगठन

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अमेरिका स्थित एक शोध केंद्र और यूएस स्टेट विभाग द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में उग्र वामपंथ के आतंकी संगठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) को दुनिया का छठा सबसे खतरनाक आतंकवादी संगठन माना गया है. भारत सरकार ने भी इस संगठन को आतंकी संगठन मानकर इस पर प्रतिबंध लगाया है.

इस्लामिक आतंकवाद से दुनिया भली भांति परिचित है, किन्तु वामपंथी आतंकवाद को उदारवाद और क्रांति की आड़ में ढंकने की नव-माओवादियों ने पुरजोर प्रयास किये हैं. शहरी माओवादियों और अर्बन नक्सलियों ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के विचारों को आगे बढ़ाने का काम किया है.

रिपोर्ट के अनुसार माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने वर्ष 2018 में भारत में 176 घटनाओं को अंजाम दिया है, जो भारत में कुल घटनाओं का 26 प्रतिशत है. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) द्वारा किए गए इन आतंकी हमलों में 311 लोगों की मौत हुई.

हालांकि गृह मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार यह संख्या कुछ अलग है. इसके अनुसार माओवादी संगठन द्वारा 2018 में 833 हिंसक वारदातों को अंजाम दिया गया, जिसमें 240 लोगों की मौत हुई.

रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि जम्मू कश्मीर के बाद सबसे अधिक आतंकी घटनाओं को छत्तीसगढ़ में अंजाम दिया गया है. माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक सक्रिय है, इसी वजह से छत्तीसगढ़ के आस पास वामपंथी संगठन से जुड़ी आतंकी घटनाएं अधिक हुई हैं.

इनके अलावा सर्वाधिक खतरनाक आतंकी संगठन में अफगानिस्तान के तालिबान (Taliban), आईएस (Islamic State), अफ्रीका का अल-शबाब, बोको हरम और फिलीपींस की वामपंथी पार्टी को शीर्ष पर रखा गया है. इन संगठनों के बाद भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) को खतरनाक आतंकी संगठन माना गया है.

कुछ समय पूर्व भीमा कोरेगांव में हिंसा के आरोप में कथित शहरी माओवादियों को पुणे पुलिस ने गिरफ्तार किया था, उनके खिलाफ भी दुनिया के सर्वाधिक खतरनाक संगठन से जुड़े होने का आरोप है.

अदालत ने गिरफ्तार कथित शहरी माओवादियों के लिए कहा था कि “फरेरा का कार्य संगठन के लिए चंदा उगाही करना था और गोंजाल्विस का काम कैडर भर्ती करना. इसके अलावा सुधा भारद्वाज भी माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सक्रिय और वरिष्ठ सदस्य है.”

 

November 8th 2019, 5:14 am

08 नवम्बर / जन्मदिवस – विरक्त सन्त दिगम्बर स्वामी जी

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नई दिल्ली. अनादि काल से भारत भूमि पर हजारों सन्त महात्माओं ने जन्म लेकर अपने उपदेशों से जनता जनार्दन का कल्याण किया है. इन्हीं ऋषि-मुनियों की परम्परा में थे श्री दिगम्बर स्वामी, जिनके सत्संग का लाभ उठाकर हजारों भक्तों ने अपना जीवन सार्थक किया. स्वामी जी का जन्म ग्राम सिरवइया (जिला उन्नाव, उत्तर प्रदेश) में आठ नवम्बर, 1903 को नन्दकिशोर जी मिश्र तथा सुखदेई जी के घर में हुआ. इनका नाम गंगाप्रसाद रखा गया. जन्म से ही इनके बायें पैर में छह ऊंगलियां थीं. लोगों ने कहा कि यह बड़ा होकर घुमक्कड़ साधु बनेगा. इस भय से माता पिता ने 11 वर्ष की छोटी अवस्था में ही इनका विवाह कर दिया. परन्तु, गंगाप्रसाद तो बचपन से ही वैराग्य वृत्ति से परिपूरित थे. उनकी घर परिवार में कोई रुचि नहीं थी. अतः उन्होंने गृहस्थ धर्म को त्याग दिया और वाराणसी आकर कठोर तप किया. लम्बी साधना के बाद अपने गुरुजी की आज्ञा पाकर भ्रमण पर निकले और अन्ततः उन्नाव जिले के सुम्हारी गांव में आकर पुनः योग साधना में लग गये. यहां रहकर उन्होंने गायत्री के तीन पुरश्चरण यज्ञ किये और फिर संन्यास आश्रम स्वीकार कर लिया.

हिन्दू धर्म ग्रन्थों का गहन अध्ययन होने के कारण उन्होंने अनेक विद्वानों से शास्त्रार्थ में विजय पायी. कुछ समय बाद जब विरक्ति भाव में और वृद्धि हुई, तो उन्होंने दण्ड, कमण्डल तथा लंगोट भी त्याग दिया और दिगम्बर अवस्था में रहने लगे. इसी से भक्त इन्हें दिगम्बर स्वामी कहने लगे और आगे चलकर इनका यही नाम प्रसिद्ध हो गया. इसके बाद इनकी साधना और कठोर होने लगी. घोर सर्दी में भी ये भूमि पर पुआल बिछाकर तथा चटाई ओढ़कर सो जाते थे. भयंकर शीत में किसी ने इन्हें आग तापते नहीं देखा. इसी प्रकार ये भीषण वर्षा, गर्मी या लू की भी चिन्ता नहीं करते थे. जून 1956 में स्वामी जी केदारनाथ गये. वहां तपस्या से उन्हें प्रभु का साक्षात्कार हुआ और उनसे इसी तीर्थक्षेत्र में निर्वाण का आश्वासन मिला. इसके बाद ये अपने आश्रम लौट आये. स्वामी जी ने अनेक बार पूरे भारत के महत्वपूर्ण तीर्थों की पदयात्रा की. प्रायः इनके साथ इनके भक्त भी चल देते थे. उन्होंने धन, सम्पत्ति, वस्त्र, अन्न आदि किसी वस्तु का कभी संग्रह नहीं किया. अपरिग्रह एवं विरक्ति को ही अपनी साधना का अंग बना लिया.

कभी-कभी वे लम्बा मौन धारण कर लेते थे. कई वर्ष तक यह क्रम चला कि एक बार हाथ में जितना अन्न आ जाये, उसे ही खड़े-खड़े खाकर तृप्त हो जाते थे. हिमालय से इन्हें अतिशय प्रेम था. बदरीनाथ और केदारनाथ के दर्शन करने प्रतिवर्ष जाते थे. 23 अक्तूबर, 1985 को श्री केदारनाथ धाम में बैठे-बैठे ही प्राणायाम के द्वारा श्वास रोककर उन्होंने शरीर त्याग दिया. केदारनाथ मन्दिर के पीछे आदि शंकराचार्य की समाधि से कुछ दूर मन्दाकिनी के तट पर इन्हें समाधि दी गयी. कई वर्ष बाद लोगों ने देखा कि इनकी समाधि नदी में बह गयी है, पर इनका शरीर पद्मासन की मुद्रा में वहीं विराजमान है. शरीर अच्छी अवस्था में था तथा नमक डालने पर भी गला नहीं था. अतः वर्ष 1993 में पुनः बड़ी-बड़ी शिलाओं से इनकी समाधि बनायी गयी तथा उसके ऊपर इनकी मूर्ति स्थापित कर वहां छोटी सी मठिया बना दी गयी. इनके भक्त आज भी इनके आश्रम तथा समाधि स्थल पर आकर धन्यता का अनुभव करते हैं.

November 7th 2019, 5:51 pm

अयोध्या – झूठ पर झूठ बोलकर हमेशा अड़ंगे लगाते रहे वामपंथी

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जो भारत के विरोध में है, वो उसके साथ हैं. वामपंथी बाबर के साथ खड़े हैं. वो काशी विश्वनाथ मंदिर तोड़कर मस्जिद और कृष्ण जन्मभूमि पर मंदिर तोड़कर ईदगाह बनाने वाले औरंगजेब के साथ खड़े हैं, वो स्वयं को गर्व पूर्वक हिन्दू मंदिरों और देवप्रतिमाओं का विध्वंसक कहने वाले टीपू सुलतान के साथ खड़े हैं. इसलिए जब मार्च 2001 में तालिबान ने बामियान में महात्मा बुद्ध की प्रतिमाएं तोडीं, तो वो उन्हें भी बातूनी जिरहबख्तर पहनाने के लिए आ खड़े हुए. लेकिन तालिबान का दुनिया में बहुत विरोध हो रहा था, इसलिए सीधे समर्थन नहीं कर सकते थे, सो राम जन्मभूमि आंदोलन और हिन्दुओं को लपेट लिया और उनकी तुलना तालिबान से कर डाली. वामपंथियों ने कहा कि तालिबान द्वारा वैश्विक धरोहर बामियान बुद्ध प्रतिमाओं को तोड़ने की घटना 6 दिसंबर को बाबरी ढांचा गिराए जाने से भिन्न नहीं है. इस प्रकार अपने आराध्य श्रीराम के जन्मस्थान को विदेशी हमलावर के अवैध कब्जे से मुक्त कराने के लिए साठ सालों से आंदोलन कर रहे हिन्दुओं को उन जिहादी तालिबानियों जैसा बता दिया जो मज़हबी नफरत के आधार पर भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं और अन्य पूजा स्थल तोड़ने, हजारों महिलाओं-बच्चों की हत्याएं करने, स्कूल-संग्रहालय- किताबें जलाने, खून-खराबे के जोर पर महिलाओं को बुर्के में कैद करने और दुनिया में आतंकवाद फैलाने के लिए कुख्यात थे. इस प्रकार मानवता पर धब्बा बन चुके तालिबान की छवि का उपयोग अयोध्या आंदोलन की छवि मलिन करने के लिए किया.

सच के अलावा सब कुछ कहा

इस मानसिकता के बुद्धिजीवियों का हाथ-पैर पटकना स्वाभाविक था, जब राम जन्मभूमि मुक्ति अभियान ने विशाल आंदोलन का रूप ले लिया. सन् 1989 में राममंदिर आंदोलन का प्रभाव गांव-गांव तक पहुंच चुका था. तब जेएनयू के पच्चीस इतिहासकारों ने पैम्पलेट निकाला, जिसका शीर्षक दिया “इतिहास का राजनीतिक दुरुपयोग : बाबरी मस्जिद – रामजन्मभूमि विवाद”. ये इतिहासकार थे – रोमिला थापर, सुवीरा जायसवाल, केएन पनिक्कर, विपिन चंद्र, सर्वपल्ली गोपाल आदि. इस पत्रक में कहा गया था, कि बाबरी ढांचे को राम मंदिर तोड़कर बनाया गया, ऐसा कोई प्रमाण नहीं है. इस पैम्पलेट में साबित करने का प्रयास किया गया कि उत्तरप्रदेश में स्थित अयोध्या रामायण में कही गई अयोध्या है, इसका भी कोई प्रमाण नहीं है. आगे चलकर इन इतिहासकारों ने यह कहना शुरू कर दिया कि अयोध्या में राम पूजा होती ही नहीं थी, यह तो सोलहवीं –सत्रहवीं शताब्दी में शुरू हुआ. इन लोगों को मीडिया पर हावी वामपंथी पत्रकारों ने महान बुद्धिजीवी और इतिहासकार बनाकर पेश करना शुरू किया.

देश-विदेश में मिलने वाले इनाम-इकरार और सुविधाओं के कारण इस वामपंथी बुद्धिजीविता की ठसक ऐसी थी कि सरकारी कर्मचारी की आचार संहिता को किनारे रखकर शेरसिंह नामक बंगाल कैडर के आईएएस अधिकारी ने किताब लिख डाली, यह साबित करने के लिए कि बाबरी ढांचा तो बाबर के आने से पहले ही मौजूद था. बाबर ने कोई मंदिर नहीं तोड़ा. बाबर द्वारा मंदिर तोड़ने की ‘कहानी’ तो 1932 में सीताराम नामक लेखक ने अपनी किताब ‘अयोध्या का इतिहास’ में गढ़ी है. शेरसिंह ने किताब का नाम रखा ‘बाबर : अ सेक्युलर एंपरर’ (बाबर : एक सेक्युलर सम्राट).. इस किताब के लेखन के पुरस्कार के रूप में सउदी अरब सरकार ने शेरसिंह को चालीस लाख अमेरिकी डॉलर का सउदी शाह फैज़ल फाउंडेशन पुरस्कार देने की घोषणा की.

एक के बाद एक अड़ंगे लगाते रहे

ऐसे माहौल में वामपंथी फंतासियों की कतार लंबी होती गई. 18 जून 2002 को परिसर में चल रहे भूमि समतलीकरण के दौरान 39 पुरातात्विक अवशेष मिले. अक्तूबर में 40 पुरातत्वविदों के एक दल ने इनका अध्ययन करके इन्हें 12वीं शताब्दी के मंदिर का अवशेष बताया. लेकिन वामपंथियों ने इन सबूतों को मानने से इनकार कर दिया, कहने लगे कि ये अवशेष किसी पुरातत्वविद ने खोदकर नहीं निकाले, मजदूरों ने निकाले हैं. इन्हें नहीं मानेंगे. ऐसे विचित्र तर्क देकर ये लोग देश का माहौल खराब करते रहे. 06 दिसंबर 1992 को बाबरी ढांचा कारसेवकों के आक्रोश में ढह गया. ढांचा टूटने के बाद उसके मलबे में से मंदिर के अन्य प्रमाण निकले तो इन लोगों ने उन प्रमाणों का “कारसेवक अर्कियोलॉजी” कहकर मजाक उड़ाया.

2002 में इलाहबाद उच्च न्यायालय ने जन्मस्थान की खुदाई की जांच का आदेश दिया ताकि हिन्दू पक्ष के दावों की सत्यता की जांच की जा सके. हिन्दू पक्ष ने इस आदेश का स्वागत किया. लेकिन वामपंथी इतिहासकार न्यायालय के इस आदेश का विरोध करने लगे. सुन्नी वक्फ बोर्ड ने भी खुदाई के आदेश का विरोध किया. 05 मार्च 2003 को उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को खुदाई का आदेश दिया. 06 मार्च को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने सर्वोच्च न्यायालय से अपील की कि वो उच्च न्यायालय के खुदाई के आदेश को निरस्त कर दे.

09 मार्च को इरफ़ान हबीब, सूरजभान, केएम श्रीमाली आदि ‘सहामेट’ (सफ़दर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट) नामक संस्था के मंच पर आए और खुदाई का आदेश देने पर उच्च न्यायालय को कोसा. सहामेट वो संस्था है जो न्यूयॉर्क संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के उद्बोधन के समय उनके खिलाफ प्रदर्शन कर रही थी. नारे लगवा रही थी कि “हल्ला बोल-हल्ला बोल, वाजपेयी पर हल्ला बोल” और “भारत से कट्टरवाद को जाना होगा”. उस समय सहामेट ने संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव कोफी अन्नान को संबोधित करते हुए एक पर्चा भी बांटा, जिसमें लिखा गया था कि – अटल सरकार को मानवता के विरुद्ध किए गए अपराधों के लिए दोषी करार दिया जाए. अटल सरकार ने परमाणु हथियारों की होड़ शुरू कर दी है. अल्पसंख्यकों पर अत्याचार किए जा रहे हैं, आदि.

12 मार्च को इंडियन एक्सप्रेस में इरफ़ान हबीब का साक्षात्कार आया, जिसमें एक बार फिर उच्च न्यायालय को कोसा गया. तर्क था कि “खुदाई से यथास्थिति बनाए रखने के सर्वोच्च न्यायालय के 1994 के आदेश का उल्लंघन होगा”. मजे की बात ये है कि स्वयं सर्वोच्च न्यायालय को खुदाई के आदेश में अपने आदेश का कोई उल्लंघन नज़र नहीं आया.

झूठ पर झूठ

जब इन लोगों की नहीं चली और खुदाई शुरू हो गई तो ये लोग भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की योग्यता और निष्पक्षता पर सवाल उठाने लगे. जब खुदाई में भूमि के अंदर से मंदिर के अवशेष निकलने लगे तो वामपंथी कहने लगे कि उन्हें कहीं और से लाकर वहां रख दिया गया है. इनके ये सारे आरोप अदालत में औंधे मुंह गिरे.

06 दिसंबर को जब बाबरी ढांचा टूटा तो उसमें से एक शिलालेख निकला. लाल पत्थर का यह शिलालेख पांच फुट लंबा और ढाई फुट चौड़ा था. इस पर नागरी लिपि में संस्कृत से 20 पंक्तियां खुदी हुई थीं. जिनमें बताया गया था कि वहां 12वीं शताब्दी में दशानन का वध करने वाले श्रीराम का भव्य-ऊंचा मंदिर बनाया गया था. नरसिंह राव सरकार ने तत्काल इस शिलालेख की छाप लेकर उसे न्यायालय को सौंप दिया. अब वामपंथी बुद्धिवीर हड़बड़ाए. और फिर कहने लगे कि ये शिलालेख बाबरी ढांचे के मलबे में से नहीं निकला है, बल्कि इसे लखनऊ म्यूजियम से चुराकर यहां रख दिया गया है. लेकिन उनका ये झूठ तत्काल पकड़ा गया, जब लखनऊ म्यूजियम के निदेशक जितेन्द्र कुमार ने बताया कि लखनऊ म्यूजियम का शिलालेख म्यूजियम में ही मौजूद है, और बाबरी ढांचे में से निकले शिलालेख से बिलकुल अलग है. जितेन्द्र कुमार ने म्यूजियम में रखे उस शिलालेख को टीवी पर सारी दुनिया को दिखाकर वामपंथी झूठ का पर्दाफ़ाश कर दिया. दुनिया को इन तथाकथित इतिहासकारों की क्षमता और नीयत का पता चल गया. लेकिन, उन पर कोई असर नहीं हुआ.

झूठ न चले तो धौंस ही सही

दिसंबर 1994 में दिल्ली में विश्व पुरातत्व सम्मेलन होना था. वामपंथी खेमा बेचैन था क्योंकि इस सम्मेलन में 06 दिसंबर को निकले उस लाल पत्थर वाले शिलालेख का जिक्र आना तय ही था. पहले तो वो झूठा प्रचार करते रहे कि आयोजनकर्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग हैं, फिर, अर्जुन सिंह जो उस समय मानव संसाधन मंत्री थे, से अपने संबंधों का इस्तेमाल किया गया, और जब 01 दिसम्बर की रात को डेढ़ बजे विश्व पुरातत्व सम्मेलन के अध्यक्ष जैक गोल्सन ऑस्ट्रेलिया से आने वाले विमान से उतरे तो उन्हें अधिवेशन के महासचिव वीएन मिश्र बदहवास से मिले. वो तनाव में थे. उन्होंने जैक गोल्सन को बताया कि भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने लिखित आश्वासन मांगा है कि सम्मेलन में राम जन्मभूमि के पुरातात्विक साक्ष्यों पर किसी भी प्रकार से चर्चा नहीं की जाएगी, अन्यथा अधिवेशन करना संभव नहीं होगा. गोल्सन सन्न रह गए. जब ये बात सम्मेलन की कार्यकारिणी के सामने रखी गई, जिसके 33 सदस्यों में से 31 विदेशी थे, तो सभी सदस्य आक्रोशित हो उठे, परन्तु न मानने की कोई गुंजाइश नहीं थी. हारकर समिति ने लिखित आश्वासन दे दिया. फिर उन्हें बताया गया कि राष्ट्रपति इस सम्मेलन का उद्घाटन नहीं करेंगे, बल्कि अब अर्जुन सिंह उद्घाटन करेंगे.

फिर मानव संसाधन मंत्री ने सम्मेलन के आयोजकों को बुलाकर निर्देश दिया कि चार (वामपंथी) पुरातत्वविदों इरफ़ान हबीब, आरएस शर्मा, सूरजभान और केएम श्रीमाली को सम्मेलन की विद्वत समिति में शामिल किया जाए. अर्जुन सिंह ने दबाव बनाकर इरफ़ान हबीब और आरएस शर्मा को एक –एक सत्र का अध्यक्ष भी बनवाया. इन दोनों ने मिलकर अंग्रेजों द्वारा गढ़े गए भारत पर “आर्यों के आक्रमण सिद्धांत” को मुद्दा बनाया, लेकिन डॉ. एके शर्मा और डॉ. स्वराज्य प्रकाश गुप्त ने उनके दावों और तर्कों की धज्जियां उड़ा दीं.

फिर ये वामपंथी लॉबी, समिति पर दबाव बनाने में लग गई कि विश्व पुरातत्व सम्मेलन में 6 दिसंबर को हुए बाबरी ढाँचे के विध्वंस का निंदा प्रस्ताव लाया जाए. वामपंथी पत्रकारों ने इसे अखबार में भी छपवा दिया, लेकिन अध्यक्ष प्रोफ़ेसर जैक गोल्सन ने साफ मना कर दिया कि जब हमसे लिखित आश्वासन लिया गया है कि किसी भी रूप में अयोध्या की चर्चा नहीं होगी तो 6 दिसंबर की भी चर्चा नहीं होगी. उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि विश्व पुरातत्व सम्मेलन, पुरातात्विक अध्ययन के लिए है, राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति का अड्डा बनने के लिए नहीं. अंततः वामपंथी लॉबी 06 दिसंबर पर कोई निंदा प्रस्ताव पारित नहीं करवा सकी. लेकिन न्याय प्रक्रिया में अड़ंगे लगाए जाते रहे, तथ्यों को दबाने के षड़यंत्र रचे जाते रहे.

प्रशांत बाजपई

पाञ्चजन्य

November 7th 2019, 8:25 am

07 नवम्बर / जन्मदिवस – संघ समर्पित माधवराव मूले जी

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नई दिल्ली. 7 नवम्बर, 1912 (कार्तिक कृष्ण 13, धनतेरस) को ग्राम ओझरखोल (जिला रत्नागिरी, महाराष्ट्र) में जन्मे माधवराव कोण्डोपन्त मूले जी प्राथमिक शिक्षा पूरी कर आगे पढ़ने के लिए वर्ष 1923 में बड़ी बहन के पास नागपुर आ गये थे. यहां उनका सम्पर्क संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी से हुआ. मैट्रिक के बाद उन्होंने डिग्री कॉलेज में प्रवेश लिया, पर क्रान्तिकारियों से प्रभावित होकर पढ़ाई छोड़ दी. इसी बीच पिताजी का देहान्त होने से घर चलाने की पूरी जिम्मेदारी इन पर आ गयी. अतः  माधवराव जी ने टायर ट्यूब मरम्मत का काम सीखकर चिपलूण में यह कार्य किया, पर घाटा होने के कारण उसे बन्द करना पड़ा.

इस बीच डॉ. हेडगेवार जी से परामर्श करने वे नागपुर आये. डॉ. जी उन्हें अपने साथ प्रवास पर ले गये. प्रवास के दौरान डॉ. जी के विचारों ने माधवराव के जीवन की दिशा बदल दी. चिपलूण आकर माधवराव जी ने दुकान किराये पर उठा दी और स्वयं पूरा समय संघ कार्य में लगाने लगे. वर्ष 1937 में निजाम हैदराबाद के विरुद्ध हुए सत्याग्रह तथा वर्ष 1938 में पुणे में सोना मारुति सत्याग्रह के दौरान वे जेल भी गये. वर्ष 1939 में माधवराव जी प्रचारक बने. वर्ष 1940 में उन्हें पंजाब भेजा गया. विभाजन की चर्चाओं के कारण वहां का वातावरण उन दिनों बहुत गरम था. ऐसे में हिन्दुओं में हिम्मत बनाये रखने तथा हर स्थिति की तैयारी रखने का कार्य उन्होंने किया. गांव और नगरों में शाखाओं का जाल बिछ गया. माधवराव जी ने सरसंघचालक श्री गुरुजी का प्रवास सुदूर क्षेत्रों में करवाया. इससे हिन्दुओं का मनोबल बढ़ा और वे हर स्थिति से निबटने की तैयारी करने लगे.

मुस्लिम षड्यन्त्रों की जानकारी लेने के लिए अनेक स्वयंसेवक मुस्लिम वेश में मस्जिदों और मुस्लिम लीग की बैठकों में जाने लगे. शस्त्र संग्रह एवं प्रशिक्षण का कार्य भी बहुत प्रभावी ढंग से हुआ. इससे विभाजन के बाद बड़ी संख्या में हिन्दू अपने प्राण बचाकर आ सके. आगे चलकर भारत में इनके पुनर्वास में भी माधवराव जी की भूमिका अति महत्त्वपूर्ण रही. देश के स्वतन्त्र होते ही धूर्त पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया. माधवराव जी के निर्देश पर स्वयंसेवकों ने भारतीय सैनिकों के कन्धे से कन्धा मिलाकर कार्य किया. श्रीनगर हवाई अड्डे को स्वयंसेवकों ने ही दिन रात एक कर ठीक किया. इसी से वहां बड़े वायुयानों द्वारा सेना उतर सकी. अन्यथा आज पूरा कश्मीर पाकिस्तान के कब्जे में होता.

वर्ष 1959 में उन्हें क्षेत्र प्रचारक, वर्ष 1970 में सह सरकार्यवाह तथा वर्ष 1973 में सरकार्यवाह बनाया गया. वर्ष 1975 में इन्दिरा गान्धी ने देश में आपातकाल थोपकर संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया. सरसंघचालक बालासाहब देवरस जी जेल चले गये. ऐसे में लोकतन्त्र की रक्षार्थ हुए सत्याग्रह का संचालन माधवराव जी ने ही किया. एक लाख स्वयंसेवक जेल गये. इनके परिवारों को कोई कष्ट न हो, इस बात पर माधवराव जी का जोर बहुत रहता था. वर्ष 1977 के लोकसभा चुनाव में इन्दिरा गान्धी पराजित हुई. संघ से भी प्रतिबन्ध हट गया.

यद्यपि माधवराव जी कभी विदेश नहीं गये, पर उन्होंने विदेशस्थ स्वयंसेवकों से सम्पर्क का तन्त्र विकसित किया. आज विश्व के 200 से भी अधिक देशों में संघ कार्य चल रहा है. इस भागदौड़ से उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया. वर्ष 1978 में अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने रज्जू भैया को सरकार्यवाह चुना. मुम्बई में माधवराव जी की चिकित्सा प्रारम्भ हुई, पर हालत में सुधार नहीं हुआ. 30 सितम्बर 1978 को अस्पताल में ही उनका देहान्त हो गया.

November 7th 2019, 7:25 am

सबके मर्यादा पुरुषोत्तम राम

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राम सत्य है, मर्यादा है, कर्म है, आदर्श है, अनुकरणीय, हरमन में विराजते और जगत के पालनहार सबके मर्यादा पुरुषोत्तम राम हैं. “र” का अर्थ है – अग्नि, प्रकाश, तेज, प्रेम, गीत. रमते इति राम: जो कण-कण में रमते हों, उसे राम कहते हैं. निरंतर आत्मा में रमने वाला राम ही शीतल और स्वच्छ हृदय का धीरवान संत है हम सबके राम.

संत कबीर लिखते हैं कि, राम शब्द भक्त और भगवान में एकता का बोध कराता है. जीव को प्रत्येक वक्त आभास होता है कि राम मेरे बाहर एवं भीतर साथ-साथ हैं. केवल उनको पहचानने की आवश्यकता है. मन इसको सोचकर कितना प्रफुल्लित हो जाता है. इस नाम से सर्वआत्मा, स्वामी, सेवक और भक्त में उतनी सामीप्यता नहीं अनुभव होता हैं.

दुनिया के राम और राम की दुनिया, दुनियाभर में लोग श्रीराम को भगवान और अपना आराध्य मानते हैं. इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड में रामगाओं का गौरवमयी और पुराना इतिहास है. मॉरीशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद और गुयाना की राम कथाएं पूरी दुनिया में अपना अलग महत्व रखती हैं. दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में वैश्विक स्तर पर रामलीलाएं आयोजित होती हैं. हर देश में रामायण की प्रस्तुतियां, अनूठी राम मान्यताएं और उनकी महान परंपराएं विद्यमान हैं. स्तुत्य, घट-घट वासी हम सबके राम कंठ-कंठ में  अलौकिक है.

महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में अवतार के उद्देश्य और सिद्धांत को सुंदर ढंग से प्रतिपादित किया है. अवतारी पुरुष अपनी श्रेष्ठता प्रकट करने के उद्देश्य आचरण नहीं करते उनका उद्देश्य यह होता है कि मनुष्य अपने जीवन में श्रेष्ठता जागृत करने का मर्म एवं ढंग उनको देखकर सीख सकें. इसीलिए वह अपने आप को सामान्य मनुष्य की मर्यादा में रखकर ही कार्य करते हैं. राम तो धर्म की साक्षात मूर्ति है. वह बड़े साधु और सत्य पराक्रमी है. जिस प्रकार इंद्र देवताओं के नायक हैं. उसी प्रकार राम भी सब लोकों के नायक हैं. श्री राम धर्म के जानने, सत्य प्रतिज्ञ की भलाई करने वाले कीर्तिवान, ज्ञानी, पवित्र, मन और इंद्रियों को वश में करने वाले तथा योगी है.

प्रत्युत, तुलसी के राम, जैसे काम के अधीन कामुक व्यक्ति को नारी प्यारी लगती है और लालची व्यक्ति को जैसे धन प्यारा लगता है. वैसे ही हे रघुनाथ, हे राम, आप मुझे हमेशा प्रिय लगते हैं. हे श्री रघुवीर! मेरे समान कोई दीन नहीं, आपके समान कोई दीनों का करने वाला नहीं है. ऐसा विचार कर हे रघुवंशी मणि! मेरे जन्म-मरण के भयानक दुखों को हरण कर लीजिए. श्री राम भक्ति रुकमणी जिसके हृदय में बसती है. उसे स्वप्न में भी लेश मात्र दुख नहीं होता.

हृदयंगम, राम नाम के पैरोकार गुरु नानक देव जी ने ना केवल राम नाम बल्कि नाद, शब्द, धुन, सच एक ही अर्थ में प्रयोग किया है. भगवान राम की महिमा सिक्ख परंपरा में भी बखूबी विवेचित है. सिक्खों के प्रधान ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में 55 सौ बार भगवान राम के नाम का जिक्र मिलता है. सिक्खों  में भगवान राम से जुड़ी विरासत राम नगरी में ही स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड में पूरी शिद्दत से प्रावमान है. उनकी जड़ें भगवान राम के पुत्र लव से जुड़ती है और दशम गुरु गोविंद सिंह जिस सोनी कुल के नर नाहर थे, उसकी जड़ें भगवान राम के दूसरे पुत्र कुश से जुड़ती हैं.

मनोहारी, रहीम के राम में जिन लोगों ने राम का नाम धारण न कर अपने धन, पद और उपाधि को ही जाना और राम के नाम पर विवाद खड़े किये, उनका जन्म व्यर्थ है. वह केवल वाद-विवाद कर अपना जीवन नष्ट करते हैं.

लीला में मीरा कहती है, जैसे एक कीमती मोती समुंदर की गहराइयों में पड़ा होता है. और उसे अथक परिश्रम के बाद ही पाया जा सकता है. वैसे ही ‘राम’ यानी ईश्वर रूपी मोती हर किसी को सुलभ उपलब्ध नहीं है. सद्गुरु आपकी कृपा से मुझे राम रूपी रत्न मिला है. यह ऐसा धन है जो ना तो खर्च करने से घटता है और ना ही उसे चोर चुरा सकते हैं.

बतौर, शायर अल्लामा इकबाल ने सबके भगवान श्रीराम को इमाम-ए-हिन्द कहा है.

है राम के वजूद पे हिंदोस्तां को नाज.

अहल-ए-नजर समझते हैं उस को इमाम-ए-हिंद..

हेमेंद्र क्षीरसागर

 

November 7th 2019, 7:25 am

अयोध्या – अदालत में खुली वामपंथी बुद्धिजीवियों की पोल

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अयोध्या मामले में हिन्दू पक्ष को झूठा साबित करने की कोशिश करने वाले वामपंथी अदालत में बार-बार झूठे साबित हुए. जब वास्तव में सबूतों की धार पर रखे गए तो उनकी बोलती बंद होती गई. अदालत उन्हें बार-बार फटकार लगाती गई. इनके फर्जी सबूतों की धज्जियां उड़ती गईं. अदालत में उनके साथ क्या हुआ, ये विस्तार से जानना जरुरी है, क्योंकि बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी और वक्फ बोर्ड की तरफ से तथाकथित सबूत पेश करने वाले यही लोग रहे हैं.

खोखला दंभ

जब पुरातत्व विभाग ने न्यायालय के कहने पर जन्मस्थल की खुदाई प्रारंभ की और मंदिर के प्रमाण सामने आने लगे तो इन लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि ‘पुरातत्व विभाग तो एक सरकारी विभाग है, उसकी क्षमता का क्या भरोसा. वैसे भी उसमें सारे हिन्दू इतिहासकार भरे हुए हैं. वो कैसे निष्पक्ष रिपोर्ट दे सकते हैं.’ इरफ़ान हबीब और डीएन झा अयोध्या राम की ऐतिहासिकता पर सवाल उठाने लगे. जो पुरातात्विक या दस्तावेजी सबूत सामने थे उन्हें नकारा, और अपने दावों को सिद्ध करने के लिए अजीबोगरीब दलीलें प्रस्तुत करते गए. जैसे डीएन झा ने एक ब्रिटिश फौज के चिकित्सक फ्रांसिस बुकनन का सन्दर्भ पेश किया, जिसने 1810 में लिखा था कि अयोध्या में मंदिर को तोड़कर मस्जिद नहीं बनाई गई. अब बुकनन की योग्यता थी – जीवशास्त्र और वनस्पति शास्त्र में, लेकिन उसको इतिहासकार के रूप में पेश किया. जबकि भारत के पेशेवर पुरातत्वविदों को नकार दिया. ब्रिटिश फौज के चिकित्सक ने कहा कि ऐसा नहीं हुआ तो वो पत्थर की लकीर हो गया, और जब सरकारी ब्रिटिश दस्तावेज इस ओर इशारा करते हैं कि मंदिर को तोड़कर बाबर ने ‘मस्जिद’ बनाई, तो उसे अंग्रेजों की चाल करार दे दिया गया. वो विशेष वैचारिक झुकाव रखने वाले ‘इंडोलॉजिस्ट’ को उद्धृत करते हैं, कि भारत में मुस्लिम शासकों ने मंदिर नहीं तोड़े, लेकिन भारत के पिछले पांच सौ वर्षों के साहित्य में बिखरे विवरणों को चर्चा करने योग्य भी नहीं समझते.

हैरान थी अदालत ये ‘बुद्धिजीविता’ देखकर

साल 2010. इलाहबाद उच्च न्यायालय में रामजन्मभूमि मामले की सुनवाई हो रही थी. ऐसी लचर दलीलें लेकर जब ये लोग न्यायालय पहुंचे, तो इनके कुतर्क तो हवा में उड़ ही गए, इनकी योग्यता और विशेषज्ञता का मुलम्मा भी उतर गया. सुवीरा जायसवाल मंदिर न होने की अपनी थ्योरी के पक्ष में कोई प्रमाण नहीं दे सकीं. सख्ती से पूछा तो जवाब मिला कि ‘मैंने इस संबंध में इतिहास का अध्ययन नहीं किया है.” जब उनसे पूछा गया कि डॉ. अजीज अहमद की किताब जो अदालत में पेश की गई है, वो तो आपके निष्कर्ष के विरुद्ध है? तो सुवीरा ने जवाब दिया कि वो उस किताब से असहमत हैं. अदालत ने जब किताब के बारे में विस्तार से पूछताछ शुरू कर दी तो सुवीरा का जवाब आया कि “मैंने ये किताब पढ़ी नहीं है.”

दूसरे इतिहासकार थे – सुरेश चंद्र मिश्रा, जो भारतीय पुरातव विभाग की योग्यता को चुनौती दे रहे थे. वो दो बार गवाही देने आए. पहली पेशी में कहा कि बाबरी ढांचे में फारसी में एक शिलालेख लगा हुआ था. दूसरी पेशी में बोले कि ढांचे में अरबी में एक शिलालेख लगा हुआ था. अब अदालत ने पूछा कि अरबी में था या फारसी में? तो अचकचा गए, फिर थोड़ी देर में मान लिया कि उन्हें न तो अरबी आती है, और न फारसी. और “मैंने किसी पत्रिका में इसके बारे में पढ़ा था.” ये इतिहासकार महोदय जितना बोलते गए, उतना फंसते गए. बोले कि “मैं विवादित ढांचे में बाबरनामा पुस्तक लेकर गया था, उस पुस्तक से शिलालेख का मिलान किया था.” जब और बारीकी से जिरह हुई तो उन्होंने कहा कि वो पुस्तक अंदर लेकर नहीं गए थे, बाहर ही छोड़ गए थे.

एक अन्य प्राध्यापक सुशील श्रीवास्तव भी बाबरी के पक्ष में गवाही देने अदालत में पेश हुए. थोड़ी ही देर में उन्होंने मान लिया कि उन्हें इतिहास की कोई ख़ास जानकारी नहीं है, और उन्हें न तो अरबी-फारसी आती है और न ही संस्कृत. फिर जब अदालत ने उनसे पूछा कि वो इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचे कि बाबर के सिपहसालार मीर बाकी ने मंदिर को तोड़कर बाबरी ढांचा खड़ा नहीं किया था. तो उन्होंने जवाब दिया कि उनके ससुर ऐसा मानते हैं. जब ससुर साहब की विशेषज्ञता के बारे में पूछताछ हुई तो पता चला कि श्रीवास्तव जी इस्लाम अपना चुके हैं, उनका नया नाम सज्जाद है, और उन्होंने इस्लाम अपनाया ताकि मेहर अफसान फारुखी से निकाह कर सकें. सुशील श्रीवास्तव उर्फ सज्जाद साहब ने अयोध्या पर एक किताब भी लिखी थी.

भटकाते और अटकाते रहे…..

वामपंथी इतिहासकार भारत के आमजन से कोसों दूर रहे, लेकिन एक छोटे लेकिन प्रभावशाली दायरे के अंदर उनकी चर्चा और रूतबा हमेशा बना रहा, जिसके बल पर वो तीस सालों तक अयोध्या मामले को भटकाते और अटकाते रहे. इनके पोषण केंद्र बने मीडिया संस्थान, जेएनयू जैसे कुछ बड़े शिक्षा संस्थान, कला संस्थान, सत्ता की कृपा से मिलने वाली अकादमिक कुर्सियां और विदेशों, खास तौर पर यूरोप के कुछ ऐसे विश्वविद्यालय जहां समाजवादी या वामपंथी विचार के लोग प्रभाव में हैं. चीन और रूस की कम्युनिस्ट सत्ता से मार्गदर्शन तो वो लेते ही रहे और इसलिए वहां से भी इन्हें उभारने, संवारने और प्रचारित-प्रक्षेपित करने के योजनाबद्ध काम होते रहे. वामपंथी बुद्धिजीवियों ने तो पाकिस्तान में भी ऐसी दोस्तियां गांठकर रखीं कि वहां की गोष्ठियों में उन्हें भारत और हिन्दू संस्कृति को कोसने के लिए आमंत्रित किया जाता रहा. इसलिए वो धारा 370 बनाने रखने की वकालत करते रहे, सेना को खलनायक और अलगाववादियों को नायक बताते रहे. जब अयोध्या आंदोलन प्रारंभ हुआ तो उपरोक्त सभी साधनों और मंचों का उपयोग राम मंदिर की मांग को हिंसक और असहिष्णु लोगों के षड्यंत्र के रूप में प्रस्तुत करने के लिए किया गया. मीडिया में इसी आशय के लेख और रपट छपते. उक्त आशय के विचार प्रकट करने वाले लोगों के साक्षात्कार प्रकाशित होते. कला और नाट्य जगत में भी इसका खासा असर था. और ये सिलसिला चलता रहा.

प्रशांत बाजपई

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November 6th 2019, 8:22 am

सपा सरकार जिन आतंकियों को छोड़ना चाहती थी, अदालत ने उन्हें सुनाई फांसी की सजा

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वर्ष 2007 में सी.आर.पी.एफ के आयुध भण्डार तक पहुंचने की योजना बना कर आए जिन आतंकवादियों को समाजवादी पार्टी सरकार रिहा करना चाहती थी, उन आतंकवादियों के खिलाफ मुकदमे को वापस लेने की तैयारी चल रही थी. उसी मुक़दमे की सुनवाई पूरी होने पर अदालत ने इन आतंकियों को फांसी की सजा सुनाई है. उस आतंकी हमले में सी.आर.पी.एफ के सात जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे.

उत्तर प्रदेश, रामपुर जनपद में 31 दिसंबर, 2007 की रात, जब ए.के. – 47 जैसे स्व-चालित हथियारों से गोलियां चलने लगीं, तब लोगों ने सोचा कि नए वर्ष के जश्न में कुछ लोग पठाखे दाग रहे हैं. मगर कुछ ही देर में पता चला कि पाकिस्तान से आए आतंकवादियों ने सी.आर.पी.एफ के ग्रुप सेंटर पर हमला कर दिया है. इस हमले में सी.आर.पी.एफ के हवलदार रामजी शरण मिश्र, हवलदार ऋषिकेश राय, हवलदार अफज़ल अहमद, सिपाही मनवीर सिंह, सिपाही विकास कुमार, सिपाही आनंद कुमाद एवं सिपाही देवेन्द्र कुमार वीरगति को प्राप्त हो गए थे. आतंकी घटना को अंजाम देने वाले चार आतंकियों — मो शरीफ, सबाउद्दीन, इमरान एवं फारूख– को अदालत ने फांसी की सजा सुनाई है. जंग बहादुर खान को आजीवन कारावास एवं फहीम अंसारी को दस वर्ष की सजा सुनाई है. इमरान और फारूख ये दोनों आतंकी पाकिस्तान के निवासी हैं. फहीम अंसारी मुम्बई का निवासी है और सबाउद्दीन बिहार का रहने वाला है. ये दोनों मुम्बई के 26/11 के हमले में भी आरोपी थे.

इस आतंकी हमले में इमरान सहजाद, मो. फारूख, मो. शरीफ, सबाउद्दीन, मो. कौसर, गुलाब खान एवं जंग बहादुर खान को ए.टी.एस ने गिरफ्तार किया था. इन आतंकियों की योजना सी.आर. पी.एफ के आयुध भंडार तक पहुंचने की थी, मगर सी.आर. पी.एफ के जवानों ने मुस्तैदी से मोर्चा संभाला. जिसकी वजह से इन आतंकियों को पीछे हटना पड़ा था.

बताया जाता है कि घटना के कुछ दिन पहले अलर्ट भी जारी हुआ था, लेकिन पुलिस ने उस पर ध्यान नहीं दिया था. वर्ष 2012 में जब सपा की सरकार बनी तो इन आतंकवादियों के खिलाफ चल रहे मुकदमे को वापस लेने का प्रयास भी किया गया. शासन की तरफ से जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर पूछा गया था कि क्या इस मुकदमे को वापस लिया जा सकता है. शासन के इस पत्र की खबरें जब अखबारों में छपीं. तब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस पर सख्त टिप्पणी की थी. इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार बैकफुट पर आ गई थी तथा मामला ठंडे बस्ते में चला गया था. मामले में 12 साल तक सुनवाई चली. ढाई सौ तारीखें पड़ी. 54 गवाहों में से 34 गवाहों की गवाही हुई और तब इन आतंकियों को सजा सुनाई गई है.

November 6th 2019, 5:06 am

अयोध्या – वामपंथी झूठ की कालिख से रंगे पन्ने और चेहरे

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तीन दशकों तक जाली प्रमाण, बोगस बातें और झूठ के पुलिंदों के सहारे मंदिर के अकाट्य प्रमाणों को झुठलाने की कोशिश की गई. अदालत में झूठे साबित होते रहे, पर बाहर वही झूठ दोहराते चले गए.

हिन्दू संस्कृति को सब बुराइयों की जड़ कहने वाले और पूजा-उपासना को अफीम कहने वाले वापंथियों ने हमेशा भारत के इतिहास को विकृत करके प्रस्तुत किया. कांग्रेस से उनका एक अलिखित समझौता रहा, जिसके अंतर्गत वामपंथियों को शिक्षा और कला संस्थानों, मीडिया आदि के क्षेत्र में बढ़ने दिया गया, और बदले में वामपंथियों ने ‘नेहरूवाद’ को भारत का विचार बताकर उसे सब ओर स्थापित किया. नेहरू का कथन ‘मैं दुर्घटनावश हिन्दू हूं’ कम्युनिस्ट विचार को छजता भी था. इसलिए कांग्रेस का सत्ताधीश परिवार वामपंथियों के साथ काफी सहज था. इसलिए साठ के दशक से लेकर आज तक गांधी परिवार और उनके इर्द-गिर्द के लोग वामपंथियों के साथ मंच और शक्ति साझा करते रहे.

वामपंथियों ने सत्ता की इस करीबी का फायदा उठाकर वामपंथी विचार को स्थापित करने और हिन्दू पहचान को झुठलाने, बदनाम करने में पूरी ताकत झोंक दी. जब राम मंदिर का आंदोलन प्रारंभ हुआ, तब वामपंथियों ने राम जन्मभूमि के इतिहास और पुरातात्विक प्रमाणों को झुठलाने के लिए अपनी सेवाएं अर्पित कर दीं. वो उन मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जा खड़े हुए जो राम जन्मभूमि को लेकर मुस्लिम समाज को गुमराह कर रहे थे, और किसी भी कीमत पर सच को सामने नहीं आने देना चाहते थे. इतिहास के साथ की गई इस लंबी धोखेबाजी का भी इतिहास बन गया, जिसे परत दर परत उधेड़ना जरूरी है.

साल 1991 में चार वामपंथी ‘इतिहासकारों’ आरएस शर्मा, एम अतहर अली, डीएन झा और सूरज भान ने अयोध्या पर एक रिपोर्ट तैयार की. इस रिपोर्ट में घुमा फिराकर यह कुतर्क दिया गया कि राम जन्मभूमि श्रीराम का जन्मस्थान नहीं है, और न ही बाबर ने कोई मंदिर तोड़कर राम जन्मभूमि पर किसी भवन (बाबरी ढांचा) का निर्माण किया. इस रिपोर्ट को तथा अन्य मुस्लिम पक्षकारों ने हाथों हाथ लिया, यह जानते हुए भी कि मंदिर के अकाट्य प्रमाणों को छिपाकर यह रिपोर्ट तैयार की गई थी.

अदालत में राम जन्मस्थान का नक्शा फाड़ने वाले मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने इस रिपोर्ट को Historian’s Report To The Indian Nation नाम से सर्वोच्च न्यायालय को सौंपा. सर्वोच्च न्यायालय ने इस रिपोर्ट को प्रमाण मानने से इनकार कर दिया क्योंकि यह रिपोर्ट राम जन्मस्थान के खुदाई में मिले मंदिर के प्रमाणों को दरकिनार कर तैयार की गई थी. खुदाई का आदेश उच्च न्यायालय ने दिया था. कोर्ट ने इस रिपोर्ट को इसके लेखकों का विचार या अभिमत (ओपिनियन) माना, सबूत नहीं. अदालत ने कहा कि इस रिपोर्ट को तैयार करने वालों ने “पुरातात्विक खुदाई में मिले वास्तु प्रमाणों – निष्कर्षों को ध्यान में नहीं रखा. रिपोर्ट को तैयार करने की प्रक्रिया भी असावधानीपूर्वक संचालित की गई लगती है.”

गौरतलब बात यह है कि रिपोर्ट उत्खनन के पहले तैयार की गई थी, लेकिन जब भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा खुदाई में ढांचे के नीचे मंदिर होने के प्रमाण मिले तो भी इस रिपोर्ट के लेखक और इस रिपोर्ट का विज्ञापन करने वाले अपनी बात पर अड़े रहे. उन्होंने इस रिपोर्ट को जस का तस बनाए रखा, और खुदाई में मिले प्रमाणों का जिक्र या खंडन करने का भी प्रयास नहीं किया. इसके पहले इलाहबाद (अब प्रयाग) उच्च न्यायालय ने भी इस रिपोर्ट को मानने से इनकार कर दिया था.

प्रमाणों को झुठलाने के अन्य प्रयास भी किए गए. अगस्त 2003 में, छह महीने लंबी खुदाई के बाद भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने इलाहबाद उच्च न्यायालय को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें बताया गया था कि जहां बाबरी ढांचा बनाया गया था, उस स्थान की खुदाई में मंदिर के पुख्ता प्रमाण मिले हैं. इन प्रमाणों में मूर्तियों के टुकड़े और व अन्य हिन्दू चिन्ह मौजूद थे. इस रिपोर्ट ने मंदिर विरोध पर आमादा ‘बुद्धिजीवियों’ को हिलाकर रख दिया. तब जेएनयू की पुरातत्व की एक प्रोफ़ेसर सुप्रिया वर्मा और शिव नादर यूनिवर्सिटी की जया मेनन आगे आईं और भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट को ही झूठा बता दिया.

उन्होंने कहा कि खुदाई में मंदिर के जो प्रमाण मिले हैं वो वास्तव में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) ने लाकर रख दिए हैं, और भूमि के अंदर जो भवन के अवशेष मिले हैं, वो उसके पहले की मस्जिद के हैं. उनका कुतर्क था कि जब एएसआई ने खुदाई की उस समय केंद्र में अटल जी की सरकार थी, इसलिए एएसआई के रिपोर्ट पर भरोसा नहीं किया जा सकता. वर्मा इन दावों को लेकर वक्फ बोर्ड की तरफ से अदालत में पहुंच गईं.

लेकिन अदालत ने पैनी जिरह करके वर्मा के दावों की पोल खोल दी और फटकार लगाई. न्यायालय की तीन जजों की बेंच ने वर्मा की रिपोर्ट को आधारहीन बताकर खारिज कर दिया. जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने वर्मा और उनके सहयोगियों से अनेक सवाल पूछे, जिसमें उनके दावों के आधार, विषय विशेषज्ञता, पृष्ठभूमि आदि के बारे में पूछा. श्री अग्रवाल के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि कई तथाकथित विशेषज्ञों की विषय विशेषज्ञता यह थी कि उन्होंने अयोध्या पर कुछ पैम्पलेट्स छापे थे, या फुटकर लेख लिखे थे. जब अदालत ने वर्मा से उनके आरोपों के प्रमाण मांगे तो जवाब सुनकर हैरान रह गए और कहा कि “वो सबूतों की अनदेखी कर रही हैं और शुतुरमुर्ग के तरह प्रमाणों से मुंह छिपा रही हैं.” न्यायमूर्ति श्री अग्रवाल ने कहा कि जिन लोगों को ‘स्वतंत्र’ गवाह बताकर अदालत में पेश किया गया है, वे सब आपस में संबद्ध हैं. एक ने दूसरे के मार्गदर्शन में पीएचडी की है, तो दूसरे ने तीसरे के साथ मिलकर किताब लिखी है.

इन्हीं में से एक ‘विशेषज्ञ’ सुवीरा जायसवाल ने अदालत में स्वीकार किया कि उन्होंने अयोध्या के बारे में सारा ज्ञान अखबारों से हासिल किया है या दूसरों से सुनकर. यानि इन तथाकथित अयोध्या विशेषज्ञ ने अयोध्या में कदम भी नहीं रखा था. जब सुप्रिया वर्मा से 2002 में जन्मस्थान पर किए गए भूमि रडार सर्वेक्षण व उसमें मिले प्रमाणों के बारे में पूछा तो सुप्रिया वर्मा का जवाब था कि उन्होंने वो रिपोर्ट पढ़ी ही नहीं है.

सुप्रिया वर्मा और उनके साथियों से अदालत में पूछा गया कि वे किस आधार पर कह रही हैं कि “मंदिर के प्रमाणों को स्थल पर कहीं से लाकर रखा गया है और भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने झूठ बोला है? क्या आपने उन्हें ऐसा करते देखा है, या कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह है?” तो ये सब बगलें झांकने लगे.

इन सब बातों को देख-सुनकर अदालत ने बहुत नाराजगी जताई और इनके दावों को खारिज करते हुए कहा कि इतने महत्वपूर्ण मामले को सुलझाने के स्थान पर उलझाने और वक्त बर्बाद करने की कोशिशें की जा रहीं हैं. यह घटना 2010 की है. रोचक बात यह है कि अदालत से फटकार खाकर इन लोगों ने क्या किया? अदालत में झूठे साबित हो जाने के बाद से ये तथाकथित अयोध्या विशेषज्ञ देश में सेमीनार करते, वामपंथी मीडिया में लेख लिखते, साक्षात्कार देते घूम रहे हैं कि “वहां कोई मंदिर था ही नहीं, और मस्जिद के नीचे भी मस्जिद ही मिली है…”

प्रशांत बाजपई

साभार – पाञ्चजन्य

November 5th 2019, 5:34 am

भारत में ‘राष्ट्रीयता के समग्र विचार’ हैं – प्रफुल्ल केतकर

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‘विमर्श 4.0’

नई दिल्ली. दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉन्फ्रेंस सेंटर में युवा द्वारा आयोजित तीन दिवसीय “विमर्श – 2019” के दूसरे दिन भी विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने छात्रों का मार्गदर्शन किया.

पहले सत्र ‘ब्रेनवॉश्ड रिपब्लिक’ सत्र में लेखक विजय मोहन तिवारी, नीरज अत्री और डॉ. मनोज सिन्हा, ‘जम्मू कश्मीर एंड लद्दाख अवे फॉरवर्ड’ में जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र के निदेशक आशुतोष जी भटनागर और डॉ. एस.के. गर्ग, ‘सोशल मीडिया वारियर्स’ पैनल डिस्कशन में प्रशांत उमराव, कायनात काज़ी, अखिलेश शुक्ल, अनिल पाण्डेय, ‘पुस्तक चर्चा’ के लिए मानोशी सिन्हा रावल, सिद्धार्थ और आकाश नरेन्द्र और ‘अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर’ विषय पर प्रोफेसर महेश्वर सिंह और शुभम रस्तोगी जी ने चर्चा की.

दूसरे सत्र में अमन लेखी, मनन पोपली और राजेश गोगना ने ‘रिविज़िटिंग गोल्डन ट्रायंगल – नेशनल सिक्यूरिटी एंड पर्सनल लिबर्टी’ विषय पर चर्चा की और प्रोफेसर भगवती प्रसाद का ‘टेक्नो नेशनलिज्म’ विषय पर उद्बोधन रहा.

इसके बाद के सत्र में ‘साइंस ऑफ़ स्पिरिचुअल’ विषय पर प्रोफेसर रमेश चन्द्र भारद्वाज व प्रोफेसर पवन धर, ‘वीमेन इन न्यूज़’ विषय पर पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा, अदिति टंडन, ‘इंडियन फुटप्रिंट एंड स्पेस टेक्नोलॉजी’ विषय पर डॉ. राजाबाबू और डॉ. सविता राय, ‘रोल ऑफ़ सिविल सर्वेंट फॉर अवेकंड भारत’ विषय पर संकल्प आई.ए.एस. के संगठन महामंत्री कन्हैया लाल, रविन्द्र. अध्यक्ष रविन्द्र सिंह, डॉ. आर.एस. गुप्ता ने अपने-अपने क्षेत्रों में अपनी मृगेन्द्रता साबित करते हुए छात्रों को राष्ट्रसेवा की ओर प्रोत्साहित किया.

कार्यक्रम में उभरते उद्यमियों का प्रोत्साहन करने हेतु ‘स्टार्ट-अप एंड इनोवेशन अवार्ड’ का आयोजन भी किया गया. जिसमें डॉ. आदित्य गुप्ता का सान्निध्य विद्यार्थियों को प्राप्त हुआ. साथ ही रंगोली व चित्रकला प्रतियोगिता, संभाषण प्रतियोगिता व निबंध प्रतियोगिता भी रही.

दूसरे दिन के समापन सत्र में आर्गनाइज़र पत्रिका के संपादक प्रफुल्ल केतकर का उद्बोधन रहा. उन्होंने ‘इंडिक थॉट्स बनाम अनइंडिक आइडियोलॉजी’ विषय रखा. उन्होंने कहा कि भारत में ‘राष्ट्रवाद की एक्स्क्लुसिविटी’ नहीं बल्कि ‘राष्ट्रीयता के समग्र विचार’ हैं. साम्यवाद व पूंजीवाद के साथ-साथ ‘ईसाईवाद व इस्लामवाद’ की विचारधाराओं को समझाते हुए ज़ोर दिया कि भारत इन विचारधाराओं से बाध्य नहीं है. स्वामी विवेकानंद ने शिकागो धर्म संसद के भाषण में उन्होंने कहा था -“मैं उस सभ्यता का प्रतिनिधि हूँ जो ‘सहिष्णुता’ से भी आगे विचार करती है”.

दिवंगत राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के साथ एक साक्षात्कार का स्मरण करते हुए बताया कि डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का मानना था – “भारत वास्तव में तब विकसित था, जब हज़ारों विदेशी छात्र नालंदा व तक्षशिला में पढ़ने आते थे”. महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के उप कुलपति प्रोफेसर संजीव शर्मा ने भी अंतिम सत्र में भारत के प्राचीन ज्ञान पर विचार व्यक्त किये.

November 4th 2019, 11:39 am

भारत में शिक्षा ज्ञानवर्धन के लिए रही है, केवल जीवनयापन के लिए नहीं – अनिरुद्ध देशपांडे जी

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विमर्श 4.0 नई दिल्ली. नॉर्थ कैम्पस के कॉन्फ्रेंस सेंटर में युवा (यूथ यूनिटड़ फॉर विज़न एन्ड एक्शन) के तीन दिवसीय (02 से 04 नवंबर) वार्षिक समागम "विमर्श-2019" का शनिवार को शुभारंभ हुआ. आयोजन का उद्देश्य छात्रों को अकादमिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से राष्ट्र सेवा की ओर अग्रसर करना है. कार्यक्रम के पहले दिन उद्घाटन सत्र "जागृत भारत" विषय पर चर्चा के साथ प्रारंभ हुआ. विमर्श – 2019 के संयोजक सौरभ ने ‘विमर्श’ की भूमिका रखी. उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष डॉ. पायल मग्गो के साथ ही विषय पर चर्चा के लिए डॉ. अनिर्बान गांगुली (निदेशक, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन) और नीरजा गुप्ता (प्राचार्य, आर्ट्स एंड कॉमर्स कॉलेज) का सान्निध्य छात्रों को प्राप्त हुआ. अनिर्बान जी ने "जागृत भारत" के चहुंमुखी स्वरुप का विश्लेषण कर सांस्कृतिक, शैक्षणिक, ऐतिहासिक व अन्य आयामों को मद्देनजर रखते हुए विषय पर प्रकाश डाला और नीरजा जी ने महिला सशक्तिकरण के आत्मीय और मार्मिक अर्थों से रूबरू करवाया. उद्घाटन सत्र के बाद अन्य समानांतर सत्रों का आयोजन हुआ. जहां "भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन" पर प्रोफेसर राघवेन्द्र तंवर, डॉ. अभिनव प्रकाश और डॉ. गीता भट्ट, "दाराशिकोह: एक सच्चे राष्ट्रवादी मुग़ल" विषय पर प्रोफेसर हीरामन तिवारी और प्रोफेसर डी.एन. दास, "राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर" पर डॉ. नंदिता सैकिया और प्रोफेसर मिलाप पुनिया और "Judicial Appointment" विषय पर नितीश राय परवानी और सिद्धांत सिजोरिया ने छात्रों को तथ्यों से अवगत कराया. इसके साथ ही छात्रों के प्रोत्साहन हेतु "Success Stories" और ओपन माइक का आयोजन भी किया गया. अंतिम सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख डॉ. अनिरुद्ध देशपांडे जी का सान्निध्य प्राप्त हुआ. जिन्होंने "भारतीय शिक्षा: भूत, वर्तमान और भविष्य" जैसे समसामयिक महत्वपूर्ण विषय पर छात्रों का ज्ञानवर्धन किया. उन्होंने कहा कि, “भारत में शिक्षा कभी भी केवल जीवनयापन मात्र के लिए नहीं, बल्कि ज्ञानवर्धन के लिए रही है. राष्ट्र की नियति शैक्षिक संस्थानों की कक्षाओं में बैठे लोगों के हाथों में है.” उन्होंने करियर की नई परिभाषा देते हुए कहा कि, “वर्तमान में careerism नवीनतम ‘ism’ है.”

November 4th 2019, 4:46 am

एनआरसी भविष्य का दस्तावेज, अवैध प्रवासियों का पता लगाना समय की आवश्यकता – CJI

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राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बने एनआरसी को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने एनआरसी का समर्थन किया है. मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने एनआरसी की आलोचना करने वालों पर निशाना साधने के साथ ही मीडिया घरानों की गैर-जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि कुछ लोगों की गैर-जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग के चलते विषय को गलत ढंग से प्रस्तुत किया गया, जिसके कारण स्थिति खराब हुई.

दिल्ली में ‘Post-Colonial Assam’ पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम में मुख्य न्यायाधीश ने एनआरसी पर कहा कि, “यह मुद्दा सिर्फ 19 लाख या 40 लाख के आंकड़े का नहीं है, यह भविष्य के लिए आधार दस्तावेज है. एक दस्तावेज जिसके आधार पर हम भविष्य के दावों को निर्धारित कर सकते हैं. मेरे विचार में, NRC का आंतरिक मूल्य, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व है. प्रगतिशील समाज समावेशी होता है.” जस्टिस गोगोई ने कहा कि यह चीज़ों को बेहतर ढंग से करने का एक मौका है. गैरकानूनी रूप से रह रहे प्रवासियों पर कार्रवाई करने वाले प्रस्ताव के समर्थन में मुख्य न्यायाधीश ने इस कदम को आवश्यक बताते हुए कहा कि वर्तमान समय में अवैध तरीके से रह रहे प्रवासियों की संख्या पता लगाने की तत्काल आवश्यकता है. यही एनआरसी का एक ज़रूरी हिस्सा भी है. उन्होंने इस पर भी जोर दिया कि एनआरसी के ज़रिए अब तक कितना काम हो पाया है, इस पर भी ध्यान दिया जाए.

एनआरसी एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर लम्बे समय से देश में व्यापक बहस छिड़ी हुई है.

November 4th 2019, 4:03 am

04 नवंबर / जन्मदिवस – सह्याद्रि का शेर वासुदेव बलवंत फड़के

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नई दिल्ली. घटना वर्ष 1870 की है. एक युवक तेजी से अपने गांव की ओर भागा जा रहा था. उसके मुंह से मां-मां….शब्द निकल रहे थे, पर दुर्भाग्य कि उसे मां के दर्शन नहीं हो सके. उसका मन रो उठा. लानत है ऐसी नौकरी पर, जो उसे अपनी मां के अन्तिम दर्शन के लिए भी छुट्टी न मिल सकी. वह युवक था वासुदेव बलवन्त फड़के. लोगों के बहुत समझाने पर वह शान्त हुआ, पर मां के वार्षिक श्राद्ध के समय फिर यही तमाशा हुआ और उसे अवकाश नहीं मिला. अब तो उसका मन विद्रोह कर उठा. वासुदेव का जन्म चार नवम्बर, 1845 को ग्राम शिरढोण (पुणे) में हुआ था. उनके पूर्वज शिवाजी की सेना में किलेदार थे, पर इन दिनों वे सब किले अंग्रेजों के अधीन थे.

छोटी अवस्था में ही वासुदेव का विवाह हो गया था. शिक्षा पूर्णकर उन्हें सरकारी नौकरी मिल गयी, पर स्वाभिमानी होने के कारण वे कहीं लम्बे समय तक टिकते नहीं थे. महादेव गोविन्द रानडे तथा गणेश वासुदेव जोशी जैसे देशभक्तों के सम्पर्क में आकर फड़के ने ‘स्वदेशी’ का व्रत लिया और पुणे में जोशीले भाषण देने लगे. वर्ष 1876-77 में महाराष्ट्र में भीषण अकाल और महामारी का प्रकोप हुआ. शासन की उदासी देखकर उनका मन व्यग्र हो उठा. अब शान्त बैठना असम्भव था. उन्होंने पुणे के युवकों को एकत्र किया और उन्हें सह्याद्रि की पहाड़ियों पर छापामार युद्ध का अभ्यास कराने लगे. हाथ में अन्न लेकर ये युवक दत्तात्रेय भगवान की मूर्ति के सम्मुख स्वतन्त्रता की प्रतिज्ञा लेते थे.

वासुदेव के कार्य की तथाकथित बड़े लोगों ने उपेक्षा की, पर पिछड़ी जाति के युवक उनके साथ समर्पित भाव से जुड़ गये. ये लोग पहले शिवाजी के दुर्गों के रक्षक होते थे, पर अब खाली होने के कारण चोरी-चकारी करने लगे थे. मजबूत टोली बन जाने के बाद फड़के एक दिन अचानक घर पहुंचे और पत्नी को अपने लक्ष्य के बारे में बताकर उससे सदा के लिए विदा ले ली. स्वराज्य के लिए पहली आवश्यकता शस्त्रों की थी. अतः वासुदेव ने सेठों और जमीदारों के घर पर धावा मारकर धन लूट लिया. वे कहते थे कि हम डाकू नहीं हैं. जैसे ही स्वराज्य प्राप्त होगा, तुम्हें यह धन ब्याज सहित लौटा देंगे. कुछ समय में ही उनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गयी. लोग उन्हें शिवाजी का अवतार मानने लगे, पर इन गतिविधियों से शासन चौकन्ना हो गये. उसने मेजर डेनियल को फड़के को पकड़ने का काम सौंपा.

डेनियल ने फड़के को पकड़वाने वाले को 4,000 रूपए का पुरस्कार घोषित किया. अगले दिन फड़के ने उसका सिर काटने वाले को 5,000 रूपए देने की घोषणा की. एक बार पुलिस ने उन्हें जंगल में घेर लिया, पर वे बच निकले. अब वे आन्ध्र की ओर निकल गये. वहां भी उन्होंने लोगों को संगठित किया, पर डेनियल उनका पीछा करता रहा और अन्ततः वे पकड़ लिये गये. उन्हें आजीवन कारावास की सजा देकर अंदमान भेज दिया गया. मातृभूमि की कुछ मिट्टी अपने साथ लेकर वे जहाज पर बैठ गये. जेल में अमानवीय उत्पीड़न के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. एक रात वे दीवार फांदकर भाग निकले, पर पुलिस ने उन्हें फिर पकड़ लिया. अब उन पर भीषण अत्याचार होने लगे. उन्हें क्षय रोग हो गया, पर शासन ने दवा का प्रबन्ध नहीं किया. 17 फरवरी, 1883 को इस वीर ने शरीर छोड़ दिया. मृत्यु के समय उनके हाथ में एक पुड़िया मिली, जिसमें भारत भूमि की पावन मिट्टी थी.

November 4th 2019, 3:33 am

भारतीय ज्ञान का खजाना – हमारी वैश्विक विरासत ‘धातु का आईना’

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हमारी वैश्विक विरासत – धातु का आईना केरल के दक्षिण में, लेकिन थोड़ा अंदर जाकर, मध्य में एक छोटा सा कस्बा है – अरणमुला. तिरुअनंतपुरम से 116 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ यह कस्बा राष्ट्रीय महामार्ग पर नहीं है, किन्तु अनेक कारणों से प्रसिद्ध है. पंपा नदी के किनारे बसे हुए इस अरणमुला कस्बे को खास तौर पर पहचाना जाता है, वहां होने वाली नावों की प्रतियोगिता के लिए. ‘स्नेक बोट रेस’ नाम से होने वाली इस प्रतियोगिता को देखने के लिए देश - विदेश से पर्यटक आते हैं. इसी अरणमुला में भगवान श्रीकृष्ण का एक भव्य - दिव्य मंदिर है. ‘अरणमुला पार्थसारथी मंदिर’ नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर के कारण यह स्थान ‘वैश्विक धरोहर’ (World Heritage) की सूची में आ गया है. ऐसा मानते हैं, कि भगवान परशुराम ने श्री विष्णु जी के जो 108 मंदिरों का निर्माण किया, उन्हीं में से यह एक मंदिर है. केरल का पवित्र ‘शबरीमला मंदिर’ भी यहां से पास ही है. दोनों का जिला एक ही है – पत्तनमतिट्टा. भगवान अयप्पा जी की जो भव्य शोभायात्रा शबरीमला से निकलती है, उसका एक विश्रामस्थल होता है, यही अरणमुला पार्थसारथी मंदिर...! अरणमुला एक और बात के लिए जाना जाता है, वह है - यहां की शाकाहारी थाली. ‘वाला सध्या’ नामक इस थाली में 42 प्रकार के व्यंजन रहते हैं. और यह सब पूर्णतः वैज्ञानिक पद्धति से, आयुर्वेद को ध्यान में रखते हुए, आहार शास्त्रानुसार बनाए और परोसे जाते हैं. अरणमुला के आसपास के ऐसे संपन्न सांस्कृतिक और आध्यात्मिक माहौल के कारण वहां अपना स्थान निर्माण करने के लिए, क्रिश्चियन मिशनरियों के अनेक कार्यक्रम चलने लगे हैं. यहां चर्च की संख्या बढ़ती जा रही है. प्रतिवर्ष, ईसाइयों का एक भव्य ‘महामेला’ यहां लगता है. लेकिन इन सबसे हटकर एक अलग ही चीज के लिए अरणमुला प्रसिद्ध है. और वह है, ‘अरणमुला कन्नड़ी’ …! मलयालम भाषा में आईने को ‘कन्नड़ी’ कहते हैं. अर्थात् ‘अरणमुला का आईना’. इसकी विशेषता यह है कि यह आईना कांच से नहीं, धातु से बनाया जाता है. पूरे विश्व में ‘आईना यानि कांच का’ यह समीकरण है. किन्तु इस धातु के आईने की बात कुछ और ही है. आमतौर पर कांच पर पारे (पारद) की एक परत लगाकर आईने बनाए जाते हैं. सिल्वर नाइट्रेट और सोडियम हाइड्रोक्साइड के द्रवरूप मिश्रण में चुटकी भर शक्कर मिलाकर उसे गरम करते हैं, और इस मिश्रण की एक परत कांच के पीछे लगाई जाती है. इस तरह आईने बनाए जाते हैं. इसमें भी विशिष्ट प्रकार के रसायनों का उपयोग करके और विशिष्ट प्रकार की कांच का उपयोग करते हुए सामान्य से लेकर तो अति - उत्कृष्ट आईने बनाए जाते हैं. अर्थात् आईने बनाने की यह पद्धति या विधि विगत डेढ़ सौ-दो सौ वर्षों की है. पारे की परत लगाकर आईना बनाने की खोज जर्मनी में हुई. सन् 1835 के आसपास जर्मन वैज्ञानिक, रसायनशास्त्र में काम करने वाले, जुस्तुस लाईबिग ने सर्वप्रथम पारे की परत वाला आईना बनवाया. परंतु, विश्व में आईने बनाने की कला प्राचीन है. सबसे पुराना, अर्थात् 8,000 वर्ष पूर्व आईने का जिक्र आस्टोनिया यानि आज के तुर्कस्तान में मिलता है. इसके बाद इजिप्त में आईने मिलने का जिक्र आता है. दक्षिण अमेरिका, चीन में भी कुछ हजार वर्ष पूर्व आईने का उपयोग होने के उल्लेख मिलते हैं. ये आईने विविध प्रकार के होते थे. पत्थर के, धातु के, कांच के... आदि. किन्तु कांच के अलावा धातु या पत्थर से बनाए गए आईनों की गुणवत्ता अच्छी नहीं होती थी. तुर्कस्तान में जो आईने मिले हैं, वे ओब्सीडियन (ज्वालामुखी के लावा रस से बनाई गई कांच) के बने हुए थे. आईनों के संदर्भ में लिखे गए विविध प्रबंध या विकिपिडिया जैसे साइट्स पर भारत का नाम कहीं नहीं दिखता. इसका सबसे बड़ा कारण, भारत में, भारत के बारे में लिखा गया साहित्य, आक्रांताओं द्वारा नष्ट किया जाना. श्रुति, स्मृति, वेद, पुराण, उपनिषद आदि कुछ ग्रंथ ‘वाचिक परंपरा’ के कारण टिके हुए हैं, और आज की पीढ़ी तक पहुंच सके हैं. लेकिन हमारी ऐतिहासिक जानकारी, अधिकतम नष्ट हो गई है. ये सब मान कर भी, जब हम अजंता के चित्र में, खजुराहो के शिल्पों में, हाथ में आईना लेकर शृंगार करती हुई स्त्री देखते हैं, तब हमें मानना ही पड़ता है कि भारत में आईने का उपयोग, हजारों वर्षों से सर्वमान्य था. लगभग सौ वर्षों से बेल्जियम की कांच और बेल्जियम के आईने विश्व में प्रसिद्ध हैं. लेकिन, बेल्जियम के आईनों को मात देते हुए धातु के आईने अरणमुला में बनाए जाते हैं. एकदम चिकने. पूरे पारदर्शी और साफ - सुस्पष्ट प्रतिमा दिखाने वाले आईने...! यह आईने एक विशेष प्रकार के मिश्र धातु से बनाए जाते हैं. लेकिन इसमें कौनसी धातु, किस अनुपात में मिलाई जाती है, यह आज भी ज्ञात नहीं है. धातु विशेषज्ञों ने इस मिश्र धातु का विस्तृत अध्ययन करने के बाद यह निर्णय दिया कि तांबा और टीन के विशिष्ट मिश्रण से बनाए गए धातु को अनेक दिन पॉलिश करने के बाद, बेल्जियम कांच के आईने जैसे आईने तैयार होते हैं. और यही आईने पहचाने जाते हैं, ‘अरणमुला कन्नड़ी’ के नाम से. केरल के अरणमुला में बनाए जाने वाले यह आईने, अपने आप में विशेषता पूर्ण आईने हैं. क्योंकि पूरे विश्व में कहीं भी ऐसे आईने न तो मिलते हैं, और न ही बनाए जाते हैं. धातु से इतने चिकने और सुस्पष्ट प्रतिमा दिखाने वाले आईने बनाने का तंत्र, आज की इक्कीसवीं सदी में भी किसी वैज्ञानिक को प्राप्त नहीं हुआ है. विश्व में प्रचलित आईनों में प्रकाश का परावर्तन पार्श्वभाग से, अर्थात् पीछे से होता है. किन्तु अरणमुला कन्नड़ी में यही परावर्तन सामने से होता है. इसीलिए दिखने वाली प्रतिमा, अधिक साफ और सुस्पष्ट होती हैं. लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय (म्यूजियम) में एक, पैंतालीस इंच का विशालकाय ‘अरणमुला कन्नड़ी’ रखा है, जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है. इन आईनों को बनाने की विधि और प्रक्रिया, केवल कुछ परिवारों को ही ज्ञात है. यह एक रहस्य के रूप में रखी गई प्रक्रिया है. इसी कारण, अन्य किसी को भी इसकी निर्माण विधि बताना संभव नहीं है. ऐसा माना जाता है कि अरणमुला के भगवान श्रीकृष्ण के ‘पार्थसारथी मंदिर’ के पुनर्निर्माण के लिए, कुछ शताब्दियों पहले, वहां के राजा ने शिल्पकला में प्रवीण आठ परिवारों को बुलाया था. इनके पास इन धातुओं के आईने की तकनीक थी. अब मूलतः मंदिरों का निर्माण कार्य करने वाले, शिल्पकला में सिद्धहस्त ऐसे इन परिवारों के पास यह तकनीक कहां से आई, इस विषय में कुछ भी जानकारी नहीं मिलती. ये निश्चित है कि ये आठ परिवार तमिलनाडु से अरणमुला आए थे. इनके पास धातु से आईने बनाने की तकनीक सैकड़ों वर्षों से थी. किन्तु उसके व्यापारिक उपयोग के बारे में उन्होंने कभी नहीं सोचा था. अरणमुला पार्थसारथी मंदिर के पुनर्निर्माण के बाद, ‘इन परिवारों को क्या काम दिया जा सकता है’, ऐसा राजा सोच रहा था. इसी समय इन परिवारों ने राजा को धातु का राजमुकुट बना कर दिया. यह मुकुट बिलकुल शीशे जैसे था. राजा को मुकुट पसंद आया और उनकी इस विशेष कला को देखते हुए राजा ने उनको जगह दी, काम के लिए पूंजी दी और उन्हें धातु के आईने बनाने के लिए प्रोत्साहित किया. इन आईनों को रानियों के शृंगार में स्थान दिया. उस समय से इन परिवारों में ‘धातु के आईने बनाना’, यही व्यवसाय बन गया. अनेक पौराणिक कथा / लोककथाओं में धातु के आईने का उल्लेख आता है. कहा जाता है कि यह आईना सर्वप्रथम पार्वती ने शृंगार करते समय उपयोग में लाया था. मजे की बात यह कि वैष्णवों के पार्थसारथी मंदिर में पार्वती की यह लोककथा भक्तिभाव से सुनाई जाती है. आज यह आईने वैश्विक विरासत हैं. यह केवल हाथों से ही बनाए जाते हैं. एक दर्जन आईने बनाने में लगभग दो हफ्तों का समय लग जाता है. कोई भी दो आईने एक जैसे नहीं होते. विदेशी पर्यटकों में इन आईनों के प्रति जबरदस्त आकर्षण है. चूंकि यह हाथ से बनाए जाते हैं और इसलिए कम संख्या में उपलब्ध रहते हैं, इसीलिए इनका मूल्य अधिक होता है. सबसे छोटे एक-डेढ़ इंच के आईने का मूल्य 1200 रुपये के लगभग होता है. दस–बारह इंच के आईने, बीस से पच्चीस हजार रुपये तक बेचे जाते हैं. अनेक कार्पोरेट घराने, इन आईनों को उपहार के रूप में देते हैं. विश्व में एकमात्र और दुनिया भर के वैज्ञानिकों के सामने प्रश्न खड़ा करने वाली यह कला, केवल कुछ शतकों पूर्व, समाज के सामने आई. परंतु यह मात्र कुछ शतक पूर्व की नहीं, अपितु कुछ हजार वर्ष पूर्व की कला है, यह निश्चित है. फिर भी, मूल प्रश्न रहता ही है, कि हजारों वर्ष पूर्व की यह धातु विज्ञान की श्रेष्ठ कला, यह नजाकत, हमारे पास आई कहां से...? -  प्रशांत पोळ

November 3rd 2019, 6:00 am

इतिहासकारों ने कश्मीर पर देश को गुमराह किया – कर्नल देवानंद

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जयपुर. दीपावली स्नेह मिलन एवं पाथेय कण का जम्मू कश्मीर विशेषांक का लोकार्पण समारोह शनिवार को पाथेय भवन में संपन्न हुआ. कार्यक्रम की अध्यक्षता पाथेय कण संस्थान के अध्यक्ष डॉ. गोविंद प्रसाद अरोड़ा ने की.

समारोह के मुख्य अतिथि सेवानिवृत कर्नल देवानंद गुर्जर ने कहा कि प्राचीनकाल से ही कश्मीर का इतिहास बहुत गौरवशाली रहा है, लेकिन हमारे इतिहासकारों ने जम्मू-कश्मीर के साथ न्याय नहीं किया. राजनेताओं ने स्वार्थ वश देश का विभाजन स्वीकार करके अखण्डता पर कुठाराघात किया. 1947 से ही वामपंथी विचारधारा ने देश को एक भ्रमित करने वाला नैरेटिव दिया. जिससे लोगों के विचारों को दूषित किया जा सके.

कर्नल गुर्जर ने कहा कि गिलगित-बाल्तिस्तान व्यापारिक मार्ग का मुख्य केंद्र है, ऐसे में हर कोई इसे अपने कब्जे में लेना चाहता है. लेकिन विदेशी साजिश के तहत पाक से युद्ध के दौरान 01 जनवरी 1949 को सीजफायर करके उसे पाकिस्तान को दे दिया गया. अस्थाई सीमा बनाकर कश्मीर में पाक परस्त सरकारें बनाने का काम किया. कश्मीर में वहां के नेताओं ने अपने स्वार्थ के चलते आंतकवाद व अलगाववाद को बढ़ावा दिया. लेकिन वर्तमान सरकार ने आतंकियों पर सर्जिकल व एयर स्ट्राइक करके करारा जवाब दिया है. इससे देश की छवि बदली है तथा हमने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि भारत अब अपनी अस्मिता पर हमला करने वालों को मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम है.

उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 की वजह से कश्मीर के लोगों का विकास बाधित था. वहां के लोगों को सरकार की योजनाओं का लाभ नहीं मिला. इसमें सुधार के लिए केन्द्र सरकार ने अनुच्छेद 370 व 35ए को समाप्त कर कश्मीर में विकास के रास्ते खोल दिए हैं.

कार्यक्रम में अतिथियों ने पाथेय कण के जम्मू-कश्मीर विशेषांक का लोकार्पण किया. संपादक मेघराज खत्री जी ने दीपावली की महत्ता व भगवान श्रीराम के जीवन प्रसंगों पर प्रकाश डाला.

November 2nd 2019, 9:14 am

पांच वर्षों में माओवादी हिंसा पर लगी लगाम, घटनाओं में 27 प्रतिशत की कमी

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देश में माओवाद से प्रभावित छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, ओडिशा, झारखंड, बिहार, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र कुल 10 प्रदेश हैं. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने माओवादी हिंसा और उससे जुड़े कुछ आंकड़े जारी किये हैं. इन आंकड़ों से पता चलता है कि सरकार माओवादी हिंसा को रोकने में कुछ हद तक सफल हुई है और सुरक्षाबलों को माओवादियों को मारने में भी सफलता मिली है.

गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 5 वर्षों में ही माओवादी हिंसा की घटनाओं में लगभग 27 प्रतिशत की कमी आई है. वहीं माओवादी हिंसा से मरने वालों की संख्या में भी लगभग 39 प्रतिशत की कमी हुई है. आम नागरिकों के अलावा पिछले 5 वर्षों में सुरक्षाबलों की जान जाने में भी 10 प्रतिशत की कमी हुई है. इसके अलावा माओवादियों के साथ एनकाउंटर में 65 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है.

केंद्र में सरकार आने के बाद से माओवादियों और उससे जुड़े तमाम नेटवर्क को लगातार ध्वस्त किया जा रहा है. सरकार ने शहरी माओवादियों पर भी शिकंजा कसा है. कथित शहरी माओवादी वरवरा राव, सुधा भारद्वाज, गोंजाल्विस जैसे लोग जेल में बंद हैं.

माओवादी हिंसा के अलावा माओवादियों के प्रभाव क्षेत्र में भी कमी आई है. माओवादी अपने दायरे को बढ़ाने में जी जान से जुटे हुए हैं, लेकिन सुरक्षाबलों की एक्शन टीम, राष्ट्रीय नीति और बेहतर प्लान की वजह से यह माओवादी पूरी तरह असफल रहे हैं.

गृह मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 2013 में 1136 माओवादी हिंसा की घटना हुई, वहीं 2018 में यह घटकर 833 रह गईं. इसी तरह 2013 में 397 नागरिक और 75 जवान मारे गए थे, लेकिन 2018 में यह आंकड़ा घटकर 240 नागरिक और 67 जवान तक सीमित रहा.

2010 से 2018 के बीच पिछले 8 वर्षों में 10,660 माओवादी हिंसा की घटनाएं हुई हैं. इसमें 3,749 लोगों की मौत हुई. इन सब के बीच यह भी तथ्य निकल कर आया है कि माओवादियों ने अपनी सबसे अधिक गतिविधियों को छत्तीसगढ़ में अंजाम दिया है.

सिर्फ छत्तीसगढ़ की बात करें तो यहां 1370 लोग पिछले 9 वर्षों में माओवादी हिंसा के शिकार बने हैं. वहीं झारखंड में 3357 घटनाओं में 997 लोग मारे गए हैं. बिहार में 1526 हिंसक घटनाओं में 387 लोग मारे गए हैं.

माओवादियों ने देश के आम नागरिकों और सुरक्षा जवानों का इतना खून बहाया है, जितना सीमा पर आतंकियों ने नहीं बहाया. इस लाल आतंक ने ना सिर्फ देश को भीतर से खोखला करने की कोशिश की है, बल्कि कई पीढ़ियों को बर्बाद किया है.

कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) इन हिंसक गतिविधियों में सबसे सक्रिय रही है. कम्युनिस्ट विचारधारा ने सशस्त्र विद्रोह करके अपने आतंक से पिछले 9 वर्षों में कितनी जाने ली हैं, उसके आंकड़े आज सबके सामने हैं.

November 1st 2019, 9:24 am

धारा 370 हटने का असर – गुलाम नबी आजाद ने खाली किया सरकारी आवास

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जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने श्रीनगर के वीवीआईपी जोन में स्थित अपना सरकारी आवास खाली कर दिया है. अब नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला और पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती सहित अन्य पूर्व राजनेताओं को भी जल्द ही अपना सरकारी बंगला खाली करना होगा. गुलाम नबी आजाद को सरकार द्वारा मुफ्त में श्रीनगर गुपकार रोड पर स्थित जम्मू-कश्मीर बैंक का गेस्ट हाउस दिया गया था. जम्मू-कश्मीर केन्द्र शासित प्रदेश बनने के बाद अब वहां की जनता और राजनेता सीधे तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के दायरे में आ गए हैं. सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व के आदेश के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री या फिर कोई राजनेता जो किसी संवैधानिक पद पर है, वह जीवनभर सरकारी बंगलों में नहीं रह सकता है. पद मुक्त होने के बाद उन्हें अपना सरकारी बंगला भी खाली करना होगा.

पूर्व मुख्यमंत्रियों को मिलता है सरकारी भत्ता

अभी तक जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्रियों को कार, ड्राइवर, पेट्रोल, चिकित्सा और सरकारी आवास की सुविधा मिलती थी. साथ ही उन्हें आवासीय खर्च के लिए प्रति वर्ष 35 हजार रुपये, टेलीफोन सेवा के लिये प्रति वर्ष 48 हजार रुपये और बिजली के लिये प्रति माह 1500 रुपये मिलता था.

मई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को जीवनभर सरकारी बंगलों में रहने की अनुमति दी गई थी. परंतु जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 लागू होने के कारण यहां के पूर्व मुख्यमंत्री इस आदेश से बचे हुए थे और सरकारी बंगलों में रह रहे थे. अब जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट का आदेश यहां भी लागू हो गया है. सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों और राजनेताओं को सरकारी आवास खाली करना होगा.

उमर और महबूबा ने बंगलों के नवीनीकरण पर खर्च किये है 50 करोड़ रुपये

उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती अभी भी सरकारी बंगले में रहते हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार दोनों ने अपने बंगलों के नवीनीकरण पर लगभग 50 करोड़ रुपये खर्च किये हैं.

November 1st 2019, 9:24 am

1984 सिक्ख नरसंहार – अपराधियों और राजनीतिक दल के नापाक गठबंधन का घिनौना कृत्य था

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File photo

31 अक्तूबर 1984 को देश की तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उन्हीं की सुरक्षा में नियुक्त दो पुलिस कर्मचारियों (एक सब इंस्पेक्टर व एक सिपाही) ने प्रधानमंत्री आवास पर ही कर दी. किसी भी देश में प्रधानमंत्री व उसका निवास सबसे सुरक्षित स्थान होता है. जो भी व्यक्ति सेना, अर्धसैनिक दस्ते या पुलिस की वर्दी पहनता है, वह केवल देश के कानून व नागरिकों की सुरक्षा तक ही समर्पित होता है. उसका व्यक्तिगत धर्म/जाति का बंधन उसे अपनी ड्यूटी निर्पेक्षता से करने में रुकावट नहीं होना चाहिए. यदि सुरक्षा कर्मचारी अनुशासन की अवहेलना करे व रखवाले बनने की जगह कातिल, हत्यारे बन जाएं, तब जरूर कुछ बड़े मानसिक कारणों की संभावना होती है.

इंदिरा गांधी जी पर हमला 31 अक्तूबर 1984 को सुबह तकरीबन 9:20 पर हुआ. तुरंत उन्हें ‘ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस’ दिल्ली में ले जाया गया. जहां डॉक्टरों ने 10:50 पर उन्हें मृत घोषित कर दिया. 11:00 बजे प्रातः ऑल इंडिया रेडियो प्रधानमंत्री जी को उन्हीं के दो सिक्ख शस्त्रधारी अंगरक्षकों द्वारा कत्ल करने की घोषणा करता है. साधारणत: ‘ग्रेव एंड सडन प्रोवोकेशन’ जो जुर्म की गंभीरता को नहीं, बल्कि सजा को कम करने की प्रक्रिया है, जिसका तात्पर्य यह है कि दोषी की भावनाओं को ठेस पहुंची तो उसने जुर्म कर दिया. पर, दिल्ली सिक्ख कत्लेआम की कहानी तो कुछ अलग ही है.

भावनाएं तो कुछ मिनटों के बाद ही शांत हो जाती हैं. परंतु दिल्ली में सिक्खों का कत्लेआम कुछ मिनटों बाद नहीं, बल्कि कई घंटों की विचार मंथन से उत्पन्न हुई घटना प्रतीत होता है. राजीव गांधी शाम 4:00 बजे वापस एम्स पहुंचते हैं. पहली पत्थरबाजी की घटना शाम 5:30 बजे तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह जी के एम्स पहुंचने पर होती है. रात में अकबर रोड दिल्ली के एक बंगले पर ऐसे कुछ मुख्य लोग इकट्ठे होते हैं, जिनमें से अधिकतर पर सिक्ख कत्लेआम करवाने का दोष आज भी लगाया जाता है.

01 नवंबर 1984 को सुबह केवल दिल्ली ही नहीं भारत के कई राज्यों में सिक्खों का नरसंहार आरंभ होता है. जिन्होंने प्रधानमंत्री जी की हत्या की थी. उनमें से एक को तो गिरफ्तार कर लिया गया व दूसरे को मौके पर ही मार गिराया गया. परंतु नरसंहार उन हजारों निर्दोष सिक्खों का हुआ, जिनका कोई जुर्म ही नहीं था.

निर्दोष सिक्खों का बर्बरता से नरसंहार किया गया, सरेराह गले में टायर डालकर उन्हें जलाया गया, सामूहिक कत्ल किए गए, बलात्कार किए गए, लूट की गई और गुरुद्वारों को तोड़ दिया गया. अच्छे भले लोग भी ‘खून का बदला खून’, ‘खून के छींटे सिक्खों के घर तक पहुंचने चाहिए’ और ‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है’ की बातें करने लगे. 03 नवंबर तक देश की पुलिस, फौज और अदालतें खामोश रहीं, इंसानियत उनके ह्रदय में नहीं जागी. सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन 3 दिनों में करीब 2800 सिक्ख दिल्ली में और 3350 सिक्ख भारत के दूसरे राज्यों में कत्लेआम की भेंट चढ़े. लूट खसोट और नुकसान का तो कोई हिसाब ही नहीं. सरकारी तंत्र चाहे अराजकता की तस्वीर बना रहा, परंतु आम आदमी के ह्रदय में इंसानियत जरूर कचोटती रही. उन्होंने मजलूमों को अपनी छाती से लगाकर, अपने घर में छिपाकर भी रखा, कई जगह बचाने वाले भी भीड़ तंत्र के शिकार बने और य​ह भले लोग शरणार्थी कैंपों में भी उनका सहारा बने. ये हमला एक धर्म को मानने वालों के द्वारा दूसरे पंथ पर नहीं था, बल्कि बदला लेने की नीयत से अपराधियों और राजनीतिक दल के नापाक गठबंधन का घिनौना कृत्य था.

इस कत्लेआम की पड़ताल तो क्या होनी थी, पुलिस ने कोई मुकदमा भी दर्ज नहीं किया और न ही किसी अदालत ने कानून के पालन हेतु, स्वयं ही कोई कार्रवाई की. दुनिया भर में बदनामी के दाग से बचने हेतु तात्कालिक सरकार ने नवंबर 1984 में एक एडिशनल कमिश्नर पुलिस वेद मरवाह की अध्यक्षता में कमेटी बनाई. जिसे 1985 में बंद कर दिया गया. उस रिपोर्ट का भी कुछ पता नहीं. अगला कमीशन जस्टिस रंगनाथ मिश्रा का बना. जस्टिस रंगनाथ मिश्रा कमीशन ने कहा कि दोषियों की शिनाख्त करनी उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा ही नहीं थी. इसी क्रम में अब तक 10 से अधिक कमीशन और कमेटियां बन चुकी हैं. परंतु पूर्ण इंसाफ की प्रक्रिया अभी देश की राजधानी दिल्ली में ही अधूरी है. देश के अन्य राज्यों में 35 साल पूरे होने के बाद भी सरकार इंसाफ की निष्पक्ष जांच, मुआवजा व दोषियों को सजा दिलाने हेतु पूरी तरह सजग नहीं है.

सन् 1993 में मदन लाल खुराना जी की तरफ से बनाई गई ‘जस्टिस नरूला कमेटी’ को भी उस समय की केंद्र सरकार ने मान्यता नहीं दी थी. पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेई जी की सरकार ने सन् 2000 में ‘जस्टिस जी. टी. नानावती कमीशन’ का गठन करके इस नरसंहार की जांच को आगे बढ़ाया. जो आज भी कभी तेज ओर कभी धीमी गति से चल रही है.

बेगुनाह लोगों के कत्लेआम, लूटमार और औरतों के साथ बलात्कार करने वाले दोषियों को सजा करवाने की प्रक्रिया यदि 35 साल में पूरी नहीं हो सकी तो लगता है कि पूरी न्यायिक प्रक्रिया की भी जांच आवश्यक है.

आज जब सारा विश्व और विशेषकर भारत सरकार श्री गुरु नानक देव जी का 550 साला प्रकाश उत्सव मना रही है. प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की तरफ से सिक्ख भाईचारे के हरे जख्मों पर मरहम लगाने का प्रयास हो रहा है. तो अच्छा हो, कि समय निश्चित करके 1984 के अपराधियों को सजा दिलवाने के कार्य को भी प्रमुखता से किया जाए.

स. इकबाल सिंह लालपुरा

(लेखक पंजाब पुलिस से सेवानिवृत्त डीआईजी हैं)

November 1st 2019, 4:21 am

30 अक्तूबर / जन्मदिवस – बहुमुखी कल्पनाओं के धनी मोरोपन्त पिंगले जी

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नई दिल्ली. संघ के वरिष्ठ प्रचारक मोरोपन्त पिंगले जी को देखकर सब खिल उठते थे. उनके कार्यक्रम हास्य-प्रसंगों से भरपूर होते थे. पर, इसके साथ ही वे एक गहन चिन्तक और कुशल योजनाकार भी थे. संघ नेतृत्व द्वारा सौंपे गए हर काम को उन्होंने नई कल्पनाओं के आधार पर सर्वश्रेष्ठ ऊंचाइयों तक पहुंचाया. उनका पूरा नाम मोरेश्वर नीलकंठ पिंगले था. उनका जन्म 30 अक्तूबर, 1919 को हुआ था. वे बचपन में मेधावी होने के साथ ही बहुत चंचल एवं शरारती भी थे. वर्ष 1930 में संघ के स्वयंसेवक तथा वर्ष 1941 में नागपुर के मौरिस कॉलेज से बीए की डिग्री हासिल करने के पश्चात प्रचारक बने. प्रारम्भ में उन्हें मध्य प्रदेश के खंडवा में सह विभाग प्रचारक बनाया गया. इसके बाद वे मध्यभारत के प्रांत प्रचारक तथा फिर महाराष्ट्र के सह प्रांत प्रचारक बने. क्रमशः पश्चिम क्षेत्र प्रचारक, अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख, बौद्धिक प्रमुख, प्रचारक प्रमुख तथा सह सरकार्यवाह के बाद केन्द्रीय कार्यकारिणी के सदस्य रहे.

मोरोपंत जी को समय-समय पर दिये गये विविध प्रवृत्ति के कामों के कारण अधिक याद किया जाता है. छत्रपति शिवाजी की 300वीं पुण्यतिथि पर रायगढ़ में भव्य कार्यक्रम, पूज्य डॉ. हेडगेवार जी की समाधि का निर्माण तथा उनके पैतृक गांव कुन्दकुर्ती (आंध्र प्रदेश) में उनके कुलदेवता के मंदिर की प्रतिष्ठापना, बाबासाहब आप्टे स्मारक समिति के अन्तर्गत विस्मृत इतिहास की खोज, वैदिक गणित तथा संस्कृत का प्रचार-प्रसार आदि उल्लेखनीय हैं. आपातकाल में भूमिगत रहकर तानाशाही के विरुद्ध आंदोलन चलाने में मोरोपंत जी की बहुत बड़ी भूमिका थी. वर्ष 1981 में मीनाक्षीपुरम् कांड के बाद संघ ने हिन्दू जागरण की जो अनेक स्तरीय योजनाएं बनाईं, उसके मुख्य कल्पक और योजनाकार भी वही थे. इसके अन्तर्गत ‘संस्कृति रक्षा निधि’ का संग्रह तथा ‘एकात्मता रथ यात्राओं’ का सफल आयोजन हुआ.

‘विश्व हिन्दू परिषद’ के मार्गदर्शक होने के नाते उन्होंने ‘श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन’ को हिन्दू जागरण का मंत्र बना दिया. श्री रामजानकी रथ यात्रा, ताला खुलना, श्रीराम शिला पूजन, शिलान्यास, श्रीराम ज्योति, पादुका पूजन आदि कार्यक्रमों ने देश में धूम जागरण का कार्य किया. छह दिसम्बर, 1992 को बाबरी कलंक का परिमार्जन इसी जागरण का सुपरिणाम था.

गोवंश रक्षा के क्षेत्र में भी उनकी सोच बिल्कुल अनूठी थी. उनका मत था – गाय की रक्षा किसान के घर में ही हो सकती है, गोशाला या पिंजरापोल में नहीं. गोबर एवं गोमूत्र भी गोदुग्ध जैसे ही उपयोगी पदार्थ हैं. यदि किसान को इनका मूल्य मिलने लगे, तो फिर कोई गोवंश को कोई नहीं बेचेगा. उनकी प्रेरणा से गोबर और गोमूत्र से साबुन, तेल, मंजन, कीटनाशक, फिनाइल, शैंपू, टाइल्स, मच्छर क्वाइल, दवाएं आदि सैकड़ों प्रकार के निर्माण प्रारम्भ हुए. ये मानव, पशु और खेती के लिए बहुउपयोगी हैं. अब तो गोबर और गोमूत्र से लगातार 24 घंटे जलने वाले बल्ब का भी सफल प्रयोग हो चुका है.

उनका मत था कि भूतकाल और भविष्य को जोड़ने वाला पुल वर्तमान है. अतः इस पर सर्वाधिक ध्यान देना चाहिए. उन्होंने हर स्थान पर स्थानीय एवं क्षेत्रीय समस्याओं को समझकर कई संस्थाएं तथा प्रकल्प स्थापित किये. महाराष्ट्र सहकारी बैंक, साप्ताहिक विवेक, लघु उद्योग भारती, नाना पालकर स्मृति समिति, देवबांध (ठाणे) सेवा प्रकल्प, कलवा कुष्ठ रोग निर्मूलन प्रकल्प, स्वाध्याय मंडल (किला पारडी) की पुनर्स्थापना आदि की नींव में मोरोपंत जी ही हैं.

मोरोपंत जी के जीवन में निराशा एवं हताशा का कोई स्थान नहीं था. वे सदा हंसते और हंसाते रहते थे. अपने कार्यों से नई पीढ़ी को दिशा देने वाले मोरोपंत पिंगले जी का 21 सितम्बर, 2003 को नागपुर में ही देहांत हुआ.

October 29th 2019, 7:38 pm

28 अक्तूबर / जन्म दिवस – भारत की महान पुत्री भगिनी निवेदिता

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नई दिल्ली. स्वामी विवेकानन्द से प्रभावित होकर आयरलैण्ड की युवती मार्गरेट नोबेल ने अपना जीवन भारत माता की सेवा में लगा दिया. प्लेग, बाढ़, अकाल आदि में उन्होंने समर्पण भाव से जनता की सेवा की. ऐसे में भारत की महान बेटी कहा जाए तो गलत न होगा. 28 अक्तूबर, 1867 को जन्मी मार्गरेट के पिता सैम्युअल नोबेल आयरिश चर्च में पादरी थे. बचपन से ही मार्गरेट नोबेल की रुचि सेवा कार्यों में थी. वह निर्धनों की झुग्गियों में जाकर बच्चों को पढ़ाती थी. एक बार उनके घर भारत में कार्यरत एक पादरी आये. उन्होंने मार्गरेट को कहा कि शायद तुम्हें भी एक दिन भारत जाना पड़े. तब से मार्गरेट के सपनों में भारत बसने लगा.

मार्गरेट के पिता का 34 वर्ष की अल्पायु में ही देहान्त हो गया. मरते समय उन्होंने अपनी पत्नी मैरी से कहा कि यदि मार्गरेट कभी भारत जाना चाहे, तो उसे रोकना नहीं. पति की मृत्यु के बाद मैरी अपने मायके आ गयी. वहीं मार्गरेट की शिक्षा पूर्ण हुई. 17 साल की अवस्था में मार्गरेट एक विद्यालय में बच्चों को पढ़ाने लगी. कुछ समय बाद उसकी सगाई हो गयी, पर विवाह से पूर्व ही उसके मंगेतर की बीमारी से मृत्यु हो गयी. इससे मार्गरेट का मन संसार से उचट गया, पर उसने स्वयं को विद्यालय में व्यस्त कर लिया. वर्ष 1895 में एक दिन मार्गरेट की सहेली लेडी इजाबेल मारगेसन ने उसे अपने घर बुलाया. वहां स्वामी विवेकानन्द आये हुए थे. स्वामी जी वर्ष 1893 में शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में भाषण देकर प्रसिद्ध हो चुके थे. उनसे बात कर मार्गरेट के हृदय के तार झंकृत हो उठे. फिर उसकी कई बार स्वामी जी से भेंट हुई. जब स्वामी जी ने भारत की दशा का वर्णन किया, तो वह समझ गयी कि वह जिस बुलावे की प्रतीक्षा में थी, वह आ गया है. वह तैयार हो गयी और 28 जनवरी, 1898 को कोलकाता आ गयी.

यहां आकर उन्होंने सबसे पहले बंगला भाषा सीखी, क्योंकि इसके बिना निर्धन और निर्बलों के बीच काम करना सम्भव नहीं था. 25 मार्च, 1898 को विवेकानन्द ने मार्गरेट को भगवान शिव की पूजा विधि सिखायी और उसे ‘निवेदिता’ नाम दिया. इसके बाद उसने स्वामी जी के साथ अनेक स्थानों का प्रवास किया. लौटकर उसने एक कन्या पाठशाला प्रारम्भ की. इसमें बहुत कठिनाई आयी. लोग लड़कियों को पढ़ने भेजना ही नहीं चाहते थे. धन का भी अभाव था, पर वह अपने काम में लगी रही. वर्ष 1899 में कोलकाता में प्लेग फैल गया. निवेदिता सेवा में जुट गयीं. उन्होंने गलियों से लेकर घरों के शौचालय तक साफ किये. धीरे-धीरे उनके साथ अनेक लोग जुट गये. इससे निबट कर वह विद्यालय के लिए धन जुटाने विदेश गयीं. दो साल के प्रवास में उन्होंने धन तो जुटाया ही, वहां पादरियों द्वारा हिन्दू धर्म के विरुद्ध किये जा रहे झूठे प्रचार का भी मुंहतोड़ उत्तर दिया.

वापस आकर वह स्वतन्त्रता आन्दोलन में भी सक्रिय हुईं. उनका मत था कि भारत की दुर्दशा का एक कारण विदेशी गुलामी भी है. बंग भंग का उन्होंने प्रबल विरोध किया और क्रान्तिगीत ‘वन्दे मातरम्’ को अपने विद्यालय में प्रार्थना गीत बनाया. उन्होंने अनेक पुस्तकें भी लिखीं. अथक परिश्रम के कारण वह बीमार हो गयीं. 13 अक्तूबर, 1911 को दार्जिलिंग में उनका देहान्त हुआ. मृत्यु से पूर्व उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति बेलूर मठ को दान कर दी. उनकी समाधि पर लिखा है – यहां भगिनी निवेदिता चिरनिद्रा में सो रही हैं, जिन्होंने भारत के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया.

October 28th 2019, 2:14 am

भारतीय ज्ञान का खजाना – 17 भारत की समृद्ध खाद्य संस्कृति

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भारत की समृद्ध खाद्य संस्कृति

समूचे विश्व को मोह लेने वाला ‘डोसा’ अथवा ‘मसाला डोसा’ (दोसा) नामक पदार्थ कितना पुराना है..? इस बारे में निश्चित रूप से कोई नहीं बता सकता. परन्तु लगभग दो हजार वर्ष से अधिक पुराना है, यह तो निश्चित है. अर्थात् इतिहास के ज्ञात साधनों एवं तमाम दस्तावेजों की पड़ताल करते हुए पीछे चलें, तो हमें पता चलता है कि लगभग दो हजार वर्ष पूर्व अत्यंत स्वादिष्ट यह ‘डोसा’ दक्षिण भारत में खाया जाता था.

यह एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि भारतीय संस्कृति की संपन्नता में केवल वास्तुशास्त्र ही नहीं… केवल कला एवं नाट्य क्षेत्र नहीं… केवल विज्ञान नहीं… केवल अध्यात्म नहीं… अपितु समृद्ध खाद्य संस्कृति भी मौजूद थी. अर्थात् जीवन के सभी अंगों की परिपूर्णता थी.

खाद्य संस्कृति के बारे में हमारे पूर्वजों ने बहुत ही गहराई से विचार किया हुआ है. आधुनिक आहारशास्त्र जिन बातों को मजबूती से रखने का प्रयास करता है, वह सभी बातें कई हजार वर्ष पहले भारतीय आहारशास्त्र ने बताई हुई हैं. ‘आहार एवं शरीर का, आहार एवं मन का, आहार एवं चित्तवृत्ति का आपसी अंतर्संबंध होता है’, यह बात हमारे पूर्वजों ने कई हजार वर्ष पूर्व लिख रखी है. यह निश्चित रूप से अद्भुत है. प्राचीनकाल में उन्नत माने जाने वाले ग्रीक, इजिप्त अथवा चीनी संस्कृतियों में ऐसी खाद्य संस्कृति दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती. दुर्भाग्य से हमें अपनी ही उन्नत, स्वास्थ्ययुक्त एवं परिपूर्ण आहार प्रणाली की कद्र ही नहीं है.

ऐसा अनुमान है कि ‘भगवद् गीता’ नामक ग्रन्थ लगभग साढ़े पाँच से छह हजार वर्ष प्राचीन है. यहां तक कि पाश्चात्य विद्वान भी अपने शोध एवं सूत्रों के हवाले से ‘गीता’ को लगभग ढाई से तीन हजार वर्ष पहले लिखी गई है, ऐसा मानते हैं. इस गीता के सत्रहवें अध्याय में ८, ९ और १० क्रमांक के श्लोक हैं, जो हमारे जीवन पर आहार के प्रभाव एवं परिणामों के बारे में बताते हैं. सात्विक, राजसी एवं तामसिक, इस प्रकार के तीन स्वभाव वाले विभिन्न व्यक्तियों के शारीरिक पोषण के लिए तीन प्रकार के आहार ग्रहण करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है. और इन्हीं तीन मानसिक वृत्तियों का अनुसरण करके उनके कर्म भी तीन प्रकार के होते हैं, ऐसा साफ परिलक्षित होता है..!

उदाहरणार्थ आठवां श्लोक देखें….. –

आयु सत्त्वबलारोग्य सुखाप्रीतिविवर्धना, रस्याः,

स्निग्धाः, स्थिराः, हृदयः, आहाराः, सात्त्विकप्रियाः ||८||

अर्थात् आयुष्य, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख एवं प्रसन्नता में वृद्धि करने वाले रसयुक्त, स्निग्ध, लंबे समय तक खराब न होने वाले एवं मन को रुचिकर लगने वाले आहार सात्त्विक वृत्ति के लोगों के प्रिय होते हैं.

एक परिपूर्ण, वैज्ञानिक एवं प्राचीन खाद्य संस्कृति की विरासत वाला हमारा देश, दुनिया का एकमात्र देश है. ऋग्वेद के समय से ही विभिन्न ग्रंथों में आहारशास्त्र के उल्लेख मिलते हैं. ‘यजस्वम तत्रं त्वस्वाम’ (अपने शरीर का पोषण करके उसका सम्मान करें). ऐसे उल्लेख अनेक स्थानों पर हैं. भोजन में गेहूँ, जौ, दूध का समावेश होना चाहिए, ऐसे भी वर्णन ग्रंथों में आते हैं. अथर्ववेद के छठवें अध्याय के १४०/२ सूक्त में कहा गया है कि चावल, जौ, उड़द एवं तिल्ली से बने पदार्थ एक योग्य आहार हैं.’

इन लिखे हुए ग्रंथों का समर्थन करने वाले अनेक तथ्य मेहरगढ़, हड़प्पा और मोहन जोदड़ो के उत्खनन में प्राप्त भी हुए हैं. इनके अनुसार लगभग आठ हजार वर्ष पूर्व हमारे पूर्वज गेहूँ, जौ, दूध इत्यादि से बने हुए पदार्थ खाते थे. विशेष बात यह है कि भोजन में मसालों का उपयोग किए जाने के सबूत भी उत्खनन में मिलते हैं. दालचीनी, कालीमिर्च का उपयोग भारतीय भोजन में कई हजार वर्षों पहले से किया जा रहा है.

मेहरगढ़ वर्तमान पाकिस्तान में बलूचिस्तान स्थित एक छोटा सा गांव है. वर्ष 1974 में वहां सबसे पहले ‘जीन-फ्रान्कोईस जरीगे’ नामक फ्रांसीसी पुरातत्व वैज्ञानिक ने उत्खनन शुरू किया था, और उसे ईसा से सात हजार वर्ष पूर्व के एक गांव के अवशेष प्राप्त हुए. महत्त्वपूर्ण बात यह कि इस उत्खनन में विश्व की सबसे प्राचीन कृषि के बहुत ही ठोस सबूत प्राप्त हुए. अर्थात् आज तक के उपलब्ध आंकड़ों एवं सबूतों के आधार पर स्पष्ट रूप से ऐसा कहा जा सकता है कि विश्व में ‘खेती’ की संकल्पना सबसे पहले भारतीय उपमहाद्वीप में आरम्भ हुई थी.

विभिन्न प्रकार की दालें (मसूर, तुअर इत्यादि) उगाना, गेहूँ का उत्पादन करना, इस गेहूं को पीसकर उसका आटा तैयार करना एवं उस आटे से भिन्न-भिन्न पदार्थ तैयार करना… यह सब आठ-नौ हजार वर्ष पहले से ही भारतीयों को ज्ञात था.

विश्व की खाद्य संस्कृति को भारत का सबसे बड़ा योगदान कौन सा है..? जी हाँ… मसालों का. आज से लगभग दो-तीन हजार वर्ष पूर्व भारत से बड़े पैमाने पर मसालों का निर्यात किया जाता था, इसके स्पष्ट प्रमाण अब मिल चुके हैं.

इस लेखमाला के ‘भारतीय संस्कृति के वैश्विक पदचिन्ह – १’ नामक आलेख में इजिप्त के बेरेनाईक नामक उत्खनन प्रकल्प का उल्लेख आया हुआ है. इस बेरेनाईक बंदरगाह की खुदाई के दौरान एक पेटी में आठ किलो काली मिर्च प्राप्त हुई थी. कार्बन डेटिंग के अनुसार यह काली मिर्च पहली शताब्दी के ईस्वी सन् 30 से ईस्वी सन् 70 के बीच की निकली. यह तथ्य इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि वर्षों पहले भारत से मसालों का निर्यात हुआ करता था.

काली मिर्च, दालचीनी, तेजपान, खड़ा धनिया इत्यादि मसालों के पदार्थों की खोज भारतीयों ने हजारों वर्ष पहले ही कर ली थी. आगे चलकर इन मसालों की मदद से भारत में विभिन्न भौगोलिक प्रदेशों के अनुसार अलग-अलग पदार्थ तैयार होने लगे. यह पदार्थ अत्यंत स्वादिष्ट थे. इसीलिए हजारों वर्ष पूर्व उस कालखंड में भी हमारे भारतीय व्यंजनों का स्वाद विदेशी यात्रियों को मोहित कर लेता था. मूलतः ब्रिटिश ‘प्रोफ़ेसर अंगस मेडिसन’, हॉलैंड के ग्रोंइंगेन विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर हुआ करते थे. उन्होंने विश्व की अर्थव्यवस्था के बारे में एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखी है, ‘द वर्ल्ड इकॉनमी – ए मिलेनियम पर्सपेक्टिव’. विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में इस ग्रन्थ को अच्छा प्रमाण माना जाता है. उन्होंने इस ग्रन्थ में लिखा है कि, आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पहले भारत का जो माल यूरोप जाता था, वह इटली के दो शहरों – जिनोया और वेनिस के जरिये जाता था. और मसालों के इस व्यापार के आधार पर यह दोनों शहर उस कालखंड में यूरोप के सर्वाधिक अमीर शहरों में गिने जाते थे. जिन वस्तुओं के कारण इन शहरों को धनलाभ प्राप्त होता था, उनमें प्रमुखता से थे ‘भारतीय मसाले’…!

हालांकि यूरोप में भारतीय मसाले मुख्यतः जानवरों का मांस पकाकर बनाए जाने वाले मांसाहारी व्यंजनों के लिए उपयोग में आते थे. शाकाहारी पदार्थ बनाना पश्चिमी लोगों को आता नहीं था. इसके दो प्रमुख कारण थे – पहला तो यूरोप की जलवायु विषमता के कारण वहां वनस्पतियों का उत्पादन तुलनात्मक रूप से कम था और दूसरा कारण यह कि उन यूरोपियन लोगों को शाकाहारी पदार्थों की विविधता के बारे में ज्ञान ही नहीं था.

आज से लगभग पंद्रह वर्ष पूर्व मैं अपने एक क्लायंट से मिलने ज़ुरिक (स्विट्ज़रलैंड) गया था. हमारी भेंट के पश्चात, वह मुझे वहां स्थित एक भारतीय रेस्टोरेंट में ले गया. वहां पर बातचीत के समय उसने मुझसे कहा कि, कुछ दिनों पूर्व उसने शाकाहारी बनने का निर्णय लिया. चूंकि इसके पहले कभी शाकाहारी भोजन ज्यादा लिया नहीं था, इसलिए पहला प्रयोग तीस दिनों के लिए करने का तय किया. परन्तु केवल पांच – छह दिनों के भीतर ही वह शाकाहारी भोजन से ऊब गया. फिर अगले दस – पंद्रह दिन उसने किसी तरह व्यतीत किए. अंततः तीन सप्ताह के बाद उसने अपना शाकाहारी होने का निर्णय बदलते हुए पुनः मांसाहार शुरू कर दिया.

मैंने पूछा, “ऐसा क्यों..?”

उसने कहा, “रोज-रोज इस प्रकार के घासफूस खाकर बेहद ऊब गया था… प्रतिदिन कच्ची सब्जियाँ, उबली हुई सब्जियाँ और उनका सलाद कोई व्यक्ति आखिर कितने दिन खा सकता है..?”

मैंने कहा, “अरे भाई, केवल कच्ची और उबली हुई सब्जियाँ ही क्यों खाना? हजारों प्रकार के पदार्थ हमारी शाकाहारी पद्धति में हैं. अब यहां इस रेस्टोरेंट में ही देख लो…”

उसने कहा, “हाँ सही है, परन्तु ये बात मुझे पहले कहां पता थी..? मुझे तो शाकाहारी भोजन का अर्थ कच्ची और उबली हुई सब्जियां ही मालूम था. इन सब्जियों में भारतीय मसाले डालकर उसे पावरोटी के साथ खाने लायक स्वादिष्ट पदार्थ बना सकते हैं, यह बात हम पश्चिमी लोगों को कहाँ ज्ञात थी..?”

भारत ने अत्यंत रुचिकर, स्वादिष्ट एवं पोषक पद्धति की खाद्य संस्कृति समूचे विश्व को प्रदान की है. आज विश्व का ऐसा कोई देश नहीं है, जहां यदि जनसँख्या पचास हजार भी है, तब भी वहां एकाध भारतीय रेस्टोरेंट तो अवश्य मिलेगा. चीनी और इटैलियन खाद्य संस्कृति के समान ही, बल्कि कई मामलों में इनसे काफी अधिक ही, भारतीय खाद्य संस्कृति विश्व के कोने-कोने में पसर चुकी है. डोमिनोज़ जैसी कंपनियों ने इटैलियन पिज्ज़ा और पास्ता को विश्वव्यापी बनाया है. परन्तु यह भारतीयों का दुर्भाग्य है कि इडली, दोसा, वड़ा-पाव, छोले-भटूरे जैसे अनेक व्यंजनों को बनाने वाली विश्वव्यापी रेस्टोरेंट्स की श्रृंखला हम भारतीयों को निर्माण करना नहीं आया.

जबकि भारतीय व्यंजनों में जबरदस्त विविधता है… केवल दक्षिण भारतीय खाद्य पदार्थ कहने से काम नहीं चलता. इसमें भी आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल के व्यंजन भिन्न-भिन्न हैं. डोसा और वड़े यह दो-तीन हजार वर्ष पहले से ही भारत में प्रचलित हैं. परन्तु इडली नामक व्यंजन भारत का नहीं है. इडली व्यंजन भारतीयों का तो है, लेकिन भारत से बाहर का. जावा-सुमात्रा (इंडोनेशिया) के भारतीय राजाओं के दक्षिण भारतीय रसोईयों ने हजार-बारह सौ वर्ष पहले फर्मेंटेशन पद्धति से इडली नामक व्यंजन को तैयार किया था. वह जावा-सुमात्रा होते हुए दक्षिण भारत पहुंचा और फिर समूचे विश्व में फ़ैल गया. बेल्लारी जिले के ‘शिवकोटीचार्य’ ने ईस्वी सन् 920 में कन्नड़ भाषा में लिखी हुई पुस्तक, ‘वड्डराधने’ में ‘इड्लीगे’ शब्द का उल्लेख किया हुआ मिलता है.

‘इन्डियन करी’ नामक व्यंजन विश्व में अत्यधिक प्रसिद्ध है. विश्व की अनेक ‘सेलेब्रिटीज़’ को इस भारतीय करी के स्वाद का चस्का लगा हुआ है. ‘करी’ अर्थात् भारतीय मसालों से बनने वाली ‘ग्रेवी’. यह ग्रेवी शाकाहारी और मांसाहारी, दोनों प्रकार के पदार्थों में उपयोग की जा सकती है. इस करी का इतिहास भी मनोरंजक एवं प्राचीन है. यह शब्द तमिल भाषा के ‘कैकारी’ नामक शब्द से बना है. तमिल में कैकारी का अर्थ है, विभिन्न मसालों का मिश्रण करके बनी हुई सब्जी.

विश्व के भिन्न-भिन्न देशों में भोजन से पहले प्रार्थना करने की परंपरा है. ईसाईयों, यहूदियों में यह परंपरा विशेष रूप से पालन की जाती है. भारतीयों में भी इस प्रार्थना परंपरा का महत्त्व है. हम अन्न को पूर्णब्रह्म मानते हैं. ‘भोजन’ नामक शब्द को सिद्ध करने की लिए पाणिनी ने धातुसूत्र लिखा हुआ है – ‘भुज पालन अयवहार्यो’. इसी को आगे बढ़ाते हुए, भोजन करने से पूर्व हम जो मन्त्र कहते हैं, वह है –

ॐ अन्नपते अन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः ।

मम दातारं तारिषऽ ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे ।। (यजुर्वेद – ११-८३)

अर्थ – हे (अन्नपते) अन्न के पति भगवन्, (नः) हमें (अनमीवस्य) कीट आदि रहित (शुष्मिणः) बलकारक (अन्नस्य) अन्न के भण्डार (देहि) दीजिये. (प्रदातारं) अन्न का खूब दान देने वाले को (प्रतारिष) दु:खों से पार लगाईये (नः). हमारे (द्विपदे चतुष्पदे) दोपायो और चौपायो को (ऊर्जं) बल (धेहि) दीजिये.

अथवा

ॐ ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्र्ह्यागनौ ब्रह्मणा हुतं|

ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना || (गीता – अध्याय ४, श्लोक २४)

अर्थ – जिस यज्ञ में अर्पण भी ब्रह्म है, हवि भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है, (ऐसे यज्ञ को करने वाले) जिस मनुष्य की ब्रह्म में ही कर्मसमाधि हो गयी है, उसके द्वारा प्राप्त करने योग्य फल भी ब्रह्म ही है।

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।

ॐ शांति शांति शांति… (कठोपनिषद – कृष्ण यजुर्वेद)

अर्थ – परमेश्वर हम शिष्य और आचार्य दोनों की साथ-साथ रक्षा करें, हम दोनों को साथ-साथ विद्या के फल का भोग कराएं, हम दोनों एकसाथ मिलकर विद्या प्राप्ति का सामर्थ्य प्राप्त करें, हम दोनों का पढ़ा हुआ तेजस्वी हो, हम दोनों परस्पर द्वेष न करें।

कुल मिलाकर बात यह है कि हम भारतीय लोग एक परिपूर्ण, वैज्ञानिक एवं पोषक प्रकार की प्राचीन खाद्य संस्कृति के संवाहक हैं. इस संस्कृति पर गर्व करने में कोई समस्या नहीं है, अपितु हमारी यह प्राचीन खाद्य संस्कृति विश्व के समक्ष अधिकाधिक लाने की आवश्यकता है….!

–  प्रशांत पोळ

October 26th 2019, 5:04 pm

जम्मू कश्मीर और लद्दाख को मिले एलजी, 31 अक्तूबर को संभालेंगे कार्यभार

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जीसी मुर्मू जम्मू कश्मीर के उप-राज्यपाल और आरके माथुर लद्दाख के उप-राज्यपाल नियुक्त, सत्यपाल मलिक होंगे गोवा के राज्यपाल

31 अक्तूबर को जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम लागू हो जाएगा. इसके बाद जम्मू कश्मीर और लद्दाख 2 केंद्र शासित प्रदेशों में बदल जाएंगे. केंद्र शासित प्रदेश होने के कारण इनकी कमान एलजी या उप-राज्यपाल के हाथों में होगी. इसे ध्यान में रखते हुए गृह मंत्रालय ने दोनों पर पदों पर नियुक्ति कर दी है. आईएएस अधिकारी गिरीश चंद्र मुर्मू को जम्मू कश्मीर का उप-राज्यपाल बनाया गया है, जबकि अन्य सेवानिवृत्त आईएएस राधाकृष्ण माथुर को लद्दाख का उप-राज्यपाल नियुक्त किया गया है. दोनों 31 अक्तूबर से अपना कार्यभार संभाल लेंगे.

मौजूदा राज्यपाल सत्यपाल मलिक को उनकी सफल पारी के बाद गोवा भेज दिया गया है, यानि 31 अक्तूबर से गोवा के राज्यपाल का पदभार संभालेंगे.

1977 बैच के आईएएस अधिकारी गिरीश चंद्र मुर्मू फिलहाल एक्सपेंडीचर सेक्रेटरी हैं. आर्टिकल 370 को हटाने की पूरी रूपरेखा की जिम्मेदारी उन्हीं के ऑफिस ने संभाली हुई थी. गिरीश चंद्र मूल रूप से ओडिशा के रहने वाले हैं और बर्मिंघम यूनिवर्सिटी में पढ़ाई पूरी की है. मुर्मू पीएम मोदी के साथ भी काम कर चुके हैं, जब नरेंद्र मोदी गुजरात के सीएम थे, तब गिरीश चंद्र मुर्मू उनके प्रमुख सचिव थे. उन्हें पीएम मोदी का करीबी विश्वासपात्र माना जाता है.

लद्दाख के पहले एलजी राधा कृष्ण माथुर रक्षा मामलों के विशेषज्ञ माने जाते हैं. 1977 बैच के सेवानिवृत्त आईएएस माथुर नवंबर 2018 में मुख्य सूचना आयुक्त के पद से रिटायर हुए थे. आईआईटी कानपुर के छात्र रहे माथुर को रक्षा और सामरिक क्षेत्र में अनुभव के चलते लद्दाख का उप-राज्यपाल बनाया गया है.

October 26th 2019, 3:23 am

कश्मीर अतीत से वर्तमान तक – लेख संकलन

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कश्मीर : अतीत से आज तक – भाग एक

धर्म – रक्षक आध्यात्मिक कश्मीर

पिछले अनेक वर्षों से मजहबी कट्टरपन, भारत विरोध और हिंसक जिहाद के संस्कारों में पल कर बड़ी हुई कश्मीर घाटी की युवा पीढ़ी को भारत की मुख्य राष्ट्रीय धारा में लाना वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती है. इसके लिए कश्मीर के उज्ज्वल अतीत का इतिहास पढ़ाया जाना अतिआवश्यक है. तभी युवा कश्मीरियों को सनातन (वास्तविक) कश्मीरियत का ज्ञान होगा और वे हिंसक जिहाद के अमानवीय मक्कड़जाल से बाहर निकलकर अपने गौरवशाली अतीत से जुड़ सकेंगे.

 

कश्मीर : अतीत से आज तक – भाग दो

वीरव्रती दिग्विजयी कश्मीर

हम सभी भारतीयों को कश्मीर की गौरवमयी क्षात्र परंपरा और अजय शक्ति पर गर्व है. विश्व में मस्तक ऊंचा करके 4000 वर्षों तक स्वाभिमान पूर्वक स्वतंत्रता का भोग कश्मीर ने अपने बाहुबल पर किया है. इस धरती के हिन्दू शूरवीरों ने कभी विदेशी आक्रमणकारियों और उनके शस्त्रों के सम्मुख मस्तक नहीं झुकाए.

 

कश्मीर : अतीत से आज तक – भाग तीन

कट्टरपंथी धर्मान्तरित कश्मीर

सारे देश में चलती धर्मान्तरण की खूनी आंधी की तरह ही कश्मीर में भी विदेशों से आए हमलावरों की एक लंबी कतार ने तलवार के जोर पर हिन्दुओं को इस्लाम कबूल करवाया है. इन विदेशी और विधर्मी आक्रमणकारियों ने कश्मीर के हिन्दू राजाओं और प्रजा की उदारता, धार्मिक सहनशीलता, अतिथि सत्कार इत्यादि मानवीय गुणों का भरपूर फायदा उठाया है. यह मानवता पर जहालत की विजय का उदाहरण है.

 

कश्मीर : अतीत से आज तक – अंतिम भाग

भावी स्वर्णिम कश्मीर

कश्मीर के गौरवशाली अतीत की संक्षिप्त जानकारी पूर्व के दो लेखों – ‘धर्मरक्षक आध्यात्मिक कश्मीर’ और ‘वीरव्रती दिग्विजयी कश्मीर’ में दी है. इसी तरह इस वैभव की पतनावस्था की जानकारी तीसरे लेख ‘कट्टरपंथी धर्मान्तरित कश्मीर’ नामक लेख में दी गई है. भारत के नंदनवन कश्मीर के वैभव और पतन के बाद अब भविष्य के ‘स्वर्णिम कश्मीर’ का खाका तैयार करने और उसके अमल पर चिंतन करने का समय है.

October 26th 2019, 3:23 am

पीओजेके को पाकिस्तान नहीं आतंकवादी नियंत्रित करते हैं – जन. बिपिन रावत

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पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) का नियंत्रण पाकिस्तान के पास नहीं, अपितु आतंकियों के पास है. हम जिस जम्मू-कश्मीर की बात करते हैं, उसके हिस्से में पीओजेके और गिलगिट बाल्टिस्तान भी आता है. पाकिस्तान ने इस पर अवैध रूप से कब्जा किया हुआ है.

सेनाध्यक्ष बिपिन रावत ने शुक्रवार को केएम करियप्पा मेमोरियल लेक्चर में कहा कि पाकिस्तान ने जिस इलाके पर अवैध कब्जा जमा रखा है, उसे आतंकवादी नियंत्रित करते हैं. पीओजेके वास्तव में आतंकवादी नियंत्रित क्षेत्र है.

बिपिन रावत ने कहा कि हमें इस बात का यकीन है कि हमारे अंतिम मिशन से हमें कोई नहीं रोक सकता है. आखरी लक्ष्य हासिल करने में हमें समय जरूर लग सकता है, लेकिन आखिर में धुंध छंटेगी और उजाला होगा. उन्होंने कहा कि हमारे देश को अपनी सेना के ऊपर गर्व है.

October 26th 2019, 2:23 am

1962 भारत-चीन युद्ध – परमवीर सूबेदार जोगिंदर सिंह और उनके साथी सैनिक गोलियां समाप्त होने पर बंदूक की

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20 अक्तूबर 1962 चीन और भारत बूम ला मोर्चे पर आमने सामने आ गए. चीनी फौजें तवांग की ओर बढ़ रही थीं. चीनी फौज की पूरी  डिवीजन के सामने भारत की केवल 1 सिख कम्पनी थी. कम्पनी का नेतृत्व सूबेदार जोगिन्दर सिंह कर रहे थे. सूबेदार जोगिन्दर सिंह रिज नामक स्थान के पास नेफा (उत्तर-पूर्व सीमांत प्रदेश) में अपनी टुकड़ी के साथ तैनात थे.

सुबह साढ़े पांच बजे चीन की फौजों ने बूम ला पर धावा बोल दिया. उनका इरादा तवांग तक पहुंचने का था. दुश्मन की फौज ने तीन बार इस मोर्चे पर हमला किया. पहला हमला सूबेदार जोगिंदर सिंह की कम्पनी बहादुरी से झेल गई, और चीन को कामयाबी नहीं मिली. उसका काफी नुकसान हुआ, और उसे रुकना पड़ा.

कुछ ही देर बाद दुश्मन ने फिर धावा बोला. उसका भी सामना जोगिन्दर सिंह ने बहादुरी से किया. ‘जो बोले सो निहाल…’ का नारा लगाते और दुश्मन के हौसले पस्त कर देते. लेकिन दूसरा हमला जोगिन्दर सिंह की आधी फौज साफ कर गया. सूबेदार जोगिन्दर सिंह खुद भी घायल थे. उनकी जांघ में गोली लगी थी, फिर भी उन्होंने रण क्षेत्र छोड़ने से मना कर दिया. उनके नेतृत्व में उनकी टुकड़ी भी पूरे हौसले के साथ जमी हुई थी.

तभी दुश्मन की ओर से तीसरा हमला किया गया. अब तो सूबेदार जोगिन्दर सिंह ने स्वयं मशीनगन लेकर गोलियां दागनी शुरू कर दीं. चीन की फौज का भी इस हमले में काफ़ी नुकसान हो चुका था, लेकिन वह लगातार बढ़ते जा रहे थे. जोगिंदर सिंह के पास गोलियां समाप्त हो गईं, तो उन्हें पीछे हटने को कहा गया. लेकिन सूबेदार और उनके बचे हुए सैनिक अपनी बंदूक में लगी संगीन हाथ में लेकर दुश्मन पर टूट पड़े और आगे बढ़ रहे दुश्मन का डटकर सामना किया. सूबेदार घायल हो गये और युद्धबंदी बना लिये गये. बाद में दुश्मन की हिरासत में ही सूबेदार जोगिंदर सिंह बलिदान हो गए.

October 23rd 2019, 5:15 am

कठुआ रेप केस – क्राइम ब्रांच की SIT के 6 पुलिसकर्मियों पर एफआईआर के आदेश, झूठे बयान दिलवाने और फर्ज़

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कठुआ रेप केस की जांच कर रही स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम के सदस्य भी अब खुद जांच के घेरे में आ गए हैं. आरोप है कि क्राइम ब्रांच के 6 सदस्यों ने केस में बरी विशाल जंगोत्रा को फंसाने के लिए फर्जी सबूत गढ़े और उसके साथियों को झूठे बयान दिलवाने के लिए मजबूर किया. इस मामले में अब जम्मू की एक अदालत ने एसआईटी के 6 सदस्यों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिये हैं.

मंगलवार को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रेम सागर ने इस केस के गवाहों सचिन शर्मा, नीरज शर्मा और साहिल शर्मा की एक याचिका पर जम्मू के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) को निर्देश देते हुए कहा कि इन छह लोगों के खिलाफ संज्ञेय अपराध बनता है. अदालत ने तत्कालीन एसएसपी आरके जल्ला (अब सेवानिवृत्त), एएसपी पीरजादा नाविद, पुलिस उपाधीक्षकों शतम्बरी शर्मा और निसार हुसैन, पुलिस की अपराध शाखा के उप निरीक्षक उर्फन वानी और केवल किशोर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिये हैं और जम्मू के एसएसपी से 11 नवम्बर को मामले की अगली सुनवाई पर अनुपालन रिपोर्ट देने को कहा है.

पठानकोर्ट जिला एवं सत्र न्यायाधीश तेजविंदर सिंह ने इस साल जून महीने में तीन मुख्य आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जबकि मामले में सबूत मिटाने के लिए अन्य तीन को पांच वर्ष जेल की सजा सुनाई थी. जबकि 7वें आरोपी विशाल जंगोत्रा को बेगुनाह मानते हुए बरी कर दिया था.

आरोप है कि विशाल जंगोत्रा को फंसाने के लिए एसआईटी टीम ने फर्जी सबूत गढ़े थे और विशाल के साथियों को टॉर्चर कर झूठे बयान देने के लिए मज़बूर किया था. लेकिन पठानकोट कोर्ट में ये आरोप साबित नहीं कर पाए.

विशाल के इन्हीं 3 साथियों ने कोर्ट से एसआईटी पर थर्ड-डिग्री का इस्तेमाल कर झूठे बयान दिलवाने का आरोप लगाते हुए उन पर पर एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी. जिसे कोर्ट ने प्रथम दृष्ट्या सही माना और पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिये.

October 23rd 2019, 5:15 am

23 अक्तूबर / जन्मदिवस – अजातशत्रु पंडित प्रेमनाथ डोगरा जी

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नई दिल्ली. जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के पक्षधर पंडित प्रेमनाथ डोगरा जी का जन्म 23 अक्तूबर, 1894 को ग्राम समेलपुर (जम्मू) में पं. अनंत राय के घर में हुआ था. जम्मू-कश्मीर के महाराजा रणवीर सिंह के समय में पं. अनंत राय “रणवीर गवर्नमेंट प्रेस” के और फिर लाहौर में “कश्मीर प्रापर्टी” के अधीक्षक रहे. उनका महत्व इसी से समझा जा सकता है कि लाहौर में वे राजा ध्यान सिंह की हवेली में रहते थे. इसलिए प्रेमनाथ जी की शिक्षा लाहौर में ही हुई. प्रेमनाथ जी पढ़ाई और खेल में सदा आगे रहते थे. एफ.सी. कॉलेज, लाहौर में हुई प्रतियोगिता में उन्होंने 100 गज, 400 गज, आधा मील और एक मील दौड़ की प्रतियोगिताएं जीतीं. इस पर पंजाब के तत्कालीन गर्वनर ने उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया. उन्हें एक जेब घड़ी पुरस्कार में मिली, जो उनके परिवार में आज भी सुरक्षित है. वे फुटबॉल के भी अच्छे खिलाड़ी थे.

शिक्षा के बाद शासन में अनेक उच्च पदों पर काम करते हुए वे 1931 में मुजफ्फराबाद के वजीरे वजारत (जिला मंत्री) बने. उस समय शेख अब्दुल्ला का ‘कश्मीर छोड़ो’ आंदोलन जोरों पर था. पंडित जी ने उस आंदोलन को बिना बल प्रयोग किये अपनी कूटनीति से शांत कर दिया, पर शासन बल प्रयोग चाहता था. अतः उन्हें नौकरी से अलग कर दिया गया. इसके बाद पंडित जी जनसेवा में जुट गये. 1940 में वे पहली बार प्रजा सभा के सदस्य चुने गये. 1947 में जम्मू-कश्मीर का माहौल बहुत गरम था. महाराजा हरिसिंह को रियासत छोड़नी पड़ी. प्रधानमंत्री नेहरू की शह पर शेख अब्दुल्ला इस रियासत को अपने अधीन रखना चाहता था. उसने नये कश्मीर का नारा दिया और ‘अलग प्रधान, अलग विधान, अलग निशान’ की बात कही. कश्मीर घाटी में मुसलमानों की संख्या अधिक थी, अतः वहां भारतीय तिरंगे के स्थान पर शेख का लाल रंग और हल निशान वाले झंडे फहराने लगे.

यह सब बातें देशहित में नहीं थीं. अतः पंडित प्रेमनाथ डोगरा के नेतृत्व में प्रजा परिषद का गठन हुआ और ‘एक देश में एक प्रधान, एक विधान, एक निशान’ के नारे के साथ आंदोलन छेड़ दिया गया. आंदोलन के दौरान पंडित जी तीन बार जेल गये. उन्हें जेल में बहुत कष्ट दिये गये. उनकी सरकारी पेंशन भी बंद कर दी गयी, पर पंडित जी झुके नहीं. आगे चलकर भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में कश्मीर आंदोलन शुरू हुआ. 23 जून, 1953 को श्रीनगर की जेल में डॉ. मुखर्जी की संदेहास्पद हत्या कर दी गयी. उस समय पंडित जी भी जेल में ही थे. डॉ. मुखर्जी के शव को दिल्ली होते हुए कोलकाता ले जाया गया. पंडित जी भी उसी वायुयान में थे, पर उन्हें दिल्ली ही उतार दिया गया. पंडित जी जवाहरलाल नेहरू से मिले और उन्हें पूरी स्थिति की जानकारी दी.

कुछ समय बाद प्रजा परिषद का जनसंघ में विलय हो गया और पंडित जी एक वर्ष तक जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे. 1957 में वे जम्मू नगर से प्रदेश की विधानसभा के सदस्य चुने गये. 1972 तक उन्होंने हर चुनाव जीता. जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह के बारे में उनका कहना था कि विलय पत्र में इसका उल्लेख नहीं है, इसलिए उसका भारत में विलय निर्विवाद है. पंडित जी का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति बहुत प्रेम था. तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी सदा उनके घर पर ही ठहरते थे. ऐसे अजातशत्रु, श्रेष्ठ सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता पंडित प्रेमनाथ डोगरा का 21 मार्च, 1972 को कच्ची छावनी स्थित अपने घर पर देहांत हुआ.

 

October 22nd 2019, 9:41 pm

राष्ट्रीयता की भावना से ही भारत बन सकता है विश्वगुरू – बंडारू दत्तात्रेय

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शिमला (विसंकें). हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित सेमीनार में सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा कि राष्ट्रीयता की भावना का विकास तो होना ही चाहिए. लेकिन, इसमें हिन्दुत्व के मूल्यों का ह्रास नहीं होना चाहिए. हमारी संस्कृति देश की ऐसी विलक्षण धरोहर है, जिसके शाश्वत मूल्यों का यहां सतत् विकास हुआ है. हजारों साल से हमारे देश को इसी विलक्षणता के कारण हिन्दू राष्ट्र कहा जाता रहा है.

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में महर्षि पाणिनी विचार मंच की ओर से राष्ट्रीयता पर संगोष्ठी का आयोजन (19 अक्तूबर) किया गया था. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि पूर्व केन्द्रीय मंत्री और राज्यसभा सदस्य सुब्रह्मण्यम स्वामी और विशिष्ट अतिथि हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय थे, योग भारती संस्थापक श्रीनिवासमूर्ति विशेष रूप से उपस्थित रहे. कार्यक्रम की अध्यक्षता माईक्रोटेक के चैयरमेन सुबोध गुप्ता ने की.

सुब्रह्मण्यम स्वामी कहा कि हमारी संस्कृति में भौतिकता और अध्यात्म का एक विशिष्ट समन्वय रहा है जो इसे विलक्षण बनाती है. जेएनयू के कुछ प्रोफेसर झूठ बोलने में माहिर रहे हैं, जिस कारण वे गलत जानकारियां पढ़ाते रहे. भारत हमेशा से एक राष्ट्र रहा है. उन्होंने महाभारत के युद्ध के बारे में कहा कि यह युद्ध एक राष्ट्र का युद्ध था. लेकिन हमारे इतिहास में ये पढ़ाया जाता रहा कि भारत टुकड़े-टुकड़े था. आर्य यूरोप से आए, उन्होंने यहां के मूल निवासियों को दक्षिण की ओर भगा दिया. लेकिन अब ये थ्योरी गलत साबित हो रही है, उनका झूठ सबके सामने आ रहा है.

प्रश्नोत्तर के दौरान एक सवाल के उत्तर में उन्होंने कहा कि राष्ट्रीयता की आड़ में बेरोजगारी को नहीं छिपाया जा रहा, बल्कि सरकार देश की अर्थव्यवस्था के प्रति गंभीर है और इससे निपटने के लिए कई प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं. अयोध्या में मंदिर निर्माण पर कहा कि वहां पर उपासना का अधिकार हिन्दुओं का मूलभूत अधिकार है. उनसे यह अधिकार छीना नहीं जा सकता, जिसे कुछ मुस्लिम पक्षकारों ने भूमि विवाद का रूप दिया है. उन्होंने विश्वास जताया कि अयोध्या मामले में फैसला हमारे पक्ष में ही आएगा. सामाजिक समरसता पर उन्होंने कहा कि हमारे देश में हमेशा से समरस समाज रहा है. उन्होंने इसके कई उदाहरण दिये. महिलाओं के विषय पर कहा कि महिलाओं को किसी भी तरह से कमतर नहीं आंकना चाहिए. महिलाओं ने हमेशा से समाज में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी है.

राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय जी ने कहा कि राष्ट्रीयता की भावना से भारत विश्वगुरू बन सकता है.  उन्होंने कहा कि राष्ट्रीयता एक प्रेरणा है जो हमारे खिलाड़ियों को अच्छा प्रदर्शन करने और सैनिकों को सर्वोच्च बलिदान करने को प्पेरित करती है. आज देश के बाहर व भीतर अलगाववादी, विघटनकारी शक्तियां सक्रिय हैं. जिनसे लड़ना देश के सामने एक चुनौती है और इस चुनौती से निपटने के लिए शक्ति राष्ट्रीयता की भावना से ही आ सकती है. देश की नई पीढ़ी को स्वतंत्रता सेनानियों और देश के गौरवशाली इतिहास के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए.

उन्होंने व्यक्त की कि 2030 तक भारत में युवाओं के लिए 3 मिलियन नौकरियां होंगी. राज्यपाल ने महिला सशक्तिकरण पर बल देते हुए कहा कि समाज में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाना चाहिए.

श्रीनिवासमूर्ति जी ने कहा कि भारत की परम्परा करोड़ों वर्ष पुरानी रही है, इसका अतीत गौरवशाली रहा है. भारत हमेशा से ही विश्व का मार्गदर्शन करने वाला राष्ट्र रहा है. भारत में भगवद् गीता जैसा ग्रंथ है, जिसे पूरे विश्व में आदर्श व प्रेरणास्रोत माना जाता है. गीता को सभी को जानने का प्रयास करना चाहिए, इसका अनुवाद 175 भाषाओं में किया गया है. योग हमारे देश की एक प्राचीन विधा रही है, जिससे आज विश्व के लोग भी लाभ उठा रहे हैं.

उन्होंने बताया कि सोलन में भी योग केंद्र खोला जा रहा है. उन्होंने कुछ यौगिक क्रियाओं की जानकारी भी उपस्थित लोगों के समक्ष रखी. उन्होंने प्रदेश में एक स्वयंसेवक के नाते अपने अनुभवों को भी साझा किया.

October 22nd 2019, 10:03 am

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान मना रहा 54वां स्थापना दिवस

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शिमला (विसंकें). भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला 20 से 22 अक्तूबर तक अपना 54वां स्थापना दिवस मना रहा है. इस अवसर पर तीन दिन तक परिसर में विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है. प्रारंम्भिक कार्यक्रम में प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल बतौर मुख्यातिथि उपस्थित रहे. संस्थान के निदेशक मकरंद पराजंपे ने संस्थान के इतिहास पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि इस संस्थान के साथ महान विभूतियां जुड़ी रही हैं. संस्थान में इस वर्ष 50 विषयों पर राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन और लैक्चर करवाये जा चुके हैं. संस्थान ने कई पुस्तकों का प्रकाशन भी किया और इनका डिजीटाईजेशन भी शुरू किया गया है.

डॉ राजीव बिंदल ने संस्थान के 54वें स्थापना दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं प्रदान कीं उन्होंने कहा कि यह संस्थान हिमाचल प्रदेश का गौरव है और हमें इस पर गर्व है. संस्थान द्वारा विविधता में एकता जैसे विषयों पर शोध किया जा रहा है जो भारत की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने में महत्वपूर्ण है. इसके साथ ही भारत के जीवन दर्शन, संस्कृति, सामाजिकता को लेकर संस्थान जो कार्य कर रहा है वो सराहनीय है. भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के सचिव कर्नल विजय तिवारी ने गणमान्यजनों का आभार व्यक्त किया .

संध्याकाल में ग्वालियर घराने से प्रख्यात हिंदुस्तानी गायिका नीला भागवत जी ने संगीतमय प्रस्तुति देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया.

October 22nd 2019, 8:19 am

राम द्रोहियों को सद्बुद्धि के साथ मंदिर निर्माण की शेष बाधाओं को दूर करें भगवान – विनोद बंसल

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राम मंदिर निर्माण के लिए मंगल कामना पूर्ति यज्ञ

नई दिल्ली. अयोध्या की पावन नगरी में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर के निर्माण तथा राम द्रोहियों को सद्बुद्धि देने हेतु राम मंदिर निर्माण मंगल कामना पूर्ति यज्ञ का आयोजन किया गया. चारों वेदों के पवित्र मन्त्रों से दी गई आहूतियों के माध्यम से प्रार्थना की गई कि हे प्रभु! अयोध्या में जन्मभूमि पर मंदिर को भव्यता देने में रह गईं कुछ बाधाओं को और अविलम्ब दूर कर जन-जन की आकांक्षाओं को पूरा करें. यज्ञोपरांत मुख्य वक्ता विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल जी ने कहा कि अब तक हम भारतीयों का यह दुर्भाग्य ही तो था कि राम के इस राष्ट्र में उन्हीं को विराट मंदिर से निकाल कर टाट के टेंट में रहने को मजबूर किया गया. गत लगभग 500 वर्षों के सतत् संघर्ष के बाद अब उस कालिमा के छंटने का समय निकट है. हमारा विश्वास है कि इस मंगल कामना यज्ञ में दी गईं आहूतियां मंदिर निर्माण की सभी बाधाओं को दूर करेंगी तो साथ ही उन राम द्रोहियों को भी सद्बुद्धि प्रदान कर सदमार्ग की ओर लौटाएंगी, जिन्होंने अज्ञान, अभाव या डर के कारण धर्मांतरण तो किया ही, साथ में अपने पूर्वजों को भी भुला बैठे. हमें आशा है, वे सभी अपने मूल की ओर लौट कर भूल सुधारेंगे और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के मंदिर की भव्यतार्थ अयोध्या की ओर बढेंगे.

उन्होंने कहा कि किसी भारतीय या उसके समुदाय का एक विदेशी, आक्रमणकारी, अत्याचारी व विधर्मी देश द्रोही या उसके द्वारा अपमान स्वरूप बनाए गए किसी ढांचे से भला क्या सम्बन्ध हो सकता है? जो लोग पथ से विमुख होकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय का अमूल्य समय व उसकी मर्यादा के साथ हिन्दुओं की पवित्र भावनाओं से खिलवाड़ करने या जनता को बार-बार दिग्भ्रमित कर रहे हैं, भगवान उन्हें भी सद्बुद्धि प्रदान करे.

वैदिक विदुषी दर्शानाचार्या श्रीमति विमलेश आर्या के ब्रह्मत्व में संचालित  राम मंदिर निर्माण मंगल कामना पूर्ति यज्ञ (हवन) के उपरांत विहिप के बदरपुर जिला मंत्री ललित कुमार के गीत “वह दिन समीप में है वह क्षण समीप में है, अब राम जी तुम्हारा मंदिर वहीं बनेगा’ ने उपस्थित राम भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया. कार्यक्रम में क्षेत्र के गणमान्य व स्थानीय लोग उपस्थित थे.

October 22nd 2019, 7:18 am

21 अक्तूबर / पुण्यतिथि – दिल्ली में सत्याग्रह की शान बहिन सत्यवती

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नई दिल्ली. 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समय दिल्ली में जिस वीर महिला ने अपने साहस, संगठन क्षमता एवं अथक परिश्रम से चूल्हे-चौके तक सीमित रहने वाली घरेलू महिलाओं को सड़क पर लाकर ब्रिटिश शासन को हैरान कर दिया, उनका नाम था बहन सत्यवती. सत्यवती का जन्म अपने ननिहाल ग्राम तलवन (जिला जालंधर, पंजाब) में 26 जनवरी, 1906 को हुआ था. स्वाधीनता सेनानी एवं परावर्तन के अग्रदूत स्वामी श्रद्धानंद जी उनके नाना थे. उनकी माता श्रीमती वेदवती धार्मिक एवं सामाजिक कार्यों में सक्रिय थीं. इस प्रकार साहस एवं देशभक्ति के संस्कार उन्हें अपने परिवार से ही मिले. विवाह के बाद वे दिल्ली में रहने लगीं.

उनका विवाह दिल्ली क्लॉथ मिल में कार्यरत एक अधिकारी से हुआ, जिससे उन्हें एक पुत्र एवं पुत्री की प्राप्ति हुई. अपने पति से उन्हें दिल्ली के उद्योगों में कार्यरत श्रमिकों की दुर्दशा की जानकारी मिली. इससे उनका मातृत्व जाग उठा. वे श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए मैदान में कूद पड़ीं. इस प्रकार उन्होंने 1936-37 में दिल्ली में श्रमिक आंदोलन को एक नयी दिशा दी.

उनके उग्र भाषणों से घबराकर शासन ने उन पर कई प्रतिबंध लगाये, पर वे पुलिस को चकमा देकर निर्धारित स्थान पर पहुंच जाती थीं. इससे दिल्ली की महिलाओं तथा युवाओं में उनकी विशेष पहचान बन गयी. हिन्दू कॉलेज एवं इन्द्रप्रस्थ कन्या विद्यालय के छात्र-छात्राएं तो उनके एक आह्वान पर सड़क पर आ जाते थे. उन्होंने ‘कांग्रेस महिला समाज’ एवं ‘कांग्रेस देश सेविका दल’ की स्थापना की. वे ‘कांग्रेस समाजवादी दल’ की भी संस्थापक सदस्य थीं.

नमक सत्याग्रह के समय उन्होंने शाहदरा के एक खाली मैदान में कई दिन तक नमक बनाकर लोगों को निःशुल्क बांटा. कश्मीरी गेट रजिस्ट्रार कार्यालय पर उन्होंने महिलाओं के साथ विशाल जुलूस निकाला. इस पर शासन ने उन्हें गिरफ्तार कर अच्छे आचरण का लिखित आश्वासन एवं 5,000 रु0 का मुचलका मांगा, पर बहन सत्यवती ने ऐसा करने से मना कर दिया. परिणाम यह हुआ कि उन्हें छह महीने के लिए कारावास में भेज दिया गया.

उनके नेतृत्व में ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ का भी दिल्ली में बहुत प्रभाव हुआ, पर बार-बार की जेल यात्राओं से जहां एक ओर वे तपेदिक से ग्रस्त हो गयीं, वहां दूसरी ओर वे अपने परिवार और बच्चों की देखभाल भी ठीक से नहीं कर सकीं. उनकी बेटी ने दस वर्ष की अल्पायु में ही प्राण त्याग दिये. शासन ने पुत्री के अंतिम संस्कार के लिए भी उन्हें जेल से नहीं छोड़ा.

सन् 1942 के आंदोलन के समय बीमार होते हुए भी उन्होंने चांदनी चौक की गलियों में घूम-घूमकर महिलाओं के जत्थे तैयार किये और उन्हें स्वाधीनता के संघर्ष में कूदने को प्रेरित किया. शासन ने उन्हें गिरफ्तार कर अम्बाला जेल में बंद कर दिया. वहां उनकी देखभाल न होने से उनका रोग बहुत बढ़ गया. इस पर शासन ने उन्हें टी.बी चिकित्सालय में भर्ती करा दिया. जब वे जेल से छूटीं, तब तक आंदोलन ठंडा पड़ चुका था. लोगों की निराशा दूर करने के लिए उन्होंने महिलाओं एवं सत्याग्रहियों से संपर्क जारी रखा. यह देखकर शासन ने उन्हें घर पर ही नजरबंद कर दिया. रोग बढ़ जाने पर उन्हें दिल्ली के ही एक अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 21 अक्तूबर, 1945 को उनका देहांत हो गया. उनकी स्मृति को चिरस्थायी रखने के लिए दिल्ली में “सत्यवती कॉलेज” की स्थापना की गयी है.

October 21st 2019, 12:14 am

क्रांति नायक विनायक दामोदर सावरकर

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महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर को ‘भारत रत्न’ की उपाधि से सम्मानित करने की घोषणा करके ऐतिहासिक भूल को सुधार कर अन्याय को न्याय में बदलने का कार्य किया है. अंडमान जेल की काल कोठरी में दस वर्षों तक घोर अमानवीय और अकल्पनीय यातनाएं सहन करने वाले महामानव सावरकर पर उंगलियां उठाने वाले वही लोग हैं, जिनके पुरखे हाथों में कटोरा लेकर अंग्रेजों से आजादी की भीख मांगते रहे.

क्रांति शिरोमणि वीर सावरकर के प्रखर राष्ट्रवाद पर वही लोग सवालिया निशान लगाते हैं जो योजनाबद्ध तरीके से जेलों में जाकर फाइव स्टार सुविधाएं लेते थे और ऐशोआराम का लुत्फ उठाते हुए अपनी आत्म-कथाएं लिखते थे. आज उन्हीं के वंशज वातानुकूलित महलों में पलकर बड़े हुए ‘युवराज’ वीर सावरकर की राष्ट्र भक्ति को कटघरे में खड़ा करने का अतिघृणित कार्य कर रहे हैं. यह सुविधाभोगी तथाकथित स्वतंत्रता सेनानी कष्टभोगी क्रांतिकारियों के राष्ट्र समर्पित व्यक्तित्व को समझ ही नहीं सकते.

देश की स्वतंत्रता के लिए अपने जीवन को तिल-तिल करके जलाने वाले वीर सावरकर जैसे क्रांतिवीरों को बदनाम करने वाले वही लोग हैं जो महात्मा गांधी को अंग्रेजों का पिट्ठू, सुभाष चन्द्र बोस को जापान का कुत्ता और सरदार भगत सिंह को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा करते थे.

यह वही लोग हैं – जिन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन, 1962 में चीन के आक्रमण और 1971 में बंग्लादेश की स्वतंत्रता के समय भारत के साथ गद्दारी की थी. जो लोग धर्म, संस्कृति, सनातन भारतीयता (हिन्दुत्व) से नफरत करते हों, वे लोग न तो भारत के वफादार ही हो सकते हैं और न ही वीर सावरकर जैसे राष्ट्रभक्तों की साधना और तपस्या को समझ सकते हैं.

वीर सावरकर एक स्वतंत्रता सेनानी, राष्ट्रवादी साहित्यकार, निर्भीक कवि और चिंतनशील विद्वान थे. अंग्रेजों के घर लंदन में रहकर उन्होंने अनेक पुस्तकें, लेख और देशभक्ति से सराबोर कविताएं लिखीं. उनके द्वारा लिखी गईं पुस्तक – ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ एक ऐसा ऐतिहासिक दस्तावेज है, जिसने सरदार भगत सिंह, रासबिहारी बोस, लाला हरदयाल, श्यामजी कृष्ण वर्मा, त्रिलोक्यनाथ चक्रवर्ती, करतार सिंह सराभा, रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खां, ऊधम सिंह और मदनलाल ढींगरा जैसे युवा क्रांतिकारी तैयार किए, जिन्होंने भारत और इंग्लैंड में अंग्रेज साम्राज्यवादियों की ईंट से ईंट बजा दी.

वीर सावरकर ने अंडमान और रत्नागिरी की काल कोठरी में रहते हुए, लेखनी और कागज के बिना भी जेल की दीवारों पर कीलों, कोयलों और यहां तक कि अपने नाखुनों से राष्ट्रवादी साहित्य का सृजन कर डाला. इस साहित्य की अनेक पंक्तियों को वर्षों तक कंठस्थ करके देशवासियों तक पहुंचाया. उन्होंने गोमांतक, कमला, हिन्दुत्व, हिन्दु पद पादशाही, सन्यस्त खडग, उत्तर क्रिया, विरोच्छवास और भारतीय इतिहास के छह स्वर्णिम पृष्ठ इत्यादि ग्रंथ लिखे.

स्वातंत्र्य सेनानी वीर सावरकर ऐसे प्रथम भारतीय थे, जिन पर हेग के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में मुकदमा चलाया गया. वे प्रथम स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा दो आजन्म कारावास की सजा दी गई. वे ऐसे प्रथम इतिहासकार थे, जिन्होंने 1857 में हुई देशव्यापी जनक्रांति को स्वतंत्रता संग्राम सिद्ध किया था. वे एक ऐसे योद्धा थे, जिन्होंने अपनी हथकड़ियां तोड़ीं और समुद्री जहाज से कूदकर अथाह समुद्र (इंग्लिश चैनल) को तैरकर पार किया और फ्रांस के तट पर जा पहुंचे.

वहां बैरिस्टर सावरकर ने शोर मचाया कि अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार विदेश की धरती पर उन्हें अंग्रेज सरकार गिरफ्तार नहीं कर सकती. परन्तु फ्रैंच पुलिस उनकी अंग्रेजी नहीं समझ सकी और न ही वे अपनी बात समझा सके. परिणाम स्वरूप वह गिरफ्तार हो गए. जरा कल्पना कीजिए कि गोलियों की बौछार से बचते हुए समुद्र में तैरना कितने साहस और निडरता का पारिचायक है. देशभक्ति के उस ज्वार को वे लोग नहीं समझ सकते जो अंग्रेजों के राज्य को ‘ईश्वर की देन’ समझते थे.

इस स्वतंत्रता सेनानी के साथ एक और भी अन्याय किया जा रहा है कि वे अंडमान जेल से माफी मांगकर अपने घर आ गए थे. ऐसे लोगों से पूछना चाहिए कि यदि वीर सावरकर ने क्षमायाचना ही करनी थी तो वे दस वर्षों तक घोर यातनाएं क्यों सहते रहे? शुरु में ही माफी क्यों नहीं मांग ली? क्यों तेल निकालने वाले कोल्हू में बैल की तरह उत्पीड़ित होते रहे? मार खाते रहे, भूखे मरते रहे, गालियां बर्दाश्त करते रहे, क्यों?

सच्चाई तो यह है कि क्षमा पत्र पर हस्ताक्षर करना उनकी कूटनीतिक रणनीति थी. जिन्दगी भर जेल में न रहकर किसी भी प्रकार से बाहर आकर स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देना उनका उद्देश्य था. उल्लेखनीय है कि छत्रपति शिवाजी भी इसी प्रकार की कूटनीतिक चाल से औरंगजेब की कैद से छूटकर आए थे और आकर उन्होंने औरंगजेब, अफजल शाह और शाइस्ता खान का क्या हाल किया था, यह सारा संसार जानता है. ध्यान देने की बात है कि सिरफिरे और कुबुद्धि इतिहासकारों ने तो राणाप्रताप पर भी अकबर से माफी मांगने का आरोप जड़ दिया था.

वीर सावरकर ने माफी नहीं मांगी थी, अपितु ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की आंख में धूल झौंक कर वे बाहर आए और पुनः स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों में कूद पड़े. यह बात भी जानना जरूरी है कि अंग्रेज सरकार ने उन्हें छोड़ा नहीं था, अपितु रत्नागिरी में नजरबंद कर दिया था. बाद में 1937 में उन्हें छोड़ा गया. इस समय वीर सावरकर ने ‘अभिनव भारत’ और ‘हिन्दू महासभा’ इत्यादि मंचों के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम में अपनी अग्रणी भागीदारी को सक्रिय रखा. क्रांतिकारियों को संगठित करने का सफल प्रयास किया. वे एक व्यक्ति नहीं, एक विचारधारा थे. चाहे जेल में हों, चाहे नजरबंदी में हों, चाहे खुले मैदान में, प्रखर राष्ट्रवाद की लौ उनमें सदैव जलती रही. उन्होंने कभी भी अपने सिद्धांतों और अपनी विचारधारा के साथ समझौता नहीं किया.

वीर सावरकर के ही आह्वान पर देश के हजारों युवा सेना में भर्ती हुए और समय आने पर इन्हीं सैनिकों ने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध बगावत कर दी. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा गठित आजाद हिन्द फौज में युवाओं के भर्ती अभियान में भी वीर सावरकर का महत्वपूर्ण योगदान रहा था. वीर सावरकर ने भारत के विभाजन का भी डटकर विरोध किया था. वे अखंड भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के पक्षधर थे.

एक जनसभा में वीर सावरकर ने घोषणा की थी – ‘भारतमाता के अंग-भंग कर उसके एक भाग को पाकिस्तान बनाने की मुस्लिम लीग और अंग्रेजों की कुत्सित योजना का समर्थन करके कांग्रेस एक बहुत बड़ा राष्ट्रीय अपराध कर रही है’. वास्तव में अखंड भारत, सनातन हिन्दू राष्ट्रवाद, भारत की राष्ट्रीय पहचान हिन्दुत्व, सशस्त्र क्रांति के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम इत्यादि, ऐसे मुद्दे थे जिनके कारण कांग्रेस और वीर सावरकर की दूरियां बढ़ती गई. कांग्रेस अपने जन्मकाल से लेकर भारत के विभाजन तक अंग्रेजों के साथ समझौतावादी नीति पर चलती रही.

कांग्रेस की हठधर्मी, अंग्रेज भक्ति, मुस्लिम तुष्टीकरण और शीघ्र सत्ता पर बैठने की लालसा इत्यादि कुछ ऐसे कारण थे, जिनकी वजह से देश का विभाजन हो गया. यह एक सच्चाई है कि 1200 वर्ष तक चलने वाले स्वतंत्रता संग्राम का उद्देश्य भारत का विभाजन नहीं था. कांग्रेस अंग्रेजों और मुस्लिम लीग के षड्यंत्र में फंस गई और स्वतंत्रता के लिए दिए गए लाखों करोड़ों बलिदानों की पीठ में छुरा घोंप कर भारत का विभाजन स्वीकार कर लिया गया.

अतः सावरकर विरोधियों से हमारा निवेदन है कि वीर सावरकर के व्यक्तित्व को साक्षीभाव से समझने का प्रयास करें और भविष्य में उन्हें मिलने वाले ‘भारत रत्न’ सम्मान का समर्थन करके अपने विशाल दृष्टिकोण का परिचय दें. यह ठीक है कि सावरकर की विचारधारा का आधार हिन्दुत्व था और है, परन्तु हिन्दुत्व का अर्थ गैर हिन्दुओं का विरोध नहीं है. हिन्दुत्व भारत की सनातन राष्ट्रीय पहचान है और हम सभी 135 करोड़ भारतवासी इस पहचान के अटूट अंग हैं. हमारी पूजा पद्धतियां भिन्न हो सकती हैं, परन्तु हमारी सनातन, भौगोलिक और राष्ट्रीय पहचान हिन्दुत्व ही है.

नरेंद्र सहगल

October 19th 2019, 7:21 pm

20 अक्तूबर / जन्मदिवस – संघ सुगन्ध के विस्तारक शरद मेहरोत्रा जी

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नई दिल्ली. कन्नौज (उ.प्र.) के प्रसिद्ध इत्र निर्माता व नगर संघचालक श्री हरिहर नाथ एवं श्रीमती सरला के घर में 20 अक्तूबर, 1942 को शरद जी का जन्म हुआ. संघचालक होने के कारण संघ के कार्यकर्ताओं का प्रायः उनके घर आगमन होता था, पर वे अपनी किताबों में डूबे रहते थे. इस कारण कन्नौज में वे संघ से नहीं जुड़ पाये. सेठ वासुदेव सहाय इंटर कॉलेज से इंटर और फिर विक्रमजीत सिंह सनातन धर्म महाविद्यालय, कानपुर से उन्होंने अर्थशास्त्र में एम.ए किया.

कानपुर में 1962 में उनका सम्पर्क फरुखाबाद जिला प्रचारक शिवप्रसाद जी के माध्यम से विभाग प्रचारक अशोक सिंघल जी से हुआ. उस समय रज्जू भैया और भाऊराव देवरस भी कानपुर आते रहते थे. इनके सान्निध्य ने शरद जी के जीवन में संघ की लौ जला दी. इसका परिणाम यह हुआ कि 1964 में 22 वर्ष की अवस्था में एम.ए करते ही वे प्रचारक बन गये. प्रचारक के नाते सर्वप्रथम उन्हें मथुरा भेजा गया. मथुरा की मस्ती उनके स्वभाव के अनुकूल थी, इसलिए वे वहां रम गये. वे अत्यन्त सम्पन्न परिवार के थे, जबकि प्रचारक को सादगी से रहते हुए अपने व्यय का हिसाब प्रति माह व्यवस्था प्रमुख को देना होता है. शाही खर्च के आदि शरद जी को इससे कठिनाई होती थी, पर धीरे-धीरे उन्होंने स्वयं को इस अनुसार ढाल लिया.

वे आगरा, अलीगढ़ और एटा में जिला व विभाग प्रचारक रहे. मथुरा में दीनदयाल जी के पैतृक ग्राम फरह में शरद जी ने उनके जन्मदिवस पर मेला प्रारम्भ कराया. ऐसे कई अभिनव कार्यक्रमों से उन्होंने सैकड़ों नये कार्यकर्ताओं को संघ से जोड़ा. शरद जी बहुत सिद्धांतनिष्ठ व्यक्ति थे. आपातकाल में वे जब जेल में थे, तो उनके परिवारजन जेलर के माध्यम से प्रायः उनसे मिल लेते थे. शरद जी ने इसके लिए उन्हें डांटा. सन् 1977 में जब प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार बनी, तो कल्याण सिंह उसमें स्वास्थ्य मंत्री थे. शरद जी के परिजनों ने उनसे मिलकर और शरद जी का नाम लेकर अपने एक संबंधी का स्थानांतरण रुकवा लिया. इससे भी शरद जी बहुत नाराज हुए.

1981 में वे मध्यभारत में सहप्रांत प्रचारक और 1985 में प्रांत प्रचारक बने. वहां उन्होंने अपने परिश्रम से शाखाओं का भरपूर विस्तार किया. श्री रामजन्मभूमि आंदोलन में पूरे भारत की भांति मध्यभारत प्रांत भी सक्रिय रहा. साहित्य निर्माण, विद्यालयों का विस्तार, धर्म जागरण से लेकर सेवा तक सब कामों में उन्होंने नये आयाम स्थापित किये. उन दिनों म0प्र0 में भाजपा का शासन था. ऐसे में सिद्धांतों पर दृढ़ रहते हुए संगठन और सत्ता में तालमेल बनाये रखने में भी वे सफल हुए.

बचपन से ही शरद जी का जबड़ा कुछ कम खुलता था. उसे सक्रिय रखने के लिए वे प्रायः कुछ चबाते रहते थे, पर यही आगे चलकर मुख कैंसर में बदल गया. मुंबई में टाटा अस्पताल की जांच से जब यह पता लगा, तब तक बात बहुत आगे बढ़ गयी थी. कई तरह के इलाज किये गये, पर रोग बढ़ता गया. उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि चार-छह माह का जीवन बढ़ाने के लिए ऑपरेशन, रेडियेशन या कीमोथेरेपी आदि का प्रयोग वे नहीं करेंगे. धीरे-धीरे उनका मुंह बिल्कुल बंद हो गया और वे लिखकर बात करने लगे. उन्होंने स्वयं को प्रभु चरणों में समर्पित कर दिया और आयुर्वेदिक दवा लेते रहे.

कैंसर में रोगी को अत्यन्त शारीरिक पीड़ा होती है, पर शरद जी ने किसी को इसका अनुभव नहीं होने दिया. जब तक संभव था, वे बीमारी में भी प्रवास करते रहे. इसी प्रकार समय निकलता गया और 30 जनवरी, 1993 को सुंगध नगरी के इस सुगंधित पुष्प ने स्वयं को भारतमाता के चरणों में विसर्जित कर दिया. देहांत से एक घंटे पूर्व उन्होंने श्री माणिक चंद्र वाजपेयी को स्लेट पर लिखकर एक संदेश दिया, जो सब कार्यकर्ताओं के लिए आज भी पाथेय है.

October 19th 2019, 6:39 pm

महाभारत काल काल्पनिक नहीं – सनौली में मिले पुरातात्विक तथ्यों के आधार पर पुष्टि

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ASI को पिछले साल 2018 में बागपत (Baghpat) के सनौली गांव में पहली बार घोड़े से चलने वाले रथ, नौ कंकाल और युद्ध के तलवार मिले थे, जिसे हड़प्पाकालीन सभ्यता से जोड़ा जा रहा था. लेकिन अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) ने दावा किया है कि खुदाई में मिले ये कंकाल और सामान चार हजार साल पुराने हैं. शव को दफनाने और उसके पास रखे युद्ध के सामान इस बात का संकेत हैं कि ये महाभारत काल के हैं.

ASI के डायरेक्टर एवं पुरातात्विक खुदाई जुड़े रहे संजय कुमार मंजुल कहते हैं कि सालभर पहले मैं ये नहीं कह सकता था, लेकिन कई सारे साइंटिफिक निष्कर्षों और जगहों के आधार पर इस बात के संकेत मिलते हैं कि ये महाभारतकालीन साइट है. महाभारत के युद्ध में 25 अलग-अलग जगह से लोग लड़ने आए थे. गांधार जो आजकल कंधार, पानीपत, बरनावा, हस्तिनापुर, इंद्रप्रस्थ, दिल्ली आदि जगहों का उल्लेख कई वेदों में भी मिलता है जो आज भी मौजूद हैं. जो वेदों में शव के दाह संस्कार के उल्लेख हैं और जगह का उल्लेख है वो सनौली की खुदाई में मिली चीजों से मेल खाते हैं. इसी के आधार पर हम कह रहे हैं कि ये महाभारत कालीन थे.

संजय मंजुल कहते हैं कि सनौली में मिले युद्ध रथ की मेसोपोटामिया, ग्रीस और चीन में मिले रथ से तुलना की जाए तो ग्रीक और मेसोपोटामिया में मिले रथ, युद्ध रथ नहीं थे. बल्कि इनका उपयोग सामान ढोने के लिए होता था. लेकिन सनौली में मिला रथ, युद्ध रथ था क्योंकि ये घोड़े से चलने वाला हल्का रथ था. एएसआई ने दावे को पुख्ता करने के लिये कई CT स्कैन और एक्स-रे करवाने का दावा भी किया है.

राखीगढ़ी में मिले नर कंकालों की डीएनए रिपोर्ट से खुलासा हुआ था कि आर्य ग्रीस या मध्य एशिया से नहीं आए, बल्कि भारत के निवासी थे. यहीं से वे मध्य एशिया गए थे. ASI के दावों से पुष्टि होती है कि महाभारत काल्पनिक नहीं है, इसके प्रमाण सनौली में मिले हैं.

October 19th 2019, 9:50 am

भारतीय ज्ञान का खजाना – 16……….हमारा श्रेय, जो हमसे छिन गया…

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हमारा श्रेय, जो हमसे छिन गया…

हाल ही में एक समाचार पत्र में यह समाचार प्रकाशित हुआ था कि विभिन्न प्रकार की खोज और शोध के अनुसार हमारे पृथ्वी की आयु लगभग 4.5 बिलियन वर्ष आंकी गई है… अर्थात् 454 करोड़ वर्ष.

मजे की बात यह है कि हमारे पुराणों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है. अंग्रेजों ने हमारे पुराणों को Mythology नाम दिया है, जो Myth शब्द से तैयार किया गया है. Myth का अर्थ है ‘सत्य प्रतीत होने वाला झूठ’, अर्थात् Mythology का अर्थ अंग्रेजों ने निकाला, ‘जो सच नहीं है, वह…’ इसका दूसरा अर्थ यह है कि जो भी पुराणों में लिखा है, उसे सच नहीं माना जा सकता. पुराण केवल दादा-दादी की, नाना-नानी की भगवान भक्ति के लिए, भजन-कीर्तन के लिए ठीक हो सकता है. परन्तु वास्तव में उसकी कोई कीमत नहीं है. अंग्रेजों के अनुसार पुराणों में वर्णित बातों को प्रमाण नहीं माना जा सकता. उनका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है.

अब विष्णुपुराण के तीसरे अध्याय में स्थित इस श्लोक को देखिये –

‘काष्ठा पञ्चदशाख्याता निमेषा मुनिसत्तम ।

काष्ठात्रिंशत्कला त्रिंशत्कला मौहूर्तिको विधिः ॥ १,३.८ ॥

तावत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्तैर्मानुषं स्मृतम् ।

अहोरात्राणि तावन्ति मासः पक्षद्वयात्मकः ॥ १,३.९ ॥

तैः षड्भिरयनं वर्षं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे ।

अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम् ॥ १,३.१० ॥

दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु कृतत्रेतादिसंज्ञितम् ।

चतुर्युगं द्वादशभिस्तद्विभागं निबोद मे ॥ १,३.११ ॥

चत्वारित्रीणि द्वे चैकं कृतादिषु यथाक्रमम् ।

द्विव्याब्दानां सहस्राणि युगोष्वाहुः पुराविदः ॥ १,३.१२ ॥

तत्प्रमाणैः शतैः संध्या पूर्वा तत्राभिधीयते ।

सन्ध्यांशश्चैव तत्तुल्यो युगस्यानन्तरो हि सः ॥ १,३.१३ ॥

सन्ध्यासंध्यांशयोरन्तर्यः कालो मुनिसत्तम ।

युगाख्यः स तु विज्ञेयः कृतत्रेतादिसंज्ञितः ॥ १,३.१४ ॥

कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्चैव चतुर्युगम् ।

प्रोच्यते तत्सहस्रं व ब्रह्मणां दिवसं मुने ॥ १,३.१५ ॥

महाभारत में भी इस कालगणना का वर्णन किया गया है –

काष्ठा निमेषा दश पञ्च चैव

त्रिंशत्तु काष्ठा गणयेत्कलां ताम्।

त्रिंशत्कलश्चापि भवेन्मुहूर्तो

भागः कलाया दशमश्च यः स्यात्।।

त्रिंशन्मुहूर्तं तु भवेदहश्च

रात्रिश्च सङ्ख्या मुनिभिः प्रणीता।

मासः स्मृतो रात्र्यहनी च त्रिंशु

त्संवत्सरो द्वादशमास उक्तः।।

– महाभारत, (शांतिपर्व), 238वां सर्ग

इसके अनुसार –

15 निमिष (पलक खुलने – झपकने का समय) 1 कष्ट

30 कष्ट – 1 कला

30 कला – 1 मुहूर्त

30 मुहूर्त – 1 दिन/रात्रि

30 दिवस/रात्रि – 1 महीना (मास)

6 महीने – 1 अयन

2 अयन – 1 मानवी वर्ष

360 मानवी वर्ष – 1 दैवी वर्ष

12,000 दैवी वर्ष – 4 युग

43,20,000 मानवी वर्ष – 1 चौकड़ी

72 चौकड़ियां (चतुर्युग) – 31 कोटि 10 लाख 40 हजार वर्ष – 1 मन्वंतर

इस प्रकार जब 14 मन्वंतर हो जाते हैं, तब वह ब्रह्मदेव का एक दिवस होता है.

14 मन्वंतर – 435.45 करोड़ मानवी वर्ष

ब्रह्मदेव का 1 दिवस

ब्रह्मदेव का दिवस/रात्रि 870.91 कोटि मानवी वर्ष (सृष्टि का आरम्भ/अंत)

अभी चौदह में से सातवां वैवस्वत मन्वंतर चल रहा है. इसका अट्ठाईसवां युग ही कलियुग है. अर्थात् 435.45 करोड़ + 28 युग (3 करोड़ 2 लाख वर्ष) = 438.65 करोड़ वर्ष.

दूसरी मजे की बात यह है कि अथर्ववेद में भी सृष्टि की आयु के बारे में एक श्लोक है –

शतं ते युतंहायानान्द्वे युगे त्रीणी चत्वारि || अथर्ववेद ८.२.२१||

इस श्लोक की गणना के अनुसार सृष्टि की आयु है – 432 करोड़ वर्ष

कहने का अर्थ ये है कि अंग्रेजों द्वारा हमारे जिन पुराणों को ‘सत्य लगने वाला झूठ’ कहकर प्रचारित किया गया है, उन पुराणों के अनुसार सृष्टि का निर्माण काल 438.65 करोड़ वर्ष है. और कथित आधुनिकतम विज्ञान द्वारा एकदम सटीक और तमाम प्रयोगों के बाद सृष्टि का उदगम 454 करोड़ वर्ष पहले हुआ है. इसका अर्थ साफ़ है कि हमारे पुराण भी आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रयोगों के बाद घोषित किए गए निरीक्षणों के एकदम पास हैं. कुछ हजार वर्ष पूर्व, जब आज की तरह आधुनिक वैज्ञानिक साधन नहीं थे, तब हमारे पूर्वजों ने पृथ्वी के उद्गम संबंधी यह सटीक गणना एवं आँकड़े कैसे प्राप्त किए होंगे…?

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हमारे स्कूलों में आज भी बच्चों को पढ़ाया जा रहा है कि ‘निकोलस कोपर्निकस’ (१४७३-१५४३) नामक पोलैंड के एक खगोलशास्त्री ने सर्वप्रथम दुनिया को यह बताया कि ‘सूर्य हमारे अंतरिक्ष एवं ग्रह परिवार का केंद्र बिंदु है तथा पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ चक्कर लगाती है..’. हम इतने निकम्मे निकले कि यही जानकारी वर्षों से बच्चों को आगे पढ़ाए जा रहे हैं. इस कोपर्निकस नामक वैज्ञानिक से लगभग ढाई-तीन हजार वर्ष पहले पाराशर ऋषि ने विष्णु पुराण की रचना की हुई है. इस विष्णु पुराण के आठवें अध्याय का पन्द्रहवां श्लोक है –

नैवास्तमनमर्कस्यनोदमः सर्वतासतः ।

उदयास्तमनाख्यन्ही दर्शनादर्शन रवे ।।

अर्थात्, ‘यदि वास्तविकता से कहा जाए तो सूर्य का उदय एवं अस्त होने का अर्थ सूर्य का अस्तित्त्व होना या समाप्त होना नहीं है, क्योंकि सूर्य तो सदैव वहीं पर स्थित है’.

इसी प्रकार एकदम स्पष्टता के साथ सूर्य, पृथ्वी, चन्द्र, ग्रह-गोल-तारे इन सभी के बारे में हमारे पूर्वजों को जानकारी थी. और यह जानकारी सभी को थी. फिर भी किसी के मन में यह भावना नहीं थी कि उसे कोई बहुत ही विशिष्ट जानकारी है.

अर्थात् जिस समय प्रसिद्ध पश्चिमी वैज्ञानिक टोलेमी (Ptolemy AD100 to AD 170) यह सिद्धांत प्रतिपादित कर रहा था कि, ‘पृथ्वी स्थिर होती है और सूर्य उसके चारों तरफ चक्कर लगाता है’, और पश्चिमी जगत इस वैज्ञानिक का समर्थन भी कर रहा था, उस कालखंड में आर्यभट्ट अत्यंत आत्मविश्वास के साथ अपना प्राचीन ज्ञान प्रतिपादित कर रहे थे, जिसके अनुसार –

अनुलोमगतिनरस्थ: पश्यत्यचलं विलोमगं यद्वत्।

अचलानि भानि तदवत्समपश्चिमगानि लङ्कायाम्॥

उदयास्तमयनिमित्तं नित्यं प्रवहेण वायुना क्षिप्त:।

लङ्कासमपश्चिमगो भपञ्जर: सग्रहो भ्रमति॥ – (आर्यभट्टीय ४.९ से ४.१० श्लोक)

इस श्लोक का अर्थ है कि, ‘जिस प्रकार अनुलोम (गति से आगे जाने वाला) एवं नाव में बैठा हुआ मनुष्य, अचल किनारे को विलोम (पीछे जाते हुए) देखता है, उसी प्रकार लंका में अचल यानी स्थिर तारे हमें पश्चिम दिशा में जाते हुए दिखाई देते हैं..’

कितने स्पष्ट शब्दों में समझाया गया है… लंका का सन्दर्भ यह है कि ग्रीनविच रेखा के निर्धारण से पहले भारतीयों के अक्षांश-रेखांश तय किए हुए थे एवं उसमें विषुवत रेखा लंका से होकर गुजरती थी.

आगे चलकर तेरहवीं शताब्दी में संत ज्ञानेश्वर (१२७५-१२९६) ने एकदम सहज स्वरूप में यह लिखा, कि –

अथवा नावे हन जो रिगे । तो थडियेचे रुख जातां देखे वेंगे।

तेची साचोकारें जों पाहों लागे । तंव रुख म्हणे अचल ।।    – श्री ज्ञानेश्वरी ४-९७     तथा…

उदो अस्ताचेनी प्रमाणे, जैसे न चलता सूर्याचे चालण।

तैसे नैष्कर्म्यत्व जाणे, कर्मीचिअसतां ।।    –  श्री ज्ञानेश्वरी ४-९९

यह पंक्तियां आर्यभट्ट द्वारा दिए गए उदाहरणों का सरल प्राकृत भाषा में किया गया अर्थ है. इसी का दूसरा अर्थ यह है कि, मुस्लिम आक्रांताओं के भारत में आने से पहले जो शिक्षा पद्धति हमारे देश में चल रही थी, उस शिक्षा प्रणाली में यह जानकारी अंतर्भूत होती थी. उस कालखंड में खगोलशास्त्र के ‘बेसिक सिद्धांत’ विद्यार्थियों को निश्चित ही पता थे. इसीलिए संत ज्ञानेश्वर भी एकदम सहज भाषा में यह सिद्धांत लिख जाते हैं.

इसका एक और अर्थ यह भी है कि जो ज्ञान हम भारतीयों को इतनी सरलता से, और हजारों वर्षों पहले से था, वही ज्ञान पंद्रहवीं शताब्दी में कोपर्निकस ने दुनिया के सामने रखा. दुनिया ने भी इस कथित शोध को ऐसे स्वीकार कर लिया, मानो ‘कोपर्निकस ने बहुत महत्त्वपूर्ण शोध किया हो’. इसी के साथ भारत में भी कई पीढ़ियों तक, सूर्य-पृथ्वी के सम्बन्ध में यह खोज कोपर्निकस ने ही की, ऐसा पढ़ने लगे, पढ़ाने लगे…!

कितना बड़ा दुर्भाग्य है हमारा..!

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जैसे यह बात सूर्य के स्थिर केन्द्रीय स्थान के बारे में है, वैसे ही सूर्य प्रकाश की गति के बारे में भी मौजूद है. आज हम तीसरी-चौथी के बच्चों को पढ़ाते हैं कि, प्रकाश की गति की खोज, डेनमार्क के खगोलशास्त्री ओले रोमर (Olaus Roemer) ने सन 1676 में, अर्थात् महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी के राज्यारोहण के दो वर्ष बाद की…..कहा जाए तो एकदम हाल ही में. परन्तु वास्तविक स्थिति क्या है…?

यूनेस्को की अधिकृत रिपोर्ट में कहा गया है कि इस संसार का सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद है, जो ईसा से लगभग पांच-छह हजार वर्ष पूर्व लिखा गया था. इस ऋग्वेद के पहले मंडल में, पचासवें सूक्त की चौथे श्लोक में क्या कहा गया है –

तरणीर्विश्वदर्शतो तरणीर्विश्वदर्शतो ज्योतिषकृदसी सूर्य ।

विश्वमा भासि रोचनम ।। ऋग्वेद १.५०.४

अर्थात्, हे सूर्य प्रकाश, तुम गति से भरे हो (तीव्रगामी), तुम सभी को दिखाई देते हो, तुम प्रकाश का स्रोत हो.. तुम सारे संसार को प्रकाशमान करते हो.

आगे चलकर चौदहवीं शताब्दी में, विजयनगर साम्राज्य के सायणाचार्य (१३३५-१३८७) नामक ऋषि ने ऋग्वेद के इस श्लोक की मीमांसा करते हुए लिखा है कि –

तथा च स्मर्यते योजनानां सहस्त्रं द्वे द्वे शते द्वे च

योजने एकेन निमिषार्धेन क्रममान नमोस्तुऽते ।। (सायण ऋग्वेद भाष्य १.५०.४)

अर्थात् – प्रकाश द्वारा तय की गई दूरी 2202 योजन (द्वे द्वे शते द्वे)

1 योजन – 9 मील 110 यार्ड्स

9.0625 मील

अर्थात् प्रकाश की दूरी 9.0625x 2202 = 21,144.705 मील

पृथ्वी तक पहुंचने के लिए लिया गया समय आधा निमिष = 1/8.75 = 0.11428 सेकण्ड

अर्थात् प्रकाश का वेग 185,025.813 मील/सेकण्ड

आधुनिक विज्ञान द्वारा तय किया गया प्रकाश वेग – 186,282.397 मील/सेकण्ड

ध्यान देने योग्य बात यह है कि डेनिश वैज्ञानिक ओले रोमर से पांच हजार वर्ष पहले हमारे ऋग्वेद में सूर्य प्रकाश की गति के बारे में स्पष्ट उल्लेख है. इस सन्दर्भ में कुछ और सूत्र भी होंगे, परन्तु आज वे उपलब्ध नहीं हैं. आज हमारे पास सायणाचार्य द्वारा ऋग्वेद मीमांसा के रूप में लिखित शक्तिशाली सबूत है. यह भी ओले रोमर से तीन सौ वर्ष पहले लिखा गया है. परन्तु फिर भी हम पीढ़ी दर पीढ़ी बच्चों को पढ़ाते आ रहे हैं कि प्रकाश की गति की खोज यूरोपियन वैज्ञानिक ओले रोमर ने की.

ऐसा हम और भी न जाने कितने तथ्यों के बारे में कहते रहेंगे…?

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ग्रहण की संकल्पना बेहद प्राचीन है. चीनी वैज्ञानिकों ने 2600 वर्षों में कुल 900 सूर्यग्रहण और 600 चंद्रगहण होने का दावा किया. परन्तु यह ग्रहण क्यों हुए, इस बारे में कोई नहीं बता पाया. जबकि पांचवीं शताब्दी में आर्यभट्ट ने एकदम स्पष्ट शब्दों में बताया है कि –

छादयती शशी सूर्य शशिनं महती च भूच्छाया ||३७||  – (गोलपाद, आर्यभट्टीय)

अर्थात्, ‘पृथ्वी की छाया जब चंद्रमा को ढंकती है, तब चंद्रगहण होता है.’ आठ हजार वर्ष पूर्व ऋग्वेद में चन्द्र को इंगित करके लिखा जा चुका है कि –

ॐ आयं गौ : पृश्निरक्रमीद सदन्नमातरं पुर: पितरञ्च प्रयन्त्स्व:

ॐ भू: गौतमाय नम: । गौतमायावाहयामि स्थापयामि । ४३

अर्थात् चन्द्र, जो पृथ्वी का उपग्रह है, यह अपने मातृग्रह (अर्थात् पृथ्वी) के चारों ओर घूमता है, और यह मातृग्रह, उसके (यानी पृथ्वी के) प्रकाशमान पितृ ग्रह के चारों तरफ घूमता है.

इससे अधिक स्पष्ट और क्या चाहिए? ध्यान दें कि आज से लगभग आठ हजार वर्ष पहले हमारे पूर्वजों को यह मालूम था कि पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ, तथा चंद्रमा पृथ्वी के चारों तरफ चक्कर लगाता है. इसके हजारों वर्ष के बाद ही, बाकी संसार को, विशेषकर पश्चिमी सभ्यता को यह ज्ञान प्राप्त हुआ.

इसमें महत्त्वपूर्ण बात ये है कि हमारे देश में यह ज्ञान हजारों वर्षों से उपलब्ध था, इसलिए यह बातें हमें पता हैं, फिर भी हमारे ऋषियों/विद्वानों में ऐसा भाव कभी नहीं था कि उनके पास बहुत बड़ा ज्ञान का भण्डार है. इसी कारण संत ज्ञानेश्वर महाराज अथवा गोस्वामी तुलसीदास जैसे विद्वान ऐसी महत्त्वपूर्ण जानकारी बेहद सरल शब्दों में लिख जाते हैं…!

October 19th 2019, 9:19 am

स्वयंसेवक देशभर में डेढ़ लाख से अधिक सेवा प्रकल्प चला रहे – भय्याजी जोशी

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भुवनेश्वर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक देशभर में 1.50 लाख से अधिक सेवा कार्य चला रहे हैं. 20 स्थानों पर सेवार्थ बड़े अस्पताल एवं 15 ब्लड बैंक भी चलाते हैं. भुवनेश्वर में चल रही संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक के अंतिम दिन आयोजित पत्रकार सम्मेलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ने कहा कि आपदा के समय तो संघ पहले से ही काम कर रहा था, परंतु 1989 से संघ ने योजनाबद्ध रूप से सेवा क्षेत्र में कार्य करना शुरू किया. वर्तमान में स्वयंसेवकों द्वारा डेढ़ लाख से अधिक सेवा प्रकल्प चलाए जा रहे हैं . उन्होंने कहा कि 20 स्थानों पर संघ के स्वयंसेवक सेवार्थ बड़े अस्पताल चलाते हैं, उनकी क्षमता 50 से 150 बेड तक है. 15 ब्लड बैंक संघ के स्वयंसेवक चलाते हैं, जो उस क्षेत्र की 50 प्रतिशत तक की आवश्यकता को पूरा करते हैं . उन्होंने कहा कि दिव्यांगों के क्षेत्र में भी स्वयंसेवक कार्य कर रहे हैं. नेत्रदान के क्षेत्र में स्वयंसेवकों के प्रयास से 3 से 4 हजार नेत्रदान प्रतिवर्ष होते हैं. ग्राम विकास के क्षेत्र में भी संघ के स्वयंसेवक कार्य कर रहे हैं . इन प्रयासों से अभी तक देश के 250 गांवों में ग्रामवासियों के सहयोग से ही विकास का मॉडल स्थापित किया है. उन्होंने कहा कि हमारी ग्राम विकास की परिकल्पना में हम मानते हैं कि गांव के लोग ही अपना कार्य करें. हम केवल सहयोग करेंगे. संघ के स्वयंसेवकों ने पांच क्षेत्रों जैसे  शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सामाजिक वातावरण, स्वावलंबन को ग्राम विकास में शामिल किया है. उन्होंने कहा कि पूरे देश में एक लाख से अधिक गांव ऐसे हैं, जहां संघ के विचारों को स्वीकार करने वाले, समझने वाले व सहयोग करने वाले लोग हैं. प्रतिदिन शाखा में आने वाले 16 -17 साल की आयु से ऊपर के लोगों के शामिल होने वाले स्वयंसेवकों की संख्या लगभग 5 लाख है तथा 17 वर्ष से कम आयु के भी चार लाख दैनिक आते हैं. उन्होंने कहा कि देश में लगभग 59 हजार ग्रामीण मंडलों में से लगभग 30 हजार मंडलों में संघ का काम है. पत्रकारों द्वारा एनआरसी के मामले में पूछे गये सवालों के उत्तर में भय्याजी जोशी ने कहा कि एनआरसी पूरे देश में लागू होना चाहिए. उन्होंने कहा कि किसी भी सरकार का कार्य है कि देश में घुसपैठियों की पहचान करे और नीति बना कर उसके आधार पर उचित कार्रवाई करे. अभी तक यह प्रयोग केवल असम में हुआ है. इसे पूरे देश में लागू करना चाहिए. अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को लेकर पूछे गये सवाल के उत्तर में उन्होंने कहा कि हमारा यह मानना रहा है कि अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण को लेकर सभी बाधाओं को समाप्त किया जाना चाहिए. अब जब इस मामले को लेकर न्यायालय में सुनवाई पूरी हो चुकी है और हम आशा करते हैं कि निर्णय हिन्दुओं के पक्ष में आएगा. न्यायालय से बाहर इस मामले को सुलझाने के संबंध में किये जा रहे प्रयासों के संबंध में पूछे गये सवाल के उत्तर में उन्होंने कहा कि इस मामले  को सद्भावना से समाधान निकालने के लिए प्रयास किये गए. अगर ऐसा होता तो भारत की प्रतिष्ठा विश्व में बढ़ी होती. हम ने भी इन प्रयासों का स्वागत किया था. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया और न्यायालय में मामला लंबा समय तक चला. अब न्यायालयीन कार्रवाई पूरी हो गई है, अब सबको निर्णय की प्रतीक्षा करनी चाहिए. समान आचार संहिता लागू करने के संबध में पूछे गये एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि यह मांग काफी पुरानी है. संविधान निर्माण के समय ही इसका फैसला हो जाना चाहिए था. यह सभी के हित में है और किसी भी देश में उसके नागरिकों के लिए एक समान कानून होना चाहिए. कश्मीरी पंडितों की वापसी के संबंध में उन्होंने कहा कि सुरक्षा कारणों से कश्मीरी पंडितों को अपने घरों से पलायन करना पड़ा था. हम चाहते हैं कि कश्मीर में सुरक्षा का पुन: वातावरण बने ताकि कश्मीरी हिन्दू समाज की उनके अपने घरों में वापसी हो सके. अखंड भारत के संबंध में पत्रकारों द्वारा पूछे गये सवाल का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा अंखड भारत की कल्पना उनका सपना है. विभाजित भारत के समस्त इलाकों की सांस्कृतिक धारा एक ही है. बंगाल में निरंतर हो रही हिंसा पर उन्होंने कहा कि किसी भी सरकार का दायित्व है कि उसके नागरिकों की समुचित सुरक्षा सुनिश्चित करे. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वामपंथी शासनकाल में विरोधी विचारधारा के प्रति प्रारम्भ हिंसा का चक्र वर्तमान सरकार के बाद भी अबाध गति से चल रहा है. इस पत्रकार वार्ता में संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार व सह प्रचार प्रमुख नरेन्द्र ठाकुर उपस्थित थे.

October 18th 2019, 6:56 am

कर्मयोगी सोहन सिंह जी का राष्ट्र को सम्पूर्ण समर्पण

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एक ऐसी पद्धति जिस पर चलकर असंख्य कर्म योगियों ने अपने जीवन को खपा दिया व इस राष्ट्र मंदिर को महकाया. उन्हीं पूजनीय डॉक्टर हेडगेवार की माला के मोती उस पथ के पथिक स्वर्गीय श्री सोहन सिंह जी थे. जिन्होंने दधिची की तरह अपने जीवन को गला दिया. जीवन का हर क्षण, हर पल राष्ट्र को समर्पित कर दिया.

उनका चयन भारतीय वायुसेना में हो गया था, किन्तु देश सेवा के निमित्त उन्होंने नौकरी को ठुकरा दिया था.

राष्ट्रीय आपातकाल के समय सोहन जी उत्तर क्षेत्र के क्षेत्र प्रचारक थे. उन्होंने एक लाख स्वयंसेवकों को परिवारों में ठहराने की व्यवस्था पहले से ही बना रखी थी. यह पूरी योजना वह एक महीने पहले ही बना चुके थे, ऐसा दूरदर्शी नेतृत्व उनका था.

वे देश की स्वतंत्रता से पूर्व प्रचारक निकले थे. वे व्यक्ति निर्माण कला के मर्मज्ञ थे. सैकड़ों कार्यकर्ताओं को उन्होंने गढ़ा. कार्यकर्ताओं की खूब संभाल करते थे. वे कर्तव्य कठोर थे, अत्यंत परिश्रम करते थे. एक वर्ग में वर्ग व्यवस्था में उन्होंने रात के वक्त स्वयं घड़ों में पानी भरा.

जम्मू कश्मीर की चिंता उनको सदैव रहती थी. उनकी योजना होती थी कि जो भी प्रचारक जम्मू जाता था, वे उनसे भेंट करते व वहां की परिस्थीति और चुनौतियों को लेकर चर्चा करते थे.

अंतिम दिनों में भी उन्होंने किसी सहयोगी को सेवा के लिए नहीं लिया. अस्वस्थता के बारे में किसी से कुछ नहीं बोलते थे. अंतिम दिनों में भी स्वयं ही अपने कपड़े धोए. ऐसे श्रेष्ठ कार्यकर्ता का जीवन हमें असाधारण परिस्थितियों में काम करने की प्रेरणा देता है.

 

October 18th 2019, 4:08 am

नक्सलियों की कैद से छूटे युवकों की कहानी – 44 घंटे बाद चेतावनी देकर छोड़ा था

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छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्र में हाल ही में एक ऐसी घटना हुई, जिसके बाद बुनियादी सुविधाओं को पूरा करने में लगे कर्मचारी खौफ में हैं. दंतेवाड़ा जिले के पालनार-मुलेर सड़क के सर्वे के लिए गए दो कर्मचारी और एक ठेकेदार को नक्सलियों ने अगवा कर लिया था. उन्हें 44 घंटे अपनी मांद में रखने के पश्चात नक्सलियों ने छोड़ा. नक्सलियों ने भविष्य में विकास कार्य नहीं करने की चेतावनी देते हुए तीनों को अपने कब्जे से रिहा किया. नक्सलियों ने पीएमजीएसवाई के सब इंजीनियर अरुण मरावी, मनरेगा के तकनीकी सहायक मोहन बघेल और पेटी ठेकेदार मिंटू राय को अगवा कर लिया था, इसके बाद से ही नक्सली लगातार अपनी लोकेशन बदल रहे थे.

इंजीनियर, तकनीकी सहायक और ठेकेदार एक गाड़ी में ककाड़ी गांव पहुँचे थे. तीनों अरनपुर कैम्प से गाड़ी में निकले थे. गाड़ी खड़ी करने बाद सड़क के सर्वे के लिए सरपंच से बात करने को उसके घर पहुंचे. सरपंच घर पर मौजूद नहीं थे, इस कारण तीनों उनके घर पर इन्तजार करने लगे. इसी बीच दो लोग उनके पास आए और पूछताछ करने लगे. उन लोगों ने हथियार, मोबाइल और गाड़ी की चाबी भी ले ली. शाम होते ही ये लोग तीनों को अपने साथ जंगल में ले गए.

अगवा हुए तीनों युवकों के अनुसार उन्हें गांव से करीब 10 किमी दूर जंगल में ले गए थे. और रात होते ही एक जगह कैम्प लगाकर रखा. वहीं खाना बनाया और उन्हें भी खिलाया. सभी नक्सली किसी का इंतज़ार कर रहे थे. खाना खाने के बाद सभी जल्दी जल्दी लोकेशन बदल रहे थे. फिर एक गहरी अंधेरी जगह में रुक कर कुछ देर इंतज़ार किया और सोने की तैयारी करने लगे. उन्हें चादर और अन्य चीजें दी गई.

इंजीनियर ने बताया कि अगले दिन भी उन्हें पूरे दिन जंगल में ही रखा गया. पूरे दिन में 5-6 बार लोकेशन बदली गई. सुबह नाश्ता और दोपहर और रात में खाना दिया. दूसरी रात में कुछ लोग वहां आए, शायद ये वही लोग थे जिनका सभी इंतज़ार कर रहे थे. अगले दिन तीनों युवकों को एक क्षेत्र में ले जाकर छोड़ दिया. नक्सलियों ने चेतावनी दी कि अगली बार यहां सड़क के काम से मत आना, अन्यथा श्यामगिरी की घटना जैसा अंजाम होगा.

तीनों अगवा युवकों की एक ही गलती थी कि क्षेत्र के पिछड़े और जनजाति समाज की सुगमता के लिए सड़क व्यवस्था करना चाहते थे. लेकिन नक्सलियों/माओवादियों को विकास पसंद नहीं है. नक्सली अपने क्षेत्र में विकास में बाधा डालते आए हैं.

 

October 17th 2019, 7:25 am

हिन्दू धर्म नहीं संस्कृति है और भारत का प्रत्येक निवासी हिन्दू है – डॉ. मोहन भागवत

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ओडिशा. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने भारत को परिभाषित करते हुए कहा कि भारत पश्चिमी अवधारणा वाला देश नहीं है. यह सनातन काल से एक सांस्कृतिक देश रहा है. अतः भारत को देखने का पश्चिमी नजरिया गलत है. वास्तव में भारत ऐसा देश है, जिसने विश्व को मानवता का पाठ पढ़ाया है. हमारी सभ्यता में अनेक सभ्यताओं को समाहित करने की शक्ति है. तभी भारत अनेक भाषा, वेशभूषा, धर्म, पंथ को मानने वाला देश बन सकने में समर्थ हुआ है. जब हम हिन्दुत्व की बात करते हैं तो केवल एक संम्प्रदाय की बात नहीं करते, हमारे लिए इस देश का प्रत्येक नागरिक हिन्दू है. यह केवल एक पंथ विशेष नहीं है, हिन्दुत्व एक जीवन शैली है, संस्कृति है, जीवन जीने का तरीका है. मगर कुछ लोग अपने निहित स्वार्थ के कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गलत तरह से प्रस्तुत करते हैं. वास्तव में भारत में सांस्कृतिक विविधता वैदिक काल से चली आ रही है. हम आरंभ से मानते आ रहे हैं कि विभिन्न पंथ, विभिन्न सम्प्रदाय, द्वारा अपनी-अपनी उपासना पद्धति को अपनाते हुए सभी का मान-सम्मान करने की हमारी संस्कृति ही हमारी पहचान है. सरसंघचालक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्व उड़ीसा प्रांत द्वारा आयोजित विशिष्ट नागरिक सम्मेलन (12 अक्तूबर) में संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि हम जब भारत के विकास की बात करते हैं तो उसमें यहां रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के विकास की बात करते हैं. उसमें पंथ-सम्प्रदाय को लेकर हमारे मन में कोई भेदभाव नहीं है. संसार में यही एकमात्र ऐसा देश है, जो विभिन्न संस्कृतियों को समाहित कर सदैव से अपनी पहचान बनाए रखने में समर्थ रहा है. डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि भारत में रहने वाले अन्य धर्मावलंबी यानि मुसलमान, ईसाई लोग भी स्वयं को भारतीय कहने में गर्व करते रहे हैं. लेकिन 1940 के पश्चात राजनैतिक स्वार्थ के कारण कुछ लोगों का नजरिया बदला है. पर, हमें पूर्ण विश्वास है कि यह बदलाव सामयिक है. वास्तव में भारत में रहने वाला हर नागरिक स्वयं को इसी देश से जोड़कर देखता है और इस पर गर्व भी करता है. उन्होंने कहा कि भारत राष्ट्र का निर्माण स्वयं, मूल्य आधारित जीवन, धर्म और संस्कार के धरातल पर हुआ है. तभी यह अपनी अलग पहचान बनाए रखने में समर्थ रहा है. हम अपनी मातृभूमि भारत को परम वैभवशाली राष्ट्र बनते देखना चाहते हैं. सरसंघचालक ने कहा कि संघ को लेकर लोगों में भ्रांतियां फैलाई जाती हैं. संघ को बदनाम किया जाता है. जबकि वास्तविकता का संघ की शाखा में आने पर ही पता चलता है. संघ को समझने के लिये ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिससे लोगों की भ्रांतियां दूर हो सकें. हमारा आग्रह है कि आप संघ को नजदीक से जानने के लिए संघ से जुड़ें, संघ को निकट से देखें, अनुभव करें, तब जाकर आपको समझ में आएगा कि संघ क्या करता है. हमारा तो मानना है कि संघ जैसा संगठन और नहीं है. लेकिन, यदि संसार में ऐसे भाव लेकर राष्ट्र को समर्पित कोई संगठन चल रहा है तो हमें प्रसन्नता होगी.

October 17th 2019, 6:55 am

जम्मू कश्मीर समस्या – दिल्ली की स्पष्ट नीति ने किया समाधान

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दिल्ली की ही भ्रामक नीति के कारण विकराल हुई थी समस्या

जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल जगमोहन ने अप्रैल-मई 1989 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी को राज्य की तेजी से बिगड़ती स्थिति से अवगत करवाया था. उनका कहना था कि यह लगभग वहां पहुंच गई है, जहां से लौटना असंभव है. उन दिनों बड़े पैमाने पर हिंसा, लूटपाट, गोलीबारी, हड़ताल और हत्याओं का तांता सा लग गया था. पूर्व राज्यपाल का अनुभव ऐसा था, जैसे सब कुछ टूटकर बिखर रहा है. इसके बावजूद भी दिल्ली में बैठे सत्ताधारी नेताओं के पास संकेत समझने की शक्ति और दूरदृष्टि दोनों नहीं थी. नतीजतन जम्मू-कश्मीर, जिसका इतिहास भारतीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों से सम्बंधित था, वह कट्टरता, तानाशाही, आतंकवाद और अलगाव से जबरन भर दिया गया.

इस त्रासदी की जिम्मेदार राज्य की छल-कपट से भरी और भ्रांतियों से फैली राजनीति है. इसके शिकार श्रीनगर के नेता ही नहीं, बल्कि दिल्ली में भी बैठे लोग थे. जगमोहन इस समस्या के समाधान पर लिखते हैं कि भारतीय नेताओं को हवाई बातें छोड़कर वास्तविकता पर ध्यान देना चाहिए. साथ ही पुराने विचारों के चक्र से निकलकर नए ध्येय पर ध्यान देना होगा. इसके अलावा घुटने–टेक नीति के दुष्परिणाम समझ कर दो राष्ट्रों के सिद्धांत से चिपके रहने की आदत को भी मिटाना पड़ेगा. हालांकि, यह कुछ साधारण बातें समझने में हमें 17 लोकसभाओं का इंतजार करना पड़ गया. समय इतना निकल गया था कि सबकुछ ठीक करने के लिए दृढ़ और प्रभावी कदम उठाने आवश्यक थे.

हम सभी जानते हैं कि अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी हो गया है. कश्मीर घाटी अपने सामान्य जन-जीवन की ओर वापस लौट रही है. आज प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सहित केंद्रीय मंत्रिमंडल का राज्य के प्रति रवैया मजबूत है. नजरिए में ढुलमुल नहीं, बल्कि स्थिरता है. केंद्र सरकार के लक्ष्य स्पष्ट और राज्यपाल का दृष्टिकोण भी सकारात्मक है. पिछले दिनों की सामान्य खबरों को ध्यान में रखकर कहा जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का भविष्य सुरक्षित हाथों में है.

एक पुरानी कहावत है कि अधजल गगरी छलकत जाए यानि अधूरा ज्ञान जिसे होता है, वह विद्वान होने का ज्यादा दिखावा करता है. मुझे यहां किसी का नाम लेने कि जरूरत नहीं जो ऐसा पिछले दो महीनों से कर रहे हैं. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से सोशल मीडिया और न्यूयॉर्क के प्रतिष्ठित अखबारों के माध्यम से झूठ फैलाया जा रहा है. उनको यह पता है अथवा नहीं, लेकिन एक जमाने में कश्मीर घाटी में राजनैतिक फायदे के लिए नागरिकों को बरगलाया जाता था और ऐसा हर दिन होता था.

इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझा जा सकता है. पाकिस्तान के तानाशाह जनरल जिया उल हक की मौत पर कश्मीर घाटी में व्यापक हिंसा हुई थी. शिया और सुन्नी समुदाय दोनों एक-दूसरे पर हमले कर रहे थे. घाटी की मस्जिदों में जनरल जिया के लिए दुआएं मांगी जाती और बाहर आकर भीड़ हिंसात्मक घटनाओं को अंजाम देती. इस अशांति के सन्दर्भ में कई सवाल उठाए जा सकते हैं. पाकिस्तान के तानाशाह की मौत श्रीनगर, बारामूला और अन्य हिस्सों में हिंसा का अवसर कैसे बन गई, जबकि पाकिस्तान में कोई दंगा-फसाद नहीं हुआ. अब सोचने वाली बात है कि कुछ साल पहले जुल्फिकार अली भुट्टो की राजनैतिक हत्या पर इसी कश्मीर घाटी में जनरल जिया के खिलाफ प्रदर्शन हुए थे.

यह तो पक्का है कि कश्मीर घाटी के नेताओं का कोई राजनैतिक विचार नहीं है. उन्होंने सामान्य नागरिकों को सच्चाई के करीब जाने नहीं दिया. पहले भारत विरोधी नारे लगवाए और फिर पाकिस्तान के लिए प्रोत्साहित किया गया. श्रीनगर का पूरा समय काला दिवस, दमन दिवस, शहीद दिवस और किसी हड़ताल में बीत रहा था. यह कौन लोग थे जो ऐसा करते थे, उसका भी एक जिक्र साल 1988 में मिलता है.

उस साल श्रीनगर उच्च न्यायलय में महात्मा गांधी की प्रतिमा स्थापित की जानी थी और भारत के मुख्य न्यायाधीश आर.एस. पाठक को मूर्ति का लोकार्पण करना था. लेकिन कुछ मुसलमान अधिवक्ताओं की आपत्ति से मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने समारोह स्थगित कर दिया. इस आन्दोलन की अगुवाई उच्च न्यायालय का एक वकील मोहमम्द शफी बट्ट कर रहा था. बाद में वह श्रीनगर से नेशनल कांफ्रेंस का लोकसभा प्रत्याशी भी बना.

ऐसे नेता कश्मीर के अतीत में मौजूद थे. इस नेशनल कांफ्रेंस के सबसे बड़े नेता शेख अब्दुल्ला थे. साल 1953 में उन्हें गिरफ्तार किया गया तो कांग्रेस ने वहां अपना वजूद बना लिया. इस पर शेख ने फतवा जारी कर कांग्रेस को काफिर और नास्तिक घोषित किया. उन्होंने यहां तक कह दिया कि कांग्रेस के किसी मुसलमान सदस्य की मौत पर उसके जनाजे में शामिल होना पाप है. वे कांग्रेस के लोगों को गाली देते और राज्य की जमीन में दफ़नाने के योग्य तक नहीं समझते थे. यह राज्य की राजनीति के सबसे दुर्भाग्यपूर्ण चेहरों में से एक था. फिर भी कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेस एक-दूसरे को बिना शर्त समर्थन देते रहे और उनके विचारों में समानता किसी से छुपी नहीं है. यही वह छल-कपट और भ्रम की राजनीति थी, जिसकी चर्चा मैंने ऊपर की है.

सत्ता में बने रहने की भूख ने कश्मीर घाटी को असामान्य हालातों में पहुंचा दिया था. यह लोग अपने आपको ही धोखा देते रहे. उम्मीद है कि निकट भविष्य में यह सब एकदम खत्म हो जाएगा. जम्मू-कश्मीर को अब कानूनी तकनीक के माध्यम से न्याय मिल चुका है. पहले जब यह राज्य धार्मिक रंग से नहीं, बल्कि प्राकृतिक खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध था – यह अधिकार भी इसे वापस मिल जाएगा. एक आखिरी खास बात यह भी है कि कश्मीर घाटी की संकीर्ण स्थानीय राजनीति का वर्चस्व अब पहले जैसा नहीं रहने वाला है.

देवेश खंडेलवाल

October 17th 2019, 4:07 am

जब महात्मा गांधी ने श्रीराम मंदिर में सीता-राम की प्रतिमा के दर्शन किये थे

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जब महात्मा गांधी ने अयोध्या में श्रीराम मंदिर में सीता-राम की मूर्ति के दर्शन किये थे…..

महात्मा गांधी अयोध्या गए थे. गांधी जी की अयोध्या यात्रा का विवरण “गांधी वाङ्गमय” खंड 19 पृष्ठ 461 पर दिया गया है जो “नवजीवन अखबार” में  मार्च 1921 में प्रकाशित हुआ था. महात्मा गांधी ने इस यात्रा का विवरण इस प्रकार बताया – “अयोध्या में जहां भगवान रामचंद्र का जन्म हुआ कहा जाता है, उसी स्थान पर एक छोटा सा मंदिर है. जब मैं अयोध्या पहुंचा तो वहां मुझे ले जाया गया. साथी श्रद्धालुओं ने मुझे सुझाव दिया कि मैं पुजारी से विनती करूं कि वह भगवान सीता-राम की मूर्तियों के लिए पवित्र खादी का उपयोग करें, मैंने विनती तो की लेकिन उस पर अमल शायद ही हुआ हो. जब मैं दर्शन करने गया, तब मैंने मूर्तियों को मैली मलमल और जरी के वस्त्रों में पाया, यदि मुझ में तुलसीदास जी जितनी गाढ़ भक्ति की सामर्थ्य होती तो मैं भी उस समय तुलसीदास जी की तरह हठ पकड़ लेता. कृष्ण मंदिर में तुलसीदास जी ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक धनुष बाण लेकर कृष्ण राम रूप में प्रकट नहीं होते, तब तक तुलसी मस्तक नहीं झुकेगा. लेखकों का कहना है कि जब गोस्वामी ने ऐसी प्रतिज्ञा की, तब चारों और उनकी आंखों के सामने भगवान रामचंद्र की मूर्तियां खड़ी हो गई और तुलसीदास जी का मस्तक सहज ही नत हो गया. मंदिर में भगवान सीता-राम के दर्शन के समय अनेक बार मेरा ऐसा हठ करने का मन हुआ कि हमारे भगवान राम को जब पुजारी खादी पहनाकर स्वदेशी बनाएंगे, तभी हम अपना माथा झुकाएंगे. लेकिन मुझे पहले तुलसीदास जी जितना तप करना होगा, तुलसीदास जी की अभूतपूर्व भक्ति को प्राप्त करना होगा.

“गांधी वाङ्गमय” में महात्मा गांधी के जीवन के विभिन्न काल खंडों की विभिन्न स्मृतियों का विवरण संकलित है. इनका संकलन नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद गुजरात द्वारा किया गया है. इसके खंड 19 में नवंबर 1920 से लेकर अप्रैल 1921 के विवरण दर्ज हैं, वर्ष 1966 में इस खंड का प्रकाशन विभाग सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार द्वारा प्रकाशित किया गया है.

October 16th 2019, 9:08 pm

अयोध्या राम मंदिर मामला – सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी, 23 दिन में आ सकता है फैसला

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अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज 40वें दिन पूरी हो गई. कोर्ट ने निर्णय सुरक्षित रख लिया है तथा संभावना है कि अगले 23 दिनों में कोर्ट का निर्णय आ जाएगा. अंतिम दिन सुनवाई के दौरान हिन्दू महासभा द्वारा रखे एक दस्तावेज को लेकर मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन उग्र हो गए तथा उन्होंने दस्तावेज फाड़ दिया. इस पर दोनों पक्षों की नोकझोंक भी हुई.

सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ पिछले 39 दिनों से अयोध्या मामले की प्रतिदिन सुनवाई कर रही थी. कोर्ट ने सभी पक्षों को पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि 16 अक्तूबर को सुनवाई का अंतिम दिन होगा, तथा बुधवार सुबह भी कोर्ट ने साफ कर दिया था कि 5 बजे तक ही सुनवाई होगी. इससे आगे समय नहीं मिलेगा, सुनवाई तय समय से एक घंटे पहले 4 बजे ही समाप्त हो गई. 40 दिन की लंबी सुनवाई के पश्चात कोर्ट ने निर्णय सुरक्षित रख लिया है. हालांकि कोर्ट ने सभी पक्षों को मोल्डिंग ऑफ फाइनल रिलीफ लिखित में देने के लिए 3 दिन का समय दिया है.

अयोध्या मामले की सुनवाई के लिए गठित संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायाधीश एसए बोबड़े, न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायाधीश अशोक भूषण, न्यायाधीश अब्दुल नजीर शामिल थे. पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता के पारासरन, सीएस वैद्यनाथन (भगवान राम लला पक्ष), एसके जैन (निर्मोही अखाड़ा), राजीव धवन, मीनाक्षी अरोड़ा व शेखर नफाड़े (सुन्नी वक्फ बोर्ड, मुस्लिम पक्ष) व अन्य अधिवक्ताओं का पक्ष सुना. मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई 17 नवंबर को सेवानिवृत्त होने वाले हैं, माना जा रहा है कि उससे पहले अयोध्या मामले में फैसला आ सकता है.

अयोध्या मामले में अंतिम दिन (16 अक्तूबर) को सुनवाई के दौरान हिन्दू महासभा ने कुछ दस्तावेज कोर्ट में रखे थे, इसमें अयोध्या का पुराना नक्शा भी था. इसके अनुसार विवादित स्थल पर प्रारंभ से ही राम मंदिर स्थित था. इस पर मुस्लिम पक्षकार राजीव धवन उग्र हो गए तथा उन्होंने नक्शा फाड़ दिया. इस दौरान हिन्दू महासभा के अधिवक्ता के साथ उनकी नोकझोंक भी हुई. इस पर मुख्य न्यायाधीश ने भी नाराजगी जताई.

उधर, दूसरी ओर उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले में निर्णय आने की संभावना को देखते हुए तैयारी शुरू कर दी है. अयोध्या में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती कर दी गई है. संपूर्ण क्षेत्र में 13 अक्तूबर से 10 दिसंबर तक धारा 144 लागू कर दी है.

October 16th 2019, 9:43 am

अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण का मुद्दा राजनैतिक नहीं, देश की आस्था का विषय है – डॉ. मनमोहन वैद्

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देश में संघ कार्य का निरंतर विस्तार हो रहा है पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय विचारों के लोगों की हत्या दुर्भाग्यपूर्ण भुवनेश्वर (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य जी ने कहा कि संघ के स्वयंसेवकों के कठोर परिश्रम एवं सतत प्रयास और समाज की अनुकूलता के कारण संघ कार्य का लगातार विस्तार हो रहा है. विशेष कर युवा व छात्र संघ से जुड रहे हैं. स्थानीय शिक्षा व अनुसंधान विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यकारी मंडल बैठक के शुभारंभ के बाद पत्रकारों से बातचीत में सह सरकार्यवाह ने जानकारी दी. एक प्रश्न के उत्तर में डॉ. वैद्य ने कहा कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण का मुद्दा राजनैतिक मुद्दा नहीं है. यह देश की आस्था का विषय है. इसी तरह कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाये जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि संविधान में इस धारा का उल्लेख अस्थायी प्रावधान के रुप में था. उन्होंने एक और प्रश्न के उत्तर में कहा कि पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय विचारों के लोगों की हत्या हो रही है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है. उन्होंने कहा कि संघ का मानना है कि सरकार सब कुछ नहीं करेगी. समाज को स्वयं आगे आकर अपना कार्य करना होगा. इसी भावना को लेकर संघ के स्वयंसेवक समाज परिवर्तन के कार्य में सक्रिय हैं. 1998 से प्रारंभ ग्राम विकास का परिणाम अनेक गांवों में देखने को मिल रहा है. उन्होंने कहा कि समाज में जाति पाति के बंधन को मिटाने तथा पूरा समाज एक है, ऐसी भावना समाज में जागृत करने एवं सामाजिक समरसता पैदा करने के लिए संघ स्वयंसेवक कार्य कर रहे हैं. भारतीय नस्लों की गायों के संवर्धन के लिए भी संघ के स्वयंसेवक कार्य कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि समाज में एकल परिवार का प्रचलन बढ़ने के कारण परिवारों में मूल्यों का क्षरण हो रहा है. इस कारण संघ के स्वयंसेवकों द्वारा कुटुंब प्रबोधन का कार्य किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि पर्यावरण की रक्षा के लिए संघ के स्वयंसेवक तीन पी (P) यानी पौधे लगाने, पानी का कम उपयोग तथा प्लास्टिक का उपयोग न करने को लेकर जागरूकता लाने के कार्य में लगे हैं. डॉ. वैद्य ने बताया कि वर्तमान में पूरे देश में 57, 411 दैनिक शाखाएं एवं 18923 साप्ताहिक मिलन चल रहे हैं. वर्ष 2009 में संघ कार्य का विस्तार करने की योजना बनायी गई थी. इस कारण 2010 से ही शाखाओं का लगातार विस्तार हो रहा है. 2010 के बाद शाखाओं की संख्या में कुल 19 हजार 584 की बढ़ोतरी हुई है. 2010 से 2014 तक लगभग 6 हजार शाखाओं की बढ़ोतरी हुई. उन्होंने कहा कि देश भर के 6000 प्रखंडों में यानि 90 प्रतिशत प्रखंडों में संघ का काम है. उन्होंने बताया कि देश भर में चलने वाली शाखाओं में से छात्र व युवाओं की शाखाओं की संख्या 60 प्रतिशत है, 20 से 40 साल के आयु वर्ग के बीच स्वयंसेवकों की शाखाओं का प्रतिशत 29 प्रतिशत है. 40 साल की आयु से अधिक प्रौढ़ लोगों की शाखाओं की संख्या 11 प्रतिशत है. सह सरकार्यवाह ने बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 2013 में वेबसाइट के जरिये ज्वाइन आरएसएस के नाम से एक योजना शुरु की थी. इसमें काफी संख्या में लोग जुड़ने के लिए अनुरोध कर रहे हैं. इसमें युवाओं व छात्रों की संख्या सर्वाधिक है. वर्ष 2013 में ही इसके जरिये संघ से जुड़ने के लिए 88,843 अनुरोध प्राप्त हुए थे. 2014 से लेकर 2016 तक औसतन 90 से 95 हजार लोगों ने, 2017 में 1.25 लाख, 2018 में 1.5 लाख एवं 2019 में सितंबर माह तक 1.3 लाख अनुरोध संघ से जुड़ने के लिए प्राप्त हुए हैं. उन्होंने कहा कि संघ के कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण पर भी जोर दिया जा रहा है. इसी क्रम में कार्यकर्ता विकास वर्ग आयोजित किये जा रहे हैं. इन वर्गों में प्रशिक्षण को कैसे बेहतर किया जा सकता है तथा इसमें कैसे वेल्यू एडिशन किया जा सकता है, इस संबंध में भी बैठक में चर्चा होगी. उन्होंने कहा कि अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में देश के समस्त प्रांतों से प्रांत स्तरीय अधिकारी शामिल हो रहे हैं. तीन दिनों तक चलने वाली बैठक में लगभग 350 प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं. सवांददाता सम्मेलन में संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार व सह प्रचार प्रमुख नरेन्द्र  ठाकुर भी उपस्थित थे. इससे पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक भुवनेश्वर में प्रारंभ हुई. बैठक का शुभारंभ सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी तथा  सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया. तीन दिवसीय बैठक 16 अक्तूबर से 18 अक्तूबर 2019 तक चलेगी.   https://www.youtube.com/watch?v=qpO5DHZHaD8

October 16th 2019, 4:53 am

कोरेगांव हिंसा – बॉम्बे हाई कोर्ट से सुधा भारद्वाज, वर्नोन गोंजाल्विस और अरुण फरेरा की जमानत याचिका

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बॉम्बे हाई कोर्ट ने तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं सुधा भारद्वाज, वर्नोन गोंजाल्विस और अरुण फरेरा को जमानत देने से इंकार कर दिया. इन पर कोरेगांव हिंसा की साजिश रचने तथा माओवादी संगठनों से संबंध रखने के आरोप हैं. हाई कोर्ट ने आज तीनों की जमानत याचिका खारिज कर दी. याचिका पर लगभग एक माह तक सुनवाई चली. जस्टिस सारंग कोतवाल की एकल पीठ 27 अक्तूबर से याचिका पर सुनवाई कर रही थी.

बॉम्बे हाई कोर्ट ने 7 अक्तूबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था, कोर्ट ने आज फैसला सुनाया. तीनों पर दिसंबर 31, 2017 को एल्गार परिषद की बैठक में भड़काऊ बयान देने का आरोप है. पुलिस का कहना है कि तीनों के कारण ही पुणे के भीमा-कोरेगाँव में हिंसा भड़की थी. पुणे पुलिस ने अदालत में बताया कि वर्नोन गोंजाल्विस और अरुण फरेरा प्रतिबंधित नक्सली संगठन में भर्ती के लिए लोगों को भड़का रहे थे  और सीपीएम (माओवादी) के लिए कैडर तैयार कर रहे थे.

पुणे पुलिस ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए हाई कोर्ट में कहा कि तीनों कथित एक्टिविस्ट्स 4 ऐसे संगठनों से जुड़े थे, जो प्रतिबंधित माओवादी संगठन के मुखौटे के रूप में कार्यरत हैं. UAPA एक्ट के तहत गिरफ़्तार अरुण फरेरा, सुधा भारद्वाज और वर्नोन गोंजाल्विस की जमानत याचिका पिछले वर्ष अक्तूबर पुणे की स्पेशल कोर्ट ने खारिज कर दी थी. इसके बाद तीनों ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया था.

October 15th 2019, 9:52 am

लिटफेस्ट एजेंडा साहित्यकारों का जमावड़ा – मानवाधिकार मंच

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लिटफेस्ट का हिमाचल और हिमाचली संस्कृति, साहित्य से नहीं कोई सरोकार

शिमला (विसंकें). मानवाधिकार मंच के प्रदेशाध्यक्ष एवं सेवानिवृत्त एडीजीपी केसी सडयाल ने कहा कि हिमाचल प्रदेश के कसौली में प्रख्यात लेखक स्व. खुशवंत सिंह की याद में होने वाले लिटफेस्ट का हिमाचल और हिमाचल की संस्कृति, साहित्य से कोई सरोकार नहीं रह गया है. इस मंच में जिस तरह मॉब लिंचिग को एक सम्प्रदाय विशेष के साथ जोड़कर प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है, उससे प्रख्यात लेखक खुशवंत सिंह की धर्मनिरपेक्ष सोच का मजाक बन गया है. केसी सडयाल ने प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से लिटफेस्ट में आए साहित्यकारों की मंशा पर सवाल उठाए.

उन्होंने लिटफेस्ट में लेखिका तवलीन सिंह के कथन को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताया, जिसमें उन्होंने पश्चिम बंगाल में मुस्लिमों द्वारा हिन्दू परिवार की मॉब लिंचिग को एक सामान्य घटना बताया, जबकि मुस्लिमों के साथ हुई ऐसी घटनाओं को ही मॉब लिंचिग माना है. साथ ही तवलीन ने कहा था कि कश्मीर में धारा 370 और 35ए को गलत तरीके से हटाया गया है. जबकि इन धाराओं को हटाने से पूर्व पूरी संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया था.

मंच का मानना है जिन निर्णयों में भारत सरकार को पूरे देश का समर्थन मिला, वहीं कुछ देश विरोधी लोगों को ये बातें पसन्द नहीं आ रही हैं. जिस कारण वे लिटफेस्ट जैसे साहित्यिक मंचों का प्रयोग करके देश विरोधी एंजेडा को आगे कर रहे हैं.

केसी सडयाल ने कहा कि कसौली में चल रहे 8वें लिटफेस्ट में पहुंचे अधिकतर साहित्यकार एक विचारधारा विशेष के ही पोषक हैं. ये साहित्यकार पहले भी एक विशेष एंजेडा को आगे बढ़ाने को लेकर प्रदेश में एकत्र होते रहे हैं. वर्ष 2017 के लिटफेस्ट में जेएनयू प्रकरण से चर्चा में आए देशद्रोही नारों के आरोपी छात्र नेता कन्हैया कुमार को भी एक बड़े विचारक के रूप में ऐसे ही साहित्यकारों ने अपने कार्यक्रम में बुलाया था. जिससे पता चलता है कि लिटफेस्ट एक विशेष प्रकार के साहित्यकारों का जमावड़ा बन गया है.

मानवाधिकार मंच ने लिटफेस्ट में पाक साहित्यकारों की कमी खलने की बात को देश विरोधी सोच को बढ़ावा देने वाला बताया है. प्रदेश में ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से देश विरोधी सोच को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए. उन्होंने सरकार से अपील की कि ऐसे कार्यक्रमों को आयोजित करने की अनुमति देने से पूर्व प्रशासन को आयोजकों की मंशा को भी समझ लेना चाहिए.

October 15th 2019, 6:15 am

अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल बैठक भुवनेश्वर

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File Photo

भुवनेश्वर (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल बैठक भुवनेश्वर के SOA Campus-2 में आयोजित की जा रही है. तीन दिवसीय बैठक 16 अक्तूबर से 18 अक्तूबर 2019 तक चलेगी. संघ की इस वार्षिक बैठक में सभी महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन करने वाले पदाधिकारी उपस्थित रहेंगे.

बैठक में परम पूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी, माननीय सरकार्यवाह सुरेश (भय्याजी) जोशी के साथ अखिल भारतीय, क्षेत्र एवं प्रांत अधिकारी उपस्थित रहेंगे और महत्वपूर्ण चर्चाओं में भाग लेंगे. देशभर से करीब 400 प्रतिनिधि इस बैठक में उपस्थित रहेंगे. मार्च के महीने में संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में वार्षिक योजना प्रस्तुत की जाती है. यह बैठक 6 महीने बाद होने वाली समीक्षा बैठक है. बैठक में संगठन की गतिविधियों, जैसे कार्य विस्तार, कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण और अनुभवों की चर्चा होगी.

अरुण कुमार

अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

October 15th 2019, 6:01 am

15 अक्तूबर / बलिदान दिवस – तोपों के सामने निडर खड़े होने वाले मंगल गाडिया और सैयद हुसैन

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नई दिल्ली. 1857 के स्वातंत्र्य समर को भले ही अंग्रेज या उनके चाटुकार इतिहासकार कुछ भी नाम दें. पर संदेह नहीं कि वह सम्पूर्ण देश को आप्लावित करने वाला स्वयंस्फूर्त समर था. मुम्बई में भी उस समय अनेक क्रान्तिकारी हुए, उनमें से ही मंगल गाडिया तथा सैयद हुसैन को 15 अक्तूबर, 1857 को तोप से उड़ाकर अंग्रेजों ने अपने मुंह पर कालिख पोती थी.

मुम्बई में आधुनिक शिक्षा का प्रणेता मान कर जिसके गुण गाये जाते हैं, वह लार्ड माउण्ट स्टुअर्ट एलफिंस्टन उन दिनों मुम्बई में ही गवर्नर था. वर्ष 1853 में ब्रिटिश संसद ने विधेयक पारित किया कि भारत को ईसा के झण्डे के नीचे लाना है. अंग्रेज अधिकारियों को इसके लिए गुप्त निर्देश भी दिये गये. अतः वे सब अपने सरकारी काम के साथ इस ओर भी प्रयास करने लगे. इन अधिकारियों के प्रयास से मुम्बई में वर्ष 1856 में धर्मान्तरण की गतिविधियां जोर पकड़ने लगीं. अनेक हिन्दू, मुस्लिम तथा पारसी युवकों को जबरन ईसाई बना लिया गया. इससे पूरे शहर में हलचल मच गयी. इन समुदायों के प्रभावी लोगों ने मुम्बई के नाना जगन्नाथ शंकर सेठ को शिकायत की. नाना का अंग्रेज अधिकारियों के बीच भी उठना-बैठना था, यों वह प्रखर देशभक्त थे और अंग्रेजों को देश से बाहर देखना चाहते थे.

नाना ने हजारों लोगों से इस विषय में हस्ताक्षर संग्रह किये और गर्वनर एलफिंस्टन को दिये, पर उसकी योजना से तो सब हो ही रहा था. अतः उसने ज्ञापन लेकर रख लिया. 10 मई को जब मेरठ में भारतीय वीर सैनिकों ने क्रान्ति का सूत्रपात किया, तो एलफिंस्टन ने खतरे को भांपते हुए छावनी से 400 सैनिकों को मुम्बई बुला लिया. उसे सन्देह था कि नाना भी क्रान्तिकारियों से मिला हुआ है, अतः उसने मुम्बई के पुलिस कमिश्नर चार्ल्स फोरजेट को नाना की गतिविधियों पर नजर रखने को कहा.

इधर नाना साहब पेशवा भी देश से अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने के प्रयास में लगे थे. इसके लिए 31 मई की तिथि निर्धारित हुई थी, पर उससे पूर्व क्रान्ति का वातावरण बनाने के लिए साधु, सन्त, ज्योतिषी और कीर्तनकार के रूप में देश भर में उनके लोग घूम रहे थे. ऐसे जो लोग मुम्बई आते थे, वे नाना की ताड़देव स्थित धर्मशाला में ही ठहरते थे. इसी प्रकार मुम्बई में नाखुदा मोहम्मद रोगे नामक एक देशभक्त मुसलमान था. वह ऐसे लोगों को सहर्ष अपने घर में टिका लेता था.

लेकिन, देशप्रेमियों के साथ ही देशद्रोहियों की भी भारत में कभी कमी नहीं रही. इन सब गतिविधियों की सूचना एलफिंस्टन को भी मिल रही थी. एक बार मुखबिर की सूचना पर उसने इन दोनों स्थानों पर छापा मारा और अनेक क्रान्तिवीरों को पकड़ लिया. मुकदमा चलाकर उनमें से दो को मृत्युदंड और छह को आजीवन कारावास की सजा दी गयी. एलफिंस्टन ने इन दोनों को सार्वजनिक रूप से मृत्युदंड देने का निर्णय लिया, जिससे पूरे नगर में भय एवं आतंक का वातावरण बने. इसके लिए एस्तालेनेड कैम्प (वर्तमान आजाद मैदान) में दो तोपें लगायी गयीं. शाम को 4.30 बजे अंग्रेज अधिकारी कैप्टेन माइल्स के निर्देश पर तोपें दाग दी गयीं. अगले ही क्षण भारत मां के वीर सपूत मंगल गाडिया और सैयद हुसैन भारत मां की गोदी में सदा के लिए सो गये.

October 14th 2019, 9:41 pm

15 अक्तूबर / जन्मदिवस – मिसाइल मैन डॉ. अब्दुल कलाम

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क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि उस युवक के मन पर क्या बीती होगी, जो वायुसेना में पायलट बनने की न जाने कितनी सुखद आशाएं लेकर देहरादून गया था; पर परिणामों की सूची में उसका नाम नवें क्रमाँक पर था, जबकि चयन केवल आठ का ही होना था. कल्पना करने से पूर्व हिसाब किताब में यह भी जोड़ लें कि मछुआरा परिवार के उस युवक ने नौका चलाकर और समाचारपत्र बांटकर जैसे-तैसे अपनी पढ़ाई पूरी की थी.

देहरादून आते समय वह केवल अपनी ही नहीं, तो अपने माता-पिता और बड़े भाई की आकांक्षाओं का मानसिक बोझ भी अपनी पीठ पर लेकर आया था, जिन्होंने अपनी न जाने कौन-कौन सी आवश्यकताओं को ताक पर रखकर उसे यह सोचकर पढ़ाया था कि वह पढ़-लिखकर कोई अच्छी नौकरी पाएगा और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने में सहायक होगा.

परन्तु पायलट परीक्षा के परिणामों ने सब सपनों को क्षणमात्र में धूलधूसरित कर दिया. निराशा के इन क्षणों में वह जा पहुंचा ऋषिकेश, जहां जगतकल्याणी मां गंगा की पवित्रता, पूज्य स्वामी शिवानन्द के सान्निध्य और श्रीमद् भगवद्गीता के सन्देश ने उसे नये सिरे से कर्मपथ पर अग्रसर किया. उस समय किसे मालूम था कि नियति ने उसके साथ मजाक नहीं किया, अपितु उसके भाग्योदय के द्वार स्वयं अपने स्वर्णिम हाथों से खोल दिये हैं.

15 अक्तूबर, 1931 को धनुष्कोटि (रामेश्वरम्, तमिलनाडु) में जन्मा अबुल पाकिर जैनुल आब्दीन अब्दुल कलाम नामक वह युवक भविष्य में ‘मिसाइलमैन’ के नाम से प्रख्यात हुआ. उनकी उपलब्धियों को देखकर अनेक विकसित और सम्पन्न देशों ने उन्हें मनचाहे वेतन पर अपने यहाँ बुलाना चाहा; पर उन्होंने देश में रहकर ही काम करने का व्रत लिया था. यही डॉ. कलाम आगे चलकर भारत के 12वें राष्ट्रपति बने.

डॉ. कलाम की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे राष्ट्रपति बनने के बाद भी आडम्बरों से दूर रहे. वे जहां भी जाते, वहां छात्रों से अवश्य मिलते. वे उन्हें कुछ निरक्षरों को पढ़ाने तथा देशभक्त नागरिक बनने की शपथ दिलाते. उनकी आंखों में अपने घर, परिवार, जाति या प्रान्त की नहीं, अपितु सम्पूर्ण देश की उन्नति का सपना पलता. वे 2020 तक भारत को दुनिया के अग्रणी देशों की सूची में स्थान दिलाना चाहते थे.

मुसलमान होते हुए भी उनके मन में सब धर्मों के प्रति आदर का भाव था. वे अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर गये, तो श्रवण बेलगोला में भगवान बाहुबलि के महामस्तकाभिषेक कार्यक्रम में भी शामिल हुए. उनकी आस्था कुरान के साथ गीता पर भी थी तथा वे प्रतिदिन उसका पाठ करते थे. उनके राष्ट्रपति काल में जब-जब उनके परिवारजन दिल्ली आये, तब उनके भोजन, आवास, भ्रमण आदि का व्यय डॉ. कलाम ने अपनी जेब से किया.

उनके नेतृत्व में भारत ने पृथ्वी, अग्नि, आकाश जैसे प्रक्षेपास्त्रों का सफल परीक्षण किया. इससे भारतीय सेना की मारक क्षमता में वृद्धि हुई. भारत को परमाणु शक्ति सम्पन्न देश बनाने का श्रेय भी डॉ. कलाम को ही है.

उन्नत भारत के स्वप्नद्रष्टा, ऋषि वैज्ञानिक डॉ. कलाम भारत की युवा पीढ़ी में देशभक्ति जाग्रत करते रहे. 27 जुलाई 2015 को भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलांग में व्याख्यान के दौरान हृदयाघात से उनका निधन हुआ.

October 14th 2019, 9:41 pm

18 सदस्यीय सूफी प्रतिनिधिमंडल ने कहा- “एक भी स्थानीय ने ह्यूमन राइट्स के उल्लंघन की शिकायत नहीं की”

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सूफी प्रतिनिधिमंडल ने कश्मीर घाटी का किया दौरा

देश की बड़ी सूफी दरगाहों की काउंसिल के बैनर तले 18 सदस्यों के प्रतिनिधिमंडल ने कश्मीर घाटी का दौरा कर वास्तविकता जानी. प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे अजमेर शरीफ के सज्जदानशीं सैयद नसीरूद्दीन चिश्ती ने स्पष्ट कहा कि उनके दौरे के दौरान उन्हें ह्यूमन राइट्स के उल्लंघन का कोई मामला नहीं मिला. बल्कि पाकिस्तान जेहाद और इस्लाम के नाम पर कश्मीर में प्रोपगैंडा फैलाने में लगा है.

सूफी संत नसीरूद्दीन चिश्ती ने कहा कि “हम यहां स्थानीय लोगों से मिले, किसी ने भी ह्यूमन राइट्स के उल्लंघन की बात नहीं की. पाकिस्तान का प्रोपगैंडा झूठा है, हां फोन जैसी सर्विस पर पाबंदी थी, लेकिन जब ऐसे फैसले (आर्टिकल 370 हटाना) लिये जाते हैं तो ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं.”

नसीरूद्दीन चिश्ती ने कश्मीर और इस्लाम के नाम पर भड़काने के लिए पाकिस्तान को खरी-खरी सुनाई. पत्रकारों से बात करते हुए नसीरूद्दीन चिश्ती ने कहा कि “पाकिस्तान की तरफ से जितने बयानात आए, खासतौर पर पाकिस्तान के सदर ने जो जेहाद शब्द का इस्तेमाल किया वो नाकाबिले-बर्दाश्त है और उनको शर्म आनी चाहिए. जो मुल्क के मामलात हैं, जो दुनिया के मामलात हैं, उनके अंदर जेहाद का इस्तेमाल करके, लोगों के सेन्टीमेंट्स से खिलवाड़ करके ये एक मुसलमान को ज़ेब (शोभा) नहीं देता.

खासतौर से मुस्लिक कंट्री को ज़ेब नहीं देता औऱ पाकिस्तान को जेहाद अगर करना है तो जाके फिलिस्तीन में करे, म्यांमार में बोले, चायना में जो हो रहा है उनके लिए बोले. हिन्दुस्तान के कश्मीर के मैटर जो हमारे देश का इंटीग्रल पार्ट है, इस मामले में किसी को दखल देने का अख्तियार नहीं है.”

भारत के मुसलमानों के प्रति साहनुभूति दिखाकर प्रोपगैंडा फैलाने की पाकिस्तान की साजिश पर नसीरूद्दीन चिश्ती ने पाकिस्तान को साफ संदेश दिया कि “.. हम यहां के मुसलमान हैं. हमें बाहर के किसी मुसलमान की रहनुमाई नहीं चाहिए. हमारे खुद के रहनुमा यहां मौजूद हैं. हम उनसे बेहतर कंडीशन में यहां रह रहे हैं. उनसे ज्यादा खुशहाल माहौल में यहां रह रहे हैं. तो हमें किसी बाहर के आदमी की ज़रूरत नहीं हैं. मैं उनको (पाकिस्तान) को प्रोपर मैसेज देना चाहता हूं. जेहाद के नाम पर, इस्लाम का नाम लेकर लोगों के सेंटीमेंट्स को हर्ट न करें और दुनिया के मसाइल (मामलों) को इस्लाम से न जोड़ें.”

ऑल इंडिया सूफी दरगाह सज्जदानशीं काउंसिल के बैनर तले 18 सूफी सदस्य 12 अक्तूबर को कश्मीर पहुंचे थे. इस प्रतिनिधिमंडल में में राजस्थान, हैदराबाद, नई दिल्ली, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात और बिहार राज्यों में स्थित दरगाहों के सूफी संत नुमाइंदगी कर रहे थे. ये तमाम सूफी संत 3 दिनों तक कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों में गए और स्थानीय लोगों से बात की.

कश्मीर घाटी के बारे में फैलायी जा रही अफवाहों के बाद अजमेर शरीफ दरगाह के मुखिया जैनुलाबिदीन अली खान ने प्रतिनिधिमंडल को भेजने की पहल की थी. प्रतिनिधिमंडल ने सरकार से कश्मीर के टूरिज्म को बढ़ाने के लिए काम करने की गुजारिश की.

October 14th 2019, 11:21 am

विश्व कल्याण के लिए वेदों के पुनर्तेजस्वीकरण की आवश्यकता है – डॉ. मोहन भागवत

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नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि भारतवर्ष के सभी लोगों के नित्य जीवन का वेदों से सम्बन्ध है. वेद का अर्थ जानना होता है. जिसको हम साइंस कहते हैं वो बाहर की बातें जानना है, वेद में विज्ञान भी है और ज्ञान भी, वह भी है जो समझ में नहीं आता. वेदों का ज्ञान अपने अंदर की खोज करता है. वेद समाज को उन्नत करते हैं, समाज को उन्नत धर्म करता है और धर्म का मूल वेद हैं. अध्यात्म विज्ञान का विरोधी नहीं हो सकता, क्योंकि अध्यात्म में विज्ञान से भी ज्यादा अनुभूति है. हमारे यहां अध्यात्म और विज्ञान दोनों का विचार पहले से हुआ है. वेदों में यह दोनों बातें हैं. इसलिए वेदों का महत्व ज्यादा है. तीन गुणों से सम्बन्धित सृष्टि का विचार वेद में है. विश्व हिन्दू परिषद् व अशोक सिंघल फाउंडेशन द्वारा लक्ष्मी नारायण मंदिर (बिड़ला मंदिर) नई दिल्ली में चल रहे में छह दिवसीय चतुर्वेद स्वाहाकार महायज्ञ कार्यक्रम के तीसरे दिन यजमान के रूप आमंत्रित डॉ. मोहन भागवत ने संबोधित किया. सरसंघचालक जी ने कहा कि जो भौतिक ज्ञान आज की दुनिया को प्राप्त है, उसको सम्भालने के लिए जो आंतरिक ज्ञान चाहिए, जिसके अभाव में युद्ध हो रहे हैं, जिसके अभाव में विनाश और पर्यावरण की हानि हो रही है. उस ज्ञान को पूर्णतया देने वाला वेद ज्ञान हमको फिर अपने परिश्रम से पुनर्जीवित करना पड़ेगा. वेदों का पुनर्तेजस्वीकरण हिन्दुओं की ही नहीं, पूरी मानवजाति के जीवन का प्रश्न है, यह कोई पूजा कर्मकांड की सीमित बात नहीं है. वेदों के पुनर्तेजस्वीकरण से पूरे संसार का कल्याण होगा, इसके लिए हम सबको समर्पण करना पड़ेगा. महायज्ञ के आयोजक अशोक सिंघल फाउंडेशन के प्रमुख महेश भागचंदका ने कहा कि मा. अशोक सिंघल जी की अंतिम इच्छा रही कि वेदों को घर-घर तक पहुंचाना चाहिए. विश्व शांति के लिए लोगों को वेदों को सुनना चाहिए. युवा पीढ़ी को वेदों की जानकारी हो, इसके लिए विश्व स्तर का चारों वेदों का स्वाहाकार दिल्ली में किया जाए. उनके रहते हुए 2015 में यह योजना बनी थी, लेकिन चार दिन पहले उनका शरीर शांत हो गया था. इस कार्यक्रम को स्थगित कर दिया था. अब चार पर्व के पश्चात हम इस कार्यक्रम को कर रहे हैं और इसमें दक्षिण भारत से रामानुजाचार्य स्वामी जी की देखरेख में 60 आचार्यों के साथ चारों वेदों का स्वाहाकार हो रहा है. 09 अक्तूबर से यह स्वाहाकार शुरु हुआ है और 14 अक्तूबर को सुबह इसकी पूर्णाहुति होगी. इसमें समाज की सभी वर्गों के व्यक्तियों को बुलाया है चाहे वह राजनीति में हों, सामाजिक हों, धार्मिक हों, सब लोगों को आमंत्रित किया है. इसमें अधिक से अधिक युवा भाग लें, इसके लिए सोशल मीडिया में भी इसको प्रमोट किया है. आज एक लाख लोग जो सोशल मीडिया से जुड़े हुए हैं वो इस यज्ञ को देख रहे हैं. सभी संतों का यहां आगमन हो रहा है व देश विदेश से यजमान यहां आ रहे हैं. वो सब इस यज्ञ को देखेंगे तो अपने-अपने स्थान में जाकर इस तरह का कार्यक्रम करेंगे. इससे पूर्व के सत्र में विश्व हिन्दू परिषद की प्रबन्ध समिति के सदस्य दिनेश चन्द्र जी ने कहा कि तीन दिन से यहां चारों वेदों का अलग-अलग कुंडों पर सस्वर शुद्ध उच्चारण करते हुए एक-एक मंत्र को शुद्ध सस्वर उच्चारण करते हुए यज्ञ कुंड में आहुति डाली जा रही है. इसलिए इसको चतुर्वेद स्वाहाकार महायज्ञ कहा गया है. आज इसका तीसरा दिन है, 14 अक्तूबर को साढ़े ग्यारह बारह के बीच में महापूर्ण यज्ञ की पूर्ण आहुति होगी. आज विशेष बात त्रिदंडी स्वामी रामानुजाचार्य जी ने वेद के बारे में बताई कि वेद ऋषियों ने ईश्वर का साक्षात्कार किया अर्थात् आत्मअनुभव किया, उन अनुभव करने वालों के प्रसंग उन्होंने बताए और उस अनुभूति में से अनेक आज भी वेदों को कंठस्थ करके उस समय की अनुभूति को प्राप्त कर रहे हैं. पूज्य अशोक सिंघल जी का जो संकल्प था कि वेद समाज में फिर से आएं, सामान्य जन तक वेद का ज्ञान पहुंचे तथा अंग्रेजों के कालखंड में वेद के संबंध फैली सब भ्रांतियां दूर हों. शाम के सत्र में पूज्य संत रूपेंद्रानाथ हरिद्वार से, दिल्ली से पूज्य सुधांशु जी महाराज महायज्ञ में आए. यजमानों में डॉ. सुब्रमणयम स्वामी,  विहिप के अंतराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार, उपस्थित थे.

October 14th 2019, 11:21 am

संगठित सज्जन शक्तियां करेंगी बुरी वृत्तियों का दहन – रेखा राजे

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दिल्ली में राष्ट्र सेविका समिति का विजयादशमी उत्सव नई दिल्ली. राष्ट्र सेविका समिति दिल्ली प्रान्त के पूर्वी विभाग ने विजयादशमी के उपलक्ष्य में शस्त्र पूजन एवं पथ संचलन का कार्यक्रम आयोजित किया. 13 अक्तूबर को शाम 4 बजे गणेश नगर कांपलेक्स समुदाय भवन में कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ. इसमें मुख्य वक्ता के रूप में राष्ट्र सेविका समिति की अखिल भारतीय सह कार्यवाहिका रेखा राजे जी उपस्थित रहीं. वे पिछले 36 वर्षों से देश के विभिन्न भागों में प्रचारिका के रूप में कार्य कर रही हैं. रेखा राजे जी ने शस्त्र पूजन के अवसर पर कहा कि राष्ट्र की रक्षा शस्त्र और शास्त्र दोनों से होगी. हमें शस्त्र, शास्त्र, विज्ञान, और अध्यात्म के विविध क्षेत्र का ज्ञान अर्जित कर आगे बढ़ना होगा. पहले विदेशों से छात्र भारत में पढ़ने आते थे, लेकिन अब विदेशों में पढ़ने जाते हैं. जिससे प्रतिभा का पलायन होता है, इसे रोकने के आवश्यकता है. देश की भाषा और संस्कृति को बचाने का काम विशेष रूप से देश की महिलाओं का है. हिन्दुत्व कोई पूजा पद्धति नहीं है, एक जीवन शैली है जो मानव को पशु पक्षियों से अलग करती है. यह देवताओं की संस्कृति इस देश की है. इस हिन्दू संस्कृति को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है. हमें अपनी शक्ति को पहचानना होगा. ईश्वर की विशेष कृपा है कि उसने हमें समिति का कार्य करने का अवसर दिया है. विजयादशमी के अवसर पर हमें संकल्प लेना है कि संगठित सज्जन शक्तियां देश से बुरी वृत्तियों को समाप्त करके भारत को परम वैभव पर ले जाएंगी. कार्यक्रम की अध्यक्ष दिल्ली कान्वेंट स्कूल, पांडव नगर की निवर्तमान प्रधानाचार्य आशा अरोड़ा जी ने कहा कि विजयादशमी हम हर साल मनाते हैं, लेकिन यह नहीं सोचते कि हमारे बच्चे श्री राम के जैसे क्यों नहीं बन रहे, इसके कारणों पर विचार कर इन गलतियों को दूर करने की आवश्यक्ता है. आज यह प्रण करना होगा कि हमें अपने बच्चों में अच्छे संस्कार डालने हैं. इसके लिए माता-पिता दोनों को अनुशासित होकर अपने अन्दर अच्छे गुण पैदा करने होंगे, जिससे उनके बच्चे उनको देखकर उनका अनुसरण कर सकें. शस्त्र पूजन में समिति के पूर्वी विभाग की पालक अधिकारी स्नेह लता गुप्ता जी तथा सह पालक अधिकारी कविता विश्नोई जी का सान्निध्य प्राप्त हुआ. इस अवसर पर आयोजित पथ संचलन गणेश नगर समुदायिक भवन (निकट अक्षरधाम) से प्रारंभ होकर दिल्ली कान्वेंट विद्यालय, हनुमान मंदिर, काली मंदिर, पांडव नगर जे, डी, ई, तथा एफ ब्लॉक, समसपुर गांव, दिल्ली पुलिस सोसाईटी से होते हुए संजय झील गेट नंबर 1 पर लगभग 4 किलोमीटर की दूरी तय करने के पश्चात संपन्न हुआ. इस कार्यक्रम में चारों जिलों कि 20 शाखाओं की सेविकाओं ने पूर्ण गणवेश में भाग लिया. पथ संचलन के मार्ग में विभिन्न स्थानों पर क्षेत्र के महिलाओं ने सेविकाओं का पुष्प वर्षा कर स्वागत किया.  

October 14th 2019, 11:21 am

गुरु नानकदेव जी के प्रकाशोत्सव पर देशभर में कार्यक्रम आयोजित करेगा विहिप

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17 नवंबर से शुरू होगा हितचिंतक जोड़ो अभियान

नागपुर. विहिप महामंत्री मिलिंद परांडे जी ने नागपुर में आयोजित प्रेस वार्ता में बताया कि निकट भविष्य में विश्व हिन्दू परिषद के दो प्रमुख कार्यक्रम आ रहे हैं. 17 नवम्बर से 01 दिसम्बर संपूर्ण देश में हितचिंतक अभियान के माध्यम से 51 लाख से अधिक हिन्दुओं को विहिप के साथ जोड़ने का प्रयास रहेगा. विदर्भ प्रांत में 02 लाख लोगों को जोड़ने का प्रयास किया जाएगा. पिछले अभियान में में 32 लाख से अधिक लोग जोड़े गए थे.

इसी प्रकार 10 नवम्बर से 17 नवम्बर तक श्री गुरू नानकदेव जी के 550वें प्रकाशोत्सव के निमित्त देशभर में कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. गुरु नानकदेव जी के सामाजिक समरसता एवं अध्यात्म के संदेश को समाज तक पहुंचाया जाएगा.

उन्होंने बताया कि हाल ही में बारिश के कारण अनेक राज्यों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हुई, इस विकट परिस्थिति में विहिप ने महाराष्ट्र, पंजाब, बिहार, कर्नाटक, केरल सहित अन्य राज्यों में प्रभावित परिवारों को चिकित्सा, भोजन, वस्त्र, अस्थायी निवास उपलब्ध करवाया.

उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में जनसंख्या असंतुलन मुस्लिम घुसपैठ के कारण निरंतर बढ़ रहा है. नागरिकता अधिनियम में योग्य बदलाव करते हुये भारत के निकट देशों से भारत में शरण लेने के लिये आए व भविष्य में आने वाले हिन्दुओं को नागरिकता, सुरक्षा तथा सहयोग करने की मांग भारत सरकार से विहिप करता है. साथ ही मांग की कि हिन्दुओं के विरूद्ध पश्चिम बंगाल में चल रहे हिंसा के तांडव को रोकने के लिये बंगाल में एनआरसी लागू करना अवश्यक है. संवैधानिक पद पर रहते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने पुलिस स्टेशन में जाकर अपने पहचान पत्र खो जाने की F.I.R. दर्ज करवाने की सलाह घुसपैठियों को दी है, यह अत्यंत गैर जिम्मेदारना वक्तव्य है. इससे घुसपैठियों को ही प्रोत्साहन मिलेगा और आंतरिक सुरक्षा को खतरा निर्माण होगा.

उन्होंने कहा कि आंध्र प्रदेश में चुनकर आई जगन मोहन रेड्डी सरकार ने अनेक हिन्दू विरोधी कदम उठाए हैं. इसाई पादरियों तथा मौलवियों को हर माह वेतन देने की घोषणा हिन्दू विरोधी, पक्षपात पूर्ण, तुष्टीकरण की नीति तथा असंवैधानिक है.

हिन्दू मंदिरों की भूमि वंचित वर्ग को घर बनाने के लिये आबंटित करना भी अन्याय पूर्ण है. आंध्र प्रदेश में ब्रिटिश सरकार द्वारा चर्च को लीज पर दी गई भूमि की लीज़ 1994 में ही समाप्त हो गई थी. इसलिए समाज के वंचित वर्ग को घर बनाने के लिये चर्च तथा वक्फ बोर्ड भूमि का उपयोग करने पर भी आंध्र प्रदेश सरकार को विचार करना चाहिये. हिन्दू मंदिरों के प्रबंधन में कई स्थानों पर ईसाई और मुसलमानों को नौकरी दी है. उन्हें अन्यत्र स्थानांतरित करना चाहिये. ऐसे अनेक कर्मचारी हिन्दू धर्मावलंबियों के धर्मांतरण के षड्यंत्रों में संलिप्त पाए गए हैं.

October 14th 2019, 8:33 am

महर्षि वाल्मीकि

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हमारे महापुरुष समय-समय पर नीति संबंधी अनेक सूक्ति वाक्यों का प्रयोग करते रहे हैं, जैसा कि नीति एवं नियम जीवन का एक ऐसा मार्ग है जो मानव के हर क्षेत्र के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है. यदि यह कहा जाए कि मानव जीवन का पूर्ण विकास किसी न किसी नीति का ही परिणाम है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. प्रत्येक समाज अपने अंदर शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक विशेष प्रकार की आचार पद्धति निर्धारित करता है, जिससे समाज के अंदर रहने वाले सभी व्यक्तियों के आचरण का निर्देशन व नियंत्रण होता है. इस व्यवस्थित आधार पद्धति को नैतिकता की संज्ञा दी जाती है या यूं कहें कि सामाजिक जीवन में व्यवस्था एवं शांति बनाए रखने वाला आचरण ‘नैतिकता’ कहलाने लगता है. इस प्रकार नैतिकता से अभिप्राय व्यक्ति के आचरण का निर्देशन करने वाली एक नियम व्यवस्था एवं आधार पद्धति से है, जिससे समाज अपने सदस्यों के लिए रचता है. आदि कवि भगवान महर्षि वाल्मीकि ने भी अपने ग्रन्थ ‘रामायण’ में ऐसे ही नैतिक नियमों से संचालित “रामराज्य” की परिकल्पना की है. आदि कवि ने ‘रामराज्य’ की आधार शिला नैतिक नियमों, मूल्यों-मान्यताओं, शुभ परम्पराओं और ज्ञान के साथ-साथ जीवन के अनुभवजन्य ज्ञान पर रखी है, इसलिए आज भी विश्व के अनेक देशों को आदि कवि महर्षि वाल्मीकि का रामायण आदर्श समाज को स्थापित करने की प्रेरणा देता है.

महाकाव्य की कलात्मक अभिव्यंजना में सर्वसमर्थ होने के कारण भगवान महर्षि वाल्मीकि कभी भी उपदेशक या शिक्षक के रूप में अपनी बात नहीं कहते, बल्कि वे अपने पात्रों को अपना प्रवक्ता बना देते हैं.

आदर्श पात्र- जैसे राम, भरत, लक्ष्मण, सीता, सुमित्रा, सुमंत्र, गुह, जटायु, शबरी, हनुमान आदि, ये विभिन्न मानवीय गुणों का आदर्श प्रस्तुत करते हैं. उनका आचरण देखकर पाठक स्वयं सोचने लगते हैं, ‘हां’ आदर्श पुत्र हो तो ऐसा होना चाहिए, पुत्र वत्सल पिता ऐसे ही होते हैं, भाई का प्रेम, पत्नी की पति-भक्ति, स्त्री की सेवा भावना जो कभी किसी की शिकायत नहीं करती है और हमेशा दूसरों की सहायता करने में तत्पर रहती है.

भारतीय समाज में आदि कवि भगवान महर्षि वाल्मीकि जी का स्थान सर्वोपरि है, उनका जन्म त्रेतायुग में हुआ. महर्षि वाल्मीकि जी ने उस समय की परिस्थितियों के अनुरूप समाज को मार्गदर्शन देने के लिए ‘रामायण’ जैसे हाकाव्य की रचना की, आज रामायण ग्रन्थ प्रत्येक हिन्दू के घर में श्रद्धापूर्वक पूजा जाता है. हम भगवान महर्षि वाल्मीकि जी को संस्कृत भाषा के जनक के रूप में भी देखते हैं वे प्रथम व्यक्ति हैं जिन्होंने संस्कृत भाषा में श्लोकों के माध्यम से रामायण की रचना की.

आदि महाकाव्य ‘रामायण’ के सृजन के बारे में स्वयं बालकांड में वर्णन मिलता है कि एक बार महर्षि नारद जी महर्षि वाल्मीकि जी के आश्रम पर पधारे, आश्रम में महर्षि वाल्मीकि ने महर्षि नारद जी से पूछा इस संसार में गुणवान, वीर-जवान धर्मज्ञ और उपकार मानने वाला तथा दृढ़ प्रतिज्ञ कौन है? तब देवर्षि नारद जी ने महर्षि वाल्मीकि की जिज्ञासा को शांत करते हुए कहा कि – ‘अयोध्या निवासी महाराज दशरथ पुत्र श्रीराम को अनेक गुणों से युक्त महान पुरुष कह कर संक्षेप में उनकी समस्त कथा सुनाते हैं. कथा सुनने के उपरान्त महर्षि वाल्मीकि जी स्नान करने के लिए तमसा नदी के तट पर जाते हैं, जहां पर एक बहेलिया प्रेम-क्रीडा में रत क्रौंच पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी को अपने बाण से मार डालता है, मादा पक्षी इस शोक से व्याकुल होकर विलाप करने लगती है. इस दृश्य को महर्षि वाल्मीकि जी देख रहे थे, वह इस दृश्य से अत्यंत आहत हुए और उनके मुख से विषाद के रूप में बहेलिया को श्राप देने के लिए अनायास जो शब्द निकलते हैं –

मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः

यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम् ॥

इसे संस्कृत का प्रथम श्लोक माना जाता है. इसी दौरान आश्रम में आकर महर्षि वाल्मीकि उस घटना को याद करके बैठे हुए हैं, वहीं पर ब्रह्माजी आ जाते हैं. वे महर्षि वाल्मीकि जी से आग्रह करते हैं कि नारद जी द्वारा जो कथा आपको सुनाई गई है, उसे लिपिबद्ध करें. तब महर्षि वाल्मीकि जी श्लोकबद्ध तरीके से रामायण की रचना करते हैं. रामायण की रचना करते समय महर्षि वाल्मीकि जी के पास एक तो व्यवहारिक अनुभव था और दूसरा महर्षि नारद जी तथा ब्रह्मा जी द्वारा दिए गए विचार. इस तरह महर्षि वाल्मीकि जी ने रामायण की रचना आदर्श समाज के लिए एक मूल ग्रंथ के रूप में की.

सामाजिक दर्शन

आदि कवि महर्षि वाल्मीकि रामायण में एक आदर्श समाज की परिकल्पना करते हैं, जिसमें वे एक ऐसे आदर्श परिवार और समाज का निर्माण करते हैं. जिसमें आदर्श पुत्र राम, आदर्श भाई भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न, तो आदर्श पुत्री और पत्नी तथा भाभी के रूप में माता सीता तथा माता के रूप में माता कौशल्या का चित्रण करते हैं. निश्चित रूप से महर्षि महर्षि ने एक आदर्श और प्रेरणादायी समाज का चित्रण किया है. महर्षि वाल्मीकि ने अपने प्रत्येक पात्र पर नैतिक मर्यादा का झीना आवरण डाला हुआ है, इसीलिए स्वयं भगवान श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं. उस समय का समाज अत्यंत मर्यादित एवं सुसंस्कृत था, प्रत्येक व्यक्ति समाज के नियम एवं मर्यादाओं का पालन करता था.

रवीन्द्रनाथ ठाकुर कि कविताभाषा ओ छ्ंदवाल्मीकि नारद से कहते हैंअब तक देवताओं पर काव्य लिखा गया है, मैं अपने काव्य में मनुष्य को अमर करूंगा.

मानवतावादी विचार

महर्षि वाल्मीकि जी का रामायण ग्रन्थ मानवमात्र के कल्याण का मूल मंत्र है, रामायण के श्रीराम एक राजा होते हुए भी प्रजा के साथ कोई भेद-भाव नहीं करते हैं. जैसे जंगल में शबरी के हाथ से झूठे बेर खाते हैं तो जटायु, सुग्रीव और वानरों के साथ-साथ हनुमान जी के साथ मित्रवत व्यवहार करते हैं, निम्न जाति के व्यक्ति निषाद को गले लगाते हैं.

डॉ. शर्मा आगे लिखते हैं, रवीन्द्रनाथ ने बड़े मर्म की बात पकड़ी है. वाल्मीकि परंपरा को जन्म दे रहे थे- उस काव्य को जो देवोपासक नहीं, बड़ी गहरायी से मानवतावादी है. उनके काव्य के आरम्भ में किसी देवता की वन्दना नहीं है. वह घोषित करते हैं कि यह काव्य द्विजों के लिये ही नहीं, शूद्रों के लिये भी है, उनके चरितनायक राम अपने मनुष्य होने की सगर्व घोषणा करते हैं.

एक तरह से जंगल में रहने वाले प्रत्येक प्राणी से मित्रवत भाव रखते हैं, महर्षि ने रामायण में पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं को भी आदर्श रूप में राम कथा के माध्यम से प्रस्तुत किया है – कौशल्या, सीता, उर्मिला और मंदोदरी आदि सती-साध्वी और पतिव्रत का पालन करने वाली आदर्श नारी हैं, वे सभी समाज के हित में अपनी इच्छाओं और अधिकारों को त्याग देती हैं. महर्षि वाल्मीकि परिवार की महत्ता पर विशेष महत्व देते हैं, उनका विचार है कि परिवार के सभी सदस्यों में परिवार को चलाने के लिए नैतिक आदर्श का होना जरूरी है.

समन्वयवादी विचार

महर्षि वाल्मीकि के श्रीराम समाज के सभी वर्ग के लोगों को साथ लेकर चलते हैं. उनके राज्य में ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा, सभी समान सम्मान के अधिकारी हैं. राजा दशरथ के शासनकाल का वर्णन करते हुए महर्षि ने वर्णन किया है कि उस समय सभी नागरिक धन्य-धान्य से परिपूर्ण होकर राजा का सम्मान करते थे. महर्षि वाल्मीकि जी ने रामायण में हर स्तर पर समन्वय किया है.

राम राज्य अर्थात् कल्याणकारी राज्य

अयोध्या का राज्य बहुत समृद्ध और सुंदर था, इसका प्रमाण उस समय के सुंदर भवनों और अट्टालिकाओं के वर्णन में मिलता है. इसमें भवनों का निर्माण अनेक प्रकार के रत्नों से हुआ, इससे यह पता चलता है कि राम के राज्य की आर्थिक नीति बड़ी सफल थी. महर्षि वाल्मीकि जी जीवन के चार लक्ष्य – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में से अर्थ पर विशेष बल देते हैं. उन्होंने रामायण में मानव के विकास के लिए अर्थ को आवश्यक मानते हुए रामायण में रामराज्य की आर्थिक नीतियों का वर्णन किया है. महर्षि वाल्मीकि धन उपार्जन के साधन और जीवन में धन संग्रह तथा उनका सदुपयोग आदि से संबंधित ज्ञान की विस्तृत चर्चा करते हैं, उनका विचार है कि मानव विकास के लिए धन परम आवश्यक है. आश्रम व्यवस्था के अनुसार गृहस्थ आश्रम का प्रमुख उद्देश्य धन उपार्जन करना है क्योंकि निर्धन व्यक्ति अपने समाज में लज्जा का अनुभव करता है. लज्जित व्यक्ति ग्लानि महसूस करता है और ग्लानि से पीड़ित हो कर वह अपना विवेक खो बैठता है, अविवेक से उसका नाश हो जाता है. इसलिए निर्धनता समस्त आपत्तियों का मूल कारण है. यही नहीं दरिद्र पुरुष का सभी तिरस्कार करते हैं, मित्र भी उससे घृणा करने लगते हैं, स्वयं धनहीन की पत्नी भी उसका तिरस्कार करने लगती है. अत: महर्षि वाल्मीकि रामायण में इस बात पर जोर देते हैं कि व्यक्ति के विकास के लिए अर्थ जरूरी है. लेकिन उन्होंने धन संग्रह के सुसाधनों का ही समर्थन किया है अर्थात् धर्म के आधार पर जो धन संग्रह किया जाए, वही धन शुभ और कल्याणकारी माना जाता है. वे धर्म रहित साधनों से अर्थ संचय का समर्थन नहीं करते हैं.

महर्षि वाल्मीकि धन उपार्जन की अपेक्षा उसके सदुपयोग पर विशेष बल देते हैं, वे कहते हैं कि जो धन गरीबों, दुखियों और लाचारों पर खर्च नहीं होता है, वह धन नष्ट हो जाता है. अयोध्या में प्रजा के कल्याण और विकास पर विशेष ध्यान दिया जाता था. खासतौर पर प्रजा के शिक्षा और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जाता था. भगवान महर्षि वाल्मीकि ने लिखा है कि शिक्षा की व्यवस्था करना राज्य की ओर से शुभ कार्य माना है, शिक्षा पर खर्च किया गया धन उनकी दृष्टि में धन का सदुपयोग है.

उनका विचार है शिक्षा के बिना मानव को विकास की दिशा नहीं मिलती है, रामायण से पता चलता है कि राज्य की ओर से शिक्षा की व्यवस्था की जाती थी.

राज्य में जन स्वास्थ्य सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जाता था, अयोध्या में राज वैद्य के अलावा अनेक वैद होते थे जो लोगों के स्वाथ्य का ध्यान रखते थे. महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में सभी नागरिकों को स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने की बात की है. उनका विचार है कि राज्य अपने नागरिकों को शारीरिक विकास के पूरा अवसर प्रदान करेगा तो वे रोग रहित होंगे. इसीलिए रामराज्य में सभी लोग निरोगी थे.

राज्य की तरफ से कृषकों के कल्याण का विशेष ध्यान रखा जाता था तथा इस के बदले राज्य उन से उपज का 1/6 भाग टैक्स के रूप में लिया जाता था. महर्षि वाल्मीकि का विचार है कि जिस देश में कृषि और कृषकों का विकास होगा. वही देश विकसित होगा. इसीलिए राज्य की ओर से कृषि और वाणिज्य की व्यवस्था की जाती थी. भगवान महर्षि वाल्मीकि ने राज्य की ओर से उद्योग- धंधों की व्यवस्था करने का भी संकेत दिया है, निश्चय ही अयोध्या का राज्य आर्थिक दृष्टि से समृद्ध था.

महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में आदर्श राम राज्य की परिकल्पना प्रस्तुत की है. उन्होंने एक राजा के गुणों की चर्चा की है. रामायण में इस बात का उल्लेख करते हैं कि राजा का मुख्य उद्देश्य प्रजा के सुख-दुख का ध्यान रखना होता है. प्रजा के सुख में ही राजा का सुख होता है. अत: राजा को हर प्रकार से प्रजा को सुखी रखना चाहिए. यह एक कल्याणकारी राज्य था, जिसमें कोई भी दीन, हीन, दुःखी नहीं था. राम राज्य में राजा द्वारा साम, दाम, दंड, भेद की नीति का प्रयोग न के बराबर था, अगर वाल्मीकि जी द्वारा रामायण की रचना न की गयी होती तो श्री राम को समाज के सामने कौन लाता और भगवान राम क्या जन-जन तक पहुँच पाते? महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में राजा के लिए सिद्धान्त या संविधान या नियम बनाए हैं. उन नियमों का पालन करना प्रत्येक राजा का राजधर्म था. राजा उन सिद्धांतों का पालन अपने हितों को छोड़कर पालन करता था.

गोस्वामी तुलसी दास, महात्मा गांधी अन्य व्यक्तियों ने राम राज्य के विचार को समाज में अपने कार्यों द्वारा प्रचारित किया तथा समाज में पुन: राम राज्य लाने के लिए प्रयास किये, इसी कड़ी में राम मनोहर लोहिया द्वारा अयोध्या में राम मेला आयोजन की शुरुआत की.

देवराज सिंह

असि॰ प्रो॰ राजनीतिक विज्ञान

गार्गी महाविद्यालय( दिल्ली विश्वविद्यालय)

 

October 14th 2019, 5:45 am

14 अक्तूबर / पुण्यतिथि – चिर युवा दत्ता जी डिडोलकर

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नई दिल्ली. दत्ता जी डिडोलकर संघ परिवार की अनेक संस्थाओं के संस्थापक तथा आधार स्तम्भ थे. उन्होंने काफी समय तक केरल तथा तमिलनाडु में प्रचारक के नाते प्रत्यक्ष शाखा विस्तार का कार्य किया. उस जीवन से वापस आकर भी वे घर-गृहस्थी के बंधन में नहीं फंसे और जीवन भर संगठन के जिस कार्य में उन्हें लगाया गया, पूर्ण मनोयोग से उसे करते रहे. ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ के कार्य के तो वे जीवन भर पर्यायवाची ही रहे.

सरसंघचालक श्री गुरुजी ने आदर्श महापुरुष की चर्चा करते हुए एक बार कहा था कि वह कभी परिस्थिति का गुलाम नहीं बनता. उसके सामने घुटने नहीं टेकता, अपितु उससे संघर्ष कर अपने लिए निर्धारित कार्य को सिद्ध करता है. वह अशुभ शक्तियों को कभी अपनी शुभ शक्तियों पर हावी नहीं होने देता. इस कसौटी पर देखें, तो दत्ता जी सदा खरे उतरते हैं. दत्ता जी विद्यार्थी परिषद के संस्थापक सदस्य तो थे ही, लम्बे समय तक उसके अध्यक्ष भी रहे. उस समय विद्यार्थी परिषद को एक प्रभावी अध्यक्ष की आवश्यकता थी. उन्होंने अपने मजबूत इरादों तथा कर्तत्व शक्ति के बलपर परिषद के कार्य को देशव्यापी बनाया.

दक्षिण के राज्यों को इस नाते कुछ कठिन माना जाता था, पर दत्ता जी ने वहां भी विजय प्राप्त की. उन्होंने साम्यवादियों के गढ़ केरल की राजधानी त्रिवेन्द्रम में परिषद का राष्ट्रीय अधिवेशन करने का निर्णय लिया. उनके प्रयास से वह अधिवेशन अत्यन्त सफल हुआ. उनका मत था कि विद्यार्थी परिषद किसी राजनीतिक दल की गुलामी के लिए नहीं बना है. बल्कि एक समय ऐसा आएगा, जब सब राजनीतिक दल ईर्ष्या करेंगे कि विद्यार्थी परिषद जैसे कार्यकर्ता हमारे पास क्यों नहीं हैं ? उनके समय के परिषद के कार्यकर्ता आज राजनीति में जो प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं, उससे वह बात शत-प्रतिशत सत्य हुई दिखाई देती है.

दत्ता जी की अवस्था चाहे जो हो, पर वे मन से चिरयुवा थे. अतः वे सदा विद्यार्थियों और युवकों के बीच ही रहना चाहते थे. प्रचारक जीवन से निवृत्त होकर उन्होंने ‘जयंत ट्यूटोरियल’ की स्थापना की. इस संस्था के माध्यम से उन्होंने अनेक छात्रों की सहायता की. इसके पाठ्यक्रम में पढ़ाई के सामान्य विषय तो रहते ही थे, पर कुछ अन्य विषयों के माध्यम से वे छात्र के अन्तर्निहित गुणों को उभारने का प्रयास करते थे. केवल पढ़ाना ही नहीं, तो वे अपने छात्रों की हर प्रकार की सहायता करने को सदा तत्पर रहते थे. जब कन्याकुमारी में विवेकानंद शिला स्मारक बनाने का निश्चय हुआ, तो दत्ता जी उस समिति के संस्थापक तथा फिर कुछ समय तक महामंत्री भी रहे. 1989 में जब संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी की जन्म शताब्दी मनाई गयी, तो उसके क्रियान्वयन के लिए बनी समिति के भी वे केन्द्रीय सहसचिव थे.

वे विश्व हिन्दू परिषद के पश्चिमांचल क्षेत्र के संगठन मंत्री भी रहे. छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्यारोहण की 300 वीं जयन्ती उत्साहपूर्वक मनाई गयी. उस समारोह समिति के भी वे सचिव थे. नागपुर में नागपुर विद्यापीठ की एक विशेष पहचान है. वे उसकी कार्यकारिणी के सदस्य थे. इतना सब होने पर भी उनके मन में प्रसिद्धि की चाह नहीं थी. उन्होंने जो धन कमाया था, उसका कुछ भाग अपने निजी उपयोग के लिए रखकर शेष सब बिना चर्चा किये संघ तथा उसकी संस्थाओं को दे दिया. सदा हंसते रहकर शेष सब को भी हंसाने वाले चिर युवा, सैकड़ों युवकों तथा कार्यकर्ताओं के आदर्श दत्ता जी डिडोलकर का 14 अक्तूबर, 1990 को देहांत हुआ.

October 13th 2019, 11:42 pm

महान खगोलशास्त्री थे महर्षि वाल्मीकि

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महर्षि वाल्मीकि जयंती के अवसर पर संस्कृत के आदि कवि तथा ‘रामायण के रचियता के बारे में यह जान कर आपको हैरानी होगी कि महर्षि वाल्मीकि एक महान खगोलशास्त्री थे. खगोलशास्त्र पर उनकी पकड़ उनकी कृति ‘रामायण’ से सिद्ध होती है. आधुनिक साफ्टवेयरों के माध्यम से यह साबित हो गया है कि रामायण में दिए गए खगोलीय संदर्भ शब्दश: सही हैं.

भारतीय वेदों पर वैज्ञानिक शोध संस्थान की पूर्व निदेशक सुश्री सरोज बाला ने इस संदर्भ में 16 साल के शोध के बाद एक पुस्तक ‘रामायण की कहानी, विज्ञान की जुबानी’  में कई दिलचस्प तथ्य उजागर किए हैं. आईए इनमें से कुछ पर नज़र डालते हैं……..

अगर हम महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण को ध्यान से पढ़ें तो पता चलता है कि इस ग्रंथ में श्रीराम के जीवन से संबंधित सभी महत्वपूर्ण घटनाओं के समय पर आकाश में देखी गई खगोलीय स्थितियों का विस्तृत एवं क्रमानुसार वर्णन है.

ध्यान रहे कि नक्षत्रों व ग्रहों की वही स्थिति 25920 वर्षों से पहले नहीं देखी जा सकती है. सरोज बाला की पुस्तक के अनुसार उन्होंने प्लैनेटेरियम गोल्ड सॉफ्टवेयर-संस्करण 4.1 का उपयोग किया क्योंकि यह साफ्टवेयर समय, तारीख और स्थान के साथ-साथ उच्च रिज़ोल्यूशन वाले आकाशीय दृश्य प्रदान करता है.

इसी प्रकार शोधकर्ताओं ने महर्षि वाल्मीकि की रामायण के खगोलीय संदर्भों की सत्यता को मापने के लिए स्टेलेरियम सॉफ्टवयेर का भी उपयोग किया. इसके इस्तेमाल से भी यही पता चला कि रामायण में वर्णित ग्रहों व नक्षत्रों की स्थिति, तत्कालीन आकाशीय स्थिति व खगोल से जुड़ी सभी जानकारियां अक्षरश: सत्य थीं. जो वर्णन रामायण में जिस वर्ष, तिथि और समय पर दिया गया है, उन्हें इन सॉफ्टवेयर्स में डालने पर हूबहू वैसे ही तस्वीरें सामने आती हैं.

आप चाहें तो आप भी इसे जांच सकते हैं. स्टेलेरियम एक ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर है, मतलब इसे निःशुल्क इंटरनेट से डाउनलोड किया जा सकता है.

सरोज बाला के अनुसार, स्काई गाइड सॉफ्टवेयर भी स्टेलेरियम सॉफ्टवेयर द्वारा दर्शाए गए इन क्रमिक आकाशीय दृश्यों की तिथियों का पूर्ण समर्थन करता है. इन दोनों सॉफ्टवेयर के परिणाम एक जैसे होने के कारण पाठक अपने मोबाइल, आइपैड, लैपटॉप या कंप्यूटर पर इस पुस्तक में दिए गए आकाशीय दृश्यों की तिथियों का सत्यापन कर सकते हैं.

‘प्लेनेटेरियम सिमुलेशन सॉफ्टवेयर का उपयोग करते हुए रामायण के संदर्भों की इन क्रमिक खगोलीय तिथियों का पुष्टिकरण आधुनिक पुरातत्व विज्ञान, पुरावनस्पति विज्ञान, समुद्र विज्ञान, भू-विज्ञान, जलवायु विज्ञान, उपग्रह चित्रों और आनुवांशिकी अध्ययनों ने भी किया है.’

रामायण में दिए गए खगोलीय संदर्भ कितने सटीक थे, इसका एक उदाहरण श्री राम के जन्म के समय के वर्णन से मिलता है. जब श्रीराम का जन्म हुआ तो महर्षि वाल्मीकि ने उस समय के ग्रहों, नक्षत्रों, राशियों का इस प्रकार वर्णन किया है:

ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतुनां षट् समत्ययु:

ततश्रच द्वादशे मसो चैत्रे नावमिके तिथौ ..

नक्षत्रे दितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पुंचसु.

ग्रहेषु कर्कट लगने वाक्पताविन्दुना सह ..

प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम.

कौसल्याजनयद् रामं दिव्यलक्षणंसंयुतम..

इसका अर्थ है कि जब कौशल्या ने श्रीराम को जन्म दिया, उस समय सूर्य, शुक्र, मंगल, शनि और बृहस्पति, ये पांच ग्रह अपने-अपने उच्च स्थान में विद्यमान थे तथा लग्न में चंद्रमा के साथ बृहस्पति विराजमान थे.

यह वैदिक काल से भारत में ग्रहों व नक्षत्रों की स्थिति बताने का तरीका रहा है. बिना किसी परिवर्तन के आज भी यही तरीका भारतीय ज्योतिष का आधार है.

जो वर्णन रामायण में है, वही साफ्टवेयर में डाला जाए तो जो तस्वीर सामने आती है, उसमें इन सभी खगोलीय विन्यासों को अयोध्या के अक्षांश और रेखांश – 27 डिग्री उत्तर और 82 डिग्री पूर्व – से 10 जनवरी 5114 वर्ष ईसा पूर्व को दोपहर 12 से 2 बजे के बीच के समय में देखा जा सकता था. यह चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि थी. यह बिल्कुल वही समय व तिथि है, जिसमें समस्त भारत में आज तक रामनवमी मनाई जाती है. ध्यान रहे कि ऐसे खगोलीय विन्यास पिछले 25000 सालों में नहीं बन पाए हैं, जैसे श्रीराम के जन्म के समय थे जो लगभग 7000 साल पहले हुआ था.

यह केवल एकमात्र उदाहरण है. ऐसे सैकड़ों वर्णनों को रामायण से लेकर सॉफ्टवेयर में डालने से पता चला है कि हर वर्णन इसी प्रकार खगोलशास्त्र की कसौटी पर खरा उतरता है.

इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि राम कोई मिथक नहीं, न ही रामायण कोई कल्पना की उड़ान है. श्रीराम सूर्यवंशी राजकुल के 64वें यशस्वी शासक थे. महर्षि वाल्मीकि श्रीराम के समकालीन थे. आदिकवि वाल्मीकि ने अयोध्या के राजा के रूप में श्रीराम का राज्यारोहण होने के बाद रामायण की रचना आरंभ कर दी थी. इस ग्रंथ में श्रीराम का जीवनचरित संस्कृत के 24000 श्लोकों के माध्यम से दिया गया है. रामायण में उत्तरकांड के अलावा छह और अध्याय हैं: बालकांड, अयोध्या कांड, अरण्य कांड, किष्किंधा कांड, सुंदर कांड तथा युद्धकांड.

October 12th 2019, 8:11 pm

13 अक्तूबर / पुण्यतिथि – क्रांति और भक्ति के साधक राधा बाबा

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नई दिल्ली. राधा बाबा के नाम से विख्यात श्री चक्रधर मिश्र जी का जन्म ग्राम फखरपुर (गया, बिहार) में 1913 ई. की पौष शुक्ल नवमी को एक राजपुरोहित परिवार में हुआ था. सन् 1928 में गांधी जी के आह्वान पर गया के सरकारी विद्यालय में उन्होंने यूनियन जैक उतार कर तिरंगा फहरा दिया था. शासन विरोधी भाषण के आरोप में उन्हें छह माह के लिये कारावास में रहना पड़ा.

गया में जेल अधीक्षक एक अंग्रेज था. सब उसे झुककर ‘सलाम साहब’ कहते थे, पर इन्होंने ऐसा नहीं किया. अतः इन्हें बुरी तरह पीटा गया. जेल से आकर ये क्रांतिकारी गतिविधियों में जुट गये. गया में राजा साहब की हवेली में इनका गुप्त ठिकाना था. एक बार पुलिस ने वहां से इन्हें कई साथियों के साथ पकड़ कर ‘गया षड्यन्त्र केस’ में कारागार में बंद कर दिया. जेल में बंदियों को रामायण और महाभारत की कथा सुनाकर वे सबमें देशभक्ति का भाव भरने लगे. अतः इन्हें तन्हाई में डालकर अमानवीय यातनायें दी गयीं, पर ये झुके नहीं. जेल से छूटकर इन्होंने कथाओं के माध्यम से धन संग्रह कर स्वाधीनता सेनानियों के परिवारों की सहायता की. जेल में कई बार हुई दिव्य अनुभूतियों से प्रेरित होकर उन्होंने 1936 में शरद पूर्णिमा पर संन्यास ले लिया. कोलकाता में उनकी भेंट स्वामी रामसुखदास जी एवं सेठ जयदयाल गोयन्दका जी से हुई. उनके आग्रह पर वे गीता वाटिका, गोरखपुर में रहकर गीता पर टीका लिखने लगे. वहां भाई श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी से हुई भेंट से उनके मन की अनेक शंकाओं का समाधान हुआ. इसके बाद तो वे भाई जी के परम भक्त बन गये. गीता पर टीका पूर्ण होने के बाद वे वृन्दावन जाना चाहते थे, पर सेठ गोयन्दका जी एवं भाई जी की इच्छा थी कि वे उनके साथ हिन्दू धर्मग्रन्थों के प्रचार-प्रसार में योगदान दें. भाई जी के प्रति अनन्य श्रद्धा होने के कारण उन्होंने यह बात मान ली. 1939 में उन्होंने शेष जीवन भाई जी के सान्निध्य में बिताने तथा आजीवन उनके चितास्थान के समीप रहने का संकल्प लिया. बाबा का श्रीराधा माधव के प्रति अत्यधिक अनुराग था. समाधि अवस्था में वे नित्य श्रीकृष्ण के साथ लीला विहार करते थे. हर समय श्री राधा जी के नामाश्रय में रहने से उनका नाम ‘राधा बाबा’ पड़ गया. 1951 की अक्षय तृतीया को भगवती त्रिपुर सुंदरी ने उन्हें दर्शन देकर निज मंत्र प्रदान किया. 1956 की शरद पूर्णिमा पर उन्होंने काष्ठ मौन का कठोर व्रत लिया. बाबा का ध्यान अध्यात्म साधना के साथ ही समाज सेवा की ओर भी था. उनकी प्रेरणा से निर्मित हनुमान प्रसाद पोद्दार कैंसर अस्पताल से हर दिन सैंकड़ों रोगी लाभ उठा रहे हैं. 26 अगस्त, 1976 को भाई जी के स्मारक का निर्माण कार्य पूरा हुआ. गीता वाटिका में श्री राधाकृष्ण साधना मंदिर भक्तों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है. इसके अतिरिक्त भक्ति साहित्य का प्रचुर मात्रा में निर्माण, अनाथों को आश्रय, अभावग्रस्तों की सहायता, साधकों का मार्गदर्शन, गोसंरक्षण आदि अनेक सेवा कार्य बाबा की प्रेरणा से सम्पन्न हुये. 1971 में भाई जी के देहांत के बाद बाबा उनकी चितास्थली के पास एक वृक्ष के नीचे रहने लगे. 13 अक्तूबर, 1992 को इसी स्थान पर उनकी आत्मा सदा के लिये श्री राधा जी के चरणों में लीन हो गयी. यहां बाबा का एक सुंदर श्रीविग्रह विराजित है, जिसकी प्रतिदिन विधिपूर्वक पूजा होती है.

October 12th 2019, 5:50 pm

प्रकृति और मानव को संतुलित रखता है यज्ञ – महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरी जी महाराज

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नई दिल्ली. लक्ष्मी नारायण मंदिर (बिड़ला मंदिर) में छह दिवसीय चतुर्वेद स्वाहाकार महायज्ञ कार्यक्रम का आयोजन विश्व हिन्दू परिषद् व अशोक सिंघल फाउंडेशन द्वारा किया जा रहा है. लक्ष्मीनारायण मंदिर, मंदिर मार्ग में वेदों को लेकर पूज्य संतों, माताओं, बहनों, पुरुषों ने तीन किमी यात्रा की. श्रीश्रीश्री त्रिदंडी स्वामी रामानुजाचार्य चिन्जय स्वामी जी ने विस्तार पूर्वक वेद से सम्बन्धित छह दिवसीय आयोजन में होने वाली सम्पूर्ण प्रक्रिया की जानकारी दी. उन्होंने यज्ञ की प्रक्रिया को बताया कि यज्ञ में क्या और क्यों यह हो रहा है तथा इसके पीछे का उद्देश्य बताया. दोनों सत्रों में प्रातः 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक और शाम को 5 बजे से रात्रि 8 बजे तक चारों वेदों का अलग-अलग यज्ञ कुंडों पर उच्चारण होगा, वेद मंत्र कंठस्थ वेदपाठी, विद्वानों द्वारा अलग-अलग यज्ञ कुंडों में शुद्ध सस्वर उच्चारण करते हुए यज्ञ में आहुति दी. इसी क्रम में 14 अक्तूबर को प्रातः पूर्णाहुति संपन्न होगी.

जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरी जी ने महायज्ञ के उद्देश्य पर कहा कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण विश्व में वैष्मयता बढ़ रही है, प्रकृति में प्रतिकूलता बढ़ रही है तो हम ऐसा मानते हैं कि यज्ञ के माध्यम से धरती, अम्बर, अग्नि, जल, वायु, निहारिका, नक्षत्रों का संतुलन बनेगा और प्राणियों में सद्भावना आती है. यज्ञ से उन्माद शिथिल होता है, उत्तेजना शिथिल होती है. यज्ञ के माध्यम से जो हारमोन-कैमिकल्स डेवलप होते हैं जो व्यक्ति को सहज, स्वाभाविक, नैसर्गिक, प्रकृतिक और संयमित रखते हैं, उसे संतुलित करते हैं. यज्ञ से पाचक रस सहज बनते हैं. यज्ञ के परिणाम यह भी देखे गए कि समूची प्रकृति में एकता आ जाती है, एकरूपता आ जाती है. यज्ञ सब के कल्याण की चीज है.. सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे संतु निरामयः, तो सबका आनन्द हो, सबके स्वाभिमान सम्मान की रक्षा हो.

विश्व हिन्दू परिषद की प्रबन्ध समिति के सदस्य दिनेश चन्द्र जी ने कहा कि विश्व के कल्याण के लिए यह यज्ञ है. वेद के विषय में अनेक भ्रांतियां फैली हैं, जैसे महिलाएं वेद नहीं पढ़-सुन नहीं सकतीं, कोई विशेष वर्ग नहीं सुन सकता, यह सच नहीं है. यजुर्वेद के 26वें मंडल के दूसरे अध्याय में बहुत स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि वेदों का ब्रह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, नारी, सेवक कोई भी श्रवण, अध्ययन और पठन कर सकता है और किसी को भी उसका श्रवण करा सकता है. वेद के बारे में फैले भ्रम इत्यादि दूर हों, इसलिए दिल्ली में ऐसा महायज्ञ पहली बार हो रहा है. सामाजिक समरसता की दृष्टि से भी यह ऐतिहासिक है, इसमें झुग्गियों से लेकर महलों तक रहने वाले विभिन्न समाज नेता, धर्म नेता, राज नेता, सभी को बुला रहे हैं, वे सब आ रहे हैं. दक्षिण के 61 आचार्य यहां आए हुए हैं, जिनको वेद कंठस्थ हैं. घनपाठी विद्वान आए हैं जो शुरु से जो वाक्य पढ़ा उसे उसी स्वर में विपरीत दिशा में भी उसको उसी रूप में बोल सकते हैं, ऐसे वर्षों में तैयार होने वाले घनपाठी विद्वान भी यहां आए हैं.

महायज्ञ में यजमान के नाते महेश भागचंदका व उनका परिवार, विश्व हिन्दू परिषद के संयुक्त महामंत्री कोटेश्वर जी, विश्व हिन्दू परिषद से दिनेश चन्द्र जी एवं अनिल सिंघल जी का परिवार, कोहली टेंट के कीमती लाल धर्म पत्नी, पुत्र एवं पुत्र वधु सहित उपस्थित थे. प्रातः 8:15 बजे से यह सभी यजमानों ने पूर्ण विधि विधान से पांचों यज्ञ कुंडों में भगवान को अपर्ण करते हुए विधिवत आहुति दी.

वेद कंठस्थ करने की जो परंपरा विश्व हिन्दू परिषद ने गत 17 वर्षों से प्रारम्भ की है, उसमें मंडोली के वेद विद्यालय के बटुक भी इस यज्ञ में वेद मंत्रोच्चारण करते हुए उपस्थित थे. माताएं, बहनें, पुरुष और अनेक विद्वान, संस्कृत के अनेक ज्ञाता, लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विश्व विद्यालय के कुलपति रमेश पांडे जी महाराज, उनके साथ जिनको अलग-अलग वेद कंठस्थ हैं, ऐसे प्रोफेसर सहचार के रूप में यहां उपस्थित थे. विश्व हिन्दू परिषद के संगठन महामंत्री मिलिंद जी परांडे, संगठन महामंत्री विनायक देशपांडे जी, संयुक्त महामंत्री राघवलू जी, विद्या भारती अखिल भारतीय सह संगठन मंत्री शिव कुमार जी, संस्कृत भारती से श्रीनिवास जी, व समाज के अनेक प्रबुद्ध लोग महायज्ञ में सम्मिलित हुए.

यज्ञ सत्र में प्रयाग के सच्चा बाबा गोपाल जी, ऋषिकेश के जगद्गुरु कृष्णाचार्य जी महाराज, महामंडलेशवर प्रज्ञानंद जी आदि संतों ने वेदों पर अपने विचार रखे.

October 11th 2019, 7:55 am

राष्ट्र की समृद्धि व शक्ति उसके राष्ट्रभक्त समाज में निहित होती है – ब्रिगेडियर सुचेत सिंह जी

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना दिवस पर पथ संचलन का आयोजन किया गया. कार्यक्रम का आयोजन सांबा के पौराणिक किले में किया गया, जहां सर्वप्रथम सभी स्वयंसेवकों ने शक्ति पूजन किया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत संघचालक ब्रिगेडियर सुचेत सिंह जी ने शस्त्र पूजन किया. कार्यक्रम की अध्यक्षता राज सिंह जी ने की.

राज सिंह जी ने कहा कि संविधान सेना के बाद यदि देश की सेवा में सबसे ज्यादा अगर किसी का योगदान है तो वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है. उन्होंने समाज से यह आह्वान किया कि समाज के हर वर्ग को, हर आयु के व्यक्तियों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ना चाहिए ताकि वह देश हित में कार्य कर सकें.

जम्मू कश्मीर के प्रांत संघचालक ब्रिगेडियर सुचेत सिंह जी ने स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना सन् 1925 में विजयादशमी के दिन हुई थी. हमारा भारतीय समाज रोज एक नया उत्सव मनाता है. विजयादशमी उत्सव असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है, विजयादशमी के दिन ही मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था. इसीलिए हम आज के दिन शक्ति पूजन करते हैं. विजयादशमी के दिन ही भगवान राम ने रावण का वध किया था. उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र की शक्ति उसके समाज में है ना कि उसके भव्य स्वरूप या भव्य सेना में. समृद्धि व शक्ति उसके राष्ट्रभक्त समाज में निहित होती है.

इसके पश्चात पथ संचलन में 485 से अधिक स्वयंसेवक तीन वाहिनियों में बढ़ते हुए बाजार चौहटा चौक, नए बस अड्डे की ओर चले और शहर के विभिन्न स्थानों से होते हुए तीनों वाहिनियां  मुख्य चौक में पहुंचते ही त्रिवेणी संगम की तरह विलीन हुईं. पथ संचलन अस्पताल रोड से होते हुए फिर किले तक पहुंचा,  जहां कार्यक्रम का समापन हुआ.

October 11th 2019, 4:50 am
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