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15 नवंबर – भगवान बिरसा मुंडा जयंती जनजातीय गौरव दिवस घोषित

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नई दिल्ली. केंद्र सरकार ने भगवान बिरसा मुंडा जयंती 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की. केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आज इसे स्वीकृति प्रदान की. यह दिवस जनजाति समाज के स्‍वतंत्रता सेनानियों की स्‍मृति को समर्पित है, जिससे आने वाली पीढ़ियां देश के प्रति उनके बलिदान के बारे में जान सकें. संथाल, तामार, कोल, भील, खासी और मिज़ो जैसी अनेक जनजातीयों ने विभिन्न आंदोलनों के माध्यम से भारत के स्वतंत्रता संग्राम को मजबूत किया था.

जनजातीय समुदाय के क्रांतिकारी आंदोलनों और संघर्षों को उनके अपार साहस एवं सर्वोच्च बलिदान की वजह से जाना जाता है. देश के विभिन्न क्षेत्रों में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ जनजाति समाज के आंदोलनों को राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा और इसने पूरे देश में भारतीयों को प्रेरित किया. हालांकि, देश के ज्यादातर लोग इन नायकों को लेकर ज्यादा जागरूक नहीं है. भारत सरकार ने देश भर में 10 जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों को स्वीकृति दी है.

15 नवंबर को भगवान बिरसा मुंडा की जयंती होती है. बिरसा मुंडा ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की शोषण वाली नीति के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी और ‘उलगुलान’ (क्रांति) का आह्वान करते हुए ब्रिटिश दमन के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया.

जनजातीय गौरव दिवस हर साल मनाया जाएगा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और वीरता, आतिथ्य और राष्ट्रीय गौरव के भारतीय मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए जनजातीयों के प्रयासों को मान्यता देगा. रांची में जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय का उद्घाटन प्रधानमंत्री द्वारा किया जाएगा, जहां भगवान बिरसा मुंडा ने अंतिम सांस ली थी.

भारत सरकार ने जनजातीय लोगों, संस्कृति और उपलब्धियों के गौरवशाली इतिहास के 75 साल पूरे होने का उत्सव मनाने के लिए 15 नवंबर से 22 नवंबर 2021 तक चलने वाले समारोह के आयोजन की योजना बनाई है.

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November 12th 2021, 2:26 pm

कारनामा – राज्य उत्सव में आयोजित प्रदर्शनी में जनजाति समाज के लोगों को नुमाइश में बैठाया

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रायपुर. राज्य सरकार सत्ता में आने के बाद से ही जनजाति समाज की निरंतर अनदेखी कर रही है, जनजाति समाज के हितों के खिलाफ निर्णय ले रही है. यही कारण है कि, स्थानीय जनजाति समाज विभिन्न विषयों को लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहा है.

फिर चाहे जनजाति विकास आयोग में पादरी की सदस्य के रूप में नियुक्ति हो, या चाहे सरगुजा क्षेत्र में ईसाई मिशनरियों द्वारा जनजाति समाज की रीति परंपरा का अपमान करने का मामला हो या बस्तर क्षेत्र में लगातार हो रहे मतांतरण का विषय हो. इसके अलावा पंडो जनजाति के साथ हो रहा अन्याय हो या प्रदेश के जनजाति समाज कल्याण मंत्री द्वारा मजाक उड़ाना हो. सभी विषयों को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार लगातार विवादों में रही है और उसे आलोचना का सामना करना पड़ा है.

अब एक बार फिर छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने नया कारनामा कर दिखाया है. जिसके बाद से सरकार जनजाति समाज के निशाने पर है.

छत्तीसगढ़ में राज्य स्थापना दिवस उत्सव के दौरान राजधानी रायपुर में एक बड़ा आयोजन किया गया था, जिसमें जनजाति समाज को एक तरह से अपमानित किया गया. आयोजन में एक विशेष प्रदर्शनी लगाई गई थी, जिसमें आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग ने बैगा जनजातियों की संस्कृति को प्रदर्शित किया था.

लेकिन, हैरान करने वाली बात है कि जनजातियों की भावनाओं, मान-सम्मान को आहत करते हुए बैगा जनजाति के नागरिकों को ही प्रदर्शनी स्थल पर बैठा दिया था, जहां राज्योत्सव देखने पहुंचे लोग उनके साथ सेल्फी ले रहे थे और उन्हें मनोरंजन का साधन समझ रहे थे. बैगा जनजाति के लोग एक सांस्कृतिक समूह का हिस्सा थे.

दरअसल, जो जनजाति आज विलुप्त की कगार पर है उसे भूपेश बघेल की सरकार प्रदर्शनी के तौर पर पेश कर रही है और उन्हें मनोरंजन के साधन के रूप में सरकारी स्टॉल में बिठा दिया गया. एक नागरिक को इस तरह से प्रदर्शनी के रूप में बैठाना, ना सिर्फ जनजाति संस्कृति का अपमान है, बल्कि यह मानव अधिकार का भी उल्लंघन है.

इनपुट – https://thenarrativeworld.in

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November 12th 2021, 2:26 pm

जनजातीय गौरव दिवस’ की घोषणा जनजातीय समाज के समर्पण का सम्मान है – अभाविप

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नई दिल्ली. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने जनजातीय अस्मिता के नायक भगवान बिरसा मुंडा के जन्मदिवस 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस मनाने के केंद्र सरकार के निर्णय का स्वागत किया.

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जनजाति समाज का बहुमूल्य योगदान रहा है. सैकड़ों जनजाति क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर देश को आजादी दिलवाई है. साथ ही देश, संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिये जनजातीय समाज सदैव अग्रिम पंक्ति में रहा है. ऐसे में जनजातीय समाज की भावनाओं का आदर करते हुए भगवान बिरसा मुंडा जी की जयंती को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाने का केंद्र सरकार का निर्णय बहुत ही सार्थक तथा सम्पूर्ण जनजातीय समाज के साथ-साथ पूरे देश को गौरवान्वित करने वाला है.

अभाविप की राष्ट्रीय महामंत्री निधि त्रिपाठी ने कहा कि, “हम भारत सरकार के निर्णय का अभिनन्दन करते हैं तथा भारत की प्रकृति एवं संस्कृति के रक्षक जनजाति समाज के लिए यह निर्णय सार्थक सिद्ध होगा तथा भारत के गौरवशाली इतिहास को पुनर्स्थापित करेगा.”

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November 12th 2021, 2:26 pm

सेवागाथा – उम्मीद की नई किरण सावित्रीबाई फुले एकात्म समाज मंडल (औरंगाबाद महाराष्ट्र)

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रश्मि दाधीच

औरंगाबाद के पास एक छोटे से गांव खामखेडा में 65 वर्ष की भामा आजी की आंखें भर आईं, जब पहली बार वह सरकारी कागजों पर अंगूठे की जगह अपनी कलम से हस्ताक्षर कर रही थी. बरसों से अपने गांव को जानती है, पर आज बस पर लिखे अपने गांव के नाम \”खामखेडा”\ को जोर जोर से पढ़कर सभी गांव वालों को ये बता रही थीं कि अब उन्हें पढ़ना लिखना आता है. शायद उन्हें अब भी विश्वास नहीं हो रहा था कि वह पढ़ना सीख चुकी है. तो वहीं दूसरी ओर औरंगाबाद के इंदिरा नगर की रहने वाली आशा जब शराबी पति के कारण दाने-दाने को मजबूर थी व हालात सुधरने की उम्मीद छोड़ चुकी थी, तब वो 22 वर्ष की उम्र में सावित्रीबाई फुले एकात्म समाज मंडल के संपर्क में आई. आज आशा ताई 42 वर्ष की उम्र में बहुत से लोगों को अपने नर्सिंग ब्यूरो में न केवल काम सिखा रही है, बल्कि रोजगार भी दे रही है. सामाजिक कुरीतियों की सभी बेड़ियों को तोड़, रुकी हुयी शिक्षा को पुन: शुरू कर कक्षा 10वीं और विज्ञान में कक्षा 12वीं व स्नातक करना, वह भी तीन बच्चों की जिम्मेदारियों के साथ इतना आसान नहीं था. परंतु संस्था के \”सशक्त नारी\” \”सशक्त परिवार\” की सोच ने हौसला भी दिया और जीवन में एक नई दिशा भी. मंडल के अध्यक्ष व औरंगाबाद के पूर्व नगर कार्यवाह डॉ. दिवाकर कुलकर्णी जी बताते हैं कि सावित्रीबाई फुले एकात्म समाज मंडल से स्वयंसेवी महिलाओं के 302 (बचत गट) स्व सहायता समूह व विभिन्न परियोजनाओं से करीब 2000 से ज्यादा (स्वयंसेवी) सेवाव्रती जुड़े हैं.

इसके अंतर्गत चल रहे करीब 43 से ज्यादा प्रोजेक्ट, जिनमें कुछ निःशुल्क एवं कई नाममात्र के टोकन शुल्क पर आधारित हैं. जिनमें निःस्वार्थ सेवा दृष्टि से प्राथमिक स्वास्थ्य, सेवा, शिक्षा, कृषि, सुरक्षित जल, बालकों, विद्यार्थियों और किशोरियों के लिए व्यक्तित्व विकास केंद्र, नारी सशक्तिकरण व जीवन स्तर को सुदृढ़ एवं समृद्ध बनाने के कौशल विकास केंद्र जैसी परियोजनाओं का लाभ औरंगाबाद नगर की 45 पिछड़ी बस्तियों (कच्ची बस्ती) व आसपास के 270 गांवों के करीब 55 लाख से अधिक लोगों को किसी न किसी रूप में मिला है.

लाखों लोगों के जीवन में उम्मीद और आशा भरने वाले इस मंडल की स्थापना कब और कैसे हुई यह कहानी बड़ी रोचक है – “आम आदमी को सस्ती कीमत पर गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने के मुख्य उद्देश्य से मातृ संस्था डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर वैद्यकीय प्रतिष्ठान के अंतर्गत 7 डॉक्टर्स ने अपनी पूंजी से 1989 में डॉ. हेडगेवार अस्पताल (औरंगाबाद) की स्थापना हुई. सर्वप्रथम डॉ. हेडगेवार अस्पताल द्वारा नगर की तीन पिछड़ी बस्तियों में आरोग्य केंद्र स्थापित किए गए. किंतु सिर्फ इतना काफी नहीं था, सेवा बस्तियों के बच्चों की पढ़ाई एवं महिलाओं के सशक्तिकरण की जरूरत को समझते हुए 1994 में सावित्रीबाई फुले महिला एकात्म समाज मंडल (SPMESM) की नींव रखी गयी. सावित्रीबाई फुले एकात्म समाज मंडल की ट्रस्टी माधुरी दीदी बताती हैं कि, पैसों की तंगी और बालविवाह करने की मानसिकता इन बस्तियों में आम थी.16 वर्ष आयु की प्रियंका बहुत ही शांत और शर्मीली थी. उन परिस्थितियों में कम उम्र में ही उसकी शादी हो जाती, परंतु पढ़ाई के साथ साथ उसने मंडल के सहयोग से मुकुंदवाडी में कराटे का प्रशिक्षण लिया. आज कराटे में ब्लैक बेल्ट प्रियंका राज्य स्तर चैंपियन है एवं मुकुंदवाडी के आरोग्य केंद्र में सभी बच्चों को निःशुल्क प्रशिक्षण दे रही है. अब किशोरियां स्वयं संगठित होकर अपनी आवाज को बुलंद कर रही हैं.

मंडल के अंतर्गत चल रहे 18 विद्यार्थी विकास केंद्र एवं 19 किशोरी विकास केंद्र, जिनमें 10 केन्द्रों में 15000 से ज्यादा लड़के-लड़कियों को प्रबोधन तक ले जाने का कार्य चल रहा है. कम उम्र में विवाह एवं पढ़ाई छोड़ने वालों पर नज़र रखने और रोकने के लिए विभिन्न गतिविधियों के साथ शिक्षा को बढ़ावा देना, किशोरावस्था पर जागरूकता और किशोरियों के स्वास्थ्य के मुद्दों से जुड़े सभी गतिविधियों पर विशेष परियोजना चलाई जा रही हैं. इनके माध्यम से यह युवा पीढ़ी साक्षर, सक्षम, आत्मनिर्भर व नारी सशक्तिकरण के क्रियाकलापों में भाग लेकर स्वयं का आत्मसम्मान और अपने भविष्य को संरक्षित कर रही है. आत्मनिर्भर बनाता कौशल विकास केंद्र गांव हो या शहर सभी के जीवन स्तर को सुधार रहा है. नीलम ने कभी नहीं सोचा था कि वह औरंगाबाद की एक ख्याति प्राप्त ब्यूटीशियन बन जाएंगी और ना ही मीनाक्षी ने यह सोचा था कि वह कभी आटा चक्की मिल की मालकिन बनेंगी. पांचवी कक्षा में पढ़ने आए अविनाश आज जल शुद्धिकरण फैक्ट्री के मालिक हैं जो अपनी सेवा संस्थान में देने को सदैव तत्पर रहते हैं. मंडल की समस्त गतिविधियों में आरंभ से ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली सविता कुलकर्णी कहती हैं – देश का भविष्य बच्चों में उच्च संस्कार और पोषण का आधार बनते मंडल के प्राथमिक शिक्षा केन्द्र ना केवल बच्चों को, बल्कि शिक्षक और माता-पिता को भी उचित ट्रेनिंग दे रहे हैं. विहंग शिक्षण केन्द्र में दिव्यांग बच्चों के लिए अलग-अलग ऑडियोलॉजी – स्पीच थेरेपी, फिजियोथेरेपी, म्यूजिक थेरेपी सपोर्ट, पैरेंट्स सपोर्ट ग्रुप, स्पेशल एजुकेशन पर ट्रेनिंग कोर्स जैसी गतिविधियां चल रही है. करीब 300 से ज्यादा दिव्यांग बच्चों के लिए नए परिसर का निर्माण भी हो रहा है. डॉक्टर भगवान का रूप होते हैं, यह तो हम सभी ने सुना है. परंतु इस संस्थान के अंतर्गत चल रहे विभिन्न आयाम हमें डॉक्टर की विस्तृत सोच और उनके अभूतपूर्व कार्य क्षेत्र को बखूबी दर्शाते हैं.

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November 12th 2021, 2:26 pm

संपूर्ण विश्व की विभीषिकाओं का आध्यात्मिक समाधान भारत का मूल सांस्कृतिक उद्देश्य है

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स्वामी अवधेशानंद गिरि

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भारत की आध्यात्मिक चेतना के केंद्र बिंदु हिमालय पर्वत में अवस्थित श्री केदारनाथ धाम में भगवान आदि शंकराचार्य की समाधि एवं भव्य-दिव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित की गई. सनातन संस्कृति के लिए आदि शंकराचार्य जी का योगदान अमूल्य रहा है. वह हिन्दू धर्म-संस्कृति और उसमें अंतर्निहित दिव्य जीवन मूल्यों को युगानुकूल रूप से प्रस्तुत और पुन:परिभाषित करने वाले भाष्यकार थे. स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत यूं तो हमारे राष्ट्र में निर्वाचित सरकारों द्वारा विकास के अनेक कार्य संपादित हुए हैं, किंतु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह आध्यात्मिक पुरुषार्थ विशेष रूप से प्रशंसनीय है. भगवतपाद आचार्य शंकर भारतीय आध्यात्मिक जगत की नाभिकीय सत्ता हैं. उन्होंने 32 वर्ष की अल्पायु में ही वेदादि समस्त धर्म शास्त्रों का मंथन कर उनसे जिस ज्ञानामृत की निष्पत्ति की, वह मनुष्य मात्र के लिए अनुकरणीय है. धर्म-संस्कृति के रक्षणार्थ उन्होंने जो श्रेष्ठ कार्य संपादित किए, वे किसी सामान्य मनुष्य की सामर्थ्य, यहां तक कि परिकल्पनाओं की परिधि से भी बाहर हैं. आचार्य शंकर जैसी प्रखर प्रतिभा, पांडित्य, प्रचंड-पुरुषार्थ, त्याग और योगैश्वर्य अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता. संभवत: इसीलिए हम सनातन हिन्दू मतावलंबी उन्हें शिव का अवतार मानते हैं. हमारी यह मान्यता कपोल कल्पना नहीं है, अपितु शास्त्रों द्वारा प्रमाणित है.

मुझे स्मरण है कि वर्ष 2013 की केदारनाथ की भीषण आपदा के समय नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और उन्होंने पीड़ितों की सहायता एवं आपदा प्रबंधन में जैसी तत्परता दिखाई थी, वह अभूतपूर्व और आश्चर्यचकित करने वाली थी. प्रधानमंत्री के जीवन का कुछ कालखंड हिमालय में भी व्यतीत हुआ है और ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और शुभ कर्म संलग्नता के मूल में हिमालय में अवस्थित देवात्माओं का दिव्य आशीर्वाद सन्निहित है. कोरोना के भीषण संकट काल में उन्होंने जिस कुशलता से देश का नेतृत्व किया और कोरोना योद्धाओं एवं विज्ञानियों को प्रोत्साहित किया, उसी के परिणामस्वरूप हम अपना स्वदेशी टीका बनाने में सफल रहे. देश में बने टीकों ने कोरोना से लड़ाई में अभूतपूर्व योगदान दिया है. नोटबंदी के समय अथवा जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 और धारा 35-ए की समाप्ति के संदर्भ में लिया गया, उनका साहसिक निर्णय भी अभूतपूर्व था.

अब इसी क्रम में आचार्य शंकर की समाधि और प्रतिमा की स्थापना भारतीय संस्कृति-संस्कार और उसकी दिव्य संवेदनाओं एवं संसार की आद्य सभ्यता का जयघोष ही है. ऐसी विलक्षण अभिप्रेरणा और समायोजन दृढ़संकल्प और दैव सत्ता की सम्मति के बिना असंभव है.

आज विश्व के समक्ष बढ़ती जनसंख्या, पर्यावरण क्षरण, ग्लोबल वार्मिग, जलवायु परिवर्तन और पारस्परिक संघर्ष की जो स्थितियां बनी हुई हैं, उनका एकमात्र समाधान आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैत दर्शन ही है. हमारे पूर्वज ऋषि प्रकृति के गूढ़ रहस्य को समझकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मनुष्य और अन्य पर्यावरणीय घटकों के पारस्परिक सहकार-संतुलन एवं सह-अस्तित्व में ही हमारा जीवन सुरक्षित है. यदि समष्टि में असंतुलन है, धरा, अंबर, जल, वायु आदि दूषित हैं तो मनुष्य अकेले सुखी कैसे हो सकता है? इसलिए हमारी प्रार्थनाओं में सर्वत्र शांति की बात की गई है. आचार्य शंकर द्वारा प्रतिपादित अद्वैत मत मनुष्य और प्रकृति के मध्य परस्पर एकत्व और सामंजस्य के इसी रहस्य को उद्घाटित करता है.

वस्तुत: रूप, गुण-धर्म, प्रकृति और अन्य सभी पारिस्थितिक विषमताओं के बाद भी हमारे मूल में एक ही तत्व विद्यमान है, जिसे ‘आत्म तत्व’ कहा जाता है. आत्मा का वही अविनाशी स्वरूप हमें जाति, धर्म, संस्कृति आदि की विभिन्नताओं और वैविध्य के बाद भी एकत्व प्रदान करता है. संसार के समस्त प्राणियों के भीतर वही एक अविनाशी तत्व विद्यमान है. इस अवबोध के बाद हमारा पारस्परिक विद्वेष-संघर्ष स्वत: समाप्त हो जाएगा. सबका हित, सबकी प्रगति, सबका कल्याण और सर्वत्र समता का भाव ही आचार्य शंकर के अद्वैत दर्शन की प्रमुख विशेषता है. प्रचंड भोगवाद और पारस्परिक संघर्ष से जूझ रहे इस विश्व में अद्वैत का दिव्य विचार ही शांति-सामंजस्य और सद्भाव की स्थापना कर सकता है. इस दृष्टि से आचार्य शंकर के विचारों का प्रसार मानव कल्याण हेतु उच्चतम प्रतिमानों की संस्थापना ही है. भारतीय आध्यात्मिक जगत की प्राणस्थली हिमालय के तुंग शिखर पर विद्यमान श्री केदारनाथ धाम में आचार्य भगवान आदि शंकराचार्य की समाधि का निर्माण एवं भव्य प्रतिमा की स्थापना इसी सत्य को परिपुष्ट करता है. भारत की संस्कृति प्रकाश के विस्तार की संस्कृति है. अपनी उदार भावना से संपूर्ण विश्व को एक करना और जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग आदि पर्यावरणीय आदि विभीषिकाओं का आध्यात्मिक समाधान प्रस्तुत करना ही भारत का मूल सांस्कृतिक उद्देश्य है.

भारत का साफ्ट पावर, योग-आयुर्वेद, आर्ष विद्या और आद्य शंकराचार्य के अद्वैत के विचार द्वारा समग्र विश्व को अनेक समकालीन संकटों से छुटकारा दिलाया जा सकता है. इस दृष्टि से भारत की आध्यात्मिक जीवन पद्धति के प्रसार का संकल्प बहुत ऐतिहासिक है. भारत के शीर्षस्थ संत-सत्पुरुष और सनातन जगत प्रधानमंत्री के प्रति आभार व्यक्त करते हैं.

(लेखक श्रीपंचदशनाम जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर एवं हरिद्वार आश्रम, कनखल के पीठाधीश्वर हैं)

साभार – दैनिक जागरण

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November 12th 2021, 2:26 pm

15 नवम्बर को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की घोषणा स्वागतयोग्य – वनवासी कल्याण आश्रम

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नई दिल्ली. जनजाति अस्मिता के नायक भगवान बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवम्बर को जनजाति गौरव दिवस के रूप में मनाने का निर्णय केंद्र सरकार ने लिया है. अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम सरकार के निर्णय का स्वागत करता है.

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जनजाति समाज का बहुमूल्य योगदान रहा है. सैकड़ों जनजाति क्रांतिकारियों ने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है. भगवान बिरसा मुंडा उन्हीं क्रांतिकारियों के अग्रणी रहे हैं. जल, जमीन, और जंगल रक्षा और अपनी धर्म संस्कृति को बचाने के लिए संघर्ष करने वाले बिरसा मुंडा को जनजाति अस्मिता का नायक माना गया है, इसीलिए उनके जीवनकाल से ही झारखंड के लोग उन्हें “धरती का आबा – भगवान” कहते थे.

वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष रामचंद्र खराडी, और महामंत्री योगेश बापट ने कहा कि आजादी की लड़ाई में जनजाति समाज के गौरवशाली योगदान को याद करने के लिए भगवान बिरसा मुंडा के जन्मदिवस को जनजाति समाज और कल्याण आश्रम जनजाति गौरव दिवस के रूप में कई वर्षों से मनाता आ रहा है. इसके माध्यम से जनजाति समाज अपनी अस्मिता, स्वाभिमान और पहचान खोज रहा था. ऐसे में केंद्र सरकार के इस निर्णय से उसे मान्यता मिल गई है. वनवासी कल्याण आश्रम और सम्पूर्ण जनजाति समाज केंद्र सरकार के इस निर्णय का हार्दिक स्वागत करता है.

बिरसा मुंडा तो जनजाति अस्मिता के प्रतीक थे ही, लेकिन उन्होंने केवल जनजाति समाज के लिए ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण देश की आजादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया था. सरकार का यह निर्णय न केवल बिरसा मुंडा, बल्कि सिदो-कानो, तिलका मांझी, टांट्या भील, राघोजी भांगरे, तलक्कल चंदू, वीर रघुनाथ मंडलोई, उ तीरथ सिंह और रानी गाईदिन्ल्यू, जैसे जनजाति स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को भी मान्यता देता है.

इस वर्ष देश जब आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है तो इस घोषणा का महत्व और भी बढ़ जाता है. अतः भगवान बिरसा मुंडा और अन्य बलिदानियों को याद करते हुए न केवल जनजाति समाज, बल्कि सम्पूर्ण देश 15 नवम्बर का दिन जनजाति गौरव दिवस के रूप में धूमधाम से मनाए, सम्पूर्ण समाज का हम यही आवाहन करते हैं.

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November 12th 2021, 2:26 pm

डर के कारण मुस्लिम बने बंजारा समाज के परिवार ने अपनाया हिन्दू धर्म

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मुजफ्फरनगर के बघरा आश्रम में एक परिवार 18 वर्ष पहले डर की वजह से मुस्लिम बन गया था. अब, इस परिवार ने पुनः हिन्दू धर्म अपना लिया है. महाराज यशवीर ने हवन-पूजन कर विधि-विधान से इनकी सनातन धर्म में वापसी करवाई. 15 सदस्यीय परिवार की मुखिया जरीना अब फिर से मिथलेश बन गई हैं. 18 वर्ष पहले भी उसका यही नाम था.

बागपत के बिनौली क्षेत्र के रहने वाले परिवार ने कई दिन पहले बघरा योग साधना केंद्र आश्रम में  महाराज यशवीर से संपर्क कर स्वैच्छा से हिन्दू धर्म में वापसी की इच्छा व्यक्त की थी, जिसके बाद आश्रम में परिवार के सभी सदस्यों की हवन-पूजन का सनातन दीक्षाएं देकर हिन्दू धर्म में वापसी हुई.

परिवार में दानिश का नाम पूर्व की तरह दिनेश, शमी का नाम बादल, आसमां का कविता, रईस का यशपाल रखा गया है. परिवार में सात महिलाएं, तीन लड़कियां और पांच पुरुषों ने हिन्दू धर्म में पुनः आस्था जताई है. बंजारा समाज के परिवार की कई दिनों की घर वापसी की इच्छा को पूरा किया गया है.

27 नवंबर, 2020 को उत्तर प्रदेश में विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश-2020 लागू हुआ था. इसके बाद से ही एटीएस ने कई मुकदमे दर्ज किए हैं. मेरठ, बरेली, गोरखपुर में अनेक मामले सामने आए हैं. इसके अलावा नोएडा कमिश्नरेट, लखनऊ कमिश्नरेट, प्रयागराज जोन व वाराणसी जोन में एटीएस ने मामले दर्ज किए थे. इसके अलावा उत्तर प्रदेश पुलिस ने मतांतरण के खेल में शामिल गिरोह का भी पर्दाफाश किया था.

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November 12th 2021, 2:26 pm

कर्नाटक – बेलगावी में मिशनरियों द्वारा मतांतरण के प्रयासों का हिन्दू समाज ने किया विरोध

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क्रिश्चियन मिशनरियों द्वारा भारत के विभिन्न हिस्सों में षड्यंत्र के तहत बड़े पैमाने पर मतांतरण का खेल खेला जा रहा है. आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, केरल, छत्तीसगढ़, पूर्वोत्तर के राज्य और कर्नाटक मुख्य रूप से निशाने पर हैं. मिशनरी मतांतरण करवाने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन, आर्थिक सहायता, उपचार के नाम पर सहायता का ढोंग करने से लेकर, अंधविश्वास तक का सहारा लेते हैं.

पिछले दिनों पंजाब के एक गांव को वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें मतांतरण के उद्देश्य से घूम रही टोली को जागरूक गांव वासियों ने भगा दिया था.

इसी क्रम में कर्नाटक के बेलगावी से मतांतरण की साजिश की घटना सामने आई है. जानकारी के अनुसार कर्नाटक के बेलगावी जिले के मराठा कॉलोनी में ईसाई मिशनरियों के एक गिरोह द्वारा योजनाबद्ध तरीके से मतांतरण करवाए जाने का मामला सामने आया है.

दावा किया जा रहा है कि मराठा कॉलोनी स्थित एक ‘आवासीय परिसर’ में चलाए जा रहे मतांतरण केंद्र में बड़े पैमाने पर मतांतरण को अंजाम दिया जा रहा है.

जानकारी मिलने के बाद अब स्थानीय हिन्दू समुदाय ने विरोध प्रदर्शन कर रविवार को इस आवासीय परिसर का घेराव किया गया. लोगों का कहना था कि यहां लगभग 200 से अधिक लोगों को मतांतरण करने के लिए रखा गया है. स्थानीय लोगों का आरोप है कि आर्थिक दृष्टिकोण से पिछड़ी हुई पृष्ठभूमि की महिलाओं सहित बच्चों को भी मतांतरण के उद्देश्य से यहां रखा गया है.

लोगों का कहना है कि ईसाई मिशनरियों द्वारा आवासीय परिसर में प्रार्थना सभा के नाम पर लोगों को बुलाकर उन्हें आर्थिक रूप से सहायता देने का लालच देकर, बहला-फुसलाकर उनका धर्मांतरण कराया जा रहा है.

रविवार को इस प्रकरण पर विरोध बढ़ता देख ईसाई मिशनरी वहां से रफूचक्कर हो गए. ईसाई मिशनरियों के भाग जाने की सूचना मिलने के बाद गुस्साए लोगों ने परिसर में उपस्थित लोगों को कमरे में बंद कर पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद बेलगांव पुलिस ने घटनास्थल पर पहुंचकर घटना की सघनता से जांच करने का आश्वासन देते हुए विरोध प्रदर्शन समाप्त करवाया.

ज्ञात हो कि कर्नाटक में पिछले कुछ वर्षों से ईसाई मिशनरियों द्वारा योजनाबद्ध तरीके से मतांतरण को बढ़ावा दिया जा रहा है. मतांतरण गिरोहों की सक्रियता को देखते हुए अभी हाल ही में विधायक शेखर के नेतृत्व में मतांतरण को लेकर  विधायी समिति ने चर्च व मिशनरी का सर्वे करवाने का निर्णय लिया था.

विधायी समिति की बैठक में अधिकारियों को यह निर्देश दिया गया था कि कर्नाटक के सभी पंजीकृत और गैर पंजीकृत चर्च की सूची तैयार की जाए. साथ ही प्रदेश में अवैध रूप से मतांतरण को बढ़ावा दे रहे मिशनरियों के गिरोह की पहचान कर मतांतरण रोकने के प्रयासों को तेज करने के लिए अधिकारियों को निर्देशित किया था.

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November 12th 2021, 2:26 pm

विश्व को धर्म का वास्तविक स्वरूप समझाने में संतों का महत्वपूर्ण योगदान – डॉ. मोहन जी भागवत

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नरसी के संत नामदेव गुरुद्वारा में सरसंघचालक जी ने दर्शन कर माथा टेका

हिंगोली. राष्ट्रीय सावयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि राष्ट्र का सामर्थ्य, आध्यात्मिक शक्ति पर ही टिका होता है और यह आध्यात्मिक शक्ति को वृद्धिंगत करने हेतु साधु-संतों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है. संपूर्ण विश्व को संतुलित रखने और वास्तविक धर्म समझाने हेतु संतों ने अनेक महत्वपूर्ण कार्य किये. हमारे यहाँ भक्ति के, उपासना के मार्ग अलग अवश्य होंगे, भाषा, परंपरा भिन्न होंगी. परंतु, अंततः सभी भारतीयों की श्रद्धा एक ही है, अंतिम सत्य एक ही है और यही भारत की विशेषता है.

सरसंघचालक जी नरसी में (जिला हिंगोली, महाराष्ट्र) श्री गुरुद्वारा दर्शन पश्चात, स्थानीय नागरिक, संत, सज्जन वृंद से संवाद कर रहे थे. सरसंघचालक आज महराष्ट्र के हिंगोली जिले में संत नामदेव महराज के जन्म से पुनीत नरसी नामदेव स्थान पर गए थे.

सरसंघचालक जी ने कहा कि “भक्तिमार्ग का भौतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्त्व है. महाराष्ट्र में अनेक संतों की परंपरा रही है. श्री संत नामदेव जी ने सरल भाषा में लोगों को भक्तिमार्ग सिखाया. उन्होंने पंजाब तक वारकरी संप्रदाय की पताका लहराई. इसी से हिन्दू समाज के आपस में समन्वय, सद्भाव और आत्मीयता का दर्शन होता है. अत्यंत सामान्य पारंपरिक कथाओं में भी अध्यात्म और सामाजिक जागृति भारत में आज भी दिखाई देती है. इसलिए पंजाब की पावन भूमि ने संत नामदेव जी के मार्ग को सहज स्वीकार किया. संत नामदेव जी की 61 पंक्तियां गुरु ग्रंथ साहब में भी समाविष्ट है. श्री गुरुनानक देव जी, श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने संत नामदेव जी को सदैव आदर और सम्मान का स्थान दिया है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी यही भूमिका है. एक जन, एक संघ. इसमें से ही मूलभूत साक्षात्कार होता है”. नरसी में श्री संत नामदेव महराज के जन्मस्थान, गुरुद्वारा के दर्शन और संत नामदेव जी की समाधि स्थान के दर्शन से मैं धन्य हुआ.

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November 12th 2021, 2:26 pm

हिन्दू त्यौहारों पर निरंतर आघात का सिलसिला

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विकास सारस्वत

पिछले कई वर्षों से कोई भी हिन्दू उत्सव उदारवादियों की झिड़की, महानुभावों के ज्ञान और न्यायिक दखलअंदाजी के बिना संपन्न नहीं हो पाया है. उनकी नजर में यदि करवा चौथ और रक्षाबंधन पितृसत्तात्मक व्यवस्था का रूप हैं तो होली पानी की बर्बादी. इसी तरह इस वर्ग की नजर में जल्लीकट्टू पशुओं से क्रूरता है तो गणेश चतुर्थी पर्यावरण पर आघात. मकर संक्रांति हो या दुर्गा पूजा, जन्माष्टमी हो या शिवरात्रि, इनके लिए हर त्योहार हिन्दुओं में लज्जा भाव उत्पन्न करने का अवसर है. हिन्दुओं का सबसे बड़ा त्योहार होने के कारण दीपावली विशेष रूप से निशाने पर रहती है. अन्य वर्षों की तरह कहीं शासनादेश तो कहीं न्यायिक आदेशों द्वारा पटाखे प्रतिबंधित कर दिए गए. साथ ही खिलाड़ियों, अभिनेताओं और तमाम विज्ञापनों के माध्यम से दीपावली जिम्मेदारी से मनाने के संदेशों का तांता लगा रहा. इन संदेशों का निहित अर्थ यह है कि हिन्दू समाज अपने उत्सवों को लेकर गैर जिम्मेदार और अपरिपक्व है.

निरंतर प्रचार द्वारा दीपावली को प्रदूषण से इस प्रकार जोड़ दिया गया, मानो वर्ष भर के प्रदूषण का कारण केवल दीपावली के पटाखे हों. यह सोच कितनी निमरूल है, इसे आइआइटी कानपुर ने 2016 में अपने शोध द्वारा प्रमाणित किया था. इस शोध में दिवाली के पटाखों को दिल्ली के प्रदूषण के शीर्ष 15 कारकों में भी जगह नहीं मिली थी. इसी प्रकार एनजीटी और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्टों में भी दिल्ली के प्रदूषण में दीपावली के पटाखों का कोई प्रमुख योगदान होने की बात नहीं आई थी, परंतु चाहे सरकारें हों या पर्यावरणविद् या फिर एनजीओ और न्यायालय, प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए मात्र दीपावली के पटाखों पर रोक लगा कर सबने अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली. सड़कों की धूल, वाहनों का धुआं, इमारती निर्माण से जनित गर्द, औद्योगिक इकाइयों, कचरा तथा पराली जलाने से उत्पन्न धुआं, कोयला और फ्लाई एश वह मूल समस्या है, जो दिल्ली में साल भर प्रदूषण का कारण बनती है, परंतु दिवाली के पटाखों के अतिरिक्त इन कारकों पर किसी की चिंता नहीं दिखाई देती. पटाखों पर दुष्प्रचार का प्रभाव ऐसा है कि न्यायालय ने सबसे सुरक्षित माने जाने वाले उस ऑक्सीकारक बेरियम नाइट्रेट को प्रतिबंधित किया, जो सब्जियों में भी पाया जाता है. डब्ल्यूएचओ मानकों के अनुसार भी 700 माइक्रोग्राम बेरियम नाइट्रेट अनुमेय है और यह किसी भी देश में प्रतिबंधित नहीं है.

जाहिर है पटाखों जनित प्रदूषण असल चिंता नहीं है, बल्कि हिन्दू त्योहारों में दखल और हिन्दू समाज में अपराध बोध भरने के लिए उपयोग हो रहा है. जब ऐसे अभिनेता पटाखे न जलाने की अपील करते हैं, जो स्वयं आतिशबाजी करते या उसका आनंद लेते दिख जाते हैं तो इन अभियानों की वास्तविकता पता चल जाता है. न्यायिक और शासकीय हस्तक्षेप इसलिए भी आपत्तिजनक है, क्योंकि यह सिर्फ हिन्दू उत्सवों में ही देखने को मिलता है. जो शासन सड़कों पर नमाज या लाउडस्पीकर पर अजान रोकने में अक्षम रहा है, उसने हिन्दुओं के सबसे बड़े त्योहार का उल्लास कुचल दिया. कभी ‘आवश्यक धार्मिक आचरण’ तो कभी ‘धर्म के मूल सूत्र’ जैसे न्यायिक सिद्धांतों का हवाला देकर अन्य मजहबी विवादों में हस्तक्षेप से इन्कार करने वाले न्यायालय हिन्दू त्योहारों में न सिर्फ दही हांडी की ऊंचाई तय कर देते हैं, बल्कि भगवान अय्यप्पा के मूल नैष्टिक ब्रह्मचर्य व्रत को तोड़ने का फरमान भी दे देते हैं. न्यायपालिका के साथ-साथ एक्टिविस्ट, एनजीओ वर्ग की चिंता भी हिन्दू त्योहारों पर ही व्यक्त होती है. टीवी स्टूडियो से लेकर विद्यालयों तक दीपावली नसीहतों का त्योहार बन गया है. तुलनात्मक रूप से अपने सामाजिक जीवन में बेहद लचीले हिन्दुओं से अपेक्षा रहती है कि वे पर्वों पर भी आज्ञाकारी बच्चों जैसा आचरण कर दोगले उदारवाद की कसौटी पर खरे उतरते रहें.

यहां यह समझना आवश्यक है कि त्योहारों का हमारे सामाजिक जीवन में अर्थ क्या है? बर्ट्रेंड रसल ने इसे बहुत खूबसूरती से व्यक्त किया है. रसल के अनुसार, सभ्यता के क्रम विकास में मानव ने बहुत सी पाशविक प्रवृत्तियों को दबाया है, परंतु साथ ही इस प्रक्रिया ने शिष्टता के ऐसे मानक गढ़े हैं, जिसमें मूल मानवीय प्रकृति के सीधे-साधे मुक्त आचरण को भी दबाया गया है. पर्व और त्योहार हमें बिना शर्मिदा हुए अपने सरल, स्वच्छंद मूल प्राकृतिक आचरण को सीमित समय के लिए ही सही, पर वापस जीने का अवसर देते हैं. उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति ऑफिस से निकल कर बाजार में नृत्य करना शुरू कर दे तो वह अटपटा लगेगा, परंतु त्योहार के उल्लास में समूह के साथ वही नृत्य सहज ही नहीं, अच्छा भी लगता है.

त्योहार हमारे जीवन की नीरसता को तोड़ते हैं. उनके हर पहलू में तर्कसंगति और आधुनिकता के तौर तरीके ढूंढ़ना मूर्खता है, क्योंकि यह नियमित न होकर क्षणिक आचरण है. सभी परिपक्व समाज इस बात को भली-भांति समझते हैं. इसीलिए पश्चिम में टौमैटीनो जैसे आयोजन भी होते हैं और चुनिंदा मौकों पर जमकर आतिशबाजी भी. वहां शासन तंत्र भी समझता है कि प्रदूषण पर नियंत्रण वह चुनौती है, जिससे साल भर जूझकर ऐसा वातावरण दिया जाए, जिसमें लोग आतिशबाजी जैसे आयोजनों का आनंद ले सकें. भारतीय शासन तंत्र को भी चाहिए कि यदि दिल्ली जैसे शहरों में प्रदूषण बड़ी समस्या बना है तो उसके स्थायी समाधान खोजें. निश्चित ही ध्वनि मानकों का ध्यान रखा जाए, परंतु पटाखों के साथ हर प्रकार के ध्वनि प्रदूषण पर कार्रवाई हो. पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध वह तुगलकी फरमान है, जो न केवल सांस्कृतिक आघात है, बल्कि एक बड़े वर्ग को रोजगार से वंचित भी करता है. 2018 तक शिवकाशी के करीब आठ लाख पटाखा उद्योग कारीगरों का रोजगार छिन चुका था. यह संख्या पिछले तीन वर्ष में और भी बढ़ गई है. शासन में बैठे लोगों को चाहिए कि पटाखों पर व्यावहारिक और संवेदनशील रवैया अपनाएं. साथ ही वर्ष में एक बार आने वाले हिन्दू तीज-त्योहारों को त्योहार ही रहने दें, उन्हें शैक्षणिक प्रयोजन न बनाएं.

(लेखक इंडिक अकादमी के सदस्य एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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November 12th 2021, 2:26 pm

हरियाणा – दो विवि में व्यक्तित्व विकास और वैदिक गणित का प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम

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नई दिल्ली. शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली ने हरियाणा के जे.सी. बोस विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय तथा अग्रवाल महाविद्यालय के साथ चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व विकास तथा वैदिक गणित के प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम संचालित करने हेतु अनुबंध किया गया है.

न्यास के सचिव अतुल कोठारी ने बताया कि शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास विश्वविद्यालय को पाठ्यक्रम निर्माण में सहायता करेगा. साथ ही विश्वविद्यालय न्यास द्वारा बनाई पाठ्य सामग्री को विद्यार्थियों को प्रदान करेगा. चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व विकास जैसे विषय आज समाज की आवश्यकता है, साथ ही वैदिक गणित जैसे विषय विद्यार्थियों के मन से गणित का भय दूर कर उन्हें गणित में पारंगत बनाते हैं. वैदिक गणित की पद्धति विद्यार्थियों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में भी कारगर साबित हुई है. निश्चित ही यह दोनों पाठ्यक्रम विद्यार्थियों के लिए लाभकारी रहेंगे. इस अवसर पर जे.सी. बोस विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दिनेश कुमार जी एवं अग्रवाल महाविद्यालय के प्राचार्य कृष्ण कांत जी उपस्थित थे.

बता दें शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व विकास व वैदिक गणित विषय का पाठ्यक्रम कक्षा 1 से लेकर कक्षा 12वीं तक तैयार किया गया है. साथ ही इन दोनों विषयों के सर्टिफ़िकेट कोर्स का पाठ्यक्रम भी न्यास द्वारा तैयार किया गया है. जो देश के सैकड़ों विद्यालय-महाविद्यालयों में संचालित है.

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October 30th 2021, 4:48 am

मध्यप्रदेश – भोपाल के दीए से रोशन होंगे अयोध्या और मथुरा जैसे पावन धाम

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भोपाल. जिले के स्वयं सहायता समूह की महिलाओं द्वारा बनाए गए इको फ्रेंडली दीए मथुरा और अयोध्या भेजे जाएंगे. दीपावली के पावन अवसर पर अयोध्या व मथुरा जैसे पावन धाम भोपाल के दीयों से रोशन होंगे. भोपाल कलेक्टर अविनाश लवानिया ने जानकारी प्रदान की.

प्रदेश में गठित स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं स्वावलंबन के साथ आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही हैं. राजधानी भोपाल में प्रत्यक्ष उदाहरण सामने आया है. यहां जिले की विभिन्न तहसीलों में चल रहे स्वयं सहायता समूह की महिलाओं द्वारा निर्मित दीपक दीपावली के पावन पर्व के लिए भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या और भगवान श्री कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा भेजे जाएंगे.

भोपाल कलेक्टर अविनाश लवानिया ने मीडिया को बताया कि जिले के विभिन्न ने स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने गोबर, मुल्तानी मिट्टी, गेहूं के आटे के मिश्रण से लाखों दीए बनाए हैं. महिलाओं द्वारा बनाए गए 15 लाख इको फ्रेंडली दीए उत्तर प्रदेश भेजे जाएंगे, जिनमें 11 लाख अयोध्या और 4 लाख मथुरा भेजे जाएंगे. उन्होंने कहा कि प्रशासन व सरकार के प्रयासों से स्वयं सहायता समूह से महिलाओं को जोड़ा गया था. स्वरोजगार के माध्यम से महिलाएं अब आत्मनिर्भर हो रही हैं. वह अपने कार्य को आगे बढ़ाएंगी और अपनी आजीविका का उपार्जन भी स्वयं कर सकेंगी.

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October 30th 2021, 4:48 am

राजस्थान सरकार हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करने का प्रयास न करे – विहिप

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जयपुर. राजस्थान से पुलिस महानिदेशक का पत्र सामने आने के पश्चात विश्व हिन्दू परिषद ने पत्र की निंदा करते हुए कहा कि राजस्थान सरकार हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करने का प्रयास न करे.

पुलिस महानिदेशक राजस्थान के परिपत्र क्रमांक 5458-83, 25 अक्तूबर, 2021 द्वारा राजस्थान धार्मिक भवन स्थल अधिनियम 1954 सार्वजनिक स्थलों पर धार्मिक उपयोग निषिद्ध करता है, का उल्लेख करते हुए सभी पुलिस थाना/कार्यालयों को निर्देशित करते हुए लिखा है कि आदेश का अक्षरश: पालन करवाया जाना सुनिश्चित करें.

विश्व हिन्दू परिषद आदेश का कड़ा विरोध किया है. विहिप राजस्थानके प्रदेश मंत्री सुरेश उपाध्याय ने कहा कि विहिप राजस्थान सरकार को आगाह करती है कि वह हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करने का प्रयास न करे और तुष्टीकरण की राजनीति को बंद करे. तथा आदेश को तुरंत प्रभाव से निष्प्रभावी बनाने की कार्यवाही की जाए. अन्यथा विश्व हिन्दू परिषद राजस्थान को राज्य सरकार द्वारा किए जा रहे तुष्टीकरण के विरुद्ध आंदोलन करने को मजबूर होना पड़ेगा.

देश के तीर्थ स्थल संपूर्ण हिन्दू समाज के आस्था के केंद्र हैं और प्रत्येक हिन्दू की आकांक्षा रहती है कि वह जीवन में एक बार अपने पवित्र तीर्थ स्थलों के दर्शन करें. सभी हिन्दू परिवारों के घरों में एक पूजा स्थल तो होता है, जहां वह अपनी दैनिक दिनचर्या प्रारंभ करने से पूर्व अपने धर्म के प्रति आस्था प्रकट करता है और सत्य के रास्ते पर चलने के लिए ईश्वर से आशीर्वाद मांगता है. ठीक इसी प्रकार से संपूर्ण देश के पुलिस थानों में, अस्पतालों में, यहां तक सचिवालय में भी कर्मचारी परिवार भाव से काम करते हैं. और वही व्यक्तिगत सहयोग करके छोटा सा पूजा स्थल बना लेते हैं. जहां वह अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक संपादित करने का ईश्वर से आशीर्वाद मांगते हैं. अत: इन पूजास्थलों की व्याख्या करना उचित नहीं होगा.

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October 30th 2021, 4:48 am

अ. भा. कार्यकारी मंडल प्रस्ताव – बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हुए उन्मादी इस्लामिक आक्रमण की अखिल भारत

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धारवाड़. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल बैठक में बांग्लादेश में हिन्दुओं पर इस्लामिक आक्रमण की निंदा की. बैठक में हिंसा को लेकर प्रस्ताव पारित किया गया है.

 प्रस्ताव – बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हुए उन्मादी इस्लामिक आक्रमण की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल द्वारा भर्त्सना

अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल (अ. भा. का. मंडल) बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हुए हिंसक आक्रमणों पर अपना गहरा दुःख व्यक्त करता है और वहाँ के हिन्दू अल्पसंख्यकों पर लगातार हो रही क्रूर हिंसा और बांग्लादेश के व्यापक इस्लामीकरण के जिहादी संगठनों के षडयन्त्र की घोर निंदा करता है.

बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिन्दू समाज व हिन्दू मंदिरों पर हिंसक आक्रमण का क्रम बिना रोकटोक चल रहा  है. गत समय में दुर्गा-पूजा के पवित्र पर्व काल में प्रारम्भ हुई इस साम्प्रदायिक हिंसा में अनेक  निरपराध हिन्दुओं की हत्या हुई, सैकड़ों लोग घायल हुए और हज़ारों  परिवार बेघर हो गए. गत दो सप्ताह में ही हिन्दू समाज की अनेक माता-बहनें अत्याचार की शिकार हुईं तथा मंदिरों व दुर्गा-पूजा पंडालों  का विध्वंस हुआ.

निराधार झूठे समाचार प्रसारित कर साम्प्रदायिक उन्माद फैलाने वाले कुछ दोषियों की गिरफ़्तारी से यह स्पष्ट हुआ है कि कट्टरपंथी इस्लामिक शक्तियों का वर्तमान आक्रमण एक सुनियोजित षड्यन्त्र था. हिन्दू समाज को लक्षित कर बार-बार हो रही हिंसा का वास्तविक उद्देश्य बांग्लादेश से हिन्दू समाज का संपूर्ण निर्मूलन है, फलस्वरूप भारत विभाजन के समय से ही हिन्दू समाज की जनसंख्या में निरंतर कमी आ रही है.

विभाजन के समय पूर्वी बंगाल में हिन्दुओं की जनसंख्या जहाँ लगभग अठ्ठाईस प्रतिशत थी, वह घटकर अब लगभग आठ प्रतिशत हो गई है. जमात-ए-इस्लाम (बांग्लादेश) जैसे कट्टरपंथी इस्लामी समूहों द्वारा अत्याचारों के कारण विभाजन काल से और विशेषकर 1971 के युद्ध के समय बड़ी संख्या में हिन्दू समाज को भारत में पलायन करना पड़ा. बांग्लादेश निर्माण के उपरान्त आज भी वही तत्व सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ रहे हैं, जिसके कारण अल्पसंख्यक हिन्दू समाज में असुरक्षा की भावना उत्पन्न हुई है.

अ. भा. का. मंडल का यह मत है कि बांग्लादेश सरकार अपने ही देश के अल्पसंख्यक समाज के खिलाफ बढ़ रही हिंसक घटनाओं को रोकने हेतू कठोर कदम उठाये. सरकार यह भी सुनिश्चित करे कि हिन्दू विरोधी हिंसा के अपराधियों को कठोर दंड प्राप्त हो ताकि हिन्दू समाज में ऐसा विश्वास उत्पन्न हो कि बांग्लादेश में वे अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए सम्मानपूर्वक सुरक्षित जीवन जी सकते हैं.

अ. भा. का. मंडल मानवाधिकार के तथाकथित प्रहरी संगठनों और संयुक्त राष्ट्र संघ से संबंधित संस्थाओं के गहरे मौन पर चिंता व्यक्त करता है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आवाहन करता है कि वह इस हिंसा की निंदा करने के लिए आगे आए व बांग्लादेश के हिन्दू, बौद्ध व अन्य अल्पसंख्यक समाज के बचाव व सुरक्षा हेतु अपनी आवाज़ उठाए. हम यह भी आगाह करना चाहते हैं कि बांग्लादेश या विश्व के किसी भी अन्य भाग में कट्टरपंथी इस्लामिक शक्ति का उभार विश्व के शांतिप्रिय देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था और मानवाधिकार के लिए गम्भीर ख़तरा सिद्ध होगा.

अ. भा. का. मंडल भारत सरकार से भी यह अनुरोध करता है कि वे उपलब्ध सभी राजनयिक माध्यमों का उपयोग करते हुए बांग्लादेश में हो रहे आक्रमणों व मानवाधिकार हनन के बारे में विश्व भर के हिन्दू समाज एवं संस्थाओं की चिंताओं से बांग्लादेश सरकार को अवगत कराये ताकि वहाँ के हिन्दू और बौद्ध समाज की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके.

कट्टरपंथी हिंसा से पीड़ित बांग्लादेश के हिन्दू भाई-बहनों के साथ जुड़कर संपूर्ण सहयोग करने वाले   इस्कॉन, रामकृष्ण मिशन, भारत सेवाश्रम संघ, विश्व हिन्दू परिषद एवं अनेक हिन्दू संगठनों-संस्थाओं की अ. भा. का. मंडल सराहना करता है. हम यह भी विश्वास दिलाते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित संपूर्ण हिन्दू समाज बांग्लादेश के हिन्दू और अन्य प्रताड़ित अल्पसंख्यकों के इस कठिन एवं चुनौतीपूर्ण समय में उनके साथ डटकर खड़ा है.

 

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October 30th 2021, 4:48 am

जयंती पर विशेष : भगिनी निवेदिता – भारतीयता की ओजमयी वाणी

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लवी चौधरी

भारत के चिंतन और दर्शन ने सुदीर्घकाल से विश्व जगत को स्पंदित किया है. पाश्चत्य जगत की भोगवादी चमक-धमक को छोड़कर स्वामी विवेकानंद का शिष्यत्व ग्रहण करने वाली मार्गरेट से भगिनी निवेदिता बनने की उनकी यह यात्रा न सिर्फ प्रेरणादायी है, बल्कि भारतीयता की ओजस्वी कहानी है. उन्होंने स्वामी विवेकानंद के आकर्षक व्यक्तित्व और सदाचार से प्रभावित होकर अपना देश छोड़ा, तथा उन्हीं के ज्ञान से पोषित होकर भारत को कर्मभूमि के रूप में वरण किया. एक शिक्षिका और लेखिका मार्गरेट से वह भगिनी निवेदिता के रूप में श्रेष्ठ आध्यात्मिक व सामाजिक कार्यकर्ता बन गईं.

विश्व में भारतीय संस्कृति की ध्वजा लहराने वाले स्वामी विवेकानन्द की शिष्या मार्गरेट नोबल का जन्म 28 अक्तूबर, 1867 को आयरलैंड में हुआ. उनके पिता सैमुअल नोबल एक पादरी थे. माँ मैरी हैमिल्टन एक सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षिका व लेखिका थीं. 1884 में एक स्थानीय स्कूल में बतौर शिक्षिका पढ़ाने लगीं. 1895 में मार्गरेट की सहेली ने एक भारतीय साधु से मुलाकात करवाने के लिए उन्हें आमंत्रित किया. मार्गरेट स्वामी विवेकानंद के अलौकिक व्यक्तित्व और विचारों से बहुत प्रभावित हुईं. स्वामी जी को समाज सेवा को प्रतिबद्ध निश्च्छल मार्गरेट में भारत की मातृशक्ति को जागृत करने का दैदीप्यमान व्यक्तित्व दिखा.

28 जनवरी, 1895 को मार्गरेट जन्मभूमि छोड़ हमेशा के लिए भारत आ गईं. भारत आने पर कोलकाता में उनके स्वागत के लिए स्वयं स्वामी जी उपस्थित थे. मार्गरेट ने भारत आने पर यह मान लिया था कि अब यही उनकी कर्मभूमि है और सेवाकार्य ही उनका परम लक्ष्य है. 25 मार्च, 1898 को भगवान शिव की विधिवत पूजा के बाद स्वामी जी ने आशीर्वाद दिया और मार्गरेट का नाम बदलकर निवेदिता रखा. भगिनी निवेदिता के जीवन को जब हम देखते हैं तो पता चलता है कि उन्होंने वेदांत को सीखा, अपनाया और जीया भी. इस क्रम में बंगाल में निरक्षरता के अँधेरे को मिटाकर विशेष रूप से महिला शिक्षा को भरपूर बढ़ावा दिया. 1899 में कोलकाता में प्लेग पीड़ितों की सेवा की और बाढ़ प्रभावितों की सेवा की. आजीवन अटल रहकर समर्पण भाव से जनता की सेवा में लग्न रहीं.

दीक्षा प्राप्त करने के बाद निवेदिता कोलकाता के बागबाज़ार में बस गईं. यहाँ पर उन्होंने लड़कियों के लिए एक विद्यालय प्रारंभ किया. लड़कियों के माता-पिता को उन्हें पढ़ने भेजने के लिए प्रेरित करती थीं. निवेदिता स्कूल का उद्घाटन स्वामी रामकृष्ण परमहंस की पत्नी मां शारदा ने किया था. निवेदिता को पता था – बाल विवाह जैसी कुरीतियों को खत्म करने के लिए लड़कियों को शिक्षित करना बहुत जरुरी है. धीरे-धीरे निवेदिता की लोकप्रियता बढ़ी तो उन्हें लोग “सिस्टर निवेदिता” के नाम से पुकारने लगे.

भगिनी निवेदिता ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी प्रभावी भूमिका निभाई. निवेदिता को स्पष्ट अनुभव हो चुका था कि ब्रिटिश शासन के अंत के बिना भारतीय एक आदर्श मानवीय जीवन नहीं जी सकते. देखा कि अंग्रेज़ सरकार किस तरह भारतीयों का शोषण कर रही है. भारत में अंग्रेजों के अत्याचारों को देख उनके विरुद्ध विचार, वाणी तथा कर्म से संघर्षरत हो गयी.

निवेदिता ने स्वतंत्रता की अलख जगाने के लिए विद्यालय को राष्ट्रीयता का केंद्र बनाया. बंकिमचन्द्र का गीत “वन्देमातरम” जो आजादी की लड़ाई का मंत्र था, वह पाठशाला का प्रार्थना गीत बन गया.

वर्ष 1905 में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया. स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद निवेदिता अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आन्दोलन में कूद पड़ीं.

अपने अंतिम समय में निवेदिता ने संपत्ति, नकद राशि तथा अपनी लेखन से मिले धन को बैलूर मठ को समर्पित कर दिया. उनकी आखिरी इच्छा यही थी कि इस धन का उपयोग भारत की महिलाओं को राष्ट्रीयता की शिक्षा देने में किया जाए.

13 अक्तूबर, 1911 भारत की बेटी, भारत में बालिका शिक्षा, अध्यात्म, देशप्रेम और समाजसेवा का अलख जगाने वाली स्वामी विवेकानंद जी की सुयोग्य व गुणी शिष्या का देहांत हो गया. आज भी उनकी समाधि पर लिखा है – यहाँ भगिनी निवेदिता चिरनिद्रा में सो रही हैं, जिन्होंने भारत के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया.

 

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October 30th 2021, 4:48 am

अ. भा. कार्यकारी मंडल बैठक धारवाड़ में प्रारम्भ

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धारवाड़. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक का आज धारवाड़ (कर्नाटक) में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी और  सरकार्यवाह  दत्तात्रेय होसबाले जी ने भारत माता के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर शुभारम्भ किया. बैठक में देशभर से सभी प्रांतों व क्षेत्रों के संघचालक, कार्यवाह, प्रचारक, अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य तथा कुछ विविध संगठनों के अखिल भारतीय संगठन मंत्रियों सहित लगभग 350 कार्यकर्ता भाग ले रहे हैं.

बैठक में संघ कार्य की वर्तमान स्थिति की समीक्षा, कार्य विस्तार और कार्यकर्ता विकास की योजना पर चर्चा होगी. हाल ही में बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हुई हिंसा पर भी प्रस्ताव पारित किया जाएगा.

बैठक के प्रारंभ में गत दिनों दिवंगत हुए महानुभावों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई. जिनमें प्रमुख संस्कार भारती के अखिल भारतीय महामंत्री श्री अमीर चंद, कन्नड़ लेखक श्री जी. वेंकट सुबहिया, स्वतंत्रता सेनानी व पत्रकार श्री एच. एस. दुरेस्वामी, प्रसिद्ध कवि डा. एच. सिद्धलंगैया, राजनीतिज्ञ श्री ऑस्कर फर्नांडीज, स्वामी अध्यात्मानंद जी, स्वामी ओंकारानंद जी, स्वामी अरुणागिरी जी, वरिष्ठ पत्रकार श्री श्याम खोसला, दैनिक जागरण के मालिक श्री योगेन्द्र मोहन गुप्ता, गीता प्रेस गोरखपुर के अध्यक्ष श्री राधेश्याम खेमका, प्रसिद्ध लेखक श्री नरेन्द्र कोहली, श्री राजेश सातव, राज्यसभा सांसद (कांग्रेस), अटोर्नी जनरल श्री सोली सोराब जी, पूर्व राज्यपाल श्री जगमोहन, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश श्री कल्याण सिंह, पत्रकार श्री रोहित सरदाना, श्री सुंदर लाल बहुगुणा (चिपको आंदोलन), अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी जी महाराज, हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री वीरभद्र सिंह हैं.

बैठक 30 अक्तूबर सायंकाल संपन्न होगी.

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October 30th 2021, 4:48 am

बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हमले हिन्दू समाज के निर्मूलन का योजनाबद्ध प्रयास – अरुण कुमार

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कार्यकारी मंडल ने की जिहादी संगठनों द्वारा बांग्लादेश के इस्लामीकरण के षड्यंत्र की निंदा

कट्टरपंथी इस्लामिक शक्ति का उभार शांतिप्रिय देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गम्भीर ख़तरा

संघ के कार्यकारी मंडल की बैठक में बांग्लादेश हिंसा को लेकर प्रस्ताव पारित

निधि समर्पण अभियान में 5.34 लाख गावों में 12.73 करोड़ परिवारों तक पहुंचे कार्यकर्ता

 

धारवाड़, 29 अक्तूबर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह अरुण कुमार जी ने बताया कि कार्यकारी मंडल की बैठक में बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हमलों को लेकर प्रस्ताव पारित किया गया है. बांग्लादेश में हिन्दू समाज पर आक्रमण अचानक घटित घटना नहीं है. फेक न्यूज के आधार पर साम्प्रदायिक उन्माद पैदा करने की कोशिश की गई है, ये हिन्दू समाज के निर्मूलन का योजनाबद्ध प्रयास था. उन्होंने बताया कि प्रस्ताव में हिन्दुओं पर हुए हिंसक आक्रमणों पर दुःख व्यक्त किया गया है और वहाँ के हिन्दू अल्पसंख्यकों पर लगातार हो रही क्रूर हिंसा और बांग्लादेश के व्यापक इस्लामीकरण के जिहादी संगठनों के षडयन्त्र की घोर निंदा की गई है.

प्रस्ताव में कहा गया है कि हिन्दू समाज को लक्षित कर बार-बार हो रही हिंसा का वास्तविक उद्देश्य बांग्लादेश से हिन्दू समाज का संपूर्ण निर्मूलन है, फलस्वरूप भारत विभाजन के समय से ही हिन्दू समाज की जनसंख्या में निरंतर कमी आ रही है. विभाजन के समय पूर्वी बंगाल में हिन्दुओं की जनसंख्या लगभग अठ्ठाईस प्रतिशत थी, वह घटकर अब लगभग आठ प्रतिशत रह गई है. जमात-ए-इस्लामी (बांग्लादेश) जैसे कट्टरपंथी इस्लामी समूहों द्वारा अत्याचारों के कारण विभाजन काल से, विशेषकर 1971 के युद्ध के समय बड़ी संख्या में हिन्दू समाज को भारत में पलायन करना पड़ा.

संघ ने मानवाधिकार के तथाकथित प्रहरी संगठनों और संयुक्त राष्ट्र संघ से संबंधित संस्थाओं के गहरे मौन पर चिंता व्यक्त की और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आवाहन किया कि इस हिंसा की निंदा करने के लिए आगे आए व बांग्लादेश के हिन्दू, बौद्ध व अन्य अल्पसंख्यक समाज के बचाव व सुरक्षा हेतु अपनी आवाज़ उठाए. बांग्लादेश या विश्व के किसी भी अन्य भाग में कट्टरपंथी इस्लामिक शक्ति का उभार विश्व के शांतिप्रिय देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था और मानवाधिकार के लिए गम्भीर ख़तरा सिद्ध होगा.

प्रस्ताव में हिंसा से पीड़ित परिवारों की सहायता के लिए इस्कॉन, रामकृष्ण मिशन, भारत सेवाश्रम संघ, विश्व हिन्दू परिषद एवं अनेक हिन्दू संगठनों-संस्थाओं की सराहना की गई है. कार्यकारी मंडल ने भारत सरकार से भी अनुरोध किया कि उपलब्ध सभी राजनयिक माध्यमों का उपयोग करते हुए बांग्लादेश में हो रहे आक्रमणों व मानवाधिकार हनन के बारे में विश्व भर के हिन्दू समाज एवं संस्थाओं की चिंताओं से बांग्लादेश सरकार को अवगत कराये ताकि वहाँ के हिन्दू और बौद्ध समाज की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके.

अरुण कुमार जी धारवाड़ (कर्नाटक) में आयोजित संघ के कार्यकारी मंडल की बैठक के दूसरे दिन प्रेस वार्ता में जानकारी प्रदान कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि संघ की निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था प्रतिनिधि सभा है, साल में एक बार बैठक मार्च में होती है. दूसरी सांविधानिक संस्था कार्यकारी मंडल है, इसकी बैठक अभी यहां चल रही है. मार्च में होने वाली प्रतिनिधि सभा की बैठक में वर्ष भर का कैलेंडर बनाते हैं, और अखिल भारतीय कार्यकर्ताओं का प्रवास भी तय होता है. अक्तूबर की बैठक का एक काम होता है, वर्ष में अभी तक के कार्य की समीक्षा करना.

उन्होंने कहा कि श्रीराम जन्मभूमि निधि समर्पण अभियान में धन एकत्रित करना संघ का मुख्य उद्देश्य नहीं था. संघ का मानना था कि न्यास आवाहन कर रहा है और समाज के लोग देने ही वाले हैं. इस आंदोलन में पूरे समाज की भागीदारी रही है, तो इसलिए अब भी समाज के अधिकतम लोगों तक पहुंचने का लक्ष्य तय किया गया. और देश में 6.5 लाख (अनुमानित आंकड़ा) गांवों में से 5.34 लाख गांवों तक कार्यकर्ता पहुंचे, सभी नगरों की सभी बस्तियों तक पहुंचे. अभियान में 12.73 करोड़ परिवारों तक कार्यकर्ता पहुंचे. अभियान में केवल संघ के कार्यकर्ताओं ने काम किया ऐसा नहीं है, समाज में स्वयं प्रेरणा से बहुत बड़ी संख्या में लोग जुड़े. अभियान में 25 से 30 लाख महिला-पुरुष कार्यकर्ताओं ने सहभागिता की.

इसी प्रकार कोरोना काल में चुनौती भी बड़ी थी, और समाज से प्रत्युत्तर भी समग्र था. सब लोगों ने मिलकर काम किया, बहुत से नए लोग हमारे साथ जुड़े और हमारे साथ काम करना चाहते थे. इन लोगों को स्थायी रूप से अपने काम के साथ जोड़ें, ऐसा विचार मार्च की बैठक में हुआ था. इस बैठक में कार्य विस्तार की दृष्टि से इसकी भी समीक्षा हुई.

सह सरकार्यवाह ने कहा कि मार्च माह की बैठक में इन सभी लोगों को पर्यावरण संरक्षण, परिवार प्रबोधन, समरसता, सामाजिक सद्भाव के कार्य के साथ जोड़ने पर विचार हुआ था. ये चारों समाज की गतिविधि बने, इस दृष्टि से काम करने का तय किया था. इसे लेकर अभी तक हुए प्रयासों व अनुभवों की समीक्षा बैठक में हुई है. साथ ही देश स्वाधीनता के 75 वर्ष का उत्सव मना रहा है. स्वाधीनता के 75 वर्ष पर क्या-क्या कर सकते हैं, और क्या करना चाहिए, इसे लेकर भी बैठक में चर्चा व समीक्षा की गई है.

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October 30th 2021, 4:48 am

पाकिस्तान की जीत का जश्न मनाने वालों के खिलाफ एफआईआर होने पर भड़के आतंकी संगठन की धमकी

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नई दिल्ली. भारत पाकिस्तान टी-20 मैच में पाकिस्तान की जीत के बाद देश में अनेक स्थानों पर जश्न मनाया गया. कई जगह हुड़दंग भी हुआ, पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगे. इस दौरान SKIMS मेडिकल कॉलेज सहित कई स्थानों के वीडियो भी सामने आए. SKIMS में छात्र भारत विरोधी नारे लगा रहे हैं. घटना की संवेदनशीलता को देखते हुए कश्मीर पुलिस ने यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया है. इससे बौखलाए कट्टरपंथी गैर मुस्लिमों, गैर कश्मीरियों को निशाना बनाने के साथ एक छात्रा की फोटो शेयर करके उस पर पुलिस मुखबिर होने का आरोप लगा रहे हैं.

बात सिर्फ आरोप लगाने तक सीमित नहीं है. कट्टरपंथी जमात के साथ ही यूएलएफ जम्मू-कश्मीर सक्रिय हो गया है, जिसे आतंकी संगठन लश्कर का ही एक समूह बताया जाता है और गैर कश्मीरियों की हत्या में शामिल था. इस समूह ने 26 अक्तूबर को बयान जारी कर कहा – उन्हें खबर मिल गई है कि इन एफआईआर के पीछे किसका हाथ है. गैर स्थानीय कर्मचारी और छात्रों को चेतावनी दी जाती है कि वो ऐसी गतिविधियों में शामिल न हों.

बयान के अनुसार, “हम तत्वों को चेतावनी दे रहे हैं क्योंकि हम जानते हैं कि ये कौन हैं? 48 घंटों का समय दिया जाता है कि माफी माँग लें. वरना अंजाम भुगतना होगा…हम इन्हें पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि ये किसी गैर कश्मीरी गतिविधि में शामिल न हों. वरना हम ये फर्क नहीं करेंगे कि कौन क्या है? जिन भी गैर स्थानीय कर्मचारी और छात्रों ने डॉक्टर और छात्रों की थाना सौरा, करण नगर..में शिकायत दी है उन्हें चेतावनी दी जा रही है. हम सब देख रहे हैं. बाद में इल्जाम मत देना जो कहर तुम पर बरपेगा.”

अब्दुल्ला गाजी नाम के ट्विटर हैंडल से कई ट्वीट किए गए और मेडिकल छात्रा अनन्या जामवाल को टैग करते हुए दावा किया कि वो पुलिस की मुखबिर है. और SKIMS छात्रों के खिलाफ FIR और UAPA लगवाने की दोषी है. वह एक बाहरी डोगरा है जो इसी कॉलेज से मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई कर रही है.

गाजी ने अनन्या के विरुद्ध कई ट्वीट किए. इसके अलावा एक और ट्वीट में सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाली मोनिका लांघे को भी निशाना बनाया है.

इन्हीं ट्वीट को शेयर करते हुए अनन्या जामवाल ने कहा – “क्या ये आदमी इन आरोपों को सिद्ध कर सकता है कि ये मुझे क्यों धमकी दे रहा है.” अनन्या ने जम्मू-कश्मीर पुलिस, देश की राष्ट्रीय जाँच एजेंसी, गृहमंत्री, रक्षामंत्री और प्रधानमंत्री सहित कुछ लोगों को टैग करते हुए कहा कि वो डरा हुआ महसूस कर रही है. वह पूछती है – इन लोगों का मकसद क्या है?

डॉ. मोनिका लांघे ने कहा कि तू किसी गलतफहमी में है, याद कर ले कश्मीर भारत का हिस्सा है और तुझे याद करवाकर रखेंगे हम. जय भारत.

इनपुट साभार – पाञ्चजन्य

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October 30th 2021, 4:48 am

Patna Serial Blast case – एनआईए कोर्ट ने नौ आरोपियों को दोषी करार दिया

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नई दिल्ली. एनआईए विशेष न्यायालय (स्पेशल कोर्ट) ने पटना के गांधी मैदान ब्लास्ट मामले में नौ आरोपियों को दोषी करार दिया है. न्यायालय ने इस बहुचर्चित मामले में 10 आरोपियों में से एक को बरी कर दिया. न्यायालय ने दस आरोपियों में से नौ को दोषी करार दिया, जिनमें इम्तियाज अंसारी, हैदर अली, नवाज अंसारी, मुजमुल्लाह, उमर सिद्धकी, अजहर कुरैशी, अहमद हुसैन, फिरोज असलम, इफ्तेखार आलम शामिल हैं. दोषी करार दिए अपराधियों को सजा एक नवंबर को सुनाई जाएगी. सभी दोषी सिमी से संबंधित बताए जा रहे हैं. सभी 10 आरोपी पटना की बेऊर जेल में बंद हैं.

पटना में 27 अक्तूबर, 2013 को गांधी मैदान में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी रैली के दौरान धमाके हुए थे. भाजपा (BJP) की हुंकार रैली के दौरान सिलसिलेवार बम धमाकों के कारण भगदड़ मच गई थी. गांधी मैदान से पहले एक धमका पटना जंक्शन पर भी हुआ था. पटना में हुए इन सीरियल धमाकों में 7 लोगों की मौत हुई थी, वहीं करीब 89 लोग घायल हुए थे.

पटना के गांधी मैदान ब्लास्ट केस में NIA ने अगले दिन से ही जांच शुरू कर दी थी. और एक साल के अंदर 21 अगस्त, 2014 को कुल 11 अभियुक्तों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया था. इसके बाद NIA की टीम ने इस मामले में हैदर अली, नोमान अंसारी, मो. मुजिबुल्लाह अंसारी, इम्तियाज आलम, अहमद हुसैन, फकरुद्दीन, मो. फिरोज असलम, इम्तियाज अंसारी, मो. इफ्तिकार आलम, अजहरुद्दीन कुरैशी और तौफिक अंसारी को गिरफ्तार किया था.

पटना के गांधी मैदान ब्लास्ट का मास्टर माइंड हैदर अली और मुजिबुल्लाह था. वह भागने के प्रयास में था, लेकिन तब तक पुलिस मौके पर पहुंच गई और उसे दबोच लिया गया. पूछताछ के दौरान उसने जुर्म स्वीकार कर लिया. पूछताछ में बताया था कि वो अपनी पूरी टीम के साथ गांधी मैदान में हुंकार रैली को दहलाने के लिए पहुंचा था. गिरफ्तार आतंकी इम्तियाज से सख्ती से पूछताछ पर उसने कई नाम उगले. बोधगया ब्लास्ट मामले का खुलासा भी इसी आतंकी के बयान से हुआ था.

गांधी मैदान ब्लास्ट मामले में एनआईए कोर्ट ने 27 अक्तूबर को फैसला सुनाया. विशेष यह कि गांधी मैदान में धमाके वर्ष 2013 में 27 अक्तूबर को ही हुए थे. रिपोर्ट्स के अनुसार, रैली के दिन पटना में कुल 18 बम प्लांट किए गए थे. रैली स्थल गांधी मैदान में छह धमाके हुए थे.

 

 

 

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October 30th 2021, 4:48 am

मेडिकल कॉलेज में भारत विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों पर केस दर्ज, फिर झलका महबूबा का पाकिस्तान प्रेम

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जम्मू. भारत-पाकिस्तान टी-20 विश्व कप मैच में पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाने और पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाने वाले मेडिकल कॉलेज के छात्रों पर कार्रवाई शुरू हो गई है. पुलिस ने श्रीनगर के मेडिकल कॉलेज के छात्रों पर केस दर्ज किया है. पाकिस्तान की जीत पर जश्न के वीडियो सोशळ मीडिया पर वायरल हुए थे. पुलिस की कार्रवाई के बाद एक बार फिर पीडीपी मुखिया महबूबा मुफ्ती का पाकिस्तान प्रेम सामने आया है. महबूबा मुफ्ती बीते कुछ महीनों से लगातार पाकिस्तान का समर्थन करती नजर आ रही हैं.

पुलिस अधिकारियों ने बताया कि मेडिकल कॉलेज श्रीनगर के कर्णनगर स्थित हॉस्टल और शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल सांइसेज (सौरा) के हॉस्टल में टी-20 विश्वकप में पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाया गया और पाकिस्तान के समर्थन में नारेबाजी की गई थी.

सौरा पुलिस स्टेशन में दर्ज रिपोर्ट के अनुसार, हॉस्टल में रहने वाले एमबीबीएस और अन्य डिग्री कोर्स के विद्यार्थियों ने पटाखे फोड़कर और राष्ट्र विरोधी नारे लगाकर जश्न मनाया था. इसी तरह पुलिस स्टेशन कर्ण नगर में राजकीय मेडिकल कॉलेज श्रीनगर के हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थियों के खिलाफ भी गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम की धारा 13 के तहत मामला दर्ज किया गया है.

महबूबा का पाकिस्तान प्रेम

पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती अपना पाकिस्तान प्रेम एक बार फिर सामने आया है. महबूबा ने ट्वीट किया – पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाने में इतना गुस्सा क्यों? सरकार को यह पता लगाने का प्रयास करना चाहिए कि यह लोग नाराज क्यों हैं. कश्मीरी युवाओं के साथ गृहमंत्री की मन की बात ने पाकिस्तान की जीत का जश्न मनाने के लिए मेडिकल छात्रों के खिलाफ यूएपीए के तहत मामला दर्ज करने के साथ शुरुआत हुई है. यह पता लगाने की कोशिश करने की बजाय कि शिक्षित युवा पाकिस्तान के साथ पहचान क्यों चुनते हैं. भारत सरकार प्रतिशोधात्मक कार्रवाई का सहारा ले रही है. इस तरह के कदम उन्हें और दूर कर देंगे.

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October 30th 2021, 4:48 am

देश की छवि को धूमिल करने वालों को आइना दिखाना होगा – राज्यपाल जगदीप धनखड़

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जयपुर. पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने कहा कि मेरे लिए धानक्या आना तीर्थ यात्रा है. पश्चिम बंगाल में जो चुनौतियां और समस्याएं हैं, उनका सामना करने के लिए मैं यहां से उर्जित और ज्यादा ताकत के साथ जा रहा हूं. लड़ाई कितनी ही मुश्किल हो, लड़े बिना काम नहीं चलता. मैं उस भूभाग का राज्यपाल हूं, जहां लोगों को इस बात के लिए दंडित किया जाता है कि आपने प्रजातंत्र में अपनी मर्जी से वोट देने की हिमाकत कैसे की. जो लोगों को भ्रमित कर देश की छवि को धूमिल कर रहे हैं, उन्हें आगे आकर आइना दिखाना होगा.

राज्यपाल धनखड़ शनिवार को जयपुर के धानक्या ग्राम में पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति समारोह समिति की ओर से पं. दीनदयाल जी की 105वीं जयंती पर आयोजित व्याख्यान में बोल रहे थे. उन्होंने आह्वान किया कि मीडिया सही स्थिति का आंकलन करे. पत्रकारिता की सक्रियता से अफ्रीका के बहुत से देशों को आजादी मिली है, लेकिन पत्रकारिता की निष्क्रियता और बंधन प्रजातंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है.

उन्होंने कहा कि दीनदयाल ने जो बीज बोया था, उस पर समर्पित हुए बिना हम ना संस्कृति को बचा पाएंगे, ना आजादी को बचा पाएंगे और ना ही प्रजातंत्र को फलीभूत कर पाएंगे. पश्चिम बंगाल का कोई भूभाग नहीं है, जहां आजादी की लड़ाई में लोगों ने अपने जीवन की आहूति नहीं दी हो. लेकिन विडंबना है कि आजादी के बाद यह ज्ञान दिये जाने लगा कि आजादी कुछ ही लोगों ने दिलाई. यह सुअवसर है, हम आजादी के उन लोगों को पहचानें. उनके बारे में ज्ञान प्राप्त करें, जिन्होंने आजादी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया. उन्होंने कहा कि भारत के संविधान में उल्लेखित इंडिया देट इज भारत, इससे आगे नहीं बढ़ पाया है. जब तक हम मौलिक मुद्दों तक नहीं जाएंगे, तब तक आगे बढ़ना बहुत मुश्किल है.

पश्चिम बंगाल में मानवाधिकारों के हनन की ओर इशारा करते हुए राज्यपाल ने कहा कि मानवाधिकारों का सरंक्षण जरूरी है. अधिकारों का हनन हो तथा प्रशासन और न्यायालय से मदद नहीं मिले तो व्यक्ति कहां जाए. प्रशासन उन लोगों की मदद करता है, जो अधिकारों का हनन कर रहे हैं. मानवाधिकारों का हनन सुनियोजित षड़यंत्र है, जो खास राजनीतिक उपलब्धि के लिए किया जाता है. यह भारत के संविधान पर कुठाराघात है. पश्चिम बंगाल में एक वे लोग जो चैन की नींद सोते हैं और बेपरवाह हैं. उन्हें प्रशासन कुछ नहीं कहेगा. दूसरे वो जो एक पल भी नहीं सो पाते हैं, उनको डर लगता है.

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री सीबीआई दफ्तर में धरना देती है और कहती है कि मुझे गिरफ्तार करो या इन्हें छोड़ो. यह घटना किसी अन्य राज्य में होती तो पता नहीं क्या हो जाता.

उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति हजारों साल पुरानी है, दुनिया में भारत को इज्जत के साथ देखा जाता है. यहां के प्रधानमंत्री जिस प्रकार का काम कर रहे हैं, उनका लोहा दुनिया मानती है.

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश संगठन महामंत्री चंद्रशेखर ने कहा कि दीनदयाल की जन्म स्थली स्मारक एक राष्ट्रीय तीर्थ रूप में विकसित हो रही है, यह भविष्य में समाज जागरण, सेवा, स्वाध्याय, स्वावलंबन और समरसता के केन्द्र के रूप में विकसित होगा. पं. दीनदयाल उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद देश के लिए समर्पित हो गए, वे प्रशासनिक सेवा में नहीं गए. वे विषमता से समता और भेदभाव से समभाव की ओर देश को ले जाना चाहते थे. भारत को फिर से खड़ा करना चाहते थे. भारत की प्रेरणाओं से भरा उनका जीवन था. दीनदयाल के लिखे अधिकांश प्रस्तावों पर भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार काम कर रही है. उन्होंने देश के लिए नूतन चिंतन दिया. एकात्म मानव दर्शन भारत के राष्ट्र की संकल्पना थी. दीनदयाल ने कहा शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समन्वयन का दर्शन ही एकात्मदर्शन है.

उन्होंने कहा कि आजादी के 75 साल का भारत हमें दिख रहा है, हम जानते हैं किस प्रकार हमें आजादी मिली. देश को आजादी दिलाने वाले नाम और अनाम अनगिनत योद्धाओं ने अपना बलिदान दिया है. आजादी का अमृत महोत्सव ऐसे बलिदानियों को स्मरण करने का अवसर है.

केन्द्रीय कला एवं संस्कृति मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने कहा कि आजादी के 75 वर्ष मनाने पर बनाई समिति की बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था – आजादी का अमृत महोत्सव ऐसा होना चाहिए, जिसमें विश्लेषण भी हो और चिंतन भी हो. उन्होंने उत्सव को आजादी का अमृत महोत्सव नाम दिया, इसमें भारतीयता की झलक स्पष्ट है. पंडित दीनदयाल ने कहा था – हमारा चिंतन भारतीयता के आधार पर होना चाहिए. इसी आधार पर उन्होंने एकात्म मानव दर्शन का सिद्धांत रखा. पंडित दीनदयाल स्मारक स्थल पर संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की ओर से भव्य ऑडिटोरियम का निर्माण कराया जाएगा.

पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति समारोह समिति के अध्यक्ष प्रो. मोहनलाल ने छीपा ने समिति के कार्यों और भविष्य की योजनाओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी. कार्यक्रम में पैरांलिपक में पदक विजेता अवनि लखेरा और देवेन्द्र झाझरिया का अभिनंदन किया गया. कार्यक्रम को जयपुर जिला प्रमुख रमा चौपड़ा ने भी संबोधित किया.

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October 1st 2021, 2:11 pm

1921 मलबार हिन्दू नरसंहार के सौ साल

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नई दिल्ली. 25 सितंबर, 2021 को चरखा म्यूजियम पार्क राजीव चौक में ‘1921 मलबार हिन्दू नरसंहार के सौ साल’ के अवसर पर मोपला रिबेलियन मार्टियर्स स्मारक समिति द्वारा प्रदर्शनी एवं श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया. केरल के मलबार में हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए बलिदान हुए बलिदानियों को याद किया गया. इस श्रद्धांजलि सभा में प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय जे. नंदकुमार जी, वरिष्ठ अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा, सांसद रमेश बिधूड़ी, राज्यसभा सांसद डॉ. विनय सहस्रबुद्धे तथा कपिल मिश्रा ने श्रद्धांजलि अर्पित की.

वरिष्ठ अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा जी ने कहा कि मार्क्सवादी इतिहासकरों ने इस वीभत्स हिन्दू नरसंहार, क्रूरता और भारतीय नारी के साथ हुए कुकृत्य और बलात्कार को, जमींदारों और अंग्रेजों के खिलाफ किसान आंदोलन के रूप में दिखाया. खलीफा आंदोलन जो सिर्फ इस्लाम और खलीफा के समर्थन में किया गया आन्दोलन था, उसे  खिलाफत आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया गया. इतिहास के साथ यह नंगा और क्रूर व्यवहार और नहीं सहन किया जा सकता है. बहुत हुआ अब और नहीं. अगर भारत के इतिहास में घटित इस सच्चाई को 100 साल पहले ही दर्ज किया जा चुका होता तो उसके बाद की हजारों हिन्दू विरोधी हिंसा और दंगों रोका जा सकता था.

जे. नन्दकुमार जी ने एक विद्वान जार्ज संतायना के हवाले से कहा कि अगर आप अपने इतिहास को सही रूप में नहीं समझते और उसे सही परिप्रेक्ष्य में याद नहीं करते हैं तो वह इतिहास आप पर दोहरा दिया जाता है. इसलिए हमें अपने इतिहास को लेकर सावधान रहना है. उस इतिहास को दोहराने नहीं देना है. बल्कि उसे बदले बगैर चैन की सांस नहीं लेनी है. उन्होंने कहा 1921 का यह हिन्दू कत्लेआम पहला नहीं था. उस समय दंगों का एक पूरा सिलसिला चला, जिसमें लगभग 52 बड़े दंगे और 32 छोटे दंगे हुए. हिन्दुओं को पलायन करना पड़ा. उन्हें अपना घर और जमीन छोड़कर कोच्ची और त्रावणकोर की ओर पलायन करना पड़ा. उन्होंने दंगे से प्रभावित मलबार के इतिहास की सच्चाई पर प्रकाश डाला. उन्होंने आर.सी. मजूमदार जैसे इतिहासकार का ज़िक्र किया जो यह मानते थे कि इस हिंसा को समझने में कांग्रेस और गाँधी दोनों से भूल हुई. उस इतिहास को ठीक करने के लिये जे. नन्दकुमार ने केरल राज्य सरकार के समक्ष तीन मांगें रखीं –

  1. मोपला नरसंहार की स्मृति में संग्रहालय बनाया जाए.
  2. उन दंगाइयों का नाम स्वतंत्रता सेनानी की सूची से निकाला जाए.
  3. उन दंगाईयों को दी जाने वाली सरकारी सुविधाएं पेंशन और पद से वंचित किया जाए.

कपिल मिश्रा ने कहा कि दरअसल 100 साल पहले हिंदुओं पर किये गए अत्याचार और नरसंहार को वामपंथी मार्क्सवादी इतिहासकारों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कहकर उसे राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ दिया था. आज उस गलती को ठीक करने का दिन आ गया है. इतिहास में की गई गलती अब और बर्दाश्त नहीं की जाएगी. हम उस इतिहास को बदलकर ही दम लेंगे. आगे की पीढ़ी वामपंथियों द्वारा लिखा गया गलत इतिहास नहीं पढ़ेगी. फ़र्जी इतिहासकारों और दंगाइयों का और महिमामंडन नहीं होगा. हम संग्रहालय या स्मारक तो बनाएँगे ही साथ ही अपनी स्मृतियों में भी उन अमर बलिदानियों को सदैव याद रखेंगे.

राज्यसभा सांसद विनय सहस्रबुद्धे ने कहा कि आज का आयोजन विस्मृत इतिहास के अध्यायों को उजागर करने का सराहनीय प्रयास है. देश को विभाजन की ओर ले जाने वाली गंगोतरी मालवा से ही प्रवाहित हो गयी थी, जिसे अवरुद्ध कर देश को सही रास्ते पर लाने की जरुरत है. यह आयोजन प्रतिशोध के लिए नहीं, बल्कि उन वीरों को याद करने और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए है. जिन्होंने हिन्दू हित की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी. हम जनतंत्र में यकीन रखते हैं. लेकिन जनतंत्र का गला घोटने वालों का साथ देना गलत है. अतीत में मार्क्सवादी इतिहास लेखकों ने षड्यंत्रवश इतिहास के जिन पन्नों को गायब कर दिया, हम उसे फिर से जोड़ेंगे.

हम पाठ्य पुस्तकों में उपेक्षित वीरों को स्थान देंगे, साथ ही मोपला के बलिदानियों को जिन्होंने प्राण दे दिए लेकिन धर्मांतरण स्वीकार नहीं किया, उनके अमूल्य योगदान को उचित स्थान दिलाएंगे. जिससे आगे आने वाली पीढ़ी उन्हें जान सके.

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October 1st 2021, 2:11 pm

प्रवास के दूसरे दिन प्रचारकों के साथ बैठक में संघ कार्य विस्तार पर चर्चा

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जम्मू. जम्मू कश्मीर प्रवास के दूसरे दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने शुक्रवार सुबह से केशव भवन में प्रचारकों के साथ बैठक की. बैठकों में संघ कार्य विस्तार को लेकर चर्चा की. उन्होंने संघ में पूर्णकालिक कार्यकर्ता एवं शाखाओं की संख्या बढ़ाने का आह्वान किया. सरसंघचालक जी ने प्रचारकों से जम्मू कश्मीर प्रांत में कोरोना की स्थिति व संघ के माध्यम से हो रहे सेवा कार्यों की जानकारी ली. साथ ही संभावित तीसरी लहर से सावधानी के मद्देनजर योजना एवं प्रशिक्षण की आवश्यकताओं पर भी चर्चा की.

बैठकों में सभी प्रचारकों ने अपने-अपने क्षेत्र में संघ कार्य की वर्तमान स्थिति से सरसंघचालक जी को अवगत कराया. प्रचारकों ने कोरोना की दूसरी लहर के दौरान संघ स्वययंसेवकों द्वारा समाज के लिए किये गये कार्यों का उल्लेख किया. प्रचारकों के साथ बैठकें पूर्णतया संगठनात्मक कार्यों पर केन्द्रित रहीं.

बैठकों में विभिन्न विषयों की जानकारी साझा करने के साथ प्रचारकों ने सरसंघचालक भागवत जी से कई जिज्ञासाओं का समाधान भी प्राप्त किया. इस दौरान सरसंघचालक ने शताब्दी वर्ष आने से पूर्व संघ कार्य की गति को बढ़ाने की बात कही. शाखाओं के माध्यम से स्वयंसेवक की पहुंच हर घर तक बने.

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने बैठक में चर्चा करते हुए कहा कि धर्म संस्कृति एवं समाज के सर्वांगीण विकास को पूर्ण करने का दायित्व हमारा है. इस दायित्व को पूरा करने के लिए हम सभी को मनुष्य निर्माण के कार्य में लग जाना चाहिए. समस्याओं के समाधान के लिए ऐसे सामर्थ्यवान स्वयंसेवक खड़े करने हैं, जो परिस्थिति के साथ स्वयं की भूमिका को तय करने के लिए तैयार रहें. बैठक में उन्होंने वर्तमान विकास कार्यों के साथ आगामी वर्ष के कार्यक्रमों की भी समीक्षा की.

दृष्टि कन्या छात्रावास की छात्राओं से भेंट

शुक्रवार सुबह कुछ समय के लिए सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने सेवा भारती द्वारा संचालित दृष्टि कन्या छात्रावास की छात्राओं से भेंट की और उनसे वार्तालाप के दौरान उनकी शैक्षणिक गतिविधियों की जानकारी ली. दृष्टि छात्रावास का पूरा नाम जनक मदान कन्या छात्रावास है. छात्रावास की शुरुआत 2012 में 7 कन्याओं के साथ जम्मू जिले के पौनीचक क्षेत्र में की गई थी. वर्तमान में यहां 24 छात्राएं अपनी शिक्षा ग्रहण कर रही हैं. छात्रावास का उद्देश्य छात्राओं को शिक्षा देने के साथ-साथ अच्छे संस्कार देने का भी है ताकि वह अपने समाज में एक अच्छा काम कर सके और एक अच्छा जीवन व्यतीत कर सकें. जब पूरा देश कोरोना से जूझ रहा था, उस समय छात्राओं ने अपना सहयोग देने के लिए अपने हाथों से मासक बनाकर वितरित किए थे.

कोरोना काल की दूसरी लहर के दौरान जम्मू कश्मीर में सेवा कार्य

हेल्पलाइन सेंटर्स 140 स्थानों पर स्थापित किए गए थे. इन पर 1600 फोन कॉल आई और 826 लोगों की समस्याओं का समाधान किया गया. इनमें 307 कार्यकर्ता जुटे थे. प्रशासन का स्वयंसेवकों ने 57 स्थानों पर सहयोग किया और इसमें 282 कार्यकर्ताओं का योगदान रहा. इसमें लाभार्थियों की संख्या 8962 रही. संघ की योजना से 15 शहरों में आइसोलेशन केंद्रों की स्थापना, बैड संख्या 261, सेवित जन 38 और ऑक्सीजन कंसट्रेटर 100 उपलब्ध करवाए गए. डॉक्टरों की हेल्पलाइन के जरिए 16 स्थानों पर 88 डाक्टरों की संख्या से सेवाएं देते हुए 162 लोगों को लाभ पहुंचाया. 17 स्थानों पर 10420 भोजन के पैकेट, 53 स्थानों पर रक्तदान के जरिए 163 यूनिट उपलब्ध करवाए गए. 186 लोगों को एंबुलेंस सेवा दी गई. 29 स्थानों पर आयुष 64 वितरण केंन्द खुले. 18 प्रांत स्तर की संस्थाओं को भी सेवा काम से जोड़ा गया है. 250 लोगों को ऑक्सीजन सिलेन्डर उपलब्ध कराया गया.

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October 1st 2021, 2:11 pm

इमरान का नया पाकिस्तान – हकीम सरदार सतनाम सिंह की गोली मारकर हत्या

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पाकिस्तान में लंबे समय से अल्पसंख्यक समुदाय के लोग कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं. हिन्दू-सिक्ख-ईसाई समुदाय के लोगों को अगवा करना, उनसे मारपीट करना, उनके घर-बस्ती जलाना या बर्बर ईशनिंदा कानून के शिकंजे में फंसा देना…. इमरान खान के ‘नए पाकिस्तान’ की असलियत को पेशावर में दिनदहाड़े एक सिक्ख हकीम सतनाम सिंह की हत्या ने फिर से दुनिया के सामने उजागर कर दिया है.

30 सितम्बर को पाकिस्तान के पेशावर शहर में अज्ञात बंदूकधारियों ने सतनाम सिंह की उनके क्लीनिक में घुसकर गोली मारकर हत्या कर दी. सतनाम एक हकीम थे. मौके पर पहुंची पुलिस ने मामले पर कार्रवाई तो शुरू कर दी है, लेकिन किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है. मौके पर पहुंचने के बाद पुलिस ने बताया कि हकीम सरदार सतनाम सिंह पर अज्ञात बंदूकधारियों ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं. चार गोली लगने के बाद सतनाम सिंह ने मौके पर ही दम तोड़ दिया. उनकी हत्या करने के बाद हत्यारे वहां से फरार हो गए.

पेशावर की चारसद्दा रोड पर हकीम सरदार सतनाम सिंह वर्षों से अपना क्लीनिक चला रहे थे. लोग हैरान हैं, किसी को समझ नहीं आ रहा है कि आखिर उनकी हत्या क्यों की गई है. सतनाम सिंह का किसी से कोई वैर भाव भी नहीं था.

घटना को लेकर पाकिस्तान के हिन्दू-सिक्ख और अन्य अल्पसंख्यक समुदाय में जबरदस्त आक्रोश है. घटना ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के उस वादे की भी पोल खोल दी है कि जो उन्होंने पाकिस्तान के अल्पसंख्यक समुदाय से किया था कि वे उनकी सुरक्षा का हर तरह से ख्याल रखेंगे. लेकिन, असल में पाकिस्तान में लगभग रोज ही अल्पसंख्यकों को कट्टरपंथी निशाना बना रहे हैं. पेशावर में हकीम सतनाम सिंह की हत्या ने एक बार फिर से पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय वालों दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति को रेखांकित किया है.

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October 1st 2021, 2:11 pm

सिविल सेवा में चयनित विद्या भारती के पूर्व छात्र का सम्मान

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चूरू. चूरु के रतनगढ़ रोड स्थित आदर्श विद्या मंदिर में गुरुवार को सिविल सेवा में चयनित विद्यालय के पूर्व छात्र गौरव बुडानिया का प्रशस्ति पत्र तथा दुपट्टा पहनाकर सम्मान किया गया. विद्यालय के प्रधानाचार्य किशनलाल सैनी ने गौरव की प्रारंभिक शिक्षा, उसकी उपलब्धियां तथा उसकी प्रभावी गतिविधियों पर प्रकाश डाला.

गौरव ने कहा कि विद्या मंदिर में स्वयं पर तथा अपने कार्य पर विश्वास करना सिखाया जाता है एवं राष्ट्र के प्रति निष्ठा तथा प्रेम की शिक्षा दी जाती है. उसने रेल के इंजन का उदाहरण देते हुए बताया कि हमें अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एकाग्रचित्त होकर परिश्रम करना चाहिए. उसने अपनी सफलता का श्रेय विद्यालय के सभी गुरुजनों को तथा अपने स्वर्गीय ताऊजी को दिया.

इस अवसर पर विद्या भारती के प्रांत मंत्री शैलेंद्र शर्मा, प्रांत सचिव अशोक पारीक सहित प्रबंधन के सदस्य व अध्यापक उपस्थित रहे.

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October 1st 2021, 2:11 pm

चार दिन के प्रवास पर जम्मू पहुंचे सरसंघचालक मोहन भागवत

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जम्मू. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी वीरवार दोपहर करीब 2:00 बजे जम्मू के अंबफला स्थित केशव भवन में पहुंचे. वे चार दिन के प्रवास पर आए हैं. सरसंघचालक जम्मू कश्मीर प्रांत के पदाधिकारियों के साथ विभिन्न विषयों पर चर्चा करेंगे. हर वर्ष प्रांत पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं के साथ समीक्षा बैठक आयोजित की जाती है. इसी क्रम में जम्मू कश्मीर प्रांत की बैठकें तय हुई हैं. जिसमें सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी, पदाधिकारी एवं प्रचारकों से साल भर के कार्यों पर चर्चा करेंगे तथा आगामी कार्यक्रमों पर प्रकाश डालेंगे.

निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सरसंघचालक जी विभिन्न बैठकों का क्रम 01 अक्तूबर से प्रारंभ होगा. 02 अक्तूबर को जम्मू विश्वविद्यालय के जोरावर सिंह सभागार में प्रबुद्धजनों की विचार गोष्ठी को संबोधित करेंगे. 03 अक्तूबर को सरसंघचालक जी जम्मू कश्मीर में मंडल व बस्ती अनुसार एकत्रीकरण के अवसर पर स्वयंसेवकों को ऑनलाइन माध्यम से संबोधित करेंगे.

 

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October 1st 2021, 2:11 pm

सतना की उन्नतशील महिला कृषक साधना तिवारी को जवाहरलाल नेहरू कृषक फैलो सम्मान-2021

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चित्रकूट. दीनदयाल शोध संस्थान कृषि विज्ञान केंद्र, सतना के तकनीकी मार्गदर्शन में कृषि के क्षेत्र में किये जा रहे अभिनव नवाचारों के लिए ग्राम माधवगढ़ तहसील रघुराजनगर जिला सतना की साधना तिवारी को जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर के 58वें स्थापना दिवस पर प्रतिष्ठित पुरस्कार कृषक फैलो सम्मान-2021 से सम्मानित किया जाएगा.

कृषक फैलो सम्मान 2021 के लिए चयनित साधना तिवारी ने कृषि विज्ञान केंद्र मझगवां के तकनीकी मार्गदर्शन में अंगीकृत कृषि प्रणाली में दलहन, तिलहन, धान्य फसलों के साथ फलोद्यान, पशुपालन, मुर्गीपालन, मधुमक्खी पालन का समावेश करते हुए पर्यावरण सुरक्षा पर भी ध्यान केन्द्रित किया है. प्रक्षेत्र पर उपलब्ध जैव कचरे से वर्मीकम्पोस्ट का उत्पादन कर जैविक खेती की ओर अग्रसर है. उत्पादन लागत में कमी एवं उपलब्ध संसाधनों का उचित प्रबंधन कर जोखिम को कम करने में सफलता अर्जित की है.

कृषकों के उत्पाद का उचित मूल्य मिल सके इस हेतु सोहावल कृषक उत्पादक संगठन का भी गठन किया गया है. उपरोक्त कार्य हेतु जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर द्वारा कृषक फैलो सम्मान-2021 से सम्मानित करने के लिए चयनित किया गया है.

कृषि विज्ञान केंद्र मझगवां द्वारा भारतरत्न राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख के ध्येय को साकार करने हेतु सतना जिले के किसानों को अग्रणी एवं उन्नतशील, समृद्ध कृषक बनाने हेतु तकनीकी सहयोग एवं नवाचार के लिए प्रेरित किया जाता है.

साधना तिवारी केवीके मझगवां-सतना से जुड़कर कृषि के क्षेत्र में जिले के कृषकों एवं महिला कृषकों के लिए बेहतर उदाहरण साबित हो रही है. इसके अतिरिक्त दमोह जिले के मनोज कुमार पटेल एवं बैतूल जिले के राजकुमार सिरोरिया को भी चयनित किया गया है. जिन्हें जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के 58वें स्थापना दिवस पर 01 अक्तूबर, 2021 को सम्मानित किया जाएगा.

साधना की उपलब्धि के लिए दीनदयाल शोध संस्थान के संगठन सचिव अभय महाजन एवं कोषाध्यक्ष वसंत पंडित तथा कृषि विज्ञान केंद्र के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. राजेंद्र सिंह नेगी सहित केवीके मझगवां के सभी वैज्ञानिकों ने बधाई देते हुए उनको आगे भी कृषि क्षेत्र में विशेष योगदान को आगे बढ़ाने एवं कृषि के क्षेत्र में महिलाओं को भी विशेष रूप से प्रेरित करने हेतु शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की.

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October 1st 2021, 2:11 pm

‘हिन्दुत्व’ में इज्म नहीं हो सकता – जे. नंदकुमार

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पटना. प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे. नंदकुमार जी ने कहा कि हिन्दुत्व का तात्पर्य उन तत्वों से है, जिनके कारण कोई हिन्दू कहलाता है. हिन्दुइज्म शब्द गढ़ने वालों का मुख्य उद्देश्य हिन्दुओं को विभाजित रखना है. हिन्दू कभी ‘इज्म’ में नहीं आ सकता. ‘इज्म’ एक सीमा में बंधी हुई विचारधारा है. जैसे इस्लाम के लिए कुरान अपने आप में परिपूर्ण है, उसमें किसी भी तरह का कोई बदलाव नहीं किया जा सकता और इसी के आधार पर व्यवस्थाओं को चलाने का दम्भ रखा जाता है. ऐसे कुछ और मजहब भी हैं. लेकिन, हिन्दू पद्धति में सबका चिंतन किया जाता है एवं देश-काल-परिस्थिति के अनुसार उसमें संशोधन भी होते रहते हैं. भारत के सन्यासी एवं ऋषि-मुनियों ने संपूर्ण विश्व के कल्याण का कार्य किया.

पटना के बिहार विधान परिषद् सभागार में 27 सितंबर को अपनी पुस्तक ‘बदलते दौर में हिन्दुत्व’ के विमोचन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि ‘खलीफेत’ शब्द को खिलाफत बना दिया गया. यह षड्यंत्र टर्की के विवाद को भारतीय स्वाधीनता आंदोलन से जोड़ने के लिए किया गया. इसका उद्देश्य स्वतंत्रता सेनानियों में एक भ्रम पैदा कर पूरे संघर्ष की पृष्ठभूमि को बदलने की कोशिश थी. इसी का नतीजा था कि देश का विभाजन हुआ.

विमोचन कार्यक्रम को बिहार विधान परिषद् के सभापति अवधेश नारायण सिंह, बिहार के उप मुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद, प्रज्ञा प्रवाह के क्षेत्रीय संयोजक रामाशीष सिंह इत्यादि ने भी संबोधित किया. पुस्तक का परिचय पटना विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक गुरु प्रकाश ने दिया. कार्यक्रम में मंच संचालन प्रज्ञा प्रवाह के प्रांत संयोजक कृष्णकांत ओझा ने किया.

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October 1st 2021, 2:11 pm

राजस्थान में बाल विवाह को स्वीकृति?

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राजस्थान विधानसभा में पारित विवाह पंजीकरण संशोधन विधेयक चर्चा में है. विधेयक की धारा 8 पर विवाद है. इसमें कहा गया है कि शादी के वक्त लड़की की उम्र 18 साल और लड़के की उम्र 21 साल से कम है तो उनके माता-पिता या अभिभावकों को तीस दिन के अंदर इसकी सूचना पंजीकरण अधिकारी को देनी होगी. इसी संशोधन को लेकर विवाद है. भारत का कानून कहता है कि अगर 21 साल की उम्र से पहले लड़के और 18 साल की उम्र से पहले किसी किसी लड़की का विवाह होता है तो उसे बाल विवाह माना जाएगा, और भारत में बाल विवाह पर प्रतिबंध है. इस पर सजा का भी प्रावधान है.

अब सवाल उठता है  कि जब देश में बाल विवाह पर प्रतिबंध है तो इसका रजिस्ट्रेशन क्यों? क्या राजस्थान सरकार का कदम बाल विवाह को बढ़ावा देने वाला नहीं होगा? राजस्थान में विपक्ष के साथ ही बाल और महिला अधिकारों से जुड़े संगठन भी इसका विरोध कर रहे हैं. यहां तक कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने भी आपत्ति जताई है.

आयोग के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने तो यहां तक कह दिया है कि जरूरत पड़ी तो वह सुप्रीम कोर्ट तक भी जाएंगे. एनसीपीसीआर ने इस संबंध में राजस्थान के राज्यपाल से भी बात की है. कानूनगो का कहना है कि इस कानून से बाल विवाह के साथ ही बाल अपराध को भी बढ़ावा मिलेगा. यहां विवाह नहीं, बल्कि अपराध का पंजीकरण करने की बात हो रही है. सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह बच्चों के अधिकारों का संरक्षण करे, लेकिन राजस्थान के विधि निर्माताओं ने इस तरह का कृत्य किया है जो संविधान के परे है. महात्मा गांधी जी ने ‘यंग इंडिया’ में लिखा था कि लड़कियों पर इससे बड़ा जुल्म नहीं हो सकता कि उनका विवाह अल्प आयु में कर दिया जाए. उनका खुद का बाल विवाह हुआ था और बाल विवाह का उनसे ज्यादा मुखर विरोध किसी ने नहीं किया होगा. उन्होंने कई बार यह बात स्वीकार की कि बा के साथ तमाम अन्यायों में एक अन्याय यह भी शामिल है कि उनका बाल विवाह हुआ.

क्या कहता है कानून

बाल विवाह निषेध अधिनियम किसी भी रूप में बाल विवाह को प्रतिबंधित करता है. राजस्थान में विवाह पंजीकरण के संशोधित विधेयक की धारा 8 न केवल कानून की दृष्टि से, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी ठीक नहीं है. यह प्राकृतिक न्याय के भी खिलाफ है.

बच्चों के साथ न करें राजनीति

सरकार बच्चों को राजनीति में न लाए. बच्चों के साथ छल करने का काम न करे. क्या सरकार अपराध के पंजीयन का काम करने जा रही है. जो भी इस तरह की शादी का संपादन कराएगा तो उसे दो साल की जेल होगी. यह गैर जमानती अपराध है. इस तरह का कानून बनाकर आप अपराध करने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं. इस तरह के सारे मामले न्यायालय में आएंगे. आरोपी कोर्ट से कहेगा कि विवाह का पंजीकरण हुआ है तो अपराध कैसे होगा. सरकार ने इसे मान्यता दी है. इस तरह तो अपराधी बच जाएगा, न कि उसे सजा मिलेगी. राजस्थान सरकार तुष्टीकरण की राजनीति कर रही है. वह एक वर्ग को खुश रखना चाहती है.

शर्म से झुक जाता है सिर

एनसीपीसीआर के अध्यक्ष ने कुछ केस स्टडी साझा की. उन्होंने बताया कि राजस्थान के चाइल्ड केयर सेंटर में नाबालिग बच्चियां अपने बच्चों के साथ रह रही हैं, यह देखकर हमारा सिर शर्म से झुक जाता है. हमें हर बच्चे को बाल अधिकार दिलाना है. बाल अपराध जड़ से खत्म होना चाहिए. एक बच्ची को त्रिपुरा से राजस्थान लाया गया. उसे राजस्थान में बेचा गया और उसका विवाह कराया गया. उसका गर्भपात हुआ. यह सारी बात आयोग के संज्ञान में तब आई जब उच्च न्यायालय ने नोटिस भेजा. उस बच्ची के अभिभावकों ने उसे साथ रखने से मना कर दिया. इस तरह के कृत्यों की कड़े शब्दों में निंदा की जाए तो भी कम है.

पॉक्सो कानून बच्चों के साथ शारीरिक संबंध को यौन हिंसा की श्रेणी में रखता है. 18 साल से पहले बच्चे शारीरिक संबंध नहीं बना सकते है. यह अपराध है. बाल विवाह का पंजीकरण करने से बच्चों के साथ दुष्कर्म होगा. राजस्थान के राज्यपाल को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के विचार से अवगत करा दिया गया है. आयोग यह काला कानून लागू नहीं होने देगा. जरूरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट भी जाएंगे.

बाल विवाह के 750 से अधिक मामले रिपोर्ट हुए हैं. जमीनी स्तर पर तो इससे कहीं अधिक मामले होंगे. बाल विवाह के पंजीकरण का कानून जमीनी स्तर पर काम कर रहे अधिकारी का मनोबल तोड़ देगा. राजस्थान सरकार राजा राममोहन राय के प्रयासों, महात्मा गांधी के सपनों, ज्योतिबा फुले के संघर्ष को व्यर्थ करने का काम कर रही है.

राजस्थान सरकार का तर्क

राजस्थान सरकार का कहना है कि बाल विवाह के पंजीकरण से इस तरह के विवाह को कानूनी मान्यता नहीं दी गई है. यह सिर्फ पंजीकरण है. कार्रवाई के लिए अधिकारी स्वतंत्र हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि सभी तरह के विवाह का पंजीकरण होना चाहिए.

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October 1st 2021, 2:11 pm

सर्वोच्च न्यायालय की तल्ख टिप्पणी, आपने पूरे शहर का गला घोंट दिया है

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नई दिल्ली. दिल्ली बॉर्डर पर चल रहे आंदोलन को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी की. न्यायालय ने कहा कि आपने पूरे शहर का गला घोंट दिया है और अब आप शहर के भीतर आना चाहते हैं. एक समूह ‘किसान महापंचायत’ ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर दिल्ली के जंतर-मंतर पर ‘सत्याग्रह’ की इजाजत मांगी थी. इसी पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने तीखी टिप्पणियां कीं. सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जब किसान संगठनों ने पहले ही विवादित कृषि कानूनों को चुनौती देते हुए न्यायालय का रुख किया है, तब कानूनों के खिलाफ आंदोलन को जारी रखने का क्या तुक है.

जस्टिस एएम खानविलकर ने कहा, ‘सत्याग्रह का क्या तुक है. आपने कोर्ट का रुख किया है. अदालत में भरोसा रखिए. एक बार जब आप अदालत पहुंच गए तब प्रोटेस्ट का क्या मतलब है? क्या आप ज्यूडिशियल सिस्टम के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं? सिस्टम में भरोसा रखिए.’

जस्टिस खानविलकर ने कहा, ‘आपने पूरे शहर का दम घोंट दिया है और अब आप शहर के भीतर आना चाहते हैं. आस-पास रहने वाले क्या प्रोटेस्ट से खुश हैं? यह सब रुकना चाहिए. आप सुरक्षा और डिफेंस पर्सनल को रोक रहे हैं. यह मीडिया में है. यह सब कुछ रुकना चाहिए. एक बार जब आप कानूनों को चुनौती देने के लिए कोर्ट आ चुके हैं तो प्रोटेस्ट का कोई तुक नहीं है.’

किसान महापंचायत की तरफ से कहा गया कि सड़क उन्होंने ब्लॉक नहीं की है. इस पर न्यायालय ने कहा कि आप हलफनामा दायर करें कि आपने ब्लॉक नहीं किया है.

न्यायालय ने गुरुवार को भी कहा था कि प्रदर्शनकारी हर रोज हाईवे को कैसे ब्लॉक कर सकते हैं? अधिकारियों की कर्तव्य है कि वे न्यायालय द्वारा तय की गई व्यवस्था को लागू कराएं. केंद्र सरकार को इजाजत दी है कि वह किसान संगठनों को इस मामले में पक्षकार बनाए. न्यायालय ने कहा कि जो भी समस्या है, उसका समाधान ज्यूडिशियल फोरम या संसदीय चर्चा से निकाला जा सकता है.

सर्वोच्च न्यायालय ने 23 अगस्त को भी कहा था कि किसानों को प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन सड़कें अनिश्चितकाल के लिए बंद नहीं कर सकते.

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October 1st 2021, 2:11 pm

सामाजिक-आध्यात्मिक शक्ति के बल पर भारत विश्व का मार्गदर्शन करेगा – रामलाल जी

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आगरा. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल ने कहा कि संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी चिकित्सक थे और द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी शिक्षक थे. अतः संघ का इन दोनों वर्गों से बहुत ही गहरा रिश्ता है. साथ ही संघ इनका बहुत सम्मान भी करता है. हमारे धर्म में जिसके प्रति श्रद्धा भाव प्रकट करना हो, तो उसके प्रति मां शब्द का प्रयोग करते हैं. दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है जो अपने नाम में माता शब्द का प्रयोग करता हो, ऐसा एकमेव भारत देश ही है. रामलाल जी बुधवार को खंदारी स्थित जेपी सभागार में आगरा विभाग द्वारा आयोजित प्रबुद्धजन संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि आज समाज को जातियों में बांटने का कार्य होता है, विशेषतः हिन्दू को. हमें इससे सावधान रहने की आवश्यकता है. संघ में एक घंटे एक जगह शाखा में एकत्रित होकर भारतीय संस्कृति के प्रतीक भगवा ध्वज के समक्ष अपना शारीरिक, मानसिक, चारित्रिक विकास करना ही संघ का कार्य है. बीबीसी ने 90 के दशक में एक क्विज प्रतियोगिता में कहा था कि दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है. संघ ही एक ऐसा संगठन है, जिसमें शिशु से प्रौढ़ सभी आते हैं. सर्वस्पर्शी व सर्वसमावेशी संघ ही है. संघ झुग्गी झोपड़ी से लेकर पॉश कॉलोनी तक में चलता है. स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है – “I want a man with capital M” अर्थात विशेष गुणों से युक्त व्यक्ति चाहिए. भारत के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम जी ने कहा था कि यदि देश के सभी लोगों को nationalize कर दिया जाए तो सारी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी.

रामलाल जी ने कहा कि एक व्यक्तिगत चरित्र, दूसरा राष्ट्रीय चरित्र दोनों परस्पर पूरक हैं. डॉ. हेडगेवार ने कहा था कि मैं कोई अलग कार्य नहीं कर रहा. हमारी भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा है, जिसे लोग भूलते जा रहे हैं. मैं बस उसी को हिन्दू समाज को स्मरण करवाने का कार्य कर रहा हूँ.

भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जिसमें आयी रूढ़ियों को छोड़कर आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति है. डॉ. हेडगेवार ने एक निष्कर्ष निकाला कि यदि देश में national character तैयार होता है तो देश निश्चित ही परम वैभव पर पहुंचेगा. संघ समाज को जोड़ने का कार्य करता है.

कोरोना काल में भारत ने कोरोना की दवा को विदेशों में भेजकर वसुधैव कुटुम्बकम का संदेश दिया. देश में एक राष्ट्रीयता का उदय हुआ है, जिस कारण नेटवर्किंग और इको सिस्टम की वजह से विकृत मानसिकता का समूह भारत को तोड़ने का प्रयास करता रहता है और कोई पत्रकार भी राष्ट्रीयता की बात करे तो उस पर भी हमलावर रहता है. वर्तमान समय में एक जागरूक समाज की आवश्यकता है. देश की सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक शक्ति के बल पर भारत विश्व का मार्गदर्शन करेगा.

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September 24th 2021, 11:47 pm

आतंकियों का समर्थन और सरकारी नौकरी साथ-साथ नहीं…6 कर्मी बर्खास्त

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जम्मू कश्मीर. आतंकी संगठनों व आतंकियों से संबंध रखने वाले सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ जम्मू कश्मीर प्रशासन सख्त हो गया है. प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे कर्मचारियों के प्रति कोई नरमी नहीं बरती जाएगी.

जम्मू कश्मीर के उप राज्यपाल मनोज सिन्हा ने एक बार फिर 6 सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्‍त कर दिया. कर्मचारियों पर आतंकवादी संगठनों से संबंध रखने और उनके लिए ओवरग्राउंड वर्कर्स के रूप में काम करने का आरोप है. बर्खास्त कर्मियों में जम्‍मू-कश्‍मीर पुलिस के दो सिपाही भी शामिल हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उप-राज्‍यपाल की तरफ से एक कमेटी का गठन किया गया है, कमेटी की सिफारिश पर यह कार्रवाई की जा रही है. इससे पहले जुलाई में भी 11 सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से हटा दिया गया था. इसमें हिजबुल कमांडर सैयद सलाहुद्दीन का बेटा भी था. दो पुलिसकर्मी भी बर्खास्‍त किए गए थे. इन सब पर आरोप था कि ये आतंकी संगठनों के लिए ओवरग्राउंड वर्कर्स के रूप में काम कर रहे थे.

देशद्रोहियों का समर्थन करने पर जाएगी नौकरी

कुछ समय पहले जम्‍मू-कश्‍मीर प्रशासन ने आदेश जारी किया था कि देशद्रोहियों का समर्थन करने वाले सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया जाएगा. देश की संप्रभुता, संविधान और राष्‍ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बनने वाले तत्‍वों का समर्थन करने पर सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा. आदेश में यह भी कहा गया है कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी राष्‍ट्रीय सुरक्षा के लिए किसी भी रूप में खतरा साबित होता है या फिर विदेशी हितों के लिए काम करते हुए पाया जाता है तो उसे नौकरी से बर्खास्‍त कर दिया जाएगा.

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September 24th 2021, 11:47 pm

राज्यों द्वारा प्रत्येक COVID-19 मृत्यु के लिए ₹ 50,000 अनुग्रह राशि प्रदान की जाएगी

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नई दिल्ली. केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया है कि उसने COVID-19 से मरने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए 50,000 रुपये के मुआवजे की सिफारिश की है. केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा दायर शपथ पत्र में स्पष्ट किया गया है कि राज्यों में संबंधित राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (एसडीआरएफ) से अनुग्रह सहायता का भुगतान किया जाएगा.

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) द्वारा अनुशंसित ₹50,000 की इस मुआवजे की राशि के लिए पात्र व्यक्तियों में वे शामिल होंगे, जिन्होंने राहत कार्यों और तैयारियों की गतिविधियों में अपनी जान गंवा दी, मौत के कारण को COVID-19 के रूप में प्रमाणित किया जा रहा है.

एनडीएमए ने कहा है कि जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण मृतक के परिजनों को राशि वितरित करेगा. मृत्यु को COVID-19 मृत्यु के रूप में प्रमाणित करने के संबंध में शिकायत के मामले में, जिला स्तर पर एक समिति संशोधित मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने सहित उपचारात्मक उपायों का प्रस्ताव करेगी.

एनडीएमए ने सिफारिश की है कि कोविड-19 महामारी के भविष्य के चरणों में होने वाली मौतों के लिए भी कोविड-19 मौतों से प्रभावित परिवारों को अनुग्रह सहायता प्रदान की जाती रहेगी. सभी दावों को आवश्यक दस्तावेज जमा करने के 30 दिनों के भीतर निपटाया जाना है और आधार से जुड़े प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण प्रक्रियाओं के माध्यम से वितरित किया जाएगा.

शीर्ष अदालत ने 30 जून को एनडीएमए को ऐसे दिशानिर्देश बनाने के लिए छह सप्ताह का समय दिया था. न्यायालय ने अनुग्रह सहायता के रूप में प्रदान की जाने वाली राशि पर निर्णय लेने का अधिकार एनडीएमए के विवेक पर छोड़ दिया.

फैसले में कहा, हम एनडीएमए को निर्देश देते हैं कि वह उन लोगों के परिवार के सदस्यों के लिए अनुग्रह मुआवजे के लिए दिशा-निर्देश तैयार करे, जो कोविड के शिकार हुए हैं. प्रदान की जाने वाली उचित राशि राष्ट्रीय प्राधिकरण के विवेक पर छोड़ दी गयी.

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September 24th 2021, 11:47 pm

हाइफा युद्ध – भारतीयों के पराक्रम का स्वर्णिम पृष्ठ

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लोकेन्द्र सिंह

पराजय का इतिहास लिखने वाले इतिहासकारों ने बड़ी सफाई से भारतीय योद्धाओं की अकल्पनीय विजयों को इतिहास के पन्नों पर दर्ज नहीं होने दिया. शारीरिक तौर पर मरने के बाद जी उठने वाले देश इजरायल की आजादी के संघर्ष को जब हम देखेंगे, तब हम पाएंगे कि यहूदियों को ‘ईश्वर के प्यारे राष्ट्र’ का पहला हिस्सा भारतीय योद्धाओं ने जीतकर दिया था. वर्ष 1918 में हाइफा के युद्ध में भारत के अनेक योद्धाओं ने अपने प्राणों का बलिदान दिया. समुद्र तटीय शहर हाइफा की मुक्ति से ही आधुनिक इजरायल के निर्माण की नींव पड़ी थी. इसलिए हाइफा युद्ध में भारतीय सैनिकों के प्राणोत्सर्ग को यहूदी आज भी स्मरण करते हैं. इजरायल की सरकार आज तक हाइफा, यरुशलेम, रामलेह और ख्यात के समुद्री तटों पर बनी 900 भारतीय सैनिकों की समाधियों की अच्छी तरह देखरेख करती है. इजरायल के बच्चों को इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों में भारतीय सैनिकों के शौर्य और पराक्रम की कहानियां पढ़ाई जाती हैं. प्रत्येक वर्ष 23 सितंबर को भारतीय योद्धाओं को सम्मान देने के लिए हाइफा के महापौर, इजरायल की जनता और भारतीय दूतावास के लोग एकत्र होकर हाइफा दिवस मनाते हैं. जहाँ, एक तरफ हमारे लिए गौरव की बात है कि इजरायल के लोग भारतीय योद्धाओं के बलिदान को अब तक सम्मान दे रहे हैं. वहीं, दूसरी ओर दु:ख की बात है कि अपने ही देश भारत में इस महान जीत के नायकों के शौर्य के किस्से पढ़ाए और सुनाए नहीं जाते हैं. हालांकि, भारतीय सेना जरूर 23 सितंबर को हाइफा दिवस मनाती है. अब हम समझ सकते हैं कि भारत और इजरायल के रिश्तों में सार्वजनिक दूरी के बाद भी जो गर्माहट बनी रही, वह भारतीय सैनिकों के रक्त की गर्मी से है.

भारतीय योद्धाओं के पराक्रम और साहस को समझने के लिए हाइफा युद्ध के पन्ने पलटने होंगे. हाइफा का युद्ध मानव इतिहास का सबसे बड़ा और अपनी तरह का आखिरी युद्ध है. प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान तुर्की साम्राज्य से इजरायल के हाइफा शहर को आजाद कराने के लिए ब्रिटिश सेना की सहायता के लिए जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद से सैनिकों को भेजा गया था. चूंकि हैदराबाद के निजाम द्वारा भेजी गई टुकड़ी में लगभग सभी सैनिक मुस्लिम थे, इसलिए ब्रिटिश सेना के अधिकारियों ने उन्हें सीधे युद्ध के मैदान में नहीं उतारा. निजाम के सैनिकों को युद्ध बंदियों के प्रबंधन और देखरेख का कार्य सौंपा गया. जबकि, मैसूर और जोधपुर की घुड़सवार सैन्य टुकड़ियों को मिलाकर एक विशेष इकाई बनाई गई थी. तुर्की, ऑस्ट्रिया और जर्मनी की संयुक्त साधन सम्पन्न शक्तिशाली सेना के विरुद्ध भारतीय सैन्य दल का नेतृत्व जोधपुर के मेजर दलपत सिंह शेखावत ने किया था, जो इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए. अदम्य साहस और सैन्य रणनीति का प्रदर्शन करके वाले मेजर दलपत सिंह शेखावत को हाइफा के नायक के रूप में जाना जाता है. हाइफा का युद्ध इसलिए बड़े युद्धों में शामिल है, क्योंकि इस युद्ध में इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास की विजय हुई थी. एक ओर तुर्की, जर्मनी और ऑस्ट्रिया की संयुक्त सेना अपनी चौकियों पर मजबूती से जमी हुई थी. उनके पास तोप, बम और बंदूक सहित अत्याधुनिक हथियार थे. जबकि भारतीय सैनिकों ने उनका मुकाबला केवल तलवार और भालों से किया. उन्होंने पैदल और घोड़ों पर सवार होकर युद्ध न केवल लड़ा, बल्कि अकल्पनीय विजय भी प्राप्त की. यह दुनिया के इतिहास में घुड़सवार सेना का अंतिम महान अभियान था. इसके साथ ही यह सैन्य इतिहास में एकमात्र घटना है, जब एक घुड़सवार सेना ने सबसे कम समय में सुरक्षित और चाक-चौबंद शहर पर कब्जा कर लिया.

हाइफा पहुंचने के बाद जब ब्रिटिश सेना को दुश्मन की मोर्चाबंदी और ताकत के बारे में पता चला तब ब्रिगेडियर जनरल एडीए किंग ने सेना को वापस बुला लिया था. ब्रिगेडियर का निर्णय उचित ही था, क्योंकि तुर्की की सेना सुरक्षित और युद्ध की दृष्टि से लाभप्रद स्थिति में थी. परंतु, भारतीय योद्धा सेना को वापस बुलाने के निर्णय से खुश नहीं थे. उन्होंने कहा कि ‘हम अपने देश में किस मुंह से जाएंगे. अपने देश की जनता को कैसे बताएंगे कि शत्रु के डर से मैदान छोड़ दिया. युद्ध के मैदान में पीठ दिखाकर भागना उचित नहीं माना जाता. इसलिए हम तो लड़कर यहीं वीरगति प्राप्त करना पसंद करेंगे.’ भारतीय सैनिक सीधे मौत के मुँह में जाने की इजाजत माँग रहे थे. काफी समझाने के बाद भी जब भारतीय सैनिक नहीं माने, तब ब्रिटिश सेना के अधिकारी समझ गए कि यह असली योद्धा हैं, इन्हें रोका नहीं जा सकता. भारतीय योद्धाओं के दृढ़ संकल्प और अदम्य साहस को देखकर उन्हें हमले की अनुमति दे दी गई.

तलवार और भालों से सज्जित घुड़सवार एवं पैदल भारतीय सेना ने 23 सितंबर को सुबह 5 बजे हाइफा की ओर बढ़ना प्रारंभ किया. भारतीय सेना का मार्ग माउंट कार्मल पर्वत श्रृंखला के साथ लगता हुआ था और किशोन नदी एवं उसकी सहायक नदियों के साथ दलदली भूमि की एक पट्टी तक सीमित था. जैसे ही सेना 10 बजे हाइफा पहुंची, वह माउंट कार्मल पर तैनात 77 एमएम बंदूकों के निशाने पर आ गए.

परंतु, भारतीय सेना का नेतृत्व कर रहे जवानों ने यहां सूझबूझ दिखाई. मैसूर लांसर्स की एक स्क्वाड्रन शेरवुड रेंजर्स के एक स्क्वाड्रन के समर्थन से दक्षिण की ओर से माउंट कार्मल पर चढ़ी. उन्होंने दुश्मनों पर अचानक आश्चर्यचकित कर देने वाला हमला कर कार्मल की ढलान पर दो नौ सैनिक तोपों पर कब्जा कर लिया. उन्होंने दुश्मनों की मशीनगनों के खिलाफ भी वीरता के साथ आक्रमण किया. उधर, 14:00 बजे ‘बी’ बैटरी एचएसी के समर्थन से जोधपुर लांसर्स ने हाइफा पर हमला किया. मजबूत प्रतिरोध के बावजूद भी लांसर्स ने बहादुरी के साथ दुश्मनों की मशीनगनों पर सामने से आक्रमण किया. 15:00 बजे तक भारतीय घुड़सवारों ने उनके स्थानों पर कब्जा कर तुर्की सेना को पराजित कर हाइफा पर अधिकार कर लिया. (पुस्तक : इजऱायल में भारतीय वीरों की शौर्यगाथा, लेखक : रवि कुमार, पृष्ठ-21 और 22)

भारतीय सैनिकों की कुशल रणनीति से प्राप्त अकल्पनीय विजय के कारण इस युद्ध को इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज किया गया है. फौजी पाठ्यक्रमों में इस युद्ध को पढ़ाया जाता है. मिस्र और फिलिस्तीन के सैन्य अभियान (वॉल्यूम-2) में भारतीय घुड़सवार सैन्य टुकड़ी की कार्रवाई को अद्वितीय बताया गया है – ‘पूरे अभियान के दौरान घुड़सवार सेना की कार्रवाई के समान कोई अन्य युद्ध नहीं लड़ा गया था. मशीनगन की गोलियां भी बार-बार तेजी से आगे बढ़ रहे घोड़ों को रोकने में असफल रही थीं.’

Marquess of Anglesey की पुस्तक ‘ब्रिटिश फौज का इतिहास’ में भी इस युद्ध का विवरण दिया है – ‘…यह निश्चित रूप से विश्व के इतिहास में एकमात्र अवसर था, जब एक सुरक्षित शहर पर तेजी से बढ़ती घुड़सवार सेना द्वारा कब्जा कर लिया गया.’ इसी तरह जनरल एलेनबी ने अपनी डाक के मुख्य भाग में विशेष रूप से भारतीय योद्धाओं और उनका नेतृत्व कर रहे मेजर दलपत सिंह शेखावत की वीरता का उल्लेख किया है – ‘जब मैसूर लांसर्स माउंट कार्मल की ढलानदार चट्टानों को पार कर रहे थे, जोधपुर लांसर्स धरती को रौंदते हुए, दुश्मनों की मशीनगन पर चढ़ाई करते हुए शहर में तेजी से आए, वहाँ रास्तों पर बहुत से तुर्कों पर भाले से प्रहार किया. कर्नल ठाकुर दलपत सिंह (मिलिट्री क्रॉस) ने वीरता के साथ आक्रमण का नेतृत्व किया.’

यहां बताना उचित होगा कि मिलिट्री क्रॉस उस समय ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय सैनिकों को दिया जाने वाला सर्वोच्च वीरता सम्मान था. मेजर दलपत सिंह शेखावत के साथ ही कैप्टन अनूप सिंह और सेकंड लेफ्टिनेंट सगत सिंह को भी वीरतापूर्वक लडऩे के लिए सर्वोच्च वीरता सम्मान मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया गया.

लगभग 2000 वर्ष से अपनी जन्मभूमि से बेदखल, दुर्व्यवहार और अमानवीय यातनाओं के शिकार यहूदियों के लिए 23 सितंबर, 1918 को तुर्की साम्राज्य से हाइफा शहर की मुक्ति का महत्त्व बहुत अधिक था. यूरोप सहित दुनिया के अन्य हिस्सों में रह रहे यहूदियों ने जब हाइफा की मुक्ति का समाचार सुना तो वे खुशी से झूम उठे. उन्हें अपना संकल्प पूरा होते दिख रहा था. दुनिया में यहां-वहां फैले यहूदी अपनी मातृभूमि इजरायल को पुन: प्राप्त करने के अपने संकल्प का प्रतिदिन स्मरण करते थे. प्रत्येक यहूदी दूसरे यहूदी से विदा लेते समय यह कहना कभी नहीं भूलता था कि ‘अगली मुलाकात/सुबह यरुशलेम में होगी.’ हाइफा की मुक्ति से उन्हें अपना स्वप्न पूरा होता दिख रहा था. इजरायल से निष्कासन के बाद यहाँ-वहाँ गुजर-बसर कर रहे यहूदियों ने सन् 1919 से हाइफा में पहुंचना शुरू कर दिया था. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने अपने लिए अलग देश इजरायल की मांग जोर-शोर से उठाना प्रारंभ की दी. अंतत: यहूदियों के प्रयास रंग लाए और 30 साल बाद वह दिन आ गया, जब उन्हें 1948 में अपना देश इजरायल प्राप्त हुआ. हाइफा शहर की मुक्ति के बाद भी भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के सैनिकों के साथ मिलकर पूरे इजरायल को मुक्त करवाने के लिए कुछ और लड़ाइयां भी लड़ीं. इजरायल की आजादी के लिए लड़े गए विभिन्न युद्धों में लगभग 900 साहसी भारतीय सैनिकों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया है.

भारत के प्रति इजरायल का जो कृतज्ञता का भाव है, संभवत: उसके पीछे इन्हीं महान योद्धाओं का बलिदान है.

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September 24th 2021, 11:47 pm

अब प्रोग्रेसिव लोगों को साड़ी से भी तकलीफ, साड़ी पहने महिला को रेस्टोरेंट में प्रवेश नहीं दिया

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प्रोग्रेसिव कहे जाने वाले कुछ लोगों को अब भारतीयता की प्रतीक साड़ी से भी तकलीफ होने लगी है. हैरानी की बात है कि सम्भ्रांत कही जाने वाली देश की राजधानी दिल्ली के खेल गांव, अंसल प्लाजा स्थित अकीला रेस्टोरेंट ने जर्नलिस्ट अनीता चौधरी को रेस्टोरेंट में प्रवेश देने से मना कर दिया. रेस्टोरेंट स्टाफ का तर्क था कि यहां केवल स्मार्ट आउट-फिट्स में ही महिलाएं प्रवेश कर सकती हैं और उनकी नजर में साड़ी स्मार्ट आउटफिट नहीं है. अनीता चौधरी अकीला रेस्टोरेंट में अपनी बेटी के जन्मदिन पर परिवार सहित डिनर करने गई थीं.

घटना से आहत अनीता चौधरी ने वापस आने के बाद एक वीडियो के माध्यम से सोशल मीडिया पर अपनी पीड़ा व्यक्त की और कई सवाल भी उठाए. उनका कहना है कि मुझे साड़ी पसंद है, मेरी मां भी साड़ी पहनती हैं और मेरी बेटियां भी. कहने की आवश्यकता नहीं कि साड़ी एक भव्य, राजसी और शालीन परिधान है. वे प्रश्न करती हैं कि क्या कोई मुझे बताएगा कि स्मार्ट आउट-फिट्स की सूची में कौन से कपड़े आते हैं?

साड़ी का नाम आते ही भारतीय नारी का पूरा व्यक्तित्व नजरों के सामने उभर आता है. सनातन काल से साड़ी भारतीय महिला का मुख्य परिधान रही है. समाज सेविका दीपा खंडेलवाल अनीता चौधरी की पीड़ा को सही ठहराती हुई कहती हैं, इस देश में जहां प्रतिदिन पीएम को गाली देने से लेकर, गोमांस खाने और बिकनी में पार्टी करने की स्वतंत्रता पर बहस होती हो और कुछ लोग उनकी वकालत भी करते हों तो ऐसे में अनीता चौधरी को साड़ी पहनने पर अपमानित करना आहत तो करता है. साड़ी हमारी शान है, वह भारतीयता की पहचान है, वह बैकवर्ड कैसे हो गई? साड़ी तो देश ही नहीं विदेशों और विदेशियों में भी लोकप्रिय है.

यूके में रह रही डॉक्टर पायल कहती हैं कि साड़ी में महिला का रूप और लावण्य तो निखरता ही है, उसके व्यक्तित्व में भव्यता भी जुड़ जाती है. यही कारण है कि साड़ी भारतीय महिलाओं को ही नहीं विदेशी महिलाओं को भी लुभाती है. भारत आईं विदेशी मेहमान भी साड़ी पहनकर भारतीयता का एहसास करती हैं.

मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जुगनाथ की पत्नी कोबीता को बनारसी साड़ियां बहुत पसंद हैं. पिछली बार जब वे भारत आई थीं तो तनछुई और कढ़वा बार्डर वाली कई साड़ियां खरीद कर ले गई थीं.

पूर्व ब्रिटिश पीएम थेरेसा का साड़ी प्रेम भी किसी से छिपा नहीं. 2016 में जब वे भारत आई थीं तो प्राचीन श्री सोमेश्वर मंदिर साड़ी पहनकर गई थीं. 2010 में जब वह प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि गृह सचिव थीं, तब भी एक अवॉर्ड फंक्शन में उन्होंने साड़ी पहनी थी.

रूस में तो साड़ी की लोकप्रियता का कोई जवाब ही नहीं. ये उदाहरण उन लोगों के मुंह पर तमाचा हैं जो भारतीय संस्कृति को हीन बताते हैं और पाश्चात्य सभ्यता की नकल करते हैं. जबकि पश्चिमी देश चाहे भारतीय परिधान साड़ी और लहंगे हों, संयुक्त परिवार हों या योग, सबके मुरीद हैं.

आश्चर्य है कि देश की राजधानी दिल्ली में तथाकथित प्रोग्रेसिव व एडवांस कहे जाने वाले कुछ लोगों को साड़ी से भी चिढ़ होने लगी है.

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September 24th 2021, 11:47 pm

मालाबार नरसंहार का सच सबके समक्ष आना चाहिए

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नई दिल्ली. खिलाफत आंदोलन को स्वाधीनता की लड़ाई से जोड़ने वाले इतिहास का सत्य समाज के समक्ष आना ही चाहिए. यह आंदोलन पूरी तरह से धार्मिक था. केरल में मालाबार का नरसंहार इसकी एक बानगी है, जिसमें 10 हजार से अधिक हिन्दुओं का नरसंहार कर दिया गया था. इस नरसंहार को सामने लाने के लिए प्रदर्शनी, सेमीनार का आयोजन किया जाएगा. तथा जिन्हें स्वतंत्रता सेनानी बताया जाता है और उनके परिवार को सरकारी सुविधाएं दी जा रही हैं, उकी सच्चाई सबके सामने आ सके…जिन्होंने मतांतरण न करने पर एक वर्ग विशेष का नरसंहार किया.

यह प्रदर्शनी और प्रस्तुति 25 सितंबर को कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में होगी, जिसमें पीड़ित परिवार के लोगों की तस्वीरें और उनके बयान दिखाए जाएंगे. साथ ही एक कुंए की प्रतिकृति होगी, जिसमें जिक्र होगा कि इसी तरह के कुंए में लोगों को मारकर डाला गया था. शाम को वहीं पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन होगा.

इसी तरह 26 सितंबर को कांस्टीट्यूशन क्लब में सेमीनार आयोजित होगा, जिसमें वरिष्ठ इतिहासकार और विशेषज्ञ खिलाफत आंदोलन के काले अध्याय पर प्रकाश डालेंगे. यह कार्यक्रम नरसंहार, खिलाफत आंदोलन के 100 वर्ष पूरे होने पर केरल की वामपंथी सरकार द्वारा समारोह के रूप में मनाने की तैयारी है.

विशेष बात कि हाल ही में शिक्षा मंत्रालय के तहत आने वाले भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आइसीएचआर) की एक समिति ने परिषद को सौंपी रिपोर्ट में देश के स्वाधीनता आंदोलन के सेनानियों की सूची से मालाबार से डाले गए 386 लोगों के नाम बाहर करने की सिफारिश की थी, इसमें 1921 के इस कथित आंदोलन के अगुआ वीके हाजी का भी नाम है.

प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे. नंदकुमार ने कहा कि इन लोगों के नाम स्वाधीनता आंदोलन के सेनानियों की सूची से बाहर किया जाना चाहिए. क्योंकि स्वाधीनता की लड़ाई में खिलाफत आंदोलन का कुछ लेना देना नहीं था. बल्कि इसके चलते देश में जगह-जगह धार्मिक उन्माद बढ़ा. उसमें से एक मालाबार का नरसंहार भी है, जिसमें मतांतरण न करने पर हजारों लोगों को मारा गया. उन परिवारों के लोग अभी भी हैं, लेकिन तोड़मरोड़ कर लिखे गए इतिहास में उन्हें उचित स्थान नहीं दिया गया.

1921 के मोपला विद्रोह को “जनसंहार के तौर पर याद किया जाना चाहिए और एक स्मारक का निर्माण भी किया जाना चाहिए.” मलप्पुरम में सौ साल पहले हुई 1921 की मालाबार हत्याओं की याद में सरकार को एक “जनसंहार स्मारक” बनवाना चाहिए और 25 सितंबर को “मालाबार हिन्दू जनसंहार दिवस” के रूप में मनाया जाना चाहिए.

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September 24th 2021, 11:47 pm

रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना के लिए 56 सी-295 एमडब्ल्यू परिवहन विमान के अधिग्रहण के लिए एयरबस ड

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नई दिल्ली. रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायु सेना के लिए 56 सी-295एमडब्ल्यू परिवहन विमान के अधिग्रहण के लिए मैसर्स एयरबस डिफेंस एंड स्पेस, स्पेन के साथ एक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए. रक्षा मंत्रालय ने मैसर्स एयरबस डिफेंस एंड स्पेस के साथ ऑफसेट अनुबंध पर भी हस्ताक्षर किए हैं, जिसके माध्यम से मैसर्स एयरबस भारतीय ऑफसेट भागीदारों से योग्य उत्पादों और सेवाओं की सीधी खरीद के माध्यम से अपने ऑफसेट दायित्वों का निर्वहन करेगा. इन अनुबंधों पर इस महीने की शुरुआत में कैबिनेट की सुरक्षा मामलों की कमेटी द्वारा दी गई मंजूरी के बाद हस्ताक्षर किए गए थे.

सी-295एमडब्ल्यू को शामिल करना भारतीय वायु सेना के परिवहन बेड़े के आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा. यह समकालीन तकनीक के साथ 5-10 टन क्षमता का परिवहन विमान है जो भारतीय वायुसेना के पुराने परिवहन विमान की जगह लेगा. विमान आधी तैयार की गई एयर स्ट्रिप्स से संचालन करने में सक्षम है और इसमें तेज़ प्रतिक्रिया और सैनिकों तथा कार्गो के पैरा ड्रॉपिंग के लिए एक रियर रैंप दरवाजा है. विमान विशेष रूप से उत्तरी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र और अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह में भारतीय वायुसेना की सामरिक एयरलिफ्ट क्षमता को बढ़ावा देगा.

यह परियोजना सरकार के ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ को बढ़ावा देगी जो भारतीय निजी क्षेत्र को प्रौद्योगिकी गहन और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी विमानन उद्योग में प्रवेश करने का एक अनूठा अवसर प्रदान करती है. 56 में से 40 विमान भारत में टाटा कंसोर्टियम द्वारा निर्मित किए जाएंगे. अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के 10 साल के भीतर सभी डिलीवरी पूरी कर ली जाएंगी. सभी 56 विमानों को स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट के साथ स्थापित किया जाएगा. डिलीवरी के पूरा होने के बाद भारत में निर्मित बाद के विमानों को उन देशों को निर्यात किया जा सकता है, जिन्हें भारत सरकार द्वारा मंजूरी दी गई है. यह परियोजना भारत में एयरोस्पेस संबंधी पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देगी. जिसमें देश भर में फैले कई एमएसएमई उद्योग विमान के कुछ हिस्सों के निर्माण में शामिल होंगे. इस में हैंगर, भवन, एप्रन और टैक्सीवे के रूप में विशेष बुनियादी ढांचे का विकास भी शामिल होगा. यह कार्यक्रम स्वदेशी क्षमताओं को मजबूत करने और ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देने के लिए सरकार की एक अनूठी पहल है.

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September 24th 2021, 11:47 pm

विस्फोटकों का तेजी से पता लगाने के लिए कम लागत वाला इलेक्ट्रॉनिक पॉलीमर आधारित सेंसर विकसित किया

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नई दिल्ली. भारतीय वैज्ञानिकों ने पहली बार उच्च-ऊर्जा विस्फोटकों में प्रयुक्त नाइट्रो-एरोमैटिक रसायनों का तेजी से पता लगाने के लिए तापीय रूप से स्थिर (थर्मली स्टेबल) और कम लागत लागत वाला इलेक्ट्रॉनिक पॉलीमर-आधारित सेंसर विकसित किया है. विस्फोटकों को नष्ट किए बिना उनका पता लगाना सुरक्षा के लिए आवश्यक है और ऐसे मामलों में आपराधिक जांच, बारूदी सुरंग वाले क्षेत्र में ही उपचार (माइनफील्ड रिमेडिएशन), सैन्य अनुप्रयोगों, गोला-बारूद उपचार स्थल, सुरक्षा अनुप्रयोगों  और रासायनिक सेंसर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

हालांकि, विस्फोटक पॉली-नाइट्रो-एरोमैटिक यौगिकों का विश्लेषण आमतौर पर परिष्कृत उपकरणों में प्रयुक्त तकनीकों द्वारा किया जा सकता है. लेकिन अपराध विज्ञान प्रयोगशालाओं या कब्जे से मुक्त कराए गए सैन्य स्थलों में त्वरित निर्णय लेने अथवा उग्रवादियों के पास विद्यमान विस्फोटकों का पता लगाने के लिए अक्सर सरल, कम लागत वाली और ऐसी चयनात्मक क्षेत्र तकनीकों की आवश्यकता होती है, जिनकी प्रकृति गैर – विनाशकारी हो.

नाइट्रो-एरोमैटिक रसायनों (एनएसी) की गैर-विनाशकारी पहचान करना एक कठिन कार्य है. जबकि पहले के अध्ययन ज्यादातर फोटो-ल्यूमिनसेंट गुणधर्म पर आधारित होते हैं, फिर भी अब तक इन गुणों  की प्रविधि के आधार का पता नहीं लगाया गया है. गुणों  के आधार पर पता लगाने से विस्फोटकों को ढूँढ निकालने में सक्षम सरल कहीं भी ले जाए जा सकने योग्य ऐसा उपकरण बनाने में सहायता मिलती है, जिसमें एक एलईडी की मदद से परिणाम देखे जा सकते हैं.

इस तरह की कमियों को दूर करने के लिए, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के स्वायत्त संस्थान, विज्ञान और प्रौद्योगिकी उच्च अध्ययन संस्थान (इंस्टीटयूट ऑफ़ एडवांस्ड, स्टडी इन साइंस एंड टेक्नॉलोजी), गुवाहाटी के डॉ. नीलोत्पल सेन सरमा के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने पॉलीमर डिटेक्टर विकसित किया है, जिसमें दो कार्बनिक पॉलिमर होते हैं – पहला, पॉली-2-विनाइल पाइरीडीन जिसमें एक्रिलोनिट्राइल (पी2वीपी –सीओ- एएन) होता है और दूसरा, हेक्सेन (पीसीएचएमएएसएच) के साथ कोलेस्ट्रॉल मेथाक्राइलेट का को-पॉलीसल्फोन होता है जो  कुछ सेकंड के भीतर एनएसी वाष्प की बहुत कम सांद्रता की उपस्थिति में अवरोध (किसी एसी सर्किट में प्रतिरोध) आने पर भारी परिवर्तन से गुजरता है. यहां पिक्रिक एसिड (पीए) को मॉडल एनएसी के रूप में चुना गया था, और पीए की दृश्य पहचान के लिए एक सरल और लागत प्रभावी इलेक्ट्रॉनिक प्रोटोटाइप विकसित किया गया था. भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित इस नई प्रौद्योगिकी के पेटेंट के लिए भी  आवेदन किया  है.

डॉ नीलोत्पल सेन सरमा ने कहा, “पॉलीमर गैस सेंसर से युक्त इस प्रकार निर्मित एक इलेक्ट्रॉनिक सेंसिंग उपकरण (डिवाइस) विस्फोटक का तुरंत पता लगा सकती है.”

इस उपकरण (डिवाइस) को कमरे के सामान्य तापमान पर संचालित किया जा सकता है, इसमें कम प्रतिक्रिया समय होता है और अन्य रसायनों से नगण्य हस्तक्षेप होता है. इसका निर्माण बहुत ही सरल है और नमी से नगण्य रूप से प्रभावित होता है तथा इसमें उपयोग किए जाने वाले कोलेस्ट्रॉल-आधारित पॉलिमर प्रकृति में स्वतः ही विनष्ट हो जाते हैं.

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September 24th 2021, 11:47 pm

योगेश जाटव की हत्या का मामला – मॉब लिंचिंग का मामला दर्ज करने की मांग लेकर निकाली रैली

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बड़ौदामेव थाना क्षेत्र में मुस्लिमों की भीड़ द्वारा अनुसूचित जाति वर्ग के युवक योगेश जाटव की हत्या के मामले में विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) ने शुक्रवार को रैली निकाली. यह रैली कंपनी बाग स्थित शहीद स्मारक से शुरू हुई जो मनी का बड़, बस स्टैंड, विवेकानंद चौक होते हुए कलेक्ट्रेट पहुंची. यहां प्रदर्शन के बाद अतिरिक्त जिला कलेक्टर को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा गया.

विहिप के जिला अध्यक्ष दिलीप मोदी ने बताया कि 15 सितंबर को भरतपुर जिले के नगर तहसील के गांव भटपुरा के अनुसूचित वर्ग के युवक योगेश जाटव पुत्र ओम प्रकाश जाटव के साथ मुसलमानों की भीड़ ने मारपीट की. जिसकी इलाज के दौरान तीन दिन बाद जयपुर में मृत्यु हो गई. पुलिस इस मामले को सरकार के दबाव में आकर एक्सीडेंटल केस बनाना चाह रही है. जबकि योगेश की हत्या की गई है. यह मामला मॉब लिंचिंग का है, भीड़ ने उसे मारा है. ऐसे में दोषियों के विरुद्ध तुरंत पुलिस को कार्रवाई करनी चाहिए.

पांच सूत्री मांगों का सौंपा ज्ञापन

विश्व हिन्दू परिषद ने जिला कलेक्टर को 5 सूत्रीय मांगों का ज्ञापन सौंपा. जिसमें अपराधियों के विरुद्ध मॉब लिंचिंग का मुकदमा दर्ज करने, प्रकरण की जांच सीबीआई द्वारा कराने, लापरवाह पुलिस कर्मियों को तुरंत प्रभाव से निलंबित करने, मृतक परिवार को 50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता राशि प्रदान करने और मृतक की मां को सरकारी विद्यालय में चतुर्थ श्रेणी पद पर नौकरी देने के साथ मृतक की विमंदित बहन को ₹5000 प्रति माह आजीवन सहायता राशि देने की मांग की.

विहिप की ओर से आयोजित विरोध प्रदर्शन में मृतक योगेश जाटव की दादी रामप्यारी, पिता ओमप्रकाश, माता विद्या देवी, बहन कविता, कृपा सहित अन्य परिजन और बड़ी संख्या में ग्रामीण पुरुष व महिलाएं शामिल हुए. ये लोग वाहनों से गांव से सुबह अलवर पहुंचे थे.

जब विहिप के कार्यकर्ता ज्ञापन देने के लिए कलेक्ट्रेट पहुंचे तो पुलिस ने बेरिकेट्स लगाकर उन्हें रोक दिया. 10 आदमियों के अंदर आने की अनुमति दी गई. इसी दौरान कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच धक्का मुक्की हो गई. कार्यकर्ताओं ने पुलिस के बेरिकेट्स हटाकर अंदर प्रवेश किया तो बाकी कार्यकर्ता वहीं रोड पर बैठ गए.

कलेक्टर आए, नहीं लिया ज्ञापन

ज्ञापन देने के लिए विहिप के कार्यकर्ता मृतक के परिजनों के साथ कलेक्ट्रेट पहुंचे तो वहां कलेक्टर नहीं थे. ऐसे में कार्यकर्ता वहीं रोड पर बैठ नारेबाजी कर प्रदर्शन करने लगे और यहीं आकर ज्ञापन लेने की मांग पर अड़ गए. इसी दौरान कलेक्टर का ऑफिस आना हुआ. कलेक्टर प्रदर्शनकारियों के सामने से जैसे ही निकले, उन्होंने ज्ञापन लेने को कहा तो कलेक्टर ने कार्यालय में आकर ज्ञापन देने को कहा. जिसके बाद एडीएम सिटी मौके पर पहुंचीं और ज्ञापन लिया.

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September 24th 2021, 11:47 pm

इंदौर में प्रशासन का एंटी-माफिया अभियान, सरकारी भूमि से हटाया माफिया का कब्जा

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इंदौर. सरकार के निर्देशों के पश्चात प्रदेश को माफिया मुक्त बनाने को लेकर इंदौर में कार्रवाई शुरू हो गई है. माफिया के खिलाफ इंदौर में अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई बताई जा रही है. एंटी माफिया अभियान के तहत भू माफिया की संपत्तियों पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई. और जमीनों को कब्जा मुक्त करा रही है. शुक्रवार सुबह इंदौर कलेक्टर मनीष सिंह, भारी पुलिस बल और नगर निगम अधिकारियों के साथ कनाडिया क्षेत्र में सुबह पांच बजे डेढ़ दर्जन जेसीबी मशीनों के साथ सरकारी जमीन पर माफियाओं के कब्जे को हटाया गया. कनाडिया रोड स्थित रिवाज गार्डन और प्रेम बंधन गार्डन पर कार्रवाई के दौरान नगर निगम और पुलिस दलबल के साथ नगर निगम और प्रशासनिक अधिकारी उपस्थित रहे.

अतिक्रमण ध्वस्त करने की करवाई पर ड्रोन कैमरों के माध्यम से नजर रखी जा रही है. दोनों गार्डन सरकारी सीलिंग की जमीन पर कब्जा कर चलाए जा रहे थे. मैरिज गार्डन के साथ दोनों दबंगों द्वारा बनाई करीब 70 दुकानों को भी प्रशासन ने जेसीबी की मदद से तोड़ा. नगर निगम ने गुरुवार रात को ही ध्वस्तीकरण की सभी तैयारियां पूरी कर लीं थी.

जानकारी अनुसार, यह सभी अवैध कब्जे युनूस पटेल और उनके परिवार के लोगों के बताए जा रहे हैं. नगर निगम ने प्रेमबंधन गार्डन के सामने बनी दुकानों के साथ गार्डन के बाहर स्थित दुकानों और ठेलों को भी हटा दिया. प्रदेश में इंदौर के अलावा अन्य बड़े शहरों में माफिया के खिलाफ इसी तरह का अभियान चलाए जाने की तैयारी की जा चुकी है.

अपर आयुक्त संदीप सोनी ने बताया कि कार्रवाई के दौरान 80 पुलिस के सिपाही, दो एएसपी, चार थाना प्रभारी, नगर निगम के अपर आयुक्त और 100 से अधिक कर्मचारियों के साथ अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे. पूरी कार्रवाई की ड्रोन से निगरानी रखी जा रही है. रिवाज गार्डन पूरी तरह से अवैध रूप से बनाया गया है. वहीं, प्रेमबंधन गार्डन 1998 में धांधली करके पंचायत से अनुमति लेकर बनाया गया था. इसको लेकर माफियाओं और तत्कालीन सरपंच के खिलाफ मामला दर्ज किया जाएगा.

प्रेमबंधन गार्डन में लगभग 5 हजार वर्गफीट अवैध निर्माण और रिवाज गार्डन लगभग 4 हजार वर्गफीट अवैध निर्माण किया गया है. वहीं, कई अवैध दुकानों का निर्माण भी सीलिंग की जमीन पर किया गया था.

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September 24th 2021, 11:47 pm

रक्षाबंधन पर स्वदेशी राखियों की भरमार, चीन का बहिष्कार

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10 करोड़ रुपये का कानपुर का कुल राखी कारोबार, 05 करोड़ रुपये की राखी कानपुर नगर में बिकती है, 05 करोड़ रुपये की बिक्री कानपुर के आसपास के जिलों में होती, 80 फीसद बाजार पर पहले चीन का था कब्जा, 100 फीसद बाजार इस वर्ष स्वदेशी राखियों का

नई दिल्ली. रक्षाबंधन उत्सव पर इस बार भी बहनों ने भाईयों की कलाई पर स्वदेशी राखी ही बांधी. तथा चीन की राखी का बहिष्कार किया.

स्वदेशी राखी की उपलब्ध को लेकर भोपाल में रक्षाबंधन के पूर्व ही गायत्री शक्तिपीठ की ओर से स्वदेशी राखी बनाने का प्रशिक्षण दिया गया. इस दौरान चंदन, रूद्राक्ष, ऊन, रेशम सहित विभिन्न सामग्रियों से राखी बनाना सिखाया गया. प्रशिक्षण कार्यक्रम में ऑनलाइन माध्यम से भी लोग जुड़े.

बालाघाट में बांस से बनी राखियां आकर्ष का केंद्र रहीं. स्वदेशी राखियों की मांग ने कारीगरों को भी रोजगार प्रदान किया. जिले में गोबर के बाद बांस की रंग-बिरंगी राखियां उपलब्ध रहीं. इससे, जिले में बांस के उद्योग को भी बल मिलने लगेगा. बालाघाट जिले के जनजाति बाहुल्य बैहर में बांस हस्तशिल्प कला केंद्र में राखियां बनाई गईं. हस्तशिल्पी राजू बंजारा ने बताया कि वन विभाग द्वारा बांस से राखियां बनाने का प्रशिक्षण दिया गया है.

करनाल में रक्षाबंधन पर्व पर 650 डिजाइन की स्वदेशी राखियों की बिक्री हुई. बहनों ने चीन निर्मित राखियों का बहिष्कार किया. राखी के थोक विक्रेता मोहित कथूरिया ने बताया कि मांग को देखते हुए 650 डिजाइन की स्वदेशी राखियां तैयार की गई थीं. अहमदाबाद, बैंगलुरु, हैदराबाद, कोलकाता और दिल्ली के सामानों से राखियां तैयार की गईं. हर एक डिजाइन के 250 राखियां बनाई गई थीं.

बहनों ने अहमदाबाद के असली रुद्राक्ष वाली, कुंदन, स्वास्तिक, मोती और ब्रेसलेट, मोतियों और धागे की कारीगरी वाली राखियां खरीदीं.

कानपुर. कोरोना के वार ने इस साल भी चीन को तगड़ा झटका दिया. मुंबई और कोलकाता में निर्मित स्वदेशी राखियों की हर जगह धूम रही. शहर में 10 करोड़ रुपये का राखी बाजार है. कोरोना से पहले तक रक्षाबंधन के लिए राखी के ऑर्डर होली के बाद ही चीन भेजे जाते थे, 80 से 90 फीसद राखी बाजार पर उसका कब्जा था, लेकिन इस साल वहां से माल नहीं आया.

इस साल मुंबई से स्टोन (धागे में आर्टीफिशियल नग पिरोकर बनाई गई) राखियां आईं. वहीं, कोलकाता से मारवाड़ी (छकलिया रेशम पर साफ्ट धागे से हस्त निर्मित) राखी बाजार में बिक्री को पहुंची. कोलकाता की राखियों में विशेष रूप से लुंबे पसंद आए, जो महिलाएं हाथों में बांधती हैं. पहले राखियां चिपकाई जाती थीं. अब बीड, मोती की राखी हैं, जो धागे में पिरोई जाती हैं.

बाजार में पैकिंग, धागे, अमेरिकन डायमंड (आर्टीफिशियल नग, जो ज्वैलरी में इस्तेमाल होता है) की राखियां रहीं.

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August 23rd 2021, 2:37 pm

सांस्कृतिक अस्मिता को राजनीति के केंद्र में स्थापित करने वाले जननेता ‘कल्याण सिंह’

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प्रणय कुमार

कल्याण सिंह का देहावसान राजनीति के एक युग का अवसान है. वे राजनीति के शिखर-पुरुष के रूप में सदैव याद रहेंगे. एक शिक्षक से जननेता तक की उनकी राजनीतिक यात्रा अविस्मरणीय है. वे जनसंघ के दिनों से भारतीय राजनीति की सनातन सांस्कृतिक धारा का प्रतिनिधित्व करते रहे. उन्होंने सत्ता के लिए कभी समझौता नहीं किया. न उनमें सत्ता का कोई मोह ही था. बल्कि उन्होंने ध्येयनिष्ठा के लिए सत्ता को सहर्ष ठोकर मार दी. उनके ये शब्द सदियों तक जनमानस के मन-मस्तिष्क में गूँजते रहेंगे कि ”सत्ता रहे या जाए, मैं मुख्यमंत्री रहूँ या न रहूँ, पर निर्दोष कारसेवकों पर गोली नहीं चलाऊंगा, नहीं चलाऊंगा, नहीं चलाऊंगा!”

छह दिसंबर, 1992 को उत्तरप्रदेश के तत्कालीन डीजीपी एस.एम. त्रिपाठी भागे-भागे आए और उनसे कहा कि ”कारसेवक विवादित ढाँचे को तोड़ रहे हैं, फायरिंग की परमिशन चाहिए.” मुख्यमंत्री ने पूछा कि ”गोली चलाने पर कितने लोग मारे जाएंगे? डीजीपी बोले- ”बहुत लोग मारे जाएंगे.” कल्याण सिंह ने कहा ”आँसू गैस चलाइए या लाठीचार्ज करिए, लेकिन फायरिंग की परमिशन नहीं दे सकता. आप चाहें तो मैं कागज़ पर लिखकर दे सकता हूँ कि मैंने अनुमति नहीं दी.” उस दिन जिस समय विवादित ढाँचा ढ़हाया जा रहा था, वे टीवी देख रहे थे, कुछ विचलित भी थे. लेकिन जैसे ही आख़िरी ईंट गिरी, उन्होंने अपना मुख्यमंत्री वाला राइटिंग पैड मंगाया और त्यागपत्र लिख दिया. उन्होंने बाहर आकर यह अति संक्षिप्त किंतु ऐतिहासिक वक्तव्य दिया – ”यह सरकार श्रीराम के मंदिर के ही नाम पर बनाई गई थी, श्रीराम के मंदिर के लिए मैं ऐसी कई कुर्सियाँ त्याग सकता हूँ.” और सचमुच उन्होंने उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देने में रंचमात्र संकोच नहीं दिखाया. राजनीति में सामूहिक ध्येय एवं महान संकल्प के लिए सत्ता का ऐसा परित्याग दुर्लभ है. ऐसे दृष्टांत स्वतंत्र भारत में खोजने पर भी अन्य नहीं मिलते. जनसाधारण के स्वाभाविक ज्वार की भी नैतिक जिम्मेदारी लेने का ऐसा दृष्टांत, ऐसा साहस – संघर्षों में तपे, ज़मीन से उठे उनके जैसे जननेता में ही देखने को मिल सकता है. त्याग, साहस, संघर्ष, संकल्प एवं संगठन-कौशल के पर्याय थे – कल्याण सिंह. ढाँचा-ध्वंस के पश्चात सीबीआई द्वारा दायर याचिका में इस बात का उल्लेख किया गया कि मुख्यमंत्री बनने के बाद कल्याण सिंह अयोध्या दौरे पर गए थे और वहाँ जाकर रामलला के दर्शन करते हुए मंदिर-निर्माण की शपथ ली थी. सदियों के संघर्ष व आस्था का पुनीत परिणाम तथा देश-दुनिया में फैले कोटि-कोटि भारतवासियों का चिर-प्रतीक्षित स्वप्न यदि आज श्रीराम के भव्य मंदिर के रूप में सजीव-साकार होने जा रहा है तो उसकी नींव में कल्याण सिंह जैसे नायकों का त्याग एवं संघर्ष भी है. श्रीराम केवल किसी समुदाय-विशेष के आस्था के केंद्र बिंदु नहीं, वे विश्व-मानवता के आदर्श व पथ-प्रदर्शक हैं. उनके दर्शनार्थ अयोध्या आने वाले श्रद्धालुओं को उनके जीवन-चरित से तो प्रेरणा मिलेगी ही मिलेगी. पर आस्था और श्रद्धा के इस सबसे बड़े केंद्र को बचाने के लिए किए जाने वाले सुदीर्घ संघर्ष, त्याग और बलिदान भी कम प्रेणादायी नहीं हैं. भला किस आस्थावान भारतीय के स्मृति-पटल से कारसेवा के दौरान मारे गए रामभक्त कोठारी बंधु की, पुलिस की लाठी से चोटिल एवं लहूलुहान अशोक सिंहल जैसे महानायक की छवि ओझल हो सकती है! महती उद्देश्यों एवं ऊँचे ध्येय को समर्पित जीवन भुलाए नहीं भूलते!

कल्याण सिंह स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े जनांदोलन श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के अगुआ और नायक मात्र ही नहीं थे. उन्होंने भारतीय राजनीति की दिशा तय की, राजनीति में सफलता के प्रचलित मानक एवं प्रतिमान बदले. उन्होंने दशकों से उपेक्षित एवं तिरस्कृत हिन्दू अस्मिता, हिन्दू चेतना को मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा माना और बनाया. हिन्दू होना और हिन्दू होने के गौरवबोध को मन में धारण करना – इस देश में पिछड़ेपन का द्योतक मान लिया गया था. स्वातंत्र्योत्तर भारत में क्षद्म धर्मनिरपेक्षता एवं कथित बौद्धिकता की ऐसी हवा चला दी गई, जिसमें हिन्दू होना और स्वयं को हिन्दू मानना राष्ट्रीय शर्म का विषय बना दिया गया. परंतु कल्याण सिंह समाज के पिछड़े एवं वंचित वर्ग से आए पहले ऐसे व्यापक जनाधार वाले राजनेता थे, जिन्होंने कभी ऐसे विरोधी वायुमंडल की चिंता नहीं की. उन्होंने कभी जातिवादी या पिछड़े-अगड़े की राजनीति नहीं की. राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए छोटी-छोटी अस्मिताओं में बंटी-कटी संकीर्ण-संकुचित उत्तर भारतीय राजनीति को उन्होंने बड़ी अस्मिता, बड़ी चेतना से जोड़ा. जातियों में बंटे समाज और राजनीति को वे श्रीराम जन्मभूमि जनांदोलन के माध्यम से महत एवं बृहत्तर ध्येय से जोड़ पाने में असाधारण रूप से सफल रहे. उन्होंने हिन्दू अस्मिता को ही भारत की सांस्कृतिक अस्मिता माना. हिन्दू संस्कृति का मतलब उनके लिए निश्चित विश्वास एवं विशेष उपासना-पद्धत्ति से कभी नहीं रहा. वे जानते और मानते थे कि मज़हब बदलने से पुरखे व संस्कृति नहीं बदलती. मज़हब चाहे भिन्न हो, उपासना पद्धत्ति चाहे भिन्न हो, पर भारत भूमि पर रहने वाले भारतवासियों की संस्कृति एक है. वह सर्वसमावेशी, सर्वस्पर्शी है. कोई उसे हिन्दू कहता है, कोई भारतीय, कोई सनातन. परंतु भारत की जिस सनातन एवं गौरवशाली परंपरा के कारण पूरी दुनिया उसे विश्वगुरु मानती आई है, वह हिन्दू संस्कृति और परंपरा ही है. इसे स्वयं मानना एक बात है, पर जनमानस के हृदय में उतार पाना दूसरी बात. वे इस भाव को समाज के शोषित-वंचित-पिछड़े वर्गों के हृदय में उतार पाने में क़ामयाब रहे.

नब्बे के दशक का कदाचित ही कोई ऐसा युवा हो, जो कल्याण सिंह की शैली, निर्भीकता एवं स्पष्टवादिता से प्रभावित न रहा हो. जिसकी चेतना कल्याण सिंह के तुकबंदीयुक्त राजनीतिक भाषणों-उद्बोधनों से प्रेरित-उद्वेलित न हुई हो. वे बिना लाग-लपेट के स्पष्ट एवं खरा बोलते थे. यही उनकी ताक़त थी. उनकी छवि एक सख़्त, स्वच्छ, सुयोग्य एवं ईमानदार मुख्यमंत्री की थी. उन्होंने शासन-प्रशासन एवं उत्तरप्रदेश की व्यवस्था को लालफीताशाही के चंगुल से मुक्त किया. वे कठोर निर्णयों के लिए जाने जाते थे. चाहे नकल अध्यादेश हो, एक-एक करके चार विधायकों को जेल भेजने का साहसिक निर्णय हो या अपराधियों पर नकेल कसना हो – उन्होंने लोकप्रियता, वोट-बैंक, जातिवादी जोड़-तोड़ के गणित की परबाह किए बिना निर्णय लिए. वे दो बार उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री और हिमाचल प्रदेश एवं राजस्थान के राज्यपाल रहे. वे भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से एक थे. उन्होंने साइकिल और पोस्टकार्ड युग में दल को खड़ा किया था. उनके सुंदर, सुडौल, सुगढ़ अक्षरों में लिखे पोस्टकार्ड उस दौर के कार्यकर्त्ताओं ने आज भी सहेजकर रखे हैं. उन्हें ढाँचा गिरने के कारण एक दिन के जेल की सजा भी भोगनी पड़ी थी. यह उनके लिए कोई नई बात नहीं थी. आपातकाल के दौरान वे 21 माह तक जेल की काल-कोठरी में कैद रहे थे. वे ज़मीन से उठे और संघर्षों में तपे और पले-बढ़े थे. उनकी इच्छाशक्ति अदम्य थी. उनका अंतिम स्वप्न अपने जीवन काल में श्रीराम-मंदिर का भव्य निर्माण देखना था. वे उन सौभाग्यशालियों में से एक थे, जिसके जीवन-काल में श्रीराम के भव्य मंदिर का शिलान्यास हो चुका था. उपचार के दौरान चिकित्सालय में मिलने आने वाले परिचितों-राजनीतिज्ञों का अभिवादन वे जय श्रीराम बोलकर करते थे.

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August 23rd 2021, 2:37 pm

हजारों साल पुरानी हमारी संस्कृति पर साजिश के तहत प्रहार किए जा रहे – अनुपम खेर

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नई दिल्ली. सुप्रसिद्ध अभिनेता और विभिन्न सामाजिक विषयों पर बेबाक राय रखने वाले अनुपम खेर ने कहा कि हाल के वर्षों में हिन्दू टेरर की चर्चाएं वैश्विक स्तर पर जानबूझकर फैलायी जा रही हैं. झूठी जानकारियों पर आधारित ऐसे प्रयास हमारी हजारों साल पुरानी संस्कृति पर चोट करने की सोची-समझी साजिश है. यह इसलिए है क्योंकि भारत की लगातार मजबूत होती छवि और तरक्की ऐसे तत्वों को बर्दाश्त नहीं है.

रविवार को लीड इंडिया, प्रिंसटन युनिवर्सिटी और एसोसिएशन ऑफ साउथ एशियंस एट प्रिंसटन द्वारा आयोजित ‘खेर ऑन कैम्पस’ वर्चुअल संवाद में अनुपम खेर ने अपनी समृद्ध अभिनय यात्रा के साथ-साथ हिन्दुत्व, भारत की चुनौतियां सहित विभिन्न अहम मुद्दों से जुड़े सवालों के जवाब दिये. यह कार्यक्रम भारतीय स्वतंत्रता के 75वें साल के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया, जिसमें छात्रों और युवाओं ने हिस्सा लिया. खेर ने भारत के बाहर हर भारतीय को एक राजदूत बताते हुए कहा कि हर एक को भारत की विशिष्टता अनेकता में एकता, विभिन्न संस्कृतियों के मेल और दुनिया के सामने देश की बेहतर छवि प्रस्तुत करना चाहिये. भारत बड़े हृदय वाले लोगों का देश है.

हिन्दूफोबिया और हिन्दू टेरर की हालिया चर्चाओं से संबंधित सवालों पर अनुपम खेर ने कहा कि यह भारत को बदनाम करने की साजिश के तहत उठाया गया. उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि ऐसे तत्वों के पीछे हमारे देश के ही लोग हैं, जो भारत के हैं. लेकिन भारत की विकास यात्रा इन्हें नहीं भाती. ऐसी चर्चाओं पर प्रतिक्रिया देने की बजाय इन्हें नजरअंदाज किये जाने की जरूरत है. क्योंकि भाड़े पर बिठाए गए यह लोग चाहते हैं कि आप प्रतिक्रिया दें. यह हमारी संस्कृति की साख पर चोट करने की कोशिश है. पढ़े-लिखे लोग भी झूठ बोल रहे हैं. हमारी इतनी पुरानी संस्कृति पर हजार हमले हुए, लेकिन हम आज भी हैं और बेहतर स्थिति में हैं. आज पड़ोसी देशों को देखें और हम कहां हैं.

उन्होंने मुंबई आतंकी हमले का जिक्र करते हुए कहा कि शुरू में इसे हिन्दू टेरर बताया जा रहा था. लेकिन समय सबको जवाब देता है. सच अपना रास्ता बना ही लेता है. ये वही लोग हैं जो भारत के विश्वविद्यालयों में आजादी के नारे लगाते हैं, अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने का जश्न मनाते हैं. लेकिन अपने देश और सेना की तारीफ कभी नहीं करते. मानव अधिकारों से इनका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है. घाटी से जब कश्मीरी पंडितों का इतना बड़ा पलायन हुआ, हत्या और बलात्कार की घटनाएं हुई तो किसने आवाज उठायी. किसने बंदूकें लहरायी. मेरे दादा कहते थे कि भीगा हुआ आदमी बारिश से नहीं डरता. सच एक न एक दिन आता जरूर है. सच एक ऐसा दीया है, जिसे पहाड़ की चोटी पर रख दो तो बेशक उजाला कम हो, लेकिन दिखायी वह दूर से देता है. एक शेर है – उम्र भर अपनी ही गिरेबां से उलझने वाले, तू मेरे साए से ही डराता क्या है.

अनुपम खेर का मानना है कि जिंदगी एक सफर है, मंजिल नहीं. इस यात्रा का मजा ही इसके उतार-चढ़ाव भरे रास्ते से होकर गुजरना है. उन्होंने संघर्ष भरे अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए ओशो की जुबानी इसे यूं बयां किया – जीवन की यात्रा में अगर आप जोखिम लेने से डरते हो तो विश्वास करो, आपकी यात्रा सुरक्षित नहीं है.

उन्होंने अभिनय को लेकर पूछे गए सवाल को लेकर कहा कि गणित, विज्ञान जैसे दूसरे विषयों की तरह अभिनय नहीं है. यह बहुआयामी विषय है और यह खुद को लगातार बेहतर बनाने का अभ्यास है. टीचर कभी नहीं कहते थे कि यह सर्वोत्तम है, वे अच्छा जरूर कहते थे. बेहतर करने की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है.

बॉलीवुड कहे जाने से आपत्ति जताने वाले अनुपम खेर कहते हैं कि यह भारतीय सिनेमा है. हम अपने जीवन को भी उत्सव के रूप में लेते हैं और भारतीय सिनेमा का भी वही चरित्र है. भारतीय सिनेमा विश्व भर में खुशियां बांटने का विशेष माध्यम के रूप में उभरा.

वे कहते हैं, ‘बहुत छोटी जगह से आया हूं. पिता वन विभाग में थे और बहुत कम तनख्वाह थी. 14 लोगों का संयुक्त परिवार और छोटे से घर में हम सभी बड़े हंसी-खुशी रहते थे. इतनी तंगहाली में भी सब खुश थे तो एक दिन मैंने दादा जी से पूछा. उन्होंने कहा कि जब तुम गरीब होते हो तो छोटी-छोटी चीजें भी खुशियां देती हैं. जब मुंबई आया 1980 में तो 27 दिनों तक रेलवे स्टेशन पर रात गुजारनी पड़ी. लेकिन खुश था क्योंकि जिंदगी को लेकर एक उम्मीद थी. उम्मीद बेशकीमती चीज है, इसलिए खुशी एक मानसिक स्थिति है.’

रॉबर्ट फ्रॉस्ट की मशहूर कविता द रोड नॉट टेकन के उल्लेख पर अनुपम खेर ने कहा कि उनके पिता ने उनका नाम अनुपम रखा, जिसका अर्थ है अद्वितीय. मुझे बचपन से अंदाज़ा था कि मैं दूसरों से अलग हूं. मैं पढ़ाई में अच्छा नहीं था. खेल में ऐसा था कि टीचर का मशविरा था कि तुम अगर अकेले भी दौड़ो तो दूसरे नंबर पर आओगे. मेरा जब रिजल्ट आया था तो क्लास में 59वां स्थान था. रिपोर्ट कार्ड पर पिता से हस्ताक्षर लेने गया तो डरा हुआ था. पिता ने पूछा कि कितने बच्चे तुम्हारी क्लास में हैं, तो मैंने 60 बताया. पिता ने फिर भी कुछ नहीं कहा और कहा कि नंबर वन आने वालों पर दबाव होता है, अपनी पोजीशन बनाए रखने का लेकिन तुम पर ऐसा कोई दबाव नहीं. इसलिए आगे से कम-से-कम 40वें स्थान पर आने की कोशिश करो.

उन्होंने कहा कि वे जिंदगी में कभी बने-बनाए रास्ते पर नहीं चले और जोखिम लेने या असफलता से विचलित नहीं हुए. इसी ने सारा फर्क पैदा किया. जब वे मुंबई आए तो पहली फिल्म सारांश में 28 साल की उम्र में 60 साल के बुजुर्ग का किरदार निभाने की चुनौती ली. मेरी शक्ल-ओ-सूरत उस जमाने के खूबसूरत अभिनेताओं जैसी नहीं थी. तो लोगों ने मजाक उड़ाते हुए खारिज कर दिया. लेकिन जब फिल्म हिट हो गयी तो लोगों ने कहा कि ये तो बुजुर्गों के किरदार ही करेगा. फिर मैंने कर्मा की वह भी हिट हुई…फिर लगातार अलग-अलग किरदार मिलते गए. तो शुरू में लोग आपको हतोत्साहित करते हैं, लेकिन जब आप असफलता से नहीं डरते हो तो फिर ये सब बेमानी साबित होती है.

उन्होंने भारत के भविष्य को बेहतर बताते हुए कहा कि ओलंपिक में हमारे युवाओं ने शानदार प्रदर्शन कर भारत की सुनहरी तस्वीर दुनिया के सामने रखी है. दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में भारतीय युवा अपने शानदार कौशल से सर्वश्रेष्ठ पदों पर हैं, यह बिना ताकत दिखाए भारत के सुपरपावर बनने की पटकथा है. सपनों को कभी छोड़ें नहीं और उन सपनों को पूरा करने के लिए कठिन परिश्रम व ईमानदारी का कोई विकल्प नहीं है. यह कभी न भूलें कि राष्ट्रीयता ही सर्वोच्च पहचान है और अपने माता-पिता की सेवा और सम्मान जरूर करें. वर्चुअल संवाद का संचालन प्रिंसटन युनिवर्सिटी के पीएचडी कैंडिडेट तनुजय साहा ने किया.

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August 23rd 2021, 2:37 pm

तालिबान की तरह चीन ताइवान पर कब्जा करना चाहता है

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नई दिल्ली. ड्रैगन की नीयम और नीति हमेशा से ही विस्तारवाद की रही है. कम्युनिस्ट चीन पहले किसी न किसी माध्यम से पड़ोसी देशों को अपने चंगुल में फंसाना, फिर धमकाना और उन पर अपना सिक्का जमाने की नीति पर चलता रहा है. तिब्बत और हांगकांग को तो लगभग निगल ही चुका है, अब उसके पंजे ताइवान को जकड़ने को बेचैन हैं.

चीन कभी ताइवान के हवाई क्षेत्र में अपने लड़ाकू विमान भेजकर उसे डराता है तो कभी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पूरी बेशर्मी से उसके मुद्दों को अपने देश का अंदरूनी मामला बताता है. कोई अन्य देश ताइवान को एक देश के तौर पर संबोधित करता है तो ड्रेगन उसे ‘अपने आंतरिक मामलों में दखल’ देने से बाज आने की चेतावनी देता है. पिछले दिनों जापान को ताइवान को अलग देश कहने पर दो बार टोका.

लेकिन, ताइवान की स्वाभिमानी राष्ट्रपति त्साई इंग वेन पूरी दमदारी के साथ अपने देश की सीमा बढ़ाने को आतुर रहने वाले चीन को उसकी सही स्थिति से अवगत करा चुकी हैं और वायुसेना के माध्यम से ताइवान के आसमान में मंडराने की उसकी धमकियों का कड़ा जवाब दे चुकी हैं.

21 अगस्त को ताइवान ने एक और दमदार बयान दिया. रायटर के समाचार के अनुसार, ताइवान के विदेश मंत्री जोसेफ वू ने कहा कि चीन तालिबान की तर्ज पर उनके देश को कब्जाना चाहता है. चीन एक लंबे वक्त से ताइवान पर दावा जताता आ रहा है और इस पर कब्जे का मन बनाए हुए है. आज अफगानिस्तान में उभरे हालात के बीच ताइवान में चीन के कुछ इसी तरह की हरकत करने की मंशा को लेकर बहस छिड़ी हुई है.

उधर, चीन का मीडिया भी ऐसी बातें फैला रहा है कि काबुल का जो हाल हुआ है, उससे यह साफ है कि अमेरिका पर भरोसा करके ताइवान को कुछ हासिल नहीं होगा.

अमेरिकी विदेश विभाग ने पिछले दिनों चीन से कड़े शब्दों में कहा था कि वह ताइवान पर बेवजह दबाव बनाना बंद कर दे. अमेरिका के बयान के बाद ताइवान के विदेश मंत्री वू ने अमेरिका का धन्यवाद किया था. अब वू ने कहा कि चीन तालिबान की तरह ही ताइवान पर कब्जा करना चाहता है. हालांकि चीन की अभी इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

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August 23rd 2021, 2:37 pm

बाढ़ व फ्लैश फ्लड की मिल सकेगी पूर्व सूचना, नदी में जलस्तर बढ़ा तो मोबाइल पर मैसेज

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देहरादून. बाढ़ और अचानक आए फ्लड के कारण जान-माल का काफी नुकसान होता है. उत्तराखंड की दिल दहला देने वाली केदारनाथ त्रासदी अभी भी याद है. फ्लैश फ्लड की समय पर सूचना मिलने से जान-माल का नुकसान रोका जा सकता है. समस्या को ध्यान में रखते हुए आईआईटी कानपुर के पूर्व छात्र और उसके साथियों ने एक फ्लड अलर्ट सिस्टम बनाया है. इस सिस्टम को लेकर प्रयोग भी हो रहा है और सिस्टम प्रभावी भूमिका निभा रहा है. उत्तराखंड में केंद्रीय जल आयोग उपकरण के साथ सतत निगरानी कर रहा है. बाढ़ से पहले ही जलस्तर का आकलन कर सिस्टम अलर्ट कर रहा है.

दो वर्ष के शोध के बाद आईआईटी से वाटर रिसोर्सेज ब्रांच में एमटेक करने वाले छात्र श्रीहर्षा सहित 15 लोगों की टीम ने सिस्टम तैयार किया है. श्रीहर्षा की कंपनी कृत्सनम टेक्नोलॉजी स्टार्टअप ने 2017 में इसे विकसित किया. इसमें बाढ़ से पहले व तत्काल स्थिति का डाटा रिकार्ड किया जा सकता है.

फ्लड मानिटरिंग टेक्नोलॉजी पर आधारित अलर्ट सिस्टम में रडार वाटर लेवल सेंसर का उपयोग किया गया है. यह उपकरण किसी भी नदी व तालाब के ऊपर लगाया जाता है. यह जलस्तर नापकर हर 10 मिनट में डाटा रिपोर्ट भेजता है. और 40 मीटर तक जलस्तर की घटत व बढ़त बता सकता है. सेल्युलर नेटवर्क व सेटेलाइट के माध्यम से ऑनलाइन डाटा भेजने में सक्षम है और नदी की स्थिति का ब्योरा एकत्र करके उसे सर्वर पर भेजता है.

यह उपकरण भेजे गए डाटा का विश्लेषण भी करता है. सर्वर से कई मोबाइल जोड़े जा सकते हैं, जिन पर अलर्ट आता है. श्रीहर्षा के अलावा कृत्सनम टेक्नोलॉजी के संस्थापक सदस्य आईआईटी के पूर्व छात्र पृथ्वी सागर, विनय चटराजू व नीरज राय का उपकरण को बनाने में विशेष योगदान है. इसके अलावा आईआईटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. शिवम त्रिपाठी मेंटर हैं. उन्होंने इसकी क्षमता को अयोध्या में सरयू नदी पर परखा था.

उत्तराखंड में आठ सेंसर दे रहे जानकारी 

श्रीहर्षा ने बताया कि बाढ़ की जानकारी देने को उत्तराखंड में उत्तरकाशी, चमियाला, चिनका, नंद प्रयाग, विष्णु प्रयाग, रुद्र प्रयाग, देव प्रयाग व कर्ण प्रयाग में ऐसे आठ सेंसर लगे हैं. इन सेंसर को सर्वर से जोड़ा गया है. इस सिस्टम की लागत डेढ़ लाख रुपये आई है. यह सर्वर के माध्यम से ई-मेल, वाट्सएप व एसएमएस के जरिए बाढ़ की सूचना देता है. सामान्य से जलस्तर बढ़कर बाढ़ की स्थिति में पहुंचने पर यह महज दो मिनट में अलर्ट देने लगता है. इससे एक या ज्यादा मेल आईडी व मोबाइल नंबर जोड़े जा सकते हैं.

चमोली में इस सिस्टम ने बड़ा काम किया. समय-समय पर यह उपकरण केंद्रीय जल आयोग को जलस्तर का अपडेट देता रहा. इसका डाटा केंद्रीय जल आयोग के सेंटर ने ट्विटर पर अपलोड करने के साथ संबंधित अधिकारियों को भेजा था.

इनपुट साभार – दैनिक जागरण

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August 23rd 2021, 2:37 pm

अब सीधे मासंपेशियों में पहुंचाई जा सकेगी दवा, डिवाइस को 20 साल के लिए पेटेंट मिला

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प्रयागराज. इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय ने थ्री-डीके प्रिंटेड मास्क का डिजाइन तैयार किया था, जिसकी काफी चर्चा हुई थी. अब केंद्रीय विवि के बायोकेमिस्ट्री विभाग का नया शोध ख्याति प्राप्त कर रहा है. विभाग ने एक ऐसे डिवाइस का डिजाइन तैयार किया है, जिससे सीधे मांसपेशियों में दवा पहुंचाई जा सकेगी. बायोकेमेस्ट्री विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मुनीश पांडेय के निर्देशन में यह नया शोध हुआ है. डिवाइस की डिजाइन को लेकर चिकित्सक भी उत्साहित हैं. भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के कोलकाता स्थित कंट्रोलर जनरल ऑफ पेटेंट्स डिजाइन एंड ट्रेडमार्क ने 20 साल के लिए इस डिजाइन के पेटेंट को मान्यता भी दे दी है.

कहते हैं ना आवश्यकता अविष्कार की जननी होती है. आपदा काल में अक्सर ऐसा होता है. डॉ. मुनीश के मन में भी कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में यह विचार जन्मा. दिसंबर में उनकी पत्नी वंदना पांडेय के पैर की हड्डी टूट गई. दिसंबर से अप्रैल तक उन्हें बीच-बीच में हर 15 दिन में अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा. डॉ. ड्रिप के जरिए शरीर में दवा पहुंचाते थे. कई बार ड्रिप खुद झटके से निकल जाती थी, तब शरीर के दूसरे हिस्सों में ड्रिप लगाई जाती. इससे सूजन के साथ रक्तस्राव होता और पीला द्रव्य शरीर से निकलने लगता.

रिपोर्ट्स के अनुसार, मुनीश ने बताया कि पत्नी की तकलीफ देख उन्होंने ऐसा डिवाइस बनाने के बारे में सोचा जिससे दवा मांसपेशियों में आसानी से पहुंचाई जा सके. अलग-अलग क्षेत्र के दिग्गजों की टीम बनी और उनके परामर्श से डिवाइस की डिजाइन तैयार की गई. पेटेंट के लिए आवेदन किया, जिसे मंजूरी भी मिल गई. वैसे, फिलहाल इस डिजाइन के अनुरूप डिवाइस बनाने की दिशा में किसी कंपनी ने पहल नहीं की है. दरअसल, पहले यह पेटेंट गजट में प्रकाशित होगा. इसके बाद यदि कोई कंपनी संपर्क करती है तो उसे डिजाइन सौंपा जाएगा.

डिवाइस की विशेषता

इस डिवाइस को हाथों में चिपकाया जा सकेगा. इसमें सीरिंज भी लगी होगी. साथ ही, एक बटन होगा. इस बटन को दबाकर आवश्यकतानुसार आइवी फ्लूड, रक्त अथवा अन्य दवाएं मरीज के शरीर में पहुंचाई जा सकेंगी.

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के सर्जन डॉ. संतोष सिंह कहते हैं कि कई बार ड्रिप लगाने के बाद वह खुद बंद हो जाती है. ऐसा भी होता है कि यदि मरीज के शरीर में खून चढ़ाया जाता है तो खत्म होने पर शरीर से खून पैकेट में वापस जाने लगता है. डिवाइस में ऐसी व्यवस्था भी है कि वह अपने आप लॉक हो जाती है. इस लिहाज से चिकित्सा जगत के लिए यह खोज काफी फायदेमंद साबित होगी.

डॉ. मुनीश के अलावा नारायण ट्रांसलेशन रिसर्च सेंटर और नारायण मेडिकल कॉलेज नेल्लोर के डॉ. सिवाकुमार विजयाराघवलु, रामया यूनिवर्सिटी बेंगलुरू में एप्लाइड साइंस विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सेलवम अर्जुनन, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. एस विजयानंद और डॉ. चल्लाराज इमैनुअल, इंडियन एकेडमिक डिग्री कॉलेज बेंगलुरू में माइक्रोबायोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. पी. राजाराजन, आशुतोष हॉस्पिटल एंड ट्रामा सेंटर के निदेशक व प्रयागराज के वरिष्ठ सर्जन डॉ. यूबी यादव, पुडुचेरी के डॉ. पी कार्थिगेयन और शोध छात्र डिवाइस बनाने वाली टीम में शामिल हैं.

इन मरीजों को मिलेगी राहत

डॉ. मुनीश के अनुसार लंबी बीमारी से जूझ रहे मरीजों की मांसपेशियों में सीधे दवाएं पहुंचाई जा सकती हैं. यह दवाएं सीधे प्रभावित जगह पर आर्गन तक पहुंचाई जा सकती हैं. ऐसे मरीजों की संख्या आम मरीजों की अपेक्षा अधिक होती है. भविष्य में इनकी संख्या बढ़ने की भी संभावना है. इस डिवाइस से नैनो मेडिसिन दवाएं यानि ऐसी दवाएं जो सूक्ष्म मात्रा में होती हैं, उन्हें भी मांसपेशियों में आसानी से पहुंचाया जा सकता है. इससे साइड इफेक्ट भी कम रहेगा.

‘यह डिवाइस मरीजों के लिए निश्चित तौर पर क्रांतिकारी साबित होगा. विशेषकर बच्चों के लिए फायदेमंद है. दरअसल, कई बार बच्चों में दवाओं की अधिक डोज पहुंच जाती है और यह फेफड़े के लिए काफी नुकसानदायक साबित होता है. इस डिवाइस से चिकित्सकों को भी बार-बार मरीजों के पास नहीं जाना होगा.

डॉ. संतोष सिंह, सर्जन स्वरूपरानी नेहरू मेडिकल कॉलेज प्रयागराज

‘भविष्य में इस डिवाइस से दवा शरीर में आसानी से पहुंचाई जा सकती है. विशेष यह कि बच्चों और बूढ़ों के लिए डिवाइस काफी कारगर साबित होगी. खासतौर से अस्थि रोग पीड़ितों के मामले में यह लाभप्रद होगी. हमें उम्मीद है कि जल्द ही यह बाजार में सुलभ हो जाएगी और हम इसका उपयोग करने लगेंगे.

डॉ. यूबी यादव, निदेशक, आशुतोष हॉस्पिटल एंड ट्रॉमा सेंटर प्रयागराज

 

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August 23rd 2021, 2:37 pm

भारतीय सेना ने महिला सैन्य अधिकारियों को पदोन्नत कर कर्नल रैंक प्रदान किया

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नई दिल्ली. भारतीय सेना चयन बोर्ड ने सेना में 26 साल की मानद सेवा पूरी करने के बाद पांच महिला अधिकारियों को कर्नल (टाइम स्केल) के पद पर पदोन्नत करने का निर्णय लिया है. पहली बार है कि कॉर्प्स ऑफ सिग्नल्स, कॉर्प्स ऑफ इलेक्ट्रॉनिक एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स (ईएमई) और कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स में सेवारत महिला अधिकारियों को कर्नल के पद पर पदोन्नत करने को स्वीकृति दी गई है. इससे पहले, कर्नल के पद पर पदोन्नति केवल सैन्य चिकित्सा सेवा इकाई (एएमसी), जज एडवोकेट जनरल (जेएजी) और सैन्य शिक्षा कोर (एईसी) में कार्यरत महिला अधिकारियों के लिए ही लागू होती थी.

भारतीय सेना की अधिक से अधिक शाखाओं में पदोन्नति का अवसर देना महिला अधिकारियों के लिए इस क्षेत्र में करियर के बढ़ते अवसरों का संकेत है. भारतीय सेना की अधिकांश शाखाओं से महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने के निर्णय के साथ ही यह फैसला सैन्य सेवाओं में लैंगिक समानता के प्रति भारतीय सेना के सकारात्मक दृष्टिकोण को परिभाषित करता है.

जिन पांच महिला सैन्य अधिकारियों का कर्नल टाइम स्केल रैंक के लिए चयन किया गया है, वे हैं कॉर्प्स ऑफ सिग्नल्स से लेफ्टिनेंट कर्नल संगीता सरदाना, कॉर्प्स ऑफ ईएमई से लेफ्टिनेंट कर्नल सोनिया आनंद और लेफ्टिनेंट कर्नल नवनीत दुग्गल तथा कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स से लेफ्टिनेंट कर्नल रीनू खन्ना और लेफ्टिनेंट कर्नल ऋचा सागर.

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August 23rd 2021, 2:37 pm

अफगानिस्तान में महिलाओं को अधिकार देने की सच्चाई – महिला एंकरों पर प्रतिबंध, महिलाओं की तस्वीरों पर

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नई दिल्ली. अफगानिस्तान में महिलाओं को अधिकार और हर क्षेत्र में अवसर देने के तालिबान के दावों की सच्चाई सामने आने लगी है. तालिबान ने महिला एंकरों पर प्रतिबंध लगा दिया है. टीवी पर विदेशी शो का टेलीकास्ट रोक दिया गया है. सरकारी चैनलों से इस्लामी संदेश दिए जा रहे हैं. बाजारों में लगी महिलाओं की तस्वीरों पर कालिख पोत दी जा रही है.

रिपोर्ट्स के अनुसार तालिबान ने अफगानिस्तान के टॉप मीडिया अधिकारी की हत्या पूरे मुल्क पर कब्जे से पहले ही कर दी थी. करीब दो हफ्ते पहले तालिबानियों ने अफगानिस्तान के मीडिया एंड इन्फॉर्मेशन सेंटर के चीफ दावा खान मेनापाल का कत्ल कर दिया था. दावा खान को शुक्रवार को मारा गया था. दावा खान अफगान सरकार के कट्टर समर्थक थे और हमेशा ही तालिबान विरोधी रहे.

अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद तालिबान ने अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि महिला अधिकारों की हिफाजत की जाएगी. लेकिन एक हफ्ता पहले ही अफगानिस्तान के सरकारी चैनल ज्वाइन करने वाली महिला एंकर खदीजा अमीन को निकाल दिया है. चैनल के अधिकारियों ने खदीजा से कहा कि सरकारी चैनल में महिलाएं काम नहीं कर सकती हैं.

खदीजा ने कहा, ‘अब मैं क्या करूंगी. भविष्य की पीढ़ी के पास कुछ नहीं होगा. 20 साल में हमने जो कुछ भी हासिल किया है, वो सब कुछ चला जाएगा. तालिबान, तालिबान ही रहेगा. वो बिल्कुल नहीं बदला है.’

काबुल स्थित रेडियो टेलीविजन अफगानिस्तान में काम करने वाली एंकर शबनम दावरान को भी काम करने से मना कर दिया गया है. शबनम ने कहा – बुधवार को मैं हिजाब पहनकर और आईडी लेकर दफ्तर पहुंची. वहां मौजूद तालिबानियों ने मुझसे कहा कि सरकार बदल चुकी है. आपको यहां आने की इजाजत नहीं है. घर जाइए.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार महिलाओं को अधिकार और शिक्षा देने जैसी बातें केवल दिखावा है. वस्तुस्थिति ये है कि बाजारों में भी जहां महिलाओं की तस्वीरें दिखाई पड़ रही हैं, तालिबानी उन पर कालिख पोत रहे हैं.

तालिबान भले ही वीमन फ्रैंडली होने की बात कह रहा हो, लेकिन सच्चाई ये है कि वो हर जगह महिलाओं की मौजूदगी पर पहरा बैठा रहा है. अफगानिस्तान में पली-बढ़ी होमीरा रेजाई ने बीबीसी को बताया कि मुझे काबुल से खबरें मिल रही हैं. वहां तालिबानी घर-घर जाकर महिला एक्टिविस्टों की तलाश कर रहे हैं. महिला ब्लॉगर्स, यूट्यूबर्स की भी खोज की जा रही है ताकि उन पर बंदिश लगाई जा सके. होमीरा ने बताया कि तालिबानी हर उस महिला को तलाश कर रहे हैं, जो अफगानिस्तानी समाज के विकास से जुड़ा कोई काम कर रही हो.

1996 से 2001 का दौर लौटा

1996 से 2001 तक जब अफगानिस्तान में तालिबानी शासन था, तब भी औरतों और बच्चियों के स्कूल या काम पर जाने की मनाही थी. उन्हें अपना चेहरा ढंकना पड़ता था और बाहर निकलते वक्त घर के किसी मर्द का साथ होना जरूरी था. महिलाओं को रेडियो, टेलीविजन या किसी सभा या सम्मेलन में जाने की इजाजत नहीं थी. घर से बाहर उन्हें ऊंची आवाज में बोलने की भी इजाजत नहीं थी, क्योंकि दूसरा व्यक्ति उनकी आवाज नहीं सुन सकता था.

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August 22nd 2021, 4:05 pm

वैश्विक पटल पर वैचारिक विमर्श के लिये भारतीय चिंतन पर लेखन आवश्यक – दत्तात्रेय होसबाले

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लखनऊ. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने शनिवार को लोकहित प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘‘वैदिक सनातन अर्थशास्त्र’’ का लोर्कापण किया. उन्होंने कहा कि वैश्विक पटल पर भारतीय चिंतन और मनीषा को वैचारिक विमर्श का विषय बनाने के लिये लेखन कार्य अनवरत बढ़ते रहना चाहिये.

सरकार्यवाह जी ने कहा कि वर्तमान कालखंड में सम्पूर्ण विश्व के अंदर विभिन्न विषयों पर आवश्यक वैचारिक विमर्श चल रहा है. यह अच्छी बात है, इसे चलते रहना भी चाहिये. ऐसे समय में भारत के आधारभूत चिंतन पर भी विविध विषयों में लेखन कार्य होते रहना चाहिये, ताकि भारतीय चिंतन भी दुनिया के विश्वविद्यालयों व थिंक टैंक के बीच चर्चा के विषय बन सकें.

उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन व मनीषा पर लिखते समय बदली वैश्विक परिस्थितियों के समन्वय पर भी ध्यान देना चाहिये. इसके लिये उन्होंने 12वीं से 14वीं शताब्दी के स्मृतिकारों की भी चर्चा की और कहा कि उस समय भारत की लगभग हर भाषा में भक्ति के नाम पर साहित्य की रचना हुई, जो स्मृति की तरह माने गए. उन्होंने कहा कि उक्त रचनाओं में भारत के प्राचीन चिंतन को तत्कालीन परिस्थितियों के साथ सरल भाषा में दर्शाया गया है.

उन्होंने चिंता व्यक्त की कि मुगल काल के बाद भारत में स्मृतियों के लिखने की व्यवस्था ध्वस्त सी हो गई. इस परंपरा को पुनः गतिशील करने पर उन्होंने बल दिया.

पुस्तक के लेखक और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ वाराणसी में पत्रकारिता संस्थान के निदेशक प्रो. ओम प्रकाश सिंह ने पुस्तक के बारे में विस्तार से चर्चा की. उन्होंने बताया कि ‘‘वैदिक सनातन अर्थशास्त्र’’ पुस्तक को पांच अध्यायों में लिखा गया है. इसमें वैदिक कालीन वित्तीय व्यवस्था, मूल्य नियंत्रण सिद्धान्त, विनिमय के सिद्धान्त और आजीविका के संदर्भ में ग्रामीण चिंतन आदि विषयों पर प्रकाश डाला गया है.

प्रो. एपी तिवारी ने ‘‘वैदिक सनातन अर्थशास्त्र’’ पुस्तक की समीक्षा प्रस्तुत की और इसे देश के विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने की वकालत की. लोकहित प्रकाशन के निदेशक सर्वेश चंद्र द्विवेदी ने आभार व्यक्त किया. आभार प्रदर्शन संस्थान के निदेशक श्रीमान सर्वेश कुमार द्विवेदी जी ने किया.

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August 22nd 2021, 4:05 pm

“आपदा में भारत मां के सपूतों ने प्रस्तुत की अद्भुत मिसाल”

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सेवा भागीरथी नामक पुस्तक का सरकार्यवाह दत्तात्रेय जी ने विमोचन किया

सागर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि कोरोना काल में सेवा भारती महाकौशल प्रांत के कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए सेवा कार्यों का समावेश सेवा भागीरथी में किया गया है. इसका उद्देश्य किसी की वाहवाही करना नहीं, बल्कि उनके सेवा भाव को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है.

सरकार्यवाह शुक्रवार को केंद्रीय विश्वविद्यालय डॉ. हरिसिंह गौर के स्वर्ण जयंती सभागार में आयोजित ‘सेवा भागीरथी’ पुस्तक विमोचन समारोह में संबोधित कर रहे थे. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भैंसा गुरुद्वारा मुख्य ग्रंथी ज्ञानी रणजीत सिंह और विशेष अतिथि संजीवनी बाल आश्रम की संचालिका प्रतिभा अर्जरिया थी. कार्यक्रम का शुभारंभ भारत माता के चित्र के समक्ष अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित किया.

सरकार्यवाह ने कहा कि ‘सेवा भागीरथी’ पुस्तक में कोरोना वायरस विभीषिका के दौरान सेवा भारती और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं द्वारा किए सेवा कार्यों का संकलन है. इसमें संकट काल में की गई सेवा के विभिन्न आयामों का विवरण है. पुस्तक का प्रकाशन किसी की प्रशंसा या वाहवाही के लिए नहीं, वरन अगली पीढ़ी को सेवा के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करना है. विपदा के इस दौर में समाज के सभी वर्गों ने सेवा का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया.

इस दौरान स्वयंसेवक ने उन मरीजों पर भी ध्यान दिया जो कोरोना से नहीं, बल्कि अन्य बीमारियों से भी पीड़ित थे. उनके भोजन, उपचार और अन्य उपयोगी संसाधनों की समुचित व्यवस्था की, कोरोना की पहली लहर के दौरान करीब 45 लाख प्रवासी मजदूर मुंबई, पुणे, अहमदाबाद में फंसे थे. आवागमन के सभी संसाधन बंद थे, तब लाखों मजदूर पैदल ही अपने गांव को निकल पड़े. जिसमें उनके बच्चे, महिला और वृद्ध सभी शामिल थे. वे कोई नारा नहीं लगा रहे थे, ना सरकार, ना उद्योगपति, ना पूंजीपतियों के खिलाफ, इस भीड़ ने ना कहीं उत्पात मचाया, ना कहीं कोई लूटपाट की. इनको देख समूचा समाज इनके सहयोग और सेवा के लिए खड़ा हो गया. इनके भोजन, कपड़े, जूते आदि की व्यवस्था की गई. किसी ने इनका धर्म-संप्रदाय-जाति या भाषा नहीं पूछी. सेवा की ऐसी मिसाल दुनिया में कहीं नहीं मिलेगी. यही सेवा भाव अगली पीढ़ी तक पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी है. अगली पीढ़ी को सेवा भाव और संस्कार देना आवश्यक है, यदि संस्कार ना हो तो ज्ञान, धन और शक्ति से भी समाज का कोई हित नहीं होगा.

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि ज्ञानी रणजीत सिंह ने कहा कि सिक्ख धर्मगुरुओं ने दीन दुखियों की सेवा को सबसे प्रमुख कार्य माना है. कोरोना काल में पूरे देश में सिक्ख समाज ने पीड़ितों के लिए भोजन उपचार कपड़े दवाओं आदि की व्यवस्था की सागर में भैंसा गुरुद्वारा ने भी पूरे समय लंगर चलाया.

पुस्तक की संपादक दीप्ति प्यासी ने बताया कि कोरोना काल में स्वयंसेवकों द्वारा किए गए सेवा कार्यों का सचित्र वर्णन पुस्तक में किया गया है.

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August 22nd 2021, 4:05 pm

श्रीराम मंदिर के लिए सत्ता छोड़ने में उन्होंने एक क्षण भी नहीं लगाया

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योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश की राजनीति के पटल को दशकों तक अपनी आभा से आलोकित करने वाले श्रद्धेय कल्याण सिंह जी नहीं रहे. उनका देहावसान हो गया. अपार शोक की इस घड़ी में सोच रहा हूं कि अब जबकि वह हमारे बीच नहीं हैं, तो उन्हें किस तरह याद किया जाए. उन्हें एक राजनीतिक संत कहूं, जिसे पद-प्रतिष्ठा का मोह छू तक न पाया हो अथवा दृढ़ संकल्प की प्रतिमूर्ति मानूं, जो लक्ष्य का संधान होने तक अर्जुन की भांति एकनिष्ठ भाव के साथ सतत प्रयत्नशील रहे और अंततः सफलता ने उनका वरण किया.

वास्तव में, पांच दशक लंबा उनका सार्वजनिक जीवन इतना विविधतापूर्ण और संघर्षपूर्ण रहा है कि उसे कुछ एक विशेषणों के माध्यम से पूरा नहीं किया जा सकता. हां! इस विस्तृत समृद्ध राजनीतिक काल खंड में शुचिता, कर्तव्यपरायणता, ईमानदारी, सख्त प्रशासक और कुशल नेतृत्व उनके व्यक्तित्व की पहचान जरूर बने रहे. भारतीय राजनीति के एक बड़े कालखण्ड में भारतरत्न श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी, पूर्व उप प्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी जी और कल्याण सिंह जी की तिकड़ी में भारतीय जनमानस की आकांक्षाओं की छवि स्पष्ट दृष्टिगोचर होती थी. मैं सौभाग्यशाली हूं कि इन तीनों महानुभावों का सहयोग और स्नेह पाने की योग्यता मुझमें बनी रही.

कल्याण सिंह जी, श्रीराम मंदिर आंदोलन के अग्रणी नेतृत्वकर्ताओं में से एक थे. मंदिर के लिए सत्ता छोड़ने में उन्होंने एक क्षण भी नहीं लगाया. उनका यह कथन प्रभु श्रीराम के प्रति उनकी आस्था की झलक है. ‘‘…प्रभु श्रीराम में मुझे अगाध श्रद्धा है. अब मुझे जीवन में कुछ और नहीं चाहिए. राम जन्मभूमि पर मंदिर बनता हुआ देखने की इच्छा थी, जो अब पूरी हो गयी. सत्ता तो छोटी चीज है, आती-जाती रहती है. मुझे सरकार जाने का न तब दुख था, न अब है. मैंने सरकार की परवाह कभी नहीं की. मैंने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि कारसेवकों पर गोली नहीं चलाऊंगा. अन्य जो भी उपाय हों, उन उपायों से स्थिति को नियंत्रण में किया जाए….’’

सत्ता में ऐसे लोग विरले ही मिलेंगे. सच में उनके लिए भगवान श्रीराम पहले थे, सत्ता उसके बाद में. यही कारण है कि अयोध्या में 6 दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली. यह उनका त्याग और महानता थी. चूंकि मेरे दादा गुरु ब्रह्मलीन महंत दिग्विजय नाथ जी और पूज्य गुरुदेव ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ जी भी मंदिर आंदोलन के अग्रणी नेतृत्वकर्ताओं से थे. इसीलिए जब भी उनसे कभी मुलाकात होती या उनका गोरखनाथ मंदिर आना होता तो मंदिर आंदोलन और अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण को लेकर पूज्य गुरुदेव से उनकी लंबी चर्चा होती थी.

उनका अटूट विश्वास था कि प्रभु श्रीराम का भव्य और दिव्य मंदिर जन्मभूमि पर ही बनेगा. जब भी मंदिर आंदोलन पर चर्चा होती थी, तब वह कहते थे कि मंदिर निर्माण का काम मेरे जीवनकाल में ही शुरू होगा. प्रभु श्रीराम ने उनकी सुनी और देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने भारतीय जनमानस की 500 वर्षों की प्रतीक्षा को पूर्णता प्रदान करते हुए मंदिर निर्माण का शुभारम्भ किया. आज कोटि-कोटि आस्था के प्रतीक मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के भव्य-दिव्य मंदिर का निर्माण अवधपुरी में सतत जारी है.

गोरक्षपीठ की तीन पीढ़ियां (ब्रह्मलीन महंत दिग्विजय नाथ जी, ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ जी और आज मैं, स्वयं) मंदिर आंदोलन से जुड़ी रहीं, इस नाते पीठ से उनका खास लगाव था. वह बड़े महाराज ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ का बहुत सम्मान करते थे. यही वजह है कि जब भी गोरखपुर जाते थे, वे हमारे पूज्य गुरु जी से मिलने जरूर जाते थे. दोनों का एक ही सपना था, उनके जीते जी अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण हो. ये मेरा सौभाग्य है कि जब जन्मभूमि का ताला खुला तब पूज्य दादा गुरु ब्रह्मलीन महंत श्री दिग्विजयनाथ जी आंदोलन से जुड़े थे. जब ढांचा गिरा तब हमारे पूज्य गुरु ब्रह्मलीन श्री अवैद्यनाथ जी जी मंदिर आंदोलन के अग्रणी नेता थे और अब जब अयोध्या में प्रभु श्रीराम का भव्य और दिव्य मंदिर बन रहा है, तब मैं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का दायित्व निर्वहन कर रहा हूं.

समाज, कल्याण सिंह जी को उनके युगांतरकारी निर्णयों, कर्तव्यनिष्ठा व शुचितापूर्ण जीवन के लिए सदियों तक स्मरण करते हुए प्रेरित होता रहेगा. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, राजस्थान के पूर्व राज्यपाल, भारतीय जनता पार्टी परिवार के वरिष्ठ सदस्य व लोकप्रिय जननेता कल्याण सिंह जी का देहावसान संपूर्ण राष्ट्र के लिए अपूरणीय क्षति है. मैं उनके निधन पर विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं. प्रभु श्री राम से प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और शोक-संतप्त परिजनों को दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें.

साभार – पाञ्चजन्य

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August 22nd 2021, 4:05 pm

तालिबान ने कंधार और हेरात के दूतावासों में तलाशी ली, कुछ दस्तावेज और वाहन ले गए

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नई दिल्ली. अफगानिस्तान में तालिबान का कहर बढ़ता जा रहा है. लोग विशेषकर महिलाएं तालिबान से डरकर भाग रहे हैं. बुधवार को तालिबान ने कंधार और हेरात में स्थित बंद भारतीय वाणिज्य दूतावासों की तलाशी ली. रिपोर्ट्स के अनुसार, तालिबान ने दो दिन पहले कंधार और हेरात में बंद भारतीय वाणिज्य दूतावासों की तलाशी ली और इस तलाशी के दौरान कथित तौर पर दोनों मिशनों से कुछ दस्तावेज ले लिए. रिपोर्ट के अनुसार, तालिबानियों ने वाणिज्य दूतावास की इमारतों में सेंध लगाई और वहां खड़े वाहनों को भी अपने साथ ले गए.

भारत के अफगानिस्तान में कंधार, हेरात, मजार-ए-शरीफ और जलालाबाद में कुल मिलाकर चार भारतीय वाणिज्य दूतावास हैं. जिन्हें 15 अगस्त को तालिबान द्वारा काबुल पर कब्जे के बाद बंद कर दिया गया था. अफगानिस्तान में गंभीर स्थिति के बीच भारतीय दूतावास के कर्मचारियों को मंगलवार को भारतीय वायु सेना के सी-17 विमान द्वारा काबुल हवाई अड्डे से आईटीबीपी कर्मियों सहित 120 भारतीयों के साथ वापस लाया गया था.

कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक में शेष भारतीय नागरिकों को निकालने पर भी चर्चा की गई, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें वापस लाने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया. भारत अगले कुछ दिनों में सहायता के लिए हर संभव कदम उठाएगा.

केंद्र सरकार ने वीजा की एक नई श्रेणी, ई-आपातकालीन एक्स-विविध वीजा” भी पेश किया है. जिसके तहत सभी अफगान नागरिक भारत आने के लिए आवेदन कर सकते हैं. आपातकालीन वीजा पहले छह महीने के लिए वैध होगा. पहले काबुल में भारतीय दूतावास कम कर्मचारियों के साथ काम कर रहा था, लेकिन वहां गंभीर स्थिति को देखते हुए सरकार ने उन सभी को वापस बुलाने का फैसला किया.

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August 22nd 2021, 4:33 am

बेटी की घर वापसी

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इंदौर रात 8:00 बजे जब मैं अपनी पड़ोसी दिप्ती के साथ थाने पर पहुंची, तो सामने (परिवर्तित नाम) पिंकी के पिता रो रहे थे. उन्हें देखकर मेरी आंखें भर आई जो बार-बार कह रहे थे कि मेरी बेटी को कैसे भी उस शैतान के चंगुल से बचाओ. पिंकी की तरफ देखा तो वह बस शादाब की ही माला रट रही थी. हम सभी को अपना दुश्मन समझ अपशब्द कह रही थी.

वही 35 साल का शादाब जो पिछले साल पिंकी के घर मकान की मरम्मत करने एक कारीगर के रूप में पहुंचा था. बीवी और दो बच्चों के होते हुए भी वह चॉकलेट के बहाने 19 साल की पिंकी को बहलाने लगा और झूठे सपने दिखाकर उसका फायदा उठाने लगा.

थाने में बैठी पिंकी के शरीर पर नीले, हरे, लाल, काले कई डोरे बंधे हुए थे. हम सभी ने बहुत कोशिश की रात 10:00 बजे तक कि वह अपना मुंह खोले, हम सभी से कुछ तो बोले कि बीते 6 महीनों में उसके साथ क्या हुआ..?

प्रेम की आड़ में वासना और धर्म परिवर्तन जैसे षड्यंत्रों की शिकार पिंकी ही नहीं, ऐसी अनेक बच्चियां होती है जो उम्र के इस नाजुक दौर से गुजरते हुए सही और गलत में फर्क नहीं कर पातीं.

रात भर सुधार गृह में एक अच्छी संरक्षिका के साथ रहकर पिंकी के अंतर्मन का द्वंद कुछ शांत हुआ. दूसरे दिन उसे देखा तो वह बहुत शालीनता से पेश आ रही थी. शादाब के बीवी बच्चों से अनजान पिंकी को शादाब की सच्चाई बताई. छल, कपट, वासना की शिकार उस बच्ची के मन की गिरह को खोलने में वक्त तो लगा, परंतु दो-तीन दिन के साक्षात्कार में उसने जो सच बताया, वह रोंगटे खड़े करने वाला था.

घर पर चॉकलेट देने से बात शुरू हुई और धीरे-धीरे शादाब ने उसे एक मोबाइल फोन गिफ्ट किया. अब उसे घर से बाहर मिलने लगा, जब पिंकी ने आने से मना किया तो शादाब ने उसे उसके पिता को मारने की धमकी दी.

अपनी गलतियों का पछतावा करती पिंकी यह बातें किसी से ना कह सकी. पिंकी को जबरन नशे के इंजेक्शन लगने लगे, शादाब ने बहला-फुसलाकर उसे निकाह करने का वादा किया. अनजान पिंकी उसके दलदल में फंसती जा रही थी, नशे की लत उसके दिमाग को सूना करती जा रही थी. पिंकी को भगाकर मंदिर में माला पहना कर शादी की और उसे इंदौर में एक कमरे में रखा. कुछ दिनों बाद ही वह अचानक उसे भोपाल लेकर गया, जहां उसे छोटे से अंधेरे कमरे में अकेले रखा गया. कभी सुबह का खाना मिल जाता, तो कभी शाम का, दोनो टाइम की रोटी भी उसे नहीं दी जा रही थी. भोपाल में सख्त लॉकडाउन होने के कारण शादाब अचानक उसे इंदौर ले आया.

पिता (जनजाति समाज से) अपनी बेटी की तलाश में दर-दर भटक रहा था. पर उसकी हर कोशिश नाकाम थी. जनजाति क्षेत्रों में कार्य करते गोविंद जी और देवेंद्र जी को जब यह जानकारी मिली तो उन्होंने इंदौर से लेकर भोपाल तक बेटी की घर वापसी के लिए जमीन आसमान एक कर दिया. सभी जानकारी अपने माध्यमों से प्राप्त की.

शायद, इस बात की भनक शादाब को पड़ चुकी थी और वह उसे एक कमरे में छोड़कर भाग गया. वहीं से पिंकी को पुलिस के साथ थाने में लेकर आया गया.

बिन मां की बेटी पिंकी अपनी मौसी के साथ अपने घर में सुरक्षित और सतर्क है और 12वीं क्लास का फॉर्म भरने की तैयारी कर रही है. पर, न जाने ऐसी कितनी पिंकी हैं हमारे देश में, जो झूठे प्यार के झांसे में आकर अपनी जिंदगी के सुनहरे समय को कालिख में बदल देती हैं और शादाब जैसे दरिंदों की शिकार हो जाती हैं.

गोविंद जी, देवेन्द्र जी, दिप्ती जी, अर्पिता जी, डॉ. समीक्षा जी, इन सबके सहयोग से ही पुण्य कार्य पूर्ण हो पाया.

ह्रदय से इनका आभार, अभिनंदन.

सुनीता दिक्षित, सेवा भारती मालवा प्रांत

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August 22nd 2021, 4:33 am

मिशन कोविड सुरक्षा – कोविड-19 की डीएनए आधारित विश्व की पहली वैक्सीन तैयार, जाइकोव-डी को आपातकालीन उप

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नई दिल्ली. भारत ने दुनिया की पहली और स्वदेशी तौर पर विकसित डीएनए आधारित कोविड-19 वैक्सीन तैयार की है. डीएनए आधारित वैक्सीन जाइकोव-डी के लिए जायडस कैडिला को भारतीय औषधि महानियंत्रक (डीसीजीआई) से आपातकालीन उपयोग के लिए मंजूरी (ईयूए) भी मिल गई है. इसका उपयोग बच्‍चों के साथ-साथ 12 साल से अधिक उम्र के वयस्कों के लिए किया जा सकता है. ‘मिशन कोविड सुरक्षा’ के तहत भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के साथ साझेदारी में विकसित और बीआईआरएसी द्वारा कार्यान्वित जाइकोव-डी को क्‍लीनिकल पूर्व अध्‍ययन और पहले एवं दूसरे चरण के क्‍लीनिकल परीक्षण के लिए नेशनल बायोफार्मा मिशन के जरिये और तीसरे चरण के क्‍लीनिकल परीक्षण के लिए मिशन कोविड सुरक्षा के जरिये कोविड-19 रिसर्च कंसोर्टिया के तहत समर्थन दिया गया है.

तीन खुराक वाला यह टीका लगाए जाने पर शरीर में सार्स-सीओवी-2 वायरस के स्पाइक प्रोटीन का उत्पादन करता है और एक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया हासिल करता है जो बीमारी से सुरक्षा के साथ-साथ वायरस को खत्‍म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. प्लग-एंड-प्ले तकनीक को वायरस में म्‍यूटेशन से निपटने के लिए आसानी से अनुकूलित किया जा सकता है.

इस टीके का तीसरे चरण का क्‍लीनिकल ​​परीक्षण 28,000 से अधिक लोगों पर किया गया. इसमें लक्षण वाले आरटी-पीसीआर पॉजिटिव मामलों में 66.6 प्रतिशत प्राथमिक प्रभावकारिता दिखी. यह कोविड-19 के लिए भारत में अब तक का सबसे बड़ा टीका परीक्षण है. यह टीका पहले और दूसरे चरण के क्‍लीनिकल परीक्षण में प्रतिरक्षण क्षमता और सहनशीलता और सुरक्षा प्रोफाइल के मोर्चे पर भी सकारात्मक परिणाम दे चुका है.

डीबीटी की सचिव एवं बीआईआरएसी की चेयरपर्सन डॉ. रेणु स्‍वरूप ने कहा, ‘यह काफी गर्व की बात है कि आज हमारे पास जैव प्रौद्योगिकी विभाग के साथ साझेदारी में विकसित और मिशन कोविड सुरक्षा के तहत समर्थित दुनिया का पहला डीएनए कोविड-19 टीका जाइकोव-डी उपलब्ध है. भारतीय टीका मिशन कोविड सुरक्षा को आत्मनिर्भर भारत पैकेज 3.0 के तहत लॉन्च किया गया था. इसका उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित एवं प्रभावकारी कोविड-19 टीकों का विकास करना है. इसे बीआईआरएसी द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है. हमें विश्वास है कि यह भारत और दुनिया दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण टीका होगा. यह हमारे स्वदेशी टीका विकास मिशन में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है और यह भारत को नए टीकों के विकास में वैश्विक मानचित्र पर स्‍थापित करता है.’

डीबीटी के बारे में

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) भारत में जैव प्रौद्योगिकी को उसके विकास और कृषि, स्वास्थ्य सेवा, पशु विज्ञान, पर्यावरण एवं उद्योग में इसके कार्यान्वयन के जरिये बढ़ावा देता है.

बीआईआरएसी के बारे में

बायोटेक्‍नोलॉजी इंडस्‍ट्री रिसर्च असिस्‍टेंस काउंसिल (बीआईआरएसी) एक गैर-लाभकारी सार्वजनिक उपक्रम है. इसकी स्‍थापना भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) द्वारा किया गया है जो देश में उत्‍पाद विकास जरूरतों के संबंध में रण्‍नीतिक अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों के कार्यान्‍वयन के लिए उभरते जैव प्रौद्योगिकी उद्योग को प्रोत्‍साहित करने और बढ़ावा देने वाली एक इंटरफेस एजेंसी के रूप में कार्य करता है.

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August 22nd 2021, 4:33 am

संकट काल में मंदिरों ने खोले सहयोग के कपाट

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चन्दन आनन्द

सहायक लोक संपर्क अधिकारी

मंदिर हमारी सजीव सनातन संस्कृति का एक बहुमूल्य अंग हैं. हमारी सांस्कृतिक एवं सामाजिक गतिविधियां सदियों से मंदिरों के इर्द-गिर्द घूमती रही हैं. चाहे मेले हों, त्योहार हों या कोई उत्सव, बिना मंदिरों के उनकी कल्पना करना भी कठिन है. वास्तव में मंदिर हमारी संस्कृति में ऐसे सजीव संस्थान रहे हैं, जिनकी धूरी पर आस-पास के क्षेत्रों की सामाजिक-धार्मिक गतिविधियां घूमती थीं. हमारे .हां मंदिर देव उपासना के अलावा अन्य सामाजिक गतिविधियों के केंद्र भी रहे हैं. मंदिरों में पाठशाला, यज्ञशाला, पाकशाला एवं गऊशाला हमेशा से रही हैं. इसी कारण मंदिर केवल पूजास्थल नहीं, बल्कि रचनात्मक और सामाजिक कार्यों के अभिकेन्द्र भी बने रहे. समय के साथ कुछ प्रमुख मंदिरों को छोड़कर अधिकांश मंदिर से सामाजिक-सांस्कृतिक जुड़ाव की परम्परा कमजोर पड़ती गई.

मंदिर और उससे जुड़ी गतिविधियों से जुड़े होने के कारण हम एक तरह से पूरे समाज से जुड़े रहते थे. जैसे ही मंदिर से कटे, वैसे ही समाज से भी कटने का सिलसिला प्रारंभ हो गया. आस्था शायद आज भी मंदिर के उस देवी-देवता या ईष्ट में उतनी ही है, लेकिन अब अपने घर से ही उन्हें प्रणाम करने में हम सहजता महसूस करते हैं. मंदिरों में या मंदिरों के कारण होने वाली गतिविधियों को हमने कम कर दिया और देवी-देवताओं को हमने अकेला छोड़ दिया. लेकिन मंदिरों और देवी-देवताओं ने हमें कभी अकेला नहीं छोड़ा. कोरोना के जिस संकट से पूरा विश्व गुजर रहा है, उससे सभी ओर जब सहायता के द्वार बन्द हुए, तब हमारे इन्हीं मंदिरों ने अपने द्वार खोले. सार्वजनिक स्थानों में भीड़ कम कराने की वजह से सरकारों को मंदिरों के कपाट बंद करने पड़े, लेकिन इस संकट काल में हमारी सहायता के लिए मंदिरों ने अपने कपाट कभी बंद नहीं किए.

पिछले वर्ष जब कोरोना की पहली लहर आई तब से मंदिर, और धार्मिक संस्थान खुलकर सहायता को आगे आए. ऊना स्थित मां चिन्तापूर्णी मंदिर न्यास ने पांच करोड़, ज्वालाजी मंदिर कांगड़ा ने एक करोड़ की राशि एवं प्रवासी व जरूरतमंदों के लिए भोजन की व्यवस्था, ब्रजेश्वरी देवी कांगड़ा ने 50 लाख, मां चामुण्डा देवी मंदिर कांगड़ा ने 21 लाख, श्री नयना देवी मंदिर द्वारा 2.5 करोड़, दियोटसिद्ध स्थित बाबा बालक नाथ मंदिर द्वारा पांच करोड़ की राशि प्रदेश कोविड फंड में जमा करवाई गई. वहीं स्थानीय देवी-देवता भी सहायता को आगे आए. शिमला के मंदिर देवता रूद्र महाराज पुजारली ने 201100 रूपये, रोहड़ू के मंदिर देवता श्री नारायण नरैण द्वारा 151000 रूपये, सरकाघाट के कामेश्वर देव मंदिर द्वारा 50 हजार, मंडी देवताओं के कारदार संघ द्वारा 40 लाख, दुर्गा माता मंदिर हाटकोटी ने 25 लाख, सैंज घाटी के देव शंगचूल महादेव 1.11 लाख, बंजार घाटी के देवता बुंगड़ू महादेव 1 लाख 5 हजार, देवता रियालू नाग द्वारा 51 हजार, हाटू मंदिर नारकण्डा द्वारा 101101 रूपये की सहायता राशि भेंट की गई. राधा स्वामी सतसंग ब्यास ने तो अपने डेरे और सेवादार दिन रात कोविड से लड़ने के लिए प्रदेश को दिए. जिसमें कांगड़ा के परौर में बना 250 बेड का कोविड मेकशिफ्ट अस्पताल प्रमुख है.

वहीं, यदि देश के केवल कुछ प्रमुख मंदिरों की ही बात करें तो नवनिर्मित श्री रामजन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र द्वारा पहली लहर में पीएम केयर को 11 लाख रूपये एवं दूसरी लहर में ऑक्सीजन प्लांट की स्थापना के लिए राशि दी गई. देवस्थानम प्रबंधक कमेटी महालक्ष्मी मंदिर ने 2 करोड़, सोमनाथ मंदिर एक करोड़, महावीर मंदिर पटना 1 करोड़, कांची कामकोटी 10 लाख, स्वामी नारायण मंदिर 1.88 करोड़, अम्बाजी मंदिर 1 करोड़, हरियाणा में श्री माता शीतला देवी द्वारा पांच करोड़ एवं श्री माता मनसा देवी के खजाने से दस करोड़ की राशि भेंट की गई. पिछले वर्ष कोरोना संकट के दौरान सभी प्रवासी श्रमिकों को ठहराने और खाने की पूरी व्यवस्था तिरुपति बालाजी मंदिर ने की.

दूसरी लहर में स्वामी नारायण मंदिर वडोदरा ने मंदिर परिसर में ऑक्सीजन और वेंटीलेटर युक्त 500 बेड का कोविड केयर केंद्र आरंभ किया, पुरी जगन्नाथ ने 1.50 करोड़ राशि के साथ निलाचल भक्त निवास को 120 बेड की क्षमता वाले कोविड केयर केंद्र में बदला, मुम्बई में पवनधाम मंदिर ने अपने चार मंजिला भवन को 100 बेड युक्त कोविड उपचार केंद्र में बदला, जैन मंदिर मुम्बई ने अपने परिसर को कोविड केंद्र में बदला और पिछल वर्ष परिसर में लोगों की जांच के लिए पैथोलोजी लैब का निर्माण किया, संत गजानन मंदिर महाराष्ट्र द्वारा 500 बेड का आईसोलेशन केंद्र और प्रतिदिन 2000 लोगों का भोजन की व्यवस्था की गई. इस्कॉन मंदिर द्वारा रोगियों, बच्चों और वृद्धों के लिए निःशुल्क भोजन की व्यवस्था, श्री वैष्णो देवी मंदिर ने कटड़ा स्थित आर्शिवाद भवन 600 बेड का क्वारंटीन केंद्र के रूप में प्रशासन को दिया. यहां स्थान की कमी होने की वजह से बहुत कम मंदिरों का उल्लेख हो पाया है. इनके अतिरिक्त भी शायद ही कोई मंदिर या देव स्थान इस आपदा में आगे न आया हो. हिन्दू धर्म के अंतर्गत आने वाले तमाम मत-संप्रदाय और उससे जुड़े मंदिर पीड़ितों की सहायता के लिए कभी बंद नहीं हुए. ईश्वर इस विपत्तिकाल से हमें मुक्ति प्रदान करें और ऐसा मानस भी दें कि मंदिरों को सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का सजीव केन्द्र बनाने के लिए फिर से सजग होकर प्रयास करें.

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August 22nd 2021, 4:33 am

तालिबानी आतंकियों को खाना पसंद नहीं आया तो महिला को ज़िंदा जलाया

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नई दिल्ली. तालिबान द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद से ही तालिबानी क्रूरता के समाचार सामने आ रहे हैं. आतंकी विशेषकर महिलाओं को निशाना बना रहे हैं. क्रूरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक महिला को तालिबानी आतंकियों ने केवल इसलिए मौत के घाट उतार दिया, क्योंकि उसका बनाया खाना उन्हें पसंद नहीं आया था. अमेरिकी सेना और अशरफ गनी सरकार की मदद करने वालों को तालिबान घर-घर जाकर ढूंढ रहा है. इस दौरान कुछ आतंकी एक महिला के घर पहुंचे और उससे खाना पकाने को कहा था.

‘द सन’ में प्रकाशित समाचार के अनुसार, तालिबान के निर्देश पर महिला ने खाना बनाया, लेकिन आतंकियों को खाने का स्वाद पसंद नहीं आया. इससे नाराज आतंकियों ने महिला को जिंदा आग के हवाले कर दिया. पूर्व अफगान न्यायाधीश और महिला अधिकारों से जुड़े अभियान (‘Every Woman Treaty’) की प्रमुख नज़ला अयूबी ने बताया कि तालिबानियों ने केवल खाना पसंद नहीं आने पर महिला को जिंदा जला दिया.

ज़ी न्यूज़ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार नज़ला अयूबी ने कहा कि अफगानिस्तान से हर रोज कोई न कोई भयानक घटना सामने आ रही है. आतंकी महिलाओं को प्रताड़ित कर रहे हैं. घर-घर जाकर उन्हें डरा रहे हैं और उनसे अपने लिए जबरन खाना बनवा रहे हैं. इतना ही नहीं, आम अफगानियों से राशन भी लूट रहे हैं. अ तालिबानी लड़ाके जवान लड़कियों को उठाकर ले जा रहे हैं और उनसे शादी कर रहे हैं. पूर्व न्यायाधीश ने कहा, ‘पिछले कुछ दिनों में ही कई युवा महिलाओं को सेक्स स्लेव बनाने के लिए पड़ोसी देशों में भेजा गया है’.

काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद से बड़ी संख्या में लोग हवाई अड्डे पर पहुंच रहे हैं, ताकि वहां से बाहर निकल सकें. विशेषकर महिलाएं जल्द से जल्द अफगानिस्तान से बाहर निकलना चाहती हैं. वो तालिबान के पिछले क्रूर शासन को भूली नहीं हैं.

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August 22nd 2021, 4:33 am

अफगानिस्तान और वैश्विक संगठनों का औचित्य..??

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डॉ. नीलम महेंद्र

– सुरक्षित स्थान की तलाश में अपने ही देश से पलायन करने के लिए एयरपोर्ट के बाहर हज़ारों महिलाएं, बच्चे और बुजुर्गों की भीड़ लगी है. कई दिन और रात से भूखे प्यासे वहीं डटे हैं, इस उम्मीद में कि किसी विमान में सवार हो कर अपना और अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित करने में कामयाब हो जाएंगे. बाहर तालिबान है, भीतर नाटो की फौजें. हर बीतती घड़ी के साथ उनकी उम्मीद की डोर टूटती जा रही है. ऐसे में महिलाएं अपने छोटे-छोटे बच्चों की जिंदगी को सुरक्षित करने के लिए उन्हें नाटो फ़ौज के सैनिकों के पास फेंक रही हैं. इस दौरान कई बच्चे कँटीली तारों पर गिरकर घायल हो जाते हैं.

– इस प्रकार की खबरें और वीडियो सामने आते हैं, जिसमें अफगानिस्तान में छोटी-छोटी बच्चियों को तालिबान घरों से उठाकर ले जा रहा है.

– अमरीकी विमान टेक ऑफ के लिए आगे बढ़ रहा है और लोगों का हुजूम रनवे पर विमान के साथ- साथ दौड़ रहा है. अपने देश को छोड़कर सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए कुछ लोग विमान के टायरों के ऊपर बनी जगह पर सवार हो जाते हैं. विमान के ऊंचाई पर पहुंचते ही इनका संतुलन बिगड़ जाता है और आसमान से गिरकर इनकी मौत हो जाती है. इनके शव मकानों की छत पर मिलते हैं.

– एक जर्मन पत्रकार की खोज में तालिबान घर-घर की तलाशी ले रहा है, जब वो पत्रकार नहीं मिलता तो उसके एक रिश्तेदार की हत्या कर देता है और दूसरे को घायल कर देता है.

ऐसे न जाने कितने हृदयविदारक दृश्य पिछले कुछ दिनों में दुनिया के सामने आए. क्या एक ऐसा समाज जो स्वयं को विकसित और सभ्य कहता हो उसमें ऐसी तस्वीरें स्वीकार्य हैं? क्या ऐसी तस्वीरें महिला और बाल कल्याण से लेकर मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए बने तथाकथित अंतरराष्ट्रीय संगठनों के औचित्य पर प्रश्न नहीं लगातीं?

क्या ऐसी तस्वीरें अमरीका और यूके सहित 30 यूरोपीय देशों के नाटो जैसे तथाकथित वैश्विक सैन्य संगठन की शक्ति का मजाक नहीं उड़ातीं?

इसे क्या कहा जाए कि विश्व की महाशक्ति अमेरिका की सेनाएं 20 साल तक अफगानिस्तान में रहती हैं, अफगान सिक्युरिटी फोर्सेज पर तकरीबन 83 बिलियन डॉलर खर्च करती हैं. उन्हें ट्रेनिंग ही नहीं हथियार भी देती हैं और अंत में साढ़े तीन हज़ार सैनिकों वाली अफगान फौज 80 हज़ार तालिबान लड़ाकों के सामने बिना लड़े आत्मसमर्पण कर देती है. वहां के राष्ट्रपति एक दिन पहले तक अपने देश के नागरिकों को भरोसा दिलाते हैं कि वो देश तालिबान के कब्जे में नहीं जाने देंगे और रात को देश छोड़कर भाग जाते हैं.

तालिबान सिर्फ अफगानिस्तान की सत्ता पर ही काबिज़ नहीं होता, बल्कि आधुनिक अमरीकी हथियार, गोला बारूद, हेलीकॉप्टर और लड़ाकू विमानों से लेकर दूसरे सैन्य उपकरण भी तालिबान के कब्जे में आ जाते हैं.

अमरीकी सेनाओं के पूर्ण रूप से अफगानिस्तान छोड़ने से पहले ही यह सब हो जाता है वो भी बिना किसी संघर्ष के. ऐसा नहीं है कि सत्ता संघर्ष की ऐसी घटना पहली बार हुई हो. विश्व का इतिहास सत्ता पलट की घटनाओं से भरा पड़ा है. लेकिन मानव सभ्यता के इतने विकास के बाद भी इस प्रकार की घटनाओं का होना एक बार फिर साबित करता है कि राजनीति कितनी निर्मम और क्रूर होती है.

अफगानिस्तान के भारत का पड़ोसी देश होने से भारत पर भी निश्चित ही इन घटनाओं का प्रभाव होगा. दरअसल, भारत ने भी दोनों देशों के सम्बंध बेहतर करने के उद्देश्य से अफगानिस्तान में काफी निवेश किया है. अनेक प्रोजेक्ट भारत के सहयोग से अफगानिस्तान में चल रहे थे. सड़कों के निर्माण से लेकर डैम, स्कूल, लाइब्रेरी यहाँ तक कि वहाँ की संसद बनाने में भी भारत का योगदान है. 2015 में ही भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद भवन का उद्घाटन किया था, जिसके निर्माण में अनुमानतः 90 मिलियन डॉलर का खर्च आया था.

लेकिन आज अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबान काबिज़ है जो एक ऐसा आतंकवादी संगठन है, जिसे पाकिस्तान और चीन का समर्थन हासिल है.

भारत इस चुनौती से निपटने में सैन्य से लेकर कूटनीतिक तौर पर सक्षम है. पिछले कुछ वर्षों में वो अपनी सैन्य शक्ति और कूटनीति का प्रदर्शन सर्जिकल स्ट्राइक और आतंकवाद सहित अनेक अवसरों कर चुका है. लेकिन असली चुनौती तो संयुक्त राष्ट्र संघ, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद, यूनिसेफ, जैसे वैश्विक संगठनों के सामने उत्पन्न हो गई है जो मानवता की रक्षा करने के नाम पर बनाई गई थीं. लेकिन अफगानिस्तान की घटनाओं ने इनके औचित्य पर ही प्रश्न खड़े कर दिए हैं.

दरअसल, राजनीति अपनी जगह है और मानवता की रक्षा अपनी जगह. क्या यह इतना सरल है कि स्वयं को विश्व की महाशक्ति कहने वाले अमरीका की फौजों के रहते हुए पूरा देश ही उस आतंकवादी संगठन के कब्जे में चला जाता है, जिस देश में आतंकवादी संगठन को खत्म करने के लिए 20 सालों से काम कर रहा हो? अगर हाँ, तो यह अमेरिका के लिए चेतावनी है और अगर नहीं तो यह राजनीति का सबसे कुत्सित रूप है. एक तरफ़ विश्व की महाशक्तियां अफगानिस्तान में अपने स्वार्थ की राजनीति और कूटनीति कर रही हैं तो दूसरी तरफ ये संगठन जो ऐसी विकट परिस्थितियों में मानवीय मूल्यों एवं संवेदनाओं की रक्षा करने के उद्देश्य से अस्तित्व में आईं थीं वो अफगानिस्तान के इन मौजूदा हालात में निरर्थक प्रतीत हो रही हैं.

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August 22nd 2021, 4:33 am

हसीन ख्वाबों की दुनिया के लिए परिवार और धर्म को छोड़ा, पर मिली मौत

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कोटा. अंतिमा शक्तावत का नाम भी परसों उन लड़कियों में शुमार हो गया, जिन्होंने ख्वाबों की हसीन दुनिया की ख्वाहिश में अपने सपनों के राजकुमार के लिए अपने परिवार और धर्म तक को पीछे छोड़ दिया. लेकिन बदले में उन्हें मिली मौत. अंतिमा शक्तावत की उसके शौहर इमरान ने चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी.

मामला राजस्थान के कोटा शहर का है. मृतका शौहर के अत्याचारों से तंग आकर पिछले दो माह से अपनी बहन के पास रह रही थी. बुधवार (18 अगस्त) को बहन की बेटी के साथ ई-मित्र पर जा रही थी, तभी घात लगाकर बैठे इमरान ने बीच सड़क पर चाकुओं से ताबड़तोड़ वार कर उसे लहूलुहान कर दिया, अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसकी मौत हो गई. बीच बचाव में मृतका की भांजी को भी चोटें आई हैं.

कोटा पुलिस का कहना है कि मृतका रिजवाना उर्फ़ अंतिमा और आरोपी पति इमरान के बीच आपसी कलह चल रही थी. इसी के चलते पति इमरान ने उसकी हत्या की है. अंतिमा पति इमरान से तलाक लेना चाहती थी. दोनों ने 11 साल पहले प्रेम विवाह किया था. उनके तीन बच्चे हैं.

अंतिमा शक्तावत की बहन ने बताया कि अंतिमा ने जब इमरान से निकाह किया था, तब वह मात्र 15 साल की थी और इमरान 22 का. अंतिमा ने जिसे प्रेम समझा वह प्रेमजाल निकला. निकाह से पहले उसका कन्वर्जन किया गया, नाम रखा गया रिजवाना. यहां तक भी ठीक था, लेकिन उसके बाद उस पर जो अत्याचार हुए, वे दिल दहलाने वाले हैं. 2 महीने पहले इमरान ने बल्ला उसके सिर पर मारा था, जिससे उसका सिर फूट गया और 17 टांके आए थे. वह आए दिन उस पर जलती बीड़ी, सिगरेट फेंकता था, उसके शरीर पर जलने के निशान थे. इतना बुरा मारता था कि उसके दांत तोड़ दिए. नाबालिग थी, इसलिए उसके चंगुल में फंस गई.

हम क्या करें हमारी तो बहन है. हमने तो उसे गले लगा लिया था. इमरान उससे पैसों की मांग करता था, हम पैसा भी देते थे, खर्चा भी चलाते थे. और तो और इमरान ने गोवा में 1 लाख 20 हजार में उसका सौदा तक कर दिया था, लेकिन वह किसी तरह से बचकर वहां से भाग आई. लेकिन फिर, पति है मानकर उसके साथ रहने लगी. लेकिन इमरान नहीं सुधरा. मजबूरी में दो महीने पहले उसने इमरान का घर छोड़ दिया और हमारे साथ रहने लगी. लेकिन दरिंदे ने उसे यहां भी नहीं छोड़ा और उसकी हत्या कर दी. इन अत्याचारों में इमरान की मां भी उसका साथ देती थी.

आरोपी इमरान को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है.

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August 20th 2021, 4:19 pm

भारत माता को अखंड देखना चाहते थे महर्षि अरविंद – अजय मित्तल

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मेरठ. चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग व विश्व संवाद केंद्र के संयुक्त तत्वाधान में महर्षि अरविन्द की जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित ‘विभाजन की विभीषिका’ विषयक संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में विचारक व चिंतक अजय मित्तल ने कहा कि महर्षि अरविन्द

भारत माता को अखंड देखना चाहते थे. भारत का विभाजन होने पर उन्हें बहुत ठेस पहुंची थी. महर्षि के विचारों ने पूरे कालखंड को प्रभावित किया था. वह हमेशा कहते थे कि भारत विश्वगुरु बनने वाला है. महर्षि अरविंद के लेख के कारण ही देश में अखंड आजादी की ज्योत जली थी. वह समाज को ईश्वर के दर्शन भारत माता के रूप में कराना चाहते थे. वे कहते थे कि भारत माता एक ऐसी मानवीय चेतना है जो सामने आकर अपना रूप धारण कर सकती है.

अजय मित्तल ने कहा कि महर्षि अरविंद ने सांस्कृतिक विचार को दुनिया के सामने रखा. वह कहते थे कि यदि देश का विभाजन हुआ तो भारत की महानता पर ग्रहण लग जाएगा. उन्होंने पत्रकारिता में भी नए आयामों को स्थापित किया. उनके लेख पढ़ने के लिए लोग उत्सुक रहते थे. उनके लेखों ने देश में एक नई क्रांति को जन्म दिया एवं महर्षि अरविंद के लेखों से लाखों युवा प्रभावित हुए महर्षि अरविन्द के विचारों से प्रभावित होकर सुभाष चंद्र बोस ने सिविल सेवा से त्यागपत्र दे दिया था.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि संतोष शुक्ला ने कहा कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में महर्षि अरविंद का बहुत बड़ा योगदान था. उन्होंने चेतना के विकास का सिद्धांत दिया. महर्षि अरविंद कहते थे कि हर व्यक्ति में महामानव बनने की क्षमता है. नियमित योग से हम अपने अंदर की चेतना को जगा सकते है. उनके बारे में जानना गौरवपूर्ण है. इंग्लैंड में रहते हुए भी उन्होंने अपने देश प्रेम को जागृत रखा. महर्षि अरविंद का व्यक्तित्व अद्भुत था. महर्षि विश्व के श्रेष्ठ दर्शनिकों में से एक थे. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रणेता के रूप में स्थापित महर्षि अरविन्द ने आजादी के आंदोलन को एक नई दिशा दी. कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के निदेशक प्रो. प्रशांत कुमार ने कहा कि महर्षि अरविंद ने पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया. देश को आजाद कराने में उनके लेखों की महत्वपूर्ण भूमिका थी क्योंकि उनके लेख पढ़कर ही हजारों युवा को प्रेरणा मिली और वह युवा आजादी की लड़ाई में कूद पड़े. प्रो. प्रशांत कुमार ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया. कार्यक्रम का संचालन डॉ. मनोज कुमार श्रीवास्तव जी ने किया.

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August 20th 2021, 4:19 pm

पटना उच्च न्यायालय का निर्देश, राज्य में अवैध रूप से रह रहे विदेशियों के बारे में बताए सरकार

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पटना. पटना उच्च न्यायालय ने बिहार सरकार से प्रदेश में अवैध रूप से रह रहे विदेशियों को लेकर जानकारी मांगी है. उच्च न्यायालय ने सरकार को दो सप्ताह का समय दिया है. न्यायालय ने सरकार से पूछा कि बिहार में अवैध रूप से रह रहे विदेशियों के बारे में राज्य सरकार क्या कर रही है? सरकार इन लोगों के रखने के लिए कहां और कब तक स्थायी डिटेंशन सेंटर बनाएगी? स्थायी डिटेंशन सेंटर में क्या-क्या सुविधाएं उपलब्ध करवाएगी?

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एस. कुमार की खंडपीठ ने मामले पर सुनवाई की. सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सरकार से जानना चाहा कि प्रदेश में अवैध रूप से रह रहे विदेशियों के बारे में उन्हें जानकारी है या नहीं. यह भी जानना चाहा कि अवैध विदेशियों को रखने के लिए सरकार की क्या व्यवस्था है?

अवैध रूप से रह रहे विदेशियों की पहचान करने के लिए लोगों को जागरूक करने के बारे में क्या कदम उठाए गए हैं? सरकार को अखबार में विज्ञापन प्रकाशित करने का निर्देश दिया. और कहा कि अवैध रूप से रह रहे विदेशियों के बारे में लोग कहां शिकायत करें, इस बारे में भी लोगों को जानकारी देने का काम सरकार करे.

राज्य सरकार की ओर से न्यायालय को बताया गया कि फिलहाल हाजीपुर में विदेशियों को रखने के लिए अस्थायी डिटेंशन सेंटर बनाया जाएगा. बाद में सरकार स्थायी डिटेंशन सेंटर बनाएगी. सरकार की ओर से बताया गया कि अवैध रूप से आईं तीन बांग्लादेशी महिलाओं को वापस भेज दिया गया है.

डिटेंशन सेंटर

किसी भी देश में अवैध अप्रवासियों (दूसरे देश से आए नागरिक) को रखने के लिए जो जगह बनाई जाती है, उसे डिटेंशन सेंटर कहते हैं. इसमें किसी व्यक्ति को तब तक रखा जाता है, जब तक कि वह अपनी नागरिकता साबित नहीं कर दे.

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August 20th 2021, 4:19 pm

दिल्ली के चर्च के पास्टर सहित पांच पर केस दर्ज, मास्टरमाइंड की तलाश

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लखनऊ. पुलिस ने शहनवाजपुर मतांतरण के मामले में प्रधान प्रतिनिधि की शिकायत के आधार पर दिल्ली के एक चर्च के पास्‍टर, लखीमपुर के एक व्‍यक्ति और शहनवाजपुर गांव के तीन लोगों सहित कुल पांच पर मुकदमा दर्ज किया है. जिसमें गांव के दो आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है. जिले में ईसाई मिशनरियों की मतांतरण कराने की मुहिम को लेकर चिंतित हिन्दू संगठन चिंतित हैं और विभिन्न स्तरों पर इन घटनाओं को उठाने वाले हैं.

हिमालय की तलहटी में बसे बहराइच जिले में फैली गरीबी और अशिक्षा का लाभ उठाकर ईसाई मिशनिरियों का धर्मांतरण गिरोह सक्रिय है. कुछ दिन पूर्व रिसिया थानाक्षेत्र के शहनवाजपुर ग्राम पंचायत के पूर्व प्रधान व वर्तमान प्रधान प्रतिनिधि अनिल निषाद ने फेसबुक के माध्यम से कुछ परिवारों के ईसाई धर्म से प्रेरित होने की बात कह कर मामले में भारत सरकार से जांच की मांग की थी.

दैनिक जागरण समाचार पत्र ने मतांतरण के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था. शहनवाजपुर के आसपास के कई गांवों में ईसाई मिशनरियों के गुपचुप तौर से चंगाई सभा कर ग्रामीणों को इलाज, पैसे आदि सुविधाओं का लालच देकर मतांतरण कराने के मामले का खुलासा किया, जिसके बाद प्रशासन में हड़कंप मच गया था.

शहनवाजपुर में एसडीएम सदर, एसएसपी कुंवर ज्ञानंजय सिंह सहित तमाम प्रशासनिक अधिकारियों ने डेरा डालकर मामले की जांच की. पुलिस ने इस मामले में दिल्ली निवासी पास्टर रंजीत कुमार, शहनवाजपुर और आस-पास के गांव में लोगों को ईसाई मत में परिवर्तित करने वाला शातिर लखीमपुर जिले के पलिया कला निवासी मनोज कुमार, शहनवाजपुर गांव निवासी लालबहादुर, इंद्रजीत, गोदनी बसाही गांव निवासी प्रहलाद पर मुकदमा दर्ज किया है. थानाध्यक्ष हेमंत गौड़ ने बताया कि लालबहादुर और इन्द्रजीत को गिरफ्तार कर जेल भेजा है. जबकि मास्टर माइंड की तालाश में पुलिस टीम दबिश दे रही है.

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August 20th 2021, 4:19 pm

‘एक गाँव, एक तिरंगा’ अभियान 1,09,400 स्थानों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया

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नई दिल्ली. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के “एक गांव, एक तिरंगा” अभियान के तहत देश भर में 1,09,400 स्थानों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया. कोरोना की परिस्थिति को देखते हुए कुल 20,41,636 लोगों की सहभागिता अभियान में हुई. देश के 76,643 गांव एवं 23,887 बस्तियों में ध्वजारोहण सम्पन्न हुआ.

अंडमान निकोबार द्वीप से लेकर अरुणाचल प्रदेश के मोइरंग तक और जम्मू-कश्मीर के बारामूला से लेकर मलकानगिरी उड़ीसा के सुदूर नवरंगपुर तक, लाखों नागरिकों ने 75वें स्वतंत्रता दिवस के उत्सव में भाग लिया. चाहे बाढ़ प्रभावित क्षेत्र हों या या नक्सल प्रभावित, अभाविप के कार्यर्ताओं ने देश के सभी हिस्सों में इस अभियान को सफलता से संपन्न किया.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने भोपाल कार्यालय पर ध्वजारोहण कर अभियान की शुरुआत की थी. विशेष कार्यक्रमों में लखनऊ महानगर एवं मदुरई में ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के साथ स्वाधीनता पर्व मनाया गया, भारत नेपाल बॉर्डर में वनवासी गाँव दोमाठ में स्वतंत्रता सेनानी रामदेव मुखिया जी द्वारा ध्वजारोहण किया गया एवं गोरखपुर के नौका विहार में 5000 लोगों ने सामूहिक राष्ट्रगान किया. इस अभियान के निमित्त देश के अलग अलग स्थानों को चिन्हित कर वहां के लोगों के साथ ध्वजारोहण किया गया तथा शोभा यात्रा, सामूहिक राष्ट्र गान गायन, भारत माता पूजन, सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा प्रतियोगिताओं आदि कार्यक्रमों का आयोजन हुआ.

विद्यार्थी परिषद का मानना है कि देश को स्वतंत्रता दिलाने में देश के प्रत्येक नागरिक का योगदान रहा है. अभाविप के कार्यकर्ताओं ने देश के प्रत्येक जिले में ध्वजारोहण कर आजादी के इस अमृत उत्सव को मनाने के साथ-साथ देश के गुमनाम नायकों की कहानियां लोगों को बताते हुए स्वाधीनता के गुमनाम नायकों को याद किया.

आगामी वर्ष में अभाविप ’75 दिन देश के लिए’ नाम से अल्पकालीन विस्तारक योजना में जुड़ने का आह्वाहन युवाओं से करेगी. जिसमें देश की विभिन्न समस्याएं जैसे पर्यावरण आदि के समाधान के लिए काम किया जाएगा. इसके अतिरिक्त साहित्य निर्माण, पुस्तक प्रकाशन, स्वतंत्र वीरों के गांव में जाकर उनकी वीरता के गाथा का संकलन करना जैसे प्रयास किये जाएंगे.

अभाविप की राष्ट्रीय महामंत्री निधि त्रिपाठी ने कहा कि ,”अभाविप के कार्यकर्ताओं का देश भर में यह प्रयास अभिभूत करने वाला है. आज देश स्वाधीनता के 75वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है, उस वर्ष के प्रारंभ को ही अभाविप के कार्यकर्ताओं ने जिस उत्साह के साथ मनाया है, वह अपने आप में प्रेरणादायी है.”

 

 

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August 20th 2021, 4:19 pm

डीआरडीओ ने भारतीय वायु सेना के लिए उन्नत चैफ प्रौद्योगिकी विकसित की

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• यह तकनीक दुश्मन के रडार से पैदा खतरों से लड़ाकू विमानों की रक्षा करेगी, बड़ी मात्रा में उत्पादन के लिए उद्योग को प्रदान की गई

नई दिल्ली. डीआरडीओ ने दुश्मन के रडार खतरों से निपटने के लिए भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों की सुरक्षा के लिए एक उन्नत चैफ प्रौद्योगिकी विकसित की है. जोधपुर स्थित डीआरडीओ की रक्षा प्रयोगशाला ने वायुसेना की गुणात्मक आवश्यकताओं को पूरा करते हुए, डीआरडीओ की पुणे स्थित उच्च ऊर्जा सामग्री अनुसंधान प्रयोगशाला (एचईएमआरएल) के सहयोग से उन्नत चैफ सामग्री और चैफ कार्ट्रिज-118/I से इसे विकसित किया है. भारतीय वायु सेना ने सफल परीक्षणों के पूरा होने के बाद तकनीक को शामिल करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है.

इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में आधुनिक रडार खतरों में प्रगति के कारण लड़ाकू विमानों की उत्तरजीविता प्रमुख चिंता का विषय है. विमान की उत्तरजीविता सुनिश्चित करने के लिए, काउंटर मेजर डिस्पेंसिंग सिस्टम (सीएमडीएस) का उपयोग किया जाता है जो इंफ्रा-रेड और रडार खतरों के खिलाफ निष्क्रिय जैमिंग प्रदान करता है. चैफ एक महत्वपूर्ण रक्षा तकनीक है, जिसका उपयोग लड़ाकू विमानों को शत्रुतापूर्ण रडार खतरों से बचाने के लिए किया जाता है. तकनीक का महत्व इस तथ्य में निहित है कि हवा में तैनात बहुत कम मात्रा में चैफ सामग्री लड़ाकू विमानों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दुश्मन की मिसाइलों को अपने मार्ग से भटकाने के लिए प्रलोभन का काम करती है. भारतीय वायुसेना की वार्षिक रोलिंग आवश्यकता को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में उत्पादन करने हेतु उद्योग को प्रौद्योगिकी प्रदान की गई है.

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August 20th 2021, 4:19 pm

विस्थापित हिन्दू-सिक्ख समुदाय की सुरक्षा व संरक्षण हेतु कृत संकल्पित विहिप

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नई दिल्ली. अफगानिस्तान में तेजी से बदलते परिदृश्य पर चिंता व्यक्त करते हुए विश्व हिन्दू परिषद ने वहां बचे हिन्दू-सिक्ख समुदाय के साथ समस्त भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित कर उनकी सकुशल घर-वापसी हेतु सार्थक प्रयास किए जाने पर बल दिया. विहिप के केन्द्रीय महामंत्री मिलिंद परांडे ने कहा कि यद्यपि भारत सरकार द्वारा इस दिशा में उठाए गए कदम सराहनीय हैं, तथापि जब तक समस्त भारतीयों के साथ वहाँ के हिन्दू-सिक्ख समुदाय के सभी लोग सुरक्षित नहीं आ जाते, उनके जान-माल की रक्षा हेतु हर स्तर पर गंभीर प्रयत्न किए जाने की नितांत आवश्यकता हैं. विश्व हिन्दू परिषद अनेक वर्षों से पाकिस्तान से विस्थापित हुए लाखों हिन्दुओं की सेवा में लगी ही है, हम अपने अफगानिस्तानी हिन्दू-सिक्ख विस्थापितों की भी हर संभव मदद करेंगे. विस्थापित बंधु-भगिनियों के बीच सेवा के कार्य को हम और गति प्रदान करेंगे.

महिलाओं व बच्चों तक के मानवाधिकारों के गंभीर हनन के कारण अफगानिस्तान में तालिबान का विरोध हो ही रहा है. साथ ही, विश्व समुदाय भी उसके आतंक से भली-भांति परिचित है. इसके बावजूद, हमारे देश के नवोदित तालिबानी चाटुकार व सेक्युलर गैंग, इस्लामिक जिहादियों के साथ आतंकियों को भी प्रोत्साहित करने में लगे हैं. उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि आतंकवाद व उसको समर्थन दोनों ही का अंत बुरा होता है. आतंकी सांपों को पालने वाले उसके विषैले फन से स्वयं को भी नहीं बचा सकते. तालिबान का महिमा मंडन करने वालों को कुछ दिन अपने परिवार के साथ अपने चहेतों की छत्रछाया में अफ़ग़ानिस्तान में भी गुजारने चाहिए.

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August 20th 2021, 4:19 pm

नारायणपुर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शान से लहराया तिरंगा

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रायपुर. स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रदेश के घोर नक्सल प्रभावित नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ के विभिन्न क्षेत्रों में पहली बार तिरंगा दिनभर शान से लहराता नजर आया. बच्चे देशभक्ति गीत गुनगुना रहे थे. स्कूलों और पंचायत भवनों में गरिमामय ढंग से ध्वजारोहण किया गया. आज़ादी के बाद पहली बार कुछ गांवों में स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मनाया गया.

अबूझमाड़ में देशप्रेम की कहानी के पीछे उन बहादुर सपूतों के बलिदान का स्मरण भी आवश्यक है, जिन्होंने अबूझमाड़ के गांवों में शांति स्थापित करने के लिए अपना बलिदान दिया. माड़ के आकाबेडा, कोहकामेटा, सोनपुर, ओरछा, कुंदला, बासिंग सहित कई गांवों में नक्सल उग्रवाद रूक गया है. यहां पुलिस थाना और कैम्प स्थापित होने से नक्सल गतिविधियां सिमट गई है. आज़ादी के 75वें साल में माड़ के कुछ गांव, सही अर्थों में आज़ाद हुए है. सुरक्षा बलों के जंगलों में उतरने के बाद से अबूझमाड़ की आबोहवा भी बदल रही है. पुलिस ग्रामीणों के साथ दोस्ताना संबंध स्थापित कर गांवों में विकास के द्वार खोलने में सहभागिता निभा रही है.

काले झंडे लगाकर विरोध नहीं जता पाए ‘नक्सली’

नक्सलियों के आधार क्षेत्र में फोर्स की आमद होने से नक्सलियों का इलाका सिमट रहा है. शैक्षणिक संस्थाओं और ग्राम पंचायतों में ध्वजारोहण होने के बाद नक्सली तिरंगे झंडे को उतार कर काले झंडे लगाते आए हैं, लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है कि नक्सली अबूझमाड़ के अंदरूनी क्षेत्रों में काले झंडे लगाकर विरोध नहीं जता पाए.

विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी ओरछा डी.बी. रावते बताते हैं कि अबूझमाड़ ब्लॉक के सभी स्कूलों में स्वतंत्रता दिवस गरिमामय ढंग से मनाया गया. आजादी के पर्व को लेकर गांवों में उत्साह का माहौल रहा.

दशकों बाद अबुझमाड़िया परिवार को सरकार की योजनाओं का लाभ मिल रहा है. गांवों तक पक्की सड़कें बनाई जा रही हैं. पीने के लिए साफ पानी मिल रहा है. लालटेन युग से आजादी मिल गई है. माड़ के छोटे बड़े गांव में बिजली पहुँच गई है. असल आजादी के मायने अबूझमाड़िया परिवार के लोग अब समझ रहे है. सरकार द्वारा अंतिम व्यक्ति तक पहुँच बनाने के लिए गंभीर प्रयास किए जा रहे है. स्वास्थ्य सेवा का लाभ गांव के अंतिम छोर तक पहुँचाने के लिए स्वास्थ्य साथी के युवाओं को लगाया गया है.

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August 19th 2021, 9:34 am

इतिहास को न तो भुलाया जा सकता है और न ही छिपाया

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इतिहास को न तो भुलाया जा सकता है और न ही छिपाया जा सकता है. जब-जब इस तरह का प्रयास होता है, उसके परिणाम बुरे ही निकलते हैं, क्योंकि सच की एक बुरी आदत है कि वह सामने आने का रास्ता खोज ही लेता है. एक छोटी सी घटना की जिम्मेदारी तय करने के लिए बड़े-बड़े आंदोलन हो जाते हैं. फिर इतिहास की इतनी बड़ी त्रासदी की जिम्मेदारी किसकी थी, यह तो लोगों को पता चलना ही चाहिए. इसका मकसद यह नहीं है कि इसके आधार पर किसी से बदला लिया जाए. यदि आप किसी भी त्रासदी का समापन चाहते हैं तो पहले पूरी सच्चाई बतानी ही पड़ेगी.

प्रदीप सिंह

जो इतिहास को भूल जाते हैं, वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं. स्वतंत्रता के बाद से हमें यही बताया जा रहा है कि विभाजन के समय की विभीषिका को भूल जाओ. कहा ही नहीं जा रहा है, इतिहास भी इसी सोच के मुताबिक लिखा और लिखवाया गया. परिणाम आपके सामने है. आज यह कहने का साहस आ गया है कि दो राष्ट्र सिद्धांत का प्रतिपादन वीर सावरकर ने किया था. मतलब समझ रहे हैं आप..! साफ है कि जिन्ना को भारत विभाजन के दोष से मुक्त करना है. सच को छिपाकर किया गया झूठ का प्रचार अतीत के घाव से भी ज्यादा पीड़ा देता है. सिर्फ जिन्ना को बरी करने की ही कोशिश नहीं हो रही है. अब तो सड़कों पर नारे लग रहे हैं कि जिन्ना वाली आजादी चाहिए. नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ आंदोलन करने वालों ने ये नारे लगाए और उसका समर्थन देश के अग्रणी विपक्षी दलों ने किया. ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह-इंशा अल्लाह’ के नारे पर भी इन्हें कोई एतराज नहीं है. आजादी के आंदोलन का प्रेरणास्रोत रहा वंदे मातरम गीत 75 साल में सांप्रदायिक हो गया और जिन्ना धर्मनिरपेक्ष. कथित धर्मनिरपेक्षता की राजनीति देश को यहां तक लेकर आ गई है. कहते हैं 16 अगस्त, 1946 को जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन के एलान के बाद हुए दंगों में कितने मारे गए, उजाड़े गए, कितनी महिलाओं के साथ दुष्कर्म हुआ-यह सब भूल जाओ. मतलब यह है कि मुंदहु आंख कतहुं कुछ नाहीं.

विभाजन के समय करीब 20 लाख लोगों की मौत को भूल जाओ. सदी के सबसे बड़े विस्थापन पर ध्यान मत दो. अपनी बेटियों, बहनों को जिन लोगों ने खुद ही मार दिया, ताकि उनकी आबरू बचा सकें, उन्हें भूल जाएं. हिंदू मानस के मन पर यह घाव पहला नहीं था. आठ सौ साल का दर्द है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा है. विभाजन की विभीषिका ने उस घाव को हरा किया. इस विभीषिका को भुलाने के लिए ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ के रूप में सदी का सबसे बड़ा पाखंड रचा गया. क्या होती है यह गंगा-जमुनी तहजीब? यदि सचमुच ऐसी कोई तहजीब होती तो भारत का विभाजन क्यों होता? पूरे इतिहास पर नजर डालिए और बताइए कि कब इस गंगा-जमुनी तहजीब का चलन था? इस अवधारणा की रचना करने वालों को पता नहीं है कि जब प्रयागराज में संगम पर गंगा-जमुना मिलती हैं तो जमुना का अस्तित्व गंगा में विलीन हो जाता है. उसके बाद सिर्फ गंगा बचती है. जाहिर है कि इस तहजीब के पैरोकार ऐसा तो नहीं चाहेंगे, क्योंकि छोटा ही बड़े में समाहित होता है. यह मैं नहीं कर रहा हूं. डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पुस्तक है – इंडिया डिवाइडेड. इसमें उन्होंने लिखा है कि मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग सबसे पहले इकबाल ने 1930 में की थी.

दिसंबर 1930 में इलाहाबाद (प्रयागराज) में मुस्लिम लीग के सम्मेलन में अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा था, ‘इस्लाम का जो धार्मिक आदर्श है, वह उसकी बनाई सामाजिक व्यवस्था से जैविक रूप से जुड़ा है. एक को अस्वीकार करने का मतलब है, दूसरे को भी अस्वीकार करना. इसलिए इस्लाम की एकजुटता के आदर्श को नकार कर राष्ट्रीय स्तर पर कोई राजनीति किसी भी मुसलमान के लिए अकल्पनीय है. भारत राष्ट्र राज्य की एकता की कोशिश इस्लाम के इस सिद्धांत के अस्वीकरण से नहीं, बल्कि परस्पर समन्वय और सहयोग के आधार की जानी चाहिए.’

वह आगे कहते हैं, ‘दुख की बात है कि आंतरिक समन्वय की हमारी खोज नाकाम रही है. यह खोज नाकाम क्यों हुई, क्योंकि शायद हम एक-दूसरे के इरादों को संदेह की नजर से देखते हैं और अंदर से एक-दूसरे पर हावी होने की कोशिश करते हैं. इसलिए भारत के अंदर एक मुस्लिम भारत की हमारी मांग सर्वथा उचित है.’

राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर ने संस्कृति के चार अध्याय में लिखा है, ‘हिंदू जन्मजात अहिंसक थे. अपनी सीमा के बाहर जाकर लड़ने की उनके यहां परंपरा नहीं थी. सबसे उत्तम रक्षा यह है कि आक्रामक पर उसके घर में हमला करो. इस नीति पर हिंदुओं ने कभी अमल नहीं किया. परिणाम यह हुआ कि रक्षापरक युद्ध लड़ने की उनकी आदत हो गई.’

मुगलों और मुस्लिम शासकों की करीब आठ सौ साल की गुलामी ही नहीं, विभाजन के समय भी हिंदुओं ने अपनी इस नीति का खामियाजा भुगता. अब कहा यह जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी की विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाने की घोषणा से दोनों समुदायों में वैमनस्य बढ़ेगा. पुराने घाव हरे होंगे. इससे फायदा नहीं नुकसान होगा. ऐसा कहने वाले शायद हिंदू-मुसलमान संबंधों की समस्या को या तो समझते नहीं या समझना ही नहीं चाहते. यह मसला विभाजन के समय से शुरू नहीं होता कि उस समय जो हुआ उसे भूल जाएं तो सब ठीक हो जाएगा.

ईरानी विद्वान अल बरूनी के अनुसार, ‘लड़ाई और मारकाट के दृश्य तो हिंदुओं ने बहुत देखे थे, लेकिन उन्हें सपने में भी यह खयाल न था कि दुनिया की एकाध जाति ऐसी भी हो सकती है, जो मूर्तियों को तोड़ने और मंदिर को भ्रष्ट करने में ही अपना सुख माने. जब मुस्लिम आक्रमण के साथ मंदिरों और मूर्तियों पर विपत्ति आई, हिंदुओं का हृदय फट गया और वे इस्लाम से तभी से जो भड़के, सो अब तक भड़के हुए हैं.’

इतिहास को न तो भुलाया जा सकता है और न ही छिपाया जा सकता है. जब-जब इस तरह का प्रयास होता है, उसके परिणाम बुरे ही निकलते हैं, क्योंकि सच की एक बुरी आदत है कि वह सामने आने का रास्ता खोज ही लेता है. एक छोटी सी घटना की जिम्मेदारी तय करने के लिए बड़े-बड़े आंदोलन हो जाते हैं. फिर इतिहास की इतनी बड़ी त्रासदी की जिम्मेदारी किसकी थी, यह तो लोगों को पता चलना ही चाहिए. इसका मकसद यह नहीं है कि इसके आधार पर किसी से बदला लिया जाए. यदि आप किसी भी त्रासदी का समापन चाहते हैं तो पहले पूरी सच्चाई बतानी ही पड़ेगी. यह शुरुआत है, अंत नहीं.

कांग्रेस पार्टी यह कहने का दावा कभी नहीं छोड़ती कि देश को आजादी उसने दिलाई. सही बात है. इसे कोई चुनौती भी नहीं दे सकता, पर सवाल है कि देश का विभाजन किसने कराया?

मीठा-मीठा गप्प और कड़वा-कड़वा थू. यह तो अब नहीं चलेगा.

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August 19th 2021, 9:34 am

“मोदी जी आपने खेल जगत का दिल जीत लिया” – कपिल देव

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स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री ने टोक्यो ओलंपिक 2020 में भाग लेने वाले खिलाड़ियों से भेंट की. उन्होंने खिलाड़ियों से स्कूलों में जाकर युवाओं को प्रेरित करने के लिए कहा और साथ ही अभिभावकों से आग्रह किया कि वह युवा पीढ़ी का खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए समर्थन करें. सिर्फ टोक्यो ओलंपिक में भाग लेने वाले एथलीट ही नहीं, बल्कि दूसरे खेलों से जुड़े लोग भी प्रधानमंत्री की पहल की प्रशंसा कर रहे हैं.

1983 में क्रिकेट वर्ल्ड कप विजेता टीम के कप्तान कपिल देव ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एथलीटों से मिलने के कदम की सराहना की.

कपिल देव ने द स्टेट्समैन में अपने कॉलम में लिखा, “यह स्पष्ट नहीं है कि भारत के किसी प्रधानमंत्री ने कभी कहा है कि वह हमारे देश में खेल की संस्कृति बनाना चाहते हैं या नहीं और माता-पिता से उन बच्चों को प्रोत्साहित करने की अपील की, जो खेल खेलना चाहते हैं. मोदी जी ऐसा करने वाले पहले हो सकते हैं. प्रधानमंत्री ने न केवल माता-पिता से अपने बच्चों को खेलों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए कहा है, बल्कि उन्होंने यह भी प्रदर्शित किया है कि खेलों और हमारे एथलीटों में सक्रिय रुचि लेकर ऐसा कैसे किया जाता है.

“ओलंपिक के दौरान भी प्रधानमंत्री ने खिलाड़ियों के साथ बात की थी, लेकिन उसमें भाषण या औपचारिकता नहीं थी. प्रधानमंत्री न केवल खिलाड़ियों , अपितु उनके खेल को लेकर भी रुचि लेते थे. नहीं तो, चोट के बावजूद प्रतिस्पर्धा करने के बजरंग पुनिया के दृढ़ संकल्प के बारे में सवाल करना मुश्किल होता या रवि दहिया के साथ विरोधी के काटने के बारे में पूछना भी मुश्किल होता. यह सवाल भी मुश्किल था कि नीरज चोपड़ा के बारे में कि उन्हें कैसे पता चला कि उन्होंने भाला फैंकते ही जीत हासिल कर ली थी. मोदी जी ने कई एथलीटों के लिए माइक पकड़ा जो यह नहीं जान पाए कि यह चालू है या बंद है. प्रधानमंत्री ने इस बात का ध्यान रखा कि कार्यक्रम में खेल व ओलंपिक में भारत के लिए प्रतिस्पर्धा करने वाले खिलाड़ियों पर विषय केंद्रित रहे, न कि किसी अधिकारी या नौकरशाह पर.”

पूर्व वर्ल्ड कप विजेता ने कहा, “मोदी जी ने जिस तरह बात की, उदाहरण के लिए विनेश फोगाट से. मेडल नहीं जीतने के लिए खुद पर गुस्सा नहीं करने को कहा. उन्होंने कहा कि सफलता को कभी अपने सिर पर मत जाने दो और असफलता को कभी अपने दिल पर मत जाने दो. वह न केवल उसके लिए, बल्कि कई अन्य लोगों के लिए भी प्रोत्साहन था, जिन्होंने कोई पदक नहीं जीता था. ओलंपिक के स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने वाले एथलीटों को खुद से बहुत उम्मीदें होती हैं और जब उनकी उम्मीदें धराशायी हो जाती हैं, तो उनके लिए खुद को सजा देना आसान होता है. ऐसे अकेलेपन में उन्हें सहारे की जरूरत है और भारत के प्रधानमंत्री ने बेहतर दिखाया कि एक पूरा देश उनके साथ खड़ा है?

कपिल देव ने कहा, “मोदी जी की नीरज चोपड़ा को चूरमा और पीवी सिंधु को आइसक्रीम परोसते हुए उनकी तस्वीरें वायरल हुईं. जबकि वे सुखद यादें हैं, मुख्य सबक यह है कि भारत के लोकतंत्र के प्रभारी व्यक्ति मानते हैं कि खेल और खेल संस्कृति महत्वपूर्ण है. यही खेल संस्कृति के विकास को बढ़ावा देता है, जो मोदी जी की सबसे बड़ी विरासतों में से एक होगी. एक खिलाड़ी के रूप में, मैं खेल समुदाय को प्रधानमंत्री से प्यार और सपोर्ट प्राप्त करते हुए देखकर बहुत खुश हूं. मैं यह जोड़ना चाहता हूं कि अगर हमें भविष्य में और पदक जीतने हैं तो हमें खेल के बुनियादी ढांचे पर ध्यान देना चाहिए. और खेल के उपकरण पर कोई शुल्क नहीं होना चाहिए जो एथलीटों की आवश्यकता होती है.

और अंत में कहा, “मोदी जी आपने खेल जगत का दिल जीत लिया”. जय हिन्द.!

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August 19th 2021, 9:34 am

सिद्धू के सलाहकार की विवादित पोस्ट, कश्मीर को बताया अलग देश

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जालंधर. पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के सलाहकार ने कश्मीर को लेकर विवादित बयान दिया है, जिसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया हो रहा है. सिद्धू के सलाहकार मालविंदर सिंह माली ने कहा कि कश्‍मीर अलग देश है, जिस पर भारत और पाकिस्‍तान ने कब्‍जा कर रखा है. बयान के बाद अभी तक सिद्धू की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, वहीं अन्य दलों ने कांग्रेस को घेरना शुरू कर दिया है.

मालविंदर सिंह माली ने अपने फेसबुक अकाउंट पर स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर तिरंगा की रोशनी से जगमग कश्मीर के लाल चौक की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, ‘कश्मीर, कश्मीरी के लोगों का देश है. 1947 में भारत को छोड़ते समय हुए समझौते और संयुक्त राष्ट्र संघ के फैसले का उल्लंघन करते हुए कश्मीर देश के दो टुकड़े कर दिए गए, जिस पर पाकिस्तान और भारत ने कब्जा किया हुआ है.’

कश्मीर को लेकर विवादित पोस्ट के अलावा, सरकारी अधिकारी रह चुके मालविंदर ने अफगानिस्‍तान पर तालिबानी कब्‍जे को लेकर भी फेसबुक पर एक पोस्‍ट लिखा है. इसमें कहा – अफगानिस्‍तान में सत्‍ता हथियाने वाला तालिबान दक्षिण एशिया में शांति बहाली में मदद करेगा. साथ ही, तालिबान ने अफगानिस्‍तान में रह रहे सिक्खों और हिन्दुओं की सुरक्षा की जिम्‍मेदारी ली है.

अगर पंजाब दशकों हिंसक माहौल के बाद फिर से पूरे संघर्ष का रिकॉर्ड बना रहा है तो हम बेबस खून बहाने के बाद तालबिन से सबक सीखने की उम्मीद क्यों नहीं कर सकते, वो भी जब अफगानिस्तान में ही युद्ध शुरू हुआ था, अमेरिका बाहर आ रहा है और चीन, रूस और पाकिस्तान तालबिन के साथ अच्छे संबंध बनाने की राह पर है

विनीत जोशी ने मालविंदर सिंह माली के बयान की आलोचना करते हुए उनके खिलाफ एक्शन की मांग की है. उन्होंने कहा, ‘इससे पता चलता है कि ये लोग पंजाब को किस ओर ले जा रहे हैं. कई लोगों ने कश्मीर के लिए बलिदान दिया है. उनका यह बयान बलिदानियों के परिवार का अपमान है.

पंजाब कांग्रेस पार्टी में जारी अंतर्कलह के बीच जुलाई में नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया. इसके साथ ही संगत सिंह, सुखविंदर सिंह डैनी, पवन गोयल और कुलजीत सिंह नागरा को स्टेट वर्किंग प्रेसिडेंट बनाया गया.

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August 19th 2021, 9:34 am

उच्च न्यायालय से ममता सरकार को झटका, चुनाव बाद हुई हिंसा की जांच सीबीआई को सौंपी

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नई दिल्ली. कलकत्ता उच्च न्यायालय से ममता बनर्जी सरकार को बड़ा झटका लगा है. उच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हिंसा की घटनाओं की जांच अदालत की निगरानी में सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया है. सीबीआई हत्या और रेप के मामलों की भी जांच करेगी. इसके अलावा न्यायालय ने अन्य मामलों की जांच के लिए एसआईटी के गठन का आदेश दिया है.

इससे पहले मामले की सुनवाई कर रही पीठ ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) अध्यक्ष को चुनाव के बाद हिंसा के दौरान मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों की जांच के लिए एक जांच समिति गठित करने का आदेश दिया था.

समिति ने अपनी रिपोर्ट में ममता बनर्जी सरकार को दोषी ठहराया था और उसने बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर अपराधों की जांच सीबीआई को सौंपने की सिफारिश की थी. कहा था कि मामलों की सुनवाई राज्य के बाहर की जानी चाहिए.

एनएचआरसी समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि अन्य मामलों की जांच अदालत की निगरानी वाली विशेष जांच टीम (एसआईटी) द्वारा की जानी चाहिए और न्यायिक निर्णय के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट, विशेष लोक अभियोजक और गवाह सुरक्षा योजना होनी चाहिए.

उच्च न्यायालय ने हिंसा की निष्पक्ष जांच को लेकर दायर याचिकाओं पर पीठ ने फैसला सुनाया. आदेश के तहत अस्वाभाविक मृत्यु, हत्या और रेप सहित अन्य अधिक महत्व के अपराध के मामलों की जांच सीबीआई करेगी. कम महत्वपूर्ण मामले की जांच के लिए 3 सदस्यीय SIT का गठन किया गया है.

ईपीएस अधिकारी सुमन बाला साहू, सौमेन मित्रा और रणबीर कुमार के नेतृत्व में यह SIT गठित होगी. इसमें पश्चिम बंगाल काडर के सीनियर अधिकारियों को भी शामिल किया जाएगा. जांच कमेटी अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट को देगी. सीबीआई और एसआईटी की जांच उच्च न्यायालय की निगरानी में होगी.

उच्च न्यायालय ने सीबीआई को 6 सप्ताह के भीतर अपनी जांच रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है.

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August 19th 2021, 4:01 am

जम्मू कश्मीर के छात्रों को हुर्रियत और टेरर फंडिंग के जरिए दिलाते थे एमबीबीएस सीटें, चार आरोपी गिरफ्

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जम्मू कश्मीर. जम्मू-कश्मीर के छात्रों के लिए हुर्रियत और टेरर फंडिंग के जरिए पाकिस्तान में एमबीबीएस सीटें हासिल करने के मामले में पुलिस ने चार लोगों को गिरफ्तार किया है. जम्मू-कश्मीर के डीजीपी दिलबाग सिंह ने बताया कि मोक्ष आंदोलन के अध्यक्ष मोहम्मद अकबर भट उर्फ जफर भट, फातिमा शाह, मोहम्मद अब्दुल्ला शाह और शबजार अहमद शेख को गिरफ्तार किया गया है. उन्होंने बताया कि मोहम्मद अब्दुल्ला शाह का भाई 90 के दशक में पाकिस्तान गया था और हुर्रियत के लिए काम कर रहा था. इस मामले में अभी जांच जारी है.

दिलबाग सिंह ने बताया कि जांच में पाया गया है कि 80 के करीब एमबीबीएस सीट हुर्रियत और टेरर फंडिग के जरिए पाकिस्तान में हासिल की जाती हैं. एक सीट के लिए 10-12 लाख रुपये की रकम देनी पड़ती थी. हर साल 40 के करीब सीट भी टेरर फंडिग के जरिए हासिल की जाती होगी, तो भी यह बड़ी रकम बड़ी है. जम्मू कश्मीर के डीजीपी ने आगे बताया कि इस मामले की जांच सीआईडी की विंग कर रही है. जो लोग हुर्रियत के चैनल से एमबीबीएस की सीट खरीदकर पाकिस्तान पढ़ने गए और पैसा आगे हुर्रियत के चैनल से आतंकवाद को फंड करने के लिए इस्तेमाल हुआ, इसको लेकर ये जांच की जा रही है. बता दें कि इससे पहले भी कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिसमें छात्र जम्मू-कश्मीर से पढ़ाई के लिए पाकिस्तान जाते थे. लेकिन बाद में वह आतंकवादी बनकर लौटे हैं.

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August 19th 2021, 1:02 am

खतरा तालिबान नहीं तालिबानी सोच है

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राजीव सचान

बात बहुत पुरानी है, जब भारतीय शासक अफगानिस्तान में शासन करते थे. ऐसे अंतिम शासक थे महाराजा रणजीत सिंह, लेकिन यह बात ज्यादा पुरानी नहीं, जब अफगानिस्तान एक आम एशियाई देश था, जहां लड़कियां पश्चिमी परिधानों में स्कूल-कालेज जाती थीं और भारतीय फिल्मकार अपनी फिल्मों की शूटिंग करने वहां जाते थे. शायद अफगानिस्तान में शूट होने वाली आखिरी हिंदी फिल्म थी-खुदा गवाह. अब इस सबकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, क्योंकि वे तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता में काबिज हो गए हैं, जो सदियों पुरानी कबीलाई मानसिकता में जी रहे हैं और जिन्होंने काबुल में कब्जा जमाते ही शरिया लागू करने के इरादे जाहिर कर दिए हैं. इसके तहत लड़कियों को स्कूल जाने और महिलाओं को अकेले घर से बाहर निकलने की मनाही होगी. अब वे किसी दफ्तर में काम करने की सोच भी नहीं सकतीं. जो कामकाजी महिलाएं थीं, वे घरों में दुबक गई हैं और टीवी चैनलों ने अपनी महिला एंकरों को या तो हटा लिया है या बुर्का पहनकर काम करने को कहा है. फिलहाल काबुल में मौजूद विदेशी टीवी चैनलों की महिला संवाददाताओं ने भी बुर्कानुमा परिधान धारण कर लिया है. सार्वजनिक स्थलों में जिन होर्डिंग में महिलाएं दिख रही थीं, उन्हें या तो हटाया जा रहा है या फिर उन पर कालिख अथवा सफेदी पोती जा रही है. यह सब तब हो रहा है, जब तालिबान कह रहा है कि महिलाओं को सरकार में शामिल किया जाएगा.

तालिबान नेताओं की बातों पर भरोसा नहीं

तालिबान नेताओं की बातों पर भरोसा न होने के कारण ही लोगों में अफगानिस्तान छोड़ने की होड़ लगी है. अफगान नागरिकों को तालिबान के शासन वाले अफगानिस्तान में अपना कोई भविष्य नहीं दिख रहा है. महिलाएं कुछ ज्यादा ही दहशतजदा हैं, क्योंकि वे अच्छी तरह जानती हैं कि उनकी आजादी पर कट्टरता का कठोर पहरा बैठने वाला है और उनकी जिंदगी गुलामों जैसी होने वाली है. तालिबानी मध्ययुग की बर्बर सोच वाले लोग हैं. भले ही काबुल हवाईअड्डे के भयावह हालात यह प्रकट करते हों कि हजारों हजार अफगानी देश छोड़ने के लिए तत्पर हैं, लेकिन अफगानिस्तान में तमाम लोग ऐसे भी हैं, जो तालिबान के समर्थक हैं. तालिबान केवल इसलिए आसानी से अफगानिस्तान में काबिज नहीं हो गए, क्योंकि अमेरिका ने अपनी सेनाओं को आनन-फानन वापस बुलाने का फैसला कर लिया और अफगान सेना बहुत पिलपिली निकली. तालिबान की राह इसलिए भी आसान हो गई, क्योंकि अफगान जनता का एक वर्ग ऐसा है, जो तालिबानी सोच वाला है और जिसे शरिया में कोई बुराई नहीं नजर आती. अमेरिकी संस्था प्यू के एक सर्वेक्षण के अनुसार अफगानिस्तान के 90 प्रतिशत से अधिक लोग शरिया के पक्षधर हैं. ऐसी ही सोच वाले लोग पाकिस्तान में भी हैं. पाकिस्तान किस तरह तालिबान के लौट आने से गदगद है, इसका उदाहरण है पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान का बयान. तालिबान खान की उपाधि पा चुके इमरान खान का कहना है कि तालिबान ने काबुल में काबिज होकर अफगानिस्तान को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराया है.

अफगानिस्तान का भविष्य

अफगानिस्तान का भविष्य क्या होगा, पता नहीं, लेकिन तालिबान के काबुल में कब्जा कर लेने के बाद पाकिस्तान में जश्न का सा माहौल है. सरकार और सेना के साथ पाकिस्तान के तमाम लोग खुश हैं. उन्हें भी इमरान खान की तरह लगता है कि तालिबान के अफगानिस्तान में काबिज हो जाने में कुछ भी गलत नहीं. उन्हें अपने यहां न सही, अफगानिस्तान में शरिया लागू होती दिख रही है और यह उनके लिए खुशी की बात है. अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे पर खुश होने वाले लोग दुनिया के और देशों में भी हैं. दुर्भाग्य से ऐसे लोग भारत में भी हैं. इंटरनेट मीडिया पर ऐसे कई भारतीय मिल जाएंगे, जो तालिबान की तारीफ कर रहे हैं और उन्हें अफगानिस्तान की सत्ता का वैध दावेदार बता रहे हैं. एक वायरल चैट में जब एक तालिबान प्रेमी उत्साहित होकर यह खुशखबरी सुनाता है कि राष्ट्रपति अशरफ गनी इस्तीफा देकर अफगानिस्तान से चले गए हैं तो अन्य लोग-अलहमदुल्ला-कहकर खुशी जताते हैं. वे अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे को आजादी की जंग की जीत के तौर पर रेखांकित करते हैं. ये सब अनाम-गुमनाम लोग नहीं. इनमें तथाकथित एक्टिविस्ट, पत्रकार और नेता भी हैं. संभल से समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर रहमान बर्क ने अफगानिस्तान पर तालिबानी कब्जे को सही ठहराते हुए कहा कि तालिबान की कार्रवाई वैसी ही है, जैसी हम भारतीयों की आजादी की लड़ाई की थी. यह वही बर्क हैं, जिन्होंने कुछ समय पहले कहा था कि कोरोना की आफत इसलिए आई, क्योंकि भारत सरकार ने शरिया से छेड़छाड़ की है.

तालिबान काबुल में काबिज

तालिबान के काबुल में काबिज होने के बाद इस्लामिक स्टेट और अल कायदा जैसे आतंकी संगठनों के सिर उठा लेने के तो प्रबल आसार हैं ही, यह भी अंदेशा है कि पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठन लश्कर एवं जैश और अधिक बेलगाम हो जाएंगे. वे इन दिनों तालिबान की मदद के इरादे से अफगानिस्तान में सक्रिय हैं. इसका अंदेशा है कि वे नए सिरे से कश्मीर का रुख कर सकते हैं. आशंका यह भी है कि उन्हें तालिबान की मदद भी मिल सकती है. तालिबान का मददगार केवल पाकिस्तान ही नहीं, चीन भी है. चीन और पाकिस्तान तालिबान को भारत के खिलाफ उकसाने का काम कर सकते हैं. वैसे तो भारत को तालिबान से सीधे तौर पर खतरा नहीं है, लेकिन तालिबानी सोच से खतरा अवश्य है. इसी सोच के कारण एक समय कश्मीर में इस्लामिक स्टेट के झंडे लहराए जाते थे. इस्लामिक स्टेट और तालिबान में यदि फर्क है तो केवल उनके काले-सफेद झंडों का.

साभार – दैनिक जागरण

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August 19th 2021, 1:02 am

एनआईए ने आईएसआईएस से संबंध रखने वाली दो महिलाओं को गिरफ्तार किया

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नई दिल्ली. एनआईए ने इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) आतंकी संगठन से संबंध रखने वाली दो महिलाओं को को गिरफ्तार किया है. आरोपी महिलाओं पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर आईएसआईएस की हिंसक जिहादी विचारधारा का प्रसार करने और नए सदस्यों को इसमें शामिल करने के आरोप में मंगलवार को गिरफ्तार किया गया है.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार केरल के कन्नूर जिले की मिझा सिद्दीक और शिफा हैरिस रिश्तेदार हैं. केरल के मोहम्मद अमीन तथा उसके साथियों की आतंकी गतिविधियों के संबंध में एनआईए ने मार्च में स्वयं संज्ञान लेते हुए कानून की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया था. इसी मामले के संबंध में मंगलवार को सिद्दीक और शिफा की गिरफ्तारी हुई.

रिपोर्ट के अनुसार एनआईए के अधिकारी ने बताया कि अमीन और उसके साथी टेलीग्राम, हूप और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया मंचों पर आईएसआईएस के कई प्रोपगैंडा चैनल चलाते थे और इसके माध्यम से आतंकी संगठन की हिंसक जिहादी विचारधारा का प्रचार करते थे. तथा नए सदस्यों की भर्ती करते थे. सिद्दीक आईएसआईएस से संबद्ध है और उसने सीरिया में आतंकी संगठन में शामिल होने के लिए अपने साथियों के साथ ईरान की राजधानी तेहरान की यात्रा की थी. अमीन के निर्देश पर उसने इंस्टाग्राम पर एक पेज बनाया, जिसके माध्यम से मुस्लिम युवाओं को भ्रमित कर उन्हें आतंकी संगठन में भर्ती किया जाता था.

सिद्दीक ने शिफा हैरिस और एक अन्य रिश्तेदार मुसहाब अनवर को भी कट्टरपंथी बनाया था और उन्हें आईएसआईएस में शामिल होने के लिए उकसा रही थी. हैरिस भी आईएसआईएस से संबद्ध है और उसने अनवर तथा सिद्दीक के इशारों पर संगठन की गतिविधियों के लिए मोहम्मद वकार लोन को पैसे भेजे थे. शिफा आईएसआईएस में शामिल होने के लिए ‘हिजरा करना चाहती थी. मामले को लेकर एनआईए गहनता से जांच कर रही है.

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August 19th 2021, 1:02 am

88.13 लाख से अधिक खुराक लगाकर भारत ने एक दिन में सबसे ज्यादा टीके लगाने का रिकॉर्ड बनाया

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नई दिल्ली. देशव्यापी टीकाकरण अभियान के तहत भारत ने टीके की 88.13 लाख से अधिक खुराकें लगाईं. टीकाकरण अभियान शुरू होने के बाद से एक दिन में ये सबसे ज्यादा टीके लगाए गए हैं. इसके साथ ही कोविड-19 टीकाकरण कवरेज 55 करोड़ (17 अगस्त प्रातः तक) के पड़ाव पर पहुंच गया. सुबह सात बजे तक की अस्थायी रिपोर्ट के अनुसार 62,12,108 सत्रों के माध्यम से टीके की कुल 55,47,30,609 खुराकें लगाई गईं.

सबके लिये कोविड-19 टीकाकरण का नया अध्याय 21 जून, 2021 को शुरू हुआ था. केंद्र सरकार देशभर में कोविड-19 टीकाकरण का दायरा बढ़ाने और इस प्रक्रिया में तेजी लाने के लिये कटिबद्ध है. भारत में रिकवरी दर 97.51 प्रतिशत है. यह मार्च 2020 के बाद से सर्वाधिक है. महामारी की शुरुआत से जितने लोग संक्रमित हुए हैं, उनमें से 3,14,48,754 मरीज कोविड-19 से पहले ही उबर चुके हैं, और पिछले 24 घंटों में 36,830 मरीज स्वस्थ हुए हैं.

154 दिनों में भारत में दैनिक नये मामलों में सबसे कम (25,166) मामले दर्ज किये गए. लगातार 51 दिन से 50 हजार से कम दैनिक मामले आ रहे हैं. यह केंद्र और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के मिले-जुले और सतत प्रयासों का नतीजा है.

भारत में सक्रिय मामलों की संख्या 3,69,846 दर्ज की गई है, जो 146 दिनों में सबसे कम है. सक्रिय मामले अब देश के कुल पॉजिटिव मामलों का 1.15 प्रतिशत रह गये हैं, जो मार्च 2020 के बाद देश के कुल पॉजिटिव मामलों में सबसे कम है.

देश में जांच क्षमता को लगातार बढ़ाया जा रहा है, जिसके सिलसिले में देश में पिछले 24 घंटों के दौरान कुल 15,63,985 जांचें की गईं. आमूल रूप से भारत ने अब तक 49.66 करोड़ से अधिक (49,66,29,524) जांचें की गईं हैं.

एक तरफ देशभर में जांच क्षमता बढ़ाई गई, तो दूसरी तरफ साप्ताहिक पॉजिटिविटी दर इस समय 1.98 प्रतिशत है, जो पिछले 53 दिनों में तीन प्रतिशत से नीचे कायम है. दैनिक पॉजिटिविटी दर भी 1.61 प्रतिशत रही, जो पिछले 22 दिनों से तीन प्रतिशत से नीचे और 71 दिनों से लगातार पांच प्रतिशत से कम पर बनी हुई है.

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August 19th 2021, 1:02 am

सनातन धर्म की पुरातन परंपरा, धर्म विज्ञान, वैदिक परंपरा, युद्ध कौशल का अध्ययन करवाएगा बीएचयू

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बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी के भारत अध्ययन केंद्र में हिन्दू धर्म व संस्कृति पर आधारित कोर्स की विधिवत शुरूआत इसी सत्र से हो रही है. आधुनिकता के साथ सनातन प्राचीन परंपरा की थाती संजोए विवि में छात्र वेद, पुराण, ब्राह्मण और श्रमण परंपरा के साथ रामायण, महाभारत, दर्शन, ज्ञान मीमांसा सहित हिन्दू धर्म के वैशिष्ट्य और परंपरा पर आधारित पाठ्यक्रमों में पढ़ाई कर सकेंगे.

इसका प्रारंभ कला संकाय के अंतर्गत भारत अध्ययन केंद्र में किया गया है. कोर्स के तहत भारत सहित विश्व के छात्रों को सनातन हिन्दू धर्म की पुरातन विद्या, परंपरा, युद्ध कौशल और धर्म-विज्ञान, वैदिक परंपरा में पारंगत किया जाएगा. 2 साल के इस कोर्स के लिए 40 सीटें निर्धारित हैं. ऑनलाइन फॉर्म भरने की अंतिम तिथि 07 सितंबर, 2021 है. हिन्दू धर्म और शास्त्रों से संबंधित प्रश्नों पर आधारित प्रवेश परीक्षा 03 अक्तूबर को होगी. प्रॉस्पेक्टस 

वर्ष के प्रारंभ में ही बीएचयू, जेएनयू, आईआईटी कानपुर सहित देश भर के विद्वानों ने बैठक कर निर्णय लिया था कि भारत में पहली बार बीएचयू में हिन्दू अध्ययन की शिक्षा दी जाएगी. हिन्दू स्टडीज नामक नए कोर्स को 2021-22 के इसी सत्र से शुरू करने का निर्णय लिया गया है. इसके तहत दो वर्षीय एम ए का कोर्स होगा, जिसका आवेदन प्रक्रिया की शुरुआत के साथ आरम्भ हो चुका है.

विश्वविद्यालय में इसके लिए स्मार्ट क्लास बनाई गई है. इसमें गुरुकुल शिक्षा पद्धति भी दिखेगी और प्राचीन धर्म शास्त्र के व्यावहारिक पहलुओं पर गहन अध्ययन और प्रयोग भी होगा. प्रोफेसर राकेश उपाध्याय ने बताया कि अत्याधुनिक तकनीक के सहारे डिजिटल दुनिया के अन्य देशों के छात्र भी इस कोर्स में दाखिला ले सकेंगे.

भारत अध्ययन केंद्र द्वारा स्नातकोत्तर की उपाधि देने वाले इस कोर्स का पाठ्यक्रम कला संकाय प्रमुख प्रो. विजय बहादुर सिंह की अध्यक्षता में बनारस और देश-विदेश के कई नामी-गिरामी आचार्यों द्वारा तैयार किया गया है, जिस पर कला संकाय प्रमुख की अध्यक्षता वाली बोर्ड ऑफ स्टडीज की बैठक में सर्वसम्मति से मुहर लगा दी गई थी.

भारत में यह पहला अवसर है जब इस कोर्स के तहत सनातन परंपरा, ज्ञान मीमांसा सहित तत्व विज्ञान लेकर सैन्य विज्ञान जैसे प्राचीन हिन्दू शास्त्रों को एकेडमिक स्वरूप प्रदान किया गया है. इस कोर्स के अंतर्गत हिन्दू धर्म के वैशिष्ट्य और परंपरा पर आधारित पाठ्यक्रम की रचना की गई है.

इस कोर्स के संचालन में कला संकाय के ही भारत अध्ययन केंद्र के अलावा दर्शन शास्त्र विभाग हिन्दू धर्म का मर्म, उद्देश्य और रूपरेखा बताएगा. प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति विभाग सनातन काल से महान हिन्दू सम्राटों द्वारा उपयोग किए जाने वाले उपकरणों, हथियारों, स्थापत्य कला और प्राचीन व्यापारिक गतिविधियों को पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर सिद्ध करेगा. संस्कृत विभाग श्लोकों के माध्यम से शास्त्रों और ग्रंथों के व्यावहारिक पक्षों को विद्यार्थियों के समक्ष व्यावहारिक रूप में रखेगा.

विशेष रूप से पाठ्यक्रम में निर्णय लेने के दौरान बोर्ड आफ स्टडीज की बैठक में कला संकाय प्रमुख प्रो. विजय बहादुर सिंह की अध्यक्षता में जेएनयू के प्रो. रामनाथ झा, आईआईटी कानपुर के प्रो. नचिकेता तिवारी, प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी, प्रो. ब्रजकिशोर स्वाई (ओडिशा), बीएचयू संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के प्रमुख प्रो. विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र, लोकगायिका प्रो. मालिनी अवस्थी, प्रो. प्रद्युम्न शाह, प्रो. विमलेंद्र कुमार, प्रो. सच्चिदानंद मिश्र, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र वाराणसी के निदेशक प्रो. विजय शंकर शुक्ल, प्रो. राकेश उपाध्याय, प्रो. केशव मिश्र, डॉ. अर्पिता चटर्जी, प्रो. सदा शिव कुमार द्विवेदी समेत कई अन्य प्रमुख आचार्य मौजूद थे, जिन्होंने लंबे विचार-विमर्श के बाद पाठ्यक्रम पर अपनी संस्तुति दी.

प्रोफेसर राकेश उपाध्याय का कहना था, “ज़्यादातर ऐसे विचारधारा के लोग हैं, जिनका एकमात्र उद्देश्य हिन्दू धर्म और सनातन परंपरा से द्रोह के कारण अपने नैरेटिव के लिए हर जगह अनावश्यक डिबेट खड़ा करके उसे ख़ारिज करना है. न कि उसे समझना और उस पर वास्तविक विमर्श करना.”

उन्होंने कुछ इतिहासकारों की तरफ इशारा करते हुए कहा, “कई ऐसे प्राचीन इतिहास के विशेषज्ञ बने हुए हिन्दू धर्म पर व्याख्यान देते फिर रहे हैं. इन्हें खुद मूल ग्रंथों का ज्ञान नहीं है. जो परंपरा से ऋग्वेद पढ़ रहे हैं, उन्हें उसमें गाय काटने का वर्णन नहीं मिलेगा. लेकिन जिन्हें हिन्दू धर्म को सिर्फ बदनाम करना है वह ऐसा कोई भी क्षेपक-प्रक्षेपक के सहारे जो भारत का है, जो इस राष्ट्र का गौरवशाली तत्व है उसे विकृत और दुष्प्रचारित करने में लगे हैं.”

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August 19th 2021, 1:02 am

इमरान के नया पाकिस्तान में हिन्दू, और हिन्दू आस्था केंद्र असुरक्षित

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नई दिल्ली. इमरान खान के नया पाकिस्तान में न हिन्दू सुरक्षित हैं और न ही हिन्दुओं की आस्था केंद्र सुरक्षित हैं. पाकिस्तान में इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा हिन्दुओं व हिन्दू आस्था केन्द्रों को निशाना बनाकर किए जा रहे अत्याचार थम ही नहीं रहे हैं. 04 अगस्त को पंजाब प्रांत के रहीमयार खान जिले के भोंग शरीफ क्षेत्र में स्थित सिद्धविनायक मंदिर में सैकड़ों इस्लामी कट्टरपंथियों ने जमकर उत्पात मचाया और अपने साथ लाए डंडे, ईंट, पत्थर, तथा सरियों से मंदिर में तोड़-फोड़ की. मंदिर में स्थित भगवान गणेश की मूर्ति को खंडित कर परिसर में लगे सजावटी झूमर, घंटों और कांच के अन्य सामान को बुरी तरह से नष्ट कर दिया. इतना ही नहीं मंदिर परिसर के आस-पास रहने वाले हिन्दू परिवारों पर भी कट्टरपंथियों ने हमला किया. मंदिर क्षेत्र के पास लगभग 100 हिन्दू परिवार रहते हैं.

घटना को लेकर कहा जा रहा है कि ईशनिंदा के आरोप में एक 8 वर्षीय विक्षिप्त हिन्दू बच्चे को कोर्ट से जमानत मिलने के विरोध में यह सब किया गया था. तोड़फोड़ की पूरी घटना को कट्टरपंथियों ने सोशल मीडिया पर लाइव प्रसारित भी किया.

यद्यपि पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस गुलजार अहमद ने मंदिर तोड़ने के मामले में पुलिस और अन्य अधिकारियों को फटकार लगाते हुए कहा कि – ‘प्रशासन और पुलिस क्या कर रही थी, जब मंदिर पर हमला किया गया?’ उन्होंने यह भी कहा कि इस हमले से दुनिया भर में पाकिस्तान की छवि को गंभीर नुकसान पहुँचा है. ‘सोचिए कि अगर मस्जिद पर हमला होता तो मुस्लिमों की क्या प्रतिक्रिया होती.’

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है.

वर्ष 2020 में ही घटित कुछ घटनाओं की जानकारी स्थिति को बयां करने के लिए पर्याप्त है….

– 03 जनवरी, 2020 पाक स्थित ननकाना साहिब के पवित्र गुरुद्वारे में तोड़-फोड़ कर अपवित्र करने की कोशिश की गई.

– 26 जनवरी, 2020 में सिंध में स्थित माता रानी भटियानी के मंदिर पर हमला हुआ था, जिसमें कट्टरपंथियों ने भयंकर उत्पात मचाकर मंदिर को क्षतिग्रस्त कर दिया था.

– जुलाई, 2020 में इस्लामाबाद में भगवान कृष्ण के निर्माणाधीन मंदिर पर हमला किया गया.

– अगस्त, 2020 में सिंध प्रांत के ही हनुमान मंदिर को स्थानीय बिल्डरों द्वारा ध्वस्त किया गया .

– अक्तूबर, 2020 में सिंध प्रांत के ही नगरपारकर क्षेत्र में स्थित श्रीराम मंदिर पर हमला कर मंदिर परिसर स्थित दुर्गा माता की प्रतिमा के सिर को धड़ से अलग कर दिया.

– दिसम्बर, 2020 में खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में सौ से अधिक उन्मादियों ने करक जिले के तेरी गाँव में स्थानीय मौलवी के निर्देश पर कृष्ण मंदिर में तोड़-फोड़ कर आग लगा दी थी.

घटनाओं के चलते अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय में एक अजीब सा डर बैठ गया है. आए दिन मंदिर तोड़ने, हिन्दू युवतियों को अगवा कर जबरन धर्म परिवर्तन कर निकाह करने की बढ़ती घटनाओं के कारण मजबूरन पाकिस्तान छोड़ने को विवश हो रहे हैं.

पाकिस्तान अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करने में पूरी तरह से असफल रहा है. हिन्दू आबादी पर होने वाले अत्याचार सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है. कट्टरपंथी पूजा स्थलों को ही नहीं, उनके व्यापार, घर-सम्पत्ति को भी लगातार निशाना बना रहे हैं.

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August 17th 2021, 4:33 pm

गीता स्थली में दिखेगा श्रीकृष्ण का विराट स्वरूप

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गीता स्थली ज्योतिसर में श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप के दर्शन होंगे. विराट स्वरूप का ऊपरी हिस्सा गीता स्थली में पहुंच गया है. यह ज्योतिसर की पवित्र स्थली पर लाइट एंड साउंड शो के सामने पूर्व-दक्षिण दिशा में मुख कर लगाया जाएगा. विराट स्वरूप (करीब 40 फीट की प्रतिमा) लगाने के लिए दस फीट का फाउंडेशन बनाने का काम अक्तूबर में पूरा किया जाएगा. यह करीब 20 फीट गहरा भी होगा.

श्रीकृष्ण भगवान ने महाभारत में ज्योतिसर की धरती पर अजरुन को नीमित कर गीता का संदेश दिया था. कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड ने कृष्णा सर्किट के अंतर्गत स्थल को पर्यटन की दृष्टि से नए रूप में स्थापित करने का फैसला लिया था. विराट स्वरूप लाने के लिए लंबे समय से प्रयास किए जा रहे थे, लेकिन ज्योतिसर में इसको रखने की व्यवस्था नहीं बन पाई थी. विराट स्वरूप का ऊपरी हिस्सा शुक्रवार को तीन ट्रालों में गीता स्थली पर लाया गया. बड़ी क्रेनों की मदद से इसको गाड़ी से उतारा गया. शनिवार को विराट स्वरूप को सुरक्षा की दृष्टि से रख दिया है.

200 करोड़ का प्रोजेक्ट

केडीबी के मानद सचिव मदन मोहन छाबड़ा ने बताया कि ज्योतिसर को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है. कृष्णा सर्किट के अंतर्गत 200 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट है. बिल्डिंग बनाने का काम करीब 80 फीसद पूरा कर लिया गया है. यहां आपन थियेटर भी बनाया जाएगा. इसके अलावा गीता के हाल और अन्य स्थल बनाए जाएंगे. विराट स्वरूप एक महीने पहले बनकर तैयार था. फाउंडेशन वर्क पूरा न होने के चलते इसे नहीं लगाया जा रहा था.

प्रसिद्ध मूर्तिकार राम सूतार ने तैयार किया तैयार

प्रसिद्ध मूर्तिकार राम सूतार ने श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप को तैयार किया है. यह उनकी नोएडा स्थित वर्कशाप में तैयार किया गया है. इसमें 40 फीट का विराट स्वरूप है. इसमें श्रीकृष्ण, भगवान शिव, गणेश, नरसिंह, ब्रह्मा, एग्रीव, हनुमान, परशुराम व अग्निदेव सहित नौ सिर हैं. इसका वजन करीब 33 टन है. इसके अलावा नौ फीट के पैरों के नीचे कमल व शेषनाग की पूंछ है. राम सूतार ने पिछले दिनों ज्योतिसर का दौरा किया था.

ज्योतिसर में श्रीकृष्ण का विराट स्वरूप लगाया जाएगा. इस पर करीब 10 करोड़ रुपये की लागत आएगी. विराट स्वरूप के फाउंडेशन की दिशा को लेकर काम कुछ धीमा चल रहा था. इसको अब पूर्व की बजाय पूर्व-दक्षिण दिशा में लगाया जाएगा. फाउंडेशन का काम अक्तूबर में पूरा कर लिया जाएगा. इसके बाद विराट स्वरूप लगाया जाएगा. गौतम कुमार, एक्सईएन, टूरिज्म

इनपुट – दैनिक जागरण

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August 17th 2021, 4:33 pm

विश्व हिन्दू परिषद ने मेहंदीपुर बालाजी मंदिर अधिग्रहण का विरोध किया, उग्र आंदोलन की चेतावनी दी

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जयपुर. राज्य सरकार के देवस्थान विभाग द्वारा प्रसिद्ध मेहंदीपुर बालाजी मंदिर के अधिग्रहण की मंशा को लेकर जारी नोटिस के बाद सरकार का विरोध बढ़ता जा रहा है. पिछले 2 दिनों से आसपास के गांव के लोगों के विरोध के बाद शनिवार को विश्व हिन्दू परिषद ने सरकार की मंशा का विरोध किया है. विहिप के क्षेत्रीय मंत्री सुरेश उपाध्याय ने राज्य सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि मेहंदीपुर बालाजी मंदिर का अधिग्रहण किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. यदि सरकार ने अपना निर्णय वापस नहीं लिया तो पूरा हिन्दू समाज आंदोलन पर उतरेगा.

उन्होंने कहा कि विहिप अपने स्थापना के समय से ही मंदिरों व संतों का विशेष तौर पर सम्मान करती आई है. विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) का यह स्पष्ट मानना है कि देश में जितने भी मंदिर हैं, वे सरकार के अधिग्रहण में नहीं होकर हिन्दू समाज व परंपरागत चली आ रही पुजारी परंपरा के अधीन ही होने चाहिए. उपाध्याय ने कहा कि मंदिर से होने वाली आय का खर्च भी हिन्दू समाज के उत्थान पर ही होना चाहिए. बड़े दुर्भाग्य की बात है कि पूरे देश में मंदिरों की आय राज्य सरकारें लेकर उसका खर्च दूसरे धर्म के लोगों को दी जाने वाली सुविधाओं पर करती हैं. सैद्धांतिक रूप से विश्व हिन्दू परिषद का मानना है कि सभी मंदिर हिन्दू समाज की संपत्ति हैं और इनका संचालन समाज में संतों के हाथों में ही होना चाहिए.

आंदोलन पर उतरेगा हिन्दू समाज

विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय मंत्री उमाशंकर ने कहा कि बहुत दुख की बात है कि ब्रह्मलीन महंत किशोरपुरी महाराज के अंतिम संस्कार से पहले ही मंदिर की कथित अनियमितताओं को लेकर सरकार की ओर से नोटिस जारी हो गया. यह एक बड़े षड्यंत्र को दर्शाता है. सरकार का यह मानना कि मेहंदीपुर बालाजी स्थान परंपरागत स्थान नहीं है, लेकिन इसका निर्णय सरकार नहीं समाज को करना चाहिए. यहां बाल्यकाल से ही महंत द्वारा बालाजी मंदिर की सेवा-पूजा की जा रही थी. इसके साथ ही यहां के ट्रस्ट द्वारा सेवा के अनेकों कार्य होते रहे हैं, ऐसे में सरकार के निर्णय पर कई प्रश्न चिन्ह लग रहे हैं. विश्व हिन्दू परिषद इसका पुरजोर विरोध करती है. यदि सरकार ने अपना निर्णय वापस नहीं लिया तो हिन्दू समाज को साथ लेकर आंदोलन किया जाएगा.

पूर्व मंत्री व मालवीय नगर से भाजपा विधायक कालीचरण सराफ ने कहा कि कांग्रेस सरकार द्वारा मेहंदीपुर बालाजी मंदिर को अधिग्रहण करने की मंशा को किसी भी स्थिति में सफल नहीं होने दिया जाएगा. जिस भी स्तर पर विरोध की जरूरत पड़ेगी, भाजपा द्वारा वह किया जाएगा.

इस दौरान सेवा भारती के क्षेत्रीय संगठन मंत्री मूलचंद सोनी, विश्व हिंदू परिषद के प्रांतीय अध्यक्ष प्यारेलाल मीणा, जिला मंत्री एडवोकेट खेम सिंह गुर्जर समेत वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने ब्रह्मलीन महंत को पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि दी.

व्यापार मंडल ने दी उग्र आंदोलन की चेतावनी

प्रसिद्ध मेहंदीपुर बालाजी मंदिर के अधिग्रहण को लेकर देवस्थान विभाग द्वारा दिए गए नोटिस के विरोध में लोगों में रोष बढ़ता जा रहा है. विरोध में एक दर्जन गांवों के लोग लामबंद हो गए हैं. शनिवार को भी बालाजी व्यापार मंडल से जुड़े लोगों ने एक धर्मशाला में मीटिंग आयोजित कर सरकार के निर्णय का विरोध जताया. लोगों का कहना था कि बालाजी मंदिर के ब्रह्मलीन महंत किशोरपुरी महाराज द्वारा समाज सेवा के क्षेत्र में अद्वितीय कार्य किए गए थे. उनके सान्निध्य में ट्रस्ट द्वारा पूर्वी राजस्थान के पिछड़े क्षेत्र में बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अनेकों अच्छे कार्य किए गए. इससे समाज में शिक्षा का स्तर बढ़ा है. इसके साथ ही बालाजी धाम के विकास के लिए भी उन्होंने अनेकों कार्य किए थे. वहीं उनके उत्तराधिकारी महंत नरेशपुरी द्वारा ब्रह्मलीन महंत की परंपरा को आगे बढ़ाया जा रहा है. ऐसे में सरकार द्वारा यदि बालाजी मंदिर का अधिग्रहण किया जाता है तो उग्र आंदोलन किया जाएगा. लोगों ने मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजकर अधिग्रहण की कार्रवाई का कड़ा विरोध दर्ज कराया है.

सरकार को दिया था 73 लाख का सहयोग

ज्ञापन में कहा गया कि बड़े दुख की बात है कि एक तरफ ब्रह्मलीन महंत की पार्थिव देह रखी हुई थी कि दूसरी तरफ सरकार ने अधिग्रहण का नोटिस थमाकर लाखों भक्तों की आस्था पर कुठाराघात किया है. ब्रह्मलीन महंत किशोरपुरी समूचे बालाजी कस्बे सहित आसपास के दर्जनों गांवों के पूज्य अभिभावक थे. उनके द्वारा किए गए कार्यों से पूरे क्षेत्र में शिक्षा समेत अन्य सभी क्षेत्रों में विकास हुआ है. मंदिर ट्रस्ट द्वारा कोरोना काल में भी राज्य सरकार को 73 लाख रूपये की आर्थिक सहायता व तीन महीने तक रोजाना एक हजार से अधिक गरीब लोगों को भोजन सहायता देकर सामाजिक सरोकार निभाया था. इन सामाजिक कार्यों की स्वयं मुख्यमंत्री ने भी सराहना की थी.

40 साल पहले नरेशपुरी को बनाया था उत्तराधिकारी

ब्रह्मलीन महंत किशोरपुरी महाराज ने मंदिर ट्रस्ट की व्यवस्थाओं के सुचारू संचालन के लिए 12 अक्तूबर 1979 को नरेशपुरी गोस्वामी को अपना एकमात्र उत्तराधिकारी घोषित किया था. जिसे लेकर अभी तक कोई विवाद की स्थिति भी नहीं है. वहीं ब्रह्मलीन महंत के अंतिम संस्कार की सभी क्रियाएं उत्तराधिकारी महंत नरेशपुरी द्वारा की गई है, जिसे आसपास के दर्जनों गांवों के पंच-पटेलों में सहर्ष स्वीकार करते हुए बालाजी मंदिर का महंत स्वीकार किया है.

देवस्थान की कार्रवाई रोकने की मांग

मेहंदीपुर बालाजी मंदिर की व्यवस्थाओं के सुगम संचालन के बावजूद कथित तौर पर अव्यवस्थाओं का हवाला देते हुए देवस्थान विभाग द्वारा 10 अगस्त को नोटिस देकर जवाब तलब करने से स्थानीय लोगों सहित आसपास के दर्जनों गांवों के लोगों में भारी आक्रोश व्याप्त है. लोगों ने मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजकर मांग की कि हजारों लोगों की जन भावनाओं का सम्मान करते हुए देवस्थान विभाग द्वारा की जा रही कार्रवाई को तुरंत प्रभाव से रोका जाए नहीं तो उग्र आंदोलन किया जाएगा.

इस्लामिक ट्रस्टों का अधिग्रहण सरकार क्यों नहीं करती सरकार

मेहंदीपुर बालाजी मंदिर के अधिग्रहण मामले में सांसद जसकौर मीणा ने कहा कि आज बहुत सारे इस्लामिक ट्रस्ट हैं, जिनका अधिग्रहण सरकार क्यों नहीं करती है. जबकि मेहंदीपुर बालाजी मंदिर ट्रस्ट तो बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने, चिकित्सा, सड़क सहित सामाजिक सरोकार निभाने में पिछले कई दशक से अग्रणी रहा है. उन्होंने कहा कि मेहंदीपुर बालाजी मंदिर हिन्दू धर्म की आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है. पूरे देश के लोग दर्शनों के लिए आते हैं, यहां से करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी हुई है. ऐसे में यदि राज्य सरकार मंदिर अधिग्रहण को लेकर कोई कार्रवाई करती है तो इससे बड़ा दुर्भाग्य नहीं हो सकता.

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August 17th 2021, 4:33 pm

अब फर्रुखाबाद में लगे मकान बिकाऊ के पोस्टर, प्रताड़ना से तंग आकर पंतौजा गांव के परिवारों ने लगाए पोस

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फर्रुखाबाद में मकान बिकाऊ के पोस्टरों से जिला प्रशासन में खलबली है. कुछ परिवारों ने पूर्व प्रधान के उत्पीड़न से तंग आकर पलायन करने का निर्णय लिया है और मकान के बाहर मकान बिकाऊ के पोस्टर चिपका दिए हैं. इससे पहले लखनऊ और कानपुर के विभिन्न क्षेत्रों में भी मकान बिकाऊ के पोस्टर लगने की घटना सामने आ चुकी है.

दरअसल, जहानगंज थाना क्षेत्र के गांव पंतौजा में एक वर्ग विशेष के उत्पीड़न से परेशान होकर पांच परिवारों ने घर के बाहर मकान बिकाऊ होने के पोस्टर लगाए हैं. उन्होंने पूर्व प्रधान के परिजनों पर उत्पीड़न करने का आरोप लगाते हुए कहा कि पुलिस में भी शिकायत की, पर कोई कार्रवाई नहीं हुई.

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार पंतौजा गांव निवासी मानसिंह यादव ने बताया कि विगत 07 अगस्त को पुत्र आशीष अपने मेडिकल स्टोर पर बैठा था. इसी दौरान दूसरे वर्ग का युवक बाइक लेकर आया और जबरन चबूतरे पर चढ़ाते हुए दुकान के काउंटर में टक्कर मार दी. काउंटर क्षतिग्रस्त हो जाने पर आशीष ने ऐतराज जताया तो उसके साथ मारपीट की. आशीष ने बचाव में उसे मारा तो वह कुछ देर बाद अपने 10-15 साथियों के साथ आया और घर में घुसकर परिवार से मारपीट की. इस दौरान हमलावरों ने उसके घर पर जमकर ईंट-पत्थर चलाए और महिलाओं से अभद्रता व मारपीट की. थाने में शिकायत करने पर भी पुलिस ने मामले में कोई कार्रवाई नहीं की.

रिपोर्ट के अनुसार पुलिस द्वारा हमलावरों की गिरफ्तारी न होने पर पूर्व प्रधान के परिवार के लोग गालीगलौज करते हुए धमकी दे रहे हैं. धमकी से परेशान होकर गांव में रहने वाले मान सिंह यादव, अमर सिंह यादव, करन सिंह यादव, सुभाष गुप्ता, कल्लू दिवाकर ने परिवार के साथ पलायन करने का फैसला किया है और घर के बाहर मकान बिकाऊ का पोस्टर लगा दिया है. गांव में मकान बिकाऊ होने के पोस्टर लगने की जानकारी पर गांव पहुंचे मीडिया कर्मियों के साथ भी वर्ग विशेष के लोगों ने मारपीट की. घटना की जानकारी के बाद आनन-फानन थानाध्यक्ष दिनेश कुमार गौतम फोर्स के साथ मौके पर पहुंचे और पड़ताल शुरू कराई है.

थानाध्यक्ष दिनेश कुमार गौतम ने बताया कि 07 अगस्त को दो पक्षों के बीच झगड़ा हो गया था, जिसमें मुकदमा दर्ज करके नदीम उस्मानी सहित पांच आरोपियों का चालान करके भेज दिया था. इसमें मानसिंह, अमर सिंह यादव और कल्लू दिवाकर ने अपने घरों में बोर्ड लगाए हैं. मान सिंह का एक मकान गांव के अंदर आरोपियों के घरों के पास है, जिसे वह बेचने की बात कह रहा है.

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August 17th 2021, 4:33 pm

सेवा भारत की सनातन संस्कृति व दर्शन का प्राण है – डॉ. कृष्णगोपाल

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सेवा कार्यों पर केंद्रित पुस्तक, कॉफी टेबल बुक का विमोचन तथा वृत चित्र का लोकार्पण

नई दिल्ली. कोरोना के अप्रत्याशित संकट से निपटने के लिए राष्ट्रीय सेवा भारती द्वारा समाज के सहयोग से विविध प्रकार के सेवा कार्य संचालित किए गए. यह सेवा कार्य समाज के अंत:करण में प्रेरणा का भाव जागृत करें, इस उद्देश्य से ‘वयं राष्ट्रांगभूता’ (कॉफी टेबल बुक), ‘कोरोना काल में संवेदनशील भारत की सेवा गाथा’ पुस्तक एवं ‘सौ दिन सेवा के’ वृत्तचित्र के रूप में प्रेरणादायी कहानियों का संकलन किया गया है. 17 अगस्त, 2021 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी की उपस्थिति में विशिष्ट संकलनों का विमोचन एवं प्रसारण किया गया. नई दिल्ली के एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध उद्योगपति व समाजसेवी मुकेश गर्ग जी ने की.

कार्यक्रम में डॉ. कृष्णगोपाल जी ने कहा कि ‘‘इस संकलन की पृष्ठभूमि कोरोना की त्रासदी है. वर्तमान पीढ़ी ने पहली बार इस त्रासदी को देखा और अनुभव किया. कोरोना की आपदा कुछ ऐसी थी कि विभिन्न प्रकार के उपकरण, व्यवस्थाएं और शोध पराजित होते दिखे. मनुष्य हतप्रभ, निराश और कहीं न कहीं असमंजस में था. अमेरिका और यूरोप की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाएं असहाय नजर आ रही थीं. भारत के शहर और गांव इससे अछूते नहीं थे. लेकिन भारत ने दुनिया के समक्ष एक उदाहरण प्रस्तुत किया है.

हमारे यहां सरकार और प्रशासन के साथ समाज शक्ति ने अपने दायित्व और कर्तव्यों का जिस प्रकार निर्वहन किया, उसे दुनिया ने देखा. महामारी काल में भारत ने जिस भाव को प्रगट किया, वह दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिला. वह सभी भविष्यवाणियां एक बार पुन: गलत सिद्ध हुईं जो भारत को समझे बिना की जाती हैं. हमारा देश जो भौगोलिक रूप से दिखता है, मात्र वही नहीं है. भारत एक प्रेम की भाषा प्रगट करता है. दुनिया भर को इसने सहकार और संस्कार सीखाया. यह भावनाओं का देश है. कोरोना की त्रासदी में देश की हर सामाजिक और धार्मिक संस्था ने अपने सामर्थ्य के अनुसार सेवा कार्य किए. सेवा हजारों वर्षों से दर्शन और सनातन संस्कार का अभिन्न अंग है. इस आध्यात्म की पूंजी को लेकर ही भारतीय समाज आगे बढ़ता है. संवेदना और सहकार रूपी पूंजी का पश्चिम जगत में अभाव है. यही मौलिक अंतर है. कोरोना की विभीषिका से हम इसलिए भी उठ खड़े हुए क्योंकि दूसरों की सेवा करने में यहां लोगों को आनंद आता है. दुनिया को बोध कराने का दायित्व भी हमारा है. आज दुनिया इस बात का साक्षात्कार कर रही है कि कैसे भारत ने समाज की समवेत शक्ति के आधार पर कोरोना की त्रासदी पर विजय प्राप्त की है.

कार्यक्रम में पन्नालाल जी अध्यक्ष सेवा भारती, ब्रजकिशोर कुठियाला जी अध्यक्ष भारतीय चित्र साधना, कुलभूषण आहुजा जी प्रांत संघचालक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दिल्ली, पराग अभ्यंकर जी अखिल भारतीय सेवा प्रमुख, रामलाल जी अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख, सुधीर जी संगठन मंत्री सेवा भारती, नरेन्द्र जी अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख, सहित अन्य गणमान्य व प्रबुद्धजन उपस्थित रहे.

‘‘समाज सेवा की नई प्रेरणा व ऊर्जा मिलेगी’’

प्रशांत पोल द्वारा संपादित कोरोना काल में संवेदनशील भारत की सेवा गाथा पुस्तक की प्रस्तावना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरकार्यवाह सुरेश (भय्याजी) जोशी जी ने लिखी है. उन्होंने प्रस्तावना के जरिए संकलन को एक अकल्पनीय काल के इतिहास का एक पृष्ठ बताया है. इसी प्रकार ‘वयं राष्ट्रांगभूता’ (कॉफी टेबल बुक) प्राक्कथन में भय्याजी ने कहा कि इस संकलन को देखकर व पढ़कर सभी को समाज सेवा की नई प्रेरणा और ऊर्जा प्राप्त होगी.

वृत चित्र में सामाजिक समरसता की झलक

कार्यक्रम में भारतीय चित्र साधना के सहयोग से तैयार मुख्य वृत चित्र ‘सौ दिन सेवा के’ का प्रसारण किया गया. इसके साथ ही सात लघु वृत चित्र भी विभिन्न सेवाभावी लोगों द्वारा तैयार किए गए हैं. इन सभी वृतचित्र में कोरोना कालखंड में समाज के विभिन्न वर्गों के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों, उसके समाधान के लिए प्रदर्शित सामूहिक एकता का दर्शन होता है. लघु वृत चित्र में कोरोना प्रबंधन : प्रशासन का सहयोग, कोरोना काल : अल्पसंख्यक समाज और सेवा, पूर्वोत्तर भारत : कोरोना काल में सेवा, कोरोना संकट : जनजातीय समाज में सेवा, कोरोना : समाज के उपेक्षित वर्गों की सेवा, कोरोना संकट व स्वाभिमानी घुमंतु समाज, कोरोना संकट : प्रवासी श्रमिकों को राहत जैसे विषयों को सम्मिलित किया गया है.

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August 17th 2021, 4:33 pm

हाजी रफअत अली के जनाजे में भीड़ का मामला, उच्च न्यायालय ने मामले में दर्ज FIR को रिकॉर्ड पर लेने का

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जयपुर. मुस्लिम धर्मगुरु हाजी रफअत अली खान की 01 जून, 2021 को मृत्यु हो गई थी. उस दौरान राज्य में कोविड गाइडलाइंस के अंतर्गत लॉकडाउन था. लेकिन नियमों की अवहेलना करते हुए हाजी रफअत के जनाजे में कांग्रेस विधायक रफीक खान सहित हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए थे. इस मामले में अधिवक्ता अमितोष पारीक व अंगद हक्सर ने प्रकाश ठाकुरिया व जितेश जेठानंदानी की ओर से उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की थी और न्यायालय को मामले से अवगत कराया था. उच्च न्यायालय जिस पर आज हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए पूर्व में दर्ज FIR को रिकॉर्ड में लेने के आदेश दिए.

याचिकाकर्ता प्रकाश ठाकुरिया के अधिवक्ता अमितोष पारीक ने बताया कि 01 जून, 2021 को जब राजस्थान में लॉकडाउन लगा हुआ था और सख्त नियम लागू किए गए थे तथा पूरे प्रदेश में राजस्थान महामारी एक्ट लागू था, ऐसे में राजस्थान सरकार के विधायक रफीक खान की उपस्थिति में मरहूम हाजी के जनाजे में भारी संख्या में भीड़ का होना पूरी तरह से सरकारी आदेशों का उल्लंघन था. जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. जनप्रतिनिधि, राजस्थान पुलिस के अधिकारियों व पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में भीड़ का इकट्ठा होना भारतीय दंड संहिता की धारा 188 का मामला प्रतीत होता है, जिसमें दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है. इस मामले को लेकर हमने माननीय न्यायालय के समक्ष याचिका प्रस्तुत की थी, जिस पर सुनवाई हुई.

इस मामले में याचिका में पक्षकार पत्रकार जितेश जेठानंदानी के वकील अंगद हक्सर ने कहा कि जनाज़े में भीड़ की घटना के अगले दिन एक व्यक्ति द्वारा थाने में FIR दर्ज कराई गई थी, जिस पर उक्त घटना के समय मौजूद राज्य सरकार के विधायक व पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध आगे कोई कार्यवाही नहीं की गई. इसी मामले को लेकर न्यायालय के समक्ष याचिका प्रस्तुत की गई.

यह मामला राजस्थान सरकार के धार्मिक भेदभाव को दर्शाता है. क्योंकि सरकार ने 29 अप्रैल को धौलपुर विधायक द्वारा सामूहिक भोज का आयोजन करने पर उनके विरुद्ध कार्यवाही करते हुए उन्हें तो नोटिस जारी किया था, किंतु हाजी के जनाजे वाले मामले में राज्य सरकार द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई.

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August 17th 2021, 4:33 pm

इंदौर में फिर लवजिहाद, आरोपी ने कहा शादी से पहले कराओ बच्चे का खतना

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इंदौर में लव जिहाद का मामला सामने आया है. फैजान नाम का युवक खुद को कबीर बताकर ब्यूटी पार्लर संचालिका से मिला. बाद में दोस्ती की और चाकू की नोक पर दुष्कर्म किया. महिला ने बच्चे को जन्म दिया. डेढ़ साल बाद शादी की बात आई तो आरोपी ने कहा कि बच्चे का खतना करना पड़ेगा और उसे धर्म बदलकर निकाह करना पड़ेगा. महिला ने इसका विरोध किया तो उसने वीडियो वायरल करने की धमकी दी. पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है.

मामला शहर के कनाडिया थाना क्षेत्र का है. पुलिस के अनुसार 35 वर्षीय महिला की फैजान उर्फ कबीर से वर्ष 2017 में मुलाकात हुई थी. आरोपी उससे यह कहकर मिला था कि उसकी बहन की शादी है. वह उसका मेकअप करवाना चाहता है. फैजान ने इसके बाद कई और कस्टमर लाने का भी झांसा दिया. दोनों में दोस्ती हो गई. फैजान ने कुछ दिन बाद चाकू की नोक पर जबरदस्ती की. इस दौरान उसने वीडियो बनाया.

पीड़िता का आरोप है कि उसके वीडियो वायरल करने और उसे बदनाम करने की धमकी देकर लगातार उसका दैहिक शोषण किया. डेढ़ साल पहले उसने एक बच्चे को जन्म दिया. आरोपी अब महिला और बच्चे पर धर्म परिवर्तन का दबाव बना रहा था.

आरोपी का फर्नीचर का कारोबार

महिला ने सोमवार को इस मामले में शिकायत की. पुलिस ने रेप, धमकाने और धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है. पुलिस ने आरोपी फैजान पुत्र इकबाल खान को मैजेस्टिक नगर से गिरफ्तार कर लिया है. फैजान खान का विजयनगर में फर्नीचर का कारोबार है. पिता इकबाल प्रॉपर्टी का व्यवसाय करता है.

पीड़ित महिला का पहले पति से तलाक हो चुका है. तलाक के बाद से वह बेटे के साथ रह रही थी. ब्यूटी पॉर्लर चला कर अपना जीवनयापन कर रही थी.

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August 17th 2021, 4:33 pm

देवबंद में खुलेगा एटीएस सेंटर, उत्तर प्रदेश सरकार का निर्णय

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लखनऊ. उत्तर प्रदेश सरकार ने देवबंद में एटीएस (एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड) कमांडो सेंटर बनाने का निर्णय लिया है. उत्तर सरकार में सूचना सलाहकार शलभ मणि त्रिपाठी ने एक ट्वीट निर्णय के बारे में बताया. बताया गया कि एटीएस सेंटर में प्रदेश से चयनित डेढ़ दर्जन एटीएस अधिकारियों की नियुक्ति की जाएगी.

शलभमणि त्रिपाठी ने अपने ट्वीट में लिखा -‘तालिबान की बर्बरता के बीच यूपी की खबर भी सुनिए, योगी जी ने तत्‍काल प्रभाव से ‘देवबंद’ में एटीएस कमांडो सेंटर खोलने का निर्णय लिया है. युद्धस्‍तर पर काम भी शुरू हो गया है, प्रदेश भर से चुने हुए करीब डेढ़ दर्जन तेज तर्रार एटीएस अफसरों की यहां तैनाती होगी.

कहा जा रहा है कि देवबंद में एटीएस सेंटर के लिए 2 हजार वर्ग मीटर जमीन भी आवंटित की जा चुकी है. हालांकि, देवबंद से पहले ही लखनऊ और नोएडा में भी कमांडो सेंटर खोलने की तैयारियां चल रही हैं. नोएडा में यह इंटरनेशल एयरपोर्ट और लखनऊ में यह अमौसी एयरपोर्ट के पास स्थित होगा.

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित देवबंद इस्‍लामी शिक्षा का एक बड़ा केंद्र माना जाता है. लेकिन पिछले कुछ सालों में सुरक्षा एजेंसियों ने ऐसे आतंकवादी पकड़े हैं, जिनका संबंध देवबंद से रहा है. साल 2019 में एटीएस ने जैश ए मोहम्‍मद के दो आतंकवादी देवबंद से गिरप्थार किए थे. यहां से बांग्‍लादेशी और आईएसआई एजेंट भी पकड़े जा चुके हैं.

देवबंद के दारूल उलूम में मज़हबी शिक्षा लेने के लिए छात्र अन्य इस्लामिक देशों से भी आते हैं. इसी वजह से देवबंद में अन्य मदरसे भी खुल गए. इन मदरसों में इस्लामिक शिक्षा की तालीम दी जाने लगी. धीरे – धीरे इन मदरसों में मज़हबी शिक्षा लेकर निकलने वाले छात्र आतंक की राह पकड़ने लगे. मौजूदा समय में हालत यह है कि जैश – ए – मोहम्मद जैसे खतरनाक आतंकी संगठन के लिए देवबंद ‘साफ्ट टारगेट’ है. यहां के मदरसों में पढ़ रहे युवकों को आतंकी बनाना, उनके लिए ज्यादा आसान कार्य है.

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August 17th 2021, 4:33 pm

जिला मुख्यालयों में डीडीसी अध्यक्षों ने फहराया राष्ट्रीय ध्वज, बुरहान के पिता ने भी फहराया तिरंगा

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जम्मू कश्मीर. कभी जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा था कि “अनुच्छेद 370 और 35A हटने पर घाटी में कोई तिरंगा उठाने वाला नहीं रहेगा.”

लेकिन, 75वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जम्मू कश्मीर में विभिन्न स्थानों पर न केवल तिरंगा यात्राएं निकलीं, बल्कि हर्षोल्लास के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया. कश्मीर के त्राल जिले के गवर्नमेंट गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल में आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के पिता मुज़फ्फर वानी ने 75वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्र ध्वज फहराया. ध्वजारोहण के बाद स्कूल के शिक्षक और सभी छात्राओं ने राष्ट्रगान भी गाया. बुरहान वानी जुलाई 2016 में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया था.

शिक्षक हैं मुजफ्फर वानी

बुरहान वानी के पिता एक शिक्षक हैं और उन्होंने त्राल में गवर्मेंट गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल में राष्ट्रीय ध्वज फहराया. पूरा देश ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ मना रहा है और जम्मू कश्मीर प्रशासन ने शिक्षा सहित सभी विभागों को यह सुनिश्चित करने को कहा था कि स्वतंत्रता दिवस पर सभी कार्यालयों में राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाए.

कश्मीर के अनंतनाग जिले में 8 जुलाई, 2016 को सुरक्षा बलों ने एक मुठभेड़ में हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादी बुरहान वानी को मार गिराया था. मौत के वक्त उसकी उम्र 22 वर्ष थी. बुरहान वानी दक्षिण कश्मीर के त्राल इलाके के ददसारा गांव का निवासी था. हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल होने के लिए वह 2010 में घर से निकल गया था. बुरहान की गिरफ्तारी के लिए सूचना देने पर उस समय 10 लाख रुपये का इनाम रखा गया था.

कश्मीर घाटी में 75वें स्वतंत्रता दिवस पर एक अलग सा बदलाव और एक अलग माहौल देखने को मिला. घाटी में जगह-जगह लहराते तिरंगे और स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाओं वाले होर्डिंग्स एक अलग ही अहसास दिला रहे थे.

श्रीनगर नगर निगम के मेयर जुनैद मट्टू ने निगम कार्यालय में राष्ट्रीय ध्वज फहराया. श्रीनगर में उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा और जम्मू में सलाहकार राजीव राय भटनागर ने मुख्य समारोह में ध्वजारोहण किया. जिला मुख्यालयों और अन्य जगहों पर तिरंगा फहराया गया. 18 जिला मुख्यालयों में इस बार डीसी की जगह डीडीसी अध्यक्षों ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया.

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August 16th 2021, 9:50 pm

फ़िल्म समीक्षा : भुज – द प्राइड ऑफ इंडिया

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हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में युद्ध और देशभक्ति पर आधारित फ़िल्में बनाने का चलन ज़ोर पकड़ रहा है. लेकिन हर निर्माता सिर्फ़ प्रचलित घटना पर ही फ़िल्म बनाना चाहता है. ऐसे में ‘भुज’ जैसे अनसुने या कम सुने सब्जेक्ट पर फ़िल्म बनाने का रिस्क उठाना अपने आप में एक उदाहरण है.

फिल्म की कहानी 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध की है. इस दौरान पाकिस्तानी सैनिकों ने भुज एयरबेस पर जोरदार हमला किया था, जिसके बाद वहां पास के गांव माधापार में रहने वाली 300 महिलाओं ने अपनी जिंदगी को दांव पर लगाकर इंडियन एयरफोर्स के रनवे की मरम्मत का कार्य किया ताकि वहां भारतीय सैनिक मदद के लिए पहुंच सकें. भुज एयरबेस के स्क्वाड्रन लीडर विजय कार्णिक (अजय देवगन) ने रनवे पट्टी को रिपेयर करने के लिए उन स्थानीय लोगों प्रेरित किया था. यह फिल्म संकट की घड़ी में देश के नागरिकों और सेना के सहयोग का स्मरण करवाती है.

1962 के भारत-चीन युद्ध के परिणाम भले ही भारतीय सेना के पक्ष में न आए हों. लेकिन उस युद्ध में हमारी सेना की बहादुरी के किस्सों के साथ इतिहासकारों और फ़िल्म निर्माताओं ने बखूबी जीवित रखा. 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान के पैटन टैंकों का अकेले सामना करके बलिदान होने वाले सैनिक अब्दुल हमीद और लोंगोवाल पोस्ट पर भारतीय सेना की एक छोटी सी टुकड़ी के बड़े दुस्साहस को भी हमारी पाठ्य पुस्तकों में कुछ ऐसा ही मुकाम हासिल हुआ है.

1999 के कारगिल युद्ध में बलिदान हुए सैनिकों के जोशीले और अनूठे नारे आज के दौर में देशभक्ति की फ़िल्मों के लिए प्रेरणास्तोत्र का बन चुके हैं. इस संदर्भ में फ़िल्म “उरी” सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसका एक नारा ‘हाऊ इज़ द जोश’ सबसे हिट धुनों से भी बड़ा हिट बन गया और सार्वजनिक सभाओं से लेकर खेल के मैदानों और संसद तक में भी गूंजता रहा. इस सप्ताह रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘भुज – द प्राइड ऑफ इंडिया’, युद्ध और देशभक्ति पर बनी फ़िल्मों की उसी कड़ी का अगला हिस्सा है. इसलिए इस फ़िल्म का विश्लेषण एक महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है.

1971 के युद्ध के दौरान भुज एयरबेस पर जो हुआ उसके बारे में शायद ही किसी ने सुना होगा. ‘भुज – द प्राइड ऑफ इंडिया’ फ़िल्म की, फ़िल्म की समीक्षा करते हुए कुछ खास पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा कि यह कोविड-19 महामारी के दौरान बनाई गई एक बड़ी युद्ध फ़िल्म है, जिसके कुछ मुख्य अभिनेता, तारीखों में तालमेल न बैठने की वजह से फ़िल्म से अलग हो गए थे और इन सभी चुनौतियों का सामना करते हुए फ़िल्म को अंजाम तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी एक नवोदित निर्देशक के कंधों पर थी.

सभी सुरक्षा बलों के लिए ‘देशभक्ति के नारे’ ऑक्सीजन का काम करते हैं. यह सुरक्षा बल, धर्म, जाति, लिंग और सामाजिक रुतबे जैसे हर एक भेदभाव को भुला कर, अपनी जान की परवाह किए बिना दुश्मन की बंदूक के आगे निडर होकर डटे रहते हैं. “लड़ो या मरो” के सिद्धान्त का पालन करने वाले मराठा योद्धाओं (विजय कार्णिक) के शौर्य को फ़िल्म में विस्तार से दर्शाया है. लेकिन यह फ़िल्म सिर्फ़ भारतीय वायु सेना अधिकारियों के बारे में नहीं है, माधापुर गांव की लगभग 300 महिलाओं की दिलेरी भी फ़िल्म का एक अहम और दिलचस्प हिस्सा है, जिन्होंने भुज में स्क्वाड्रन लीडर कार्णिक (फ़िल्म में अजय देवगन द्वारा अभिनीत किरदार) की सहायता की थी. हालांकि युद्ध पृष्ठभूमि पर आधारित इस फ़िल्म का ताना-बना कुछ ऐसा है कि जिसमें आम नागरिकों और महिला किरदारों को शामिल करने की गुंजाइश न के बराबर थी, लेकिन सोनाक्षी सिन्हा के किरदार के माध्यम से हमेशा हाशिये पर धकेल दिये जाने वाली गांव की महिलाओं की बहादुरी को याद किया गया है, जो उस मुश्किल समय के दौरान भारतीय वायु सेना की मदद का इकलौता जरिया थीं, जब भुज एयरबेस के संचार और सड़क के सभी कनेक्शन काट दिए गए थे. रनछोड़ पगी इस फ़िल्म में एक महत्वपूर्ण किरदार है, जो 1965 और 1971 युद्ध के दौरान भारतीय सेना के लिए बहुत ज़रूरी और महत्वपूर्ण शख्सियत थे. किसी मायावी इंसान जैसे पगी के किरदार को संजय दत्त ने निभाया है.

फ़िल्म में हल्की सी रोशनी इस मुद्दे पर भी डाली गई है कि 1971 में बांग्लादेश को आज़ाद कराने के दौरान, पश्चिमी सीमा को किस कदर नजरअंदाज किया गया था और उस इलाके में तैनात सैनिकों को उनकी अपनी बहादुरी और किस्मत के भरोसे छोड़ दिया गया था. हर एक सैनिक इस सच्चाई से वाकिफ़ था कि उनके बचने की संभावना न के बराबर थी क्योंकि पाकिस्तान हर मुठभेड़ में सैकड़ों टैंक और हजारों सैनिकों भेजता था.

अब बात करते हैं अजय देवगन की, हालांकि अज्ञात लोगों के किरदार को पर्दे पर निभाना, इतना आसान काम नहीं है. लेकिन अजय ने न सिर्फ़ स्क्वाड्रन लीडर कार्णिक की भूमिका के साथ न्याय किया है, बल्कि अपने दम पर इस फ़िल्म की ओर दर्शकों का ध्यान खींचने में भी सफल रहे हैं.

युद्ध की फ़िल्मों में सहायक किरदार की भूमिका निभाने में संजय दत्त अब माहिर हो चुके हैं. जबकि सोनाक्षी सिन्हा के किरदार को हैंडल करना निर्देशक अभिषेक दुधैया के लिए एक खास चुनौती रहा होगा क्योंकि यह किरदार उनकी अपनी माँ के जीवन पर आधारित है. इस फ़िल्म की लेखन टीम का हिस्सा होने के नाते अभिषेक ने अपनी माँ के उस अनुभव को दिल से महसूस किया होगा. शरद केलकर ने एक बार फिर साबित कर दिया कि स्क्रीन का साइज़ बड़ा हो या छोटा, शरद की मौजूदगी हर किरदार को यादगार बना देती है, जबकि छोटे पर्दे से बड़े पर्दे की ओर रुख़ करने वाले बहुत से अभिनेता ऐसा नहीं कर पाते.

डॉग फाइट सीक्वेंस बड़े हैं, लेकिन वास्तविक लगते हैं. लगता है कि ‘टॉप गन’ के बाद किसी ने ज़्यादा डॉग फाइट्स नहीं देखी है. हवाई हमले के दृश्य बेहतरीन नहीं हैं, लेकिन बुरे भी नहीं हैं. असीम बजाज की सिनेमेटोग्राफ़ी को उनका सबसे अच्छा काम नहीं कहा जा सकता, हालांकि वीएफ़एक्स डिपार्टमेंट की मेहनत का निखार साफ़ दिखाई देता है. भुज एक अच्छी कहानी है, हालांकि फ़िल्म की पटकथा को और असरदार बनाया जा सकता था. डायलॉग में कविता क्षेत्र में ढलने की उल्लेखनीय प्रवृत्ति है. संगीत एक कमी है, और फ़िल्म में गानों की जरूरत नहीं थी.

ऐसा लगता है कि विषय की विशालता ने कहीं-कहीं अभिषेक दुधैया को बेहतर बना दिया है, यही बात फ़िल्म की एडिटिंग के बारे में भी कही जा सकती है. कुल मिलाकर फ़िल्म भुज, ज़्यादातर युद्ध फिल्मों की तरह एक ऐसी फ़िल्म है, जिसका सही आनंद और अनुभव उचित साउंड सिस्टम वाले थिएटर में लिया जाना चाहिए.

अब सवाल यह कि क्या भुज की घटना, एक बेहतर फ़िल्म का रूप ले सकती थी? जवाब में मैं तो यही कहूँगा कि हाँ, बेशक ऐसा हो सकता था. लेकिन एक सच्ची और ईमानदार समीक्षा करते समय मैं उन सभी पहलुओं और चुनौतियों पर ज़रूर गौर करूंगा, इतने पड़े पैमाने की फ़िल्म बनाते हुए जिनका सामना इसके निर्माता और निर्देशक ने किया होगा.

– अतुल पांडे

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August 16th 2021, 2:08 pm

बलिदानियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का अवसर है अमृत महोत्सव – दत्तात्रेय होसबाले

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भोपाल. स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव का पर्व बलिदानी देशभक्तों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का अवसर है. जिनके त्याग और बलिदान के कारण आज हम स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में जागतिक समुदाय में यथोचित स्थान प्राप्त करने की दिशा में बढ़ रहे हैं. स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने रविवार को राजधानी भोपाल में स्थित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रांत कार्यालय में झंडावंदन कर समारोह को संबोधित किया.

उन्होंने कहा कि महर्षि अरविंद ने कहा था – भारत को जागना है. अपने लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए और मानवता के लिए, उनकी यह घोषणा सत्य सिद्ध हुई. भारत की स्वतंत्रता विश्व के अन्य देशों के स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा बन गई. भारत की स्वतंत्रता से प्रेरणा लेकर एक के बाद एक सभी उपनिवेश स्वतंत्र होते चले गए और ब्रिटेन का कभी न छिपने वाला सूर्य सदैव के लिए अस्त हो गया.

उन्होंने कहा लोकतंत्र की मजबूती के लिए, भारत के उत्थान के लिए और विश्व मानवता के उद्धार के लिए हम इस अमृत महोत्सव के शुभ अवसर पर अपने जीवन में कुछ करने और उसकी सफलता प्राप्त करने की अनुभूति प्राप्त करें. इस विचार को लेकर हम आजादी के इस पर्व को उत्साह के साथ मनाएं. साथ ही भारत की स्वतंत्रता के लिए जिन लोगों ने बलिदान दिए हैं, जिनके परिवार नष्ट हो गए, उनके बलिदान को भी हम ना भूलें. उनके प्रति हमारे मन में सदैव कृतज्ञता और धन्यवाद का भाव रहे. इस अवसर पर भोपाल महानगर के गणमान्य नागरिक एवं विशिष्ट जन उपस्थित रहे.

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August 16th 2021, 2:08 pm

सभी परिवारों में होनी चाहिए ‘लोक पूजन विधि’ पुस्तक

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भोपाल. संस्कृति दर्शन समिति के तत्वाधान में आयोजित कार्यक्रम में लेखक जगराम सिंह की पुस्तक ‘लोक पूजन विधि’ का विमोचन किया गया. विश्व संवाद केंद्र के मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी सभागार में आयोजित विमोचन समारोह में करुणाधाम आश्रम भोपाल के महंत सुरेश शांडिल्य, लेखक जगराम सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. खेम सिंह डहेरिया और सामाजिक कार्यकर्ता विजय शर्मा उपस्थित रहे. पुस्तक का प्रकाशन अर्चना प्रकाशन, भोपाल ने किया है.

लेखक जगराम जी ने बताया कि उनके मन में शुरू से ही एक वेदना रही है कि पूजन सही पद्धति से होना चाहिए. लेकिन सामान्य व्यक्ति को पूजन की विधि पता नहीं होती. इसलिए उन्होंने यह पुस्तक लिखी. इस पुस्तक में सभी तीज-त्योहार और देवी-देवताओं की पूजन विधि दी गई है.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि महंत सुरेश शांडिल्य ने कहा कि कोई भी कार्य ईश्वर की प्रेरणा के बिना नहीं होता. यह पुस्तक ऐसी प्रेरणा से लिखी गई है कि पूजन करते समय मन यहां-वहां भागता है. पूजन विधि बताती है कि आपका मन किस अवस्था में है. यह पुस्तक सभी परिवारों में होनी चाहिए.

विशिष्ट अतिथि प्रो. खेमसिंह डेहरिया ने कहा कि यह पुस्तक प्रत्येक परिवार के लिए बेहद उपयोगी साबित होगी. पुस्तक में पूजन करने की विधि को आसान तरीके से समझाया गया है. लेखन से ही हमारी संस्कृति का प्रचार-प्रसार पूरे विश्व में हुआ.

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विजय शर्मा ने कहा कि समाज के लिए सदसाहित्य होना चाहिए जो समाज को प्रेरणा देने का कार्य करे. जगराम जी ने लोक पूजन विधि पुस्तक का लेखन करके प्रशंसनीय कार्य किया है. अर्चना प्रकाशन के निदेशक ओम प्रकाश गुप्ता ने स्वागत भाषण दिया. आभार प्रदर्शन अरविंद श्रीवास्तव ने किया.

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August 16th 2021, 2:08 pm

1 लाख से अधिक ध्वजारोहण कर ऐतिहासिक बना ‘एक गाँव एक तिरंगा अभियान’

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नई दिल्ली. अंडमान निकोबार द्वीप से लेकर मणिपुर के मोइरंग तक और जम्मू-कश्मीर के बारामूला से लेकर मलकानगिरी ओडिशा के सुदूर नवरंगपुर तक, लाखों नागरिकों ने 75वें स्वतंत्रता दिवस उत्सव में भाग लिया. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के “एक गांव, एक तिरंगा” अभियान में देश भर में 1 लाख से अधिक स्थानों पर तिरंगा ध्वज फहराया गया.

अभियान के निमित्त देश के अलग-अलग स्थानों को चिन्हित कर वहां लोगों के साथ ध्वजारोहण किया गया तथा शोभा-यात्रा, सामूहिक राष्ट्र-गान गायन, भारत माता पूजन, सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा प्रतियोगिताओं आदि के माध्यम से आम जनमानस में देशभक्ति की भावना के प्रकटीकरण का भी कार्य किया गया.

अभाविप का मानना है कि देश को स्वतंत्रता दिलाने में देश के प्रत्येक नागरिक का योगदान रहा है. परंतु कुछ लोगों द्वारा यह कुछ चुनिंदा लोगों की उपलब्धि तक ही सीमित कर दिया गया. ऐसे में अभाविप के कार्यकर्ताओं ने देश के प्रत्येक जिले में ध्वजारोहण कर स्वाधीनता के इस अमृत उत्सव को मनाने के साथ-साथ देश के गुमनाम नायकों की कहानियां लोगों को बताते हुए स्वाधीनता के गुमनाम नायकों का  समरण किया.

कार्यकर्ताओं ने इस महाअभियान में पूरे देश के विभिन्न स्थलों पर सम्मान के साथ राष्ट्रीय ध्वज को फहराया. वहीं सूर्यास्त के पूर्व ध्वज के अवतरण को सुनिश्चित किया. अभाविप ने महाभियान के अंतर्गत लद्दाख से लेकर कन्याकुमारी तथा अटक से लेकर कटक तक ध्वजारोहण किया. जिसमें बड़ी संख्या में लोगों की सहभागिता रही.

“अभाविप के कार्यकर्ताओं का देश भर में यह प्रयास अभिभूत करने वाला है. देश स्वाधीनता के 75वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है. इस वर्ष के प्रारंभ को ही अभाविप के कार्यकर्ताओं ने जिस उत्साह के साथ मनाया है. वह अपने-आप में प्रेरणादायी है. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा सम्पूर्ण वर्ष ऐसे विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता रहेगा.”

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August 16th 2021, 2:08 pm

सदैव अटल – सबको दिशा देने वाले भारतरत्न अटल बिहारी वाजपयी

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सूर्य प्रकाश सेमवाल

अजातशत्रु और सार्वकालिक लोकप्रिय राजनेता होने के साथ एक श्रेष्ठ कवि, कुशल वक्ता और आदर्श सांसद भारत के पूर्व प्रधानमंत्री भारतरत्न अटल बिहारी वाजपयी की तृतीय पुण्यतिथि पर सादर नमन. इस वर्ष भारत आजादी का अमृत उत्सव मना रहा है. कोरोना से दो हाथ करने के साथ आत्मनिर्भर भारत वैश्विक प्रगति, उन्नति और समृद्धि की ओर अग्रसर है. अटलजी के सहयात्री और भारतीय जनता पार्टी के मार्गदर्शक पूर्व उप-प्रधानमंत्री 93 वर्षीय लालकृष्ण आडवाणी स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर अटल जी जैसे  वैचारिक योद्धा के दर्शन और रीति नीति  को लेकर आगे बढ़ रही सरकार की प्रशंसा कर गौरव महसूस कर रहे हैं.

भारत की चर्चा वैश्विक स्तर पर हो रही है. किंतु नीति, नेता और मुद्दों से वंचित विपक्ष यह सब हजम नहीं कर पा रहा है. विपक्षी पार्टियां विशेषकर सरकार के विरोध के नाम पर संसद के दोनों ही सदनों में गतिरोध और हो-हल्ला मचा रही हैं. विपक्ष इससे भी आगे अमर्यादित आचरण तक भी पहुँच गया है. ऐसे में अटल जी की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है. देश की संसद के अंदर और जनता के हृदय में पाँच दशक से ज्यादा राज करने वाले लोकप्रिय नेता पूर्व प्रधानमंत्री भारतरत्न अटल बिहारी वाजपयी जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी बखूबी समझते थे. पं. नेहरू से लेकर इंदिरा, राजीव और सोनिया गांधी की कांग्रेस तक के कालखण्ड में 50 वर्ष तक विपक्षी राजनीति की धुरी और जनमन के स्वर को मुखरित करने वाले अटल जी का आचरण, उनका व्यवहार और उनके भाषण एवं विचार एक दीर्घकालिक लोकतांत्रिक दर्शन का जीवंत दस्तावेज कहे जा सकते हैं. अटल जी ने संसद के अंदर नैतिकता और माननीयों का कैसा आचरण हो, ऐसी जो सीख दी है वो भारतीय लोकतंत्र और संसदीय आचरण के लिए सदैव अनुकरणीय रहेगी.

अभी समाप्त हुए संसद के मानसून सत्र में कांग्रेस, तृणमूल, आप, कम्युनिस्ट पार्टी और अन्य विपक्षी दलों से जुड़े सांसदों ने खासकर राज्यसभा में विरोध के नाम पर जो अराजकता और सड़कछाप व्यवहार दिखाया, अटलजी होते तो अत्यधिक दुखी और निराश होते.

देश की प्रबुद्ध जनता संसद के अंदर वर्तमान दौर में हो रही नौटंकी और स्तरहीन हो गई चर्चा में अनायास और सायास अटल जी को तो याद करेगी ही. परिवार, जाति विरादरी और तुष्टीकरण की राजनीति वालों पर अटल जी सद्य भारी पड़े. देश की संसद के अंदर अपनी सोच के अनुकूल और प्रतिकूल तथा देश की जनता के कल्याण से जुड़े हर मुद्दे पर अटल जी ने तथ्यों और तर्कों के साथ सुलझी और परिपक्व चर्चा की. चाहे देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के साथ संसद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में साम्प्रदायिक आधार पर हुए चुनावों पर बहस का मुद्दा हो अथवा इंदिरा गांधी के समय देश में कई स्थानों पर हुए दंगों पर बेबाकी से सदन में अपनी राय रखने की बात. अटल जी ने सदैव देशहित में दूरदर्शितापूर्ण विधानों की वकालत की और वोटों के लिए तुष्टीकरण का विरोध. 70 के दशक में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उपस्थिति में ही उन्होंने सारी संसद को चेता दिया था – “सांप्रदायिकता को वोटों का खेल बना दिया गया है. मैं राजनीतिक दलों को चेतावनी देना चाहता हूं कि मुस्लिम संप्रदाय को बढ़ावा देकर अब आपको वोट भी नहीं मिलने वाले हैं”. (14 मई, 1970 को लोकसभा में देश में सांप्रदायिक तनाव से उत्पन्न स्थिति पर चर्चा में भाग लेते हुए).

देश में आजादी के बाद से ही दक्षिणपंथी दलों और सांस्कृतिक संगठनों पर सुनियोजित तरीके से सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का आरोप लगाया जाता रहा. कांग्रेस ने वामपंथियों के सहारे समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित भाव से काम करने वाले सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके आनुषांगिक संगठनों पर सदा हमला किया और उनके दुष्प्रचार में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी. जब जनसंघ पर सदन में भी ऐसे निराधार आरोपों पर चर्चा हुई तो अटल जी ने बेबाक होकर तर्क के साथ अपनी बात रखी – “भारतीय जनसंघ एक असांप्रदायिक राज्य के आदर्श में विश्वास करता है. जिन्होंने मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन कर लिया, वे हमारे ऊपर आक्षेप करने का दु:साहस न करें. इनकी सरकार मुस्लिम लीग के भरोसे टिकी है और हमको संप्रदायवादी बताते हैं. जो चुनाव में सांप्रदायिकता के आधार पर उम्मीदवार खड़े करते हैं, वे हमको संप्रदायवादी बताते हैं. जो भारत को रब्बात के सम्मेलन में ले जा करके अपमान का विषय बनाते हैं, वे हमें संप्रदायवादी बताते हैं.” (14 मई, 1970)

अटल बिहारी वाजपयी सत्तारूढ़ तंत्र के समक्ष सांप्रदायिकता और तुष्टीकरण को बार-बार तर्क के साथ उठाते रहे और देशहित में सच्चाई को बयां करने से कभी नहीं चूके. वे सांप्रदायिकता से लड़ने का ढोंग करने वाले कांग्रेसियों और वामपंथियों को उसी दौर से लताड़ने लगे थे, जब साठ के दशक में देश की संसद में युवा जनप्रतिनिधि के रूप में उन्होंने प्रवेश किया था. तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने उन्हें भावी प्रधानमंत्री होने की घोषणा यूं ही नहीं की थी. उदारमना अटल देश में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता के साथ हिन्दू-मुसलमान के साथ समान व्यवहार की पक्षधरता पर जोर देते रहे – “हम न भेदभाव चाहते हैं, न पक्षपात चाहते हैं. हमने संविधान की समान नागरिकता को स्वीकार किया है. भारतीय जनसंघ के दरवाजे भारत के सभी नागरिकों के लिए खुले हैं. लेकिन अगर कोई मुसलमान जनसंघ में आता है तो दिल्ली में उसके खिलाफ पोस्टर लगाए जाते हैं कि वह एक काफिर हो गया है. जो भाषा मुस्लिम लीग बोलती थी. मौलाना आजाद और अन्य राष्ट्रवादी मुसलमानों के खिलाफ, आज वही भाषा जनसंघ में आने वाले मुसलमानों के खिलाफ बोली जा रही है. सांप्रदायिकता से लड़ने का यह तरीका नहीं है.” (14 मई,1970)

देश की आजादी के बाद विभिन्न वैधानिक संस्थानों और सरकारी समितियों में किस प्रकार सत्ताधारी तंत्र ने हिन्दुत्ववादी विचारधारा के पोषक संगठनों और लोगों को दरकिनार करते हुए इन संस्थाओं के माध्यम से उन्हें निपटाने की योजना बनाई थी, इससे बखूबी परिचित वाजपयी जी ने राष्ट्रीय एकात्मता परिषद में शामिल लोगों पर भी प्रश्न खड़े किए जो सर्वथा उपयुक्त एवं प्रासंगिक थे – “प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय एकात्मता परिषद का प्रारंभ किया था. लेकिन उसे मेरे दल के विरुद्ध प्रचार करने का एक हथियार बनाया गया. मैं चाहता हूं कि राष्ट्रीय एकात्मता परिषद का विस्तार किया जाए.” (14 मई, 1970)

आंख मूंदकर मुस्लिम कट्टरवाद पर मौन और आत्मरक्षा में अपनी बात रखने वाले हिन्दू संगठनों को सांप्रदायिक घोषित करने की वोट बैंक नीति पर गंभीरता के साथ उन्होंने जो चेतावनी दी, वह आज भी प्रासंगिक और उतनी ही प्रभावशाली दिखाई पड़ती है –

“राष्ट्रीय एकात्मता परिषद में एस.सी. छागला, हमीद देसाई, डॉ. जिलानी और अनवर देहलवी जैसे राष्ट्रवादी नेता लिए जाएं. प्रधानमंत्री किसको लें, यह प्रधानमंत्री की कृपा पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. मैं पूछना चाहता हूं क्या प्रधानमंत्री मुस्लिम संप्रदायवादियों के बारे में कुछ कहने के लिए तैयार हैं. यह बात छिपी हुई नहीं है कि भिवंडी में तामीर-ए-मिल्लत ने वातावरण बिगाड़ा है. लेकिन क्या किसी ने तामीर-ए-मिल्लत का नाम लिया. शिवसेना की आलोचना हो रही है, होनी चाहिए… हमें भी लपेटा जा रहा है. लेकिन हम उसकी चिंता नहीं करते हैं. हम प्रधानमंत्री की कृपा से इस सदन में नहीं आए हैं. उनके बावजूद आए हैं. इस राष्ट्र की जनता का हम भी प्रतिनिधित्व करते हैं. लेकिन जब किसी मुस्लिम संप्रदायवादी संगठन का सवाल आता है तो मुंह में ताले पड़ जाते हैं, सांप सूंघ जाता है. जमाते-उल-उल्मा क्या कर रही है? जमाते-इस्लामी क्या कर रही है? तामीर-ए-मिल्लत ने भिवंडी में क्या किया? लेकिन है कोई बोलने वाला?” (14 मई, 1970)

देश में बढ़ती सांप्रदायिकता के प्रासंगिक तत्व अटल जी ने उस जमाने में ही अर्थात इंदिरा जी के सत्तारूढ़ रहते, कांग्रेस के विभाजन के बाद संप्रदायवादियों और वामपंथियों से कांग्रेस के गठजोड़ में ढूंढ निकाले थे – “क्या हर सवाल को राजनीति की कसौटी पर कसा जाएगा? जबसे कांग्रेस का विभाजन हुआ है, देश में संप्रदायवादियों और साम्यवादियों का गठबंधन बढ़ गया है और उनको प्रधानमंत्री का वरदहस्त प्राप्त है. यह है संप्रदायवाद के बढ़ने का कारण?” (14 मई, 1970)

महाराष्ट्र के भिवंडी में हुए दंगों पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को जनसंघ के अध्यक्ष और सदन के नेता अटल जी ने 14 मई, 1970 को संसद में एक लंबी चर्चा में निरुत्तर कर दिया था. आज संसद में असहिष्णुता के नाम पर मोदी सरकार को घेरने के बहाने जो काम कांग्रेस सहित समूचे विपक्ष ने किया और दोनों ही सदनों के दो-दो सत्र हो-हल्ले में स्वाहा कर दिए उसकी भनक मानो अटल जी को चार दशक पूर्व से ही प्रतीत होती दिखाई पड़ रही थी. भारत के वामपंथी नेताओं और कांग्रेस पर क्षुद्र मानसिकता का पोषक होने की खुली घोषणा करते वे नहीं चूके – “हमें देश के भीतर काम करने वाले पाकिस्तानी तत्वों पर नजर रखनी होगी और कम्युनिस्ट पार्टी के उस हिस्से पर भी नजर रखनी होगी जो चीनपरस्त है और चीनपरस्त होने के कारण आज पाकिस्तान परस्त हो रहा है. मुझे खेद है कि कलकत्ता के दंगों के संबंध में जो बातें कही गईं, वे एकतरफा हैं और एकतरफा बातें यह बताती हैं कि हम ऐसा प्रचार करना चाहते हैं जो प्रचार न तो सत्य पर आधारित है और न राष्ट्र के हितों के लिए काम में आ सकता है. ऐसे प्रचार से हमको सावधान रहना चाहिए.” (13 फरवरी, 1964 को राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव देते हुए)

भारतीय लोकतंत्र की विडंबना देखिए जहां एकतरफा बातों और दुष्प्रचार से कुछ लोगों के इशारों पर पूरे देश की संसद को अटल जी के समय भी बाधित किया जाता रहा और आज भी क्षुद्र राजनीति के लिए विपक्ष में रहकर यह अवरोध, गतिरोध हिंसक तांडव तक पहुंच गया है.

केवल कुर्सी को महत्त्व और देश को पीछे रखने की सोच वाली मानसिकता तथाकथित अभिव्यक्ति के खतरे के साथ-साथ असहिष्णुता के माहौल को रचने में सारी ऊर्जा लगती आई है. देश की जनता के हितों का हनन कर संसद में हो रहे विपक्ष के इस हिंसक तांडव से जनता को छलावा और धोखा ही मिलता है. आजादी के बाद से ही शुरू हुई सत्ता में बैठे रहने की इस लालसा पर अटल जी कटाक्ष करते दीखते हैं – “हमें इन दंगों को पार्टी का चश्मा उतारकर देखना होगा और मैं चाहता हूं कि कामरेड डांगे चश्मे को उतारकर इन दंगों को देखें. मुझे खुशी है कि उन्होंने अपना चश्मा उतार लिया – दलगत स्वार्थों को अलग रखकर इस पर विचार करना होगा, वोटों की चिंता को छोड़कर राष्ट्र को बचाने की चिंता करनी होगी.” (14 मई, 1970)

सांप्रदायिकता को अलग-अलग रूप से व्याख्यायित करने वालों को उलाहना देते हुए अटलजी ने इसे भावी पीढ़ियों के लिए नुकसानदायक बताते हुए सदन में जनता की अपेक्षा पर खरी उतरने वाली भूमिका निभाने का आह्वान  किया – “क्या हम देश की एकता का विचार करके नहीं चल सकते? यह विवाद इस बात को स्वीकार करेगा कि यह सदन, इस सदन में जिन दलों को प्रतिनिधित्व मिला है वे दल और उन दलों के प्रवक्ता इस महत्वपूर्ण समस्या पर कैसा दृष्टिकोण अपनाते हैं. हमें सच्चाई का सामना करना होगा. सच्चाई कितनी भी कठोर हो, कितनी भी भयानक हो, उसका उद्घाटन करना पड़ेगा. आज लाग-लपेट से काम नहीं चलेगा, किसी के पाप के ऊपर पर्दा डालने की आवश्यकता नहीं है.” (14 मई, 1970)

कुल मिलाकर देश की संसद के अंदर और जनता के हृदय में पाँच दशक से ज्यादा राज करने वाले लोकप्रिय नेता पूर्व प्रधानमंत्री भारतरत्न अटल बिहारी वाजपयी जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी बखूबी समझते थे. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपयी के संसद की महत्ता को प्रमाणित करने, गरिमा बढ़ाने वाले इन विचारों को यदि आज का विपक्ष थोड़ा भी आत्मसात कर ले तो देश की जनता का भी भला होगा और इन सत्तालोलुप दलों को अपने पुराने कृत्यों के पश्चाताप का अवसर भी मिल जाएगा.. राष्ट्र गौरव अटलजी को नमन.

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August 16th 2021, 2:08 pm

पुण्यस्मरण – जिनके व्यक्तित्व की कोई थाह नहीं

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जयराम शुक्ल

आज की उथली राजनीति और हल्के नेताओं के आचरण के बरक्स देखें तो अटल बिहारी वाजपयी के व्यक्तित्व की थाह का आंकलन कर पाना बड़े से बड़े प्रेक्षक, विश्लेषक और समालोचक के बूते की बात नहीं. वाजपयी जी शुचिता की राजनीति के जीवंत प्रतिमूर्ति हैं. अटल जी को इहलोक से मुक्त हुए दो साल पूरे हुए. आज उनकी  पुण्यतिथि है.

स्वतंत्रता के बाद जिन नेताओं के व्यक्तित्व की समग्रता का असर देशवासियों पर रहा, उनमें से  अटल बिहारी वाजपयी शीर्ष पर हैं. हमारी पीढ़ी ने पं. नेहरू के बारे में पढ़ा व सुना है और अटलजी को विकट परिस्थितियों के साथ दो-दो हाथ करते देखा है.

पंडितजी स्वप्नदर्शी थे. जबकि अटलजी ने भोगे हुए यथार्थ को जिया है. एक अत्यंत धनाढ्य वकील के वारिस पंडित जी पर महात्मा गांधी जैसे महामानव की छाया थी और आभामंडल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास. जबकि अटल जी की राजनीति गांधी जी की हत्या के बाद उत्पन्न ऐसी विकट परिस्थितियों में शुरु हुई, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ के खिलाफ शंका का वातावरण निर्मित व प्रायोजित किया गया था.

जन के सरोकारों के प्रति अटलजी का समर्पण, निष्ठा ने ही साठ के दशक में प्रतिपक्ष की राजनीति का शुभंकर बना दिया था. बचपन में हम लोग सुनते थे – ‘अटल बिहारी दिया निशान, मांग रहा है हिन्दुस्तान’… हाल यह कि जो संघ या जनसंघ को पसंद नहीं करता था, उसके लिए भी अटल जी आंखों के तारे थे.

वे 1957 में उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से उपचुनाव के जरिए लोकसभा पहुंचे और 1977 तक लोकसभा में भारतीय जनसंघ के संसदीय दल के नेता रहे. अजातशत्रु शब्द यदि किसी के चरित्र में यथारूप बैठता है तो वे अटल जी हैं. दिग्गज समाजवादियों से भरे प्रतिपक्ष में उन्होंने अपनी लकीर खुद तैयार की. वे पंडित नेहरू और डॉ. लोहिया दोनों के प्रिय थे.

वाक्चातुर्य और गांभीर्य उन्हें संस्कारों में मिला. वे श्रेष्ठ पत्रकार व कवि थे ही. इस गुण ने राजनीति में उन्हें और निखारा. अपने कविरूप का हुंकार भरते हुए उन्होंने परिचयात्मक शैली में कहा था – ‘मेरी कविता जंग का ऐलान है, पराजय की प्रस्तावना नहीं, वह हारे हुए सिपाही का नैराश्य निनाद नहीं, वह आत्मविश्वास का जयघोष है.’

अटल जी ने एक राजनेता के तौर पर भी इसी भावना को आत्मसात किया. उनकी वक्तव्य कला मोहित और मंत्रमुग्ध करने वाली थी, जो जनसंघ व कालांतर में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं में करो या मरो, संभावनाओं और उत्साह का जोश जगाती रही.

वह प्रसिद्ध उक्ति न सिर्फ भाजपा के कार्यकर्ताओं को याद है. बल्कि अटलजी के चाहने वालों को आज भी उद्धेलित करती है. 06 अप्रैल, 1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन के समय मुंबई अधिवेशन में उद्घोष किया – ‘अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा.’ इसके बाद से कमल खिलता ही रहा.

यह अटलजी की दूरदृष्टि ही कि उनकी पहल पर पार्टी के सिद्धांतों में ‘गांधीवादी समाजवाद के प्रति निष्ठा’ का नीति निर्देशक तत्व जोड़ा गया. अटल जी को इस बात का आभास था कि यदि भाजपा को राजनीतिक अस्पृश्यता के बाहर करना है तो गांधी के मार्ग पर चलना होगा.

वे 1977 के जनता पार्टी के गठन और उसके अवसान से आहत तो थे, पर उनका अनुमान था कि बिना गठबंधन के ‘दिल्ली’ हासिल नहीं हो सकती. सत्ता की भागीदारी के जरिए फैलाव की नीति, कम्युनिस्टों से उलट थी. इसलिए वीपी सिंह सरकार में भी भाजपा को शामिल रखा. जबकि यह गठबंधन भी लगभग जनता पार्टी पार्ट-टू ही था. 1980 में जनसंघ घटक दोहरी सदस्यता के सवाल पर जनता पार्टी से बाहर निकला था और 1989 की वीपी सिंह की जनमोर्चा सरकार से राममंदिर के मुद्दे पर.

1996 में 13 दिन की सरकार ने भविष्य के द्बार खोले. तब अटल जी ने अपने मित्र कवि डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन जी की इन पंक्तियों को दोहराते हुए खुद की स्थिति स्पष्ट की थी. ”क्या हार में क्या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं. संघर्ष पथ में जो मिले, यह भी सही, वह भी सही.’’ ये पंक्तियां अटल जी के समूचे व्यक्तित्व के साथ ऐसी फिट बैठीं कि आज भी लोग इन पंक्तियों का लेखक अटल जी को ही मानते हैं न कि सुमन जी को.

अटल जी ने गठबंधन धर्म का जिस कुशलता और विनयशीलता के साथ निर्वाह किया. शायद ही अब कभी ऐसा हो. वे गठबंधन को सांझे चूल्हे की संस्कृति मानते थे. एक रोटी बना रहा, दूसरा आटा गूंथ रहा तो कोई सब्जी तैयार कर रहा है, वह भी अपनी शैली में और फिर मिश्रित स्वाद न अहम् न अवहेलना.

अटलजी का व्यक्तित्व ऐसा ही कालजयी था कि असंभव सा दिखने वाला 24 दलों का गठबंधन हुआ, जिसमें पहली बार दक्षिण की पार्टियां शामिल हुईं. 1998 में जयललिता की हठ से एक वोट से सरकार गिरी. अटल बिहारी बाजपेयी ने कहा जनभावनाएं संख्या बल से पराजित हो गईं, हम फिर लौटेंगे और एक वर्ष के भीतर ही चुनाव में वे लौटे भी और इतिहास भी रचा.

अपने राजनीतिक जीवन में अटल जी ने कभी किसी को लेकर ग्रंथि नहीं पाली. पार्टी में उनकी विराटता के आगे सभी बौने थे. फिर भी उन्होंने आडवाणी जी और मुरली मनोहर जोशी को अपने बराबर समझा. कई मसलों में तो वे आडवाणी के सामने भी विनत हुए.

सन् 1971 में बांग्ला विजय पर उन्होंने इंदिरा जी की मुक्तकंठ से प्रशंसा की. लोकसभा में रणचंडी कहकर इंदिरा जी का अभिनंदन किया. उन्हीं इंदिरा जी ने आपातकाल में वाजपयी जी को जेल में भी डाला.

मुझे नहीं मालुम कि अटल जी ने कभी किसी पर व्यक्तिगत टिप्पणी की या राजनीतिक हमले किए हों. राष्ट्रहित की बातें उन्होंने दूसरों से भी लीं. इंदिरा जी के परमाणु कार्यक्रम को उन्होंने आगे बढ़ाया व 1998 की तेरह महीने की सरकार के दरम्यान पोखरण विस्फोट किए. किसी की परवाह किए बगैर देश को वैश्विक शक्ति बनाने में लगे रहे.

दिल्ली से लाहौर तक बस की यात्रा की, जवाब में कारगिल मिला. पाकिस्तान को छोटा भाई मानते हुए जब-जब भी गले लगाने की चेष्ठा की, उसका परिणाम उल्टा ही मिला. अक्षरधाम, संसद हमला, एयर लाइंस अपहरण, इन सबके बावजूद भी उन्होंने जनरल परवेज मुशर्रफ को आगरा वार्ता के लिए बुलाया. लगता है अचेतन मन से आज भी अटल जी यही कह रहे हों कि हे प्रभु, उन्हें माफ करना क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं.

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August 16th 2021, 2:08 pm

देश स्व-निर्भर होगा, तभी सुरक्षित रह सकता है – डॉ. मोहन भागवत

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मुंबई. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि हमारे देश को स्वतंत्रता मिली, लेकिन इस स्वतंत्रता को बरकरार रखने के लिए नागरिकों को योग्य बनने की आवश्यकता है. इस योग्यता का बोध हमें हमारे राष्ट्रीय ध्वज के रंग से मिलता है. हमें समग्र समृद्धि के लिए अपने जीवन में इन रंगों का उपयोग करके सभी को अपने साथ ले जाना है. देश को स्व-निर्भर, स्वावलम्बी बनाना है. देश स्व-निर्भर होगा, तभी सुरक्षित रह सकता है.

डॉ. मोहन भागवत ७५वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राजा शिवाजी विद्यालय, इंडियन एजुकेशन सोसाइटी, दादर (मुंबई) द्वारा आयोजित समारोह में संबोधित कर रहे थे. इस अवसर पर संस्था के अध्यक्ष अरविंद वैद्य, महासचिव शैलेंद्र गाडसे, सतीश नायक आदि मान्यवर उपस्थित रहे.

सरसंघचालक जी ने कहा कि हमारी आर्थिक दृष्टि का लक्ष्य सभी की खुशी है. उसके लिए भौतिक इच्छाओं की संतुष्टि और सभी के सुख के परमलक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, हमारे भीतर संतुष्टि प्राप्त करने के लिए बल की आवश्यकता होती है, और बल अर्थ साधनों से आता है. स्व-निर्भर बनते हुए हमारा ध्यान उत्पादन की उत्कृष्टता पर होना चाहिए. छोटे और बड़े उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए. जो हमारे देश में उत्पादित नहीं होता, जो अतिआवश्यक है, वही हमें निर्यात करना है और वह भी अपनी शर्तों पर लेना है.

राष्ट्रीय ध्वज के शीर्षस्थान का केसरिया रंग त्याग, कर्म, प्रकाश की दिशा में ले जाने की प्रेरणा देता है. यही हमारा लक्ष्य है. हम दुनिया में ऐसी ही मानवता चाहते हैं. मनुष्य का जीवन ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय’ इस प्रकार परमलक्ष्य की ओर ले जाने वाली  यात्रा का वर्णन है. इसी तरह चलने वाली निरंतर यात्रा है. हम ऐसा समाज बनाना है, हमें पूरी दुनिया को ऐसा बनाना है. इसीलिए हमें भारत को स्वतंत्र बनाना है. ऐसा करते समय हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि हमारा उद्देश्य जितना पवित्र और शुद्ध है, उतना ही उसके लिए किये जाने वाले हमारे प्रयास, हमारी वृत्ति उतनी ही शुद्ध और निर्मल हो, इसका प्रतीक सफेद रंग है.

यह सब करने के लिए जिस शक्ति की आवश्यकता है, जिस वैभव संपन्नता की आवश्यकता है, सामर्थ्य की आवश्यकता है, जिस समृद्धि की आवश्यकता है. हम श्रीसूक्त जानते हैं, इसमें प्रकृति के घटक का वर्णन है. मनुष्य अपने मन, शील के वैभव के साथ साथ जीवन में अंतिम लक्ष्य प्राप्त करता है. उस समृद्धि का रंग मतलब हरा रंग है. हम जो कुछ करने जा रहे हैं, उसका अधिष्ठान मतलब हमारे तिरंगा का धर्मचक्र है. जो सभी को सुख देता हो, सुखी जीवन व्यतीत करता हो, चराचर सृष्टि की धारणा, जिसे हम धर्म कहते हैं, हमारा प्रयास ऐसा ही धर्म-केंद्रित होना चाहिए.

मनुष्य जीवन में सुख प्राप्ति के लिए जीता है. जितने खुश उतना आनंद. लेकिन आनंद मतलब केवल भौतिक सुख नहीं है, बल्कि सुख हमारे भीतर है. सुख-दुख हमारी चित्त वृत्ति पर निर्भर करते हैं. मन की संतुष्टि बहुत जरूरी है और सब कुछ इसी पर निर्भर करता है. एक अकेला आदमी खुश नहीं हो सकता. एक व्यक्ति तब तक सुखी नहीं रह सकता, जब तक कि अन्य सभी सुखी न हों. अपने साथ सबको खुश रखना हमारा धर्म है. सबकी खुशी हमारी धारणा होनी चाहिए. संसार में सुख का सन्तुलन होना चाहिए. समृद्धि की प्राप्ति की यही हमारी दृष्टि है. सबका उत्थान करना हमारा धर्म है. हमें इसके लिए संयम से चलना होगा.

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August 16th 2021, 2:08 pm

अमृत महोत्सव – भारतीय स्वातंत्र्य समर का पुनरावलोकन

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आज भारत औपनिवेशिक दासता से मुक्ति का पर्व मना रहा है. समारोहों की इस श्रृंखला के बीच जहां स्वतंत्र भारत की 75 वर्षों की यात्रा का मूल्यांकन होगा, वहीं इसे पाने के लिये चार शताब्दी से अधिक के कालखण्ड में निरंतर चले संघर्ष और बलिदान का पुण्यस्मरण भी स्वाभाविक ही है.

भारत में औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध चला राष्ट्रीय आन्दोलन “स्व” के भाव से प्रेरित था जिसका प्रकटीकरण स्वधर्म, स्वराज और स्वदेशी की त्रयी के रूप में पूरे देश को मथ रहा था. संतों और मनीषियों के सान्निध्य से आध्यात्मिक चेतना अंतर्धारा के रूप में आंदोलन में निरंतर प्रवाहित थी.

युगों-युगों से भारत की आत्मा में बसा “स्व” का भाव अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ प्रकट हुआ और इन विदेशी शक्तियों को पग-पग पर प्रतिरोध का सामना करना पड़ा. इन शक्तियों ने भारत की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक व्यवस्था को तहस-नहस किया, ग्राम स्वावलम्बन को नष्ट कर डाला. विदेशी शक्तियों द्वारा यह सर्वंकश आक्रमण था जिसका सर्वतोमुख प्रतिकार भारत ने किया.

यूरोपीय शक्तियों के विरुद्ध भारतीय प्रतिरोध विश्व इतिहास में अनूठा उदाहरण है. यह बहुमुखी प्रयास था जिसमें एक ओर विदेशी आक्रमण का सशस्त्र प्रतिकार किया जा रहा था तो दूसरी ओर समाज को शक्तिशाली बनाने के लिये इसमें आई विकृतियों को दूरकर सामाजिक पुनर्रचना का काम जारी था.

देशी रियासतों के राजा जहां अंग्रेजों का अपनी शक्ति भर प्रतिकार कर रहे थे वहीं अपने सहज-सरल जीवन में अंग्रेजों के हस्तक्षेप और जीवनमूल्यों पर हमले के विरुद्ध स्थान-स्थान पर जनजातीय समाज उठ खड़ा हुआ. अपने मूल्यों की रक्षा के लिये जाग उठे इन लोगों का अंग्रेजों ने क्रूरतापूर्वक नरसंहार किया किन्तु वे संघर्ष से पीछे नहीं हटे. 1857 में हुआ देशव्यापी स्वातंत्र्य समर इसका ही फलितार्थ था जिसमें लाखों लोगों ने बलिदान दिया.

भारतीय शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करने के प्रयासों को विफल करने के लिये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, शांति निकेतन, गुजरात विद्यापीठ, एमडीटी हिन्दू कॉलेज तिरुनेलवेल्ली,  कर्वे शिक्षण संस्था व डेक्कन एज्यूकेशन सोसाइटी  तथा गुरुकुल कांगड़ी जैसे संस्थान उठ खड़े हुए और छात्र-युवाओं में देशभक्ति का ज्वार जगाने लगे. प्रफुल्लचन्द्र राय और जगदीश चंद्र बसु जैसे वैज्ञानिकों ने जहाँ अपनी प्रतिभा को भारत  के उत्थान के लिये समर्पित कर दिया वहीं नंदलाल बोस, अवनीन्द्रनाथ ठाकुर और दादा साहब फाल्के  जैसे कलाकार तथा माखनलाल चतुर्वेदी सहित प्रायः सभी राष्ट्रीय नेता पत्रकारिता के माध्यम से जनजागरण में जुटे थे. अपनी कलाओं के माध्यम से देश को जगा रहे थे. महर्षि दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द और महर्षि अरविन्द आदि अनेक मनीषियों की आध्यात्मिक प्रेरणा इन सबके पथप्रदर्शक के रूप में कार्यरत थी.

बंगाल में राजनारायण बोस द्वारा हिन्दू मेलों का आयोजन, महाराष्ट्र में लोकमान्य तिलक द्वारा गणेशोत्सव और शिवाजी उत्सव जैसे सार्वजनिक कार्यक्रम जहाँ भारत की सांस्कृतिक जड़ों को सींच रहे थे वहीं ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले जैसे समाज सुधारक महिला शिक्षा और समाज के वंचित वर्ग को सशक्त करने के रचनात्मक अभियान में जुटे थे. डॉ अम्बेडकर ने समाज को संगठित होने और सामाजिक समानता पाने के लिये संघर्ष करने का मार्ग दिखाया.

भारतीय समाज जीवन का कोई क्षेत्र महात्मा गाँधी के प्रभाव से अछूता नहीं था. वहीं विदेशों में रह कर भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन को धार देने का काम श्यामजी कृष्ण वर्मा, लाला हरदयाल और मादाम कामा जैसे लोगों के संरक्षण में प्रगति कर रहा था. लंदन का इंडिया हाउस भारत की स्वतंत्रता संबंधी गतिविधियों का केन्द्र बन चुका था. क्रान्तिवीर सावरकर द्वारा लिखा गया 1857 के राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास भारतीय क्रांतिकारियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय था. स्वयं भगत सिंह ने इसे प्रकाशित करा कर इसकी सैकड़ों प्रतियाँ वितरित कीं.

देश भर में सक्रिय चार सौ से अधिक भूमिगत संगठनों में शामिल क्रांतिकारी अपनी जान हथेली पर लेकर भारतमाता को मुक्त कराने के अभियान में लगे थे. बंगाल के क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति की गतिविधियों में सक्रिय डॉ. हेडगेवार लोकमान्य तिलक की प्रेरणा से कांग्रेस से जुड़े और सेन्ट्रल प्रोविंस के सचिव चुने गये. 1920 में नागपुर में सम्पन्न राष्ट्रीय अधिवेशन की आयोजन समिति के वे उप-प्रधान थे. इस अधिवेशन में उन्होंने अपने साथियों के साथ पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित कराने के भरसक प्रयत्न किये किन्तु कांग्रेस नेतृत्व इसके लिये तैयार नहीं हुआ. अंततः यह प्रस्ताव आठ वर्ष बाद लाहौर में पारित हो सका.

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ही नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज का नेतृत्व संभाला. उनके नेतृत्व में न केवल स्वतंत्र भारत की प्रथम सरकार का गठन हुआ अपितु आजाद हिन्द फौज ने पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों को स्वतंत्र कराने में सफलता भी प्राप्त की. लाल किले में आजाद हिन्द फौज के अधिकारियों पर चले मुकदमे ने पूरे देश को रोष से भर दिया. इसके साथ ही नौसेना द्वारा ब्रिटिश अधिकारियों के विरुद्ध किये गये विद्रोह ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिये विवश कर दिया.

स्वतंत्रता का सूर्य उगा, लेकिन विभाजन का ग्रहण उस पर लग चुका था. कठिन परिस्थिति में भी आगे बढ़ने का हौंसला बना रहा, इसका श्रेय प्रत्येक भारतीय को जाता है जिसने सैकड़ों वर्षों की राष्ट्रीय आकांक्षा को पूर्ण करने के लिये अपना खून-पसीना बहाया.

महर्षि अरविन्द ने कहा था – भारत को जागना है, अपने लिये नहीं बल्कि पूरी दुनियाँ के लिये, मानवता के लिये. उनकी यह घोषणा सत्य सिद्ध हुई जब भारत की स्वतंत्रता विश्व के अन्य देशों के स्वतंत्रता सेनानियों के लिये प्रेरणा बन गयी. एक के बाद एक, सभी उपनिवेश स्वतंत्र होते चले गये और ब्रिटेन का कभी न छिपने वाला सूर्य सदैव के लिये अस्त हो गया.

पुर्तगाली, डच, फ्रेंच तथा सबसे अंत में ब्रिटिश भारत आये. सभी ने व्यापार के साथ-साथ भारतीय संस्कृति को नष्ट करने तथा मतान्तरण करने के निरन्तर प्रयास किये. औपनिवेशिकता के विरुद्ध प्रतिकार उसी दिन प्रारंभ हो गया था जिस दिन पहले यूरोपीय यात्री वास्को-दा-गामा ने वर्ष 1498 में भारत की भूमि पर पाँव रखा. डचों को त्रावणकोर के महाराजा मार्तण्ड वर्मा के हाथों पराजित होकर भारत छोड़ना पड़ा. पुर्तगाली गोवा तक सिमट कर रह गये. वर्चस्व के संघर्ष में अंततः ब्रिटिश विजेता सिद्ध हुए जिन्होंने अपनी कुटिल नीति के बल पर भारत के आधे से कुछ अधिक भाग पर नियंत्रण स्थापित कर लिया. शेष भारत पर भारतीय शासकों का आधिपत्य बना रहा जिनके साथ अंग्रेजों ने संधिया कर लीं. स्वतंत्रता के पश्चात इन राज्यों के संघ के रूप में भारतीय गणतंत्र का उदय हुआ.

भारत ने लोकतंत्र का मार्ग चुना. आज वह विश्व का सबसे बड़ा और सफल लोकतंत्र है. जिन लोगों ने भारत के सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा के लिये स्वतंत्रता के आन्दोलन में अपना योगदान किया, उन्होंने ही भारत के लिये संविधान की रचना का कर्तव्य भी निभाया. यही कारण है कि संविधान की प्रथम प्रति में चित्रों के माध्यम से रामराज्य की कल्पना और व्यास, बुद्ध तथा महावीर जैसे भारतीयता के व्याख्याताओं को प्रदर्शित कर भारत के सांस्कृतिक प्रवाह को अक्षुण्ण रखने की व्यवस्था की गयी.

“स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव” का यह अवसर उन बलिदानियों, देशभक्तों के प्रति कृतज्ञताज्ञापन का अवसर है जिनके त्याग और बलिदान के कारण ही हम स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में जागतिक समुदाय में अपना यथोचित स्थान प्राप्त करने की दिशा में बढ़ रहे हैं. उन अनाम वीरों, चर्चा से बाहर रह गयी घटनाओं, संस्थाओं और स्थानों, जिन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन को दिशा दी और मील का पत्थर सिद्ध हुईं, का पुनरावलोकन, मूल्यांकन तथा उनसे जुड़ी लोक स्मृतियों को सहेज कर उन्हें मुख्यधारा से परिचित कराना होगा ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि आज सहज उपलब्ध स्वतंत्रता के पीछे पीढ़ियों की साधना, राष्ट्रार्चन के लिये शताब्दियों तक बहाये गये अश्रु, स्वेद और शोणित का प्रवाह है.

(लेखक वर्तमान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह है)

 

 

 

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August 15th 2021, 4:20 am

स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव – टाइम्स स्क्वायर पर सबसे बड़ा तिरंगा लहराएगा

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नई दिल्ली. अमृत महोत्सव के उत्साह की गूंज सात समंदर पार अमेरिका सहित विभिन्न देशों में भी सुनाई देगी. ऐतिहासिक टाइम्स स्क्वायर पर अब तक का सबसे बड़ा तिरंगा (भारत का राष्ट्रीय ध्वज) शान से फहराया जाएगा.

15 अगस्त को स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर अमृत महोत्सव वर्ष का शुभारम्भ करने जा रहा है. अमेरिका में भारतीय प्रवासी संस्था ने टाइम्स स्क्वायर पर अब तक का सबसे बड़ा तिंरगा फहराने की घोषणा की है. यह तिरंगा 25 फुट ऊंचे स्तम्भ पर फहराया जाएगा तथा यह 6 फुट लंबा और 10 फुट चौड़ा होगा. अमेरिका में बड़ी संख्या में रह रहे भारतीयों ने अभूतपूर्व अवसर का साक्षी होने का संकल्प किया है.

प्रसिद्ध एम्पायर स्टेट भवन को भारतीय तिरंगे के तीन रंगों से जगमगाया जाएगा. इतना ही नहीं, उसी दिन शाम ढले हडसन नदी पर एक शानदार क्रूज का आयोजन किया जाएगा. इस क्रूज कार्यक्रम में भारतवंशी अनेक विशिष्टजन सहित अमेरिकी समुदाय के लोग भी बड़ी संख्या में उपस्थित रहेंगे.

स्वतंत्रता का उत्सव फेडरेशन ऑफ इंडियन एसोसिएशन न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी और कनेक्टिकट की ओर से पूरे दिन के समारोह आयोजित किए जाएंगे.

फेडरेशन ऑफ इंडियन एसोसिएशन के अध्यक्ष अंकुर वैद्य का कहना है कि उनके संगठन ने तय किया है कि वे हर साल टाइम्स स्क्वायर पर तिरंगा फहराएंगे. यह परंपरा जारी रहने वाली है. इस साल टाइम्स स्कवायर पर अब तक का सबसे बड़ा तिरंगा फहरेगा.

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August 14th 2021, 12:03 pm

देशवासियों के संघर्ष और कुर्बानियों की स्मृति में 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में

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नई दिल्ली. विभाजन के दौरान देशवासियों के संघर्ष और कुर्बानियों की स्मृति में 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाएगा. इसकी घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि देशवासियों के संघर्षों और उनकी कुर्बानियों को याद करते हुए 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाएगा.

ट्वीट्स की श्रृंखला में प्रधानमंत्री ने कहा –

“विभाजन की पीड़ा को कभी भुलाया नहीं जा सकता. वहशी नफरत और हिंसा के कारण हमारी लाखों बहनें और भाई दर-बदर हो गए और तमाम लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. अपने लोगों के संघर्षों और कुर्बानियों को याद करते हुए 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाएगा.

#PartitionHorrorsRemembranceDay हमें यह याद दिलाता रहेगा कि सामाजिक भेदभाव और वैमन्यस्य को मिटाने की तथाएकता, सामाजिक समरसता और मानवीय संवेदनाओं को मजबूत करने की जरूरत है.

देश के बंटवारे के दर्द को कभी भुलाया नहीं जा सकता. नफरत और हिंसा की वजह से हमारे लाखों बहनों और भाइयों को विस्थापित होना पड़ा और अपनी जान तक गंवानी पड़ी. उन लोगों के संघर्ष और बलिदान की याद में 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के तौर पर मनाने का निर्णय लिया गया है.

#PartitionHorrorsRemembranceDayका यह दिन हमें भेदभाव, वैमनस्य और दुर्भावना के जहर को खत्म करने के लिए न केवल प्रेरित करेगा, बल्कि इससे एकता, सामाजिक सद्भाव और मानवीय संवेदनाएं भी मजबूत होंगी.”

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August 14th 2021, 12:03 pm

पं. दीनदयाल जी की दृष्टि में ; अखंड भारत इसलिए.. !!

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पंडित जी लिखते हैं कि – अखंड भारत के आदर्श की ओर सबका रुझान होने के बाद भी अनेक लोग इसे अव्यवहारिक मानते हैं. उनकी समझ में नहीं आता कि भारत अखण्ड कैसे होगा.

विभाजन के पूर्व तक पाकिस्तान को भी अव्यवहारिक समझा जाता था. किन्तु कुछ मुसलमानों की दृढ़ इच्छा शक्ति एवं आत्मविश्वास ने पाकिस्तान को सत्य-सृष्टि में परिणत कर दिया. क्या भारत के ३८ करोड़ (१९५२ में जनसंख्या) लोगों की दृढ़ इच्छा शक्ति आज खण्डित भारत को एक करने में समर्थ नहीं होगी?

जयराम शुक्ल

पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्वतंत्र भारत के तेजस्वी, तपस्वी व यशस्वी चिन्तकों में से एक हैं. उनके चिन्तन के मूल में लोकमंगल और राष्ट्र का कल्याण सन्निहित है. उन्होंने राष्ट्र को धर्म, अध्यात्म और संस्कृति का सनातन पुंज बताते हुए राजनीति की नई व्याख्या की. वे गांधी, तिलक और सुभाष की परम्परा के वाहक थे.

दलगत व सत्ता की राजनीति से ऊपर उठकर वे वास्तव में एक ऐसे राजनीतिक दर्शन को विकसित करना चाहते थे जो भारत की प्रकृति व परम्परा के अनुकूल हो और राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करने में समर्थ हो.

अपनी व्याख्या को उन्होंने एकात्म मानवदर्शन का नाम दिया. यही दर्शन १९६४ में जनसंघ के ग्वालियर अधिवेशन में अंगीकार किया गया.

पंडित जी की व्याख्याएं मौलिक और यथार्थ के धरातल पर साकार होने वाली थीं. उनका दृढ़मत था कि बहुलतावादी देश में मत व मन भिन्नता हो सकती है. पर इन सबके बीच राष्ट्र की एक सामान्य इच्छा नाम की कोई चीज होती है. उसको आधार बनाकर काम किया जाए तो सर्वसामान्य व्यक्ति को लगता है कि मेरे मन के मुताबिक कार्य हो रहा है.

‘Think localy act globly’. यह पंडित जी की ही अवधारणा थी जो वैश्विकरण के दौर में बार-बार दोहराई जाती रही. पंडित जी कहते हैं – जहाँ तक शाश्वत सिद्धान्तों तथा स्थायी सत्यों का सम्बन्ध है. हम सम्पूर्ण मानव के ज्ञान और उपलब्धियों का संकलित विचार करें. इन तत्वों में जो हमारा है, उसे युगानुकूल और जो बाहर का है, उसे देशानुकूल ढालकर हम आगे चलने का विचार करें.

संस्कृति ही स्वराज का प्राणतत्व है. संस्कृति विहीन, समाज और राष्ट्र पतनशीलता के मार्ग को उन्मुख होता है. पंडित जी का दृढ़ मत था कि स्वराज का स्व-संस्कृति से घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है. संस्कृति का विचार न रहा तो स्वराज की लड़ाई स्वार्थी पदलोलुप लोगों की एक राजनीतिक लड़ाई मात्र रह जाएगी. स्वराज तभी साकार और सार्थक होगा जब वह अपनी संस्कृति की अभिव्यक्ति का साधन बन सकेगा.

जिस दौर में विश्व में पूंजीवाद बनाम साम्यवाद और समाजवाद का द्वंद्व चरम पर था, उसी दौर में पंडित जी ने एकात्म मानवदर्शन को विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर, समकालीन दार्शनिकों, चिन्तकों व नीतिवेत्ताओं को चमत्कृत कर दिया था. यही विचार जनसंघ का व प्रकारान्तर में भारतीय जनता पार्टी की आत्मा बना.

पंडित जी ने इस विचार को जिस सरलता से समझाया वैसी अध्यात्म दृष्टि दुर्लभ है. एकात्म दर्शन की व्याख्या करते हुए उन्होंने लिखा – जीवन की विविधता अन्तमूर्त एकता का आविष्कार है और इसलिए उनमें परस्परानुकूलता तथा परस्पर पूरकता है. बीज की एकता ही पेड़ के मूल, तना, शाखाएं, पत्ते फूल और फल के विविध रूप में प्रकट होती है. इन सबके रंग, रूप तथा कुछ न कुछ मात्रा में गुण में भी अन्तर होता है. फिर भी उनके बीज के साथ के एकत्व के सम्बन्ध को हम सहज पहचान सकते हैं.

यहां मैं पंडितजी के एक आलेख – अखण्ड भारत क्यों ? का विवेचन करूंगा. इस आलेख को

जनसंघ की उत्तरप्रदेश इकाई ने १९५२ में एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया था.

यह आलेख पंडित जी ने तब लिखा था जब वे महज ३७ वर्ष के थे. एक युवा मन और उसका मस्तिष्क, राष्ट्र व राष्ट्रवासियों के बारे में कैसा चिन्तन करता है, इस लेख से सहज स्पष्ट है.

अखण्ड भारत कोटि-कोटि भारतीयों की आकांक्षा है. विखण्डन की पीड़ा आज भी हृदय में टीस रही है. एकात्म मानवदर्शन के प्रणेता, चिन्तक और मनीषी पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने स्वतंत्रता प्राप्ति के पांच वर्ष बाद १९५२ में अखण्ड भारत क्यों? के प्रश्न पर मार्मिक और तार्किक तरीके से इस आहत आकांक्षा को स्वर दिया. यह भारतीय जनसंघ की स्थापना का भी वर्ष था. यह वह दौर था, जब खण्डित भारत के पाकिस्तान से लुट-पिट और बर्बाद होकर आने वालों की वेदना से देश क्लांत था.

जिन्होंने अंग्रेज शासकों, मुस्लिम लीग के नेताओं के साथ समझौते की मेज पर देश को अंग-भंग करने के निर्णय को सहजता से स्वीकार किया. उनके लिए भारत माता के रक्तरंजित होने की व्यथा सत्ता के सिंहासन की लालसा के आगे तुच्छ थी. लेकिन जिनके हृदय में भारत माता की अखण्ड छवि रची बसी थी, उनके अन्तस में शूल चुभ रहे थे.

अखण्ड भारत क्यों? में देश की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एकरूपता को वैदिक काल से लेकर अब तक की स्थितियों का सहज-सरल तरीके से विवेचन किया गया है. स्वतंत्रता संग्राम के दौर में ही अंग्रेजों के संरक्षण और कांग्रेस के तत्कालीन शीर्ष नेतृत्व की सहमति से ‘पाकिस्तान’ की पटकथा कैसे तैयार हुई, ऐतिहासिक व राजनीतिक संदर्भों के साथ तथ्यों का प्रकटीकरण किया गया है.

जिस दौर में देश के सांस्कृतिक राष्ट्रीय विचार के लोगों पर तत्कालीन सत्ता प्रतिष्ठान का दमन चक्र चल रहा था. उसी दौर में पंडित जी ने बड़ी निर्भयता के साथ लिखा – ”भारत को खण्डित करने को लेकर 3 जून, १९४७ की माउन्टबेटन योजना को कांग्रेस के सर्वोच्च नेताओं ने स्वीकार कर लिया. रक्त बहाकर जिस देश की अखण्डता की रक्षा की गयी थी. उसी देश को रक्तपात के भय से खण्डित कर दिया.

उन्होंने आहत मन से कहा – ”रक्त की धार से लिखा हुआ इतिहास स्याही की रेखाओं से व्यक्त नहीं किया जा सकता. आलेख में तथ्यों और तर्कों के साथ पंडितजी उद्घाटित करते हैं – भारत को स्वतंत्रता माउन्टबेटन योजना के कारण नहीं मिली, बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों, अंग्रेजों की गिरी हुई दशा तथा भारत की राष्ट्रीय जागृति के परिणाम स्वरूप प्राप्त हुई. इसमें एक पर भी मुस्लिम मांग का प्रभाव नहीं है.

दरअसल, कांग्रेस की सत्ता पिपासा ने द्विराष्ट्र के सिद्धान्त को दूरगामी परिणाम का आंकलन किए बगैर ही स्वीकार कर लिया. कांग्रेस की भूल या सत्ताकांक्षा पर आहत पंडित जी लिखते हैं – कांग्रेस के नेता यदि डटे रहते तथा भारत की जन जागृति की मदद करते तो अंग्रेज अखण्ड भारत छोड़कर जाते और सत्ता कांग्रेस के ही हाथ में देकर जाते.

पंडित जी ने आज से कोई 65 वर्ष पहले ही भारत पाक के रिश्तों की भावी स्थिति का आंकलन कर लिया था. आज हम उनके आंकलन की परिणति देख रहे हैं. वर्तमान में भारत में पल रहे मुस्लिम कट्टरवाद की स्थिति व उसके परिणाम का विश्लेषण भारत विभाजन के तत्काल बाद ही देश के सामने रख दिया था – कल तक जो काम लीग एक संस्था के रूप में करती थी. आज वही कार्य पाकिस्तान एक राज्य के रूप में कर रहा है. निश्चित ही समस्या का परिवर्तित स्वरूप अधिक खतरनाक है.

पाकिस्तान के निर्माण में सहायक भारत के मुसलमानों की साम्प्रदायिक मनोवृत्ति को भी पाकिस्तान से बराबर बल मिलता रहता है तथा भारत के राष्ट्रीय क्षेत्र में साढ़े तीन करोड़ मुसलमानों की गतिविधि किसी भी सरकार के लिए शंका का कारण बनी रहेगी.

पंडित जी की भविष्यवाणी वर्तमान में शब्दश: चरितार्थ हो रही है. पाक पोषित और प्रेरित आतंकवादियों एक बड़ी जमात आज भारत में पल रही है. ये वो लोग हैं जो स्वयं और जिनके अग्रज, पूर्वज भारत विभाजन के समय योजना या परिस्थितिवश पाकिस्तान नहीं गए और आज भारतीय होते हुए भी पाकिस्तान की शुभेक्षा तब से ही पाले हुए हैं. पाकिस्तान व वहां तैयार हो रहे आतंकवादी गिरोहों के वे भारतीय एजेन्ट बने बैठे हैं. देश को दहलाने वाली हर आतंकी गतिविधियों में यही चेहरे उभरकर सामने आते हैं.

इन सब स्थितियों के बावजूद चिन्तक और मनीषी पंडित दीनदयाल उपाध्याय अखण्ड भारत की आकांक्षा की ज्योति को निरंतर प्रज्ज्वलित किए रहने की आवश्यकता बताते हैं. अखण्ड भारत को भौगोलिक सीमा से ज्यादा सांस्कृतिक सूत्र बांध सकते हैं.

देशों के नाम पर वे टुकड़े जो कभी भारत के अविभाज्य अंग थे, उन्हीं को शामिल कर अखण्ड भारत की छवि निर्मित होती है. वहां हमारी सनातनी सांस्कृतिक विरासत बिखरी पड़ी है. कोई आवश्यक नहीं कि इनके एकीकरण के लिए आक्रमण या युद्ध ही हो, एक ऐसा वातावरण निर्मित हो जिसकी बुनियाद में हमारी सांस्कृतिक अस्मिता रहे, जिसके आवेग से विभाजित भारत की सीमा रेखाएं मिट जाएं और अखण्ड भारत पुन: एकाकार हो जाए.

पंडित जी लिखते हैं कि – अखंड भारत के आदर्श की ओर सबका रुझान होने के बाद भी अनेक लोग इसे अव्यवहारिक मानते हैं. उनकी समझ में नहीं आता कि भारत अखण्ड कैसे होगा.

विभाजन के पूर्व तक पाकिस्तान को भी अव्यवहारिक समझा जाता था. किन्तु कुछ मुसलमानों की दृढ़ इच्छा शक्ति एवं आत्मविश्वास ने पाकिस्तान को सत्य-सृष्टि में परिणत कर दिया. क्या भारत के ३८ करोड़ (१९५२ में जनसंख्या) लोगों की दृढ़ इच्छा शक्ति आज खण्डित भारत को एक करने में समर्थ नहीं होगी?

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August 14th 2021, 12:03 pm

भारत के चंद्रयान-2 ने चंद्रमा पर पानी के अणुओं की उपस्थिति का पता लगाया

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नई दिल्ली. भारत ‘चंद्रयान-2’ अभियान ने चंद्रमा पर पानी के अणुओं की उपस्थिति का पता लगाया है. अभियान के दौरान प्राप्त आंकड़ों से यह खुलासा हुआ है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष ए.एस. किरण कुमार के सहयोग से लिखे गए एक रिसर्च पेपर में कहा गया है कि ‘चंद्रयान-2’ में लगे उपकरणों में ‘इमेजिंग इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोमीटर’ (आईआईआरएस) नाम का एक उपकरण भी है जो वैश्विक वैज्ञानिक आंकड़ा प्राप्त करने के लिए 100 किलोमीटर की एक ध्रुवीय कक्षा से जुड़ा काम कर रहा है.

‘करंट साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित रिसर्च पेपर में कहा गया है, ‘आईआईआरएस से मिले शुरुआती डेटा से चंद्रमा पर 29 डिग्री उत्तरी और 62 डिग्री उत्तरी अक्षांश के बीच व्यापक जलयोजन और अमिश्रित हाइड्रोक्सिल (ओएच) और पानी (एच2ओ) के अणुओं की उपस्थिति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है.’

प्लेजियोक्लेस प्रचुर चट्टानों में चंद्रमा के अंधकार से भरे मैदानी इलाकों की तुलना में अधिक ओएच (हाइड्रोक्सिल) या संभवत: H2O (जल) अणु पाए गए हैं.

‘चंद्रयान-2’ से भले ही वैसे नतीजे नहीं मिले, जितनी उम्मीद थी, लेकिन इससे जुड़ा यह घटनाक्रम काफी मायने रखता है.

भारत ने अपने दूसरे चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-2’ को 22 जुलाई, 2019 को चांद के लिए रवाना किया था. हालांकि, इसमें लगा लैंडर ‘विक्रम’ उसी साल सात सितंबर को निर्धारित योजना के अनुरूप चांद के दक्षिण ध्रुव क्षेत्र में ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ करने में सफल नहीं रहा, जिसकी वजह से पहले ही प्रयास में चांद पर उतरने वाला पहला देश बनने का भारत का सपना पूरा नहीं हो पाया.

‘चंद्रयान-2’ के लैंडर के भीतर ‘प्रज्ञान’ नाम का रोवर भी था. मिशन का ऑर्बिटर अब भी अच्छी तरह काम कर रहा है.

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August 14th 2021, 12:03 pm

मूलनिवासी की संकल्पना – वामपंथियों का भारत को खंड-खंड करने का षड्यंत्र

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“If there is to be revolution, there must be a revolutionary party”

माओ के इस विचार पर आधारित कम्युनिस्ट विचारधारा का सम्पूर्ण क्रान्ति एक प्रमुख लक्ष्य है. यदि क्रान्ति का लक्ष्य प्राप्त करना है तो उसके लिए समस्या होना जरूरी है. समस्या उपलब्ध है तो अच्छा है, नहीं तो समस्या का निर्माण करो, यह वामपंथियों की कार्य पद्धति रही है. उनके सद्भाग्य से भारत जैसे विशाल देश में समस्याओं की अपार उपलब्धता उन्हें प्राप्त हुई. जिसने वामपंथ के लिए क्रांति के नए रास्ते पैदा किए. इनमें से एक रास्ता 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी नाम के गाँव से होकर गुजरा.

भारत में नक्सलवाद के जनक चारू मजूमदार, कानू सन्याल और जंगल संथाल थे. बंगाल में भू–आंदोलन के बाद नक्सलवादी आंदोलन लगभग समाप्त हो गया. लेकिन उसके विश्लेषण से जो बात निकली वो स्पष्ट थी कि संथाल जनजाति की तरह, भारत के कई राज्यों में अनेक जनजातियां रहती हैं, जिनकी समस्याओं के रास्ते नई क्रांति फिर पैदा करने की तैयारी की गई. इस माओवादी वामपंथी आंदोलन का आधार मूलनिवासी अवधारणा ही था, जिसके माध्यम से ये लोग जनजातियों को एक अलग पहचान देकर भारत के संविधान के विरुद्ध एक हथियार बंद क्रान्ति के रास्ते उनकी समस्या का समाधान दिलवाने के नाम पर अलगाववाद फैला रहे हैं. भारत के कई जाने-माने संस्थान इन विचारों को पोषित करने का कार्य कर रहे हैं.

अलग पहचान खड़ी करने के उदेश्य से जनजाति क्षेत्र में महिषासुर दिवस, रावण दहन विरोध, दुर्गा पूजा विरोध के लिए नया-नया साहित्य तैयार कर जनजातीय बहुल इलाकों में फैलाया जा रहा है. हजारों सालों से साथ रह रहे एक ही रक्त एवं एक ही परम्परा, संस्कृति के अंग होने के बावजूद अन्य समाजों को जनजातियों का दुश्मन सिद्ध करने का पूरा नैरेटिव तैयार किया जा रहा है. ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे आंदोलन का मूल अलग-अलग जनजातीय समाजों के बीच वैमनस्य पैदा करना है ताकि क्रान्ति फैलाई जा सके.

हाल ही में माओवादी गतिविधियों के समर्थन में आजीवन कारावास की सजा काट रहे दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जी. एन. साईबाबा, जो कई माओवादी घटनाओं के प्रणेता रहे हैं, उन पर नर्मदा अक्का नामक नक्सली कमांडर से माओवादी विचारों को फैलाने का आरोप सिद्ध हुआ. उनके साथ JNU के तीन अन्य छात्रों को भी आजीवन कारावास की सजा मिली है. लेकिन उन्हें रिहा कराने के लिए संयुक्त राष्ट्र के स्पेशल रिपोर्टर्स ने भारत सरकार से अनुरोध किया है. साईबाबा ने अपने एक भाषण में  कहा – “Naxalism is the only way and denounces the democratic government setup.”

ऐसे कई अन्य वैचारिक अलगाववादी तत्व, भारत के प्रजातंत्र के विरुद्ध वैश्विक मंच पर कार्य कर रहे हैं. आज उन्हें पहचानने व रचे जा रहे षड्यंत्रों को समझने की आवश्यकता है.

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August 14th 2021, 12:03 pm

समाज में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता लाने का कार्य करेंगे स्वयंसेवक – दत्तात्रेय होसबाले जी

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भोपाल. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने तीसरे दिन प्रान्त और विभाग स्तर के चयनित कार्यकर्ताओं के साथ संवाद किया. बैठक में उन्होंने नगर और ग्राम स्तर पर चल रहे स्वास्थ्य प्रशिक्षण कार्यक्रमों की जानकारी ली. उन्होंने कहा कि यह प्रशिक्षण कोरोना महामारी से बचाव में तो सहयोगी होगा ही, लोगों की जीवनशैली को भी गुणवत्तापूर्ण बनाएगा. अधिक से अधिक लोगों तक स्वास्थ्य संबंधी आवश्यक जानकारी पहुंचाने का कार्य संघ के कार्यकर्ता करें. यह प्रशिक्षित कार्यकर्ता ज़मीनी स्तर पर कोरोना से बचाव के लिए सुरक्षा, सतर्कता, नियंत्रण एवं प्रबंधन करेंगे.

बैठक में मध्य भारत प्रान्त के कार्यकर्ताओं ने जानकारी दी कि शहरों में बस्ती स्तर और खंड में गांव स्तर तक ‘आरोग्य मित्र’ प्रशिक्षण अगस्त माह के आखिर तक सम्पन्न हो जाएंगे. इस प्रशिक्षण में अनुभवी चिकित्सकों का सहयोग मिल रहा है. प्रशिक्षित कार्यकर्ता ‘आरोग्य मित्र’ के रूप में समाज में स्वास्थ्य संबंधी जन-जागरूकता लाने का कार्य करेंगे.

सरकार्यवाह ने कार्यकर्ताओं से कहा कि अपने कार्य को विस्तार देने के लिए आगामी तीन वर्ष की कार्ययोजना बनाएं और कार्य को सर्वस्पर्शी विस्तार दें. नये क्षेत्रों में भी संघकार्य को बढ़ाएं. श्री राम मंदिर निधि समर्पण अभियान के अंतर्गत कार्यकर्ताओं को जो अनुभव आए, उन्हें सुनने के बाद सरकार्यवाह ने कहा कि समाज की सज्जन शक्ति को विविध प्रकार के सामाजिक कार्यों एवं गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए. समाज के अनेक बंधु सामाजिक कार्यों से जुड़ना चाहते हैं.

विद्यार्थी परिषद के प्रांत कार्यालय पर झंडावंदन

स्वाधीनता की 75वीं वर्षगांठ पर सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले भारत माता चौराहा स्थित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रांत कार्यालय ‘छात्र शक्ति भवन’ पर प्रातः 8 बजे ध्वजारोहण करेंगे.

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August 14th 2021, 12:03 pm

जुलाई 2022 से सिंगल यूज़ प्लास्टिक के उत्पादन, आयात, भंडारण, वितरण, बिक्री और उपयोग पर प्रतिबंध

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नई दिल्ली. केंद्र सरकार ने पर्यावरण के लिए खतरा बने सिंगल-यूज प्लास्टिक से मुक्ति के लिए महत्वपूर्ण निर्णय लिया है. सरकार ने जुलाई 2022 तक सिंगल यूज़ प्लास्टिक से मुक्ति का लक्ष्य रखा है. जिसके तहत एक जुलाई, 2022 के बाद से देश में इसका उपयोग पूरी तरह से प्रतिबंधित हो जाएगा. इसी के साथ सरकार ने प्लास्टिक बैग की मोटाई को लेकर तैयार नए नियमों को चरणबद्ध तरीके से लागू करने की योजना बनाई है. यह 30 सितंबर के बाद लागू होगी.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पहले चरण में प्लास्टिक की मोटाई को 50 माइक्रोन से बढ़ाकर 75 माइक्रोन करने का प्रस्ताव है, जबकि अगले चरण में इसे 75 माइक्रोन से बढ़ाकर 100 माइक्रोन या उससे ज्यादा किया जाएगा.

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए नई अधिसूचना जारी की है. इसके तहत ‘सिंगल यूज प्लास्टिक’ के उपयोग को एक जुलाई, 2022 से पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है. इसके तहत पॉली स्टाइनिन और एक्सपैंडेड पॉलीस्टाइनिन सहित सिंगल यूज वाले प्लास्टिक के उत्पादन, आयात, भंडारण, वितरण, बिक्री और उपयोग पर प्रतिबंध होगा.

सरकार ने पहली बार सिंगल यूज प्लास्टिक को भी परिभाषित किया है. वह वस्तुएं इस श्रेणी में आएंगी, जिसे डिस्पोजल या फिर रिसाइकिल के पहले एक काम के लिए एक बार ही इस्तेमाल में लाया जाना है. मंत्रालय ने प्रधानमंत्री द्वारा 2022 तक देश को ¨सिंगल यूज प्लास्टिक से मुक्ति दिलाने की घोषणा के बाद कदम उठाया है.

इन पर होगा प्रभाव

प्रतिबंध के बाद आइसक्रीम और गुब्बारे में लगने वाली प्लास्टिक स्टिक, सजावट में इस्तेमाल किए जाने थर्मोकोल, प्लास्टिक के कप-प्लेट, ग्लास, चम्मच, निमंत्रण कार्ड, सिगरेट के पैकेट पर लपेटी जाने वाली प्लास्टिक आदि का इस्तेमाल पूरी तरह से प्रतिबंधित होगा.

प्लास्टिक कचरे के डिस्पोजल के लिए अब ग्राम पंचायतों को भी व्यवस्था बनानी होगी. इस नई अधिसूचना में अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली की स्थापना करने सहित सभी इकाईयों को प्लास्टिक कचरे को अलग करने, कलेक्शन, स्टोरेज, ट्रांसपोर्टेशन, प्रोसेसिंग और डिस्पोजल आदि कार्यों को पूरा करना होगा.

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August 14th 2021, 12:03 pm

अयोध्या में सावन झूला मेला – 493 वर्ष बाद चांदी के झूले पर विराजमान हुए श्री रामलला

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अयोध्या. अयोध्या में प्रसिद्ध सावन झूला मेला के दौरान श्री रामलला 493 वर्ष बाद चांदी के झूले पर विराजमान हुए. सावन झूला के मौके पर श्री राम जन्मभूमि परिसर में राम लला के चांदी का झूला डाला गया है. श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने रामलला के लिए 21 किलो चांदी के झूले को सावन माह के लिए अस्थाई गर्भ ग्रह में स्थापित किया है. सावन माह के शुक्ल पक्ष पंचमी (नाग पंचमी) तिथि पर 493 वर्ष बाद चांदी के झूले पर भगवान श्रीरामलला विराजमान हुए. झूले पर श्री रामलला चारों भाई संग झूलनोत्सव का आनंद ले रहे हैं.

राम नगरी का प्रसिद्ध सावन झूला मेला कोरोना प्रतिबंध का पालन करते हुए 11 अगस्त तृतीया तिथि से चल रहा है. राम जन्मभूमि परिसर में सावन माह के मौके पर अस्थाई मंदिर में पहली बार झूलापड़ा है. श्री राम जन्मभूमि परिसर में रामलला के दर्शन के लिए सावन माह में भीड़ बढ़ गई है. प्रतिदिन हजारों की संख्या में लोग दर्शन कर रहे हैं. रामलला के भक्त झूलनोत्सव का भी आनंद उठा रहे हैं.

शुक्रवार को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चंपत राय ने कहा कि रामलला के दरबार में अब हर उत्सव भव्यता का पर्याय होगा. इसी के तहत शुक्रवार से मंदिर परिसर में झूलनोत्सव की छटा बिखर रही है. भक्तों की मंशा के अनुरूप रामलला के हिलए दिल्ली से 21 किलो चांदी नागद पंका पांच फीट ऊंचा झूला निर्मित कराया गया है. जो अस्थाई मंदिर में स्थापित करा दिया गया है.

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August 14th 2021, 12:03 pm

स्वयंसेवक कोरोना महामारी की तीसरी आवृत्ति से बचाव की रखें तैयारी

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भोपाल. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने शुक्रवार को भोपाल प्रवास के दौरान कार्यकर्ताओं से संगठनात्मक बैठक में संवाद किया. उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी अभी समाप्त नहीं हुई है. इसकी तीसरी आवृत्ति आने की आशंका जताई जा रही है. ऐसे में संघ के कार्यकर्ताओं को आवश्यक तैयारी कर लेनी चाहिए. नगर गांव में चयनित कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण हो जाए, इस बात की चिंता की जाए.

संघकार्य के विस्तार के लिए आगामी तीन वर्ष की कार्ययोजना बनाने के लिए भी उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा है.

कार्य विस्तार की दृष्टि से सरकार्यवाह ने स्वयंसेवकों से कहा कि संघ कार्य भौगोलिक और सर्वस्पर्शी, दोनों प्रकार से बढ़ना चाहिए. इसके लिए स्वयंसेवकों को आगामी तीन वर्ष की कार्ययोजना तैयार करनी चाहिए. विद्यार्थी शाखा के विस्तार पर भी ध्यान देना चाहिए. जिस प्रकार हमने भोपाल में श्रम साधकों के बीच विशेष प्रयास करके कार्य खड़ा किया है. उसी प्रकार सभी वर्गों एवं क्षेत्रों में कार्य पंहुचाना है. हमें अब कार्य विस्तार के साथ कार्य की गुणवत्ता बढ़ाने की दिशा में भी प्रयास करने चाहिए.

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August 13th 2021, 4:33 pm
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