बैठक में विद्यालयों की गुणवत्ता के स्पष्ट और मापनीय मानक विकसित करने पर विचार होगा
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विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान की कार्यकारिणी बैठक 11 से 13 सितम्बर तक
जबलपुर। विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान की तीन दिवसीय बैठक सरस्वती शिक्षा परिषद परिसर, शास्त्री पुल, जबलपुर में प्रारम्भ होगी, जिसमें सम्पूर्ण देश के सभी राज्यों से प्रतिभागी भाग लेंगे। डॉ. रविन्द्र कान्हेरे की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में अखिल भारतीय महामंत्री देशराज जी शर्मा, विवेक शेंडे जी सहित प्रमुख पदाधिकारी उपस्थित रहेंगे।
विद्या भारती की तीन दिवसीय बैठक में संगठनात्मक विषयों के साथ-साथ विद्यालय शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण तथा देश में शिक्षा प्रणाली के सामने उपस्थित चुनौतियों पर चिन्तन होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी तीनों दिन बैठक में उपस्थित रहेंगे। बैठक से पहले आयोजित प्रेस वार्ता में महामंत्री देशराज शर्मा जी ने कहा कि हमारा मानना है कि शिक्षा की गुणवत्ता, संस्कार, कौशल और राष्ट्रबोध, इन चारों को साथ लेकर ही शिक्षा राष्ट्रीय बन सकती है जो विश्व की समस्याओं के समाधान तथा विकास में सहायक बनेगी।
बैठक में विद्यालयों की गुणवत्ता के स्पष्ट और मापनीय मानक विकसित करने पर विचार होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने भारतीय ज्ञान परम्परा, मातृभाषा, कौशल, अनुभवात्मक शिक्षा और पंचकोशीय समग्र विकास पर बल दिया है। विद्या भारती इन प्रवधानों को विद्यालय व्यवहार में प्रभावी रूप से लागू करने के लिए कार्य कर रही है, उसका भी अवलोकन किया जाएगा। विद्या भारती का स्पष्ट दृष्टिकोण है कि भारतीय ज्ञान परम्परा आधुनिक ज्ञान और तकनीक का विरोध नहीं है, बल्कि उसके साथ भारतीय जीवन दृष्टि का समन्वय करना है। विद्यार्थी आधुनिक ज्ञान से सक्षम और अपनी जड़ों से जुड़ा होगा, तभी भारत विश्व की प्रगति एवं शांति में सहायक बनेगा।
बैठक में कक्षा 9 से 12 के विद्यार्थियों के लिए कैरियर मार्गदर्शन, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, कौशल विकास एवं व्यक्तित्व विकास आदि विषयों पर चिन्तन करेंगे। शिक्षा परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम शिक्षक है, इसलिए शिक्षक को केवल विषय अध्यापक नहीं उसे प्रेरक, मार्गदर्शक, सहयोगी और चरित्र निर्माता के रूप में विकसित करना आवश्यक है, इसकी पूर्ति के लिए कार्यकारिणी के सदस्य शिक्षक प्रशिक्षण के पाठ्यक्रम, माड्यूल पर विचार करेंगे तथा आगामी योजना का रोड मैप बनाएँगे।
उन्होंने बताया कि विद्या भारती के विद्यालयों के बोर्ड परीक्षा परिणाम बहुत ही सराहनीय हैं। इन तीन दिनों में परीक्षा परिणामों का आकलन, चर्चा, निदानात्मक परीक्षण, विषयवार कठिनाइयों की पहचान, व्यक्तिगत मार्गदर्शन, विद्यार्थीयों की अध्ययन पद्धति आदि परिणामपरक नीतियों पर विचार किया जाएगा। उत्तम संसाधनों को उत्तम परिणामों का सहायक मानते हुए AI और डिजिटल तकनीक पर महत्वपूर्ण विचार विमर्श होगा। हमारा विद्यार्थी तकनीक का उपभोक्ता नहीं, अपितु उसका रचनात्मक उपयोग करने वाला बने, ऐसी नीति बैठक में तैयार की जाएगी।
उन्होंने कहा कि विद्या भारती 24000 औपचारिक एवं अनौपचारिक विद्यालयों का संचालन कर रही है। अत: शिक्षा को युगानुकूल, राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप, सर्वस्पर्शी एवं समावेशी बनाने के लिए विचार विमर्श होगा। महानगरों, नगर निगमों, नगर पालिकाओं में शिक्षा व्यवस्था में विद्या भारती का योगदान विषय पर चर्चा होगी। दूर-दराज के क्षेत्रों के विद्यार्थियों तक आधुनिक संसाधन एवं स्थानीय संस्कृति और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा के अध्ययनों की रिपोर्ट पर विचार किया होगा। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना ही नहीं होना चाहिए, यह विद्यार्थियों को सक्षम और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सहायक बने, इसलिए कौशल एवं रोजगार को ध्यान में रखते हुए स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप कौशल, उद्यमिता, नवाचार तथा तकनिकी दक्षता पर बल देने के लिए पहले से ही तैयार कार्य नीति का विश्लेषण करेंगे।
उन्होंने कहा कि अपने देश सहित विश्व भर में हमारे पूर्व छात्र भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान का संवाहक बने हुए हैं। इन पूर्व छात्रों के कार्य तथा उनके द्वारा समाज सेवा, भारतीय शिक्षा में योगदान आदि पर विचार होगा। पूर्व छात्रों के संख्यात्मक डेटा और उपलब्धियों की जानकारियों का आदान-प्रदान भी करेंगे। देश भर की शिक्षा को समृद्ध करने के लिए हम 28 विषयों पर कार्य कर रहे हैं, इनमें इस वर्ष महिला आयाम को भी जोड़ा गया है। ऐसे कुल 29 विषयों की देश भर में स्थिति का आकलन तथा उनके परिणामों पर विचार किया जाएगा।
परिवर्तित विश्व के संदर्भ में शिक्षा और भारत की भूमिका को ध्यान में रखकर विद्यालयों को मात्र पर्यावरण पढ़ाने वाला नहीं, अपितु दीर्घकालिक प्रयोगशाला बनाने पर मंथन किया जाएगा। हमारे विद्यालयों में पांच आधारभूत विषयों शारीरिक शिक्षा, योग शिक्षा, संगीत शिक्षा, संस्कृत शिक्षा व नैतिक एवं अध्यात्मिक शिक्षा के माध्यम से शिक्षा में भारतीयता का समावेश करते हुए विश्व के लिए मॉडल सिद्ध हो रहे हैं। इन विषयों का भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति अनुरूप एवं वैश्विक दृष्टि से पाठ्यक्रम बने, यह भी इस बैठक का हिस्सा होगा।
उन्होंने कहा कि 25 सितम्बर 2026 को वन्देमातरम् के 150वें वर्ष को समर्पित एक स्वर, एक लय, एक समय में करोड़ों लोग राष्ट्रगीत का गायन करेंगे। इस कार्यक्रम की व्यवस्थाओं, अभिलेख आदि को अंतिम रूप कार्यकारिणी में दिया जाएगा। 1952 से शिक्षा क्षेत्र में कार्य करने वाली विद्या भारती का 2027 वर्ष अमृतमहोत्सव है, अत: इसकी संचालन समितियों एवं कार्यक्रम भी बैठक में तय होंगे।
उन्होंने बताया कि विद्या भारती अपने लक्ष्य अनुसार ऐसी शिक्षा प्रदान कर रही है, जिसमें विद्यार्थी अपनी जड़ों से जुड़ा हो, दृष्टि आधुनिक हो, ज्ञान में सक्षम हो, कौशल में दक्ष हो, चरित्र में दृढ़ हो और राष्ट्र एवं समाज के प्रति संवेदनशील हो। इसके क्रियान्वयन एवं परिणामों की समीक्षा होगी, जिससे भारत को ज्ञान सम्पन्न, आत्मनिर्भर और संस्कारित राष्ट्र बनाने में योगदान दिया जा सके।
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September 11th 2026, 7:01 am
अयोध्या में लघु उद्योग भारती की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की महत्वपूर्ण बैठक संपन्न
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अयोध्या। लघु उद्योग भारती की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक 7 एवं 8 सितंबर 2026 को अयोध्या की पावन भूमि पर संपन्न हुई। बैठक का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर लघु उद्योग भारती के अखिल भारतीय संगठन मंत्री प्रकाश जी, अखिल भारतीय अध्यक्ष मधुसूदन जी दादू, अखिल भारतीय संयुक्त महामंत्री नरेश पारीक जी एवं कोषाध्यक्ष महेश जी गुप्ता सहित राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पदाधिकारी एवं सदस्यगण उपस्थित रहे।
बैठक में देश के सभी प्रदेशों के अध्यक्ष, सचिव एवं कोषाध्यक्षों के साथ-साथ विभिन्न संभागों के अध्यक्ष एवं सचिवों की भी सहभागिता रही। इससे संगठन के कार्यों की व्यापक समीक्षा एवं आगामी योजनाओं पर विस्तृत विचार-विमर्श का अवसर प्राप्त हुआ।
प्रथम दिवस का शुभारंभ स्वागत उद्बोधन के साथ हुआ। इसके पश्चात विभिन्न क्षेत्र प्रभारियों द्वारा राज्यों के वृत्त एवं संगठनात्मक गतिविधियों की प्रस्तुति की गई। द्वितीय सत्र में संगठन के महत्वपूर्ण नव स्तंभों पर विस्तार से चर्चा हुई तथा संगठन को अधिक प्रभावी, सशक्त एवं परिणामोन्मुख बनाने के लिए आवश्यक कार्ययोजना पर विचार-विमर्श किया गया। तृतीय सत्र में वर्तमान औद्योगिक एवं व्यावसायिक परिवेश से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विशेषज्ञ प्रस्तुतियाँ एवं चर्चा हुई, जिसमें –
* उद्योग एवं व्यापार में AI का उपयोग
* सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के लिए रक्षा क्षेत्र में संभावनाएँ
* R&D एवं नई टेक्नोलॉजी
* SIDBI द्वारा प्रस्तुतीकरण एवं MSME के लिए उपलब्ध अवसर आदि विषय प्रमुख रहे।
इसके साथ ही महिला कार्य, वित्त एवं लेखा, रोजगार सृजन, कौशल विकास प्रकल्प, मास कम्युनिकेशन एवं IT सहित संगठन के विभिन्न महत्वपूर्ण आयामों पर भी चर्चा हुई। इन सभी विषयों के माध्यम से संगठन के कार्यों को अधिक प्रभावी, व्यवस्थित एवं परिणामोन्मुख बनाने तथा आगामी कार्यों की दिशा निर्धारित करने पर विशेष जोर दिया गया।
बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी का प्रेरणादायी एवं मार्गदर्शक उद्बोधन प्राप्त हुआ। उन्होंने वर्तमान समय में लघु उद्योगों एवं उद्यमियों की भूमिका, संगठन के दायित्वों तथा भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए आगामी कार्ययोजना एवं प्राथमिकताओं पर मार्गदर्शन प्रदान किया। उद्बोधन उपस्थित सभी कार्यकर्ताओं के लिए नई ऊर्जा, प्रेरणा एवं स्पष्ट दिशा प्रदान करने वाला रहा।
अयोध्या की पावन भूमि पर संपन्न राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक संगठनात्मक समीक्षा, अनुभवों के आदान-प्रदान, भविष्य की कार्ययोजना एवं संगठन के विस्तार की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रही। यह बैठक लघु उद्योग भारती के कार्यों को नई दिशा, गति और ऊर्जा प्रदान करने वाली रही।
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September 11th 2026, 7:01 am
भारत पर युद्ध थोपने वाले और करोड़ों लोगों की मौत के जिम्मेदार नेता को ‘महान’ बता रही CPI(M)…!!
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इतिहास में देश पर युद्ध थोपने वालों की प्रशंसा करना एक अत्यंत संवेदनशील, विवादास्पद विषय़ है। ऐसे में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी अर्थात CPI(M) ने माओ जेदोंग की 50वीं बरसी पर जो किया, वह सिर्फ एक सोशल मीडिया पोस्ट नहीं है। वह भारतीय राजनीति में उस वैचारिक सच्चाई का प्रदर्शन है, जिसे वर्षों से लोकतंत्र, संविधान, असहमति और मानवाधिकार की भाषा के पीछे छिपाया जाता रहा है।
09 सितंबर को CPI(M) के आधिकारिक अकाउंट से लिखा गया – “We salute the great revolutionary Mao Zedong, the main leader and strategist of the Chinese revolution.” यानी भारत की एक प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टी ने माओ को “महान क्रांतिकारी” बताते हुए उसे सलाम किया। इसमें न कोई आलोचनात्मक टिप्पणी थी, न माओ के शासन की भयावह मानवीय कीमत का उल्लेख था और न ही भारत के खिलाफ 1962 के युद्ध का कोई संदर्भ था।
यही वह एक वाक्य है, जिसे राजनीतिक विमर्श के सामने रखकर देखने की आवश्यकता है। क्योंकि उसी माओ के नेतृत्व में चीन ने भारत के खिलाफ 1962 का युद्ध लड़ा था और भारत के सैकड़ों सैनिक बलिदान हुए थे। यह उसी माओ की प्रशंसा है, जो चीन में करोड़ों लोगों की मौत से जुड़ा है।
ग्रेट लीप फॉरवर्ड के दौरान मौतों के अनुमान करोड़ों में हैं। The China Quarterly में प्रकाशित 2025 के शोध में माओ की नीतियों से जुड़े ग्रेट लीप फॉरवर्ड अकाल में 45 मिलियन तक मौतों का अनुमान दिया गया है। सांस्कृतिक क्रांति के ग्रामीण चीन पर प्रभाव का अध्ययन करने वाले Andrew Walder और Yang Su ने 7.5 लाख से 15 लाख मौतों और लगभग 3.6 करोड़ लोगों के राजनीतिक उत्पीड़न का अनुमान दिया था।
फिर भी भारत की एक कम्युनिस्ट पार्टी और विपक्षी गठबंधन के प्रमुख सहयोगी दल CPI(M) को माओ में सबसे पहले और सबसे प्रमुख रूप से क्या दिखाई देता है? “महान क्रांतिकारी।”
जब एक राजनीतिक पार्टी अपने आधिकारिक मंच से माओ को “great revolutionary” (महान क्रांतिकारी) कहती है, तो वह इतिहास नहीं पढ़ा रही होती, वह अपनी वैचारिक निष्ठा प्रदर्शित कर रही होती है। और इस वैचारिक निष्ठा की सबसे बड़ी बात यह है कि माओ की विरासत में चीनी क्रांति नहीं, बल्कि सत्ता के लिए निर्मम राजनीतिक हिंसा है, और सबसे महत्वपूर्ण भारत के खिलाफ युद्ध है।
1962 में चीन ने भारत पर हमला किया। उस समय चीन का सर्वोच्च नेता माओ जेडोंग था। अब 1962 का युद्ध कोई ऐसा सैन्य घटनाक्रम नहीं था, जिसे माओ से अलग करके देखा जा सके। माओ ने ही भारत पर हमला करने की रणनीति बनाई थी और सेना को हमला करने के लिए भेजा था। अध्ययन के अनुसार माओ का उद्देश्य भारत को दबाव में लाना और व्यापक अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक समीकरणों में चीन की स्थिति मजबूत करना था। अक्टूबर 1962 में माओ ने युद्ध का फैसला किया तथा 20 अक्टूबर को चीनी सेना ने भारतीय क्षेत्रों पर समन्वित हमला शुरू किया।
इसलिए जब एक राजनीतिक दल माओ को “महान क्रांतिकारी” कहकर सलाम करता है, तो वह किसी ऐसे विदेशी नेता को सम्मान नहीं दे रहा, जिसका भारत से कोई लेना देना नहीं था। वह उस व्यक्ति की प्रशंसा कर रहा है, जिसने शत्रु के रूप में भारत के खिलाफ युद्ध किया। यह तथ्य भारतीय राजनीतिक विमर्श में गायब क्यों हो जाता है? यह प्रश्न जितना CPI(M) से है, उतना ही उन लोगों से भी है जो CPI(M) के साथ राजनीतिक मंच साझा करते हैं और लोकतंत्र की नैतिकता पर बड़े बड़े भाषण देते हैं।
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September 11th 2026, 7:01 am
सम्पूर्ण समाज भाव से एकत्र हो, यही संघ कार्य की भावना है – डॉ. मनमोहन वैद्य जी
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भारत में धर्म, ‘रिलीजन’ शब्द का अर्थ नहीं है, समाज को देना चैरिटी है और समाज को वापस लौटाना धर्म है…
काशी। संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त काशी महानगर द्वारा आयोजित प्रमुख जन संवाद संगोष्ठी में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य डॉ. मनमोहन वैद्य जी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सम्पूर्ण समाज का संगठन है, सम्पूर्ण समाज एकात्म भाव से एकत्र हो, यही संघ कार्य की भावना है। संघ भारत का ‘स्व’ है।
उन्होंने कहा कि हमारी पहचान आध्यात्मिक है और इसी का नाम हिन्दुत्व है। संघ समाज जागरण, समाज परिवर्तन एवं व्यक्ति निर्माण का कार्य करता है। इस कार्य में समाज के प्रत्येक जन मानस की सहभागिता आवश्यक है। हम यह नहीं कह सकते कि हमें समय की कमी है। क्योंकि जिस प्रकार मछली पानी में रहती है, उसी प्रकार हम समय के मध्य में रहते हैं। धर्म की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में धर्म, ‘रिलीजन’ शब्द का अर्थ नहीं है, समाज को देना चैरिटी है और समाज को वापस लौटाना यह धर्म है। धर्म बांटता नहीं है, अपितु बांधता (जोड़ता) है।
मनमोहन वैद्य जी ने कहा कि भारत में ‘रिलीजन’ का अर्थ उपासना हो सकता है। विविधता में एकता, अनेकता में ऐक्य देखना, यही भारत का अन्तर्निहित धर्म है। व्यक्ति धर्म प्रवण बने और समाज धर्म आधारित हो, तब राष्ट्र बलवान होगा। प्राचीन भारत के वैभव का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ल्ड हिस्ट्री ऑफ इकॉनोमिक्स पुस्तक में उल्लेखित है कि ईस्वी सन् 1 से 1700 तक विश्व अर्थव्यवस्था में भारत की भागीदारी 33 प्रतिशत रही। चमड़ा उद्योग, धातु उद्योग, इत्र उद्योग, वस्त्र उद्योग में भारत विश्व में प्रमुख स्थान रखता था। महिलाएं घरों में उद्योग सम्भालती थी एवं पुरुष वर्ग वस्तु बेचने बाहर जाते थे। घर की सम्पदा का नियंत्रण घर की गृहणी के हाथ में था, इसी कारण महिलाएं गृह लक्ष्मी कही जाती थी। के. एम. मुंशी द्वारा लिखित पिलग्रिम टू फ्रीडम पुस्तक के अनुसार भारत का निर्यात ज्यादा था, आयात कम था। भारत के मन्दिर समाज के समृद्धि का केन्द्र थे। भारत में महिलाओं की स्थिति पर उन्होंने कहा कि भारत में महिलाओं की स्थिति आदिकाल से पुरुषों के समकक्ष रही है।
जिज्ञासा समाधान सत्र में एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि भारत दुनिया में अकेला राष्ट्र है जो अपने दो नामों के साथ आगे बढ़ रहा है। जबकि बर्मा ने स्वतंत्रता के पश्चात अपना नाम म्यांमार स्वीकार कर लिया। हम कौन हैं, जब तक यह तय नहीं होगा। हम अपनी प्राथमिकता तय नहीं कर सकते। स्व को नकारने की आदत प्रगतिशील बौद्धिकता के नाम पर भारत में स्वीकार की जाती रही है। परन्तु वर्तमान में वातावरण बदला है। राष्ट्रपति जी के आधिकारिक पत्र पर ‘इण्डिया’ के स्थान पर ‘भारत’ का प्रयोग हो रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि समाज भारत शब्द के प्रयोग को अपने दैनिक जीवन में स्वीकार करे, तब हमे ‘इण्डिया दैट इज़ भारत’ नहीं कहना होगा।
कार्यक्रम अध्यक्ष सनबीम शिक्षण समूह के निदेशक दीपक मधोक ने कहा कि शिक्षा राष्ट्र का प्रमुख रक्षक है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने शिक्षा को शेरनी का दूध कहा। शिक्षा द्वारा भारत की सेवा ही व्यक्ति का एकमेव ध्येय होना चाहिए। कार्यक्रम के प्रारम्भ में निवेदिता शिक्षा सदन की छात्राओं ने राष्ट्रगीत वन्देमातरम का गायन किया। काशी विभाग के विभाग संघचालक प्रो. जयप्रकाश लाल जी सहित मंचस्थ अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन किया।
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September 11th 2026, 2:15 am
लाल मंदिर में धमाका करना चाहता था उमर उन नबी – एनआईए की चार्जशीट में खुलासा
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नई दिल्ली। लाल किले के पास हुए बम ब्लास्ट के मामले में एनआईए की चार्जशीट में बड़ा खुलासा हुआ है। उमर-उन-नबी का असल इरादा चांदनी चौक स्थित लाल मंदिर के पास कार खड़ी करके धमाका करने का था। लेकिन, भारी ट्रैफिक और पुलिस की मौजूदगी देखकर वह अपनी योजना नहीं लागू कर सका। उसने कार घुमाई और लाल किले की तरफ चला गया।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने अदालत में चार्जशीट दाखिल की है। आतंकी हमले का मुख्य आरोपी उमर-उन-नबी को बनाया है। चार्जशीट में बताया गया है कि उसने कैसे योजना बनाई, कहां-कहां रुका और क्या-क्या सावधानियां बरतीं।
सीसीटीवी फुटेज में साफ दिता है कि 10 नवंबर की शाम 6:37 बजे उमर लाल मंदिर के पास कार पार्क करने की कोशिश कर रहा था। हालात अनुकूल न मिलने पर उसने यू-टर्न लिया। करीब 13 मिनट बाद शाम 6:50 बजे लाल किले के गेट नंबर चार के पास विस्फोट हो गया।
जांच एजेंसी की चार्जशीट के अनुसार, उमर ने आईईडी को रिमोट कमांड सिस्टम से विस्फोट किया। यह सिस्टम उसके एक जूते में लगा था। कार के पास मिला जूता और उसकी एड़ी से जुड़ा धातु का टुकड़ा फोरेंसिक जांच में भेजा गया। उसमें टीएटीपी, पोटैशियम और अमोनियम नाइट्रेट मिला। कार से मिले नमूनों का डीएनए उमर के माता-पिता से मिला, जिससे उसकी पहचान पक्की हुई।
जांच में पता चला कि उमर विस्फोटक को सुरक्षित रखने के लिए अपने कमरे को बहुत ठंडा रखता था। कमरे से दुर्गंध भी आती थी। उसने तैयार टीएटीपी को सुरक्षित रखने के लिए पानी भरने वाले बैग खरीदे थे। गवाहों ने बताया कि विस्फोटक मिश्रण को स्थिर रखने के लिए उसमें नियमित रूप से पानी डाला जाता था।
एनआईए के अनुसार, पुलिस की कार्रवाई के बाद फरार उमर नूंह में एक मकान में छिपा हुआ था। वहां भी उसका व्यवहार संदिग्ध था। मकान मालिक के परिवार की महिला सदस्य ने बताया कि वह बाहर जाकर पेशाब नहीं करता था। वह पेशाब को पॉलीथीन में जमा कर लेता था, जिससे कमरे में बदबू फैलने लगी थी। जांच में एक दस्तावेज भी मिला है, जिसमें यूरिया नाइट्रेट आधारित विस्फोटक बनाने की विधि बताई गई थी। उसमें यूरिया के स्रोत के तौर पर पेशाब से यूरिया निकालने का विकल्प भी लिखा था।
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September 10th 2026, 1:44 pm
मेवाड़ के जौहर पर सवाल नहीं, इतिहास को समझने की आवश्यकता
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मेवाड़ की धरती केवल किलों, महलों और स्थापत्य की भूमि नहीं है। यह वह भूमि है, जहां सत्ता से अधिक स्वाभिमान को महत्व दिया गया, जहां पराजय को स्वीकार करने से पहले अंतिम सांस तक संघर्ष करने की परंपरा रही और जहां इतिहास के सबसे कठिन दौर में भी अस्मिता की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। यही कारण है कि मेवाड़ के जौहर और साके का उल्लेख आज भी केवल इतिहास की घटना के रूप में नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति और शौर्य परंपरा के रूप में किया जाता है।
ऐसे में जब जौहर जैसी ऐतिहासिक घटनाओं को आधुनिक राजनीतिक या सामाजिक विमर्श के चश्मे से देखकर उन पर सवाल खड़े किए जाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से राजस्थान और विशेषकर मेवाड़ में भावनाएं आहत होती हैं। अपने विवादित बयानों से चर्चा में रहने का शौक रखने वाली एक महिला की ‘पद्मावत’ और जौहर के चित्रण को लेकर की गई टिप्पणी ने इसी संवेदनशील मुद्दे को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है।
इतिहास संकलन समिति चित्तौड़ प्रान्त के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. विवेक भटनागर ने कहा – मेवाड़ की परंपरा में जौहर को लेकर भावनाएं अत्यंत गहरी हैं। चित्तौड़गढ़ के दुर्ग ने बार-बार ऐसे दौर देखे जब महीनों की घेराबंदी के बाद विजय की संभावना समाप्त हो गई। ऐसे समय में महिलाओं और पुरुषों ने अलग-अलग, लेकिन अपने-अपने तरीके से अंतिम निर्णय लिए। महिलाओं ने जौहर किया और पुरुषों ने केसरिया धारण कर अंतिम युद्ध के लिए प्रस्थान किया।
यह इतिहास किसी एक व्यक्ति की कल्पना से निर्मित नहीं हुआ। इसके पीछे युद्धों, घेराबंदियों, सत्ता संघर्षों और उस समय की सामाजिक परिस्थितियों का लंबा इतिहास है। इसलिए जौहर की चर्चा करते समय उसके ऐतिहासिक संदर्भ को हटाकर केवल आज की दृष्टि से उसका मूल्यांकन करना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।
चित्तौड़गढ़ के इतिहास में तीन बड़े साके विशेष रूप से स्मरण किए जाते हैं।
पहला साका 1303 में अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ अभियान से जुड़ा है। राणा रतन सिंह के काल से संबंधित इस प्रसंग ने चित्तौड़ के इतिहास में एक ऐसी गाथा को जन्म दिया जो सदियों से लोकस्मृति का हिस्सा है।
दूसरा साका 1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह के आक्रमण के दौरान हुआ। इस दौर में रानी कर्णावती और चित्तौड़ की महिलाओं के जौहर का उल्लेख मिलता है।
तीसरा साका 1567-68 में अकबर के चित्तौड़ अभियान के दौरान हुआ। जयमल और पत्ता के नेतृत्व में राजपूत योद्धाओं ने मुगल सेना का सामना किया। दुर्ग के पतन से पहले जौहर और उसके बाद केसरिया धारण कर अंतिम युद्ध में उतरने की परंपरा ने इस घटना को मेवाड़ के इतिहास में अमर कर दिया।
जौहर को समझने के लिए एक बात स्पष्ट करनी होगी – उस दौर के राजपूत समाज में युद्ध केवल सेनाओं के बीच संघर्ष नहीं था। किसी दुर्ग की पराजय का अर्थ उसके भीतर रहने वाले लोगों का शत्रु के हाथों पड़ना भी हो सकता था। मध्यकालीन युद्धों में बंदी बनाए जाने, दास बनाए जाने और महिलाओं के साथ हिंसा के ऐतिहासिक उदाहरण मिलते हैं।
इसी भयावह युद्ध-परिस्थिति में जौहर जैसी परंपरा विकसित हुई। इसे केवल ‘आत्मदाह’ कहकर छोड़ देना उस पूरे ऐतिहासिक संदर्भ को छोटा कर देना है, जिसके भीतर इन घटनाओं को समझना चाहिए। और यहीं से आधुनिक बहस और ऐतिहासिक स्मृति के बीच टकराव पैदा होता है।
आज के दौर में यह कहना बिल्कुल उचित है कि किसी भी महिला को यौन हिंसा के बाद जीवित रहने के लिए दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। जीवन बचाना कायरता नहीं है और किसी पीड़िता की गरिमा उसके जीवित रहने से कम नहीं होती।
लेकिन इसी आधुनिक सिद्धांत को आधार बनाकर सदियों पहले युद्ध की आग में अपने सामने उपलब्ध विकल्पों के बीच निर्णय लेने वाली महिलाओं को अपमानित करना भी उचित नहीं हो सकता।
इतिहास को समझना और इतिहास का न्याय करना – दो अलग बातें हैं।
मेवाड़ की वीरांगनाओं ने जिस सामाजिक, राजनीतिक और युद्धकालीन परिस्थिति में निर्णय लिया, उसे समझे बिना उनके निर्णय पर आज की भाषा में टिप्पणी करना ऐतिहासिक संदर्भों को नजरअंदाज करना होगा। और यही वह बिंदु है, जहां मेवाड़ की भावनाएं सबसे अधिक संवेदनशील हो जाती हैं।
मेवाड़ की शौर्यपूर्ण परंपरा किसी राजनीतिक दल या किसी एक विचारधारा की संपत्ति नहीं है। महाराणा प्रताप, पन्नाधाय, रानी पद्मिनी, रानी कर्णावती और चित्तौड़ के अनगिनत ज्ञात-अज्ञात वीर-वीरांगनाओं की स्मृति इस भूभाग की सामूहिक विरासत है। इस विरासत से असहमति हो सकती है। जौहर जैसी परंपरा की आधुनिक दृष्टि से आलोचना भी की जा सकती है। लेकिन आलोचना और उपहास के बीच एक स्पष्ट सीमा होती है। उस सीमा का सम्मान होना चाहिए।
मेवाड़ की शौर्यगाथाओं को लेकर किसी भी तरह की ऐसी टिप्पणी, जिसमें बलिदान देने वाली महिलाओं के साहस, उनके निर्णय या उनकी ऐतिहासिक स्मृति की खिल्ली उड़ती प्रतीत हो, स्वाभाविक रूप से विरोध पैदा करेगी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि जौहर पर भावनात्मक बहस से आगे बढ़कर गंभीर ऐतिहासिक विमर्श हो। इतिहासकार स्रोतों की पड़ताल करें, साहित्य और लोक परंपरा के बीच अंतर स्पष्ट करें और मध्यकालीन युद्धों की वास्तविक परिस्थितियों को सामने रखें। लेकिन, मेवाड़ की शौर्य परंपरा को कटघरे में खड़ा करना या बलिदान की उस स्मृति को हल्का करके देखना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
मेवाड़ ने सदियों तक आक्रमणों का सामना किया है। चित्तौड़ की प्राचीरों ने युद्ध देखे हैं, रक्त देखा है, जौहर की अग्नि देखी है और केसरिया पहनकर रणभूमि में उतरते योद्धाओं को देखा है।
आज उन घटनाओं को देखने का नजरिया अलग हो सकता है, लेकिन उनका ऐतिहासिक अस्तित्व मिटाया नहीं जा सकता। सख्त संदेश यही है कि – मेवाड़ की परंपराओं पर प्रश्न कीजिए, शोध कीजिए, बहस कीजिए; लेकिन उन वीरांगनाओं के बलिदान की खिल्ली उड़ाने की हिमाकत मत कीजिए, जिनकी स्मृति सदियों से इस भूमि की सामूहिक चेतना में जीवित है।
क्योंकि इतिहास पर असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन किसी समाज की वीरगाथाओं और बलिदान की स्मृति का उपहास करना संवेदनशीलता की सीमाओं को लांघना है। समाज अपने इतिहास पर गर्व करता है – और अपने इतिहास के सम्मान की आवाज उठाना उसका अधिकार भी है और जिम्मेदारी भी।
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September 10th 2026, 1:44 pm
भारत ही एक ऐसा दैश है जो विश्व में सुख-शांति की कामना करता है – रामलाल जी
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गोरखपुर। संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त गोरखपुर महानगर द्वारा सरस्वती शिशु मंदिर पक्कीबाग में आयोजित “युवा उद्यमी संवाद” में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल जी ने कहा कि संघ की 100 वर्ष की यात्रा पूरी हुई है। यह यात्रा सामान्य नहीं रही, तमाम पाबंदी और झंझावात को झेल कर संघ आगे बढ़ा है। संघ ने शुरु से ही उपहास एवं उपेक्षा का सामना किया है, इसलिए संघ उपेक्षा एवं विरोध से घबराता नहीं है। संघ की स्थापना देश-समाज के लिए अच्छा करने के लिए, भारत को बड़ा बनाने के लिए हुई है। देश में आपदा आती है तो संघ का स्वयंसेवक सबसे आगे खड़ा होता है। इस बात की सराहना सभी करते हैं।
उन्होंने कहा कि संघ सदैव वसुधैव-कुटुंबकम का विचार लेकर कार्य करता है। संघ सकारात्मक सोच के साथ चलता है। शताब्दी वर्ष में जिनको विरोधी माना जाता है वो भी संघ से प्रभावित हुए, ऐसा सामने आया है। अभी तक 10 करोड़ से ऊपर परिवारों में चाहे वो किसी भी धर्म, जाति, पंथ के हों, सबसे संपर्क हुआ है। संघ प्रयास करता है कि युवा पीढ़ी अच्छा सोचे, अच्छा बोले एवं अच्छा करे, यही देशभक्ति है। आज युवा पीढ़ी के योगदान के कारण भारत विश्व स्तर पर अग्रणी देशों की आँखों में आँखें डालकर बात कर रहा है। विश्व में भारत की स्वीकार्यता बढ़ रही।।
उन्होंने कहा कि भारत ही एक ऐसा देश है जो विश्व में सुख-शांति की कामना करता है और उसके लिए काम करता है। विदेश के लोग भी कहते हैं कि भारत को समझना है तो हमें स्वामी विवेकानंद जी की दृष्टि से देखना होगा। सबके कल्याण और विश्व शांति के लिए सोचना, यही हमारे ऋषि मुनियों ने सिखाया है। भारत को विश्व गुरु माना गया, क्योंकि भारत ने ज्ञान-विज्ञान दिया।
उन्होंने कहा कि हम सभी भारत मां के पुत्र-पुत्री हैं तो हमारा आपस में संबंध है, इसलिए समस्त भिन्नताओं के बाद भी हम एक हैं। लेकिन आज बहुत सी ताकतें, बहुत से देश भारत को तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में हमें समझना होगा कि भारत के लिए क्या अच्छा है। उन्होंने कहा कि भारत देश को पुनः विश्वगुरु बनाने में युवाओं को बड़ी भूमिका निभानी है। संघ ने शताब्दी वर्ष में समाज परिवर्तन के लिए पंच परिवर्तन का सूत्र दिया है। पर्यावरण संरक्षण, कुटुंब प्रबोधन, नागरिक कर्तव्यबोध, समाजिक समरसता और स्वदेशी, सकारात्मक परिवर्तन के लिए इन पांच सूत्रों को समस्त समाज तक पहुंचाना है।
संवाद सत्र के दौरान रामलाल जी ने युवाओं की जिज्ञासाओं का समाधान भी किया। कार्यक्रम अध्यक्ष युवा उद्यमी समीक्षक रामानी ने भी अपने विचार कार्यक्रम का समापन वन्देमातरम के साथ हुआ। संवाद कार्यक्रम में युवा व्यवसायी, डॉक्टर, वकील, उद्यमी, चार्टड एकाउंटेंट, इंजीनियर सम्मिलित हुए।
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September 10th 2026, 1:44 pm
पुस्तक समीक्षा – न्यूजरूम के यथार्थ से जोड़ती संपादन-कला
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सोशल मीडिया के दौर में एक बात सबको साफ़ समझ आ गई है कि पत्रकारिता में संपादन का बहुत महत्व है। पत्रकारिता केवल रिपोर्टिंग नहीं है। यह सत्य है कि पत्रकारिता में जानकारी एकत्र करके लाना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण कार्य है, यह तय करना कि उस जानकारी को किस प्रकार से प्रसारित करना है – या प्रसारित करना भी है या नहीं? संपादन की अच्छी समझ होने पर ही हम उस जानकारी को लोकोपयोगी बना सकते हैं।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकारिता की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता बहुत हद तक उसके संपादन पक्ष पर टिकी होती है। इसलिए संपादन-कला का कौशल सबको सीखना चाहिए। सूचनाओं के प्रचार-प्रसार में शामिल सभी लोगों को संपादन की बुनियादी बातें पता होनी चाहिए। मीडिया के आचार्य रहे वरिष्ठ लेखक एवं बिहार लोक सेवा आयोग के सदस्य प्रो. अरुण कुमार भगत की पुस्तक ‘संपादन-कला : सिद्धांत से व्यवहार तक’, इन बुनियादी बातों को सिखाने में बहुत उपयोगी साबित होगी। पुस्तक के शीर्षक और उसकी विषय-वस्तु को देखकर यह अनुमान न लगाएं कि यह केवल पत्रकारिता के विद्यार्थियों के उपयोग की पुस्तक है। यह उन सबके लिए उपयोगी है, जो सोशल मीडिया में लिख-पढ़ रहे हैं।
प्रो. भगत ने अपने अनुभव का निचोड़ इस पुस्तक में उतार दिया है। उन्होंने संपादन को एक जीवंत शिल्प, सौंदर्य और प्रबंधन कौशल के रूप में प्रस्तुत किया है। पुस्तक के आरंभ में लेखक ने संपादन के अर्थ और अवधारणा को परिभाषित किया है ताकि कोई भी संपादन कला को केवल सामग्री की काट-छाँट तक सीमित करके न देखे। सामान्य तौर पर संपादन का अर्थ यह लगाया जाता है कि किसी समाचार या पाठ्य सामग्री को छोटा करने के साथ-साथ उसे चुस्त-दुरुस्त करना। संपादन का अर्थ अनेक अवसरों पर सामग्री का विस्तार करना भी होता है। सामग्री में तथ्यों की कोई कमी दिखे तो उसे जोड़ना भी संपादन है।
लेखक ने संपादन कला को और सरल ढंग से समझाने के लिए बताया है कि जिस प्रकार माली बगीचे को सजाता है और मूर्तिकार अनगढ़ पत्थर को तराशकर सजीव बना देता है, उसी प्रकार संपादक कच्ची सामग्री को परिमार्जित कर उसे पठनीय और संप्रेषणीय बनाता है। इसमें केवल सामग्री का संक्षेपण ही नहीं, बल्कि आवश्यकतानुसार ‘वैल्यू एडिशन’ (पल्लवन) और संदर्भ जोड़ना भी शामिल है।
लेखक प्रो. भगत ने पूरा ध्यान रखा है कि पुस्तक संपादन के सैद्धांतिक पक्ष से परिचय कराने के साथ-साथ व्यावहारिक कौशल भी सिखाए। यह पुस्तक पाठकों को सीधे न्यूजरूम की कार्यप्रणाली से जोड़ती है। इसलिए पाठकों को पत्र-पत्रिकाओं के आंतरिक कार्यालयीन स्वरूप, संपादकीय कक्ष की संरचना, पदानुक्रम और कार्य-प्रणाली का सूक्ष्म विवरण मिलता है। एक अध्याय में आकर्षक शीर्षक लिखने के सूत्र भी दिए गए हैं। आपने अच्छी कहानी या समाचार लिखा है, लेकिन उसके शीर्षक में दम नहीं है, तब आपको अपेक्षित संख्या में पाठक नहीं मिलेंगे। पाठकों को आमंत्रित करने का काम शीर्षक ही करता है। इसलिए इस अध्याय में शीर्षक की आत्मा, उसके प्रकार, तकनीक और सौंदर्य को जानने के साथ ही आकर्षक एवं तथ्यपरक शीर्षक गढ़ने की कला सीखते हैं। पुस्तक में संपादन के साथ-साथ सामग्री के प्रस्तुतिकरण, ले-आउट एवं डिजाइन पर उपयोगी सैद्धांतिक सामग्री दी गई है।
भाषा-शैली और दृष्टि
लेखक प्रो. भगत की लेखन-शैली की सबसे बड़ी खूबी उनकी प्रांजल, प्रवाहपूर्ण और मानक हिंदी है। वे जटिल तकनीकी अवधारणाओं को भी सहज और ग्राह्य उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट करते हैं। पुस्तक में सैद्धांतिक परिभाषाओं के साथ-साथ व्यावहारिक सुझावों का जो संतुलन साधा गया है, वह लेखक के अकादमिक और व्यावहारिक अनुभव की गहरी छाप छोड़ता है। एक और बहुत महत्व की बात है -लेखक ने विदेशी विद्वानों की अपेक्षा भारत के मूर्धन्य पत्रकारों एवं लेखकों के दृष्टिकोण से संपादन कला को परिभाषित किया है। सामान्य तौर पर लेखक किसी भी विषय के सैद्धांतिक पक्ष को परिभाषित करने के लिए विदेशी विद्वानों को उद्धृत करते हैं।
हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में संपादन पर पुस्तकों का अभाव नहीं है, परंतु ऐसी कृतियाँ कम हैं जो संपादकीय डेस्क के दैनिक दबाव, समय-सीमा (डेडलाइन), पुनर्लेखन की चुनौतियों और विजुअल एस्थेटिक्स को एक साथ समाहित करती हों। यह पुस्तक इस शून्यता को प्रभावी ढंग से भरती है। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित प्रो. अरुण कुमार भगत की पुस्तक ‘संपादन कला : सिद्धांत से व्यवहार तक’ पत्रकारिता एवं जनसंचार के विद्यार्थियों, शोधार्थियों, मीडिया प्राध्यापकों और मुख्यधारा की पत्रकारिता में कार्यरत उप-संपादकों के लिए एक उपयोगी एवं मार्गदर्शक पुस्तक सिद्ध होगी।
पुस्तक : संपादन कला : सिद्धांत से व्यवहार तक
लेखक: अरुण कुमार भगत
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
पृष्ठ संख्या: 160
मूल्य: ₹325
डॉ. लोकेन्द्र सिंह (समीक्षक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।)
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September 10th 2026, 1:44 pm
हिन्दू को किसी एक परिभाषा, वेष या पूजा पद्धति में नहीं बांधा जा सकता – चंपत राय जी
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अयोध्या, 7 सितंबर। विश्व हिन्दू परिषद के 62वें स्थापना दिवस पर कारसेवकपुरम सभागार में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य वक्ता एवं विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय उपाध्यक्ष चम्पत राय जी ने कहा कि देश के 15 हजार से अधिक संतों ने जब हिन्दू पर से आलस्य की राख हटाई, उसकी परिणिति श्री राम जन्मभूमि मंदिर के रूप में हुई।
इस अवसर पर विभिन्न वेद एवं संस्कृत विद्यालय के बटुकों को विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना का कारण एवं कार्यप्रणाली की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि हिन्दू को किसी एक परिभाषा, वेष या पूजा पद्धति में नहीं बांधा जा सकता है। हमारे त्योहार, उत्सव हमें एक सूत्र में पिरोते हैं। गत दो शताब्दियों की चर्चा करते हुए बताया कि एक समाज ऐसा भी है, जिसे अंग्रेज पानी के जहाज में भरकर विश्व के विभिन्न समुद्री टापुओं पर मजदूरी कराने ले गए और वहीं छोड़ दिया। वे लोग अपने साथ गोस्वामी तुलसीदास जी की रामचरितमानस या गीता लेकर गए। उसी पुस्तक ने उन्हें आज भी हिन्दुत्व से जोड़ रखा है। वे भारत की धरती से दूर हैं, हिन्दी नहीं जानते पर स्वयं को हिन्दू मानते हैं। मॉरिशस, त्रिनिडाड, म्यांमार, सूरीनाम, फिजी कुछ ऐसे ही देश हैं।
उन्होंने कहा कि गुरु गोलवलकर जी के मन में विचार आया कि विश्व के समस्त हिन्दुओं को एक सूत्र में बांधने के लिए एक गैर राजनीतिक संगठन बने जो हिन्दुओं के हित के लिए काम करे। वर्ष 1964 की जन्माष्टमी के दिन सांदीपनी साधनालय मुंबई में स्वामी चिन्मयानंद जी के आश्रम में विश्व हिन्दू परिषद नामक संस्था की नींव पड़ी। इसका उद्देश्य मुख्य रूप से हिन्दू समाज में धर्मान्तरण रोकना, परावर्तन, छुआछूत की कुरीति दूर करना, साक्षर, संस्कारवान व आर्थिक रूप से विकसित बनाना रखे गए। यह संगठन आज भारत के 75 हजार से अधिक गांवों शहरों के अलावा विश्व के 25 देशों में वहां के कायदे कानून मानते हुए काम कर रहा है। इसका मार्गदर्शक संतों को बनाया गया है।
कार्यक्रम का प्रारंभ रामवल्लभाकुंज के महंत राजकुमार दास व चम्पत राय ने भारत माता तथा राम परिवार के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलित कर किया। विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय मंत्री हरिशंकर ने विषय अवधारणा प्रस्तुत की।
महंत राजकुमार दास जी ने आशीर्वचन में कहा कि हमें एक ही प्रयास में चिंतन करना चाहिए कि “तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें”। संचालन आचार्य ऋषभ व प्रदीप ने किया। विद्यालय के बटुकों ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया।
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September 9th 2026, 7:54 am
छत्तीसगढ़ के लोकजीवन का जीवंत उत्सव पोला तिहार
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हमारी लोक संस्कृति के तीज-त्यौहारों में मनुष्य और प्रकृति के बीच बने हुए आत्मीय संबंधों की बेल भी गुंथी हुई है। हमारे लोक पर्वों में कहीं वृक्षों की पूजा होती है, कहीं नदियों और जलस्रोतों की, कहीं अन्न की तो कहीं पशुधन की। छत्तीसगढ़ का पोला तिहार भी इसी लोकजीवन का एक ऐसा पर्व है, जिसमें खेती, धान, बैल, किसान और लोक संस्कृति एक साथ दिखाई देते हैं। भादो मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह तिहार विशेष रूप से बैलों के सम्मान और कृषि जीवन के प्रति कृतज्ञता का पर्व है।
प्राचीन काल से बैल किसान के सबसे महत्वपूर्ण साथी रहे हैं। हल चलाने से लेकर खेत तैयार करने और अनाज को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने तक बैलों का उपयोग होता रहा है। जिसके पास हल-बैल और बैलगाड़ी होती थी, उसकी किसानी समय पर सबसे पहले होती थी। जिसके पास बैल नहीं होते थे, उसे दूसरे किसान का मुंह ताकना पड़ता था। इसीलिए किसान के लिए बैल केवल पशु नहीं, बल्कि उसकी खेती और गृहस्थी के सदस्य रहे हैं।
मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैलों की कथा’ याद आती है, जिसमें हीरा और मोती नाम के दो बैलों की कहानी है। खेती में जितना परिश्रम मनुष्य करता है, उतना ही परिश्रम बैल भी करते हैं। किसान और बैल अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार मिलजुल कर खेती का काम पूरा करते हैं। यही कारण है कि पोला तिहार में किसान अपने सहयोगी के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करता है। आज खेती में ट्रैक्टर और अनेक प्रकार की मशीनें आ गई हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन में पशुधन का महत्व अभी भी बना हुआ है।
इस समय धान के पौधों की बाली में दूध भरने लगता है। स्थानीय बोली में इसे धान का पोटराना कहा जाता है। धान की बालियों के भीतर दूध भरने और उसके विकसित होने की प्रक्रिया को ग्रामीण जीवन में गर्भ धारण करने के भाव से देखा गया है। इसी कारण पोला से जुड़ा हुआ एक नाम गर्भाही तिहार भी है।
किसान के लिए धान का पौधा केवल अन्न पैदा करने वाला पौधा नहीं है, वह बेटी की तरह है। जिसके भीतर नया जीवन विकसित हो रहा है। जैसे गर्भ धारण करने वाली बेटी के लिए मायके से सधौरी भेजी जाती है, उसी तरह धान के पौधों में पोटराने पर किसान उसके प्रति अपना स्नेह प्रकट करता है। इसी भाव से पोला के दिन खेत में चीला चढ़ाने की परंपरा है।
किसान घर में गेहूं अथवा चावल का चीला बनवाता है। पूजा की सामग्री लेकर खेत में जाता है और खेत के एक मेड़ पर पूजा अर्चना कर चीला अर्पित करता है। उसकी कामना यही होती है कि फसल पुष्ट हो, उसमें किसी प्रकार का रोग-दोष न लगे और खेत अनाज से भर जाए।
पोला की पूर्व रात्रि में जब गांव के अधिकांश लोग निद्रालीन होते हैं, तब गांव के गणमान्य किसान, बैगा के साथ मिलकर ग्राम देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। गांव के भीतर और बाहर, खेत-खार में स्थित देवी-देवताओं के स्थानों पर होम-धूप और नारियल चढ़ाया जाता है। कामना की जाती है कि धान की फसल अच्छी हो, उसमें बीमारी न लगे और खेतों में भरपूर पैदावार हो।
पोला का एक सुंदर पक्ष बच्चों से जुड़ा हुआ है। पोला के कुछ दिन पहले से ही गांव और कस्बों के बाजारों में मिट्टी के नांदिया बैल तथा मिट्टी से बने गृहस्थी के सामान बिकने लगते हैं। जांता, चूल्हा, हंडी, पोरा, कनौजी जैसे मिट्टी के बरतन बच्चों को विशेष रूप से आकर्षित करते हैं। पूजा करने के लिए जोड़ा बैल बिसाए जाते हैं। इनमें बांस की खपच्चियों से चक्के लगाए जाते हैं, राखी बांधकर श्रृंगार किया जाता है। फिर होम-धूप देकर चीला चढ़ाया जाता है।
पूजा के बाद लड़के इन नांदिया बैलों को चलाते हैं और लड़कियां मिट्टी के चूल्हा, चक्की, हंडी आदि से घर-गृहस्थी का खेल खेलती हैं। बच्चों का यह खेल देखने में भले ही साधारण लगे, लेकिन इसके भीतर ग्रामीण जीवन की पूरी तस्वीर दिखाई देती है। लड़के खेती और पशुधन से जुड़े काम के महत्व को समझते हैं और लड़कियां घर-गृहस्थी के। इस तरह खेल-खेल में अगली पीढ़ी कृषि कार्य के लिए तैयार हो जाती है।
पोला के दिन सुबह बैलों को नहलाया जाता है। उनके सींगों को रंग से पोता जाता है। देह पर रंग-बिरंगे छल्ले बनाए जाते हैं और खुर भी रंगे जाते हैं। इसके बाद पूजा-पाठ कर उनकी आरती उतारी जाती है। नौजवान अपनी बैल जोड़ी को घुंधरू और घंटी से सजाते हैं। जिस बैल के साथ किसान पूरे वर्ष खेत में मेहनत करता है, उसी को इस दिन सजा-संवारकर सम्मान दिया जाता है। किसान उसके सामने अपनी कृतज्ञता प्रकट करता है। पशु और मनुष्य के बीच संबंध का इससे सुंदर लोक रूप और क्या हो सकता है।
कई गांवों में बैलों की दौड़ भी आयोजित होती है। सजे हुए बैल जब मैदान में दौड़ते हैं तो चारों ओर उत्साह दिखाई देता है। बैल दौड़ में जीतने वाली जोड़ी को पुरस्कार और सम्मान दिया जाता है। यह केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि पशुधन के प्रति ग्रामीण समाज के लगाव का भी प्रदर्शन है।
पोला के दिन गांव में उत्सव का वातावरण रहता है। प्रत्येक घर में तेलई चढ़ती है और तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं। घर आए हित-मित को भोजन कराया जाता है। लोग एक दूसरे के घर जाकर हाल-चाल जानते हैं। इस तरह यह तिहार केवल बैलों का नहीं रहता, बल्कि बच्चों, नौजवानों और सियानों सभी का तिहार बन जाता है।
शाम के समय गांव की युवतियां अपनी सहेलियों के साथ गांव के बाहर मैदान अथवा चौराहे पर जाती हैं। जहां साहडा देव का स्थान होता है, वहां मिट्टी के पोरा को ले जाकर पोरा पटकने की परंपरा भी दिखाई देती है। इस तरह पोला तिहार मनता है और आगामी तीजा की तैयारियां शुरु हो जाती हैं।
आचार्य ललित मुनि
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September 9th 2026, 7:54 am
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बरेली दंगा मामले में मुस्लिम धर्मगुरु तौकीर रज़ा की ज़मानत याचिका खारिज की
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प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मौलाना तौकीर रजा की ज़मानत याचिका खारिज कर दी। उन पर सितंबर 2025 में बरेली में हिंसा भड़काने का आरोप था।
न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव ने कहा कि आरोपी मौलाना तौकीर रज़ा ने अपने धार्मिक और राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था। न्यायालय ने पाया कि यह सब बिना आधिकारिक अनुमति के किया गया। न्यायालय ने इस दलील को खारिज कर दिया कि अनुमति न मिलने के कारण इस्लामिया इंटर कॉलेज ग्राउंड में इकट्ठा होने का आह्वान रद्द कर दिया गया था। न्यायालय ने गौर किया कि मार्च फिर भी निकाला गया और जब पुलिस ने रोका, तो दंगे हुए और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया।
पीठ ने कहा, “घटना के बाद आवेदक का व्यवहार – जिसमें उन्होंने बड़ी संख्या में लोगों के आने के लिए उनका धन्यवाद किया और उनके कार्यों की सराहना की – उसे भी सही नहीं ठहराया जा सकता।”
“न्यायालय राज्य के वरिष्ठ वकील/एडिशनल एडवोकेट जनरल अनूप त्रिवेदी की इस दलील से सहमत है कि ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सज़ा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा’ का नारा कानून के अधिकार के साथ-साथ भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए एक चुनौती है और यह लोगों को सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाता है, जो कानून के तहत दंडनीय है।”
न्यायालय ने कहा कि ऐसे नारे की तुलना ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु-अकबर’, ‘जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल’, ‘जय श्री राम’ या ‘हर-हर महादेव’ जैसे नारों से नहीं की जा सकती, जो संबंधित ईश्वर या गुरु के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं।
दिसंबर 2025 में, उच्च न्यायालय ने एक सह-आरोपी की ज़मानत याचिका खारिज करते समय इसी तरह की बातें कही थीं। न्यायालय ने कहा था कि ऐसे नारे का इस्तेमाल न केवल भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 (भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाला कृत्य) के तहत दंडनीय होगा, बल्कि यह इस्लाम के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ है।
लोगों और पुलिस के बीच झड़प के बाद, 25 नामज़द और 1,700 अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी। इसके बाद, पुलिस ने जांच के आधार पर नामजद अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार किया और अज्ञात लोगों की पहचान की।
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September 9th 2026, 7:54 am
श्रीनिवासन हत्या मामले में केरल उच्च न्यायालय ने पीएफआई के 3 सदस्यों की ज़मानत याचिका खारिज की
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कोच्चि। केरल उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता श्रीनिवासन की हत्या की साजिश रचने वाले पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) के तीन सदस्यों को ज़मानत देने से इनकार कर दिया। तीनों पर वर्ष 2022 में पलक्कड़ में संघ कार्यकर्ता श्रीनिवासन की हत्या की साज़िश रचने का आरोप है।
न्यायमूर्ति अनिल के. नरेंद्रन और मुरली कृष्णा एस. की खंडपीठ ने अशरफ एस. उर्फ करमना अशरफ मौलवी (आरोपी नंबर 2), अब्दुल खादर उर्फ इकबाल (आरोपी नंबर 19) और फिरोज उर्फ थम्पी (आरोपी नंबर 20) की अलग-अलग अपीलें खारिज कर दीं।
तीनों आरोपियों ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी की विशेष अदालत द्वारा जमानत याचिका करने के निर्णय को चुनौती दी थी। श्रीनिवासन की हत्या 16 अप्रैल, 2022 को हुई थी। मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने की थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीएफआई के सदस्यों ने ‘रिपोर्टर विंग’ नाम के एक ग्रुप के माध्यम से पलक्कड़ में कई हिन्दू कार्यकर्ताओं के बारे में जानकारी जुटाई थी और संभावित टारगेट की पहचान की थी। इसके बाद, हिन्दू समुदाय और आम जनता के बीच दहशत फैलाने के लिए एक प्रमुख नेता की हत्या की साज़िश रची गई, जिसके परिणामस्वरूप श्रीनिवासन की हत्या हुई।
अशरफ, जो कथित तौर पर पीएफआई की एजुकेशन विंग के नेशनल इंचार्ज और ऑल इंडिया इमाम काउंसिल का वाइस-प्रेसिडेंट था, पर पीएफआई कैडर की भर्ती करने और हथियारों की ट्रेनिंग का इंतज़ाम करने और उसकी देखरेख करने की बड़ी साज़िश का हिस्सा होने का आरोप है।
अब्दुल और फ़िरोज़ पर श्रीनिवासन की हत्या से जुड़ी घटनाओं में सीधे तौर पर शामिल होने का आरोप है। आरोप है कि वे दोनों हत्या से पहले साज़िश की बैठकों में शामिल हुए थे और हमलावरों के साथ अपराध स्थल की ओर गए थे।
फ़िरोज़ पर घातक हथियार रखने और उस ‘हमलावर टीम’ की मदद करने का भी आरोप है, जिसने कथित तौर पर श्रीनिवासन की हत्या की थी।
आरोपियों ने हिरासत में बिताए समय और ट्रायल पूरा होने में हो रही देरी का हवाला देते हुए ज़मानत की मांग की थी। हालांकि, उच्च न्यायालय ने उन्हें ज़मानत देने से इनकार करने के स्पेशल कोर्ट के फ़ैसले में दखल देने से मना कर दिया।
न्यायालय ने कहा कि इस मामले में सिर्फ़ लंबे समय तक जेल में रहने और देरी के आधार पर ज़मानत नहीं दी जा सकती, विशेषकर इसलिए क्योंकि आरोपियों पर लगे आरोप बहुत गंभीर हैं। इनमें हत्या, इंडियन पीनल कोड, 1860 के तहत आपराधिक साज़िश और अनलॉफुल एक्टिविटीज़ (प्रिवेंशन) एक्ट, 1967 (UAPA) के तहत आतंकवादी गतिविधियों और साज़िश से जुड़े अपराध शामिल हैं, जिनमें से कुछ के लिए अधिकतम सज़ा मौत या उम्रकैद है।
न्यायालय ने कहा कि एक आरोपी को दी गई ज़मानत अपने आप दूसरे आरोपी को नहीं दी जा सकती, सिर्फ़ इसलिए कि वे एक ही मामले में आरोपी हैं। कथित अपराध में हर आरोपी की खास भूमिका, घटना के संबंध में उनकी स्थिति और उन पर लगे आरोपों की गंभीरता पर अलग-अलग विचार किया जाना चाहिए। न्यायालय ने कहा, “समानता का नियम यहाँ लागू नहीं होता। इस सिद्धांत को लागू करते समय, न्यायालय को उस आरोपी की भूमिका पर ध्यान देना होगा जिसकी ज़मानत अर्ज़ी पर विचार किया जा रहा है।”
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September 9th 2026, 7:54 am
पुस्तक समीक्षा – ‘स्त्री’ एक, दृष्टियां अनेक….
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वत्सला चौहान
आज यदि हम रिलीजियस और राजनीतिक विचारों को कुछ देर के लिए किनारे रख दें और फिर पूरे विश्व की महिलाओं के बारे में सोचें, तो प्राकृतिक और जैविक रूप से सभी समान हैं, वैसे ही जैसे सारे पुरुष। लेकिन जब हम उन्हें रिलिजन और वैचारिक दृष्टियों से देखना शुरू करते हैं, तस्वीर बदल जाती है। अब कहीं वह ‘औरत’ है, कहीं ‘ईव’ और ‘वुमन’। कम्युनिज्म की दृष्टि में वह ‘शोषित और पीड़ित वर्ग’ है तो बाजारवादी व्यवस्था में ‘ऑब्जेक्टिफाइड ऑब्जेक्ट’। भारत में उसके लिए ‘स्त्री’, ‘महिला’ जैसे शब्द प्रचलित हैं।
डॉ. शुचि चौहान की पुस्तक ‘स्त्री’ इन्हीं अलग-अलग दृष्टियों में स्त्री के प्रति सोच को पाठकों के सामने रखती है। लेखिका का कहना है कि उपर्युक्त सम्बोधन महज शब्द नहीं हैं, बल्कि उस दृष्टि को भी व्यक्त करते हैं, जिसके अंतर्गत किसी समाज और विचार ने स्त्री को देखा और परिभाषित किया है।
पुस्तक ‘स्त्री’, स्त्री को किसी एक विचार या सामाजिक व्यवस्था के दायरे में सीमित नहीं करती। इसकी यात्रा भारतीय दृष्टि से शुरू होकर इस्लामी और ईसाई दृष्टियों से होते हुए साम्यवादी विचार और बाजारवाद तक जाती है। इसके बाद पश्चिमी समाज में उभरे पितृसत्ता, व्यक्तिवाद, लिव-इन रिलेशनशिप, ‘माय बॉडी, माय चॉइस’ और वोकिज्म जैसे विचारों के माध्यम से आज के स्त्री-विमर्श को समझने का प्रयास करती है।
पुस्तक की शुरुआत भारतीय स्त्री-दृष्टि से होती है। ‘स्त्री ब्रह्म स्वरूपा’, ‘स्त्री-पुरुष परस्पर पूरक’, ‘विवाह एक पवित्र बंधन’, ‘मातृत्व स्त्री जीवन की पूर्णता’ और ‘परिवार की धुरी स्त्री’ जैसे विषय भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि में स्त्री की भूमिका को सामने रखते हैं। वैदिक काल से आधुनिक भारत तक की यात्रा में लेखिका यह बताने का प्रयास करती है कि भारतीय परंपरा में स्त्री को किसी एक भूमिका में बांधकर नहीं देखा गया। वह शक्ति भी है, सृजन का आधार भी, परिवार की केंद्र बिंदु भी और सामाजिक जीवन की सक्रिय सहभागी भी।
इसके बाद पाठक एक बिल्कुल अलग सामाजिक और मजहबी संदर्भ में प्रवेश करता है – इस्लामी स्त्री-दृष्टि। स्त्री की उत्पत्ति, पुरुष-स्त्री संबंध, पर्दा, निकाह, हलाला और युद्ध में बंदी बनाई गई स्त्रियों जैसे विषयों के माध्यम से पुस्तक उन प्रश्नों को सामने लाती है, जिन पर आज भी समाज में बहस जारी है।
इसके बाद पुस्तक ईसाई स्त्री-दृष्टि की ओर बढ़ती है। पुस्तक के इस अध्याय में ‘ईव’, ‘ओरिजिनल सिन’ और ‘विच हंट’ जैसे प्रसंगों के माध्यम से यूरोप के रिलीजियस और सामाजिक इतिहास की उन परतों को सामने लाया गया है, जिन्होंने स्त्री की सामाजिक छवि को गहराई से प्रभावित किया। ‘विच हंट’ का प्रसंग विशेष रूप से ध्यान खींचता है। यह याद दिलाता है कि आज विकसित, आधुनिक और उदार कहे जाने वाले यूरोप और अमेरिका का स्त्री-इतिहास इतना उजला नहीं रहा, जितना वर्तमान की चमक उसे दिखाती है।
पुस्तक का अगला पड़ाव है कम्युनिस्ट स्त्री-दृष्टि। यहां स्त्री-शोषण, आर्थिक निर्भरता, सामाजिक संरचना और सशक्तिकरण जैसे प्रश्न सामने आते हैं। साम्यवादी विचार में स्त्री की मुक्ति को आर्थिक स्वतंत्रता से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति पर चर्चा करते हुए पुस्तक एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है – क्या आर्थिक स्वतंत्रता ही स्त्री के लिए सब कुछ है? या फिर उसके जीवन में परिवार, भावनात्मक संबंध, मातृत्व और सामाजिक जुड़ाव की भी महत्वपूर्ण भूमिका है?
यही प्रश्न आगे बाजारवादी स्त्री-दृष्टि के संदर्भ में और गहरा हो जाता है। सौंदर्य प्रतियोगिताएं, विज्ञापन, सोशल मीडिया, ‘वायरल होना ही सफलता’, स्त्री-देह का वस्तुकरण और उत्पादों की पैकेजिंग में मातृत्व आदि सभी ऐसे विषय हैं जो आज की दुनिया से सीधे जुड़े हैं। इस हिस्से से गुजरते हुए पाठक अपने आसपास की विज्ञापन और डिजिटल दुनिया को एक अलग नजर से देखने लगता है। जिस स्त्री को एक ओर स्वतंत्र उपभोक्ता बताया जाता है, वहीं दूसरी ओर वह बाजार के लिए एक बिकाऊ वस्तु में बदल दी जाती है।
‘माय बॉडी, माय चॉइस’, पुस्तक के सबसे समकालीन हिस्सों में से एक है। सहमति, निजी स्वतंत्रता, विवाह, मातृत्व और अपनी देह पर अधिकार जैसे प्रश्नों को पश्चिमी समाज में हुए आंदोलनों के संदर्भ में रखा गया है। #MeToo से लेकर ‘चाइल्ड फ्री’ जैसे विचारों तक लेखिका यह बताने का प्रयास करती है कि आधुनिक स्त्री-विमर्श में स्वतंत्रता की परिभाषा किस तरह बदल गई है।
पुस्तक सशक्तिकरण की प्रचलित अवधारणा पर भी प्रश्न खड़ा करती है। क्या स्त्री को सशक्त बनाने का अर्थ केवल पुरुष से बराबरी है? या उसके अपने अनुभवों, आवश्यकताओं, क्षमताओं और चॉइस को समझना भी इसका हिस्सा है? क्या स्वतंत्रता का अर्थ सिर्फ अपने बारे में सोचना ही है या परिवार व समाज का हित भी इसमें समाहित होना चाहिए?
पुस्तक के अंतिम भाग में जब प्रश्न आता है – ‘भारत पश्चिम के निशाने पर क्यों?’ – तो पूरी चर्चा एक बार फिर भारतीय संदर्भ में लौटती है। पुस्तक कहती है कि यहां प्रश्न किसी विचार को स्वीकार या अस्वीकार करने का नहीं, बल्कि उसे भारतीय समाज की अपनी परिस्थितियों, परिवार व्यवस्था और सांस्कृतिक अनुभवों की कसौटी पर समझने का है।
पुस्तक की विषय-वस्तु समसामयिक और गंभीर है। यह जीवन से जुड़े – विवाह, प्रेम, परिवार, मातृत्व, देह, करियर, सोशल मीडिया, स्वतंत्रता और पहचान जैसे विषयों को बेबाकी से उठाती है। वास्तव में केवल स्त्री पर लिखी गई पुस्तक नहीं है। यह स्त्री को देखने वाली दृष्टियों पर एक संवाद है, जो पाठक को अपने आसपास की दुनिया को नए सिरे से देखने के लिए विवश करता है। पुस्तक पाठकों को झकझोर देती है। यह किसी भी विषय पर अपना मत देने के बजाय स्त्री विचारों से जुड़ी शोधपरक पृष्ठभूमि पाठकों के सामने रखती है और उन्हें स्वयं विचार करने के लिए छोड़ देती है।
स्त्री इतिहास और भारत में चल रहे स्त्री विमर्श को जानने और समझने की इच्छा रखने वाले लोगों को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए। पुस्तक एमेजॉन और सुरुचि प्रकाशन पर भी उपलब्ध है।
पुस्तक – स्त्री
लेखिका – डॉ. शुचि चौहान
प्रकाशक – ज्ञान गंगा प्रकाशन
मूल्य – ₹180
पृष्ठ – 136
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September 9th 2026, 7:54 am
सनातन संस्कृति सदैव शांति, सह-अस्तित्व और मानव कल्याण की भावना को पोषित करती रही है – जे. नंदकुमार ज
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झांसी। संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ झांसी महानगर ने रविवार को ‘युवा व्यवसायी संवाद’ कार्यक्रम का आयोजन किया। पंडित दीनदयाल सभागार में शाम चार से छह बजे तक आयोजित कार्यक्रम में युवाओं से राष्ट्र निर्माण, नागरिक कर्तव्य, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और परिवार प्रबोधन जैसे विषयों पर संवाद हुआ। बौद्धिक सत्र के बाद युवाओं ने विभिन्न विषयों से जुड़े 15 सवाल पूछे, जिनका मुख्य वक्ता ने विस्तार से उत्तर देकर जिज्ञासाओं का समाधान किया। अंत में राष्ट्र गान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। मंच पर विभाग संघचालक शिव कुमार भार्गव जी और महानगर संघचालक सतीश शरण जी भी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन और वन्दे मातरम के साथ हुआ। मुख्य वक्ता प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे. नंदकुमार जी ने युवाओं से संवाद करते हुए भारतीय संस्कृति में निहित उन विचारों और मूल्यों को विस्तार से समझाया, जो समाज और राष्ट्र के कल्याण का आधार माने जाते हैं। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसे विचारों की व्याख्या करते हुए कहा कि भारतीय चिंतन केवल अपने कल्याण तक सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण विश्व के सुख और शांति की कामना करता है। हमें हिन्दू होने पर गर्व महसूस होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत हिन्दू राष्ट्र था, है और रहेगा। अब अखण्ड भारत बनकर रहेगा। इसके लिए अविराम रूप से कार्य चल रहा है।
जे. नंदकुमार जी ने कहा कि भारत को विश्वगुरु बनाने की दिशा में इन मानवीय और सार्वभौमिक विचारों की महत्वपूर्ण भूमिका है। विश्व के कल्याण के लिए युद्ध का रास्ता नहीं, मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के विचारों और ज्ञान का मार्ग अपनाने की आवश्यकता है। सनातन संस्कृति सदैव से शांति, सह-अस्तित्व और मानव कल्याण की भावना को पोषित करती रही है। उन्होंने युवा की परिभाषा को विस्तार पूर्वक समझाया।
संवाद के दौरान युवाओं को देश और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने तथा राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया। मुख्य वक्ता ने कहा कि युवा केवल रोजगार और व्यक्तिगत सफलता तक सीमित न रहें, बल्कि सामाजिक सरोकारों और नागरिक दायित्वों के प्रति भी जागरूक रहें।
संघ की कार्यपद्धति और युवाओं का दायित्व
जे. नंदकुमार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संगठनात्मक पद्धति का उल्लेख करते हुए बताया कि व्यक्ति-व्यक्ति से संवाद, साथ बैठना, खेलना, सीखना और साथ काम करना संघ की कार्यपद्धति का अहम हिस्सा है। इसी सहज संवाद के कारण संगठन डिजिटल युग की पीढ़ी से अपनी मूल प्रकृति बचाए रखते हुए जुड़ रहा है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे केवल रोजगार और व्यक्तिगत सफलता तक सीमित न रहें, बल्कि सामाजिक सरोकारों के प्रति भी जागरूक रहें। देश का भविष्य युवाओं के हाथों में है, जिसके लिए आत्मविश्वास, दृढ़ निश्चय, साहस और निर्भीकता जैसे गुण अत्यंत आवश्यक हैं।
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September 7th 2026, 8:55 am
“विभाजन के बजाय जोड़ने वाले तत्वों पर बल देने से दुनिया बेहतर स्थान बन जाएगी” – डॉ. मोहन भागवत जी
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“स्वयंसेवक मानव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय हैं”
“हिन्दू विश्व को संतुलित दृष्टि प्रदान कर सकते हैं”
लंदन, 06 सितम्बर 2026।
न्यूयॉर्क, अमेरिका में 29 अगस्त तथा टोरंटो, कनाडा में 31 अगस्त को संबोधन के पश्चात्, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने 6 सितम्बर को यूनाइटेड किंगडम के लंदन में आयोजित ‘Celebration of Oneness’ (एकात्मता का उत्सव) कार्यक्रम के दौरान संघ की 100 वर्षों की यात्रा से संबंधित विभिन्न प्रश्नों के उत्तर देते हुए संघ की दृष्टि को रेखांकित किया। “संघ का ऐसा कौन-सा एक तत्व है, जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है’ इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा, “यदि मुझे एक ही सिद्धांत का उल्लेख करना हो, तो मैं ‘अपनापन’ कहूंगा, जिसका अर्थ है सभी के प्रति शुद्ध, सात्त्विक प्रेम। व्यक्ति, समुदाय, समाज और समूची मानवता के प्रति प्रेम- यही हिन्दू का पारंपरिक स्वभाव है। हिन्दू विश्व को संतुलित दृष्टि प्रदान कर सकते हैं।”
संघ की सेवा गतिविधियों के संबंध में डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा,“स्वयंसेवक मानव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय हैं, इसलिए उनके कार्य के पूरे विस्तार का सार प्रस्तुत करना कठिन है। राजनीतिक कारणों से हमारा विरोध करने वाले लोग भी हमारे कार्य तथा स्वयंसेवकों के गुणों और योगदान को स्वीकार करते हैं। समय-समय पर वे महत्वपूर्ण विषयों पर हम से सहयोग की अपेक्षा करते हैं और हमसे संवाद भी करते हैं। यह समाज के विभिन्न वर्गों में हमारे कार्य की व्यापक स्वीकार्यता को दर्शाता है। जहां कोई कुछ नहीं कर रहा होता, वहां संघ सेवा कर रहा होता है – लद्दाख से लेकर कन्याकुमारी तक।”
अगले 100 वर्षों के लिए संघ के लिए एक प्रमुख संदेश के संबंध में पूछे गए प्रश्न पर उन्होंने कहा कि संघ को अगले सौ वर्षों तक भी वही कार्य निरंतर आगे बढ़ाना होगा, जो उसने अब तक किया है। उन्होंने कहा, “सबसे पहले मेरे मन में यह बात आती है कि सारे कार्यों को पूरा करने में इतना समय नहीं लगना चाहिए। अभी मेरी तीसरी पीढ़ी कार्य कर रही है। संघ में अब दो पीढ़ियां और भी साथ काम कर रही हैं। इस प्रकार पांच पीढ़ियां साथ काम कर रही हैं। सातवीं पीढ़ी आने से पहले हिन्दू समाज के संगठन का कार्य पूरा हो जाना चाहिए।”
‘विश्व के लिए हिन्दू सभ्यता का ऐसा क्या योगदान है, जिसकी विशेष आवश्यकता है” – इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा, “सभी हिन्दू विचार इसी एक सूत्र पर आधारित रहे हैं कि प्रत्येक कर्म के पीछे कोई कारण है। अस्तित्व वास्तव में एक है, यद्यपि वह विविध दिखाई देता है। विविधता हमारा स्वभाव है। इसलिए हमें उसे स्वीकार करना है और उसका सम्मान करना है। लेकिन विविधताओं के साथ इस बात को ध्यान में रखते हुए व्यवहार करना होगा कि ये अस्तित्व की एकता के विभिन्न शृंगार हैं। एक ही अनेक हुआ है, इसलिए अनेक का सम्मान किया जाता है। सब एक हैं। इसी आधार पर हम हर विषय को देखते और उससे व्यवहार करते हैं।”
उन्होंने कहा, “हिन्दू’ शब्द को हम किसी धार्मिक आचरण या जीवन-शैली के आधार पर नहीं समझ सकते। हिन्दू एक प्रकृति है। समाज को ऐसी प्रकृति की आवश्यकता है, जो सभी विविधताओं को स्वीकार करे और उनका सम्मान करे, क्योंकि उसका विश्वास है कि सभी मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं। सभी विविधताएं एकता की ही विविध अभिव्यक्तियां हैं। इसलिए जब हम उस एकता को देखते हैं, तब सभी विविधताओं का सम्मान और स्वीकार करना संभव होता है। यही हिन्दू विचार है, यही हिन्दू प्रकृति है। हिन्दू समाज और भारत के इतिहास में यही दिखाई देता है। इसलिए जब हम हिन्दू कहते हैं, तो यह कोई धर्म नहीं है। यह केवल एक शब्द भी नहीं है। हिन्दू धर्म की विभिन्न परंपराएं अपनी विशिष्ट दर्शन-पद्धतियों और आचरण के साथ इस व्यापक हिन्दू सभ्यतागत परिवेश के भीतर अस्तित्व में रह सकती हैं।” उन्होंने यह बात ‘हिन्दू राष्ट्र’ और ‘हिंदुत्व’ की अवधारणा से संबंधित प्रश्न के उत्तर में कही।
भविष्य की पीढ़ी की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि उन्हें नई पीढ़ी पर अधिक विश्वास है। उनमें दुनिया को बेहतर बनाने की तीव्र आकांक्षा है और इस उद्देश्य के लिए वे विभिन्न प्रकार के छोटे-छोटे मतभेदों से ऊपर उठने को तैयार हैं। “वे अधिक ईमानदार होते हैं। उम्र बढ़ने के साथ स्वाभाविक रूप से ऐसा होता है कि हम अनेक अनुभवों से गुजरते हैं और इसलिए अधिक सतर्क हो जाते हैं। हम हर समय खुलकर नहीं बोलते। हम यह सोचते रहते हैं कि आगे क्या होगा, क्योंकि हमें पता होता है कि क्या-क्या हो सकता है। युवा पीढ़ी के पास ऐसे अनुभव नहीं होते। यदि उन्हें कुछ सही लगता है, तो वे उसे सहज रूप से स्वीकार कर लेते हैं और उसी के अनुसार कार्य करते हैं। वे परिणामों को लेकर चिंतित नहीं होते, क्योंकि वे युवा हैं। इसलिए यदि हम उन्हें यह उद्देश्य दें और अपने अनुभव से प्राप्त आवश्यक ज्ञान तथा दृष्टि प्रदान करें, बिना उसे उन पर थोपे, तो हमें उन्हें अपना मार्ग स्वयं खोजने देना चाहिए।”
भारत के सामने भविष्य की चुनौतियों से निपटने में युवा हिन्दुओं की भूमिका के संबंध में सरसंघचालक जी ने कहा कि युवा पीढ़ी का दायित्व अपने मूल्यों के अनुसार जीवन जीना है। इसलिए सेवा के क्षेत्र में भी उन्हें यही भाव रखना होगा। “सेवा निःस्वार्थ भाव से होनी चाहिए। सेवा ऐसा कोई कार्य नहीं है, जिससे आप महान बनते हैं। यह उपकार नहीं है और न ही यह ऐसा कुछ है जो आप मानवता पर किसी करुणा के रूप में कर रहे हैं। हम कहते हैं कि सेवा ईश्वर के निकट जाने का आपका अवसर है। आप जिनकी सेवा कर रहे हैं, उन पर कोई उपकार नहीं कर रहे। वे आपको सेवा का अवसर देकर आपके ऊपर बहुत बड़ा उपकार कर रहे हैं। इसलिए सेवा इसी भाव के साथ की जानी चाहिए।”
ब्रिटिश हिन्दुओं की निष्ठा को लेकर यूनाइटेड किंगडम में उठाए जाने वाले प्रश्न तथा एक ब्रिटिश स्वयंसेवक से संघ की अपेक्षाओं के संबंध में अंतिम प्रश्न पूछा गया। इसका उत्तर देते हुए सरसंघचालक जी ने कहा, “कोई संघर्ष नहीं है। यदि ब्रिटिश हिन्दू अच्छे, पक्के और सच्चे हिन्दू हैं, तो ब्रिटेन और भारत के हितों के बीच कभी कोई संघर्ष नहीं होगा। यदि कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो स्वाभाविक रूप से ब्रिटिश हिन्दू ब्रिटेन के साथ जाएंगे। अपवाद हो सकते हैं, लेकिन हिन्दुत्व इस विषय पर स्पष्ट है। आपकी कर्मभूमि ही वह स्थान है, जहां आपकी निष्ठा होती है। आपकी जन्मभूमि – अर्थात आपकी उत्पत्ति या जन्म का स्थान – और आपकी पुण्यभूमि वह स्थान है, जहां से आपको अपने मूल्य प्राप्त होते हैं। आपको उन्हीं मूल्यों को अपनी कर्मभूमि में जीना है और जिस भूमि पर आप रहते हैं, उसकी सेवा करनी है।”
हिन्दुओं के एकजुट न होने की धारणा तथा एकता के सार के संबंध में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में सरसंघचालक जी ने कहा, “यदि आप श्रोताओं को देखें या सामान्य रूप से समाज को देखें, तो मानव समाज में विविधता है और यह स्वाभाविक है। हमें इसके साथ चलना है। लेकिन अपना जोर इस बात पर होना चाहिए कि हमें क्या जोड़ता है, न कि इस बात पर कि हमें क्या विभाजित करता है। यदि हम ऐसा करेंगे, तो हमारे समुदाय, हमारा समाज समृद्ध होगा और दुनिया एक बेहतर स्थान बनेगी। हमें यही करना होगा।”
इस संवाद का संचालन यूनाइटेड किंगडम निवासी वेलनेस विशेषज्ञ ममता सुब्रह्मण्यम ने किया। हिन्दू स्वयंसेवक संघ, यूनाइटेड किंगडम (HSS UK) द्वारा आयोजित कार्यक्रम में 600 लोग उपस्थित रहे, उन्होंने 326 संगठनों का प्रतिनिधित्व किया। कार्यक्रम में हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्य, सांसद (हाउस ऑफ कॉमन्स के सदस्य), मेयर, काउंसिलर्स तथा यूनाइटेड किंगडम में भारत के उच्चायुक्त पेरियासामी कुमारन, उप उच्चायुक्त कार्तिक पांडे सहित समुदाय के अन्य प्रमुख नेता उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत नेपाल में आई बाढ़ के कारण जान गंवाने वाले लोगों तथा विस्थापित परिवारों की स्मृति में मौन रखकर हुई। कार्यक्रम के दौरान बताया गया कि Sewa UK ने नेपाल में राहत कार्यों के लिए अंश दान के माध्यम से 1,00,000 पाउंड जुटाए हैं।
सरसंघचालक जी की यह यात्रा आरएसएस के शताब्दी वर्ष के तहत सेवा, सामाजिक समरसता और साझा मूल्यों पर केंद्रित सभ्यतागत संवाद कार्यक्रम का हिस्सा है। लंदन प्रवास के दौरान सरसंघचालक जी ने विभिन्न धर्मों के प्रमुख नेताओं, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं तथा अन्य सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तियों से मुलाकात की। अंतरधार्मिक संवाद के अंतर्गत उन्होंने श्री स्वामीनारायण मंदिर, विल्सडन, खालसा जत्था ब्रिटिश आइल्स गुरुद्वारा तथा लंदन के अन्य धार्मिक स्थलों का भी दौरा किया। यूके में हिन्दू समाज के विभिन्न वर्गों और भाषायी विविधता का प्रतिनिधित्व करने वाले 11 भाषा-समुदायों ने भी इस कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक भाग लिया।
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September 7th 2026, 8:55 am
पराक्रम, त्याग और ज्ञान के समन्वय से ही युवा शक्ति निर्भय बन सकती है – बी. आर. शंकरानन्द जी
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नागपुर।
कमिंस कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग फॉर विमेन में भारतीय शिक्षण मंडल अखिल भारतीय संगठन मंत्री बी. आर. शंकरानन्द जी ने भारत की पहचान, निर्भयता, मानसिक एकाग्रता और राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका पर विचार रखे।
उन्होंने कहा कि भारत तीन प्रमुख गुणों – पराक्रम, त्याग और ज्ञान, के लिए जाना जाता है। यही तीनों गुण भारतीय जीवन-दृष्टि और राष्ट्र की वास्तविक शक्ति के आधार हैं। भारत को “मृत्युंजय भारत” बताते हुए कहा कि भारतीय समाज मृत्यु से भयभीत होने वाला नहीं है। आवश्यकता पड़ने पर वह साहसपूर्वक चुनौतियों का सामना करता है। इसलिए जीवन में निर्भयता का होना आवश्यक है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि निर्भयता का अर्थ घमंड या आक्रामकता नहीं, बल्कि मन की गहरी शांति है। यह आंतरिक शांति तभी प्राप्त होती है, जब व्यक्ति अपने मन को एकाग्र और संयमित करना सीखता है। एकाग्र मन ही सही निर्णय लेने और कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने की शक्ति देता है।
युवाओं के लिए प्रेरक संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण करने वाला युवा ऐसा हो जो “न रुकने वाला, न थकने वाला, न झुकने वाला और न बिकने वाला” हो। पराक्रम, त्याग और ज्ञान के समन्वय से ही युवाशक्ति निर्भय बन सकती है, जो एक समर्थ, स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर राष्ट्र की नींव है।
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September 6th 2026, 1:10 pm
हनुमान अंश – जैसा मैंने देखा
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एक बार सिनेमाघरों से लौट जाने के बाद फिर से बड़े पर्दे में अपने बलबूते आने वाली फ़िल्म हनुमान अंश…..
आज के दौर में जब फिल्में अक्सर बड़े नामों, बड़े बजट व बड़े नेटवर्क के सहारे चलती हैं, उसी दौर में ‘हनुमान अंश’ एक बेहद पवित्र हवा का झोंका लेकर आती है। यह फिल्म केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक वृत्ति की अनुभूति है जो दर्शकों को हँसाने-रुलाने की सांसारिक चेष्टा के बजाय उसके भीतर के मनुष्य को जगाने का प्रयास करती है। फ़िल्म के सूत्रधार विशाल चतुर्वेदी की सिनेमाई समझ और दूरदर्शिता फ़िल्म को एक अलग आयाम देती है।
फिल्म की शुरुआत डॉ. राम नंदन भोसले (चंदन आनंद) द्वारा अपने पोते को नीम करोली बाबा की कहानी सुनाने से होती है। कहानी एक बालक लक्ष्मी नारायण से शुरू होती है, जो माँ के देहांत के बाद ईश्वर की खोज में निकल पड़ता है। यहां पर पृष्ठभूमि संगीत (बैकग्राउंड म्यूजिक) में भावुकता और सहजता का बेहद सधा मिश्रण है जो इस फ़िल्म की गहराई को अंतरतम में उतार देता है। यह यात्रा धीरे-धीरे लक्ष्मी को नीम करोली बाबा के रूप में स्थापित करती है। वह एक ऐसे संत हैं जो चमत्कारों से नहीं, अपितु निःस्वार्थ सेवा, प्रेम और करुणा से भक्ति को जीवन का प्रकाश स्तम्भ बनाते हैं।
शोभिनव सत्या का अभिनय फिल्म की अन्तरात्मा है। उनके फ़िल्म के प्रमुख अभिनेता बनने की पृष्ठभूमि भी अत्यंत आश्चर्यजनक ही है, यह रोल जिसे करना था उसकी तबियत खराब होने के कारण इस कम बजट वाली फिल्म को बीच में रोकना या पुनः शूट करना बहुत मुश्किल था। उसी समय निर्देशक विशाल ने फर्स्ट एडी शोभिनव के चेहरे पर बाबा को देख लिया, बस यहीं से शोभिनव को मुख्य अभिनय हेतु कास्ट कर लिया गया। उनकी आँखों में वह शांति, आत्मविश्वास और करुणा है, जो दर्शक को बाबा के करीब ले जाती है। वे बाबा को न तो अति-नाटकीय बनाते हैं, न ही अति-सरल,
उनका प्रदर्शन संतुलित, प्रभावशाली और हृदयस्पर्शी है। बाबा की शारीरिक भाषा पर फ़िल्म की टीम ने अच्छा काम किया है। विहान शेजगे ने 13 वर्षीय लक्ष्मी (बाबा) के किरदार को बहुत अच्छे से निभाया है। विहान का अभिनय भावनात्मक गहराई से भरपूर है। उनकी मासूमियत, जिज्ञासा और आध्यात्मिक खोज को पर्दे पर उतारने का तरीका प्रशंसनीय है। चंदन आनंद ने डॉ. राम नंदन भोसले के किरदार को निभाया है, जो फिल्म की कहानी कहते हैं। अतः मूल फ़िल्म व कहानी एक साथ चलती है। पूर्णिमा तिवारी ने बाबा की पत्नी रामबेटी (कुछ स्रोतों में राम दुलारी) के किरदार को निभाया है। उनका किरदार एक ऐसी महिला का है, जो बाबा के आध्यात्मिक मार्ग का सम्मान करती है। संवाद कुछ प्रेम के अस्तित्व में होते हुए भी मर्यादित हैं और कहने की शैली भी अत्यंत सहज है। भगवान दास पटेल ने गोपाल दास बहेलिया के किरदार को निभाया है। पद्मश्री प्राप्त लखनऊ के ही अनिल रस्तोगी (महंत जी) के किरदार ने फिल्म में आध्यात्मिक मार्गदर्शक की भूमिका निभाई। अंतिम में कहानी बाबा के नीम करोली छोड़ने पर समाप्त होती है, किंतु कथा यह विशेष है…पंक्ति हमें सीक्वल के प्रतीक्षा की श्रेणी में खड़ा कर देती है।
अब बात आती है फ़िल्म के संगीत की, फिल्म का संगीत पारंपरिक भजनों, कीर्तनों और लोक संगीत को आधुनिक संगीत व्यवस्था के साथ जोड़ता है। साधु तिवारी, ऋषि पाठक, श्रेयस धर्माधिकारी और अन्य संगीतकारों ने फिल्म को एक भक्तिमय, आध्यात्मिक माहौल दिया है। “हृदय में जिनके सीताराम”, “जय हनुमान” जैसे गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रार्थना बनकर उभरते हैं। संगीत फिल्म की आत्मा बन जाता है और दर्शक को आध्यात्मिक अनुभव की ओर ले जाता है।
विशाल बावा का छायांकन और शंख राज्याध्यक्ष का संपादन फिल्म की सादगी को बनाए रखते हुए कहानी की गति को संभालता है। दृश्य एकदम उस कालखंड के वातावरण व पहचान को उकेरते हुए अति-रंगीन या अति-नाटकीय नहीं, बल्कि वास्तविक और अच्छे लगने वाले हैं।
विशाल चतुर्वेदी, फिल्म के निर्देशक तो हैं ही साथ ही लेखक, पटकथाकार, संवाद लेखक, निर्माता और गायक भी हैं। उनकी यह बहुआयामी भूमिका फिल्म की हर परत में उनके व्यक्तिगत लगाव और दृष्टि को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। विशाल चतुर्वेदी का निर्देशन शांत, संयमित और भावनात्मक गहराई से भरपूर है। एकक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि फिल्म बनाते समय कई संकट आए, लेकिन 43 दिनों तक हनुमान चालीसा का पाठ और नीम करोली बाबा की आराधना करने के बाद फिल्म पूरी हुई।
लगभग ₹2 करोड़ के बजट में बनी यह फिल्म 60 करोड़ से अधिक कमा चुकी है जो साबित करता है कि आज के दौर में सच्ची कहानी और भावनाएं बड़े स्टारकास्ट से ज्यादा देखी और समझी जाती हैं।
आज के तनावग्रस्त, स्क्रीन टाइम के भौतिकवादी दौर में यह फिल्म एक शांत, प्रेरणादायक और भावनात्मक संदेश देती है। इसलिए फ़िल्म की समाप्ति पर पूरे सिनेमाहाल में एक अलग ही आध्यात्मिक और हृदय को गदगद करने वाला माहौल बनना स्वाभाविक रहता है।
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September 6th 2026, 1:10 pm
झीरम घाटी हमला – न्यायालय ने हमले में शामिल 10 नक्सली आतंकियों को दोषी ठहराया
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जगदलपुर/नई दिल्ली।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत, जगदलपुर ने 2013 के झीरम घाटी नक्सली हमले के मामले में 10 आरोपियों को दोषी करार दिया है। यह हमला 13 साल पहले छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में हुआ था। आरोपियों को भारतीय दंड संहिता, यूएपीए, आर्म्स एक्ट और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत दोषी करार दिया गया है।
25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के दौरान काफिला NH-221 पर झीरम घाटी, दारभा (बस्तर) से गुजर रहा था। नक्सलियों ने आईईडी ब्लास्ट, गोलीबारी और ग्रेनेड अटैक किया। इसमें 24 नागरिक और पुलिसकर्मी मौके पर मारे गए। 35 से ज्यादा लोग घायल हुए, जिनमें से तीन की बाद में मौत हो गई। नक्सलियों ने हथियार, गोला-बारूद, वाकी-टॉकी, मोबाइल और अन्य सामान भी लूट लिया था।
हमले में कांग्रेस के कई बड़े नेता मारे गए थे। इनमें तत्कालीन छत्तीसगढ़ कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्या चरण शुक्ला, वरिष्ठ नेता महेंद्र कर्मा और पूर्व विधायक उदय मुदलियार शामिल थे। साथ में सुरक्षा कर्मी और अन्य लोग भी थे।
एनआईए जांच के अनुसार, प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) के सशस्त्र कैडरों ने स्थानीय समितियों के साथ मिलकर कांग्रेस नेताओं और सुरक्षा कर्मियों पर हमला करने की साजिश रची थी। यह माओवादियों के टैक्टिकल काउंटर ऑफेंसिव कैंपेन का हिस्सा था।
एनआईए ने सितंबर 2014 और सितंबर 2015 में दो चार्जशीट दाखिल की थीं, जिनमें कुल 39 आरोपी थे। गिरफ्तार 11 आरोपियों में से एक की सुनवाई के दौरान मौत हो गई। बचे हुए 10 को अब दोषी ठहराया गया है। मुकदमे में अभियोजन पक्ष ने 101 गवाहों की गवाही ली और दस्तावेजी व फॉरेंसिक सबूत पेश किए।
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September 6th 2026, 1:10 pm
संगीत चर-अचर जगत की संवेदनाओं को भी प्रभावित करता है – अनिल ओक जी
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श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर ‘नाद गोविंदम् 3.0’ का आयोजन, 101 घोषवादकों ने प्रस्तुत कीं 24 रचनाएं
जयपुर। श्री कृष्ण जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऋषि गालव भाग की ओर से प्रांत घोष दिवस के अवसर पर ‘नाद गोविंदम् 3.0’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के तहत तोपखाना संघस्थान से घोष पथ संचलन निकाला गया। घोष वाद्य यंत्रों की स्वरलहरियों के बीच सैकड़ों स्वयंसेवक कदम से कदम मिलाकर चले। पथ संचलन पांचबत्ती, अजमेरी द्वार होते हुए रामनिवास बाग स्थित केंद्रीय संग्रहालय पहुंचा। यहां स्थिर वादन हुआ, जिसमें 101 घोषवादकों ने विभिन्न वाद्य यंत्रों पर 24 रचनाओं का वादन किया।
‘घोष अनुशासन और राष्ट्रभाव जगाता है’
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता संघ के अखिल भारतीय सह व्यवस्था प्रमुख अनिल जी ओक ने कहा कि संगीत केवल चर जगत ही नहीं, अचर जगत की संवेदनाओं को भी प्रभावित करता है। भारतीय संगीत परंपरा में प्रसन्नता, उत्साह और साधना के अवसरों पर संगीत का विशेष महत्व रहा है। संघ के घोष विभाग ने उत्कृष्ट स्वदेशी रचनाओं का निर्माण किया है, जिनका उपयोग भारतीय सेना भी गर्व के साथ करती है। उन्होंने कहा कि घोष की ओजपूर्ण स्वरलहरियां स्वयंसेवकों में अनुशासन, एकाग्रता और राष्ट्रभक्ति का संचार करती हैं। जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी और शंख दोनों ही प्रेरणा के प्रतीक हैं।
अनिल ओक जी ने कहा कि गीता का मूल संदेश धर्म की स्थापना और कर्तव्य पालन की प्रेरणा देता है। राष्ट्र और समाज की रक्षा के लिए साहस, संकल्प और कर्तव्यबोध आवश्यक है। उन्होंने वीर सावरकर के जीवन को राष्ट्र के प्रति सर्वस्व समर्पण और त्याग का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। कहा कि संघ की शाखाएं व्यक्ति निर्माण, अनुशासन और समाज सेवा का प्रशिक्षण देती हैं।
संगीत अनुशासन का प्रभावी माध्यम – आलोक भट्ट
मुख्य अतिथि प्रसिद्ध गायक, संगीत रचनाकार एवं मोहन वीणा वादक पंडित आलोक भट्ट जी ने कहा कि संगीत व्यक्ति में अनुशासन, एकाग्रता और संवेदनशीलता विकसित करने का प्रभावी माध्यम है। कार्यक्रम में संघ के वरिष्ठ अधिकारी, स्वयंसेवक, मातृशक्ति तथा शहर के प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित रहे।
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September 5th 2026, 3:09 pm
निःस्वार्थ सेवा के सौ वर्ष पूर्ण होने पर संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत जी का लंदन प्रवास
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यह प्रवास सेवा, सामाजिक सद्भाव और साझा मूल्यों पर केंद्रित सभ्यतागत संवाद के संघ के शताब्दी कार्यक्रम का हिस्सा है
लंदन, 4 सितंबर 2026।
वर्ष 1925 में हिन्दू सभ्यता और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर स्थापित वैचारिक अभियान, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अपनी स्थापना का शताब्दी वर्ष मना रहा है। इस उपलक्ष्य में संघ द्वारा विश्व समुदाय के साथ सभ्यतागत संपर्क एवं संवाद कार्यक्रमों की एक विस्तृत श्रृंखला आयोजित की जा रही है, जिसकी परिणति संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी के 2 से 7 सितंबर 2026 तक लंदन प्रवास के रूप में हो रही है।
आरएसएस की स्थापना भारत के स्वाधीनता संग्राम के दौरान डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने की थी। उनका दृढ़ विश्वास था कि स्वाधीनता प्राप्त होने के बाद उसकी राजनीतिक और आर्थिक स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए एक सबल और संगठित समाज का होना आवश्यक है। विगत एक शताब्दी में संगठन एक ऐसे सभ्यतागत अभियान के रूप में विकसित हुआ है, जो पूरे भारत में समाज सेवा के कार्य में निःस्वार्थ भाव से लगे स्वयंसेवकों द्वारा संचालित है।
सेवा की एक शताब्दी
विगत एक शताब्दी में आरएसएस ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात विश्व एक परिवार है, की अवधारणा पर आधारित समाज सेवा की एक कार्य-संस्कृति विकसित की है। इसके केंद्र में व्यक्तिगत चरित्र-निर्माण की संकल्पना है, जिसे आरएसएस व्यापक सामाजिक शक्ति की आधारशिला मानता है।
आरएसएस के वार्षिक प्रतिवेदन (वर्ष 2025-26) के अनुसार, भारत भर में 1,52,000 से अधिक सेवा कार्य संचालित हैं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक कल्याण, स्वावलंबन और समाज जीवन के अन्य क्षेत्र सम्मिलित हैं। पूरे भारत में संघ की 1,34,000 से अधिक स्थानों पर नियमित लोग एकत्रित होते हैं, जिनमें दैनिक शाखाएं, तथा साप्ताहिक और मासिक मिलन सम्मिलित हैं।
आरएसएस का दृष्टिकोण साझा सभ्यतागत मूल्यों, विविधता में एकता और सामाजिक समरसता पर केंद्रित है। इसका कार्य सामाजिक एकता को सुदृढ़ करने के लिए है और यह हर प्रकार के विभाजन, कट्टरपंथ और हिंसा का निषेध करता है। शताब्दी वर्ष में संघ ने समाज के व्यापक हित में पांच प्राथमिकताएं निर्धारित की हैं – सामाजिक समरसता; पारिवारिक मूल्यों को सुदृढ़ करना; पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व; स्वावलंबन; और नागरिक कर्तव्य।
विस्तृत सभ्यतागत संवाद
शताब्दी वर्ष के दौरान आरएसएस ने विश्व भर के समुदायों और संस्थाओं के साथ सभ्यतागत संवाद के व्यापक कार्यक्रम के माध्यम से अपने अनुभव साझा करने का प्रयास किया है। इस वैश्विक संपर्क की कड़ी के रूप में अप्रैल 2026 में आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका और जर्मनी का भ्रमण किया। उनके कार्यक्रमों में लंदन का चैथम हाउस, संयुक्त राज्य अमेरिका में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय और हडसन इंस्टीट्यूट तथा बर्लिन में जर्मनी के प्रमुख नीति संस्थानों के साथ ही शिक्षाविदों, सांसदों, व्यापार जगत के प्रतिनिधियों, सामुदायिक प्रतिनिधियों और भारतीय प्रवासी समुदाय के सदस्यों के साथ चर्चा शामिल थी। इन वार्ताओं में सभ्यतागत दृष्टिकोण, सामाजिक एकजुटता और समकालीन वैश्विक चुनौतियों के प्रति साझा प्रतिक्रियाओं पर विचार-विमर्श हुआ।
इसी क्रम में सरसंघचालक डॉ. भागवत जी पहले न्यूयॉर्क, टोरंटो और अब लंदन में इस सभ्यतागत संवाद शृंखला को आगे बढ़ा रहे हैं।
न्यूयॉर्क में 29 अगस्त 2026 को AHEAD (American Hindus for Engagement and Dialogue) के आमंत्रण पर उन्होंने विभिन्न संप्रदायों और धर्मों के 175 प्रतिभागियों की उपस्थिति वाली बैठक को संबोधित किया। उन्होंने मैडिसन स्क्वायर गार्डन में “Universal Oneness” सम्मेलन को भी संबोधित किया, जिसमें 39 अमेरिकी राज्यों और 853 शहरों से आए 250 संस्थाओं के 6000 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। संयुक्त राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों के लगभग 250 छात्रों ने भी इस संवाद में भाग लिया। इस सर्वपंथीय धर्मगुरुओं की बैठक में पांच-सूत्रीय “Call for Action” संकल्प स्वीकार किया गया।
इसके बाद डॉ. भागवत जी CHORD (Canadian Hindus for Outreach, Relations and Dialogue) के आमंत्रण पर टोरंटो गए, जहाँ उन्होंने “Hindu Vishwa Bandhu” सम्मेलन को संबोधित किया। इसमें कनाडा के सभी दस प्रांतों के 175 संगठनों के 2000 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
लंदन प्रवास का विवरण
डॉ. मोहन भागवत जी शताब्दी संपर्क कार्यक्रम के अंतिम चरण के अंतर्गत 2 सितंबर को लंदन पहुंचे।
लंदन के इस विस्तृत कार्यक्रम का आयोजन और समन्वय ब्रिटेन स्थित संगठन इंटीग्रल ने किया है, यह संस्था यूके के अंदर और यूके-भारत के मध्य संवाद, सहयोग और दीर्घकालिक संबंधों को सुदृढ़ करने के लिए नेतृत्व और समुदायों को साथ लाकर कार्य करती है। डॉ. भागवत जी का यूके में स्वागत और उनकी यात्रा के दौरान व्यापक संपर्क कार्यक्रम को सहयोग देने के लिए इंटीग्रल के साथ ब्रिटेन स्थित 115 से अधिक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन भी जुड़े हैं।
अपनी इस यात्रा के दौरान डॉ. भागवत जी धर्मगुरुओं, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और अन्य सामाजिक हस्तियों से भेंट कर रहे हैं। अपनी सर्वपंथीय सहभागिता के अंतर्गत उन्होंने विल्सडेन स्थित श्री स्वामीनारायण मंदिर और खालसा जत्था ब्रिटिश आइल्स गुरुद्वारे का दौरा किया तथा लंदन के एक जैन मंदिर में भी जाने का कार्यक्रम है।
6 सितंबर 2026 को “Celebration of Oneness” विषय के अंतर्गत सामुदायिक नेतृत्वकर्ताओं के साथ सभ्यतागत संवाद कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इस कार्यक्रम की पहल हिन्दू स्वयंसेवक संघ, यूके ने की है। हिन्दू स्वयंसेवक संघ, यूके वर्ष 1966 में ब्रिटेन में स्थापित एक हिन्दू सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठन है और इस कार्यक्रम को इंटीग्रल का सहयोग प्राप्त है।
आगामी रविवार को आयोजित हो रहे इस कार्यक्रम में ब्रिटेन के 310 से अधिक सामुदायिक संगठनों और संस्थाओं के भाग लेने की संभावना है।
लंदन का यह कार्यक्रम भी न्यूयॉर्क तथा टोरंटो में डॉ. मोहन भागवत जी द्वारा साझा किए गए आरएसएस के निःस्वार्थ सेवा और सामाजिक समरसता के अनुभव तथा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात् “पूरा विश्व एक परिवार है” की सभ्यतागत दृष्टि के संदेश को आगे बढ़ाता है।
सुनील आंबेकर
अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस)
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September 5th 2026, 3:10 am
‘हनुमान अंश’ की दहाड़
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प्रशांत पोळ
इस समय सारे देश में फिल्म ‘हनुमान अंश’ की चर्चा है। कल शुक्रवार को इस मूवी ने चार सप्ताह पूरे किए और एक ऐसा इतिहास रच दिया कि सारे फिल्मी पंडित भौचक होकर देखते रह गए..!
अनेकों के लिए यह सफलता महज आश्चर्य है। अनेक लोग इस फिल्म की तुलना 1975 में प्रदर्शित हुई ‘जय संतोषी मां’ से कर रहे हैं। जय संतोषी मां धार्मिक फिल्म थी। उसमें भी जाने – पहचाने, प्रसिद्ध कलाकार नहीं थे। बजट बहुत कम था, मात्र 5 लाख। फिर भी यह फिल्म जबरदस्त हिट रही। इसने 50 लाख रुपये कमाए थे। किंतु कुछ समानता होने के बाद भी ‘हनुमान अंश’ की बात अलग है, बिल्कुल अलग। इसलिए इस फिल्म को और वर्तमान परिदृश्य को ठीक से समझना होगा। इस फिल्म को देखने के लिए युवा बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं, इसे भी समझना होगा।
यह मूवी आज के युवाओं के साथ ‘रेजोनेट’ (resonate) करती है। उनकी भावनाओं के साथ, आज की परिस्थिति के साथ, सिंक (synch) हो रही है। तालमेल बिठा रही है। इस समय भारत का युवा अपनी जड़ों को खोज रहा है। अपने मूलाधार को ढूंढ रहा है। पूरे देश में इस समय ‘भजन क्लबिंग’, ‘भजन जामिंग’, ‘अभंग रिपोस्ट’ जैसे कार्यक्रमों की धूम मची है। इन कार्यक्रमों में आपको 35 – 40 की आयु के ऊपर का कोई भी व्यक्ति नजर नहीं आएगा। चाहे दिल्ली के सीपी का हनुमान मंदिर हो, या गुरुग्राम का आर्टिस्ट चौक या शंकर चौक। अपने करियर को बनाने में लगे यह युवा, समय निकालकर भजन करने बैठ रहे हैं। कमोबेश पूरे देश का यही चित्र है।
(मध्यप्रदेश का छिंदवाड़ा छोटा सा शहर है। इस शहर की कुछ युवतियों ने सोचा, ‘चलो भजन क्लबिंग की जाए‘। अब भजन क्लबिंग क्या है, यह किसी को ज्यादा मालूम नहीं था। एक होटल वाले से बात की। कहा, “हम यहां एक छोटा सा कार्यक्रम करेंगे। बस कॉफी पिलाना।” इन छात्राओं को देखकर होटल वाला भी तैयार हो गया, कम दरों पर होटल और कॉफी के लिए।
इन छात्राओं ने अपने-अपने व्हाट्सएप समूह में सूचना डाली – ₹25 में भजन क्लबिंग। इनका अनुमान था, 10 – 15 छात्राएं / युवतियां आएंगी। किंतु वहां तो भीड़ लग गई। आखिरकार इन्हें रजिस्ट्रेशन बंद करना पड़ा। 10 – 20 की जगह 50 युवतियां आई। मस्त होकर खूब भजन गाए।
बाद में लड़कियां होटल वाले से हिसाब करने गई। उसने पैसे लेने से मना कर दिया। कहा, “इतने अच्छे भजन आपने गाए। इसके पैसे लेंगे क्या..? हमारी ओर से सब कुछ मुफ्त। लेकिन ऐसे कार्यक्रम हमेशा करते रहना। हमारा होटल आपके लिए सदैव निःशुल्क उपलब्ध रहेगा।”)
यह मूड है भारत की युवा शक्ति का। इस मूड को ‘हनुमान अंश’ स्वर दे रही है। इसके दो गाने जबरदस्त हिट हैं – ‘मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान, सागर में नैया डारे दई…’ और दूसरा है – ‘जब ज़िद पे आ गई पार्वती, समझाने पहुँचे सप्तऋषि’। ये गाने पूरे उत्तर भारत में धूम मचा रहे हैं।
और एक विशेष बात है। कुछ दिनों से बॉलीवुड पर जो ‘खानों’ का दबदबा था, वह पूरा टूट चुका है। इस मूवी ने इस बात को साबित करके दिखाया है।
इस मूवी के साथ प्रदर्शित हुई थी, आमिर खान की प्रोड्यूस की हुई फिल्म “बटवारा’, जो अच्छी-खासी पिट गई। राजकुमार संतोषी जैसा दिग्दर्शक, सनी देओल, शबाना आजमी जैसी स्टार कास्ट, आमिर खान प्रोडक्शन का जबरदस्त पीआर, अगस्त माह की, देश के बंटवारे के संदर्भ की पृष्ठभूमि। किंतु फिर भी यह फिल्म बुरी तरह से फ्लॉप हुई। केवल फ्लॉप ही नहीं, सिनेमाघरों से उखड़ गई। ट्रेड पंडितों के अनुसार ‘डिजास्टर’ साबित हुई। अभी तक इस मूवी ने पूरे विश्व से मात्र 50 करोड रुपये भी नहीं कमाए हैं और यह अधिकतम शहरों के सिनेमाघरों से उतर चुकी है। इसका बजट था, डेढ़ सौ करोड़ से भी ज्यादा।
यह ‘बटवारा’ मूवी भारत-पाकिस्तान के विभाजन को, वामपंथी दृष्टिकोण से पेश करती है। सनी देओल के रूप में एक भारतीय मुसलमान के दर्द को दिखाती है। 15 लाख लोग जिसमें मारे गए थे और डेढ़ करोड़ से ज्यादा जिसमें विस्थापित हुए थे, ऐसे भारत विभाजन को इसमें ‘भाईचारे’ की पृष्ठभूमि में दिखाया है, जो वास्तविकता से परे है। इसलिए शबाना आजमी, आमिर खान की इस मूवी को जनता ने सिरे से नकार दिया। रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। आमिर खान को समझना चाहिए कि अब समय बदल चुका है। जनता को बरगलाना अब संभव नहीं है।
इस पृष्ठभूमि में ‘हनुमान अंश’ का चमचमाता यश, स्तिमित करता है। मात्र दो करोड़ में बनी हुई यह मूवी, कल तक कुल 89 करोड रुपये कमा चुकी है। अब तो इसके स्क्रीन्स भी बढ़ गए हैं और 11 सितंबर से यह पूरे विश्व में प्रदर्शित होने जा रही है। यह मूवी जबरदस्त रिकॉर्ड बनाएगी यह सुनिश्चित है।
यह मूवी जिन नीम करोली बाबा के ऊपर बनी है, उनको मानने वालों में विश्व की बड़ी नामचीन हस्तियां हैं।
नीम करोली बाबा (महाराज जी) के प्रति पश्चिमी देशों में आकर्षण 1960 और 1970 के दशक में तब शुरू हुआ, जब उनके अमेरिकी शिष्य, बाबा राम दास (रिचर्ड अल्पर्ट) ने उनके अनुभवों पर प्रसिद्ध पुस्तक Be Here Now लिखी। इसके बाद दुनिया के कई बड़े दिग्गजों और टेक-बिजनेस लीडर्स का महाराज जी से गहरा जुड़ाव हुआ।
नीम करोली बाबा के सबसे प्रमुख विदेशी अनुयायी है –
स्टीव जॉब्स (Steve Jobs) – एपल के संस्थापक 1974 में अपने जीवन के कठिन दौर में आध्यात्मिक ज्ञान की खोज के लिए भारत आए थे। हालांकि, उनके पहुंचने से कुछ समय पहले ही महाराज जी का निधन हो चुका था, लेकिन स्टीव जॉब्स उनके आश्रम में रुके, जिससे उनके विचारों में बड़ा बदलाव आया।
मार्क जुकरबर्ग – फेसबुक के संस्थापक। जब 2008 के आसपास फेसबुक मुश्किल दौर से गुजर रहा था, तब स्टीव जॉब्स ने उन्हें भारत में नीम करोली बाबा के आश्रम जाने की सलाह दी थी। जुकरबर्ग वहां गए और एक महीने तक भारत में रहे, जिससे उन्हें फेसबुक की री-ब्रांडिंग का विजन मिला।
लरी ब्रिलियंट – प्रसिद्ध अमेरिकी महामारी विज्ञानी (Epidemiologist) और गूगल के पूर्व निदेशक। महाराज जी ने ही उन्हें भविष्यवाणी कर डब्ल्यूएचओ (WHO) के चेचक (Smallpox) उन्मूलन कार्यक्रम से जुड़ने को कहा था, जिसने दुनिया से चेचक को खत्म करने में बड़ी भूमिका निभाई।
जूलिया रॉबर्ट्स – ऑस्कर विजेता हॉलीवुड अभिनेत्री जूलिया रॉबर्ट्स अपनी फिल्म ईट प्रे लव (Eat Pray Love) की शूटिंग के दौरान नीम करोली बाबा की तस्वीर और उनकी शिक्षाओं से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने सनातन धर्म (हिन्दू धर्म) अपना लिया। वे महाराज जी की परम भक्त हैं।
विशाल अग्निहोत्री ने इस मूवी को बड़ी प्रामाणिकता और श्रद्धा से बनाया है। शूटिंग के समय विशाल भारद्वाज, प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पूरा पाठ होने के बाद ही काम प्रारंभ करते थे। यह इतनी प्रभावशाली है कि तुरंत दर्शकों के साथ जुड़ जाती है।
कुल मिलाकर अच्छे, साफ-सुथरे और राष्ट्रीयता के विचारों से बने सिनेमा का यह दौर है।
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September 5th 2026, 1:06 am
खून बहाने की धमकी देने वाला पाकिस्तान अब बातचीत की गुहार लगाने लगा
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सिंध जल संधि को लेकर पहले खून बहाने की धमकी देने वाला पाकिस्तान अब बातचीत की गुहार लगा रहा है। भारत के सख्त रुख के बाद पाकिस्तान ने नई दिल्ली से इस पर ‘रचनात्मक बातचीत’ की अपील की है।
पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने एक बयान में कहा कि दिल्ली को इस मुद्दे पर रचनात्मक बातचीत करनी चाहिए।
दरअसल, हाल ही में हेग स्थित ‘Permanent Court of Arbitration’ ने जल संधि पर एक निर्णय सुनाया था। इस निर्णय को भारत ने सिरे से खारिज कर दिया। इतना ही नहीं, हेग कोर्ट को ही “अवैध रूप से गठित” बताया और कहा कि उसे उसके संप्रभु विषयों पर निर्णय करने का कोई अधिकार नहीं है। भारत का कहना है कि इस मामले में न्यायाधिकरण का अधिकार क्षेत्र स्वीकार्य नहीं है और उसका निर्णय भारत पर बाध्यकारी नहीं है।
भारत के रुख के बाद पाकिस्तान बैकफुट पर है। इसका एक नमूना हाल ही में SCO समिट के दौरान भी देखने को मिला, जब प्रधानमंत्री मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ एक ही मंच पर थे, शहबाज लगभग गिड़गिडाने वाले अंदाज में भारत से पानी देने की गुहार लगाते नजर आए।
हालांकि ये बात अलग है कि इससे पहले तक खुद शहबाज और दूसरे पाकिस्तानी नेता अपनी आवाम को खुश करने के लिए ऊल-जलूल बयान देते रहे हैं।
‘पाकिस्तान के लिए पानी की एक-एक बूंद रेड लाइन है। अगर हमारी नदियों के सिस्टम को कोई खतरा हुआ, तो इसका करारा जवाब दिया जाएगा।’ — शहबाज शरीफ, प्रधानमंत्री
‘पाकिस्तान भारत के साथ टकराव नहीं चाहता, लेकिन संधि के तहत देश के जल संसाधनों को रोकने की किसी भी कोशिश को Act of War माना जाएगा।’ — इसहाक डार, विदेश मंत्री
‘पाकिस्तान अपने पानी के अधिकारों की रक्षा के लिए हर मोर्चे पर लड़ाई और युद्ध के लिए तैयार है।’ –बिलावल भुट्टो जरदारी, PPP चेयरमैन
खून बहाने की धमकी से बातचीत की अपील तक
हेग कोर्ट के निर्णय को भारत ने जिस दृढ़ता से नकारा है, पाकिस्तान समझ चुका है कि इस मुद्दे पर किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता काम आने वाली नहीं है। भारत को किसी भी तरह के दबाव से झुकाया नहीं जा सकता है।
तो अब पाकिस्तान के सामने एक ही रास्ता बचता है, गिड़गिड़ाने का, पानी की भीख मांगने का।
Jammu Kashmir Now
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September 4th 2026, 6:41 pm
पाकिस्तान – एक तरफ बाढ़ दूसरी तरफ अंधेरा…कराची, लाहौर, इस्लामाबाद जैसे शहरों में 24 घंटों तक की बिजल
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पहले बाढ़ और उसके बाद ब्लैक आउट…पाकिस्तान में हर दिन एक नई समस्या सामने होती है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पूरे पाकिस्तान में शाम 5 बजे से लेकर रात 1 बजे तक अघोषित बिजली कटौती की जा रही है।
कराची, लाहौर, इस्लामाबाद जैसे प्रमुख शहरों में एक-दो नहीं, 16 से 24 घंटों तक की लोड शेडिंग का सामना करना पड़ रहा है। कराची के नॉर्थ कराची, नाजिमाबाद, गुलिस्तान-ए-जौहर जैसे इलाकों में तो बिलकुल लाइट नहीं है। कंगाल हो चुकी सरकार के पास इतने भी पैसे नहीं बचे हैं कि बिजली खरीद सके। जिसके चलते 4 हजार मेगावाट से अधिक का शॉर्टफॉल हो चुका है, अकेले लाहौर में यह शॉर्टफॉल 1200 मेगवाट से ज्यादा का है।
लाहौर और पंजाब के कई क्षेत्रों में बार-बार ट्रिपिंग होने के चलते ट्रांसमिशन सिस्टम फेल हो चुका है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, दरअसल, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने के चलते कतर से पाकिस्तान आने वाली LNG गैस की सप्लाई रुक गई है। इसके कारण बिजली संयंत्रों के पास ईंधन खत्म हो चुका है। सरकारी कंपनियां बढ़े हुए रेट, ( $27 प्रति MMBtu ) पर, जो कम से कम तीन गुना तक है, LNG खरीदने की स्थिति में नहीं हैं।
इसके चलते पाकिस्तान में बिजली संयंत्र ठप पड़ चुके हैं, और ये ब्लैक आउट उसी का परिणाम है। इस ब्लैकआउट के कारण अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो रही हैं। पेयजल आपूर्ति रुक गई है और व्यापार भी ठप होने के कगार पर है।
एक तरफ पाकिस्तान बाढ़ के पानी में डूबा है, दूसरी तरफ जो बचे हैं, वो इस बिजली कटौती के चलते सड़क पर हैं।
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September 4th 2026, 6:41 pm
श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर श्री लड्डू गोपाल हेतु उपहार सामग्री प्रेषित
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वाराणसी, 02 सितम्बर, 2026।
सनातन संस्कृति के दिव्य एवं प्रमुख आध्यात्मिक केन्द्रों – काशी एवं मथुरा – के मध्य श्रद्धा, समर्पण एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान की अनुपम परंपरा को निरंतरता प्रदान करते हुए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व के अवसर पर श्री काशी विश्वनाथ धाम से भगवान श्री लड्डू गोपाल हेतु विशेष उपहार सामग्री श्रीकृष्ण जन्मस्थान, मथुरा को श्रद्धापूर्वक प्रेषित की गई।
वर्ष 2024 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर प्रारंभ किए गए इस धार्मिक एवं सांस्कृतिक नवाचार के अंतर्गत श्री काशी विश्वनाथ धाम से भगवान श्री विश्वेश्वर द्वारा श्रीकृष्ण जन्मस्थान, मथुरा में विराजमान श्री लड्डू गोपाल को उपहार सामग्री प्रेषित की गई थी। इसी क्रम में रंगभरी एकादशी के अवसर पर भी काशी एवं मथुरा के मध्य परस्पर भेंट एवं श्रद्धा-संदेशों के आदान-प्रदान की पावन परंपरा को आगे बढ़ाया गया।
नवाचारपूर्ण परंपरा का उद्देश्य सनातन धर्म के प्रमुख तीर्थों एवं मंदिरों के मध्य आध्यात्मिक संवाद, सांस्कृतिक समन्वय तथा परस्पर श्रद्धा के संबंधों को अधिक सुदृढ़ करना है।
भगवान श्री लड्डू गोपाल हेतु तैयार विशेष उपहार सामग्री को श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में भगवान श्री विश्वेश्वर महादेव के समक्ष विधि-विधानपूर्वक पूजित किया गया तथा भगवान श्री विश्वेश्वर का आशीर्वाद प्राप्त किया गया। तत्पश्चात वैदिक मंत्रोच्चार एवं पूजा-अर्चना के मध्य उक्त पावन उपहार सामग्री को श्रद्धापूर्वक श्रीकृष्ण जन्मस्थान, मथुरा के लिए प्रेषित किया गया। इस अवसर पर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के अधिकारियों एवं कार्मिकों की उपस्थिति में कार्यक्रम पारंपरिक गरिमा एवं श्रद्धाभाव के साथ संपन्न हुआ।
इस वर्ष नवाचार में अभिवृद्धि करते हुए देश-विदेश के विभिन्न देवालयों में विराजमान देवता के शुभकामना संदेश श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व हेतु श्री कृष्ण जन्मस्थल न्यास को संबोधित करते हुए निर्गत करने की पहल का समन्वय श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास द्वारा किया जा रहा है। अब तक लगभग 15 देशों से 100 से अधिक देवालयों से शुभकामना संदेश श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास द्वारा प्राप्त किए जा चुके हैं, जिन्हें श्री कृष्ण जन्मस्थल न्यास को भेंट सामग्री के साथ ही प्रेषित किया जा रहा है।
श्री कृष्ण एवं भगवान शिव सनातन धर्म की महान आध्यात्मिक परंपराओं के प्रमुख आराध्य स्वरूप हैं। उनके मध्य श्रद्धा, भक्ति एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान की परंपरा धार्मिक सौहार्द एवं सनातन एकात्मता को सुदृढ़ करने के साथ-साथ भारत की प्राचीन तीर्थ परंपरा को भी नवीन ऊर्जा प्रदान कर रही है।
काशी और मथुरा, दोनों ही भारतीय सनातन संस्कृति एवं आध्यात्मिक चेतना के प्रमुख केन्द्र हैं। इन दोनों पवित्र तीर्थों के मध्य स्थापित हो रही यह सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक परंपरा समस्त सनातन समाज को एकत्व, संवाद, सहभक्ति एवं पारस्परिक श्रद्धा का संदेश प्रदान करती है। मंदिर न्यास के अधिकारियों एवं कार्मिकों के सहयोग से कार्यक्रम को पूर्ण शुचिता, पारंपरिक गरिमा एवं श्रद्धाभाव के साथ सुचारु रूप से संपन्न कराया गया।
समारोह के उपरांत भगवान श्री लड्डू गोपाल हेतु समर्पित समस्त भेंट एवं उपहार सामग्री को विधिवत् एवं श्रद्धापूर्वक श्रीकृष्ण जन्मस्थान, मथुरा के लिए प्रेषित किया गया।
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास समस्त देशवासियों एवं आस्थावान सनातन श्रद्धालुओं को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए भगवान श्रीकृष्ण एवं बाबा श्री विश्वनाथ से समस्त विश्व के कल्याण, सुख, शांति एवं समृद्धि की कामना करता है।
श्री काशीविश्वनाथो विजयतेतराम
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September 4th 2026, 6:41 pm
NIA ने नालागढ़ पुलिस स्टेशन ब्लास्ट मामले में तीन और आरोपियों को गिरफ्तार किया
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शिमला/नई दिल्ली। नालागढ़ पुलिस स्टेशन में इसी साल एक जनवरी को हुए आईईडी विस्फोट के मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने तीन और आरोपियों को गिरफ्तार किया है। एजेंसी ने अब तक मामले में 6 लोगों को गिरफ्तार किया है।
एक जनवरी 2026 को सुबह करीब 9:40 बजे नालागढ़ पुलिस स्टेशन परिसर की दीवार के साथ धमाका हुआ। यह धमाका जांच अधिकारी के कमरे से सटी बाहरी दीवार के पास हुआ था।
शुरुआत में नालागढ़ पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की। बाद में एनआईए ने जांच अपने हाथ में ले ली। 8 मई 2026 को एनआईए ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया।
एनआईए ने पहले महावीर कुमार उर्फ काका, अजय मेहरा और मनप्रीत सिंह उर्फ मनी को मामले में गिरफ्तार किया था। ये तीनों पहले पंजाब पुलिस के मोहाली एसएसओसी की एफआईआर नंबर 02/2026 में गिरफ्तार थे। बाद में एनआईए ने इन्हें अपने मामले में भी गिरफ्तार किया।
घटना की जांच के दौरान तीन और लोगों की भूमिका सामने आई। इनकी पहचान अर्शदीप सिंह उर्फ अर्श कंडोला (मोहल्ला सिरहिंदिया, राहों, जिला एसबीएस नगर, पंजाब), करणप्रताप (मोहल्ला रोटा, राहों, जिला एसबीएस नगर, पंजाब), दिलजोत सैनी (झांसी पार्क कॉलोनी, नवांशहर रोड, राहों, जिला एसबीएस नगर, पंजाब) के तौर पर हुई है। तीनों पहले से ही पंजाब के गढ़शंकर पुलिस स्टेशन की एफआईआर नंबर 11/2026 में गिरफ्तार थे। अब एनआईए ने इन्हें नालागढ़ आईईडी ब्लास्ट केस में भी गिरफ्तार कर लिया है। इसी के साथ नालागढ़ आईईडी धमाके के मामले में एनआईए द्वारा गिरफ्तार आरोपियों की संख्या छह हो गई है।
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September 3rd 2026, 12:20 pm
पाकिस्तान – 200 साल पुराने गुरुद्वारे के बाद अब 125 साल पुराना मंदिर जमींदोज
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क्वेटा (बलूचिस्तान) में लगभग 200 साल पुराने श्री गुरु सिंह सभा गुरुद्वारे को गिराए जाने के दो दिन बाद ही अब पंजाब प्रांत में 125 साल पुराने मंदिर को कट्टरपंथियों ने ध्वस्त कर दिया। ताजा घटना पंजाब प्रांत के नारोवाल की है।
पंजाब के नारोवाल जिले के सिराज गांव में स्थित हिन्दू मंदिर लगभग 100 से 125 साल पुराना बताया जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लगभग 1,000 वर्ग मीटर में फैले मंदिर को 21 अगस्त को गिराए जाने की बात सामने आई। स्थानीय लोगों और अल्पसंख्यक समुदाय के संगठनों का आरोप है कि मंदिर की जमीन को पास के मदरसे के विस्तार के लिए इस्तेमाल करने के उद्देश्य से जानबूझकर ध्वस्त किया गया।
घटना से ठीक पहले बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में करीब 200 साल पुराने श्री गुरु सिंह सभा गुरुद्वारे को गिराए जाने का मामला सामने आया था। ऐतिहासिक गुरुद्वारे की जमीन पर मॉल बनाने की तैयारी की जा रही है। 1947 में बंटवारे के बाद गुरुद्वारे के परिसर में लगभग 1953 से सेंट गैब्रिएल स्कूल संचालित होने लगा था।
पाकिस्तान में कितने हिन्दू-सिक्ख धार्मिक स्थल बचे?
दिसंबर 2025 में पाकिस्तान की माइनॉरिटी कॉकस की संसदीय समिति को पेश की गई एक रिपोर्ट में सामने आया था कि पाकिस्तान में 1947 के दौरान कुल 1,817 हिन्दू मंदिर और गुरुद्वारे मौजूद थे। जहां पूजा पाठ से लेकर धार्मिक गतिविधियाँ होती थीं। हालाँकि, वर्तमान समय में 28 धार्मिक स्थल शेष बचे हैं। अन्य सभी मंदिर और गुरुद्वारे कट्टरपंथियों की हिंसा के भेंट चढ़ गए। इन धार्मिक स्थलों को या तो उपेक्षा के कारण खंडहर होने दिया गया या अवैध कब्जों और दंगों के दौरान तोड़ दिया गया।
इनमें से सैकड़ों ऐतिहासिक मंदिरों और गुरुद्वारों को सरकारी स्कूलों, मदरसों, होटलों, दुकानों और रेस्तरां में तब्दील कर दिया गया। वहीं, एक आर्थिक जनगणना रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में 6 लाख से अधिक मस्जिदें सक्रिय हैं। लेकिन हिन्दुओं व अन्य अलप्संख्यकों से जुड़े धार्मिक स्थलों को पाकिस्तानी चुन चुनकर मिटाने में लगी है।
पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सरकार को अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों की सुरक्षा के लिए एक विशेष टास्क फोर्स गठित करने का स्पष्ट निर्देश दिया था। लेकिन 12 साल बीत जाने के बाद भी इस आदेश को जमीन पर लागू नहीं किया गया। नतीजा यह है कि अल्पसंख्यकों की धार्मिक विरासत लगातार असुरक्षित बनी हुई है। अब नारोवाल की ताजा घटना हो या बलूचिस्तान में 200 साल पुराने ऐतिहासिक गुरुद्वारे को विध्वंस का मामला, यह घटना पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर किए जाने वाले सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को उजागर करती है।
पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बात करता है। लेकिन नारोवाल के मंदिर से लेकर क्वेटा के गुरुद्वारे तक सामने आ रहे मामले पूछ रहे हैं कि जिन मंदिरों और गुरुद्वारों की जिम्मेदारी पाकिस्तान के पास है, उनकी सुरक्षा आखिर कब सुनिश्चित होगी?
मंदिर को गिराए जाने के पीछे प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन ‘तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान’ (TLP) से जुड़े कट्टरपंथियों का हाथ बताया जा रहा है।
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September 3rd 2026, 12:20 pm
युवा ही भारत की असली ताकत, राष्ट्र निर्माण में दें योगदान – रामदत्त चक्रधर जी
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संतकबीरनगर, 1 सितंबर। संतकबीरनगर में मंगलवार को बनियाबारी स्थित कृष्णा पैलेस में ‘संवाद से विचार, विचार से निर्माण तथा युवा से राष्ट्र का उत्थान’ विषय पर आयोजित ‘युवा संवाद’ कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह रामदत्त चक्रधर जी ने कहा कि देश के 38 करोड़ युवा भारत की असली ताकत हैं। इन्हीं युवाओं के कंधों पर भारत का भविष्य टिका है। युवा शिक्षित, शालीन एवं संस्कारवान बनें और अपनी ऊर्जा देश तथा समाज के उत्थान में लगाएं। युवाओं को राष्ट्रभक्ति के ज्वार को राष्ट्रशक्ति में परिवर्तित करना होगा।
उन्होंने युवाओं से शिक्षित, शालीन एवं संस्कारवान बनकर अपनी ऊर्जा राष्ट्र और समाज के उत्थान में लगाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि युवाओं की सक्रिय भागीदारी से ही भारत को पुनः जगतगुरु के स्थान पर प्रतिष्ठित किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि युवाओं को महर्षि अरविंद, शहीद भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों एवं महापुरुषों को अपना आदर्श बनाना चाहिए। केवल महापुरुषों के जीवन को पढ़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके विचारों एवं आदर्शों को अपने जीवन में उतारना आवश्यक है। अपने से बड़ों का अपमान करना अथवा उन्हें गाली देना भारतीय संस्कार नहीं है। भारतीय संस्कृति युवाओं को सम्मान, संयम और कर्तव्यबोध की शिक्षा देती है।
सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि देश की युवा पीढ़ी अपनी मातृभूमि, धर्म और परंपराओं की रक्षा एवं संवर्धन के लिए सकारात्मक भूमिका निभाए। युवा अपनी ऊर्जा को सही दिशा देकर समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करें। युवाओं को भी राष्ट्र निर्माण के इस कार्य में अपनी सक्रिय भूमिका सुनिश्चित करनी चाहिए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध पर्वतारोही रजनी साव ने की। संवाद कार्यक्रम के अंतिम चरण में युवाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि देश के युवाओं में असीमित ऊर्जा और सामर्थ्य है। आवश्यकता इस बात की है कि युवा इस ऊर्जा का उपयोग सकारात्मक दिशा में करें। उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि वे संवाद में सुनी गई बातों को केवल सुनने तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारते हुए समाज और राष्ट्र निर्माण में योगदान दें।
युवा संवाद कार्यक्रम में बड़ी संख्या में युवा एवं गणमान्यजन उपस्थित रहे।
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September 3rd 2026, 12:20 pm
राष्ट्रीय विचार की यात्रा है ‘राष्ट्रधर्म’ – स्वांत रंजन जी
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लखनऊ। राष्ट्रधर्म मासिक पत्रिका के स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वांत रंजन जी ने कहा कि राष्ट्रीय विचारों की यात्रा है राष्ट्रधर्म। इसमें निरन्तरता बनी रहनी चाहिये और इसे समाज के सभी वर्गों तक पहुँचना चाहिये।
उन्होंने कहा कि आज समाज में विचारों को भ्रमित करने का कार्य किया जा रहा है। जिससे सतर्क रहने और इसे समझने की आवश्यकता है। ऐसी परिस्थिति में राष्ट्रधर्म जैसी पत्रिका का महत्त्व अत्यधिक बढ़ जाता है क्योंकि यह राष्ट्रीय विचारों के साथ निश्चित दिशा में चलकर समाज, संस्कृति और राष्ट्र हित का कार्य कर रही है। इसी क्रम में स्वांत रंजन जी ने दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी और भाउराव देवरस के प्रयासों का उल्लेख किया।
इस अवसर पर राष्ट्रधर्म के संस्थापक निदेशक पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयन्ती के उपलक्ष्य में आयोजित प्रतियोगिता के विजेताओं को सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में राष्ट्रधर्म के सितम्बर अंक का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. ए.पी. तिवारी ने की। कार्यक्रम का संचालन प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने किया। धन्यवाद ज्ञापन सर्वेश चन्द्र द्विवेदी ने किया।
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September 3rd 2026, 12:20 pm
अयोध्या से रामराज्य का मार्ग प्रशस्त होगा – आलोक कुमार जी
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नई दिल्ली, 02 सितंबर 2026।
विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि आज अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की एक महत्वपूर्ण बैठक संपन्न हुई। हम सब के लिए आनंद की बात है कि पूज्य गोविंद देव गिरी जी महाराज अब श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महामंत्री होंगे। पूज्य गोविंद देव गिरि जी महाराज को महामंत्री का दायित्व ग्रहण करने पर श्रद्धापूर्वक शुभकामनाएं देते है। हमें विश्वास है कि उनका नेतृत्व हम सबके लिए मार्गदर्शक होगा।
महेश भागचंदका जी श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के अग्रिम पंक्ति के सिपाही रहे हैं। बाद में भी वे श्री अशोक सिंघल फाउंडेशन द्वारा पूज्य अशोक सिंघल जी और हिंदुत्व के काम को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका ट्रस्टी और ट्रस्ट का कोषाध्यक्ष होना ट्रस्ट के लिए बहुत लाभदायक होगा।
अधिवक्ता मदन मोहन पांडेय, श्री राम जन्मभूमि की न्यायिक लड़ाई में एक समर्पित अधिवक्ता रहे हैं। उनके तप का श्री राम जन्मभूमि के मुकदमा जीतने में विशिष्ट योगदान है। अब ट्रस्टी के रूप में उनकी नियुक्ति से ट्रस्ट को उनकी विधिक दृष्टि और अनुभव का लाभ मिलेगा।
निर्मला यादव जी ट्रस्टी बनी हैं। इससे हिन्दू समाज के कई वर्गों का ट्रस्ट में प्रतिनिधित्व हो गया है। यह नियुक्ति नारी शक्ति के सम्मान का भी प्रतीक है। सीताराम जी की इस पवित्र भूमि के कार्य में मातृशक्ति की भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है और उनके समावेश से ट्रस्ट के कार्यों में एक नई संवेदनशीलता, दृष्टि और समग्रता आएगी।
मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की नियुक्ति
ट्रस्ट ने एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र जी को ट्रस्ट का मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्त किया है। वे एक अत्यंत वरिष्ठ, सम्मानित एवं अनुभवी व्यक्तित्व हैं। उनका विशाल अनुभव ट्रस्ट के कार्यों को अधिक प्रभावी एवं पारदर्शी बनाएगा। हम उन्हें भी हार्दिक बधाई देते हैं।
विश्व हिन्दू परिषद को पूर्ण विश्वास है कि इन अनुभवी सदस्यों के जुड़ने से ट्रस्ट भव्य श्री राम मंदिर के कार्यों को और अधिक दक्षता से पूर्ण करेगा और अयोध्या से रामराज्य का मार्ग प्रशस्त होगा।
जय श्री राम!
https://x.com/editorvskbharat/status/2095140894366486986
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September 3rd 2026, 12:20 pm
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में सेवा में जुटे 500 से अधिक स्वयंसेवक
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चित्रकूट। मंदाकिनी में आई भीषण बाढ़ ने चित्रकूट के जनजीवन को प्रभावित किया है। बाढ़ का पानी उतरने के बाद लोग अपने घरों और दुकानों को संभालने में जुटे ही थे कि दोबारा बारिश शुरू हो गई। ऐसे में बाढ़ प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों को फिर से जलस्तर बढ़ने की आशंका सताने लगी है। साथ ही बाढ़ के बाद प्रभावित क्षेत्रों में भोजन, पीने के साफ पानी और कपड़ों तक की समस्या सामने आ रही है। बाढ़ का पानी उतरने के बाद प्रभावित परिवारों के सामने पुनर्वास और रोजमर्रा की जरूरतों का संकट खड़ा हुआ है।
ऐसी विषम परिस्थिति के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 500 से अधिक स्वयंसेवक राहत एवं सेवा कार्यों में सक्रियता से जुटे हुए हैं। चित्रकूट नगर क्षेत्र में कुल 6 सेवा केंद्रों के माध्यम से कार्य चल रहा है। रामघाट, सीतापुर, बेड़ी पुलिया एवं शंकर बाजार सहित विभिन्न स्थानों पर 360 स्वयंसेवक सेवा कार्य में लगे हैं। वहीं ग्रामीण क्षेत्र मानिकपुर में 3 सेवा केंद्रों पर 180 स्वयंसेवक राहत एवं सेवा कार्यों में सक्रिय हैं। प्रभावित परिवारों तक भोजन के पैकेट, पेयजल एवं आवश्यक सामग्री पहुंचाई जा रही है।
सामग्री के एकत्रीकरण एवं वितरण के लिए 10 टोलियां बनाई गई हैं, जबकि भोजन एवं अन्य आवश्यक सामग्री के निर्माण/तैयारी के कार्य में 12 टोलियां लगी हुई हैं। स्वयंसेवक समाज की सज्जन शक्ति को साथ लेकर राहत कार्यों में सहयोग कर रहे हैं। संकट की इस घड़ी में संघ के स्वयंसेवक सेवा, सहयोग और संवेदना के साथ बाढ़ प्रभावित परिवारों के बीच निरंतर सक्रिय हैं।
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September 3rd 2026, 12:20 pm
आरोग्यधाम द्वारा चित्रकूट के 9 स्थानों पर बाढ़ राहत-चिकित्सा शिविर का आयोजन
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चित्रकूट। चित्रकूट में आयी विनाशकारी बाढ़ के बाद दीनदयाल शोध संस्थान के कार्यकर्ता बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में राहत और बचाव का कार्य कर रहे हैं। संस्थान के सह संगठन सचिव अनिल अग्रवाल भी बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में जाकर कार्यकर्ताओं के साथ समन्वय कर रहे हैं।
संगठन सचिव ने प्रमोदवन हरिजन बस्ती में बाढ़ पीड़ितों से मिलकर उन्हें दैनिक उपयोग की सामग्री वितरित की। दीनदयाल शोध संस्थान के कार्यकर्ताओं के 9 समूह बनाए गए हैं जो विभिन्न वार्डों में जाकर स्थिति का जायजा लेकर आवश्यक राहत उपलब्ध कराएंगे। हर समूह में 5 से 7 कार्यकर्ताओं की ड्यूटी लगाई गई है वो संबंधित वार्ड में जाकर बाढ़ ग्रस्त लोगों का सर्वे करते हुए उनकी आवश्यकताओं को चिन्हित कर रहे हैं, जिससे आवश्यकता के अनुसार सामग्री का टोकन उपलब्ध कराते हुए निर्धारित जगह से आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई जा सके।
इसके अलावा चित्रकूट के 9 अलग-अलग वार्डों में बाढ़ राहत-चिकित्सा शिविर आरोग्यधाम द्वारा लगाए जा रहे हैं। यह शिविर चिकित्सकों द्वारा प्रातः 7:00 बजे से शाम 7:00 बजे तक सुचारू संचालित किया जा रहे हैं। जिसमें चिकित्सा सेवा, निःशुल्क दवाइयों का वितरण, स्वास्थ्य जांच, विशेषज्ञ परामर्श एवं आपातकालीन सेवा को शामिल किया गया है।
कृषि विज्ञान केंद्र मझगवां एवं गनीवां के वैज्ञानिक जिले में लगातार हो रही वर्षा एवं बाढ़ की स्थिति में कृषकों को पशुओं के स्वास्थ्य से संबंधित एवं फसलों में अत्यधिक जलभराव की स्थिति से निपटने के लिए आवश्यक सलाह एवं मौसम पूर्वानुमान की जानकारी दे रहे हैं। सभी वैज्ञानिक टीम बनाकर बाढ़ग्रस्त गांवों में जाकर किसानों से सम्पर्क कर रहे हैं। साथ ही पशुओं के स्वास्थ्य शिविर आयोजित कर विभिन्न संस्थाओं के साथ मिलकर वृहद टीकाकरण अभियान शुरू किया गया है।
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September 3rd 2026, 12:20 pm
स्वामी गोविंददेव गिरी जी होंगे श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महामंत्री
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सेवानिवृत्त एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र की मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में नियुक्ति
अयोध्या धाम, २ सितंबर, २०२६।
श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र के न्यासियों की बैठक आज भाद्रपद कृष्णा पंचमी, २०८३, बुधवार, २ सितंबर, २०२६ को अयोध्या में सम्पन्न हुई। बैठक में न्यासी मंडल में रिक्त स्थानों की पूर्ति, मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सी ई ओ) की नियुक्ति, वर्ष २०२५-२६ के वार्षिक लेखों का अनुमोदन आदि सहित विशेष जांच दल द्वारा जांच की प्रगति, उच्चतम न्यायालय में इस विषय पर अद्यतन जानकारी पर चर्चा के साथ ही महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए।
न्यासियों ने उच्चतम न्यायालय में कथित वित्तीय अनियमितताओं के संबंध में प्रविष्ट याचिका पर न्यायालय द्वारा पारित आदेश का संज्ञान लिया, जिसमें जांच का क्षेत्र – कालखंड और विषय दोनों को विस्तृत किया गया है। न्यास ने आदेश का स्वागत किया, जिससे सत्य प्रकाशित हो सके और जन-मन से भ्रम का निवारण हो सके।
तीर्थक्षेत्र की ओर से बताया गया कि चढ़ावे की नगद राशि की गणना की प्रक्रिया में मानवीय हस्तक्षेप कम करने के निमित्त किए जा रहे प्रयासों पर चर्चा हुई। दो बैंकों और आईआईटी से इस संबंध में कुछ प्रस्ताव मिले हैं, जिनका मूल्यांकन कर शीघ्र ही तकनीक की सहायता से इस दिशा में प्रगति हो सकेगी।
मुख्य कार्यकारी अधिकारी का चयन करने के निमित्त गठित समिति की अनुशंसा पर चर्चा के पश्चात न्यास ने सेवानिवृत्त एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र का चयन करते हुए मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया है। आशा है कि वे शीघ्र ही अपना कार्यभार संभाल लेंगे। जितेंद्र मिश्र को भारतीय वायु सेना में विभिन्न विभागों में ३९ वर्ष कार्य करने और नेतृत्व का लंबा अनुभव है। उन्हें सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल का पुरस्कार मिला है जो सशस्त्र सेनाओं में सर्वोच्च मेडल है।
न्यासी मंडल ने चयन समिति के सदस्यों न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) प्रमोद कोहली, लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) विष्णुकांत चतुर्वेदी, सुरेश हावड़े और समिति के सचिव समीर पंडा के प्रति अल्पकाल में साढ़े पाँच हजार आवेदनों की जांच और सैकड़ों आवेदकों का साक्षात्कार कर इस महती कार्य को सम्पन्न करने के लिए आभार व्यक्त किया।
बैठक में तीन न्यासियों के रिक्त स्थानों पर नियुक्ति पर विचार कर तीन नवीन न्यासी नियुक्त किए गए। महेश भागचंदका जी, मदनमोहन पांडे जी और डॉ. निर्मला यादव जी।
न्यास ने पदाधिकारियों के दायित्व पर भी चर्चा की। तदनुसार स्वामी गोविंददेव गिरि जी अब महामंत्री होंगे। महेश भागचंदका जी कोषाध्यक्ष का दायित्व संभालेंगे। न्यासी मंडल ने कठिन एवं चुनौतीपूर्ण अवधि में महामंत्री पद का कार्यभार सफलतापूर्वक निर्वहन करने हेतु कृष्ण मोहन जी की सराहना करते हुए उनके प्रति आभार प्रकट किया।
नवीन न्यासियों का संक्षिप्त परिचय
- महेश भागचंदका
स्नातक, आयु ६८ वर्ष, व्यवसायी, समाजसेवी, नई दिल्ली
– पुस्तक ‘हिन्दुत्व के पुरोधा’ के लेखक
– श्री राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के भूमि-पूजन और प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रमों में यजमान की भूमिका में अनुष्ठानों में सहभागिता
– श्रीराम वन गमन यात्रा से जुड़े २९२ पवित्र तीर्थस्थलों में श्रीराम स्तम्भ की स्थापना में संलग्न
– वर्ल्ड हिन्दू इकनॉमिक फोरम की कार्यकारिणी के सदस्य
२. मदन मोहन पांडे
विधि स्नातक, आयु ७४ वर्ष, अधिवक्ता, अयोध्या छावनी
– अधिवक्ता परिषद उत्तरप्रदेश प्रांत में पदाधिकारी
– श्री राम जन्मभूमि मंदिर मामले में १९९० से २०१९ तक उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में पैरवी, श्री रामलला विराजमान और पूज्य महंत श्री रामचंद्र परमहंस दास जी की ओर से।
– उ.प्र. के अतिरिक्त महाधिवक्ता का दायित्व – ६ वर्ष
– श्री हरि सत्संग समिति के उपाध्यक्ष और अयोध्या में कथाकार योजना प्रशिक्षण केंद्र के पालक
– शिशु मंदिर अयोध्या जनपद की स्थायी समिति के अध्यक्ष
३. डॉ. निर्मला यादव
परास्नातक (हिन्दी एवं संस्कृत), पी.एचडी, आयु ६६ वर्ष, शिकोहाबाद (उ.प्र.)
– १९ वर्ष महाविद्यालय प्राचार्या का दायित्व, अब सेवानिवृत
– पी. एचडी थीसिस और एमए की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन का अनुभव
– 15 वर्ष तक विश्वविद्यालय की कार्य परिषद की सदस्या
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September 3rd 2026, 12:20 pm
राष्ट्रप्रेम, मातृभूमि के प्रति समर्पण भावना को सुदृढ़ करते हैं संघ गीत – पराग अभ्यंकर जी
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शताब्दी वर्ष पर ‘शत कंठे शताब्दी का स्वर’ कार्यक्रम का आयोजन; स्वयंसेवकों ने विभिन्न भारतीय भाषाओं में 100 से अधिक गीत प्रस्तुत किए
भुवनेश्वर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में भुवनेश्वर महानगर के बौद्धिक विभाग ने ‘शत कंठे शताब्दी का स्वर’ कार्यक्रम का आयोजन किया। भुवनेश्वर स्थित बुद्ध मंदिर में आयोजित कार्यक्रम में 105 स्वयंसेवकों ने 100 से अधिक राष्ट्रभक्ति एवं संघ गीतों की प्रस्तुति दी। कार्यक्रम में स्वयंसेवकों ने ओड़िया के साथ-साथ हिंदी, संस्कृत, बंगाली, असमिया, तेलुगु, मलयालम और पंजाबी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं के गीत प्रस्तुत किए।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सेवा प्रमुख पराग अभ्यंकर जी ने कहा कि संगीत केवल स्वर और ताल का संयोजन नहीं है, बल्कि यह मन में भावनाओं को जागृत करने का प्रभावी माध्यम भी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में गाए जाने वाले गीत केवल मनोरंजन या मन को प्रसन्न करने के लिए नहीं होते। इन गीतों के शब्द और उनमें निहित भाव स्वयंसेवकों के भीतर राष्ट्रप्रेम, समर्पण और मातृभूमि के प्रति सेवा की भावना को मजबूत करते हैं। संघ की शाखाओं में मातृभूमि भारत की आराधना की जाती है और स्वयंसेवक गीतों में व्यक्त भावों को आत्मसात करते हुए राष्ट्र के प्रति अपने समर्पण को निरंतर बढ़ाता है। गीतों के माध्यम से लोगों के भीतर राष्ट्र के लिए कार्य करने की प्रेरणा उत्पन्न की जा सकती है।
पराग जी ने कहा कि एकाम्र क्षेत्र भगवान शिव की नगरी है और भारतीय परंपरा में भगवान शिव को संगीत का जनक माना जाता है। ऐसे में संघ शताब्दी वर्ष के दौरान भुवनेश्वर महानगर के बौद्धिक विभाग द्वारा इस तरह का आयोजन किया जाना अपने आप में विशेष और अनूठा प्रयोग है। इस प्रकार की पहल को आगे किस तरह विस्तारित किया जाए, इस दिशा में भी विचार करने की आवश्यकता है।
उन्होंने स्वयंसेवकों के प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि संगीत के माध्यम से समाज के प्रत्येक हृदय में राष्ट्रसेवा की भावना को मजबूत करने के ऐसे प्रयास निरंतर जारी रहने चाहिए। महाप्रभु लिंगराज की इस पवित्र धरती पर आयोजित यह पहल विशेष महत्व रखती है।
उद्घाटन अवसर पर ओडिशा (पूर्व) प्रांत के प्रांत बौद्धिक प्रमुख तन्मय महापात्र ने आयोजन की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि ‘शत कंठे शताब्दी का स्वर’ कार्यक्रम की तैयारी अप्रैल माह से चल रही थी। इस अनूठे कार्यक्रम की मूल कल्पना संघ के बौद्धिक विभाग की अखिल भारतीय गीत टोली के सदस्य असित वरण महापात्र की थी। हालांकि वे कार्यक्रम में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित नहीं हो सके, लेकिन बेंगलुरु में रहते हुए भी उन्होंने ऑनलाइन माध्यम से आयोजन की तैयारियों और इसे सफल बनाने में सहयोग किया।
तन्मय महापात्र ने बताया कि संघ की शाखाओं में सामान्यतः स्वयंसेवक बिना वाद्य यंत्रों के गीत गाते हैं। इस कार्यक्रम में पहली बार स्वयंसेवकों ने वाद्य यंत्रों के साथ सामूहिक रूप से गीत प्रस्तुत किए। बिना वाद्य यंत्रों के अभ्यास करने वाले स्वयंसेवकों के लिए अचानक वाद्य यंत्रों के साथ प्रस्तुति देना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। भुवनेश्वर महानगर के स्वयंसेवकों ने इस चुनौती को सफलतापूर्वक पूरा किया। कार्यक्रम में सात वर्ष से लेकर 70 वर्ष तक की आयु के स्वयंसेवकों ने भाग लिया।
आठ भारतीय भाषाओं में राष्ट्रभक्ति गीतों की प्रस्तुति
कार्यक्रम की विशेषता इसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता भी रही। स्वयंसेवकों ने ओड़िया के अलावा बंगाली, असमिया, तेलुगु, मलयालम, पंजाबी, हिंदी और संस्कृत सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में गीत प्रस्तुत किए। इन गीतों को विभिन्न तालों और संगीत शैलियों के अनुरूप तैयार किया गया था। कार्यक्रम की संगीत संरचना और प्रस्तुतियों को तैयार करने में भुवनेश्वर महानगर के बौद्धिक प्रमुख और उनके सहयोगी कलाकारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
कार्यक्रम की शुरुआत 100 स्वयंसेवकों द्वारा ‘वंदे मातरम्’ के सामूहिक गायन से हुई। इसके बाद विभिन्न आयु वर्ग के स्वयंसेवकों और कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रभक्ति एवं संघ गीतों की प्रस्तुति दी।
संघ शताब्दी वर्ष में स्वयंसेवकों का यह सामूहिक प्रयास देशभर में अपनी तरह की एक अनूठी पहल है।
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September 3rd 2026, 12:20 pm
लोकमंथन यात्रा का डिडाणिया में स्वागत; नशामुक्ति व पॉलीथीन मुक्त गांव का लिया संकल्प
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जयपुर। लोकमंथन 2026 जयपुर के तहत वैचारिक समूह के संगठनों की ओर से निकाली जा रही लोकमंथन (लोक दर्शन) यात्रा का शुभारंभ बुधवार को लोकदेवता बाबा रामदेव की पावन समाधि रामदेवरा से हुआ।
विधिवत पूजन एवं राष्ट्रघोष के साथ यात्रा को रवाना किया गया। रामदेवरा में आयोजित कार्यक्रम में भारतीय लोकजीवन, ज्ञान परंपरा, संस्कृति और सामाजिक चेतना से जुड़े विभिन्न विषयों पर वक्ताओं ने विचार रखे।
कार्यक्रम में प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे. नंदकुमार जी ने भारतीय संवाद परंपरा की विशेषता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत में संवाद केवल दो व्यक्तियों के बीच का विषय नहीं रहा, बल्कि यहां समाज के विभिन्न वर्गों के साथ प्रकृति और समस्त जीव-जगत को भी व्यापक विमर्श का हिस्सा माना गया है। उन्होंने लोकज्ञान और शास्त्रीय ज्ञान को भारतीय ज्ञान परंपरा के परस्पर पूरक आयाम बताते हुए कहा कि भारत की सभ्यता का निर्माण गांवों, वनों, पर्वतों, नदियों और लोकजीवन के सतत संवाद से हुआ है।
रामदेवरा से रवाना होकर लोकमंथन यात्रा डिडाणिया पहुंची, जहां ग्रामीणों ने कलश यात्रा निकालकर यात्रा रथ का भव्य स्वागत किया। बिडाणियों की ढाणी में पारंपरिक वस्तुओं की प्रदर्शनी लगाई गई। इसके बाद देवगिरी जी मंदिर में दर्शन किए गए तथा मंदिर परिसर में वृक्षारोपण किया गया।
कार्यक्रम में जल संरक्षण, नारी सम्मान, मातृभाषा एवं स्थानीय बोली के संरक्षण तथा मोबाइल और रील संस्कृति से संयमित रहने जैसे सामाजिक विषयों पर भी लोक प्रस्तुतियों के माध्यम से संदेश दिया गया।
कार्यक्रम के अंत में ग्रामवासियों ने डिडाणिया गांव को नशामुक्त एवं पॉलीथीन मुक्त बनाने का सामूहिक संकल्प लिया। इसके बाद लोकमंथन यात्रा अपने अगले पड़ाव जैसलमेर के लिए रवाना हुई।
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September 3rd 2026, 12:20 pm
भुवनेश्वर में धर्म रक्षा दिवस–2026 का आयोजन
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भुवनेश्वर, 30 अगस्त 2026।
पूज्य संत स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी के 18वें बलिदान स्मृति दिवस के अवसर पर ‘धर्म रक्षा दिवस–2026’ भुवनेश्वर के यूनिट–8 स्थित सरस्वती शिशु विद्या मंदिर परिसर में श्रद्धा आयोजित किया गया।
धर्म जागरण समन्वय, भुवनेश्वर द्वारा आयोजित स्मृति समारोह में पूज्य संत स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी के धर्म, संस्कृति, शिक्षा और जनजातीय समाज के कल्याण में योगदान एवं उनके बलिदान को याद किया गया।
कार्यक्रम में निगम कल्पतरु आश्रम, भुवनेश्वर के पूज्य संत स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज और सिद्धिगिरी आश्रम, गोविंदपुर, कटक के पूज्य संत श्री बाबाजी विश्वनाथ दास प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
चकापाद संस्कृत विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त अध्यक्ष चौधरी विभूतिभूषण पटनायक जी ने सम्मानित अतिथि के रूप में भाग लिया।
पूर्वक्षेत्र धर्म जागरण प्रमुख बिनय कुमार भूयाँ ने मुख्य वक्ता के रूप में शामिल होकर स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती महाराज के जीवन, आदर्श, सेवा और बलिदान पर प्रकाश डाला।
वक्ताओं ने कहा कि स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी ने अपना जीवन धर्म, संस्कृति, शिक्षा और समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया था। विशेष रूप से जनजातीय समाज की शिक्षा, सामाजिक उन्नति और जागरूकता के लिए उनका योगदान स्मरणीय है।
धर्म रक्षा दिवस मनाने का उद्देश्य स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी के आदर्शों और सेवामय जीवन को याद करने के साथ-साथ धर्म, संस्कृति, नैतिकता, सामाजिक एकता और जन-जागरण का संदेश समाज तक पहुँचाना है।
अंत में आयोजकों की ओर से सभी अतिथियों, संतों, कार्यकर्ताओं, मीडिया प्रतिनिधियों और उपस्थित सभी शुभचिंतकों का धन्यवाद व्यक्त किया गया।
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August 31st 2026, 1:53 pm
भारत के मौलिक दर्शन को मानने वालों का संगठन है संघ – डॉ. कृष्ण गोपाल जी
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काशी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, काशी महानगर द्वारा चौकाघाट स्थित गिरजा देवी सांस्कृतिक संकुल के सभागार में संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त आयोजित प्रमुखजन संवाद-संगोष्ठी में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत के मौलिक दर्शन को मानने वालों का संगठन है। अपने सांस्कृतिक अधिष्ठान को सुरक्षित रखते हुए युगानुकूल तकनीक को स्वीकार कर समाज में संगठन का कार्य संघ कर रहा है। हिन्दू समाज दुनिया को बचाने का एकमात्र आधार है, परन्तु सबसे पहले हिन्दू समाज को अपना घर सुव्यवस्थित करना होगा।
उन्होंने कहा कि 100 वर्षों की संघ यात्रा रोचक और रोमांचकारी है। यद्यपि इस कालखण्ड में संघ को अनेक समस्याएं झेलनी पड़ी, परन्तु संघ ने युगानुकूल परिवर्तन कर समाज को एकत्रित करने का कार्य जारी रखा। प्राचीन भारत गणित, ग्रह गति, वस्त्र विन्यास, कृषि, रसायन विज्ञान, मानव शरीर रचना विज्ञान में विश्व में अग्रणी था। नालंदा, विक्रमशिला, तक्षशिला जैसे विश्व विख्यात विश्वविद्यालय भारत में थे। विश्व अर्थव्यवस्था में 30 प्रतिशत भारत का योगदान था। मानवीय मस्तिष्क की जो भी उच्चतम कृति हो सकती है, वह सब भारत में बनती थी। परन्तु हजारों वर्षों के संघर्ष के कारण शस्य श्यामला भूमि अकाल ग्रस्त होने लगी। संघ संस्थापक पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने समस्याओं के समाधान के तीन मुख्य बिन्दु बताए। प्रथम – भारतीय नागरिकों के मन में देशभक्ति भाव का जागरण करना, दूसरा – समाज जीवन में आत्मविश्वास की वृद्धि करना और तीसरा – पूर्वजों की कीर्ति को ध्यान में रखकर उसके अनुरूप कार्य करना। अंग्रेजों का कथन था कि भारतीय अकर्मण्य है, प्रशासनिक समझ नहीं है एवं आर्य बाहर से आए हैं। डॉ. हेडगेवार ने इन भ्रांतियों को हटाने का कार्य प्रारम्भ किया।
सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि आज 90 हजार से अधिक शाखाएं और 50 लाख से अधिक स्वयंसेवक एक समान उद्देश्य को लेकर देशहित में अपना समय देते हैं। सामाजिक जीवन में बदलाव के लिए स्वयंसेवक अनेक संगठन चला रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में विद्या भारती, श्रमिकों के मध्य भारतीय मजदूर संघ, सेवा के क्षेत्र में सेवा भारती, वनवासी समाज के मध्य वनवासी कल्याण आश्रम जैसे अनेकों समूह समाज की विषमता को दूर करने का कार्य कर रहे हैं।
उन्होंने उपभोक्तावादी संस्कृति से सचेत रहने का आग्रह किया। साथ ही विश्व में व्याप्त असहिष्णुता को समाप्त करने का आह्वान किया। श्रोताओं की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए एक प्रश्न के उत्तर में सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि 1947 में दुनिया के सभी देश मानते थे कि भारत एक राष्ट्र के रूप में लम्बे समय तक नहीं टिक सकता, वह देश बिखर जाएगा। परन्तु आज शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा के क्षेत्र में भारत की यात्रा अनवरत जारी है। कोरोना काल में भारत एकमात्र देश रहा, जहां लाखों लोगों को प्रतिदिन नि:शुल्क भोजन प्राप्त हो रहा था।
भारत में हिन्दू वह व्यक्ति है, जो इस देश को मातृभूमि मानता हो, सभी मत-पंथों के प्रति श्रद्धावान रहे। हिन्दू सांस्कृतिक अधिष्ठान है जो अनन्त विविधताओं को साथ लेकर चलता है। यह ”वे ऑफ लाइफ” है। स्वतंत्रता संग्राम में संघ की भूमिका के प्रश्न पर डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने बताया कि डॉ. हेडगेवार स्वयं दो बार स्वतंत्रता संग्राम में जेल गए थे। डॉ. हेडगेवार ने राजगुरु एवं सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों की सहायता भी की थी। संघ के स्वयंसेवकों ने 1942 के आन्दोलन में जेल यात्रा की थी। ज़ेन-ज़ी को धर्म और संस्कृति का संस्कार देने के प्रश्न पर कहा कि सभी हिन्दू परिवारों को युवाओं के साथ चर्चा करनी चाहिए। युवाओं को यह बताना आवश्यक है कि युगानुकूल परिवर्तन के लिए हिन्दू धर्म सदैव तैयार है। उनके मन में दूसरों के प्रति आत्मीयता बढ़ानी होगी।
उन्होंने कहा कि वास्तव में धर्म कर्तव्य का बोध है। वहीं धर्म का दूसरा पक्ष उसे गुण विशेष बनाता है। मातृधर्म, राजधर्म, जल का धर्म, वायु का धर्म इत्यादि से धर्म की व्याख्या की। धर्म परिवर्तन नहीं हो सकता, वह मात्र मतांतरण होता है। कमजोर वर्गों को सम्भालना हमारी जिम्मेदारी है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पद्मश्री राजेश्वर आचार्य ने कहा कि राष्ट्रधर्म सर्वोच्च है। कार्यक्रम का शुभारम्भ मंचासीन अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। निवेदिता शिक्षा सदन की बालिकाओं ने वन्देमातरम, एकल गीत प्रभात ने प्रस्तुत किया।
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August 31st 2026, 8:54 am
रक्षाबंधन का पर्व सामाजिक समरसता का संदेश देने वाला पर्व है – रामदत्त चक्रधर जी
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गोरखपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दक्षिण भाग द्वारा योगीराज बाबा गंभीरनाथ प्रेक्षागृह में आयोजित रक्षाबंधन उत्सव में सह सरकार्यवाह रामदत्त चक्रधर जी ने कहा कि आज हम सभी रक्षाबंधन का उत्सव मनाने को एकत्रित हुए हैं। यह सिर्फ धागा बांधने का पर्व नहीं है, धागा जब मंत्रों से अभिमंत्रित होता है, स्नेह और समर्पण जुड़ता है तो एक सामान्य सा दिखाई देने वाला धागा भी अत्यंत प्रभावशाली और परिणामकारी हो जाता है। रक्षाबंधन का पर्व सामाजिक समरसता का संदेश देने वाला पर्व है। रक्षाबंधन का पर्व राष्ट्र की रक्षा का संदेश देने वाला पर्व है। राष्ट्र की रक्षा का संकल्प लेकर हमें अपने जीवन में इस हेतु सक्रिय बनना पड़ेगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कोई भी स्वयंसेवक जब प्रतिज्ञा धारण करता है तो कहता है – ‘मैं इस पवित्र हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति तथा हिन्दू समाज का संरक्षण कर हिन्दू राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूं’। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक प्रतिज्ञाबद्ध होकर गत 100 वर्षों से कार्य कर रहाहै।
उन्होंने कहा कि हिन्दू धर्म का प्रतीक है यह परम पवित्र भगवा ध्वज। जिसका निर्माण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नहीं किया है, बल्कि यह हजारों वर्षों से इस देश की संस्कृति, जीवन मूल्य, परम्परा, सभी गतिविधियों का केंद्र बिंदु रहा है। “धर्मो रक्षति रक्षितः” के उदाहरण से बताया कि अगर हम धर्म की रक्षा करते हैं तो धर्म हमारी रक्षा करता है। जो अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा नहीं कर सकता वो स्वयं की रक्षा नहीं कर सकता। अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा करनी है तो उसको मानने वालों, उसके प्रति श्रद्धा रखने वाले समाज को भी शक्तिशाली होना पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि हमारे घर में सभी सुविधाएं हों, बड़ा मकान हो, वाहन हो और नौकर-चाकर हों, लेकिन परिवार के किसी एक सदस्य को बीमारी हो जाए तो घर का सुख-चैन समाप्त हो जाता है। हमारा सुख अकेले-अकेले संभव नहीं है। हमारा सुख परिवार के सुख से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि यदि किसी परिवार को अपनी भूमि और घर छोड़कर पलायन करना पड़े तो क्या वह परिवार वास्तव में सुखी रह सकता है? इसी प्रकार यदि राष्ट्र की स्थिति ठीक नहीं है तो केवल व्यक्तिगत समृद्धि के आधार पर हम सुखी नहीं रह सकते। बांग्लादेश में कभी लाखों-करोड़ों हिन्दू रहते थे, लेकिन परिस्थितियां बदलने पर वहां बड़ी संख्या में लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी बहुत बड़े हाथी को लोहे की जंजीर से बांधा जाए और उस जंजीर की एक कड़ी कमजोर हो, तो सबसे पहले वही कमजोर कड़ी टूटेगी। अंग्रेजी में कहा जाता है – ‘द स्ट्रेंथ ऑफ द चेन इज़ द स्ट्रेंथ ऑफ इट्स वीकेस्ट लिंक’। अर्थात किसी भी श्रृंखला की ताकत उसकी सबसे कमजोर कड़ी के बराबर होती है। इसलिए समाज की कमजोर कड़ी को मजबूत करना आवश्यक है। जब समाज की प्रत्येक कड़ी मजबूत होगी, तभी संपूर्ण हिन्दू समाज शक्तिशाली बनेगा।।
कार्यक्रम का शुभारंभ मंचासीन अतिथि सह सरकार्यवाह रामदत्त चक्रधर जी, कार्यक्रम अध्यक्ष कुलपति प्रो. अनुपमा कौशिक शर्मा जी, प्रांत संघचालक डॉ. महेंद्र अग्रवाल जी, भाग संघचालक ओम जालान जी ने दीप प्रज्ज्वलन कर व भारत माता के चित्र पर पुष्पार्चन कर किया। अतिथियों ने परम पवित्र भगवा ध्वज को रक्षा सूत्र बांधकर धर्म, संस्कृति व देश की रक्षा का संकल्प लिया।
कार्यक्रम अध्यक्ष कुलपति प्रो. अनुपमा कौशिक शर्मा जी ने राजा बलि के उदाहरण के साथ बताया कि यह पर्व त्याग और बलिदान के साथ अपनत्व की रक्षा का पर्व है। रक्षाबंधन का पर्व रक्षा के संकल्प का पर्व है। यह रक्षा सिर्फ शरीर की रक्षा की नहीं, बल्कि इसमें प्रकृति, संस्कृति और परंपरा आदि की रक्षा करना भी निहित है। यह पर्व परस्पर सम्मान, परस्पर रक्षा, परस्पर प्रेम व परस्पर विश्वास का प्रतीक है। आज हम सबने भगवा ध्वज को रक्षासूत्र बांध कर माँ भारती और सनातन संस्कृति की रक्षा का प्रण लिया है और इसके लिए हमें संकल्पित होना होगा।
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August 31st 2026, 8:54 am
एकत्व से जुड़े, विविधता से सुसज्जित
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विविधता स्वाभाविक है और एकता ही सत्य है।
न्यूयॉर्क, अमेरिका।
न्यूयॉर्क स्थित मैडिसन स्क्वायर गार्डन में 29 अगस्त को अमेरिकन हिन्दूज़ फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग (AHEAD) द्वारा आयोजित “यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन” कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि जब हम अमेरिका, अर्थात् यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका, की बात करते हैं, तो एक शब्द की प्रायः चर्चा होती है – “प्लूरलिज़्म” (बहुलतावाद)। वहीं, जब हम भारत की बात करते हैं, तो एक दूसरा शब्द अथवा वाक्यांश सामने आता है – “यूनिटी इन डायवर्सिटी” (विविधता में एकता)। उन्होंने कहा कि भारत के लिए एकता और विविधता, दोनों उसके डीएनए में हैं।
सरसंघचालक जी ने कहा, “राष्ट्र केवल भौगोलिक इकाइयाँ नहीं होते। इस ब्रह्मांड की संरचना में राष्ट्रों को एक दायित्व निभाना होता है।” उन्होंने कहा कि हर राष्ट्र की एक नियति होती है, जिसे उसे पूरा करना होता है। भारत को जो नियति मिली है, वह है विविधता में एकता के सत्य को साकार करना और समय-समय पर पूरी दुनिया को भी इस एकत्व का बोध कराना।
उन्होंने कहा, “हम एक हैं और विविधता के कारण हमारी वह एकता और भी सुसज्जित होती है। इसलिए विविधता का उत्सव मनाया जाना चाहिए, उसका सम्मान किया जाना चाहिए और उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। साथ ही, हमें इस एकत्व की भावना को ध्यान में रखना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमाओं से नहीं बनते। स्वामी विवेकानंद के शब्दों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक राष्ट्र के पास विश्व को देने के लिए एक संदेश, पूरा करने के लिए एक मिशन और प्राप्त करने के लिए एक नियति होती है।
सरसंघचालक जी ने कहा कि विश्व में दो प्रवृत्तियाँ हैं। एक प्रवृत्ति कहती है – “जियो और जीने दो।” दूसरी प्रवृत्ति कहती है – “जियो और केवल उन्हें जीने दो, जो हमारी बात मानें।” “जो लोग कहते हैं, ‘यदि आप हमारी बात मानेंगे, तो हम आपकी रक्षा करेंगे’। रक्षा को संस्कृत और हिंदी में ‘रक्षण’ कहा जाता है। इसलिए जो केवल उनकी रक्षा करते हैं, जो उनकी बात मानते हैं, वे राक्षस हैं।”
इसके विपरीत, उन्होंने ऐसी दृष्टि की बात कही, जिसमें यह महत्व नहीं रखता कि कोई व्यक्ति आपकी बात मानता है या नहीं, आपकी बात सुनता है या नहीं, आपके बारे में क्या सोचता है अथवा आपके लिए कितना उपयोगी है। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी बात यह है कि हम सभी मनुष्य हैं। हमें जीवन को बनाए रखना है और इसलिए हमें बंधुत्व के साथ रहना है।
सरसंघचालक जी ने कहा, “भौतिक भिन्नताओं और हर प्रकार की विविधता के उपरांत हमारे भीतर कुछ ऐसा है, जो समान है। हम एक-दूसरे के हैं।”
उन्होंने कहा कि वह सिद्धांत, जो सबको जोड़ता है, सबको आत्मसात करता है, किसी प्रकार का विभाजन उत्पन्न नहीं करता, सभी के बीच संतुलन बनाए रखता है और मध्य मार्ग दिखाता है, वही धर्म है।
उन्होंने कहा कि “हम आजकल फादर्स डे, मदर्स डे आदि क्यों मनाते हैं? क्योंकि हम उनके प्रति अपने दायित्व को याद करते हैं। हमें पर्यावरण के प्रति अपने दायित्व को भी याद रखना चाहिए।”
आपके कुछ भी खाने से पहले, दुनिया में खेती का होना ज़रूरी है। इसी वजह से आप खाना खा पाते हैं। अगर किसान खेती करना छोड़ दें, तो आप क्या खाएंगे? आपने जो कपड़े पहने हुए हैं, वे इसलिए हैं क्योंकि मिलें हैं, मज़दूर काम कर रहे हैं और कपास उगाने वाले किसान मौजूद हैं। हम हर चीज़ के लिए किसी न किसी दूसरे पर निर्भर हैं। इसलिए, हमें भी बदले में कुछ वापस देना चाहिए।
भारत का वैश्विक मिशन और उसकी नियति
भारत की वैश्विक भूमिका को रेखांकित करते हुए सरसंघचालक जी ने कहा, “मानव जीवन इस ज्ञान को सभी तक पहुँचाने और स्वयं उस ज्ञान को जीने के लिए मिला है – अपने मोक्ष के लिए और दुनिया के बेहतर भविष्य के लिए। यही वह मिशन है, जिसे भारत को पूरा करना है। यही वह संदेश है, जिसे विश्व भर के भारतीयों को उपदेश देकर नहीं, बल्कि अपने आचरण और उदाहरण से देना है। यही भारत की नियति है।”
विश्व भर में रहने वाले भारतीय प्रवासियों की भूमिका पर कहा कि उन्हें अपनी कर्मभूमि के प्रति निष्ठावान रहना चाहिए, लेकिन जन्मभूमि के मूल्यों के अनुरूप सतत जीवन जीना चाहिए। यही भारत की उनसे अपेक्षा है। “हम एकत्व से जुड़े हैं और विविधता से सुसज्जित हैं। विविधता प्राकृतिक है और एकता ही सत्य है। हम एकत्व की सजावट के रूप में विविधता का उत्सव मनाते हैं।”
रक्षाबंधन का संदेश—दायित्व और बंधन
सरसंघचालक जी ने कहा कि दूसरों के प्रति दायित्व को स्वीकार करना व्यक्ति को मुक्ति की ओर ले जाता है। रक्षाबंधन में निहित बंधन का संदेश भी यही है।
डॉ. मोहन भागवत जी के संबोधन से पहले २०० धार्मिक नेताओं के ‘कॉल फॉर एक्शन’ प्रस्ताव को प्रस्तुत किया। इस अवसर पर ३० देशों के १८० धार्मिक नेताओं ने भविष्य के प्रति दायित्व स्वीकार करने के लिए पाँच सूत्रीय कार्य योजना की घोषणा की। ‘कॉल फॉर एक्शन’ (कार्य आह्वान) प्रस्ताव में यह संकल्प लिया गया कि किसी भी समुदाय की गरिमा यदि अपमान अथवा हिंसा के संकट में हो, तो उसकी गरिमा की रक्षा के लिए सामूहिक रूप से खड़ा हुआ जाएगा। वैश्विक धार्मिक नेताओं ने धर्म के उपयोग के माध्यम से घृणा, अपमान, अमानवीयकरण अथवा हिंसा को उचित ठहराने को अस्वीकार किया।
वक्ताओं के संबोधन से पहले रक्षाबंधन उत्सव मनाया गया, जिसमें सभी ने एक-दूसरे को राखी बाँधकर एकत्व की भावना का संदेश दिया।
इस आयोजन को सफल बनाने के लिए २५० संगठन एक साथ आए। इस वननेस सेलिब्रेशन (एकत्व उत्सव) में अमेरिका के ३९ राज्यों और ८५० अमेरिकी नगरों से लगभग ६,००० प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसके अतिरिक्त २९ देशों से भी प्रतिनिधियों ने सहभागिता की।
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August 31st 2026, 8:54 am
अमेरिका में हिन्दू दर्शन – जन्मभूमि के मूल्यों के साथ कर्मभूमि में कार्य करें
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प्रशांत पोळ
29 अगस्त को न्यूयॉर्क के मैनहटन स्थित मेडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित कार्यक्रम विराट था, भव्य था, दिव्य था, अद्भुत था, अवर्णनीय था..!
प्रस॔ग था, ‘एक विश्व – एक मानवता उत्सव’ (Universal Oneness Celebration)। मेडिसन स्क्वायर गार्डन के इंफोसिस थिएटर की अधिकतम आसन क्षमता 5,570 है। यह विशाल सभागार पूरा भरा हुआ था। अनेक आगंतुक/आमंत्रित बाहर खड़े थे। कार्यक्रम में भारतीय समुदाय के प्रमुख तो सारे थे ही, किंतु 30 देशों के, 16 विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधि भी सम्मिलित हुए थे। 180 से अधिक आध्यात्मिक / धार्मिक गुरु, आचार्य थे। विश्व के अनेकों चैनलों से, सोशल मीडिया अकाउंट्स से यह कार्यक्रम लाइव प्रसारित हो रहा था।
इस विशाल वैश्विक मंच से भारत बोल रहा था, और सारा विश्व आतुरता के साथ सुन रहा था। 11 सितंबर 1893 के स्वामी विवेकानंद जी के शिकागो भाषण का स्मरण हो रहा था।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की श्रृंखला में यह एक विश्व – एक मानवता का उत्सव था। इसमें प्रमुख वक्ता थे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत जी। डॉक्टर भागवत जी ने कहा कि “इस विश्व में प्रत्येक देश का एक संदेश है, एक उद्देश्य है। एक भागधेय (नियति) है। (Every nation has a message, a mission and a destiny) भारत को यहां जिम्मेदारी मिली है, यह दायित्व मिला है कि विविधता का आदर और विविधता में एकता का संदेश सारे विश्व तक लेकर जाए।”
“विश्व में दो प्रकार के लोग हैं। एक कहते हैं, ‘जियो और जीने दो’ (Live and let live)। दूसरे प्रकार के लोग हैं जो कहते हैं, ‘मात्र उन्हीं को जीने का अधिकार है, जो हमारी बात मानते हैं। हम उन्हीं की रक्षा करेंगे, जो हमारे मत को मानेगा’ (If you obey us, then only we will protect you)। यह दूसरे प्रकार के लोग असुर (राक्षस) श्रेणी में आते हैं, और पहले प्रकार के लोग देव कहलाते हैं।”
‘भौतिक सुख यह स्थाई सुख या समाधान नहीं है’, इसको विस्तार से बताते हुए रामकृष्ण मिशन के बोधवाक्य ‘आत्मनोः मोक्षार्थ’ का विश्लेषण किया। “स्वयं की, अपनी आत्मा का मोक्ष कब होगा? ‘जगत् हितायच’ में। अर्थात विश्व कल्याण में। ‘मैं आप में हूं, और आप मेरे में’। यही oneness है। हमारा दायित्व है कि इस ज्ञान को हम विश्व में फैलाएं।”
अमेरिका में रह रहे भारतीयों को उन्होंने कहा कि “जो लोग भारत से बाहर दूसरे देशों में आकर बसे हैं, उनके लिए वह देश उनकी कर्मभूमि है। हमारा कर्तव्य क्या है? अगर हम अमेरिका में हैं, यहीं कमाते हैं, तो हम अमेरिका का ही हिस्सा हुए। ऐसे में हमें यहां सही व्यवहार करना चाहिए और अपनी कर्मभूमि के प्रति पूरी तरह प्रामाणिक रहना चाहिए।”
सरसंघचालक जी के उद्बोधन को जोशपूर्ण प्रतिक्रिया मिल रही थी। सबसे ज्यादा तालियां तब बजीं, जब उन्होंने कहा – “भारत यह आपकी, आपके पुरखों की जन्मभूमि है। इसलिए भारत के लिए कुछ करना संभव है तो अवश्य करें, किंतु आपकी जन्मभूमि आपसे अपेक्षा करती है कि जिन मूल्यों को लेकर आपका, आपके पुरखों का जीवन बना है, उन मूल्यों के साथ आप अपनी कर्मभूमि में कार्य करें।”
“व्यक्ति, समाज और पर्यावरण, इन तीनों को एक साथ आगे बढ़ना होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि व्यक्ति को दबाकर समाज का विकास हो, या समाज को दबाकर व्यक्ति का। मनुष्य को जीवन के द्वंद्वों को संतुलित करना सीखना होगा।”
अनेक अर्थों में यह उद्बोधन ऐतिहासिक है। आज की अस्थिर और विषम वैश्विक परिस्थिति में, इस अशांत वातावरण में, विश्व को आत्मविश्वास के साथ ‘विविधता में एकता’ का संदेश देना, ‘एक विश्व – एक मानवता’ को विश्व की नियति बताना, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस विराट उत्सव के भारत के लिए दूरगामी सकारात्मक परिणाम होंगे, यह सुनिश्चित है।
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August 31st 2026, 4:09 am
विविधता को जोड़कर रखने वाला तत्व धर्म ही है – डॉ. कृष्ण गोपाल जी
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रक्षा सूत्र बांधकर धर्म की रक्षा के संकल्प लेने का आह्वान किया
प्रयागराज।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा IIIT इलाहाबाद के ऑडिटोरियम में रक्षाबंधन उत्सव का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी तथा कार्यक्रम अध्यक्ष संस्थान के निदेशक मुकुल शरद सुतावणे जी रहे।
मुकुल शरद सुतावणे जी ने कहा कि रक्षाबंधन अब केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं रह गया है, यह अबल और सबल के बीच सुरक्षा और संरक्षण का पर्व बन गया है। डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने कहा कि इतिहास में बड़े‑बड़े सामाजिक आंदोलनों के दौरान लोग गंगा तट पर एक‑दूसरे को रक्षा सूत्र बाँधकर एकता और समर्पण का संकल्प लेते रहे हैं। धर्म किसी एक व्यक्ति द्वारा आरम्भ नहीं किया गया, धर्म वे सार्वभौमिक मूल्य हैं जो समाज को जोड़ते हैं। “ध्वज धर्म का प्रतीक है – हम भगवा ध्वज को रक्षा सूत्र बाँध कर धर्म की रक्षा का संकल्प लेते हैं। ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’।”
उन्होंने कहा कि भारत एक बहुभाषी, बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक देश है, जिसमें विविधता को जोड़कर रखने वाला तत्व धर्म ही है। विदेशी आक्रमणों और विभाजन के कारण सामाजिक बिखराव आया, पर संघ का प्रयास इन तोड़-फोड़ के बीच समाज में एकता और बंधुता स्थापित करना रहा है। संघ ने रक्षाबंधन को पारंपरिक भाई‑बहन के रिश्ते से ऊपर उठाकर वंचितों, वनवासियों और गिरिवासियों के प्रति अपनत्व और सुरक्षा का संकल्प बनाया है।
सह सरकार्यवाह जी ने वर्तमान सामाजिक परिदृश्य पर चिंता व्यक्त की और कहा कि भौतिक समृद्धि के साथ-साथ मन की गरीबी बढ़ती जा रही है। उन्होंने अपार्टमेंट संस्कृति और अकेलेपन की ओर इशारा करते हुए कहा कि हमें आत्मीयता और सामाजिक जुड़ाव को प्रोत्साहित करना होगा ताकि समाज की पवित्रता बनी रहे।
समारोह में मंच पर विभाग संघचालक डॉ. कृष्ण पाल जी तथा नगर संघचालक रामेश्वर जी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में लगभग 1500 से अधिक कार्यकर्ता और नागरिकों ने सहभागिता की।
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August 29th 2026, 4:04 pm
हमारी एकता एवं एकात्मता विश्व बन्धुता के संरक्षण व संवर्धन का आधार है – सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाल
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काशी, 28 अगस्त, 2026।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ काशी मध्य के तिलक नगर में रक्षाबन्धन उत्सव में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा कि हमारी एकता एवं एकात्मता विश्व बन्धुता के संरक्षण और संवर्धन का आधार है। न्यायोचित मार्ग पर चलते हुए बन्धुता को आधार बनाकर स्वतंत्रता और समानता की रक्षा करने के लिए भारत ने सामाजिक समरसता को अंगीकार किया है।
सिगरा स्थित डॉ. सम्पूर्णानन्द स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में उपस्थित स्वयंसेवकों एवं मातृशक्ति से कहा कि योग वशिष्ठ के एक श्लोक के अनुसार ऐसे लोग जो हमारे बन्धु नहीं हैं, उनसे प्रतिदिन मिलने से निकटता बढ़ती है और वह हमारे बन्धु बन जाते हैं। जबकि निकटता के अभ्यास को छोड़ने से बन्धुता का स्नेह बन्धन छूट जाता है। संघ में भी अपरिचित को परिचित एवं परिचित को मित्र बनाने की परम्परा रही है। स्वतंत्रता, समानता एवं बन्धुता, इन तीनों अवधारणाओं को विश्व के अनेक देशों ने अलग-अलग रूपों में स्वीकार किया है। ऐसे राष्ट्र जहां केवल स्वतंत्रता को महत्व दिया गया, वहां स्वच्छंदता व्याप्त हो गयी। जबकि सोवियत रूस जैसे देश ने समानता को वरीयता दी, यह विचार भी टिक नहीं पाया। भारतीय संस्कृति में बन्धुता को स्वतंत्रता और समानता के साथ जोड़ा गया है। इन तीनों तत्वों का मूलाधार सामाजिक समरसता है।
सरकार्यवाह जी ने कहा कि हिन्दू संस्कृति में सम्पूर्ण विश्व को एक कुटुम्ब स्वीकार किया गया है। मैं और समस्त जीव एक ही परमात्मा के अंश हैं, उदार चरित के साथ इस भावना को स्वीकार करना चाहिए। सम्बन्धों के मध्य अविश्वास, रक्षाबन्धन के स्नेहसूत्र को कमजोर करते हैं। आपस में बंटने पर विरोधी पक्ष को उसका लाभ मिलता है। जब हम सभी विश्व बंधुत्व की चर्चा करते हैं तो उसका मूलाधार भविष्य पुराण का श्लोक –
”येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबन्धामि रक्षे मा चल मा चल॥”
जिसका अर्थ है कि जिस प्रकार राजा बलि को स्नेह बन्धन में बांधा गया, उसी प्रकार मैं भी आपको स्नेह बन्धन में बांधता हूं। यह बन्धन स्थिर रहे। वर्तमान में परिवार और समाज में जो अस्थिरता उत्पन्न हो गयी है, उसका कारण स्वार्थ है। मनुष्य के अन्दर स्वार्थ विकार के रूप में नहीं आना चाहिए।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी, काशी मध्य के संघचालक डॉ. हेमन्त गुप्त जी, तिलक नगर के नगर संघचालक प्रदीप जी ने भगवा ध्वज को रक्षा सूत्र बांधा।
नेपाल प्राकृतिक आपदा पीड़ितों के प्रति श्रद्धांजलि
दो दिन पूर्व नेपाल के बाढ़ आपदा में मृतक जनमानस के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने पूरे संघ परिवार की ओर से श्रद्धांजलि निवेदित की। उन्होंने कहा कि जो बन्धु इस आपदा में संकटग्रस्त हुए हैं, संघ परिवार उनके प्रति भी अपनी गहरी संवेदनाएं व्यक्त करता है।
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August 28th 2026, 10:48 am
वर्ल्ड हिन्दू कांग्रेस 2026 – मुंबई में 18 से 20 दिसंबर तक होगा ऐतिहासिक महासम्मेलन
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वैश्विक हिन्दू समुदाय का सबसे बड़ा वैश्विक मंच, वर्ल्ड हिन्दू कांग्रेस (WHC), इस वर्ष भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में आयोजित होगा। 18 से 20 दिसंबर को जियो वर्ल्ड कन्वेंशन सेंटर में आयोजित सम्मेलन का विषय है ‘समानं व्रतं सह चित्तम्’ – अर्थात साझा संकल्प, सामूहिक दृढ़ता। इस महासम्मेलन में भारत और विश्व के कोने-कोने से हिन्दू कार्यकर्ता, विचारक, उद्यमी, नीति-निर्माता, शिक्षाविद, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता एकत्र होंगे। इनके बीच धर्म, संस्कृति और समाज के पुनरुत्थान पर विचार-मंथन होगा।
WHC 2026 में सात समानांतर विषयगत सम्मेलन आयोजित होंगे – वर्ल्ड हिन्दू इकोनॉमिक फोरम, हिन्दू एजुकेशन कॉन्फ्रेंस, हिन्दू मीडिया कॉन्फ्रेंस, हिन्दू पॉलिटिकल कॉन्फ्रेंस, हिन्दू वुमेन कॉन्फ्रेंस, हिन्दू यूथ कॉन्फ्रेंस और हिन्दू ऑर्गेनाइजेशनल कॉन्फ्रेंस। यह सभी मंच हिन्दू समाज की विविधता, सृजनशीलता और उद्यमशीलता को नई ऊर्जा देंगे।
इससे पहले WHC 2023 का आयोजन नवंबर 2023 में बैंकॉक, थाईलैंड में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ था। अब तक के सम्मेलनों में 60 से अधिक देशों के 6,500 से ज्यादा प्रतिभागी भाग ले चुके हैं। पूर्व सम्मेलनों में परम पूजनीय दलाई लामा, माता अमृतानंदमयी, सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाळे, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, डॉ. बिबेक देबरॉय, पद्म भूषण डॉ. विजय भटकर, पद्म भूषण डॉ. आर. नागस्वामी, प्रो. कपिल कपूर, ज़ोहो के संस्थापक श्रीधर वेम्बू, अजय पीरामल, मोहनदास पई, फिल्मकार विपुल शाह और प्रियदर्शन, अश्विन अधिन, डेविड फ्रॉली, स्वामी स्वरूपानंद, सतगुरु दिलीप सिंह तथा मधु पंडित दास, इतिहासकार विक्रम संपत और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के ट्रस्टी स्वामी गोविंद देव गिरि जैसी विभूतियां शिरकत कर चुकी हैं।
आज हिन्दू समाज पिछली एक सदी की तुलना में कहीं अधिक दृश्यमान, स्वीकार्य और सम्माननीय स्थिति में है। अब समय है कि हम संगठित होकर, दृढ़ संकल्प के साथ हिन्दू आकांक्षाओं को साकार करें और उन चुनौतियों का सामना करें जो हमारी एकता की परीक्षा लेती हैं। – स्वामी विज्ञानानंद
“वर्ल्ड हिन्दू कांग्रेस एक ऐसा मंच है जो हिन्दू चिंतन को वैश्विक महत्वाकांक्षाओं से जोड़ता है। इस दिसंबर मुंबई में हम 60 से अधिक देशों के 4,500 से ज्यादा प्रतिभागियों के साथ एकत्र होंगे। यह संख्या इस आंदोलन की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है। हमारे पास अवसर अपार हैं और इसे सफल बनाने की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है।” – WHC 2026 के अध्यक्ष एवं पिरामल ग्रुप के चेयरमैन अजय पिरामल
वर्ल्ड हिन्दू कांग्रेस एक वैश्विक मंच है जो ‘यतो धर्मस्ततो जय:’ – जहां धर्म है, वहां विजय है – की भावना से संचालित है। हर चार साल में एक बार आयोजित महासम्मेलन के सात समानांतर मंच हिन्दू समाज की आर्थिक, शैक्षणिक, मीडिया, राजनीतिक और संगठनात्मक शक्ति को सामने लाते हैं। 2014 में दिल्ली से शुरू होकर 2018 में शिकागो और 2023 में बैंकॉक में आयोजित यह सम्मेलन अब 2026 में मुंबई में अपना नया अध्याय लिखेगा।
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August 27th 2026, 9:03 am
फिल्म आस्वादन – ‘ओह माय डॉग’….बेजुबान वफादारी की भावुक कहानी
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फिल्म ने जगाया इंसान और पशु के रिश्ते का भावनात्मक संसार
नई दिल्ली।
भारतीय चित्र साधना द्वारा 22 अगस्त को विचार विनिमय न्यास सभागार, केशव कुंज में आयोजित फिल्म आस्वादन कार्यक्रम में फिल्म ‘ओह माय डॉग’ का विशेष प्रदर्शन किया गया। कार्यक्रम में फिल्म प्रेमियों, सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों, जनप्रतिनिधियों और विभिन्न संस्थाओं के गणमान्य अतिथियों ने सहभागिता की।
‘ओह माय डॉग’ – बेजुबान वफादारी की भावुक कहानी
अमित राय द्वारा निर्देशित ‘ओह माय डॉग’ मनुष्य व एक पशु के बीच के गहरे भावनात्मक रिश्ते को केंद्र में रखती है। फिल्म की विशेष बात यह है कि यह कहानी केवल पालतू जानवर और उसके मालिक के रिश्ते तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इंसान और पशु के बीच मौजूद विश्वास, संवेदना, अपनापन और बेजुबान वफादारी को व्यापक रूप से सामने लाती है।
फिल्म में आवारा कुत्तों ऑस्कर और मोमो को महत्वपूर्ण भूमिका में प्रस्तुत किया गया है। यह पहल मुख्यधारा के सिनेमा में एक अलग और संवेदनशील दृष्टिकोण सामने रखती है। फिल्म में पंकज त्रिपाठी, माही राय और निखिल कुमार सहित अन्य कलाकारों ने अभिनय किया है।
फिल्म की कहानी बच्चों और बड़ों, दोनों के लिए एक इमोशनल और फील-गुड अनुभव प्रस्तुत करती है। जहां एक ओर फिल्म दर्शकों को पशुओं के प्रति संवेदनशील होने का संदेश देती है, वहीं दूसरी ओर कहानी में शामिल सस्पेंस, थ्रिल और छोटे-छोटे ट्विस्ट दर्शकों को अंत तक जोड़े रखते हैं।
निर्देशक अमित राय से सीधा संवाद
फिल्म प्रदर्शन के बाद विशेष चरण रहा निर्देशक अमित राय के साथ बातचीत। अमित राय स्वयं कार्यक्रम में उपस्थित रहे और उन्होंने फिल्म के निर्माण से जुड़े अपने अनुभव दर्शकों के साथ साझा किए।
उन्होंने बताया कि फिल्म की कल्पना से लेकर उसके निर्माण तक उन्हें किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा। अमित राय ने फिल्म के निर्माण के दौरान सामने आई विभिन्न समस्याओं और उनके समाधान से जुड़े कई रोचक प्रसंग भी साझा किए। उनकी बातचीत ने दर्शकों को फिल्म के पर्दे के पीछे की दुनिया को समझने का अवसर दिया।
दर्शकों ने भी निर्देशक से कई सवाल पूछे। प्रश्नोत्तर सत्र में फिल्म की कहानी, कुत्तों के साथ शूटिंग, चरित्र निर्माण, फिल्म के संदेश और निर्माण प्रक्रिया को लेकर दर्शकों की उत्सुकता स्पष्ट दिखाई दी।
भारतीय चित्र साधना का यह आयोजन केवल फिल्म प्रदर्शन तक सीमित नहीं था। इसका उद्देश्य दर्शकों को फिल्म को एक कला, सामाजिक दस्तावेज और विचार-विमर्श के माध्यम के रूप में देखने के लिए प्रेरित करना भी है।
‘ओह माय डॉग’ जैसी फिल्म के माध्यम से पशु-प्रेम, करुणा और इंसान तथा जानवरों के बीच के भावनात्मक संबंध पर संवाद की शुरुआत होना महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। लगभग 200 दर्शकों की सहभागिता और फिल्म के बाद हुए जीवंत संवाद ने यह साबित किया कि अच्छी और संवेदनशील फिल्म दर्शकों के मन में सवाल भी पैदा करती है और संवाद की संभावनाएं भी खोलती है।
भारतीय चित्र साधना द्वारा आयोजित यह फिल्म प्रशंसा कार्यक्रम इसी भावना को आगे बढ़ाने वाली एक सार्थक पहल है, जहां सिनेमा देखा ही नहीं गया, बल्कि समझा, महसूस किया और उस पर संवाद भी किया गया।
इस अवसर पर सतीश उपाध्याय जी, उपाध्यक्ष, दिल्ली जल बोर्ड; आरती उपाध्याय जी, पशु अधिकार कार्यकर्ता; रोहित मेहरा जी, IRS कमिश्नर, इंटरनेशनल टैक्सेशन; जयवीर राणा जी, चेयरमैन, नजफगढ़ ज़ोन, MCD; रविंदर सोलंकी जी, जिला अध्यक्ष, भाजपा, महरौली जिला; श्रीवर्धन त्रिवेदी जी, वरिष्ठ एंकर ‘सनसनी’, ABP News एवं अभिनेता; डॉ. पंकज श्याम लाथर, कंट्रोलर ऑफ फाइनेंस एवं डायरेक्टर-PR, DSEU; डॉ. विनोद नारायण इंदुरकर, चेयरमैन, CCRT; सरिता तोमर जी, सदस्य, NDMC, सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। इस अवसर पर भारतीय चित्र साधना के सचिव अतुल गंगवार जी एवं ट्रस्टी रंजना यादव जी भी उपस्थित रहे।
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August 27th 2026, 9:03 am
नेपाल में आयी आपदा पर संघ, विहिप, विद्यार्थी परिषद ने व्यक्त की संवेदनाएं; हर संभव सहायता का आश्वासन
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विश्व हिन्दू परिषद ने नेपाल में आयी भीषण बाढ़ से हुई जनहानि, पीड़ित तथा घायलों के प्रति संवेदनाएं प्रकट की हैं। तथा हर संभव सहायता की घोषणा की है। नेपाल में बुधवार को सुबह आयी भीषण बाढ़ के कारण रसुवा, धादिङ्ग, नुवाकोट, चितवन और पूर्वी नवलपरासी ज़िले प्रभावित हुए हैं। इन जिलों में भीषण आपदा से हजारों लोग प्रभावित हुए हैं। अनेक परिवारों को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। बाढ़ के कारण तीर्थयात्रियों सहित कई लोगों के लापता होने तथा अस्पतालों, विद्यालयों, पुलिस चौकियों, पुलों एवं अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों के क्षतिग्रस्त होने की खबर अत्यंत चिंताजनक है।
नेपाल बाढ़ पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने अपने संदेश में कहा –
नेपाल के उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्र में आयी भयंकर बाढ़ से प्रभावित सभी मृतकों के परिजनों एवं पीड़ित तथा घायलों के प्रति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गहरी संवेदना प्रकट करता है। नेपाल में बुधवार को सुबह आयी भीषण बाढ़ के कारण रसुवा, धादिङ्ग, नुवाकोट, चितवन और पूर्वी नवलपरासी ज़िले प्रभावित हुए हैं। इन जिलों में भीषण आपदा में हजारों लोग प्रभावित हुए हैं। इस आपदा में पीड़ितों के सहयोग हेतु हम सभी तत्पर हैं तथा हर सम्भव सहायता प्रदान करने का प्रयास करेंगे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समस्त लोगों से अनुरोध करता है कि इस अप्रत्याशित स्थिति में हर संभव सहायता हेतु आगे आएं।
नेपाल त्रासदी पर विश्व हिन्दू परिषद ने व्यक्त की संवेदना; सहायता की घोषणा
विश्व हिन्दू परिषद के महामंत्री बजरंग बागड़ा जी ने कहा – विश्व हिन्दू परिषद तिब्बत-नेपाल सीमा पर आयी प्राकृतिक आपदा के फलस्वरूप रसुआ की भोटेकोशी नदी में भीषण जलप्रवाह से हुई जन-धन की भारी हानि पर गहरी संवेदना व्यक्त करती है। परिषद और संपूर्ण हिन्दू समाज इस विपदा की घड़ी में नेपाली समाज, पीड़ित परिवारों और प्रभावित जनसमुदाय के साथ खड़ा है। कैलाश मानसरोवर की तीर्थयात्रा पर गए यात्रियों के जीवन पर मंडराए संकट पर परिषद चिंता और गहरा दुख व्यक्त करती है। परिषद ने निश्चय किया है कि भारत सरकार द्वारा दी जा रही विभिन्न प्रकार की सहायता के अतिरिक्त भारतीय समाज की ओर से भी राहत सामग्री और सहायता राशि संग्रह करेगी और प्रभावित क्षेत्रों में पीड़ितों को उपलब्ध कराएगी।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. वीरेन्द्र सिंह सोलंकी ने कहा — “नेपाल में आई इस भीषण प्राकृतिक आपदा से हुई जनहानि अत्यंत दुःखद और हृदयविदारक है। संकट की इस घड़ी में अभाविप नेपाल के प्रभावित बंधु-भगिनियों के साथ पूरी संवेदना और एकजुटता के साथ खड़ी है। भारत सरकार द्वारा 10 टन राहत सामग्री तत्काल नेपाल भेजने का निर्णय सराहनीय है। इस त्वरित सहायता से प्रभावित लोगों तक आवश्यक सामग्री पहुँचाने और राहत कार्यों को गति देने में महत्वपूर्ण सहयोग मिलेगा। हमारी प्रार्थना है कि सभी लापता लोगों का शीघ्र पता चले तथा राहत एवं बचाव कार्यों के माध्यम से प्रभावित परिवारों को आवश्यक सहायता जल्द से जल्द प्राप्त हो। भारत और नेपाल के बीच के आत्मीय संबंधों की भावना के अनुरूप हम इस कठिन समय में नेपाल के लोगों के साथ हैं।”
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August 27th 2026, 9:03 am
गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय – 108 देशों की 1200 छात्राएं मिलकर बनाएंगी दो सैटेलाइट
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ग्रेटर नोएडा। गौतमबुद्ध नगर अंतरिक्ष में महिला शक्ति का उदाहरण बनने जा रहा है। गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय में नौ दिवसीय मिशन शक्तिसैट कार्यक्रम में भारत सहित 108 देशों की 1200 छात्राएं एक साथ मिलकर दो सेटेलाइट तैयार कर रही हैं। इसमें से एक सेटेलाइट शक्तिसैट-लियो (लो अर्थ आर्बिट) को श्रीहरिकोटा से और दूसरे शक्तिसैट-मून को जापान की निजी अंतरिक्ष कंपनी आई-स्पेस से चंद्रमा के लिए लॉंच किया जाएगा।
विश्वविद्यालय परिसर में 23 अगस्त से शुरू हुए कार्यक्रम में देश-विदेश की छात्राओं का संगम देखने को मिल रहा है। 108 देशों में से 61 देशों की 142 छात्राएं कैंपस में पहुंची हैं, शेष देशों की छात्राएं ऑनलाइन माध्यम से मिशन से जुड़ी हैं।
आयोजकों के अनुसार, मिशन में शामिल होना आसान नहीं था। इसके लिए एक विशेष स्पेस डिप्लोमा कोर्स तैयार किया गया था। कोर्स को 20 विशेषज्ञों की टीम ने दो वर्ष की मेहनत से तैयार किया। यह कोर्स 1500 पन्नों का है, जिसमें 550 प्रैक्टिकल गतिविधियां और 120 घंटे की थ्योरी शामिल है।
यह पूरा कोर्स जोवो प्लेटफार्म पर उपलब्ध था। दुनिया भर के स्कूलों, विज्ञान शिक्षकों और स्पेस टेक्नोलाजी से जुड़े इंजीनियरों से संपर्क कर छात्राओं को कोर्स के लिए प्रेरित किया गया। कोर्स पूरा करने के बाद परीक्षा के माध्यम से 1200 छात्राओं का चयन किया गया, जो अब सेटेलाइट असेंबलिंग का प्रशिक्षण ले रही हैं। यह कोर्स अंग्रेजी, फ्रेंच, पुर्तगाली और स्पेनिश भाषा में है।
गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय में 24 से 27 अगस्त तक टेक्निकल सत्र चलेंगे। इसमें छात्राओं को वैज्ञानिकों की देखरेख में सेटेलाइट डिजाइन, असेंबलिंग, प्रोग्रामिंग और लॉंचिंग की बारीकियां सिखाई जा रही हैं। इसके बाद 28 अगस्त को एक फाइनल परीक्षा आयोजित होगी, जिसके बाद सभी छात्राओं को सर्टिफिकेट दिया जाएगा।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य स्पेस टेक्नोलाजी में छात्राओं की भागीदारी बढ़ाना और उन्हें कम उम्र में ही अंतरिक्ष विज्ञान से जोड़ना है। शक्तिसैट-लियो लो अर्थ आर्बिट में स्थापित होगा, जो पृथ्वी से जुड़े डेटा कलेक्ट करेगा, जबकि शक्तिसैट-मून चंद्रमा की कक्षा के लिए भेजा जाएगा। 28 से 31 अगस्त तक सेटेलाइट बनाने पर कार्य किया जाएगा।
उद्घाटन कार्यक्रम में ऑनलाइन माध्यम से जुड़कर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि आने वाला समय केवल डिग्री प्राप्त करने का नहीं, बल्कि आइडिया, नवाचार, उद्यमिता और तकनीक का है। भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विश्व स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। भारत की अंतरिक्ष यात्रा केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों की यात्रा नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत, नवाचार और युवा शक्ति की यात्रा है।
ऑनलाइन माध्यम से जुड़े विंग कमांडर राकेश शर्मा ने कहा कि युवा पृथ्वी ग्रह के भविष्य के संरक्षक हैं। हमें अपने ज्ञान एवं क्षमताओं का उपयोग पृथ्वी तथा मानवता के बेहतर भविष्य के लिए करना चाहिए।
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August 27th 2026, 9:03 am
डॉ. हेडगेवार जी ने सामान्य व्यक्तियों को राष्ट्रकार्य के लिए प्रेरित किया – सुनील आंबेकर जी
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कानपुर, 25 अगस्त 2026।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, कानपुर द्वारा गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कॉलेज के ऑडिटोरियम में ‘युवा व्यवसायी समागम’ का आयोजन किया गया। संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में शहर के सैकड़ों प्रमुख युवा उद्यमियों, व्यवसायियों, उद्योगपतियों, चिकित्सकों, प्राध्यापकों एवं प्रबुद्ध नागरिकों ने सहभागिता की।
कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ मुख्य अतिथि अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी, प्रान्त संघचालक भवानी भीख जी तथा विभाग संघचालक डॉ. श्याम बाबू गुप्ता जी ने दीप प्रज्ज्वलन एवं भारत माता के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया। तत्पश्चात राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ का गायन हुआ।
अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी ने संघ की 100 वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा और इसके मूल उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में विजयादशमी के दिन पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने की थी, उनके साथ जुड़े अधिकांश युवा साथी महज 20 वर्ष के थे।
डॉ. हेडगेवार जी स्वयं 1931 के आंदोलन के दौरान जेल गए थे। ब्रिटिश हुकूमत की उन पर कड़ी नजर थी। अंग्रेजों ने न केवल राजनीतिक और आर्थिक, बल्कि भारत पर सांस्कृतिक और धार्मिक आक्रमण भी किए थे। डॉ. साहब का स्पष्ट मानना था कि भारत को केवल राजनीतिक स्वाधीनता ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और मानसिक गुलामी से भी पूरी तरह मुक्त कराना होगा।
1936 में जब महात्मा गांधी सेवाग्राम में संघ के वर्ग में आए और उन्होंने डॉ. साहब से कांग्रेस के अंतर्गत कार्य करने का सुझाव दिया, तब डॉ. हेडगेवार जी ने विनम्रतापूर्वक स्पष्ट किया कि राष्ट्र के स्थायी पुनरुत्थान के लिए चरित्र निर्माण करने वाली एक स्वतंत्र और निष्काम इकाई की आवश्यकता है।
उस दौर में यह धारणा थी कि बड़े कार्यों के लिए केवल बड़े नेताओं की आवश्यकता होती है, परंतु डॉ. साहब ने इस सोच को बदला। उन्होंने सामान्य नागरिकों को राष्ट्रकार्य के लिए प्रेरित किया और शाखा पद्धति के माध्यम से अनुशासन, राष्ट्रभक्ति एवं खेल-खेल में व्यक्तित्व निर्माण का तंत्र विकसित किया।
सुनील आंबेकर जी ने संघ के ऐतिहासिक संघर्षों का उल्लेख करते हुए बताया कि संघ का एकमात्र लक्ष्य राष्ट्रभक्त नागरिकों का निर्माण करना रहा है।
1947 में देश के दुखद विभाजन के समय संघ स्वयंसेवकों और श्री गुरुजी (द्वितीय सरसंघचालक) ने अपनी पूरी शक्ति समाज की रक्षा में झोंक दी और अनेक कार्यकर्ताओं ने अपने प्राणों की आहुति दी। 1948 में गांधी जी की हत्या के झूठे आरोपों के तहत संघ पर प्रतिबंध लगाया गया, जिसे बाद में सरकार को बिना किसी शर्त के वापस लेना पड़ा।
1975 में जब देश पर आपातकाल थोपा गया और नागरिक अधिकार छीन लिए गए, तब संघ के स्वयंसेवकों ने लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए अभूतपूर्व संघर्ष किया। आपातकाल के पश्चात जब सरकार बदली, तब तीसरे सरसंघचालक पूजनीय बालासाहब देवरस जी ने ‘भूल जाओ और आगे बढ़ो’ का आह्वान करते हुए समाज को पुनः एकजुट करने का कार्य किया।
1963 में कर्नाटक के उडुपि सम्मेलन में सभी पूज्य संतों को एक मंच पर लाकर ऐतिहासिक घोषणा की गई – ‘न हिन्दू पतिता भवेत्’ (अर्थात कोई भी हिन्दू पतित या अछूत नहीं है)। जब हर व्यक्ति में ईश्वर का अंश विद्यमान है, तो समाज में छुआछूत और जातिगत भेदभाव का कोई स्थान नहीं हो सकता।
सुनील जी ने वर्तमान समय की वैश्विक एवं राष्ट्रीय चुनौतियों की चर्चा करते हुए समाज से संघ द्वारा प्रस्तावित ‘पंच परिवर्तन’ के संकल्पों को अपनाने का आह्वान किया –
- सामाजिक समरसता: जाति, पंथ और वर्ग के भेदभाव को समाप्त कर प्रत्येक परिवार को समरसता की पहल करनी होगी।
- कुटुंब प्रबोधन (पारिवारिक मूल्य): भारतीय संस्कृति का मुख्य आधार परिवार है। आज अमेरिका जैसे विकसित देशों में 62% लोग परिवार से अलग एकाकी जीवन जी रहे हैं। हमें अपने बच्चों को समय देना होगा, परिवार के साथ बैठकर भोजन करना होगा और घर में संस्कारयुक्त वातावरण निर्मित करना होगा।
- पर्यावरण संरक्षण: प्रकृति और पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनानी होगी।
- ‘स्व’ का भाव (स्वदेशी व स्वाभिमान): अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान पर गर्व करें। अपनी भाषा में हस्ताक्षर करने का स्वाभिमान जगाएं और विदेशी मानसिकता से मुक्त हों।
- नागरिक कर्तव्य: प्रत्येक नागरिक को अपने मौलिक कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि राम मंदिर का निर्माण और धारा 370 का निरसन केवल सरकार की पहल से नहीं, बल्कि जब पूरे समाज ने एकजुट होकर संकल्प लिया, तब संभव हुआ। देश के सामने आज धर्मांतरण, ‘लव जिहाद’ और समाज को बांटने वाली विघटनकारी शक्तियों की गंभीर चुनौतियां हैं। समाज को लाचार बनने की बजाय स्वयं सजग होकर इन चुनौतियों से निपटना होगा।
उन्होंने बताया कि आज संघ व विविध संगठनों द्वारा देशभर में 1.50 लाख से अधिक सेवा कार्य संचालित किए जा रहे हैं। दूरस्थ जनजातीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वावलंबन प्रदान करने के लिए एकल विद्यालय और सेवा भारती का विशाल नेटवर्क कार्य कर रहा है। कोरोना महामारी के दौरान हिन्दू समाज और संघ कार्यकर्ताओं ने जिस तन्मयता से राहत कार्य किए, उसने वैश्विक स्तर पर एक उदाहरण प्रस्तुत किया।
उन्होंने युवा व्यवसायियों, पेशेवरों, गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और प्रबुद्ध वर्ग से आह्वान किया कि वे संघ की शाखा में आएं, इसके विचार और कार्यपद्धति को समझें तथा संघ के सेवा प्रकल्पों में अपना सक्रिय योगदान दें।
कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के सामूहिक गायन के साथ हुआ।
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August 27th 2026, 9:03 am
असम के मुख्यमंत्री ने पूर्वोत्तर की साहस और परिवर्तन की कहानियों के व्यापक प्रसार का आह्वान किया
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नई दिल्ली, 25 अगस्त 2026।
अभिजीत जोग द्वारा लिखित और सुरुचि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक Grit & Glory का मंगलवार को विचार विनिमय न्यास सभागार में आयोजित एक समारोह में लोकार्पण किया गया।
असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर विशिष्ट अतिथि रहे। सामाजिक कार्यकर्ता हरि मारुति मिरासदार ने भी समारोह को संबोधित किया। पुस्तक के लेखक अभिजीत जोग ने पुस्तक की प्रेरणा और उसके केंद्रीय विषय पर अपने विचार रखे।
पुस्तक में भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के ऐसे प्रेरणादायी व्यक्तित्वों और आम लोगों की कहानियाँ प्रस्तुत की गई हैं, जिन्होंने संघर्ष, दृढ़ संकल्प और निरंतर प्रयास के बल पर विपरीत परिस्थितियों का सामना किया। इनकी यात्रा दर्शाती है कि साहस और प्रतिबद्धता के माध्यम से सामान्य लोग भी दूसरों के जीवन तथा अपने समुदायों में सार्थक बदलाव ला सकते हैं।
इस अवसर पर असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा – “पूर्वोत्तर भारत में जो आज राष्ट्रीयता के जयघोष उच्च स्वर में लग रहे हैं। अलगाव की भावना बदलकर आत्मीयता का भाव बढ़ रहा है। हर घर तिरंगा फहरा रहा है। उसके पीछे संघ के कार्यकर्ताओं का त्याग और बलिदान है। यह पुस्तक उन्हीं बलिदानी महापुरुषों के बलिदान की गाथा है।”
हितेश शंकर ने कहा – “यह पुस्तक पूर्वोत्तर के परिवर्तन से अधिक जागरण की कथा कहती है। इसमें अनुभवजन्य साक्ष्य और आंकड़े हैं।”
सामाजिक कार्यकर्ता हरि मारुति मिरासदार ने कहा – “इस पुस्तक के निर्माण में देश के अलग अलग राज्यों के 175 कार्यकर्ताओं के साक्षात्कार लिए गए। अनेक कार्यकर्ता अभी रह गए हैं। पूर्वोत्तर भारत में तिरंगा फहराने का वातावरण बनाने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वालों का इतिहास लिखने का यह पुस्तक अच्छा प्रयास है।” लेखक अभिजीत जोग ने पुस्तक की पृष्ठभूमि बताई और संक्षेप में विषयवस्तु साझा की।
कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इसके बाद अतिथियों के स्वागत के साथ ही सुरुचि प्रकाशन का परिचय प्रस्तुत किया गया। लेखक ने Grit & Glory का परिचय देते हुए पुस्तक के पीछे की प्रेरणा तथा इसमें शामिल अनुभवों और कहानियों के बारे में जानकारी दी।
समारोह में लेखक, बुद्धिजीवी, मीडिया प्रतिनिधि, पुस्तक प्रेमी और आम नागरिक, विशेषतः उत्तरपूर्वी भारत के प्रबुद्ध जन उपस्थित रहे।
सुरुचि प्रकाशन अपनी प्रकाशन गतिविधियों के माध्यम से भारत के इतिहास, संस्कृति, समाज और राष्ट्रीय जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण पुस्तकों को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाने का प्रयास करता है। Grit & Glory इसी प्रयास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जो भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र से जुड़ी साहस, दृढ़ता और परिवर्तन की प्रेरणादायी कहानियों को सामने लाती है।
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August 27th 2026, 9:03 am
स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब नहीं, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने खारिज की याचिका
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प्रयागराज। स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की अनुमति देने की मांग करने वाली याचिका इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने खारिज कर दी। प्रयागराज के टैगोर पब्लिक स्कूल की एक नाबालिग छात्रा ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी।
याचिकाकर्ता कक्षा-10 उत्तीर्ण कर चुकी है और कक्षा-11 में उसी स्कूल में दाखिला चाहती थी। उसका कहना था कि वह कक्षा-6 से ही स्कार्फ पहनकर पढ़ती आई है और स्कूल ने कभी आपत्ति नहीं जताई, लेकिन अब कक्षा-11 में दाखिले के वक्त स्कूल प्रशासन ने स्कार्फ पहनने पर आपत्ति जताते हुए दाखिला देने से इनकार कर दिया।
छात्रा ने जिलाधिकारी से शिकायत की, जिस पर डीआईओएस (जिला विद्यालय निरीक्षक) ने रिपोर्ट मांगी। स्कूल प्रिंसिपल ने स्पष्ट किया कि यह सह-शिक्षा संस्थान है, जहां सभी छात्रों के लिए एक समान ड्रेस कोड लागू है, और किसी एक छात्रा को अलग छूट देने से स्कूल की व्यवस्था प्रभावित होगी।
न्यायालय ने कहा कि जब तक ड्रेस कोड एक समान, नेकनीयती से बना और गैर-भेदभावपूर्ण है, तब तक यूनिफॉर्म तय करना स्कूल प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में आता है। पहले स्कार्फ पहनने की अनुमति मिलने से यह स्थायी अधिकार नहीं बन जाता कि स्कूल भविष्य में भी उससे बाध्य हो।
यह भी कहा कि याचिका में यह साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री या मजहबी ग्रंथों का हवाला नहीं दिया गया कि स्कार्फ पहनना इस्लाम का “अनिवार्य धार्मिक आचरण” है। इस आधार पर अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण का दावा स्वीकार नहीं किया जा सका।
न्यायालय ने केरल उच्च न्यायालय, मुंबई उच्च न्यायालय, कर्नाटक उच्च न्यायालय की फुल बेंच के प्रसिद्ध “रेशम” फैसले का उल्लेख किया, जिनमें भी यही सिद्धांत दोहराया गया था कि निजी स्कूल अपनी यूनिफॉर्म नीति खुद तय कर सकते हैं और हिजाब को अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना गया। सर्वोच्च न्यायालय में “आयशा शिफा बनाम कर्नाटक राज्य” मामले में दो जजों की राय बंटी हुई थी, इसलिए इस मुद्दे पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं आया है।
न्यायालय ने कहा कि स्कूल छात्रा की आस्था पर कोई रोक नहीं लगा रहा, बल्कि केवल संस्थागत अनुशासन और यूनिफॉर्म के पालन की अपेक्षा कर रहा है। इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई।
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August 25th 2026, 6:45 pm
भाषा, परंपरा, पूजा भले भिन्न हो, लेकिन हम सब एक ही सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा हैं – सुनील आंबेकर जी
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कानपुर, 25 अगस्त 2026। छत्रपति साहूजी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई सभागार में ‘युवा संवाद’ कार्यक्रम संपन्न हुआ। विशेष संवाद कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक जी ने की।
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों द्वारा भारत की सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता पर पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देते हुए सुनील आंबेकर जी ने कहा कि भारत की विविधता ही इसकी शक्ति है। “संघ का मूल कार्य समाज की उस विस्मृति को दूर करना है, जो हमें हमारी जड़ों से अलग करती है। हमारी भाषाएं, परंपराएं और पूजा-पद्धतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन हम सब एक ही सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा हैं।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय परंपराएं कभी भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता में बाधा नहीं बनतीं, बल्कि वे एक-दूसरे की पूरक हैं। उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि वे बाइनरी सोच से बाहर निकलें। हिन्दुत्व का मूल तत्व ही ‘एकता’, ‘एकसाथ’ और ‘सह-अस्तित्व’ है। त्याग, समर्पण और सेवा के मूल्य ही हम सभी भारतीयों को आपस में जोड़ते हैं।
उन्होंने आधुनिक दौर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और रोजगार पर युवाओं की आशंकाओं का समाधान करते हुए कहा कि मनुष्य का ‘विवेक’ ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है, जिसे कोई मशीन प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। AI के जमाने में AI सूचना दे सकता है, उसे तेजी से प्रोसेस कर सकता है। लेकिन किस परिस्थिति में कौन-सी बात करनी है और कौन-सा निर्णय सबके हित, तथा समाज कल्याण के अनुकूल होगा, इसका निर्णय लेने की क्षमता और विवेक मनुष्य के पास है। युवाओं को अपने विवेक के अनुसार निर्णय लेकर कार्य करना चाहिए।
तकनीक का ढांचा कैसा हो और हमें किस प्रकार का जीवन जीना है, इसका निर्णय समाज स्वयं करता है। युवाओं को सबसे पहले स्वयं को पहचानना होगा ताकि वे तकनीक का उपयोग अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप कर सकें।
सुनील आंबेकर जी ने संघ द्वारा संचालित सेवा प्रकल्पों का उल्लेख किया। उन्होंने दिव्यांगजन सशक्तिकरण हेतु ‘सक्षम’, शिक्षा के क्षेत्र में ‘विद्या भारती’ (शिशु मंदिर व विद्या मंदिर) और सुदूर क्षेत्रों के लिए ‘एकल विद्यालय’ का विवरण दिया। ‘स्वावलंबी भारत अभियान’ के माध्यम से युवाओं को स्वरोजगार के लिए प्रेरित के अभियान की चर्चा की।
उन्होंने छात्रों को सलाह दी कि केवल एक डिग्री तक सीमित न रहें, बल्कि कम से कम 2-3 नए कौशल सीखें। नई शिक्षा नीति में अब पाठ्येतर गतिविधियों को भी पाठ्यक्रम का मुख्य हिस्सा बनाया गया है। शोधार्थियों और छात्रों को माध्यमिक स्रोतों पर निर्भर रहने के बजाय हमेशा प्राथमिक एवं मूल स्रोतों पर जाना चाहिए।
महिला सुरक्षा पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि बदलाव की शुरुआत स्वयं से होनी चाहिए। अपनी यूनिवर्सिटी और आसपास ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास करना चाहिए, जहां महिलाओं को सुरक्षित महसूस हो। केवल नियम-कानूनों से बदलाव संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए अपने घरों से सकारात्मक मानसिकता और सामाजिक दायित्व का माहौल तैयार करना होगा। हर परिवार में सुरक्षा, सम्मान और अच्छे व्यवहार को लेकर चर्चा होनी चाहिए। बच्चों के साथ बचपन से ही ऐसा वातावरण बनाया जाना चाहिए, जिसमें वे खुलकर अपनी बात रख सकें।
लोकतंत्र में असहमति को सामान्य बताते हुए उन्होंने कहा कि विरोध हमेशा शांतिपूर्ण होना चाहिए। किसी निर्णय तक पहुँचने के लिए सर्वसम्मति और संवाद ही सबसे बड़ा मार्ग है।
कार्यक्रम की शुरुआत में कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक जी ने मुख्य अतिथि का स्वागत करते हुए 1991 से संघ के साथ अपने अनुभवों को साझा किया। उन्होंने आयुर्वेद के क्षेत्र में शुरुआती दौर में 5 लोगों के साथ मिलकर किए गए कार्यों और अपनी टीम द्वारा तैयार की गई ‘वैदिक पुस्तक’ की चर्चा की।
प्रो. पाठक ने छात्रों को ‘लेजर लाइट और टॉर्च’ का उदाहरण देते हुए जीवन में एकाग्रता एवं स्पष्ट दिशा बनाए रखने का संदेश दिया। उन्होंने अपने जापान प्रवास के अनुभव साझा किए और देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी जी की पंक्तियों के साथ अपने संबोधन का समापन किया।
कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत संघचालक भवानी भीख जी सहित बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय के शिक्षकों और विद्यार्थियों ने भाग लिया।
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August 25th 2026, 6:45 pm
सान्डर्स वध के बाद जब क्रांतिकारी ‘राजगुरु’ को संघ पदाधिकारी ने दिया गुप्त आश्रय
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शिवराम हरि राजगुरु का नाम आते ही भगत सिंह और सुखदेव के साथ उनका अमर बलिदान स्मरण हो आता है, पर उनके क्रांतिकारी जीवन का एक ऐसा अध्याय भी है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई है। सॉन्डर्स वध के बाद जब ब्रिटिश सरकार राजगुरु को पकड़ने के लिए पूरे देश में जाल बिछा चुकी थी, तब नागपुर में उनके लिए सुरक्षित ठिकाने की व्यवस्था से जुड़ा प्रसंग सामने आता है।
राजगुरु को उमरेड में संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी भय्याजी दाणी के कृषि फार्म पर छिपाने की व्यवस्था की गई थी। यह प्रसंग आज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अपना कार्य करते हुए एक ओर 100 वर्ष पूर्ण हुए हैं तो दूसरी ओर राजगुरु की देश भर में जयन्ती मनाई जा रही है।
24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र के पुणे जिले में जन्मे शिवराम हरि राजगुरु का व्यक्तित्व बचपन से ही स्वाभिमान, साहस और राष्ट्रभक्ति से निर्मित हुआ। छत्रपति शिवाजी महाराज और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला। संस्कृत और शास्त्रों के अध्ययन के लिए वे काशी पहुंचे, जहां अध्ययन के साथ उन्होंने अखाड़ों में शारीरिक प्रशिक्षण भी प्राप्त किया।
काशी में उनका संपर्क चंद्रशेखर आजाद से हुआ। उन्होंने राजगुरु की प्रतिभा और निर्भीकता को पहचाना और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से उन्हें जोड़ा। संगठन में ‘रघुनाथ’ नाम से सक्रिय रहे और अपनी अचूक निशानेबाजी के लिए विशेष पहचान बनाई।
1928 में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाहौर में लाला लाजपत राय पर हुए निर्मम लाठीचार्ज और उसके बाद उनकी मृत्यु ने क्रांतिकारी युवाओं को भीतर तक झकझोर दिया। राजगुरु, भगत सिंह, सुखदेव और चंद्रशेखर आजाद ने इसके प्रतिशोध की योजना बनाई। 17 दिसंबर, 1928 को लाहौर में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन पी. सॉन्डर्स की हत्या कर दी गई। कार्रवाई में राजगुरु ने पहली गोली चलाई और भगत सिंह ने आगे की कार्रवाई पूरी की।
इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारियों की धरपकड़ के लिए व्यापक अभियान शुरू कर दिया। राजगुरु के लिए अब हर कदम जोखिम से भरा था। उन्हें लगातार ठिकाने बदलने पड़े। यही वह दौर था जब उनके जीवन का वह अध्याय सामने आता है, जो संघ और राजगुरु के संबंधों को दिखाता है।
सान्डर्स वध के बाद राजगुरु लाहौर से निकलते हुए अमरावती और वर्धा के रास्ते नागपुर पहुंचे। नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से मिले। यह संपर्क उस समय के राजनीतिक वातावरण को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। डॉ. हेडगेवार स्वयं अपने युवा दिनों में क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े रहे थे, इसलिए ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भूमिगत संघर्ष करने वाले युवाओं की मनोदशा और उनकी कठिनाइयों से परिचित थे। इस संबंध में पत्रकार नरेंद्र सहगल ने प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर बताया है कि संघ और राजगुरु के आपसी संबंध कैसे रहे।
“भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता” पुस्तक में लिखते हैं कि राजगुरु संघ की मोहिते के बाड़े की शाखा के स्वयंसेवक थे। नागपुर के भोंसले वेदशाला के छात्र रहते हुए ही राजगुरु, संघ संस्थापक हेडगेवार के करीब आ गए थे। अब यह संदर्भ इसलिए भी प्रमाण है, क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार, कलकत्ता में अपने अध्ययनकाल से ही क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति के अंतरंग समिति के सदस्य थे। उस समय विभिन्न क्रांतिकारी संगठनों के क्रान्तिकारी, ब्रिटिश सरकार की पकड़ से दूर रहकर गुप्त प्रवास हेतु बुंदेलखंड, महाकौशल और नागपुर आते थे।
नागपुर उस समय मध्य प्रांत और बरार की राजधानी था, तथा भौगोलिक दृष्टि से गुप्त प्रवास के लिए अत्यंत सुरक्षित था और डॉ. हेडगेवार ने भी नागपुर आकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना कर ली थी, इसलिए क्रांतिकारियों का ब्रिटिश सरकार की पकड़ से दूर रहने के लिए डॉ. हेडगेवार के पास गुप्त प्रवास पर आना स्वाभाविक था। अब राजगुरु के भूमिगत जीवन में संघ से जुड़े सहयोग का यह प्रसंग दरअसल, इतिहास की एक ऐसी कड़ी है, जिस पर विमर्श होना आज की आवश्यकता है।
वस्तुत: राजगुरु का स्वभाव अत्यंत चंचल और साहसी था। परिवार से मिलने की इच्छा उन्हें पुणे ले गई, जहां 30 सितंबर 1929 को पुलिस ने उन्हें पहचान कर गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद उन्हें लाहौर लाया गया और लाहौर षड्यंत्र केस में मुकदमा चला। जेल में भी उन्होंने भगत सिंह और सुखदेव के साथ राजनीतिक बंदियों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। ब्रिटिश सरकार ने सात अक्तूबर 1930 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को मृत्युदंड सुनाया। 23 मार्च 1931 की शाम तीनों क्रांतिकारियों को निर्धारित तारीख से पहले फांसी दे दी गई।
इस तरह मात्र 22 वर्ष की आयु में राजगुरु ने अपने प्राण मातृभूमि को अर्पित कर दिए। इसके साथ ही उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे मार्मिक घटनाओं में शामिल हो गया। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की त्रिमूर्ति आज भी युवाओं के लिए साहस और राष्ट्रनिष्ठा का प्रतीक है।
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August 25th 2026, 6:45 pm
साहित्य जगत में भारतीय विचार को व्यापक वर्ग तक पहुंचाने का कार्य करें – सुशील चंद्र त्रिवेदी
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नई दिल्ली। इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती द्वारा आयोजित कार्यक्रम में ‘साहित्य परिक्रमा’ पत्रिका के नूतन कलेवर का विमोचन, ‘विभाजन की विभीषिका’ नाट्य मंचन एवं कार्यकारिणी की घोषणा की गई। कार्यक्रम का शुभारम्भ सरस्वती वंदना एवं साहित्य भारती के उद्देश्य गीत लोकमंगल की कामना के गायन से हुआ। प्रबन्ध सम्पादक डॉ. रजनी ने ‘साहित्य परिक्रमा’ का परिचय दिया और बताया कि पत्रिका अब नूतन कलेवर में ग्वालियर की बजाय दिल्ली से प्रकाशित होगी।
पत्रिका के कुछ पूर्ववर्ती स्तंभों को नए नाम और नए स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है। विषयवस्तु को अधिक विविध, समृद्ध और समकालीन बनाने के लिए ‘कलालोक’ और ‘लोकालोक’, ‘भाषा सुभाषा’ आदि स्तम्भ शामिल किए हैं। इस नवीन अंक में ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और राष्ट्रीय संदर्भों को सामने लाने का प्रयास किया गया है।
इस अवसर पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के अ.भा. अध्यक्ष सुशील चंद्र त्रिवेदी ने कहा कि हम सब मिलकर एक मन से साहित्य जगत में भारतीय विचार को व्यापक वर्ग तक पहुंचाने का कार्य करें, जिससे साहित्य के सर्वहित का संदेश पूरे विश्व में पहुंच सके।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के अ.भा. महामंत्री पवनपुत्र बादल ने कहा कि साहित्य परिक्रमा का यह कलेवर हमारी परंपरा को आधुनिक संदर्भों के साथ जोड़कर युवाओं को नई दृष्टि प्रदान करेगा।
साहित्य परिक्रमा की दृष्टि में भारत की सभी भाषाएं, राष्ट्रभाषाएं और सभी का सम्मान हमारा कर्तव्य है। ‘साहित्य परिक्रमा’ हिंदी में प्रकाशित होने के बावजूद उसकी दृष्टि सभी भारतीय भाषाओं तक है। इसी भावना से पत्रिका में एक नया स्तंभ ‘भाषा सुभाषा’ प्रारंभ किया गया है। इस स्तंभ के माध्यम से साहित्य परिक्रमा का उद्देश्य भारतीय भाषाओं का संवर्धन करना है। इस स्तंभ के अंतर्गत हिंदी के अतिरिक्त भारतीय भाषा, उसी भाषा की मूल लिपि के साथ प्रकाशित की जाएगी। इस अभिनव पहल का शुभारंभ इस बार तमिल भाषा से किया गया है।
कार्यक्रम में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के अ.भा. अध्यक्ष सुशील चंद्र त्रिवेदी ने इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती की नवीन कार्यकारिणी की घोषणा की। वरिष्ठ साहित्यकार रामशरण गौड़ संरक्षक, विनोद बब्बर को अध्यक्ष, पूनम माटिया को उपाध्यक्ष, मनोज शर्मा को महामंत्री एवं मुन्ना रजक को कोषाध्यक्ष का दायित्व दिया गया है। ममता वालिया साहित्य परिक्रमा पत्रिका प्रमुख, मलखान सिंह लोक साहित्य प्रमुख, राकेश कुमार बाल साहित्य प्रमुख, सारिका कालरा युवा आयाम प्रमुख, दिनेश वत्स प्रचार प्रमुख और जगदीश सिंह एवं सुनीता बुग्गा सदस्य नियुक्त किए गए।
इसके साथ ही, इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती के अध्यक्ष विनोद बब्बर ने दिल्ली में दस केंद्रों पर साहित्यिक गतिविधियों के सुचारू संचालन के लिए संयोजक एवं सह संयोजकों की घोषणा की।
कार्यक्रम के अंत में अदिति महाविद्यालय की छात्राओं ने ‘विभाजन की विभीषिका’ नाटक का मंचन किया। नाटक के माध्यम से भारत विभाजन की त्रासदी को संवेदनाओं और स्मृतियों से प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। विभाजन केवल भौगोलिक सीमा का विभाजन मात्र नहीं था, बल्कि उसने असंख्य परिवारों को एक-दूसरे से अलग कर उनको गहरा आघात पहुंचाया। नाट्य प्रस्तुति में हिन्दू परिवारों की पीड़ा को सामने लाया गया, जिन्हें अपना घर, अपनी गली, अपना गांव, अपनी मिट्टी और अपने प्रियजनों को छोड़कर अनजान स्थानों पर जाना पड़ा। प्रस्तुति का सबसे मार्मिक पक्ष यह रहा कि विस्थापन के बावजूद अपनी जन्मभूमि से जुड़ी भावनाएं और स्मृतियां उनके हृदय में अमिट बनी हुई हैं।
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August 25th 2026, 6:45 pm
चंडीगढ़ में बब्बर खालसा के आतंकी मॉड्यूल का खुलासा; हथियारों के साथ बब्बर खालसा के 3 आतंकी गिरफ्तार
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पुलिस ने पाकिस्तान समर्थित खालिस्तानी आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया है। पुलिस ने चंडीगढ़ में बब्बर खालसा के तीन आतंकियों को भारी मात्रा में विस्फोटक व हथियारों सहित गिरफ्तार किया है। दूसरी ओर अमृतसर में ड्रोन से आई दस पिस्तोल भी बरामद की हैं।
बीती रात चंडीगढ़ पुलिस ने सेक्टर-43 अंतरराज्यीय बस अड्डे के पीछे एक संदिग्ध बैग से पांच किलो जिलेटिन की छड़ें, विस्फोटक और हथियार बरामद कर बड़ी आतंकी साजिश को नाकाम किया है। पुलिस ने मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जिनका संबंध बब्बर खालसा इंटरनेशनल नामक प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठन से है। यह आतंकी विदेश में बैठे सतनाम सिंह उर्फ सत्ता नामक आतंकी के इशारों पर काम करते हैं।
आरोपियों की पहचान तरनतारन निवासी लवप्रीत सिंह (19), जसनप्रीत सिंह उर्फ जसनदीप (21) और अमृतसर निवासी प्रभप्रीत सिंह उर्फ प्रभ (19) के रूप में हुई है। पुलिस के अनुसार, सूचना के आधार पर रविवार दोपहर को ऑपरेशन सेल ने कार्रवाई की। बैग की तलाशी में टिफिन बॉक्स में संदिग्ध आईईडी मिला। बम निरोधक दस्ते और फोरेंसिक विशेषज्ञों ने मौके पर पहुंचकर सामग्री को कब्जे में लिया। जांच में आईईडी सक्रिय नहीं मिला।
बाद में बैग से करीब पांच किलो जिलेटिन छड़ें, डेटोनेटर, रिमोट से संचालित उपकरण, पिस्टल, मैगजीन और पांच जिंदा कारतूस बरामद होने की पुष्टि हुई। पुलिस ने सेक्टर-36 थाने में विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4(बी) और 5 के तहत मामला दर्ज किया है।
मामले की आगे की जांच चंडीगढ़ पुलिस की आपरेशन सेल कर रही है। केंद्रीय एजेंसी के साथ समन्वय में की गई कार्रवाई के बाद गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के जरिए पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने का प्रयास किया जाएगा। पुलिस के अनुसार यह कार्रवाई एक संभावित बड़े आतंकी खतरे को टालने में महत्वपूर्ण रही है। मामले में गिरफ्तार आरोपितों की कथित भूमिका, विदेशी संपर्कों, संभावित लक्ष्य और नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों का पता लगाने के लिए जांच जारी है।
अमृतसर में 10 पिस्तौल के साथ दो तस्कर गिरफ्तार
पंजाब को नशा और हथियार मुक्त बनाने के अभियान के तहत काउंटर इंटेलिजेंस (सीआई) अमृतसर ने अवैध हथियार तस्करी के नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। टीम ने दो आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके कब्जे से 10 अत्याधुनिक पिस्तौल, मैगजीन और 10 जिंदा कारतूस बरामद किए हैं। पुलिस के अनुसार आरोपी विदेश में बैठे हैंडलर के संपर्क में थे और सीमा पार से ड्रोन के जरिए हथियारों की खेप हासिल कर रहे थे।
पंजाब के डीजीपी गौरव यादव ने बताया कि गिरफ्तार आरोपियों की पहचान गुरप्रीत सिंह पुत्र इकबाल सिंह और गुरप्रीत सिंह पुत्र गुलजार सिंह, दोनों निवासी गांव हवेलियां, तरनतारन के रूप में हुई है।
बरामद हथियारों में नौ 9 एमएम पिस्तौल और एक 30 बोर पिस्तौल शामिल है। पुलिस ने हथियारों की ढुलाई के लिए इस्तेमाल किया जा रहा बजाज प्लेटिना मोटरसाइकिल (पीबी-38-सी-1658) भी जब्त किया है।
सीआई अमृतसर को सूचना मिली थी कि दोनों आरोपी विदेश में बैठे अपने हैंडलर के निर्देश पर भारत-पाकिस्तान सीमा के पास गांव हवेलियां क्षेत्र में ड्रोन के जरिए हथियारों की बड़ी खेप हासिल कर चुके हैं। वे हथियारों को पंजाब में किसी अन्य व्यक्ति तक पहुंचाने जा रहे थे। सूचना मिलते ही पुलिस टीम ने अमृतसर-अटारी जीटी रोड पर गांव खासा के नजदीक नाकाबंदी कर दोनों आरोपियों को दबोच लिया। तलाशी के दौरान उनके पास से 10 पिस्तौल, मैगजीन और जिंदा कारतूस बरामद हुए।
राकेश सैन
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August 24th 2026, 10:00 am
संस्कृत भारत की समृद्ध ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, साहित्य और सांस्कृतिक परंपरा की जीवंत वाहक
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शोभायात्रा के साथ संस्कृत सप्ताह महोत्सव का शुभारम्भ
नई दिल्ली, 23 अगस्त 2026।
देववाणी संस्कृत के प्रचार-प्रसार, संरक्षण एवं संवर्धन तथा भारतीय ज्ञान-परंपरा के प्रति जनजागरण के उद्देश्य से संस्कृत सप्ताह महोत्सव-2026 का शुभारम्भ रविवार को राजधानी दिल्ली में संस्कृत शोभायात्रा के साथ हुआ। कला, संस्कृति एवं भाषा विभाग, दिल्ली सरकार, दिल्ली संस्कृत अकादमी तथा संस्कृत भारती के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित शोभायात्रा में सैकड़ों संस्कृत प्रेमियों, विद्यार्थियों, शिक्षकों, विद्वानों और युवाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
संस्कृत भारती के केंद्रीय कार्यालय ‘प्रणवः’ से अपराह्न 3 बजे शोभायात्रा रवाना हुई। कनॉट प्लेस और राजीव चौक की ओर बढ़ते हुए प्रतिभागियों ने ‘जयतु जयतु संस्कृत भाषा’, ‘अस्माकं भाषा संस्कृत’ सहित अन्य संस्कृत नारों का उद्घोष किया। इससे राजधानी का वातावरण संस्कृतमय हो उठा। पारंपरिक वेशभूषा में शामिल विद्यार्थियों और संस्कृत प्रेमियों ने भारतीय संस्कृति एवं संस्कृत की गौरवशाली परंपरा का संदेश दिया।
शोभायात्रा में संस्कृत गीतों एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने विशेष आकर्षण पैदा किया। प्रतिभागियों ने ‘अवनितलं मनसा सततं स्मरणीयम्’, ‘कालिदासो जने जने, कण्ठे कण्ठे संस्कृतम्’ सहित अनेक गीतों की सामूहिक प्रस्तुति दी। मार्ग में विभिन्न स्थानों पर लोगों ने पुष्पवर्षा एवं स्वागत कर प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन किया।
शोभायात्रा कनॉट प्लेस स्थित राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर-6 पर पहुंची, जहां सैकड़ों लोगों की उपस्थिति में विशेष सभा आयोजित हुई। वक्ताओं ने संस्कृत के संरक्षण, संवर्धन तथा आधुनिक समाज में इसकी उपयोगिता पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि संस्कृत भारत की समृद्ध ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, साहित्य और सांस्कृतिक परंपरा की जीवंत वाहक है। संस्कृत सप्ताह महोत्सव के माध्यम से नई पीढ़ी को संस्कृत से जोड़ने तथा समाज में इसके प्रति गौरव और आत्मीयता की भावना विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है।
सभा के दौरान संस्कृत गीतों पर सांस्कृतिक प्रस्तुतियों प्रस्तुत दी। इसके बाद शोभायात्रा पुनः ‘प्रणवः’ केंद्रीय कार्यालय पहुंची, जहां शोभायात्रा का समापन हुआ।
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August 24th 2026, 3:30 am
अमेरिकी राजदूत के बयान से तिलमिलाया पाकिस्तान…!!
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जम्मू कश्मीर।
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर 19 अगस्त को जम्मू-कश्मीर दौरे पर थे। उन्होंने यहां मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से भी मुलाकात की। इस दौरान मीडिया से बातचीत में उन्होंने जम्मू-कश्मीर को भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उनका बयान दुनियाभर की मीडिया में सुर्खियां बना, और इसके साथ ही इस्लामाबाद की बौखलाहट का कारण भी।
अमेरिकी राजदूत के बयान से जम्मू-कश्मीर पर पिछले आठ दशकों से चलाए जा रहे पाकिस्तानी झूठ का घड़ा फूट गया।
सर्जियो गोर के बयान के बाद पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में अमेरिकी दूतावास की प्रभारी नताली बेकर को तलब कर अपना विरोध दर्ज कराया। हालांकि, इससे ज्यादा वो कुछ कर भी नहीं सकता था।
पाकिस्तान या दुनिया का कोई भी देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कुछ भी कहे, लेकिन भारत का रुख प्रारंभ से ही स्पष्ट है। जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा था, है और रहेगा। और जो अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कहा, वो ऐतिहासिक तथ्य है।
सर्जियो गोर ने श्रीनगर में मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए कहा था कि – “यह भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। मैं यहां पर पहली बार आया हूं। यह बहुत गर्मजोशी भरा है, दौरा बहुत अच्छा रहा और हम इस रिश्ते को आगे बढ़ाने के लिए उत्सुक हैं।”
‘हमारा मानना है कि इस इलाके को और सुरक्षित बनाने के लिए नई दिल्ली ने कुछ शानदार कदम उठाए हैं। इसलिए हम जम्मू-कश्मीर के लिए जारी अमेरिकी ट्रैवल एडवाइजरी को डाउनग्रेड करने पर विचार कर सकते हैं।’
पाकिस्तान के लिए झटका क्यों?
दरअसल, हाल के दिनों में पाकिस्तान अमेरिका का करीबी होने का नाटक करता रहा है। ईरान-इजरायल युद्ध के बीच जबरन तथाकथित शांति दूत बनने के बहाने ही सही। ये बात अलग है कि दोनों ही देश पाकिस्तान की किसी भी भूमिका को नकार चुके हैं। ऐसे में अमेरिकी राजदूत के बयान से तिलमिलाना तो बनता है।
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August 22nd 2026, 1:45 am
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कहा, जम्मू-कश्मीर भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा
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जम्मू कश्मीर। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने बुधवार को जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात के बाद पत्रकारों से बातचीत में जम्मू-कश्मीर को भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि यह उनकी जम्मू-कश्मीर की पहली यात्रा है और यहां की प्राकृतिक सुंदरता ने उन्हें काफी प्रभावित किया। गोर ने कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। मुख्यमंत्री के साथ हुई बातचीत में कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई है।
मुलाकात के दौरान भारत-अमेरिका संबंधों के अलावा जम्मू-कश्मीर से जुड़े विभिन्न मुद्दों और क्षेत्र में आर्थिक सहयोग की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई।
अमेरिकी राजदूत ने जम्मू-कश्मीर को लेकर अमेरिका की ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा के संकेत भी दिए। उन्होंने कहा कि इस विषय पर आगे विचार-विमर्श किया जाएगा। उन्होंने कहा, “जम्मू-कश्मीर में पर्यटन गतिविधियों और क्षेत्र की बदलती परिस्थितियों पर लगातार ध्यान दिया जा रहा है। ट्रैवल एडवाइजरी में किसी संभावित बदलाव का अंतिम फैसला अमेरिकी सरकार करेगी।” सर्जियो गोर की यह यात्रा ऐसे समय हुई है, जब जम्मू-कश्मीर में पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने पर लगातार जोर दिया जा रहा है।
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August 22nd 2026, 1:45 am
राष्ट्र, समाज और भविष्य की चुनौतियों पर तीन दिनों तक व्यापक चिंतन-मंथन
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय समन्वय बैठक सम्पन्न
विशाखापट्टणम, 21 अगस्त 2026।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित विभिन्न संगठनों की तीन दिवसीय अखिल भारतीय समन्वय बैठक आज विशाखापट्टणम के समीप विज्ञान विहार आवासीय विद्यालय परिसर, गुडिलोवा में सम्पन्न हुई।
समाज और राष्ट्र के लिए विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत संघ प्रेरित संगठनों के प्रमुख पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं ने बैठक में भाग लिया। बैठक के लिए कुल 326 प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया था, जिनमें विभिन्न संगठनों का महिला नेतृत्व भी शामिल रहा। 49 महिला प्रतिनिधियों ने तीन दिवसीय बैठक में सहभागिता की।
बैठक में सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत तथा सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी की विशेष उपस्थिति रही। इसके साथ ही संघ प्रेरित विभिन्न संगठनों के राष्ट्रीय स्तर के प्रमुख कार्यकर्ताओं एवं नेतृत्व ने बैठक में भाग लिया।
तीन दिनों के दौरान देश और समाज की वर्तमान परिस्थितियों, विभिन्न संगठनों द्वारा किए जा रहे कार्यों, उनके अनुभवों, भविष्य की चुनौतियों तथा आगामी कार्ययोजना पर विस्तार से विचार-विमर्श हुआ।
बैठक के सम्बंध में पत्रकार वार्ता को सम्बोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह सी.आर. मुकुंद जी ने बताया कि प्राकृतिक आपदाओं के समय समाज आधारित सेवा और पुनर्वास कार्यों की समीक्षा की गई। असम में आई भीषण बाढ़ के दौरान राष्ट्रीय सेवा भारती, भारतीय किसान संघ, नेशनल मेडिकोज ऑर्गेनाइजेशन (NMO), आरोग्य भारती सहित विभिन्न संगठनों और कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए राहत एवं पुनर्वास कार्यों की जानकारी साझा की गई।
संत रविदास जी के 650वीं जयंती के संदर्भ में उनके संदेश के आधार पर सामाजिक समरसता एवं सामाजिक सौहार्द के लिए देशभर में किए गए कार्यक्रमों और समाज से मिले सकारात्मक प्रतिसाद की समीक्षा की गई। इस दिशा में आगे भी कार्य को निरंतर बढ़ाने पर विचार हुआ।
उन्होंने कहा कि बैठक में जनसांख्यिकीय परिवर्तन एवं असंतुलन पर भी गंभीर चर्चा हुई। विश्व के अनेक देशों में वृद्ध होती जनसंख्या तथा घटती प्रजनन दर से उत्पन्न चुनौतियों के संदर्भ में भारत की परिस्थितियों पर विचार किया गया। विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों में जनसंख्या के अनुपात में हो रहे परिवर्तनों तथा उनके सामाजिक प्रभावों पर चर्चा करते हुए समाज में संतुलन और सौहार्द बनाए रखने के उपायों पर विचार हुआ।
नशामुक्त समाज के लिए व्यापक सामाजिक प्रयास
देश में युवाओं और विद्यार्थियों तक मादक पदार्थों की बढ़ती पहुँच पर बैठक में गंभीर चिंता व्यक्त की गई। इस समस्या को केवल सरकार या पुलिस के स्तर पर नहीं, बल्कि पूरे समाज की सहभागिता से हल करने की आवश्यकता पर बल दिया गया।
शिक्षण संस्थानों, अभिभावकों, सामाजिक संगठनों, प्रशासन, पुलिस तथा अन्य संबंधित पक्षों को साथ लेकर नशामुक्त समाज के लिए समन्वित प्रयास करने की आवश्यकता पर चर्चा हुई।
युवाओं की आकांक्षाओं और चिंताओं पर विशेष चर्चा
युवा पीढ़ी की सोच, आकांक्षाओं, सृजनात्मक क्षमता, भविष्य संबंधी चिंताओं तथा राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका पर विस्तृत विचार हुआ।
संघ का कार्य बड़ी संख्या में युवाओं के बीच चल रहा है। इस वर्ष संघ के 21 दिवसीय प्रशिक्षण वर्गों में लगभग 21,000 युवा स्वयंसेवकों ने भाग लिया। देशभर की दैनिक शाखाओं में उपस्थित स्वयंसेवकों में 60 प्रतिशत से अधिक युवा हैं।
युवाओं के साथ केवल उपदेशात्मक संवाद के बजाय उनके साथ प्रत्यक्ष जुड़ाव, उनकी भावनाओं और चिंताओं को समझना तथा संवाद के माध्यम से देश, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों के प्रति आत्मीयता विकसित करना आवश्यक बताया गया।
आत्मनिर्भर, पर्यावरण हितैषी और समावेशी विकास
बैठक में भारतीय दृष्टि पर आधारित विकास मॉडल पर भी चर्चा हुई। विकास आत्मनिर्भर, पर्यावरण हितैषी और समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाला होना चाहिए – इस दिशा में आर्थिक क्षेत्र में कार्यरत संगठनों के अनुभवों पर विचार हुआ।
कई संगठनों द्वारा विभिन्न प्रकार के समाज उपयोगी कार्य किए जा रहे हैं, जैसे लघु उद्योग भारती द्वारा सूक्ष्म उद्योगों के क्षेत्र में संचालित कौशल विकास केंद्रों के माध्यम से इस वर्ष 41,000 से अधिक लोगों को कौशल प्रशिक्षण दिए जाने की जानकारी भी साझा की गई।
पंच परिवर्तन और कुटुंब प्रबोधन
संघ शताब्दी वर्ष के संदर्भ में समाज परिवर्तन के लिए निर्धारित ‘पंच परिवर्तन’ के विभिन्न आयामों पर बैठक में विशेष चर्चा हुई।
विशेष रूप से कुटुंब प्रबोधन के अंतर्गत भारतीय परिवार व्यवस्था, पारिवारिक मूल्यों तथा पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपराओं को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर विचार हुआ।
पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में केवल प्रस्ताव पारित करने के बजाय प्रत्येक व्यक्ति और परिवार के दैनिक जीवन में परिवर्तन लाने पर बल दिया गया। जल का विवेकपूर्ण उपयोग, प्लास्टिक का न्यूनतम उपयोग और हरित क्षेत्र बढ़ाना जैसे विषय प्रत्येक परिवार के व्यवहार का हिस्सा बनने चाहिए।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर विस्तृत चर्चा
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के समाज पर बढ़ते प्रभाव को लेकर बैठक में विस्तृत प्रस्तुति और चर्चा हुई।
AI की सकारात्मक संभावनाओं के साथ उससे जुड़ी सावधानियों और चुनौतियों पर विचार करते हुए इसे भारतीय दृष्टिकोण और भारतीय सामाजिक संदर्भ में देखने की आवश्यकता पर बल दिया गया। तकनीक का उपयोग समाज हित में कैसे हो और उसके संभावित दुष्प्रभावों के प्रति समाज को कैसे जागरूक किया जाए, इस विषय पर आगे भी चिंतन जारी रहेगा।
कार्य विस्तार
संघ प्रेरित 32 संगठनों द्वारा समाज के विविध क्षेत्रों में किए जा रहे कार्यों के विस्तार पर भी चर्चा हुई। राष्ट्रीय दृष्टि और समाज केंद्रित चिंतन को समाज के अधिकाधिक क्षेत्रों तक पहुँचाने तथा संगठनात्मक कार्य का विस्तार करने के लिए आगामी वर्ष की योजनाओं पर विचार किया गया।
सह सरकार्यवाह मुकुंद जी ने पत्रकारों के प्रश्नों के उत्तर दिए –
प्रश्न: व्यवस्था में भ्रष्टाचार और विभिन्न सिस्टम की कमियों को लेकर बैठक में क्या चर्चा हुई?
उत्तर: इस विषय को केवल भ्रष्टाचार तक सीमित करके नहीं देखा गया। व्यवस्था में जहाँ-जहाँ कमियाँ हैं, उन्हें ठीक करने के लिए सरकार के साथ-साथ समाज की जागरूकता भी आवश्यक है। NEET जैसे विषय हों अथवा अन्य व्यवस्थागत समस्याएँ, इनके कारण युवाओं में अपने भविष्य को लेकर चिंता उत्पन्न होती है। इस चिंता को समझना और उसका समाधान करना आवश्यक है। केवल विरोध या व्यवधान से समाधान नहीं होगा। सकारात्मक और रचनात्मक दृष्टि से व्यवस्था में सुधार के लिए सरकार और समाज—दोनों को मिलकर प्रयास करना चाहिए।
प्रश्न: युवा पीढ़ी में संस्कृति और परंपराओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए संघ क्या करेगा?
उत्तर: संघ का कार्य मुख्य रूप से युवाओं के बीच व्यापक रूप से चल रहा है। इस वर्ष लगभग 21,000 युवा स्वयंसेवकों ने 21 दिवसीय प्रशिक्षण वर्गों में भाग लिया और दैनिक शाखाओं की उपस्थिति में 60 प्रतिशत से अधिक युवा हैं।
युवाओं में संस्कार और सांस्कृतिक मूल्यों का निर्माण केवल भाषणों या पोस्टरों से नहीं हो सकता। उनके साथ निरंतर जुड़ना, उनकी भावनाओं को समझना, संवाद करना तथा भारत की महानता और सांस्कृतिक विरासत को अनुभव के स्तर पर उनके सामने रखना आवश्यक है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, बजरंग दल, हिन्दू जागरण मंच सहित अनेक संगठनों के माध्यम से युवकों और युवतियों के बीच कार्य किया जा रहा है। आज की युवा पीढ़ी की क्षमता और सकारात्मक प्रतिसाद को देखते हुए हमें विश्वास है कि भारत का भविष्य युवाओं के हाथों में सुरक्षित है।
इसके साथ ही धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक संगठनों को भी युवाओं में सांस्कृतिक मूल्यों के संवर्धन के लिए मिलकर कार्य करने का आह्वान किया गया।
प्रश्न: सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी की प्रस्तावित अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन यात्रा का उद्देश्य क्या है?
उत्तर: यह यात्रा संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर व्यापक वैश्विक संपर्क का हिस्सा है। इसके तीन प्रमुख उद्देश्य हैं।
पहला – भारत, हिन्दू समाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंध में विश्व में व्याप्त भ्रांतियों और दुष्प्रचार के बीच तथ्यपरक एवं सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना।
दूसरा – भारत के ऋषि-मुनियों द्वारा दिए गए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और वैश्विक एकात्मता के संदेश को विश्व के विभिन्न समाजों तक पहुँचाना।
तीसरा – विश्व के विभिन्न देशों में रहने वाले हिन्दुओं और भारतीय मूल के लोगों के हितों एवं अधिकारों के विषय में वहाँ के मुख्यधारा समाज से संवाद बढ़ाना।
इस क्रम में डॉ. मोहन भागवत जी न्यूयॉर्क में Universal Oneness कार्यक्रम तथा टोरंटो और लंदन में सामुदायिक नेतृत्व के कार्यक्रमों में सहभागिता करेंगे।
प्रश्न: पंच परिवर्तन में पर्यावरण संरक्षण को लेकर केवल प्रस्ताव या संकल्प से आगे व्यावहारिक रूप से क्या किया जा सकता है?
उत्तर: पंच परिवर्तन की कल्पना लगभग तीन वर्ष पूर्व संघ के शताब्दी वर्ष की योजना बनाते समय की गई थी। हमारा मानना है कि किसी भी व्यवस्थागत परिवर्तन से पहले सामाजिक परिवर्तन आवश्यक है।
पर्यावरण संरक्षण केवल प्रकृति को बाहर से बचाने का विषय नहीं है। भारतीय दृष्टि में मनुष्य स्वयं इस संपूर्ण सृष्टि और पर्यावरण का अभिन्न अंग है।
इसलिए प्रत्येक व्यक्ति और परिवार अपने दैनिक जीवन में कम से कम तीन स्तरों पर योगदान कर सकता है – जल का विवेकपूर्ण उपयोग, प्लास्टिक के उपयोग को कम करना और अपने आसपास हरियाली बढ़ाना।
केवल प्रस्ताव पारित करने से परिवर्तन नहीं आएगा। जीवनशैली में परिवर्तन आवश्यक है। इसी संदेश को परिवारों, गांवों और देश के दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है। व्यक्ति और परिवार के व्यवहार में आया छोटा परिवर्तन भी व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय परिवर्तन का आधार बन सकता है।
इस प्रेस वार्ता में संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी, अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर जी, प्रदीप जोशी जी, सहित अन्य उपस्थित रहे।
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August 21st 2026, 8:31 am
21 अगस्त से होगा स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जन्म शताब्दी महोत्सव का शुभारंभ
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भुवनेश्वर, 19 अगस्त।
विधर्म चक्र विदारक, दक्ष महारथी, वेदांत केसरी ब्रह्मलीन पूज्य स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी का जन्म शताब्दी महोत्सव श्रावण शुक्ल नवमी तिथि, 21 अगस्त से प्रारंभ हो रहा है। शताब्दी वर्ष के अंतर्गत आगामी वर्ष नवंबर 2027 तक पूरे भारत में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जन्म शताब्दी महोत्सव समिति, ओडिशा की ओर से बुधवार को आयोजित पत्रकार वार्ता में जानकारी दी गई कि अकेले ओडिशा के 25 हजार स्थानों पर यह महोत्सव मनाया जाएगा। 21 अगस्त को आयोजित होने वाले शताब्दी महोत्सव कार्यक्रम में ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी रहने वाले हैं।
पत्रकार वार्ता में समिति के अध्यक्ष स्वामी जीवनमुक्तानंदपुरी और संयोजक बिनय कुमार भूयां ने बताया कि 21 अगस्त को तालचेर के गुरुजंगा में शताब्दी वर्ष का उद्घाटन कार्यक्रम होगा।
मुख्य कार्यक्रम: कलश शोभायात्रा, गौ पूजन, यज्ञ, नगर परिक्रमा, धर्मसभा, प्रसाद सेवन और कार्यकर्ताओं की बैठक।
सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक आयोजन: शाम को गाँव के विभिन्न स्थानों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, भजन संध्या, नृत्य, पाला, पूज्य संतों द्वारा प्रवचन और स्वामी जी के जीवन-आदर्शों पर आधारित प्रदर्शनी का आयोजन।
प्रमुख अतिथि: संत ब्रह्मानंद सरस्वती, सच्चिदानंद महाराज, शिवदास बाबा, स्मृति सागर महाराज, जीवन चैतन्य महाराज, सच्चिदानंद दास महाराज, बाबाजी विश्वनाथ दास, शरधानंद सरस्वती, अविनाश बाबा सहित अन्य साधु-संत उपस्थित रहेंगे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र कार्यवाह दुर्गा प्रसाद साहू तथा राज्य के अन्य प्रमुख महानुभाव भी उपस्थित रहकर मार्गदर्शन करेंगे।
वर्ष भर चलने वाले कार्यक्रम –
23 अगस्त से 4 सितंबर: 23 अगस्त (बलिदान दिवस) से 4 सितंबर (बलिदान तिथि – जन्माष्टमी) तक गाँवों और बस्तियों में श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित होंगी।
अक्तूबर 2026: चकापाद में संस्कृत सम्मेलन और जलेसपटा में महिला सम्मेलन।
नवंबर 2026: संबलपुर में प्रथम महासम्मेलन, ब्रह्मपुर में द्वितीय महासम्मेलन और भुवनेश्वर में तृतीय महासम्मेलन का आयोजन। इसके अलावा हरिद्वार, दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और कोलकाता जैसे प्रमुख नगरों में महा-समावेश आयोजित होंगे।
2027 (जनवरी से मई): जनवरी से अप्रैल तक प्रत्येक गाँव और बस्ती में संतों द्वारा ‘जागरण यात्रा’ निकाली जाएगी। अप्रैल और मई में ब्लॉक तथा शहर स्तर पर विशाल हिन्दू सम्मेलनों का आयोजन किया जाएगा।
स्वामीजी का जीवन और योगदान
पत्रकार वार्ता में स्वामी जीवनमुक्तानंदपुरी ने बताया कि एक संन्यासी होते हुए भी स्वामी जी ने मोक्ष साधना का व्यक्तिगत मार्ग त्यागकर देश, समाज सेवा और धर्म रक्षा के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया।
14 वर्ष की आयु में स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया। 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान युद्ध पीड़ितों की सेवा की। उनके प्रयास और प्रेरणा से कंधमाल में 2 संस्कृत विद्यालय, 2 महाविद्यालय, तुलसीपुर में 1 उच्च विद्यालय तथा कंधमाल में महिलाओं के लिए रात्रि पाठशालाएं शुरू की गईं। उन्होंने कंधमाल के कटिंगिया में आयुर्वेद स्वास्थ्य केंद्र तथा रायगडा में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्थापित किए।
कृषि व पर्यावरण: स्वामी जी स्वयं जैविक खेती और गौ पालन करते थे तथा स्थानीय लोगों को इसका प्रशिक्षण देते थे। छोटे- छोटे चेक डैम बनाकर सिंचाई की व्यवस्था की, कटिंगिया में कृषि सहकारी समिति बनाई, वनों की सुरक्षा के लिए ग्राम समितियां गठित कीं और प्लास्टिक के उपयोग का त्याग व घर-घर तुलसी का पौधा लगाने का आह्वान किया।
गौ रक्षा, सामाजिक व धार्मिक जागृति: गाँव-गाँव में कीर्तन मंडली, जगन्नाथ रथयात्रा, धरणी पेनू यात्रा, पंच महायज्ञ और सप्त महायज्ञ आयोजित कराए। कंधमाल और गजपति में 5 मंदिरों का निर्माण कराया तथा कंधमाल में महिला कीर्तन मंडली की शुरुआत की।
1966 में दिल्ली में स्वामी करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में गौ रक्षा आंदोलन में भाग लेकर 18 दिन जेल में रहे। 1967 में ओडिशा में गौ रक्षा आंदोलन चलाकर ढाई महीने का कारावास भोगा। धर्म रक्षा हेतु धर्मांतरित हिन्दुओं की स्वधर्म वापसी कराने के कारण 2008 में जन्माष्टमी के दिन विधर्मियों ने उनकी तथा उनके 4 सहयोगियों की निर्मम हत्या कर दी थी।
पंच संकल्प का आह्वान
महान विभूति स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वतीजी की जन्म शताब्दी के अवसर पर उनके विचारों व जीवन संदेश को जन-जन तक पहुँचाने के लिए बिनय कुमार भूयां ने समाज से पंच संकल्प को लागू करने की अपील की।
पंच संकल्प हैं — हिन्दू धर्म की सुरक्षा (धर्मांतरण रोकना); घर-घर गौ पालन; सघन पौधारोपण; मां, माटी, और मातृभाषा की रक्षा; भारतीय संस्कृति का संरक्षण।
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August 20th 2026, 7:30 pm
नक्सल पीड़ितों ने पूर्व गृहमंत्री चिदंबरम के बयान का किया विरोध; दिल्ली पहुंचकर सुनाई आपबीती
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नई दिल्ली। बस्तर के नक्सल पीड़ितों ने कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में प्रेस वार्ता कर पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम के ‘दिमागी नक्सल’ होने का गर्व करने वाले बयान का विरोध करते हुए सवाल उठाए।
18 अगस्त, 2026 को बस्तर शांति समिति के बैनर तले दिल्ली पहुंचे नक्सली हिंसा के पीड़ितों, घायल नागरिकों और शहीद परिवारों ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम द्वारा स्वयं को “दिमागी नक्सल” कहे जाने पर गर्व व्यक्त करने वाले बयान का विरोध किया। पीड़ितों ने कहा कि नक्सलवाद उनके लिए कोई राजनीतिक विमर्श या वैचारिक बहस नहीं, बल्कि जीवन का ऐसा घाव है, जिसकी पीड़ा आज भी झेल रहे हैं।
पीड़ितों ने प्रश्न किया, “जो व्यक्ति देश का पूर्व गृहमंत्री रहा हो, वह ऐसे शब्दों को लेकर गर्व कैसे व्यक्त कर सकता है? हमारी पीड़ा क्यों नहीं दिखती? क्या वे नक्सलियों के साथ हैं या हम बस्तरवासियों के साथ हैं?”
जिन लोगों ने नक्सली हिंसा में अपने परिजनों को खोया, गोलियां खाईं, बारूदी सुरंगों में अपने अंग गंवाए और अपने जीवनभर की आजीविका तथा सामान्य जीवन खो दिया, उनके लिए “दिमागी नक्सल” शब्द किसी गर्व का विषय नहीं हो सकता।
‘क्या नक्सलियों की रणनीति बनाने में भी भूमिका थी?’
पीड़ितों ने चिदंबरम के बयान पर पूछा कि “यदि चिदंबरम यह कह रहे हैं कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है, तो क्या वे यह भी स्पष्ट करेंगे कि क्या वे नक्सलियों की रणनीति बनाने वालों में शामिल थे?”
नक्सली हिंसा के दौरान बस्तर के ग्रामीणों, जनजातियों, जनप्रतिनिधियों, पुलिसकर्मियों और सुरक्षा बलों ने जिस भयावहता को झेला है, उसे दिल्ली में बैठकर केवल वैचारिक शब्दों के खेल के रूप में नहीं देखा जा सकता। हिंसा का वास्तविक प्रभाव उन परिवारों के जीवन में आज भी है, जिन्होंने अपने परिजनों, शरीर, आजीविका और सामान्य जीवन की कीमत चुकाई है।
प्रेस वार्ता में नक्सली हिंसा के कई पीड़ितों ने अपनी आपबीती साझा की। इनमें गौतरिहा राम विश्वकर्मा भी शामिल रहे, जिन्हें वर्ष 2009 में नक्सलियों ने गोलियां मारकर गंभीर रूप से घायल कर दिया था।
सियाराम रामटेके को वर्ष 2022 में खेत पर जाते समय गोलियां मारी गई थीं। गंभीर चोटों के कारण आज व्हीलचेयर और वॉकर के सहारे जीवन जी रहे हैं।
आरक्षक मोहन उईके के बलिदान और उनके पीछे छूटे परिवार की पीड़ा का भी उल्लेख किया। साथ ही सालिक राम सिन्हा के बलिदान, पुलिस जवान अमर सिंह कुमेटी की स्थायी दिव्यांगता तथा तरुण कलाकार की रीढ़ की गंभीर चोट का जिक्र करते हुए कहा कि ये नक्सली हिंसा की भयावहता को सामने रखती हैं।
सीआरपीएफ कोबरा में रहे रुद्रेश सिंह ने भी प्रेस वार्ता में अपनी पीड़ा साझा की। 25 जनवरी 2026 को हुए आईईडी विस्फोट में गंभीर रूप से घायल हुए और उन्हें अपना एक पैर गंवाना पड़ा। उन्होंने कहा कि नक्सली हिंसा की कीमत केवल आंकड़ों में नहीं मापी जा सकती। इसके पीछे किसी का शरीर, किसी का परिवार और किसी का पूरा भविष्य टूटता है।
बस्तर शांति समिति ने कहा कि नक्सली हिंसा का वास्तविक चेहरा उन हजारों परिवारों की पीड़ा में दिखाई देता है, जिन्होंने अपने लोगों को खोया है। यही कारण है कि “दिमागी नक्सलवाद” किसी के लिए गर्व करने का विषय नहीं हो सकता।
नक्सली हिंसा केवल गोलियों और विस्फोटों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने बस्तर के सामान्य जनजीवन, आजीविका और विकास की प्रक्रिया को भी लंबे समय तक प्रभावित किया है। इसलिए नक्सलवाद पर होने वाली किसी भी राजनीतिक या वैचारिक चर्चा में उन लोगों की आवाज को स्थान मिलना चाहिए, जिन्होंने इस हिंसा को प्रत्यक्ष रूप से झेला है।
उन्होंने राजनीतिक दलों और बुद्धिजीवी वर्ग से अपील की – नक्सली विचारधारा और “दिमागी नक्सल” जैसे विषयों को केवल राजनीतिक विमर्श के चश्मे से न देखा जाए, बल्कि उन परिवारों की आंखों से भी देखा जाए. जिन्होंने इस हिंसा की वास्तविक कीमत चुकाई है।
बस्तर शांति समिति ने स्पष्ट किया कि क्षेत्र अब हिंसा और भय से आगे बढ़कर शांति, विश्वास, सुरक्षा और विकास की दिशा में अपना भविष्य देखना चाहता है।
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August 20th 2026, 7:30 pm
युवा पीढ़ी को साहस, कर्मशीलता, त्याग और शौर्य के बल पर स्वयं को तैयार करना होगा
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नागपुर के ऐतिहासिक कस्तूरचंद पार्क में 200 फीट ऊंचे ध्वज स्तंभ पर ध्वजारोहण
नागपुर, 15 अगस्त 2026।
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ऐतिहासिक कस्तूरचंद पार्क मैदान में नागपुर महानगरपालिका के सहयोग से ‘लोकमत’ समाचार समूह द्वारा स्थापित 200 फीट ऊंचे ध्वज स्तंभ पर राष्ट्रध्वज का ध्वजारोहण सरसंघचालक जी ने किया। विशेष कार्यक्रम में ‘भारत के उज्ज्वल भविष्य में युवाओं का योगदान’ विषय पर मार्गदर्शन किया। इस अवसर पर ‘लोकमत’ एडिटोरियल बोर्ड के चेयरमैन तथा पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. विजय दर्डा और महापौर नीता ठाकरे उपस्थित रहीं।
कार्यक्रम में सरसंघचालक जी ने कहा कि भारत के पास मौजूद विशाल युवा आबादी केवल जनसंख्या का आंकड़ा नहीं, बल्कि देश की सबसे बड़ी ताकत है। इस ‘डेमोक्रेटिक डिविडेंड’ का सही उपयोग किया जाए तो भारत विश्वगुरु बन सकता है। इसके लिए युवा शक्ति को उचित दिशा, कौशल और अवसर उपलब्ध कराना जरूरी है। युवाओं को केवल अपने भविष्य के बारे में न सोचते हुए देश और आने वाली पीढ़ी के भविष्य की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। ऐसे समय में देश के सामने सबसे बड़ा अवसर उसकी युवा आबादी है। अनेक पीढ़ियों ने देश के लिए त्याग किया, जिसके कारण आज की पीढ़ी स्वतंत्रता का आनंद ले रही है। अब आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ करने की जिम्मेदारी वर्तमान पीढ़ी की है। युवाओं में ऊर्जा, सपने और कुछ अलग करने की ललक होती है। दुनिया के संघर्षों का पर्याप्त अनुभव नहीं होने के कारण उनमें आशावाद भी अधिक होता है। इस ऊर्जा को सही दिशा देना और राष्ट्र निर्माण में उसका उपयोग करना आवश्यक है। युवाओं को अपनी क्षमता पर विश्वास रखते हुए बड़े सपने देखने चाहिए और उन्हें पूरा करने के लिए पूरी ताकत से जुट जाना चाहिए।
मोहन भागवत जी ने कहा कि युवा आबादी भारत के लिए एक बड़ा अवसर है। हालांकि यह अवसर अपने आप विकास में परिवर्तित नहीं होगा। शिक्षा, कौशल, उद्यमिता, रोजगार सृजन और राष्ट्रहित की भावना के माध्यम से ही ‘डेमोक्रेटिक डिविडेंड’ को राष्ट्रीय शक्ति में बदला जा सकता है। रोजगार का अर्थ केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं है। उद्योग और व्यवसाय में जोखिम होते हैं और युवाओं में इन जोखिमों का सामना करने का साहस होना चाहिए। स्वयं रोजगार प्राप्त करने के साथ ही दूसरों के लिए रोजगार पैदा करने की मानसिकता भी विकसित होनी चाहिए। देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में युवाओं को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
भारत को दूसरों से अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए
भारत को अमेरिका, चीन या ऑस्ट्रेलिया से अपनी तुलना करने के बजाय अपनी संस्कृति, मूल्यों और आवश्यकताओं के आधार पर विकास की दिशा तय करनी चाहिए। दुनिया आज अधूरी दृष्टि के कारण संघर्ष कर रही है। ऐसे में दुनिया को आगे का मार्ग दिखाने की जिम्मेदारी भारत की है। इसके लिए युवा पीढ़ी को साहस, कर्मशीलता, त्याग और शौर्य के बल पर स्वयं को तैयार करना होगा। देश की प्रतिष्ठा और सुरक्षा को मजबूत करने में युवाओं को आगे आना चाहिए।
विरोध करें, लेकिन संविधान का ध्यान रखें
लोकतंत्र में अलग-अलग विचार और विरोधी दृष्टिकोण होना स्वाभाविक है। सवाल मजबूती से उठाना, आंदोलन करना और विरोध करना लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन ऐसा करते समय संविधान और उसकी मर्यादाओं का ध्यान रखना जरूरी है। अपने कानून, संविधान, प्राचीन संस्कृति, संस्कार और शील को नुकसान न पहुंचे, इसकी जिम्मेदारी प्रत्येक नागरिक को निभानी चाहिए। मतभेद होने के बावजूद मन में वैमनस्य नहीं होना चाहिए। विविधता में एकता और सहचित्त का निर्माण करना ही तिरंगे में मौजूद धम्मचक्र का संदेश है।
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August 20th 2026, 7:30 pm
तुष्टीकरण के चलते “वन्दे मातरम्” अनादर…!!
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डॉ. मयंक चतुर्वेदी
राजनीति में जब अपने सवालों का उत्तर देना कठिन हो जाए, तब अक्सर प्रतिपक्ष कोई ऐसा कोना ढूंढ़ता है, जिसे कमजोरी के रूप में अपने राजनीतिक विरोधियों के समक्ष इस्तेमाल किया जा सके। शायद, कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियांक खरगे के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर लगातार उठाए जा रहे सवालों को इसी राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। आखिर जिस समय कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व स्वयं “वन्दे मातरम्” के पूरे गान को लेकर उठे गंभीर सवालों के घेरे में है, उसी समय अचानक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कानूनी स्थिति, पंजीकरण, संपत्तियों और वित्तीय पारदर्शिता पर सवालों की बौछार क्यों शुरू हो गई?
यह सवाल इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि “वन्दे मातरम्” कोई सामान्य गीत नहीं है। यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम की चेतना, राष्ट्रभाव और मातृभूमि के प्रति श्रद्धा है। ऐसे में जब कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े लोगों के आचरण को लेकर प्रश्न उठ रहे हैं, तब अपेक्षा यह थी कि कांग्रेस अपने भीतर झांकती, आत्ममंथन करती और अपने नेताओं के आचरण पर स्वयं से प्रश्न करती और अपने आचरण में सुधार करती, किंतु उसके बजाय इसके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करती दिख रही है।
इसमें भी इस पूरे प्रसंग का सबसे रोचक पक्ष यह है कि कांग्रेस के सामान्य कार्यकर्ताओं ने अपने शीर्ष नेतृत्व से बिल्कुल अलग तस्वीर प्रस्तुत की। जब “वन्दे मातरम्” का गान हो रहा था, तब अनेक कार्यकर्ता सावधान मुद्रा में खड़े होकर पूरे गान का सम्मान करते दिखे। यह दृश्य अपने आप में बहुत कुछ कहता है। शायद कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को अपने ही कार्यकर्ताओं से सीखने की आवश्यकता है कि राष्ट्र आराधना किसी राजनीतिक योजना का विषय न होकर करोड़ों भारतीयों की भावनाओं का प्रश्न है। जिसका सम्मान हर हाल में होना ही चाहिए।
अब आते हैं प्रियांक खरगे के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर उठाए गए सवालों पर। खरगे पूछ रहे हैं कि संघ किस कानून के तहत अस्तित्व में है? उसका पंजीकरण कहां है? उसकी संपत्तियों का स्वामित्व किसके पास है? बैंक खाते कैसे संचालित होते हैं? ‘गुरु दक्षिणा’ के रूप में मिलने वाले योगदान का कानूनी ढांचा क्या है? निश्चय ही किसी भी संगठन की कानूनी और वित्तीय व्यवस्था पर प्रश्न पूछना लोकतंत्र में अपराध नहीं है। मगर प्रश्न पूछने वाले की जिम्मेदारी यह भी है कि वह जिस कानून की दुहाई दे रहा है, पहले उसका अध्ययन करे।
वस्तुत: यहीं सबसे बड़ा आश्चर्य पैदा होता है। प्रियांक खरगे कर्नाटक के गृहमंत्री हैं। उनसे अपेक्षा सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ता की कोई नहीं करता, इसलिए यह जानना उनका दायित्व है कि भारत में प्रत्येक सामाजिक या स्वयंसेवी समूह के लिए एक ही प्रकार का अनिवार्य पंजीकरण ढांचा नहीं है। संघ समर्थकों का स्पष्ट तर्क है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं को एक स्वैच्छिक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में संचालित करता है और उसके लिए किसी एक विशेष केंद्रीय पंजीकरण प्रमाण-पत्र की अनिवार्यता नहीं है। अत: अच्छा होता कि वे अपनी बात को ‘संघ पंजीकृत है या नहीं’ से आगे बढ़कर यह जानने का प्रयास करते कि आखिर इस विषय में कानून क्या कहता है।
दूसरी ओर सच यही है कि संघ को समझना हो तो उसके कागज से पहले उसके कार्य को देखें । 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने जिस संगठन की स्थापना की थी, उसका मूल आधार व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन है। शाखा संघ के कार्य का बाहरी रूप है, उसके पीछे अनुशासन, आत्मसंयम, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रभाव की अवधारणा है। स्वयंसेवक प्रतिदिन अपने व्यक्तिगत जीवन से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के लिए काम करने की मानसिकता विकसित करने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि संघ का वास्तविक प्रभाव उसके कार्यालयों या दस्तावेजों के आगे स्वयंसेवकों की सामाजिक उपस्थिति में दिखाई देता है।
जब ओडिशा में 1999 का विनाशकारी चक्रवात आया, जब 2001 में गुजरात भूकंप ने हजारों परिवारों को तबाह कर दिया या जब कोरोना महामारी ने पूरे देश को संकट में डाल दिया, तब स्वयंसेवक राहत कार्यों में दिखाई दिए। भोजन, दवाइयां, रक्त, राहत सामग्री और जरूरतमंदों तक सहायता पहुंचाने से लेकर अंतिम संस्कार तक अनेक सेवा कार्यों में स्वयंसेवकों ने काम किया और आज भी वे निरंतर देशभर में सेवा कार्य कर रहे हैं। तब किसी पीड़ित ने यह नहीं पूछा कि स्वयंसेवक के पास कौन-सा पंजीकरण प्रमाण-पत्र है। वस्तुत: संघ की राष्ट्रसेवा उसके व्यापक वैचारिक परिवार से जुड़े संगठन जो शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और जनजातीय क्षेत्रों में लंबे समय से काम कर रहे हैं, में देखी जा सकती है।
फिर प्रश्न उठता है, क्या किसी संगठन के सामाजिक योगदान का मूल्यांकन सिर्फ इस आधार पर होना चाहिए कि उसके पास कौन-सा सरकारी प्रमाण-पत्र है? यदि संघ के वित्तीय ढांचे पर कोई ठोस कानूनी प्रश्न है तो उसे कानून के समक्ष रखा जाना चाहिए। यदि किसी संपत्ति पर विवाद है तो उसके दस्तावेज सामने आने चाहिए। किंतु सिर्फ इसलिए कि संघ एक विशाल सामाजिक प्रभाव वाला संगठन है, उसके अस्तित्व को संदेह के घेरे में खड़ा कर उसके प्रति लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर किया जाए, यह कहीं से भी नैतिकता नहीं है, जिसकी दुहाई (नैतिकता) आजकल कांग्रेस अक्सर देती हुई दिखती है।
संघ की स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका हो या 1962 और 1965 के युद्धों के दौरान स्वयंसेवकों की भूमिका, 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में स्वयंसेवकों की भागीदारी जैसे प्रसंग संघ समर्थक आज भी सामने रखते हैं। जिसके बाद इतना तो स्पष्ट है ही कि संघ को भारत के सार्वजनिक जीवन से मिटा देने की कोशिश न तो ऐतिहासिक रूप से संभव है और न सामाजिक रूप से। शक्ति किसी सरकारी पद से नहीं आती, यह स्वयं के माध्यम से दिनरात की जाने वाली सेवा से आती है।
ऐसे में प्रियांक खरगे के लिए शायद सबसे जरूरी प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि ‘संघ का पंजीकरण कहां है?’ बल्कि यह होना चाहिए कि क्यों करोड़ों भारतीयों के बीच एक गैर-सरकारी, स्वयंसेवी संगठन लगभग सौ वर्षों तक अपना सामाजिक प्रभाव बनाए रखने में सफल रहा? निश्चित ही इस प्रश्न का उत्तर किसी रजिस्ट्रार के कार्यालय से उन्हें नहीं मिलने वाला है। उत्तर शाखाओं में मिलेगा। स्वयंसेवकों के जीवन में मिलेगा। आपदा के समय किए गए सेवा कार्यों में मिलेगा। दूरदराज के गांवों में चल रहे विद्यालयों में मिलेगा और उन लोगों के अनुभवों में मिलेगा, जिन्हें संकट की घड़ी में किसी स्वयंसेवक ने बिना किसी राजनीतिक पहचान पूछे सहायता पहुंचाई।
हां, संघ से सवाल पूछे जाने चाहिए, किंतु वही सवाल हर बड़े सामाजिक और राजनीतिक संगठन से भी पूछे जाने चाहिए। पारदर्शिता की कसौटी समान होनी चाहिए और कांग्रेस के लिए इससे बड़ा आत्ममंथन का अवसर शायद ही कभी आए! आखिर क्यों वह अब तक तुष्टीकरण की राजनीति के चलते “वन्देमातरम्” का अनादर करती आ रही है? क्यों नहीं उसने अब तक अपने कार्यालयों में संपूर्ण “वन्देमातरम्” के गान को अनिवार्य किया है? क्या कांग्रेस अपने शीर्ष नेतृत्व को सजा देगी, जो सामने आए वीडियो में राष्ट्रगीत “वन्देमातरम्” का अपमान करती नजर आ रही है? अच्छा हो यदि वह कुछ सुधार करना चाहती है तो सबसे पहले स्वयं से सुधार की शुरूआत करे।
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August 20th 2026, 7:30 pm
रामकथा को जन-जन तक पहुंचाने वाले तुलसीदास जी
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कवि यह सोचकर किसी काव्य की रचना नहीं करता कि वह लोक में प्रसिद्ध होगा। वह अपने भीतर उठे भाव, अनुभव और विचारों को शब्द देता है। कवि कुलभूषण तुलसीदास जी ने जब श्री रामचरितमानस की रचना की होगी, तब उन्होंने भी शायद यह नहीं सोचा होगा कि उनकी रचना आने वाली सदियों में लोकजीवन का इतना गहरा हिस्सा बन जाएगी।
उन्होंने अपनी विनम्रता व्यक्त करते हुए स्वयं कहा है –
“कबित बिबेक एक नहिं मोरें। सत्य कहउँ लिखि कागद कोरें॥”
लोक ने रामचरितमानस को वह स्थान दिया, जो बहुत कम काव्य ग्रंथों को प्राप्त हुआ। वह धीरे-धीरे तुलसीदास जी का काव्य भर नहीं रहा। लोक ने उसे अपनाया, गाया, सुना, याद किया और अपने जीवन के प्रसंगों में उतार लिया। इस तरह मानस लोक में समरस हो गया।
भारत में रामकथा की यात्रा बहुत पुरानी है। महर्षि वाल्मीकि की रामायण से लेकर देश की अलग-अलग भाषाओं, लोक परंपराओं और काव्यधाराओं तक राम अनेक रूपों में सामने आते रहे हैं। कहीं वे आदर्श राजा हैं, कहीं वनवासी राम, कहीं लोकदेवता और कहीं भक्त के हृदय में बसे आराध्य। इसी लंबी परंपरा में तुलसीदास जी की रामचरितमानस एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में दिखाई देती है।
तुलसीदास जी ने रामकथा को नया विषय नहीं दिया। उनके सामने महर्षि वाल्मीकि की रामायण सहित रामकथा की समृद्ध परंपरा मौजूद थी। उनका असाधारण योगदान यह था कि उन्होंने इस कथा को ऐसी भाषा और काव्य-भंगिमा में प्रस्तुत किया, जिसमें सामान्य जन अपने अनुभवों की आवाज सुन सके। अवधी में रचा गया रामचरितमानस, परंपरागत विवरणों के अनुसार तुलसीदास जी ने इसका आरंभ संवत् 1631 यानी 1574 ईस्वी में किया।
उस समय समाज का बहुत बड़ा हिस्सा संस्कृत का पाठक नहीं था। कथा सुनने वालों की संख्या पढ़ने वालों से कहीं अधिक रही होगी। तुलसीदास जी ने लोक की इसी स्थिति को समझा। उन्होंने रामकथा को अवधी में लिखा। यह निर्णय केवल भाषा का चुनाव नहीं था, लोकजीवन से सीधा संवाद था।
मानस के आरंभ में तुलसीदास जी कहते हैं –
“संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरितमानस कबि तुलसी॥”
आगे –
“करइ मनोहर मति अनुहारी। सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी॥”
यहां “सुनि” शब्द पर ठहरना चाहिए। तुलसी के लिए काव्य केवल पढ़ने की वस्तु नहीं था। उसे सुना जाना था। चौपाल में, मंदिर में, कथा में, परिवार के बीच। यही कारण है कि मानस की रचना में श्रव्यता इतनी महत्वपूर्ण है। एक व्यक्ति पढ़ सकता था, दूसरा सुन सकता था और कोई तीसरा उसे गा सकता था। इस तरह लिखित काव्य धीरे-धीरे वाचिक परंपरा का हिस्सा बन गया।
रामचरितमानस का सबसे मार्मिक प्रसंग राम का वनगमन है। अयोध्या का राजकुमार वन की ओर जाता है, लेकिन तुलसीदास जी इसे केवल राजपरिवार के संकट के रूप में नहीं देखते। इसमें पिता के वचन, पुत्र के कर्तव्य और व्यक्ति की मर्यादा का प्रश्न जुड़ जाता है। दशरथ के मुख से निकलता है –
“रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई॥”
दो पंक्तियों में एक पूरा नैतिक संसार खड़ा हो जाता है। प्राण चले जाएं, वचन न जाए। राम का वनवास इसलिए केवल कथा की घटना नहीं रह जाता, वह भारतीय लोकमानस में कर्तव्य और मर्यादा की कसौटी बन जाता है।
राम वन जाते हैं तो सीता और लक्ष्मण भी साथ चलते हैं। राजमहल पीछे छूट जाता है और वन सामने आता है। सीता के भावों को तुलसी जिस सहजता से व्यक्त करते हैं, वह मन को छूता है –
“सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा॥”
राम के साथ होने के कारण वन भी सीता को अयोध्या से अधिक प्रिय लगने लगता है। यहां वन केवल भौगोलिक स्थान नहीं रह जाता, वह संबंधों और भावनाओं का संसार बन जाता है।
चित्रकूट पहुंचने पर रामकथा का एक और रूप सामने आता है। यहां राजमहल नहीं है। कोल-किरात हैं, वनवासी हैं, मुनि हैं, नदी-पर्वत और वन्य जीवन है। राम के आने की खबर पाकर वनवासी जिस उत्साह से उनकी ओर आते हैं, तुलसी लिखते हैं –
“यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई॥
कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना॥”
जिनके पास राजकीय वैभव नहीं, वे कंद-मूल और फल लेकर आते हैं। उनके पास देने के लिए यही है और उनके लिए यही सबसे बड़ा उपहार है। राम भी उनके प्रेम को स्वीकार करते हैं –
“राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने॥”
यहीं रामकथा राजसत्ता के केंद्र से निकलकर लोक के बीच आती है। व्यक्ति की सामाजिक स्थिति से अधिक उसके प्रेम और भाव का महत्व दिखाई देता है।
तुलसीदास जी के राम को समझने के लिए शायद यह एक पंक्ति पर्याप्त है –
“रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा॥”
निषादराज, केवट, शबरी और वनवासी पात्रों के प्रसंगों में यही आत्मीयता दिखाई देती है। राम के साथ उनका संबंध कथा को लोकजीवन से जोड़ता है। केवट के प्रसंग में गंगा किनारे नाव चलाने वाला एक सामान्य व्यक्ति राम के सामने खड़ा है। उसके पास न राजकीय शक्ति है, न शास्त्रीय ज्ञान का प्रदर्शन। उसके पास सहज बुद्धि, अपनापन और भक्ति है। यही भाव मानस को दूर के देवता की कथा से उठाकर मनुष्य के अपने अनुभवों के करीब ले आता है।
भरत का चरित्र भी इसी मानवीय संसार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। राम वन चले जाते हैं और अयोध्या का राजपाट भरत के सामने है। सत्ता उन्हें मिल सकती है, लेकिन उनका मन उसे स्वीकार नहीं करता। भरत का त्याग भाई के प्रति प्रेम के साथ सत्ता के प्रति वैराग्य का भी उदाहरण बनता है। तुलसीदास जी के लिए यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि अधिकार मिलने के बाद मनुष्य उसका व्यवहार कैसे करता है। भरत इसका उत्तर अपने आचरण से देते हैं।
यहीं से रामचरितमानस की दूसरी बड़ी यात्रा शुरू होती है। चौपाई और दोहा केवल पढ़े नहीं गए, गाए गए। मानस मंडलियां बनीं। कथा कही गई। रामलीला के मंच पर पात्रों ने तुलसी की पंक्तियों को संवाद बनाया। गांवों में लोग मानस का पाठ सुनने लगे। जिसने स्वयं ग्रंथ नहीं पढ़ा, वह भी किसी पाठ या कथा के माध्यम से उससे जुड़ गया।
किसी साहित्यिक रचना के लिए इससे बड़ी सामाजिक उपलब्धि क्या होगी कि उसकी पंक्तियां लोगों को याद रहें और उसके पात्र लोकनाट्य के पात्र बन जाएं?
आज भी किसी गांव में मानस का पाठ शुरू होता है तो लोग केवल पुस्तक लेकर नहीं बैठते। कोई चौपाई पढ़ता है, कोई उसकी टीका कहता है, कोई प्रसंग सुनाता है और श्रोता अपनी स्मृतियों से उसमें कुछ जोड़ देते हैं। यही वह प्रक्रिया है जिसमें साहित्य लोक का हिस्सा बनता है।
तुलसीदास जी ने लोकभाषा को आध्यात्मिक, दार्शनिक और नैतिक विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। उनकी भाषा सहज दिखाई देती है, लेकिन उसके भीतर भक्ति, दर्शन, नीति और मानवीय मनोविज्ञान की कई परतें हैं। इसी कारण रामचरितमानस को केवल धार्मिक ग्रंथ मानकर देखना उसके व्यापक साहित्यिक और सामाजिक प्रभाव को सीमित कर देना होगा।
रामकथा तुलसीदास जी से बहुत पहले से भारत में थी। लेकिन तुलसीदास जी ने उसे ऐसी भाषा दी, जिसे लोक सुन सकता था; ऐसी लय दी, जिसे लोक गा सकता था और ऐसे पात्र दिए, जिनमें लोक अपने जीवन को पहचान सकता था।
इसलिए रामचरितमानस अंततः केवल तुलसीदास जी की रचना नहीं रही। लोक ने उसे अपने कंठ में रखा, अपनी स्मृति में बसाया और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे पहुंचाया। कवि ने कागद पर लिखा था, लेकिन लोक ने उसे अपने हृदय पर अंकित कर लिया।
आचार्य ललित मुनि
पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता
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August 20th 2026, 7:30 pm
सारा देश एकजुट होकर आगे बढ़े और विश्व के सामने एक उत्तम आदर्श प्रस्तुत करे – डॉ. कृष्ण गोपाल जी
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नई दिल्ली, 15 अगस्त 2026। भारत के 80वें स्वाधीनता दिवस के अवसर पर केशव कुंज में श्री केशव स्मारक समिति के तत्वाधान में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने ध्वजारोहण किया। समारोह के प्रारंभ में राष्ट्र गीत वन्दे मातरम तथा ध्वजारोहण के बाद राष्ट्रगान हुआ। केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के दल ने ध्वज को सलामी दी।
देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने कहा कि भारत अपनी स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ मना रहा है। आज ही के दिन 15 अगस्त 1947 को अपना देश सदियों की पराधीनता के बाद स्वतंत्र हुआ। अपनी स्वतंत्रता के पीछे लगभग एक हजार वर्षों का संघर्ष है। इसके लिए लाखों लोगों ने बलिदान दिया है। आज सबसे पहले उन महापुरुषों एवं महिलाओं को स्मरण करें, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी अथवा जीवन भर कारागारों के पीछे रहे। सिंध के राजा दाहिर, दिल्ली के राजा अनंगपाल, पृथ्वीराज चौहान, राणा सांगा, शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, छत्रसाल, दक्षिण भारत की चेन्नमा, विजय नगर साम्राज्य के लोग जो स्वतंत्रता के लिए लड़ते हुए बलिदान हुए। देश के भिन्न-भिन्न स्थानों पर स्वतंत्रता के लिए यह संघर्ष चला। अंग्रेजों के समय में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, भगत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, चंद्रशेखर आजाद और लंबे समय तक संघर्ष करते रहने वाले देश के प्रत्येक प्रांत के बंधुगण, माताएं एवं बहनें, हम उन सभी का स्मरण करते हैं, जिनके बलिदानों के कारण यह स्वतंत्रता प्राप्त हुई।
डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद देश ने प्रगति की। हमारा देश तेजी से प्रगति के पथ पर आगे बढ़ रहा है। इस स्वतंत्रता दिवस पर सभी देशवासियों को शुभकामना देता हूँ कि सारा देश एकजुट होकर आगे बढ़े और विश्व के सामने एक उत्तम आदर्श प्रस्तुत करे।
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August 20th 2026, 7:30 pm
‘स्व’ के बिना संभव नहीं स्वराज
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1947 में हमने विदेशी शासन से मुक्ति अवश्य प्राप्त की, किंतु क्या उसी दिन मानसिक और सांस्कृतिक पराधीनता भी समाप्त हो गई? यह प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना स्वतंत्रता के समय था। यदि हम अपनी भाषाओं को हीन समझें, अपने इतिहास को संदेह की दृष्टि से देखें, अपनी ज्ञान परंपरा को अप्रासंगिक मान लें और विकास का अर्थ केवल विदेशी प्रतिमानों की नकल समझें, तो यह स्वीकार करना होगा कि स्वराज की यात्रा अभी अधूरी है।
आचार्य ललित मुनि
हर वर्ष 15 अगस्त को जब तिरंगा शान से लहराता है, राष्ट्रगान गूंजता है और पूरा देश स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मनाता है, तब स्वाभाविक रूप से हमारा ध्यान 1947 की उस ऐतिहासिक मध्यरात्रि की ओर चला जाता है, जब भारत ने औपनिवेशिक शासन की बेड़ियों को तोड़कर स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में नई यात्रा आरंभ की। किंतु स्वतंत्रता दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं है, बल्कि आत्ममंथन का भी दिन है। यह स्वयं से पूछने का अवसर है कि क्या स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन का नाम है, या उसके पीछे कोई राष्ट्रीय और सभ्यतागत अर्थ भी छिपा है? उत्तर स्पष्ट है, स्व के बिना स्वराज संभव नहीं।
भारतीय परंपरा में “स्व” केवल व्यक्ति का अहं या निजी अस्तित्व नहीं है। “स्व” का अर्थ है – अपनी आत्मा, अपनी प्रकृति, अपनी संस्कृति, अपनी भाषा, अपने ज्ञान, अपने इतिहास और अपने जीवन मूल्यों का बोध। यही कारण है कि भारत में स्वतंत्रता की अवधारणा पश्चिमी राजनीतिक चिंतन से भिन्न रही है। यहाँ स्वतंत्रता का प्रारंभ व्यक्ति के भीतर से होता है और उसका विस्तार समाज, संस्कृति तथा राष्ट्र तक पहुँचता है।
यही कारण है कि हमारे मनीषियों ने पहले आत्मजागरण की बात की और उसके बाद स्वराज की। उपनिषदों की आत्मविद्या, भगवद्गीता का “स्वधर्म”, स्वामी विवेकानंद का आत्मविश्वास, लोकमान्य तिलक का स्वराज, महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज और पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन, सभी एक ही व्यापक सूत्र में जुड़े दिखाई देते हैं। इन विचारों में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को अलग-अलग इकाइयों के रूप में नहीं, बल्कि परस्पर जुड़े हुए जीवन-तंत्र के रूप में देखने का आग्रह दिखाई देता है। इन सबका मूल संदेश था कि यदि राष्ट्र अपने “स्व” को भूल जाएगा, तो राजनीतिक स्वतंत्रता भी लंबे समय तक उसे आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी नहीं बना सकेगी।
1947 में हमने विदेशी शासन से मुक्ति अवश्य प्राप्त की, किंतु क्या उसी दिन मानसिक और सांस्कृतिक पराधीनता भी समाप्त हो गई? यह प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना स्वतंत्रता के समय था। यदि हम अपनी भाषाओं को हीन समझें, अपने इतिहास को संदेह की दृष्टि से देखें, अपनी ज्ञान परंपरा को अप्रासंगिक मान लें और विकास का अर्थ केवल विदेशी प्रतिमानों की नकल समझें, तो यह स्वीकार करना होगा कि स्वराज की यात्रा अभी अधूरी है।
स्वतंत्रता आंदोलन स्वयं इस व्यापक चेतना का प्रमाण है। महात्मा गांधी ने राजनीतिक स्वतंत्रता को सामाजिक और आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ा। चरखा केवल वस्त्र उत्पादन का साधन नहीं था, बल्कि स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बना। लोकमान्य तिलक ने “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” के माध्यम से राजनीतिक अधिकार को जनचेतना का विषय बनाया। श्री अरविंद ने राष्ट्रीयता को आध्यात्मिक चेतना से जोड़ा, जबकि स्वामी विवेकानंद ने भारतीय समाज में आत्मविश्वास और आत्मबोध जगाने का प्रयास किया। इस दृष्टि से स्वतंत्रता का संघर्ष केवल सत्ता हस्तांतरण का आंदोलन नहीं था, बल्कि भारतीय समाज के आत्मजागरण का भी आंदोलन था।
इसका अर्थ यह नहीं कि भारत को आधुनिकता से दूरी बनानी चाहिए। भारत का इतिहास परिवर्तन का विरोध नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण समन्वय का इतिहास है। हमने सदैव नई बातों का स्वागत किया है, किंतु अपनी पहचान खोकर नहीं। विज्ञान, तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष अनुसंधान और वैश्विक व्यापार में अग्रणी बनने की आकांक्षा तभी सार्थक होगी, जब उसके साथ भारतीय समाज का सांस्कृतिक आत्मविश्वास भी मजबूत हो। आर्थिक विकास और सांस्कृतिक आत्मबोध परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।
आज “आत्मनिर्भर भारत”, भारतीय भाषाओं के प्रति बढ़ता सम्मान, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, भारतीय ज्ञान परंपरा पर बढ़ता शोध और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रयास इसी व्यापक दृष्टि के संकेत हैं। इनका मूल्यांकन केवल सरकारी योजनाओं के रूप में नहीं, बल्कि उस अधूरे स्वराज की दिशा में उठाए गए कदमों के रूप में भी किया जा सकता है, जिसकी कल्पना स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक विचारकों ने की थी।
स्वराज का अर्थ यह भी नहीं कि राष्ट्र स्वयं को दुनिया से अलग कर ले। भारतीय दृष्टि तो “वसुधैव कुटुम्बकम्” की है। किंतु विश्व के साथ संवाद वही राष्ट्र प्रभावी ढंग से कर सकता है, जो स्वयं को जानता हो। जिसकी अपनी बौद्धिक पहचान हो, जो अपनी संस्कृति पर गर्व करता हो और जो अपनी सभ्यतागत शक्ति को समझता हो। आत्म विस्मृति कभी वैश्विक नेतृत्व का आधार नहीं बन सकती।
भारत 2047 में स्वतंत्रता की शताब्दी पूरी करेगा। इसलिए आज से ही यह विचार करना आवश्यक है कि शताब्दी वर्ष तक हम किस प्रकार के भारत का निर्माण करना चाहते हैं। 2047 का भारत कैसा होगा, यह केवल आर्थिक विकास दर, प्रति व्यक्ति आय या तकनीकी उपलब्धियों से तय नहीं होगा। यह इस बात से भी निर्धारित होगा कि क्या हमने अपने बच्चों को अपनी सभ्यता से जोड़ा, क्या हमने अपनी भाषाओं को सम्मान दिया, क्या हमने अपने ज्ञान और विज्ञान की परंपराओं को आधुनिक संदर्भों में विकसित किया और क्या हमने विकास की दौड़ में अपने सामाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों को सुरक्षित रखा।
स्वतंत्रता दिवस का वास्तविक संदेश यही है कि राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनता, बल्कि चेतना से बनता है। यह चेतना ही उसका “स्व” है। यदि यह जागृत रहेगा, तो स्वराज भी सुरक्षित रहेगा; यदि यह कमजोर पड़ गया, तो राजनीतिक स्वतंत्रता भी अपने उद्देश्य को पूर्ण नहीं कर पाएगी।
इसलिए आज, हमें केवल उन वीरों को स्मरण नहीं करना चाहिए, जिन्होंने हमें स्वतंत्रता दिलाई, बल्कि उस मूल विचार को भी याद करना चाहिए, जिसके लिए उन्होंने संघर्ष किया था। उनका लक्ष्य केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि ऐसा भारत था जो अपने स्वभाव, अपनी संस्कृति, अपने ज्ञान और अपने आत्मविश्वास के आधार पर विश्व के सामने खड़ा हो।
यही स्वतंत्रता का भारतीय अर्थ है। यही स्वराज का वास्तविक स्वरूप है। और यही कारण है कि यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में था कि स्व के बिना संभव नहीं स्वराज।
(लेखक पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।)
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August 20th 2026, 7:30 pm
आईएसआई समर्थित शहजाद भट्टी नेटवर्क का भंडाफोड़; 253 हिरासत में, 200 से अधिक गिरफ्तार
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नई दिल्ली।
सुरक्षा एजेंसियों ने स्वतंत्रता दिवस से पहले आईएसआई-समर्थित शहजाद भट्टी नेटवर्क (SBN) के खिलाफ बहु-राज्यीय कार्रवाई कर आतंकी सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया है। सीमा-पार आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत 14 राज्यों में 253 लोग हिरासत में लिए गए हैं और नेटवर्क के खिलाफ 80 से अधिक एफआईआर और 200+ गिरफ्तारियां की गई हैं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि सरकार ने स्वतंत्रता दिवस से पहले ISI समर्थित आतंकी समूह ‘शहज़ाद भट्टी नेटवर्क’ को खत्म कर दिया और 200 से ज़्यादा सदस्यों को गिरफ़्तार कर उसके खतरनाक हमलों के मंसूबों को नाकाम कर दिया।
भारतीय सुरक्षा बलों ने 14 राज्यों में अलग-अलग जगह पर एक साथ ऑपरेशन चलाकर इस नेटवर्क को ध्वस्त किया, जो आतंकवाद के प्रति भारत की ‘ज़ीरो-टॉलरेंस’ नीति का एक बेहतरीन उदाहरण है।
आईएसआई से फंड पाने वाले इस समूह के पास से भारी मात्रा में सामग्री बरामद की गई, जिसमें IED, पाकिस्तान ऑर्डनेंस फैक्ट्री के निशान वाले ग्रेनेड, पिस्तौल, ज़िंदा कारतूस और जासूसी के लिए इस्तेमाल होने वाले CCTV कैमरे शामिल थे। यह नेटवर्क कई आतंकी गतिविधियों में शामिल था।
शहजाद भट्टी नेटवर्क (SBN) पाकिस्तान स्थित, आईएसआई द्वारा समर्थित आतंकी सिंडिकेट है जो भारत में ग्रेनेड, IED और पेट्रोल बम हमलों तथा टारगेटेड किलिंग में शामिल है। स्थानीय सहयोगियों को पैसे देकर पुलिस, रक्षा और धार्मिक स्थलों की रेकी करवाता था और जासूसी के लिए CCTV कैमरे लगवाता था।
स्वतंत्रता दिवस के आसपास नेटवर्क से जुड़ी संभावित गड़बड़ियों को रोकने के लिए 12 अगस्त को राज्य पुलिस बलों के साथ रियल-टाइम खुफिया जानकारी साझा करने वाली प्रणाली के जरिए समन्वित बहु-राज्यीय अभियान चलाया गया। इसमें 14 राज्यों में 253 लोगों को हिरासत में लिया गया – उत्तर प्रदेश (62), हरियाणा (52), दिल्ली (51), पंजाब (44), राजस्थान (15), महाराष्ट्र (8), उत्तराखंड (5), कर्नाटक, गुजरात और बिहार (3-3) तथा तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और केरल (2-2)। साथ ही दिल्ली और कर्नाटक में नई FIR भी दर्ज की गई हैं।
अब तक SBN के खिलाफ 80 से अधिक FIR और 200+ गिरफ्तारियां दर्ज की जा चुकी हैं। ये मामले UAPA, BNS, आर्म्स एक्ट, NDPS एक्ट और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत दर्ज हैं।
सुरक्षा एजेंसियों ने दोहराया कि भारत सरकार की सीमा-पार आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति है और नेटवर्क को देशभर में खत्म करने के लिए समन्वित कार्रवाई जारी रहेगी।
https://x.com/AmitShah/status/2089280063024009216
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August 20th 2026, 7:30 pm
अखिल भारतीय समन्वय बैठक में डेमोग्राफिक चेंज को लेकर होगी चर्चा
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वर्ष 2026 में जुलाई तक सवा लाख लोगों ने संघ से जुड़ने के लिए करवाया ऑनलाइन पंजीकरण
जॉइन आरएसएस के माध्यम से पंजीकरण में जुलाई 2025 के मुकाबले जुलाई 2026 में ढाई गुना से अधिक की वृद्धि; आवेदन करने वाले 65 प्रतिशत 30 वर्ष से कम आयु वाले
विशाखापट्टनम, 18 अगस्त 2026।
विशाखापट्टनम के समीप स्थित गुड़िलोवा के ‘विज्ञान विहार’ विद्यालय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ‘अखिल भारतीय समन्वय बैठक’ आयोजित हो रही है। बैठक से पूर्व मंगलवार को विज्ञान विहार में आयोजित प्रेस ब्रीफिंग में संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी ने बताया कि बैठक 19 अगस्त प्रातः 9:00 बजे शुरू होकर 21 अगस्त की शाम तक चलेगी। प्रतिवर्ष होने वाली अखिल भारतीय समन्वय बैठक में संघ की प्रेरणा से कार्य कर रहे कुल 32 संगठनों के प्रमुख पदाधिकारी भाग लेंगे। बैठक में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी, सभी सह सरकार्यवाह और अन्य केंद्रीय अधिकारी उपस्थित रहेंगे।
समन्वय बैठक में संघ प्रेरित विविध संगठनों जैसे भारतीय मजदूर संघ, विश्व हिन्दू परिषद, भारतीय जनता पार्टी, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय किसान संघ, राष्ट्र सेविका समिति सहित अन्य के राष्ट्रीय अध्यक्ष, महामंत्री, अखिल भारतीय संगठन मंत्री और कुछ चयनित कार्यकर्ता भाग लेंगे। बैठक में विविध संगठनों से 49 महिलाओं सहित कुल 253 प्रमुख कार्यकर्ता और संघ के पदाधिकारियों को मिलाकर 327 प्रतिनिधि अपेक्षित हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह बैठक कोई निर्णय लेने वाली (कार्यकारी/एग्जीक्यूटिव) बैठक नहीं है, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य समाज हित में कार्यरत विभिन्न संगठनों के बीच आपसी अनुभवों को साझा करना है। बैठक में संगठनों में परस्पर समन्वय को बेहतर करने पर भी चर्चा होगी। साथ ही समसामयिक विषयों पर भी चर्चा होगी।
समसामयिक स्थिति: देश की वर्तमान स्थिति, सामाजिक परिवर्तन और समस्याओं को लेकर बैठक में चर्चा होगी। जनसांख्या असंतुलन, डेमोग्राफिक बदलाव तथा उससे उत्पन्न होने वाली चिंताओं व उपायों को लेकर भी बैठक में विचार-विमर्श होगा।
नशा मुक्ति: युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं तथा आने वाले समय में सभी संगठन क्या कर सकते हैं, इस विषय पर भी बैठक में चर्चा होगी। नशा मुक्ति के साथ ही युवाओं में जागृति के लिए अन्य विषयों पर भी चर्चा होगी।
उन्होंने कहा कि संघ शताब्दी वर्ष के अवसर पर संघ द्वारा तय किए गए ‘पंच परिवर्तन’ के विषयों पर भी चर्चा की जाएगी –
* सामाजिक समरसता
* पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली
* कुटुंब प्रबोधन (पारिवारिक मूल्य)
* ‘स्व’ का भाव (स्वदेशी / स्व-जागरण)
* नागरिक कर्तव्यों का पालन
संघ के स्वयंसेवकों तथा विविध संगठनों के कार्यकर्ताओं ने पंच परिवर्तन पर प्रयास प्रारंभ कर दिए हैं। अब शताब्दी वर्ष पूर्ण होने पर इन विषयों को कैसे आगे ले जाना है तथा विभिन्न संगठनों की भूमिका पर भी बैठक में चर्चा होगी।
उन्होंने कहा कि विकास के मॉडल पर लगातार चर्चा होती है। हमारा कॉन्सेप्ट, विकास की अवधारणा क्या है। विकास केवल आर्थिक वृद्धि तक सीमित नहीं है, उसके विभिन्न आयाम जुड़े हुए हैं। बैठक में इन पर भी चर्चा होगी और आने वाले समय में विभिन्न संगठन अपनी योजना बनाएंगे। आर्थिक पहलुओं के साथ-साथ सभी क्षेत्रों को संतुलित करने वाले एक समग्र ‘भारतीय विकास मॉडल’ पर विस्तृत चर्चा होगी।
संघ शताब्दी वर्ष के दौरान में समाज में आरएसएस के प्रति आकर्षण काफी बढ़ रहा है। संघ की वेबसाइट पर ‘जॉइन आरएसएस’ के माध्यम से वर्ष 2025 में जनवरी से जुलाई के बीच 55,423 लोगों ने संघ से जुड़ने के लिए पंजीकरण करवाया था, जबकि 2026 में इसी अवधि के दौरान संख्या ढाई गुना बढ़कर 1,23,287 हो गई है। जुलाई 2025 में संख्या 9,718 रही, जबकि जुलाई 2026 में 24,086 लोगों ने संघ से जुड़ने की इच्छा व्यक्त की है। इनमें 30 वर्ष से कम आयु के युवा लगभग 65 प्रतिशत हैं और 40 वर्ष से कम आयु के लोग 85 प्रतिशत हैं।
प्रेस ब्रीफिंग के दौरान दक्षिण मध्य क्षेत्र के सह संघचालक दूसी रामकृष्ण जी, अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख प्रदीप जोशी जी उपस्थित रहे।
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August 20th 2026, 7:30 pm
आजादी के बाद पहली बार अबूझमाड़ के 9 गांवों में लहराया तिरंगा
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रायपुर, छत्तीसगढ़।
देश का 80वां स्वतंत्रता दिवस अबूझमाड़ के लिए ऐतिहासिक बन गया। दशकों से नक्सल हिंसा और भय के साये में रहे कोरसकोडो, हचेकोटी, आदनार, बोटेर, कुमनार, दिवालुर, गुंडेकोट, रेकापाल एवं रासमेटा गांवों में आजादी के बाद पहली बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर तिरंगा फहराया गया।
अबूझमाड़ के ये गांव लंबे समय तक घनघोर नक्सल प्रभावित क्षेत्र रहे हैं और नक्सली गतिविधियों एवं शीर्ष नक्सल नेतृत्व के आश्रय स्थलों के रूप में जाने जाते थे। नक्सल हिंसा के कारण यहां के ग्रामीणों के लिए राष्ट्रीय पर्व का आयोजन करना और खुले तौर पर तिरंगा फहराना संभव नहीं था।
31 मार्च 2026 को क्षेत्र के नक्सलमुक्त होने के बाद यह पहला अवसर है, जब इन गांवों में स्वतंत्रता दिवस का आयोजन कर सम्मान और उत्साह के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। गांवों में तिरंगा लहराने के साथ ही ग्रामीणों के चेहरों पर खुशी और गर्व का भाव देखने को मिला।
वर्षों तक जहां नक्सलवाद के भय के कारण राष्ट्रध्वज फहराना भी संभव नहीं था, वहीं आज उन्हीं गांवों में तिरंगा पूरे गौरव के साथ आसमान में लहराया। यह केवल ध्वजारोहण नहीं, बल्कि अबूझमाड़ में बदलते हालात, लौटती शांति और लोकतांत्रिक व्यवस्था में ग्रामीणों के बढ़ते विश्वास का प्रतीक है।
इन गांवों में स्वतंत्रता दिवस मनाया जाना इस बात का प्रमाण है कि अबूझमाड़ अब भय से निकलकर विकास, शांति और लोकतंत्र की ओर बढ़ रहा है। राष्ट्रीय ध्वज के साथ ग्रामीणों ने देश के प्रति अपनी आस्था और राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ने की भावना को भी अभिव्यक्त किया।
ग्रामीणों के लिए ऐतिहासिक और भावुक पल
पहली बार स्वतंत्रता दिवस मनाए जाने के दौरान गांवों में उत्साह का वातावरण रहा। ग्रामीणों ने तिरंगे को सम्मानपूर्वक नमन किया और स्वतंत्रता दिवस की खुशियां साझा कीं। लंबे समय से नक्सलवाद के कारण राष्ट्रीय पर्वों से दूर रहे इन ग्रामीणों के लिए यह क्षण भावुक और गौरवपूर्ण रहा।
आज अबूझमाड़ के इन गांवों में सिर्फ तिरंगा नहीं लहराया, बल्कि वर्षों के भय पर आजादी, हिंसा पर शांति और अलगाव पर लोकतंत्र की जीत का संदेश भी बुलंद हुआ।
यह ऐतिहासिक अवसर अबूझमाड़ के बदलते भविष्य की एक नई तस्वीर प्रस्तुत करता है।
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August 20th 2026, 7:30 pm
15 नवंबर – भगवान बिरसा मुंडा जयंती जनजातीय गौरव दिवस घोषित
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नई दिल्ली. केंद्र सरकार ने भगवान बिरसा मुंडा जयंती 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की. केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आज इसे स्वीकृति प्रदान की. यह दिवस जनजाति समाज के स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति को समर्पित है, जिससे आने वाली पीढ़ियां देश के प्रति उनके बलिदान के बारे में जान सकें. संथाल, तामार, कोल, भील, खासी और मिज़ो जैसी अनेक जनजातीयों ने विभिन्न आंदोलनों के माध्यम से भारत के स्वतंत्रता संग्राम को मजबूत किया था.
जनजातीय समुदाय के क्रांतिकारी आंदोलनों और संघर्षों को उनके अपार साहस एवं सर्वोच्च बलिदान की वजह से जाना जाता है. देश के विभिन्न क्षेत्रों में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ जनजाति समाज के आंदोलनों को राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा और इसने पूरे देश में भारतीयों को प्रेरित किया. हालांकि, देश के ज्यादातर लोग इन नायकों को लेकर ज्यादा जागरूक नहीं है. भारत सरकार ने देश भर में 10 जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों को स्वीकृति दी है.
15 नवंबर को भगवान बिरसा मुंडा की जयंती होती है. बिरसा मुंडा ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की शोषण वाली नीति के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी और ‘उलगुलान’ (क्रांति) का आह्वान करते हुए ब्रिटिश दमन के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया.
जनजातीय गौरव दिवस हर साल मनाया जाएगा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और वीरता, आतिथ्य और राष्ट्रीय गौरव के भारतीय मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए जनजातीयों के प्रयासों को मान्यता देगा. रांची में जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय का उद्घाटन प्रधानमंत्री द्वारा किया जाएगा, जहां भगवान बिरसा मुंडा ने अंतिम सांस ली थी.
भारत सरकार ने जनजातीय लोगों, संस्कृति और उपलब्धियों के गौरवशाली इतिहास के 75 साल पूरे होने का उत्सव मनाने के लिए 15 नवंबर से 22 नवंबर 2021 तक चलने वाले समारोह के आयोजन की योजना बनाई है.
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November 12th 2021, 2:26 pm
कारनामा – राज्य उत्सव में आयोजित प्रदर्शनी में जनजाति समाज के लोगों को नुमाइश में बैठाया
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रायपुर. राज्य सरकार सत्ता में आने के बाद से ही जनजाति समाज की निरंतर अनदेखी कर रही है, जनजाति समाज के हितों के खिलाफ निर्णय ले रही है. यही कारण है कि, स्थानीय जनजाति समाज विभिन्न विषयों को लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहा है.
फिर चाहे जनजाति विकास आयोग में पादरी की सदस्य के रूप में नियुक्ति हो, या चाहे सरगुजा क्षेत्र में ईसाई मिशनरियों द्वारा जनजाति समाज की रीति परंपरा का अपमान करने का मामला हो या बस्तर क्षेत्र में लगातार हो रहे मतांतरण का विषय हो. इसके अलावा पंडो जनजाति के साथ हो रहा अन्याय हो या प्रदेश के जनजाति समाज कल्याण मंत्री द्वारा मजाक उड़ाना हो. सभी विषयों को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार लगातार विवादों में रही है और उसे आलोचना का सामना करना पड़ा है.
अब एक बार फिर छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने नया कारनामा कर दिखाया है. जिसके बाद से सरकार जनजाति समाज के निशाने पर है.
छत्तीसगढ़ में राज्य स्थापना दिवस उत्सव के दौरान राजधानी रायपुर में एक बड़ा आयोजन किया गया था, जिसमें जनजाति समाज को एक तरह से अपमानित किया गया. आयोजन में एक विशेष प्रदर्शनी लगाई गई थी, जिसमें आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग ने बैगा जनजातियों की संस्कृति को प्रदर्शित किया था.
लेकिन, हैरान करने वाली बात है कि जनजातियों की भावनाओं, मान-सम्मान को आहत करते हुए बैगा जनजाति के नागरिकों को ही प्रदर्शनी स्थल पर बैठा दिया था, जहां राज्योत्सव देखने पहुंचे लोग उनके साथ सेल्फी ले रहे थे और उन्हें मनोरंजन का साधन समझ रहे थे. बैगा जनजाति के लोग एक सांस्कृतिक समूह का हिस्सा थे.
दरअसल, जो जनजाति आज विलुप्त की कगार पर है उसे भूपेश बघेल की सरकार प्रदर्शनी के तौर पर पेश कर रही है और उन्हें मनोरंजन के साधन के रूप में सरकारी स्टॉल में बिठा दिया गया. एक नागरिक को इस तरह से प्रदर्शनी के रूप में बैठाना, ना सिर्फ जनजाति संस्कृति का अपमान है, बल्कि यह मानव अधिकार का भी उल्लंघन है.
इनपुट – https://thenarrativeworld.in
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November 12th 2021, 2:26 pm
जनजातीय गौरव दिवस’ की घोषणा जनजातीय समाज के समर्पण का सम्मान है – अभाविप
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नई दिल्ली. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने जनजातीय अस्मिता के नायक भगवान बिरसा मुंडा के जन्मदिवस 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस मनाने के केंद्र सरकार के निर्णय का स्वागत किया.
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जनजाति समाज का बहुमूल्य योगदान रहा है. सैकड़ों जनजाति क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर देश को आजादी दिलवाई है. साथ ही देश, संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिये जनजातीय समाज सदैव अग्रिम पंक्ति में रहा है. ऐसे में जनजातीय समाज की भावनाओं का आदर करते हुए भगवान बिरसा मुंडा जी की जयंती को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाने का केंद्र सरकार का निर्णय बहुत ही सार्थक तथा सम्पूर्ण जनजातीय समाज के साथ-साथ पूरे देश को गौरवान्वित करने वाला है.
अभाविप की राष्ट्रीय महामंत्री निधि त्रिपाठी ने कहा कि, “हम भारत सरकार के निर्णय का अभिनन्दन करते हैं तथा भारत की प्रकृति एवं संस्कृति के रक्षक जनजाति समाज के लिए यह निर्णय सार्थक सिद्ध होगा तथा भारत के गौरवशाली इतिहास को पुनर्स्थापित करेगा.”
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November 12th 2021, 2:26 pm
सेवागाथा – उम्मीद की नई किरण सावित्रीबाई फुले एकात्म समाज मंडल (औरंगाबाद महाराष्ट्र)
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रश्मि दाधीच
औरंगाबाद के पास एक छोटे से गांव खामखेडा में 65 वर्ष की भामा आजी की आंखें भर आईं, जब पहली बार वह सरकारी कागजों पर अंगूठे की जगह अपनी कलम से हस्ताक्षर कर रही थी. बरसों से अपने गांव को जानती है, पर आज बस पर लिखे अपने गांव के नाम \”खामखेडा”\ को जोर जोर से पढ़कर सभी गांव वालों को ये बता रही थीं कि अब उन्हें पढ़ना लिखना आता है. शायद उन्हें अब भी विश्वास नहीं हो रहा था कि वह पढ़ना सीख चुकी है. तो वहीं दूसरी ओर औरंगाबाद के इंदिरा नगर की रहने वाली आशा जब शराबी पति के कारण दाने-दाने को मजबूर थी व हालात सुधरने की उम्मीद छोड़ चुकी थी, तब वो 22 वर्ष की उम्र में सावित्रीबाई फुले एकात्म समाज मंडल के संपर्क में आई. आज आशा ताई 42 वर्ष की उम्र में बहुत से लोगों को अपने नर्सिंग ब्यूरो में न केवल काम सिखा रही है, बल्कि रोजगार भी दे रही है. सामाजिक कुरीतियों की सभी बेड़ियों को तोड़, रुकी हुयी शिक्षा को पुन: शुरू कर कक्षा 10वीं और विज्ञान में कक्षा 12वीं व स्नातक करना, वह भी तीन बच्चों की जिम्मेदारियों के साथ इतना आसान नहीं था. परंतु संस्था के \”सशक्त नारी\” \”सशक्त परिवार\” की सोच ने हौसला भी दिया और जीवन में एक नई दिशा भी. मंडल के अध्यक्ष व औरंगाबाद के पूर्व नगर कार्यवाह डॉ. दिवाकर कुलकर्णी जी बताते हैं कि सावित्रीबाई फुले एकात्म समाज मंडल से स्वयंसेवी महिलाओं के 302 (बचत गट) स्व सहायता समूह व विभिन्न परियोजनाओं से करीब 2000 से ज्यादा (स्वयंसेवी) सेवाव्रती जुड़े हैं.
इसके अंतर्गत चल रहे करीब 43 से ज्यादा प्रोजेक्ट, जिनमें कुछ निःशुल्क एवं कई नाममात्र के टोकन शुल्क पर आधारित हैं. जिनमें निःस्वार्थ सेवा दृष्टि से प्राथमिक स्वास्थ्य, सेवा, शिक्षा, कृषि, सुरक्षित जल, बालकों, विद्यार्थियों और किशोरियों के लिए व्यक्तित्व विकास केंद्र, नारी सशक्तिकरण व जीवन स्तर को सुदृढ़ एवं समृद्ध बनाने के कौशल विकास केंद्र जैसी परियोजनाओं का लाभ औरंगाबाद नगर की 45 पिछड़ी बस्तियों (कच्ची बस्ती) व आसपास के 270 गांवों के करीब 55 लाख से अधिक लोगों को किसी न किसी रूप में मिला है.
लाखों लोगों के जीवन में उम्मीद और आशा भरने वाले इस मंडल की स्थापना कब और कैसे हुई यह कहानी बड़ी रोचक है – “आम आदमी को सस्ती कीमत पर गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने के मुख्य उद्देश्य से मातृ संस्था डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर वैद्यकीय प्रतिष्ठान के अंतर्गत 7 डॉक्टर्स ने अपनी पूंजी से 1989 में डॉ. हेडगेवार अस्पताल (औरंगाबाद) की स्थापना हुई. सर्वप्रथम डॉ. हेडगेवार अस्पताल द्वारा नगर की तीन पिछड़ी बस्तियों में आरोग्य केंद्र स्थापित किए गए. किंतु सिर्फ इतना काफी नहीं था, सेवा बस्तियों के बच्चों की पढ़ाई एवं महिलाओं के सशक्तिकरण की जरूरत को समझते हुए 1994 में सावित्रीबाई फुले महिला एकात्म समाज मंडल (SPMESM) की नींव रखी गयी. सावित्रीबाई फुले एकात्म समाज मंडल की ट्रस्टी माधुरी दीदी बताती हैं कि, पैसों की तंगी और बालविवाह करने की मानसिकता इन बस्तियों में आम थी.16 वर्ष आयु की प्रियंका बहुत ही शांत और शर्मीली थी. उन परिस्थितियों में कम उम्र में ही उसकी शादी हो जाती, परंतु पढ़ाई के साथ साथ उसने मंडल के सहयोग से मुकुंदवाडी में कराटे का प्रशिक्षण लिया. आज कराटे में ब्लैक बेल्ट प्रियंका राज्य स्तर चैंपियन है एवं मुकुंदवाडी के आरोग्य केंद्र में सभी बच्चों को निःशुल्क प्रशिक्षण दे रही है. अब किशोरियां स्वयं संगठित होकर अपनी आवाज को बुलंद कर रही हैं.
मंडल के अंतर्गत चल रहे 18 विद्यार्थी विकास केंद्र एवं 19 किशोरी विकास केंद्र, जिनमें 10 केन्द्रों में 15000 से ज्यादा लड़के-लड़कियों को प्रबोधन तक ले जाने का कार्य चल रहा है. कम उम्र में विवाह एवं पढ़ाई छोड़ने वालों पर नज़र रखने और रोकने के लिए विभिन्न गतिविधियों के साथ शिक्षा को बढ़ावा देना, किशोरावस्था पर जागरूकता और किशोरियों के स्वास्थ्य के मुद्दों से जुड़े सभी गतिविधियों पर विशेष परियोजना चलाई जा रही हैं. इनके माध्यम से यह युवा पीढ़ी साक्षर, सक्षम, आत्मनिर्भर व नारी सशक्तिकरण के क्रियाकलापों में भाग लेकर स्वयं का आत्मसम्मान और अपने भविष्य को संरक्षित कर रही है. आत्मनिर्भर बनाता कौशल विकास केंद्र गांव हो या शहर सभी के जीवन स्तर को सुधार रहा है. नीलम ने कभी नहीं सोचा था कि वह औरंगाबाद की एक ख्याति प्राप्त ब्यूटीशियन बन जाएंगी और ना ही मीनाक्षी ने यह सोचा था कि वह कभी आटा चक्की मिल की मालकिन बनेंगी. पांचवी कक्षा में पढ़ने आए अविनाश आज जल शुद्धिकरण फैक्ट्री के मालिक हैं जो अपनी सेवा संस्थान में देने को सदैव तत्पर रहते हैं. मंडल की समस्त गतिविधियों में आरंभ से ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली सविता कुलकर्णी कहती हैं – देश का भविष्य बच्चों में उच्च संस्कार और पोषण का आधार बनते मंडल के प्राथमिक शिक्षा केन्द्र ना केवल बच्चों को, बल्कि शिक्षक और माता-पिता को भी उचित ट्रेनिंग दे रहे हैं. विहंग शिक्षण केन्द्र में दिव्यांग बच्चों के लिए अलग-अलग ऑडियोलॉजी – स्पीच थेरेपी, फिजियोथेरेपी, म्यूजिक थेरेपी सपोर्ट, पैरेंट्स सपोर्ट ग्रुप, स्पेशल एजुकेशन पर ट्रेनिंग कोर्स जैसी गतिविधियां चल रही है. करीब 300 से ज्यादा दिव्यांग बच्चों के लिए नए परिसर का निर्माण भी हो रहा है. डॉक्टर भगवान का रूप होते हैं, यह तो हम सभी ने सुना है. परंतु इस संस्थान के अंतर्गत चल रहे विभिन्न आयाम हमें डॉक्टर की विस्तृत सोच और उनके अभूतपूर्व कार्य क्षेत्र को बखूबी दर्शाते हैं.
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November 12th 2021, 2:26 pm
संपूर्ण विश्व की विभीषिकाओं का आध्यात्मिक समाधान भारत का मूल सांस्कृतिक उद्देश्य है
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स्वामी अवधेशानंद गिरि
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भारत की आध्यात्मिक चेतना के केंद्र बिंदु हिमालय पर्वत में अवस्थित श्री केदारनाथ धाम में भगवान आदि शंकराचार्य की समाधि एवं भव्य-दिव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित की गई. सनातन संस्कृति के लिए आदि शंकराचार्य जी का योगदान अमूल्य रहा है. वह हिन्दू धर्म-संस्कृति और उसमें अंतर्निहित दिव्य जीवन मूल्यों को युगानुकूल रूप से प्रस्तुत और पुन:परिभाषित करने वाले भाष्यकार थे. स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत यूं तो हमारे राष्ट्र में निर्वाचित सरकारों द्वारा विकास के अनेक कार्य संपादित हुए हैं, किंतु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह आध्यात्मिक पुरुषार्थ विशेष रूप से प्रशंसनीय है. भगवतपाद आचार्य शंकर भारतीय आध्यात्मिक जगत की नाभिकीय सत्ता हैं. उन्होंने 32 वर्ष की अल्पायु में ही वेदादि समस्त धर्म शास्त्रों का मंथन कर उनसे जिस ज्ञानामृत की निष्पत्ति की, वह मनुष्य मात्र के लिए अनुकरणीय है. धर्म-संस्कृति के रक्षणार्थ उन्होंने जो श्रेष्ठ कार्य संपादित किए, वे किसी सामान्य मनुष्य की सामर्थ्य, यहां तक कि परिकल्पनाओं की परिधि से भी बाहर हैं. आचार्य शंकर जैसी प्रखर प्रतिभा, पांडित्य, प्रचंड-पुरुषार्थ, त्याग और योगैश्वर्य अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता. संभवत: इसीलिए हम सनातन हिन्दू मतावलंबी उन्हें शिव का अवतार मानते हैं. हमारी यह मान्यता कपोल कल्पना नहीं है, अपितु शास्त्रों द्वारा प्रमाणित है.
मुझे स्मरण है कि वर्ष 2013 की केदारनाथ की भीषण आपदा के समय नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और उन्होंने पीड़ितों की सहायता एवं आपदा प्रबंधन में जैसी तत्परता दिखाई थी, वह अभूतपूर्व और आश्चर्यचकित करने वाली थी. प्रधानमंत्री के जीवन का कुछ कालखंड हिमालय में भी व्यतीत हुआ है और ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और शुभ कर्म संलग्नता के मूल में हिमालय में अवस्थित देवात्माओं का दिव्य आशीर्वाद सन्निहित है. कोरोना के भीषण संकट काल में उन्होंने जिस कुशलता से देश का नेतृत्व किया और कोरोना योद्धाओं एवं विज्ञानियों को प्रोत्साहित किया, उसी के परिणामस्वरूप हम अपना स्वदेशी टीका बनाने में सफल रहे. देश में बने टीकों ने कोरोना से लड़ाई में अभूतपूर्व योगदान दिया है. नोटबंदी के समय अथवा जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 और धारा 35-ए की समाप्ति के संदर्भ में लिया गया, उनका साहसिक निर्णय भी अभूतपूर्व था.
अब इसी क्रम में आचार्य शंकर की समाधि और प्रतिमा की स्थापना भारतीय संस्कृति-संस्कार और उसकी दिव्य संवेदनाओं एवं संसार की आद्य सभ्यता का जयघोष ही है. ऐसी विलक्षण अभिप्रेरणा और समायोजन दृढ़संकल्प और दैव सत्ता की सम्मति के बिना असंभव है.
आज विश्व के समक्ष बढ़ती जनसंख्या, पर्यावरण क्षरण, ग्लोबल वार्मिग, जलवायु परिवर्तन और पारस्परिक संघर्ष की जो स्थितियां बनी हुई हैं, उनका एकमात्र समाधान आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैत दर्शन ही है. हमारे पूर्वज ऋषि प्रकृति के गूढ़ रहस्य को समझकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मनुष्य और अन्य पर्यावरणीय घटकों के पारस्परिक सहकार-संतुलन एवं सह-अस्तित्व में ही हमारा जीवन सुरक्षित है. यदि समष्टि में असंतुलन है, धरा, अंबर, जल, वायु आदि दूषित हैं तो मनुष्य अकेले सुखी कैसे हो सकता है? इसलिए हमारी प्रार्थनाओं में सर्वत्र शांति की बात की गई है. आचार्य शंकर द्वारा प्रतिपादित अद्वैत मत मनुष्य और प्रकृति के मध्य परस्पर एकत्व और सामंजस्य के इसी रहस्य को उद्घाटित करता है.
वस्तुत: रूप, गुण-धर्म, प्रकृति और अन्य सभी पारिस्थितिक विषमताओं के बाद भी हमारे मूल में एक ही तत्व विद्यमान है, जिसे ‘आत्म तत्व’ कहा जाता है. आत्मा का वही अविनाशी स्वरूप हमें जाति, धर्म, संस्कृति आदि की विभिन्नताओं और वैविध्य के बाद भी एकत्व प्रदान करता है. संसार के समस्त प्राणियों के भीतर वही एक अविनाशी तत्व विद्यमान है. इस अवबोध के बाद हमारा पारस्परिक विद्वेष-संघर्ष स्वत: समाप्त हो जाएगा. सबका हित, सबकी प्रगति, सबका कल्याण और सर्वत्र समता का भाव ही आचार्य शंकर के अद्वैत दर्शन की प्रमुख विशेषता है. प्रचंड भोगवाद और पारस्परिक संघर्ष से जूझ रहे इस विश्व में अद्वैत का दिव्य विचार ही शांति-सामंजस्य और सद्भाव की स्थापना कर सकता है. इस दृष्टि से आचार्य शंकर के विचारों का प्रसार मानव कल्याण हेतु उच्चतम प्रतिमानों की संस्थापना ही है. भारतीय आध्यात्मिक जगत की प्राणस्थली हिमालय के तुंग शिखर पर विद्यमान श्री केदारनाथ धाम में आचार्य भगवान आदि शंकराचार्य की समाधि का निर्माण एवं भव्य प्रतिमा की स्थापना इसी सत्य को परिपुष्ट करता है. भारत की संस्कृति प्रकाश के विस्तार की संस्कृति है. अपनी उदार भावना से संपूर्ण विश्व को एक करना और जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग आदि पर्यावरणीय आदि विभीषिकाओं का आध्यात्मिक समाधान प्रस्तुत करना ही भारत का मूल सांस्कृतिक उद्देश्य है.
भारत का साफ्ट पावर, योग-आयुर्वेद, आर्ष विद्या और आद्य शंकराचार्य के अद्वैत के विचार द्वारा समग्र विश्व को अनेक समकालीन संकटों से छुटकारा दिलाया जा सकता है. इस दृष्टि से भारत की आध्यात्मिक जीवन पद्धति के प्रसार का संकल्प बहुत ऐतिहासिक है. भारत के शीर्षस्थ संत-सत्पुरुष और सनातन जगत प्रधानमंत्री के प्रति आभार व्यक्त करते हैं.
(लेखक श्रीपंचदशनाम जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर एवं हरिद्वार आश्रम, कनखल के पीठाधीश्वर हैं)
साभार – दैनिक जागरण
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November 12th 2021, 2:26 pm
15 नवम्बर को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की घोषणा स्वागतयोग्य – वनवासी कल्याण आश्रम
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नई दिल्ली. जनजाति अस्मिता के नायक भगवान बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवम्बर को जनजाति गौरव दिवस के रूप में मनाने का निर्णय केंद्र सरकार ने लिया है. अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम सरकार के निर्णय का स्वागत करता है.
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जनजाति समाज का बहुमूल्य योगदान रहा है. सैकड़ों जनजाति क्रांतिकारियों ने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है. भगवान बिरसा मुंडा उन्हीं क्रांतिकारियों के अग्रणी रहे हैं. जल, जमीन, और जंगल रक्षा और अपनी धर्म संस्कृति को बचाने के लिए संघर्ष करने वाले बिरसा मुंडा को जनजाति अस्मिता का नायक माना गया है, इसीलिए उनके जीवनकाल से ही झारखंड के लोग उन्हें “धरती का आबा – भगवान” कहते थे.
वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष रामचंद्र खराडी, और महामंत्री योगेश बापट ने कहा कि आजादी की लड़ाई में जनजाति समाज के गौरवशाली योगदान को याद करने के लिए भगवान बिरसा मुंडा के जन्मदिवस को जनजाति समाज और कल्याण आश्रम जनजाति गौरव दिवस के रूप में कई वर्षों से मनाता आ रहा है. इसके माध्यम से जनजाति समाज अपनी अस्मिता, स्वाभिमान और पहचान खोज रहा था. ऐसे में केंद्र सरकार के इस निर्णय से उसे मान्यता मिल गई है. वनवासी कल्याण आश्रम और सम्पूर्ण जनजाति समाज केंद्र सरकार के इस निर्णय का हार्दिक स्वागत करता है.
बिरसा मुंडा तो जनजाति अस्मिता के प्रतीक थे ही, लेकिन उन्होंने केवल जनजाति समाज के लिए ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण देश की आजादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया था. सरकार का यह निर्णय न केवल बिरसा मुंडा, बल्कि सिदो-कानो, तिलका मांझी, टांट्या भील, राघोजी भांगरे, तलक्कल चंदू, वीर रघुनाथ मंडलोई, उ तीरथ सिंह और रानी गाईदिन्ल्यू, जैसे जनजाति स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को भी मान्यता देता है.
इस वर्ष देश जब आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है तो इस घोषणा का महत्व और भी बढ़ जाता है. अतः भगवान बिरसा मुंडा और अन्य बलिदानियों को याद करते हुए न केवल जनजाति समाज, बल्कि सम्पूर्ण देश 15 नवम्बर का दिन जनजाति गौरव दिवस के रूप में धूमधाम से मनाए, सम्पूर्ण समाज का हम यही आवाहन करते हैं.
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November 12th 2021, 2:26 pm
डर के कारण मुस्लिम बने बंजारा समाज के परिवार ने अपनाया हिन्दू धर्म
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मुजफ्फरनगर के बघरा आश्रम में एक परिवार 18 वर्ष पहले डर की वजह से मुस्लिम बन गया था. अब, इस परिवार ने पुनः हिन्दू धर्म अपना लिया है. महाराज यशवीर ने हवन-पूजन कर विधि-विधान से इनकी सनातन धर्म में वापसी करवाई. 15 सदस्यीय परिवार की मुखिया जरीना अब फिर से मिथलेश बन गई हैं. 18 वर्ष पहले भी उसका यही नाम था.
बागपत के बिनौली क्षेत्र के रहने वाले परिवार ने कई दिन पहले बघरा योग साधना केंद्र आश्रम में महाराज यशवीर से संपर्क कर स्वैच्छा से हिन्दू धर्म में वापसी की इच्छा व्यक्त की थी, जिसके बाद आश्रम में परिवार के सभी सदस्यों की हवन-पूजन का सनातन दीक्षाएं देकर हिन्दू धर्म में वापसी हुई.
परिवार में दानिश का नाम पूर्व की तरह दिनेश, शमी का नाम बादल, आसमां का कविता, रईस का यशपाल रखा गया है. परिवार में सात महिलाएं, तीन लड़कियां और पांच पुरुषों ने हिन्दू धर्म में पुनः आस्था जताई है. बंजारा समाज के परिवार की कई दिनों की घर वापसी की इच्छा को पूरा किया गया है.
27 नवंबर, 2020 को उत्तर प्रदेश में विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश-2020 लागू हुआ था. इसके बाद से ही एटीएस ने कई मुकदमे दर्ज किए हैं. मेरठ, बरेली, गोरखपुर में अनेक मामले सामने आए हैं. इसके अलावा नोएडा कमिश्नरेट, लखनऊ कमिश्नरेट, प्रयागराज जोन व वाराणसी जोन में एटीएस ने मामले दर्ज किए थे. इसके अलावा उत्तर प्रदेश पुलिस ने मतांतरण के खेल में शामिल गिरोह का भी पर्दाफाश किया था.
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November 12th 2021, 2:26 pm
कर्नाटक – बेलगावी में मिशनरियों द्वारा मतांतरण के प्रयासों का हिन्दू समाज ने किया विरोध
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क्रिश्चियन मिशनरियों द्वारा भारत के विभिन्न हिस्सों में षड्यंत्र के तहत बड़े पैमाने पर मतांतरण का खेल खेला जा रहा है. आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, केरल, छत्तीसगढ़, पूर्वोत्तर के राज्य और कर्नाटक मुख्य रूप से निशाने पर हैं. मिशनरी मतांतरण करवाने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन, आर्थिक सहायता, उपचार के नाम पर सहायता का ढोंग करने से लेकर, अंधविश्वास तक का सहारा लेते हैं.
पिछले दिनों पंजाब के एक गांव को वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें मतांतरण के उद्देश्य से घूम रही टोली को जागरूक गांव वासियों ने भगा दिया था.
इसी क्रम में कर्नाटक के बेलगावी से मतांतरण की साजिश की घटना सामने आई है. जानकारी के अनुसार कर्नाटक के बेलगावी जिले के मराठा कॉलोनी में ईसाई मिशनरियों के एक गिरोह द्वारा योजनाबद्ध तरीके से मतांतरण करवाए जाने का मामला सामने आया है.
दावा किया जा रहा है कि मराठा कॉलोनी स्थित एक ‘आवासीय परिसर’ में चलाए जा रहे मतांतरण केंद्र में बड़े पैमाने पर मतांतरण को अंजाम दिया जा रहा है.
जानकारी मिलने के बाद अब स्थानीय हिन्दू समुदाय ने विरोध प्रदर्शन कर रविवार को इस आवासीय परिसर का घेराव किया गया. लोगों का कहना था कि यहां लगभग 200 से अधिक लोगों को मतांतरण करने के लिए रखा गया है. स्थानीय लोगों का आरोप है कि आर्थिक दृष्टिकोण से पिछड़ी हुई पृष्ठभूमि की महिलाओं सहित बच्चों को भी मतांतरण के उद्देश्य से यहां रखा गया है.
लोगों का कहना है कि ईसाई मिशनरियों द्वारा आवासीय परिसर में प्रार्थना सभा के नाम पर लोगों को बुलाकर उन्हें आर्थिक रूप से सहायता देने का लालच देकर, बहला-फुसलाकर उनका धर्मांतरण कराया जा रहा है.
रविवार को इस प्रकरण पर विरोध बढ़ता देख ईसाई मिशनरी वहां से रफूचक्कर हो गए. ईसाई मिशनरियों के भाग जाने की सूचना मिलने के बाद गुस्साए लोगों ने परिसर में उपस्थित लोगों को कमरे में बंद कर पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद बेलगांव पुलिस ने घटनास्थल पर पहुंचकर घटना की सघनता से जांच करने का आश्वासन देते हुए विरोध प्रदर्शन समाप्त करवाया.
ज्ञात हो कि कर्नाटक में पिछले कुछ वर्षों से ईसाई मिशनरियों द्वारा योजनाबद्ध तरीके से मतांतरण को बढ़ावा दिया जा रहा है. मतांतरण गिरोहों की सक्रियता को देखते हुए अभी हाल ही में विधायक शेखर के नेतृत्व में मतांतरण को लेकर विधायी समिति ने चर्च व मिशनरी का सर्वे करवाने का निर्णय लिया था.
विधायी समिति की बैठक में अधिकारियों को यह निर्देश दिया गया था कि कर्नाटक के सभी पंजीकृत और गैर पंजीकृत चर्च की सूची तैयार की जाए. साथ ही प्रदेश में अवैध रूप से मतांतरण को बढ़ावा दे रहे मिशनरियों के गिरोह की पहचान कर मतांतरण रोकने के प्रयासों को तेज करने के लिए अधिकारियों को निर्देशित किया था.
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November 12th 2021, 2:26 pm
विश्व को धर्म का वास्तविक स्वरूप समझाने में संतों का महत्वपूर्ण योगदान – डॉ. मोहन जी भागवत
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नरसी के संत नामदेव गुरुद्वारा में सरसंघचालक जी ने दर्शन कर माथा टेका
हिंगोली. राष्ट्रीय सावयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि राष्ट्र का सामर्थ्य, आध्यात्मिक शक्ति पर ही टिका होता है और यह आध्यात्मिक शक्ति को वृद्धिंगत करने हेतु साधु-संतों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है. संपूर्ण विश्व को संतुलित रखने और वास्तविक धर्म समझाने हेतु संतों ने अनेक महत्वपूर्ण कार्य किये. हमारे यहाँ भक्ति के, उपासना के मार्ग अलग अवश्य होंगे, भाषा, परंपरा भिन्न होंगी. परंतु, अंततः सभी भारतीयों की श्रद्धा एक ही है, अंतिम सत्य एक ही है और यही भारत की विशेषता है.
सरसंघचालक जी नरसी में (जिला हिंगोली, महाराष्ट्र) श्री गुरुद्वारा दर्शन पश्चात, स्थानीय नागरिक, संत, सज्जन वृंद से संवाद कर रहे थे. सरसंघचालक आज महराष्ट्र के हिंगोली जिले में संत नामदेव महराज के जन्म से पुनीत नरसी नामदेव स्थान पर गए थे.
सरसंघचालक जी ने कहा कि “भक्तिमार्ग का भौतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्त्व है. महाराष्ट्र में अनेक संतों की परंपरा रही है. श्री संत नामदेव जी ने सरल भाषा में लोगों को भक्तिमार्ग सिखाया. उन्होंने पंजाब तक वारकरी संप्रदाय की पताका लहराई. इसी से हिन्दू समाज के आपस में समन्वय, सद्भाव और आत्मीयता का दर्शन होता है. अत्यंत सामान्य पारंपरिक कथाओं में भी अध्यात्म और सामाजिक जागृति भारत में आज भी दिखाई देती है. इसलिए पंजाब की पावन भूमि ने संत नामदेव जी के मार्ग को सहज स्वीकार किया. संत नामदेव जी की 61 पंक्तियां गुरु ग्रंथ साहब में भी समाविष्ट है. श्री गुरुनानक देव जी, श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने संत नामदेव जी को सदैव आदर और सम्मान का स्थान दिया है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी यही भूमिका है. एक जन, एक संघ. इसमें से ही मूलभूत साक्षात्कार होता है”. नरसी में श्री संत नामदेव महराज के जन्मस्थान, गुरुद्वारा के दर्शन और संत नामदेव जी की समाधि स्थान के दर्शन से मैं धन्य हुआ.
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November 12th 2021, 2:26 pm
हिन्दू त्यौहारों पर निरंतर आघात का सिलसिला
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विकास सारस्वत
पिछले कई वर्षों से कोई भी हिन्दू उत्सव उदारवादियों की झिड़की, महानुभावों के ज्ञान और न्यायिक दखलअंदाजी के बिना संपन्न नहीं हो पाया है. उनकी नजर में यदि करवा चौथ और रक्षाबंधन पितृसत्तात्मक व्यवस्था का रूप हैं तो होली पानी की बर्बादी. इसी तरह इस वर्ग की नजर में जल्लीकट्टू पशुओं से क्रूरता है तो गणेश चतुर्थी पर्यावरण पर आघात. मकर संक्रांति हो या दुर्गा पूजा, जन्माष्टमी हो या शिवरात्रि, इनके लिए हर त्योहार हिन्दुओं में लज्जा भाव उत्पन्न करने का अवसर है. हिन्दुओं का सबसे बड़ा त्योहार होने के कारण दीपावली विशेष रूप से निशाने पर रहती है. अन्य वर्षों की तरह कहीं शासनादेश तो कहीं न्यायिक आदेशों द्वारा पटाखे प्रतिबंधित कर दिए गए. साथ ही खिलाड़ियों, अभिनेताओं और तमाम विज्ञापनों के माध्यम से दीपावली जिम्मेदारी से मनाने के संदेशों का तांता लगा रहा. इन संदेशों का निहित अर्थ यह है कि हिन्दू समाज अपने उत्सवों को लेकर गैर जिम्मेदार और अपरिपक्व है.
निरंतर प्रचार द्वारा दीपावली को प्रदूषण से इस प्रकार जोड़ दिया गया, मानो वर्ष भर के प्रदूषण का कारण केवल दीपावली के पटाखे हों. यह सोच कितनी निमरूल है, इसे आइआइटी कानपुर ने 2016 में अपने शोध द्वारा प्रमाणित किया था. इस शोध में दिवाली के पटाखों को दिल्ली के प्रदूषण के शीर्ष 15 कारकों में भी जगह नहीं मिली थी. इसी प्रकार एनजीटी और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्टों में भी दिल्ली के प्रदूषण में दीपावली के पटाखों का कोई प्रमुख योगदान होने की बात नहीं आई थी, परंतु चाहे सरकारें हों या पर्यावरणविद् या फिर एनजीओ और न्यायालय, प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए मात्र दीपावली के पटाखों पर रोक लगा कर सबने अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली. सड़कों की धूल, वाहनों का धुआं, इमारती निर्माण से जनित गर्द, औद्योगिक इकाइयों, कचरा तथा पराली जलाने से उत्पन्न धुआं, कोयला और फ्लाई एश वह मूल समस्या है, जो दिल्ली में साल भर प्रदूषण का कारण बनती है, परंतु दिवाली के पटाखों के अतिरिक्त इन कारकों पर किसी की चिंता नहीं दिखाई देती. पटाखों पर दुष्प्रचार का प्रभाव ऐसा है कि न्यायालय ने सबसे सुरक्षित माने जाने वाले उस ऑक्सीकारक बेरियम नाइट्रेट को प्रतिबंधित किया, जो सब्जियों में भी पाया जाता है. डब्ल्यूएचओ मानकों के अनुसार भी 700 माइक्रोग्राम बेरियम नाइट्रेट अनुमेय है और यह किसी भी देश में प्रतिबंधित नहीं है.
जाहिर है पटाखों जनित प्रदूषण असल चिंता नहीं है, बल्कि हिन्दू त्योहारों में दखल और हिन्दू समाज में अपराध बोध भरने के लिए उपयोग हो रहा है. जब ऐसे अभिनेता पटाखे न जलाने की अपील करते हैं, जो स्वयं आतिशबाजी करते या उसका आनंद लेते दिख जाते हैं तो इन अभियानों की वास्तविकता पता चल जाता है. न्यायिक और शासकीय हस्तक्षेप इसलिए भी आपत्तिजनक है, क्योंकि यह सिर्फ हिन्दू उत्सवों में ही देखने को मिलता है. जो शासन सड़कों पर नमाज या लाउडस्पीकर पर अजान रोकने में अक्षम रहा है, उसने हिन्दुओं के सबसे बड़े त्योहार का उल्लास कुचल दिया. कभी ‘आवश्यक धार्मिक आचरण’ तो कभी ‘धर्म के मूल सूत्र’ जैसे न्यायिक सिद्धांतों का हवाला देकर अन्य मजहबी विवादों में हस्तक्षेप से इन्कार करने वाले न्यायालय हिन्दू त्योहारों में न सिर्फ दही हांडी की ऊंचाई तय कर देते हैं, बल्कि भगवान अय्यप्पा के मूल नैष्टिक ब्रह्मचर्य व्रत को तोड़ने का फरमान भी दे देते हैं. न्यायपालिका के साथ-साथ एक्टिविस्ट, एनजीओ वर्ग की चिंता भी हिन्दू त्योहारों पर ही व्यक्त होती है. टीवी स्टूडियो से लेकर विद्यालयों तक दीपावली नसीहतों का त्योहार बन गया है. तुलनात्मक रूप से अपने सामाजिक जीवन में बेहद लचीले हिन्दुओं से अपेक्षा रहती है कि वे पर्वों पर भी आज्ञाकारी बच्चों जैसा आचरण कर दोगले उदारवाद की कसौटी पर खरे उतरते रहें.
यहां यह समझना आवश्यक है कि त्योहारों का हमारे सामाजिक जीवन में अर्थ क्या है? बर्ट्रेंड रसल ने इसे बहुत खूबसूरती से व्यक्त किया है. रसल के अनुसार, सभ्यता के क्रम विकास में मानव ने बहुत सी पाशविक प्रवृत्तियों को दबाया है, परंतु साथ ही इस प्रक्रिया ने शिष्टता के ऐसे मानक गढ़े हैं, जिसमें मूल मानवीय प्रकृति के सीधे-साधे मुक्त आचरण को भी दबाया गया है. पर्व और त्योहार हमें बिना शर्मिदा हुए अपने सरल, स्वच्छंद मूल प्राकृतिक आचरण को सीमित समय के लिए ही सही, पर वापस जीने का अवसर देते हैं. उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति ऑफिस से निकल कर बाजार में नृत्य करना शुरू कर दे तो वह अटपटा लगेगा, परंतु त्योहार के उल्लास में समूह के साथ वही नृत्य सहज ही नहीं, अच्छा भी लगता है.
त्योहार हमारे जीवन की नीरसता को तोड़ते हैं. उनके हर पहलू में तर्कसंगति और आधुनिकता के तौर तरीके ढूंढ़ना मूर्खता है, क्योंकि यह नियमित न होकर क्षणिक आचरण है. सभी परिपक्व समाज इस बात को भली-भांति समझते हैं. इसीलिए पश्चिम में टौमैटीनो जैसे आयोजन भी होते हैं और चुनिंदा मौकों पर जमकर आतिशबाजी भी. वहां शासन तंत्र भी समझता है कि प्रदूषण पर नियंत्रण वह चुनौती है, जिससे साल भर जूझकर ऐसा वातावरण दिया जाए, जिसमें लोग आतिशबाजी जैसे आयोजनों का आनंद ले सकें. भारतीय शासन तंत्र को भी चाहिए कि यदि दिल्ली जैसे शहरों में प्रदूषण बड़ी समस्या बना है तो उसके स्थायी समाधान खोजें. निश्चित ही ध्वनि मानकों का ध्यान रखा जाए, परंतु पटाखों के साथ हर प्रकार के ध्वनि प्रदूषण पर कार्रवाई हो. पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध वह तुगलकी फरमान है, जो न केवल सांस्कृतिक आघात है, बल्कि एक बड़े वर्ग को रोजगार से वंचित भी करता है. 2018 तक शिवकाशी के करीब आठ लाख पटाखा उद्योग कारीगरों का रोजगार छिन चुका था. यह संख्या पिछले तीन वर्ष में और भी बढ़ गई है. शासन में बैठे लोगों को चाहिए कि पटाखों पर व्यावहारिक और संवेदनशील रवैया अपनाएं. साथ ही वर्ष में एक बार आने वाले हिन्दू तीज-त्योहारों को त्योहार ही रहने दें, उन्हें शैक्षणिक प्रयोजन न बनाएं.
(लेखक इंडिक अकादमी के सदस्य एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
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November 12th 2021, 2:26 pm
हरियाणा – दो विवि में व्यक्तित्व विकास और वैदिक गणित का प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम
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नई दिल्ली. शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली ने हरियाणा के जे.सी. बोस विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय तथा अग्रवाल महाविद्यालय के साथ चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व विकास तथा वैदिक गणित के प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम संचालित करने हेतु अनुबंध किया गया है.
न्यास के सचिव अतुल कोठारी ने बताया कि शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास विश्वविद्यालय को पाठ्यक्रम निर्माण में सहायता करेगा. साथ ही विश्वविद्यालय न्यास द्वारा बनाई पाठ्य सामग्री को विद्यार्थियों को प्रदान करेगा. चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व विकास जैसे विषय आज समाज की आवश्यकता है, साथ ही वैदिक गणित जैसे विषय विद्यार्थियों के मन से गणित का भय दूर कर उन्हें गणित में पारंगत बनाते हैं. वैदिक गणित की पद्धति विद्यार्थियों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में भी कारगर साबित हुई है. निश्चित ही यह दोनों पाठ्यक्रम विद्यार्थियों के लिए लाभकारी रहेंगे. इस अवसर पर जे.सी. बोस विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दिनेश कुमार जी एवं अग्रवाल महाविद्यालय के प्राचार्य कृष्ण कांत जी उपस्थित थे.
बता दें शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व विकास व वैदिक गणित विषय का पाठ्यक्रम कक्षा 1 से लेकर कक्षा 12वीं तक तैयार किया गया है. साथ ही इन दोनों विषयों के सर्टिफ़िकेट कोर्स का पाठ्यक्रम भी न्यास द्वारा तैयार किया गया है. जो देश के सैकड़ों विद्यालय-महाविद्यालयों में संचालित है.
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October 30th 2021, 4:48 am
मध्यप्रदेश – भोपाल के दीए से रोशन होंगे अयोध्या और मथुरा जैसे पावन धाम
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भोपाल. जिले के स्वयं सहायता समूह की महिलाओं द्वारा बनाए गए इको फ्रेंडली दीए मथुरा और अयोध्या भेजे जाएंगे. दीपावली के पावन अवसर पर अयोध्या व मथुरा जैसे पावन धाम भोपाल के दीयों से रोशन होंगे. भोपाल कलेक्टर अविनाश लवानिया ने जानकारी प्रदान की.
प्रदेश में गठित स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं स्वावलंबन के साथ आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही हैं. राजधानी भोपाल में प्रत्यक्ष उदाहरण सामने आया है. यहां जिले की विभिन्न तहसीलों में चल रहे स्वयं सहायता समूह की महिलाओं द्वारा निर्मित दीपक दीपावली के पावन पर्व के लिए भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या और भगवान श्री कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा भेजे जाएंगे.
भोपाल कलेक्टर अविनाश लवानिया ने मीडिया को बताया कि जिले के विभिन्न ने स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने गोबर, मुल्तानी मिट्टी, गेहूं के आटे के मिश्रण से लाखों दीए बनाए हैं. महिलाओं द्वारा बनाए गए 15 लाख इको फ्रेंडली दीए उत्तर प्रदेश भेजे जाएंगे, जिनमें 11 लाख अयोध्या और 4 लाख मथुरा भेजे जाएंगे. उन्होंने कहा कि प्रशासन व सरकार के प्रयासों से स्वयं सहायता समूह से महिलाओं को जोड़ा गया था. स्वरोजगार के माध्यम से महिलाएं अब आत्मनिर्भर हो रही हैं. वह अपने कार्य को आगे बढ़ाएंगी और अपनी आजीविका का उपार्जन भी स्वयं कर सकेंगी.
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October 30th 2021, 4:48 am
राजस्थान सरकार हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करने का प्रयास न करे – विहिप
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जयपुर. राजस्थान से पुलिस महानिदेशक का पत्र सामने आने के पश्चात विश्व हिन्दू परिषद ने पत्र की निंदा करते हुए कहा कि राजस्थान सरकार हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करने का प्रयास न करे.
पुलिस महानिदेशक राजस्थान के परिपत्र क्रमांक 5458-83, 25 अक्तूबर, 2021 द्वारा राजस्थान धार्मिक भवन स्थल अधिनियम 1954 सार्वजनिक स्थलों पर धार्मिक उपयोग निषिद्ध करता है, का उल्लेख करते हुए सभी पुलिस थाना/कार्यालयों को निर्देशित करते हुए लिखा है कि आदेश का अक्षरश: पालन करवाया जाना सुनिश्चित करें.
विश्व हिन्दू परिषद आदेश का कड़ा विरोध किया है. विहिप राजस्थानके प्रदेश मंत्री सुरेश उपाध्याय ने कहा कि विहिप राजस्थान सरकार को आगाह करती है कि वह हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करने का प्रयास न करे और तुष्टीकरण की राजनीति को बंद करे. तथा आदेश को तुरंत प्रभाव से निष्प्रभावी बनाने की कार्यवाही की जाए. अन्यथा विश्व हिन्दू परिषद राजस्थान को राज्य सरकार द्वारा किए जा रहे तुष्टीकरण के विरुद्ध आंदोलन करने को मजबूर होना पड़ेगा.
देश के तीर्थ स्थल संपूर्ण हिन्दू समाज के आस्था के केंद्र हैं और प्रत्येक हिन्दू की आकांक्षा रहती है कि वह जीवन में एक बार अपने पवित्र तीर्थ स्थलों के दर्शन करें. सभी हिन्दू परिवारों के घरों में एक पूजा स्थल तो होता है, जहां वह अपनी दैनिक दिनचर्या प्रारंभ करने से पूर्व अपने धर्म के प्रति आस्था प्रकट करता है और सत्य के रास्ते पर चलने के लिए ईश्वर से आशीर्वाद मांगता है. ठीक इसी प्रकार से संपूर्ण देश के पुलिस थानों में, अस्पतालों में, यहां तक सचिवालय में भी कर्मचारी परिवार भाव से काम करते हैं. और वही व्यक्तिगत सहयोग करके छोटा सा पूजा स्थल बना लेते हैं. जहां वह अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक संपादित करने का ईश्वर से आशीर्वाद मांगते हैं. अत: इन पूजास्थलों की व्याख्या करना उचित नहीं होगा.
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October 30th 2021, 4:48 am
अ. भा. कार्यकारी मंडल प्रस्ताव – बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हुए उन्मादी इस्लामिक आक्रमण की अखिल भारत
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धारवाड़. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल बैठक में बांग्लादेश में हिन्दुओं पर इस्लामिक आक्रमण की निंदा की. बैठक में हिंसा को लेकर प्रस्ताव पारित किया गया है.
प्रस्ताव – बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हुए उन्मादी इस्लामिक आक्रमण की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल द्वारा भर्त्सना
अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल (अ. भा. का. मंडल) बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हुए हिंसक आक्रमणों पर अपना गहरा दुःख व्यक्त करता है और वहाँ के हिन्दू अल्पसंख्यकों पर लगातार हो रही क्रूर हिंसा और बांग्लादेश के व्यापक इस्लामीकरण के जिहादी संगठनों के षडयन्त्र की घोर निंदा करता है.
बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिन्दू समाज व हिन्दू मंदिरों पर हिंसक आक्रमण का क्रम बिना रोकटोक चल रहा है. गत समय में दुर्गा-पूजा के पवित्र पर्व काल में प्रारम्भ हुई इस साम्प्रदायिक हिंसा में अनेक निरपराध हिन्दुओं की हत्या हुई, सैकड़ों लोग घायल हुए और हज़ारों परिवार बेघर हो गए. गत दो सप्ताह में ही हिन्दू समाज की अनेक माता-बहनें अत्याचार की शिकार हुईं तथा मंदिरों व दुर्गा-पूजा पंडालों का विध्वंस हुआ.
निराधार झूठे समाचार प्रसारित कर साम्प्रदायिक उन्माद फैलाने वाले कुछ दोषियों की गिरफ़्तारी से यह स्पष्ट हुआ है कि कट्टरपंथी इस्लामिक शक्तियों का वर्तमान आक्रमण एक सुनियोजित षड्यन्त्र था. हिन्दू समाज को लक्षित कर बार-बार हो रही हिंसा का वास्तविक उद्देश्य बांग्लादेश से हिन्दू समाज का संपूर्ण निर्मूलन है, फलस्वरूप भारत विभाजन के समय से ही हिन्दू समाज की जनसंख्या में निरंतर कमी आ रही है.
विभाजन के समय पूर्वी बंगाल में हिन्दुओं की जनसंख्या जहाँ लगभग अठ्ठाईस प्रतिशत थी, वह घटकर अब लगभग आठ प्रतिशत हो गई है. जमात-ए-इस्लाम (बांग्लादेश) जैसे कट्टरपंथी इस्लामी समूहों द्वारा अत्याचारों के कारण विभाजन काल से और विशेषकर 1971 के युद्ध के समय बड़ी संख्या में हिन्दू समाज को भारत में पलायन करना पड़ा. बांग्लादेश निर्माण के उपरान्त आज भी वही तत्व सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ रहे हैं, जिसके कारण अल्पसंख्यक हिन्दू समाज में असुरक्षा की भावना उत्पन्न हुई है.
अ. भा. का. मंडल का यह मत है कि बांग्लादेश सरकार अपने ही देश के अल्पसंख्यक समाज के खिलाफ बढ़ रही हिंसक घटनाओं को रोकने हेतू कठोर कदम उठाये. सरकार यह भी सुनिश्चित करे कि हिन्दू विरोधी हिंसा के अपराधियों को कठोर दंड प्राप्त हो ताकि हिन्दू समाज में ऐसा विश्वास उत्पन्न हो कि बांग्लादेश में वे अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए सम्मानपूर्वक सुरक्षित जीवन जी सकते हैं.
अ. भा. का. मंडल मानवाधिकार के तथाकथित प्रहरी संगठनों और संयुक्त राष्ट्र संघ से संबंधित संस्थाओं के गहरे मौन पर चिंता व्यक्त करता है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आवाहन करता है कि वह इस हिंसा की निंदा करने के लिए आगे आए व बांग्लादेश के हिन्दू, बौद्ध व अन्य अल्पसंख्यक समाज के बचाव व सुरक्षा हेतु अपनी आवाज़ उठाए. हम यह भी आगाह करना चाहते हैं कि बांग्लादेश या विश्व के किसी भी अन्य भाग में कट्टरपंथी इस्लामिक शक्ति का उभार विश्व के शांतिप्रिय देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था और मानवाधिकार के लिए गम्भीर ख़तरा सिद्ध होगा.
अ. भा. का. मंडल भारत सरकार से भी यह अनुरोध करता है कि वे उपलब्ध सभी राजनयिक माध्यमों का उपयोग करते हुए बांग्लादेश में हो रहे आक्रमणों व मानवाधिकार हनन के बारे में विश्व भर के हिन्दू समाज एवं संस्थाओं की चिंताओं से बांग्लादेश सरकार को अवगत कराये ताकि वहाँ के हिन्दू और बौद्ध समाज की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके.
कट्टरपंथी हिंसा से पीड़ित बांग्लादेश के हिन्दू भाई-बहनों के साथ जुड़कर संपूर्ण सहयोग करने वाले इस्कॉन, रामकृष्ण मिशन, भारत सेवाश्रम संघ, विश्व हिन्दू परिषद एवं अनेक हिन्दू संगठनों-संस्थाओं की अ. भा. का. मंडल सराहना करता है. हम यह भी विश्वास दिलाते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित संपूर्ण हिन्दू समाज बांग्लादेश के हिन्दू और अन्य प्रताड़ित अल्पसंख्यकों के इस कठिन एवं चुनौतीपूर्ण समय में उनके साथ डटकर खड़ा है.
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October 30th 2021, 4:48 am
जयंती पर विशेष : भगिनी निवेदिता – भारतीयता की ओजमयी वाणी
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लवी चौधरी
भारत के चिंतन और दर्शन ने सुदीर्घकाल से विश्व जगत को स्पंदित किया है. पाश्चत्य जगत की भोगवादी चमक-धमक को छोड़कर स्वामी विवेकानंद का शिष्यत्व ग्रहण करने वाली मार्गरेट से भगिनी निवेदिता बनने की उनकी यह यात्रा न सिर्फ प्रेरणादायी है, बल्कि भारतीयता की ओजस्वी कहानी है. उन्होंने स्वामी विवेकानंद के आकर्षक व्यक्तित्व और सदाचार से प्रभावित होकर अपना देश छोड़ा, तथा उन्हीं के ज्ञान से पोषित होकर भारत को कर्मभूमि के रूप में वरण किया. एक शिक्षिका और लेखिका मार्गरेट से वह भगिनी निवेदिता के रूप में श्रेष्ठ आध्यात्मिक व सामाजिक कार्यकर्ता बन गईं.
विश्व में भारतीय संस्कृति की ध्वजा लहराने वाले स्वामी विवेकानन्द की शिष्या मार्गरेट नोबल का जन्म 28 अक्तूबर, 1867 को आयरलैंड में हुआ. उनके पिता सैमुअल नोबल एक पादरी थे. माँ मैरी हैमिल्टन एक सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षिका व लेखिका थीं. 1884 में एक स्थानीय स्कूल में बतौर शिक्षिका पढ़ाने लगीं. 1895 में मार्गरेट की सहेली ने एक भारतीय साधु से मुलाकात करवाने के लिए उन्हें आमंत्रित किया. मार्गरेट स्वामी विवेकानंद के अलौकिक व्यक्तित्व और विचारों से बहुत प्रभावित हुईं. स्वामी जी को समाज सेवा को प्रतिबद्ध निश्च्छल मार्गरेट में भारत की मातृशक्ति को जागृत करने का दैदीप्यमान व्यक्तित्व दिखा.
28 जनवरी, 1895 को मार्गरेट जन्मभूमि छोड़ हमेशा के लिए भारत आ गईं. भारत आने पर कोलकाता में उनके स्वागत के लिए स्वयं स्वामी जी उपस्थित थे. मार्गरेट ने भारत आने पर यह मान लिया था कि अब यही उनकी कर्मभूमि है और सेवाकार्य ही उनका परम लक्ष्य है. 25 मार्च, 1898 को भगवान शिव की विधिवत पूजा के बाद स्वामी जी ने आशीर्वाद दिया और मार्गरेट का नाम बदलकर निवेदिता रखा. भगिनी निवेदिता के जीवन को जब हम देखते हैं तो पता चलता है कि उन्होंने वेदांत को सीखा, अपनाया और जीया भी. इस क्रम में बंगाल में निरक्षरता के अँधेरे को मिटाकर विशेष रूप से महिला शिक्षा को भरपूर बढ़ावा दिया. 1899 में कोलकाता में प्लेग पीड़ितों की सेवा की और बाढ़ प्रभावितों की सेवा की. आजीवन अटल रहकर समर्पण भाव से जनता की सेवा में लग्न रहीं.
दीक्षा प्राप्त करने के बाद निवेदिता कोलकाता के बागबाज़ार में बस गईं. यहाँ पर उन्होंने लड़कियों के लिए एक विद्यालय प्रारंभ किया. लड़कियों के माता-पिता को उन्हें पढ़ने भेजने के लिए प्रेरित करती थीं. निवेदिता स्कूल का उद्घाटन स्वामी रामकृष्ण परमहंस की पत्नी मां शारदा ने किया था. निवेदिता को पता था – बाल विवाह जैसी कुरीतियों को खत्म करने के लिए लड़कियों को शिक्षित करना बहुत जरुरी है. धीरे-धीरे निवेदिता की लोकप्रियता बढ़ी तो उन्हें लोग “सिस्टर निवेदिता” के नाम से पुकारने लगे.
भगिनी निवेदिता ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी प्रभावी भूमिका निभाई. निवेदिता को स्पष्ट अनुभव हो चुका था कि ब्रिटिश शासन के अंत के बिना भारतीय एक आदर्श मानवीय जीवन नहीं जी सकते. देखा कि अंग्रेज़ सरकार किस तरह भारतीयों का शोषण कर रही है. भारत में अंग्रेजों के अत्याचारों को देख उनके विरुद्ध विचार, वाणी तथा कर्म से संघर्षरत हो गयी.
निवेदिता ने स्वतंत्रता की अलख जगाने के लिए विद्यालय को राष्ट्रीयता का केंद्र बनाया. बंकिमचन्द्र का गीत “वन्देमातरम” जो आजादी की लड़ाई का मंत्र था, वह पाठशाला का प्रार्थना गीत बन गया.
वर्ष 1905 में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया. स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद निवेदिता अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आन्दोलन में कूद पड़ीं.
अपने अंतिम समय में निवेदिता ने संपत्ति, नकद राशि तथा अपनी लेखन से मिले धन को बैलूर मठ को समर्पित कर दिया. उनकी आखिरी इच्छा यही थी कि इस धन का उपयोग भारत की महिलाओं को राष्ट्रीयता की शिक्षा देने में किया जाए.
13 अक्तूबर, 1911 भारत की बेटी, भारत में बालिका शिक्षा, अध्यात्म, देशप्रेम और समाजसेवा का अलख जगाने वाली स्वामी विवेकानंद जी की सुयोग्य व गुणी शिष्या का देहांत हो गया. आज भी उनकी समाधि पर लिखा है – यहाँ भगिनी निवेदिता चिरनिद्रा में सो रही हैं, जिन्होंने भारत के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया.
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October 30th 2021, 4:48 am
अ. भा. कार्यकारी मंडल बैठक धारवाड़ में प्रारम्भ
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धारवाड़. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक का आज धारवाड़ (कर्नाटक) में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी और सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने भारत माता के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर शुभारम्भ किया. बैठक में देशभर से सभी प्रांतों व क्षेत्रों के संघचालक, कार्यवाह, प्रचारक, अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य तथा कुछ विविध संगठनों के अखिल भारतीय संगठन मंत्रियों सहित लगभग 350 कार्यकर्ता भाग ले रहे हैं.
बैठक में संघ कार्य की वर्तमान स्थिति की समीक्षा, कार्य विस्तार और कार्यकर्ता विकास की योजना पर चर्चा होगी. हाल ही में बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हुई हिंसा पर भी प्रस्ताव पारित किया जाएगा.
बैठक के प्रारंभ में गत दिनों दिवंगत हुए महानुभावों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई. जिनमें प्रमुख संस्कार भारती के अखिल भारतीय महामंत्री श्री अमीर चंद, कन्नड़ लेखक श्री जी. वेंकट सुबहिया, स्वतंत्रता सेनानी व पत्रकार श्री एच. एस. दुरेस्वामी, प्रसिद्ध कवि डा. एच. सिद्धलंगैया, राजनीतिज्ञ श्री ऑस्कर फर्नांडीज, स्वामी अध्यात्मानंद जी, स्वामी ओंकारानंद जी, स्वामी अरुणागिरी जी, वरिष्ठ पत्रकार श्री श्याम खोसला, दैनिक जागरण के मालिक श्री योगेन्द्र मोहन गुप्ता, गीता प्रेस गोरखपुर के अध्यक्ष श्री राधेश्याम खेमका, प्रसिद्ध लेखक श्री नरेन्द्र कोहली, श्री राजेश सातव, राज्यसभा सांसद (कांग्रेस), अटोर्नी जनरल श्री सोली सोराब जी, पूर्व राज्यपाल श्री जगमोहन, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश श्री कल्याण सिंह, पत्रकार श्री रोहित सरदाना, श्री सुंदर लाल बहुगुणा (चिपको आंदोलन), अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी जी महाराज, हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री वीरभद्र सिंह हैं.
बैठक 30 अक्तूबर सायंकाल संपन्न होगी.
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October 30th 2021, 4:48 am
बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हमले हिन्दू समाज के निर्मूलन का योजनाबद्ध प्रयास – अरुण कुमार
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कार्यकारी मंडल ने की जिहादी संगठनों द्वारा बांग्लादेश के इस्लामीकरण के षड्यंत्र की निंदा
कट्टरपंथी इस्लामिक शक्ति का उभार शांतिप्रिय देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गम्भीर ख़तरा
संघ के कार्यकारी मंडल की बैठक में बांग्लादेश हिंसा को लेकर प्रस्ताव पारित
निधि समर्पण अभियान में 5.34 लाख गावों में 12.73 करोड़ परिवारों तक पहुंचे कार्यकर्ता
धारवाड़, 29 अक्तूबर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह अरुण कुमार जी ने बताया कि कार्यकारी मंडल की बैठक में बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हमलों को लेकर प्रस्ताव पारित किया गया है. बांग्लादेश में हिन्दू समाज पर आक्रमण अचानक घटित घटना नहीं है. फेक न्यूज के आधार पर साम्प्रदायिक उन्माद पैदा करने की कोशिश की गई है, ये हिन्दू समाज के निर्मूलन का योजनाबद्ध प्रयास था. उन्होंने बताया कि प्रस्ताव में हिन्दुओं पर हुए हिंसक आक्रमणों पर दुःख व्यक्त किया गया है और वहाँ के हिन्दू अल्पसंख्यकों पर लगातार हो रही क्रूर हिंसा और बांग्लादेश के व्यापक इस्लामीकरण के जिहादी संगठनों के षडयन्त्र की घोर निंदा की गई है.
प्रस्ताव में कहा गया है कि हिन्दू समाज को लक्षित कर बार-बार हो रही हिंसा का वास्तविक उद्देश्य बांग्लादेश से हिन्दू समाज का संपूर्ण निर्मूलन है, फलस्वरूप भारत विभाजन के समय से ही हिन्दू समाज की जनसंख्या में निरंतर कमी आ रही है. विभाजन के समय पूर्वी बंगाल में हिन्दुओं की जनसंख्या लगभग अठ्ठाईस प्रतिशत थी, वह घटकर अब लगभग आठ प्रतिशत रह गई है. जमात-ए-इस्लामी (बांग्लादेश) जैसे कट्टरपंथी इस्लामी समूहों द्वारा अत्याचारों के कारण विभाजन काल से, विशेषकर 1971 के युद्ध के समय बड़ी संख्या में हिन्दू समाज को भारत में पलायन करना पड़ा.
संघ ने मानवाधिकार के तथाकथित प्रहरी संगठनों और संयुक्त राष्ट्र संघ से संबंधित संस्थाओं के गहरे मौन पर चिंता व्यक्त की और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आवाहन किया कि इस हिंसा की निंदा करने के लिए आगे आए व बांग्लादेश के हिन्दू, बौद्ध व अन्य अल्पसंख्यक समाज के बचाव व सुरक्षा हेतु अपनी आवाज़ उठाए. बांग्लादेश या विश्व के किसी भी अन्य भाग में कट्टरपंथी इस्लामिक शक्ति का उभार विश्व के शांतिप्रिय देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था और मानवाधिकार के लिए गम्भीर ख़तरा सिद्ध होगा.
प्रस्ताव में हिंसा से पीड़ित परिवारों की सहायता के लिए इस्कॉन, रामकृष्ण मिशन, भारत सेवाश्रम संघ, विश्व हिन्दू परिषद एवं अनेक हिन्दू संगठनों-संस्थाओं की सराहना की गई है. कार्यकारी मंडल ने भारत सरकार से भी अनुरोध किया कि उपलब्ध सभी राजनयिक माध्यमों का उपयोग करते हुए बांग्लादेश में हो रहे आक्रमणों व मानवाधिकार हनन के बारे में विश्व भर के हिन्दू समाज एवं संस्थाओं की चिंताओं से बांग्लादेश सरकार को अवगत कराये ताकि वहाँ के हिन्दू और बौद्ध समाज की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके.
अरुण कुमार जी धारवाड़ (कर्नाटक) में आयोजित संघ के कार्यकारी मंडल की बैठक के दूसरे दिन प्रेस वार्ता में जानकारी प्रदान कर रहे थे.
उन्होंने कहा कि संघ की निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था प्रतिनिधि सभा है, साल में एक बार बैठक मार्च में होती है. दूसरी सांविधानिक संस्था कार्यकारी मंडल है, इसकी बैठक अभी यहां चल रही है. मार्च में होने वाली प्रतिनिधि सभा की बैठक में वर्ष भर का कैलेंडर बनाते हैं, और अखिल भारतीय कार्यकर्ताओं का प्रवास भी तय होता है. अक्तूबर की बैठक का एक काम होता है, वर्ष में अभी तक के कार्य की समीक्षा करना.
उन्होंने कहा कि श्रीराम जन्मभूमि निधि समर्पण अभियान में धन एकत्रित करना संघ का मुख्य उद्देश्य नहीं था. संघ का मानना था कि न्यास आवाहन कर रहा है और समाज के लोग देने ही वाले हैं. इस आंदोलन में पूरे समाज की भागीदारी रही है, तो इसलिए अब भी समाज के अधिकतम लोगों तक पहुंचने का लक्ष्य तय किया गया. और देश में 6.5 लाख (अनुमानित आंकड़ा) गांवों में से 5.34 लाख गांवों तक कार्यकर्ता पहुंचे, सभी नगरों की सभी बस्तियों तक पहुंचे. अभियान में 12.73 करोड़ परिवारों तक कार्यकर्ता पहुंचे. अभियान में केवल संघ के कार्यकर्ताओं ने काम किया ऐसा नहीं है, समाज में स्वयं प्रेरणा से बहुत बड़ी संख्या में लोग जुड़े. अभियान में 25 से 30 लाख महिला-पुरुष कार्यकर्ताओं ने सहभागिता की.
इसी प्रकार कोरोना काल में चुनौती भी बड़ी थी, और समाज से प्रत्युत्तर भी समग्र था. सब लोगों ने मिलकर काम किया, बहुत से नए लोग हमारे साथ जुड़े और हमारे साथ काम करना चाहते थे. इन लोगों को स्थायी रूप से अपने काम के साथ जोड़ें, ऐसा विचार मार्च की बैठक में हुआ था. इस बैठक में कार्य विस्तार की दृष्टि से इसकी भी समीक्षा हुई.
सह सरकार्यवाह ने कहा कि मार्च माह की बैठक में इन सभी लोगों को पर्यावरण संरक्षण, परिवार प्रबोधन, समरसता, सामाजिक सद्भाव के कार्य के साथ जोड़ने पर विचार हुआ था. ये चारों समाज की गतिविधि बने, इस दृष्टि से काम करने का तय किया था. इसे लेकर अभी तक हुए प्रयासों व अनुभवों की समीक्षा बैठक में हुई है. साथ ही देश स्वाधीनता के 75 वर्ष का उत्सव मना रहा है. स्वाधीनता के 75 वर्ष पर क्या-क्या कर सकते हैं, और क्या करना चाहिए, इसे लेकर भी बैठक में चर्चा व समीक्षा की गई है.
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October 30th 2021, 4:48 am
पाकिस्तान की जीत का जश्न मनाने वालों के खिलाफ एफआईआर होने पर भड़के आतंकी संगठन की धमकी
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नई दिल्ली. भारत पाकिस्तान टी-20 मैच में पाकिस्तान की जीत के बाद देश में अनेक स्थानों पर जश्न मनाया गया. कई जगह हुड़दंग भी हुआ, पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगे. इस दौरान SKIMS मेडिकल कॉलेज सहित कई स्थानों के वीडियो भी सामने आए. SKIMS में छात्र भारत विरोधी नारे लगा रहे हैं. घटना की संवेदनशीलता को देखते हुए कश्मीर पुलिस ने यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया है. इससे बौखलाए कट्टरपंथी गैर मुस्लिमों, गैर कश्मीरियों को निशाना बनाने के साथ एक छात्रा की फोटो शेयर करके उस पर पुलिस मुखबिर होने का आरोप लगा रहे हैं.
बात सिर्फ आरोप लगाने तक सीमित नहीं है. कट्टरपंथी जमात के साथ ही यूएलएफ जम्मू-कश्मीर सक्रिय हो गया है, जिसे आतंकी संगठन लश्कर का ही एक समूह बताया जाता है और गैर कश्मीरियों की हत्या में शामिल था. इस समूह ने 26 अक्तूबर को बयान जारी कर कहा – उन्हें खबर मिल गई है कि इन एफआईआर के पीछे किसका हाथ है. गैर स्थानीय कर्मचारी और छात्रों को चेतावनी दी जाती है कि वो ऐसी गतिविधियों में शामिल न हों.
बयान के अनुसार, “हम तत्वों को चेतावनी दे रहे हैं क्योंकि हम जानते हैं कि ये कौन हैं? 48 घंटों का समय दिया जाता है कि माफी माँग लें. वरना अंजाम भुगतना होगा…हम इन्हें पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि ये किसी गैर कश्मीरी गतिविधि में शामिल न हों. वरना हम ये फर्क नहीं करेंगे कि कौन क्या है? जिन भी गैर स्थानीय कर्मचारी और छात्रों ने डॉक्टर और छात्रों की थाना सौरा, करण नगर..में शिकायत दी है उन्हें चेतावनी दी जा रही है. हम सब देख रहे हैं. बाद में इल्जाम मत देना जो कहर तुम पर बरपेगा.”
अब्दुल्ला गाजी नाम के ट्विटर हैंडल से कई ट्वीट किए गए और मेडिकल छात्रा अनन्या जामवाल को टैग करते हुए दावा किया कि वो पुलिस की मुखबिर है. और SKIMS छात्रों के खिलाफ FIR और UAPA लगवाने की दोषी है. वह एक बाहरी डोगरा है जो इसी कॉलेज से मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई कर रही है.
गाजी ने अनन्या के विरुद्ध कई ट्वीट किए. इसके अलावा एक और ट्वीट में सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाली मोनिका लांघे को भी निशाना बनाया है.
इन्हीं ट्वीट को शेयर करते हुए अनन्या जामवाल ने कहा – “क्या ये आदमी इन आरोपों को सिद्ध कर सकता है कि ये मुझे क्यों धमकी दे रहा है.” अनन्या ने जम्मू-कश्मीर पुलिस, देश की राष्ट्रीय जाँच एजेंसी, गृहमंत्री, रक्षामंत्री और प्रधानमंत्री सहित कुछ लोगों को टैग करते हुए कहा कि वो डरा हुआ महसूस कर रही है. वह पूछती है – इन लोगों का मकसद क्या है?
डॉ. मोनिका लांघे ने कहा कि तू किसी गलतफहमी में है, याद कर ले कश्मीर भारत का हिस्सा है और तुझे याद करवाकर रखेंगे हम. जय भारत.
इनपुट साभार – पाञ्चजन्य
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October 30th 2021, 4:48 am
Patna Serial Blast case – एनआईए कोर्ट ने नौ आरोपियों को दोषी करार दिया
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नई दिल्ली. एनआईए विशेष न्यायालय (स्पेशल कोर्ट) ने पटना के गांधी मैदान ब्लास्ट मामले में नौ आरोपियों को दोषी करार दिया है. न्यायालय ने इस बहुचर्चित मामले में 10 आरोपियों में से एक को बरी कर दिया. न्यायालय ने दस आरोपियों में से नौ को दोषी करार दिया, जिनमें इम्तियाज अंसारी, हैदर अली, नवाज अंसारी, मुजमुल्लाह, उमर सिद्धकी, अजहर कुरैशी, अहमद हुसैन, फिरोज असलम, इफ्तेखार आलम शामिल हैं. दोषी करार दिए अपराधियों को सजा एक नवंबर को सुनाई जाएगी. सभी दोषी सिमी से संबंधित बताए जा रहे हैं. सभी 10 आरोपी पटना की बेऊर जेल में बंद हैं.
पटना में 27 अक्तूबर, 2013 को गांधी मैदान में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी रैली के दौरान धमाके हुए थे. भाजपा (BJP) की हुंकार रैली के दौरान सिलसिलेवार बम धमाकों के कारण भगदड़ मच गई थी. गांधी मैदान से पहले एक धमका पटना जंक्शन पर भी हुआ था. पटना में हुए इन सीरियल धमाकों में 7 लोगों की मौत हुई थी, वहीं करीब 89 लोग घायल हुए थे.
पटना के गांधी मैदान ब्लास्ट केस में NIA ने अगले दिन से ही जांच शुरू कर दी थी. और एक साल के अंदर 21 अगस्त, 2014 को कुल 11 अभियुक्तों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया था. इसके बाद NIA की टीम ने इस मामले में हैदर अली, नोमान अंसारी, मो. मुजिबुल्लाह अंसारी, इम्तियाज आलम, अहमद हुसैन, फकरुद्दीन, मो. फिरोज असलम, इम्तियाज अंसारी, मो. इफ्तिकार आलम, अजहरुद्दीन कुरैशी और तौफिक अंसारी को गिरफ्तार किया था.
पटना के गांधी मैदान ब्लास्ट का मास्टर माइंड हैदर अली और मुजिबुल्लाह था. वह भागने के प्रयास में था, लेकिन तब तक पुलिस मौके पर पहुंच गई और उसे दबोच लिया गया. पूछताछ के दौरान उसने जुर्म स्वीकार कर लिया. पूछताछ में बताया था कि वो अपनी पूरी टीम के साथ गांधी मैदान में हुंकार रैली को दहलाने के लिए पहुंचा था. गिरफ्तार आतंकी इम्तियाज से सख्ती से पूछताछ पर उसने कई नाम उगले. बोधगया ब्लास्ट मामले का खुलासा भी इसी आतंकी के बयान से हुआ था.
गांधी मैदान ब्लास्ट मामले में एनआईए कोर्ट ने 27 अक्तूबर को फैसला सुनाया. विशेष यह कि गांधी मैदान में धमाके वर्ष 2013 में 27 अक्तूबर को ही हुए थे. रिपोर्ट्स के अनुसार, रैली के दिन पटना में कुल 18 बम प्लांट किए गए थे. रैली स्थल गांधी मैदान में छह धमाके हुए थे.
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October 30th 2021, 4:48 am
मेडिकल कॉलेज में भारत विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों पर केस दर्ज, फिर झलका महबूबा का पाकिस्तान प्रेम
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जम्मू. भारत-पाकिस्तान टी-20 विश्व कप मैच में पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाने और पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाने वाले मेडिकल कॉलेज के छात्रों पर कार्रवाई शुरू हो गई है. पुलिस ने श्रीनगर के मेडिकल कॉलेज के छात्रों पर केस दर्ज किया है. पाकिस्तान की जीत पर जश्न के वीडियो सोशळ मीडिया पर वायरल हुए थे. पुलिस की कार्रवाई के बाद एक बार फिर पीडीपी मुखिया महबूबा मुफ्ती का पाकिस्तान प्रेम सामने आया है. महबूबा मुफ्ती बीते कुछ महीनों से लगातार पाकिस्तान का समर्थन करती नजर आ रही हैं.
पुलिस अधिकारियों ने बताया कि मेडिकल कॉलेज श्रीनगर के कर्णनगर स्थित हॉस्टल और शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल सांइसेज (सौरा) के हॉस्टल में टी-20 विश्वकप में पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाया गया और पाकिस्तान के समर्थन में नारेबाजी की गई थी.
सौरा पुलिस स्टेशन में दर्ज रिपोर्ट के अनुसार, हॉस्टल में रहने वाले एमबीबीएस और अन्य डिग्री कोर्स के विद्यार्थियों ने पटाखे फोड़कर और राष्ट्र विरोधी नारे लगाकर जश्न मनाया था. इसी तरह पुलिस स्टेशन कर्ण नगर में राजकीय मेडिकल कॉलेज श्रीनगर के हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थियों के खिलाफ भी गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम की धारा 13 के तहत मामला दर्ज किया गया है.
महबूबा का पाकिस्तान प्रेम
पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती अपना पाकिस्तान प्रेम एक बार फिर सामने आया है. महबूबा ने ट्वीट किया – पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाने में इतना गुस्सा क्यों? सरकार को यह पता लगाने का प्रयास करना चाहिए कि यह लोग नाराज क्यों हैं. कश्मीरी युवाओं के साथ गृहमंत्री की मन की बात ने पाकिस्तान की जीत का जश्न मनाने के लिए मेडिकल छात्रों के खिलाफ यूएपीए के तहत मामला दर्ज करने के साथ शुरुआत हुई है. यह पता लगाने की कोशिश करने की बजाय कि शिक्षित युवा पाकिस्तान के साथ पहचान क्यों चुनते हैं. भारत सरकार प्रतिशोधात्मक कार्रवाई का सहारा ले रही है. इस तरह के कदम उन्हें और दूर कर देंगे.
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October 30th 2021, 4:48 am
देश की छवि को धूमिल करने वालों को आइना दिखाना होगा – राज्यपाल जगदीप धनखड़
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जयपुर. पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने कहा कि मेरे लिए धानक्या आना तीर्थ यात्रा है. पश्चिम बंगाल में जो चुनौतियां और समस्याएं हैं, उनका सामना करने के लिए मैं यहां से उर्जित और ज्यादा ताकत के साथ जा रहा हूं. लड़ाई कितनी ही मुश्किल हो, लड़े बिना काम नहीं चलता. मैं उस भूभाग का राज्यपाल हूं, जहां लोगों को इस बात के लिए दंडित किया जाता है कि आपने प्रजातंत्र में अपनी मर्जी से वोट देने की हिमाकत कैसे की. जो लोगों को भ्रमित कर देश की छवि को धूमिल कर रहे हैं, उन्हें आगे आकर आइना दिखाना होगा.
राज्यपाल धनखड़ शनिवार को जयपुर के धानक्या ग्राम में पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति समारोह समिति की ओर से पं. दीनदयाल जी की 105वीं जयंती पर आयोजित व्याख्यान में बोल रहे थे. उन्होंने आह्वान किया कि मीडिया सही स्थिति का आंकलन करे. पत्रकारिता की सक्रियता से अफ्रीका के बहुत से देशों को आजादी मिली है, लेकिन पत्रकारिता की निष्क्रियता और बंधन प्रजातंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है.
उन्होंने कहा कि दीनदयाल ने जो बीज बोया था, उस पर समर्पित हुए बिना हम ना संस्कृति को बचा पाएंगे, ना आजादी को बचा पाएंगे और ना ही प्रजातंत्र को फलीभूत कर पाएंगे. पश्चिम बंगाल का कोई भूभाग नहीं है, जहां आजादी की लड़ाई में लोगों ने अपने जीवन की आहूति नहीं दी हो. लेकिन विडंबना है कि आजादी के बाद यह ज्ञान दिये जाने लगा कि आजादी कुछ ही लोगों ने दिलाई. यह सुअवसर है, हम आजादी के उन लोगों को पहचानें. उनके बारे में ज्ञान प्राप्त करें, जिन्होंने आजादी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया. उन्होंने कहा कि भारत के संविधान में उल्लेखित इंडिया देट इज भारत, इससे आगे नहीं बढ़ पाया है. जब तक हम मौलिक मुद्दों तक नहीं जाएंगे, तब तक आगे बढ़ना बहुत मुश्किल है.
पश्चिम बंगाल में मानवाधिकारों के हनन की ओर इशारा करते हुए राज्यपाल ने कहा कि मानवाधिकारों का सरंक्षण जरूरी है. अधिकारों का हनन हो तथा प्रशासन और न्यायालय से मदद नहीं मिले तो व्यक्ति कहां जाए. प्रशासन उन लोगों की मदद करता है, जो अधिकारों का हनन कर रहे हैं. मानवाधिकारों का हनन सुनियोजित षड़यंत्र है, जो खास राजनीतिक उपलब्धि के लिए किया जाता है. यह भारत के संविधान पर कुठाराघात है. पश्चिम बंगाल में एक वे लोग जो चैन की नींद सोते हैं और बेपरवाह हैं. उन्हें प्रशासन कुछ नहीं कहेगा. दूसरे वो जो एक पल भी नहीं सो पाते हैं, उनको डर लगता है.
उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री सीबीआई दफ्तर में धरना देती है और कहती है कि मुझे गिरफ्तार करो या इन्हें छोड़ो. यह घटना किसी अन्य राज्य में होती तो पता नहीं क्या हो जाता.
उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति हजारों साल पुरानी है, दुनिया में भारत को इज्जत के साथ देखा जाता है. यहां के प्रधानमंत्री जिस प्रकार का काम कर रहे हैं, उनका लोहा दुनिया मानती है.
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश संगठन महामंत्री चंद्रशेखर ने कहा कि दीनदयाल की जन्म स्थली स्मारक एक राष्ट्रीय तीर्थ रूप में विकसित हो रही है, यह भविष्य में समाज जागरण, सेवा, स्वाध्याय, स्वावलंबन और समरसता के केन्द्र के रूप में विकसित होगा. पं. दीनदयाल उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद देश के लिए समर्पित हो गए, वे प्रशासनिक सेवा में नहीं गए. वे विषमता से समता और भेदभाव से समभाव की ओर देश को ले जाना चाहते थे. भारत को फिर से खड़ा करना चाहते थे. भारत की प्रेरणाओं से भरा उनका जीवन था. दीनदयाल के लिखे अधिकांश प्रस्तावों पर भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार काम कर रही है. उन्होंने देश के लिए नूतन चिंतन दिया. एकात्म मानव दर्शन भारत के राष्ट्र की संकल्पना थी. दीनदयाल ने कहा शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समन्वयन का दर्शन ही एकात्मदर्शन है.
उन्होंने कहा कि आजादी के 75 साल का भारत हमें दिख रहा है, हम जानते हैं किस प्रकार हमें आजादी मिली. देश को आजादी दिलाने वाले नाम और अनाम अनगिनत योद्धाओं ने अपना बलिदान दिया है. आजादी का अमृत महोत्सव ऐसे बलिदानियों को स्मरण करने का अवसर है.
केन्द्रीय कला एवं संस्कृति मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने कहा कि आजादी के 75 वर्ष मनाने पर बनाई समिति की बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था – आजादी का अमृत महोत्सव ऐसा होना चाहिए, जिसमें विश्लेषण भी हो और चिंतन भी हो. उन्होंने उत्सव को आजादी का अमृत महोत्सव नाम दिया, इसमें भारतीयता की झलक स्पष्ट है. पंडित दीनदयाल ने कहा था – हमारा चिंतन भारतीयता के आधार पर होना चाहिए. इसी आधार पर उन्होंने एकात्म मानव दर्शन का सिद्धांत रखा. पंडित दीनदयाल स्मारक स्थल पर संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की ओर से भव्य ऑडिटोरियम का निर्माण कराया जाएगा.
पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति समारोह समिति के अध्यक्ष प्रो. मोहनलाल ने छीपा ने समिति के कार्यों और भविष्य की योजनाओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी. कार्यक्रम में पैरांलिपक में पदक विजेता अवनि लखेरा और देवेन्द्र झाझरिया का अभिनंदन किया गया. कार्यक्रम को जयपुर जिला प्रमुख रमा चौपड़ा ने भी संबोधित किया.
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October 1st 2021, 2:11 pm
1921 मलबार हिन्दू नरसंहार के सौ साल
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नई दिल्ली. 25 सितंबर, 2021 को चरखा म्यूजियम पार्क राजीव चौक में ‘1921 मलबार हिन्दू नरसंहार के सौ साल’ के अवसर पर मोपला रिबेलियन मार्टियर्स स्मारक समिति द्वारा प्रदर्शनी एवं श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया. केरल के मलबार में हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए बलिदान हुए बलिदानियों को याद किया गया. इस श्रद्धांजलि सभा में प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय जे. नंदकुमार जी, वरिष्ठ अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा, सांसद रमेश बिधूड़ी, राज्यसभा सांसद डॉ. विनय सहस्रबुद्धे तथा कपिल मिश्रा ने श्रद्धांजलि अर्पित की.
वरिष्ठ अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा जी ने कहा कि मार्क्सवादी इतिहासकरों ने इस वीभत्स हिन्दू नरसंहार, क्रूरता और भारतीय नारी के साथ हुए कुकृत्य और बलात्कार को, जमींदारों और अंग्रेजों के खिलाफ किसान आंदोलन के रूप में दिखाया. खलीफा आंदोलन जो सिर्फ इस्लाम और खलीफा के समर्थन में किया गया आन्दोलन था, उसे खिलाफत आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया गया. इतिहास के साथ यह नंगा और क्रूर व्यवहार और नहीं सहन किया जा सकता है. बहुत हुआ अब और नहीं. अगर भारत के इतिहास में घटित इस सच्चाई को 100 साल पहले ही दर्ज किया जा चुका होता तो उसके बाद की हजारों हिन्दू विरोधी हिंसा और दंगों रोका जा सकता था.
जे. नन्दकुमार जी ने एक विद्वान जार्ज संतायना के हवाले से कहा कि अगर आप अपने इतिहास को सही रूप में नहीं समझते और उसे सही परिप्रेक्ष्य में याद नहीं करते हैं तो वह इतिहास आप पर दोहरा दिया जाता है. इसलिए हमें अपने इतिहास को लेकर सावधान रहना है. उस इतिहास को दोहराने नहीं देना है. बल्कि उसे बदले बगैर चैन की सांस नहीं लेनी है. उन्होंने कहा 1921 का यह हिन्दू कत्लेआम पहला नहीं था. उस समय दंगों का एक पूरा सिलसिला चला, जिसमें लगभग 52 बड़े दंगे और 32 छोटे दंगे हुए. हिन्दुओं को पलायन करना पड़ा. उन्हें अपना घर और जमीन छोड़कर कोच्ची और त्रावणकोर की ओर पलायन करना पड़ा. उन्होंने दंगे से प्रभावित मलबार के इतिहास की सच्चाई पर प्रकाश डाला. उन्होंने आर.सी. मजूमदार जैसे इतिहासकार का ज़िक्र किया जो यह मानते थे कि इस हिंसा को समझने में कांग्रेस और गाँधी दोनों से भूल हुई. उस इतिहास को ठीक करने के लिये जे. नन्दकुमार ने केरल राज्य सरकार के समक्ष तीन मांगें रखीं –
- मोपला नरसंहार की स्मृति में संग्रहालय बनाया जाए.
- उन दंगाइयों का नाम स्वतंत्रता सेनानी की सूची से निकाला जाए.
- उन दंगाईयों को दी जाने वाली सरकारी सुविधाएं पेंशन और पद से वंचित किया जाए.
कपिल मिश्रा ने कहा कि दरअसल 100 साल पहले हिंदुओं पर किये गए अत्याचार और नरसंहार को वामपंथी मार्क्सवादी इतिहासकारों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कहकर उसे राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ दिया था. आज उस गलती को ठीक करने का दिन आ गया है. इतिहास में की गई गलती अब और बर्दाश्त नहीं की जाएगी. हम उस इतिहास को बदलकर ही दम लेंगे. आगे की पीढ़ी वामपंथियों द्वारा लिखा गया गलत इतिहास नहीं पढ़ेगी. फ़र्जी इतिहासकारों और दंगाइयों का और महिमामंडन नहीं होगा. हम संग्रहालय या स्मारक तो बनाएँगे ही साथ ही अपनी स्मृतियों में भी उन अमर बलिदानियों को सदैव याद रखेंगे.
राज्यसभा सांसद विनय सहस्रबुद्धे ने कहा कि आज का आयोजन विस्मृत इतिहास के अध्यायों को उजागर करने का सराहनीय प्रयास है. देश को विभाजन की ओर ले जाने वाली गंगोतरी मालवा से ही प्रवाहित हो गयी थी, जिसे अवरुद्ध कर देश को सही रास्ते पर लाने की जरुरत है. यह आयोजन प्रतिशोध के लिए नहीं, बल्कि उन वीरों को याद करने और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए है. जिन्होंने हिन्दू हित की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी. हम जनतंत्र में यकीन रखते हैं. लेकिन जनतंत्र का गला घोटने वालों का साथ देना गलत है. अतीत में मार्क्सवादी इतिहास लेखकों ने षड्यंत्रवश इतिहास के जिन पन्नों को गायब कर दिया, हम उसे फिर से जोड़ेंगे.
हम पाठ्य पुस्तकों में उपेक्षित वीरों को स्थान देंगे, साथ ही मोपला के बलिदानियों को जिन्होंने प्राण दे दिए लेकिन धर्मांतरण स्वीकार नहीं किया, उनके अमूल्य योगदान को उचित स्थान दिलाएंगे. जिससे आगे आने वाली पीढ़ी उन्हें जान सके.
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October 1st 2021, 2:11 pm
प्रवास के दूसरे दिन प्रचारकों के साथ बैठक में संघ कार्य विस्तार पर चर्चा
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जम्मू. जम्मू कश्मीर प्रवास के दूसरे दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने शुक्रवार सुबह से केशव भवन में प्रचारकों के साथ बैठक की. बैठकों में संघ कार्य विस्तार को लेकर चर्चा की. उन्होंने संघ में पूर्णकालिक कार्यकर्ता एवं शाखाओं की संख्या बढ़ाने का आह्वान किया. सरसंघचालक जी ने प्रचारकों से जम्मू कश्मीर प्रांत में कोरोना की स्थिति व संघ के माध्यम से हो रहे सेवा कार्यों की जानकारी ली. साथ ही संभावित तीसरी लहर से सावधानी के मद्देनजर योजना एवं प्रशिक्षण की आवश्यकताओं पर भी चर्चा की.
बैठकों में सभी प्रचारकों ने अपने-अपने क्षेत्र में संघ कार्य की वर्तमान स्थिति से सरसंघचालक जी को अवगत कराया. प्रचारकों ने कोरोना की दूसरी लहर के दौरान संघ स्वययंसेवकों द्वारा समाज के लिए किये गये कार्यों का उल्लेख किया. प्रचारकों के साथ बैठकें पूर्णतया संगठनात्मक कार्यों पर केन्द्रित रहीं.
बैठकों में विभिन्न विषयों की जानकारी साझा करने के साथ प्रचारकों ने सरसंघचालक भागवत जी से कई जिज्ञासाओं का समाधान भी प्राप्त किया. इस दौरान सरसंघचालक ने शताब्दी वर्ष आने से पूर्व संघ कार्य की गति को बढ़ाने की बात कही. शाखाओं के माध्यम से स्वयंसेवक की पहुंच हर घर तक बने.
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने बैठक में चर्चा करते हुए कहा कि धर्म संस्कृति एवं समाज के सर्वांगीण विकास को पूर्ण करने का दायित्व हमारा है. इस दायित्व को पूरा करने के लिए हम सभी को मनुष्य निर्माण के कार्य में लग जाना चाहिए. समस्याओं के समाधान के लिए ऐसे सामर्थ्यवान स्वयंसेवक खड़े करने हैं, जो परिस्थिति के साथ स्वयं की भूमिका को तय करने के लिए तैयार रहें. बैठक में उन्होंने वर्तमान विकास कार्यों के साथ आगामी वर्ष के कार्यक्रमों की भी समीक्षा की.
दृष्टि कन्या छात्रावास की छात्राओं से भेंट
शुक्रवार सुबह कुछ समय के लिए सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने सेवा भारती द्वारा संचालित दृष्टि कन्या छात्रावास की छात्राओं से भेंट की और उनसे वार्तालाप के दौरान उनकी शैक्षणिक गतिविधियों की जानकारी ली. दृष्टि छात्रावास का पूरा नाम जनक मदान कन्या छात्रावास है. छात्रावास की शुरुआत 2012 में 7 कन्याओं के साथ जम्मू जिले के पौनीचक क्षेत्र में की गई थी. वर्तमान में यहां 24 छात्राएं अपनी शिक्षा ग्रहण कर रही हैं. छात्रावास का उद्देश्य छात्राओं को शिक्षा देने के साथ-साथ अच्छे संस्कार देने का भी है ताकि वह अपने समाज में एक अच्छा काम कर सके और एक अच्छा जीवन व्यतीत कर सकें. जब पूरा देश कोरोना से जूझ रहा था, उस समय छात्राओं ने अपना सहयोग देने के लिए अपने हाथों से मासक बनाकर वितरित किए थे.
कोरोना काल की दूसरी लहर के दौरान जम्मू कश्मीर में सेवा कार्य
हेल्पलाइन सेंटर्स 140 स्थानों पर स्थापित किए गए थे. इन पर 1600 फोन कॉल आई और 826 लोगों की समस्याओं का समाधान किया गया. इनमें 307 कार्यकर्ता जुटे थे. प्रशासन का स्वयंसेवकों ने 57 स्थानों पर सहयोग किया और इसमें 282 कार्यकर्ताओं का योगदान रहा. इसमें लाभार्थियों की संख्या 8962 रही. संघ की योजना से 15 शहरों में आइसोलेशन केंद्रों की स्थापना, बैड संख्या 261, सेवित जन 38 और ऑक्सीजन कंसट्रेटर 100 उपलब्ध करवाए गए. डॉक्टरों की हेल्पलाइन के जरिए 16 स्थानों पर 88 डाक्टरों की संख्या से सेवाएं देते हुए 162 लोगों को लाभ पहुंचाया. 17 स्थानों पर 10420 भोजन के पैकेट, 53 स्थानों पर रक्तदान के जरिए 163 यूनिट उपलब्ध करवाए गए. 186 लोगों को एंबुलेंस सेवा दी गई. 29 स्थानों पर आयुष 64 वितरण केंन्द खुले. 18 प्रांत स्तर की संस्थाओं को भी सेवा काम से जोड़ा गया है. 250 लोगों को ऑक्सीजन सिलेन्डर उपलब्ध कराया गया.
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October 1st 2021, 2:11 pm
इमरान का नया पाकिस्तान – हकीम सरदार सतनाम सिंह की गोली मारकर हत्या
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पाकिस्तान में लंबे समय से अल्पसंख्यक समुदाय के लोग कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं. हिन्दू-सिक्ख-ईसाई समुदाय के लोगों को अगवा करना, उनसे मारपीट करना, उनके घर-बस्ती जलाना या बर्बर ईशनिंदा कानून के शिकंजे में फंसा देना…. इमरान खान के ‘नए पाकिस्तान’ की असलियत को पेशावर में दिनदहाड़े एक सिक्ख हकीम सतनाम सिंह की हत्या ने फिर से दुनिया के सामने उजागर कर दिया है.
30 सितम्बर को पाकिस्तान के पेशावर शहर में अज्ञात बंदूकधारियों ने सतनाम सिंह की उनके क्लीनिक में घुसकर गोली मारकर हत्या कर दी. सतनाम एक हकीम थे. मौके पर पहुंची पुलिस ने मामले पर कार्रवाई तो शुरू कर दी है, लेकिन किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है. मौके पर पहुंचने के बाद पुलिस ने बताया कि हकीम सरदार सतनाम सिंह पर अज्ञात बंदूकधारियों ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं. चार गोली लगने के बाद सतनाम सिंह ने मौके पर ही दम तोड़ दिया. उनकी हत्या करने के बाद हत्यारे वहां से फरार हो गए.
पेशावर की चारसद्दा रोड पर हकीम सरदार सतनाम सिंह वर्षों से अपना क्लीनिक चला रहे थे. लोग हैरान हैं, किसी को समझ नहीं आ रहा है कि आखिर उनकी हत्या क्यों की गई है. सतनाम सिंह का किसी से कोई वैर भाव भी नहीं था.
घटना को लेकर पाकिस्तान के हिन्दू-सिक्ख और अन्य अल्पसंख्यक समुदाय में जबरदस्त आक्रोश है. घटना ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के उस वादे की भी पोल खोल दी है कि जो उन्होंने पाकिस्तान के अल्पसंख्यक समुदाय से किया था कि वे उनकी सुरक्षा का हर तरह से ख्याल रखेंगे. लेकिन, असल में पाकिस्तान में लगभग रोज ही अल्पसंख्यकों को कट्टरपंथी निशाना बना रहे हैं. पेशावर में हकीम सतनाम सिंह की हत्या ने एक बार फिर से पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय वालों दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति को रेखांकित किया है.
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October 1st 2021, 2:11 pm
सिविल सेवा में चयनित विद्या भारती के पूर्व छात्र का सम्मान
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चूरू. चूरु के रतनगढ़ रोड स्थित आदर्श विद्या मंदिर में गुरुवार को सिविल सेवा में चयनित विद्यालय के पूर्व छात्र गौरव बुडानिया का प्रशस्ति पत्र तथा दुपट्टा पहनाकर सम्मान किया गया. विद्यालय के प्रधानाचार्य किशनलाल सैनी ने गौरव की प्रारंभिक शिक्षा, उसकी उपलब्धियां तथा उसकी प्रभावी गतिविधियों पर प्रकाश डाला.
गौरव ने कहा कि विद्या मंदिर में स्वयं पर तथा अपने कार्य पर विश्वास करना सिखाया जाता है एवं राष्ट्र के प्रति निष्ठा तथा प्रेम की शिक्षा दी जाती है. उसने रेल के इंजन का उदाहरण देते हुए बताया कि हमें अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एकाग्रचित्त होकर परिश्रम करना चाहिए. उसने अपनी सफलता का श्रेय विद्यालय के सभी गुरुजनों को तथा अपने स्वर्गीय ताऊजी को दिया.
इस अवसर पर विद्या भारती के प्रांत मंत्री शैलेंद्र शर्मा, प्रांत सचिव अशोक पारीक सहित प्रबंधन के सदस्य व अध्यापक उपस्थित रहे.
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October 1st 2021, 2:11 pm
चार दिन के प्रवास पर जम्मू पहुंचे सरसंघचालक मोहन भागवत
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जम्मू. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी वीरवार दोपहर करीब 2:00 बजे जम्मू के अंबफला स्थित केशव भवन में पहुंचे. वे चार दिन के प्रवास पर आए हैं. सरसंघचालक जम्मू कश्मीर प्रांत के पदाधिकारियों के साथ विभिन्न विषयों पर चर्चा करेंगे. हर वर्ष प्रांत पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं के साथ समीक्षा बैठक आयोजित की जाती है. इसी क्रम में जम्मू कश्मीर प्रांत की बैठकें तय हुई हैं. जिसमें सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी, पदाधिकारी एवं प्रचारकों से साल भर के कार्यों पर चर्चा करेंगे तथा आगामी कार्यक्रमों पर प्रकाश डालेंगे.
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सरसंघचालक जी विभिन्न बैठकों का क्रम 01 अक्तूबर से प्रारंभ होगा. 02 अक्तूबर को जम्मू विश्वविद्यालय के जोरावर सिंह सभागार में प्रबुद्धजनों की विचार गोष्ठी को संबोधित करेंगे. 03 अक्तूबर को सरसंघचालक जी जम्मू कश्मीर में मंडल व बस्ती अनुसार एकत्रीकरण के अवसर पर स्वयंसेवकों को ऑनलाइन माध्यम से संबोधित करेंगे.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी वीरवार दोपहर करीब 2:00 बजे जम्मू के अंबफला स्थित केशव भवन पहुंचे.
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सरसंघचालक जी विभिन्न बैठकों का क्रम 01 अक्तूबर से प्रारंभ होगा. pic.twitter.com/igYBHEp04X— VSK BHARAT (@editorvskbharat) September 30, 2021
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October 1st 2021, 2:11 pm
सतना की उन्नतशील महिला कृषक साधना तिवारी को जवाहरलाल नेहरू कृषक फैलो सम्मान-2021
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चित्रकूट. दीनदयाल शोध संस्थान कृषि विज्ञान केंद्र, सतना के तकनीकी मार्गदर्शन में कृषि के क्षेत्र में किये जा रहे अभिनव नवाचारों के लिए ग्राम माधवगढ़ तहसील रघुराजनगर जिला सतना की साधना तिवारी को जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर के 58वें स्थापना दिवस पर प्रतिष्ठित पुरस्कार कृषक फैलो सम्मान-2021 से सम्मानित किया जाएगा.
कृषक फैलो सम्मान 2021 के लिए चयनित साधना तिवारी ने कृषि विज्ञान केंद्र मझगवां के तकनीकी मार्गदर्शन में अंगीकृत कृषि प्रणाली में दलहन, तिलहन, धान्य फसलों के साथ फलोद्यान, पशुपालन, मुर्गीपालन, मधुमक्खी पालन का समावेश करते हुए पर्यावरण सुरक्षा पर भी ध्यान केन्द्रित किया है. प्रक्षेत्र पर उपलब्ध जैव कचरे से वर्मीकम्पोस्ट का उत्पादन कर जैविक खेती की ओर अग्रसर है. उत्पादन लागत में कमी एवं उपलब्ध संसाधनों का उचित प्रबंधन कर जोखिम को कम करने में सफलता अर्जित की है.
कृषकों के उत्पाद का उचित मूल्य मिल सके इस हेतु सोहावल कृषक उत्पादक संगठन का भी गठन किया गया है. उपरोक्त कार्य हेतु जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर द्वारा कृषक फैलो सम्मान-2021 से सम्मानित करने के लिए चयनित किया गया है.
कृषि विज्ञान केंद्र मझगवां द्वारा भारतरत्न राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख के ध्येय को साकार करने हेतु सतना जिले के किसानों को अग्रणी एवं उन्नतशील, समृद्ध कृषक बनाने हेतु तकनीकी सहयोग एवं नवाचार के लिए प्रेरित किया जाता है.
साधना तिवारी केवीके मझगवां-सतना से जुड़कर कृषि के क्षेत्र में जिले के कृषकों एवं महिला कृषकों के लिए बेहतर उदाहरण साबित हो रही है. इसके अतिरिक्त दमोह जिले के मनोज कुमार पटेल एवं बैतूल जिले के राजकुमार सिरोरिया को भी चयनित किया गया है. जिन्हें जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के 58वें स्थापना दिवस पर 01 अक्तूबर, 2021 को सम्मानित किया जाएगा.
साधना की उपलब्धि के लिए दीनदयाल शोध संस्थान के संगठन सचिव अभय महाजन एवं कोषाध्यक्ष वसंत पंडित तथा कृषि विज्ञान केंद्र के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. राजेंद्र सिंह नेगी सहित केवीके मझगवां के सभी वैज्ञानिकों ने बधाई देते हुए उनको आगे भी कृषि क्षेत्र में विशेष योगदान को आगे बढ़ाने एवं कृषि के क्षेत्र में महिलाओं को भी विशेष रूप से प्रेरित करने हेतु शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की.
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October 1st 2021, 2:11 pm
‘हिन्दुत्व’ में इज्म नहीं हो सकता – जे. नंदकुमार
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पटना. प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे. नंदकुमार जी ने कहा कि हिन्दुत्व का तात्पर्य उन तत्वों से है, जिनके कारण कोई हिन्दू कहलाता है. हिन्दुइज्म शब्द गढ़ने वालों का मुख्य उद्देश्य हिन्दुओं को विभाजित रखना है. हिन्दू कभी ‘इज्म’ में नहीं आ सकता. ‘इज्म’ एक सीमा में बंधी हुई विचारधारा है. जैसे इस्लाम के लिए कुरान अपने आप में परिपूर्ण है, उसमें किसी भी तरह का कोई बदलाव नहीं किया जा सकता और इसी के आधार पर व्यवस्थाओं को चलाने का दम्भ रखा जाता है. ऐसे कुछ और मजहब भी हैं. लेकिन, हिन्दू पद्धति में सबका चिंतन किया जाता है एवं देश-काल-परिस्थिति के अनुसार उसमें संशोधन भी होते रहते हैं. भारत के सन्यासी एवं ऋषि-मुनियों ने संपूर्ण विश्व के कल्याण का कार्य किया.
पटना के बिहार विधान परिषद् सभागार में 27 सितंबर को अपनी पुस्तक ‘बदलते दौर में हिन्दुत्व’ के विमोचन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि ‘खलीफेत’ शब्द को खिलाफत बना दिया गया. यह षड्यंत्र टर्की के विवाद को भारतीय स्वाधीनता आंदोलन से जोड़ने के लिए किया गया. इसका उद्देश्य स्वतंत्रता सेनानियों में एक भ्रम पैदा कर पूरे संघर्ष की पृष्ठभूमि को बदलने की कोशिश थी. इसी का नतीजा था कि देश का विभाजन हुआ.
विमोचन कार्यक्रम को बिहार विधान परिषद् के सभापति अवधेश नारायण सिंह, बिहार के उप मुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद, प्रज्ञा प्रवाह के क्षेत्रीय संयोजक रामाशीष सिंह इत्यादि ने भी संबोधित किया. पुस्तक का परिचय पटना विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक गुरु प्रकाश ने दिया. कार्यक्रम में मंच संचालन प्रज्ञा प्रवाह के प्रांत संयोजक कृष्णकांत ओझा ने किया.
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October 1st 2021, 2:11 pm
राजस्थान में बाल विवाह को स्वीकृति?
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राजस्थान विधानसभा में पारित विवाह पंजीकरण संशोधन विधेयक चर्चा में है. विधेयक की धारा 8 पर विवाद है. इसमें कहा गया है कि शादी के वक्त लड़की की उम्र 18 साल और लड़के की उम्र 21 साल से कम है तो उनके माता-पिता या अभिभावकों को तीस दिन के अंदर इसकी सूचना पंजीकरण अधिकारी को देनी होगी. इसी संशोधन को लेकर विवाद है. भारत का कानून कहता है कि अगर 21 साल की उम्र से पहले लड़के और 18 साल की उम्र से पहले किसी किसी लड़की का विवाह होता है तो उसे बाल विवाह माना जाएगा, और भारत में बाल विवाह पर प्रतिबंध है. इस पर सजा का भी प्रावधान है.
अब सवाल उठता है कि जब देश में बाल विवाह पर प्रतिबंध है तो इसका रजिस्ट्रेशन क्यों? क्या राजस्थान सरकार का कदम बाल विवाह को बढ़ावा देने वाला नहीं होगा? राजस्थान में विपक्ष के साथ ही बाल और महिला अधिकारों से जुड़े संगठन भी इसका विरोध कर रहे हैं. यहां तक कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने भी आपत्ति जताई है.
आयोग के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने तो यहां तक कह दिया है कि जरूरत पड़ी तो वह सुप्रीम कोर्ट तक भी जाएंगे. एनसीपीसीआर ने इस संबंध में राजस्थान के राज्यपाल से भी बात की है. कानूनगो का कहना है कि इस कानून से बाल विवाह के साथ ही बाल अपराध को भी बढ़ावा मिलेगा. यहां विवाह नहीं, बल्कि अपराध का पंजीकरण करने की बात हो रही है. सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह बच्चों के अधिकारों का संरक्षण करे, लेकिन राजस्थान के विधि निर्माताओं ने इस तरह का कृत्य किया है जो संविधान के परे है. महात्मा गांधी जी ने ‘यंग इंडिया’ में लिखा था कि लड़कियों पर इससे बड़ा जुल्म नहीं हो सकता कि उनका विवाह अल्प आयु में कर दिया जाए. उनका खुद का बाल विवाह हुआ था और बाल विवाह का उनसे ज्यादा मुखर विरोध किसी ने नहीं किया होगा. उन्होंने कई बार यह बात स्वीकार की कि बा के साथ तमाम अन्यायों में एक अन्याय यह भी शामिल है कि उनका बाल विवाह हुआ.
क्या कहता है कानून
बाल विवाह निषेध अधिनियम किसी भी रूप में बाल विवाह को प्रतिबंधित करता है. राजस्थान में विवाह पंजीकरण के संशोधित विधेयक की धारा 8 न केवल कानून की दृष्टि से, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी ठीक नहीं है. यह प्राकृतिक न्याय के भी खिलाफ है.
बच्चों के साथ न करें राजनीति
सरकार बच्चों को राजनीति में न लाए. बच्चों के साथ छल करने का काम न करे. क्या सरकार अपराध के पंजीयन का काम करने जा रही है. जो भी इस तरह की शादी का संपादन कराएगा तो उसे दो साल की जेल होगी. यह गैर जमानती अपराध है. इस तरह का कानून बनाकर आप अपराध करने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं. इस तरह के सारे मामले न्यायालय में आएंगे. आरोपी कोर्ट से कहेगा कि विवाह का पंजीकरण हुआ है तो अपराध कैसे होगा. सरकार ने इसे मान्यता दी है. इस तरह तो अपराधी बच जाएगा, न कि उसे सजा मिलेगी. राजस्थान सरकार तुष्टीकरण की राजनीति कर रही है. वह एक वर्ग को खुश रखना चाहती है.
शर्म से झुक जाता है सिर
एनसीपीसीआर के अध्यक्ष ने कुछ केस स्टडी साझा की. उन्होंने बताया कि राजस्थान के चाइल्ड केयर सेंटर में नाबालिग बच्चियां अपने बच्चों के साथ रह रही हैं, यह देखकर हमारा सिर शर्म से झुक जाता है. हमें हर बच्चे को बाल अधिकार दिलाना है. बाल अपराध जड़ से खत्म होना चाहिए. एक बच्ची को त्रिपुरा से राजस्थान लाया गया. उसे राजस्थान में बेचा गया और उसका विवाह कराया गया. उसका गर्भपात हुआ. यह सारी बात आयोग के संज्ञान में तब आई जब उच्च न्यायालय ने नोटिस भेजा. उस बच्ची के अभिभावकों ने उसे साथ रखने से मना कर दिया. इस तरह के कृत्यों की कड़े शब्दों में निंदा की जाए तो भी कम है.
पॉक्सो कानून बच्चों के साथ शारीरिक संबंध को यौन हिंसा की श्रेणी में रखता है. 18 साल से पहले बच्चे शारीरिक संबंध नहीं बना सकते है. यह अपराध है. बाल विवाह का पंजीकरण करने से बच्चों के साथ दुष्कर्म होगा. राजस्थान के राज्यपाल को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के विचार से अवगत करा दिया गया है. आयोग यह काला कानून लागू नहीं होने देगा. जरूरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट भी जाएंगे.
बाल विवाह के 750 से अधिक मामले रिपोर्ट हुए हैं. जमीनी स्तर पर तो इससे कहीं अधिक मामले होंगे. बाल विवाह के पंजीकरण का कानून जमीनी स्तर पर काम कर रहे अधिकारी का मनोबल तोड़ देगा. राजस्थान सरकार राजा राममोहन राय के प्रयासों, महात्मा गांधी के सपनों, ज्योतिबा फुले के संघर्ष को व्यर्थ करने का काम कर रही है.
राजस्थान सरकार का तर्क
राजस्थान सरकार का कहना है कि बाल विवाह के पंजीकरण से इस तरह के विवाह को कानूनी मान्यता नहीं दी गई है. यह सिर्फ पंजीकरण है. कार्रवाई के लिए अधिकारी स्वतंत्र हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि सभी तरह के विवाह का पंजीकरण होना चाहिए.
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October 1st 2021, 2:11 pm
सर्वोच्च न्यायालय की तल्ख टिप्पणी, आपने पूरे शहर का गला घोंट दिया है
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नई दिल्ली. दिल्ली बॉर्डर पर चल रहे आंदोलन को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी की. न्यायालय ने कहा कि आपने पूरे शहर का गला घोंट दिया है और अब आप शहर के भीतर आना चाहते हैं. एक समूह ‘किसान महापंचायत’ ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर दिल्ली के जंतर-मंतर पर ‘सत्याग्रह’ की इजाजत मांगी थी. इसी पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने तीखी टिप्पणियां कीं. सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जब किसान संगठनों ने पहले ही विवादित कृषि कानूनों को चुनौती देते हुए न्यायालय का रुख किया है, तब कानूनों के खिलाफ आंदोलन को जारी रखने का क्या तुक है.
जस्टिस एएम खानविलकर ने कहा, ‘सत्याग्रह का क्या तुक है. आपने कोर्ट का रुख किया है. अदालत में भरोसा रखिए. एक बार जब आप अदालत पहुंच गए तब प्रोटेस्ट का क्या मतलब है? क्या आप ज्यूडिशियल सिस्टम के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं? सिस्टम में भरोसा रखिए.’
जस्टिस खानविलकर ने कहा, ‘आपने पूरे शहर का दम घोंट दिया है और अब आप शहर के भीतर आना चाहते हैं. आस-पास रहने वाले क्या प्रोटेस्ट से खुश हैं? यह सब रुकना चाहिए. आप सुरक्षा और डिफेंस पर्सनल को रोक रहे हैं. यह मीडिया में है. यह सब कुछ रुकना चाहिए. एक बार जब आप कानूनों को चुनौती देने के लिए कोर्ट आ चुके हैं तो प्रोटेस्ट का कोई तुक नहीं है.’
किसान महापंचायत की तरफ से कहा गया कि सड़क उन्होंने ब्लॉक नहीं की है. इस पर न्यायालय ने कहा कि आप हलफनामा दायर करें कि आपने ब्लॉक नहीं किया है.
न्यायालय ने गुरुवार को भी कहा था कि प्रदर्शनकारी हर रोज हाईवे को कैसे ब्लॉक कर सकते हैं? अधिकारियों की कर्तव्य है कि वे न्यायालय द्वारा तय की गई व्यवस्था को लागू कराएं. केंद्र सरकार को इजाजत दी है कि वह किसान संगठनों को इस मामले में पक्षकार बनाए. न्यायालय ने कहा कि जो भी समस्या है, उसका समाधान ज्यूडिशियल फोरम या संसदीय चर्चा से निकाला जा सकता है.
सर्वोच्च न्यायालय ने 23 अगस्त को भी कहा था कि किसानों को प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन सड़कें अनिश्चितकाल के लिए बंद नहीं कर सकते.
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October 1st 2021, 2:11 pm
सामाजिक-आध्यात्मिक शक्ति के बल पर भारत विश्व का मार्गदर्शन करेगा – रामलाल जी
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आगरा. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल ने कहा कि संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी चिकित्सक थे और द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी शिक्षक थे. अतः संघ का इन दोनों वर्गों से बहुत ही गहरा रिश्ता है. साथ ही संघ इनका बहुत सम्मान भी करता है. हमारे धर्म में जिसके प्रति श्रद्धा भाव प्रकट करना हो, तो उसके प्रति मां शब्द का प्रयोग करते हैं. दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है जो अपने नाम में माता शब्द का प्रयोग करता हो, ऐसा एकमेव भारत देश ही है. रामलाल जी बुधवार को खंदारी स्थित जेपी सभागार में आगरा विभाग द्वारा आयोजित प्रबुद्धजन संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे.
उन्होंने कहा कि आज समाज को जातियों में बांटने का कार्य होता है, विशेषतः हिन्दू को. हमें इससे सावधान रहने की आवश्यकता है. संघ में एक घंटे एक जगह शाखा में एकत्रित होकर भारतीय संस्कृति के प्रतीक भगवा ध्वज के समक्ष अपना शारीरिक, मानसिक, चारित्रिक विकास करना ही संघ का कार्य है. बीबीसी ने 90 के दशक में एक क्विज प्रतियोगिता में कहा था कि दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है. संघ ही एक ऐसा संगठन है, जिसमें शिशु से प्रौढ़ सभी आते हैं. सर्वस्पर्शी व सर्वसमावेशी संघ ही है. संघ झुग्गी झोपड़ी से लेकर पॉश कॉलोनी तक में चलता है. स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है – “I want a man with capital M” अर्थात विशेष गुणों से युक्त व्यक्ति चाहिए. भारत के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम जी ने कहा था कि यदि देश के सभी लोगों को nationalize कर दिया जाए तो सारी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी.
रामलाल जी ने कहा कि एक व्यक्तिगत चरित्र, दूसरा राष्ट्रीय चरित्र दोनों परस्पर पूरक हैं. डॉ. हेडगेवार ने कहा था कि मैं कोई अलग कार्य नहीं कर रहा. हमारी भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा है, जिसे लोग भूलते जा रहे हैं. मैं बस उसी को हिन्दू समाज को स्मरण करवाने का कार्य कर रहा हूँ.
भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जिसमें आयी रूढ़ियों को छोड़कर आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति है. डॉ. हेडगेवार ने एक निष्कर्ष निकाला कि यदि देश में national character तैयार होता है तो देश निश्चित ही परम वैभव पर पहुंचेगा. संघ समाज को जोड़ने का कार्य करता है.
कोरोना काल में भारत ने कोरोना की दवा को विदेशों में भेजकर वसुधैव कुटुम्बकम का संदेश दिया. देश में एक राष्ट्रीयता का उदय हुआ है, जिस कारण नेटवर्किंग और इको सिस्टम की वजह से विकृत मानसिकता का समूह भारत को तोड़ने का प्रयास करता रहता है और कोई पत्रकार भी राष्ट्रीयता की बात करे तो उस पर भी हमलावर रहता है. वर्तमान समय में एक जागरूक समाज की आवश्यकता है. देश की सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक शक्ति के बल पर भारत विश्व का मार्गदर्शन करेगा.
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September 24th 2021, 11:47 pm
आतंकियों का समर्थन और सरकारी नौकरी साथ-साथ नहीं…6 कर्मी बर्खास्त
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जम्मू कश्मीर. आतंकी संगठनों व आतंकियों से संबंध रखने वाले सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ जम्मू कश्मीर प्रशासन सख्त हो गया है. प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे कर्मचारियों के प्रति कोई नरमी नहीं बरती जाएगी.
जम्मू कश्मीर के उप राज्यपाल मनोज सिन्हा ने एक बार फिर 6 सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त कर दिया. कर्मचारियों पर आतंकवादी संगठनों से संबंध रखने और उनके लिए ओवरग्राउंड वर्कर्स के रूप में काम करने का आरोप है. बर्खास्त कर्मियों में जम्मू-कश्मीर पुलिस के दो सिपाही भी शामिल हैं.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उप-राज्यपाल की तरफ से एक कमेटी का गठन किया गया है, कमेटी की सिफारिश पर यह कार्रवाई की जा रही है. इससे पहले जुलाई में भी 11 सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से हटा दिया गया था. इसमें हिजबुल कमांडर सैयद सलाहुद्दीन का बेटा भी था. दो पुलिसकर्मी भी बर्खास्त किए गए थे. इन सब पर आरोप था कि ये आतंकी संगठनों के लिए ओवरग्राउंड वर्कर्स के रूप में काम कर रहे थे.
देशद्रोहियों का समर्थन करने पर जाएगी नौकरी
कुछ समय पहले जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने आदेश जारी किया था कि देशद्रोहियों का समर्थन करने वाले सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया जाएगा. देश की संप्रभुता, संविधान और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बनने वाले तत्वों का समर्थन करने पर सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा. आदेश में यह भी कहा गया है कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए किसी भी रूप में खतरा साबित होता है या फिर विदेशी हितों के लिए काम करते हुए पाया जाता है तो उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाएगा.
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September 24th 2021, 11:47 pm
राज्यों द्वारा प्रत्येक COVID-19 मृत्यु के लिए ₹ 50,000 अनुग्रह राशि प्रदान की जाएगी
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नई दिल्ली. केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया है कि उसने COVID-19 से मरने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए 50,000 रुपये के मुआवजे की सिफारिश की है. केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा दायर शपथ पत्र में स्पष्ट किया गया है कि राज्यों में संबंधित राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (एसडीआरएफ) से अनुग्रह सहायता का भुगतान किया जाएगा.
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) द्वारा अनुशंसित ₹50,000 की इस मुआवजे की राशि के लिए पात्र व्यक्तियों में वे शामिल होंगे, जिन्होंने राहत कार्यों और तैयारियों की गतिविधियों में अपनी जान गंवा दी, मौत के कारण को COVID-19 के रूप में प्रमाणित किया जा रहा है.
एनडीएमए ने कहा है कि जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण मृतक के परिजनों को राशि वितरित करेगा. मृत्यु को COVID-19 मृत्यु के रूप में प्रमाणित करने के संबंध में शिकायत के मामले में, जिला स्तर पर एक समिति संशोधित मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने सहित उपचारात्मक उपायों का प्रस्ताव करेगी.
एनडीएमए ने सिफारिश की है कि कोविड-19 महामारी के भविष्य के चरणों में होने वाली मौतों के लिए भी कोविड-19 मौतों से प्रभावित परिवारों को अनुग्रह सहायता प्रदान की जाती रहेगी. सभी दावों को आवश्यक दस्तावेज जमा करने के 30 दिनों के भीतर निपटाया जाना है और आधार से जुड़े प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण प्रक्रियाओं के माध्यम से वितरित किया जाएगा.
शीर्ष अदालत ने 30 जून को एनडीएमए को ऐसे दिशानिर्देश बनाने के लिए छह सप्ताह का समय दिया था. न्यायालय ने अनुग्रह सहायता के रूप में प्रदान की जाने वाली राशि पर निर्णय लेने का अधिकार एनडीएमए के विवेक पर छोड़ दिया.
फैसले में कहा, हम एनडीएमए को निर्देश देते हैं कि वह उन लोगों के परिवार के सदस्यों के लिए अनुग्रह मुआवजे के लिए दिशा-निर्देश तैयार करे, जो कोविड के शिकार हुए हैं. प्रदान की जाने वाली उचित राशि राष्ट्रीय प्राधिकरण के विवेक पर छोड़ दी गयी.
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September 24th 2021, 11:47 pm
हाइफा युद्ध – भारतीयों के पराक्रम का स्वर्णिम पृष्ठ
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लोकेन्द्र सिंह
पराजय का इतिहास लिखने वाले इतिहासकारों ने बड़ी सफाई से भारतीय योद्धाओं की अकल्पनीय विजयों को इतिहास के पन्नों पर दर्ज नहीं होने दिया. शारीरिक तौर पर मरने के बाद जी उठने वाले देश इजरायल की आजादी के संघर्ष को जब हम देखेंगे, तब हम पाएंगे कि यहूदियों को ‘ईश्वर के प्यारे राष्ट्र’ का पहला हिस्सा भारतीय योद्धाओं ने जीतकर दिया था. वर्ष 1918 में हाइफा के युद्ध में भारत के अनेक योद्धाओं ने अपने प्राणों का बलिदान दिया. समुद्र तटीय शहर हाइफा की मुक्ति से ही आधुनिक इजरायल के निर्माण की नींव पड़ी थी. इसलिए हाइफा युद्ध में भारतीय सैनिकों के प्राणोत्सर्ग को यहूदी आज भी स्मरण करते हैं. इजरायल की सरकार आज तक हाइफा, यरुशलेम, रामलेह और ख्यात के समुद्री तटों पर बनी 900 भारतीय सैनिकों की समाधियों की अच्छी तरह देखरेख करती है. इजरायल के बच्चों को इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों में भारतीय सैनिकों के शौर्य और पराक्रम की कहानियां पढ़ाई जाती हैं. प्रत्येक वर्ष 23 सितंबर को भारतीय योद्धाओं को सम्मान देने के लिए हाइफा के महापौर, इजरायल की जनता और भारतीय दूतावास के लोग एकत्र होकर हाइफा दिवस मनाते हैं. जहाँ, एक तरफ हमारे लिए गौरव की बात है कि इजरायल के लोग भारतीय योद्धाओं के बलिदान को अब तक सम्मान दे रहे हैं. वहीं, दूसरी ओर दु:ख की बात है कि अपने ही देश भारत में इस महान जीत के नायकों के शौर्य के किस्से पढ़ाए और सुनाए नहीं जाते हैं. हालांकि, भारतीय सेना जरूर 23 सितंबर को हाइफा दिवस मनाती है. अब हम समझ सकते हैं कि भारत और इजरायल के रिश्तों में सार्वजनिक दूरी के बाद भी जो गर्माहट बनी रही, वह भारतीय सैनिकों के रक्त की गर्मी से है.
भारतीय योद्धाओं के पराक्रम और साहस को समझने के लिए हाइफा युद्ध के पन्ने पलटने होंगे. हाइफा का युद्ध मानव इतिहास का सबसे बड़ा और अपनी तरह का आखिरी युद्ध है. प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान तुर्की साम्राज्य से इजरायल के हाइफा शहर को आजाद कराने के लिए ब्रिटिश सेना की सहायता के लिए जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद से सैनिकों को भेजा गया था. चूंकि हैदराबाद के निजाम द्वारा भेजी गई टुकड़ी में लगभग सभी सैनिक मुस्लिम थे, इसलिए ब्रिटिश सेना के अधिकारियों ने उन्हें सीधे युद्ध के मैदान में नहीं उतारा. निजाम के सैनिकों को युद्ध बंदियों के प्रबंधन और देखरेख का कार्य सौंपा गया. जबकि, मैसूर और जोधपुर की घुड़सवार सैन्य टुकड़ियों को मिलाकर एक विशेष इकाई बनाई गई थी. तुर्की, ऑस्ट्रिया और जर्मनी की संयुक्त साधन सम्पन्न शक्तिशाली सेना के विरुद्ध भारतीय सैन्य दल का नेतृत्व जोधपुर के मेजर दलपत सिंह शेखावत ने किया था, जो इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए. अदम्य साहस और सैन्य रणनीति का प्रदर्शन करके वाले मेजर दलपत सिंह शेखावत को हाइफा के नायक के रूप में जाना जाता है. हाइफा का युद्ध इसलिए बड़े युद्धों में शामिल है, क्योंकि इस युद्ध में इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास की विजय हुई थी. एक ओर तुर्की, जर्मनी और ऑस्ट्रिया की संयुक्त सेना अपनी चौकियों पर मजबूती से जमी हुई थी. उनके पास तोप, बम और बंदूक सहित अत्याधुनिक हथियार थे. जबकि भारतीय सैनिकों ने उनका मुकाबला केवल तलवार और भालों से किया. उन्होंने पैदल और घोड़ों पर सवार होकर युद्ध न केवल लड़ा, बल्कि अकल्पनीय विजय भी प्राप्त की. यह दुनिया के इतिहास में घुड़सवार सेना का अंतिम महान अभियान था. इसके साथ ही यह सैन्य इतिहास में एकमात्र घटना है, जब एक घुड़सवार सेना ने सबसे कम समय में सुरक्षित और चाक-चौबंद शहर पर कब्जा कर लिया.
हाइफा पहुंचने के बाद जब ब्रिटिश सेना को दुश्मन की मोर्चाबंदी और ताकत के बारे में पता चला तब ब्रिगेडियर जनरल एडीए किंग ने सेना को वापस बुला लिया था. ब्रिगेडियर का निर्णय उचित ही था, क्योंकि तुर्की की सेना सुरक्षित और युद्ध की दृष्टि से लाभप्रद स्थिति में थी. परंतु, भारतीय योद्धा सेना को वापस बुलाने के निर्णय से खुश नहीं थे. उन्होंने कहा कि ‘हम अपने देश में किस मुंह से जाएंगे. अपने देश की जनता को कैसे बताएंगे कि शत्रु के डर से मैदान छोड़ दिया. युद्ध के मैदान में पीठ दिखाकर भागना उचित नहीं माना जाता. इसलिए हम तो लड़कर यहीं वीरगति प्राप्त करना पसंद करेंगे.’ भारतीय सैनिक सीधे मौत के मुँह में जाने की इजाजत माँग रहे थे. काफी समझाने के बाद भी जब भारतीय सैनिक नहीं माने, तब ब्रिटिश सेना के अधिकारी समझ गए कि यह असली योद्धा हैं, इन्हें रोका नहीं जा सकता. भारतीय योद्धाओं के दृढ़ संकल्प और अदम्य साहस को देखकर उन्हें हमले की अनुमति दे दी गई.
तलवार और भालों से सज्जित घुड़सवार एवं पैदल भारतीय सेना ने 23 सितंबर को सुबह 5 बजे हाइफा की ओर बढ़ना प्रारंभ किया. भारतीय सेना का मार्ग माउंट कार्मल पर्वत श्रृंखला के साथ लगता हुआ था और किशोन नदी एवं उसकी सहायक नदियों के साथ दलदली भूमि की एक पट्टी तक सीमित था. जैसे ही सेना 10 बजे हाइफा पहुंची, वह माउंट कार्मल पर तैनात 77 एमएम बंदूकों के निशाने पर आ गए.
परंतु, भारतीय सेना का नेतृत्व कर रहे जवानों ने यहां सूझबूझ दिखाई. मैसूर लांसर्स की एक स्क्वाड्रन शेरवुड रेंजर्स के एक स्क्वाड्रन के समर्थन से दक्षिण की ओर से माउंट कार्मल पर चढ़ी. उन्होंने दुश्मनों पर अचानक आश्चर्यचकित कर देने वाला हमला कर कार्मल की ढलान पर दो नौ सैनिक तोपों पर कब्जा कर लिया. उन्होंने दुश्मनों की मशीनगनों के खिलाफ भी वीरता के साथ आक्रमण किया. उधर, 14:00 बजे ‘बी’ बैटरी एचएसी के समर्थन से जोधपुर लांसर्स ने हाइफा पर हमला किया. मजबूत प्रतिरोध के बावजूद भी लांसर्स ने बहादुरी के साथ दुश्मनों की मशीनगनों पर सामने से आक्रमण किया. 15:00 बजे तक भारतीय घुड़सवारों ने उनके स्थानों पर कब्जा कर तुर्की सेना को पराजित कर हाइफा पर अधिकार कर लिया. (पुस्तक : इजऱायल में भारतीय वीरों की शौर्यगाथा, लेखक : रवि कुमार, पृष्ठ-21 और 22)
भारतीय सैनिकों की कुशल रणनीति से प्राप्त अकल्पनीय विजय के कारण इस युद्ध को इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज किया गया है. फौजी पाठ्यक्रमों में इस युद्ध को पढ़ाया जाता है. मिस्र और फिलिस्तीन के सैन्य अभियान (वॉल्यूम-2) में भारतीय घुड़सवार सैन्य टुकड़ी की कार्रवाई को अद्वितीय बताया गया है – ‘पूरे अभियान के दौरान घुड़सवार सेना की कार्रवाई के समान कोई अन्य युद्ध नहीं लड़ा गया था. मशीनगन की गोलियां भी बार-बार तेजी से आगे बढ़ रहे घोड़ों को रोकने में असफल रही थीं.’
Marquess of Anglesey की पुस्तक ‘ब्रिटिश फौज का इतिहास’ में भी इस युद्ध का विवरण दिया है – ‘…यह निश्चित रूप से विश्व के इतिहास में एकमात्र अवसर था, जब एक सुरक्षित शहर पर तेजी से बढ़ती घुड़सवार सेना द्वारा कब्जा कर लिया गया.’ इसी तरह जनरल एलेनबी ने अपनी डाक के मुख्य भाग में विशेष रूप से भारतीय योद्धाओं और उनका नेतृत्व कर रहे मेजर दलपत सिंह शेखावत की वीरता का उल्लेख किया है – ‘जब मैसूर लांसर्स माउंट कार्मल की ढलानदार चट्टानों को पार कर रहे थे, जोधपुर लांसर्स धरती को रौंदते हुए, दुश्मनों की मशीनगन पर चढ़ाई करते हुए शहर में तेजी से आए, वहाँ रास्तों पर बहुत से तुर्कों पर भाले से प्रहार किया. कर्नल ठाकुर दलपत सिंह (मिलिट्री क्रॉस) ने वीरता के साथ आक्रमण का नेतृत्व किया.’
यहां बताना उचित होगा कि मिलिट्री क्रॉस उस समय ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय सैनिकों को दिया जाने वाला सर्वोच्च वीरता सम्मान था. मेजर दलपत सिंह शेखावत के साथ ही कैप्टन अनूप सिंह और सेकंड लेफ्टिनेंट सगत सिंह को भी वीरतापूर्वक लडऩे के लिए सर्वोच्च वीरता सम्मान मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया गया.
लगभग 2000 वर्ष से अपनी जन्मभूमि से बेदखल, दुर्व्यवहार और अमानवीय यातनाओं के शिकार यहूदियों के लिए 23 सितंबर, 1918 को तुर्की साम्राज्य से हाइफा शहर की मुक्ति का महत्त्व बहुत अधिक था. यूरोप सहित दुनिया के अन्य हिस्सों में रह रहे यहूदियों ने जब हाइफा की मुक्ति का समाचार सुना तो वे खुशी से झूम उठे. उन्हें अपना संकल्प पूरा होते दिख रहा था. दुनिया में यहां-वहां फैले यहूदी अपनी मातृभूमि इजरायल को पुन: प्राप्त करने के अपने संकल्प का प्रतिदिन स्मरण करते थे. प्रत्येक यहूदी दूसरे यहूदी से विदा लेते समय यह कहना कभी नहीं भूलता था कि ‘अगली मुलाकात/सुबह यरुशलेम में होगी.’ हाइफा की मुक्ति से उन्हें अपना स्वप्न पूरा होता दिख रहा था. इजरायल से निष्कासन के बाद यहाँ-वहाँ गुजर-बसर कर रहे यहूदियों ने सन् 1919 से हाइफा में पहुंचना शुरू कर दिया था. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने अपने लिए अलग देश इजरायल की मांग जोर-शोर से उठाना प्रारंभ की दी. अंतत: यहूदियों के प्रयास रंग लाए और 30 साल बाद वह दिन आ गया, जब उन्हें 1948 में अपना देश इजरायल प्राप्त हुआ. हाइफा शहर की मुक्ति के बाद भी भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के सैनिकों के साथ मिलकर पूरे इजरायल को मुक्त करवाने के लिए कुछ और लड़ाइयां भी लड़ीं. इजरायल की आजादी के लिए लड़े गए विभिन्न युद्धों में लगभग 900 साहसी भारतीय सैनिकों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया है.
भारत के प्रति इजरायल का जो कृतज्ञता का भाव है, संभवत: उसके पीछे इन्हीं महान योद्धाओं का बलिदान है.
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