भारत ने दुनिया को संघर्ष नहीं, समन्वय, सह-अस्तित्व और बंधुत्व का संदेश दिया है – पराग जी अभ्यंकर
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उज्जैन। विश्व बंधुत्व दिवस के अवसर पर कालिदास अकादमी परिसर में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सेवा प्रमुख पराग अभ्यंकर जी ने कहा कि युवाओं के पास ऊर्जा, सामर्थ्य और प्रतिभा है, लेकिन इस शक्ति को सही दिशा देने के लिए संस्कार, विवेक और राष्ट्रबोध आवश्यक है।
विवेकानन्द केन्द्र, कन्याकुमारी की उज्जैन शाखा द्वारा “स्वामी विवेकानंद आज भी प्रासंगिक हैं” विषय पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारत की पहचान केवल उसकी प्राचीन संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा से नहीं, बल्कि त्याग और सेवा की भावना से भी है। भारतीय जीवन-दृष्टि में स्वयं से पहले समाज, राष्ट्र और मानवता के कल्याण को महत्व दिया गया है। यही कारण है कि भारत ने दुनिया को संघर्ष नहीं, बल्कि समन्वय, सह-अस्तित्व, करुणा और बंधुत्व का संदेश दिया। सेवा भारतीय संस्कृति का मूल स्वभाव है और त्याग उसकी शक्ति है। स्वामी विवेकानंद ने इसी भावना को युवाओं के भीतर जागृत करने का कार्य किया। उनका जीवन बताता है कि ज्ञान और सामर्थ्य का सर्वोच्च उपयोग समाज एवं राष्ट्र की सेवा में होना चाहिए।
11 सितंबर 1893 को शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने भारत की उस महान परंपरा का परिचय दुनिया को कराया, जिसमें विभिन्न मत-पंथों के बीच केवल सहनशीलता नहीं, बल्कि एक-दूसरे को स्वीकार करने और सम्मान देने की भावना है। उन्होंने कहा कि भारत ने सदैव सर्वे भवन्तु सुखिन: की भावना के साथ संपूर्ण मानवता के कल्याण की कामना की है। यही विश्व बंधुत्व की वास्तविक भावना है।
आज युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल रोजगार या करियर की नहीं है। उन्हें यह भी जानना होगा कि वे कौन हैं? उनका देश क्या है? उनकी संस्कृति क्या है? और भारत की हजारों वर्ष पुरानी ज्ञान परंपरा क्या कहती है? आज आवश्यकता है कि युवा भारत के इतिहास, संस्कृति, महापुरुषों और ज्ञान-विज्ञान की परंपरा को पढ़ें और आत्मविश्वास के साथ दुनिया के सामने खड़े हों।
अधिकार के साथ कर्तव्य भी समझें युवा
पराग अभ्यंकर जी ने कहा कि युवाओं को अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी बोध होना चाहिए। आक्रोश के साथ संयम, शक्ति के साथ विवेक और ज्ञान के साथ संस्कार आवश्यक हैं। स्वामी विवेकानंद ऐसी युवा शक्ति चाहते थे, जो बौद्धिक रूप से सक्षम, शारीरिक रूप से मजबूत और आध्यात्मिक रूप से जागृत हो। इसी भाव को स्पष्ट करते हुए स्वामी जी ने कहा था कि गीता पढ़ो और फुटबॉल भी खेलो।
वर्तमान सोशल मीडिया युग में युवाओं को सावधान करते हुए कहा कि आज सूचना की कमी नहीं है, बल्कि सही और गलत सूचना में अंतर करना चुनौती है। सोशल मीडिया पर मिलने वाली प्रत्येक जानकारी को अंतिम सत्य मानने के बजाय अध्ययन, तर्क और विवेक के आधार पर उसकी सत्यता परखना जरूरी है।
त्याग और सेवा से बनेगा समर्थ भारत
उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद का चिंतन केवल भाषणों तक सीमित रखने का विषय नहीं, बल्कि जीवन में उतारने का संदेश है। यदि युवा शक्ति को त्याग, सेवा, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति से जोड़ा जाए तो भारत को विश्व में नई दिशा देने वाली शक्ति बनाया जा सकता है।
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