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हिन्दू को किसी एक परिभाषा, वेष या पूजा पद्धति में नहीं बांधा जा सकता – चंपत राय जी

VSK Bharat

अयोध्या, 7 सितंबर। विश्व हिन्दू परिषद के 62वें स्थापना दिवस पर कारसेवकपुरम सभागार में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य वक्ता एवं विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय उपाध्यक्ष चम्पत राय जी ने कहा कि देश के 15 हजार से अधिक संतों ने जब हिन्दू पर से आलस्य की राख हटाई, उसकी परिणिति श्री राम जन्मभूमि मंदिर के रूप में हुई।

इस अवसर पर विभिन्न वेद एवं संस्कृत विद्यालय के बटुकों को विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना का कारण एवं कार्यप्रणाली की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि हिन्दू को किसी एक परिभाषा, वेष या पूजा पद्धति में नहीं बांधा जा सकता है। हमारे त्योहार, उत्सव हमें एक सूत्र में पिरोते हैं। गत दो शताब्दियों की चर्चा करते हुए बताया कि एक समाज ऐसा भी है, जिसे अंग्रेज पानी के जहाज में भरकर विश्व के विभिन्न समुद्री टापुओं पर मजदूरी कराने ले गए और वहीं छोड़ दिया। वे लोग अपने साथ गोस्वामी तुलसीदास जी की रामचरितमानस या गीता लेकर गए। उसी पुस्तक ने उन्हें आज भी हिन्दुत्व से जोड़ रखा है। वे भारत की धरती से दूर हैं, हिन्दी नहीं जानते पर स्वयं को हिन्दू मानते हैं। मॉरिशस, त्रिनिडाड, म्यांमार, सूरीनाम, फिजी कुछ ऐसे ही देश हैं।

उन्होंने कहा कि गुरु गोलवलकर जी के मन में विचार आया कि विश्व के समस्त हिन्दुओं को एक सूत्र में बांधने के लिए एक गैर राजनीतिक संगठन बने जो हिन्दुओं के हित के लिए काम करे। वर्ष 1964 की जन्माष्टमी के दिन सांदीपनी साधनालय मुंबई में स्वामी चिन्मयानंद जी के आश्रम में विश्व हिन्दू परिषद नामक संस्था की नींव पड़ी। इसका उद्देश्य मुख्य रूप से हिन्दू समाज में धर्मान्तरण रोकना, परावर्तन, छुआछूत की कुरीति दूर करना, साक्षर, संस्कारवान व आर्थिक रूप से विकसित बनाना रखे गए। यह संगठन आज भारत के 75 हजार से अधिक गांवों शहरों के अलावा विश्व के 25 देशों में वहां के कायदे कानून मानते हुए काम कर रहा है। इसका मार्गदर्शक संतों को बनाया गया है।

कार्यक्रम का प्रारंभ रामवल्लभाकुंज के महंत राजकुमार दास व चम्पत राय ने भारत माता तथा राम परिवार के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलित कर किया। विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय मंत्री हरिशंकर ने विषय अवधारणा प्रस्तुत की।

महंत राजकुमार दास जी ने आशीर्वचन में कहा कि हमें एक ही प्रयास में चिंतन करना चाहिए कि “तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें”। संचालन आचार्य ऋषभ व प्रदीप ने किया। विद्यालय के बटुकों ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया।

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September 9th 2026, 7:54 am
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