सफल होने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है जीवन का सार्थक होना – डॉ. मोहन भागवत जी
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बिना शक्ति के सत्य भी पंगु होता है; व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक सामर्थ्य अनिवार्य है
गोटन (नागौर)।
एल.के. सिंघानिया एजुकेशन सेंटर (LKSEC), गोटन के 37वें वार्षिक पारितोषिक वितरण समारोह ‘स्वराज’ में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल पेट भरना अथवा आजीविका उपार्जित करना नहीं है, बल्कि मनुष्य को श्रेष्ठ, समर्थ और संवेदनशील बनाना है। मनुष्य का जीवन केवल व्यक्तिगत सफलताओं के दायरे में सिमटने के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज और सृष्टि के पोषण के लिए होना चाहिए।
सरसंघचालक जी ने औपचारिक और अनौपचारिक शिक्षा के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि विद्यालयीन शिक्षा के साथ-साथ परिवार, वातावरण और समाज से मिलने वाले संस्कार विद्यार्थी के आचरण की नींव रखते हैं। उन्होंने कहा कि आहार, निद्रा, भय और मैथुन जैसी प्रवृत्तियां पशुओं में भी होती हैं, किंतु प्रकृति ने केवल मनुष्य को विवेक और विचार करने की शक्ति प्रदान की है। इसी विचार शक्ति के बल पर मनुष्य ‘नर से नारायण’ बन सकता है। यदि कर्म सद्विचार से प्रेरित हों तो मनुष्य देवत्व को प्राप्त करता है, अन्यथा पतन की ओर अग्रसर हो जाता है। अतः मनुष्य की जीवन-यात्रा मानवत्व से अतिमानवत्व और अतिमानवत्व से देवत्व की ओर होनी चाहिए।
सत्य और सामर्थ्य के अंतर्संबंध को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि बिना शक्ति के सत्य भी पंगु हो जाता है। व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक – शरीर, मन, बुद्धि और ज्ञान का बल होना अनिवार्य है। आज विश्व पटल पर भारत का आर्थिक और सामरिक सामर्थ्य सुदृढ़ हुआ है, इसी कारण संपूर्ण विश्व आज भारत के विचारों और ज्ञान को गंभीरता से सुन रहा है और स्वीकार कर रहा है।
जीवन के वास्तविक ध्येय की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में केवल यशस्वी (सफल) होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि जीवन का ‘सार्थक’ होना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। सफलता-असफलता प्रयासों के साथ-साथ प्रारब्ध पर भी निर्भर करती है, किंतु परमार्थ भाव से किया गया कर्म व्यक्ति को अमर बना देता है। इतिहास उन्हीं का स्मरण करता है, जिन्होंने समाज के लिए सर्वस्व अर्पण किया – चाहे वे दानवीर भामाशाह हों, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम हों, स्वामी विवेकानंद हों या देश की स्वाधीनता के लिए हंसते-हंसते प्राण न्योछावर करने वाले अमर बलिदानी।
मोहन भागवत जी ने कहा कि शिक्षा केवल बौद्धिक या वैज्ञानिक विषयों तक सीमित न रहकर सर्वांगीण होनी चाहिए। कला, संगीत, क्रीड़ा और योग भी शिक्षा के उतने ही आवश्यक अंग हैं। कबड्डी जैसे खेल जीवन में कभी हार न मानने और पुनः उठ खड़े होने का सूक्ष्म बोध कराते हैं, वहीं वाद्यवृन्द और संगीत मन, बुद्धि और शरीर के अद्भुत समन्वय से सामूहिक चेतना का संचार करते हैं।
उन्होंने आह्वान किया कि शिक्षण संस्थान केवल उपाधि वितरण के केंद्र न बनकर मनुष्य निर्माण के तीर्थ बनें, जहाँ विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, चरित्र और राष्ट्रभक्ति के संस्कार पल्लवित हों। अपने लिए तो सब जीते हैं, किंतु जो समाज और राष्ट्र के लिए जीता है, उसी का जीवन वास्तविक अर्थों में सार्थक होता है।
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