‘स्व’ के बिना संभव नहीं स्वराज
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1947 में हमने विदेशी शासन से मुक्ति अवश्य प्राप्त की, किंतु क्या उसी दिन मानसिक और सांस्कृतिक पराधीनता भी समाप्त हो गई? यह प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना स्वतंत्रता के समय था। यदि हम अपनी भाषाओं को हीन समझें, अपने इतिहास को संदेह की दृष्टि से देखें, अपनी ज्ञान परंपरा को अप्रासंगिक मान लें और विकास का अर्थ केवल विदेशी प्रतिमानों की नकल समझें, तो यह स्वीकार करना होगा कि स्वराज की यात्रा अभी अधूरी है।
आचार्य ललित मुनि
हर वर्ष 15 अगस्त को जब तिरंगा शान से लहराता है, राष्ट्रगान गूंजता है और पूरा देश स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मनाता है, तब स्वाभाविक रूप से हमारा ध्यान 1947 की उस ऐतिहासिक मध्यरात्रि की ओर चला जाता है, जब भारत ने औपनिवेशिक शासन की बेड़ियों को तोड़कर स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में नई यात्रा आरंभ की। किंतु स्वतंत्रता दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं है, बल्कि आत्ममंथन का भी दिन है। यह स्वयं से पूछने का अवसर है कि क्या स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन का नाम है, या उसके पीछे कोई राष्ट्रीय और सभ्यतागत अर्थ भी छिपा है? उत्तर स्पष्ट है, स्व के बिना स्वराज संभव नहीं।
भारतीय परंपरा में “स्व” केवल व्यक्ति का अहं या निजी अस्तित्व नहीं है। “स्व” का अर्थ है – अपनी आत्मा, अपनी प्रकृति, अपनी संस्कृति, अपनी भाषा, अपने ज्ञान, अपने इतिहास और अपने जीवन मूल्यों का बोध। यही कारण है कि भारत में स्वतंत्रता की अवधारणा पश्चिमी राजनीतिक चिंतन से भिन्न रही है। यहाँ स्वतंत्रता का प्रारंभ व्यक्ति के भीतर से होता है और उसका विस्तार समाज, संस्कृति तथा राष्ट्र तक पहुँचता है।
यही कारण है कि हमारे मनीषियों ने पहले आत्मजागरण की बात की और उसके बाद स्वराज की। उपनिषदों की आत्मविद्या, भगवद्गीता का “स्वधर्म”, स्वामी विवेकानंद का आत्मविश्वास, लोकमान्य तिलक का स्वराज, महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज और पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन, सभी एक ही व्यापक सूत्र में जुड़े दिखाई देते हैं। इन विचारों में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को अलग-अलग इकाइयों के रूप में नहीं, बल्कि परस्पर जुड़े हुए जीवन-तंत्र के रूप में देखने का आग्रह दिखाई देता है। इन सबका मूल संदेश था कि यदि राष्ट्र अपने “स्व” को भूल जाएगा, तो राजनीतिक स्वतंत्रता भी लंबे समय तक उसे आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी नहीं बना सकेगी।
1947 में हमने विदेशी शासन से मुक्ति अवश्य प्राप्त की, किंतु क्या उसी दिन मानसिक और सांस्कृतिक पराधीनता भी समाप्त हो गई? यह प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना स्वतंत्रता के समय था। यदि हम अपनी भाषाओं को हीन समझें, अपने इतिहास को संदेह की दृष्टि से देखें, अपनी ज्ञान परंपरा को अप्रासंगिक मान लें और विकास का अर्थ केवल विदेशी प्रतिमानों की नकल समझें, तो यह स्वीकार करना होगा कि स्वराज की यात्रा अभी अधूरी है।
स्वतंत्रता आंदोलन स्वयं इस व्यापक चेतना का प्रमाण है। महात्मा गांधी ने राजनीतिक स्वतंत्रता को सामाजिक और आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ा। चरखा केवल वस्त्र उत्पादन का साधन नहीं था, बल्कि स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बना। लोकमान्य तिलक ने “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” के माध्यम से राजनीतिक अधिकार को जनचेतना का विषय बनाया। श्री अरविंद ने राष्ट्रीयता को आध्यात्मिक चेतना से जोड़ा, जबकि स्वामी विवेकानंद ने भारतीय समाज में आत्मविश्वास और आत्मबोध जगाने का प्रयास किया। इस दृष्टि से स्वतंत्रता का संघर्ष केवल सत्ता हस्तांतरण का आंदोलन नहीं था, बल्कि भारतीय समाज के आत्मजागरण का भी आंदोलन था।
इसका अर्थ यह नहीं कि भारत को आधुनिकता से दूरी बनानी चाहिए। भारत का इतिहास परिवर्तन का विरोध नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण समन्वय का इतिहास है। हमने सदैव नई बातों का स्वागत किया है, किंतु अपनी पहचान खोकर नहीं। विज्ञान, तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष अनुसंधान और वैश्विक व्यापार में अग्रणी बनने की आकांक्षा तभी सार्थक होगी, जब उसके साथ भारतीय समाज का सांस्कृतिक आत्मविश्वास भी मजबूत हो। आर्थिक विकास और सांस्कृतिक आत्मबोध परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।
आज “आत्मनिर्भर भारत”, भारतीय भाषाओं के प्रति बढ़ता सम्मान, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, भारतीय ज्ञान परंपरा पर बढ़ता शोध और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रयास इसी व्यापक दृष्टि के संकेत हैं। इनका मूल्यांकन केवल सरकारी योजनाओं के रूप में नहीं, बल्कि उस अधूरे स्वराज की दिशा में उठाए गए कदमों के रूप में भी किया जा सकता है, जिसकी कल्पना स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक विचारकों ने की थी।
स्वराज का अर्थ यह भी नहीं कि राष्ट्र स्वयं को दुनिया से अलग कर ले। भारतीय दृष्टि तो “वसुधैव कुटुम्बकम्” की है। किंतु विश्व के साथ संवाद वही राष्ट्र प्रभावी ढंग से कर सकता है, जो स्वयं को जानता हो। जिसकी अपनी बौद्धिक पहचान हो, जो अपनी संस्कृति पर गर्व करता हो और जो अपनी सभ्यतागत शक्ति को समझता हो। आत्म विस्मृति कभी वैश्विक नेतृत्व का आधार नहीं बन सकती।
भारत 2047 में स्वतंत्रता की शताब्दी पूरी करेगा। इसलिए आज से ही यह विचार करना आवश्यक है कि शताब्दी वर्ष तक हम किस प्रकार के भारत का निर्माण करना चाहते हैं। 2047 का भारत कैसा होगा, यह केवल आर्थिक विकास दर, प्रति व्यक्ति आय या तकनीकी उपलब्धियों से तय नहीं होगा। यह इस बात से भी निर्धारित होगा कि क्या हमने अपने बच्चों को अपनी सभ्यता से जोड़ा, क्या हमने अपनी भाषाओं को सम्मान दिया, क्या हमने अपने ज्ञान और विज्ञान की परंपराओं को आधुनिक संदर्भों में विकसित किया और क्या हमने विकास की दौड़ में अपने सामाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों को सुरक्षित रखा।
स्वतंत्रता दिवस का वास्तविक संदेश यही है कि राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनता, बल्कि चेतना से बनता है। यह चेतना ही उसका “स्व” है। यदि यह जागृत रहेगा, तो स्वराज भी सुरक्षित रहेगा; यदि यह कमजोर पड़ गया, तो राजनीतिक स्वतंत्रता भी अपने उद्देश्य को पूर्ण नहीं कर पाएगी।
इसलिए आज, हमें केवल उन वीरों को स्मरण नहीं करना चाहिए, जिन्होंने हमें स्वतंत्रता दिलाई, बल्कि उस मूल विचार को भी याद करना चाहिए, जिसके लिए उन्होंने संघर्ष किया था। उनका लक्ष्य केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि ऐसा भारत था जो अपने स्वभाव, अपनी संस्कृति, अपने ज्ञान और अपने आत्मविश्वास के आधार पर विश्व के सामने खड़ा हो।
यही स्वतंत्रता का भारतीय अर्थ है। यही स्वराज का वास्तविक स्वरूप है। और यही कारण है कि यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में था कि स्व के बिना संभव नहीं स्वराज।
(लेखक पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।)
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