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संपूर्ण विश्व की विभीषिकाओं का आध्यात्मिक समाधान भारत का मूल सांस्कृतिक उद्देश्य है

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स्वामी अवधेशानंद गिरि

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भारत की आध्यात्मिक चेतना के केंद्र बिंदु हिमालय पर्वत में अवस्थित श्री केदारनाथ धाम में भगवान आदि शंकराचार्य की समाधि एवं भव्य-दिव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित की गई. सनातन संस्कृति के लिए आदि शंकराचार्य जी का योगदान अमूल्य रहा है. वह हिन्दू धर्म-संस्कृति और उसमें अंतर्निहित दिव्य जीवन मूल्यों को युगानुकूल रूप से प्रस्तुत और पुन:परिभाषित करने वाले भाष्यकार थे. स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत यूं तो हमारे राष्ट्र में निर्वाचित सरकारों द्वारा विकास के अनेक कार्य संपादित हुए हैं, किंतु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह आध्यात्मिक पुरुषार्थ विशेष रूप से प्रशंसनीय है. भगवतपाद आचार्य शंकर भारतीय आध्यात्मिक जगत की नाभिकीय सत्ता हैं. उन्होंने 32 वर्ष की अल्पायु में ही वेदादि समस्त धर्म शास्त्रों का मंथन कर उनसे जिस ज्ञानामृत की निष्पत्ति की, वह मनुष्य मात्र के लिए अनुकरणीय है. धर्म-संस्कृति के रक्षणार्थ उन्होंने जो श्रेष्ठ कार्य संपादित किए, वे किसी सामान्य मनुष्य की सामर्थ्य, यहां तक कि परिकल्पनाओं की परिधि से भी बाहर हैं. आचार्य शंकर जैसी प्रखर प्रतिभा, पांडित्य, प्रचंड-पुरुषार्थ, त्याग और योगैश्वर्य अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता. संभवत: इसीलिए हम सनातन हिन्दू मतावलंबी उन्हें शिव का अवतार मानते हैं. हमारी यह मान्यता कपोल कल्पना नहीं है, अपितु शास्त्रों द्वारा प्रमाणित है.

मुझे स्मरण है कि वर्ष 2013 की केदारनाथ की भीषण आपदा के समय नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और उन्होंने पीड़ितों की सहायता एवं आपदा प्रबंधन में जैसी तत्परता दिखाई थी, वह अभूतपूर्व और आश्चर्यचकित करने वाली थी. प्रधानमंत्री के जीवन का कुछ कालखंड हिमालय में भी व्यतीत हुआ है और ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और शुभ कर्म संलग्नता के मूल में हिमालय में अवस्थित देवात्माओं का दिव्य आशीर्वाद सन्निहित है. कोरोना के भीषण संकट काल में उन्होंने जिस कुशलता से देश का नेतृत्व किया और कोरोना योद्धाओं एवं विज्ञानियों को प्रोत्साहित किया, उसी के परिणामस्वरूप हम अपना स्वदेशी टीका बनाने में सफल रहे. देश में बने टीकों ने कोरोना से लड़ाई में अभूतपूर्व योगदान दिया है. नोटबंदी के समय अथवा जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 और धारा 35-ए की समाप्ति के संदर्भ में लिया गया, उनका साहसिक निर्णय भी अभूतपूर्व था.

अब इसी क्रम में आचार्य शंकर की समाधि और प्रतिमा की स्थापना भारतीय संस्कृति-संस्कार और उसकी दिव्य संवेदनाओं एवं संसार की आद्य सभ्यता का जयघोष ही है. ऐसी विलक्षण अभिप्रेरणा और समायोजन दृढ़संकल्प और दैव सत्ता की सम्मति के बिना असंभव है.

आज विश्व के समक्ष बढ़ती जनसंख्या, पर्यावरण क्षरण, ग्लोबल वार्मिग, जलवायु परिवर्तन और पारस्परिक संघर्ष की जो स्थितियां बनी हुई हैं, उनका एकमात्र समाधान आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैत दर्शन ही है. हमारे पूर्वज ऋषि प्रकृति के गूढ़ रहस्य को समझकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मनुष्य और अन्य पर्यावरणीय घटकों के पारस्परिक सहकार-संतुलन एवं सह-अस्तित्व में ही हमारा जीवन सुरक्षित है. यदि समष्टि में असंतुलन है, धरा, अंबर, जल, वायु आदि दूषित हैं तो मनुष्य अकेले सुखी कैसे हो सकता है? इसलिए हमारी प्रार्थनाओं में सर्वत्र शांति की बात की गई है. आचार्य शंकर द्वारा प्रतिपादित अद्वैत मत मनुष्य और प्रकृति के मध्य परस्पर एकत्व और सामंजस्य के इसी रहस्य को उद्घाटित करता है.

वस्तुत: रूप, गुण-धर्म, प्रकृति और अन्य सभी पारिस्थितिक विषमताओं के बाद भी हमारे मूल में एक ही तत्व विद्यमान है, जिसे ‘आत्म तत्व’ कहा जाता है. आत्मा का वही अविनाशी स्वरूप हमें जाति, धर्म, संस्कृति आदि की विभिन्नताओं और वैविध्य के बाद भी एकत्व प्रदान करता है. संसार के समस्त प्राणियों के भीतर वही एक अविनाशी तत्व विद्यमान है. इस अवबोध के बाद हमारा पारस्परिक विद्वेष-संघर्ष स्वत: समाप्त हो जाएगा. सबका हित, सबकी प्रगति, सबका कल्याण और सर्वत्र समता का भाव ही आचार्य शंकर के अद्वैत दर्शन की प्रमुख विशेषता है. प्रचंड भोगवाद और पारस्परिक संघर्ष से जूझ रहे इस विश्व में अद्वैत का दिव्य विचार ही शांति-सामंजस्य और सद्भाव की स्थापना कर सकता है. इस दृष्टि से आचार्य शंकर के विचारों का प्रसार मानव कल्याण हेतु उच्चतम प्रतिमानों की संस्थापना ही है. भारतीय आध्यात्मिक जगत की प्राणस्थली हिमालय के तुंग शिखर पर विद्यमान श्री केदारनाथ धाम में आचार्य भगवान आदि शंकराचार्य की समाधि का निर्माण एवं भव्य प्रतिमा की स्थापना इसी सत्य को परिपुष्ट करता है. भारत की संस्कृति प्रकाश के विस्तार की संस्कृति है. अपनी उदार भावना से संपूर्ण विश्व को एक करना और जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग आदि पर्यावरणीय आदि विभीषिकाओं का आध्यात्मिक समाधान प्रस्तुत करना ही भारत का मूल सांस्कृतिक उद्देश्य है.

भारत का साफ्ट पावर, योग-आयुर्वेद, आर्ष विद्या और आद्य शंकराचार्य के अद्वैत के विचार द्वारा समग्र विश्व को अनेक समकालीन संकटों से छुटकारा दिलाया जा सकता है. इस दृष्टि से भारत की आध्यात्मिक जीवन पद्धति के प्रसार का संकल्प बहुत ऐतिहासिक है. भारत के शीर्षस्थ संत-सत्पुरुष और सनातन जगत प्रधानमंत्री के प्रति आभार व्यक्त करते हैं.

(लेखक श्रीपंचदशनाम जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर एवं हरिद्वार आश्रम, कनखल के पीठाधीश्वर हैं)

साभार – दैनिक जागरण

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November 12th 2021, 2:26 pm
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