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संकट काल में मंदिरों ने खोले सहयोग के कपाट

VSK Bharat

चन्दन आनन्द

सहायक लोक संपर्क अधिकारी

मंदिर हमारी सजीव सनातन संस्कृति का एक बहुमूल्य अंग हैं. हमारी सांस्कृतिक एवं सामाजिक गतिविधियां सदियों से मंदिरों के इर्द-गिर्द घूमती रही हैं. चाहे मेले हों, त्योहार हों या कोई उत्सव, बिना मंदिरों के उनकी कल्पना करना भी कठिन है. वास्तव में मंदिर हमारी संस्कृति में ऐसे सजीव संस्थान रहे हैं, जिनकी धूरी पर आस-पास के क्षेत्रों की सामाजिक-धार्मिक गतिविधियां घूमती थीं. हमारे .हां मंदिर देव उपासना के अलावा अन्य सामाजिक गतिविधियों के केंद्र भी रहे हैं. मंदिरों में पाठशाला, यज्ञशाला, पाकशाला एवं गऊशाला हमेशा से रही हैं. इसी कारण मंदिर केवल पूजास्थल नहीं, बल्कि रचनात्मक और सामाजिक कार्यों के अभिकेन्द्र भी बने रहे. समय के साथ कुछ प्रमुख मंदिरों को छोड़कर अधिकांश मंदिर से सामाजिक-सांस्कृतिक जुड़ाव की परम्परा कमजोर पड़ती गई.

मंदिर और उससे जुड़ी गतिविधियों से जुड़े होने के कारण हम एक तरह से पूरे समाज से जुड़े रहते थे. जैसे ही मंदिर से कटे, वैसे ही समाज से भी कटने का सिलसिला प्रारंभ हो गया. आस्था शायद आज भी मंदिर के उस देवी-देवता या ईष्ट में उतनी ही है, लेकिन अब अपने घर से ही उन्हें प्रणाम करने में हम सहजता महसूस करते हैं. मंदिरों में या मंदिरों के कारण होने वाली गतिविधियों को हमने कम कर दिया और देवी-देवताओं को हमने अकेला छोड़ दिया. लेकिन मंदिरों और देवी-देवताओं ने हमें कभी अकेला नहीं छोड़ा. कोरोना के जिस संकट से पूरा विश्व गुजर रहा है, उससे सभी ओर जब सहायता के द्वार बन्द हुए, तब हमारे इन्हीं मंदिरों ने अपने द्वार खोले. सार्वजनिक स्थानों में भीड़ कम कराने की वजह से सरकारों को मंदिरों के कपाट बंद करने पड़े, लेकिन इस संकट काल में हमारी सहायता के लिए मंदिरों ने अपने कपाट कभी बंद नहीं किए.

पिछले वर्ष जब कोरोना की पहली लहर आई तब से मंदिर, और धार्मिक संस्थान खुलकर सहायता को आगे आए. ऊना स्थित मां चिन्तापूर्णी मंदिर न्यास ने पांच करोड़, ज्वालाजी मंदिर कांगड़ा ने एक करोड़ की राशि एवं प्रवासी व जरूरतमंदों के लिए भोजन की व्यवस्था, ब्रजेश्वरी देवी कांगड़ा ने 50 लाख, मां चामुण्डा देवी मंदिर कांगड़ा ने 21 लाख, श्री नयना देवी मंदिर द्वारा 2.5 करोड़, दियोटसिद्ध स्थित बाबा बालक नाथ मंदिर द्वारा पांच करोड़ की राशि प्रदेश कोविड फंड में जमा करवाई गई. वहीं स्थानीय देवी-देवता भी सहायता को आगे आए. शिमला के मंदिर देवता रूद्र महाराज पुजारली ने 201100 रूपये, रोहड़ू के मंदिर देवता श्री नारायण नरैण द्वारा 151000 रूपये, सरकाघाट के कामेश्वर देव मंदिर द्वारा 50 हजार, मंडी देवताओं के कारदार संघ द्वारा 40 लाख, दुर्गा माता मंदिर हाटकोटी ने 25 लाख, सैंज घाटी के देव शंगचूल महादेव 1.11 लाख, बंजार घाटी के देवता बुंगड़ू महादेव 1 लाख 5 हजार, देवता रियालू नाग द्वारा 51 हजार, हाटू मंदिर नारकण्डा द्वारा 101101 रूपये की सहायता राशि भेंट की गई. राधा स्वामी सतसंग ब्यास ने तो अपने डेरे और सेवादार दिन रात कोविड से लड़ने के लिए प्रदेश को दिए. जिसमें कांगड़ा के परौर में बना 250 बेड का कोविड मेकशिफ्ट अस्पताल प्रमुख है.

वहीं, यदि देश के केवल कुछ प्रमुख मंदिरों की ही बात करें तो नवनिर्मित श्री रामजन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र द्वारा पहली लहर में पीएम केयर को 11 लाख रूपये एवं दूसरी लहर में ऑक्सीजन प्लांट की स्थापना के लिए राशि दी गई. देवस्थानम प्रबंधक कमेटी महालक्ष्मी मंदिर ने 2 करोड़, सोमनाथ मंदिर एक करोड़, महावीर मंदिर पटना 1 करोड़, कांची कामकोटी 10 लाख, स्वामी नारायण मंदिर 1.88 करोड़, अम्बाजी मंदिर 1 करोड़, हरियाणा में श्री माता शीतला देवी द्वारा पांच करोड़ एवं श्री माता मनसा देवी के खजाने से दस करोड़ की राशि भेंट की गई. पिछले वर्ष कोरोना संकट के दौरान सभी प्रवासी श्रमिकों को ठहराने और खाने की पूरी व्यवस्था तिरुपति बालाजी मंदिर ने की.

दूसरी लहर में स्वामी नारायण मंदिर वडोदरा ने मंदिर परिसर में ऑक्सीजन और वेंटीलेटर युक्त 500 बेड का कोविड केयर केंद्र आरंभ किया, पुरी जगन्नाथ ने 1.50 करोड़ राशि के साथ निलाचल भक्त निवास को 120 बेड की क्षमता वाले कोविड केयर केंद्र में बदला, मुम्बई में पवनधाम मंदिर ने अपने चार मंजिला भवन को 100 बेड युक्त कोविड उपचार केंद्र में बदला, जैन मंदिर मुम्बई ने अपने परिसर को कोविड केंद्र में बदला और पिछल वर्ष परिसर में लोगों की जांच के लिए पैथोलोजी लैब का निर्माण किया, संत गजानन मंदिर महाराष्ट्र द्वारा 500 बेड का आईसोलेशन केंद्र और प्रतिदिन 2000 लोगों का भोजन की व्यवस्था की गई. इस्कॉन मंदिर द्वारा रोगियों, बच्चों और वृद्धों के लिए निःशुल्क भोजन की व्यवस्था, श्री वैष्णो देवी मंदिर ने कटड़ा स्थित आर्शिवाद भवन 600 बेड का क्वारंटीन केंद्र के रूप में प्रशासन को दिया. यहां स्थान की कमी होने की वजह से बहुत कम मंदिरों का उल्लेख हो पाया है. इनके अतिरिक्त भी शायद ही कोई मंदिर या देव स्थान इस आपदा में आगे न आया हो. हिन्दू धर्म के अंतर्गत आने वाले तमाम मत-संप्रदाय और उससे जुड़े मंदिर पीड़ितों की सहायता के लिए कभी बंद नहीं हुए. ईश्वर इस विपत्तिकाल से हमें मुक्ति प्रदान करें और ऐसा मानस भी दें कि मंदिरों को सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का सजीव केन्द्र बनाने के लिए फिर से सजग होकर प्रयास करें.

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August 22nd 2021, 4:33 am
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