श्रीनिवासन हत्या मामले में केरल उच्च न्यायालय ने पीएफआई के 3 सदस्यों की ज़मानत याचिका खारिज की
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कोच्चि। केरल उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता श्रीनिवासन की हत्या की साजिश रचने वाले पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) के तीन सदस्यों को ज़मानत देने से इनकार कर दिया। तीनों पर वर्ष 2022 में पलक्कड़ में संघ कार्यकर्ता श्रीनिवासन की हत्या की साज़िश रचने का आरोप है।
न्यायमूर्ति अनिल के. नरेंद्रन और मुरली कृष्णा एस. की खंडपीठ ने अशरफ एस. उर्फ करमना अशरफ मौलवी (आरोपी नंबर 2), अब्दुल खादर उर्फ इकबाल (आरोपी नंबर 19) और फिरोज उर्फ थम्पी (आरोपी नंबर 20) की अलग-अलग अपीलें खारिज कर दीं।
तीनों आरोपियों ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी की विशेष अदालत द्वारा जमानत याचिका करने के निर्णय को चुनौती दी थी। श्रीनिवासन की हत्या 16 अप्रैल, 2022 को हुई थी। मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने की थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीएफआई के सदस्यों ने ‘रिपोर्टर विंग’ नाम के एक ग्रुप के माध्यम से पलक्कड़ में कई हिन्दू कार्यकर्ताओं के बारे में जानकारी जुटाई थी और संभावित टारगेट की पहचान की थी। इसके बाद, हिन्दू समुदाय और आम जनता के बीच दहशत फैलाने के लिए एक प्रमुख नेता की हत्या की साज़िश रची गई, जिसके परिणामस्वरूप श्रीनिवासन की हत्या हुई।
अशरफ, जो कथित तौर पर पीएफआई की एजुकेशन विंग के नेशनल इंचार्ज और ऑल इंडिया इमाम काउंसिल का वाइस-प्रेसिडेंट था, पर पीएफआई कैडर की भर्ती करने और हथियारों की ट्रेनिंग का इंतज़ाम करने और उसकी देखरेख करने की बड़ी साज़िश का हिस्सा होने का आरोप है।
अब्दुल और फ़िरोज़ पर श्रीनिवासन की हत्या से जुड़ी घटनाओं में सीधे तौर पर शामिल होने का आरोप है। आरोप है कि वे दोनों हत्या से पहले साज़िश की बैठकों में शामिल हुए थे और हमलावरों के साथ अपराध स्थल की ओर गए थे।
फ़िरोज़ पर घातक हथियार रखने और उस ‘हमलावर टीम’ की मदद करने का भी आरोप है, जिसने कथित तौर पर श्रीनिवासन की हत्या की थी।
आरोपियों ने हिरासत में बिताए समय और ट्रायल पूरा होने में हो रही देरी का हवाला देते हुए ज़मानत की मांग की थी। हालांकि, उच्च न्यायालय ने उन्हें ज़मानत देने से इनकार करने के स्पेशल कोर्ट के फ़ैसले में दखल देने से मना कर दिया।
न्यायालय ने कहा कि इस मामले में सिर्फ़ लंबे समय तक जेल में रहने और देरी के आधार पर ज़मानत नहीं दी जा सकती, विशेषकर इसलिए क्योंकि आरोपियों पर लगे आरोप बहुत गंभीर हैं। इनमें हत्या, इंडियन पीनल कोड, 1860 के तहत आपराधिक साज़िश और अनलॉफुल एक्टिविटीज़ (प्रिवेंशन) एक्ट, 1967 (UAPA) के तहत आतंकवादी गतिविधियों और साज़िश से जुड़े अपराध शामिल हैं, जिनमें से कुछ के लिए अधिकतम सज़ा मौत या उम्रकैद है।
न्यायालय ने कहा कि एक आरोपी को दी गई ज़मानत अपने आप दूसरे आरोपी को नहीं दी जा सकती, सिर्फ़ इसलिए कि वे एक ही मामले में आरोपी हैं। कथित अपराध में हर आरोपी की खास भूमिका, घटना के संबंध में उनकी स्थिति और उन पर लगे आरोपों की गंभीरता पर अलग-अलग विचार किया जाना चाहिए। न्यायालय ने कहा, “समानता का नियम यहाँ लागू नहीं होता। इस सिद्धांत को लागू करते समय, न्यायालय को उस आरोपी की भूमिका पर ध्यान देना होगा जिसकी ज़मानत अर्ज़ी पर विचार किया जा रहा है।”
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