विद्या भारती ने देश के लिए उपयोगी शिक्षा को अपनाकर समाज के सामने एक प्रतिमान स्थापित किया है
VSK Bharat
जबलपुर। विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान की कार्यकारिणी बैठक का शुभारम्भ सरस्वती शिक्षा परिषद कार्यालय के रोशनलाल सक्सेना सभागार में हुआ। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता पूज्य स्वामी नृसिंह देवाचार्य जी महाराज (नृसिंह पीठाधीश्ववर) ने की, मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति दिनेश कुमार पालीवाल जी (म.प्र. उच्च न्यायालय से सेवानिवृत्त न्यायधीश) विशिष्ट अतिथि डॉ. कृष्ण गोपाल जी (सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ), डॉ. रविन्द्र कान्हेरे जी (अ.भा. अध्यक्ष, विद्याभारती), गोविन्द चन्द्र महंत जी (अ.भा. संगठन मंत्री, विद्याभारती), देशराज जी शर्मा अ.भा. महामंत्री विद्याभारती रहे।
बैठक के प्रारम्भ में दिवंगत प्रतिष्ठित नागरिकों एवं असम और नेपाल में आई बाढ़ में असमय काल कवलीत हुए नागरिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की। बैठक की प्रस्तावना रखते हुए गोविन्द चन्द महंत जी ने कहा कि विद्या भारती का कार्य 1952 से आरम्भ होकर अब 75 वर्ष होने जा रहे हैं, अपने कार्य का लक्ष्य हिन्दुत्वनिष्ठ और राष्ट्रभक्ति है। सभी विद्यालयों और देश में शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने का जो प्रयास आरम्भ हुआ था, उस दिशा में अपना कार्य बढ़ रहा है। देश के प्रत्येक प्रदेश में विद्या भारती का शिक्षा मॉडल पहुंचा है, इसकी निरंतर समीक्षा करते हुए गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की दिशा में आगे बढ़ना, इस दृष्टि से बैठक में अनेक विषयों पर विचार विमर्श करने वाले हैं।
मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति दिनेश कुमार पालीवाल जी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने जो ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ का संदेश दिया, उसी भाव से विद्याभारती के कार्यकर्ता कार्य में लगे हैं। आप चरित्र निर्माण के महत्वपूर्ण कार्य को कर रहे हैं। भारत को स्वतंत्रता के पश्चात यह अपेक्षा थी कि भारत केन्द्रित शिक्षा व्यवस्था द्वारा भारत को विश्वगुरू बनाने की ओर अपना देश बढ़ेगा, किन्तु दुर्भाग्य से मैकाले और मार्क्स के अनुयायियों ने उसी शिक्षा को आगे बढ़ाया जो देश के लिए अनुपयोगी थी। विद्या भारती ने देश के लिए उपयोगी शिक्षा को अपनाकर समाज के सामने एक प्रतिमान स्थापित किया है। सौभाग्य से राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से भारत केन्द्रित शिक्षा का मॉडल देश के सामने आया है।
उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता करते हुए प.पू. स्वामी नृसिंह देवाचार्य जी महाराज ने कहा कि विद्या भारती शब्द अपने आप में गौरव लिये हुए है। विवेक, सम्यक कर्म, सम्यक ज्ञान, सम्यक भक्ति है। इन तीनों के समन्वय द्वारा व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण का कार्य विद्या भारती कर रही है। शिक्षा का लक्ष्य है – संस्कृति आगे बढ़नी चाहिए। अपनी धर्म संस्कृति के प्रति गौरव का भाव होना चाहिए। हमारी सनातन संस्कृति में सब एक हैं। उन्होंने कहा कि वे भाग्यशाली हैं, जिनका जीवन समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित है। राष्ट्र का निर्माण सब के प्रयासों और प्रयत्नों से होगा। वर्तमान शिक्षा नीति राष्ट्र निर्माण में सहायक होगी। विद्या भारती के सकारात्मक प्रयत्न के लिए शुभकामनाएं।
प्रारम्भ में अतिथियों का स्वागत सुधीर अग्रवाल (सचिव सरस्वती शिक्षा परिषद, जबलपुर) एवं नितिन चौधरी (सर्व व्यवस्था प्रमुख) ने किया। सत्र का संचालन विवेक शेण्डेय क्षेत्र अध्यक्ष (मध्यक्षेत्र) ने किया।
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