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मैं’ से ‘हम’ की यात्रा ही भारत के चिंतन का मूल भाव – हनुमान सिंह राठौड़

VSK Bharat

महर्षि दधीचि देहदान सम्मान के अंतर्गत परिजनों को किया गया सम्मानित

उदयपुर। पाथेय कण संस्थान, विश्व संवाद केंद्र एवं रवींद्रनाथ टैगोर आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, उदयपुर के संयुक्त तत्वाधान में हस्तीमल व्याख्यानमाला के अंतर्गत ‘हम भारत के लोग’ विषयक व्याख्यान आयोजित किया गया।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष हनुमान सिंह राठौड़ रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता पाथेय कण संस्थान के अध्यक्ष एवं हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलगुरू प्रो. नंदकिशोर पांडे ने की। रवीन्द्रनाथ टैगोर आयुर्विज्ञान महाविद्यालय उदयपुर के प्राचार्य एवं नियंत्रक डॉ. राहुल जैन एवं विश्व संवाद केंद्र उदयपुर के अध्यक्ष कमल प्रकाश रोहिला भी मंचासीन रहे।

मुख्य वक्ता हनुमान सिंह राठौड़ ने ‘हम भारत के लोग’ विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने भारत की राष्ट्रीय पहचान, भारतीय चिंतन परंपरा और ‘मैं’ से ‘हम’ बनने की यात्रा पर विचार व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि आज दुनिया के सामने यह प्रश्न महत्वपूर्ण बन गया है कि ‘हम कौन हैं?’ राष्ट्रीय पहचान को लेकर जिस प्रकार का संकट दिखाई दे रहा है, उस पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है। भारत के संदर्भ में भी हमें विचार करना होगा कि ‘मैं’ से ‘हम’ कैसे बनें और ‘हम’ की अनुभूति का आधार क्या है!

भारत के दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि संसार में दिखाई देने वाली प्रत्येक वस्तु में ईश्वर के अंश को देखने की दृष्टि प्रदान करती है। त्यागपूर्ण जीवन और समष्टि के प्रति संवेदनशीलता से ही ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा प्रारंभ होती है। भारत का चिंतन केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवार, समाज और संपूर्ण विश्व को एक इकाई के रूप में देखने की दृष्टि देता है। भारत में कुटुंब भाव इसी चिंतन का परिणाम है। त्याग और अपनत्व से परिवार का निर्माण होता है और यही भावना आगे बढ़कर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के रूप में संपूर्ण विश्व को अपना परिवार मानने की प्रेरणा देती है।

उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में मनुष्य ही नहीं, बल्कि सभी प्राणियों के प्रति संवेदना का भाव दिखाई देता है। यहाँ तक कि जीवों के प्रति सम्मान तथा परिवार और समाज में पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता जैसे उदाहरण बताते हैं कि भारतीय जीवन-दृष्टि में समस्त सृष्टि के प्रति आत्मीयता का भाव रहा है। वेद, उपनिषद ने इसी व्यापक दृष्टिकोण को समाज के सामने रखा है।

हनुमान सिंह राठौड़ ने कहा कि जो केवल स्वयं के लिए सोचता और स्वयं के लिए जीता है, वह समाज और मानवता के प्रति अपने दायित्व से विमुख हो जाता है। विभिन्न विचारधाराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि दुनिया को विभिन्न वर्गों और समूहों में बांटने वाली प्रवृत्तियों के विपरीत भारतीय चिंतन समस्त संसार के कल्याण की भावना को सामने रखता है।

उन्होंने कहा कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’, ‘प्राणियों में सद्भावना हो’ और ‘विश्व का कल्याण हो’ जैसी भावना भारतीय जीवन-दर्शन की व्यापकता को दर्शाती है। जो व्यक्ति केवल अपने समूह या अपने हित की चिंता करता है, वह ‘हम’ के भाव को विकसित नहीं कर सकता। ‘हम’ का भाव तभी विकसित होगा, जब व्यक्ति पूरे समाज और विश्व के हित के बारे में चिंतन करेगा।

भारत की ऐतिहासिक भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत ने दुनिया को शस्त्रों के माध्यम से प्रभावित नहीं किया, बल्कि ज्ञान, शिक्षा, संस्कृति, वेदों और अपने चरित्र के माध्यम से विश्व को प्रभावित किया है। भारत की सभ्यता ने लोगों को अपने चरित्र और आचरण के माध्यम से जोड़ा। भारत की यह परंपरा उसके ऋषियों और आचार्यों की देन है, जिन्होंने जीवन को कुटुंब भाव और मानवीय मूल्यों के साथ जीने का मार्ग दिखाया।

उन्होंने कहा कि आज समाज को जाति, वर्ग और विभिन्न समूहों में बांटने वाली प्रवृत्तियां दिखाई दे रही हैं। संकुचित सोच के आधार पर समाज में विभाजन पैदा करने के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसी प्रवृत्तियों के प्रति सजग रहते हुए भारतीय दर्शन और सामाजिक समरसता के आधार पर ‘हम’ के भाव को मजबूत करना होगा।

उन्होंने संविधान सभा में हुई चर्चाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि नागरिकों को संविधान सभा की चर्चाओं का अध्ययन करना चाहिए। स्वतंत्र भारत की पहचान, भाषा और राष्ट्र से जुड़े विषयों पर संविधान सभा में व्यापक विमर्श हुआ। राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के निर्धारण से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्र के प्रति ‘मां’ का भाव और अपनत्व ही नागरिकों को ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर ले जाता है।

उन्होंने कहा कि भारत को केवल राजनीतिक या भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना के रूप में समझने की आवश्यकता है। भारतीय दर्शन, समाज और संस्कृति के आधार पर हमें यह चिंतन करना होगा कि व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के प्रति ‘हम’ का भाव कैसे विकसित किया जाए।

पाथेय कण संस्थान के सचिव महेंद्र सिंहल ने कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए पाथेय कण संस्थान की यात्रा और उसकी गतिविधियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस वर्ष पाथेय कण पत्रिका ने अपने सदस्यता के पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए 1 लाख 85 हजार सदस्य जोड़ने का गौरव प्राप्त किया है। पत्रिका के माध्यम से गांव-गांव तक जनजागरण के कार्य को आगे बढ़ाया गया। संस्थान द्वारा साहित्य, सामाजिक जागरण और राष्ट्रहित से जुड़े विषयों पर निरंतर कार्य किया जा रहा है।

महर्षि दधीचि देहदान सम्मान समारोह भी आयोजित किया गया, जिसमें देहदान करने वाले व्यक्तित्वों के परिवारजनों का सम्मान किया गया।

प्रोफेसर नंदकिशोर पांडे द्वारा अध्यक्षीय उद्बोधन में पाठ्यक्रम से संबंधित जानकारी प्रदान की गई। कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रगीत वंदे मातरम् एवं समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ। अतिथिगण द्वारा भारत माता के चित्र के समक्ष पुष्पांजलि अर्पित की गई। नृत्य-सृष्टि समूह के कलाकारों ने आराधना स्वरूप शास्त्रीय नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति दी। संविधान चित्र प्रदर्शनी व साहित्य प्रदर्शनी का श्रोताओं ने अवलोकन किया।

कौन थे हस्तीमल-

हस्तीमल हिरण का जन्म राजसमंद के आमेट में हुआ था। विद्यार्थी जीवन से ही उन्होंने संघ कार्यों से जुड़कर अपना जीवन राष्ट्रकार्य को समर्पित कर दिया। उदयपुर में प्रचारक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने संघ के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। वर्ष 2004 से 2015 तक अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रहे। अध्ययन, संगठन, आत्मीयता और सेवा उनके जीवन की प्रमुख विशेषताएं रहीं।

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September 14th 2026, 3:31 am
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